2.2. भ्रष्ट मानवजाति के शैतानी स्वभाव और उसके प्रकृति सार को प्रकट करने पर वचन

81. परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का मूल कारण शैतान द्वारा उसकी भ्रष्टता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए जाने के कारण मनुष्य का जमीर सुन्न हो गया है, वह नैतिक रूप से भ्रष्ट हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने से पहले मनुष्य शुरू में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता था और उसके वचन सुनने के बाद उनके प्रति समर्पण करता था। वह शुरुआत में सही-सलामत विवेक और जमीर वाला और सामान्य मानवता वाला था। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य का मूल विवेक, जमीर और मानवता—ये सब सुन्न पड़ गए और शैतान द्वारा बिगाड़ दिए गए। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपना समर्पण और प्रेम खो दिया है। मनुष्य का विवेक असामान्य हो गया है, उसका स्वभाव पशु के समान हो गया है और परमेश्वर के खिलाफ उसकी विद्रोहशीलता लगातार बढ़ती जा रही है और अधिक गंभीर होती जा रही है। फिर भी मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही समझता है, बस लगातार विरोध और विद्रोह करता रहता है। मनुष्य के स्वभाव के खुलासे उसके विवेक, अंतर्दृष्टि और जमीर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्योंकि उसका विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि सही-सलामत नहीं हैं और उसका जमीर अत्यंत सुन्न पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही है। यदि मनुष्य के विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि में बदलाव नहीं हो सकता है तो उसके स्वभाव में बदलाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, न ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने का कोई प्रश्न उठता है। यदि मनुष्य का विवेक सही-सलामत नहीं है तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता है और परमेश्वर के उपयोग के लिए अनुपयुक्त है। “सामान्य विवेक” का अर्थ है परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और वफादार होना, परमेश्वर के लिए लालायित रहना, परमेश्वर के प्रति एकचित्त होना और परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा रखना। इसका अर्थ है परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन होना और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध न करना। असामान्य विवेक का होना ऐसा नहीं है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना ली हैं और उसमें परमेश्वर के लिए कोई निष्ठा या तड़प नहीं है, परमेश्वर के प्रति जमीर होने की तो बात ही छोड़ो। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है, उसकी आलोचना करता है और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों की बौछार करता है। यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि वह परमेश्वर है, मनुष्य उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना करता है; मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का कोई इरादा नहीं रखता, बल्कि केवल परमेश्वर से माँगें और अनुरोध ही करता रहता है। ऐसे लोग—जिनका विवेक असामान्य होता है—अपने घृणित व्यवहार को जानने या अपने विद्रोह के कृत्यों पर पछताने में अक्षम होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने में सक्षम हैं, तो उन्होंने अपना विवेक थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर लिया है; लोग जितना अधिक परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही होते हैं और फिर भी अपने आप को नहीं जानते हैं, वे उतने ही कम सही-सलामत विवेक वाले होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

82. कई हजार सालों की भ्रष्टता के दौरान, सब लोग सुन्न और मंदबुद्धि-वाले हो गए हैं; वे सब परमेश्वर का विरोध करने वाले दुष्ट दानव बन गए हैं, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति उनकी विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है और यहाँ तक कि लोग स्वयं भी अपने विद्रोही व्यवहार का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ हैं—क्योंकि वे शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिए गए हैं और शैतान द्वारा रास्ते से इस तरह भटका दिए गए हैं कि वे नहीं जानते कि उन्हें किस ओर जाना है। यहाँ तक कि आज भी, लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं। जब वे परमेश्वर को देखते हैं, तो वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं और जब वे परमेश्वर को नहीं देख पाते, तब भी वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के शापों और कोप को देखने के बाद भी उसके साथ विश्वासघात करते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य के विवेक ने अपना मूल कार्य खो दिया है और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी अपना मूल कार्य खो दिया है। मेरी नजर में, सभी लोग मनुष्य के चोले में जानवर और जहरीले साँप हैं। चाहे वे मेरी आँखों के सामने कितना भी दयनीय दिखने की कोशिश करें, मैं उन पर कभी दया नहीं करूँगा, क्योंकि उन्हें काले और सफेद के बीच के अंतर की बिल्कुल भी समझ नहीं है और उनमें से कोई भी सत्य और असत्य के बीच के अंतर को नहीं समझता है। उनका विवेक इतना सुन्न हो चुका है, फिर भी वे आशीष पाना चाहते हैं; उनकी मानवता इतनी नीच है, फिर भी वे राजाओं की तरह राज करना और ताकत का इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे विवेक के साथ वे किसके राजा बन सकते हैं? ऐसी मानवता के साथ वे सिंहासन पर कैसे बैठ सकते हैं? लोग सचमुच बेशर्म हैं! वे ऐसे घृणित लोग हैं जो खुद को अपनी हैसियत से बढ़कर समझते हैं! मेरा सुझाव है कि तुम लोग, जो आशीष पाना चाहते हो, पहले एक आईना ढूँढ़ो और अपना बदसूरत चेहरा देखो। क्या तुममें राजा बनने की योग्यता है? क्या तुम्हारे पास चेहरे की ऐसी विशेषताएँ हैं जो आशीष पा सकने वाले व्यक्ति में होती हैं? तुम्हारे स्वभाव में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तुम किसी भी सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाए हो, फिर भी तुम एक सुनहरे कल की कामना करते हो। यह कोरा भ्रम है! मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने “उच्चतर शिक्षा संस्थानों” की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन को लेकर घटिया दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, नितांत मूल्यहीन अस्तित्व, नीच रीति-रिवाज और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नुकसान पहुँचाती और उस पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है और उसका अधिकाधिक विरोधी होता जा रहा है। मनुष्य का स्वभाव दिन-प्रतिदिन और अधिक नृशंस हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करता हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो और ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करता हो। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को भरपूर भ्रष्ट करता है। जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें सत्य सुनने के बाद भी इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बाद भी कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की कोई गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

83. मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के प्रकट होने की जड़ उसकी सुन्न अंतरात्मा, उसकी दुर्भावनापूर्ण प्रकृति और उसके अनुचित विवेक में ही निहित है; यदि मनुष्य की अंतरात्मा और विवेक फिर से सामान्य हो पाते हैं, तो फिर वह परमेश्वर के सामने उपयोग करने योग्य बन जाएगा। चूँकि मनुष्य की अंतरात्मा हमेशा सुन्न रही है, और मनुष्य का विवेक कभी भी उचित नहीं रहा है और अधिकाधिक सुन्न होता जा रहा है, बस इसीलिए परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विद्रोहीपन के कार्य कई गुणा बढ़ते जा रहे हैं, इस तरह कि उसने यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया और वह अंत के दिनों में देहधारी परमेश्वर के लिए अपने दरवाजे बंद कर देता है, और परमेश्वर के देह पर दोष लगाता है, और परमेश्वर के देह को तुच्छ समझता है। यदि मनुष्य में थोड़ी-सी भी मानवता होती, तो वह परमेश्वर की देहधारी देह के साथ पेश आने में इतना निर्मम नहीं होता; यदि उसमें जरा-सा भी विवेक होता, तो वह परमेश्वर की देहधारी देह के साथ पेश आने में इतना शातिर नहीं होता; यदि उसमें थोड़ी-सी भी अंतरात्मा होती, तो वह देहधारी परमेश्वर को इस ढंग से “धन्यवाद” न देता। मनुष्य परमेश्वर के देहधारी होने के युग में जीता है, फिर भी वह इतना अच्छा अवसर दिए जाने के लिए परमेश्वर को धन्यवाद नहीं देता है, और इसके बजाय परमेश्वर के आगमन को कोसता है, या परमेश्वर के देहधारण के तथ्य को पूरी तरह से अनदेखा कर देता है, इसके विरुद्ध और इससे विमुख प्रतीत होता है। मनुष्य परमेश्वर के आगमन को चाहे जैसा भी ले, परमेश्वर हमेशा अपना कार्य करता रहा है, इससे कभी भी नहीं थका है—जबकि मनुष्य परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी स्वागतोत्सुक नहीं रहा है और उससे माँगें करता रहा है। मनुष्य का स्वभाव अत्यंत दुर्भावनापूर्ण बन गया है, उसका विवेक अत्यंत सुन्न हो गया है और उसकी अंतरात्मा उस दुष्ट द्वारा पूरी तरह से रौंद दी गई है और वह बहुत पहले से मनुष्य की मौलिक अंतरात्मा नहीं रही है। मानवजाति को इतना अधिक जीवन और अनुग्रह प्रदान करने को लेकर मनुष्य देहधारी परमेश्वर के प्रति न केवल कृतघ्न है, बल्कि परमेश्वर उसे जो सत्य प्रदान करता है उसके लिए भी उसमें परमेश्वर के लिए घृणा है; क्योंकि मनुष्य को सत्य में थोड़ी-सी भी रुचि नहीं है, इसीलिए उसमें परमेश्वर के प्रति घृणा है। मनुष्य देहधारी परमेश्वर के लिए न सिर्फ अपनी जान देने में अक्षम है, बल्कि वह उससे फायदे ऐंठने की कोशिश भी करता है, और ऐसे भुगतान की माँग करता है जो उससे दर्जनों गुना ज्यादा है जो मनुष्य ने परमेश्वर को दिया है। मनुष्य की अंतरात्मा और विवेक का यह हाल है, फिर भी उसे लगता है कि यह कोई बड़ा मामला नहीं है, अभी भी यह मानता है कि वह परमेश्वर के लिए बहुत खप चुका है और परमेश्वर ने उसे बहुत कम दिया है। कुछ लोग ऐसे हैं जो मुझे एक कटोरा पानी देने के बाद अपने हाथ पसारकर माँग करते हैं कि मैं उन्हें दो कटोरे दूध की कीमत चुकाऊँ या मुझे एक रात के लिए कमरा देने के बाद मुझसे कई गुना किराए की माँग करते हैं। ऐसी मानवता और ऐसी अंतरात्मा के रहते तुम लोग अब भी जीवन पाने की कामना कैसे कर सकते हो? तुम कितने घिनौने पतित हो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

84. अगर मैंने तुम लोगों के हृदय की गहराई में छिपी कुरूपता बेनकाब न की, तो तुम लोगों में से प्रत्येक अपने सिर पर मुकुट रखकर समस्त महिमा का श्रेय खुद ही ले लेगा। तुम लोगों की अभिमानी और दंभी प्रकृति तुम लोगों को अपने ही अंतःकरण के साथ विश्वासघात करने, मसीह के खिलाफ विद्रोह करने और उसका प्रतिरोध करने और अपने कुरूप चेहरे प्रकट करने के लिए प्रेरित करती है, और इस तरह तुम लोगों के इरादों, धारणाओं, असंयत इच्छाओं और लालच से भरी नजरों को प्रकाश में ले आती है। फिर भी तुम लोग मसीह के कार्य के लिए अपने जीवन भर के जोश की घोषणा करते रहते हो और मसीह द्वारा बहुत पहले कहे गए सत्यों को बोलते और दोहराते रहते हो। यही तुम लोगों की “आस्था”—तुम लोगों की “अशुद्धता-रहित आस्था” है। मैंने पूरे समय मनुष्य के लिए बहुत कठोर मानक रखा है। अगर तुम्हारी वफादारी इरादों और शर्तों के साथ आती है, तो मैं तुम्हारी तथाकथित वफादारी के बिना रहना चाहूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों से बेहद घृणा करता हूँ, जो मुझे अपने इरादों से धोखा देते हैं और शर्तों द्वारा मुझसे जबरन वसूली करते हैं। मैं मनुष्य से सिर्फ यही चाहता हूँ कि वह मेरे प्रति पूरी तरह से वफादार हो और सभी चीजें एक ही शब्द—आस्था—की खातिर और इसे साबित करने के लिए करे। मैं तुम्हारे द्वारा मुझे प्रसन्न करने की कोशिश करने के लिए की जाने वाली खुशामद से नफरत करता हूँ, क्योंकि मैंने हमेशा तुम लोगों के साथ सच्चाई से व्यवहार किया है, और इसलिए मैं तुम लोगों से भी यही चाहता हूँ कि तुम भी मेरे प्रति एक सच्ची आस्था के साथ कार्य करो। जब आस्था की बात आती है, तो कई लोग यह सोच सकते हैं कि वे परमेश्वर का अनुसरण इसलिए करते हैं क्योंकि उनमें आस्था है, अन्यथा वे इस प्रकार की पीड़ा न सहते। तो मैं तुमसे यह पूछता हूँ : अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो कभी भी उसका भय क्यों नहीं मानते? अगर तुम परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करते हो, तो तुम्हारे हृदय में उसका थोड़ा-सा भी खौफ क्यों नहीं है? अगर तुम स्वीकार करते हो कि मसीह परमेश्वर का देहधारी शरीर है, तो तुम उसकी अवमानना क्यों करते हो? तुम उसके प्रति अनादरपूर्वक क्यों पेश आते हो? तुम उसकी खुलेआम आलोचना क्यों करते हो? तुम हमेशा उसकी गतिविधियों की जासूसी क्यों करते हो? तुम उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित क्यों नहीं होते? तुम उसके वचनों को अपने क्रियाकलापों की कसौटी के रूप में क्यों नहीं लेते? क्यों तुम उसकी भेंटें जबरन छीनते और चुराते हो? क्यों तुम मसीह के स्थान से बोलने की कोशिश करते हो? क्यों तुम यह मूल्यांकन करते हो कि उसका कार्य और वचन सही हैं या नहीं? क्यों तुम पीठ पीछे उसकी निंदा करने का साहस करते हो? क्या तुम्हारी आस्था इन्हीं और अन्य बातों से मिलकर बनी है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?

85. यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, पूरी तरह परमेश्वर को बाइबल तक सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में बाँधते हो तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीहा ही कहा जा सकता था और मात्र वही जिसे मसीहा कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो और चूँकि लोग परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करते थे, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर निर्दोष था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, अड़ियल बनकर उसे मृत्युदंड दे दिया और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर सीमित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो जो परमेश्वर करता है। लोग चरम रूप से बेतुके, चरम रूप से अहंकारी हैं और उनमें बड़ी-बड़ी बातें करने का पैदाइशी हुनर है। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी उत्कृष्ट क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है और तुमने परमेश्वर को दोषी ठहराया है, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को कभी नहीं जानता, उसकी बहुत-सी धारणाएँ हैं, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता; इसके बजाय, वह सूत्रबद्ध और दोहराया जाने वाला होता है और यंत्रवत ढंग से अनुकृत और कठोरता से लागू किया जाता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है। क्रूर मानवजाति! कुचक्र और षड्यंत्र, एक को दूसरे से छीनना और हथियाना, प्रसिद्धि और लाभ के लिए हाथापाई, आपसी कत्लेआम—यह सब कब समाप्त होगा? परमेश्वर द्वारा बोले गए सैकड़ों हज़ारों वचनों के बावजूद किसी को भी होश नहीं आया है। लोग अपने परिवार और बेटे-बेटियों के वास्ते, आजीविका, भावी संभावनाओं, रुतबे, घमंड और पैसों के लिए, भोजन, कपड़ों और देह के वास्ते कार्य करते हैं। पर क्या कोई ऐसा है, जिसके कार्य वास्तव में परमेश्वर के वास्ते हैं? यहाँ तक कि जो परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं, उनमें से भी थोड़े ही हैं जो परमेश्वर को जानते हैं। कितने लोग अपने स्वयं के हितों के लिए काम नहीं करते? कितने लोग अपना रुतबा बचाए रखने के लिए दूसरों पर अत्याचार या उनका बहिष्कार नहीं करते? और इसलिए, परमेश्वर को असंख्य बार जबरन मृत्युदंड दिया गया है और अनगिनत क्रूर न्यायाधीशों ने परमेश्वर को दोषी ठहराया है और एक बार फिर उसे सलीब पर चढ़ाया है। कितनों को इसलिए धार्मिक लोग कहा जा सकता है, क्योंकि वे वास्तव में परमेश्वर के लिए कार्य करते हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुरे लोगों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा

86. क्या बहुत-से लोग इसलिए परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते और पवित्र आत्मा के कार्य में बाधा नहीं डालते क्योंकि वे परमेश्वर के विभिन्न और विविधतापूर्ण कार्यों को नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, क्योंकि वे केवल थोड़े-से ज्ञान और धर्म-सिद्धांत से संपन्न होते हैं जिसका उपयोग करके वे पवित्र आत्मा के कार्य को मापते हैं? यद्यपि इन लोगों के पास केवल उथले अनुभव हैं, फिर भी इनकी प्रकृति अहंकारी, स्वेच्छाचारी और निरंकुश है, ये पवित्र आत्मा के कार्य को तिरस्कार की दृष्टि से देखते हैं, पवित्र आत्मा के अनुशासन की उपेक्षा करते हैं और इसके अलावा, पवित्र आत्मा के कार्य की "पुष्टि" करने के लिए अपने तुच्छ पुराने धर्म-सिद्धांतों का उपयोग करते हैं। वे दिखावा भी करते हैं और अपनी विद्वता के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त रहते हैं, यह मानते हुए कि वे पूरी दुनिया में बेरोकटोक घूम सकते हैं। क्या ऐसे लोग वे नहीं हैं जिन्हें पवित्र आत्मा द्वारा तिरस्कृत कर दिया जाता है और जिन्हें नए युग द्वारा हटा दिया जाता है? क्या वे लोग जो परमेश्वर के सामने आते हैं और खुलेआम उसका प्रतिरोध करते हैं, उथले और सीमित ज्ञान वाले ऐसे नीच व्यक्ति नहीं हैं जो अपनी कथित "बुद्धिमत्ता" का प्रदर्शन कर रहे हैं? उन्हें बाइबल का बस थोड़ा-सा ज्ञान है और फिर भी वे दुनिया के "शैक्षणिक हलकों" में बेरोकटोक राज करना चाहते हैं; उनके पास लोगों को सिखाने के लिए बस थोड़ा-सा उथला धर्म-सिद्धांत है और फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा को पलटना चाहते हैं और इसे अपनी विचार प्रक्रियाओं के इर्द-गिर्द घुमाने का प्रयास करते हैं। वे अदूरदर्शी हैं, फिर भी वे परमेश्वर के 6,000 वर्षों के कार्य की भव्यता को देखना चाहते हैं। इन लोगों में नाममात्र की भी समझ नहीं है! वास्तव में, लोगों को परमेश्वर का जितना अधिक ज्ञान होता है, वे उसके कार्य के बारे में उतने ही कम हल्के ढंग से निर्णय करते हैं। वे परमेश्वर के वर्तमान कार्य के बारे में अपने ज्ञान की केवल थोड़ी-सी चर्चा करते हैं, लेकिन उस पर लापरवाही से कोई निर्णय नहीं सुनाते। लोग परमेश्वर को जितना कम जानते हैं, वे उतने ही अधिक अहंकारी होते हैं, स्वयं का उतना ही बढ़ा-चढ़ाकर आकलन करते हैं और उतनी ही मनमानी से यह घोषणा करते हैं कि परमेश्वर का स्वरूप क्या है; फिर भी वे जो घोषणा करते हैं, वह केवल धर्म-सिद्धांत होता है और उसका कोई तथ्यात्मक आधार नहीं होता। ये सबसे बेकार लोग हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य को एक खेल मानते हैं, वे ओछे लोग हैं! पवित्र आत्मा के नए कार्य का सामना होने पर, वे इसके साथ सावधानी से व्यवहार नहीं करते, बल्कि इसके बजाय वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं और जल्दी से राय बना लेते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य के सही होने को नकारने के लिए अपनी मर्जी को खुली छूट देते हैं और यहाँ तक कि इसका अपमान या ईश-निंदा करते हैं—क्या ये अनादर करने वाले व्यक्ति पवित्र आत्मा के कार्य से अनजान नहीं हैं और इसके अलावा, क्या ये ऐसे घमंडी लोग नहीं हैं जो स्वाभाविक रूप से अहंकारी और निरंकुश हैं? भले ही एक दिन ऐसा आए जब ऐसे लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार कर लें, फिर भी उन्हें परमेश्वर की क्षमा प्राप्त नहीं होगी। वे न केवल परमेश्वर के लिए कार्य करने वालों को नीची दृष्टि से देखते हैं, बल्कि वे स्वयं परमेश्वर की ईश-निंदा भी करते हैं। ऐसे दुस्साहसी लोगों को न तो इस जीवन में और न ही आने वाले संसार में क्षमा किया जाएगा और वे हमेशा के लिए नरक में विनष्ट हो जाएँगे! ऐसे अनादर करने वाले और आत्म-भोगी लोग केवल विश्वासियों का लेबल लगाए रहते हैं, और वे जितने अधिक ऐसे होते हैं, उतनी ही अधिक संभावना होती है कि वे परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करेंगे। क्या वे सभी अहंकारी व्यक्ति जो स्वाभाविक रूप से निरंकुश हैं और जिन्होंने कभी किसी की आज्ञा नहीं मानी है, इसी मार्ग पर नहीं चलते हैं? क्या वे दिन-प्रतिदिन, इसी तरह से उस परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं करते जो हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं होता?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

87. तुम लोगों को पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का उपयोग इसलिए करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति लापरवाही बरतते हो। तुम लोगों द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग स्वाभाविक रूप से अत्यंत विद्रोही हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य के सही और गलत होने के बारे में राय बनाते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी नसीहतें देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और अभद्र बातें बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न स्तर की है और उनमें रत्ती-भर भी विवेक नहीं है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य पर राय बनाते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के विवेक से रहित लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; मनुष्य द्वारा मनमाने आकलन करने के दौरान पवित्र आत्मा के प्रबोधन के माध्यम से परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सटीक होता जाता है, उतना ही कम वे उसका प्रतिरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध करने की संभावना रहती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह पूँजी है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो और जितनी अधिक तुम्हारी नैतिकता भ्रष्ट होती है, तुम्हारा चरित्र उतना ही अधिक नीच होता है और तुम्हारी मानवता जितनी निम्न स्तर की होती है, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर की अनुरूपता में नहीं होगे और सदैव उससे दूर रहोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

88. जो लोग परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग होते हैं। यह बात उन लोगों पर और भी ज्यादा लागू होती है जो परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य तो समझते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते। ऐसे भी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं और दिन भर उसके अंशों का पाठ करते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता, न ही उनमें से कोई ऐसा होता है जो परमेश्वर को जान सकता है—उनमें से किसी के परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाला होने की तो बात ही छोड़ दो। वे सब बेकार, नीच लोग होते हैं, जो "परमेश्वर" को उपदेश देने के लिए ऊँचे स्थानों पर खड़े होते हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के बैनर तले काम करते हैं, फिर भी जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास करने का लेबल लगाते हैं, लेकिन मनुष्य का मांस खाते और उनका रक्त पीते हैं। ऐसे तमाम लोग दुष्ट दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाते हैं, वे प्रधान राक्षस हैं जो जानबूझकर लोगों को सही मार्ग पर चलने से बाधित करते हैं और वे ऐसी अड़चनें हैं जो लोगों को परमेश्वर की खोज करने से रोकती हैं। वे देखने में भले ही "शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट" लगते हों, लेकिन उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने की ओर ले जाते हैं? उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे ऐसे जीवित दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाने के लिए समर्पित हैं? जो लोग परमेश्वर की उपस्थिति में खुद को कुलीन समझते हैं, वे वास्तव में सबसे नीच हैं, जबकि जो लोग खुद को नीचा समझते हैं, वे सबसे कुलीन हैं। और जो लोग यह मान बैठते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं और जो परमेश्वर पर अपनी नजरें जमाए हुए, बिना किसी रोक-टोक के दूसरों के सामने उसके कार्य की घोषणा कर सकते हैं, वे सबसे ज्यादा अज्ञानी हैं। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर की कोई गवाही नहीं होती और वे सब अहंकारी और घमंडी होते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि वे परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानते हैं लेकिन वास्तव में जिनके पास परमेश्वर का व्यावहारिक अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान होता है, वे ही परमेश्वर को सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं। सिर्फ ऐसे लोगों के पास ही सच्ची गवाही होती है और सिर्फ ऐसे लोग ही वास्तव में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में सक्षम होते हैं। जो लोग परमेश्वर के इरादे नहीं समझते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर के इरादे तो समझते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर के वचन तो खाते-पीते हैं लेकिन फिर भी परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध चलते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं और तो और जानबूझकर विद्रोह में संलग्न होते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर की आलोचना करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। और जो कोई भी परमेश्वर को जानने में असमर्थ है और उसकी गवाही नहीं दे सकता, वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इसलिए मैं तुम लोगों को नसीहत देता हूँ : अगर तुम लोगों में वास्तव में इस मार्ग पर चलने की आस्था है तो अनुसरण करते रहो। लेकिन अगर तुम लोग खुद को परमेश्वर का प्रतिरोध करने से नहीं रोक पाते तो बेहतर यही होगा कि बहुत देर होने से पहले ही तुम लोग पीछे हट जाओ वरना तुम लोगों के लिए चीजें वाकई अच्छी नहीं होंगी, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति ही बहुत ज्यादा भ्रष्ट है। तुम लोगों में वफादारी नहीं है, समर्पण नहीं है, ऐसा हृदय नहीं है जो धार्मिकता और सत्य के लिए प्यासा हो और तुममें परमेश्वर के लिए प्रेम नहीं है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम लोगों की अवस्था मूलभूत रूप से पूरी गड़बड़ है। तुम उसका पालन करने में असमर्थ हो जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए, वह कहने में असमर्थ हो जो तुम्हें कहना चाहिए, उसका अभ्यास करने में असमर्थ हो जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए और वह प्रकार्य पूरा करने में असमर्थ हो जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए; तुम लोगों में वह वफादारी नहीं है जो होनी चाहिए, वह जमीर नहीं है जो होना चाहिए, वह समर्पण नहीं है जो होना चाहिए या वह संकल्प नहीं है जो होना चाहिए; तुमने वह कष्ट नहीं सहा है जो तुम्हें सहना चाहिए था और तुममें वह आस्था भी नहीं है जो होनी चाहिए। तुम लोगों में पूरी तरह से कोई गुण नहीं है। इस तरह जीते रहने पर क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? मैं तुम लोगों को सलाह देता हूँ कि तुम लोग जल्द से जल्द अनंत विश्राम में अपनी आँखें मूँद लो और ऐसा करके परमेश्वर को तुम्हारी चिंता करने और तुम्हारी खातिर कष्ट उठाने से बख्श दो। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसके इरादे नहीं समझते; तुम परमेश्वर के वचन खाते-पीते हो फिर भी मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप चलने में असमर्थ हो। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसे नहीं जानते और तुम बिना किसी लक्ष्य के लिए प्रयास किए, बिना किसी मूल्य के या बिना किसी अर्थ के अपना जीवन जीते हो। तुम इंसान हो फिर भी तुममें जरा भी जमीर, ईमानदारी या विश्वसनीयता नहीं है—क्या तुम लोग अभी भी खुद को इंसान कह सकते हो? तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसे धोखा देते हो; यहाँ तक कि तुम परमेश्वर के पैसों के लिए भी ललचाते हो और उसे चढ़ाई गई भेंटें भी खा जाते हो। और फिर भी, अंत में तुम परमेश्वर की भावनाओं के प्रति जरा भी विचारशीलता या उसके प्रति जरा भी जमीर दिखाने में असफल रहते हो। यहाँ तक कि तुम परमेश्वर द्वारा की गई एक छोटी-सी अपेक्षा भी पूरी नहीं कर सकते। क्या तुम लोग अभी भी खुद को इंसान कह सकते हो? तुम वही खाना खाते हो जो परमेश्वर तुम्हें देता है, उसी ऑक्सीजन से साँस लेते हो जो वह तुम्हें देता है और उसके अनुग्रह का आनंद उठाते हो, लेकिन अंत में तुम्हें परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके विपरीत, तुम ऐसे निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। क्या यह तुम्हें एक ऐसा जानवर नहीं बना देता जिसकी तुलना कुत्ते से भी नहीं की जा सकती? जानवरों में क्या कोई ऐसा जानवर है जो तुम लोगों से ज्यादा दुर्भावनापूर्ण हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं

89. मनुष्य के साथ सबसे बड़ी समस्या यह है कि वह केवल उन्हीं चीजों से प्यार करता है, जिन्हें वह देख या स्पर्श नहीं कर सकता, जो अत्यधिक रहस्यमयी और अद्भुत होती हैं, और जो मनुष्यों द्वारा अकल्पनीय और अप्राप्य हैं। चीजें जितनी अधिक अवास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक लोगों द्वारा उनका विश्लेषण किया जाता है, और यहाँ तक कि लोग अन्य सभी से बेपरवाह होकर भी उनका अनुसरण करते हैं और उन्हें प्राप्त करने की व्यर्थ आशा करते हैं। जितना अधिक अवास्तविक ये चीज़ें होती हैं, उतना ही अधिक बारीकी से लोग उनकी जाँच और विश्लेषण करते हैं और, यहाँ तक कि इतनी दूर चले जाते हैं कि उनके बारे में अपने स्वयं के व्यापक विचार बना लेते हैं। इसके विपरीत, चीजें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, लोग उनके प्रति उतने ही अधिक उपेक्षापूर्ण होते हैं; वे केवल उन्हें हेय दृष्टि से देखते हैं और यहाँ तक कि उनके प्रति तिरस्कारपूर्ण भी हो जाते हैं। क्या तुम लोगों का यही रवैया उस यथार्थपरक कार्य के प्रति नहीं है, जो मैं आज करता हूँ? ये चीज़ें जितनी अधिक वास्तविक होती हैं, उतना ही अधिक तुम लोग उनके विरुद्ध पूर्वाग्रही हो जाते हो। तुम उनकी जाँच किए जाने की जरा भी गुंजाइश नहीं छोड़ते, बल्कि केवल उनकी उपेक्षा कर देते हो; तुम लोग इन यथार्थवादी, निम्नस्तरीय अपेक्षाओं को हेय दृष्टि से देखते हो, और यहाँ तक कि इस परमेश्वर के बारे में कई धारणाओं को प्रश्रय देते हो, जो कि सर्वाधिक व्यावहारिक है, और बस उसकी व्यावहारिकता और सामान्यता को स्वीकारने में अक्षम हो। इस तरह, क्या तुम लोग एक अज्ञात विश्वास नहीं रखते? तुम लोगों का अतीत के अज्ञात परमेश्वर में अचल विश्वास है, और आज के व्यावहारिक परमेश्वर में कोई रुचि नहीं है। क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि कल का परमेश्वर और आज का परमेश्वर दो भिन्न-भिन्न युगों से हैं? क्या ऐसा इसलिए भी नहीं है, क्योंकि बीते कल का परमेश्वर स्वर्ग में रहने वाला महान और उच्च परमेश्वर है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर एक छोटा-सा मनुष्य है? इसके अलावा, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि मनुष्यों द्वारा आराधना किया जाने वाला परमेश्वर उनकी अपनी धारणाओं से उत्पन्न हुआ है, जबकि आज का परमेश्वर धरती पर उत्पन्न, मूर्त देह है? हर चीज पर विचार करने के बाद, क्या ऐसा इसलिए नहीं है, क्योंकि आज का परमेश्वर इतना अधिक वास्तविक है कि मनुष्य उसका अनुसरण नहीं करता? क्योंकि आज का परमेश्वर लोगों से जो कहता है, वह ठीक वही है, जिसे करने के लिए लोग सबसे अधिक अनिच्छुक हैं, और जो उन्हें लज्जित महसूस करवाता है। क्या यह लोगों के लिए चीज़ों को कठिन बनाना नहीं है? क्या यह लोगों के दागों को उघाड़ नहीं देता? नतीजतन, बहुत-से लोग वास्तविक परमेश्वर, व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण नहीं करते और देहधारी परमेश्वर के शत्रु बन जाते हैं, अर्थात् मसीह-विरोधी बन जाते हैं। क्या यह एक स्पष्ट तथ्य नहीं है? अतीत में, जब परमेश्वर का अभी देह धारण करना बाकी था, तो तुम कोई धार्मिक हस्ती या कोई धर्मनिष्ठ विश्वासी रहे होगे। परमेश्वर के देह धारण करने के बाद ऐसे कई धर्मनिष्ठ विश्वासी अनजाने में मसीह-विरोधी बन गए। क्या तुम जानते हो, यहाँ क्या चल रहा है? परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित नहीं करते या सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि अवास्तविक चीजों पर ध्यान केंद्रित करते हो—क्या यह देहधारी परमेश्वर के प्रति तुम्हारी शत्रुता का स्पष्टतम स्रोत नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं

90. मसीह के संपर्क में आने से पहले शायद तुम यह मान सकते हो कि तुम्हारा स्वभाव पूरी तरह से बदल चुका है, कि तुम मसीह के निष्ठावान अनुयायी हो और यह कि तुमसे ज्यादा मसीह के आशीष पाने के योग्य कोई नहीं है क्योंकि तुमने कई मार्गों पर यात्रा की है, बहुत सारा काम कर चुके हो और बहुत परिणाम ला चुके हो, इसलिए तुम सोचते हो कि अंत में तुम निश्चित ही उनमें से एक होगे, जिन्हें मुकुट मिलेगा। लेकिन क्या तुम निम्नलिखित तथ्य जानते हो, जो यह है कि जब मनुष्य मसीह को देखता है, तो उसका भ्रष्ट स्वभाव और उसका विद्रोह और प्रतिरोध उजागर हो जाता है, और इस समय उसका विद्रोह और प्रतिरोध किसी अन्य समय की तुलना में ज्यादा पूर्ण रूप में और पूरी तरह से उजागर हो जाते हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि मसीह मनुष्य का पुत्र है—मनुष्य का ऐसा पुत्र, जिसमें सामान्य मानवता है—इसलिए मनुष्य न तो उसका सम्मान करता है और न ही उसका आदर करता है। चूँकि परमेश्वर देह में रहता है, इसलिए मनुष्य का विद्रोह इतनी अच्छी तरह और इतने विशद विवरण के साथ प्रकाश में आ जाता है। इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह के आगमन ने मानवजाति की समस्त विद्रोहशीलता उजागर कर दी है और मानवजाति की प्रकृति को बहुत स्पष्ट कर दिया है। इसे कहते हैं “बाघ को फुसलाकर पहाड़ के नीचे लाना” और “भेड़िए को फुसलाकर उसकी गुफा से बाहर लाना।” क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो? क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण दिखाते हो? क्या तुम यह कहने की कल्पना करने की हिम्मत कर सकते हो कि तुम विद्रोही नहीं हो? कुछ लोग कहेंगे : “जब भी परमेश्वर मेरे लिए एक परिवेश आयोजित करता है, मैं कभी शिकायत नहीं करता और हमेशा समर्पित होने में समर्थ होता हूँ और इतना ही नहीं, मैं परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाता।” कुछ लोग कहेंगे : “परमेश्वर मुझे जो भी काम देता है, मैं उसे अपनी पूरी योग्यता के साथ पूर्ण करता हूँ और कभी लापरवाह नहीं होता।” इस स्थिति में, मैं तुम लोगों से यह पूछता हूँ : क्या तुम लोग मसीह के साथ रहते हुए उसके साथ संगत हो सकते हो? और तुम कब तक उसके साथ संगत रहोगे? एक दिन? दो दिन? एक घंटा? दो घंटे? तुम लोगों की आस्था प्रशंसनीय हो सकती है, लेकिन तुम लोगों में दृढ़ता कुछ खास नहीं है। जब तुम सच में मसीह के साथ रहते हो, तो तुम्हारी कथनी और करनी से तुम्हारी आत्मतुष्टता और अभिमान का थोड़ा-थोड़ा करके खुलासा होने लगेगा और इसी प्रकार तुम्हारी असंयमित इच्छाएँ, अवज्ञाकारी मानसिकता और असंतोष स्वाभाविक रूप से प्रकट हो जाएँगे। अंततः तुम्हारा अहंकार और भी बड़ा हो जाएगा, जब तक कि तुम मसीह से उतने ही विपरीत नहीं हो जाते जितना पानी आग से होता है, और तब तुम्हारी प्रकृति पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। उस समय तुम्हारी धारणाएँ छिपी नहीं रह सकेंगी, तुम्हारी शिकायतें भी स्वाभाविक रूप से बाहर आ जाएँगी, और तुम्हारी घृणित मानवता पूरी तरह से उजागर हो जाएगी। किंतु फिर भी, तुम अभी भी अपनी विद्रोहशीलता स्वीकारने से इनकार करते हो, और उसके बजाय यह मानते हो कि ऐसे मसीह को स्वीकार करना मनुष्य के लिए आसान नहीं है, वह मनुष्य के प्रति बहुत कठोर है, और अगर वह कोई बेहतर मसीह होता तो तुम पूरी तरह से समर्पित हो जाते। तुम लोग यह मानते हो कि तुम्हारी विद्रोहशीलता जायज है, तुम उसके विरुद्ध विद्रोह तभी करते हो, जब वह तुम लोगों को हद से ज्यादा मजबूर कर देता है। तुम लोगों ने कभी यह विचार नहीं किया कि तुम मसीह को परमेश्वर नहीं मानते, कि तुम्हारा उसके प्रति समर्पित होने का इरादा नहीं है। बल्कि, तुम ढिठाई से यह आग्रह करते हो कि मसीह तुम्हारी इच्छाओं के अनुसार कार्यकलाप करे, और जब वह एक भी काम ऐसा करता है जो तुम्हारी सोच के विपरीत होता है, तो तुम मान लेते हो कि वह परमेश्वर नहीं, एक व्यक्ति है। क्या तुम लोगों में से कई लोग ऐसे नहीं हैं, जिन्होंने उसके साथ इस तरह से विवाद किया है? आखिर वह कौन है, जिस पर तुम लोग विश्वास करते हो? और तुम लोग किस तरह से अनुसरण करते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो मसीह के साथ असंगत हैं वे निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं

91. तुम लोग हमेशा मसीह को देखने की कामना करते हो, लेकिन मैं तुम लोगों से आग्रह करता हूँ कि तुम अपने आपको इतना ऊँचा मत समझो; हर कोई मसीह को देख सकता है, लेकिन मैं कहता हूँ कि कोई भी मसीह को देखने लायक नहीं है। क्योंकि मनुष्य की प्रकृति बुराई, अहंकार और विद्रोहशीलता से भरी हुई है, जिस क्षण तुम मसीह को देखोगे, तुम्हारी प्रकृति तुम्हें नष्ट कर देगी और तुम्हें मौत की सजा तक पहुँचाने वाला दंड देगी। किसी भाई (या बहन) के साथ तुम्हारा जुडाव शायद तुम्हारे बारे में बहुत-कुछ न दिखाए, लेकिन जब तुम मसीह से जुड़ते हो तो यह इतना आसान नहीं होता। किसी भी समय तुम्हारी धारणाएँ जड़ पकड़ सकती हैं, तुम्हारा अहंकार पनपना शुरू हो सकता है और तुम्हारी विद्रोहशीलता फल-फूल सकती है। ऐसी मानवता के साथ तुम कैसे मसीह से जुड़ने के लिए उपयुक्त हो सकते हो? क्या तुम उसे हर दिन, हर पल परमेश्वर मान सकते हो? क्या तुममें सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण की वास्तविकता है? तुम सभी लोग अपने हृदय में बसे ऊँचे परमेश्वर को ही यहोवा मानकर उसकी आराधना करते हो, लेकिन प्रत्यक्ष मसीह को एक व्यक्ति समझते हो। तुम लोगों का विवेक बहुत ही खराब है और मानवता बहुत ही निम्न स्तर की है! तुम लोग मसीह को सदैव परमेश्वर मानने में असमर्थ हो; कभी-कभार ही, जब तुम एक अच्छी मनोदशा में होते हो, तुम उसकी ओर लपकते हो और परमेश्वर के रूप में उसकी आराधना करते हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोग परमेश्वर के विश्वासी नहीं हो, बल्कि उन सह-अपराधियों की टोली हो, जो मसीह का विरोध करते हैं। यहाँ तक कि दूसरों के प्रति हमदर्दी दिखाने वाले लोगों तक को प्रतिफल दिया जाता है, लेकिन मसीह को, जिसने तुम्हारे बीच ऐसा कार्य किया है, न तो मनुष्य का प्रेम मिला है और न ही उसकी कोई प्रतिपूर्ति या समर्पण। क्या यह हृदय-विदारक बात नहीं है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो मसीह के साथ असंगत हैं वे निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं

92. हो सकता है कि परमेश्वर में अपनी इतने वर्षों की आस्था के दौरान तुमने कभी किसी को कोसा न हो या कोई बुरा काम न किया हो, फिर भी अगर मसीह के साथ अपने जुड़ाव में तुम सच नहीं बोल सकते, ईमानदारी से कार्य नहीं कर सकते, या मसीह के वचन को समर्पित नहीं हो सकते; तो मैं कहूँगा कि तुम संसार में सबसे अधिक प्रपंची और दुर्भावनापूर्ण व्यक्ति हो। तुम अपने रिश्तेदारों, दोस्तों, पत्नी (या पति), बेटे-बेटियों और माता-पिता के प्रति अत्यंत सौम्य और समर्पित हो सकते हो, और शायद कभी दूसरों का फायदा न उठाते हो, लेकिन अगर तुम मसीह के साथ संगत नहीं हो पाते, उसके साथ सामंजस्यपूर्ण व्यवहार नहीं कर पाते, तो भले ही तुम अपने पड़ोसियों की सहायता के लिए अपना सब-कुछ खपा दो या अपने माता-पिता और घरवालों की अच्छी देखभाल करो, तब भी मैं कहूँगा कि तुम एक बुरे व्यक्ति हो और इतना ही नहीं, शातिर चालों से भरे हुए हो। खुद को सिर्फ इसलिए मसीह के साथ संगत मत समझो कि तुम दूसरों के साथ अच्छा तालमेल बिठा लेते हो या कुछ अच्छी चीजें कर लेते हो। क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा परोपकारी इरादा चालबाजी से स्वर्ग के आशीष प्राप्त कर सकता है? क्या तुम्हें लगता है कि कुछ अच्छी चीजें कर लेना तुम्हारे समर्पण का स्थान ले सकता है? तुम लोगों में से एक भी व्यक्ति काट-छाँट स्वीकार नहीं कर पाता और तुम सभी को मसीह की सामान्य मानवता अपनाने में कठिनाई होती है, इससे भी ऊपर तुम परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण का निरंतर ढोल पीटते रहते हो। तुम लोगों जैसी आस्था उचित प्रतिकार लाएगी। काल्पनिक भ्रमों में लिप्त होना और मसीह को देखने की इच्छा करना छोड़ दो, क्योंकि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, यहाँ तक कि तुम उसे देखने के योग्य भी नहीं हो। जब तुम अपनी विद्रोहशीलता को पूरी तरह उतारकर फेंक चुके होगे और मसीह के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से मेलजोल कर पाओगे, उसी समय परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हारे सामने प्रकट होगा। यदि तुम काट-छाँट या न्याय से गुजरे बिना परमेश्वर को देखने जाते हो, तो तुम निश्चित रूप से परमेश्वर के विरोधी बन जाओगे और यकीनन विनाश का लक्ष्य बन जाओगे। मनुष्य की प्रकृति जन्मजात परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, क्योंकि सभी लोग शैतान की गहरी भ्रष्टता के अधीन रहे हैं। यदि मनुष्य अपनी भ्रष्टता के बीच से परमेश्वर के साथ मेलजोल करने का प्रयास करता है, तो यह निश्चित है कि इसका कोई अच्छा परिणाम नहीं हो सकता; उसके कार्य और शब्द निश्चित रूप से हर मोड़ पर उसकी भ्रष्टता को प्रकट करेंगे और परमेश्वर के साथ जुड़ने में उसकी विद्रोहशीलता हर मोड़ पर प्रकट होगी। मनुष्य अनजाने ही मसीह का विरोध कर देता है, मसीह को धोखा दे देता है और मसीह को अस्वीकार कर देता है; जब ऐसा होता है तो मनुष्य और ज्यादा संकट की स्थिति में होगा और यदि यह जारी रहा, तो वह दंड का भागी बन जाएगा।

कुछ लोग यह मान सकते हैं कि यदि परमेश्वर के साथ जुड़ाव इतना खतरनाक है, तो बुद्धिमानी यही होगी कि परमेश्वर से दूर रहा जाए। ऐसे लोगों को भला क्या हासिल हो सकता है? क्या वे परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं? निश्चित ही, परमेश्वर के साथ जुड़ाव बहुत कठिन है—लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य भ्रष्ट है, न कि इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य के साथ जुड़ नहीं सकता। तुम लोगों के लिए सबसे अच्छा यह होगा कि तुम लोग स्वयं को जानने के सत्य पर थोड़ा प्रयास समर्पित करो। परमेश्वर तुम लोगों की सराहना क्यों नहीं करता? तुम्हारा स्वभाव उसके लिए घृणास्पद क्यों है? तुम्हारा बोलना उसके अंदर घृणा क्यों उत्पन्न करता है? जब तुम लोग थोड़ी-सी निष्ठा दिखा देते हो, तुम अपनी तारीफ के गीत गाने लगते हो; जब तुम छोटा-सा योगदान करते हो तो पुरस्कार माँगने लगते हो; जब तुम थोड़ा-सा समर्पण दिखा देते हो तो दूसरों को नीची निगाह से देखने लगते हो; और जब कुछ छोटे-मोटे काम संपन्न कर लेते हो तो परमेश्वर की अवहेलना करने लगते हो। परमेश्वर की मेजबानी करने के लिए तुम लोग धन, भौतिक चीजें और प्रशंसा माँगते हो। दो सिक्के देते हुए भी तुम्हारा दिल दुखता है; जब तुम दस सिक्के देते हो तो तुम आशीष माँगते हो और दूसरों से विशिष्ट माने जाने की माँग करते हो। तुम लोगों जैसी मानवता के बारे में तो बात करना या सुनना भी पक्के तौर पर अपमानजनक है। क्या तुम्हारे शब्दों और कार्यों में कुछ भी प्रशंसा-योग्य है? जो अपना कर्तव्य निभाते हैं और जो नहीं निभाते; जो अगुआई करते हैं और जो अनुसरण करते हैं; जो परमेश्वर की मेजबानी करते और जो नहीं करते; जो भेंट चढ़ाते हैं और जो नहीं चढ़ाते; जो उपदेश देते हैं और जो वचन ग्रहण करते हैं, इत्यादि : ऐसे सभी लोग अपनी तारीफ करते हैं। क्या तुम लोगों को यह हास्यास्पद नहीं लगता? यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम परमेश्वर से सुसंगत नहीं हो सकते हो। यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि तुम लोग बिल्कुल अयोग्य हो, तुम डींगें मारते रहते हो। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि तुम्हारी समझ इस हद तक पहुँच गई है कि अब तुम्हारे नियंत्रण से बाहर है? इस तरह के विवेक के साथ तुम परमेश्वर के संपर्क में आने योग्य कैसे हो? क्या तुम लोग इस समय अपने बारे में चिंतित नहीं हो? तुम्हारा स्वभाव पहले ही इस हद तक खराब हो चुका है कि तुम परमेश्वर के साथ संगत होने में असमर्थ हो। इस बात को देखते हुए, क्या तुम लोगों की आस्था हास्यास्पद नहीं है? क्या तुम्हारी आस्था बेतुकी नहीं है? तुम अपने भविष्य से कैसे निपटोगे? तुम कैसे चुनोगे कि तुम्हें कौन-सा मार्ग अपनाना है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो मसीह के साथ असंगत हैं वे निश्चित ही परमेश्वर के विरोधी हैं

93. कुछ लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, न्याय से तो और भी कम प्रेम करते हैं। इसके बजाय वे सत्ता और दौलत से प्रेम करते हैं; ऐसे लोग सत्ता चाहने वाले कहे जाते हैं। वे केवल दुनिया के शक्तिशाली संप्रदायों को और धर्म-महाविद्यालयों से आने वाले पादरियों और शिक्षकों को ही खोजते हैं। यूँ तो उन्होंने सत्य के मार्ग को स्वीकार कर लिया है, फिर भी वे केवल अर्ध-विश्वासी हैं और वे अपने समस्त तन और मन को समर्पित करने में असमर्थ हैं; वे अपने मुँह से तो परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की बात करते हैं, लेकिन उनकी नजरें बड़े पादरियों और शिक्षकों पर गड़ी रहती हैं और वे मसीह की ओर निगाह फेरने तक की जहमत नहीं उठाते हैं। उनके मन प्रसिद्धि, लाभ और प्रतिष्ठा के विचारों से भरे रहते हैं। वे इसे असंभव समझते हैं कि ऐसा छोटा व्यक्ति इतने लोगों पर विजय प्राप्त कर सकता है, कि इतना साधारण व्यक्ति लोगों को पूर्ण बना सकता है। वे इसे असंभव समझते हैं कि ये धूल और घूरे में पड़े नाचीज लोग परमेश्वर द्वारा चुने गए हैं। वे मानते हैं कि अगर ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार के पात्र होते, तो स्वर्ग और पृथ्वी उलट-पुलट हो जाते और सभी लोगों का हँसते-हँसते बुरा हाल हो जाता। उनका मानना है कि अगर परमेश्वर ने ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने के लिए चुना होता, तो वे सभी बड़े लोग स्वयं परमेश्वर बन जाते। उनके दृष्टिकोण अविश्वास से दूषित हैं; अविश्वासी होने से भी बढ़कर, वे अविवेकी जानवर हैं। क्योंकि वे केवल रुतबे, प्रतिष्ठा और सत्ता को महत्व देते हैं और बड़े समूहों और संप्रदायों को सम्मान देते हैं और उनमें मसीह की अगुआई में चलने वालों के लिए रत्ती भर भी परवाह नहीं है। वे तो बस ऐसे विश्वासघाती हैं जिन्होंने मसीह, सत्य और जीवन से पीठ फेर ली है।

तुम मसीह की विनम्रता की प्रशंसा नहीं करते, लेकिन तुम उन ऊँचे रुतबे वाले झूठे चरवाहों का सम्मान जरूर करते हो। तुम मसीह की मनोहरता या बुद्धि से प्रेम नहीं करते, बल्कि तुम उन व्यभिचारियों को बहुत पसंद करते हो, जो संसार की गंदगी के साथ रहते हैं। तुम मसीह की सिर टिकाने तक की जगह न होने की पीड़ा पर केवल कुटिलता से हँसते हो, लेकिन उन मुरदों की तारीफ करते हो, जो चढ़ावों का गबन करते हैं और ऐयाशी में जीते हैं। तुम मसीह के साथ कष्ट सहने को तैयार नहीं हो, बल्कि खुद को खुशी-खुशी उन लापरवाह और मनमाने मसीह-विरोधियों की बाँहों में सौंप देते हो, जबकि वे तुम्हें सिर्फ देह, शब्द और नियंत्रण ही प्रदान करते हैं। अभी भी तुम्हारा हृदय उनकी ओर, उनकी प्रतिष्ठा की ओर, उनके रुतबे, उनकी शक्तियों की ओर मुड़ता है। अभी भी तुम यही रवैया अपनाए हुए हो कि मसीह का कार्य स्वीकारना कठिन है और तुम इसे स्वीकारने के लिए तैयार नहीं रहते। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुममें मसीह को स्वीकार करने की आस्था नहीं है। तुमने आज तक उसका अनुसरण सिर्फ इसलिए किया है, क्योंकि तुम्हारे पास कोई और विकल्प नहीं था। बुलंद छवियों की एक शृंखला हमेशा तुम्हारे हृदय में बसी रहती है; तुम उनके किसी शब्द और कर्म को नहीं भूल सकते, न ही उनके प्रभावशाली शब्दों और हाथों को भूल सकते हो। वे तुम लोगों के हृदय में हमेशा सर्वोच्च और हमेशा नायक रहते हैं। लेकिन आज के मसीह के लिए ऐसा नहीं है। तुम्हारे हृदय में वह हमेशा महत्वहीन है, वह मनुष्य है जो हमेशा भय के अयोग्य है। क्योंकि वह बहुत ही साधारण है, उसका बहुत ही कम प्रभाव है और वह कद्दावर होने से बहुत पीछे है।

बहरहाल, मैं कहता हूँ कि जो लोग सत्य को महत्व नहीं देते वे सभी छद्म-विश्वासी हैं और सत्य के प्रति विश्वासघाती हैं। ऐसे लोगों को कभी भी मसीह का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा। क्या अब तुमने पहचान लिया है कि तुम्हारे भीतर कितना अविश्वास है, और तुममें मसीह के प्रति कितना विश्वासघात है? मैं तुम्हें इस प्रकार नसीहत देता हूँ : चूँकि तुमने सत्य का मार्ग चुना है, तो तुम्हें खुद को संपूर्ण हृदय से समर्पित करना चाहिए; दुविधाग्रस्त या आधे दिल वाले न बनो। तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर संसार का या किसी एक व्यक्ति का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उन सबका परमेश्वर है जो उस पर सचमुच विश्वास करते हैं, जो उसकी आराधना करते हैं और जो उसके प्रति समर्पित और निष्ठावान हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम सचमुच परमेश्वर के विश्वासी हो?

94. परमेश्वर का अनुसरण करने वाले बहुत सारे लोग केवल इस बात से मतलब रखते हैं कि आशीष कैसे प्राप्त किए जाएँ या आपदा को कैसे टाला जाए। जैसे ही परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन का उल्लेख किया जाता है, वे चुप हो जाते हैं और सारी रुचि खो देते हैं। उन्हें लगता है कि इस प्रकार के उबाऊ मुद्दों को समझने से उनके जीवन की प्रगति में कोई मदद नहीं मिलेगी और न ही कोई लाभ प्राप्त होगा। परिणामस्वरूप, भले ही उन्होंने परमेश्वर के प्रबंधन के बारे में जानकारी सुनी हो, वे इसके साथ अगंभीर तरीके से पेश आते हैं। वे इसे स्वीकारने योग्य कोई खजाना नहीं मानते, न ही इसे समझने के लिए अपने जीवन का हिस्सा बनाते हैं। परमेश्वर का अनुसरण करने में इन लोगों का प्रयोजन बहुत सरल होता है और यह एक ही लक्ष्य के लिए होता है : आशीषित होना। ये लोग ऐसी किसी भी दूसरी चीज के लिए पूर्णतया उदासीन रहते हैं जो इस उद्देश्य से संबंध नहीं रखती। उनके लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का सबसे वैध लक्ष्य आशीष प्राप्त करना है—यह उनकी आस्था का असली मूल्य है। यदि कोई चीज इस प्रयोजन को पूरा नहीं करती, तो चाहे जो भी हो वे उससे अप्रभावित रहते हैं। आज परमेश्वर में विश्वास करने वाले अधिकांश लोगों का यही हाल है। उनका प्रयोजन और इरादा न्यायोचित प्रतीत होते हैं, क्योंकि जब वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर के लिए स्वयं को खपाते भी हैं, परमेश्वर के प्रति समर्पित भी होते हैं और अपना कर्तव्य भी निभाते हैं। वे अपनी जवानी न्योछावर कर देते हैं, परिवार और आजीविका त्याग देते हैं, यहाँ तक कि दौड़-धूप करने के लिए वर्षों अपने घर से दूर बिताते हैं। अपने परम प्रयोजन के लिए वे अपनी रुचियाँ बदल डालते हैं, अपने जीवन का दृष्टिकोण बदल देते हैं, यहाँ तक कि अपने अनुसरण की दिशा तक बदल देते हैं, किंतु परमेश्वर पर अपने विश्वास करने के प्रयोजन को नहीं बदल सकते। वे अपनी आकांक्षाओं के प्रबंधन के लिए दौड़-धूप करते हैं; चाहे मार्ग कितना भी दूर क्यों न हो, और मार्ग में कितनी भी कठिनाइयाँ, खतरे और अवरोध क्यों न आएँ, वे दृढ़ रहते हैं और मृत्यु से नहीं डरते। इस तरह से अपने आप को समर्पित रखने के लिए उन्हें कौन-सी ताकत बाध्य करती है? क्या यह उनकी अंतरात्मा है? क्या यह उनका महान और कुलीन चरित्र है? क्या यह बुराई की शक्तियों से बिल्कुल अंत तक लड़ने का उनका दृढ़ संकल्प है? क्या यह प्रतिफल की आकांक्षा के बिना परमेश्वर के लिए गवाही देने की जो आस्था उनके पास है, वह है? क्या यह परमेश्वर की इच्छा पूरी करने के लिए सब कुछ बेहिचक त्याग देने की उनकी लगन है? या यह विलासितापूर्ण व्यक्तिगत माँगें हमेशा त्यागने की उनकी समर्पित भावना है? ऐसे किसी भी व्यक्ति के लिए, जिसने कभी परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य को नहीं समझा, उसका इतना सारा हृदय का रक्त खपाने में सक्षम होना एक बहुत बड़ा चमत्कार है! फिलहाल, आओ इसकी चर्चा न करें कि इन लोगों ने कितना कुछ दिया है। किंतु उनका व्यवहार हमारे गहन-विश्लेषण के बहुत योग्य है। उनके साथ इतनी निकटता से जुड़े उन लाभों के अतिरिक्त, परमेश्वर को कभी नहीं समझने वाले लोगों द्वारा उसके लिए इतनी बड़ी कीमत चुकाने का क्या कोई अन्य कारण हो सकता है? यहाँ हमें एक ऐसी समस्या का पता चलता है जिसे मनुष्य पहले पता नहीं लगा सका है : परमेश्वर के साथ मनुष्य का संबंध केवल नग्न स्वार्थ पर आधारित है। यह आशीष लेने वाले और देने वाले के मध्य का संबंध है। स्पष्ट रूप से कहें तो यह एक कर्मचारी और एक नियोक्ता के मध्य का संबंध है। कर्मचारी केवल नियोक्ता द्वारा दिए जाने वाले प्रतिफल प्राप्त करने के लिए कठिन परिश्रम करता है। इस प्रकार के स्वार्थ आधारित संबंध में कोई आत्मीय स्नेह नहीं होता, केवल लेन-देन होता है। प्रेम करने या प्रेम पाने जैसी कोई बात नहीं होती, केवल दान और दया होती है। कोई समझ नहीं होती, केवल असहाय दबा हुआ आक्रोश और धोखा होता है। कोई अंतरंगता नहीं होती, केवल एक अगम खाई होती है। अब जबकि चीजें इस बिंदु तक आ गई हैं तो ऐसी राह को कौन उलट सकता है? और कितने लोग इस बात को वास्तव में समझने में सक्षम हैं कि यह संबंध कितना भयावह बन चुका है? मेरा मानना है कि जब लोग आशीष प्राप्त होने के आनंदपूर्ण वातावरण में निमग्न हो जाते हैं तो कोई यह कल्पना नहीं कर सकता कि परमेश्वर के साथ ऐसा संबंध कितना अटपटा और भद्दा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

95. परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास के बारे में सबसे दुःखद बात यह है कि परमेश्वर के कार्य के बीच मनुष्य अपने खुद के उद्यम में जुटा रहता है, जबकि परमेश्वर के प्रबंधन पर कोई ध्यान नहीं देता। परमेश्वर में मानवजाति के विश्वास की सबसे बड़ी असफलता यह है कि जब वह परमेश्वर के प्रति समर्पित होने और उसकी आराधना करने का अनुसरण करता है, उसी समय वह एक महत्वाकांक्षी मंजिल के अपने सपने का निर्माण कर रहा होता है और इस बात की साजिश रचता है कि सबसे बड़ा आशीष और सर्वोत्तम मंजिल कैसे हासिल की जाए। भले ही लोग समझते हैं कि वे कितने दीन-हीन, घृणास्पद और दयनीय हैं, फिर भी ऐसे कितने लोग अपनी आकांक्षाओं और आशाओं को आसानी से त्याग सकते हैं? और कौन अपने कदमों को रोकने और अपनी ओर से योजनाएँ बनाना बंद करने में सक्षम है? परमेश्वर को उन लोगों की ज़रूरत है, जो उसके प्रबंधन को पूरा करने के लिए उसके साथ निकटता से सहयोग करेंगे। उसे उन लोगों की जरूरत है जो उसके प्रति समर्पण करने की खातिर अपने पूरे तन-मन को उसके प्रबंधन के कार्य के प्रति समर्पित करेंगे। उसे ऐसे लोगों की जरूरत नहीं है जो हर दिन उससे भीख माँगने के लिए अपने हाथ फैलाए रहते हैं और उनकी तो बिल्कुल भी जरूरत नहीं है जो उसके लिए खुद को थोड़ा-सा खपाते हैं और फिर उससे भुगतान अदायगी की माँग करने का इंतजार करते हैं। परमेश्वर उन लोगों से नफरत करता है जो तुच्छ योगदान करते हैं और फिर अपनी उपलब्धियों से संतुष्ट हो जाते हैं। वह उन निष्ठुर लोगों से नफरत करता है जो उसके प्रबंधन-कार्य को अत्यधिक नापसंद करते हैं और केवल स्वर्ग जाने और आशीष प्राप्त करने के बारे में बात करना चाहते हैं। वह उन लोगों से और भी अधिक नफरत करता है जो उसके उद्धार के कार्य से प्राप्त अवसर का लाभ अपने फायदे के लिए उठाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि इन लोगों ने कभी इस बात की परवाह नहीं की है कि परमेश्वर अपने प्रबंधन के कार्य के माध्यम से क्या हासिल और प्राप्त करना चाहता है। उनकी रुचि केवल इस बात में होती है कि किस प्रकार वे परमेश्वर के कार्य द्वारा प्रदान किए गए अवसर का उपयोग आशीष प्राप्त करने के लिए कर सकते हैं। वे परमेश्वर के हृदय के प्रति बिल्कुल भी विचारशील नहीं हैं और पूरी तरह से अपने भविष्य और भाग्य में तल्लीन रहते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के प्रति विमुख होते हैं और जो इस बात में जरा-सी भी रुचि नहीं रखते कि परमेश्वर मानवजाति को कैसे बचाता है और उसके इरादे क्या हैं, वे सभी परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के दायरे से बाहर वही चीजें कर रहे हैं जिन्हें वे करना चाहते हैं। उनके क्रियाकलापों को परमेश्वर द्वारा न तो याद किया जाता है और न ही अनुमोदित किया जाता है, परमेश्वर द्वारा इन्हें मूल्यवान माना जाना तो दूर की बात है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

96. मेरे कर्मों की संख्या इतनी ज्यादा है कि वे समुद्र-तटों की रेत के कणों से भी ज्यादा हैं और मेरी बुद्धि इतनी महान है कि वह सुलेमान के सभी पुत्रों की बुद्धि से बढ़कर है, फिर भी लोग मुझमें इस तरह विश्वास करते हैं जैसे कि मैं मामूली हैसियत वाला मात्र एक चिकित्सक और मनुष्यों का कोई अज्ञात शिक्षक हूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उन्हें चंगा कर दूँ। बहुत सारे लोग मुझ में सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि मैं उनके शरीर से अशुद्ध आत्माओं को निकालने के लिए अपनी सामर्थ्य का इस्तेमाल करूँ और बहुत-से लोग मुझसे बस शांति और आनंद प्राप्त करने के लिए मुझमें विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझसे सिर्फ और अधिक भौतिक संपदा माँगने के लिए मुझ पर विश्वास करते हैं। बहुत-से लोग मुझमें सिर्फ इसलिए विश्वास करते हैं कि इस जीवन को शांति से गुजार सकें और अगले जीवन में सुरक्षित और हानिरहित रह सकें। बहुत-से लोग केवल नरक की पीड़ा से बचने के लिए और स्वर्ग के आशीष प्राप्त करने के लिए मुझ में विश्वास करते हैं। बहुत सारे लोग केवल अस्थायी आराम के लिए मुझमें विश्वास करते हैं, फिर भी अगले जीवन में कुछ भी हासिल करने का प्रयास नहीं करते। जब मैं लोगों पर अपना क्रोध उतारता हूँ और कभी उनके पास रही सारी सुख-शांति छीन लेता हूँ, तो मनुष्य शंकालु हो जाता है। जब मैं मनुष्य को नरक का कष्ट देता हूँ और स्वर्ग के आशीष वापस ले लेता हूँ, वे क्रोध से भर जाते हैं। जब लोग मुझसे खुद को चंगा करने के लिए कहते हैं और मैं उन पर ध्यान नहीं देता और उनके प्रति घृणा महसूस करता हूँ तो वे मुझे छोड़कर चले जाते हैं, इलाज के दुष्ट तरीके और जादू-टोने का मार्ग खोजने लगते हैं। जब मैं मनुष्य द्वारा मुझसे माँगी गई सारी चीजें वापस ले लेता हूँ, तो वे बिना कोई निशान छोड़े गायब हो जाते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि लोग मुझमें आस्था इसलिए रखते हैं क्योंकि मेरा अनुग्रह अत्यंत विपुल है, और क्योंकि बहुत अधिक लाभ प्राप्त किए जा सकते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?

