2.2. भ्रष्ट मनुष्य के शैतानी स्वभाव और उसकी प्रकृति-सार को प्रकट करने पर वचन

81. परमेश्वर के विरुद्ध मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का स्रोत शैतान के द्वारा उसकी भ्रष्टता है। क्योंकि वह शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इसलिये मनुष्य की अंतरात्मा सुन्न हो गई है, वह अनैतिक हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं, और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने से पहले, मनुष्य स्वाभाविक रूप से परमेश्वर का अनुसरण करता था और उसके वचनों को सुनने के बाद उनका पालन करता था। उसमें स्वाभाविक रूप से सही समझ और विवेक था, और उचित मानवता थी। शैतान के द्वारा भ्रष्ट होने के बाद, उसकी मूल समझ, विवेक, और मानवता मंद पड़ गई और शैतान के द्वारा दूषित हो गई। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपनी आज्ञाकारिता और प्रेम को खो दिया है। मनुष्य की समझ पथ से हट गई है, उसका स्वभाव एक जानवर के समान हो गया है, और परमेश्वर के प्रति उसकी विद्रोहशीलता और भी अधिक बढ़ गई है और गंभीर हो गई है। लेकिन फिर भी, मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही पहचानता है, और केवल आँख बंद करके विरोध और विद्रोह करता है। मनुष्य के स्वभाव का प्रकाशन उसकी समझ, अंतर्दृष्टि, और अंत:करण का प्रकटीकरण है; और क्योंकि उसकी समझ और अंतर्दृष्टि सही नहीं हैं, और उसका अंत:करण अत्यंत मंद पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के प्रति विद्रोही है। यदि मनुष्य की समझ और अंतर्दृष्टि बदल नहीं सकती, तो फिर उसके स्वभाव में ऐसा बदलाव होने का तो प्रश्न ही नहीं उठता, जो परमेश्वर के हृदय के अनुकूल हो। यदि मनुष्य की समझ सही नहीं है, तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता और परमेश्वर के द्वारा उपयोग के लिए अयोग्य है। "उचित समझ" के मायने हैं परमेश्वर की आज्ञा का पालन करना और उसके प्रति निष्ठावान बने रहना, परमेश्वर के लिए तड़पना, परमेश्वर के प्रति पूर्णतया शुद्ध होना, और परमेश्वर के प्रति अंत:करण रखना, यह परमेश्वर के साथ एक हृदय और मन होने को दर्शाता है, जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करने को नहीं। पथभ्रष्ट समझ का होना ऐसा नहीं है। चूँकि मनुष्य शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया था इसलिये, उसने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना लीं, और परमेश्वर के लिए उसके अंदर निष्ठा या तड़प नहीं रही है, परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा की तो बात ही क्या। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता और उस पर दोष लगाता है, और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों का प्रहार करता है। मनुष्य स्पष्ट रूप से जानता है कि वह परमेश्वर है, फिर भी उसकी पीठ पीछे उस पर दोष लगाता है, परमेश्वर की आज्ञापालन का उसका कोई भी इरादा नहीं होता, वह सिर्फ परमेश्वर से अंधाधुंध माँग और निवेदन करता रहता है। ऐसे लोग—जिनकी समझ पथभ्रष्ट होती है—वे अपने घृणित स्वभाव को जानने या अपनी विद्रोहशीलता पर पछतावा करने के अयोग्य होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने के योग्य हों, तो फिर वे अपनी समझ को थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर चुके हैं; परमेश्वर के प्रति अधिक विद्रोही लोग, जो अपने आप को अब तक नहीं जान पाये, उनमें समझ उतनी ही कम होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

82. भ्रष्टाचार के हजारों सालों बाद, मनुष्य संवेदनहीन और मूर्ख बन गया है; वह एक दुष्ट आत्मा बन गया है जो परमेश्वर का विरोध करती है, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति मनुष्य की विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है, यहाँ तक कि मनुष्य खुद भी अपने विद्रोही आचरण का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ है—क्योंकि मनुष्य शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट किया जा चुका है, और शैतान के द्वारा रास्ते से भटका दिया गया है इसलिए वह नहीं जानता कि कहाँ जाना है। आज भी, मनुष्य परमेश्वर को धोखा देता है : जब मनुष्य परमेश्वर को देखता है, तो वह उसे धोखा देता है, और जब वह परमेश्वर को नहीं देख पाता, तब भी वह उसे धोखा देता है। कुछ ऐसे भी हैं, जो परमेश्वर के श्रापों और परमेश्वर के कोप का अनुभव करने के बाद भी उसे धोखा देते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य की समझ ने अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है, और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी, अपने मूल प्रकार्य को खो दिया है। मनुष्य जिसे मैं देखता हूँ, वह मानव रूप में एक जानवर है, वह एक जहरीला साँप है, मेरी आँखों के सामने वह कितना भी दयनीय बनने की कोशिश करे, मैं उसके प्रति कभी भी दयावान नहीं बनूँगा, क्योंकि मनुष्य को काले और सफेद के बीच, सत्य और असत्य के बीच अन्तर की समझ नहीं है, मनुष्य की समझ बहुत ही सुन्न हो गई है, फिर भी वह आशीषें पाने की कामना करता है; उसकी मानवता बहुत नीच है फिर भी वह एक राजा के प्रभुत्व को पाने की कामना करता है। ऐसी समझ के साथ, वह किसका राजा बन सकता है? ऐसी मानवता के साथ, कैसे वह सिंहासन पर बैठ सकता है? सचमुच में मनुष्य को कोई शर्म नहीं है! वह नीच ढोंगी है! तुम सब जो आशीषें पाने की कामना करते हो, मैं सुझाव देता हूँ कि पहले शीशे में अपना बदसूरत प्रतिबिंब देखो—क्या तू एक राजा बनने लायक है? क्या तेरे पास एक ऐसा चेहरा है जो आशीषें पा सकता है? तेरे स्वभाव में ज़रा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तूने किसी भी सत्य का अभ्यास नहीं किया, फिर भी तू एक बेहतरीन कल की कामना करता है। तू अपने आप को भुलावे में रख रहा है! ऐसी गन्दी जगह में जन्म लेकर, मनुष्य समाज के द्वारा बुरी तरह संक्रमित किया गया है, वह सामंती नैतिकता से प्रभावित किया गया है, और उसे "उच्च शिक्षा के संस्थानों" में सिखाया गया है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन पर मतलबी दृष्टिकोण, जीने के लिए तिरस्कार-योग्य दर्शन, बिल्कुल बेकार अस्तित्व, पतित जीवन शैली और रिवाज—इन सभी चीज़ों ने मनुष्य के हृदय में गंभीर रूप से घुसपैठ कर ली है, और उसकी अंतरात्मा को बुरी तरह खोखला कर दिया है और उस पर गंभीर प्रहार किया है। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से और अधिक दूर हो गया है, और परमेश्वर का और अधिक विरोधी हो गया है। दिन-प्रतिदिन मनुष्य का स्वभाव और अधिक शातिर बन रहा है, और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करे, एक भी व्यक्ति नहीं जो स्वेच्छा से परमेश्वर की आज्ञा का पालन करे, इसके अलावा, न ही एक भी व्यक्ति ऐसा है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करे। इसकी बजाय, इंसान शैतान की प्रभुता में रहकर, कीचड़ की धरती पर बस सुख-सुविधा में लगा रहता है और खुद को देह के भ्रष्टाचार को सौंप देता है। सत्य को सुनने के बाद भी, जो लोग अन्धकार में जीते हैं, इसे अभ्यास में लाने का कोई विचार नहीं करते, यदि वे परमेश्वर के प्रकटन को देख लेते हैं तो इसके बावजूद उसे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। इतनी पथभ्रष्ट मानवजाति को उद्धार का मौका कैसे मिल सकता है? इतनी पतित मानवजाति प्रकाश में कैसे जी सकती है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

83. मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकटीकरण का स्रोत उसका मंद अंत:करण, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसकी विकृत समझ से बढ़कर और किसी में भी नहीं है; यदि मनुष्य का अंत:करण और समझ फिर से उचित होने के योग्य हो पाएँ, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने के योग्य बन जायेगा। सिर्फ इसलिए क्योंकि मनुष्य का अंत:करण हमेशा सुन्न रहा है, मनुष्य की समझ जो कभी भी सही नहीं रही, लगातार मंद होती जा रही है, इस कारण ही मनुष्य लगातार परमेश्वर के प्रति विद्रोही बना हुआ है, इस हद तक कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और अंतिम दिनों के देहधारी परमेश्वर को अपने घर में प्रवेश देने से इंकार कर रहा है, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर के देह को तुच्छ जानता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह परमेश्वर के देहधारी शरीर के साथ इतना निर्दयी व्यवहार न करता; यदि उसे थोड़ी-सी भी समझ होती, तो वह देहधारी परमेश्वर के शरीर के साथ अपने व्यवहार में इतना शातिर न होता; यदि उसमें थोड़ा-सा भी विवेक होता, तो वह देहधारी परमेश्वर को इस ढंग से "धन्यवाद" न देता। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के युग में जीता है, फिर भी वह इतना अच्छा अवसर दिये जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद देने की बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, और प्रकट रूप से इसके विरोध में होता है और इससे ऊबा हुआ है। मनुष्य परमेश्वर के आगमन के प्रति चाहे जैसा भी व्यवहार करे, संक्षेप में, परमेश्वर ने हमेशा धैर्यपूर्वक अपने कार्य को जारी रखा है—भले ही मनुष्य ने परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागत करने वाला रुख़ नहीं रखा है, और अंधाधुंध उससे निवेदन करता रहता है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत शातिर बन गया है, उसकी समझ अत्यंत मंद हो गई है, और उसका अंत:करण दुष्ट के द्वारा पूरी तरह से रौंद दिया गया है और मनुष्य के मौलिक अंत:करण का अस्तित्व बहुत पहले ही समाप्त हो गया था। मनुष्य, मानवजाति को बहुत अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान करने के लिए देहधारी परमेश्वर का न केवल एहसानमंद नहीं है, बल्कि परमेश्वर के द्वारा उसे सत्य दिए जाने पर वह आक्रोश में भी है; ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रूचि नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर के प्रति आक्रोश में आ गया है। मनुष्य न सिर्फ देहधारी परमेश्वर के लिए अपनी जान देने के नाकाबिल है, बल्कि वह उससे उपकार हासिल करने की कोशिश भी करता रहता है, और परमेश्वर से ऐसे सूद की माँग करता है जो उससे दर्जनों गुना बड़ी हैं जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। ऐसे विवेक और समझ के लोग इसे कोई बड़ी बात नहीं मानते हैं, वे अब भी ऐसा मानते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के लिए स्वयं को बहुत अधिक खर्च किया है, और परमेश्वर ने उन्हें बहुत थोड़ा दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जिन्होंने मुझे सिर्फ एक कटोरा पानी ही दिया है फिर भी अपने हाथ पसार कर माँग करते हैं कि मैं उन्हें दो कटोरे दूध की कीमत चुकाऊँ या मुझे एक रात के लिए कमरा दिया है परन्तु मुझ से कई रातों के किराए की माँग करते हैं। ऐसी मानवता, और ऐसे विवेक के साथ, कैसे तू अब भी जीवन पाने की कामना कर सकता है? तू कितना घृणित अभागा है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

84. यदि मैं तुम लोगों के हृदय की गहराई में छिपी हुई कुरूपता को प्रकट न करूँ, तो तुममें से प्रत्येक व्यक्ति अपने सिर पर मुकुट रखकर समस्त महिमा अपने लिए रख लेगा। तुम सबकी अभिमानी और दंभी प्रकृति तुम सबको अपने अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने, मसीह के खिलाफ विद्रोह करने और उसका विरोध करने और अपनी कुरूपता प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, और इस तरह तुम सबके इरादों, धारणाओं, असाधारण इच्छाओं और लालच से भरी नज़रों को प्रकाश में ले आती है। फिर भी तुम सब मसीह के कार्य के लिए अपने जीवन भर के जोश के बारे में बक-बक करते रहते हो और मसीह के द्वारा बहुत पहले कहे गए सत्यों को बार-बार दोहराते रहते हो। यही तुम सबका "विश्वास" है—यही तुम सबका "अशुद्धता रहित विश्वास" है। मैंने मनुष्य के लिए आरंभ से ही बहुत कठोर मानक रखा है। यदि तुम्हारी वफ़ादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से घृणा करता हूँ जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों के साथ मुझसे ज़बरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्यों से सिर्फ़ यही चाहता हूँ कि वे मेरे प्रति पूरे वफादार हों और सब चीज़े एक शब्द : विश्वास के वास्ते—और उसे साबित करने के लिए करें। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद का तिरस्कार करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम सबके साथ ईमानदारी से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम सब से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्चे विश्वास के साथ कार्य करो। जब विश्वास की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें विश्वास है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा नहीं सहते। तो मैं तुम से पूछता हूँ : यदि तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो उसका आदर क्यों नहीं करते? यदि तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो तो तुम्हारे हृदय में उसका थोड़ा-सा भी भय क्यों नहीं है? तुम स्वीकार करते हो कि मसीह परमेश्वर का देहधारण है, तो तुम उसकी अवमानना क्यों करते हो? तुम उसके प्रति इतने अनादरपूर्वक कार्य क्यों करते हो? तुम उसकी खुलेआम आलोचना क्यों करते हो? तुम हमेशा उसकी गतिविधियों की जासूसी क्यों करते हो? तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित क्यों नहीं होते? तुम उसके वचन के अनुसार कार्य क्यों नहीं करते? क्यों तुम उसकी भेंटों को जबरन छीनने और लूटने का प्रयास करते हो? क्यों तुम मसीह के स्थान से बोलते हो? क्यों तुम उसके कार्य और वचनों के सही या गलत होने का का आकलन करते हो? क्यों तुम पीठ पीछे उसकी निंदा करने का साहस करते हो? क्या यही और अन्य बातें हैं, जो तुम सबके विश्वास का निर्माण करती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

85. यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए अपनी धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, और अगर तुम लोग परमेश्वर को बाइबल के मापदंडों के भीतर सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में समाविष्ट करते हो, तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था, जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीह ही कहा जा सकता था, और मात्र वही, जिसे मसीह कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो, और चूँकि मानवजाति परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करती थी, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर ने कोई अपराध नहीं किया था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, और उसे मृत्युदंड देने पर जोर दिया, और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर परिभाषित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो, जो परमेश्वर करता है। लोग बेहद बेतुके, बेहद अहंकारी और स्वभाव से बड़बोले हैं। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी महान क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है, और कि तुमने परमेश्वर की निंदा की है, कि तुम परमेश्वर के कार्य का पालन करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, क्योंकि उसकी अनेक धारणाएँ है, क्योंकि उसका परमेश्वर का ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता, इसके बजाय वह नीरस ढंग से एक ही विषय को बिना बदलाव के दोहराता रहता है और हर स्थिति के लिए एक ही दृष्टिकोण इस्तेमाल करता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है। क्रूर मानवजाति! साँठ-गाँठ और साज़िश, एक-दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और संपत्ति के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए लाखों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, हैसियत, महत्वाकांक्षा और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह-सुख के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी बहुत थोड़े ही हैं, जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपनी हैसियत बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते? और इसलिए, परमेश्वर को असंख्य बार बलात् मृत्युदंड दिया गया है, और अनगिनत बर्बर न्यायाधीशों ने परमेश्वर की निंदा की है और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ाया है। कितने लोगों को इसलिए धर्मी कहा जा सकता है, क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'दुष्टों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा' से उद्धृत

86. क्या बहुत से लोग इसलिए परमेश्वर का विरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में इसलिए बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल चुटकीभर ज्ञान और सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिससे वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इस प्रकार के लोगों का अनुभव केवल सतही होता है, किंतु वे घमंडी और आसक्त प्रकृति के होते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य को अवमानना से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्यों की "पुष्टि" करने के लिए अपने पुराने तुच्छ तर्कों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं, और अपनी शिक्षा और पांडित्य को लेकर पूरी तरह से आश्वस्त होते हैं, और उन्हें यह भी भरोसा रहता है कि वे संसार भर में यात्रा करने में सक्षम हैं। क्या ये ऐसे लोग नहीं हैं जो पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत और अस्वीकृत कर दिए गए हैं और क्या ये नए युग के द्वारा हटा नहीं दिए जाएँगे? क्या ये वही अज्ञानी और अल्पसूचित तुच्छ लोग नहीं हैं जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका विरोध करते हैं, जो केवल यह दिखाने का प्रयास कर रहे हैं कि वे कितने मेधावी हैं? बाइबल के अल्प ज्ञान के साथ, वे संसार के "शैक्षणिक समुदाय" में पैर पसारने की कोशिश करते हैं, और केवल एक सतही सिद्धांत के साथ लोगों को सिखाते हुए, वे पवित्र आत्मा के कार्य को पलटने का प्रयत्न करते हैं, और इसे अपने खुद के विचारों की प्रक्रिया के इर्दगिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। अपनी अदूरदर्शिता के कारण वे एक ही झलक में परमेश्वर के 6,000 सालों के कार्यों को देखने की कोशिश करते हैं। इन लोगों के पास समझ नाम की कोई चीज ही नहीं है! वास्तव में, परमेश्वर के बारे में लोगों को जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य का आकलन करने में उतने ही धीमे होते हैं। इसके अलावा, वे परमेश्वर के आज के कार्य के बारे में अपने ज्ञान की बहुत कम बात करते हैं, लेकिन वे अपने निर्णय में जल्दबाज़ी नहीं करते हैं। लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक घमंडी और अति आत्मविश्वासी होते हैं और उतनी ही अधिक बेहूदगी से परमेश्वर के अस्तित्व की घोषणा करते हैं—फिर भी वे केवल सिद्धांत की बात ही करते हैं और कोई भी वास्तविक प्रमाण प्रस्तुत नहीं करते। इस प्रकार के लोगों का कोई मूल्य नहीं होता है। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल की तरह देखते हैं वे ओछे लोग होते हैं! जो लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना करते समय सचेत नहीं रहते हैं, जो अपना मुँह चलाते रहते हैं, जो मीन-नेख निकालते रहते हैं, जो पवित्र आत्मा के धार्मिक कार्यों को नकारने की अपनी सहज प्रवृत्ति पर लगाम नहीं लगाते हैं, और जो उसका अपमान और ईशनिंदा भी करते हैं—क्या इस प्रकार के अशिष्ट लोग पवित्र आत्मा के कार्य से अनभिज्ञ नहीं हैं? इसके अलावा, क्या वे अत्यंत अहंकारी, अंतर्निहित रूप से घमंडी और दुर्दमनीय लोग नहीं हैं? कोई ऐसा दिन आ भी जाए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, तो भी परमेश्वर उन्हें सहन नहीं करेगा। न केवल वे उन्हें तुच्छ समझते हैं जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, बल्कि वे स्वयं भी परमेश्वर के विरुद्ध ईशनिंदा करते हैं, इस प्रकार के दुस्साहसी लोग, न तो इस युग में और न ही आने वाले युग में क्षमा किए जाएँगे, और वे हमेशा के लिए नरक में सड़ेंगे! इस प्रकार के अशिष्ट, आसक्त लोग परमेश्वर में भरोसा करने का दिखावा करते हैं और लोग जितने अधिक इस तरह के होते हैं, उतनी ही अधिक उनकी परमेश्वर के प्रशासकीय आदेशों का उल्लंघन करने की संभावना रहती है। क्या वे सभी अहंकारी लोग, जो स्वाभाविक रूप से उच्छृंखल हैं, और जिन्होंने कभी भी किसी का भी आज्ञापालन नहीं किया है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन प्रतिदिन परमेश्वर का विरोध नहीं करते हैं, वह परमेश्वर जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

87. तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का विरोध इसलिए करते हो, या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का इसलिए उपयोग करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को पर्याप्त गंभीरता से नहीं लेते हो। तुम लोगों का परमेश्वर के प्रति विरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग प्राकृतिक रूप से अत्यंत अवज्ञाकारी हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्यों के सही और गलत होने के बारे में बताते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी व्याख्यान देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और बेमतलब बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न है, और उनमें बिल्कुल भी समझ नहीं होती है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा अस्वीकृत कर दिए जाएँगे, और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य की आलोचना करते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के अविवेकी लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; न कि अपनी सनक में उसकी आलोचना करने के द्वारा मनुष्य पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के माध्यम से परमेश्वर को जान पाया है। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सही होता जाता है, उतना ही कम वे उसका विरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का विरोध करने की संभावना रहती है। तुम लोगों की धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति, और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह "पूँजी" है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो, और तुम जितना अधिक भ्रष्ट, तुच्छ और निम्न होगे, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर के अनुकूल नहीं होगे, और सदैव उससे दूर रहोगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है' से उद्धृत

88. जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को नहीं समझते, वे परमेश्वर के विरुद्ध खड़े होते हैं, और जो लोग परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य से अवगत होते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते, वे तो परमेश्वर के और भी बड़े विरोधी होते हैं। ऐसे भी लोग हैं जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में दिन-भर बाइबल पढ़ते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य को समझता हो। उनमें से एक भी ऐसा नहीं होता जो परमेश्वर को जान पाता हो; उनमें से परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप तो एक भी नहीं होता। वे सबके सब निकम्मे और अधम लोग हैं, जिनमें से प्रत्येक परमेश्वर को सिखाने के लिए ऊँचे पायदान पर खड़ा रहता है। वे लोग परमेश्वर के नाम का झंडा उठाकर, जानबूझकर उसका विरोध करते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी मनुष्यों का माँस खाते और रक्त पीते हैं। ऐसे सभी मनुष्य शैतान हैं जो मनुष्यों की आत्माओं को निगल जाते हैं, ऐसे मुख्य राक्षस हैं जो जानबूझकर उन्हें विचलित करते हैं जो सही मार्ग पर कदम बढ़ाने का प्रयास करते हैं और ऐसी बाधाएँ हैं जो परमेश्वर को खोजने वालों के मार्ग में रुकावट पैदा करते हैं। वे "मज़बूत देह" वाले दिख सकते हैं, किंतु उसके अनुयायियों को कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों से परमेश्वर का विरोध करवाते हैं? अनुयायी कैसे जानेंगे कि वे जीवित शैतान हैं जो इंसानी आत्माओं को निगलने को तैयार बैठे हैं? जो लोग परमेश्वर के सामने अपने आपको बड़ा मूल्य देते हैं, वे सबसे अधिक अधम लोग हैं, जबकि जो स्वयं को दीन और विनम्र बनाए रखते हैं, वे सबसे अधिक आदरणीय हैं। जो लोग यह सोचते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं, और दूसरों के आगे परमेश्वर के कार्य की धूमधाम से उद्घोषणा करते हैं, जबकि वे सीधे परमेश्वर को देखते हैं—ऐसे लोग बेहद अज्ञानी होते हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर की गवाही नहीं होती, वे अभिमानी और अत्यंत दंभी होते हैं। परमेश्वर का वास्तविक अनुभव और व्यवहारिक ज्ञान होने के बावजूद, जो लोग ये मानते हैं कि उन्हें परमेश्वर का बहुत थोड़ा-सा ज्ञान है, वे परमेश्वर के सबसे प्रिय लोग होते हैं। ऐसे लोग ही सच में गवाह होते हैं और परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के योग्य होते हैं। जो परमेश्वर की इच्छा को नहीं समझते वे परमेश्वर के विरोधी हैं, जो परमेश्वर की इच्छा को समझते तो हैं मगर सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हैं, फिर भी परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध जाते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जिनमें देहधारी परमेश्वर के प्रति धारणाएँ हैं और जिनका दिमाग विद्रोह लिप्त रहता है, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; जो लोग परमेश्वर की आलोचना करते हैं, वे परमेश्वर के विरोधी हैं; और जो कोई भी परमेश्वर को जानने या उसकी गवाही देने में असमर्थ है, वो परमेश्वर का विरोधी है। इसलिये मेरा तुम लोगों से आग्रह है : यदि तुम लोगों को सचमुच विश्वास है कि तुम इस मार्ग पर चल सकते हो, तो इस मार्ग पर चलते रहो। लेकिन अगर तुम लोग परमेश्वर के विरोध से परहेज नहीं कर सकते, तो इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, बेहतर है कि तुम लोग यह मार्ग छोड़कर चले जाओ। अन्यथा इस बात की संभावना बहुत ज़्यादा है कि तुम्हारे साथ बुरा हो जाए, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति बहुत ही भ्रष्ट है। तुम लोगों में लेशमात्र भी निष्ठा, आज्ञाकारिता, या ऐसा हृदय नहीं है जिसमें धार्मिकता और सत्य की प्यास हो या परमेश्वर के लिए प्रेम हो। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी दशा बेहद खराब है। तुम लोगों को जिन बातों का पालन करना चाहिए उनका पालन नहीं कर पाते, और जो बोलना चाहिए वो तुम बोल नहीं पाते। तुम्हें जिन चीज़ों का अभ्यास करना चाहिए उनका अभ्यास तुम लोग कर नहीं पाए। तुम लोगों को जो कार्य करना चाहिए था, वो तुमने किया नहीं। तुम लोगों में जो निष्ठा, विवेक, आज्ञाकारिता और संकल्पशक्ति होनी चाहिए, वो तुम लोगों में है नहीं। तुम लोगों ने उस तकलीफ़ को नहीं झेला है, जो तुम्हें झेलनी चाहिए, तुम लोगों में वह विश्वास नहीं है, जो होना चाहिए। सीधी-सी बात है, तुम लोग सभी गुणों से रहित हो : क्या तुम लोग इस तरह जीते रहने से शर्मिंदा नहीं हो? मैं तुम लोगों को विश्वास दिलाना चाहूँगा, तुम लोगों के लिए अनंत विश्राम में आँखें बंद कर लेना बेहतर होगा और इस तरह तुम परमेश्वर को तुम लोगों की चिंता करने और कष्ट झेलने से मुक्त कर दोगे। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास तो करते हो मगर उसकी इच्छा को नहीं जानते; तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते तो हो, मगर इंसान से परमेश्वर की जो अपेक्षाएँ हैं, उसे पूरा करने में असमर्थ हो। तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास तो करते हो मगर परमेश्वर को जानते नहीं, तुम लक्ष्यहीन जीवन जीते हो, न कोई मूल्य है और न ही कोई सार्थकता है। तुम लोग इंसान की तरह जीते तो हो मगर तुम लोगों में विवेक, सत्यनिष्ठा या विश्वसनीयता लेशमात्र भी नहीं है—क्या तुम लोग खुद को अब भी इंसान कह सकते हो? तुम लोग परमेश्वर पर विश्वास करते हो फिर भी उसे धोखा देते हो; और तो और, तुम लोग परमेश्वर का धन हड़प जाते हो और उसके चढ़ावों को खा जाते हो, फिर भी, परमेश्वर की भावनाओं के प्रति न तो तुम्हारे अंदर कोई आदर-भाव है, न ही परमेश्वर के प्रति तुम्हारा ज़मीर जागता है। तुम लोग परमेश्वर की अत्यंत मामूली अपेक्षाओं को भी पूरा नहीं कर पाते। क्या फिर भी तुम खुद को इंसान कह सकते हो? तुम परमेश्वर का दिया आहार ग्रहण करते हो, उसकी दी हुई ऑक्सीजन में साँस लेते हो, तुम उसके अनुग्रह का आनंद लेते हो, मगर अंत में, तुम लोगों को परमेश्वर का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं होता है। उल्टे, तुम लोग ऐसे निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। क्या तुम लोग एक कुत्ते से भी बदतर जंगली जानवर नहीं हो? क्या जानवरों में कोई ऐसा है जो तुम लोगों से भी अधिक द्वेषपूर्ण हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को न जानने वाले सभी लोग परमेश्वर का विरोध करते हैं' से उद्धृत

89. मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और जो मनुष्यों द्वारा अकल्पनीय और अप्राप्य हैं। जितनी अधिक अवास्तविक ये वस्तुएँ होती हैं, उतना ही अधिक लोगों द्वारा उनका विश्लेषण किया जाता है, और यहाँ तक कि लोग अन्य सभी से बेपरवाह होकर भी उनकी खोज करते हैं और उन्हें प्राप्त करने की कोशिश करते हैं। जितना अधिक अवास्तविक ये चीज़ें होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से लोग उनकी जाँच और विश्लेषण करते हैं और, यहाँ तक कि इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके बारे में अपने स्वयं के व्यापक विचार बना लेते हैं। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती है, लोग उनके प्रति उतने ही अधिक उपेक्षापूर्ण होते हैं; वे केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाते हैं। क्या यही प्रवृत्ति तुम लोगों की उस यथार्थपरक कार्य के प्रति नहीं है, जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक तुम लोग उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम उनकी जाँच करने के लिए ज़रा भी समय नहीं निकालते, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन यथार्थवादी, निम्नस्तरीय अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो, जो कि सर्वाधिक वास्तविक है, और बस उसकी वास्तविकता और सामान्यता को स्वीकार करने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग एक अज्ञात विश्वास नहीं रखते? तुम लोगों का अतीत के अज्ञात परमेश्वर में अचल विश्वास है, और आज के वास्तविक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर स्वर्ग का उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर एक छोटा-सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उनकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न, वास्तविक देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसकी खोज नहीं करता? क्योंकि आज का परमेश्वर लोगों से जो कहता है, वह ठीक वही है, जिसे करने के लिए लोग सबसे अधिक अनिच्छुक हैं, और जो उन्हें लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह लोगों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह उसके दागों को उघाड़ नहीं देता? इस प्रकार से, वास्तविकता की खोज न करने वालों में से कई लोग देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, मसीह-विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक स्पष्ट तथ्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर का अभी देह बनना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक हस्ती या कोई धर्मनिष्ठ विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देह बनने के बाद ऐसे कई धर्मनिष्ठ विश्वासी अनजाने में मसीह-विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो, यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित नहीं करते या सत्य की खोज नहीं करते, बल्कि इसके बजाय तुम झूठ से ग्रस्त हो जाते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं' से उद्धृत

90. मसीह के संपर्क में आने से पहले, तुम लोगों को शायद यह विश्वास हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह से बदल चुका है, और तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो, और यह भी विश्वास हो कि तुम मसीह के आशीष पाने के सबसे ज़्यादा योग्य हो। क्योंकि तुम कई मार्गों की यात्रा कर चुके हो, बहुत सारा काम करके बहुत-सा फल प्राप्त कर चुके हो, इसलिए अंत में तुम्हें ही मुकुट मिलेगा। फिर भी, एक सच्चाई ऐसी है जिसे शायद तुम नहीं जानते: जब मनुष्य मसीह को देखता है तो मनुष्य का भ्रष्ट स्वभाव, उसका विद्रोह और प्रतिरोध उजागर हो जाता है। किसी अन्य अवसर की तुलना में इस अवसर पर उसका विद्रोही स्वभाव और प्रतिरोध कहीं ज्यादा पूर्ण और निश्चित रूप से उजागर होता है। मसीह मनुष्य का पुत्र है—मनुष्य का ऐसा पुत्र जिसमें सामान्य मानवता है—इसलिए मनुष्य न तो उसका सम्मान करता है और न ही उसका आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इसलिए मनुष्य का विद्रोह पूरी तरह से और स्पष्ट विवरण के साथ प्रकाश में आ जाता है। अतः मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति के सारे विद्रोह को खोद निकाला है और मानवजाति के स्वभाव को बहुत ही स्पष्ट रूप से प्रकाश में ला दिया है। इसे कहते हैं "लालच देकर एक बाघ को पहाड़ के नीचे ले आना" और "लालच देकर एक भेड़िए को उसकी गुफा से बाहर ले आना।" क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति संपूर्ण आज्ञाकारिता दिखाते हो? क्या तुम लोग कह सकते हो कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगेः जब भी परमेश्वर मुझे नई परिस्थिति में डालता है, तो मैं इसे स्वीकार कर लेता हूँ और कभी कोई शिकायत नहीं करता। साथ ही, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता। कुछ कहेंगेः परमेश्वर मुझे जो भी काम सौंपता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ करता हूँ और कभी भी लापरवाही नहीं करता। तब मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ: क्या तुम सब मसीह के साथ रहते हुए उसके अनुरूप हो सकते हो? और कितने समय तक तुम सब उसके अनुरूप रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घंटा? दो घंटे? हो सकता है तुम्हारी आस्था प्रशंसा के योग्य हो, परन्तु तुम लोगों में कोई खास दृढ़ता नहीं है। जब तुम सचमुच में मसीह के साथ रहोगे, तो तुम्हारा दंभ और अहंकार धीरे-धीरे तुम्हारे शब्दों और कार्यों के द्वारा प्रकट होने लगेगा, और इसी प्रकार तुम्हारी अत्यधिक इच्छाएँ, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतुष्टि स्वतः ही उजागर हो जाएँगी। आखिरकार, तुम्हारा अहंकार बहुत ज़्यादा बड़ा हो जाएगा, जब तक कि तुम मसीह के साथ वैसे ही बेमेल नहीं हो जाते जैसे पानी और आग, और तब तुम लोगों का स्वभाव पूरी तरह से उजागर हो जायेगा। उस समय, तुम्हारी धारणाएँ पर्दे में नहीं रह सकेंगी। तुम्हारी शिकायतें भी अनायास ही बाहर आ जाएँगी, और तुम्हारी नीच मानवता पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। फिर भी, तुम अपने विद्रोहीपन को स्वीकार करने से लगातार इनकार करते रहते हो। बल्कि तुम यह विश्वास करते रहते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं है, वह मनुष्य के प्रति बहुत अधिक कठोर है, अगर वह कोई अधिक दयालु मसीह होता तो तुम पूरी तरह से उसे समर्पित हो जाते। तुम लोग यह विश्वास करते हो कि तुम्हारे विद्रोह का एक जायज़ कारण है, तुम केवल तभी मसीह के विरूद्ध विद्रोह करते हो जब वह तुम लोगों को हद से ज़्यादा मजबूर कर देता है। तुमने कभी यह एहसास नहीं किया कि तुम मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, न ही तुम्हारा इरादा उसकी आज्ञा का पालन करने का है। बल्कि, तुम ढिठाई से यह आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारे मन के अनुसार काम करे, और यदि वह एक भी कार्य ऐसा करे जो तुम्हारे मन के अनुकूल नहीं हो तो तुम लोग मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं, मनुष्य है। क्या तुम लोगों में से बहुत से लोग ऐसे ही नहीं हैं जिन्होंने उसके साथ इस तरह से विवाद किया है? आख़िरकार तुम लोग किसमें विश्वास करते हो? और तुम लोग उसे किस तरह से खोजते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

91. तुम सब हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम सबसे विनती करता हूँ कि तुम अपने आपको इतना ऊँचा न समझो; हर कोई मसीह को देख सकता है, परन्तु मैं कहता हूँ कि कोई भी मसीह को देखने के लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य का स्वभाव बुराई, अहंकार और विद्रोह से भरा हुआ है, इस समय तुम मसीह को देखोगे तो तुम्हारा स्वभाव तुम्हें बर्बाद कर देगा और बेहद तिरस्कृत करेगा। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारी संगति शायद तुम्हारे बारे में बहुत कुछ न दिखाए, परन्तु जब तुम मसीह के साथ संगति करते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय, तुम्हारी धारणा जड़ पकड़ सकती है, तुम्हारा अहंकार फूटना शुरू कर सकता है, और तुम्हारा विद्रोह फलना-फूलना शुरू कर सकता है। ऐसी मानवता के साथ तुम लोग कैसे मसीह की संगति के काबिल हो सकते हो? क्या तुम उसके साथ प्रत्येक दिन के प्रत्येक पल में परमेश्वर जैसा बर्ताव कर सकते हो? क्या तुममें सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता होगी? तुम सब अपने हृदय में यहोवा के रूप में एक ऊँचे परमेश्वर की आराधना करते हो, लेकिन दृश्यमान मसीह को मनुष्य समझते हो। तुम लोगों की समझ बहुत ही हीन है और तुम्हारी मानवता अत्यंत नीची है! तुम सब सदैव के लिए मसीह को परमेश्वर के रूप में मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम्हारा मन होता है, तुम उसकी ओर लपकते हो और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करने लगते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि उन लोगों का सहभागी जत्था हो जो मसीह के विरूद्ध लड़ते हैं। ऐसे मनुष्यों को भी जो दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाते हैं, इसका प्रतिफल दिया जाता है। फिर भी मसीह को, जिसने तुम्हारे मध्य ऐसा कार्य किया है, न तो मनुष्य का प्रेम मिला है और न ही मनुष्य की तरफ से उसे कोई प्रतिफल या समर्पण मिला है। क्या यह दिल दुखाने वाली बात नहीं है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

92. हो सकता है कि परमेश्वर में अपने इतने वर्षों के विश्वास के कारण तुमने कभी किसी को कोसा न हो और न ही कोई बुरा कार्य किया हो, फिर भी अगर मसीह के साथ अपनी संगति में तुम सच नहीं बोल सकते, सच्चाई से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन का पालन नहीं कर सकते; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक कुटिल और कपटी व्यक्ति। हो सकता है तुम अपने रिश्तेदारों, मित्रों, पत्नी (या पति), बेटों और बेटियों, और माता पिता के प्रति अत्यंत स्नेहपूर्ण और निष्ठावान हो, और कभी दूसरों का फायदा नहीं उठाते हो, लेकिन अगर तुम मसीह के अनुरूप नहीं पाते हो और उसके साथ समरसता के साथ व्यवहार नहीं कर पाते हो, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब कुछ खपा दो या अपने माता-पिता और घरवालों की अच्छी देखभाल करो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम धूर्त हो, और साथ में चालाक भी हो। सिर्फ इसलिए कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छे काम कर लेते हो, तो यह न सोचो कि तुम मसीह के अनुरूप हो। क्या तुम लोग सोचते हो कि तुम्हारी उदारता स्वर्ग की आशीष बटोर सकती है? क्या तुम सोचते हो कि थोड़े-से अच्छे काम कर लेना तुम्हारी आज्ञाकारिता का स्थान ले सकता है? तुम लोगों में से कोई भी निपटारा और काट-छांट स्वीकार नहीं कर पाता, और तुम सभी को मसीह की सरल मानवता को अंगीकार करने में कठिनाई होती है। फिर भी तुम सब परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का निरंतर ढोल पीटते रहते हो। तुम्हारी इस तरह की आस्था का तुम पर उचित प्रतिकार फूटेगा। काल्पनिक भ्रमों में लिप्त होना और मसीह को देखने की इच्छा करना छोड़ दो, क्योंकि तुम सब आध्यात्मिक कद में बहुत छोटे हो, इतने कि तुम लोग उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम अपने विद्रोह से पूरी तरह से मुक्त हो जाओगे, और मसीह के साथ समरसता स्थापित कर लोगे, तभी परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम काट-छांट या न्याय से गुज़रे बिना परमेश्वर को देखने जाते हो, तो तुम निश्चित तौर पर परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और विनाश तुम्हारी नियति बन जाएगा। मनुष्य के स्वभाव में परमेश्वर के प्रति बैर-भाव अंतर्निहित है, क्योंकि सभी मनुष्यों को शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। यदि कोई मनुष्य भ्रष्ट होते हुए परमेश्वर से संगति करने का प्रयास करे, तो यह निश्चित है कि इसका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; मनुष्य के सारे कर्म और शब्द निश्चित तौर पर हर मोड़ पर उसकी भ्रष्टता को उजागर करेंगे; और जब वह परमेश्वर के साथ जुड़ेगा, तो उसका विद्रोह अपने सभी पहलुओं के साथ प्रकट हो जाएगा। मनुष्य अनजाने में मसीह का विरोध करता है, मसीह को धोखा देता है, और मसीह को अस्वीकार करता है; जब यह होता है तो मनुष्य और भी ज़्यादा संकट की स्थिति में आ जाता है, और यदि यह जारी रहता है, तो वह दंड का भागी बनता है।

कुछ लोग यह मान सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ संगति इतनी खतरनाक है, तो बुद्धिमानी यही होगी कि परमेश्वर से दूर रहा जाए। तब, ऐसे लोगों को भला क्या हासिल होगा? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं? निश्चित ही, परमेश्वर के साथ संगति बहुत कठिन है, परन्तु ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है, न कि इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता। तुम लोगों के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि तुम सब स्वयं को जानने की सच्चाई पर ज़्यादा ध्यान दो। तुम लोग परमेश्वर की कृपा क्यों नहीं प्राप्त कर पाए हो? तुम्हारा स्वभाव उसे घिनौना क्यों लगता है? तुम्हारे शब्द उसके अंदर जुगुप्ता क्यों उत्पन्न करते हैं? जैसे ही तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखाते हो, तो खुद ही तुम अपनी तारीफ करने लगते हो और अपने छोटे से योगदान के लिए पुरस्कार चाहते हो; जब तुम थोड़ी-सी आज्ञाकारिता दिखाते हो तो दूसरों को नीची दृष्टि से देखते हो, और कोई छोटा-मोटा काम संपन्न करते ही तुम परमेश्वर का अनादर करने लगते हो। तुम लोग परमेश्वर का स्वागत करने के बदले में धन-संपत्ति, भेंटों और प्रशंसा की अभिलाषा करते हो। एक या दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा दिल दुखता है; जब तुम दस सिक्के देते हो तो तुम आशीषों की और दूसरों से विशिष्ट माने जाने की अभिलाषा करते हो। तुम लोगों जैसी मानवता के बारे में तो बात करना और सुनना भी अपमानजनक है। क्या तुम्हारे शब्दों और कार्यों में कुछ प्रशंसा योग्य है? वे जो अपने कर्तव्यों को निभाते हैं और वे जो नहीं निभाते; वे जो अगुवाई करते हैं और वे जो अनुसरण करते हैं; वे जो परमेश्वर का स्वागत करते और वे जो नहीं करते; वे जो दान देते हैं और वे जो नहीं देते; वे जो उपदेश देते हैं और वे जो वचन को ग्रहण करते हैं, इत्यादि; इस प्रकार के सभी लोग अपनी तारीफ करते हैं। क्या तुम्हें यह हास्यास्पद नहीं लगता? तुम लोग भली-भांति जानते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, फिर भी तुम परमेश्वर के अनुरूप नहीं हो सकते हो। तुम लोग भली-भांति यह जानते हुए भी कि तुम सब बिल्कुल अयोग्य हो, तुम लोग डींगें मारते रहते हो। क्या तुम्हें ऐसा महसूस नहीं होता कि तुम्हारी समझ इतनी खराब हो चुकी है कि तुम्हारे पास अब आत्म-नियंत्रण ही नहीं रहा है? इस तरह की समझ के साथ तुम लोग परमेश्वर के साथ संगति करने के योग्य कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोगों को इस मुकाम पर अपने लिए डर नहीं लगता है? तुम्हारा स्वभाव पहले ही इतना खराब हो चुका है कि तुम परमेश्वर के अनुरूप होने में समर्थ नहीं हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम लोगों की आस्था हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारी आस्था बेतुकी नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम उस मार्ग का चुनाव कैसे करोगे जिस पर तुम्हें चलना है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'वे सभी जो मसीह से असंगत हैं निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं' से उद्धृत

93. कुछ लोग सत्य में आनंदित नहीं होते, न्याय में तो बिल्कुल भी नहीं। बल्कि वे शक्ति और सम्पत्तियों में आनन्दित होते हैं; इस प्रकार के लोग शक्ति के खोजी कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के प्रभावशाली सम्प्रदायों तथा सेमिनरी से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को खोजते हैं। हालंकि उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे आधा विश्वास करते हैं; और वे अपने दिलो-दिमाग को पूरी तरह से समर्पित करने में असमर्थ होते हैं, वे मुख से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, किन्तु उनकी नज़रें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर केन्द्रित रहती हैं, और वे मसीह की ओर दूसरी नजर भी नहीं डालते। उनके हृदय प्रसिद्धि, वैभव और महिमा पर ही टिक गए हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा मामूली व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है कि एक इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बनाबना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज़ लोग परमेश्वर के द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि यदि ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार की योजना के लक्ष्य रहे होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोग ठहाके लगाकर हँसते। उनका मानना है कि यदि परमेश्वर ने ऐसे नाचीज़ों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वास करने से अधिक, वे बेहूदे जानवर हैं। क्योंकि वे केवल पद, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते है और केवल बड़े समूहों और सम्प्रदायों को सम्मान देते हैं। उनमें उनके लिए बिल्कुल भी सम्मान नहीं है जिनकी अगुवाई मसीह करता है; वे तो बस ऐसे गद्दार हैं जिन्होंने मसीह से, सत्य से और जीवन से अपना मुँह मोड़ लिया है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, बल्कि विशेष हैसियत वाले उन झूठे चरवाहों की प्रशंसा करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते हो, बल्कि उन व्यभिचारियों से प्रेम करते हो जो संसार की कीचड़ में लोट लगाते हैं। तुम मसीह की पीड़ा पर हँसते हो, जिसके पास अपना सिर टिकाने तक की जगह नहीं है, किन्तु उन मुरदों की तारीफ़ करते हो जो चढ़ावों को हड़प लेते हैं और अय्याशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, परन्तु उन धृष्ट मसीह-विरोधियों की बाँहों में प्रसन्नता से जाते हो, हालाँकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अब भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनकी हैसियत की ओर, उनके प्रभाव की ओर मुड़ता है। फिर भी तुम ऐसा रवैया बनाये रखते हो जहाँ तुम मसीह के कार्य को गले से उतारना कठिन पाते हो और उसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं होते। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने का विश्वास नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ़ इसलिए किया, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और चारा नहीं था। तुम्हारे हृदय में हमेशा बुलंद छवियों का स्थान रहा है; तुम न तो उनके हर वचन और कर्म को, और न ही उनके प्रभावशाली वचनों और हाथों को भूल सकते हो। तुम सबके हृदय में वे हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक हैं। किन्तु आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन और हमेशा आदर के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह उत्कृष्ट तो बिल्कुल नहीं है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य का सम्मान नहीं करते हैं वे सभी अविश्वासी और सत्य के प्रति गद्दार हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अधिक अविश्वास है, और मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुमको इस तरह से शिक्षा देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें सम्पूर्ण हृदय से खुद को समर्पित कर देना चाहिए; दुविधाग्रस्त या अधूरे मन वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर इस संसार या किसी एक व्यक्ति का नहीं है, बल्कि उन सबका है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, उन सबका जो उसकी आराधना करते हैं, और उन सबका है जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'क्या तुम परमेश्वर के एक सच्चे विश्वासी हो?' से उद्धृत

94. परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा से कैसे बचा जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और उनकी सारी रुचि समाप्त हो जाती है। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन के विकास में मदद नहीं मिलेगी या कोई लाभ प्राप्त नहीं होगा। परिणामस्वरूप, हालाँकि उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में सुना होता है, वे उसपर बहुत कम ध्यान देते हैं। उन्हें वह इतना मूल्यवान नहीं लगता कि उसे स्वीकारा जाए, और उसे अपने जीवन का अंग तो वे बिलकुल नहीं समझते। ऐसे लोगों का परमेश्वर का अनुसरण करने का केवल एक सरल उद्देश्य होता है, और वह उद्देश्य है आशीष प्राप्त करना। ऐसे लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज़ पर ध्यान देने की परवाह नहीं कर सकते जो इस उद्देश्य से सीधे संबंध नहीं रखती। उनके लिए, आशीष प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करने से ज्यादा वैध उद्देश्य और कोई नहीं है—यह उनके विश्वास का असली मूल्य है। यदि कोई चीज़ इस उद्देश्य को प्राप्त करने में योगदान नहीं करती, तो वे उससे पूरी तरह से अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनके उद्देश्य और इरादे न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि वर्षों अपने घर से दूर व्यस्त रहते हैं। अपने परम उद्देश्य के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपनी खोज की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास के उद्देश्य को नहीं बदल सकते। वे अपने आदर्शों के प्रबंधन के लिए भाग-दौड़ करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनका विवेक है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई से बिलकुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह बिना प्रतिफल की आकांक्षा के परमेश्वर की गवाही देने का उनका विश्वास है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा प्राप्त करने के लिए सब-कुछ त्याग देने की तत्परता के प्रति उनकी निष्ठा है? या यह अनावश्यक व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्याग देने की उनकी भक्ति-भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन को नहीं समझा, फिर भी इतना कुछ देना एक चमत्कार ही है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतना कुछ दिए जाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? इसमें हमें पूर्व की एक अज्ञात समस्या का पता चलता है : मनुष्य का परमेश्वर के साथ संबंध केवल एक नग्न स्वार्थ है। यह आशीष देने वाले और लेने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो, यह कर्मचारी और नियोक्ता के मध्य के संबंध के समान है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कार्य करता है। इस प्रकार के संबंध में कोई स्नेह नहीं होता, केवल एक लेनदेन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझदारी नहीं होती, केवल दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीज़ें इस बिंदु तक आ गई हैं, तो कौन इस क्रम को उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयानक बन चुका है? मैं मानता हूँ कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंद में निमग्न हो जाते हैं, तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ इस प्रकार का संबंध कितना शर्मनाक और भद्दा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

95. परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दु:खद बात यह है कि मनुष्य परमेश्वर के कार्य के बीच अपने खुद के प्रबंधन का संचालन करता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। मनुष्य की सबसे बड़ी असफलता इस बात में है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का प्रयास करता है, उसी समय कैसे वह अपनी आदर्श मंज़िल का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रच रहा होता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंज़िल कैसे प्राप्त किए जाएँ। यहाँ तक कि अगर कोई समझता भी है कि वह कितना दयनीय, घृणास्पद और दीन-हीन है, तो भी ऐसे कितने लोग अपने आदर्शों और आशाओं को तत्परता से छोड़ सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और केवल अपने बारे में सोचना बंद कर सकने में सक्षम हैं? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की ज़रूरत है, जो अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य में अर्पित कर उसके प्रति समर्पित होंगे। उसे ऐसे लोगों की ज़रूरत नहीं है, जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं, और उनकी तो बिलकुल भी ज़रूरत नहीं है, जो थोड़ा-सा देते हैं और फिर पुरस्कृत होने का इंतज़ार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से घृणा करता है, जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है, जो उसके प्रबंधन-कार्य से नाराज़ रहते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक घृणा करता है, जो उसके द्वारा मानवजाति के बचाव के लिए किए जा रहे कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ उठाते हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन-कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय की परवाह नहीं करते, और पूरी तरह से अपनी संभावनाओं और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से कुढ़ते हैं और इस बात में ज़रा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसकी क्या मर्ज़ी है, वे केवल वही कर रहे हैं जो उन्हें अच्छा लगता है और उनका तरीका परमेश्वर के प्रबंधन-कार्य से अलग-थलग है। उनके व्यवहार को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है—परमेश्वर द्वारा उसे कृपापूर्वक देखे जाने का तो प्रश्न ही नहीं उठता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है' से उद्धृत

96. मेरे कर्मों की संख्या समुद्र-तटों की रेत के कणों से भी ज़्यादा है, और मेरी बुद्धि सुलेमान के सभी पुत्रों से बढ़कर है, फिर भी लोग मुझे मामूली हैसियत का मात्र एक चिकित्सक और मनुष्यों का कोई अज्ञात शिक्षक समझते हैं। बहुत-से लोग केवल इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनको चंगा कर सकता हूँ। बहुत-से लोग सिर्फ इसलिए मुझ पर विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करूँगा, और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ इस जीवन को शांति से गुज़ारने और आने वाले संसार में सुरक्षित और स्वस्थ रहने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं और आने वाले संसार में कुछ हासिल करने की कोशिश नहीं करते। जब मैंने अपना क्रोध नीचे मनुष्यों पर उतारा और उसका सारा आनंद और शांति छीन ली, तो मनुष्य संदिग्ध हो गया। जब मैंने मनुष्य को नरक का कष्ट दिया और स्वर्ग के आशीष वापस ले लिए, तो मनुष्य की लज्जा क्रोध में बदल गई। जब मनुष्य ने मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहा, तो मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया और उसके प्रति घृणा महसूस की; तो मनुष्य मुझे छोड़कर चला गया और बुरी दवाइयों तथा जादू-टोने का मार्ग खोजने लगा। जब मैंने मनुष्य द्वारा मुझसे माँगा गया सब-कुछ वापस ले लिया, तो हर कोई बिना कोई निशान छोड़े गायब हो गया। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मुझ पर इसलिए विश्वास करता है, क्योंकि मैं बहुत अनुग्रह देता हूँ, और प्राप्त करने के लिए और भी बहुत-कुछ है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विश्वास के बारे में क्या जानते हो?' से उद्धृत

97. तुम्हें लगता है कि परमेश्वर में अपनी आस्था के लिए तुम्‍हें चुनौतियों और क्लेशों या कठिनाइयों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो, और तुम जीवन के विकास को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने फिजूल के विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि शरीर से प्यार करते हैं, क्या वे सब पूरे जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बात की शिकायत है? क्या यह बात नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? क्योंकि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा निरर्थक हैं? क्योंकि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में असमर्थ हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करना चाहते हो—ताकि अपनी संतान को बीमारी से दूर रख सको, अपने पति के लिए एक अच्छी नौकरी पा सको, अपने बेटे के लिए एक अच्छी पत्नी और अपनी बेटी के लिए एक अच्छा पति पा सको, अपने बैल और घोड़े से जमीन की अच्छी जुताई कर पाने की क्षमता और अपनी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम पा सको। तुम यही सब पाने की कामना करते हो। तुम्‍हारा लक्ष्य केवल सुखी जीवन बिताना है, तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएं, तुम किसी भी विपत्ति से प्रभावित न हो सको, तुम परमेश्वर के आलिंगन में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा दैहिक सुख के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ मांगे तुम्‍हें एक सत्य मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर से भिन्न नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन की कामना नहीं करते, वे शुद्ध होने का प्रयास नहीं करते, और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, उनका काम बस पेट भर खाना और सोना है। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग दिया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है: तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और ग्लानिपूर्ण है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो; क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुम परमेश्वर की ओर देखने का साहस कर सकते हो? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें एक सच्चा मार्ग दे दिया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारी व्यक्तिगत खोज पर निर्भर करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पतरस के अनुभव: ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान' से उद्धृत

98. लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं, मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे इसमें अवश्य जोड़ना, और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ दिया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत अधिक सहा है—क्या परमेश्वर ने बदले में मुझे कोई प्रतिज्ञाएँ दी हैं? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा अंत क्या होगा? क्या मैं परमेश्वर के आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ... प्रत्येक व्यक्ति अपने हृदय में निरंतर ऐसा गुणा-भाग करता है, और वे परमेश्वर से माँगें करते हैं जिनमें उनके कारण, महत्वाकांक्षाएँ, तथा लेन-देन की मानसिकता होती है। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है, परमेश्वर के बारे में लगातार मनसूबे बनाता रहता है, और स्वयं अपने व्यक्तिगत मनोरथ के पक्ष में परमेश्वर के साथ तर्क-वितर्क करता रहता है, और परमेश्वर से कुछ न कुछ कहलवाने की कोशिश करता है, यह देखने के लिए कि परमेश्वर उसे वह दे सकता है या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर से परमेश्वर के समान बर्ताव नहीं करता है। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत माँगें की हैं, और यहाँ तक कि एक इंच देने के बाद एक मील लेने की कोशिश करते हुए, हर क़दम पर उस पर दबाव भी डाला है। परमेश्वर के साथ सौदबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो, जब परीक्षाएँ उन पर पड़ती हैं या जब वे अपने आप को किन्हीं निश्चित स्थितियों में पाते हैं, तो प्रायः कमज़ोर, निष्क्रिय और अपने कार्य में सुस्त पड़ जाते हैं, और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक स्विस आर्मी चाकू माना है, और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और प्रतिज्ञाएँ प्राप्त करने की कोशिश करना उसका जन्मजात अधिकार और कर्तव्य है, जबकि परमेश्वर का दायित्व मनुष्य की रक्षा और देखभाल करना, और उसे भरण-पोषण देना है। ऐसी है "परमेश्वर में विश्वास" की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ। मनुष्य की प्रकृति के सार से लेकर उसके व्यक्तिपरक अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से संबंधित हो। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ कोई लेना-देना संभवतः नहीं हो सकता है। कहने का तात्पर्य यह, मनुष्य ने न कभी यह विचार किया और न समझा कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए परमेश्वर का भय मानने और आराधना करने की आवश्यकता होती है। ऐसी स्थितियों के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। यह सार क्या है? यह सार यह है कि मनुष्य का हृदय द्वेषपूर्ण है, छल और कपट रखता है, निष्पक्षता और धार्मिकता और उससे जो सकारात्मक है प्रेम नहीं करता है, और यह तिरस्करणीय और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए और अधिक बंद नहीं हो सकता है; उसने इसे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं दिया है। परमेश्वर ने मनुष्य का सच्चा हृदय कभी नहीं देखा है, न ही उसकी मनुष्य द्वारा कभी आराधना की गई है। परमेश्वर चाहे जितनी बड़ी कीमत चुकाए, या वह चाहे जितना अधिक कार्य करे, या वह मनुष्य का चाहे जितना भरण-पोषण करे, मनुष्य इस सबके प्रति अंधा, और सर्वथा उदासीन ही बना रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह केवल स्वयं ही अपने हृदय का ध्यान रखना, स्वयं अपने निर्णय लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग का अनुसरण करना, या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं का पालन करना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। ऐसी है आज मनुष्य की दशा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

99. जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से संवेदनशील हो। कुछ लोग तो एक अच्छा गंतव्य पाने के लिए परमेश्वर के सामने दंडवत करते हुए अपने सिर जमीन से लगने का भी इंतज़ार नहीं करते। मैं तुम्हारी उत्सुकता समझता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह इससे अधिक कुछ नहीं है कि तुम लोग अपनी देह विपत्ति में नहीं डालना चाहते, और भविष्य में चिरस्थायी सजा तो बिलकुल भी नहीं भुगतना चाहते। तुम लोग केवल स्वयं को थोड़ा और उन्मुक्त, थोड़ा और आसान जीवन जीने देने की आशा करते हो। इसलिए जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग खास तौर से बेचैन महसूस करते हो और अत्यधिक डर जाते हो कि अगर तुम लोग पर्याप्त सतर्क नहीं रहे, तो तुम परमेश्वर को नाराज़ कर सकते हो और इस प्रकार उस दंड के भागी हो सकते हो, जिसके तुम पात्र हो। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचकेहो, यहाँ तक कि तुममें से कई लोग, जो कभी कुटिल और चंचल थे, अचानक विशेष रूप से विनम्र और ईमानदार बन गए हैं; तुम्हारी ईमानदारी का दिखावा लोगों की मज्जा तक को कँपा देता है। फिर भी, तुम सभी के पास "ईमानदार" दिल हैं, और तुम लोगों ने लगातार बिना कोई बात छिपाए अपने दिलों के राज़ मेरे सामने खोले हैं, चाहे वह शिकायत हो, धोखा हो या भक्ति हो। कुल मिलाकर, तुम लोगों ने अपने अस्तित्व के गहनतम कोनों में पड़ी महत्वपूर्ण चीज़ें मेरे सामने खुलकर "कबूल" की हैं। बेशक, मैंने कभी इन चीज़ों पर ध्यान नहीं दिया, क्योंकि वे सब मेरे लिए बहुत आम हो गई हैं। लेकिन अपने अंतिम गंतव्य के लिए तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए अपने सिर के बाल का एक रेशा भी गँवाने के बजाय आग के दरिया में कूद जाओगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ बहुत कट्टर हो रहा हूँ; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसके रूबरू आने के लिए तुम्हारे हृदय के भक्ति-भाव में बहुत कमी है। तुम लोग शायद न समझ पाओ कि मैंने अभी क्या कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक आसान स्पष्टीकरण देता हूँ : तुम लोगों को सत्य और जीवन की ज़रूरत नहीं है; न ही तुम्हें अपने आचरण के सिद्धांतों की ज़रूरत है, मेरे श्रमसाध्य कार्य की तो निश्चित रूप से ज़रूरतनहीं है। इसके बजाय तुम लोगों को उन चीज़ों की ज़रूरत है, जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—धन-संपत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य को पूरी तरह से ख़ारिज करते हो, इसलिए मैं तुम्हारे विश्वास को एक शब्द में समेट सकता हूँ : उथला। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग पूर्णत: समर्पित हो, उन्हें हासिल करने के लिए तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने पाया है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास से संबंधित मामलों में ऐसा नहीं करते। इसके बजाय, तुम सापेक्ष रूप से समर्पित हो, सापेक्ष रूप से ईमानदार हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जिनके दिल में पूर्ण निष्ठा का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में असफल हैं। ध्यान से सोचो—क्या तुम लोगों के बीच कई लोग असफल हैं?

तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास में सफलता लोगों के अपने कार्यों का परिणाम होती है; जब लोग सफल नहीं होते, बल्कि असफल होते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, उसमें किसी अन्य कारक की कोई भूमिका नहीं होती। मेरा मानना है कि तुम लोग ऐसी चीज़ प्राप्त करने के लिए सब-कुछ करोगे, जो परमेश्वर में विश्वास करने से ज्यादा मुश्किल होती है और जिसे पाने के लिए उससे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लोगे, यहाँ तक कि तुम उसमें कोई गलती बरदाश्त करने के लिए भी तैयार नहींहोंगे; इस तरह के निरंतर प्रयास तुम लोग अपने जीवन में करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग उन परिस्थितियों में भी मेरी देह को धोखा दे सकते हो, जिनमें तुम अपने परिवार के किसी सदस्य को धोखा नहीं दोगे। यही तुम लोगों का अटल व्यवहार और तुम लोगों का जीवनसिद्धांत है। क्या तुम लोग अभी भी अपने गंतव्य की खातिर मुझे धोखा देने के लिए एक झूठा मुखौटा नहीं लगा रहे हो, ताकि तुम्हारा गंतव्य पूरी तरह से खूबसूरत हो जाए और तुम जो चाहते हो वह सब हो? मुझे ज्ञात है कि तुम लोगों की भक्ति वैसी ही अस्थायी है, जैसी अस्थायी तुम लोगों की ईमानदारी है। क्या तुम लोगों का संकल्प और वह कीमत जो तुम लोग चुकाते हो, भविष्य के बजाय वर्तमान क्षण के लिए नहीं हैं? तुम लोग केवल एक खूबसूरत गंतव्य सुरक्षित कर लेने के लिए एक अंतिम प्रयास करना चाहते हो, जिसका एकमात्र उद्देश्य सौदेबाज़ी है। तुम यह प्रयास सत्य के ऋणी होने से बचने के लिए नहीं करते, और मुझे उस कीमत का भुगतान करने के लिए तो बिलकुल भी नहीं, जो मैंने अदा की है। संक्षेप में, तुम केवल जो चाहते हो, उसे प्राप्त करने के लिए अपनी चतुर चालें चलने के इच्छुक हो, लेकिन उसके लिए खुला संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हो। क्या यही तुम लोगों की दिली ख्वाहिश नहीं है? तुम लोगों को अपने को छिपाना नहीं चाहिए, न ही अपने गंतव्य को लेकर इतनी माथापच्ची करनी चाहिए कि न तो तुम खा सको, न सो सको। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा परिणाम पहले ही निर्धारित हो चुका होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'गंतव्य के बारे में' से उद्धृत

100. इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसकी बजाय, तुम उन लोगों के इर्दगिर्द घूमते रहे हो, जिनसे तुम प्रेम करते हो और जो चीज़ें तुम्हें प्रसन्न करती हैं—इतना कि हर समय, और हर जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें अपने हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी भी उन्हें छोड़ा नहीं है। जब भी तुम लोग किसी एक चीज के बारे में, जिससे तुम प्रेम करते हो, उत्सुकता और चाहत से भर जाते हो, तो ऐसा तब होता है जब तुम मेरा अनुसरण कर रहे होते हो, या तब भी जब तुम मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की माँग मैं तुमसे करता हूँ, उसे तुम अपने "पालतुओं" के प्रति वफादार होने और उन्हें प्रसन्न करने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीजों का त्याग करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो। तुम लोग खुद को उन उपक्रमों में संलग्न कर देते हो, जिनके प्रति तुम बहुत गहरा चाव रखते हो : कुछ लोग अपने बेटे-बेटियों के प्रति वफादार हैं, तो अन्य अपने पतियों, पत्नियों, धन-संपत्ति, व्यवसाय, वरिष्ठ अधिकारियों, हैसियत या स्त्रियों के प्रति वफादार हैं। जिन चीजों के प्रति तुम लोग वफादार होते हो, उनसे तुम कभी ऊबते या नाराज नहीं होते; उलटे तुम उन चीजों को ज्यादा बड़ी मात्रा और बेहतर गुणवत्ता में पाने के लिए और अधिक लालायित हो जाते हो, और तुम कभी भी ऐसा करना छोडते नहीं हो। मैं और मेरे वचन हमेशा उन चीजों के पीछे धकेल दिए जाते हैं, जिनके प्रति तुम गहरा चाव रखते हो। और तुम्हारे पास उन्हें आखिरी स्थान पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे लोग भी हैं जो इस आखिरी स्थान को भी अपनी वफादारी की उन चीजों के लिए छोड़ देते हैं, जिन्हें अभी खोजना बाकी है। उनके दिलों में कभी भी मेरा मामूली-सा भी निशान नहीं रहा है। तुम लोग सोच सकते हो कि मैं तुमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा रखता हूँ या तुम पर गलत आरोप लगा रहा हूँ—लेकिन क्या तुमने कभी इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब तुम खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते हो, तो तुम कभी भी मेरे प्रति वफादार नहीं रहते? ऐसे समय में, क्या तुम्हें इससे तकलीफ नहीं होती? जब तुम्हारा दिल खुशी से भरा होता है, और तुम्हें अपनी मेहनत का फल मिलता है, तब क्या तुम खुद को पर्याप्त सत्य से लैस न करने के कारण निराश महसूस नहीं करते? मेरा अनुमोदन प्राप्त न करने पर तुम लोग कब रोए हो? तुम लोग अपने बेटे-बेटियों के लिए अपना दिमाग खपाते हो और बहुत तकलीफ उठाते हो, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं होते; फिर भी तुम यह मानते हो कि तुमने उनके लिए ज्यादा मेहनत नहीं की है, कि तुमने उनके लिए वह सब कुछ नहीं किया है जो तुम कर सकते थे, जबकि मेरे लिए तुम हमेशा से असावधान और लापरवाह रहे हो; मैं केवल तुम्हारी यादों में रहता हूँ, तुम्हारे दिलों में नहीं। मेरा प्रेम और कोशिशें लोगों के द्वारा कभी महसूस नहीं की जातीं और तुमने उनकी कभी कोई कद्र नहीं की। तुम सिर्फ मामूली संक्षिप्त सोच-विचार करते हो, और समझते हो कि यह काफी होगा। यह "वफादारी" वह नहीं है, जिसकी मैंने लंबे समय से कामना की है, बल्कि वह है जो लंबे समय से मेरे लिए घृणास्पद रही है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम किसके प्रति वफादार हो?' से उद्धृत

101. अगर मैं तुम लोगों के सामने कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को पकड़ लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वत: प्रकट नहीं हो जाता? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम वफादार हो, चुनाव करते समय तुम सभी ऐसा ही निर्णय लोगे, और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम लोगों में बहुतेरे ऐसे नहीं हैं, जो सही और ग़लत के बीच में झूलते रहे हैं? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद के बीच प्रतियोगिता में, तुम लोग निश्चित तौर पर अपने उन चुनावों से परिचित हो, जो तुमने परिवार और परमेश्वर, संतान और परमेश्वर, शांति और विघटन, अमीरी और ग़रीबी, हैसियत और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और दरकिनार किए जाने इत्यादि के बीच किए हैं। शांतिपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच, तुमने पहले को चुना, और ऐसा तुमने बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच, तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने की इच्छा[क] भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच, तुमने पहले को चुना; अपने बेटों, बेटियों, पत्नियों और पतियों तथा मेरे बीच, तुमने पहले को चुना; और धारणा और सत्य के बीच, तुमने एक बार फिर पहले को चुना। तुम लोगों के दुष्कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास ही तुम पर से उठ गया है। मुझे बहुत आश्चर्य होता है कि तुम्हारा हृदय कोमल बनने का इतना प्रतिरोध करता है। सालों की लगन और प्रयास से मुझे स्पष्टत: केवल तुम्हारे परित्याग और निराशा से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला पड़ा रहा है। फिर भी तुम लोग लगातार अँधेरी और बुरी चीजों की तलाश में रहते हो, और उन पर अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम मुझे निराशा और भयंकर कष्ट ही पहुँचाओगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में थोड़ा-सा भी सौहार्द होगा? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम किसके प्रति वफादार हो?' से उद्धृत

