केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

तुम सभी परीक्षण और शोधन के बीच हो। शोधन के दौरान तुम्हें परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? शोधन का अनुभव करने के बाद लोग परमेश्वर को सच्ची स्तुति अर्पित कर पाते हैं, और शोधन के दौरान वे यह देख सकते हैं कि उनमें बहुत कमी है। जितना अधिक तुम्हारा शोधन किया जाता है, उतना ही अधिक तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो; जितना अधिक लोगों का शोधन किया जाता है, उतना ही अधिक वे परमेश्वर को प्रेम देते हैं। तुम लोगों को यह बात समझनी चाहिए। लोगों का शोधन क्यों किया जाना चाहिए? इसका लक्ष्य क्या परिणाम प्राप्त करना है? मनुष्य पर परमेश्वर के शोधन के कार्य का क्या अर्थ है? यदि तुम सच में परमेश्वर को खोजते हो, तो एक ख़ास बिंदु तक उसके शोधन का अनुभव कर लेने पर तुम महसूस करोगे कि यह बहुत अच्छा और अत्यंत आवश्यक है। शोधन के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शोधन को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शोधन के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो, “परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है और तू मुझमें अपना और अधिक प्रेम गढ़।” यह शोधन के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नींव की तरह इस्तेमाल करोगे, तो शोधन तुम्हें परमेश्वर के और निकट लाकर परमेश्वर के साथ तुम्हारी घनिष्ठता बढ़ा सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित कर दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शोधन के दौरान तुम निश्चित रूप से परमेश्वर को नहीं नकारोगे या छोड़ोगे। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध ज्यादा से ज्यादा घनिष्ठ और सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारी संगति ज्यादा बार-बार हो जाएगी। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे तो तुम परमेश्वर की रोशनी में अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम्हारे ऊपर आ जाएँगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर के लिए गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। जब तुमने परमेश्वर के लिए गवाही दी होगी, तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो वास्तव में उससे प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति जो खुशी-खुशी उसके लिए अपना जीवन दे देगा और कि तुम परमेश्वर के गवाह हो और ऐसे व्यक्ति हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है। जिस प्रेम ने शोधन का अनुभव किया है वह मजबूत होता है, नाज़ुक नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर तुम्हें कब या कैसे अपने परीक्षणों के अधीन करता है, तुम अपने जीवन का अनादर करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी सब कुछ त्याग देते हो और परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी कुछ भी सह लेते हो, इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा और तुम्हारी आस्था में वास्तविकता होगी। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

यदि लोग शैतान के प्रभाव में आ जाते हैं, तो उनके भीतर परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं रहता, और उनके पिछले दर्शन, प्रेम और संकल्प लुप्त हो जाते हैं। लोग महसूस किया करते थे कि उनसे परमेश्वर के लिए दुःख उठाना अपेक्षित है, परंतु आज वे ऐसा करना निंदनीय समझते हैं, और उनके पास शिकायतों की कोई कमी नहीं होती। यह शैतान का कार्य है, इस बात का संकेत कि वे शैतान की शक्ति के अधीन आ गए हैं। यदि तुम्हारे सामने यह स्थिति आ जाए, तो तुम्हें तुरंत प्रार्थना करनी होगी और जितनी जल्दी हो सके, उसे उलट देना चाहिए—यह शैतान के हमला करने पर तुम्हारी रक्षा करेगा। कड़वे शोधन के दौरान मनुष्य सबसे ज्यादा आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शोधन के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपना संकल्प जगाना चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शोधन करे, तुम्हें परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और संगति की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतना ही आसान तुम्हारे लिए नकारात्मक बनना होगा और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हें अपनी भूमिका निभाने की जरूरत होती है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से न निभाओ, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने के लिए अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय के अलावा और किसी चीज का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है या यह कि तुमने खराब किया है—कुल मिलाकर, तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम आत्मतुष्ट नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो, “परमेश्वर! मैं यह नहीं कहता कि दूसरे मुझे माफ कर दें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा जमीर शांत हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहता हूँ। मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ। यद्यपि मैं मूर्ख हूँ, और मुझमें काबिलियत की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू प्यारा है, और मैं वह सब कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।” जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तुम्हारे परमेश्वर-प्रेमी हृदय का उदय होता है, और तुम अपने हृदय में कहीं अधिक सहज महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। जब तुम इसका अनुभव करोगे, तो तुम दो बार असफल होगे और एक बार सफल होगे, या पाँच बार असफल होगे और दो बार सफल होगे, और जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तो केवल असफलता के बीच ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को देख पाओगे और खोज पाओगे कि तुममें क्या कमी है। जब तुम अगली बार ऐसी ही स्थिति का सामना करो, तो तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए, अपनी गति नियंत्रित करनी चाहिए और अपनी प्रार्थनाएँ बढ़ा देनी चाहिए और तुम धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में विजयी होने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हारी प्रार्थनाओं के परिणाम देने का यही अर्थ है। केवल जब तुम देखो कि तुम इस बार सफल हुए हो, कि तुम्हें अंदर से संतुष्टि मिली है और कि जैसे ही तुम प्रार्थना करते हो वैसे ही तुम परमेश्वर को महसूस कर सकते हो और कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति ने तुम्हें नहीं छोड़ा है, तभी तुम जान पाओगे कि परमेश्वर तुम पर कैसे कार्य करता है। यदि तुम इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे अनुभव में एक मार्ग होगा। यदि तुम सत्य को अभ्यास में नहीं लाओगे, तो तुम अपने भीतर पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित रहोगे। परंतु यदि तुम चीज़ों का सामना करते हुए सत्य को अभ्यास में लाते हो, तो भले ही तुम भीतर से आहत हो, लेकिन पवित्र आत्मा बाद में तुम्हारे साथ रहेगा, जब तुम प्रार्थना करोगे तो परमेश्वर की उपस्थिति महसूस कर पाओगे, तुममें परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का सामर्थ्य होगा, और अपने भाई-बहनों के साथ संगति के दौरान तुम्हारे अंतःकरण पर कोई बोझ नहीं होगा, और तुम शांति महसूस करोगे, और इस तरह से तुम वह प्रकाश में ला पाओगे, जो तुमने किया है। चाहे दूसरे कुछ भी कहें, यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य रहता है, तुम दूसरों द्वारा बाधित नहीं होते और हर चीज से ऊपर उठने में सक्षम हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा परमेश्वर के वचनों का अभ्यास प्रभावी रहा है।

