2.3. भ्रष्ट मानवजाति की धर्म-संबंधी धारणाओं, विधर्म और भ्रांतियों को प्रकट करने पर वचन
135. परमेश्वर पर विश्वास करने में, परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए? परमेश्वर को बिना किसी भटकाव या भ्रामकता के उसके वर्तमान वचनों और कार्य के आधार पर जानना चाहिए, और अन्य सभी चीजों से पहले परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए, जो स्वयं परमेश्वर को जानने का आधार है। वे तमाम प्रकार की भ्रांतियाँ जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ नहीं है, धार्मिक धारणाएँ हैं, वे विकृत समझ हैं। धार्मिक हस्तियों का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वे अतीत में समझे गए परमेश्वर के वचनों के आधार पर उसके आज के वचनों की जाँच करते हैं। यदि आज के परमेश्वर की सेवा करते हुए, तुम अतीत में पवित्र आत्मा के प्रबोधन द्वारा खुलासा की गई बातों को पकड़े रहते हो, तो तुम्हारी सेवा गड़बड़ी पैदा करेगी, वह एक तरह से पुराना अभ्यास बन जाएगी, जो धार्मिक अनुष्ठानों से अधिक कुछ नहीं होगा। यदि तुम यह विश्वास करते हो कि जो परमेश्वर की सेवा करते हैं उनमें बाह्य रूप से, अन्य गुणों के साथ-साथ, विनम्रता और धैर्य का होना आवश्यक है, और यदि तुम आज इस प्रकार के ज्ञान को अभ्यास में लाते हो, तो ऐसा ज्ञान एक धार्मिक धारणा है; इस प्रकार से अभ्यास करना पाखंड प्रदर्शित करना है। “धार्मिक धारणाएँ” उन बातों को दर्शाती हैं जो पुरानी हो चुकी हैं (इनमें परमेश्वर द्वारा पहले कहे गए वचनों की समझ और पवित्र आत्मा के सीधे प्रबोधन का प्रकाश शामिल है) और यदि उन्हें आज अभ्यास में लाया जाता है, तो वे परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ करती हैं और मनुष्य को कोई लाभ नहीं पहुँचाती हैं। यदि मनुष्य स्वयं को उन चीजों से मुक्त नहीं कर पाता है जो धार्मिक धारणाओं से जुड़ी हैं, तो ये चीजें मनुष्य द्वारा परमेश्वर की सेवा में बहुत बड़ी बाधा बन जाएँगी। धार्मिक धारणाओं वाले लोगों के पास पवित्र आत्मा के कार्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का कोई उपाय नहीं है, वे एक कदम, फिर दो कदम पीछे हो जाएंगे—क्योंकि ये धार्मिक धारणाएँ मनुष्य को बेहद आत्मतुष्ट और घमंडी बना देती हैं। परमेश्वर अतीत में कही गई अपनी बातों और अपने द्वारा किए गए कार्यों के प्रति कोई मोह महसूस नहीं करता, यदि कुछ अप्रचलित हो गया है, तो वह उसे हटा देता है। क्या तुम सचमुच अपनी धारणाओं को त्यागने में असमर्थ हो? यदि तुम परमेश्वर के पूर्व में कहे गए वचनों से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो? यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश को स्वीकार करने में असमर्थ हो और इसके बजाय अतीत के प्रकाश से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है कि तुम परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते हो? क्या तुम अभी भी धार्मिक धारणाओं को छोड़ पाने में असमर्थ हो? यदि ऐसा है, तो तुम परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाओगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं
136. क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई प्रगति होती रहती है, कुछ ऐसा कार्य है जो नए कार्य के सामने आने पर अप्रचलित और पुराना हो जाता है। ये विभिन्न प्रकार के नए और पुराने कार्य परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं; हर अगला चरण पिछले चरण का अनुसरण करता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें बेशक हटा दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, लंबे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभव और सीखे गए सबकों के साथ मिलकर, मनुष्य के मन में अनेक तरह और रूपों की धारणाएँ बना दी हैं। परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और अंतर्निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है—साथ ही अतीत से लेकर वर्तमान तक कई वर्षों से परंपरागत सिद्धांतों का फैलाव जारी है—जो मनुष्य के ऐसी धारणाएँ बनाने में और भी अधिक सहायक है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास में, विभिन्न धारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण लोगों में परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार की धारणात्मक समझ निरंतर उत्पन्न और विकसित होती रही है, जिसके कारण कई ऐसे धार्मिक लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसके शत्रु बन गए हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक धारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता—वह कभी भी विनियम नहीं बनाता है; बल्कि यह निरंतर विभिन्न स्तरों के बदलाव और नवीनीकरण से गुजरता रहता है। परमेश्वर का इस तरह कार्य करना उसके अंतर्निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत भी है और कार्य करने के उन तरीकों में से एक है जिनके माध्यम से परमेश्वर अपना प्रबंधन निष्पादित करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य नहीं बदलेगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परंतु वास्तव में ये निश्चित अवधियों में होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर में विश्वास करता है, वह बहुत अलग है। वह पुराने, परिचित विनियमों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और वे जितने पुराने होते हैं, उसे उतने ही प्रिय लगते हैं। मनुष्य का मूर्ख मन, जो पत्थर के समान अपरिवर्तनशील है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नया बने रहने वाले और कभी पुराना न पड़ने वाले परमेश्वर को नापसंद करता है; वह हमेशा ही केवल उस पुराने परमेश्वर को पसंद करता है जिसके दाँत लंबे और बाल सफेद हैं और जो चल-फिर नहीं सकता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी “पसंद” है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, एक ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छह हजार सालों से नया कार्य करता आ रहा है। तो वे किसी भी इलाज से परे हैं। शायद मनुष्य के हठ के कारण या शायद किसी भी मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों की अलंघनीयता के कारण, वे पुरुष और महिला पादरी अभी भी घिसी-पिटी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को पूरा करने में इस तरह लगा रहता है मानो कोई भी देख नहीं रहा हो। भले ही ऐसे प्रतिकूल विरोधाभास मौजूद हैं जिनका समाधान करना संभव नहीं है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, मानो वे होकर भी नहीं हैं। लेकिन मनुष्य तब भी अपने विश्वास और धारणाओं से चिपका रहता है और उन्हें कभी छोड़ता नहीं है। फिर भी, एक बात स्वतःस्पष्ट है : भले ही मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के “कदम” हमेशा एक स्थान पर टिके नहीं रहते हैं और वह अपना रुख परिवेश के