102. प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और विचार उस एक की आँखों के द्वारा देखे जाते हैं, और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी कर रहे होते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर सभी प्राणियों को चलना चाहिए; यही वह मार्ग है, जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है, और कोई इससे बच या छूट नहीं सकता। मैंने अनगिनत वचन कहे हैं और साथ ही मैंने अनगिनत कार्य किए हैं। प्रतिदिन मैं प्रत्येक मनुष्य को स्वाभाविक रूप से वह सब करते हुए देखता हूँ, जो उसे अपने अंतर्निहित स्वभाव और अपनी प्रकृति की घटनाओं के अनुसार करना है। अनजाने में अनेक लोगों ने पहले ही "सही मार्ग" पर चलना आरंभ कर दिया है, जिसे मैंने विभिन्न प्रकार के लोगों के लिए निर्धारित किया है। इन विभिन्न प्रकार के लोगों को मैंने लंबे समय से विभिन्न वातावरणों में रखा है और अपने-अपने स्थान पर प्रत्येक ने अपनी अंतर्निहित विशेषताओं को व्यक्त किया है। उन्हें कोई बाँध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं और वे जो अभिव्यक्त करते हैं, वह स्वभाविक रूप से अभिव्यक्त होता है। केवल एक चीज़ उन्हें नियंत्रण में रखती है : मेरे वचन। इस तरह कुछ लोग मेरे वचन अनमने भाव से पढ़ते हैं, कभी उनका अभ्यास नहीं करते, केवल मृत्यु से बचने के लिए ऐसा करते हैं; जबकि कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, और इसलिए वे स्वभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, वे मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानव-जाति के गंतव्य और मनुष्य होने के महत्त्व की खोज करते जाते हैं। मानव-जाति मेरे वचनों की उपस्थिति में इससे अलग कुछ नहीं है और मैं बस चीज़ों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूँ। मैं ऐसा कुछ नहीं करता, जो लोगों को मेरे वचनों को अपने अस्तित्व का आधार बनाने के लिए बाध्य करे। तो जिन लोगों में कभी विवेक नहीं रहा और जिनके अस्तित्व का कभी कोई मूल्य नहीं रहा, वे बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और चुपचाप चीज़ों को घटित होते देखने के बाद जो चाहते हैं, करते हैं। वे सत्य से और उस सबसे जो मुझसे आता है, उकताने लगते हैं। इतना ही नहीं, वे मेरे घर में रहने से भी उकता जाते हैं। अपने गंतव्य की खातिर, और सजा से बचने के लिए ये लोग कुछ समय के लिए मेरे घर में रहते हैं, भले ही सेवा प्रदान कर रहे हों। परंतु उनके इरादे और कार्य कभी नहीं बदलते। इससे आशीष पाने की उनकी इच्छा और एक बार राज्य में प्रवेश करने और उसके बाद वहाँ हमेशा के लिए रहने—यहाँ तक कि अनंत स्वर्ग में प्रवेश करने की उनकी इच्छा बढ़ जाती है। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी आने की लालसा करते हैं, उतना ही अधिक वे महसूस करते हैं कि सत्य उनके मार्ग की बाधा और अड़चन बन गया है। वे हमेशा के लिए स्वर्ग के राज्य के आशीषों का आनंद उठाने हेतु राज्य में कदम रखने के लिए मुश्किल से इंतजार कर पाते हैं—सब-कुछ बिना सत्य की खोज करने या न्याय और ताड़ना स्वीकार करने, यहाँ तक कि मेरे घर में विनीत भाव से रहने और मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की जरूरत समझे बिना। ये लोग न तो सत्य की खोज करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मेरे घर में प्रवेश करते हैं, न ही मेरे प्रबंधन में सहयोग करने के लिए; उनका उद्देश्य महज उन लोगों में शामिल होने का होता है, जिन्हें आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है, या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाए। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी सत्य का अभ्यास या अपनी भ्रष्टता की गहराई का एहसास नहीं किया, और फिर भी वे मेरे घर में हमेशा "सेवकों" के रूप में रहे हैं। वे "धैर्यपूर्वक" मेरे दिन के आने का इंतज़ार करते हैं और मेरे कार्य के तरीके से यहाँ-वहाँ उछाले जाकर भी थकते नहीं। लेकिन भले ही उनकी कोशिश कितनी भी बड़ी हो और उन्होंने उसकी कुछ भी कीमत चुकाई हो, किसी ने उन्हें सत्य के लिए कष्ट उठाते हुए या मेरी खातिर कुछ देते हुए नहीं देखा। अपने हृदय में वे उस दिन को देखने के लिए बेचैन हैं, जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे भी बढ़कर, वे यह जानने का इंतज़ार नहीं कर सकते कि मेरा सामर्थ्य और मेरा अधिकार कितने विशाल हैं। जिस चीज़ के लिए उन्होंने कभी शीघ्रता नहीं की, वह है खुद को बदलना और सत्य का अनुसरण करना। वे उससे प्रेम करते हैं, जिससे मैं उकता गया हूँ और उससे उकता गए हैं, जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी अभिलाषा करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ, लेकिन उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते हुए भी इससे कभी नफरत नहीं करते, फिर भी इस बात से बहुत डरते हैं कि मैं इसे नष्ट कर दूँगा। अपने परस्पर विरोधी इरादों के बीच वे इस संसार से प्यार करते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, लेकिन इस बात के लिए लालायित भी रहते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ, और इससे पहले कि वे सच्चे मार्ग से भटक जाएँ, उन्हें विनाश के कष्ट से बचा लिया जाए और अगले युग के स्वामियों के रूप में रूपांतरित कर दिया जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और उस सबसे उकता गए हैं, जो मुझसे आता है। वे आशीष खोने के डर से थोड़े समय के लिए "आज्ञाकारी लोग" बन सकते हैं, लेकिन आशीष पाने के लिए उनकी उत्कंठा और नष्ट होने तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने का उनका भय कभी छिपाया नहीं जा। जैसे-जैसे मेरा दिन नज़दीक आता है, उनकी इच्छा लगातार उत्कट होती जाती है। और आपदा जितनी बड़ी होती है, उतना ही वह उन्हें असहाय बना देती है और वे यह नहीं जान पाते कि मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए, जिनकी उन्होंने लंबे समय से लालसा की है, कहाँ से शुरुआत करें। जैसे ही मेरा हाथ अपना काम करना शुरू करता है, ये लोग एक अग्र-दल के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। इस डर से कि मैं उन्हें नहीं देखूँगा, वे बस सेना की सबसे आगे की टुकड़ी में आने की सोचते हैं। वे वही करते और कहते हैं, जिसे वे सही समझते हैं, और यह कभी नहीं जान पाते कि उनके क्रिया-कलाप कभी सत्य के अनुरूप नहीं रहे, और कि उनके कर्म मेरी योजनाओं में गड़बड़ी और हस्तक्षेप मात्र करते हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत की हो सकती है, और वे कष्ट सहने के अपने इरादे और प्रयास में सच्चे हो सकते हैं, पर उनके कार्यों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कार्य अच्छे इरादे के साथ किए गए हैं, और उन्हें अपनी वेदी पर कुछ रखते हुए तो मैंने बहुत ही कम देखा है। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उन्होंने ऐसे ही कार्य किए हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

103. कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उसके अनुरूप अपने आप को ढालने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्‍वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्‍वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुज़र चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीज़ों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक श्रद्धा जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिलकुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अकसर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे "द्रवित" होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में "परमेश्वर" की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उनका आध्‍यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिलकुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्ची आज्ञाकारिता क्या है, सच्ची देखभाल क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए "पूँजी" और "हथियार" का रूप दे देते हैं, उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज़ भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्‍यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की वास्तविकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। इस तरह, हालाँकि वे लोग परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और पोषण में जीते हैं, फिर भी वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सचमुच चलने में असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी वास्तविक संपर्क या समागम किया है, अत: उनके लिए परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ पर पहुँचना, या अपने भीतर परमेश्वर के प्रति सच्‍चा विश्‍वास पैदा कर पाना, उसका सच्चा अनुसरण या उसकी सच्ची आराधना जाग्रत कर पाना असंभव है। इस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण ने—कि उन्हें इस प्रकार परमेश्वर के वचनों को देखना चाहिए, उन्हें इस प्रकार परमेश्वर को देखना चाहिए, उन्हें अनंत काल तक अपने प्रयासों में खाली हाथ लौटने, और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पाने के लिए अभिशप्त कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह प्रदर्शित करता है कि अनंत काल से वे परमेश्वर के शत्रु हैं और अनंत काल तक वे कभी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर को जानना परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने का मार्ग है' से उद्धृत

104. मेरे कार्य के कई वर्षों के दौरान, मनुष्य ने बहुत अधिक प्राप्त किया और बहुत त्याग किया है, फिर भी मैं कहता हूँ कि लोग मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करते। क्योंकि लोग केवल यह मानते हैं कि मैं परमेश्वर हूँ जबकि मेरे द्वारा बोले गए सत्य से वे असहमत होते हैं, और वे उन सत्‍यों का भी अभ्‍यास नहीं करते, जिनकी अपेक्षा मैं उनसे करता हूँ। कहने का अर्थ है कि मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता; मनुष्य केवल परमेश्वर के अस्तित्व को ही स्वीकार करता है परन्तु जीवन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करता, मनुष्य केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करता है परन्तु उसके सार को स्वीकार नहीं करता। अपने उत्साह के कारण, मनुष्य मेरे लिए घृणित बन गया है। क्योंकि वह केवल मुझे धोखा देने के लिए कानों को अच्छे लगने वाले शब्द बोलता है; कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता। तुम लोगों के शब्‍दों में दुष्ट व्यक्ति का प्रलोभन है; इसके अलावा, इंसान बेहद अहंकारी है, प्रधान स्वर्गदूत की यह पक्की उद्घोषणा है। इतना ही नहीं, तुम्हारे कर्म हद दर्जे तक तार-तार हो चुके हैं; तुम लोगों की असंयमित अभिलाषाएँ और लोलुप अभिप्राय सुनने में अपमानजनक हैं। तुम सब लोग मेरे घर में कीड़े और घृणित त्याज्य वस्तु बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य का प्रेमी नहीं है, बल्कि तुम इंसान हो जो आशीष चाहता है, स्वर्ग में जाना चाहता है, और पृथ्वी पर अपने सामर्थ्य का उपयोग करते हुए मसीह के दर्शन करना चाहता है। क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि कोई तुम लोगों के समान व्यक्ति, जो इतनी गहराई तक भ्रष्ट हो चुका है, और जो नहीं जानता कि परमेश्वर क्या है, वह परमेश्वर का अनुसरण करने योग्य कैसे हो सकता है? तुम लोग स्वर्ग में कैसे आरोहण कर सकते हो? तुम लोग उस महिमा को देखने योग्य कैसे बन सकते हो, जो अपने वैभव में अभूतपूर्व है। तुम लोगों के मुँह छल और गंदगी, विश्वासघात और अहंकार के वचनों से भरे हैं। तुम लोगों ने मुझसे कभी ईमानदारी के वचन नहीं कहे, मेरे वचनों का अनुभव करने पर कोई पवित्र बातें, समर्पण करने के शब्द नहीं कहे। आखिर तुम लोगों का यह कैसा विश्वास है? तुम लोगों के हृदय में केवल अभिलाषाएँ और धन भरा हुआ है; तुम्हारे दिमाग में भौतिक वस्‍तुओं के अतिरिक्‍त कुछ नहीं है। तुम लोग प्रतिदिन हिसाब लगाते हो कि तुमने मुझसे कितनी सम्पत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त की हैं। तुम लोग प्रतिदिन और भी अधिक आशीष पाने की प्रतीक्षा करते हो ताकि तुम लोग और भी अधिक तथा और भी बेहतर तरीके से उन चीज़ों का आनन्द ले सको जिनका आनंद लिया जा सकता है। मैं तुम लोगों के विचारों में हर समय नहीं रहता, न ही वह सत्य रहता है जो मुझसे आता है, बल्कि तुम लोगों के विचारों में पति (पत्नी), बेटे, बेटियाँ, या तुम क्या खाते-पहनते हो, यही आते हैं। तुम लोग यही सोचते हो कि तुम अपने आनंद को और कैसे बढ़ा सकते हो। लेकिन अपने पेट को ठूँस-ठूँसकर भरकर भी क्या तुम लोग महज़ लाश ही नहीं हो? यहाँ तक कि जब तुम लोग अपने बाहरी स्वरूप को सजा लेते हो, क्या तब भी तुम लोग एक चलती-फिरती लाश नहीं हो जिसमें कोई जीवन नहीं है? तुम लोग पेट की खातिर तब तक कठिन परिश्रम करते हो जब तक कि तुम लोगों के बाल सफेद नहीं हो जाते, फिर भी तुममें से कोई भी मेरे कार्य के लिए एक बाल तक का त्याग नहीं करता। तुम लोग अपनी देह, अपने बेटे-बेटियों के लिए लगातार सक्रिय रहते हो, अपने तन को थकाते रहते हो और अपने मस्तिष्क को कष्ट देते रहते हो, फिर भी तुम में से कोई एक भी मेरी इच्छा के लिए चिंता या परवाह नहीं दिखाता। ऐसा क्या है जो तुम अब भी मुझ से प्राप्त करने की आशा रखते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'बहुत बुलाए जाते हैं, पर कुछ ही चुने जाते हैं' से उद्धृत

105. मैंने बहुत सारे वचन कहे हैं, और अपनी इच्छा और अपने स्वभाव को भी व्यक्त किया है, फिर भी लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ पर विश्वास करने में अक्षम हैं। या यह कहा जा सकता है कि लोग अभी भी मेरी आज्ञा का पालन करने में अक्षम हैं। जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, जो सिद्धांत के अनुसार जीते हैं, जो उस कार्य के मध्य जीते हैं जिसे मैं आज करता हूँ—उनमें से कौन मेरे अनुकूल है? तुम लोग सिर्फ़ आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, पर कभी यह नहीं सोचा कि मेरे अनुकूल वास्तव में कैसे बनो, या अपने को मेरे विरुद्ध होने से कैसे रोको। मैं तुम लोगों से बहुत निराश हूँ, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक दिया है, जबकि मैंने तुम लोगों से बहुत कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमंड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की फालतू इच्छाएँ, तुम लोगों का धोखा, तुम लोगों की अवज्ञा—इनमें से कौन-सी चीज़ मेरी नज़र से बच सकती है? तुम लोग मेरे प्रति असावधान हो, मुझे मूर्ख बनाते हो, मेरा अपमान करते हो, मुझे फुसलाते हो, मुझसे ज़बरन वसूली करते हो, बलिदानों के लिए मुझसे ज़बरदस्ती करते हो—ऐसे दुष्कर्म मेरी सज़ा से कैसे बचकर निकल सकते हैं? ये सब दुष्कर्म मेरे साथ तुम लोगों की शत्रुता का प्रमाण हैं, और तुम लोगों की मेरे साथ अनुकूलता न होने का प्रमाण हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक अपने को मेरे साथ बहुत अनुकूल समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति बहुत ईमानदारी और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? मैं कहता हूँ, तुम लोग बहुत हीघमंडी, बहुत ही लालची, बहुत ही लापरवाह हो; और जिन चालबाज़ियों से तुम मुझे मूर्ख बनाते हो, वे बहुत शातिर हैं, और तुम्हारे इरादे और तरीके बहुत घृणित हैं। तुम लोगों की वफ़ादारी बहुत ही थोड़ी है, तुम्हारी ईमानदारी बहुत ही कम है, और तुम्हारी अंतरात्मा तो और अधिक क्षुद्र है। तुम लोगों के हृदय में बहुत ही अधिक द्वेष है, और तुम्हारे द्वेष से कोई नहीं बचा है, यहाँ तक कि मैं भी नहीं। तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति या आत्म-रक्षा के लिए मुझे बाहर निकाल देते हो। मेरी चिंता करने के बजाय तुम लोग अपने परिवार, अपने बच्चों, अपनी हैसियत, अपने भविष्य और अपनी संतुष्टि की चिंता करते हो। तुम लोगों ने बातचीत या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो, तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कब मेरे लिए क्या किया है? तुमने कब मेरे बारे में सोचा है? तुमने कब अपने आप को, हर कीमत पर, मेरे लिए और मेरे कार्य के लिए समर्पित किया है? मेरे साथ तुम्हारी अनुकूलता का प्रमाण कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी वफ़ादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे साथ तुम्हारी आज्ञाकारिता की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे केवल मेरे आशीष पाने के लिए नहीं रहे हैं? तुम लोग मुझे मूर्ख बनाते और धोखा देते हो, तुम लोग सत्य के साथ खेलते हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपाते हो, और सत्य के सार को धोखा देते हो। इस तरह मेरे ख़िलाफ़ जाने से भविष्य में क्या चीज़ तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर के साथ अनुकूलता की खोज करते हो, और मात्र एक अज्ञात विश्वास की खोज करते हो, लेकिन तुम मसीह के साथ अनुकूल नहीं हो। क्या तुम्हारी दुष्टता के लिए भी वही प्रतिफल नहीं मिलेगा, जो दुष्ट को मिलता है? उस समय तुम लोगों को एहसास होगा कि जो कोई मसीह के अनुकूल नहीं होता, वह कोप के दिन से बच नहीं सकता, और तुम लोगों को पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं, उन्हें कैसा प्रतिफल दिया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम्हें मसीह के साथ अनुकूलता का तरीका खोजना चाहिए' से उद्धृत

106. तुम लोगों की खोज में, तुम्हारी बहुत सी व्यक्तिगत अवधारणाएँ, आशाएँ और भविष्य होते हैं। वर्तमान कार्य तुम लोगों की हैसियत पाने की अभिलाषा और तुम्हारी अनावश्यक अभिलाषाओं से निपटने के लिए है। आशाएँ, हैसियत और अवधारणाएँ सभी शैतानी स्वभाव के विशिष्ट प्रतिनिधित्व हैं। लोगों के हृदय में इन चीज़ों के होने का कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का विष हमेशा लोगों के विचारों को दूषित कर रहा है, और लोग शैतान के इन प्रलोभनों से पीछा छुड़ाने में हमेशा असमर्थ रहे हैं। वे पाप के बीच रह रहे हैं, मगर इसे पाप नहीं मानते, और अभी भी सोचते हैं: "हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें आशीष प्रदान करना चाहिए और हमारे लिए सब कुछ सही ढंग से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर होना चाहिए, और हमारे पास दूसरों की तुलना में बेहतर हैसियत और बेहतर भविष्य होना चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीष देनी चाहिए। अन्यथा, इसे परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं कहा जाएगा।" बहुत सालों से, जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके हृदय को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। उनमें न केवल इच्छा-शक्ति और संकल्प का अभाव है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और स्वेच्छाचारी भी बन गए हैं। उनमें ऐसे किसी भी संकल्प का सर्वथा अभाव है जो स्वयं को ऊँचा उठाता हो, बल्कि, उनमें इन अंधेरे प्रभावों की बाध्यताओं से पीछा छुड़ाने की लेश-मात्र भी हिम्मत नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़े हुए हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में उनके दृष्टिकोण अभी भी बेहद वीभत्स हैं। यहाँ तक कि जब लोग परमेश्वर में विश्वास के बारे में अपना दृष्टिकोण बताते हैं तो इसे सुनना मात्र ही असहनीय होता है। सभी लोग कायर, अक्षम, नीच और दुर्बल हैं। उन्हें अंधेरे की शक्तियों के प्रति क्रोध नहीं आता, उनके अंदर प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम पैदा नहीं होता; बल्कि, वे उन्हें बाहर निकालने का पूरा प्रयास करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और दृष्टिकोण ठीक ऐसे ही नहीं हैं? "चूँकि मैं परमेश्वर पर विश्वास करता हूँ, इसलिए मुझ पर आशीषों की वर्षा होनी चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि मेरी हैसियत कभी न गिरे, यह अविश्वासियों की तुलना में अधिक बनी रहनी चाहिए।" तुम्हारा यह दृष्टिकोण कोई एक-दो वर्षों से नहीं है; बल्कि बरसों से है। तुम लोगों की लेन-देन संबंधी मानसिकता कुछ ज़्यादा ही विकसित है। यद्यपि आज तुम लोग इस चरण तक पहुँच गए हो, तब भी तुम लोगों ने हैसियत का राग अलापना नहीं छोड़ा, बल्कि लगातार इसके बारे में पूछताछ करते रहते हो, और इस पर रोज नज़र रखते हो, इस गहरे डर के साथ कि कहीकहीं किसी दिन तुम लोगों की हैसियत खो न जाए और तुम लोगों का नाम बर्बाद न हो जाए। लोगों ने सहूलियत की अपनी अभिलाषा का कभी त्याग नहीं किया। ... जितना अधिक तू इस तरह से तलाश करेगी उतना ही कम तू पाएगी। हैसियत के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसके साथ निपटा जाएगा और उसे उतने ही बड़े शुद्धिकरण से गुजरना होगा। इस तरह के लोग निकम्मे होते हैं! उनके साथ अच्छी तरह से निपटने और उनका न्याय करने की ज़रूरत है ताकि वे इन चीज़ों को पूरी तरह से छोड़ दें। यदि तुम लोग अंत तक इसी तरह से अनुसरण करोगे, तो तुम लोग कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते; जिनमें सत्य की प्यास नहीं है वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुसरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान नहीं देती; बल्कि तू हमेशा उन अनावश्यक अभिलाषाओं और उन चीज़ों पर ध्यान देती है जो परमेश्वर के लिए तेरे प्रेम को बाधित करती हैं और तुझे उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या ये चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या ये तुझे राज्य में ला सकती हैं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?' से उद्धृत

107. मनुष्य प्रकाश के बीच जीता है, फिर भी वह प्रकाश की बहुमूल्यता से अनभिज्ञ है। वह प्रकाश के सार तथा उसके स्रोत से और इस बात से भी अनजान है कि यह प्रकाश किसका है। जब मैं इंसान को प्रकाश देता हूँ, तो मैं तुरन्त ही लोगों की स्थितियों का निरीक्षण करता हूँ : प्रकाश के कारण सभी लोग बदल रहे हैं, पनप रहे हैं और उन्होंने अन्धकार को छोड़ दिया है। मैं ब्रह्माण्डके हर कोने में नज़र डालकर देखता हूँ और पाता हूँ कि पर्वत कोहरे में समा गए हैं, समुद्र शीत में जम गए हैं, और प्रकाश के आगमन की वजह से लोग पूरब की ओर देखते हैं कि शायद उन्हें कुछ अधिक मूल्यवान मिल जाए—फिर भी मनुष्य कोहरे के बीच एक सही दिशा नहीं पहचान पाता। चूँकि सारा संसार कोहरे से आच्छादित है, इसलिए जब मैं बादलों के बीच से देखता हूँ, तो मुझे कोई ऐसा इंसान नज़र नहीं आता जो मेरे अस्तित्व को खोज निकालता हो। इंसान पृथ्वी पर किसी चीज़की तलाश कर रहा है; वह भोजन की तलाश में घूमता-फिरता हुआ प्रतीत होता है; लगता है उसका इरादा मेरे आने का इन्तज़ार करने का है—फिर भी वह मेरे दिन से अनजान है और वह अक्सर पूर्व में केवल प्रकाश की झिलमिलाहट को ही देख पाता है। सभी लोगों के बीच मैं उनलोगों को खोजता हूँ जो सचमुच मेरे हृदय के अनुकूल हैं। मैं लोगों के बीच घूमता-फिरता हूँ, उनके बीच रहता हूँ, लेकिन इंसान पृथ्वी पर सुरक्षित और स्वस्थ है, इसलिए ऐसा कोई नहीं जो मेरे हृदय के अनुकूल हो। लोग नहीं जानते कि मेरी इच्छा का ध्यान कैसे रखें, वे मेरे कार्यों को नहीं देख पाते, प्रकाश के भीतर चल-फिर नहीं पाते और प्रकाश से दीप्त नहीं हो पाते। हालाँकि इंसान ने हमेशा मेरे वचनों को सँजोकर रखा है, फिर भी वह शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं समझ नहीं पाता; चूँकि इंसान का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, वह अपने मन मुताबिक काम नहीं कर पाता। इंसान ने कभी भी मुझसे ईमानदारी से प्रेम नहीं किया। जब मैं उसकी प्रशंसा करता हूँ, तो वह अपने आपको अयोग्य समझता है, लेकिन इससे वह मुझे संतुष्ट करने की कोशिश नहीं करता। वह मात्र उस "स्थान" को पकड़े रहता है जो मैंने उसके हाथों में सौंपा है और उसकी बारीकी से जाँच करता है; मेरी मनोरमता के प्रति असंवेदनशील बनकर, वह खुद को अपने स्थान से प्राप्त आशीषों से भरने में जुटा रहता है। क्या यह मनुष्य की कमी नहीं है? जब पहाड़ सरकते हैं, तो क्या वे तुम्हारे स्थान की खातिर अपना रास्ता बादल सकते हैं? जब समुद्र बहते हैं, तो क्या वे मनुष्य के स्थान के सामने रुक सकते हैं? क्या मनुष्य का स्थान आकाश और पृथ्वी को पलट सकता है? मैं कभी इंसान के प्रति दयावान हुआ करता था, बार-बार—लेकिन कोई इसे सँजोता नहीं या खज़ाने की तरह संभालकर नहीं रखता, उन्होंने इसे मात्र एक कहानी की तरह सुना या उपन्यास की तरह पढ़ा। क्या मेरे वचन सचमुच इंसान के हृदय को नहीं छूते? क्या मेरे कथनों का वास्तव में कोई प्रभाव नहीं पड़ता? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई भी मेरे अस्तित्व में विश्वास ही नहीं करता? इंसान खुद से प्रेम नहीं करता; बल्कि, वह मुझ पर आक्रमण करने के लिए शैतान के साथ मिल जाता है और मेरी सेवा करने के लिए शैतान को एक "परिसम्पत्ति" के रूप में इस्तेमाल करता है। मैं शैतान की सभी कपटपूर्ण योजनाओं को भेद दूँगा और पृथ्वी के लोगों को शैतान के धोखों को स्वीकार करने से रोक दूँगा, ताकि वे उसके अस्तित्व की वजह से मेरा विरोध न करें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 22' से उद्धृत