जितना अधिक परमेश्वर लोगों का शोधन करता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की पीड़ा उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है; यह उन्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में अधिक सक्षम बनाती है, परमेश्वर के साथ उनका अधिक निकटता का संबंध हो जाता है और वे परमेश्वर के अथाह प्रेम और उसके अद्भुत उद्धार को बेहतर तरीके से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शोधन से होकर गुजरना होगा—तुम लोगों को इस प्रक्रिया से गुजरना होगा और इस चरण पर निर्भर रहना होगा—केवल तभी तुम लोग परमेश्वर के इरादों को पूरा कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे। शोधन वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शोधन और कड़वे परीक्षणों के माध्यम से ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम विकसित हो सकता है। कष्टों के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए कोई सच्चा प्रेम नहीं रहता है; यदि भीतर से उनका परीक्षण नहीं किया जाता, और यदि वे सच्चे शोधन के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय हमेशा बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शोधन किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और तुम उन अनेक कठिनाइयों पर काबू पाने में असमर्थ हो जिनका तुम सामना करते हो और तुम देखोगे कि तुमने बहुत अधिक विद्रोह किया है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी वास्तविक दशाओं को सचमुच जान पाते हैं; परीक्षण लोगों को पूर्ण बनाने में अधिक सक्षम होते हैं।