अनुसार हमेशा बदलता रहता है। अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने पराजित दुश्मनों का “सबसे बड़ा शत्रु” है और वह मानवजाति का “परम विजेता” भी है, समान रूप से पराजित और अपराजित दोनों का। परमेश्वर के साथ कौन लड़ सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की धारणाएँ परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं, क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्य के साथ ही थोड़ा-थोड़ा करके आई हैं। जो भी हो, परमेश्वर इस कारण से मनुष्य को क्षमा नहीं कर देता, वह अपने कार्य के साथ ही खेप-दर-खेप “परमेश्वर के लिए” ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा तो बिल्कुल नहीं करता है जो उसके कार्यक्षेत्र के बाहर हों। इसके बजाय, वह मनुष्य की धारणाओं और पुरानी भक्ति से बेहद घृणा करता है और उसका इरादा उस तारीख पर ध्यान देने तक का नहीं है जब ये धारणाएँ सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये धारणाएँ उसके कार्य के कारण पैदा हुई हैं, क्योंकि मनुष्य की धारणाएँ मनुष्य के संसर्ग से आती हैं; उनका स्रोत मनुष्य की सोच और दिमाग है—परमेश्वर नहीं, बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्य को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वे युगों और कालों में विभाजित हैं, न कि अनंत और स्थिर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर ही है जिसके कारण मनुष्य जीवित रहता है और नया बनता है, न कि शैतान जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम लोग अभी भी यह नहीं समझते हो? तुममें परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नही हो, ऐसा चीजों को समझने में तुम्हारी विफलता के कारण है—ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य के भीतर तर्क का बहुत अभाव है और न ही इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य के प्रति विचारशील नहीं है; ऐसा इसलिए तो बिल्कुल नहीं है क्योंकि परमेश्वर अपने उचित कार्य पर कभी ध्यान नहीं देता है। तुम अपनी धारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ पाते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर समर्पण की अत्यधिक कमी है, और क्योंकि तुममें परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी की थोड़ी सी भी समानता नहीं है; ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; सारे कष्ट और विपदा मनुष्य ने ही पैदा किए हैं। परमेश्वर की सोच हमेशा अच्छी होती है : वह तुम्हें धारणाएँ विकसित करने देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी नवीनीकृत हो जाओ और परिवर्तन से गुजरो। फिर भी तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, और तुम हमेशा परख या विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें ही परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है और तुम्हारी विद्रोहशीलता बहुत ज्यादा है। एक अदना-सा सृजित प्राणी पूर्व में परमेश्वर द्वारा दी गई किसी चीज के एक मामूली-से हिस्से को लेकर और पलटकर उसी से परमेश्वर पर प्रहार करने का साहस करता है—क्या यह मनुष्य का विद्रोह नहीं है? यह कहना उचित होगा कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और वह अपनी व्यर्थ की, बदबूदार, सड़ी-गली, पुरानी शब्दावली के साथ अपनी मनमानी करने में तो और भी अयोग्य है—उन घिसी-पिटी धारणाओं का तो कहना ही क्या। क्या वे और भी बेकार नहीं हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं
137. परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता, फिर भी जिन तरीकों से वह कार्य करता है वे निरंतर बदलते रहते हैं; इसलिए जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे भी निरंतर बदलते रहते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक पूर्ण होता जाता है। परमेश्वर के कार्य के परिणामस्वरूप मनुष्य के स्वभाव में तदनुरूप बदलाव आता है। लेकिन चूँकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है, इसलिए पवित्र आत्मा के कार्य को न समझने वाले और वे बेतुके लोग जो सत्य नहीं समझते, परमेश्वर का विरोध करने वाले लोग बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता, न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है, बल्कि वह कार्य करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं किया है। चूँकि परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर ही उसके आज के कार्य का आकलन करता है, इस कारण परमेश्वर के लिए नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना लगातार अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्य के सामने बहुत अधिक मुश्किलें हैं! मनुष्य की सोच बहुत ही रूढ़िवादी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता, फिर भी हर कोई उसे सीमा में बांध देता है। जब मनुष्य परमेश्वर से दूर जाता है, तो वह जीवन, सत्य और परमेश्वर के आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले अधिक बड़े आशीषों को तो बिल्कुल ग्रहण नहीं करता। सभी लोग परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव सहन नहीं करते। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा ठहरा रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से अनंत उद्धार प्राप्त करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह है व्यवस्था का पालन करना, जब तक वे पश्चात्ताप करेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, परमेश्वर के इरादे हमेशा संतुष्ट होंगे। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर न तो बाइबल से बढ़कर होना चाहिए और न ही वो हो सकता है। उनके इन्हीं विचारों ने उन्हें पुरानी व्यवस्था से दृढ़ता से बाँध रखा है और मृत विनियमों में जकड़कर रखा है। ऐसे लोग तो और भी हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर का नया कार्य जो भी हो, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया जाना ही चाहिए और कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी “सच्चे” मन से उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें प्रकाशन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए; अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। मनुष्य के बेतुके हृदय और उसकी अभिमान एवं दंभी विद्रोही प्रकृति को देखते हुए, परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के नए कार्य की सावधानीपूर्वक जाँच करता है, न ही उसे विनम्रता से स्वीकार करता है; इसके बजाय मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए उसके प्रति तिरस्कार का रवैया अपनाता है। क्या ये अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करने वाले मनुष्य की नहीं हैं? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?
138. चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का निकटता से अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि “यहोवा परमेश्वर है” और “यीशु मसीह है,” जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करता हो, यदि मनुष्य बिना किसी संदेह के अनुसरण करता है और वह निकटता से अनुसरण करता है, तो फिर पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को कैसे निकाला जा सकता है? परमेश्वर चाहे जो भी करे, जब तक मनुष्य निश्चित है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दंड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रुका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और अपने प्रबंधन-कार्य की पूर्णता से पहले वह सदैव व्यस्त रहा है और कभी नहीं रुकता। किंतु मनुष्य अलग है : पवित्र आत्मा के कार्य का थोड़ा-सा अंश प्राप्त करने के बाद वह उसके साथ इस तरह व्यवहार करता है मानो वह कभी नहीं बदलेगा; जरा-सा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता; परमेश्वर के कार्य का थोड़ा-सा ही अंश देखने के बाद वह तुरंत ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के होने में सीमित कर देता है और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इसी छवि में बना रहेगा जिसे वह देखता है, कि यह अतीत में भी ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा; सिर्फ थोड़ा-सा सतही स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य इतना घमंडी हो जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य उस नए कार्य को स्वीकार नहीं करता। इस तरह के लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते; वे बहुत रूढ़िवादी हैं और नई चीजों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, किंतु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य का मानना है कि इस्राएलियों का “केवल यहोवा में विश्वास करना और यीशु में विश्वास न करना” ग़लत था, किंतु अधिकतर लोग ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, जिसमें वे “केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं” और “मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किंतु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।” तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं करते। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर में ईसाई धर्म के सभी लोग, जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है, यह मानते हुए कि परमेश्वर उनकी संबंधित इच्छाएँ पूरी करेगा, इस उम्मीद से चिपके रहते हैं कि वे भाग्यशाली होंगे। फिर भी वे पूरी निश्चितता से यह नहीं कह सकते कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा या कैसे यीशु उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, वे तो पूर्ण निश्चितता के साथ यह भी नहीं कह सकते कि यीशु वास्तव में उस दिन सफेद बादल पर सवार होकर आएगा या नहीं, जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चितित और हैरान हैं; वे स्वयं भी नहीं जानते कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े-से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हर पंथ से आते हैं। परमेश्वर द्वारा अभी किया जाने वाला कार्य, वर्तमान युग, परमेश्वर के इरादे—इनमें से किसी भी चीज की उन्हें कोई समझ नहीं है और वे अपनी उँगलियों पर दिन गिनने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही अंतिम आशीष प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे “चतुर लोग,” जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं, किंतु विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिना किसी कारण परमेश्वर के कार्य के निरंतर विकास को बीच में ही रोक देते हैं, तथा पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा—वे, जिनकी “परमेश्वर के प्रति अटूट निष्ठा है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।” भले ही उनमें परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के प्रति “अटूट निष्ठा” हो, फिर भी उनकी कथनी और करनी अत्यंत घिनौनी है, क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और कपट और बुराई करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकते और केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं, वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो नए युग द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं और जो दंडित किए जाएँगे। क्या उनसे भी अधिक दयनीय कोई है? अनेक तो यहाँ तक विश्वास करते हैं कि जो लोग प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे सभी अंतरात्मा विहीन हैं। ये लोग, जो केवल “अंतरात्मा” पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, अंततः अपनी ही अंतरात्मा द्वारा अपने भविष्य की संभावनाओं को बीच में नहीं रोकेंगे। यहाँ तक कि परमेश्वर भी अपने कार्य में विनियमों का पालन नहीं करता, और भले ही वह उसका अपना कार्य हो, फिर भी परमेश्वर उससे चिपका नहीं रहता। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा जाता है, जिसे निकाल दिया जाना चाहिए उसे निकाल दिया जाता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के एक छोटे-से भाग को ही पकड़े रहकर खुद को उसके विरोध में खड़ा कर लेता है। क्या यह मनुष्य की बेहूदगी नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? आशीष प्राप्त न करने के डर से लोग जितना अधिक कायर और अति-सतर्क होते हैं, उतना ही अधिक वे और अधिक आशीष प्राप्त करने और अंतिम आशीष पाने में असमर्थ होते हैं। जो लोग हठपूर्वक व्यवस्था का पालन करते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अटूट निष्ठा प्रदर्शित करते हैं और जितनी अधिक वे व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी दिखाते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। चूँकि अब व्यवस्था का युग नहीं, राज्य का युग है, इसलिए आज के कार्य और अतीत के कार्य का उल्लेख एक-साथ नहीं किया जा सकता, न ही अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है और मनुष्य का अभ्यास भी बदल चुका है; वह व्यवस्था को थामे रहना या सलीब उठाना नहीं है। इसलिए, व्यवस्था और सलीब के प्रति लोगों की वफादारी को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