108. मेरी पीठ पीछे बहुत-से लोग हैसियत के आशीष की अभिलाषा करते हैं, वे ठूँस-ठूँसकर खाना खाते हैं, सोना पसंद करते हैं तथा देह की इच्छाओं पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह से बाहर कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना उपयुक्त कार्य नहीं करते, पर मुफ़्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों की भर्त्सना करते हैं, और अधिकार के पदों से दूसरों के ऊपर आधिपत्य जताते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा पूरी कर रहे हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारे इरादे सही हैं, पर तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्ख हो; किंतु यदि तुम्हारे इरादे सही नहीं हैं, और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ़्तखोरी करते हैं, हमेशा देह के आराम का लोभ करते हैं, और परमेश्वर की इच्छाओं का कोई विचार नहीं करते; वे हमेशा उसकी खोज करते हैं जो उनके लिए अच्छा है, और परमेश्वर की इच्छा पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते। वे अपने भाई-बहनों के साथ हमेशा छल करते हैं और उन्हें धोखा देते रहते हैं, और दो-मुँहे होकर वे, अंगूर के बाग़ में घुसी लोमड़ी के समान, हमेशा अंगूर चुराते हैं और अंगूर के बाग़ को रौंदते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने लायक़ हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक़ हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई बड़ा काम सौंपने की जुर्रत कर सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप सेवा कैसे करें' से उद्धृत

109. अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों की बात भी करते हैं : वे परवाह नहीं करते कि वह परमेश्वर है या मनुष्य है, वे सिर्फ अपनी शर्तों की ही बात करते हैं, और सिर्फ अपनी ही इच्छाओं को पूरा करने की कोशिश करते हैं। जब तुम लोग मेरे लिए खाना पकाते हो, तो तुम सेवा शुल्क की माँग करते हो, जब तुम लोग मेरे लिए दौड़ते हो, तो तुम लोग मुझसे दौड़ने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे लिए काम करते हो तो काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग मेरे कपड़े धोते हो तो कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम कलीसिया के लिए कुछ करते हो तो स्वास्थ्यलाभ की लागत माँगते हो, जब तुम लोग बोलते हो तो तुम वक्ता का शुल्क माँगते हो, जब तुम लोग पुस्तकें बाँटते हो तो तुम लोग वितरण शुल्क माँगते हो, और जब लिखते हो तो लिखने का शुल्क माँगते हो। जिनके साथ मैं निपट चुका हूँ वे मुझ से मुआवजा तक माँगते हैं, जबकि वे जो घर भेजे जा चुके हैं अपने नाम के नुकसान के लिए क्षतिपूर्ति की माँग करते हैं; वे जो अविवाहित हैं दहेज की माँग करते हैं, या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, वे जो मुर्गे को काटते हैं वे कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, वे जो खाने को तलते हैं, तलने का शुल्क माँगते हैं, और वे जो सूप बनाते हैं उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम लोगों की ऊँची और शक्तिशाली मानवता है और ये तुम सबके स्नेही विवेक के द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम लोगों की समझ कहाँ है? तुम लोगों की मानवता कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ! यदि तुम लोग ऐसे ही करते रहोगे, तो मैं तुम सबके मध्य में कार्य करना बंद कर दूँगा। मैं मनुष्य के रूप में जंगली जानवरों के झुंड में कार्य नहीं करूँगा, मैं ऐसे समूह के लोगों के लिए दुःख नहीं सहूँगा जिनका उजला चेहरा जंगली हृदय को छुपाये हुए है, मैं ऐसे जानवरों के झुंड के लिए कष्ट नहीं झेलूँगा जिनके उद्धार की थोड़ी-सी भी संभावना नहीं है। जिस दिन मैं तुम सबकी ओर पीठ कर लूँगा उसी दिन तुम सब मर जाओगे, उस दिन अंधकार तुम सब पर आ जायेगा, और उस दिन तुम सब प्रकाश के द्वारा त्याग दिए जाओगे। मैं तुम लोगों को बता दूँ! मैं कभी भी तुम लोगों जैसे समूह पर दयालु नहीं बनूँगा, एक ऐसा झुंड जो जानवरों से भी बदतर है! मेरे वचनों और कार्यकलापों की कुछ सीमायें हैं, और तुम सबकी मानवता और विवेक जैसे हैं उसके चलते, मैं और कार्य नहीं करूँगा, क्योंकि तुम सबमें विवेक की बहुत कमी है, तुम लोगों ने मुझे बहुत अधिक पीड़ा दी है, और तुम लोगों का घृणित व्यवहार मुझे बहुत अधिक घिन दिलाता है! तुम जैसे लोग जिनमें मानवता और विवेक की इतनी कमी है उन्हें उद्धार का अवसर कभी नहीं मिलेगा; मैं ऐसे बेरहम और एहसान-फरामोश लोगों को कभी भी नहीं बचाऊँगा। जब मेरा दिन आएगा, मैं अनंत काल के लिए अनाज्ञाकारिता की संतानों पर अपनी झुलसाने वाली आग की लपटों को बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे प्रचण्ड कोप को उकसाया था, मैं ऐसे जानवरों पर अपने अनंत दंड को थोप दूंगा जिन्होंने कभी मुझे अपशब्द कहे थे और मुझे त्याग दिया था, मैं अनाज्ञाकारिता के पुत्रों को अपने क्रोध की आग में हमेशा के लिए जलाऊँगा जिन्होंने कभी मेरे साथ खाया था और जो मेरे साथ रहे थे, परन्तु मुझ में विश्वास नहीं रखा, और मेरा अपमान किया और मुझे धोखा दिया था। मैं उन सब को सज़ा दूँगा जिन्होंने मेरे क्रोध को भड़काया, मैं उन सभी जानवरों पर अपने कोप की सम्पूर्णता को बरसाऊँगा जिन्होंने कभी बराबरी में मेरे बगल में खड़े होने की कामना की थी, फिर भी मेरी आराधना या मेरा आज्ञापालन नहीं किया, मेरी छड़ी जिससे मैं मनुष्य को मारता हूँ, वह उन जानवरों पर टूट पड़ेगी जिन्होंने कभी मेरी देखभाल और जो रहस्य मैंने बोले उनका आनंद लिया था, और जिन्होंने कभी मुझसे भौतिक आनंद लेने की कोशिश की थी। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति को क्षमा नहीं करूँगा जो मेरा स्थान लेने की कोशिश करते हैं; मैं उन में से किसी को भी नहीं छोड़ूँगा जो मुझ से खाना और कपड़े हथियाने की कोशिश करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

110. आज तुम लोग जो देखते हो, वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है। तुमने मेरे हाथ में छड़ी या उस ज्वाला को नहीं देखा है, जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ, और इसीलिए तुम लोग अभी भी मेरी उपस्थिति में अभिमानी और असंयमी हो। इसीलिए तुम लोग उस बात पर अपनी इंसानी ज़बान से विवाद करते हुए, जो मैंने तुम लोगों से कही थी, अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो। मनुष्य मुझसे नहीं डरता, और यद्यपि आज भी वह मेरे साथ शत्रुता जारी रख रहा है, उसे बिल्कुल भी कोई भय नहीं है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मी जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के वचन और कार्य उस साँप के समान हैं, जिसने हव्वा को पाप करने के लिए बहकाया था। तुम एक-दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो, और तुम अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ झपटने के लिए मेरी उपस्थिति में संघर्ष करते हो, लेकिन तुम लोग नहीं जानते कि मैं गुप्त रूप से तुम लोगों के वचनों एवं कर्मों को देख रहा हूँ। इससे पहले कि तुम लोग मेरी उपस्थिति में आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों की थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों के अवलोकन से बचना चाहता है, किंतु मैं कभी उसके कथनों या कर्मों से कतराया नहीं हूँ। इसके बजाय, मैं उद्देश्यपूर्वक उन कथनों और कर्मों को अपनी नज़रों में प्रवेश करने देता हूँ, ताकि मैं मनुष्य की अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ और उनके विद्रोह का न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गुप्त कथन और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं, और मेरे न्याय ने मनुष्य को कभी नहीं छोड़ा है, क्योंकि उसका विद्रोह बहुत ज़्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी वचनों और कर्मों को जलाकर शुद्ध करना है, जो मेरे आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[ख] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी लोग मेरे प्रति वफादारी बनाए रखेंगे, और मेरी सेवा उसी तरह से करेंगे, जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरे कार्य में करते हैं, और पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक जारी रहने देंगे, जब तक कि वह पूरा न हो जाए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है' से उद्धृत

111. मैं उन लोगों में प्रसन्नता अनुभव करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सच को तत्परता से स्वीकार कर लेते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे, और इस प्रकार मुझमें तुम्हारा विश्वास संदेह की नींव पर निर्मित होगा। मैं इस तरह के विश्वास को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर इच्छानुसार संदेह करने और उसके बारे में अनुमान लगाने के आदी हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र चरित्र का, निष्पक्षता और विवेक से विहीन, न्याय की भावना से रहित, शातिर चालबाज़ियों में प्रवृत्त, विश्वासघाती और चालाक, बुराई और अँधेरे से प्रसन्न रहने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ ऐसे लोग भी हैं, जो मानते हैं कि जो लोग मुझे खुश करते हैं, वे बिल्कुल ऐसे लोग हैं जो चापलूसी और खुशामद करते हैं, और जिनमें ऐसे हुनर नहीं होंगे, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसा विश्वास तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगा और मेरे खिलाफ बड़े विरोध में खड़ा कर देगा। कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग विश्वास करते हो कि कुलीन चरित्र और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग विश्वास करते हो कि ऐसा कोई संत नहीं होता, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक किंवदंती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही ईमानदार, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिलकुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा से संबंधित होते हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसे लक्षण हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का एक अंश है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमज़ोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में भावना नहीं, केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और विवेक से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह त्रुटिपूर्ण ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से रखा गया है और भविष्य में भी बनाए रखा जा सकता है। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोग केवल अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उत्कृष्ट परमेश्वर की सेवा करते हो और उस परमेश्वर की सेवा कभी नहीं करते, जिसे तुम इतना महत्वहीन समझते हो, मानो वह तुम लोगों को दिखाई तक न देता हो। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर की आराधना करते हो। तुम बुलंद छवियों से प्रेम करते हो और उन लोगों का सम्मान करते हो, जो अपनी वाक्पटुता के लिए प्रतिष्ठित हैं। तुम सहर्ष उस परमेश्वर द्वारा नियंत्रित हो जाते हो, जो तुम लोगों के हाथ धन-दौलत से भर देता है, और उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर सकता है। तुम केवल इस परमेश्वर की आराधना नहीं करते, जो अभिमानी नहीं है; तुम केवल इस परमेश्वर के साथ जुड़ने से घृणा करते हो, जिसे कोई मनुष्य ऊँची नज़र से नहीं देखता। तुम केवल इस परमेश्वर की सेवा करने के अनिच्छुक हो, जिसने तुम्हें कभी एक पैसा नहीं दिया है, और जो तुम्हें अपने लिए लालायित करवाने में असमर्थ है, वह केवल यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। इस प्रकार का परमेश्वर तुम्हारे क्षितिज को विस्तृत करने में, तुम्हें खज़ाना मिल जाने का एहसास करने में सक्षम नहीं बना सकता, तुम्हारी इच्छा पूरी तो बिलकुल नहीं कर सकता। तो फिर तुम उसका अनुसरण क्यों करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो, वह केवल इस मसीह का ही अपमान नहीं करता, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह स्वर्ग के परमेश्वर का अपमान करता है। मेरे विचार से परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'पृथ्वी के परमेश्वर को कैसे जानें' से उद्धृत

112. बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने की बजाय नरक में दंडित होना पसंद करेंगे। इसमें कोई हैरानी की बात नहीं कि जो बेईमान हैं उनके लिए मेरे भंडार में अन्य उपचार भी है। मैं अच्छी तरह से जानता हूँ तुम्हारे लिए ईमानदार इंसान बनना कितना मुश्किल काम है। चूँकि तुम लोग बहुत चतुर हो, अपने तुच्छ पैमाने से लोगों का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूंकि तुम में से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में भेज दूँगा ताकि अग्नि तुम्हें सबक सिखा सके, ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों के प्रति पूरी तरह समर्पित हो जाओ। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से "परमेश्वर एक निष्ठावान परमेश्वर है" शब्द निकलवा लूँगा, तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, "कुटिल है इंसान का हृदय!" उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? मुझे लगता है कि तुम उतने खुश नहीं होगे जितने अभी हो। तुम लोग इतने "गहन और गूढ़" तो बिल्कुल भी नहीं होगे जितने कि तुम अब हो। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे "शिष्ट व्यवहार” के लिए कड़ी मेहनत करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने जहरीले दाँत और पँजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसान को ईमानदार लोगों की श्रेणी में रखोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो "व्यक्तिगत संबंधों" में कुशल है, तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को हल्के में लेने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और महत्वहीन तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसी बहुत-से गुप्त भेद हैं जिन्हें तुम साझा नहीं करना चाहते, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ और अपनी कठिनाइयाँ उजागर करने के विरुद्ध हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें आसानी से उद्धार प्राप्त नहीं होगा और तुम सरलता से अंधकार से बाहर नहीं निकल पाओगे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तीन चेतावनियाँ' से उद्धृत

113. मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ, जो तुम लोगों के दिल में मौजूद है; तुममें से अधिकतर लोग केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हैं और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज में आए हैं। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन जीने की इच्छा—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी गायब हो जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखाधड़ी तुम्हारे शब्दों और कर्मों के माध्यम से उजागर होती है। स्पष्ट कहूँ तो, तुम लोग मेरे बारे में केवल उत्सुक हो, मुझसे भयभीत नहीं हो; तुम लोग अपनी जीभ पर काबू नहीं रखते और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग सिर्फ अपनी चिंताएँ दूर करने और अपनी ऊब मिटाने के लिए, अपने जीवन में मौजूद खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से किसने मेरे वचनों को अभ्यास में ढाला है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चिल्लाते रहते हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है, जो लोगों के दिलों में गहराई से देखता है, परंतु जिस परमेश्वर के बारे में तुम अपने दिलों में चिल्लाते रहते हो, उसकी मेरे साथ क्या अनुरूपता है? जब तुम लोग इस तरह से चिल्ला रहे हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या इसलिए कि यही वह प्रेम है जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम्हारे होंठों पर समर्पण की थोड़ी भी बात नहीं है, लेकिन तुम लोगों के बलिदान और अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर तुम्हारे शब्द मेरे कानों तक न पहुँचते, तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम इस तरह के संकट में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छा रही है, मानो तुम अधोलोक में खड़े परीक्षण दे रहे हो। तुम लोगों के पास जीवन-शक्ति का एक कण भी नहीं है, और तुम अपने अंदर की आवाज़ के बारे में क्षीणता से बात करते हो; यहाँ तक कि तुम शिकायत और धिक्कार से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ, उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था, यहाँ तक कि तुम्हारा मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? ऐसी स्थिति में तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन' से उद्धृत

114. हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह अनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से बचता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं गया नहीं है : इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे परमेश्वर के देखने के लिए प्रकट करने के बजाय, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह इस तथ्य के बावज़ूद है कि कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते और कहते हैं, "हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है," और कुछ लोग तो परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देने की सौगंध खाते हैं, कि यदि वे अपनी सौगंध तोड़ें तो उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं को मानने में सक्षम है, न ही यह कि उसने अपना भाग्य और संभावनाएँ और अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन छोड़ दिया है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के समक्ष चाहे जो सौगंधें खाओ या चाहे जो घोषणा करो, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अब भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किंतु इसे नियंत्रित करने की अनुमति उसे नहीं देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को थोड़ा भी दिया ही नहीं है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले शब्द बोलते हो; इस बीच, तुम अपने षडयंत्रों, कुचक्रों और मनसूबों के साथ-साथ अपने छल-कपट से भरे नानाविध मंतव्य भी परमेश्वर से छिपा लेते हो, और तुम अपनी संभावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़ लेते हो, इस गहरे डर से कि परमेश्वर उन्हें ले लेगा। इस प्रकार, परमेश्वर कभी अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों को ध्यान से देखता है, और देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करना चाहता है, और देख सकता है कि उसके हृदय के भीतर कौन-सी चीज़ें रखी हैं, किंतु मनुष्य का हृदय परमेश्वर का नहीं है, उसने उसे परमेश्वर के नियंत्रण में नहीं सौंपा है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर को अवलोकन का अधिकार है, किंतु उसे नियंत्रण का अधिकार नहीं है। मनुष्य की व्यक्तिपरक चेतना में, मनुष्य अपने आप को परमेश्वर की व्यवस्थाओं को सौंपना नहीं चाहता या न ही उसका ऐसा कोई इरादा है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे भी लोग हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने, और परमेश्वर की नज़रों से अपना असली चेहरा छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढँक लेने के तरीक़ों के बारे सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह जानने-समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपने हृदय देना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य जो करता है और वह जो चाहता है, उन सब का नियोजन, आकलन, और निर्णय स्वयं मनुष्य द्वारा किया जाता है; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो और भी नहीं है। इस प्रकार, बात चाहे परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश, या परमेश्वर द्वारा मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं से संबंधित हो, मनुष्य के निर्णय उसके अपने मंतव्यों और हितों पर, उस समय की उसकी अपनी अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य को जो मार्ग अपनाना चाहिए उसे परखने और चुनने के लिए वह अपने चिर-परिचित ज्ञान और अंतर्दृष्टियों का, और अपनी विचार शक्ति का उपयोग करता है, और परमेश्वर को हस्तक्षेप या नियंत्रण नहीं करने देता है। यही वह मनुष्य का हृदय है जिसे परमेश्वर देखता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II' से उद्धृत

115. बहुत से लोग मुझसे सच में प्रेम करना चाहते हैं, किन्तु क्योंकि उनके हृदय उनके स्वयं के नहीं हैं, इसलिए उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं है; बहुत से लोग मेरे द्वारा दिए गए परीक्षणों का अनुभव कर सच में मुझसे प्रेम करते हैं, फिर भी वे यह समझने में अक्षम हैं कि मैं वास्तव में विद्यमान हूँ, और मात्र खालीपन में मुझसे प्रेम करते हैं, ना कि मेरे वास्तविक अस्तित्व के कारण; बहुत से लोग अपने हृदय मेरे सामने रखते हैं और फिर उन पर कोई ध्यान नहीं देते, और इस प्रकार शैतान को जब भी अवसर मिलता है उनके हृदय उसके द्वारा छीन लिए जाते हैं, और तब वे मुझे छोड़ देते हैं; जब मैं अपने वचनों को प्रदान करता हूँ तो बहुत से लोग मुझसे सचमुच प्रेम करते हैं, मगर मेरे वचनों को अपनी आत्मा में सँजोते नहीं हैं; उसके बजाए, वे उनका सार्वजनिक संपत्ति के समान यूँ ही उपयोग करते हैं और जब भी वे ऐसा महसूस करते हैं उन्हें वापस वहाँ उछाल देते हैं जहाँ से वे आए थे। मनुष्य दर्द के बीच मुझे खोजता है, और परीक्षणों के बीच मेरी ओर देखता है। शांति के समय के दौरान वह मेरा आनंद उठाता है जब संकट में होता है तो वह मुझे नकारता है, जब वह व्यस्त होता है तो मुझे भूल जाता है, और जब वह खाली होता है तब अन्यमनस्क तरीके से मेरे लिए कुछ करता है—फिर भी किसी ने भी अपने संपूर्ण जीवन भर मुझसे प्रेम नहीं किया है। मैं चाहता हूँ कि मनुष्य मेरे सम्मुख ईमानदार हो : मैं नहीं कहता कि वह मुझे कोई चीज़ दे, किन्तु केवल यही कहता हूँ कि सभी लोग मुझे गंभीरता से लें, कि, मुझे फुसलाने के बजाए, वे मुझे मनुष्य की ईमानदारी को वापस लाने की अनुमति दें। मेरी प्रबुद्धता, मेरी रोशनी और मेरे प्रयासों की कीमत सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाती हैं, लेकिन साथ ही मनुष्य के हर कार्य के वास्तविक तथ्य, मुझे दिए गए उनके धोखे भी, सभी लोगों के बीच व्याप्त हो जाते हैं। यह ऐसा है मानो मनुष्य के धोखे के अवयव उसके गर्भ में आने के समय से ही उसके साथ रहे हैं, मानो उसने चालबाजी के ये विशेष कौशल जन्म से ही धारण किए हुए है। इसके अलावा, उसने कभी भी इरादों को प्रकट नहीं किया है; किसी को भी कभी इन कपटपूर्ण कौशलों के स्रोत की प्रकृति का पता नहीं लगा है। परिणामस्वरूप, मनुष्य धोखे का एहसास किए बिना इसके बीच रहता है, और यह ऐसा है मानो वह अपने आपको क्षमा कर देता है, मानो यह उसके द्वारा मुझे जानबूझ कर दिए गए धोखे के बजाए परमेश्वर की व्यवस्था है। क्या यह मनुष्य का मुझसे धोखे का वास्तविक स्रोत नहीं है? क्या यह उसकी धूर्त योजना नहीं है? मैं कभी भी मनुष्य की चापलूसियों और झाँसापट्टी से संभ्रमित नहीं हुआ हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही उसके सार को जान लिया था। कौन जानता है कि उसके खून में कितनी अशुद्धता है, और शैतान का कितना ज़हर उसकी मज्जा में है? मनुष्य हर गुज़रते दिन के साथ उसका और अधिक अभ्यस्त होता जाता है, इतना कि वह शैतान द्वारा की गई क्षति को महसूस नहीं करता, और इस प्रकार उसमें "स्वस्थ अस्तित्व की कला" को ढूँढ़ने में कोई रुचि नहीं होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 21' से उद्धृत