97. तुम यह आशा करते हो कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था के मार्ग में कोई भी मुश्किल या क्लेश या लेशमात्र भी पीड़ा नहीं होगी। तुम हमेशा निरर्थक चीजों के पीछे भागते हो और तुम जीवन को कोई अहमियत नहीं देते, बल्कि तुम अपने बेतुके विचारों को सत्य से ज्यादा महत्व देते हो। तुम कितने निकम्‍मे हो! तुम सूअर की तरह जीते हो—तुममें और सूअर और कुत्ते में क्या अंतर है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, बल्कि देह से प्यार करते हैं, क्या वे सब जानवर नहीं हैं? क्या वे मरे हुए लोग जिनमें आत्मा नहीं है, चलती-फिरती लाशें नहीं हैं? तुम लोगों के बीच कितने सारे वचन कहे गए हैं? क्या तुम लोगों के बीच केवल थोड़ा-सा ही कार्य किया गया है? मैंने तुम लोगों के बीच कितनी आपूर्ति की है? तो फिर तुमने इसे प्राप्त क्यों नहीं किया? तुम्हें किस बारे में शिकायत करनी है? क्या ऐसा नहीं है कि तुमने इसलिए कुछ भी प्राप्त नहीं किया है क्योंकि तुम देह से बहुत अधिक प्रेम करते हो? और क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम्‍हारे विचार बहुत ज्यादा असंयमित हैं? क्या इसकी वजह यह नहीं है कि तुम बहुत ज्यादा मूर्ख हो? यदि तुम इन आशीषों को प्राप्त करने में विफल होते हो, तो क्या तुम परमेश्वर को दोष दोगे कि उसने तुम्‍हें नहीं बचाया? तुम परमेश्वर में विश्वास करने के बाद शांति प्राप्त करने में सक्षम होने का अनुसरण करते हो—ताकि तुम्हारे बच्चे बीमारी से दूर रहें, तुम्हारे पति को एक अच्छी नौकरी मिल जाए, तुम्हारे बेटे को एक अच्छी पत्नी और तुम्हारी बेटी को एक अच्छा पति मिले, तुम्हारे बैल और घोड़े जमीन की अच्छी जुताई कर पाएँ और तुम्हारी फसलों के लिए साल भर अच्छा मौसम रहे। तुम इन्हीं चीजों का अनुसरण करते हो। तुम्‍हारा अनुसरण केवल आराम से जीने के लिए है—ताकि तुम्‍हारे परिवार में कोई दुर्घटना न हो, आँधी-तूफान तुम्‍हारे पास से होकर गुजर जाएँ, धूल-मिट्टी तुम्‍हारे चेहरे को छू भी न पाए, तुम्‍हारे परिवार की फसलें बाढ़ में न बह जाएँ—किसी भी आपदा से प्रभावित न हों, तुम “परमेश्वर के आलिंगन” में रहो, एक आरामदायक घरौंदे में रहो। तुम जैसा डरपोक इंसान, जो हमेशा देह के पीछे भागता है—क्या तुम्‍हारे अंदर एक दिल है, क्या तुम्‍हारे अंदर एक आत्मा है? क्या तुम एक पशु नहीं हो? मैं बदले में बिना कुछ माँगे तुम्‍हें सच्चा मार्ग देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम अभी भी उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं? मैं तुम्‍हें एक सच्चा मानवीय जीवन देता हूँ, फिर भी तुम उसका अनुसरण नहीं करते। क्या तुम कुत्ते और सूअर की किस्म के ही नहीं हो? सूअर मनुष्य के जीवन का अनुसरण नहीं करते, वे शुद्ध किए जाने का अनुसरण नहीं करते और वे नहीं समझते कि जीवन क्या है। प्रतिदिन, वे बस पेट भर खाना खाते हैं और सो जाते हैं। मैंने तुम्‍हें सच्चा मार्ग प्रदान किया है, फिर भी तुमने उसे प्राप्त नहीं किया है, तुम्‍हारे हाथ खाली हैं। क्या तुम इस जीवन में एक सूअर का जीवन जीते रहना चाहते हो? ऐसे लोगों के जिंदा रहने का क्या अर्थ है? तुम्‍हारा जीवन घृणित और नीच है, तुम गंदगी और व्यभिचार में जीते हो और किसी लक्ष्य को पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम्‍हारा जीवन अत्यंत निकृष्ट नहीं है? क्या तुममें परमेश्वर का सामना करने का दुस्साहस है? यदि तुम इसी तरह अनुभव करते रहे, तो क्या केवल शून्य ही तुम्हारे हाथ नहीं लगेगा? तुम्हें सच्चा मार्ग प्रदान किया गया है, किंतु अंततः तुम उसे प्राप्त कर पाओगे या नहीं, यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान

98. लोगों के जीवन अनुभवों में, वे प्रायः मन ही मन सोचते हैं : “मैंने परमेश्वर के लिए अपने परिवार और जीविका का त्याग कर दिया है, और उसने मुझे क्या दिया है? मुझे हिसाब करना चाहिए और इसकी पुष्टि करनी चाहिए—क्या मैंने हाल ही में कोई आशीष प्राप्त किया है? मैंने इस दौरान बहुत कुछ खपाया है, मैं बहुत दौड़ा-भागा हूँ, मैंने बहुत कष्ट सहा है—क्या परमेश्वर ने इस दौरान मेरे प्रदर्शन के बदले में मुझसे कोई वादा किया है? क्या उसने मेरे अच्छे कर्म याद रखे हैं? मेरा परिणाम क्या होगा? क्या मैं आशीष प्राप्त कर सकता हूँ? ...” अपने हृदय में प्रत्येक व्यक्ति बार-बार ऐसे जोड़-तोड़ करता है और परमेश्वर से चीजों की माँग करते हुए लगातार प्रेरणाएँ, महत्वाकांक्षाएँ और लेन-देन की मानसिकता रखता है। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य अपने हृदय में लगातार परमेश्वर की परीक्षा लेता रहता है और परमेश्वर के बारे में साजिशें रचता रहता है, अपने परिणाम के लिए परमेश्वर के साथ लगातार “मामले पर बहस” करता रहता है और परमेश्वर से बयान माँगने और यह देखने की कोशिश करता है कि परमेश्वर उसे वह चीज देगा या नहीं जो वह चाहता है। परमेश्वर का अनुसरण करने के साथ ही साथ, मनुष्य परमेश्वर को परमेश्वर नहीं मानता। मनुष्य ने परमेश्वर के साथ हमेशा सौदेबाजी करने की कोशिश की है, उससे अनवरत चीजों की माँग की है और हर कदम पर उस पर दबाव डालते हुए, एक इंच दिए जाने पर एक मील लेने की कोशिश की है। परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश करते हुए साथ ही साथ, मनुष्य उसके साथ तर्क-वितर्क भी करता है, और यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परीक्षण आने पर या अपने आप को किन्हीं खास स्थितियों में पाने पर अक्सर कमजोर, नकारात्मक होते हैं और अपने कार्य में ढिलाई करते हैं और परमेश्वर के बारे में शिकायतों से भरे होते हैं। मनुष्य ने जब पहले-पहल परमेश्वर में विश्वास करना आरंभ किया था, उसी समय से मनुष्य ने परमेश्वर को एक अक्षय पात्र, एक सर्व-उपयोगी उपकरण माना है और अपने आपको परमेश्वर का सबसे बड़ा साहूकार माना है, मानो परमेश्वर से आशीष और वादे माँगना उसका जन्मजात अधिकार और दायित्व है, जबकि मनुष्य की रक्षा, परवाह और उसकी आपूर्ति करना परमेश्वर की जिम्मेदारियाँ हैं जो परमेश्वर को पूरी करनी चाहिए। ऐसी है “परमेश्वर में विश्वास” के तीन शब्दों की मूलभूत समझ, उन सब लोगों की जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और ऐसी है परमेश्वर में विश्वास की अवधारणा की उनकी गहनतम समझ। मनुष्य के प्रकृति सार से लेकर उसके व्यक्तिपरक अनुसरण तक, ऐसा कुछ भी नहीं है जो परमेश्वर के भय से संबंधित हो। परमेश्वर में विश्वास करने में मनुष्य के लक्ष्य का परमेश्वर की आराधना के साथ कोई लेना-देना नहीं हो सकता। कहने का तात्पर्य यह है कि मनुष्य ने परमेश्वर में अपने विश्वास में परमेश्वर का भय मानने और उसकी आराधना करने का इरादा कभी नहीं किया है और कभी भी यह नहीं समझा है कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए ऐसी चीजों की आवश्यकता है। ऐसी दशा के आलोक में, मनुष्य का सार स्पष्ट है। यह सार क्या है? यह सार यह है कि मनुष्य का हृदय दुर्भावनापूर्ण, कुटिल और धोखेबाज है, वह निष्पक्षता, धार्मिकता और सकारात्मक चीजों से प्रेम नहीं करता है और यह तिरस्करणीय और लोभी है। मनुष्य का हृदय परमेश्वर के लिए पूरी तरह से बंद हो चुका है; वह इसे परमेश्वर को बिल्कुल भी नहीं देता है। परमेश्वर ने मनुष्य का सच्चा हृदय कभी नहीं देखा है, न ही उसकी मनुष्य द्वारा कभी आराधना की गई है। परमेश्वर चाहे जितनी बड़ी कीमत चुकाए, या वह चाहे जितना अधिक कार्य करे, या वह मनुष्य का चाहे जितना भरण-पोषण करे, मनुष्य इन सबके प्रति अंधा और उदासीन ही बना रहता है। मनुष्य ने कभी परमेश्वर को अपना हृदय नहीं दिया है, वह अपना हृदय अपने पास ही रखना, स्वयं अपने निर्णय लेना चाहता है—जिसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलना या परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना नहीं चाहता है, न ही वह परमेश्वर के रूप में परमेश्वर की आराधना करना चाहता है। ऐसी है आज मनुष्य की दशा।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

99. जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग उसे विशेष गंभीरता से लेते हो; इतना ही नहीं, यह एक ऐसी चीज़ है, जिसके बारे में तुम सभी विशेष रूप से संवेदनशील हो। कुछ लोगों से एक अच्छा गंतव्य पाने के लिए परमेश्वर के सामने दंडवत करते हुए अपने सिर जमीन पर पटकने का इंतज़ार नहीं हो पा रहा है। मैं तुम्हारी उत्सुकता देखता हूँ, जिसे शब्दों में व्यक्त करने की आवश्यकता नहीं है। यह इससे अधिक कुछ नहीं है कि तुम लोग अपनी देह विपत्ति में नहीं डालना चाहते, और भविष्य में चिरस्थायी सज़ातो बिल्कुल भी नहीं भुगतना चाहते। तुम लोग केवल स्वयं को थोड़ा और उन्मुक्त, थोड़ा और आसान जीवन जीने देने की आशा करते हो। इसलिए जब भी गंतव्य का जिक्र होता है, तुम लोग खास तौर से बेचैन महसूस करते हो और अत्यधिक डर जाते हो कि अगर तुम लोग पर्याप्त सतर्क नहीं रहे, तो तुम परमेश्वर को नाराज़ कर सकते हो और इस प्रकार उस दंड के भागी हो सकते हो, जिसके तुम पात्र हो। अपने गंतव्य की खातिर तुम लोग समझौते करने से भी नहीं हिचके हो, यहाँ तक कि तुममें से कई लोग, जो कभी कुटिल और चंचल थे, अचानक विशेष रूप से विनम्र और ईमानदार बन गए हैं; तुम्हारी ईमानदारी का दिखावा बिल्कुल कँपा देने वाला है। फिर भी, तुम सभी के पास “ईमानदार” दिल हैं, और तुम लोगों ने लगातार बिना कोई बात छिपाए अपने दिलों के राज़ मेरे सामने खोले हैं, चाहे वह शिकायत हो, धोखा हो या वफादारी हो। कुल मिलाकर, तुम लोगों ने अपने अस्तित्व के गहनतम कोनों में पड़ी मूलभूत चीज़ें मेरे सामने खुलकर “कबूल” की हैं। बेशक, मैंने कभी इन चीज़ों को टाला नहीं है, क्योंकि वे सब मेरे लिए बहुत आम हो गई हैं। लेकिन अपने अंतिम गंतव्य के लिए तुम लोग परमेश्वर का अनुमोदन पाने के लिए अपने सिर के बाल का एक रेशा भी गँवाने के बजाय आग के दरिया में कूद जाओगे। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों के साथ बहुत कट्टर हो रहा हूँ; बात यह है कि मैं जो कुछ भी करता हूँ, उसके रूबरू आने के लिए तुम लोगों के हृदय में वफादारी की बहुत कमी है। तुम लोग शायद न समझ पाओ कि मैंने अभी क्या कहा है, इसलिए मैं तुम्हें एक आसान स्पष्टीकरण देता हूँ : तुम लोगों को सत्य और जीवन की ज़रूरत नहीं है; न ही तुम्हें अपने आचरण के सिद्धांतों की ज़रूरत है, मेरे श्रमसाध्य कार्य की तो निश्चित रूप से ज़रूरत नहीं है। इसके बजाय तुम लोगों को उन चीज़ों की ज़रूरत है, जो तुम्हारी देह से जुड़ी हैं—धन-संपत्ति, हैसियत, परिवार, विवाह आदि। तुम लोग मेरे वचनों और कार्य को पूरी तरह से ख़ारिज करते हो, इसलिए मैं तुम्हारी आस्था को एक शब्द में समेट सकता हूँ : लापरवाह। जिन चीज़ों के प्रति तुम लोग पूर्णतः वफादार हो, उन्हें हासिल करने के लिए तुम किसी भी हद तक जा सकते हो, लेकिन मैंने पाया है कि तुम लोग परमेश्वर में अपने विश्वास से संबंधित मामलों में ऐसा नहीं करते। इसके बजाय, तुम तुलनात्मक रूप से वफादार हो, तुलनात्मक रूप से गंभीर हो। इसीलिए मैं कहता हूँ कि जिनके दिल में पूर्ण ईमानदारी का अभाव है, वे परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में असफल हैं। ध्यान से सोचो—क्या तुम लोगों के बीच कई लोग असफल हैं?

तुम लोगों को ज्ञात होना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास में सफलता लोगों के अपने कार्यों का परिणाम होती है; जब लोग सफल नहीं होते, बल्कि असफल होते हैं, तो वह भी उनके अपने कार्यों के कारण ही होता है, उसमें किसी अन्य कारक की कोई भूमिका नहीं होती। मेरा मानना है कि तुम लोग ऐसी चीज़ प्राप्त करने के लिए हर साधन का उपयोग करोगे, जो परमेश्वर में विश्वास करने से ज्यादा मुश्किल होती है और जिसे पाने के लिए उससे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं, और उसे तुम बड़ी गंभीरता से लोगे, यहाँ तक कि तुम उसमें कोई गलती बरदाश्त करने के लिए भी तैयार नहीं होंगे; इस तरह के निरंतर प्रयास तुम लोग अपने जीवन में करते हो। यहाँ तक कि तुम लोग उन परिस्थितियों में भी मेरी देह को धोखा दे सकते हो, जिनमें तुम अपने परिवार के किसी सदस्य को धोखा नहीं दोगे। यही तुम लोगों का हमेशा का व्यवहार और वह सिद्धांत है जिससे तुम संसार से निपटते हो। क्या तुम लोग अभी भी अपने गंतव्य की खातिर मुझे धोखा देने के लिए एक झूठा मुखौटा नहीं लगा रहे हो, ताकि तुम्हारा गंतव्य अद्भुत हो जाए और पूरी तरह तुम्हारी इच्छा के अनुरूप हो? मुझे पता है कि तुम्हारी वफादारी अस्थायी है, ठीक वैसे ही जैसे तुम्हारी ईमानदारी। क्या मामला ये नहीं है कि तुम्हारा संकल्प और तुम जो कीमत चुकाते हो, वे सिर्फ अभी मौजूद हैं और भविष्य में मौजूद नहीं रहेंगे? तुम बस एक सुंदर मंजिल की खातिर भरसक कोशिश करने के लिए एक आखिरी प्रयास करना चाहते हो। तुम्हारा एकमात्र उद्देश्य सौदेबाज़ी करना है, सत्य का ऋणी होने से बचना नहीं, मुझे उस कीमत का प्रतिदान करना तो बिल्कुल भी नहीं, जो मैंने अदा की है। संक्षेप में, तुम केवल जो चाहते हो, उसे प्राप्त करने के लिए अपनी चतुर चालें चलने के इच्छुक हो, लेकिन उसके लिए खुला संघर्ष करने के लिए तैयार नहीं हो। क्या यही तुम लोगों के अंतरतम विचार नहीं हैं? तुम्हें स्वयं ढोंग नहीं करना चाहिए, अपने गंतव्य के बारे में इतनी माथापच्ची तो और भी नहीं करनी चाहिए कि दिन में तुम्हारी खाने-पीने की इच्छा ही न हो और रात को चैन से सो भी न पाओ। क्या यह सच नहीं है कि अंत में तुम्हारा परिणाम पहले ही निर्धारित हो चुका होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, गंतव्य के बारे में

100. इन सब वर्षों में तुम लोगों ने मेरा अनुसरण किया है, फिर भी तुमने मुझे कभी वफादारी का एक कण भी नहीं दिया है। इसके बजाय, तुम उन लोगों और चीजों के इर्द-गिर्द घूमते रहे हो जिन्हें तुम लोग पसंद करते हो—इतना कि हर समय, और हर जगह जहाँ तुम जाते हो, उन्हें अपने हृदय के करीब रखते हो और तुमने कभी भी उन्हें छोड़ा नहीं है। जब भी तुम लोग किसी एक चीज के बारे में, जिससे तुम प्रेम करते हो, उत्सुक और जोशीले हो रहे होते हो, तो तुम ऐसा उसी समय कर रहे होते हो जब तुम मेरा अनुसरण कर रहे होते हो, यहाँ तक कि जब तुम साथ ही मेरे वचनों को सुन रहे होते हो। इसलिए मैं कहता हूँ कि जिस वफादारी की अपेक्षा मैं तुम लोगों से करता हूँ, उसे तुम लोग अपने “पालतुओं” के प्रति वफादार होने और उन्हें संजोने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो। हालाँकि तुम लोग मेरे लिए एक-दो चीजों का त्याग करते हो, पर वह तुम्हारे सर्वस्व का प्रतिनिधित्व नहीं करता, और यह नहीं दर्शाता कि वह मैं हूँ, जिसके प्रति तुम सचमुच वफादार हो। तुम लोग खुद को उन उपक्रमों में संलग्न कर देते हो, जिनके प्रति तुम बहुत गहरा चाव रखते हो : तुममें से कुछ अपने बेटे-बेटियों के प्रति वफादार हैं, तो अन्य अपने पतियों, पत्नियों, धन-संपत्ति, व्यवसाय, वरिष्ठ अधिकारियों, हैसियत या स्त्रियों के प्रति वफादार हैं। जिन चीजों के प्रति तुम लोग वफादार होते हो, उनसे तुम कभी ऊबते या नाराज नहीं होते; बल्कि तुम उन चीजों को ज्यादा बड़ी मात्रा में और बेहतर तरीके से पाने के लिए और अधिक लालायित हो जाते हो और तुम कभी भी ऐसा करना छोड़ते नहीं हो। मेरे वचन और मैं हमेशा उन चीजों के पीछे धकेल दिए जाते हैं, जिनके प्रति तुम गहरा चाव रखते हो, और तुम्हारे पास उन्हें आखिरी स्थान पर रखने के सिवा कोई विकल्प नहीं बचता। ऐसे लोग भी हैं जो इस आखिरी स्थान को भी उन चीजों के लिए छोड़ देते हैं जिनके लिए वे वफादार हैं, लेकिन जिन्हें उन्होंने अभी खोजा नहीं है। उनके दिलों में कभी भी मेरा मामूली-सा भी निशान नहीं रहा है। तुम लोग सोच सकते हो कि मैं तुमसे बहुत ज्यादा अपेक्षा रखता हूँ या तुम पर गलत आरोप लगा रहा हूँ—लेकिन क्या तुमने कभी इस तथ्य पर ध्यान दिया है कि जब तुम खुशी-खुशी अपने परिवार के साथ समय बिता रहे होते हो, तो तुम कभी भी मेरे प्रति वफादार नहीं रहे हो? इस समय, क्या तुम लोगों को इससे तकलीफ नहीं होती? जब तुम लोगों के दिल अपनी मेहनत का प्रतिफल पाकर खुशी से भरे होते हैं, तब क्या तुम लोग खुद को पर्याप्त सत्यों से लैस न करने के कारण निराश महसूस नहीं करते? मेरा अनुमोदन प्राप्त न करने पर तुम लोग कब रोए हो? तुम लोग अपने बेटे-बेटियों के लिए अपना दिमाग खपाते हो और बहुत तकलीफ उठाते हो, फिर भी तुम संतुष्ट नहीं होते; फिर भी तुम यह मानते हो कि तुमने उनके लिए ज्यादा मेहनत नहीं की है, कि तुमने उनके लिए वह सब कुछ नहीं किया है जो तुम कर सकते थे, जबकि मेरे लिए तुम हमेशा से असावधान और लापरवाह रहे हो; मैं केवल तुम्हारी यादों में रहता हूँ, तुम्हारे दिलों में नहीं। तुम लोग कभी मेरे श्रमसाध्य इरादों को समझने की कोशिश नहीं करते या उनके प्रति कभी विचारशीलता नहीं दिखाते हो। तुम सिर्फ मामूली संक्षिप्त सोच-विचार करते हो, और समझते हो कि यह काफी होगा। यह “वफादारी” वह नहीं है, जिसकी मैंने लंबे समय से कामना की है, बल्कि वह है जिससे मैंने लंबे समय से नफरत की है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?

101. अगर मैं तुम लोगों के सामने अभी कुछ पैसे रखूँ और तुम्हें चुनने की आजादी दूँ—और अगर मैं तुम्हारी पसंद के लिए तुम्हारी निंदा न करूँ—तो तुममें से ज्यादातर लोग पैसे का चुनाव करेंगे और सत्य को छोड़ देंगे। तुममें से जो बेहतर होंगे, वे पैसे को छोड़ देंगे और अनिच्छा से सत्य को चुन लेंगे, जबकि इन दोनों के बीच वाले एक हाथ से पैसे को झपट लेंगे और दूसरे हाथ से सत्य को। इस तरह तुम्हारा असली रंग क्या स्वतः प्रकट नहीं हो जाएगा? सत्य और किसी ऐसी अन्य चीज के बीच, जिसके प्रति तुम लोग वफादार हो, तुम सभी ऐसा ही चुनाव करोगे और तुम्हारा रवैया ऐसा ही रहेगा। क्या ऐसा नहीं है? तुम लोगों में बहुत-से सही और गलत के बीच डगमगाए हैं, है ना? सकारात्मक और नकारात्मक, काले और सफेद, परिवार और परमेश्वर, संतानों और परमेश्वर, सद्भाव और बिगाड़, धन और गरीबी, रुतबा और मामूलीपन, समर्थन दिए जाने और ठुकरा दिए जाने इत्यादि के बीच सभी संघर्षों के दौरान तुम लोगों ने जो विकल्प चुने हैं उनके बारे में तुम लोग निश्चित ही अनजान नहीं हो! एक सौहार्दपूर्ण परिवार और टूटे हुए परिवार के बीच तुमने पहले को चुना और तुमने ऐसा बिना किसी संकोच के किया; धन-संपत्ति और कर्तव्य के बीच तुमने फिर से पहले को चुना, यहाँ तक कि तुममें किनारे पर वापस लौटने[क] की इच्छा भी नहीं रही; विलासिता और निर्धनता के बीच तुमने पहले को चुना; अपने बच्चों, पत्नियों और पतियों या मेरे बीच तुमने पहले को चुना; और धारणाओं और सत्य के बीच तुमने अब भी पहले को चुना। तुम लोगों के तरह-तरह के बुरे कर्मों को देखते हुए मेरा विश्वास तुम पर से बिल्कुल उठ गया है, मैं बिल्कुल स्तब्ध हूँ। तुम्हारे हृदय अप्रत्याशित रूप से इतने कठोर हैं कि उन्हें कोमल नहीं बनाया जा सकता। सालों तक मैंने अपने हृदय का जो खून खपाया है, उससे मुझे आश्चर्यजनक रूप से तुम्हारे परित्याग और विवशता से अधिक कुछ नहीं मिला, लेकिन तुम लोगों के प्रति मेरी आशाएँ हर गुजरते दिन के साथ बढ़ती ही जाती हैं, क्योंकि मेरा दिन सबके सामने पूरी तरह से खुला हुआ है। फिर भी अब तुम लोग अंधेरी और बुरी चीजों का पीछा कर रहे हो और उनसे अपनी पकड़ ढीली करने से इनकार करते हो। तो फिर तुम्हारा परिणाम क्या होगा? क्या तुम लोगों ने कभी इस पर सावधानी से विचार किया है? अगर तुम लोगों को फिर से चुनाव करने को कहा जाए, तो तुम्हारा क्या रुख रहेगा? क्या अब भी तुम लोग पहले को ही चुनोगे? क्या अब भी तुम लोग निराशा और दर्दनाक शोक से मेरा प्रतिदान करोगे? क्या अब भी तुम्हारे हृदयों में जरा-सी ही गर्मजोशी होगी? क्या तुम अब भी इस बात से अनभिज्ञ रहोगे कि मेरे हृदय को सुकून पहुँचाने के लिए तुम्हें क्या करना चाहिए?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम वास्तव में किसके प्रति वफादार हो?

फुटनोट :

क. किनारे पर वापस लौटना : एक चीनी कहावत, जिसका मतलब है “अपने बुरे कामों से विमुख होना; अपने बुरे काम छोड़ना।”


102. प्रतिदिन प्रत्येक व्यक्ति के कर्म और विचार उस एक की आँखों के द्वारा देखे जाते हैं, और साथ ही, वे अपने कल की तैयारी कर रहे होते हैं। यही वह मार्ग है, जिस पर सभी प्राणियों को चलना चाहिए; यही वह मार्ग है, जिसे मैंने सभी के लिए पूर्वनिर्धारित कर दिया है, और कोई इससे बच या छूट नहीं सकता। मैंने जो वचन कहे हैं वे अनगिनत हैं और मैंने कार्य किए हैं वे और भी अपरिमेय हैं। प्रतिदिन मैं प्रत्येक मनुष्य को स्वाभाविक रूप से वह सब करते हुए देखता हूँ, जो उसे अपनी अंतर्निहित प्रकृति और अपनी प्रकृति के विकास के अनुसार करना है। अनजाने में अनेक लोगों ने पहले ही “सही मार्ग” पर चलना आरंभ कर दिया है, जिसे मैंने विभिन्न प्रकार के लोगों को उजागर करने के लिए निर्धारित किया है। इन विभिन्न प्रकार के लोगों को मैंने लंबे समय से विभिन्न वातावरणों में रखा है और अपने-अपने स्थान पर प्रत्येक अपने अंतर्निहित वर्गीकरण को दिखाता है। उन्हें कोई बाँध नहीं सकता और कोई उन्हें बहका नहीं सकता। वे पूर्ण रूप से स्वतंत्र हैं और वे जो प्रकट करते हैं वह स्वाभाविक रूप से आता है। केवल एक चीज उन्हें नियंत्रण में रखती है : मेरे वचन। इस तरह कुछ लोग मेरे वचन अनमने भाव से पढ़ते हैं, कभी उनका अभ्यास नहीं करते, वे ऐसा केवल मृत्यु से बचने के परिणाम के साथ किसी तरह जीते रहने के लिए करते हैं; जबकि कुछ लोगों के लिए मेरे वचनों के मार्गदर्शन और आपूर्ति के बिना दिन गुज़ारना कठिन होता है, और इसलिए वे स्वाभाविक तौर पर मेरे वचनों को हर समय थामे रहते हैं। जैसे-जैसे समय बीतता है, उन्हें मनुष्य के जीवन के रहस्य, मानव-जाति के गंतव्य और मनुष्य होने का महत्व पता चलता जाता है। मानव-जाति मेरे वचनों की उपस्थिति में इससे अलग कुछ नहीं है और मैं बस चीजों को उनके अपने हिसाब से होने देता हूँ। मैं ऐसा कोई कार्य नहीं करता, जो लोगों को मेरे वचनों को अपने अस्तित्व का आधार बनाने के लिए बाध्य करे। तो जिन लोगों में कभी विवेक नहीं रहा और जिनके अस्तित्व का कभी कोई मूल्य नहीं रहा, चुपचाप चीजों को घटित होते देखने के बाद वे बेधड़क मेरे वचनों को दरकिनार कर देते हैं और जो चाहते हैं वो करते हैं। वे सत्य से और उस सबसे जो मुझसे आता है, विमुख होने लगते हैं और वे मेरे घर में रहने से और भी विमुख महसूस करते हैं। अपने गंतव्य की खातिर और सजा से बचने के लिए ये लोग कुछ समय के लिए मेरे घर में रहते हैं, फिर भले ही वे मजदूरी कर रहे हों। परंतु उनके इरादे और कार्य कभी नहीं बदलते। इससे आशीष पाने की उनकी इच्छा और एक बार राज्य में प्रवेश करने और उसके बाद वहाँ हमेशा के लिए रहने की इच्छा—यहाँ तक कि अनंत स्वर्ग में प्रवेश करने की उनकी इच्छा बढ़ जाती है। जितना अधिक वे मेरे दिन के जल्दी आने की लालसा करते हैं, उतना ही अधिक वे महसूस करते हैं कि सत्य उनके मार्ग की बाधा और अड़चन बन गया है। वे हमेशा के लिए स्वर्ग के राज्य के आशीषों का आनंद उठाने हेतु राज्य में कदम रखने के लिए मुश्किल से इंतजार कर पाते हैं—सब-कुछ सत्य की खोज करने या न्याय और ताड़ना स्वीकार करने, यहाँ तक कि मेरे घर में हाथ-पैर जोड़ने और मेरी आज्ञा के अनुसार कार्य करने की जरूरत पड़े बिना। ये लोग न तो सत्य की खोज करने की अपनी इच्छा पूरी करने के लिए मेरे घर में प्रवेश करते हैं, न ही मेरे प्रबंधन में सहयोग करने के लिए; उनका उद्देश्य महज उन लोगों में शामिल होने का होता है, जिन्हें आने वाले युग में नष्ट नहीं किया जाएगा। इसलिए उनके हृदय ने कभी नहीं जाना कि सत्य क्या है, या सत्य को कैसे ग्रहण किया जाए। यही कारण है कि ऐसे लोगों ने कभी सत्य का अभ्यास या अपनी भ्रष्टता की गहराई का एहसास नहीं किया, और फिर भी वे मेरे घर में हमेशा “सेवकों” के रूप में रहे हैं। वे “धैर्यपूर्वक” मेरे दिन के आने का इंतज़ार करते हैं और मेरे कार्य के तरीके से यहाँ-वहाँ उछाले जाकर भी थकते नहीं। लेकिन भले ही उनकी कोशिश कितनी भी बड़ी हो और उन्होंने उसकी कुछ भी कीमत चुकाई हो, किसी ने उन्हें सत्य के लिए कष्ट उठाते हुए या मेरी खातिर कुछ देते हुए नहीं देखा। अपने हृदय में वे उस दिन को देखने के लिए बेचैन हैं, जब मैं पुराने युग का अंत करूँगा, और इससे भी बढ़कर, वे यह जानने का इंतज़ार नहीं कर सकते कि मेरा सामर्थ्य और मेरा अधिकार कितने विशाल हैं। जिस चीज के लिए उन्होंने कभी शीघ्रता नहीं की, वह है खुद को बदलना और सत्य का अनुसरण करना। वे उससे प्रेम करते हैं, जिससे मैं विमुख हूँ और वे उससे विमुख हैं, जिससे मैं प्रेम करता हूँ। वे उसकी अभिलाषा करते हैं जिससे मैं नफरत करता हूँ, लेकिन उसे खोने से डरते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ। वे इस बुरे संसार में रहते हुए भी इससे कभी नफरत नहीं करते, फिर भी इस बात से बहुत डरते हैं कि मैं इसे नष्ट कर दूँगा। अपने परस्पर विरोधी इरादों के बीच वे इस संसार से प्यार करते हैं जिससे मैं घृणा करता हूँ, लेकिन इस बात के लिए लालायित भी रहते हैं कि मैं इस संसार को शीघ्र नष्ट कर दूँ, और इससे पहले कि वे सच्चे मार्ग से दूर चले जाएँ, उन्हें विनाश की विपत्ति से बचा लिया जाए और अगले युग के मालिकों के रूप में रूपांतरित कर दिया जाए। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सत्य से प्रेम नहीं करते और उस सबसे विमुख हैं, जो मुझसे आता है। वे आशीष खोने के डर से थोड़े समय के लिए “आज्ञाकारी लोग” बन सकते हैं, लेकिन आशीष पाने के लिए उनकी उत्कंठा और नष्ट होने तथा जलती हुई आग की झील में प्रवेश करने का उनका भय कभी छिपाया नहीं जा सकता। जैसे-जैसे मेरा दिन नजदीक आता है, उनकी इच्छा हमेशा से अधिक उत्कट होती जाती है। और आपदा जितनी बड़ी होती है, उतना ही वह उन्हें असहाय बना देती है और वे यह नहीं जान पाते कि मुझे प्रसन्न करने के लिए एवं उन आशीषों को खोने से बचाने के लिए, जिनकी उन्होंने लंबे समय से लालसा की है, कहाँ से शुरुआत करें। जैसे ही मेरा हाथ अपना काम करना शुरू करता है, ये लोग एक अग्र-दल के रूप में कार्य करने के लिए उत्सुक हो जाते हैं। इस डर से कि मैं उन्हें नहीं देखूँगा, वे बस सेना की सबसे आगे की टुकड़ी में आने की सोचते हैं। वे वही करते और कहते हैं, जिसे वे सही समझते हैं, और यह कभी नहीं जान पाते कि उनके क्रियाकलाप कभी सत्य के अनुरूप नहीं रहे, और कि उनके कर्म मेरी योजनाओं को मात्र कमजोर करते और उनमें विघ्न डालते हैं। उन्होंने कड़ी मेहनत की हो सकती है और वे कष्ट सहने के अपने संकल्प और इरादे में सच्चे हो सकते हैं, पर उनके कार्यों से मेरा कोई लेना-देना नहीं है, क्योंकि मैंने कभी नहीं देखा कि उनके कर्म अच्छे इरादे के साथ किए गए हैं, और उन्हें अपनी वेदी पर कुछ रखते हुए तो मैंने बिल्कुल नहीं देखा है। इन अनेक वर्षों में मेरे सामने उन्होंने ऐसे ही कार्य किए हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए

103. कई लोग परमेश्वर के वचनों को दिन-रात पढ़ते रहते हैं, यहाँ तक कि उनके उत्कृष्ट अंशों को सबसे बेशकीमती संपत्ति के तौर पर स्मृति में अंकित कर लेते हैं, इतना ही नहीं, वे जगह-जगह परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हैं, और दूसरों को भी परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति करके उनकी सहायता करते हैं। वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर की गवाही देना है, उसके वचनों की गवाही देना है; ऐसा करना परमेश्वर के मार्ग का पालन करना है; वे सोचते हैं कि ऐसा करना परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीना है, ऐसा करना उसके वचनों को अपने जीवन में लागू करना है, ऐसा करना उन्हें परमेश्वर की सराहना प्राप्त करने, बचाए जाने और पूर्ण बनाए जाने योग्य बनाएगा। परंतु परमेश्वर के वचनों का प्रचार करते हुए भी वे कभी परमेश्वर के वचनों पर खुद अमल नहीं करते या परमेश्वर के वचनों में जो प्रकाशित किया गया है, उससे अपनी तुलना करने की कोशिश नहीं करते। इसके बजाय, वे परमेश्वर के वचनों का उपयोग छल से दूसरों की प्रशंसा और विश्वास प्राप्त करने, अपने दम पर प्रबंधन में प्रवेश करने, परमेश्वर की महिमा का गबन और उसकी चोरी करने के लिए करते हैं। वे परमेश्वर के वचनों के प्रसार से मिले अवसर का दोहन परमेश्वर का कार्य और उसकी प्रशंसा पाने के लिए करने की व्‍यर्थ आशा करते हैं। कितने ही वर्ष गुजर चुके हैं, परंतु ये लोग परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में न केवल परमेश्वर की प्रशंसा प्राप्त करने में असमर्थ रहे हैं, परमेश्वर के वचनों की गवाही देने की प्रक्रिया में न केवल उस मार्ग को खोजने में असफल रहे हैं जिसका उन्हें अनुसरण करना चाहिए, दूसरों को परमेश्वर के वचनों से सहायता और पोषण प्रदान करने की प्रक्रिया में न केवल उन्होंने स्वयं सहायता और पोषण नहीं पाया है, और इन सब चीजों को करने की प्रक्रिया में वे न केवल परमेश्वर को जानने या परमेश्वर के प्रति स्वयं में वास्तविक भय जगाने में असमर्थ रहे हैं; बल्कि, इसके विपरीत, परमेश्वर के बारे में उनकी गलतफहमियाँ और अधिक गहरी हो रही हैं; उस पर अविश्वास और अधिक बढ़ रहा है और उसके बारे में उनकी कल्पनाएँ और अधिक अतिशयोक्तिपूर्ण होती जा रही हैं। परमेश्वर के वचनों के बारे में अपने सिद्धांतों से आपूर्ति और निर्देशन पाकर वे ऐसे प्रतीत होते हैं मानो वे बिल्कुल मनोनुकूल परिस्थिति में हों, मानो वे अपने कौशल का सरलता से इस्तेमाल कर रहे हों, मानो उन्होंने अपने जीवन का उद्देश्य, अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया हो, और मानो उन्होंने एक नया जीवन जीत लिया हो और वे बचा लिए गए हों, मानो परमेश्वर के वचनों को धाराप्रवाह बोलने से उन्‍होंने सत्य प्राप्त कर लिया हो, परमेश्वर के इरादे समझ लिए हों, और परमेश्वर को जानने का मार्ग खोज लिया हो, मानो परमेश्वर के वचनों का प्रचार करने की प्रक्रिया में वे अक्सर परमेश्वर से रूबरू होते हों। साथ ही, अक्सर वे “द्रवित” होकर बार-बार रोते हैं और बहुधा परमेश्वर के वचनों में “परमेश्वर” की अगुआई प्राप्त करते हुए, वे उसकी गंभीर परवाह और उदार मंतव्य समझते प्रतीत होते हैं और साथ ही लगता है कि उन्होंने मनुष्य के लिए परमेश्वर के उद्धार और उसके प्रबंधन को भी जान लिया है, उसके सार को भी जान लिया है और उसके धार्मिक स्वभाव को भी समझ लिया है। इस नींव के आधार पर, वे परमेश्वर के अस्तित्‍व पर और अधिक दृढ़ता से विश्वास करते, उसकी उत्कृष्टता की स्थिति से और अधिक परिचित होते और उसकी भव्यता एवं श्रेष्ठता को और अधिक गहराई से महसूस करते प्रतीत होते हैं। परमेश्वर के वचनों के सतही ज्ञान से ओतप्रोत होने से ऐसा प्रतीत होता है कि उनके विश्वास में वृद्धि हुई है, कष्ट सहने का उनका संकल्प दृढ़ हुआ है, और परमेश्वर संबंधी उनका ज्ञान और अधिक गहरा हुआ है। वे नहीं जानते कि जब तक वे परमेश्वर के वचनों का वास्तव में अनुभव नहीं करेंगे, तब तक उनका परमेश्वर संबंधी सारा ज्ञान और उसके बारे में उनके विचार उनकी अपनी इच्छित कल्पनाओं और अनुमान से निकलते हैं। उनका विश्वास परमेश्वर की किसी भी प्रकार की परीक्षा के सामने नहीं ठहरेगा, उनकी तथाकथित आध्‍यात्मिकता और उनका आध्‍यात्मिक कद परमेश्वर के किसी भी परीक्षण या निरीक्षण के तहत बिल्कुल नहीं ठहरेगी, उनका संकल्प रेत पर बने हुए महल से अधिक कुछ नहीं है, और उनका परमेश्वर संबंधी तथाकथित ज्ञान उनकी कल्पना की उड़ान से अधिक कुछ नहीं है। वास्तव में इन लोगों ने, जिन्होंने एक तरह से परमेश्वर के वचनों पर काफी परिश्रम किया है, कभी यह एहसास ही नहीं किया कि सच्ची आस्था क्या है, सच्चा समर्पण क्या है, सच्ची परवाह क्या है, या परमेश्वर का सच्चा ज्ञान क्या है। वे सिद्धांत, कल्पना, ज्ञान, हुनर, परंपरा, अंधविश्वास, यहाँ तक कि मानवता के नैतिक मूल्यों को भी परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए “पूँजी” और “हथियार” का रूप दे देते हैं, उन्‍हें परमेश्वर पर विश्वास करने और उसका अनुसरण करने का आधार बना लेते हैं। साथ ही, वे इस पूँजी और हथियार का जादुई तावीज भी बना लेते हैं और उसके माध्यम से परमेश्वर को जानते हैं और उसके निरीक्षणों, परीक्षणों, ताड़ना और न्याय का सामना करते हैं। अंत में जो कुछ वे प्राप्त करते हैं, उसमें फिर भी परमेश्वर के बारे में धार्मिक संकेतार्थों और सामंती अंधविश्वासों से ओतप्रोत निष्कर्षों से अधिक कुछ नहीं होता, जो हर तरह से रोमानी, विकृत और रहस्‍यमय होता है। परमेश्वर को जानने और उसे परिभाषित करने का उनका तरीका उन्हीं लोगों के साँचे में ढला होता है, जो केवल ऊपर स्वर्ग में या आसमान में किसी वृद्ध के होने में विश्वास करते हैं, जबकि परमेश्वर की व्यावहारिकता, उसका सार, उसका स्वभाव, उसका स्‍वरूप और अस्तित्‍व आदि—वह सब, जो वास्तविक स्वयं परमेश्वर से संबंध रखता है—ऐसी चीज़ें हैं, जिन्हें समझने में उनका ज्ञान विफल रहा है, जिनसे उनके ज्ञान का पूरी तरह से संबंध-विच्छेद हो गया है, यहाँ तक कि वे इतने अलग हैं, जितने उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव। इस तरह, हालाँकि वे लोग परमेश्वर के वचनों की आपूर्ति और पोषण में जीते हैं, फिर भी वे परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर सचमुच चलने में असमर्थ हैं। इसका वास्‍तविक कारण यह है कि वे कभी भी परमेश्वर से परिचित नहीं हुए हैं, न ही उन्होंने उसके साथ कभी वास्तविक संपर्क या समागम किया है, अतः उनके लिए परमेश्वर के साथ पारस्परिक समझ पर पहुँचना, या अपने भीतर परमेश्वर के प्रति सच्‍चा विश्‍वास पैदा कर पाना, उसका सच्चा अनुसरण या उसकी सच्ची आराधना जाग्रत कर पाना असंभव है। इस परिप्रेक्ष्य और दृष्टिकोण ने—कि उन्हें इस प्रकार परमेश्वर के वचनों को देखना चाहिए, उन्हें इस प्रकार परमेश्वर को देखना चाहिए, उन्हें अनंत काल तक अपने प्रयासों में खाली हाथ लौटने, और परमेश्वर का भय मानने तथा बुराई से दूर रहने के मार्ग पर न चल पाने के लिए अभिशप्त कर दिया है। जिस लक्ष्य को वे साध रहे हैं और जिस ओर वे जा रहे हैं, वह प्रदर्शित करता है कि अनंत काल से वे परमेश्वर के शत्रु हैं और अनंत काल तक वे कभी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकेंगे।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, प्रस्तावना

104. मेरे कार्य के कई वर्षों के दौरान मनुष्य ने बहुत-कुछ प्राप्त किया है और बहुत-कुछ त्यागा है, फिर भी मैं कहता हूँ कि वे मुझ पर वास्तव में विश्वास नहीं करते। क्योंकि लोग केवल मुख से यह मानते हैं कि मैं परमेश्वर हूँ, जबकि मेरे द्वारा व्यक्त सत्यों से वे असहमत होते हैं और इतना ही नहीं, वे उन सत्‍यों का अभ्‍यास भी नहीं करते, जिनकी मैं उनसे अपेक्षा करता हूँ। कहने का अर्थ है कि लोग केवल परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, लेकिन सत्य के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; लोग केवल परमेश्वर के अस्तित्व को स्वीकार करते हैं, जीवन के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते; लोग केवल परमेश्वर के नाम को स्वीकार करते हैं, उसके सार को नहीं। मैं उनके उत्साह के कारण उनसे नफरत करता हूँ, क्योंकि वे केवल मुझे धोखा देने के लिए कानों को अच्छे लगने वाले शब्द बोलते हैं और उनमें से कोई भी सच्चे हृदय से मेरी आराधना नहीं करता। तुम लोगों के शब्‍दों में सर्प का प्रलोभन है और वे बेहद अहंकारी हैं, प्रधान दूत की यह पक्की उद्घोषणा है। इतना ही नहीं, तुम लोगों के कर्म शर्मनाक हद तक तार-तार हो चुके हैं और तुम लोगों की अत्यधिक इच्छाएँ और लोभी मंशाएँ सुनने में घृणित लगती हैं। तुम सब लोग मेरे घर में कीड़े बन गए हो, मेरे तिरस्कार के पात्र बन गए हो। क्योंकि तुम लोगों में से कोई भी सत्य से प्रेम नहीं करता; इसके बजाय तुम आशीष पाना पसंद करते हो, स्वर्गारोहण करना चाहते हो, पृथ्वी पर अपने सामर्थ्य का उपयोग करते मसीह के भव्य दर्शन करना चाहते हो। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी सोचा है कि तुम लोगों जैसा कोई व्यक्ति, कोई इतनी गहराई तक भ्रष्ट व्यक्ति, जो नहीं जानता कि परमेश्वर क्या है, परमेश्वर का अनुसरण करने योग्य कैसे हो सकता है? तुम स्वर्गारोहण कैसे कर सकते हो? तुम उस अभूतपूर्व, भव्य दर्शन के सुंदर दृश्य को निहारने के योग्य कैसे हो सकते हो? तुम्हारे मुँह मुझे धोखा देने वाले शब्दों, गंदगी के शब्दों, मेरे साथ विश्वासघात करने वाले शब्दों और अहंकार के शब्दों से भरे हैं। तुमने मुझसे कभी ईमानदारी के शब्द नहीं कहे, कोई पुनीत शब्द नहीं कहे, न ही मेरे वचनों का अनुभव करने और मेरे प्रति समर्पण के कोई शब्द कहे। आखिरकार तुम्हारी आस्था कैसी है? तुम लोगों के हृदय में इच्छा और धन के सिवाय कुछ नहीं है; और तुम लोगों के मस्तिष्क में भौतिक वस्‍तुओं के सिवाय कुछ नहीं है। हर दिन तुम हिसाब लगाते हो कि मुझसे कुछ कैसे प्राप्त किया जाए। हर दिन तुम गणना करते हो कि तुमने मुझसे कितनी संपत्ति और कितनी भौतिक वस्तुएँ प्राप्त की हैं। हर दिन तुम लोग खुद पर और अधिक आशीष बरसने की प्रतीक्षा करते हो, ताकि तुम लोग अधिक आनंद ले सको, और उन उच्चतर चीजों का आनंद ले सको, जिनका आनंद लिया जा सकता हो। तुम लोगों के विचारों में हर क्षण मैं या मुझसे आने वाला सत्य नहीं, बल्कि तुम लोगों के पति या पत्नी, बच्चे और तुम लोगों के खाने और पहनने की चीजें रहती हैं। तुम लोग यही सोचते हो कि तुम और बेहतर तथा और ऊँचा आनंद कैसे पा सकते हो। लेकिन यदि तुम लोग अपना पेट फटने की हद तक भर लेते हो, क्या तुम अब भी महज लाश नहीं हो? भले ही तुम लोग खुद को बाहर से इतने सुंदर परिधानों से सजा लेते हो, तब भी क्या तुम लोग बस एक चलती-फिरती लाश नहीं हो, जिसमें जीवन नहीं है? तुम लोग पेट के लिए इतनी मेहनत करते रहते हो कि तुम्हारे बाल सफेद हो जाते हैं, लेकिन मेरे कार्य के लिए तुममें से कोई तिनके के बराबर भी त्याग नहीं करता। तुम लोग अपनी देह और अपने बेटे-बेटियों के लिए लगातार दौड़-भाग करते रहते हो, अपने शरीरों को थकाते रहते हो और अपने मस्तिष्कों को कष्ट देते रहते हो—लेकिन मेरे इरादों के लिए तुममें से कोई एक भी चिंता या परवाह नहीं दिखाता। वह क्या है, जो तुम अब भी मुझसे प्राप्त करने की आशा रखते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुलाए बहुत जाते हैं, पर चुने कुछ ही जाते हैं

105. मैंने बहुत सारे वचन व्यक्त किए हैं और अपने इरादों और अपने स्वभाव को भी व्यक्त किया है, इसके बावजूद लोग अभी भी मुझे जानने और मुझ पर विश्वास करने में अक्षम हैं। या यह कहा जा सकता है कि लोग अभी भी मेरे प्रति समर्पण करने में अक्षम हैं। जो बाइबल में जीते हैं, जो व्यवस्था में जीते हैं, जो सलीब पर जीते हैं, जो विनियमों के भीतर जीते हैं, जो उस कार्य के मध्य जीते हैं जिसे मैं आज करता हूँ—उनमें से कौन मेरे अनुरूप है? तुम लोग सिर्फ कोई आशीष और पुरस्कार पाने के बारे में ही सोचते हो, पर तुमने कभी यह नहीं सोचा कि वास्तव में मेरे अनुरूप कैसे बनोगे या अपने आप को मेरे विरुद्ध होने से कैसे रोकोगे। मैं तुम लोगों से बहुत निराश हूँ, क्योंकि मैंने तुम लोगों को बहुत अधिक प्रदान किया है, फिर भी मैंने तुम लोगों से बहुत कम हासिल किया है। तुम लोगों का छल, तुम लोगों का घमंड, तुम लोगों का लालच, तुम लोगों की फालतू इच्छाएँ, तुम लोगों का विश्वासघात, तुम लोगों की अवज्ञा—इनमें से कौन-सी चीज मेरी नजर से बच सकती है? तुम लोग मेरे साथ अनमने ढंग से पेश आते हो, मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करते हो, मेरा अनादर करते हो, मुझे फुसलाते हो, मुझसे जबरन वसूली करते हो और मुझसे मेरी भेंटें छीन लेते हो—ऐसे बुरे कर्म मेरी सजा से कैसे बचकर निकल सकते हैं? ये सभी बुरे कर्म मेरे खिलाफ तुम लोगों की शत्रुता के प्रमाण हैं और तुम लोगों की मेरे साथ अनुरूपता न होने के प्रमाण हैं। तुम लोगों में से प्रत्येक स्वयं को मेरे बहुत अनुरूप समझता है, परंतु यदि ऐसा होता, तो फिर यह अकाट्य प्रमाण किस पर लागू होगा? तुम लोगों को लगता है कि तुम्हारे अंदर मेरे प्रति उच्चतम सच्चाई और निष्ठा है। तुम लोग सोचते हो कि तुम बहुत ही रहमदिल, बहुत ही करुणामय हो और तुमने मेरे प्रति बहुत समर्पण किया है। तुम लोग सोचते हो कि तुम लोगों ने मेरे लिए पर्याप्त से अधिक किया है। लेकिन क्या तुम लोगों ने कभी इसे अपने कामों से मिलाकर देखा है? मैं कहता हूँ, तुम लोग अत्यंत घमंडी, अत्यंत लालची, अत्यंत लापरवाह हो; और जिन चालबाजियों से तुम लोग मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश करते हो, वे अत्यंत शातिर हैं और तुम लोगों के अत्यंत घृणित इरादे और घृणित तरीके हैं। इसके विपरीत, तुम लोगों की वफादारी बहुत ही थोड़ी है, तुम लोगों में सच्ची भावना बहुत ही कम है और तुम लोग अंतरात्मा से तो पूरी तरह खाली हो। तुम लोगों का दिल बहुत ही दुर्भावनापूर्ण है और तुम किसी को नहीं बख्शते, यहाँ तक कि मुझे भी नहीं। तुम लोग अपने बच्चों या अपने पति की खातिर या अपनी आत्म-रक्षा की खातिर मुझे बाहर निकाल देते हो। तुम लोग जिसकी परवाह करते हो, वह मैं नहीं हूँ—वह तुम लोगों का परिवार, तुम लोगों के बच्चे, तुम लोगों का रुतबा, तुम लोगों का भविष्य और तुम लोगों का सुख है। कब तुम लोगों ने बोलते या कार्य करते समय कभी मेरे बारे में सोचा है? कड़ाके की ठंड के दिनों में तुम लोगों के विचार अपने बच्चों, अपने पति, अपनी पत्नी या अपने माता-पिता की तरफ मुड़ जाते हैं। झुलसाने वाली गर्मी के दिनों में भी तुम सबके विचारों में मेरे लिए कोई स्थान नहीं होता। जब तुम अपना कर्तव्य निभाते हो तब तुम अपने हितों, अपनी व्यक्तिगत सुरक्षा, अपने परिवार के सदस्यों के बारे में ही सोच रहे होते हो। तुमने कभी ऐसा क्या किया है जो मेरे लिए हो? तुमने कब कभी भी मेरे बारे में सोचा है? ऐसा कब हुआ कि तुमने मेरी और मेरे कार्य की खातिर हरसंभव प्रयास किया हो? मेरे साथ तुम्हारी अनुरूपता का प्रमाण कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारी वफादारी की वास्तविकता कहाँ है? मेरे प्रति तुम्हारे समर्पण की वास्तविकता कहाँ है? कब तुम्हारे इरादे मेरा आशीष पाने की खातिर नहीं रहे हैं? तुम सभी लोग मुझे मूर्ख बनाने की कोशिश कर रहे हो। तुम सब मुझे धोखा दे रहे हो। तुम लोग सत्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हो, तुम सत्य के अस्तित्व को छिपा रहे हो और सत्य के सार से विश्वासघात कर रहे हो। यह देखते हुए कि तुम लोग इस तरह मेरे विरुद्ध जाते हो, भविष्य में क्या चीज तुम लोगों की प्रतीक्षा कर रही है? तुम लोग केवल एक अज्ञात परमेश्वर के प्रति अनुरूपता का अनुसरण करते हो और मात्र एक अस्पष्ट विश्वास का अनुसरण करते हो, लेकिन तुम मसीह के अनुरूप नहीं हो। ऐसे बुरे कर्मों के साथ क्या तुम लोग बुरे लोगों के साथ वही दंड नहीं भुगतोगे जिसके तुम लायक हो? उस समय तुम लोगों को एहसास होगा कि जो कोई मसीह के अनुरूप नहीं होता है, वह क्रोध के दिन से बच नहीं सकता, और तुम लोगों को पता चलेगा कि जो मसीह के शत्रु हैं, उन्हें कैसा गंभीर दंड दिया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए

106. तुम लोगों के अनुसरण में, तुम्हारी बहुत ज्यादा व्यक्तिगत धारणाएँ, आशाएँ और संभावनाएँ रहती हैं। अब कार्य इस तरह से किया जाता है कि तुम लोगों की रुतबे की इच्छा और तुम्हारी अत्यधिक इच्छाओं से निपटा जा सके। ये आशाएँ, रुतबे की यह इच्छा और ये धारणाएँ, सभी शैतानी स्वभावों के प्रतीक हैं। लोगों के दिलों में इन चीजों के होने का कारण पूरी तरह से यह है कि शैतान का जहर हमेशा लोगों के विचारों को भ्रष्ट करता रहता है। लोग शैतान के इन प्रलोभनों से खुद को कभी मुक्त नहीं कर पाते और वे पाप के बीच जी रहे हैं, फिर भी नहीं मानते कि यह पाप है। इतना ही नहीं, वे सोचते हैं, “हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें आशीष प्रदान करना चाहिए और हमारे लिए सब कुछ सही ढंग से व्यवस्थित करना चाहिए। हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए हमें दूसरों से श्रेष्ठतर होना चाहिए और हमारे पास दूसरों की तुलना में ऊँचा रुतबा और बेहतर संभावनाएँ होनी चाहिए। चूँकि हम परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, इसलिए उसे हमें असीम आशीष देना चाहिए। अन्यथा इसे परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं कहा जाएगा।” बहुत सालों से जिन विचारों पर लोगों ने अपने अस्तित्व के लिए भरोसा रखा था, वे उनके दिलों को इस स्थिति तक दूषित कर रहे हैं कि वे विश्वासघाती, डरपोक और नीच हो गए हैं। न केवल उनमें इच्छाशक्ति या संकल्प की कमी है, बल्कि वे लालची, अभिमानी और मनमौजी भी हो गए हैं। उनमें स्वयं से परे जाने के संकल्प का पूरी तरह से अभाव है और इन अंधकारपूर्ण प्रभावों के बंधनों से मुक्त होने का तो लेशमात्र भी साहस नहीं है। लोगों के विचार और जीवन इतने सड़ चुके हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के पीछे के उनके परिप्रेक्ष्य अभी भी असहनीय रूप से घिनौने हैं और यहाँ तक कि सुनने में भी पूरी तरह से आपत्तिजनक हैं। लोग पूरी तरह से कायर, शक्तिहीन, नीच और कमजोर हैं। वे अंधकार की शक्तियों से घृणा नहीं करते, वे प्रकाश और सत्य के लिए प्रेम महसूस नहीं करते; इसके बजाय, वे उन्हें निष्कासित करने की पूरी कोशिश करते हैं। क्या तुम लोगों के वर्तमान विचार और परिप्रेक्ष्य ठीक ऐसे ही नहीं हैं? यानी, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें आशीष मिलना चाहिए और यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि तुम्हारा रुतबा कभी न गिरे, यह अविश्वासियों से ऊँचा बना रहे—तुम लोग इस तरह का परिप्रेक्ष्य सिर्फ एक या दो साल से नहीं, बल्कि कई सालों से पाले हुए हो। तुम्हारी लेन-देन वाली सोच बहुत ज्यादा विकसित हो गई है। यद्यपि तुम आज इस पड़ाव पर पहुँच गए हो, फिर भी रुतबे की बात आने पर तुम निश्चिंत नहीं हो पाते; तुम लगातार इसकी ताक-झाँक करते रहते हो और प्रतिदिन इस पर नजर रखते हो, इस गहरे डर के साथ कि कहीं एक दिन तुम्हारा रुतबा छिन न जाए और तुम्हारा नाम खराब न हो जाए। लोगों ने सहूलियत की अपनी अभिलाषा को कभी नहीं छोड़ा। ... जितना अधिक तू इस तरह से अनुसरण करेगा उतना ही कम तू पाएगा। रुतबे के लिए किसी व्यक्ति की अभिलाषा जितनी अधिक होगी, उतनी ही गंभीरता से उसकी काट-छाँट करनी होगी और उसे बड़े शोधन से उतना ही अधिक गुजरना होगा। इस तरह के लोग इतने निकम्मे होते हैं! उन्हें काफी काट-छाँट और न्याय से गुजरना होगा ताकि वे रुतबे की अपनी इच्छा को पूरी तरह छोड़ दें। यदि तुम लोग इसी तरह से अनुसरण करोगे, तो अंत में कुछ भी नहीं पाओगे। जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते वे रूपान्तरित नहीं किए जा सकते और जो सत्य के लिए प्यासे नहीं होते हैं वे सत्य प्राप्त नहीं कर सकते हैं। तू व्यक्तिगत रूपान्तरण का अनुसरण करने और प्रवेश करने पर ध्यान नहीं देता; बल्कि तू हमेशा उन असंयत इच्छाओं और उन चीजों पर ध्यान देता है जो तुझे परमेश्वर से प्रेम करने और उसके करीब आने से रोकती हैं। क्या ये चीजें तुझे रूपान्तरित कर सकती हैं? क्या ये तुझे राज्य में ला सकती हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम विषमता होने के अनिच्छुक क्यों हो?

107. मनुष्य प्रकाश के बीच जीता है, फिर भी वह प्रकाश की बहुमूल्यता से अनभिज्ञ है। वह प्रकाश के सार तथा उसके स्रोत से और इस बात से भी अनजान है कि यह प्रकाश किसका है। जब मैं इंसान को प्रकाश देता हूँ, तो मैं तुरन्त ही लोगों की स्थितियों का अवलोकन करता हूँ : प्रकाश के कारण सभी लोग बदल रहे हैं, पनप रहे हैं और उन्होंने अन्धकार को छोड़ दिया है। मैं ब्रह्माण्ड के हर कोने में नज़र डालकर देखता हूँ और पाता हूँ कि पर्वत कोहरे में समा गए हैं, समुद्र शीत में जम गए हैं, और प्रकाश के आगमन की वजह से लोग पूरब की ओर देखते हैं कि शायद उन्हें कुछ अधिक मूल्यवान मिल जाए—फिर भी वे कोहरे के बीच एक सही दिशा पहचान पाने में असमर्थ रहते हैं। चूँकि सारा संसार कोहरे से आच्छादित है, इसलिए जब मैं बादलों के बीच से देखता हूँ, तो मुझे कोई ऐसा इंसान नज़र नहीं आता जो मेरे अस्तित्व को खोज निकालता हो। इंसान पृथ्वी पर किसी चीज़ की तलाश कर रहा है; वह भोजन की तलाश में घूमता-फिरता हुआ प्रतीत होता है; लगता है उसका इरादा मेरे आने का इन्तज़ार करने का है—फिर भी वह मेरे दिन से अनजान है और वह अक्सर पूर्व में केवल प्रकाश की झिलमिलाहट को ही देख पाता है। मेरे चुने असंख्य लोगों के बीच मैं उन लोगों को खोजता हूँ जो सचमुच मेरे इरादों के अनुकूल हैं। मैं अपने चुने असंख्य लोगों के बीच घूमता-फिरता हूँ, उनके बीच रहता हूँ, लेकिन इंसान पृथ्वी पर सुरक्षित और स्वस्थ है, इसलिए ऐसा कोई नहीं जो मेरे इरादों के अनुकूल हो। लोग नहीं जानते कि मेरे इरादों के प्रति विचारशीलता कैसे दिखाएँ, वे मेरे क्रियाकलापों को नहीं देख पाते, वे प्रकाश के भीतर चल-फिर नहीं पाते और प्रकाश से दीप्त नहीं हो पाते। भले ही इंसान कभी मेरे वचनों को सँजोकर रखता था, वह शैतान की साजिशों की असलियत जानने में असमर्थ है; चूँकि इंसान का आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, इसलिए वह वैसा नहीं कर पाता है जैसा उसका दिल चाहता है। इंसान ने कभी भी मुझसे सच्चे दिल से प्रेम नहीं किया है। जब मैं उसे ऊँचा उठाता हूँ, वह अपने आपको अयोग्य समझता है, लेकिन यह कारण उसे प्रेरित नहीं करता कि वह मुझे संतुष्ट करने की कोशिश करे। वह मात्र उस “रुतबे” को अपने हाथों में पकड़े रहता है जो मैंने उसे दिया है और उसे बारीकी से देखता रहता है; मेरी मनोहरता के प्रति असंवेदनशील रहता है और इसके बजाय रुतबा होने के फायदों में लिप्त रहता है। क्या यह मनुष्य की कमी नहीं है? जब पहाड़ खिसकते हैं तो क्या वे तुम्हारे रुतबे की खातिर तुम्हारे अगल-बगल अपना रास्ता बदल सकते हैं? जब पानी बहता है तो क्या वह मनुष्य के रुतबे के सामने रुक सकता है? क्या मनुष्य के रुतबे के द्वारा आकाश और पृथ्वी पलटे जा सकते हैं? मैंने कभी मनुष्य के प्रति बार-बार दया दिखाई थी—फिर भी किसी ने इसे न सँजोया, न ही अनमोल माना। उन्होंने इसे मात्र एक कहानी की तरह सुना या उपन्यास की तरह पढ़ा। क्या मेरे वचन सचमुच इंसान के हृदय को नहीं छूते हैं? क्या मेरे कथनों का वास्तव में कोई प्रभाव नहीं पड़ता है? क्या ऐसा हो सकता है कि कोई भी मेरे अस्तित्व में विश्वास ही नहीं करता है? इंसान खुद से प्रेम नहीं करता है; बल्कि वह मुझ पर आक्रमण करने के लिए शैतान के साथ मिल जाता है और मेरी सेवा करने के लिए शैतान को एक “परिसम्पत्ति” के रूप में इस्तेमाल करता है। मैं शैतान की सभी साजिशों को भाँप लूँगा, ताकि आज के बाद से पृथ्वी के लोग उसके द्वारा गुमराह न हों और उसके अस्तित्व की वजह से मेरा विरोध न करें।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 22

108. बहुत-से लोग—मेरी पीठ पीछे—रुतबे के लाभों का आनंद लेते हैं; खाने में लिप्त रहते हैं, सोना पसंद करते हैं और वे देह की देखभाल पर पूरा ध्यान देते हैं, हमेशा भयभीत रहते हैं कि देह के बच निकलने का कोई मार्ग नहीं है। वे कलीसिया में अपना कार्य उचित रूप से नहीं करते, पर मुफ्त में कलीसिया से खाते हैं, या फिर मेरे वचनों से अपने भाई-बहनों को उपदेश देते हैं और ऊँचे पायदान से दूसरों को नियंत्रित करते हैं। ये लोग निरंतर कहते रहते हैं कि वे परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने वाले लोग हैं और हमेशा कहते हैं कि वे परमेश्वर के अंतरंग हैं—क्या यह बेतुका नहीं है? यदि तुम्हारी मंशा सही है, पर तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में असमर्थ हो, तो तुम मूर्खतापूर्ण व्यवहार कर रहे हो। किंतु यदि तुम्हारी मंशा सही नहीं है और फिर भी तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर की सेवा करने वाले व्यक्ति हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर का विरोध करता है, और तुम्हें परमेश्वर द्वारा दंडित किया जाना चाहिए! ऐसे लोगों से मुझे कोई सहानुभूति नहीं है! परमेश्वर के घर में वे मुफ्तखोरी करते हैं, हमेशा देह की सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हैं, और परमेश्वर के हितों का कोई विचार नहीं करते हैं। वे हमेशा व्यक्तिगत लाभ ही खोजते हैं और परमेश्वर के इरादों पर कोई ध्यान नहीं देते। वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें परमेश्वर के आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं कर सकते। वे कुटिल और धोखेबाज बनकर हमेशा अपने भाई-बहनों को धोखा देते हैं और वे दोमुँहे होते हैं। वे अंगूर के बाग में एक लोमड़ी की तरह होते हैं जो हमेशा अंगूर चुराती है और बाग को बर्बाद कर देती है। क्या ऐसे लोग परमेश्वर के अंतरंग हो सकते हैं? क्या तुम परमेश्वर के आशीष विरासत में पाने लायक हो? तुम अपने जीवन एवं कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते, क्या तुम परमेश्वर का आदेश लेने के लायक हो? तुम जैसे व्यक्ति पर कौन भरोसा करने की हिम्मत करेगा? जब तुम इस प्रकार से सेवा करते हो तो क्या परमेश्वर तुम्हें कोई अधिक बड़ा काम सौंप सकता है? क्या इससे कार्य में विलंब नहीं होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के इरादों के अनुरूप सेवा कैसे करें

109. अधिकतर लोग परमेश्वर की सेवा करने के लिए शर्तों की बात भी करते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि वह परमेश्वर है या मनुष्य, वे सिर्फ अपनी शर्तों की ही बात करते हैं, और सिर्फ अपनी इच्छाएँ पूरी करने की ही कोशिश करते हैं। जब तुम लोग मेरे लिए खाना पकाते हो तो तुम सेवा शुल्क की माँग करते हो, जब तुम मेरे लिए भाग-दौड़ करते हो तो मुझसे भाग-दौड़ करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम मेरे लिए काम करते हो तो काम करने का शुल्क माँगते हो, जब तुम मेरे कपड़े धोते हो तो कपड़े धोने का शुल्क माँगते हो, जब तुम कलीसिया को आपूर्ति करते हो तो स्वास्थ्य लाभ की लागत माँगते हो, जब तुम बोलते हो तो बोलने का शुल्क माँगते हो, जब तुम पुस्तकें बाँटते हो तो वितरण-शुल्क माँगते हो, और जब तुम लिखते हो तो लिखने का शुल्क माँगते हो। जिन लोगों की मैंने काट-छाँट की है, वे भी मुझसे मुआवजा माँगते हैं, जबकि जिन्हें घर भेज दिया गया है, वे अपने नाम के नुकसान की भरपाई माँगते हैं; जो अविवाहित हैं वे दहेज की या अपनी खोई हुई जवानी के लिए मुआवजे की माँग करते हैं, जो मुर्गा काटते हैं वे कसाई के शुल्क की माँग करते हैं, जो खाना पकाते हैं वे पकाने का शुल्क माँगते हैं, और जो सूप बनाते हैं वे उसके लिए भी भुगतान माँगते हैं...। यह तुम लोगों की ऊँची और शक्तिशाली मानवता है, और ये तुम लोगों की स्नेही अंतरात्मा द्वारा निर्धारित कार्य हैं। तुम लोगों का विवेक कहाँ है? तुम लोगों की मानवता कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ! यदि तुम लोग ऐसे ही करते रहे, तो मैं तुम लोगों के मध्य कार्य करना बंद कर दूँगा। मैं मनुष्य के भेस में जंगली जानवरों के झुंड के बीच कार्य नहीं करूँगा, मैं ऐसे समूह के लोगों के लिए दुःख नहीं सहूँगा जिनका उजला चेहरा जंगली हृदय को छुपाए हुए है, मैं ऐसे जानवरों के झुंड के लिए कष्ट नहीं झेलूँगा जिनके उद्धार की थोड़ी-सी भी संभावना नहीं है। जिस दिन मैं तुम सबसे मुँह मोड़ लूँगा, उसी दिन तुम लोग मर जाओगे, उसी दिन तुम लोगों पर अंधकार छा जाएगा, और उसी दिन प्रकाश द्वारा तुम्हें त्याग दिया जाएगा। मैं तुम लोगों को बता दूँ! मैं तुम लोगों जैसे समूह पर कभी दयालु नहीं बनूँगा, ऐसा समूह जो जानवरों से भी बदतर है! मेरे वचनों और कार्यकलापों की सीमाएँ हैं, और जैसी तुम लोगों की मानवता और अंतरात्मा हैं, उसके चलते मैं और कार्य नहीं करूँगा, क्योंकि तुम लोग अंतरात्मा से नितांत रहित हो, तुम लोगों ने मुझे बहुत अधिक पीड़ा दी है, और तुम लोगों के घृणित व्यवहार से मुझे बहुत घिन आती है! मानवता और अंतरात्मा से रहित ऐसे लोगों को उद्धार का अवसर कभी नहीं मिलेगा; मैं ऐसे हृदयहीन और कृतघ्न लोगों को कभी नहीं बचाऊँगा। जब मेरा दिन आएगा, मैं अनंत काल के लिए विद्रोह के पुत्रों पर अपनी झुलसाने वाली आग की लपटें बरसाऊँगा जिन्होंने एक बार मेरे प्रचंड कोप को भड़काया था, मैं ऐसे जानवरों पर अपना अनंत दंड थोप दूँगा, जिन्होंने कभी मुझे अपशब्द कहे थे और मुझे त्याग दिया था, मैं विद्रोह के पुत्रों को अपने क्रोध की आग में हमेशा के लिए जला दूँगा, जिन्होंने कभी मेरे साथ खाया था और जो मेरे साथ रहे थे परंतु जिन्होंने मुझमें विश्वास नहीं रखा, जिन्होंने मेरा अपमान किया और मुझे धोखा दिया। मैं उन सबको अपनी सजा का भागी बनाऊँगा जिन्होंने मेरे क्रोध को भड़काया, मैं उन सभी जानवरों पर अपना सारा कोप बरसाऊँगा जिन्होंने कभी मेरे समकक्षों के रूप में मेरी बगल में खड़े होने की कामना की थी लेकिन कभी मेरी आराधना नहीं की या मेरे प्रति समर्पण नहीं किया; अपनी जिस छड़ी से मैं मनुष्य को मारता हूँ वह उन जानवरों पर पड़ेगी जिन्होंने कभी मेरी देखभाल और मेरे द्वारा बोले गए रहस्यों का आनंद लिया था और जिन्होंने कभी मुझसे भौतिक आनंद छीनने की कोशिश की थी। मैं ऐसे किसी व्यक्ति को क्षमा नहीं करूँगा, जो मेरा स्थान छीनने की कोशिश करता है; मैं उनमें से किसी को भी नहीं छोड़ूँगा, जो मुझसे खाना और कपड़े हथियाने की कोशिश करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

110. आज तुम लोग जो देखते हो वह मात्र मेरे मुँह की तीखी तलवार है; तुमने मेरे हाथ में छड़ी नहीं देखी है और न ही वह ज्वाला देखी है जिससे मैं मनुष्य को जलाता हूँ। इसी कारण तुम लोग मेरी उपस्थिति में अभी भी अभिमानी और असंयमी हो और इसी कारण तुम लोग अभी भी मेरे घर में मुझसे लड़ते हो, उस बात पर अपनी इंसानी जबान से विवाद करते हो जो मैंने अपने मुँह से कही है। मनुष्य मुझसे नहीं डरता और आज तक उसने मेरे साथ शत्रुता कायम रखी है, अब भी बिल्कुल भय महसूस नहीं करता है। तुम लोगों के मुँह में अधर्मियों की जिह्वा और दाँत हैं। तुम लोगों के शब्द और कर्म उस साँप के समान हैं जिसने हव्वा को पाप करने के लिए बहकाया था। तुम एक-दूसरे से आँख के बदले आँख और दाँत के बदले दाँत की माँग करते हो और मेरी उपस्थिति में तुम अपने लिए पद, प्रतिष्ठा और लाभ झपटने के लिए संघर्ष करते हो, फिर भी तुम लोग नहीं जानते कि मैं तुम्हारे शब्दों और कर्मों को गुप्त रूप से देख रहा हूँ। इससे पहले कि तुम लोग मेरी निगाह में भी आओ, मैंने तुम लोगों के हृदयों की गहराइयों की थाह ले ली है। मनुष्य हमेशा मेरे हाथ की पकड़ से बच निकलना और मेरी आँखों की जाँच-पड़ताल से बचना चाहता है, किंतु मैंने उसके शब्दों या कर्मों को कभी नहीं टाला है। इसके बजाय, मैं उद्देश्यपूर्वक उन शब्दों और कर्मों को अपनी निगाह में आने देता हूँ, ताकि मैं मनुष्य की अधार्मिकता को ताड़ना दे सकूँ और उसके विद्रोहीपन का न्याय कर सकूँ। इस प्रकार, मनुष्य के गुप्त शब्द और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं और मेरा न्याय मनुष्य को छोड़कर कभी नहीं गया है, क्योंकि उसका विद्रोहीपन बहुत ही ज्यादा है। मेरा कार्य मनुष्य के उन सभी शब्दों और कर्मों को जलाना और शुद्ध करना है, जो मेरे आत्मा की उपस्थिति में कहे और किए गए थे। इस तरह से,[क] जब मैं पृथ्वी से चला जाऊँगा, तब भी लोग मेरे प्रति वफादारी बनाए रखेंगे और वे तब भी मेरे कार्य के प्रति वैसे ही पेश आने में सक्षम होंगे जैसे मेरे पवित्र सेवक मेरी सेवा करने में पेश आते हैं और वे पृथ्वी पर मेरे कार्य को उस दिन तक जारी रहने देंगे जब तक यह पूरा न हो जाए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, “इस तरह से” यह वाक्यांश नहीं है।


111. मैं सचमुच उन लोगों की सराहना करता हूँ जो दूसरों पर शक नहीं करते, और मैं सचमुच उन लोगों को पसंद करता हूँ जो सत्य स्वीकारने के लिए तैयार रहते हैं; इन दो प्रकार के लोगों की मैं बहुत परवाह करता हूँ, क्योंकि मेरी नज़र में ये ईमानदार लोग हैं। यदि तुम बहुत धोखेबाज हो, तो तुम सभी लोगों और मामलों के प्रति सतर्क और शंकित रहोगे; इस प्रकार मुझमें तुम्हारी आस्था संदेह की नींव पर निर्मित होगी। मैं इस तरह की आस्था को कभी स्वीकार नहीं कर सकता। सच्चे विश्वास के अभाव में तुम सच्चे प्यार से और भी अधिक वंचित हो। और यदि तुम परमेश्वर पर संदेह भी कर सकते हो और उसके बारे में मनमाने ढंग से अनुमान लगा सकते हो, तो तुम यकीनन सभी लोगों में सबसे अधिक धोखेबाज हो। तुम अनुमान लगाते हो कि क्या परमेश्वर मनुष्य जैसा हो सकता है : अक्षम्य रूप से पापी, क्षुद्र, निष्पक्षता और तर्कसंगतता से विहीन, न्याय की भावना से रहित, कुटिल चालें चलने वाला, कपटी और धूर्त, बुराई और अंधकार में खुश होने वाला, आदि-आदि। क्या लोगों के ऐसे विचारों का कारण यह नहीं है कि उन्हें परमेश्वर का थोड़ा-सा भी ज्ञान नहीं है? ऐसा विश्वास पाप से कम नहीं है! कुछ लोग तो यह तक मानते हैं कि मुझे सिर्फ वही लोग पसंद हैं जो चापलूसी करना और तलवे चाटना जानते हैं और जो लोग ऐसा करना नहीं जानते, वे परमेश्वर के घर में अवांछनीय होंगे और वे वहाँ अपना स्थान खो देंगे। क्या तुम लोगों ने इतने बरसों में बस यही ज्ञान हासिल किया है? क्या तुम लोगों ने यही प्राप्त किया है? और मेरे बारे में तुम लोगों का ज्ञान इन गलतफहमियों पर ही नहीं रुकता; परमेश्वर के आत्मा के खिलाफ तुम्हारी निंदा और स्वर्ग की बदनामी इससे भी बुरी बात है। इसीलिए मैं कहता हूँ कि ऐसी आस्था तुम लोगों को केवल मुझसे दूर भटकाएगी और मेरे प्रति शत्रुता और बढ़ा देगी। कार्य के कई वर्षों के दौरान तुम लोगों ने कई सत्य देखे हैं, किंतु क्या तुम लोग जानते हो कि मेरे कानों ने क्या सुना है? तुम में से कितने लोग सत्य को स्वीकारने के लिए तैयार हैं? तुम सब लोग विश्वास करते हो कि तुम सत्य के लिए कीमत चुकाने को तैयार हो, किंतु तुम लोगों में से कितनों ने वास्तव में सत्य के लिए दुःख झेला है? तुम लोगों के हृदय में अधार्मिकता के सिवाय कुछ नहीं है, जिससे तुम लोगों को लगता है कि हर कोई, चाहे वह कोई भी हो, बराबर से धोखेबाज और कुटिल है—यहाँ तक कि तुम यह भी विश्वास करते हो कि देहधारी परमेश्वर, किसी सामान्य मनुष्य की तरह, दयालु हृदय या कृपालु प्रेम से रहित हो सकता है। इससे भी अधिक, तुम लोग मानते हो कि नेक गुण और दयालु, कृपालु प्रकृति केवल स्वर्ग के परमेश्वर में ही होती है। तुम लोग मानते हो कि ऐसा पवित्र व्यक्ति मौजूद नहीं है, कि केवल अंधकार एवं दुष्टता ही पृथ्वी पर राज करते हैं, जबकि परमेश्वर एक ऐसी चीज़ है, जिसे लोग अच्छाई और सुंदरता के लिए अपने मनोरथ सौंपते हैं, वह उनके द्वारा गढ़ी गई एक काल्पनिक हस्ती है। तुम लोगों के विचार से, स्वर्ग का परमेश्वर बहुत ही खरा, धार्मिक और महान है, आराधना और श्रद्धा के योग्य है, जबकि पृथ्वी का यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर का एक स्थानापन्न और साधन मात्र है। तुम विश्वास करते हो कि यह परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर के समकक्ष नहीं हो सकता, उनका एक-साथ उल्लेख तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता। जब परमेश्वर की महानता और सम्मान की बात आती है, तो वे स्वर्ग के परमेश्वर की महिमा हैं, किंतु जब मनुष्य की प्रकृति और भ्रष्टता की बात आती है, तो ये ऐसी चीजें हैं जिनमें पृथ्वी के परमेश्वर का हिस्सा है। स्वर्ग का परमेश्वर हमेशा उत्कृष्ट है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर हमेशा ही नगण्य, कमजोर और अक्षम है। स्वर्ग के परमेश्वर में दैहिक अनुभूतियाँ नहीं हैं, बल्कि केवल धार्मिकता है, जबकि धरती के परमेश्वर के केवल स्वार्थपूर्ण उद्देश्य हैं और वह निष्पक्षता और तर्कसंगतता से रहित है। स्वर्ग के परमेश्वर में थोड़ी-सी भी कुटिलता नहीं है और वह हमेशा विश्वसनीय है, जबकि पृथ्वी के परमेश्वर में हमेशा बेईमानी का एक पक्ष होता है। स्वर्ग का परमेश्वर मनुष्यों से बहुत प्रेम करता है, जबकि पृथ्वी का परमेश्वर मनुष्य की पर्याप्त परवाह नहीं करता, यहाँ तक कि उसकी पूरी तरह से उपेक्षा करता है। यह भ्रामक ज्ञान तुम लोगों के हृदय में काफी समय से मौजूद रहा है; यह त्रुटिपूर्ण है और तुम लोग आगे भी इसमें लगे रह सकते हो। तुम लोग मसीह के सभी कर्मों पर अधार्मिकता के दृष्टिकोण से विचार करते हो और उसके सभी कार्यों और साथ ही उसकी पहचान और सार का मूल्यांकन दुष्ट के परिप्रेक्ष्य से करते हो। तुम लोगों ने बहुत गंभीर गलती की है और ऐसा काम किया है, जो तुमसे पहले के लोगों ने कभी नहीं किया। अर्थात्, तुम लोगों ने हमेशा अपने सिर पर मुकुट धारण करने वाले स्वर्ग के उस उच्च परमेश्वर की ही सेवा की है, जबकि उस परमेश्वर की कभी “सेवा-टहल” नहीं की जिसे तुम इतना तुच्छ समझते हो कि वह तुम लोगों को दिखाई ही नहीं देता। क्या यह तुम लोगों का पाप नहीं है? क्या यह परमेश्वर के स्वभाव के विरुद्ध तुम लोगों के अपराध का विशिष्ट उदाहरण नहीं है? तुम लोग स्वर्ग के परमेश्वर को पूरे उत्साह से पूजते हो। तुम उत्कृष्ट छवियों का गहराई से आदर करते हो और असाधारण वाक्पटुता वाले लोगों की बहुत तारीफ करते हो। तुम उस परमेश्वर का आदेश मानने के लिए पूरी तरह से तैयार रहते हो जो तुम्हारे हाथ धन-दौलत से भर देता है और तुम उस परमेश्वर के लिए बहुत अधिक लालायित रहते हो जो तुम्हारी हर इच्छा पूरी कर सकता है। तुम केवल इस परमेश्वर की आराधना नहीं करते, जो ऊँचा नहीं है; तुम केवल इस परमेश्वर के साथ जुड़ने से घृणा करते हो, जिसे कोई मनुष्य ऊँची नज़र से नहीं देखता। तुम केवल इस परमेश्वर के लिए कार्य करने के अनिच्छुक हो, जिसने तुम्हें कभी एक पैसा नहीं दिया है, और जो तुम्हें अपने लिए लालायित करवाने में असमर्थ है, वह केवल यह अनाकर्षक परमेश्वर ही है। यह परमेश्वर तुम्हें अपनी नज़र का दायरा बढ़ाने में, तुम्हें खज़ाना मिल जाने का एहसास कराने में सक्षम नहीं बना सकता, तुम्हारी इच्छा पूरी तो बिल्कुल नहीं कर सकता। तो फिर तुम उसका अनुसरण क्यों करते हो? क्या तुमने कभी इस तरह के प्रश्न पर विचार किया है? तुम जो करते हो, वह केवल इस मसीह को ही नाराज़ नहीं करता, बल्कि, इससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से, वह स्वर्ग के परमेश्वर को नाराज़ करता है। मेरे विचार से परमेश्वर पर तुम लोगों के विश्वास का यह उद्देश्य नहीं है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पृथ्वी के परमेश्वर को वास्तव में कैसे जानें

112. बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने के बजाय नरक में डाले जाना पसंद करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनसे निपटने के लिए मेरे पास अन्य तरीके भी तैयार हैं। बेशक मैं अच्छी तरह से जानता हूँ कि तुम लोगों के लिए ईमानदार लोग होना कितना मुश्किल है। चूँकि तुम सभी बहुत “चतुर” हो, अपनी घटिया मानसिकता के आधार पर, उच्च नैतिक चरित्र वाले लोगों के हृदय का मूल्यांकन करने में बहुत अच्छे हो, इससे मेरा कार्य और आसान हो जाता है। और चूँकि तुममें से हरेक अपने भेदों को अपने सीने में भींचकर रखता है, तो ठीक है, मैं तुम लोगों को एक-एक करके आपदा में डाल दूँगा जिससे कि अग्नि तुम्हें “सबक सिखाए,” ताकि उसके बाद तुम मेरे वचनों पर अडिग विश्वास रखने लगो। अंततः, मैं तुम लोगों के मुँह से ये शब्द निकलवा लूँगा—“परमेश्वर एक विश्वासयोग्य परमेश्वर है,” तब तुम लोग अपनी छाती पीटोगे और विलाप करोगे, “इंसान का हृदय कितना कपटी है!” उस समय तुम्हारी मनोस्थिति क्या होगी? निश्चित रूप से तुम घमंड में उतना नहीं बहोगे जितना तुम अभी बहते हो! और तुम लोग अब की तुलना में इतने “गहन और गूढ़” तो और भी कम होगे। कुछ लोग परमेश्वर की उपस्थिति में नियम-निष्ठ और उचित शैली में व्यवहार करते हैं, वे विशेष रूप से “शिष्ट व्यवहार” करते हैं, फिर भी आत्मा की उपस्थिति में वे अपने दाँत और पंजे दिखाने लगते हैं। क्या तुम लोग ऐसे इंसानों को ईमानदार लोगों की श्रेणी में गिनोगे? यदि तुम पाखंडी और ऐसे व्यक्ति हो जो “व्यक्तिगत संबंधों” में कुशल है तो मैं कहता हूँ कि तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर से खिलवाड़ करने का प्रयास करता है। यदि तुम्हारी बातें बहानों और बेकार तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने में अनिच्छुक है। यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने रहस्य यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ

113. मैं गहराई से उस धोखेबाजी को समझता हूँ, जो तुम लोगों के दिल में मौजूद है; तुममें से अधिकतर लोग केवल जिज्ञासावश मेरा अनुसरण करते हैं और अपने खालीपन के कारण मेरी खोज में आए हैं। जब तुम लोगों की तीसरी इच्छा—एक शांतिपूर्ण और सुखी जीवन जीने की इच्छा—टूट जाती है, तो तुम लोगों की जिज्ञासा भी गायब हो जाती है। तुम लोगों में से प्रत्येक के दिल के भीतर मौजूद धोखेबाजी तुम्हारे शब्दों और कर्मों के माध्यम से उजागर होती है। स्पष्ट कहूँ तो, तुम लोग मेरे बारे में केवल उत्सुक हो, मुझसे भयभीत नहीं हो; तुम लोग अपनी जीभ पर काबू नहीं रखते और अपने व्यवहार को तो और भी कम नियंत्रित करते हो। तो तुम लोगों का विश्वास आखिर कैसा है? क्या यह वास्तविक है? तुम लोग सिर्फ अपनी चिंताएँ दूर करने और अपनी ऊब मिटाने के लिए, अपने जीवन में मौजूद खालीपन को भरने के लिए मेरे वचनों का उपयोग करते हो। तुम लोगों में से कौन मेरे वचनों को अभ्यास में लाया है? वास्तविक विश्वास किसे है? तुम लोग चिल्लाते रहते हो कि परमेश्वर ऐसा परमेश्वर है जो लोगों के अंतर्तम हृदयों का अवलोकन करता है, परंतु जिस परमेश्वर के बारे में तुम अपने दिलों में चिल्लाते रहते हो, उसकी मेरे साथ क्या अनुरूपता है? जब तुम लोग इस तरह से चिल्ला रहे हो, तो फिर वैसे कार्य क्यों करते हो? क्या ऐसा हो सकता है कि यही वह प्रेम है जो तुम लोग मुझे प्रतिफल में चुकाना चाहते हो? तुम लोगों के होंठों पर ढेर सारा समर्पण है, लेकिन तुम लोगों के बलिदान और अच्छे कर्म कहाँ हैं? अगर तुम्हारे शब्द मेरे कानों तक न पहुँचते, तो मैं तुम लोगों से इतनी नफरत कैसे कर पाता? यदि तुम लोग वास्तव में मुझ पर विश्वास करते, तो तुम ऐसी शर्मनाक अवस्था में कैसे पड़ सकते थे? तुम लोगों के चेहरों पर ऐसे उदासी छाई है, मानो तुम रसातल में कोई मुकदमा झेल रहे हो। तुम लोगों के पास जीवन-शक्ति का एक कण भी नहीं है, और तुम अपने अंदर की आवाज के बारे में क्षीणता से बात करते हो; यहाँ तक कि तुम शिकायतों और शापों से भी भरे हुए हो। मैं जो करता हूँ, उसमें तुम लोगों ने बहुत पहले ही अपना विश्वास खो दिया था, यहाँ तक कि तुम्हारा मूल विश्वास भी गायब हो गया है, इसलिए तुम अंत तक संभवतः कैसे अनुसरण कर सकते हो? ऐसी स्थिति में तुम लोगों को कैसे बचाया जा सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, युवा और वृद्ध लोगों के लिए वचन

114. हालाँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर से रहित है, और वह अनजान है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम करे, न ही वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, क्योंकि उसका हृदय कभी भी परमेश्वर के नज़दीक नहीं आता है और वह हमेशा परमेश्वर से बचता है। परिणामस्वरूप, मनुष्य का हृदय परमेश्वर से दूर है। तो उसका हृदय कहाँ है? वास्तव में, मनुष्य का हृदय कहीं गया नहीं है : इसे परमेश्वर को देने के बजाय या इसे परमेश्वर के देखने के लिए प्रकट करने के बजाय, उसने इसे स्वयं के लिए रख लिया है। यह इस तथ्य के बावज़ूद है कि कुछ लोग प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते और कहते हैं, “हे परमेश्वर, मेरे हृदय पर दृष्टि डाल—जो मैं सोचता हूँ तू वह सब कुछ जानता है,” और कुछ लोग तो परमेश्वर को अपने ऊपर दृष्टि डालने देने की सौगंध खाते हैं, कि यदि वे अपनी सौगंध तोड़ें तो उन्हें दण्ड दिया जाए। यद्यपि मनुष्य परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर झाँकने देता है, फिर भी इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने में सक्षम है, न ही यह कि उसने अपना भाग्य और संभावनाएँ और अपना सर्वस्व परमेश्वर के नियंत्रण के अधीन छोड़ दिया है। इस प्रकार, तुम परमेश्वर के समक्ष चाहे जो सौगंध खाओ या चाहे जो घोषणा करो, परमेश्वर की नज़रों में तुम्हारा हृदय अब भी उसके प्रति बंद है, क्योंकि तुम परमेश्वर को अपने हृदय के भीतर केवल झाँकने देते हो किंतु इसे नियंत्रित करने की अनुमति उसे नहीं देते हो। दूसरे शब्दों में, तुमने अपना हृदय परमेश्वर को थोड़ा भी दिया ही नहीं है, और केवल परमेश्वर को सुनाने के लिए अच्छे लगने वाले शब्द बोलते हो; इस बीच, तुम अपने षडयंत्रों, कुचक्रों और मनसूबों के साथ-साथ अपने छल-कपट से भरे नानाविध मंतव्य भी परमेश्वर से छिपा लेते हो, और तुम अपनी संभावनाओं और भाग्य को अपने हाथों में जकड़ लेते हो, इस गहरे डर से कि परमेश्वर उन्हें ले लेगा। इस प्रकार, परमेश्वर कभी अपने प्रति मनुष्य की शुद्ध हृदयता नहीं देखता है। यद्यपि परमेश्वर मनुष्य के हृदय की गहराइयों को ध्यान से देखता है, और देख सकता है कि मनुष्य अपने हृदय में क्या सोच रहा है और क्या करना चाहता है, और देख सकता है कि उसके हृदय के भीतर कौन-सी चीजें रखी हैं, किंतु मनुष्य का हृदय परमेश्वर का नहीं है, उसने उसे परमेश्वर के नियंत्रण में नहीं सौंपा है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर को अवलोकन का अधिकार है, किंतु उसे नियंत्रण का अधिकार नहीं है। अपनी व्यक्तिपरक चेतना में मनुष्य अपने लिए परमेश्वर को आयोजन नहीं करने देना चाहता, न ही उसका ऐसा कोई इरादा है। मनुष्य ने न केवल स्वयं को परमेश्वर से बंद कर लिया है, बल्कि ऐसे भी लोग हैं जो एक मिथ्या धारणा बनाने और परमेश्वर का भरोसा प्राप्त करने, और परमेश्वर से अपना असली चेहरा छिपाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों और चापलूसी का उपयोग करके अपने हृदयों को ढँक लेने के तरीकों के बारे में सोचते हैं। परमेश्वर को देखने नहीं देने में उनका उद्देश्य परमेश्वर को यह जानने-समझने नहीं देना है कि वे वास्तव में कैसे हैं। वे परमेश्वर को अपने हृदय देना नहीं चाहते, बल्कि उन्हें स्वयं के लिए रखना चाहते हैं। इसका निहितार्थ यह है कि मनुष्य जो करता है और वह जो चाहता है, उन सब का नियोजन, आकलन, और निर्णय स्वयं मनुष्य द्वारा किया जाता है; उसे परमेश्वर की भागीदारी या हस्तक्षेप की आवश्यकता नहीं है, परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं की आवश्यकता तो और भी नहीं है। इस प्रकार, बात चाहे परमेश्वर की आज्ञाओं, उसके आदेश, या परमेश्वर द्वारा मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाओं से संबंधित हो, मनुष्य के निर्णय उसके अपने मंतव्यों और हितों पर, उस समय की उसकी अपनी अवस्था और परिस्थितियों पर आधारित होते हैं। मनुष्य को जो मार्ग अपनाना चाहिए उसे परखने और चुनने के लिए वह अपने पास मौजूद ज्ञान और अनुभवों और अपनी प्रज्ञा का उपयोग करता है और परमेश्वर को हस्तक्षेप या नियंत्रण नहीं करने देता है। यही वह मनुष्य का हृदय है जिसे परमेश्वर देखता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

115. बहुत से लोग मुझसे सच में प्रेम करना चाहते हैं, किन्तु क्योंकि उनके हृदय उनके स्वयं के नहीं हैं, इसलिए उनका स्वयं पर कोई नियंत्रण नहीं है। बहुत से लोग मेरे द्वारा दिए गए परीक्षणों का अनुभव कर सच में मुझसे प्रेम करते हैं, फिर भी वे यह समझने में अक्षम हैं कि मैं वास्तव में विद्यमान हूँ, और मात्र खालीपन में मुझसे प्रेम करते हैं, ना कि मेरे वास्तविक अस्तित्व के कारण। बहुत से लोग अपने हृदय मेरे सामने रखते हैं और फिर उन पर कोई ध्यान नहीं देते, और इस प्रकार शैतान को जब भी अवसर मिलता है उनके हृदय उसके द्वारा छीन लिए जाते हैं, और तब वे मुझे छोड़ देते हैं। जब मैं अपने वचनों को प्रदान करता हूँ तो बहुत से लोग मुझसे सच में प्रेम करते हैं, मगर मेरे वचनों को अपनी आत्मा में सँजोते नहीं हैं; उसके बजाय वे उनका सार्वजनिक संपत्ति की तरह यूँ ही उपयोग करते हैं और जब उनका मन होता है, तब उन्हें वापस वहीं फेंक देते हैं जहाँ से वे आए थे। सभी लोग दर्द के बीच मुझे खोजते हैं, और परीक्षणों के बीच मेरी ओर देखते हैं; शांति के समय वे मेरा आनंद उठाते हैं, संकट के समय वे मुझे नकारते हैं, जब वे व्यस्त होते हैं मुझे भूल जाते हैं और अपने फुर्सत के समय में वे मुझसे निपटने के लिए कुछ लापरवाही से प्रयास करते हैं। और फिर भी किसी ने भी अपने संपूर्ण जीवन भर मुझसे प्रेम नहीं किया है। मैं चाहता हूँ कि लोग मेरे सम्मुख ईमानदार हों। मैं नहीं कहता कि वे मुझे कोई चीज़ दें, बस इतना ही कहता हूँ कि वे सभी मुझे गंभीरता से लें, कि, मुझे फुसलाने के बजाए, वे बदले में मुझे अपनी ईमानदारी प्राप्त करने दें। मेरी प्रबुद्धता, मेरी रोशनी और मेरे हृदय का रक्त सभी लोगों के बीच व्याप्त है, लेकिन साथ ही मनुष्य के प्रत्येक कार्य का वास्तविक तथ्य और मेरे प्रति उनका धोखा भी सभी लोगों के बीच व्याप्त है। यह ऐसा है मानो मनुष्य के धोखे के अवयव उसके गर्भ में आने के समय से ही उसके साथ रहे हैं, मानो उसने चालबाजी के विशेष कौशल जन्म से ही धारण कर रखे हैं। इसके अलावा, उसने कभी भी इरादों को प्रकट नहीं किया है; किसी ने भी कभी इन चालबाजियों के कौशलों के स्रोत की असलियत नहीं देखी है। परिणामस्वरूप, मनुष्य धोखे का एहसास किए बिना इसके बीच रहता है, और यह ऐसा है मानो वह अपने आपको क्षमा कर देता है, मानो यह उसके द्वारा मुझे जानबूझ कर दिए गए धोखे के बजाए परमेश्वर की व्यवस्था है। क्या यह मनुष्य का मुझसे धोखे का वास्तविक स्रोत नहीं है? क्या यह उसकी चाल नहीं है? मैं कभी भी मनुष्य की झूठी मीठी बातों से संभ्रमित नहीं हुआ हूँ, क्योंकि मैंने बहुत पहले ही उसके सार को जान लिया था। कौन जानता है कि उसके खून में कितनी गंदगी है, और शैतान का कितना ज़हर उसकी मज्जा में है? यह हर गुजरते दिन के साथ बढ़ता जाता है और मनुष्य इसका अभ्यस्त हो जाता है। उसे शैतान की पीड़ाओं का बिल्कुल भी एहसास नहीं होता और इस प्रकार “स्वस्थ अस्तित्व की कला” जानने का उसका मन ही नहीं होता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 21

116. समस्त मनुष्य आत्मज्ञान से रहित प्राणी हैं, और वे स्वयं को जानने में असमर्थ हैं। फिर भी, वे अन्य सभी को बहुत करीब से जानते हैं, मानो दूसरों के द्वारा की और कही गई हर चीज़ का “निरीक्षण” पहले उन्होंने ही ठीक उन्हीं के सामने किया हो और करने से पहले उनका अनुमोदन प्राप्त किया गया हो। परिणामस्वरूप, ऐसा लगता है, मानो उन्होंने अन्य सभी की, उनकी मनोवैज्ञानिक अवस्थाओं तक, पूरी नाप-तौल कर ली हो। सभी मनुष्य ऐसे ही हैं। भले ही उन्होंने राज्य के युग में प्रवेश कर लिया है, परंतु उनका स्वभाव अपरिवर्तित बना हुआ है। वे मेरे सामने अब भी वैसा ही करते हैं, जैसा मैं करता हूँ, परंतु मेरी पीठ पीछे वे अपने विशिष्ट “व्यापार” में संलग्न होना आरंभ कर देते हैं। लेकिन बाद में जब वे मेरे सम्मुख आते हैं, तो वे पूर्णतः भिन्न व्यक्तियों के समान होते हैं, प्रत्यक्षतः शांत और अविचलित, प्रकृतिस्थ चेहरे और संतुलित धड़कन के साथ। क्या वास्तव में यही चीज़ मनुष्यों को हेय नहीं बनाती? बहुत-से लोग दो पूर्णतः भिन्न चेहरे रखते हैं—एक जब वे मेरे सामने होते हैं, और दूसरा जब वे मेरी पीठ पीछे होते हैं। उनमें से कई लोग मेरे सामने नवजात मेमने के समान आचरण करते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे भयानक शेरों में बदल जाते हैं, और बाद में वे पहाड़ी पर आनंद से उड़ती छोटी चिड़ियों के समान व्यवहार करते हैं। बहुत-से लोग मेरे सामने उद्देश्य और संकल्प प्रदर्शित करते हैं। बहुत-से लोग प्यास और लालसा के साथ मेरे वचनों की तलाश करते हुए मेरे सामने आते हैं, किंतु मेरी पीठ पीछे वे उनसे अरुचि महसूस करते हैं और उन्हें त्याग देते हैं, मानो मेरे कथन कोई बोझ हों। मैंने कई बार अपने शत्रु द्वारा भ्रष्ट की गई मनुष्यजाति को देखकर उससे आशा रखना छोड़ा है। कई बार मैंने उन्हें रो-रोकर क्षमा माँगते हुए अपने सामने आता देखकर, उनमें आत्मसम्मान के अभाव और उनकी अड़ियल असाध्यता के कारण, क्रोधवश उनके कार्यों के प्रति अपनी आँखें बंद कर ली हैं, यहाँ तक कि उस समय भी, जब उनका हृदय सच्चा और अभिप्राय ईमानदार होता है। कई बार मैंने लोगों को अपने साथ सहयोग करने के लिए पर्याप्त आत्मविश्वास से भरा देखा है, जो मेरे सामने, मेरे आगोश में, उसकी गर्माहट का स्वाद लेते प्रतीत होते हैं। कई बार, अपने चुने हुए लोगों का भोलापन, उनकी जीवंतता और मनोहरता देखकर क्यों नहीं मैं अपने हृदय में इन चीज़ों का खूब आनंद ले पाता। मनुष्य मेरे हाथों में अपने पूर्वनियत आशीषों का आनंद लेना नहीं जानते, क्योंकि वे यह नहीं समझते कि “आशीषों” या “पीड़ा”, दोनों का ठीक-ठीक क्या तात्पर्य है। इस प्रकार लोग मेरा अनुसरण करने में सच्चे नहीं हैं। यदि आने वाला कल नहीं होता, तो मेरी उपस्थिति में तुम लोगों में से कौन गिरती हुई बर्फ जैसा शुद्ध और हरिताश्म जैसा बेदाग होता? क्या ऐसा हो सकता है कि मेरे प्रति तुम लोगों के प्रेम का सौदा स्वादिष्ट भोजन या उत्तम दर्जे के कपड़े के सूट या उच्च पद या शानदार वेतन के बदले किया जाए? क्या इसका सौदा उस प्रेम के बदले किया जा सकता है जो दूसरे तुम्हारे लिए रखते हैं? क्या वास्तव में ऐसा हो सकता है कि परीक्षणों से गुजरना लोगों से मेरे प्रति उनके प्रेम को छुड़वा देगा? या क्या कष्ट और क्लेश मेरी व्यवस्थाओं के बारे में उनसे शिकायत करवाएंगे? मेरे मुख में स्थित धारदार तलवार को कभी किसी ने वास्तव में समझा नहीं है : वे वास्तव में इसका सच्चा अर्थ समझे बिना केवल इसका सतही अर्थ जानते हैं। यदि मनुष्य वास्तव में मेरी तलवार की धार देखने में सक्षम होते, तो वे चूहों की तरह तेजी से दौड़कर अपने बिलों में घुस जाते। अपने सुन्नपन के कारण मनुष्य मेरे वचनों का कुछ भी सच्चा अर्थ नहीं जानते हैं, और इसलिए वे नहीं जानते हैं कि मेरे कथन कितने विकट हैं या वे मनुष्य की प्रकृति को कितना उजागर करते हैं और उन वचनों द्वारा उनकी भ्रष्टता का कितना न्याय हुआ है। इस प्रकार, मेरे वचनों के प्रति अपनी अधूरी समझ के फलस्वरूप अधिकतर लोगों ने उदासीन रवैया अपना लिया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 15

117. युगों-युगों से, बहुत-से लोग निराश होकर, और अनिच्छा से, इस संसार से चले गए हैं, और बहुत-से लोग आशा और आस्था के साथ इसमें आए हैं। मैंने बहुतों के आने की व्यवस्था की है, और बहुतों को दूर भेजा है। अनगिनत लोग मेरे हाथों से होकर गुज़रे हैं। बहुत-सी आत्माएँ रसातल में डाल दी गई हैं, बहुतों ने देह में जीवन जिया है, और बहुत-सी मर गईं और पृथ्वी पर पुनः जन्मी हैं। परंतु उनमें से किसी को भी आज राज्य के आशीषों का आनंद उठाने का अवसर नहीं मिला। मैंने मनुष्य को इतना अधिक दिया है, फिर भी उसने कम ही कुछ प्राप्त किया है; शैतान की शक्तियों के आक्रमण की वजह से वह मेरी सारी संपदा का आनंद उठा पाने में असमर्थ हो गया है। उसके पास केवल उन्हें देखने का सौभाग्य ही है, किंतु वह उनका पूरा आनंद कभी नहीं उठा पाया। मनुष्य ने स्वर्ग की धन-संपत्ति पाने के लिए अपने शरीर के ख़ज़ाने के भंडार की खोज कभी नहीं की, और इसलिए उसने वे आशीष गँवा दिए जो मैंने उसे दिए थे। क्या मनुष्य का आत्मा बिल्कुल वही अंग नहीं है जो उसे मेरे आत्मा से जोड़ता है? क्यों मनुष्य ने कभी मुझसे अपनी आत्मा के द्वारा मेलजोल नहीं किया है? ऐसा क्यों है कि वह देह में मेरे करीब आता है, किंतु आत्मा में ऐसा नहीं कर पाता है? क्या मेरा सच्चा चेहरा देह है? मनुष्य मेरा सार क्यों नहीं जानता? क्या मनुष्य की आत्मा में सचमुच कभी मेरी कोई छाप नहीं रही है? क्या मैं मनुष्य की आत्मा से पूरी तरह लुप्त हो चुका हूँ? यदि मनुष्य आध्यात्मिक क्षेत्र में प्रवेश नहीं करता, तो वह मेरे इरादों को कैसे समझ सकता है? मनुष्य की दृष्टि में, क्या वहाँ वह है जो सीधे आध्यात्मिक क्षेत्र को बेध सके? कई बार ऐसा हुआ कि मैंने अपने आत्मा से मनुष्य को पुकारा है, फिर भी मनुष्य ऐसे व्यवहार करता है मानो मैंने उसे डँक मार दिया हो, दूर से मुझे देखते हुए, अत्यधिक डर से कि मैं उसे किसी और संसार में ले जाऊँगा। कई बार ऐसा हुआ कि मैंने मनुष्य की आत्मा में पूछताछ की, फिर भी वह अनजान बना रहता है, गहराई से भयभीत कि मैं उसके घर में घुस जाऊँगा और अवसर का लाभ उठाकर उसका सारा सामान छीन लूँगा। इस प्रकार, वह मुझे बाहर रोक देता है, वहाँ छोड़ देता है जहाँ मेरे सामने एक ठंडे, कसकर बंद दरवाज़े के सिवा कुछ नहीं होता। कई बार ऐसा हुआ कि मनुष्य गिर गया है और मैंने उसे बचाया है, फिर भी वह जागने के बाद तुरंत मुझे छोड़ देता है और, मेरी प्रेमपूर्ण उदारता से अनछुआ, चौकन्नी नज़र से मुझे देखता है; मनुष्य के हृदय को मैंने कभी गरमाया नहीं है। मनुष्य भावनाहीन है, ठंडे खून वाला पशु है। मेरे आलिंगन की गरमाहट में भी वह इससे कभी गहराई से द्रवित नहीं हुआ है। मनुष्य पहाड़ी बनैले इंसान के समान है। उसने मानवजाति के प्रति मेरे दुलार को कभी संजोकर नहीं रखा है। वह मेरे पास आने से आनाकानी करता है, और पहाड़ों के बीच रहना पसंद करता है, जहाँ वह जंगली जानवरों का खतरा झेलता है—फिर भी वह मुझमें शरण लेने का अनिच्छुक है। मैं किसी मनुष्य को बाध्य नहीं करता हूँ : मैं बस अपना कार्य करता हूँ। वह दिन आएगा जब मनुष्य शक्तिशाली महासागर के बीच से तैरकर मेरी तरफ आ जाएगा, ताकि वह पृथ्वी पर सकल संपदा का आनंद उठाए और समुद्र के द्वारा निगले जाने का जोखिम पीछे छोड़ दे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 20

118. तुम लोगों का विश्वास बहुत सुंदर है; तुम्हारा कहना है कि तुम अपना सारा जीवन-काल मेरे कार्य के लिए खपाने को तैयार हो, और तुम इसके लिए अपने प्राणों का बलिदान करने को तैयार हो, लेकिन तुम्हारे स्वभाव में अधिक बदलाव नहीं आया है। तुम लोग बस घमंड से बोलते हो, बावजूद इस तथ्य के कि तुम्हारा वास्तविक व्यवहार बहुत दयनीय है। यह ऐसा है जैसे कि लोगों की जीभ और होंठ तो स्वर्ग में हों, लेकिन उनके पैर बहुत नीचे पृथ्वी पर हों, परिणामस्वरूप उनके वचन और कर्म तथा उनकी प्रतिष्ठा अभी भी चिथड़ा-चिथड़ा और विध्वस्त हैं। तुम लोगों की प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है, तुम्हारा ढंग निम्नस्तरीय है, तुम्हारे बोलने का तरीका निम्न कोटि का है, तुम्हारा जीवन घृणित है; यहाँ तक कि तुम्हारी सारी मनुष्यता नीच अधमता की है। तुम दूसरों के प्रति संकीर्ण सोच रखते हो और छोटी-छोटी बात पर बखेड़ा करते हो। तुम अपनी प्रतिष्ठा और हैसियत को लेकर इस हद तक झगड़ते हो कि नरक और आग की झील में उतरने तक को तैयार रहते हो। तुम लोगों के वर्तमान वचन और कर्म मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी हैं कि तुम लोग पापी हो। मेरे कार्य के प्रति तुम लोगों का रवैया मेरे लिए यह तय करने के लिए काफी है कि तुम लोग अधर्मी हो, और तुम लोगों के समस्त स्वभाव यह इंगित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोग गंदी आत्माएँ हो, जो घृणित चीजों से भरी हैं। तुम लोगों की अभिव्यक्तियाँ और जो कुछ भी तुम प्रकट करते हो, वह यह कहने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम वे लोग हो, जिन्होंने अशुद्ध आत्माओं का पेट भरकर रक्त पी लिया है। जब स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का जिक्र होता है, तो तुम लोग अपनी भावनाएँ जाहिर नहीं करते। क्या तुम लोग मानते हो कि तुम्हारा मौजूदा ढंग तुम्हें मेरे स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश कराने के लिए पर्याप्त है? क्या तुम लोग मानते हो कि तुम मेरे कार्य और वचनों की पवित्र भूमि में प्रवेश पाने की अनुमति प्राप्त कर सकते हो, इससे पहले कि मैं तुम लोगों के वचनों और कर्मों का परीक्षण करूँ? कौन है, जो मेरी आँखों में धूल झोंक सकता है? तुम लोगों का घृणित, नीच व्यवहार और बातचीत मेरी दृष्टि से कैसे छिपे रह सकते हैं? तुम लोगों के जीवन मेरे द्वारा उन अशुद्ध आत्माओं का रक्त और मांस पीने और खाने वालों के जीवन के रूप में तय किए गए हैं, क्योंकि तुम लोग रोज़ाना मेरे सामने उनका अनुकरण करते हो। मेरे सामने तुम्हारा व्यवहार विशेष रूप से ख़राब और नीचतापूर्ण रहा है, तो मैं तुम्हें घिनौना कैसे न समझता? तुम्हारे शब्दों में अशुद्ध आत्माओं की अपवित्रताएँ है : तुम फुसलाते हो, भेद छिपाते हो चापलूसी करते हो, ठीक उन लोगों की तरह जो टोने-टोटकों में संलग्न रहते हैं और उनकी तरह भी जो कपट करते हैं और अधर्मियों का खून पीते हैं। मनुष्य की समस्त अभिव्यक्तियाँ बेहद अधार्मिक हैं, तो फिर सभी लोगों को पवित्र भूमि में कैसे रखा जा सकता है, जहाँ धर्मी रहते हैं? क्या तुम्हें लगता है कि तुम्हारा यह घिनौना व्यवहार तुम्हें उन अधर्मी लोगों से पवित्र ठहराकर अलग कर देता है? तुम्हारी साँप जैसी जीभ अंततः तुम्हारी इस देह का नाश कर देगी, जो तबाही बरपाती है और घृणापूर्ण कार्य करती है, और तुम्हारे वे हाथ भी, जो अशुद्ध आत्माओं के रक्त से सने हैं, अंततः तुम्हारी आत्मा को नरक में खींच लेंगे। तो फिर तुम मैल से सने अपने हाथों को साफ़ करने का यह मौका क्यों नहीं लपकते? और तुम अधर्मी शब्द बोलने वाली अपनी इस जीभ को काटकर फेंकने के लिए इस अवसर का लाभ क्यों नहीं उठाते? कहीं ऐसा तो नहीं कि तुम अपने हाथों, जीभ और होंठों के लिए नरक की आग में जलने के लिए तैयार हो? मैं तमाम लोगों के हृदयों की अपनी दोनों आँखों से पड़ताल करता हूँ, क्योंकि मानव-जाति के निर्माण से बहुत पहले मैंने उनके दिलों को अपने नियंत्रण में ले लिया था। मैंने बहुत पहले लोगों के दिलों की असलियत जान ली थी, इसलिए उनके विचार मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते थे? मेरे आत्मा की आग से जलने से बचने के लिए उनके पास अभी भी समय कैसे हो सकता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

119. तुम्हारे होंठ कबूतरों से अधिक दयालु हैं, लेकिन तुम्हारा दिल पुराने साँप से ज्यादा भयानक है। तुम्हारे होंठ लेबनानी महिलाओं जितने सुंदर हैं, लेकिन तुम्हारा दिल उनकी तरह दयालु नहीं है, और कनानी लोगों की सुंदरता से तुलना तो वह निश्चित रूप से नहीं कर सकता। तुम्हारा दिल बहुत कपटी है! जिन चीज़ों से मुझे घृणा है, वे केवल अधर्मी के होंठ और उनके दिल हैं, और लोगों से मैं यह अपेक्षा नहीं करता कि वे पवित्र जनों से आगे निकल जाएँ; बात बस इतनी है कि मुझे अधर्मियों के बुरे कर्मों से घृणा महसूस होती है, और मुझे उम्मीद है कि वे अपनी मलिनता त्याग पाएँगे और अपनी मौजूदा दुर्दशा से बच सकेंगे, ताकि वे उन अधर्मी लोगों से अलग खड़े हो सकें और उन लोगों के साथ रह सकें और पवित्र हो सकें, जो धर्मी हैं। तुम लोग उन्हीं परिस्थितियों में हो जिनमें मैं हूँ, लेकिन तुम लोग मैल से ढके हो; तुम्हारे पास उन मनुष्यों की मूल समानता का छोटे से छोटा अंश भी नहीं है, जिन्हें शुरुआत में बनाया गया था। इतना ही नहीं, चूँकि तुम लोग रोज़ाना उन अशुद्ध आत्माओं की नकल करते हो, और वही करते हो जो वे करती हैं और वही कहते हो जो वे कहती हैं, इसलिए तुम लोगों के समस्त अंग—यहाँ तक कि तुम लोगों की जीभ और होंठ भी—उनके गंदे पानी से इस क़दर भीगे हुए हैं कि तुम लोग पूरी तरह से दाग़ों से ढँके हुए हो, और तुम्हारा एक भी अंग ऐसा नहीं है जिसका उपयोग मेरे कार्य के लिए किया जा सके। यह बहुत हृदय-विदारक है! तुम लोग घोड़ों और मवेशियों की ऐसी दुनिया में रहते हो, फिर भी तुम लोगों को वास्तव में परेशानी महसूस नहीं होती; तुम लोग आनंद से भरे हुए हो और आज़ादी तथा आसानी से जीते हो। तुम लोग उस गंदे पानी में तैर रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का एहसास नहीं है कि तुम इस तरह की दुर्दशा में गिर चुके हो। हर दिन तुम अशुद्ध आत्माओं के साहचर्य में रहते हो, “मल-मूत्र” के साथ व्यवहार करते हो और तुम्हारा जीवन बहुत नीच है; तुम वास्तव में इस बात से अवगत नहीं हो कि तुम बिल्कुल भी मनुष्यों की दुनिया में नहीं रहते और तुम अपने नियंत्रण में नहीं हो। क्या तुम नहीं जानते कि तुम्हारा जीवन बहुत पहले ही अशुद्ध आत्माओं द्वारा रौंद दिया गया था या कि तुम्हारा चरित्र बहुत पहले ही गंदे पानी से मैला कर दिया गया था? क्या तुम्हें लगता है कि तुम एक सांसारिक स्वर्ग में रह रहे हो और तुम खुशियों के बीच में हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुमने अपना जीवन अशुद्ध आत्माओं के साथ बिताया है, और तुम हर उस चीज़ के साथ सह-अस्तित्व में रहे हो जो उन्होंने तुम्हारे लिए तैयार की है? तुम्हारे जीने के ढंग का कोई अर्थ कैसे हो सकता है? तुम्हारे जीवन का कोई मूल्य कैसे हो सकता है? तुम अपने माता-पिता के लिए, अशुद्ध आत्माओं वाले माता-पिता के लिए, दौड़-भाग करते रहे हो, फिर भी तुम्हें वास्तव में इस बात का अंदाज़ा नहीं है कि तुम्हें नुकसान पहुँचाने वाले वे अशुद्ध आत्माओं वाले माता-पिता हैं, जिन्होंने तुम्हें जन्म दिया और पाल-पोसकर बड़ा किया। इससे भी अधिक, तुम नहीं जानते कि तुम्हारी सारी गंदगी वास्तव में उन्होंने ही तुम्हें दी है; तुम बस यही जानते हो कि वे तुम्हें “आनंद” दे सकते हैं, वे तुम्हें ताड़ना नहीं देते, न ही वे तुम्हारी आलोचना करते हैं, और विशेष रूप से वे तुम्हें शाप नहीं देते। वे कभी तुम पर गुस्से से भड़के नहीं, बल्कि तुम्हारे साथ आनंद और मिलनसार ढंग से व्यवहार करते हैं। उनके शब्द तुम्हारे दिल को पोषण देते हैं और तुम्हें लुभाते हैं, ताकि तुम गुमराह हो जाओ, और बिना एहसास किए, तुम फँसा लिए जाते हो और उनकी सेवा करने के इच्छुक हो जाते हो, उनके लिए एक जरिया और नौकर बन जाते हो। तुम्हें कोई शिकायत नहीं होती है, बल्कि तुम उनके लिए कुत्तों और घोड़ों की तरह कार्य करने के लिए तैयार रहते हो; वे तुम्हें गुमराह करते हैं। यही कारण है कि मेरे कार्य के प्रति तुम्हारी कोई प्रतिक्रिया नहीं है। कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मेरे हाथों से चुपके से निकल जाना चाहते हो, और कोई आश्चर्य नहीं कि तुम हमेशा मीठे शब्दों का प्रयोग करके छल से मेरी स्वीकृति लेना चाहते हो। इससे पता चलता है कि तुम्हारे पास पहले से एक दूसरी योजना थी, एक दूसरी व्यवस्था थी। सर्वशक्तिमान के तौर पर किए गए कुछ कार्यों को तुम देख सकते हो, पर तुम्हें मेरे न्याय और ताड़ना की जरा-सी भी जानकारी नहीं है। तुम्हें कोई अंदाज़ा नहीं है कि मेरी ताड़ना कब शुरू हुई; तुम केवल मुझे धोखा देना जानते हो—लेकिन तुम यह नहीं जानते कि मैं मनुष्य का कोई उल्लंघन बरदाश्त नहीं करूँगा। चूँकि तुम पहले ही मेरी सेवा करने का संकल्प ले चुके हो, इसलिए मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जो बुराई से बेइंतहा नफरत करता है, और मैं वह परमेश्वर हूँ, जो मनुष्य के प्रति ईर्ष्या रखता है। चूँकि तुमने पहले ही अपने शब्दों को वेदी पर रख दिया है, इसलिए मैं यह नहीं होने दूँगा कि तुम मेरी ही आँखों के सामने से भाग जाओ, न ही मैं यह होने दूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदी पर और मेरी आँखों के सामने अपने शब्दों को रखने के बाद तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से मुझे मूर्ख कैसे बनाने दे सकता हूँ? क्या तुम्हें लगता था कि तुम अपनी जीभ से यूँ ही मेरे लिए प्रतिज्ञा और शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन की शपथ कैसे ले सकते हो, मेरा सिंहासन, मैं जो सबसे ऊँचा हूँ? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले ही खत्म हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बता दूँ : तुम्हारी देह भले ही खत्म हो जाए, पर तुम्हारी शपथ खत्म नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हें दोषी ठहराऊँगा। हालाँकि तुम लोगों को लगता है कि अपने शब्द मेरे सामने रखकर अनमने ढंग से मेरा सामना कर लोगे, और तुम लोगों के दिल अशुद्ध और बुरी आत्माओं की सेवा कर सकते हैं। मेरा गुस्सा उन लोगों का धोखा कैसे सहन कर सकता है जो कुत्ते और सुअर जैसे हैं? मुझे अपने प्रशासनिक आदेश कार्यान्वित करने होंगे, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी कट्टर, “पावन” लोगों को वापस खींचना होगा जिनका मुझमें विश्वास है, ताकि वे एक अनुशासित प्रकार से मेरे लिए “सेवारत” हो सकें, मेरे बैल बन सकें, मेरे घोड़े बन सकें, मेरे संहार की दया पर रह सकें। मैं तुमसे तुम्हारे पिछले संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। मैं ऐसे किसी भी सृजित प्राणी को अनुमति नहीं दूँगा, जो मुझे ठगता है। तुम्हें क्या लगा कि तुम बस मनमाने ढंग से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने झूठ बोल सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि मैंने तुम्हारे वचन और कर्म सुने या देखे नहीं? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि में कैसे नहीं आ सकते? मैं लोगों को इस तरह अपने को ठगने कैसे दे सकता हूँ?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

120. मैं कई वसंत और पतझड़ से तुम लोगों के बीच में चलता रहा हूँ; मैं लंबे समय तक तुम लोगों के बीच जीया हूँ, और तुम लोगों के साथ जीया हूँ। तुम लोगों का कितना घृणित व्यवहार मेरी आँखों के सामने से फिसला है? तुम्हारे वे हृदयस्पर्शी शब्द लगातार मेरे कानों में गूँजते हैं; तुम लोगों के हज़ारों-करोड़ों संकल्प मेरी वेदी पर रखे गए हैं—इतने ज्यादा कि उन्हें गिना भी नहीं जा सकता। लेकिन तुम लोगों का जो समर्पण है और जितना तुम अपने आपको खपाते हो, वह रंचमात्र भी नहीं है। मेरी वेदी पर तुम लोग ईमानदारी की एक नन्ही बूँद भी नहीं रखते। मुझ पर तुम लोगों के विश्वास के फल कहाँ हैं? तुम लोगों ने मुझसे अनंत अनुग्रह प्राप्त किया है और तुमने स्वर्ग के अनंत रहस्य देखे हैं; यहाँ तक कि मैंने तुम लोगों को स्वर्ग की लपटें भी दिखाई हैं, लेकिन मैं तुम लोगों को जलाना सह नहीं सकता था। फिर भी, बदले में तुम लोगों ने मुझे कितना दिया है? तुम लोग मुझे कितना देने के लिए तैयार हो? तुम्हारे हाथ में जो भोजन है जो मैंने प्रदान किया है, पलटकर उसी को तुम मुझे चढ़ा देते हो, यह तक कहते हो कि वह तुम्हें अपनी कड़ी मेहनत के पसीने के बदले मिला है और तुम अपना सर्वस्व मुझे चढ़ा रहे हो। तुम यह कैसे नहीं जानते कि मेरे लिए तुम्हारा “योगदान” बस वे सभी चीजें हैं, जो मेरी ही वेदी से चुराई गई हैं? इतना ही नहीं, अब तुम वे चीज़ें मुझे चढ़ा रहे हो, क्या तुम मुझे धोखा नहीं दे रहे? तुम यह कैसे नहीं जान पाते कि आज जिन भेंटों का आनंद मैं उठा रहा हूँ, वे मेरी वेदी पर चढ़ाई गई सभी भेंटें हैं, न कि जो तुमने अपनी कड़ी मेहनत से कमाई हैं और फिर मुझे चढ़ावा दिया है? तुम लोग वास्तव में मुझे इस तरह धोखा देने की हिम्मत करते हो, इसलिए मैं तुम लोगों को कैसे माफ़ कर सकता हूँ? तुम लोग मुझसे इसे और सहने की अपेक्षा कैसे कर सकते हो? मैंने तुम लोगों को सब कुछ प्रदान किया है, मैंने तुम लोगों के लिए सब कुछ खोलकर रख दिया है और तुम्हारी ज़रूरतें पूरी की हैं, तुम लोगों की सोच के दायरे को बहुत बढ़ाया है, फिर भी तुम लोग अपनी अंतरात्मा की अनदेखी कर इस तरह मुझे धोखा देते हो। मैंने निःस्वार्थ भाव से अपना सब कुछ तुम लोगों को प्रदान किया है, ताकि तुम लोग अगर पीड़ित भी होते हो, तो भी तुम लोगों को मुझसे वह सब मिल जाए, जो मैं स्वर्ग से लाया हूँ। फिर भी, तुम लोगों में बिल्कुल भी समर्पण नहीं है, और अगर तुमने कोई छोटा-मोटा योगदान किया भी हो, तो बाद में तुम मुझसे उसका “हिसाब बराबर” करने की कोशिश करते हो। क्या तुम्हारा योगदान शून्य नहीं माना जाएगा? तुमने मुझे मात्र रेत का एक कण चढ़ाया है, जबकि माँगा एक टन सोना है। क्या तुम बस बेतुके ढंग से माँग करने वाले नहीं बन रहे हो? मैं तुम लोगों के बीच काम करता हूँ। उस दस प्रतिशत का भी कोई नामोनिशान नहीं है, जो मुझे मिलना चाहिए, अतिरिक्त बलिदानों की तो बात ही छोड़ दो। इसके अलावा, धर्मपरायण लोगों द्वारा भेंट चढ़ाए जाने वाले उस दस प्रतिशत को भी बुरे लोगों द्वारा छीन लिया जाता है। क्या तुम सभी मुझसे तितर-बितर नहीं हो गए हो? क्या तुम सब मेरे विरोधी नहीं हो? क्या तुम सब मेरी वेदी को नष्ट नहीं कर रहे हो? ऐसे लोगों को मेरी आँखें एक खज़ाने के रूप में कैसे देख सकती हैं? क्या वे सुअर और कुत्ते नहीं हैं, जिनसे मैं घृणा करता हूँ? मैं तुम लोगों के बुरे कर्मों को खज़ाना कैसे कह सकता हूँ?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम सभी कितने नीच चरित्र के हो!

121. कई मार्ग हैं जिन्हें तुम नहीं समझते, कई मामले हैं जिनकी तुम्हें जानकारी नहीं है। तुम लोग इतने अज्ञानी हो; मैं तुम लोगों का आध्यात्मिक कद और तुम लोगों की कमियाँ अच्छी तरह जानता हूँ। इसलिए, तुम लोग भले ही कई वचन समझने में असमर्थ हो, फिर भी मैं तुम्हें ये सारे सत्य बताने को तैयार हूँ जिन्हें तुम लोगों ने पहले कभी स्वीकार नहीं किया है, क्योंकि मुझे इस बात की चिंता रहती है कि अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद में तुम लोग मेरे लिए अपनी गवाही में अडिग रहने में समर्थ हो या नहीं। ऐसा नहीं है कि मैं तुम लोगों को नीची नजर से देखता हूँ; लेकिन तुम सभी लोग जानवर हो, जिन्हें अभी मेरे औपचारिक प्रशिक्षण से गुजरना है, और मैं बिल्कुल नहीं देख सकता कि तुम लोगों के भीतर कितनी महिमा है। यद्यपि मैंने तुम लोगों पर कार्य करने में बहुत ऊर्जा खर्च की है, फिर भी ऐसा लगता है कि तुम लोगों में कुछ ही सकारात्मक पहलू हैं और नकारात्मक पहलू कहीं नहीं मिलते; यह बस एक ऐसी गवाही है जो शैतान को शर्मिंदा करती है। तुम्हारे भीतर बाकी लगभग हर चीज शैतान का जहर है। तुम लोग मुझे ऐसे दिखते हो, जैसे तुम उद्धार से परे हो। वर्तमान स्थिति में, मैं तुम लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ और व्यवहार देखता हूँ, और अंततः, मैं तुम लोगों का असली आध्यात्मिक कद जानता हूँ। यही कारण है कि मैं तुम लोगों की चिंता करता रहता हूँ : अपने बल पर जीने के लिए छोड़ दिए जाने पर क्या तुम जैसे आज हो, उससे बेहतर या उसके समान हो पाओगे? क्या तुम लोगों का बचकाना आध्यात्मिक कद तुम लोगों को व्याकुल नहीं करता? क्या तुम लोग सचमुच इस्राएल के चुने हुए लोगों जैसे हो सकते हो—हर समय मेरे और केवल मेरे प्रति निष्ठावान? तुम लोगों में जो प्रकट होता है, वह बच्चों द्वारा तब की जाने वाली शरारत नहीं है जब वे अपने माता-पिता से दूर होते हैं, बल्कि अपने स्वामियों के कोड़ों की पहुँच से बाहर हो जाने वाले जानवरों से फूटकर बाहर आने वाला जंगलीपन है। तुम लोगों को अपनी प्रकृति जाननी चाहिए, जो तुम लोगों में समान कमजोरी भी है; यह एक रोग है, जो तुम लोगों में समान है। इसलिए आज तुम लोगों से मेरा एकमात्र आग्रह यह है कि मेरे प्रति अपनी गवाही में अडिग रहो। किसी भी परिस्थिति में पुरानी बीमारी फिर न उभरने दो। गवाही देना ही सबसे महत्वपूर्ण है—यह मेरे कार्य का मर्म है। तुम लोगों को मेरे वचन वैसे ही स्वीकार करने चाहिए, जैसे मरियम ने सपने में आया यहोवा का प्रकाशन स्वीकार किया था, विश्वास करके और फिर समर्पण करके। केवल यही शुचितापूर्ण होने की पात्रता रखता है। क्योंकि तुम लोग ही हो, जो मेरे वचन सबसे अधिक सुनते हो, जिन्हें मेरा सबसे अधिक आशीष प्राप्त है। मैंने तुम लोगों को अपनी समस्त मूल्यवान चीजें दे दी हैं, मैंने सब-कुछ तुम लोगों को प्रदान कर दिया है, फिर भी तुम लोगों का मूल्य इस्राएल के लोगों से बहुत अलग है—दोनों में जमीन-आसमान का फर्क है। लेकिन उनकी तुलना में तुम लोगों ने इतना अधिक प्राप्त किया है; जहाँ वे मेरे प्रकटन की बेतहाशा प्रतीक्षा करते हैं, वहीं तुम लोग मेरी प्रचुरता को साझा करते हुए मेरे साथ सुखद दिन बिताते हो। इस अंतर को देखते हुए, मेरे ऊपर चीखने-चिल्लाने और मेरे साथ झगड़ा करने और मेरी संपत्ति में अपने हिस्से की माँग करने का अधिकार तुम लोगों को कौन देता है? क्या तुम लोगों को ज्यादा कुछ नहीं मिला है? मैं तुम लोगों को इतना अधिक देता हूँ, लेकिन बदले में तुम लोग मुझे सिर्फ हृदयविदारक उदासी और चिंता, और अदम्य रोष और असंतोष ही देते हो। तुम बहुत घृणास्पद हो—तथापि तुम दयनीय भी हो, इसलिए मेरे पास इसके सिवा कोई चारा नहीं है कि मैं अपना सारा रोष निगल लूँ और तुम लोगों के सामने बार-बार अपनी आपत्तियाँ जाहिर करूँ। हजारों वर्षों के कार्य के दौरान मैंने कभी मानवजाति के साथ प्रतिवाद नहीं किया, क्योंकि मैंने पाया है कि मानवता के समूचे विकास में तुम लोगों के बीच के धोखेबाजी के काम ही हैं, जो प्राचीन काल के प्रसिद्ध पुरखों द्वारा तुम लोगों के लिए छोड़ी गई बहुमूल्य धरोहरों की तरह सर्वाधिक विख्यात हुए हैं। उन अव-मानवीय सूअरों और कुत्तों से मुझे कितनी घृणा है। तुम लोगों में अंतरात्मा की बहुत कमी है! तुम लोग बहुत नीच चरित्र के हो! तुम लोगों के हृदय बहुत कठोर हैं! अगर मैं ऐसे वचन और कार्य इस्राएलियों के बीच ले गया होता, तो बहुत पहले ही महिमा प्राप्त कर चुका होता। लेकिन तुम लोगों के बीच यह अप्राप्य है; तुम लोगों के बीच सिर्फ क्रूर उपेक्षा, अनदेखा किया जाना और तुम्हारे बहाने हैं। तुम्हारी इंद्रियाँ बहुत सुन्न हैं और तुम बिल्कुल निकम्मे हो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के बारे में तुम्हारी समझ क्या है?

122. अतीत के बारे में सोचो : कब तुम लोगों के प्रति मेरी दृष्टि क्रोधित, और मेरी आवाज़ कठोर हुई है? मैंने कब तुम लोगों में मीनमेख निकाली है? मैंने कब तुम लोगों को अनुचित रूप से फटकारा है? मैंने कब तुम लोगों को तुम्हारे मुँह पर डाँटा है? क्या यह मेरे कार्य के वास्ते नहीं है कि मैं तुम लोगों को हर प्रलोभन से बख्श देने के लिए अपने परमपिता को पुकारता हूँ? तुम लोग मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार क्यों करते हो? क्या मैंने कभी भी अपने अधिकार का उपयोग तुम लोगों की देह को मार गिराने के लिए किया है? तुम लोग मुझे इस प्रकार का प्रतिफल क्यों दे रहे हो? मेरे प्रति कभी हाँ और कभी ना करने के बाद, तुम लोग न हाँ में हो और न ही ना में, और फिर तुम मुझे मनाने और मुझसे बातें छिपाने का प्रयास करते हो और तुम लोगों के मुँह अधार्मिक लोगों के थूक से भरे हुए हैं। क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे आत्मा को धोखा दे सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मेरे क्रोध से बच सकती हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि तुम लोगों की ज़ुबानें मुझ यहोवा के कार्यों की, जैसी चाहे वैसी आलोचना कर सकती हैं? क्या मैं ऐसा परमेश्वर हूँ जिसकी मनुष्य आलोचना करता है? क्या मैं छोटे से भुनगे को इस प्रकार अपनी ईशनिंदा करने दे सकता हूँ? मैं ऐसे विद्रोह के पुत्रों को कैसे अपने अनंत आशीषों के बीच रख सकता हूँ? तुम लोगों के वचनों और कार्यों ने तुम लोगों को काफी समय तक उजागर और निंदित किया है। जब मैंने स्वर्ग का विस्तार किया और सभी चीज़ों का सृजन किया, तो मैंने अपने अलावा किसी भी प्राणी को उसके मन मुताबिक़ भाग लेने की अनुमति नहीं दी, मैं किसी भी चीज को उसकी इच्छानुसार मेरे कार्य और मेरे प्रबंधन में गड़बड़ करने की अनुमति तो बिल्कुल नहीं देता। मैं किसी भी मनुष्य या वस्तु को सहन नहीं करता; मैं कैसे उन लोगों को छोड़ सकता हूँ, जो मेरे प्रति क्रूर और अमानवीय हैं? मैं कैसे उन लोगों को क्षमा कर सकता हूँ, जो मेरे वचनों से विश्वासघात करते हैं? मैं कैसे उन्हें छोड़ सकता हूँ, जो मुझसे विद्रोह करते हैं? क्या मनुष्य की नियति मुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं है? मैं कैसे तुम्हारी अधार्मिकता और विद्रोहीपन को पवित्र मान सकता हूँ? तुम्हारे पाप मेरी पवित्रता को कैसे मैला कर सकते हैं? मैं अधर्मी की गंदगी से दूषित नहीं होता, न ही मैं अधर्मियों के चढ़ावों का आनंद लेता हूँ। यदि तुम मुझ यहोवा के प्रति वफादार होते, तो क्या तुम मेरी वेदी से बलिदानों को अपने लिए ले सकते थे? क्या तुम मेरे पवित्र नाम की ईशनिंदा के लिए अपनी विषैली ज़ुबान का उपयोग कर सकते थे? क्या तुम इस प्रकार मेरे वचनों से विश्वासघात कर सकते थे? क्या तुम मेरी महिमा और पवित्र नाम को, एक दुष्ट, शैतान की सेवा के लिए एक उपकरण के रूप में उपयोग कर सकते थे? मेरा जीवन पवित्र लोगों के आनंद के लिए प्रदान किया जाता है। मैं तुम्हें कैसे तुम्हारी इच्छानुसार मेरे जीवन के साथ एक खेलने की वस्तु की तरह पेश आने और तुम लोगों के बीच के संघर्ष में इसे एक उपकरण के रूप में उपयोग करने की इजाज़त दे सकता हूँ? मेरे प्रति व्यवहार में तुम लोग इतने निर्दयी और अच्छाई के मार्ग से इतने वंचित कैसे हो सकते हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि मैंने पहले ही तुम लोगों के दुष्कृत्यों को जीवन के इन वचनों में लिख दिया है? तुम लोग कोप के उस दिन से कैसे बच सकते हो जब मैं मिस्र को ताड़ना दूँगा? मैं कैसे तुम लोगों को इस तरह बार-बार मेरा विरोध और मुझसे विद्रोह करने की अनुमति दे सकता हूँ? मैं तुम लोगों को सीधे तौर पर कहता हूँ कि जब वह दिन आएगा, तो तुम लोगों की ताड़ना मिस्र की ताड़ना की अपेक्षा अधिक असहनीय होगी! तुम लोग कैसे मेरे कोप के दिन से बच सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कोई भी जो देह में है, क्रोध के दिन से नहीं बच सकता

123. परमेश्वर को पाने में मनुष्य के असफल होने का कारण यह नहीं है कि परमेश्वर के पास दैहिक भावनाएँ हैं या इसलिए कि परमेश्वर मनुष्य द्वारा प्राप्त होना नहीं चाहता, बल्कि इसलिए कि मनुष्य परमेश्वर को प्राप्त नहीं करना चाहता है और इसलिए कि मनुष्य के पास ऐसा हृदय नहीं है जो आतुरता के साथ परमेश्वर को खोजे। जो सचमुच परमेश्वर को खोजते हैं उनमें से कोई परमेश्वर द्वारा शापित कैसे हो सकता है? सही विवेक और संवेदनशील अंतरात्मा रखने वाला कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा शापित कैसे हो सकता है? जो सचमुच परमेश्वर की आराधना और सेवा करता है वह परमेश्वर के कोप की आग द्वारा कैसे भस्म हो सकता है? जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करने को इच्छुक है, उसे परमेश्वर के घर से कैसे निकाला जा सकता है? जो यह महसूस करता है कि वह कभी भी परमेश्वर से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकता है वह परमेश्वर के दंड में कैसे रह सकता है? यह कैसे हो सकता है कि जो परमेश्वर के लिए सब कुछ त्यागने को इच्छुक है, उसके पास कुछ न बचे? मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करने का इच्छुक नहीं है, अपनी संपत्तियाँ परमेश्वर के लिए खपाने का इच्छुक नहीं है और परमेश्वर के लिए जीवन-भर का प्रयास समर्पित करने के लिए तैयार नहीं है; इसके बजाय वह कहता है कि परमेश्वर हद पार कर गया है, कि परमेश्वर के बारे में बहुत-कुछ मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता है। ऐसी मानवता के साथ, अपने पूर्ण प्रयास के बावजूद तुम लोग परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे, इस तथ्य की तो बात ही छोड़ो कि तुम परमेश्वर को नहीं खोजते हो। क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोग मानवजाति की दोषपूर्ण वस्तुएँ हो? क्या तुम नहीं जानते कि तुम लोगों की मानवता से ज्यादा नीच और कोई मानवता नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों का “सम्मान” करने के लिए दूसरे तुम्हें क्या कहकर बुलाते हैं? जो लोग सच में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे तुम लोगों को भेड़िये का पिता, भेड़िये की माता, भेड़िये का पुत्र, और भेड़िये का पोता कहते हैं; तुम लोग भेड़िये के वंशज हो, भेड़िये के लोग हो, और तुम लोगों को अपनी पहचान जाननी चाहिए और उसे कभी नहीं भूलना चाहिए। यह मत सोचो कि तुम कोई श्रेष्ठ हस्ती हो : तुम लोग मानवजाति के बीच अमानुषों का सबसे नृशंस समूह हो। क्या तुम लोग इसमें से कुछ भी नहीं जानते हो? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोगों के बीच कार्य करके मैंने कितना जोखिम उठाया है? यदि तुम लोगों का विवेक दोबारा सामान्य नहीं हो सकता है और तुम लोगों की अंतरात्मा सामान्य रूप से कार्य नहीं कर सकती है तो फिर तुम लोग “भेड़िये” के नाम से कभी मुक्त नहीं हो पाओगे, तुम कभी शाप के दिन से नहीं बच पाओगे, कभी अपने दंड के दिन से नहीं बच पाओगे। तुम लोग हीन जन्मे थे, एक मूल्यरहित वस्तु। तुम लोग स्वभाव से भूखे भेड़ियों का झुंड हो, मलबे और कचरे का ढेर हो और तुम लोगों के विपरीत मैं तुम लोगों पर व्यक्तिगत लाभ के लिए कार्य नहीं करता हूँ, बल्कि कार्य की आवश्यकता के कारण कार्य करता हूँ। यदि तुम लोग इसी तरह से विद्रोही बने रहे तो मैं अपना कार्य रोक दूँगा और दोबारा कभी तुम लोगों पर कार्य नहीं करूँगा; इसके विपरीत मैं अपना कार्य एक ऐसे समूह पर स्थानांतरित कर दूँगा जिसे मैं पसंद करता हूँ और इस तरह मैं तुम लोगों को हमेशा के लिए छोड़ दूँगा, क्योंकि मैं उन लोगों को देखने का इच्छुक नहीं हूँ जो मुझसे शत्रुता रखते हैं। तो फिर तुम लोग मेरे अनुरूप होना चाहते हो या मुझसे शत्रुता रखना चाहते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है

124. जब तुम आज के मार्ग पर चलते हो, तो सबसे उपयुक्त प्रकार का अनुसरण क्या होता है? अपने अनुसरण में तुम्हें खुद को किस तरह के व्यक्ति के रूप में देखना चाहिए? तुम्हारे लिए यह जानना उचित है कि आज तुम जिसका भी सामना करते हो, उसे तुम्हें कैसे लेना चाहिए, फिर चाहे वे परीक्षण हों या कठिनाइयाँ, शाप हों या निर्मम ताड़ना। इन सभी चीजों का सामना करते हुए तुम्हें इनमें से हर एक पर ध्यान से विचार करना चाहिए। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? मैं ऐसा इसलिए कहता हूँ क्योंकि आज जिन चीजों का तुम सामना करते हो, वे अंततः छोटी अवधि के परीक्षण हैं जो बार-बार आते हैं; शायद जहाँ तक तुम्हारी बात है, वे विशेष रूप से तनावपूर्ण नहीं हैं और इसलिए तुम चीजों को बिना हस्तक्षेप किए उनके स्वाभाविक क्रम में चलने देते हो और उन्हें प्रगति के लिए किए जाने वाले अनुसरण में कोई मूल्यवान संपत्ति नहीं मानते। तुम कितने विचारहीन हो! तुम इतने विचारहीन हो कि इस मूल्यवान संपत्ति को अपनी आँखों के सामने तैरते हुए बादल जैसा समझते हो और बार-बार बरसने वाले इन कठोर आघातों को सँजोकर नहीं रखते—ये आघात अल्पकालिक होते हैं और तुम्हें बहुत भारी भी नहीं लगते—बल्कि तुम उन्हें दिल पर नहीं लेते, ठंडी अनासक्ति से देखते हो और उन्हें केवल ऐसा समझते हो जैसे किसी ईंट की दीवार से टकरा गए हो। तुम इतने घमंडी हो! इन भयंकर हमलों के प्रति, जो बार-बार आने वाले तूफानों की तरह हैं, तुम केवल लापरवाही भरी उपेक्षा दिखाते हो; कभी-कभी तो तुम पूर्ण उदासीनता प्रकट करते हुए एक ठंडी मुस्कान तक दे देते हो—क्योंकि तुमने अपने मन में कभी एक बार भी यह नहीं सोचा कि तुम इस तरह के “दुर्भाग्य” क्यों झेलते रहते हो। क्या ऐसा हो सकता है कि मैं मनुष्य के साथ घोर अन्याय करता हूँ? क्या मैं तुम्हारी गलतियाँ निकालने को अपना काम बना लेता हूँ? भले ही तुम्हारी सोच से जुड़ी समस्याएँ उतनी गंभीर न हों, जितनी मैंने वर्णित की हैं, फिर भी तुमने अपने बाहरी आत्मसंयम के माध्यम से पहले से ही अपनी आंतरिक दुनिया की एक उत्तम तस्वीर चित्रित की है। मुझे यह बताने की कोई आवश्यकता नहीं कि तुम्हारे दिल की गहराइयों में छिपी चीजें मात्र बेतुके अपशब्द और उदासी के हल्के निशान हैं, जिन्हें दूसरे मुश्किल से ही देख पाते हैं। चूँकि तुम्हें लगता है कि इस तरह के परीक्षण झेलना बहुत गलत है, इसलिए तुम कोसते हो; और चूँकि ये परीक्षण तुम्हें दुनिया की वीरानी का एहसास कराते हैं, इसलिए तुम उदासी से भर जाते हो। तुम इन बार-बार के आघातों और अनुशासन के क्रियाकलापों को सर्वोत्तम सुरक्षा के रूप में नहीं देखते; तुम उन्हें स्वर्ग द्वारा पैदा की गई निरर्थक परेशानियों के रूप में, या फिर तुम पर आने वाले उचित दंड के रूप में देखते हो। तुम कितने अज्ञानी हो! तुम निर्दयतापूर्वक अच्छे समय को अँधेरे में कैद कर लेते हो; तुम अद्भुत परीक्षणों और अनुशासन के एक के बाद एक अनुभवों को अपने शत्रुओं द्वारा किए गए हमलों के रूप में देखते हो। तुम नहीं जानते कि अपने परिवेश में कैसे ढलना है, और ऐसा करने का प्रयास करने के इच्छुक तो तुम बिल्कुल भी नहीं हो, क्योंकि तुम इस बार-बार की—और अपनी दृष्टि में निर्मम—ताड़ना से कुछ भी हासिल करने के लिए तैयार नहीं हो। तुम न तो खोजने का और न ही अन्वेषण करने का कोई प्रयास करते हो, और बस अपने भाग्य के आगे नतमस्तक हो, जहाँ वह ले जाए, चले जाते हो। जो शायद तुम्हें ताड़ना के बर्बर कार्य लगते हैं, उन्होंने तुम्हारा दिल नहीं बदला, न ही उन्होंने तुम्हारे दिल पर कब्जा किया है; इसके बजाय उन्होंने तुम्हारे दिल में छुरा घोंपा है। तुम इस “क्रूर ताड़ना” को इस जीवन में सिर्फ अपने दुश्मन की तरह देखते हो, और इसलिए तुमने कुछ भी हासिल नहीं किया है। तुम इतने आत्मतुष्ट हो! तुम शायद ही कभी यह मानते हो कि तुम इस तरह के परीक्षण इसलिए भुगतते हो क्योंकि तुम बहुत घृणित हो; इसके बजाय तुम खुद को बहुत अभागा समझते हो, और तो और, यह भी कहते हो कि मैं हमेशा तुम्हारी गलतियाँ निकालता रहता हूँ। और आज जब चीजें इस मुकाम पर पहुँच गई हैं, तो तुम उसके बारे में वास्तव में कितना जानते हो, जो मैं कहता और करता हूँ? यह मत सोचो कि तुम एक स्वाभाविक रूप से जन्मी विलक्षण प्रतिभा हो, जो स्वर्ग से थोड़ी ही निम्न, किंतु पृथ्वी से कहीं अधिक ऊँची है। तुम किसी दूसरे से ज्यादा होशियार नहीं हो—यहाँ तक कि यह भी कहा जा सकता है कि पृथ्वी पर जितने भी विवेकशील लोग हैं, उनसे तुम्हारा कहीं ज्यादा मूर्ख होना हास्यास्पद है, क्योंकि तुम खुद को बहुत ऊँचा समझते हो और तुममें कभी हीनता की भावना नहीं रही, मानो तुम मेरे कार्यों को उनके छोटे से छोटे ब्योरे तक स्पष्ट रूप से देख सकते हो। वास्तव में, तुम ऐसे व्यक्ति ही नहीं हो, जिसमें विवेक हो, क्योंकि तुम्हें इस बात का कुछ पता नहीं कि मैं क्या करने का इरादा रखता हूँ, और तुम इस बात से तो बिल्कुल भी अवगत नहीं हो कि मैं अभी क्या कर रहा हूँ। और इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम एक बूढ़े किसान के बराबर भी नहीं हो, एक ऐसा किसान जिसे मानव-जीवन की थोड़ी सी भी समझ नहीं है फिर भी जो भूमि पर खेती करते समय अपना सारा भरोसा स्वर्ग के आशीषों पर रखता है। तुम्हें अपने जीवन की जरा भी परवाह नहीं है, तुम प्रसिद्धि के बारे में भी कुछ नहीं जानते और तुममें आत्म-जागरूकता तो बिल्कुल भी नहीं है। तुम वास्तव में इतने “महान” हो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग सीखते नहीं और अज्ञानी बने रहते हैं—क्या वे जानवर नहीं हैं?

125. कुछ लोग अपने बाहरी स्वरूप के मामले में खूबसूरती से सज-धज कर रहते हैं : बहनें अपने आपको फूलों की तरह सँवारती हैं और भाई राजकुमारों या अमीर छबीले नौजवानों की तरह कपड़े पहनते हैं। वे केवल बाहरी खान-पान और कपड़ों की परवाह करते हैं; लेकिन अंदर से वे कंगाल होते हैं, उन्हें परमेश्वर का ज़रा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके क्या मायने हो सकते हैं? और कुछ तो ऐसे हैं जो भिखारियों की तरह कपड़े पहनते हैं—वे वाकई पूर्वी एशिया के गुलाम लगते हैं! क्या तुम लोगों को सचमुच नहीं पता कि मैं तुम लोगों से क्या अपेक्षा करता हूँ? आपस में संगति करो : तुम लोगों ने वास्तव में क्या पाया है? तुम लोगों ने इतने सालों तक परमेश्वर में आस्था रखी है, फिर भी तुम लोगों ने इतना ही प्राप्त किया है—क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? क्या तुम लज्जित महसूस नहीं करते? इतने सालों से तुम सत्य मार्ग पर चलने का प्रयास कर रहे हो, फिर भी आज तुम्हारा आध्यात्मिक कद गौरैये से भी छोटा है! अपने मध्य राजकुमारी किस्म की महिलाओं को देखो, कपड़ों और मेकअप में तुम बहुत ही सुंदर दिखती हो, एक-दूसरे से अपनी तुलना करती हो—और तुलना क्या करती हो? अपनी मौज-मस्ती की? अपनी माँगों की? क्या तुम्हें यह लगता है कि मैं मॉडल भर्ती करने आया हूँ? तुम में ज़रा भी शर्म नहीं है! तुम लोगों का जीवन कहाँ है? जिन चीज़ों के पीछे तुम लोग भाग रही हो, क्या वे तुम्हारी असंयमित इच्छाएँ नहीं हैं? तुम्हें लगता है कि तुम बहुत सुंदर हो, लेकिन भले ही तुम बहुत सजी-सँवरी हो, क्या तुम अभी भी गोबर के ढेर में जन्मा कुलबुलाता कीड़ा नहीं हो? आज खुशकिस्मती से तुम जिस स्वर्गिक आशीष का आनंद ले रही हो, वह तुम्हारे सुंदर चेहरे के कारण नहीं है, बल्कि परमेश्वर अपवाद स्वरूप तुम्हें ऊपर उठा रहा है। क्या यह तुम्हें अब भी स्पष्ट नहीं हुआ कि तुम कहाँ से आई हो? जीवन का उल्लेख होने पर, तुम अपना मुँह बंद कर लेती हो और कुछ नहीं बोलती, बुत की तरह गूँगी बन जाती हो, फिर भी तुम सजने-सँवरने की जुर्रत करती हो! फिर भी तुम्हारा मन अपने चेहरे पर लाली और पाउडर लगाने का करता है! और तुम लोगों के बीच के छैलों को देखो—वे एकदम अभद्र हैं। वे अपने चेहरों पर बेपरवाह भाव लिए दिनभर मटरगश्ती करते रहते हैं—वे जहाँ भी जाते हैं, उनमें मर्यादा की ज़रा-सी भी समझ नहीं होती। क्या वे मानव के समान हैं? तुम लोगों में से हर एक आदमी और औरत का ध्यान दिनभर कहाँ रहता है? क्या तुम लोगों को पता है कि तुम लोग अपने भरण-पोषण के लिए किस पर निर्भर हो? अपने कपड़े देखो, देखो तुम्हारे हाथों ने क्या प्राप्त किया है, अपने पेट पर हाथ फेरो—इतने बरसों में तुमने अपनी आस्था में जो दिल का खून बहाया है, उससे तुमने क्या नतीजे हासिल किए हैं? तुम अब भी पर्यटन-स्थल के बारे में सोचते हो, अपनी बदबूदार देह को सजाने-सँवारने की सोचते हो—यह सब निरर्थक है! तुमसे सामान्य इंसान बनने के लिए कहा जाता है, फिर भी अभी तुम असामान्य हो, यही नहीं तुम विरूपित भी हो। ऐसा व्यक्ति मेरे सामने आने की धृष्टता कैसे कर सकता है? इस तरह की मानवता के साथ, तुम्हारा अपनी सुंदरता का प्रदर्शन करना, देह पर इतराना और हमेशा देह की वासनाओं में जीना—क्या तुम घिनौने राक्षसों और दुष्ट आत्माओं के वंशज नहीं हो? मैं ऐसे घिनौने राक्षसों को लंबे समय तक अस्तित्व में नहीं रहने दूँगा! ऐसा मानकर मत चलो कि मुझे पता ही नहीं कि तुम दिल में क्या सोचते हो। ऐसा हो सकता है कि तुम अपनी वासना और देह को खुला न छोड़ो, लेकिन तुम्हारे दिल में जो विचार हैं, उन्हें मैं कैसे न जानूँगा? तुम्हारी आँखों की सारी ख्वाहिशों को मैं कैसे न जानूँगा? क्या तुम राजकुमारी किस्म की युवतियाँ अपनी देह का प्रदर्शन करने के लिए अपने आपको इतना सुंदर नहीं बनाती हो? पुरुषों से तुम्हें क्या लाभ होगा? क्या वे तुम लोगों को अथाह पीड़ा से बचा सकते हैं? जहाँ तक तुम लोगों में छबीले नौजवानों की बात है, तुम सब अपने आपको सभ्य और शालीन दिखाने के लिए सजते-सँवरते हो, लेकिन क्या यह तुम्हारी सुंदरता पर ध्यान ले जाने के लिए नहीं किया गया है? तुम लोग यह किसके लिए कर रहे हो? महिलाओं से तुम लोगों को क्या फायदा होगा? क्या वे तुम लोगों के पापों का मूल नहीं हैं? मैंने तुम सभी स्त्री-पुरुषों से बहुत-सी बातें कही हैं, लेकिन तुम लोगों ने उनमें से कुछ का ही पालन किया है। तुम लोग बहुत कम सुन पाते हो, तुम लोगों की आँखें कमजोर पड़ चुकी हैं, तुम्हारे दिल इस हद तक दुराग्रही हैं कि तुम्हारे जिस्मों में वासना के अलावा कुछ नहीं है और तुम लोग इसके चँगुल में फँस गए हो और अब निकल नहीं सकते। गंदगी और मैल में छटपटाते तुम जैसे कीड़ों के इर्द-गिर्द कौन आना चाहता है? मत भूलो कि तुम्हारी औकात उनसे ज़्यादा कुछ नहीं है जिन्हें मैंने गोबर के ढेर से निकाला है, तुममें मूलतः सामान्य मानवता नहीं थी। मैं तुम लोगों से उस सामान्य मानवता की अपेक्षा करता हूँ जो मूलतः तुम्हारे अंदर नहीं थी, इसकी नहीं कि तुम अपनी वासना की नुमाइश करो या अपनी दुर्गंध-युक्त देह को बेलगाम छोड़ दो, जिसे बरसों तक दानवों ने प्रशिक्षित किया है। जब तुम लोग इस तरह सजते-सँवरते हो, तो क्या तुम्हें डर नहीं लगता कि तुम इसमें और गहरे फँस जाओगे? क्या तुम लोगों को पता नहीं कि तुम लोग मूलतः पाप के हो? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम लोगों की देह वासना से भरी है? बात इस हद तक पहुँच गई है कि तुम लोगों के कपड़ों से भी वासना झलकती है, जो घिनौने राक्षसों के रूप में तुम लोगों के बेहद भद्दे स्वरूप को प्रकट करती है। क्या ऐसा नहीं है कि तुम लोग यह सब किसी भी अन्य व्यक्ति से अधिक स्पष्ट रूप से जानते हो? क्या तुम लोगों के दिलों को, तुम लोगों की आँखों को, तुम लोगों के होठों को घिनौने राक्षसों ने गंदा नहीं कर दिया है? क्या तुम्हारे ये अंग घिनौने नहीं हैं? क्या तुम लोगों को लगता है कि जब तक तुम कुछ नहीं करते, तब तक तुम सर्वाधिक पवित्र हो? क्या तुम लोगों को लगता है कि भड़कीले वस्त्रों में सजने-सँवरने से तुम्हारी गंदी आत्माएँ छिप जाएँगी? ऐसा नहीं होगा! मेरी सलाह है कि अधिक यथार्थवादी बनो, कपटी और नकली मत बनो और अपनी आकर्षक चीजों की नुमाइश मत करो। तुम लोग अपनी वासना को लेकर एक-दूसरे के सामने शान बघारते हो, लेकिन बदले में तुम लोगों को अनंत यातनाएँ और निर्मम ताड़ना ही मिलेगी! तुम लोगों को एक-दूसरे से आँखें लड़ाने और रोमाँस में लिप्त रहने की क्या आवश्यकता है? क्या यह तुम लोगों की सत्यनिष्ठा है? क्या यह तुम लोगों की अडिग सत्यनिष्ठा है? मुझे तुम लोगों में से उनसे बेइंतहा नफरत है जो बुरी औषधि और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; मुझे तुम लोगों में से उन नौजवान लड़के-लड़कियों से नफरत है जिन्हें अपने शरीर से लगाव है। बेहतर होगा अगर तुम लोग स्वयं पर नियंत्रण रखो, क्योंकि अब आवश्यक है कि तुम्हारे अंदर सामान्य मानवता हो, तुम लोगों को अपनी वासना की नुमाइश करने की अनुमति नहीं दी गई है—लेकिन फिर भी तुम लोग हाथ से कोई मौका जाने नहीं देते हो, क्योंकि तुममें अत्यधिक दैहिक भ्रष्टता है और तुम्हारी वासना बहुत प्रचंड है!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)

126. जो लोग केवल अपने देह-सुख की सोचते हैं और सुख-साधनों का आनंद लेते हैं; जो विश्वास रखते हुए प्रतीत होते हैं लेकिन सचमुच विश्वास नहीं रखते; जो दानवी चिकित्सा प्रथाओं और जादू-टोने में लिप्त रहते हैं; जो व्यभिचारी और पतित हैं; जो यहोवा के चढ़ावे और उसकी संपत्ति को चुराते हैं; जिन्हें रिश्वत पसंद है; जो व्यर्थ में स्वर्गारोहित होने के सपने देखते हैं; जो अहंकारी और दंभी हैं, जो केवल व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ के लिए होड़ करते हैं; जो अवमाननापूर्ण शब्दों को फैलाते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की निंदा करते हैं; जो स्वयं परमेश्वर की आलोचना और बुराई करने के अलावा कुछ नहीं करते; जो अपना अलग गुट बनाते हैं और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करते हैं; जो परमेश्वर का उत्कर्ष करने से कहीं अधिक खुद का उत्कर्ष करते हैं; वे छिछोरे नौजवान, अधेड़ उम्र के लोग और बुज़ुर्ग स्त्री-पुरुष जो व्यभिचार में फँसे हुए हैं; जो स्त्री-पुरुष व्यक्तिगत प्रसिद्धि और लाभ का आनंद लेते हैं और लोगों के बीच निजी रुतबा तलाशते हैं; जिन लोगों को कोई मलाल नहीं है और जो पाप में फँसे हुए हैं—क्या वे तमाम लोग उद्धार से परे नहीं हैं? व्यभिचार, पाप, दानवी चिकित्सा प्रथाएँ, जादू-टोना, ईशनिंदा वाले शब्द और अवमाननापूर्ण शब्द, सब तुम लोगों में निरंकुशता से फैल रहे हैं; सत्य और जीवन के वचन तुम लोगों के बीच कुचले जाते हैं और तुम लोगों के मध्य पवित्र शब्द मलिन किए जाते हैं। तुम मलिनता और विद्रोहशीलता से भरे हुए अन्य-जाति राष्ट्र के लोगों! तुम लोगों का परिणाम क्या होगा? जिन्हें देह-सुख से प्यार है, जो देह का जादू-टोना करते हैं, और जो व्यभिचार के पाप में फँसे हुए हैं, वे जीते रहने का दुस्साहस कैसे कर सकते हैं! क्या तुम नहीं जानते कि तुम जैसे लोग कीड़े-मकौड़े हैं जो उद्धार से परे हैं? किसी भी चीज की माँग करने का हक तुम्हें किसने दिया? आज तक, उन लोगों में जरा-सा भी परिवर्तन नहीं आया है जिन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, जो केवल देह से प्यार करते हैं—ऐसे लोगों को कैसे बचाया जा सकता है? जो जीवन के मार्ग से प्रेम नहीं करते, जो परमेश्वर का उत्कर्ष नहीं करते और उसकी गवाही नहीं देते, जो अपने रुतबे के लिए षडयंत्र रचते हैं, जो स्वयं का उत्कर्ष करते हैं—क्या वे आज भी वैसे ही नहीं हैं? उन्हें बचाने का क्या मूल्य है? तुम्हें बचाया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं है कि तुम कितने वरिष्ठ हो या तुम कितने साल से काम कर रहे हो, और इस बात पर तो बिल्कुल भी निर्भर नहीं है कि तुमने कितनी योग्यताएँ हासिल कर ली हैं। बल्कि इस बात पर निर्भर है कि क्या तुम्हारा अनुसरण फलीभूत हुआ है। तुम्हें यह जानना चाहिए कि जिन्हें बचाया जाता है वे ऐसे “वृक्ष” होते हैं जिन पर फल लगते हैं, ऐसे वृक्ष नहीं जो हरी-भरी पत्तियों और फूलों से तो लदे होते हैं, लेकिन जिन पर फल नहीं आते। अगर तुम बरसों तक भी गलियों की खाक छानते रहे हो, तो उससे क्या फर्क पड़ता है? तुम्हारी गवाही कहाँ है? तुम्हारे पास खुद से प्रेम करने वाले और अपनी वासनायुक्त कामनाओं से भरे दिल की तुलना में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बहुत कम है—क्या इस तरह का व्यक्ति पतित नहीं है? वे उद्धार के लिए नमूना और मॉडल कैसे हो सकते हैं? तुम्हारी प्रकृति सुधर नहीं सकती, तुम बहुत अधिक विद्रोहशीलता के अधीन हो, तुम छुटकारा पाने से परे हो! क्या ऐसे लोगों को हटा नहीं दिया जाएगा? क्या मेरे कार्य के समाप्त हो जाने का समय तुम्हारा अंत आने का समय नहीं है? मैंने तुम लोगों के बीच बहुत सारा कार्य किया है और बहुत सारे वचन बोले हैं—इनमें से कितने सच में तुम लोगों के कानों में गए हैं? इनमें से कितनों के प्रति तुम लोगों ने कभी समर्पण किया है? जब मेरा कार्य समाप्त होगा, तो यह वो समय होगा जब तुम मेरा विरोध करना बंद कर दोगे, तुम मेरे खिलाफ खड़ा होना बंद कर दोगे। जब मैं काम करता हूँ, तो तुम लोग लगातार मेरे खिलाफ काम करते रहते हो; तुम लोग कभी मेरे वचनों का अनुपालन नहीं करते। मैं अपना कार्य करता हूँ, और तुम अपना “काम” करते हो, और अपना छोटा-सा राज्य बनाते हो। तुम लोग लोमड़ियों और कुत्तों के झुंड हो, तुम लोग मेरे खिलाफ काम करने के अलावा कुछ नहीं करते हो! तुम लोग लगातार उन्हें अपने आगोश में लाने का प्रयास कर रहे हो जो तुम लोगों के प्रति अपना अविभक्त प्रेम समर्पित करते हैं—तुम लोगों के भय मानने वाले दिल कहाँ हैं? तुम्हारा हर काम कपट से भरा होता है! तुम्हारे अंदर न समर्पण है, न भय है, तुम्हारा हर काम कपटपूर्ण और ईश-निंदा करने वाला होता है! क्या ऐसे लोगों को बचाया जा सकता है? जो पुरुष यौन-संबंधों में अनैतिक और लंपट होते हैं, वे हमेशा कामोत्तेजक वेश्याओं को आकर्षित करके उनके साथ मौज-मस्ती करना चाहते हैं। मैं ऐसे काम-वासना में लिप्त अनैतिक राक्षसों को कतई नहीं बचाऊँगा। मैं तुम घिनौने राक्षसों से पूरी तरह घृणा करता हूँ, तुम्हारा व्यभिचार और तुम्हारी कामुक अदाएँ तुम लोगों को नरक में धकेल देंगे। तुम लोगों को अपने बारे में क्या कहना है? घिनौने राक्षसो और दुष्ट आत्माओ, तुम लोग बेहद घृणित हो! तुम बेहद घृणित हो! ऐसे कूड़े-करकट को कैसे बचाया जा सकता है? क्या ऐसे लोगों को जो पाप में फँसे हुए हैं, उन्हें अब भी बचाया जा सकता है? आज, तुम लोगों के दिल इस सत्य, इस मार्ग और इस जीवन की ओर आकर्षित नहीं होते हैं। बल्कि, वे पाप, और पैसे, रुतबे, प्रसिद्धि, लाभ, देह के सुखों, और पुरुषों के सौंदर्य और महिलाओं की कामुक अदाओं की ओर आकर्षित होते हैं। यह तुम लोगों को मेरे राज्य में प्रवेश करने के योग्य कैसे बनाता है? तुम लोगों की छवियाँ परमेश्वर की छवि से भी बड़ी हैं, तुम लोगों का रुतबा परमेश्वर के रुतबे से भी ऊँचा है, लोगों के बीच तुम लोगों की प्रतिष्ठा की तो बात ही छोड़ दो—तुम लोग वास्तव में ऐसी मूर्तियाँ बन गए हो जिनकी लोग आराधना करते हैं। क्या तुममें से हर एक प्रधान दूत नहीं बन गया है? जब लोगों के परिणामों का खुलासा किया जाता है, जो वह समय भी है जब उद्धार का कार्य समाप्ति के करीब होने लगेगा, तो तुम लोगों में से बहुत-से ऐसी लाश होंगे जो उद्धार से परे होंगे और जिन्हें हटा दिया जाना होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अभ्यास (7)

127. मनुष्य निकम्मा और नाकारा है, क्योंकि उसने स्वयं को सँजोकर नहीं रखा है। यदि वह स्वयं से प्यार करके खुद को ही रौंदता है, तो क्या यह उसके निकम्मेपन को नहीं दिखाता? मानवजाति एक ऐसी अनैतिक स्त्री की तरह है जो स्वयं के साथ खेल खेलती है और दूषित किए जाने के लिए स्वेच्छा से स्वयं को दूसरों को सौंप देती है। किन्तु फिर भी, लोग नहीं जानते हैं कि वे कितने अधम हैं। उन्हें दूसरों के लिए कार्य करने, या दूसरों के साथ बातचीत करने, स्वयं को दूसरों के नियंत्रण में करने में खुशी मिलती है; क्या यह वास्तव में मानवजाति की गंदगी नहीं है? यद्यपि मैंने मानवजाति के बीच जीवन का अनुभव नहीं किया है, और मुझे वास्तव में मानव जीवन का अनुभव नहीं रहा है, फिर भी मुझे मनुष्य की हर हरकत, उसके हर क्रिया-कलाप, हर वचन और हर कर्म की एकदम स्पष्ट समझ है। मैं मानवजाति का उसके बेहद शर्मिंदा करने की हद तक गहन-विश्लेषण कर सकता हूँ, इस सीमा तक कि वे अपनी चालाकियाँ दिखाने का और अपनी वासना को हवा देने की धृष्टता फिर न करे। इंसान घोंघे की तरह, जो अपने खोल में छिपा रहता है, अब कभी अपनी बदसूरत स्थिति को उजागर करने का धृष्टता नहीं करता। चूँकि मानवजाति स्वयं को नहीं जानती, इसलिए उसका सबसे बड़ा दोष अपने आकर्षण का दूसरों के सामने स्वेच्छा से जुलूस निकालनाहै, अपने कुरूप चेहरे का जूलूस निकालना है; परमेश्वर इस चीज़ से सबसे ज्यादा घृणा करता है। क्योंकि लोगों के आपसी संबंध असामान्य हैं, लोगों का आपसी व्यवहार ही सामान्य नहीं है, तो परमेश्वर और इंसान के बीच सामान्य संबंध की तो बात ही दूर है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 14

128. इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, “लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?” तो सभी जवाब देंगे, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए”—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है। शैतान का हर काम अपनी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और उद्देश्यों के लिए होता है। वह परमेश्वर से आगे जाना चाहता है, परमेश्वर से मुक्त होना चाहता है और परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीजों पर नियंत्रण पाना चाहता है। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं। उन सभी में शैतानी प्रकृति है, उनमें परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति होती है और वे अपने भाग्य का नियंत्रण अपने हाथों में रखना चाहते हैं; वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का विरोध करने की कोशिश करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ पहले से ही बिल्कुल शैतान की महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं जैसी हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, लोगों के बहुत-से नीति-वाक्य और सूक्तियाँ मानव प्रकृति को दर्शाती हैं और मनुष्य के भ्रष्ट सार को प्रतिबिंबित करती हैं। लोग जो चीजें चुनते हैं वे उनकी अपनी पसंद को दर्शाती हैं और वे सभी लोगों के स्वभावों और अनुसरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इंसान जो कुछ कहता और करता है, उसका भेष कितना भी बदला हुआ क्यों न हो, यह भेष उसकी प्रकृति नहीं छिपा सकता। जैसे, फरीसी आमतौर पर बहुत अच्छा उपदेश देते थे, लेकिन जब उन्होंने यीशु द्वारा व्यक्त धर्मोपदेश और सत्य सुने, तो उन्हें स्वीकारने के बजाय उनकी निंदा करने लगे। इसने फरीसियों के सत्य से विमुख होने और घृणा करने वाले प्रकृति सार को उजागर कर दिया। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं और खुद को बहुत अच्छे से छिपा लेते हैं, लेकिन जब अन्य लोग कुछ समय के लिए उनसे जुड़ते हैं, तो वे जान जाते हैं कि वे लोग प्रकृति में अत्यंत धोखेबाज हैं और ज़रा भी ईमानदार नहीं हैं। लंबे समय तक उन लोगों के साथ जुड़ने के बाद, उन्हें उनके प्रकृति सार का पता चल जाता है। अंत में, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं : वे लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते और वे धोखेबाज हैं। यह कथन उन लोगों की प्रकृति को दर्शाता है और यह उनके प्रकृति सार का सर्वोत्तम चित्रण और सबूत है। सांसारिक आचरण का उनका फलसफा है किसी को सच न बताना, और साथ ही किसी पर विश्वास न करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में शैतान के फलसफों और विषों से युक्त है। कभी-कभी तुम खुद भी उनसे अनजान होते हो। यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम शैतान के स्वभाव का भेद नहीं पहचान सकते। और फिर भी, तुम हर दिन हर मिनट शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो और तुम सोचते हो कि यह काफी सही और उचित है, यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि जब तुम शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हो, तो तुम शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो, और यह कि शैतान के फलसफे और स्वभाव तुम्हारी प्रकृति बन गए हैं। अक्सर, लोग शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं लेकिन फिर भी इसे बहुत अच्छा मानते हैं और उनमें पश्चात्ताप की कोई भावना नहीं होती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सत्य को नहीं समझते। इसलिए, वे हर मोड़ पर लगातार अपनी शैतानी प्रकृति प्रकट कर रहे हैं और वे हर मोड़ पर लगातार शैतान के फलसफों के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है और यह मनुष्य का प्रकृति सार है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

129. मनुष्य की प्रकृति मेरे सार से काफी भिन्न है, क्योंकि मनुष्य की भ्रष्ट प्रकृति पूरी तरह से शैतान से उत्पन्न होती है; मनुष्य की प्रकृति को शैतान द्वारा संसाधित और भ्रष्ट किया गया है। अर्थात्, मनुष्य इसकी बुराई और कुरूपता के प्रभाव के अधीन जीता है। मनुष्य सत्य के संसार या पवित्र वातावरण में बड़ा नहीं होता है और प्रकाश में जीना तो दूर की बात है। इसलिए किसी व्यक्ति के पास जन्म से ही प्रकृति के भीतर सत्य का होना संभव नहीं है और किसी व्यक्ति का परमेश्वर का भय मानने और उसके प्रति समर्पण करने के सार के साथ पैदा होना और भी संभव नहीं है। इसके विपरीत, लोग एक ऐसी प्रकृति से युक्त होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करती है, परमेश्वर से विद्रोह करती है और जिसमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं होता। यही प्रकृति वह समस्या है जिसके बारे में मैं बात करना चाहता हूँ—विश्वासघात।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (2)

130. ऐसा व्यवहार जो पूरी तरह से मेरे प्रति समर्पण नहीं कर सकता है, विश्वासघात है। ऐसा व्यवहार जो मेरे प्रति निष्ठावान नहीं हो सकता, वह है विश्वासघात। मेरे साथ धोखा करना और मेरे साथ छल करने के लिए झूठ का उपयोग करना, विश्वासघात है। धारणाओं से भरा होना और हर जगह उन्हें फैलाना विश्वासघात है। मेरी गवाहियों और हितों की रक्षा नहीं कर पाना विश्वासघात है। दिल में मुझसे दूर होते हुए भी झूठमूठ मुस्कुराना विश्वासघात है। ये सभी विश्वासघात के काम हैं जिन्हें करने में तुम लोग हमेशा सक्षम रहे हो, और ये तुम लोगों के बीच आम बात है। तुम लोगों में से शायद कोई भी इसे समस्या न माने, लेकिन मैं ऐसा नहीं सोचता हूँ। मैं अपने साथ किसी व्‍यक्ति के विश्वासघात को एक तुच्छ बात नहीं मान सकता हूँ, और इससे भी बढ़कर, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता। अब भी, जबकि मैं तुम लोगों के बीच कार्य कर रहा हूँ, तो तुम लोग इस तरह से व्‍यवहार कर रहे हो—यदि कभी ऐसा दिन आए जब तुम लोगों की निगरानी करने के लिए कोई न हो, तो क्या तुम लोग उन डाकुओं जैसे नहीं बन जाओगे जिन्होंने खुद को अपने छोटे-से इलाकों का राजा घोषित कर दिया है? जब ऐसा होगा और तुम विनाश का कारण बनोगे, तब तुम्हारे पीछे उस गंदगी को कौन साफ करेगा? अगर तुम लोग सोचते हो कि विश्वासघात के कुछ कार्य तुम लोगों के सतत व्यवहार नहीं, बल्कि मात्र कभी-कभार होने वाले क्रियाकलाप हैं, जिन्हें इतनी सख्ती से नहीं उठाया जाना चाहिए जिससे तुम्हारे स्वाभिमान को ठेस पहुँचे, और यदि तुम लोग वास्तव में ऐसा ही मानते हो तो तुम समझ से बिल्कुल कोरे हो। कोई व्यक्ति जितना ज्यादा इस तरीके से सोचता है, वह विद्रोह का उतना ही बड़ा आदर्श और नमूना होता है। मनुष्य की प्रकृति उसका जीवन है; यह एक सिद्धांत है जिस पर वह जीवित रहने के लिए निर्भर करता है और वह इसे बदलने में असमर्थ है। विश्वासघात की प्रकृति का उदाहरण लो। यदि तुम अपने किसी रिश्तेदार या मित्र से विश्वासघात करने के लिए चीजें कर सकते हो, तो यह साबित करता है कि यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी प्रकृति का हिस्सा है जिसके साथ तुम पैदा हुए थे। यह कुछ ऐसा है जिससे कोई भी इनकार नहीं कर सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)

131. कोई भी अपना सच्चा चेहरा दर्शाने के लिए अपने स्वयं के शब्दों और क्रियाओं का उपयोग कर सकता है। यह सच्चा चेहरा निश्चित रूप से उसकी प्रकृति है। यदि तुम बहुत कुटिल ढंग से बोलने वाले व्यक्ति हो, तो तुम कुटिल प्रकृति के हो। यदि तुम्हारी प्रकृति कपटपूर्ण है, तो तुम कपटी ढंग से काम करते हो, और दूसरे बहुत आसानी से तुम्हारे झाँसे में आ जाते हैं और ठगे जाते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति अत्यंत क्रूर है, तो हो सकता है कि तुम्हारे वचन सुनने में सुखद हों, लेकिन तुम्हारे कार्य तुम्हारी क्रूर चालों को छिपा नहीं सकते हैं। यदि तुम्हारी प्रकृति आलसी है, तो तुम जो कुछ भी कहोगे, उससे खुद को अपने लापरवाह और आलसी होने से दोषमुक्त कराने की कोशिश कर रहे होगे, और तुम्हारे कार्य बहुत धीमे और लापरवाही से भरे होंगे, और सत्य छिपाने में बहुत अच्छे होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति सहानुभूतिपूर्ण है, तो तुम्हारे वचन तर्कसंगत होंगे और तुम्हारे कार्य भी सत्य के अत्यधिक अनुरूप होंगे। यदि तुम्हारी प्रकृति सबके प्रति वफादार रहने की है, तो तुम्हारे वचन निश्‍चय ही खरे होंगे और जिस तरीके से तुम कार्य करते हो, वह भी व्यावहारिक और यथार्थवादी होगा, जिसमें ऐसा कुछ न होगा जिससे तुम्हारे मालिक को असहजता महसूस हो। यदि तुम्हारी प्रकृति कामुक या धन लोलुप है, तो तुम्हारा हृदय प्रायः इन चीजों से भरा होगा और तुम बेइरादा कुछ विकृत, अनैतिक काम करोगे, जिन्हें भूलना लोगों के लिए कठिन होगा और वे काम उनमें घृणा पैदा करेंगे। जैसा कि मैंने कहा है, यदि तुम्हारी प्रकृति विश्वासघात की है तो तुम मुश्किल से ही स्वयं को इससे छुड़ा सकते हो। यह मानकर ख्याली पुलाव पकाने की मानसिकता मत पालो कि चूँकि तुमने दूसरों के साथ गलत नहीं किया है, इसलिए तुम्हारी प्रकृति विश्वासघात की नहीं है। यदि तुम ऐसा ही सोचते हो तो तुम घृणित हो। जब भी मैं बोलता हूँ, तो मेरे वचन सभी लोगों पर लक्षित होते हैं, न कि केवल एक व्यक्ति या एक प्रकार के व्यक्ति पर। यह तथ्य कि तुमने मेरे साथ एक मामले में विश्वासघात नहीं किया है, यह साबित नहीं करता कि तुम मेरे साथ किसी मामले में विश्वासघात नहीं करोगे। कुछ लोग अपने विवाह में असफलताओं के दौरान सत्य की तलाश करने में अपनी आस्था खो देते हैं। कुछ लोग परिवार के टूटने के दौरान मेरे प्रति निष्ठावान होने के अपने दायित्व को त्याग देते हैं। कुछ लोग खुशी और उत्तेजना के एक पल की तलाश करने के लिए मेरा परित्याग कर देते हैं। कुछ लोग प्रकाश में रहने और पवित्र आत्मा के कार्य का आनंद प्राप्त करने के बजाय एक अंधेरी खोह में पड़े रहना पसंद करेंगे। कुछ लोग धन की अपनी लालसा को संतुष्ट करने के लिए दोस्तों की सलाह पर ध्यान नहीं देते हैं, और अब भी अपनी गलतियों को स्वीकार नहीं कर सकते हैं और अपनी दिशा में बदलाव नहीं कर सकते हैं। कुछ लोग मेरा संरक्षण प्राप्त करने के लिए केवल अस्थायी रूप से मेरे नाम के अधीन रहते हैं, जबकि अन्य लोग बेमन से मेरे प्रति थोड़ा-सा समर्पित होते हैं क्योंकि वे जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं। क्या ये और ऐसे अन्य क्रियाकलाप जो अनैतिक हैं और इससे भी बढ़कर सत्यनिष्ठा से रहित हैं, ऐसे व्यवहार नहीं हैं जिनसे लोग लंबे समय पहले अपने दिलों की गहराई में मेरे साथ विश्वासघात करते आ रहे हैं? निस्संदेह, मुझे पता है कि लोग मुझसे विश्वासघात करने की पहले से योजना नहीं बनाते, लेकिन उनका विश्‍वासघात उनकी प्रकृति का स्वाभाविक रूप से प्रकट होना है। कोई मेरे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहता, और इस बात से खुश तो कोई बिल्कुल भी नहीं होता कि उसने मेरे साथ विश्वासघात का कोई काम किया है। इसके विपरीत, वे डर से काँप रहे हैं, है ना? तो क्या तुम लोग इस बारे में सोच रहे हो कि तुम लोग इन विश्वासघातों की भरपाई कैसे कर सकते हो, और कैसे तुम लोग वर्तमान परिस्थिति को बदल सकते हो?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक बहुत गंभीर समस्या : विश्वासघात (1)

132. तुम लोग कीचड़ से अलग किए गए थे और हर हाल में तुम उन्हीं चीज़ों में से थे जिन्हें तलछट में से चुनकर निकाला गया था और तुम गंदे और परमेश्वर द्वारा घृणित थे। तुम लोग शैतान के थे और कभी उसके द्वारा कुचले और दूषित किए गए थे। इसीलिए यह कहा जाता है कि तुम कीचड़ से अलग किए गए थे और तुम पवित्र नहीं हो; बल्कि तुम गैर-इंसानी चीजें हो जिन्हें शैतान द्वारा बहुत पहले से मूर्ख बनाया जा रहा है। यह तुम लोगों का सबसे उपयुक्त आकलन है। तुम्हें पता होना चाहिए कि मूल रूप से तुम लोग, मछली और झींगे जैसे वांछनीय शिकारों के विपरीत, रुके हुए पानी और कीचड़ में पाई जाने वाली गंदगियाँ थे, क्योंकि तुमसे आनंद देने वाली कोई चीज नहीं मिल सकती। दो-टूक शब्दों में कहूँ तो, तुम लोग निम्न समाज के सबसे नीच जानवर हो, सूअरों और कुत्तों से भी बदतर। स्पष्ट कहूँ तो, तुम सबको इन शब्दों से संबोधित करना न तो अत्युक्ति है, न ही अतिशयोक्ति; बल्कि यह मुद्दे को सरल बना देता है। तुम लोगों को ऐसे शब्दों से संबोधित करना भी तुम्हें सम्मान देने का एक तरीका कहा जा सकता है। तुम लोगों की अंतर्दृष्टि, वाणी, मनुष्यों के रूप में व्यवहार, और साथ ही तुम्हारे जीवन का प्रत्येक पहलू और कीचड़ में तुम्हारा रुतबा यह साबित करने के लिए पर्याप्त हैं कि तुम लोगों की पहचान “असाधारण” है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य की अंतर्निहित पहचान और उसका मूल्य : वे असल में कैसे हैं?

133. मनुष्य मेरे शत्रुओं के अलावा कुछ नहीं हैं। मनुष्य वे दुष्ट हैं, जो मेरा विरोध और मुझसे विद्रोह करते हैं। मनुष्य मेरे द्वारा शापित उस दुष्ट की संतान के अतिरिक्त कुछ नहीं हैं। मनुष्य उस प्रधान दूत के वंशजों के अतिरिक्त कुछ नहीं है, जिसने मेरे साथ विश्वासघात किया था। मनुष्य उस दुष्ट दानव की विरासत के अतिरिक्त कुछ नहीं है जो बहुत पहले ही मेरे द्वारा ठुकरा दिया गया था और जो सीधे मुझसे शत्रुता रखता है। चूँकि सारी मानवजाति के ऊपर का आसमान, स्पष्टता की जरा-सी झलक के बिना, मलिन और अंधकारमय है, और मानव-संसार स्याह अँधेरे में इस तरह डूबा हुआ है कि उसमें रहने वाला व्यक्ति अपने चेहरे के सामने लाकर अपने हाथ को या अपना सिर उठाकर सूरज को भी नहीं देख सकता। उसके पैरों के नीचे की कीचड़दार और गड्ढों से भरी सड़क घुमावदार और टेढ़ी-मेढ़ी है; पूरी जमीन पर लाशें बिखरी हुई हैं। अँधेरे कोने मृतकों के अवशेषों से भरे पड़े हैं, जबकि ठंडे और छायादार कोनों में दानवों की भीड़ ने अपना निवास बना लिया है। हर कदम पर, दानव लोगों के बीच झुंडों में आते-जाते रहते हैं। सभी तरह के जंगली जानवरों की गंदगी से ढकी हुई संतानें घमासान युद्ध में उलझी हुई हैं, जिनकी आवाज दिल में दहशत पैदा करती है। ऐसे समय में, इस तरह के संसार में, ऐसे “सांसारिक स्वर्गलोक” में व्यक्ति जीवन के आनंद की खोज करने कहाँ जा सकता है? अपने जीवन की मंजिल खोजने के लिए कोई कहाँ जा सकता है? लंबे समय से शैतान के पैरों के नीचे रौंदी हुई मानवजाति शैतान की छवि लिए एक प्रस्तोता रही है—इससे भी अधिक, मानवजाति शैतान का मूर्त रूप है और वह शैतान की ओर से “जबरदस्त गवाही” देने वाले प्रमाण के रूप में काम करती है। ऐसी मानवजाति, ऐसे अधम लोगों का झुंड, भ्रष्ट मानव-परिवार की ऐसी संतान परमेश्वर की गवाही कैसे दे सकती है? मेरी महिमा कहाँ से आती है? क्या मेरी ऐसी कोई गवाही है जिसके बारे में बात की जा सके? क्योंकि उस शत्रु ने, जो मेरे खिलाफ खड़ा है और जिसने मानवजाति को भ्रष्ट किया है, पहले ही उस मानवजाति को—जिसे मैंने बहुत पहले बनाया था और जो मेरी महिमा और मेरे जीवन यापन से भरी थी—दूषित कर दिया है। उसने मेरी महिमा छीन ली है और मनुष्य में जो चीज भर दी है, वह शैतान की कुरूपता की भारी मिलावट वाला जहर और अच्छे और बुरे के ज्ञान के वृक्ष के फल का रस है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, एक वास्तविक व्यक्ति होने का क्या अर्थ है

134. मेरे सामने तुम लोगों के कई वर्षों के व्यवहार ने मुझे अभूतपूर्व उत्तर दे दिया, और इस उत्तर का प्रश्न यह है कि : “सत्य और सच्चे परमेश्वर के सामने मनुष्य का रवैया क्या है?” मैंने मनुष्य के लिए जो हृदय का खून उड़ेला है, यह मनुष्य के लिए मेरे प्रेम के सार को साबित करता है, और मेरे सामने मनुष्य के कार्य और कर्म सत्य से नफरत करने और मेरे विरोध में होने के उसके सार को प्रमाणित करता है। मैं हर समय उन सबके लिए चिंतित रहता हूँ, जिन्होंने मेरा अनुसरण किया, लेकिन मेरा अनुसरण करने वाले कभी मेरे वचन स्वीकारने में समर्थ नहीं होते; यहाँ तक कि वे मेरे सुझाव स्वीकार करने में भी सक्षम नहीं हैं। यह बात मुझे सबसे ज़्यादा उदास करती है। कोई भी मुझे कभी भी समझ नहीं पाया है, और कोई भी मुझे कभी स्वीकार तो और भी नहीं कर पाया है, बावजूद इसके कि मेरा रवैया सच्चा और मेरे वचन सौम्य हैं। सभी लोग मेरे द्वारा उन्हें सौंपा गया कार्य अपने इरादों के अनुसार करते हैं; वे मेरे इरादों को नहीं खोजते मेरी अपेक्षाओं के बारे में पूछने की बात तो छोड़ ही दो। वे अभी भी वफादारी के साथ मेरी सेवा करने का दावा करते हैं, जबकि वे मेरे खिलाफ विद्रोह करते हैं। बहुतों का यह मानना है कि जो सत्य उन्हें स्वीकार्य नहीं हैं या जिनका वे अभ्यास नहीं कर पाते, वे सत्य ही नहीं हैं। ऐसे लोगों में मेरे सत्य ऐसी चीज बन जाते हैं, जिन्हें नकार दिया जाता है और दरकिनार कर दिया जाता है। उसी समय, लोग मुझे वचन में परमेश्वर के रूप में स्वीकार करते हैं, परंतु साथ ही मुझे एक ऐसा बाहरी व्यक्ति मानते हैं, जो सत्य, मार्ग या जीवन नहीं है। इस सत्य को कोई नहीं जानता है : मेरे वचन सदा अपरिवर्तनीय सत्‍य हैं। मैं मनुष्य के लिए जीवन की आपूर्ति और मानवजाति के लिए एकमात्र मार्गदर्शक हूँ; मेरे वचनों का मूल्य और अर्थ इससे निर्धारित नहीं होता कि क्या उन्हें मानवजाति मानती या स्वीकार करती है, बल्कि स्वयं वचनों के सार से निर्धारित होता है; और भले ही इस पृथ्वी पर एक भी व्यक्ति मेरे वचन न स्वीकार कर सके, तो भी मेरे वचनों के मूल्य और मानवजाति के लिए उनके उपकार का आकलन करना किसी भी मनुष्य के लिए असंभव है। इसलिए मेरे वचनों के खिलाफ विद्रोह करने वाले, उनका खंडन करने वाले या उनका पूरी तरह से तिरस्कार करने वाले बहुत से लोगों से सामना होने पर मेरा रवैया केवल यह रहता है : समय और तथ्यों को मेरी गवाही देने दो और यह साबित करने दो कि मेरे वचन सत्य, मार्ग और जीवन हैं। उन्हें यह साबित करने दो कि जो कुछ मैंने कहा है वह सब सही है और वह ऐसा है जो मनुष्य के पास होना चाहिए और इतना ही नहीं, जो मनुष्य को स्वीकार करना चाहिए। मैं निश्चित करूँगा कि जो लोग मेरा अनुसरण करते हैं वे इस तथ्य को जान लें : जो लोग पूरी तरह से मेरे वचनों को स्वीकार नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं कर सकते, जो मेरे वचनों में कोई लक्ष्य नहीं खोज सकते और जो मेरे वचनों के माध्यम से उद्धार का अनुग्रह प्राप्त नहीं कर सकते, वे ऐसे लोग हैं जिनकी मेरे वचन निंदा करते हैं; यही नहीं, वे ऐसे लोग हैं जिन्होंने मेरे उद्धार का अनुग्रह गँवा दिया है, और मेरा डंडा उन्हें कभी नहीं छोड़ेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम लोगों को अपने कर्मों पर विचार करना चाहिए

पिछला: 2.1. शैतान कैसे मानवजाति को भ्रष्ट करता है यह प्रकट करने के बारे में वचन

अगला: 2.3. भ्रष्ट मानवजाति की धर्म-संबंधी धारणाओं, विधर्म और भ्रांतियों को प्रकट करने पर वचन

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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