139. मनुष्य जो भ्रष्ट हो चुके हैं, जो शैतान के जाल में जीते हैं, वे सभी देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं जो मेरे अनुरूप हो। जो कहते हैं कि वे मेरे अनुरूप हैं, वे सब अज्ञात मूर्तियों की आराधना करते हैं। भले ही वे मेरे नाम को पवित्र मानने का दावा करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सब स्वाभाविक रूप से मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही “उपयुक्त” अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचन पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुरूप कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे एक अज्ञात परमेश्वर को जिसे उन्होंने देखा ही नहीं है और आधारभूत रूप से देख भी नहीं सकते, बाइबल की सीमाओं के भीतर परिसीमित करते हैं, वे फुरसत के समय में बाइबल निकालकर पढ़ते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापों पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत-से लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे निरे शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं, इस हद तक कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुरूपता का मार्ग या सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने का मार्ग खोजते हैं और विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। वे उस समय के यीशु के अनुरूप होने का प्रयास नहीं करते थे, बल्कि व्यवस्था के प्रत्येक अनुच्छेद के साथ इतनी गंभीरता से पेश आते थे कि—यीशु पर यह दोष लगाने के बाद कि वह पुराने नियम की व्यवस्था का पालन नहीं करता और मसीहा नहीं है—अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुरूपता के मार्ग की खोज नहीं की? वे केवल पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर ध्यान देते थे, जबकि मेरे इरादों और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि पवित्रशास्त्र के शब्दों से ढिठाई से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। अगर बात की तह में जाएँ तो वे बाइबल के ठेकेदार बन बैठे थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक शब्द का रुतबा बनाए रखने के लिए किया। इसलिए उन्होंने अपना भविष्य त्यागना और पापबलि को प्राप्त न करना पसंद किया ताकि पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुरूप न होने के कारण यीशु को मृत्यु-दंड दे सकें। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक शब्द के दास नहीं थे?
और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? वे उस मसीह को, जो सत्य को प्रकट करने आया है, इस संसार से निकाल देना ज्यादा पसंद करेंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकारना और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ाना पसंद करेंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतनी अधिक दुर्भावना से भरा है और उसकी प्रकृति मेरे प्रति इतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे में नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं मनुष्य पर अपना क्रोध बरसाता हूँ तो वह और भी अधिक मेरे अस्तित्व को नकारता है। मनुष्य शब्दों और बाइबल के साथ अनुरूपता खोजता है, फिर भी कोई भी मेरे सामने सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग खोजने नहीं आता। मैं स्वर्ग में रहूँ तो मनुष्य मेरा आदर करता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में रहूँ तो कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो मनुष्य के बीच रहता हूँ, अत्यंत महत्त्वहीन हूँ। जो लोग सिर्फ बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ एक अज्ञात परमेश्वर के अनुरूप होने की खोज करते हैं, वे मेरी दृष्टि में तुच्छ हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अथाह धन देने में सक्षम है; वे जिस परमेश्वर की पूजा करते हैं, वह ऐसा परमेश्वर है जो स्वयं को मनुष्य की दया पर रख देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य की तुच्छता शब्दों से परे है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मुझसे असीमित माँगें करते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुरूप कैसे हो सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए
140. यदि तुम परमेश्वर के मापन और परिसीमन के लिए धारणाओं का उपयोग करते हो, मानो परमेश्वर कोई मिट्टी की अचल मूर्ति हो, पूरी तरह परमेश्वर को बाइबल तक सीमांकित करते हो और उसे कार्य के एक सीमित दायरे में बाँधते हो तो इससे यह प्रमाणित होता है कि तुम लोगों ने परमेश्वर की निंदा की है। चूँकि पुराने विधान के युग के यहूदियों ने परमेश्वर को एक अचल प्रतिमा के रूप में लिया था जिसे वे अपने हृदयों में रखते थे, मानो परमेश्वर को मात्र मसीहा ही कहा जा सकता था और मात्र वही जिसे मसीहा कहा जाता था, परमेश्वर हो सकता हो और चूँकि लोग परमेश्वर की सेवा और आराधना इस तरह से करते थे, मानो वह मिट्टी की एक (निर्जीव) मूर्ति हो, इसलिए उन्होंने उस समय के यीशु को मौत की सजा देते हुए सलीब पर चढ़ा दिया—निर्दोष यीशु को इस तरह मौत की सजा दे दी गई। परमेश्वर निर्दोष था, फिर भी मनुष्य ने उसे छोड़ने से इनकार कर दिया, अड़ियल बनकर उसे मृत्युदंड दे दिया और इसलिए यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया। मनुष्य सदैव विश्वास करता है कि परमेश्वर स्थिर है, और वह उसे एक अकेली पुस्तक बाइबल के आधार पर सीमित करता है, मानो मनुष्य को परमेश्वर के प्रबंधन की पूर्ण समझ हो, मानो मनुष्य वह सब अपनी हथेली पर रखता हो जो परमेश्वर करता है। लोग चरम रूप से बेतुके, चरम रूप से अहंकारी हैं और उनमें बड़ी-बड़ी बातें करने का पैदाइशी हुनर है। परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान कितना भी उत्कृष्ट क्यों न हो, मैं फिर भी यही कहता हूँ कि तुम परमेश्वर को नहीं जानते, तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर का सबसे अधिक विरोध करता है और तुमने परमेश्वर को दोषी ठहराया है, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलने में सर्वथा अक्षम हो। क्यों परमेश्वर मनुष्य के कार्यकलापों से कभी संतुष्ट नहीं होता? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को कभी नहीं जानता, उसकी बहुत-सी धारणाएँ हैं, परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान वास्तविकता से किसी भी तरह मेल नहीं खाता; इसके बजाय, वह सूत्रबद्ध और दोहराया जाने वाला होता है और यंत्रवत ढंग से अनुकृत और कठोरता से लागू किया जाता है। और इसलिए, आज पृथ्वी पर आने पर, परमेश्वर को एक बार फिर मनुष्य द्वारा सलीब पर चढ़ा दिया गया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बुरे लोगों को निश्चित ही दंड दिया जाएगा
141. कई सहस्राब्दियों से मनुष्य ने उद्धारकर्ता के आगमन को देखने की लालसा की है। मनुष्य उद्धारकर्ता यीशु को एक सफेद बादल पर सवार होकर व्यक्तिगत रूप से उन लोगों के बीच उतरते देखने के लिए तरसा है, जो हज़ारों सालों से उसके लिए लालायित रहे हैं और उसकी आशा की है। मनुष्य ने यह भी लालसा की है कि उद्धारकर्ता वापस लौटे और उसके साथ फिर से जुड़े; अर्थात् लोगों से हज़ारों सालों से अलग हुए उद्धारकर्ता यीशु के वापस आने और एक बार फिर से छुटकारे के उस कार्य को करने की, जो उसने यहूदियों के बीच किया था, मनुष्य के प्रति दयालु और प्रेममय होने की, मनुष्य के पाप क्षमा करने और उन्हें अपने ऊपर लेने की, यहाँ तक कि मनुष्य के सभी अपराध ग्रहण करने और उसे पाप से बचाने की लालसा की है। मनुष्य उद्धारकर्ता यीशु के पहले के समान होने की लालसा करता है—ऐसा उद्धारकर्ता जो प्यारा, दयालु और आदरणीय है, जो मनुष्य से कभी गुस्सा नहीं होता, और जो कभी मनुष्य को धिक्कारता नहीं, बल्कि जो मनुष्य के सारे पाप क्षमा करता है और उन्हें अपने ऊपर ले लेता है, यहाँ तक कि जो एक बार फिर से मनुष्य के लिए सलीब पर अपनी जान दे देगा। जब से यीशु गया है, वे चेले जो उसका अनुसरण करते थे, और वे सभी संत जिन्हें उसके नाम पर बचाया गया था, वे बेतहाशा उसे याद कर रहे और उसके आने की अपेक्षा कर रहे हैं। वे सभी, जो अनुग्रह के युग के दौरान यीशु मसीह के अनुग्रह द्वारा बचाए गए थे, अंत के दिनों के दौरान उस उल्लास भरे दिन की लालसा कर रहे हैं, जब उद्धारकर्ता यीशु सफेद बादल पर सवार होकर असंख्य लोगों के बीच प्रकट होगा। निस्संदेह, यह उन सभी लोगों की सामूहिक इच्छा भी है, जो आज उद्धारकर्ता यीशु के नाम को स्वीकार करते हैं। विश्व भर में वे सभी, जो उद्धारकर्ता यीशु के उद्धार को जानते हैं, वे अत्यधिक लालायित हैं कि यीशु मसीह अचानक आकर, पृथ्वी पर कहे अपने ये वचन पूरे करे : “मैं जैसे गया था वैसे ही मैं वापस आऊँगा।” मनुष्य मानता है कि सलीब पर चढ़ने और पुनरुत्थान के बाद यीशु सर्वोच्च परमेश्वर की दाईं ओर अपना स्थान ग्रहण करने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर स्वर्ग वापस चला गया था। इसी प्रकार यीशु फिर से सफेद बादल पर सवार होकर (यह बादल उस बादल को संदर्भित करता है, जिस पर यीशु तब सवार हुआ था, जब वह स्वर्ग वापस गया था), उन लोगों के बीच वापस आएगा, जिन्होंने हज़ारों सालों से उसके लिए बेतहाशा लालसा की है, और वह यहूदियों का स्वरूप और उनके कपड़े धारण करेगा। उनके सामने प्रकट होने के बाद वह उन्हें भोजन प्रदान करेगा, उनके लिए जीवंत जल को उड़ेलेगा और मनुष्यों के बीच में रहेगा, अनुग्रह और प्रेमपूर्ण अनुकंपा से भरा हुआ, जीवंत और वास्तविक। ये सभी वे धारणाएँ हैं, जिन्हें लोग मानते हैं। किंतु उद्धारकर्ता यीशु ने ऐसा नहीं किया; उसने जो किया वह मनुष्य की धारणाओं के बिल्कुल विपरीत था। वह उन लोगों के बीच में नहीं आया, जिन्होंने बेसब्री से उसकी वापसी की लालसा की थी, और वह सफेद बादल पर सवार होकर असंख्य मनुष्यों के सामने प्रकट नहीं हुआ। वह पहले ही आ चुका है, किंतु मनुष्य उसे नहीं जानता, वह इससे अनभिज्ञ बना हुआ है। मनुष्य केवल निरुद्देश्य होकर उसका इंतज़ार कर रहा है—उसे थोड़ा भी अंदाजा नहीं है कि वह तो पहले ही “सफेद बादल” पर सवार होकर नीचे आ चुका है (वह सफेद बादल, जो उसका आत्मा, उसके वचन, उसका संपूर्ण स्वभाव और उसका स्वरूप है), और वह अब उन विजेताओं के समूह के बीच है, जिसे वह अंत के दिनों के दौरान बनाएगा। मनुष्य इसे कैसे जान सकता था कि भले ही पवित्र उद्धारकर्ता यीशु मनुष्य के प्रति प्रेमपूर्ण अनुकंपा और प्रेम से भरा हुआ है, पर उसका उन “मंदिरों” में कार्य करना संभव नहीं है जो गंदगी से भरे हैं और जहाँ अशुद्ध आत्माएँ रहती हैं? यद्यपि मनुष्य उसके आगमन का इंतज़ार करता रहा है, फिर भी वह उनके सामने कैसे प्रकट हो सकता है जो अधार्मिक का मांस खाते हैं, अधार्मिक का रक्त पीते हैं और अधार्मिकों के वस्त्र पहनते हैं, जो उस पर विश्वास तो करते हैं फिर भी उसे जानते नहीं, और लगातार उससे जबरदस्ती माँगते रहते हैं? मनुष्य केवल यही जानता है कि उद्धारकर्ता यीशु प्रेमपूर्ण अनुकंपा और दयालुता से परिपूर्ण है, और वह एक पाप-बलि है जो छुटकारे से भरपूर है। परंतु मनुष्य को नहीं पता कि वह स्वयं परमेश्वर है, जो धार्मिकता, प्रताप, कोप और न्याय से लबालब भरा है, और अधिकार और गौरव से संपन्न है। इसलिए, भले ही मनुष्य छुटकारा दिलाने वाले की वापसी के लिए उत्सुकता से लालायित रहता है और उसके लिए तरसता है, यहाँ तक कि उसकी प्रार्थनाएँ “स्वर्ग” को भी द्रवित कर देती हैं, किंतु उद्धारकर्ता यीशु उन लोगों के सामने प्रकट नहीं होता, जो उस पर विश्वास तो करते हैं किंतु उसे जानते नहीं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, उद्धारकर्ता पहले ही एक “सफेद बादल” पर सवार होकर वापस आ चुका है
142. यदि, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, यीशु पुनः आएगा और अंत के दिनों में तब भी यीशु कहलाएगा, और तब भी एक सफेद बादल पर यीशु की छवि में मनुष्य के बीच अवरोहण करेगा : तो क्या यह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या पवित्र आत्मा पुराने से चिपके रह सकता है? मनुष्य जो कुछ भी मानता है, वे धारणाएँ हैं, और जो कुछ भी मनुष्य समझता है, वह शाब्दिक अर्थ के अनुसार है, और साथ ही उसकी कल्पनाओं के अनुसार है; वे पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं, और परमेश्वर के विचारों से मेल नहीं खाते हैं। परमेश्वर उस तरह से कार्य नहीं करेगा; परमेश्वर इतना अज्ञानी और नासमझ नहीं है, और उसका कार्य इतना सरल नहीं है जितना कि तुम कल्पना करते हो। लोगों की कल्पनाओं के अनुसार, यीशु एक बादल पर सवार होकर आएगा और तुम लोगों के बीच उतरेगा। तुम लोग उसे देखोगे, जो एक बादल पर सवारी करते हुए तुम लोगों को बताएगा कि वह यीशु है। तुम लोग उसके हाथों में कीलों के निशान भी देखोगे, और उसे यीशु के रूप में जानोगे। और वह तुम लोगों को फिर से बचाएगा, और तुम लोगों का शक्तिशाली परमेश्वर होगा। वह तुम लोगों को बचाएगा, तुम लोगों को एक नया नाम प्रदान करेगा, और तुम लोगों में से प्रत्येक को एक सफ़ेद पत्थर देगा, जिसके बाद तुम लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दिया जाएगा और स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत किया जाएगा। क्या इस तरह के विश्वास मनुष्य की धारणाएँ नहीं हैं? क्या परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता है, या क्या वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत कार्य करता है? क्या मनुष्य की सभी धारणाएँ शैतान से नहीं आतीं? क्या सब मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किए गए हैं? यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार अपना कार्य करता, तो क्या वह शैतान नहीं बन गया होता? क्या वह उसी प्रकार का नहीं होता, जैसे सृजित प्राणी हैं? चूँकि सृजित प्राणी अब शैतान द्वारा इतने भ्रष्ट हो गए हैं और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, इसलिए यदि परमेश्वर शैतान की चीज़ों के अनुसार कार्य करता, तो क्या वह शैतान के साथ मिला हुआ नहीं होता? मनुष्य परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? इसलिए, परमेश्वर कभी मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करेगा, और कभी उस तरह से कार्य नहीं करेगा, जैसी तुम कल्पना करते हो। तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर ने कहा था कि वह एक बादल पर आएगा। यह सच है कि परमेश्वर ने स्वयं ऐसा कहा था, पर क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के रहस्यों की थाह नहीं पा सकता? क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के वचनों की व्याख्या नहीं कर सकता? क्या तुम, बिना लेशमात्र संदेह के, निश्चित हो कि तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन कर दिया गया था? निश्चित रूप से ऐसा नहीं था कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें इतने प्रत्यक्ष तरीके से निर्देश दिया था? क्या वह पवित्र आत्मा था, जिसने तुम्हें निर्देश दिए थे, या तुम्हारी स्वयं की धारणाओं ने तुम्हें ऐसा सोचने के लिए प्रेरित किया? तुम कह सकते हो, “यह स्वयं परमेश्वर द्वारा कहा गया था।” किंतु हम परमेश्वर के वचनों को मापने के लिए अपनी धारणाओं और मन का उपयोग नहीं कर सकते। जहाँ तक यशायाह के वचनों की बात है, क्या तुम पूरी निश्चितता के साथ उसके वचनों की व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम उसके वचनों की व्याख्या करने का साहस करते हो? चूँकि तुम यशायाह के वचनों की व्याख्या करने का साहस नहीं करते, तो तुम यीशु के वचनों की व्याख्या करने का साहस क्यों करते हो? कौन अधिक बड़ा है, यीशु अथवा यशायाह? चूँकि उत्तर यीशु है, तो तुम यीशु द्वारा बोले गए वचनों की व्याख्या क्यों करते हो? क्या परमेश्वर अपने कार्य के बारे में तुम्हें अग्रिम रूप से बताएगा? कोई एक सृजित प्राणी भी नहीं जान सकता, यहाँ तक कि स्वर्ग के दूत भी नहीं, और न ही मनुष्य का पुत्र जान सकता है, तो तुम कैसे जान सकते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