116. समस्त मनुष्य आत्मज्ञान से रहित प्राणी हैं, और वे स्वयं को जानने में असमर्थ हैं। फिर भी, वे अन्य सभी को बहुत करीब से जानते हैं, मानो दूसरों के द्वारा की और कही गई हर चीज़ का "निरीक्षण" पहले उन्होंने ही ठीक उन्हीं के सामने किया हो और करने से पहले उनका अनुमोदन प्राप्त किया गया हो। परिणामस्वरूप, ऐसा लगता है, मानो उन्होंने अन्य सभी की, उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं तक, पूरी नाप-तौल कर ली हो। सभी मनुष्य ऐसे ही हैं। भले ही उन्होंने राज्य के युग में प्रवेश कर लिया है, परंतु उनका स्वभाव अपरिवर्तित बना हुआ है। वे मेरे सामने अब भी वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूँ, परंतु मेरी पीठ पीछे वे अपने विशिष्ट "व्यापार" में संलग्न होना आरंभ कर देते हैं। लेकिन बाद में जब वे मेरे सम्मुख आते हैं, तो वे पूर्णत: भिन्न व्यक्तियों के समान होते हैं, प्रत्यक्षत: शांत और अविचलित, प्रकृतिस्थ चेहरे और संतुलित धड़कन के साथ। क्या वास्तव में यही चीज़ मनुष्यों को हेय नहीं बनाती? बहुत-से लोग दो पूर्णतः भिन्न चेहरे रखते हैं—एक जब वे मेरे सामने होते हैं, और दूसरा जब वे मेरी पीठ पीछे होते हैं। उनमें से कई लोग मेरे सामने नवजात मेमने के समान आचरण करते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे भयानक शेरों में बदल जाते हैं, और बाद में वे पहाड़ी पर आनंद से उड़ती छोटी चिड़ियों के समान व्यवहार करते हैं। बहुत-से लोग मेरे सामने उद्देश्य और संकल्प प्रदर्शित करते हैं। बहुत-से लोग प्यास और लालसा के साथ मेरे वचनों की तलाश करते हुए मेरे सामने आते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे उनसे उकता जाते हैं और उन्हें त्याग देते हैं, मानो मेरे कथन कोई बोझ हों। मैंने कई बार अपने शत्रु द्वारा भ्रष्ट की गई मनुष्यजाति को देखकर उससे आशा रखना छोड़ा है। कई बार मैंने उन्हें रो-रोकर क्षमा माँगते हुए अपने सामने आता देखकर, उनमें आत्मसम्मान के अभाव और उनकी अड़ियल असाध्यता के कारण, क्रोधवश उनके कार्यों के प्रति अपनी आँखें बंद कर ली हैं, यहाँ तक कि उस समय भी, जब उनका हृदय सच्चा और अभिप्राय ईमानदार होता है। कई बार मैंने लोगों को अपने साथ सहयोग करने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास से भरा देखा है, जो मेरे सामने, मेरे आगोश में, उसकी गर्माहट का स्वाद लेते प्रतीत होते हैं। कई बार, अपने चुने हुए लोगों का भोलापन, उनकी जीवंतता और मनोहरता देखकर क्यों नहीं मैं अपने हृदय में इन चीज़ों का खूब आनंद ले पाता। मनुष्य मेरे हाथों में अपने पूर्व-नियत आशीषों का आनंद लेना नहीं जानते, क्योंकि वे यह नहीं समझते कि "आशीषों" या "पीड़ाओं", दोनों का ठीक-ठीक क्या तात्पर्य है। इस कारण, मनुष्य मेरी खोज में ईमानदारी से दूर हैं। यदि आने वाला कल नहीं होता, तो मेरे सामने खड़े तुम लोगों में से कौन बहती बर्फ जैसा शुद्ध और हरिताश्म जैसा बेदाग़ होता? क्या ऐसा हो सकता है मेरे प्रति तुम लोगों का प्रेम स्वादिष्ट भोजन या कपड़े के उत्तम दर्ज़े के सूट या उत्तम परिलब्धियों वाले उच्च पद से बदला जा सकता है? क्या उसे उस प्रेम से बदला जा सकता है, जो दूसरे तुम्हारे लिए रखते हैं? क्या वास्तव में परीक्षणों से गुजरना लोगों को मेरे प्रति अपना प्रेम त्यागने के लिए प्रेरित कर देगा? क्या कष्ट और क्लेश उन्हें मेरी व्यवस्थाओं के विरुद्ध शिकायत करने का कारण बनेंगे? किसी ने भी कभी वास्तव में मेरे मुख की तलवार की प्रशंसा नहीं की है : वे इसका वास्तविक तात्पर्य समझे बिना केवल इसका सतही अर्थ जानते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में मेरी तलवार की धार देखने में सक्षम होते, तो वे चूहों की तरह तेजी से दौड़कर अपने बिलों में घुस जाते। अपनी संवेदनहीनता के कारण मनुष्य मेरे वचनों का वास्तविक अर्थ नहीं जानते, और इसलिए उन्हें कोई भनक नहीं है कि मेरे कथन कितने विकट हैं या वे मनुष्य की प्रकृति को कितना उजागर करते हैं और उन वचनों द्वारा उनकी भ्रष्टता का कितना न्याय हुआ है। इस कारण, मैं जो कहता हूँ, उसके बारे में उनके अधपके विचारों के परिणामस्वरूप अधिकतर लोगों ने एक उदासीन रवैया अपना लिया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 15' से उद्धृत

117. युगों-युगों से, बहुत-से लोग निराश होकर, और अनिच्छा से, इस संसार से चले गए हैं, और बहुत-से लोग आशा और विश्वास के साथ इसमें आए हैं। मैंने बहुतों के आने की व्यवस्था की है, और बहुतों को दूर भेजा है। अनगिनत लोग मेरे हाथों से होकर गुज़रे हैं। बहुत-सी आत्माएँ अधोलोक में डाल दी गई हैं, बहुतों ने देह में जीवन जिया है, और बहुत-सी मर गईं और पृथ्वी पर पुनः जन्मी हैं। परंतु उनमें से किसी को भी आज राज्य के आशीषों का आनंद उठाने का अवसर नहीं मिला। मैंने मनुष्य को इतना अधिक दिया है, फिर भी उसने कम ही कुछ प्राप्त किया है, क्योंकि शैतान की शक्तियों के आक्रमण ने उन्हें मेरी सारी संपदा का आनंद उठा पाने योग्य नहीं छोड़ा है। उसके पास केवल उन्हें देखने का सौभाग्य ही है, किंतु वह उनका पूरा आनंद कभी नहीं उठा पाया। मनुष्य ने स्वर्ग की धन-संपत्ति पाने के लिए अपने शरीर के ख़ज़ाने से भरे घर की खोज कभी नहीं की, और इसलिए उसने वे आशीष गँवा दिए जो मैंने उसे दिए थे। क्या मनुष्य का आत्मा बिल्कुल वही आंतरिक शक्ति नहीं है जो उसे मेरे आत्मा से जोड़ता है? क्यों मनुष्य ने मुझे कभी अपने आत्मा से नहीं जोड़ा है? ऐसा क्यों है कि वह देह में मेरे निकट खिंचा चला आता है, किंतु आत्मा में ऐसा नहीं कर पाता है? क्या मेरा सच्चा चेहरा देह का चेहरा है? मनुष्य मेरा सार क्यों नहीं जानता? क्या मनुष्य के आत्मा में सचमुच कभी मेरा कोई अवशेष नहीं रहा है? क्या मैं मनुष्य के आत्मा से पूरी तरह लुप्त हो चुका हूँ? यदि मनुष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, तो वह मेरे मनोरथों को कैसे पकड़ सकता है? मनुष्य की दृष्टि में, क्या वहाँ वह है जो सीधे आध्यात्मिक क्षेत्र को बेध सके? कई बार ऐसा हुआ कि मैंने अपने आत्मा से मनुष्य को पुकारा है, फिर भी मनुष्य ऐसे व्यवहार करता है मानो मैंने उसे डँक मार दिया हो, दूर से मेरा आदर करते हुए, अत्यधिक डर से कि मैं उसे किसी और संसार में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ कि मैंने मनुष्य के आत्मा में जाँच-पड़ताल की, फिर भी वह भुलक्कड़ बना रहता है, गहराई से भयभीत कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और अवसर का लाभ उठाकर उसका सारा सामान छीन लूँगा। इस प्रकार, वह मुझे बाहर रोक देता है, वहाँ छोड़ देता है जहाँ मेरे सामने एक भावहीन, कसकर बंद दरवाज़े के सिवा कुछ नहीं होता। कई बार ऐसा हुआ कि मनुष्य गिर गया है और मैंने उसे बचाया है, फिर भी वह जागने के बाद तुरंत मुझे छोड़ देता है और, मेरे प्रेम से अनछुआ, चौकन्नी नज़र से मुझे बेधता है; मानो मनुष्य के हृदय को मैंने कभी गरमाया नहीं है। मनुष्य भावनाहीन है, नृशंस पशु है। यद्यपि मेरे आलिंगन से उसने गरमाहट ली है, फिर भी वह इससे कभी गहराई से द्रवित नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी बनैले के समान है। उसने मानवजाति को मेरी ताड़ना कभी संजोकर नहीं रखी है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों के बीच रहना पसंद करता है, जहाँ वह जंगली जानवरों का खतरा झेलता है—फिर भी वह मुझमें शरण लेने का अनिच्छुक है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ : मैं बस अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य शक्तिशाली महासागर के बीच से तैरकर मेरी तरफ आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सकल संपदा का आनंद उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने का जोखिम पीछे छोड़ दे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन' के 'अध्याय 20' से उद्धृत

118. तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम्हारा कहना है कि तुम अपना सारा जीवन-काल मेरे कार्य के लिए खपाने को तैयार हो, और तुम इसके लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार हो, लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम लोग बस हेकड़ी से बोलते हो, बावजूद इस तथ्य के कि तुम्हारा वास्तविक व्यवहार बहुत घिनौना है। यह ऐसा है जैसे कि लोगों की जीभ और होंठ तो स्वर्ग में हों, लेकिन उनके पैर बहुत नीचे पृथ्वी पर हों, परिणामस्वरूप उनके वचन और कर्म तथा उनकी प्रतिष्ठा अभी भी चिथड़ा-चिथड़ा और विध्वस्त हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग खराब है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता डूबकर नीच अधमता में पहुँच गई है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के समस्त स्वभाव यह इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग घृणित आत्माएँ हो, जो गंदगी से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और जो कुछ भी तुम प्रकट करते हो, वह यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम वे लोग हो, जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का पेट भरकर रक्त पी लिया है। जब राज्य में प्रवेश करने का जिक्र होता है, तो तुम लोग अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं करते। क्या तुम लोग मानते हो कि तुम्हारा मौजूदा ढंग तुम्हें मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश कराने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि तुम मेरे कार्य और वचनों की पवित्र भूमि में प्रवेश पा सकते हो, इससे पहले कि मैं तुम लोगों के वचनों और कर्मों का परीक्षण करूँ? कौन है, जो मेरी आँखों में धूल झोंक सकता है? तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे छिपे रह सकते हैं? तुम लोगों के जीवन मेरे द्वारा उन अशुद्ध आत्माओं का रक्त और मांस पीने और खाने वालों के जीवन के रूप में तय किए गए हैं, क्योंकि तुम लोग रोज़ाना मेरे सामने उनका अनुकरण करते हो। मेरे सामने तुम्हारा व्यवहार विशेष रूप से ख़राब रहा है, तो मैं तुम्हें घृणित कैसे न समझता? तुम्हारे शब्दों में अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रताएँ है : तुम फुसलाते हो, भेद छिपाते हो चापलूसी करते हो, ठीक उन लोगों की तरह जो टोने-टोटकों में संलग्न रहते हैं और उनकी तरह भी जो विश्वासघाती हैं और अधर्मियों का खून पीते हैं। मनुष्य के समस्त भाव बेहद अधार्मिक हैं, तो फिर सभी लोगों को पवित्र भूमि में कैसे रखा जा सकता है, जहाँ धर्मी रहते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा यह घिनौना व्यवहार तुम्हें उन अधर्मी लोगों की तुलना में पवित्र होने की पहचान दिला सकता है? तुम्हारी साँप जैसी जीभ अंततः तुम्हारी इस देह का नाश कर देगी, जो तबाही बरपाती है और घृणा ढोती है, और तुम्हारे वे हाथ भी, जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त से सने हैं, अंततः तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे। तो फिर तुम मैल से सने अपने हाथों को साफ़ करने का यह मौका क्यों नहीं लपकते? और तुम अधर्मी शब्द बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के लिए इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने हाथों, जीभ और होंठों के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं अपनी दोनों आँखों से हरेक व्यक्ति के दिल पर नज़र रखता हूँ, क्योंकि मानव-जाति के निर्माण से बहुत पहले मैंने उनके दिलों को अपने हाथों में पकड़ा था। मैंने बहुत पहले लोगों के दिलों के भीतर झाँककर देख लिया था, इसलिए उनके विचार मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते थे? मेरे आत्मा द्वारा जलाए जाने से बचने में उन्हें ज्यादा देर कैसे नहीं हो सकती थी?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

119. तुम्हारे होंठ कबूतरों से अधिक दयालु हैं, लेकिन तुम्हारा दिल पुराने साँप से ज्यादा भयानक है। तुम्हारे होंठ लेबनानी महिलाओं जितने सुंदर हैं, लेकिन तुम्हारा दिल उनकी तरह दयालु नहीं है, और कनानी लोगों की सुंदरता से तुलना तो वह निश्चित रूप से नहीं कर सकता। तुम्हारा दिल बहुत धोखेबाज़ है! जिन चीज़ों से मुझे घृणा है, वे केवल अधर्मी के होंठ और उनके दिल हैं, और लोगों से मेरी अपेक्षाएँ, संतों से मेरी अपेक्षा से जरा भी अधिक नहीं हैं; बात बस इतनी है कि मुझे अधर्मियों के बुरे कर्मों से घृणा महसूस होती है, और मुझे उम्मीद है कि वे अपनी मलिनता दूर कर पाएँगे और अपनी मौजूदा दुर्दशा से बच सकेंगे, ताकि वे उन अधर्मी लोगों से अलग खड़े हो सकें और उन लोगों के साथ रह सकें और पवित्र हो सकें, जो धर्मी हैं। तुम लोग उन्हीं परिस्थितियों में हो जिनमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल से ढके हो; तुम्हारे पास उन मनुष्यों की मूल समानता का छोटे से छोटा अंश भी नहीं है, जिन्हें शुरुआत में बनाया गया था। इतना ही नहीं, चूँकि तुम लोग रोज़ाना उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो, और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, इसलिए तुम लोगों के समस्त अंग—यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी—उनके गंदे पानी से इस क़दर भीगे हुए हैं कि तुम लोग पूरी तरह से दाग़ों से ढँके हुए हो, और तुम्हारा एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत हृदय-विदारक है! तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, और फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो और "मल-मूत्र" के साथ व्यवहार करते हो। तुम्हारा जीवन बहुत भद्दा है, फिर भी तुम इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिलकुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था, या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो, और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है? तुम अपने माता-पिता के लिए, अशुद्ध आत्माओं के माता-पिता के लिए, दौड़-भाग करते रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि तुम्हें फँसाने वाले वे अशुद्ध आत्माओं के माता-पिता हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर बड़ा किया। इसके अलावा, तुम नहीं जानते कि तुम्हारी सारी गंदगी वास्तव में उन्होंने ही तुम्हें दी है; तुम बस यही जानते हो कि वे तुम्हें "आनंद" दे सकते हैं, वे तुम्हें ताड़ना नहीं देते, न ही वे तुम्हारी आलोचना करते हैं, और विशेष रूप से वे तुम्हें शाप नहीं देते। वे कभी तुम पर गुस्से से भड़के नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ स्नेह और दया का व्यवहार करते हैं। उनके शब्द तुम्हारे दिल को पोषण देते हैं और तुम्हें लुभाते हैं, ताकि तुम गुमराह हो जाओ, और बिना एहसास किए, तुम फँसालिए जाते हो और उनकी सेवा करने के इच्छुक हो जाते हो, उनके निकास और नौकर बन जाते हो। तुम्हें कोई शिकायत नहीं होती है, बल्कि तुम उनके लिए कुत्तों और घोड़ों की तरह कार्य करने के लिए तैयार रहते हो; वे तुम्हें धोखा देते हैं। यही कारण है कि मेरे कार्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मेरे हाथों से चुपके से निकल जाना चाहते हो, और कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मीठे शब्दों का प्रयोग करके छल से मेरी सहायता चाहते हो। इससे पता चलता है कि तुम्हारे पास पहले से एक दूसरी योजना थी, एक दूसरी व्यवस्था थी। तुम मेरे कुछ कार्यों को सर्वशक्तिमान के कार्य के रूप में देख सकते हो, पर तुम्हें मेरे न्याय और ताड़ना की जरा-सी भी जानकारी नहीं है। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं है कि मेरी ताड़ना कब शुरू हुई; तुम केवल मुझे धोखा देना जानते हो—लेकिन तुम यह नहीं जानते कि मैं मनुष्य का कोई उल्लंघन बरदाश्त नहीं करूँगा। चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं वह परमेश्वर हूँ, जो बुराई से घृणा करता है, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति शंकालु है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह बरदाश्त नहीं करूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह बरदाश्त करूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दंड दूंगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा क्रोध उन कुत्ते और सुअर जैसे लोगों को कैसे सहन कर सकता है, जो मुझे धोखा देते हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी पाखंडी, "पवित्र" लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए "सेवारत" हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारा पिछला संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को बरदाश्त नहीं करूँगा, जो मुझे धोखा दे। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस बेहूदगी से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को धोखा कैसे देने दे सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

120. मैं तुम लोगों के बीच में रहा हूँ, कई वसंत और पतझड़ तुम्हारे साथ जुड़ा रहा हूँ; मैं लंबे समय तक तुम लोगों के बीच जीया हूँ, और तुम लोगों के साथ जीया हूँ। तुम लोगों का कितना घृणित व्यवहार मेरी आँखों के सामने से फिसला है? तुम्हारे वे हृदयस्पर्शी शब्द लगातार मेरे कानों में गूँजते हैं; तुम लोगों की हज़ारों-करोड़ों आकांक्षाएँ मेरी वेदी पर रखी गई हैं—इतनी ज्यादा कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता। लेकिन तुम लोगों का जो समर्पण है और जितना तुम अपने आपको खपाते हो, वह रंचमात्र भी नहीं है। मेरी वेदी पर तुम लोग ईमानदारी की एक नन्ही बूँद भी नहीं रखते। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहाँ हैं? तुम लोगों ने मुझसे अनंत अनुग्रह प्राप्त किया है और तुमने स्वर्ग के अनंत रहस्य देखे हैं; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन तुम लोगों को जला देने को मेरा दिल नहीं माना। फिर भी, बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? जो भोजन मैंने तुम्हारे हाथ में दिया है, पलटकर उसी को तुम मुझे पेश कर देते हो, बल्कि यह कहते हो कि वह तुम्हें अपनी कड़ी मेहनत के पसीने के बदले मिला है और तुम अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर रहे हो। तुम यह कैसे नहीं जानते कि मेरे लिए तुम्हारा "योगदान" बस वे सभी चीज़ें हैं, जो मेरी ही वेदी से चुराई गई हैं? इतना ही नहीं, अब तुम वे चीज़ें मुझे चढ़ा रहे हो, क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे? तुम यह कैसे नहीं जान पाते कि आज जिन भेंटों का आनंद मैं उठा रहा हूँ, वे मेरी वेदी पर चढ़ाई गई सभी भेंटें हैं, न कि जो तुमने अपनी कड़ी मेहनत से कमाई हैं और फिर मुझे प्रदान की हैं। तुम लोग वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत करते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? तुम लोग मुझसे इसे और सहने की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को सब-कुछ दे दिया है। मैंने तुम लोगों के लिए सब-कुछ खोलकर रख दिया है, तुम्हारी ज़रूरतें पूरी की हैं, और तुम लोगों की आँखें खोली हैं, फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा की अनदेखी कर इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने नि:स्वार्थ भाव से अपना सब-कुछ तुम लोगों पर न्योछावर कर दिया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी तुम लोगों को मुझसे वह सब मिल जाए, जो मैं स्वर्ग से लाया हूँ। इसके बावजूद तुम लोगों में बिलकुल भी समर्पण नहीं है, और अगर तुमने कोई छोटा-मोटा योगदान किया भी हो, तो बाद में तुम मुझसे उसका "हिसाब बराबर" करने की कोशिश करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं माना जाएगा? तुमने मुझे मात्र रेत का एक कण दिया है, जबकि माँगा एक टन सोना है। क्या तुम सर्वथा विवेकहीन नहीं बन रहे हो? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूँ। बदले में जो कुछ मुझे मिलना चाहिए, उसके दस प्रतिशत का भी कोई नामोनिशान नहीं है, अतिरिक्त बलिदानों की तो बात ही छोड़ दो। इसके अलावा, धर्मपरायण लोगों द्वारा दिए जाने वाले उस दस प्रतिशत को भी दुष्टों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम लोग मुझसे तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो? क्या तुम सब मेरी वेदी को नष्ट नहीं कर रहे हो? ऐसे लोगों को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम लोगों के दुष्कर्मों को खज़ाना कैसे कह सकता हूँ?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!' से उद्धृत