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया और वह बहुत-सी कष्टदायक तपन से होकर गुजरा। यह शोधन परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव बन गया और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे अर्थपूर्ण अनुभव हो गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने में समर्थ हो पाया, एक अर्थ में यह परमेश्वर से प्रेम करने के उसके संकल्प के कारण था परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह उस शोधन और पीड़ा के कारण था, जिससे होकर वह गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक बन गई और ऐसी चीज बन गई जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शोधन की पीड़ा से नहीं गुजरते तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की पसंद से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है और मूलतः परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। भले ही वे अपने दिलों में जो सोचते हैं, वह सब परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की खातिर ही होता हो—वह किसी मानवीय विचार से रहित प्रतीत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि सब परमेश्वर की खातिर है—फिर भी जब परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अभ्यास उसके सामने लाया जाता है तो वह उसे स्वीकृति या आशीष नहीं देता। भले ही लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लें और जान जाएँ तो भी इसे परमेश्वर से प्रेम करने की निशानी नहीं कहा जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि इन लोगों में परमेश्वर से प्रेम करने की वास्तविकता है। शोधन से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शोधन के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ का अनुभव कर सकते हैं। उस समय जब वे इन सत्यों का अभ्यास करते हैं, तब वे ऐसा सटीकता से और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कर पाने में समर्थ होते हैं; उस समय उनके अभ्यास में उनके अपने विचार कम हो जाते हैं, उनकी भ्रष्टता घट जाती है और उनकी मानवीय भावनाएँ कम हो जाती हैं। केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक इच्छा से हासिल नहीं होता है और न ही इसे केवल उस सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, वे शोधन के दौरान बहुत पीड़ा से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के इरादों के अनुसार बनेगा। अपनी इस अपेक्षा में कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परमेश्वर यह अपेक्षा नहीं करता कि मनुष्य अपने जोश या मरज़ी का उपयोग करके उससे प्रेम करे; बल्कि यह चाहता है कि मनुष्य वफ़ादारी और सत्य के साथ उसकी सेवा करे। केवल इस तरह का प्रेम ही सच्चा प्रेम है। परंतु मनुष्य भ्रष्टता के बीच रहता है, और इसलिए वह परमेश्वर की सेवा करने में सत्य और वफ़ादारी का प्रयोग करने में असमर्थ है। वह या तो परमेश्वर के संबंध में बहुत अधिक जोशीला है या फिर बहुत ठंडा और बेपरवाह; वह या तो परमेश्वर से हद से ज्यादा “प्रेम” करता है या उससे हद से ज्यादा घृणा करता है। जो भ्रष्टता के बीच जीते हैं, वे सदैव इन दोनों अतियों के बीच जीते हैं, वे सदैव अपनी मरज़ी के मुताबिक जीते हैं, फिर भी वे यह मानते हैं कि वे सही हैं। यद्यपि मैंने बार-बार इसका उल्लेख किया है, फिर भी लोग इसे गंभीरता से लेने में असमर्थ हैं, वे इसके महत्व को गहराई से समझने में अक्षम हैं, और इसलिए वे खुद को धोखा देने वाली आस्था के बीच, परमेश्वर के प्रति प्रेम के भ्रम में जीते हैं, जो उनकी मनमानी पर आश्रित है। पूरे इतिहास में, जैसे-जैसे मनुष्यजाति का विकास हुआ है और युग बीते हैं, मनुष्य से परमेश्वर की माँगें पहले से अधिक ऊँची होती गई हैं, और उसने लगातार यह अपेक्षा की है कि मनुष्य पूरी तरह से उसके प्रति समर्पित हो जाए। परंतु मनुष्य का ज्ञान अधिकाधिक धुँधला और अस्पष्ट होता गया है, और साथ ही साथ परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम अधिकाधिक अशुद्ध होता गया है। मनुष्य की दशा और जो कुछ वह करता है, वह सब लगातार परमेश्वर के इरादों के अनुसार नहीं है, क्योंकि मनुष्य शैतान द्वारा पहले से अधिक गहराई तक भ्रष्ट हो गया है। इसमें यह आवश्यक हो जाता है कि परमेश्वर उद्धार का और अधिक तथा बड़ा कार्य करे। मनुष्य परमेश्वर से अपनी अपेक्षाएँ अधिकाधिक बढ़ाता जा रहा है, और परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम निरंतर कम होता जा रहा है। लोग विद्रोहशीलता में, सत्य के बिना रहते हैं, वे ऐसा जीवन जीते हैं जो मानवता से रहित है; न केवल उनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी प्रेम नहीं है, बल्कि वे विद्रोहशीलता और विरोध से भरे हुए हैं। यद्यपि वे सोचते हैं कि उनमें परमेश्वर के प्रति पहले से ही सर्वाधिक प्रेम है, और वे उसके प्रति इससे अधिक सहनशील नहीं हो सकते, परंतु परमेश्वर ऐसा नहीं मानता। उसे यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि उसके प्रति मनुष्य का प्रेम कितना मिलावटी है, और मनुष्य के दिखावटी जोश के कारण उसने कभी मनुष्य के बारे में अपनी राय नहीं बदली है, न कभी मनुष्य के समर्पण के परिणामस्वरूप उसकी दयालुता का “बदला चुकाया” है। मनुष्य के विपरीत, परमेश्वर में भेद पहचानने की क्षमता है : वह जानता है कि कौन उससे वास्तव में प्रेम करता है और कौन नहीं, और मनुष्य के क्षणिक संवेगों के कारण जोश में आने और आपा खो देने के बजाय वह मनुष्य के सार और व्यवहार के अनुसार बरताव करता है। परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है, और उसकी अपनी गरिमा और अपने निश्चय हैं; मनुष्य आखिरकार मनुष्य है, और परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रेम अगर सत्य के अनुसार नहीं होगा, तो परमेश्वर उससे भ्रमित नहीं होगा। इसके विपरीत, वह मनुष्य के समस्त कार्यों के प्रति उपयुक्त रूप से व्यवहार करता है।

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का रवैया देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति समर्पण दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके न्याय और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव की खातिर होता है। इसलिए परमेश्वर उन लोगों पर शोधन का कार्य करता है, जो सत्य खोजने के लिए तैयार हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से समझा-बूझा नहीं जाता। चूँकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है और अंततः परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसा स्वभाव रखना असंभव है, इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को समझना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शोधन या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी सफल नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शोधन बेहद कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शोधन के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है, मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करता है, अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है और अधिक व्यावहारिक काट-छाँट करता है। तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से मनुष्य अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान प्राप्त करता है, और उसे परमेश्वर के इरादों की और अधिक समझ प्राप्त होती है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के लिए अधिक सच्चा और अधिक शुद्ध प्रेम प्राप्त होता है। शोधन का कार्य क्रियान्वित करने में परमेश्वर के लक्ष्य ऐसे होते हैं। परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले समस्त कार्य के अपने लक्ष्य और महत्व होते हैं; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना होता है। बल्कि इसका अर्थ है शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना और उसके जीने के संपूर्ण तरीके को बदलना। शोधन मनुष्य की व्यावहारिक परीक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का एक रूप है; केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम अपनी अंतर्निहित भूमिका निभा सकता है।

पिछला: पतरस ने यीशु को कैसे जाना

अगला: परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें