वचन देह में प्रकट होता है

विषय-वस्तु

परमेश्वर के समक्ष अपने आप को शांत रखना

परमेश्वर के समक्ष अपने आप को शांत रखना, परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का एक महत्वपूर्ण क़दम है, और यह एक ऐसा पाठ है जो समय की मांग है। परमेश्वर के समक्ष अपने आप को शांत रखने की प्रक्रिया में प्रवेश करने का तरीका यह है:

1. अपने मन को बाहरी चीज़ों से हटाले, परमेश्वर के समक्ष शांत रह और अपने आप को केंद्रित करके परमेश्वर से प्रार्थना कर।

2. परमेश्वर के समक्ष शांत रहकर परमेश्वर के वचनों को खा, पीऔर उनका आनंद ले।

3. परमेश्वर के प्रेम पर ध्यान लगा और मनन कर और उसके कार्यों पर अपने हृदय से विचार करना एक निरन्तर आदत बना ले।

सर्वप्रथम, प्रार्थना के विषय से आरंभ कर। एक चित्त रह तथा एक समय पर प्रार्थना कर। चाहे कितनी भी समय की कमी हो या कितना भी व्यस्त हो या तुझ पर कुछ भी क्यों ना बीते, हर दिन साधारण तौर पर प्रार्थना कर, साधारण तौर पर परमेश्वर के वचन को खा और पी। जब तक तू परमेश्वर के वचन को खाता औरपीता रहेगा, चाहे तेरी कोई भी परिस्थिति क्यों ना हो, तेरी आत्मा विशेष तौर से प्रसन्न ही रहेगी, चारों ओर की चीज़ों और लोगों, घटनाओं और वस्तुओं से तू प्रभावित नहीं होगा। जब तू हृदय से परमेश्वर का मनन करता हो, तो जो बाहर हो रहा है वह तुझे परेशान नहीं कर सकता। महत्ता होने का यही अर्थ है। पहले प्रार्थना से आरम्भ कर: परमेश्वर के सामने शांति के साथ प्रार्थना करना बहुत फलदायक है। इसके पश्चात परमेश्वर के वचन को खा और पी, उसके वचनों पर मनन करके उससे प्रकाश पाने का प्रयास कर, अभ्यास करने की राह ढूँढने का प्रयत्न कर, परमेश्वर की कही गई बातों का उद्देश्य जान और भटकाव के बिना समझ। आमतौर से, अपने हृदय में सामान्य रूप से परमेश्वर के निकट आ, परमेश्वर के प्रेम पर मनन कर, बाहरी चीज़ों से प्रभावित हुये बिना, उसके वचनों पर मनन कर। जब तेरा हृदय उस सीमा तक शांत हो कि तू ध्यान लगाने में सक्षम हो, ताकि तू अपने अंदर परमेश्वर के प्रेम पर मनन कर सके और वास्तव में परमेश्वर के निकट आ सके, चाहे जो भी तेरा वातावरण हो, और तब तू एक ऐसी अवस्था में पहुँच जाता है कि तू अपने हृदय में प्रशंसा करता है, और यह प्रार्थना करने से भी अच्छा है, तब तू एक विशेष कद को प्राप्त करेगा। यदि ऊपर कही गयी अवस्थाएं तू प्राप्त कर पाते है तो यह प्रमाणित हो जाएगा कि तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष सही मायने में शांत है। यह पहला क़दम है; यह एक मूल अभ्यास है। जब लोग परमेश्वर के सामने शांत होने में सक्षम होंगे तभी पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशित होंगे, केवल तभी वे परमेश्वर के साथ वास्तविक संवाद कर पायेंगे और परमेश्वर की इच्छा और पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझ पायेंगे, और इससे वे आध्यात्मिक जीवन की सही राह पर प्रवेश कर पायेंगे। परमेश्वर के सामने जीवन बिताने के लिये अपने आप को तैयार करना, एक ऐसी गहराई में पहुँचना ताकि अपने आप से बगावत कर सकें, अपना तिरस्कार कर सकें और परमेश्वर के वचनों में जी सकें, यही वास्तविक रूप में परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का अर्थ है। अपने आप का तिरस्कार करना, स्वयं को कोसना, और अपने आप से बगावत करना, यह सब परमेश्वर के कार्य प्राप्ति के फलस्वरूप है और लोग यह कर नहीं सकते हैं। इसलिये अपने मन को परमेश्वर के समक्ष शांत रखने का अभ्यास वह पाठ है जिसमें लोगों को अविलम्ब प्रवेश करने की आवश्यकता है। कुछ लोग साधारण तौर पर अपने मन को परमेश्वर के सामने शांत नहीं रख पाते, यहाँ तक कि प्रार्थना करते समय भी अपने मन को शांत नहीं रख पाते। यह परमेश्वर के माप-दंड से बहुत अधिक दूर है! यदि तुम लोगों का मन परमेश्वर के सामने शांत न हो तो क्या पवित्र आत्मा तुम लोगों को प्रेरित कर सकता है? यदि तू परमेश्वर के सामने शांत नहीं रह पाता है तो किसी के आने से तेरा ध्यान भंग हो सकता है, लोगों के बात करने पर तेरा ध्यान भंग हो सकता है, और जब दूसरे लोग कुछ और कार्य करते हैं तो तेरा मन दूर भटक सकता है, तो तू वह नहीं है जो परमेश्वर के सामने जिंदगी जी रहा है। यदि तेरा मन वास्तव में परमेश्वर के सामने शांत रहता है तो संसार के चारों ओर होने वाली किसी भी बात से तू विचलित नहीं होगा, कोई व्यक्ति या घटना, या वस्तु तुझको हथिया नहीं पायेगा। यदि तुम लोग इसमें प्रवेश पाते हो, तो सारी नकारात्मक सोच या बातें जैसे की मानवीय धारणाएँ, जीवनदर्शन, लोगों के साथ असामान्य संबंध और इस तरह के विचार स्वाभाविक रूप से गायब हो जायेंगे। क्योंकि तू सदा परमेश्वर के वचनों पर विचार कर रहे है और तेरा हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर आकर्षित हो रहा है और परमेश्वर के सत्य वचनों से परिपूर्ण होता जा रहा है, इसलिए वे नकारात्मक बातें अनजाने में ही दूर हो जायेंगी। जब नई सकारात्मक बातें तुझे अपने वश में करेंगी, तब पुरानी नकारात्मक बातों के लिये कोई स्थान नहीं रहेगा। इसलिए नकारात्मक बातों की ओर ध्यान न लगा। उसे रोकने के लिये तुझे कोई प्रयास नहीं करना पड़ेगा। केवल परमेश्वर के सामने अपने आप को शांत रखने का प्रयत्न कर। परमेश्वर के वचनों को और अधिक खा और पी और उनका आनंद ले। परमेश्वर की स्तुति के और अधिक गीत गा, और परमेश्वर को अपने जीवन में कार्य करने का अवसर दे क्योंकि परमेश्वर इस समय व्यक्तिगत रूप से सिद्ध लोगों को चाहता है। वह तेरे हृदय को जीतना चाहता है, उसका आत्मा तेरे हृदय को प्रेरित करना चाहता है, और यदि तू परमेश्वर के सामने, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में जीवन बिताएगा तो तू परमेश्वर को तृप्त करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों में ध्यान लगाकर जियेगा, और पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाश को प्राप्त करने के लिये उसकी संगति में और संवादकरेगा, तो वह सारी धार्मिक धारणायें, स्वयं को धर्मी ठहराने की प्रवृत्ति और अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने की इच्छा, सब गायब हो जायेंगी, तब तू समझ पायेगा कि किस प्रकार परमेश्वर के लिये व्यय करना है, कैसे परमेश्वर से प्रेम करना है, और कैसे उसे तृप्त करना है। तब जो बातें परमेश्वर के बाहर की हैं वह अनजाने में भुला दी जायेंगी।

परमेश्वर के वचनों का ध्यान करना और प्रार्थना करना, साथ ही साथ परमेश्वर के वास्तविक वचनों को खाना और पीना – यही है वह पहला क़दम जिससे हम परमेश्वर के समक्ष शांति में रह सकते हैं। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता है तो पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और प्रकाश तेरे साथ रहेगी।

परमेश्वर के सामने शांत रहने पर विश्वास करने से ही सभी आध्यात्मिक जीवन प्राप्त किया जा सकता है। इससे पहले कि तुम लोग पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित किए जा सको तुम लोगों को प्रार्थना करते समय परमेश्वर के समक्ष शांत रहना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को खाते पीते समय परमेश्वर के आगे शान्त रह कर, तुम लोग पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध और प्रकाशमान हो सकते हो और परमेश्वर के सत्य वचनों को समझने में सक्षम हो सकते हो। तेरे नियमित ध्यान और सहभागिता में, और जब तू अपने हृदय से परमेश्वर के निकट जा रहा होता है, केवल जब तू परमेश्वर के सामने शांत होता हो, तभी तेरी परमेश्वर से वास्तविक निकटता हो सकती है, परमेश्वर का प्रेम, परमेश्वर के कार्य की वास्तविक समझ हो सकती है, और परमेश्वर के उद्देश्यों की तरफ चिंतित हो सकता है। जितना अधिक तू परमेश्वर के सामने शांत रहने में सक्षम होता हो उतना ही तू प्रकाशमान होगा और उतना अधिक तू स्वयं अपने भ्रष्ट स्वभाव को समझने में सक्षम हो पायेगा और पहचान पायेगा कि तुझमें किस चीज की कमी है, तुझे कहां प्रवेश करना है, तुझे कौन से कार्य में सेवा करनी चाहिए, और तुझमें कहाँ दोष है। यह सब परमेश्वर के आगे शांत रहने से प्राप्त होता है। यदि तू परमेश्वर के आगे शांत रहने की किसी गहराई तक पहुंच पाता है, तो आत्मा के कुछ भेद को तू छू पायेगा, और समझ पायेगा कि वर्तमान में परमेश्वर तेरे ऊपर क्या कार्य करना चाहता है, उसके वचनों की गहराई को छू पायेगा और उसके वचन के सार को छू पायेगा। उसके वचन के अर्थ से वचन में बने रहने से तू कार्यों के राह को सही और स्पष्ट रूप से देख सकता है। यदि तू अपनी आत्मा की खास गहराई तक शांत नहीं रह पाता है तो तू थोड़ा बहुत आत्मा का स्पर्श अनुभव करेगा, और कुछ आनंद और शांति महसूस करेगा, लेकिन तू अन्य कुछ भी प्रगाढ़ नहीं प्राप्त कर पायेगा। मैंने पहले भी कहा है कि यदि कोई अपना पूरा सामर्थ्य न उपयोग करें तो उसके लिए मेरी वाणी सुनना या मेरा चेहरा देखना कठिन होगा। यह बाहरी सामर्थ्य नहीं परंतु परमेश्वर के आगे शांत रहकर गहराई को प्राप्त करने से तात्पर्य रखता है। जो व्यक्ति वास्तव में परमेश्वर के आगे शांत रहता है वह बहुत सारे सांसारिक बंधनों से अपने आप को मुक्त कर सकता है और परमेश्वर उसे पूर्णतया अपना लेता है। जो भी अपने आपको परमेश्वर के आगे शांत नहीं रख सकता है वह निश्चित ही स्वछंद और असंयमित है। जो लोग अपने आप को परमेश्वर के आगे शांत रख पाते हैं वे लोग परमेश्वर के समक्ष पवित्र होते हैं, और वे लोग और परमेश्वर के लिए लालायित रहते हैं। जो इस प्रकार शांत रहते हैं वह जीवन की ओर अपने आप को केंद्रित करते हैं, आत्मा में सहभागिता पर ध्यान देते हैं, परमेश्वर के वचनों के प्यासे होते हैं, और सत्य को खोजते हैं। जो लोग परमेश्वर के आगे शांत रहने में ध्यान नहीं देते हैं और इसका अभ्यास नहीं करते हैं, वे व्यर्थ हैं और संसार से पूरी तरह जुड़े रहते हैं। उनमें जीवन नहीं है। भले ही वे कहते हैं कि वे परमेश्वर पर विश्वास रखते हैं परंतु केवल दिखावटी। जो परमेश्वर के आगे शांत होते हैं वही केवल सिद्ध और संपूर्ण होते हैं। इसलिए वे लोग जो परमेश्वर के समक्ष शांत होते हैं वे बड़े अनुग्रह प्राप्त किए होते हैं। वे लोग जो दिन में थोड़ा समय देकर परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हैं, और बाहरी बातों से पूरी तरह घिरे रहते हैं, और अनंत जीवन में प्रवेश को कोई ध्यान नहीं देते हैं, वे सब ढोंगी हैं और उनके भविष्य में प्रगति प्राप्त करने के कोई आसार नहीं होते। जो वास्तव में परमेश्वर के आगे शांत रह सकते हैं और परमेश्वर से संवाद करते हैं, वे ही परमेश्वर के लोग होते हैं।

परमेश्वर के आगे आने और उसके वचन को अपना जीवन मानकर अंगीकार करने के लिए तुझे पहले उसके आगे शांत रहना होगा। जब तू उसके आगे शांत रहेगा तभी वह तुझे प्रबुद्ध करेगा और तुझे समझाएगा। परमेश्वर के समक्ष जितना अधिक लोग शांत रहेंगे उतना अधिक वे प्रकाशमान और प्रबुद्ध होंगे। इसके लिए आवश्यक है कि तुझमें भक्ति और विश्वास हो। केवल ऐसे ही वे परिपूर्ण हो सकते हैं। इसलिए आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने का मूल अभ्यास परमेश्वर के आगे शांत रहना है। तेरे सभी आध्यात्मिक प्रशिक्षण तभी प्रभावी होते हैं जब तू परमेश्वर के समक्ष शांत हो। यदि तू परमेश्वर के समक्ष हृदय को शांत नहीं रख सकता है तो तू पवित्र आत्मा के कार्यों को प्राप्त नहीं कर पायेगा। चाहे तू जो कुछ भी करे यदि तेरा मन परमेश्वर के समक्ष शांत रहता है तो तू सही अर्थ में परमेश्वर के सानिध्य में जीता है। यदि तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत है और उसके करीब है तो चाहे तू जो भी करे, इससे साबित होता है कि तू ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के सामने शांत रहता है। जब तू लोगों से वार्तालाप करता है, उठता बैठता है, तू यह कह पायेगा, "मेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है और बाहरी तत्वों पर केंद्रित नहीं है और मैं परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकता हूँ।" तो यह व्यक्ति है जो परमेश्वर के समक्ष शांत है। ऐसी चीजों के संपर्क में नहीं आ जो तेरे हृदय को बाहरी दुनिया की तरफ मोड़ सकते हैं; और ऐसे लोगों से दूर रह जो तेरे हृदय को परमेश्वर से दूर कर सकते हैं। उस हर चीज का वर्जन कर जो तेरे हृदय को परमेश्वर से दूर करता है। यह तेरे लिए लाभदायक सिद्ध होगा। अभी पवित्र आत्मा के महान कार्य का वक्त है। यह वह समय है जब परमेश्वर स्वयं लोगों को सुधार रहा है। यदि तू अभी परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकता तो तू उनमें से है जो परमेश्वर के सिंहासन की ओर अग्रसर नहीं है। यदि तू परमेश्वर के अलावा अन्य चीजों का पीछा करता है तो परमेश्वर का निर्देशन नहीं प्राप्त कर पायेगा। जो लोग आज भी परमेश्वर की वाणी को सुन सकते हैं परंतु उसके समक्ष शांत नहीं रहते, वे सत्य से और परमेश्वर के वचन से प्रेम नहीं करते हैं। अगर तू आज अपने आप को समर्पित नहीं करेगा तो कब करेगा? पूर्ण समर्पण का अर्थ है परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना। यही एक सार्थक बलिदान है। जो कोई अब सचमुच अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करता है वह उसके द्वारा निस्संदेह पूर्ण किया जाएगा। ऐसे व्यक्ति को किसी प्रकार की आलोचना से परेशानी नहीं हो सकती। चाहे यह तेरी छंटाई करना हो, या तेरे साथ निपटना हो, या चाहे तुझे किसी प्रकार की असफलता या निराशा का सामना करना पड़े, तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए। चाहे दुनिया का तेरे प्रति व्यवहार कैसा भी हो, तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष शांत रहना चाहिए। चाहे जैसी भी परिस्थिति का सामना करना पड़े, मुश्किलें, पीड़ा, उत्पीड़न या परीक्षाओं का सामना हो, तेरा हृदय परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत होना चाहिए। सिद्ध किए जाने का यही तरीका है। परमेश्वर की उपस्थिति में शांति धारण कर ही परमेश्वर के वास्तविक वचनों को स्पष्ट रुप से जान पायेगा, पवित्र आत्मा के प्रबोधन पर अमल कर पायेगा, परमेश्वर के इरादों को जानकर अपनी सेवा को पूरी कर पायेगा। इस प्रकार तू पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन को समझकर उस के नेतृत्व में चल पायेगा। यह सब परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का परिणाम है। जब लोग परमेश्वर के वचनों की स्पष्टता से नहीं समझते, उनको अभ्यास में लाने का तरीका नहीं जानते, परमेश्वर के गंतव्य को छू नहीं पाते या किसी प्रकार का व्यावहारिक सिद्धांत नहीं रखते, यह इसलिए होता है क्योंकि परमेश्वर के समक्ष उनका हृदय शांत नहीं रहता। परमेश्वर के समक्ष शांत रहने का उद्देश्य यह है कि हम अकपट और दृढ़ रहें और अंततः सत्य को समझने और परमेश्वर के वचनों में यथार्थता और पारदर्शिता को ढूंढें ताकि अंत में सत्य की समझ को प्राप्त करें और परमेश्वर की तलाश करें।

यदि तू निरंतर अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रखसकता, तो परमेश्वर तुझे सिद्ध नहीं कर पाएगा। यदि कोई मनुष्य इच्छुक नहीं हैं या दिल नहीं रखता, बिना हृदय का मनुष्य परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह सकता। वे नहीं जानते कि परमेश्वर कितने कार्य करता है अथवा क्या कुछ कहता है, ना ही वे यह समझ पाते हैं कि उन्हें कैसे अभ्यास में लाया जाए। क्या ये लोग बिना हृदय वाले मनुष्य नहीं है? क्या बिना हृदय वाले मनुष्य परमेश्वर के समक्ष शांत रह सकते हैं? क्या वे लोग परमेश्वर के समक्ष शांत हो सकते हैं जिनका हृदय ही ना हो? बिना हृदय वाले लोगों को परमेश्वर सिद्ध नहीं कर सकता और वे पशुओं में गिने जाएंगे। परमेश्वर ने स्पष्ट और पुख्ता तरीके से कहा है फिर भी तेरा हृदय प्रेरित नहीं होता है और तू परमेश्वर के सामने शांत नहीं हो पाता; तो क्या यह पशु समान बात नहीं है? परमेश्वर के सामने शांत रहने के अभ्यास में कई लोग भटक जाते हैं। जब भोजन पकाने का समय हो तो वह नहीं पकाते, जब कार्य करने का समय हो तो वह नहीं करते, तो केवल प्रार्थना और ध्यान ही करते रहते हैं। परमेश्वर के आगे शांत रहने का अर्थ यह नहीं है कि न पका, न खा और न ही कि जीवन को नज़रअंदाज़ कर परंतु इसका अर्थ है कि हर परिस्थिति में परमेश्वर का स्थान अपने हृदय में बनाए रख। जब तू प्रार्थना कर तो ठीक तरह से घुटने टेककर प्रार्थना कर; जब तू काम कर या भोजन पका, तो परमेश्वर के समक्ष शांत रहकर उसके वचनों का ध्यान कर और भजन गा। तू चाहे जिस किसी परिस्थिति में हो, तेरा अभ्यास करने का यही तरीका है, परमेश्वर के निकट रहने के लिए जो कुछ कर सकता हो, कर, परमेश्वर के आगे शांत रहने के लिए जो कुछ कर सकता हो, कर। जब परिस्थितियां अनुकूल हों तो एकचित्त होकर प्रार्थना कर; और जब परिस्थितियां अनुकूल न हों तो अपने हाथों से काम करते हुए भी हृदय से परमेश्वर के निकट बने रह। जब भी तू परमेश्वर के वचनों को खा और पी सकता हो, खा और पी। जब प्रार्थना कर सकता हो, तो कर; जब परमेश्वर का ध्यान कर सकता हो तब उसका ध्यान कर। अपने परिवेश पर आधारित प्रवेश को प्राप्त करने के लिए हर संभव अभ्यास कर। कुछ लोग परमेश्वर के समक्ष तभी शांत हो पाते हैं जब कुछ नहीं होता परंतु जैसे ही कुछ हो जाता है उनका हृदय परमेश्वर से दूर हो जाता है। इसे परमेश्वर के समक्ष शांत होना नहीं कहते। सही तरीका यह है कि चाहे जो परिस्थिति हो हमारा हृदय परमेश्वर को न छोड़े, या बाहरी बातों से, घटनाओं और लोगों से हम विचलित न हों: यही वह व्यक्ति है जो वास्तव में परमेश्वर के समक्ष शांत होता है। कुछ लोग कहते हैं कि प्रार्थना सभा में प्रार्थना करते समय उनका मन शांत हो सकता है परंतु सहभागिता में वह परमेश्वर के समक्ष शांत नहीं रह पाते, उनका ध्यान भटक जाता है। इसे परमेश्वर के समक्ष शांत रहना नहीं कहते हैं। बहुत से लोग आज इसी स्थिति में है और उनका मन परमेश्वर के समक्ष हमेशा शांत नहीं हो पाता है। इसलिए तुम सबको चाहिए कि इस बात में अपने को अभ्यस्त करने के लिए अधिक परिश्रम करो। जीवन के अनुभव के पथ पर, एक कदम रखकर, सही राह से प्रवेश करो और परमेश्वर के द्वारा सिद्ध बनाए जाने के लिए उसकी राह पर चलो।