121. कई तरीके हैं जो तुम नहीं समझते हो, कई मामले हैं जिनका तुम्हें कोई ज्ञान नहीं है। तुम लोग इतने अज्ञानी हो; मैं तुम लोगों की कद-काठी और तुम लोगों की कमियां अच्छी तरह जानता हूँ। इसलिए, यद्यपि कई वचन हैं जिन्हें समझने में तुम लोग असमर्थ हो, फिर भी मैं तुम सब लोगों को ये सारे सत्य बताने का इच्छुक हूँ जिन्हें तुमने पहले कभी ग्रहण नहीं किया हैहे, क्योंकि मैं चिंता करता रहता हूँ कि तुम लोगों की वर्तमान कद-काठी में, तुम मेरे प्रति अपनी गवाही पर डटे रहने में समर्थ हो या नहीं। ऐसा नहीं है कि मुझे तुम लोगों की कोई परवाह नहीं है; तुम लोग पूरे जंगली हो जिन्हें अभी मेरे औपचारिक प्रशिक्षण से गुज़रना है, और मैं पूरी तरह देख नहीं सकता कि तुम लोगों के भीतर कितनी महिमा है। हालाँकि तुम लोगों पर कार्य करते हुए मैंने बहुत ऊर्जा व्यय की है, तब भी तुम लोगों में सकारात्मक तत्व वास्तव में अविद्यमान प्रतीत होते हैं, जबकि नकारात्मक तत्व अँगुलियों पर गिने जा सकते हैं और केवल ऐसी गवाहियों का काम कर सकते हैं, जो शैतान को लज्जित करती हैं। तुम्हारे भीतर लगभग बाकी सब कुछ शैतान का ज़हर है। तुम लोग मुझे ऐसे दिखते हो जैसे तुम उद्धार से परे हो। अभी स्थिति यह है कि मैं तुम लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियों और व्यवहारों को देखता हूँ, और अंततः, मैं तुम लोगों की असली कद-काठी जानता हूँ। यही कारण है कि मैं तुम लोगों को लेकर अत्यधिक चिंता करता रहता हूँ: जीवन जीने के लिए अकेले छोड़ दिये जायें, तो क्या मनुष्य आज जैसे हैं, उसके तुल्य या उससे बेहतर हो पाएंगे? क्या तुम लोगों की बचकानी कद-काठी तुम लोगों को व्याकुल नहीं करती? क्या तुम लोग सचमुच इस्राएल के चुने हुए लोगों जैसे हो सकते हो-हर समय, केवल और केवल मेरे प्रति निष्ठावान? तुम लोगों में जो उद्घाटित हुआ है, वह अपने माता-पिता से बिछड़े बच्चों का शरारतीपन नहीं है, बल्कि जंगलीपन है जो अपने स्वामियों के चाबुक की पहुँच से बाहर हो चुके जानवरों से फूटकर बाहर आ जाता है। तुम लोगों को अपनी प्रकृति जाननी चाहिए, जो तुम लोगों में समान कमज़ोरी भी है; यह एक रोग है जो तुम लोगों में समान है। इस प्रकार, आज तुम लोगों को मेरा एकमात्र उपदेश यह है कि मेरे प्रति अपनी गवाही पर अडिग रहो। किसी भी परिस्थिति में पुरानी बीमारी को फिर भड़कने न दो। गवाही देना ही वह है, जो सबसे महत्वपूर्ण है—यह मेरे कार्य का मर्म है। तुम लोगों कोमेरे वचन वैसे ही स्वीकार करने चाहिए जैसे मरियम ने यहोवा का प्रकाशन स्वीकार किया था, जो उस तक एक स्वप्न में आया था : विश्वास करके और आज्ञापालन करके। केवल यही पवित्रता की कसौटी पर खरा उतरता है। क्योंकि तुम लोग ही हो जो मेरे वचनों को सबसे अधिक सुनते हो, जिन्हें मेरा सबसे अधिक आशीष प्राप्त है। मैंने तुम लोगों को अपनी समस्त मूल्यवान चीज़ें दे दी हैं, मैंने सब कुछ तुम लोगों को प्रदान कर दिया है, तो भी तुम लोग इस्राएल के लोगों से इतने अत्यधिक भिन्न कद-काठी के हो; तुम बहुत ही अलग-अलग हो। लेकिन उनकी तुलना में, तुम लोगों ने इतना अधिक प्राप्त किया है; जहां वे मेरे प्रकटन की हताशा से प्रतीक्षा करते हैं, तुम लोग मेरे साथ, मेरी उदारता को साझा करते हुए, सुखद दिन बिताते हो। इस भिन्नता को देखते हुए, मेरे ऊपर चीखने-चिल्लाने और मेरे साथ झगड़ा करने और जो मेरा है, उसमें अपने हिस्से की माँग करने का अधिकार तुम लोगों को कौन देता है? क्या तुम लोगों को बहुत नहीं मिला है? मैं तुम लोगों को इतना अधिक देता हूँ, परन्तु बदले में तुम लोग जो मुझे देते हो, वह है हृदयविदारक उदासी और दुष्चिंता और अदम्य रोष और असंतोष। तुम बहुत घृणास्पद हो—तथापि तुम दयनीय भी हो, इसलिए मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि मैं अपना सारा रोष निगल लूँ और तुम लोगों के सामने बार-बार अपनी आपत्तियों को ज़ाहिर करूँ। हज़ारों वर्षों के कार्य के दौरान, मैंने कभी मानवजाति के साथ प्रतिवाद नहीं किया क्योंकि मैंने पाया है कि मानवता के समूचे विकास में, तुम लोगों के बीच केवल "चकमेबाज" ही हैं जो सबसे अधिक प्रख्यात बने हैं, प्राचीन कालों के प्रसिद्ध पुरखों द्वारा तुम लोगों के लिए छोड़ी गई बहुमूल्य धरोहरों की तरह। उन सूअर और कुत्तों से, निचले दर्जे के इन्सानों से मुझे कितनी घृणा है। तुम लोगों में अंतरात्मा की कमी है! तुम लोग बहुत अधम चरित्र के हो! तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं! यदि मैं अपने ऐसे वचनों और कार्य को इस्राएलियों के बीच ले गया होता, तो मैं बहुत पहले ही महिमा प्राप्त कर चुका होता। परन्तु तुम लोगों के बीच यह अप्राप्य है; तुम लोगों के बीच सिर्फ़ क्रूर उपेक्षा, तुम्हारा रूखा व्यवहार और तुम्हारे बहाने हैं। तुम लोग बहुत संवेदनाशून्य और बिल्कुल बेकार हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?' से उद्धृत

122. अतीत के बारे में सोचो : कब तुम लोगों के प्रति मेरी दृष्टि क्रोधित, और मेरी आवाज़ कठोर हुई है? मैंने कब तुम लोगों में मीनमेख निकाली है? मैंने कब तुम लोगों को बेवजह प्रताड़ित किया है? मैंने कब तुम लोगों को तुम्हारे मुँह पर डाँटा है? क्या यह मेरे कार्य के वास्ते नहीं है कि मैं तुम लोगों को हर प्रलोभन से बचाने के लिए अपने परमपिता को पुकारता हूँ? तुम लोग मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हो? क्या मैंने कभी भी अपने अधिकार का उपयोग तुम लोगों की देह को मार गिराने के लिए किया है? तुम लोग मुझे इस प्रकार का प्रतिफल क्यों दे रहे हो? मेरे प्रति कभी हाँ और कभी ना करने के बाद, तुम लोग न हाँ में हो और न ही ना में, और फिर तुम मुझे मनाने और मुझसे बातें छिपाने का प्रयास करते हो और तुम लोगों के मुँह अधार्मिकता के थूक से भरे हुए हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे आत्मा को धोखा दे सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे कोप से बच सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मुझ यहोवा के कार्यों की, जैसी चाहे वैसी आलोचना कर सकती हैं? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ, जिसके बारे में मनुष्य आलोचना कर सकता है? क्या मैं छोटे से भुनगे को इस प्रकार अपनी ईशनिंदा करने दे सकता हूँ? मैं ऐसे अवज्ञाकारिता के पुत्रों को कैसे अपने अनंत आशीषों के बीच रख सकता हूँ? तुम लोगों के वचनों और कार्यों ने तुम लोगों को काफी समय तक उजागर और निंदित किया है। जब मैंने स्वर्ग का विस्तार किया और सभी चीज़ों का सृजन किया, तो मैंने किसी भी प्राणी को उसके मन मुताबिक़ भाग लेने की अनुमति नहीं दी, किसी भी चीज़ को उसके हिसाब से मेरे कार्य और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ करने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं दी। मैंने किसी भी मनुष्य या वस्तु को सहन नहीं किया; मैं कैसे उन लोगों को छोड़ सकता हूँ, जो मेरे प्रति निर्दयी और क्रूर और अमानवीय हैं? मैं कैसे उन लोगों को क्षमा कर सकता हूँ, जो मेरे वचनों के ख़िलाफ़ विद्रोह करते हैं? मैं कैसे उन्हें छोड़ सकता हूँ, जो मेरी अवज्ञा करते हैं? क्या मनुष्य की नियति मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं है? मैं कैसे तुम्हारी अधार्मिकता और अवज्ञा को पवित्र मान सकता हूँ? तुम्हारे पाप मेरी पवित्रता को कैसे मैला कर सकते हैं? मैं अधर्मी की अशुद्धता से दूषित नहीं होता, न ही मैं अधर्मियों के चढ़ावों का आनंद लेता हूँ। यदि तुम मुझ यहोवा के प्रति वफादार होते, तो क्या तुम मेरी वेदी से बलिदानों को अपने लिए ले सकते थे? क्या तुम मेरे पवित्र नाम की ईशनिंदा के लिए अपनी विषैली ज़ुबान का उपयोग कर सकते थे? क्या तुम इस प्रकार मेरे वचनों के विरुद्ध विद्रोह कर सकते थे? क्या तुम मेरी महिमा और पवित्र नाम को, एक दुष्ट, शैतान की सेवा के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते थे? मेरा जीवन पवित्र लोगों के आनंद के लिए प्रदान किया जाता है। मैं तुम्हें कैसे अपने जीवन के साथ तुम्हारी इच्छानुसार खेलने और तुम लोगों के बीच के संघर्ष में इसे एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की इजाज़त दे सकता हूँ? तुम लोग अच्छाई के मार्ग में इतने निर्दयी और इतने अभावग्रस्त कैसे हो सकते हो, जैसे तुम मेरे प्रति हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मैंने पहले ही तुम लोगों की बुरी करतूतों को जीवन के इन वचनों में लिख दिया है? जब मैं मिस्र को ताड़ना देता हूँ, तब तुम लोग कोप के दिन से कैसे बच सकते हो? कैसे तुम लोगों को इस तरह बार-बार अपना विरोध और अनादर करने की अनुमति दे सकता हूँ? मैं तुम लोगों को सीधे तौर पर कहता हूँ कि जब वह दिन आएगा, तो तुम लोगों की ताड़ना मिस्र की ताड़ना की अपेक्षा अधिक असहनीय होगी! तुम लोग कैसे मेरे कोप के दिन से बच सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'कोई भी जो देह में है, कोप के दिन से नहीं बच सकता' से उद्धृत

123. मनुष्य परमेश्वर को पाने में इसलिए असफल नहीं होता कि परमेश्वर के पास भावना है, या इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य के द्वारा प्राप्त होना नहीं चाहता, बल्कि इसलिए कि मनुष्य परमेश्वर को पाना ही नहीं चाहता, और इसलिए क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को आवश्यकता की भावना के साथ खोजता ही नहीं। जो सचमुच परमेश्वर को खोजता है वह परमेश्वर के द्वारा श्रापित कैसे किया जा सकता है? जो सही समझ और संवेदनशील विवेक का हो वह परमेश्वर के द्वारा कैसे श्रापित किया जा सकता है? जो सचमुच परमेश्वर की आराधना और सेवा करता है उसे परमेश्वर के कोप की आग से नष्ट कैसे किया जा सकता है? जिसे परमेश्वर की आज्ञा मानने में ख़ुशी मिलती है, उसे परमेश्वर के घर से बाहर कैसे निकाला जा सकता है? जो परमेश्वर को अधिक से अधिक प्रेम करना चाहता है, वह परमेश्वर की सज़ा में कैसे रह सकता है? जो परमेश्वर के लिए सबकुछ त्यागने के लिए तैयार है उसका सब कुछ ले लिया जाए, ये कैसे हो सकता है? मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं है, अपनी सम्पत्ति को परमेश्वर के लिए खर्च करने का इच्छुक नहीं है, और परमेश्वर के लिए जीवन-भर के प्रयास समर्पित करने के लिए तैयार नहीं है; इसके बजाय कहता है कि परमेश्वर बहुत दूर चला गया है, परमेश्वर के बारे में बहुत कुछ मनुष्य की धारणाओं के साथ मेल नहीं खाता। ऐसी मानवता के साथ, यद्यपि तुम सब अपने प्रयासों में उदार भी होते तो भी तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाओगे, इस तथ्य के बारे में तो क्या कहा जाए कि तुम परमेश्वर को नहीं खोजते हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम सब मानवजाति के दोषपूर्ण उत्पाद हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की मानवता से ज़्यादा नीच और कोई मानवता नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों का आदर करने क लिए दूसरे तुम्हें क्या कहकर बुलाते हैं? जो लोग सच में परमेश्वर को प्रेम करते हैं वे तुम लोगों को भेड़िये का पिता, भेड़िये की माता, भेड़िये का पुत्र, और भेड़िये का पोता कह कर बुलाते हैं; तुम सब भेड़िये के वंशज हो, भेड़िये के लोग हो, और तुम लोगों को अपनी पहचान जाननी चाहिए और उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। यह न सोचो कि तुम लोग कोई श्रेष्ठ हस्ती हो : तुम सब मानवजाति के मध्य गैर-मनुष्यों का सबसे अधिक क्रूर झुंड हो। क्या तुम्हें इसमें से कुछ नहीं पता? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम सबके मध्य में कार्य करने के द्वारा मैंने कितना जोखिम उठाया है? यदि तुम सबकी समझ वापस उचित नहीं हो सकती, और तुम सबका विवेक सामान्य रूप से कार्य नहीं कर सकता, तो फिर तुम सब कभी भी "भेड़िये" की पदवी से मुक्त नहीं हो पाओगे, तुम सब कभी भी श्राप के दिन से बच नहीं पाओगे, अपनी सज़ा के दिन से कभी बच नहीं पाओगे। तुम सब हीन जन्मे थे, एक मूल्यरहित वस्तु। तुम सब प्रकृति से भूखे भेड़ियों का झुंड, मलबे और कचरे का एक ढेर हो, और, तुम सबकी तरह, मैं तुम लोगों के ऊपर एहसान पाने के लिए कार्य नहीं करता, बल्कि इसलिए करता हूँ क्योंकि कार्य की आवश्यकता है। यदि तुम सब इसी ढंग से विद्रोही बने रहोगे, तो मैं अपना कार्य रोक दूँगा, और फिर दोबारा तुम लोगों पर कभी कार्य नहीं करूँगा; बल्कि मैं अपना कार्य दूसरे झुंड पर स्थानांतरित कर दूँगा जो मुझे प्रसन्न करता है, और इस तरह से मैं तुम सबको हमेशा के लिए छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं उन पर नजर डालने के लिए तैयार नहीं हूँ जो मेरे साथ शत्रुता रखते हैं। तो फिर, क्या तुम सब मेरे अनुरूप बनने की कामना करते हो, या मेरे विरुद्ध शत्रुता रखने की?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक अपरिवर्तित स्वभाव का होना परमेश्वर के साथ शत्रुता में होना है' से उद्धृत

124. जब तुम आज के मार्ग पर चलते हो, तो किस प्रकार का अनुगमन सबसे अच्छा होता है? अपने अनुगमन में तुम्हें खुद को किस तरह के व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए? तुम्हें पता होना चाहिए कि आज जो कुछ भी तुम पर पड़ता है, उसके प्रति तुम्हारा नज़रिया क्या होना चाहिए, चाहे वह परीक्षण हों या कठिनाई, या फिर निर्मम ताड़ना और श्राप। तुम्हें इस पर सभी मामलों में सावधानीपूर्वक विचार करना चाहिए। मैं यह क्यों कहता हूँ? मैं इसे इसलिए कहता हूँ, क्योंकि आज जो कुछ भी तुम पर पड़ता है, आख़िरकार, वे छोटे-छोटे परीक्षण हैं जो बार-बार आते हैं; शायद तुम उन्हें मानसिक रूप से बहुत कष्टदायक नहीं समझते, और इसलिए तुम चीजों को बस बह जाने देते हो, और प्रगति की खोज में उन्हें मूल्यवान संपत्ति नहीं मानते। तुम कितने लापरवाह हो! यहाँ तक कि तुम इस मूल्यवान संपत्ति को अपनी आँखों के सामने उड़ते एक बादल जैसा समझते हो, और तुम बार-बार बरसने वाले इन कठोर आघातों को सँजोकर नहीं रखते—आघात, जो कि अल्पकालीन होते हैं और तुम्हें कम भारी लगते हैं—बल्कि उन्हें दिल पर न लेते हुए उन्हें ठंडी अनासक्ति से देखते हो, और उन्हें सिर्फ़ सांयोगिक आघात समझते हो। तुम इतने घमंडी हो! इन भयंकर हमलों के प्रति, हमले जो कि बार-बार आने वाले तूफानों की तरह हैं, तुम केवल क्षुद्र अनादर दिखाते हो; कभी-कभी तुम अपनी पूर्ण उदासीनता की अभिव्यक्ति प्रकट करते हुए एक ठंडी मुस्कान तक देने पर उतारू हो जाते हो—क्योंकि तुमने मन में कभी एक बार भी नहीं सोचा कि तुम इस तरह के "दुर्भाग्य" क्यों झेलते रहते हो। क्या मैं मनुष्य के साथ बहुत अन्याय करता हूँ? क्या मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालता हूँ? हालाँकि तुम्हारी मानसिकता संबंधी समस्याएँ उतनी गंभीर नहीं भी हो सकती हैं, जितना मैंने वर्णित किया है, फिर भी तुमने अपने बाहरी आत्मसंयम के माध्यम से, लंबे समय से अपनी आंतरिक दुनिया की एक उत्तम छवि बनाई हुई है। मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं है कि तुम्हारे दिल की गहराइयों में छिपी एकमात्र चीज़ है असभ्य कटूक्ति और उदासी के हलके निशान, जो दूसरों को मुश्किल से दिखाई पड़ते हैं। क्योंकि तुम्हें लगता है कि इस तरह के परीक्षण झेलना बहुत गलत है, तुम श्राप देते हो; परीक्षण तुम्हें दुनिया की वीरानी का एहसास कराते हैं और इस वजह से तुम उदासी से भर जाते हो। इन बार-बार के आघातों और अनुशासन को बहुत अच्छी सुरक्षा के रूप में देखने के बजाय तुम उन्हें स्वर्ग द्वारा निरर्थक परेशानी पैदा किए जाने के रूप में, या फिर स्वयं से लिए जाने वाले उपयुक्त प्रतिशोध के रूप में देखते हो। तुम कितने अज्ञानी हो! तुम निर्दयता से अच्छे समय को अँधेरे में कैद कर लेते हो; बार-बार तुम अद्भुत परीक्षणों और अनुशासन को अपने दुश्मनों द्वारा किए गए हमलों के रूप में देखते हो। तुम अपने वातावरण के अनुकूल होने में असमर्थ हो; और उसके लिए इच्छुक तो और भी कम हो, क्योंकि तुम इस बार-बार की—और अपनी दृष्टि में निर्मम—ताड़ना से कुछ भी हासिल करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम न तो खोज करने का प्रयास करते हो और न ही अन्वेषण करने का, बस अपने भाग्य के आगे नतमस्तक हो जाते हो, चाहे वह तुम्हें जहाँ भी ले जाए। जो बातें तुम्हें बर्बर ताड़ना लगती हैं उन्होंने तुम्हारा दिल नहीं बदला, न ही उन्होंने तुम्हारे दिल पर कब्ज़ा किया है; इसके बजाय उन्होंने तुम्हारे दिल में छुरा घोंपा। तुम इस "क्रूर ताड़ना" को इस जीवन में अपने दुश्मन से ज्यादा नहीं देखते, और तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। तुम इतने दंभी हो! शायद ही कभी तुम मानते हो कि तुम इस तरह के परीक्षण इसलिए भुगतते हो, क्योंकि तुम बहुत घिनौने हो; इसके बजाय, तुम खुद को बहुत अभागा समझते हो, और कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारी गलतियाँ निकालता रहता हूँ। आज तक, जो मैं कहता और करता हूँ, तुम्हें वास्तव में उसका कितना ज्ञान है? ऐसा मत सोचो कि तुम एक अंतर्जात प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से बहुत अधिक ऊँची है। तुम किसी भी अन्य से ज्यादा होशियार नहीं हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, तुम उनसे कहीं ज्यादा मूर्ख हो, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो, और तुममें कभी भी हीनता की भावना नहीं रही; ऐसा लगता है कि तुम मेरे कार्यों को बड़े विस्तार से अनुभव करते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति हो, जिसके पास विवेक की मूलभूत रूप से कमी है, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं है कि मैं क्या करूँगा, और उससे भी कम तुम्हें इस बात की जानकारी है कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम जमीन पर कड़ी मेहनत करने वाले किसी बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, ऐसा किसान, जिसे मानव-जीवन की थोड़ी भी समझ नहीं है और फिर भी जो जमीन पर खेती करते हुए स्वर्ग के आशीषों पर निर्भर करता है। तुम अपने जीवन के संबंध में एक पल भी विचार नहीं करते, तुम्हें यश के बारे में कुछ नहीं पता, और तुम्हारे पास कोई आत्म-ज्ञान तो बिलकुल नहीं है। तुम इतने "उन्नत" हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं : क्या वे जानवर नहीं हैं?' से उद्धृत

125. कुछ लोग खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं, लेकिन बस ऊपर-ऊपर से : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी चीज़ों की परवाह करते हैं, जैसे कि अपने खाने-पहनने की; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में सँवाद करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुमने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी तुम्हारा आध्यात्मिक कद नगण्य है! अपने मध्य तरुण महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी फिज़ूल की इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, भले ही तुम्हें लगता हो कि तुम बहुत सजी-सँवरी हो, लेकिन क्या तुम सच में गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वो तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा झुकाव अपने चेहरे पर लाली और पावडर पोतने की तरफ रहता है! और अपने बीच छबीले नौजवानों को देखो, ये अनुशासनहीन पुरुष जो दिनभर मटरगश्ती करते फिरते हैं, बेलगाम रहते हैं और अपने चेहरे पर लापरवाही के हाव-भाव लिए रहते हैं। क्या किसी व्यक्ति को ऐसा बर्ताव करना चाहिए? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो खून-पसीना बहाया है, उसकी कीमत के बदले तुमने क्या लाभ प्राप्त किया है? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—निरर्थक काम! तुमसे सामान्यता का इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम पथ-भ्रष्ट भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवीयता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम मलिन हैवानों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे मलिन हैवानों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। तुम अपनी वासना और देह को भले ही कठोर नियंत्रण में रख लो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पी‌ड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और विशिष्ट दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए रचा गया फरेब नहीं है? तुम लोग यह किसलिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोगों के कान बहरे हैं, तुम लोगों की आँखें कमज़ोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारा दिल इस हद तक कठोर है कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है, और यह ऐसा है कि तुम इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुम्हें मूलत: सामान्य मानवीयता से संसाधित नहीं किया गया था। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवीयता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलत: तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक शैतान ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलत: पाप के हो? क्या तुम लोग जानते नहीं कि तुम्हारी देह वासना से इतनी भरी हुई है कि यह तुम्हारे कपड़ों तक से रिसती है, तुम लोगों की असह्य रूप से बदसूरत और मलिन दुष्टों जैसी स्थितियों को प्रकट करती है? क्या बात ऐसी नहीं है कि तुम लोग इसे दूसरों से ज़्यादा बेहतर ढंग से जानते हो? क्या तुम्हारे दिलों को, तुम्हारी आँखों को, तुम्हारे होठों को मलिन दुष्टों ने बिगाड़ नहीं दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग गंदे नहीं हैं? क्या तुम्हें लगता है कि जब तक तुम कोई क्रियाकलाप नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम्हें लगता है कि सुदंर वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी नीच आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो : कपटी और नकली मत बनो और अपनी नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा का पैमाना और ईमानदारी की हद है? मुझे तुम लोगों में से उनसे नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवीयता हो, और तुम्हें अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुम्हारी देह बहुत उछाल मार रही है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

126. जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो बुरी औषधियों और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी हैं, जो बिखर चुके हैं, तार-तार हो चुके हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत शोहरत और धन-दौलत के लिए संघर्ष करते हैं; जो कर्कश शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो गुटबाज़ी करते हैं और स्वतंत्रता चाहते हैं; जो खुद को परमेश्वर से भी ऊँचा उठाते हैं; वे तुच्छ नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष निजी शोहरत और धन-दौलत का मज़ा लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, बुरी औषधि, जादू-टोना, अश्लील भाषा और असभ्य शब्द सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र भाषा मलिन की जाती है। तुम मलिनता और अवज्ञा से भरे हुए अन्यजाति राष्ट्रो! तुम लोगों का अंतिम परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज़ की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग को प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर को ऊँचा उठाकर उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो अपनी प्रशंसा करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है? तुम्हारा बचाया जाना इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी साख बना ली है। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा लक्ष्य फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे "वृक्ष" होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? परमेश्वर के प्रति तुम्हारी श्रद्धा, खुद के लिए तुम्हारे प्रेम और तुम्हारी वासनायुक्त कामनाओं से कहीं कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और आदर्श कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत ही विद्रोही हो, तुम्हारा उद्धार नहीं हो सकता! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे काम के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों का तुमने कभी पालन किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना "काम" करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों से कम नहीं हो, सब-कुछ मेरे विरोध में कर रहे हो! तुम लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम्हें अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों की श्रद्धा कहाँ है? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न आज्ञाकारिता है, न श्रद्धा है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लम्पट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊंगा। मैं तुम मलिन राक्षसों से घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामोत्तेजना तुम लोगों को नरक में धकेल देगी। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? मलिन राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग घिनौने हो! तुम निकृष्ट हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, यह सत्य, यह मार्ग और यह जीवन तुम लोगों को आकर्षित नहीं करता; बल्कि, तुम लोग पाप की ओर, धन की ओर, रुतबे की ओर, शोहरत और लाभ की ओर आकर्षित होते हो; देह-सुख की ओर आकर्षित होते हो; सुंदर स्त्री-पुरुषों की ओर आकर्षित होते हो। मेरे राज्य में प्रवेश करने की तुम लोगों की क्या पात्रता है? तुम लोगों की छवि परमेश्वर से भी बड़ी है, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर से भी ऊँचा है, लोगों में तुम्हारी प्रतिष्ठा का तो कहना ही क्या—तुम लोग ऐसे आदर्श बन गए हो जिन्हें लोग पूजते हैं। क्या तुम प्रधान स्वर्गदूत नहीं बन गए हो? जब लोगों के परिणाम उजागर होते हैं, जो वो समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'अभ्यास (7)' से उद्धृत

127. मनुष्य निकम्मा और नाकारा है, क्योंकि उसने स्वयं को सँजोकर नहीं रखा है। यदि वह स्वयं से प्यार करके खुद को ही रौंदता है, तो क्या यह उसके निकम्मेपन को नहीं दिखाता? मानवजाति एक ऐसी अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को सौंप देती है। किन्तु फिर भी, लोग नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण में करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैंने मानवजाति के बीच जीवन का अनुभव नहीं किया है, और मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म की एकदम स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति को उसे बेहद शर्मिंदा करने की हद तक उजागर कर सकता हूँ, इस सीमा तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को हवा देने की धृष्टता फिर न करे। इंसान घोंघे की तरह, जो अपने खोल में छिपा रहता है, अब कभी अपनी बदसूरत स्थिति को उजागर करने का धृष्टता नहीं करता। चूँकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती, इसलिए उसका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालनाहै, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; परमेश्वर इस चीज़ से सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के आपसी संबंध असामान्य हैं, लोगों का आपसी व्यवहार ही सामान्य नहीं है, तो परमेश्वर और इंसान के बीच सामान्य संबंध की तो बात ही दूर है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या' के 'अध्याय 14' से उद्धृत

128. जब तक लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर लेते हैं और सत्य को प्राप्त नहीं कर लेते हैं, तब तक यह शैतान की प्रकृति है जो भीतर से इन पर नियंत्रण कर लेती है और उन पर हावी हो जाती है। वह प्रकृति विशिष्ट रूप से किस चीज़ को अपरिहार्य बनाती है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने पद की रक्षा क्यों करते हो? तुम्हारी भावनाएँ इतनी प्रबल क्यों हैं? तुम उन अधार्मिक चीज़ों से प्यार क्यों करते हो? ऐसी बुरी चीज़ें तुम्हें अच्छी क्यों लगती हैं? ऐसी चीजों को पसंद करने का आधार क्या है? ये चीज़ें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें स्वीकारकर इतने खुश क्यों हो? अब तक, तुम सब लोगों ने समझ लिया है कि इन सभी चीजों के पीछे मुख्य कारण यह है कि वे शैतान के जहर से युक्त हैं। जहाँ तक इस बात का प्रश्न है कि शैतान का जहर क्या है, इसे वचनों के माध्यम से पूरी तरह से व्यक्त किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम कुछ कुकर्मियों से पूछते हो उन्होंने बुरे कर्म क्यों किए, तो वे जवाब देंगे: "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये।" यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का तर्क लोगों का जीवन बन गया है। भले वे चीज़ों को इस या उस उद्देश्य से करें, वे इसे केवल अपने लिए ही कर रहे होते हैं। सब लोग सोचते हैं चूँकि जीवन का नियम, हर कोई बस अपना सोचे, और बाकियों को शैतान ले जाए, यही है, इसलिए उन्हें बस अपने लिए ही जीना चाहिए, एक अच्छा पद और ज़रूरत के खाने-कपड़े हासिल करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देनी चाहिए। "हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाये"—यही मनुष्य का जीवन और फ़लसफ़ा है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। यह कथन वास्तव में शैतान का जहर है और जब इसे मनुष्य के द्वारा आत्मसात कर लिया जाता है तो यह उनकी प्रकृति बन जाता है। इन वचनों के माध्यम से शैतान की प्रकृति उजागर होती है; ये पूरी तरह से इसका प्रतिनिधित्व करते हैं। और यही ज़हर मनुष्य के अस्तित्व की नींव बन जाता है और उसका जीवन भी, यह भ्रष्ट मानवजाति पर लगातार हजारों सालों से इस ज़हर के द्वारा हावी रहा है। शैतान जो कुछ भी करता है, वह उसके स्वयं के लिए होता है। यह परमेश्वर से परे जाना, परमेश्वर से मुक्त होना और स्वयं सामर्थ्य का प्रयोग करना, और उन सभी चीज़ों पर अपना आधिपत्य जमाना चाहता है जो परमेश्वर ने रची हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, बहुत से लोगों के नीति-वाक्य उनकी प्रकृति के प्रतिनिधि और प्रतिबिंब बन सकते हैं। चाहे लोग खुद को छिपाने की कितनी भी कोशिश करें, जो कुछ भी वे करते हैं और हर बात जो वे कहते हैं, उनमें वे अपनी प्रकृति को छिपा नहीं सकते हैं। कुछ लोग ऐसे होते हैं जो कभी सच नहीं बोलते हैं और वे दिखावा करने में अच्छे होते हैं, लेकिन एक बार जब दूसरे लोग उनसे साथ थोड़ी देर बातचीत करते हैं, तो उनकी कपटी प्रकृति और अतिशय बेईमानी का खुलासा हो जाता है। अंत में, लोग एक निष्कर्ष पर पहुंचेंगे : ये लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते, और वे धोखेबाज़ लोग हैं। यह कथन ऐसे व्यक्ति की प्रकृति को दर्शाता है; यह उनकी प्रकृति और सार का सर्वोत्तम चित्रण और प्रमाण है। उनके जीवन का फलसफ़ा है किसी को सच नहीं बताना, और किसी पर भी विश्वास नहीं करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में फ़लसफ़े से युक्त है। कभी-कभी तुम स्वयं ही इसके बारे में अवगत नहीं होते हो और इसे नहीं समझते हो, मगर तुम्हारे जीवन का हर पल इस पर आधारित है। इसके अलावा तुम्हें लगता है कि यह फ़लसफ़ा बहुत सही है, बहुत उचित है और गलत नहीं है। यह इसका चित्रण करने के लिए काफी है कि शैतान का फ़लसफ़ा लोगों की प्रकृति बन गया है और वे पूरी तरह से शैतान के फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं और इसका जरा सा भी विद्रोह नहीं करते। इसलिए, वे लगातार शैतानी प्रकृति को प्रकट कर रहे हैं, और हर लिहाज़ से वे निरंतर शैतानी फ़लसफ़े के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है।

— "मसीह की बातचीत के अभिलेख" में 'पतरस के मार्ग पर कैसे चलें' से उद्धृत

129. मनुष्य का स्वभाव मेरे सार से काफी भिन्न है, क्योंकि मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति पूरी तरह से शैतान से उत्पन्न होती है और मनुष्य की प्रकृति को शैतान द्वारा संसाधित और भ्रष्ट किया गया है। अर्थात्, मनुष्य इसकी बुराई और कुरूपता के प्रभाव के अधीन जीता है। मनुष्य सत्य के संसार या पवित्र वातावरण में बड़ा नहीं होता है, और प्रकाश में तो बिलकुल नहीं। इसलिए, जन्म से ही किसी व्यक्ति की प्रकृति के भीतर सत्य सहज रूप से निहित हो, यह संभव नहीं है, और कोई परमेश्वर के भय, परमेश्वर की आज्ञाकारिता के सार के साथ तो पैदा हो ही नहीं सकता। इसके विपरीत, लोग एक ऐसी प्रकृति से युक्त होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है, परमेश्वर की अवज्ञा करती है, और जिसमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता। यही प्रकृति वह समस्या है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ—विश्वासघात।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)' से उद्धृत

130. ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरी आज्ञा का पालन नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता है विश्वासघात है। मेरे साथ छल करना और मेरे साथ धोखा करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। धारणाओं से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं कर पाना विश्वासघात है। दिल में मुझसे दूर होते हुए भी झूठमूठ मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी विश्वासघात के काम हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम रहे हो, और ये तुम लोगों के बीच आम बात है। तुम लोगों में से शायद कोई भी इसे समस्या न माने, लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ। मैं अपने साथ किसी व्‍यक्ति के विश्वासघात को एक तुच्छ बात नहीं मान सकता हूँ, और निश्‍चय ही, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता हूँ। अब, जबकि मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, तो तुम लोग इस तरह से व्‍यवहार कर रहे हो—यदि किसी दिन तुम लोगों की निगरानी करने के लिए कोई न हो, तो क्या तुम लोग ऐसे डाकू नहीं बन जाओगे जिन्होंने खुद को राजा घोषित कर दिया है? जब ऐसा होगा और तुम विनाश का कारण बनोगे, तब तुम्हारे पीछे उस गंदगी को कौन साफ करेगा? तुम सोचते हो कि विश्वासघात के कुछ कार्य तुम्‍हारे सतत व्यवहार नहीं, बल्कि मात्र कभी-कभी होने वाली घटनाएँ हैं, और उनकी इतने गंभीर तरीके से चर्चा नहीं होनी चाहिए कि तुम्हारे अहं को ठेस पहुँचे। यदि तुम वास्तव में ऐसा मानते हो, तो तुम में समझ का अभाव है। इस तरीके से सोचना विद्रोह का एक नमूना और विशिष्ट उदाहरण है। मनुष्य की प्रकृति उसका जीवन है; यह एक सिद्धांत है जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर करता है और वह इसे बदलने में असमर्थ है। विश्वासघात की प्रकृति भी वैसी ही है—यदि तुम किसी रिश्तेदार या मित्र को धोखा देने के लिए कुछ कर सकते हो, तो यह साबित करता है कि यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी प्रकृति का हिस्सा है जिसके साथ तुम पैदा हुए थे। यह कुछ ऐसा है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

131. कोई भी अपना सच्चा चेहरा दर्शाने के लिए अपने स्वयं के शब्दों और क्रियाओं का उपयोग कर सकता है। यह सच्चा चेहरा निश्चित रूप से उसकी प्रकृति है। यदि तुम बहुत कुटिल ढंग से बोलने वाले व्यक्ति हो, तो तुम कुटिल प्रकृति के हो। यदि तुम्हारी प्रकृति धूर्त है, तो तुम कपटी ढंग से काम करते हो, और इससे तुम बहुत आसानी से लोगों को धोखा दे देते हो। यदि तुम्हारी प्रकृति अत्यंत कुटिल है, तो हो सकता है कि तुम्हारे वचन सुनने में सुखद हों, लेकिन तुम्हारे कार्य तुम्हारी कुटिल चालों को छिपा नहीं सकते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति आलसी है, तो तुम जो कुछ भी कहते हो, उस सबका उद्देश्य तुम्हारी लापरवाही और अकर्मण्यता के लिए उत्तरदायित्व से बचना है, और तुम्हारे कार्य बहुत धीमे और लापरवाह होंगे, और सच्चाई को छिपाने में बहुत माहिर होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति सहानुभूतिपूर्ण है, तो तुम्हारे वचन तर्कसंगत होंगे और तुम्हारे कार्य भी सत्य के अत्यधिक अनुरूप होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति निष्ठावान है, तो तुम्हारे वचन निश्‍चय ही खरे होंगे और जिस तरीके से तुम कार्य करते हो, वह भी व्यावहारिक और यथार्थवादी होगा, जिसमें ऐसा कुछ न होगा जिससे तुम्हारे मालिक को असहजता महसूस हो। यदि तुम्हारी प्रकृति कामुक या धन लोलुप है, तो तुम्हारा हृदय प्रायः इन चीजों से भरा होगा और तुम बेइरादा कुछ विकृत, अनैतिक काम करोगे, जिन्हें भूलना लोगों के लिए कठिन होगा और वे काम उनमें घृणा पैदा करेंगे। जैसा कि मैंने कहा है, यदि तुम्हारी प्रकृति विश्वासघात की है तो तुम मुश्किल से ही स्वयं को इससे छुड़ा सकते हो। इसे भाग्य पर मत छोड़ दो कि अगर तुम लोगों ने किसी के साथ गलत नहीं किया है तो तुम लोगों की विश्वासघात की प्रकृति नहीं है। यदि तुम ऐसा ही सोचते हो तो तुम घृणित हो। मेरे सभी वचन, हर बार जो मैं बोलता हूँ, वे सभी लोगों पर लक्षित होते हैं, न कि केवल एक व्यक्ति या एक प्रकार के व्यक्ति पर। सिर्फ इसलिए कि तुमने मेरे साथ एक मामले में विश्वासघात नहीं किया है, यह साबित नहीं करता कि तुम मेरे साथ किसी अन्य मामले में विश्वासघात नहीं कर सकते हो। कुछ लोग अपने विवाह में असफलताओं के दौरान सत्य की तलाश करने में अपना आत्मविश्वास खो देते हैं। कुछ लोग परिवार के टूटने के दौरान मेरे प्रति निष्ठावान होने के अपने दायित्व को त्याग देते हैं। कुछ लोग खुशी और उत्तेजना के एक पल की तलाश करने के लिए मेरा परित्याग कर देते हैं। कुछ लोग प्रकाश में रहने और पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद प्राप्त करने के बजाय एक अंधेरी खोह में पड़े रहना पसंद करेंगे। कुछ लोग धन की अपनी लालसा को संतुष्ट करने के लिए दोस्तों की सलाह पर ध्यान नहीं देते हैं, और अब भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और स्वयं में बदलाव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग मेरा संरक्षण प्राप्त करने के लिए केवल अस्थायी रूप से मेरे नाम के अधीन रहते हैं, जबकि अन्य लोग केवल दबाव में मेरे प्रति थोड़ा-सा समर्पित होते हैं क्योंकि वे जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं। क्या ये और अन्य अनैतिक और, इससे भी बढ़कर, अशोभनीय कार्य ऐसे व्यवहार नहीं हैं जिनसे लोग लंबे समय पहले अपने दिलों की गहराई में मेरे साथ विश्वासघात करते आ रहे हैं? निस्संदेह, मुझे पता है कि लोग मुझसे विश्वासघात करने की पहले से योजना नहीं बनाते; उनका विश्‍वासघात उनकी प्रकृति का स्वाभाविक रूप से प्रकट होना है। कोई मेरे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहता है, और कोई भी इस बात से खुश नहीं है कि उसने मेरे साथ विश्वासघात करने का कोई काम किया है। इसके विपरीत, वे डर से काँप रहे हैं, है ना? तो क्या तुम लोग इस बारे में सोच रहे हो कि तुम लोग इन विश्वासघातों से कैसे छुटकारा पा सकते हो, और कैसे तुम लोग वर्तमान परिस्थिति को बदल सकते हो?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)' से उद्धृत

132. तुम लोग कीचड़ से अलग किये गए थे और हर हाल में, तुम सब उसी मैल से बने थे जिसे कीचड़ के बीच से उठाया गया था, गंदे और परमेश्वर द्वारा घृणित थे। तुम लोग शैतान के थे और कभी उसके द्वारा कुचले और दूषित किये गये थे। इसीलिए यह कहा जाता है कि तुम सब कीचड़ से निकाले गए थे और तुम लोग पवित्र से कहीं दूर, वे गैर-मानवीय वस्तुएँ हो जो काफी समय से शैतान के कपट के लक्ष्य थे। यह तुम सब का सबसे उपयुक्त आंकलन है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम सब मछली और झींगे जैसी वांछनीय वस्तुओं के विपरीत मूल रूप से रुके हुए पानी और कीचड़ में पाई जाने वाली गन्दगी थे, क्योंकि तुम सब से आनंद देने वाली कोई चीज़ नहीं मिल सकती है। इसे साफ़-साफ़ कहें तो, तुम लोग हीन सामाजिक वर्ग के सबसे नीच जानवर हो, सूअरों और कुत्तों से भी बदतर जानवर हो। सच कहूँ तो, तुम सब को इस तरह से संबोधित करना अतिरेक या अतिशयोक्ति नहीं हैं; बल्कि यह मुद्दे को सरल बना देता है। तुम सभी को ऐसे शब्दों से संबोधित करना वास्तव में तुम्हें सम्मान देने का एक तरीका है। तुम लोगों की अंतर्दृष्टि, बोलचाल, मनुष्यों के रूप में आचरण और कीचड़ में तुम्हारी स्थिति सहित तुम्हारी ज़िंदगी के हर पहलू, यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोगों की पहचान "असामान्य" है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'मनुष्य की अंतर्निहित पहचान और उसका मूल्य : उनका स्वरूप कैसा है?' से उद्धृत

133. मानवजाति मेरी शत्रु के अलावा और कुछ नहीं है। मानवजाति ऐसी दुष्ट है जो मेरा विरोध और मेरी अवज्ञा करती है। मानवजाति मेरे द्वारा श्रापित दुष्ट की संतान के अतिरिक्त और कोई नहीं है। मानवजाति उस प्रधान दूत की वंशज ही है जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मानवजाति और कोई नहीं बल्कि उस शैतान की विरासत है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकराया गया था और हमेशा से मेरा कट्टर विरोधी शत्रु रहा है। चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, बगैर स्पष्टता की ज़रा-सी झलक के, मलिन और अँधकारमय है, और मानव दुनिया स्याह अंधेरे में डूबी हुई है, कुछ इस तरह कि उसमें रहने वाला कोई व्यक्ति अपने चेहरे के सामने हाथ को या अपना सिर उठाने पर सूरज को नहीं देख सकता है। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क, घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं जबकि ठण्डे और छाया वाले कोनों में दुष्टात्माओं की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। मनुष्यों के संसार में हर कहीं, दुष्टात्माएँ जत्थों में आती-जाती रहती हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गन्दगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज़ दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समयों में, इस तरह के संसार में, एक ऐसे "सांसारिक स्वर्गलोक" में, कोई व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल की खोज करने के लिए कोई कहाँ जाएगा? बहुत पहले से शैतान के पैरों के नीचे रौंदी हुई मानवजाति, शुरू से ही शैतान की छवि लिये एक अभिनेता—उससे भी अधिक, मानवजाति शैतान का मूर्त रूप है, जो उस साक्ष्य के रूप में काम करती है जो जोरदार तरीके से और स्पष्ट रूप से शैतान की गवाही देती है। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों का झुंड, इस भ्रष्ट मानव परिवार की ऐसी संतान, कैसे परमेश्वर की गवाही दे सकती है? मेरी महिमा किस स्थान से आएगी? कोई मेरी गवाही के बारे में बोलना कहाँ से शुरू कर सकता है? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मानवजाति को भ्रष्ट करके मेरे विरोध में खड़ा है, पहले ही उस मानवजाति को जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था, जो मेरी महिमा और मेरे जीवन से भरी थी, उसे दबोच कर दूषित कर दिया है। उसने मेरी महिमा को छीन लिया है और उसने मनुष्य को जिस चीज़ से भर दिया है, वह शैतान की कुरूपता की भारी मिलावट वाला ज़हर, और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है' से उद्धृत

134. मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे बिना दृष्टांत के उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : "सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?" मैंने मनुष्य के लिए जो प्रयास किए हैं, वे मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को प्रमाणित करते हैं, और मेरे सामने मनुष्य का हर कार्य सत्य से घृणा करने और मेरा विरोध करने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जो मेरा अनुसरण करते हैं, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचनों को ग्रहण करने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और इतना ही नहीं, कोई भी मुझे कभी भी स्वीकार नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया नेक और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने विचारों के अनुसार करने की कोशिश करते हैं; वे मेरे इरादे को जानने की कोशिश नहीं करते, मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दीजिए। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में सत्य ऐसी चीज़ बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में पहचानते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। कोई इस सत्य को नहीं जानता : मेरे वचन सदा-सर्वदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानव-जाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ। मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि उन्हें मानव-जाति द्वारा पहचाना या स्वीकारा जाता है या नहीं, बल्कि स्वयं वचनों के सार द्वारा निर्धारित होता है। भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचनों को ग्रहण न कर पाए, मेरे वचनों का मूल्य और मानव-जाति के लिए उनकी सहायता किसी भी मनुष्य के लिए अपरिमेय है। इसलिए ऐसे अनेक लोगों से सामना होने पर, जो मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करते हैं, उनका खंडन करते हैं, या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करते हैं, मेरा रुख केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह दिखाने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह दिखाने दो कि जो कुछ मैंने कहा है, वह सही है, और वह ऐसा है जिसकी आपूर्ति लोगों को की जानी चाहिए, और इतना ही नहीं, जिसे मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं उन सबको, जो मेरा अनुसरण करते हैं, यह तथ्य ज्ञात करवाऊँगा : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जिन्हें मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं मिल पाता, और जो मेरे वचनों के कारण उद्धार प्राप्त नहीं कर पाते, वे लोग हैं जो मेरे वचनों के कारण निंदित हुए हैं और इतना ही नहीं, जिन्होंने मेरे उद्धार को खो दिया है, और मेरी लाठी उन पर से कभी नहीं हटेगी।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में 'तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए' से उद्धृत

फुटनोट :

क. किनारे पर वापस लौटने की इच्छा : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है "अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।"

ख. मूल पाठ में "इस तरह से" शब्द शामिल नहीं है।

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लोग जब परमेश्वर के कथन पढ़ते हैं तो वे अवाक रह जाते हैं और सोचते हैं कि परमेश्वर ने आध्यात्मिक क्षेत्र में बहुत बड़ा कार्य किया है, कुछ ऐसा...

आज परमेश्वर के कार्य को जानना

इन दिनों परमेश्वर के कार्य को जानना, अधिकांशतः यह जानना है कि अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर की मुख्य सेवकाई क्या है और पृथ्वी पर वह क्या...

अध्याय 6

आत्मा से सम्बन्धित मामलों में तुझे अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए; मेरे वचनों पर तुझे ध्यान लगाना चाहिए। तुझे मेरा आत्मा और मेरे स्वरूप,...

अध्याय 20

मेरे घर की धन-संपत्ति गिनती से परे और अथाह है, फिर भी मनुष्य उनका आनंद उठाने के लिए कभी मेरे पास नहीं आया। मनुष्य स्वयं अकेला उनका आनंद उठा...

वचन देह में प्रकट होता है न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का संकलन सत्य का अभ्यास करने के 170 सिद्धांत जीवन में प्रवेश पर धर्मोपदेश और संगति मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ अंत के दिनों के मसीह—उद्धारकर्ता का प्रकटन और कार्य राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं (नये विश्वासियों के लिए अनिवार्य चीजें) परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर (संकलन) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवों की गवाहियाँ विजेताओं की गवाहियाँ (खंड I) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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