143. क्या तुम लोग इसकी जड़ जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम लोग फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसलिए वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग का कोई ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है। तुम्हीं लोग बताओ ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे मसीहा को देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इससे भी अधिक इसलिए क्योंकि वे मसीहा को नहीं समझते थे। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं जुड़े थे, उन्होंने मसीहा के बस नाम के साथ चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का आज्ञापालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या यह सोच हास्यास्पद और बेतुकी नहीं है? मैं तुम लोगों से आगे पूछता हूँ : क्या तुम लोगों के लिए वो गलतियाँ करना बेहद आसान नहीं जो उस समय के फरीसियों ने की थीं, क्योंकि तुम लोगों के पास यीशु की थोड़ी-भी समझ नहीं है? क्या तुम सत्य के मार्ग का भेद पहचान सकते हो? क्या तुम सचमुच विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में समर्थ हो? यदि तुम नहीं जानते कि तुम मसीह का विरोध करोगे या नहीं, तो मेरा कहना है कि तुम पहले ही मौत की कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे, वे सभी यीशु का विरोध करने वाले कार्य करने, यीशु को अस्वीकार करने, उसे बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते, वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उसे बुरा-भला कहने में सक्षम हैं। इससे भी अधिक, वे यीशु के लौटने को शैतान द्वारा गुमराह किए जाने की तरह देखने में सक्षम हैं और ज्यादातर लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सब से तुम लोगों को डर नहीं लगता? जिसका तुम लोग सामना करते हो, वह पवित्र आत्मा के खिलाफ निंदा होगी, कलीसियाओं के लिए कहे गए पवित्र आत्मा के वचनों को चीरना होगा और यीशु द्वारा व्यक्त किए गए समस्त वचनों को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम हठपूर्वक होश में आने से इनकार करते हो तो तुम लोग उस कार्य को कैसे समझ सकते हो जिसे यीशु श्वेत बादल पर देह में लौटने पर करता है? मैं तुम लोगों को यह बताता हूँ : जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, फिर भी अंधों की तरह श्वेत बादलों पर यीशु के आगमन का इंतजार करते हैं, वे निश्चित रूप से वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा की ईश-निंदा करते हैं और ये वो वर्ग है जो निश्चित तौर पर नष्ट कर दिया जाएगा। तुम लोग सिर्फ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो और सिर्फ स्वर्ग के सुखद क्षेत्र का आनंद लेना चाहते हो, तुमने यीशु के कहे वचनों का कभी पालन नहीं किया और जब यीशु देह में लौटता है तो उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को तुमने कभी नहीं स्वीकारा। यीशु के एक श्वेत बादल पर लौटने के तथ्य के बदले तुम लोग क्या दोगे? क्या वही ईमानदारी जिससे तुम लोग बार-बार पाप करते हो और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? श्वेत बादल पर लौटने वाले यीशु को तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या यह कार्य के कई वर्षों की वह पूँजी है, जिसके जरिए तुम लोग अपनी बड़ाई करते हो? तुम किस चीज को पेश करोगे, ताकि लौटकर आए यीशु को तुम पर भरोसा हो? क्या वह तुम लोगों की अभिमानी प्रकृति है, जो किसी भी सत्य को समर्पित नहीं होती?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा
144. तुम लोगों की निष्ठा सिर्फ वचन में है, तुम लोगों का ज्ञान सिर्फ सोच और धारणाओं का है, तुम लोगों की कड़ी मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीष पाने के लिए है तो तुम लोगों की आस्था किस प्रकार की होगी? आज भी, तुम लोग सत्य के प्रत्येक वचन को अनसुना कर देते हो। तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि मसीह क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि यहोवा का भय कैसे मानें, तुम लोग नहीं जानते कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश करें और तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर स्वयं के कार्य और मनुष्य द्वारा गुमराह किए जाने के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के किसी भी ऐसे वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो, जो तुम्हारे विचारों के अनुरूप नहीं होता। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारा समर्पण कहाँ है? तुम्हारी निष्ठा कहाँ है? सत्य खोजने का तुम्हारा रवैया कहाँ है? परमेश्वर का भय मानने वाला तुम्हारा हृदय कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से वह श्रेणी होगी, जो नष्ट की जाएगी। जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकारने में अक्षम हैं, वे निश्चित ही नरक के वंशज, महा देवदूत के वंशज हैं, उस श्रेणी में हैं जो हमेशा के लिए नष्ट कर दी जाएगी। बहुत-से लोगों को शायद इसकी परवाह न हो कि मैं क्या कहता हूँ, किंतु फिर भी मैं यीशु का अनुसरण करने वाले हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते अपनी आँखों से देखोगे तो यह धार्मिकता के सूर्य के सार्वजनिक प्रकटन का समय होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा। हालाँकि तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते देखोगे तो यह वह समय भी होगा जब तुम दंडित किए जाने के लिए नीचे नरक में जाओगे, वह समय होगा जब परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा की जा चुकी होगी और जब परमेश्वर अच्छे लोगों को पुरस्कार और बुरे लोगों को दंड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय उस समय से पहले ही समाप्त हो चुका होगा जब मनुष्य चिह्न देखता है, जब सिर्फ सत्य की अभिव्यक्ति होती है। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं और चिह्न नहीं खोजते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए गए हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लाए जा चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ वे जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि “ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता, एक झूठा मसीह है” अनंत दंड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो चिह्न प्रदर्शित करता है, पर उस यीशु को स्वीकार नहीं करते जो कड़ा न्याय अभिव्यक्त करता है और जीवन और सच्चा मार्ग प्रदान करता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटे तो वह उनसे निपटे। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अहंकारी हैं। ऐसे नीच लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु की वापसी उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है, जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, पर जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं उनके लिए यह दोषी ठहराए जाने का संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के खिलाफ ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करता हो और सत्य के लिए प्यासा होकर इसकी खोज करता हो; सिर्फ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। स्वेच्छाचारी रूप से निष्कर्ष पर मत पहुँचो; और परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और ढीले-ढाले तो और भी मत रहो। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनके पास विनम्र और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए। जिन्होंने सत्य सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो सत्य को सुन चुके हैं और फिर भी लापरवाही से निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या इसे दोषी ठहराते हैं वे अहंकारी लोग हैं। जो भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को शाप देने या निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास विवेक है और जो सत्य स्वीकार करता है। शायद सत्य का मार्ग सुन लेने और जीवन का वचन पढ़ लेने के बाद तुम्हें यह लगता है कि इन वचनों में से केवल दस हजार में एक वचन तुम्हारी समझ और बाइबल के अनुरूप है और फिर तुम्हें इन्हीं वचनों के उस दस हजारवें हिस्से में खोज जारी रखनी चाहिए। मैं तुम्हें सुझाव भी देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो और बहुत अभिमानी न बनो। तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला जो थोड़ा-सा दिल है उसके चलते तुम और अधिक रोशनी प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्य पढ़कर, कुछ लोग इन वचनों की आँखें मूँदकर यह कहते हुए निंदा करेंगे, “यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है” या “यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को गुमराह करने आया है।” जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे बहुत अज्ञानी हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः शुरू से आरंभ करने की सलाह देता हूँ! तुम लोगों को सिर्फ इस वजह से कि अंत के दिनों में झूठे मसीह प्रकट होंगे, परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त वचनों की आँख मूँदकर निंदा नहीं करनी चाहिए, तुम्हें गुमराह होने के डर से ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करता हो। क्या यह बहुत ही पछतावे की बात नहीं होगी? यदि बार-बार जाँच के बाद अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दंडित किए जाओगे और आशीष के बिना होगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा
145. तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, फिर भी तुममें उसके प्रति बहुत सारी धारणाएँ हैं, इस हद तक कि तुम इस बारे में एक क्षण के लिए भी यह सोचने की हिम्मत नहीं करते कि इस्राएलियों का परमेश्वर अपनी उपस्थिति से तुम लोगों पर अनुग्रह करेगा। यह जानते हुए कि तुम कितने अधिक मलिन हो, तुम लोग इस बारे में सोचने की हिम्मत तो बिल्कुल नहीं करते कि तुम कैसे परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से प्रकट होते हुए देख सकते हो। न ही तुम लोगों ने कभी यह सोचा है कि कैसे एक अन्य-जाति भूमि में परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अवतरित हो सकता है। उसे तो सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर अवतरित होकर इस्राएलियों के समक्ष प्रकट होना चाहिए। क्या अन्य-जाति (यानी इस्राएल से बाहर के लोग) के सभी लोग उसकी घृणा के पात्र नहीं हैं? वह व्यक्तिगत रूप से उनके बीच कैसे काम कर सकता है? ये सब ऐसी गहरी जड़ों वाली धारणाएँ हैं जो तुम लोगों ने बहुत वर्षों में विकसित की हैं। आज तुम लोगों पर विजय प्राप्त करने का उद्देश्य है तुम लोगों की इन धारणाओं को ध्वस्त करना। इस तरह तुम लोग परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से अपने बीच में प्रकट होते हुए देखते हो—सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर नहीं, बल्कि उन लोगों के बीच जिनकी उसने पहले कभी अगुआई नहीं की है। जब परमेश्वर ने इस्राएल में अपने दो चरणों का कार्य कर लिया तो उसके बाद इस्राएलियों और सारे अन्य-जाति राष्ट्रों ने समान रूप से यह धारणा अपना ली कि यूँ तो यह सच है कि परमेश्वर ने सभी चीजें बनाई हैं, लेकिन वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर बनने का इच्छुक है, अन्य-जाति राष्ट्रों का नहीं। इस्राएली मानते हैं कि परमेश्वर केवल हमारा परमेश्वर हो सकता है, तुम सभी अन्य-जातियों का नहीं, और क्योंकि तुम लोग यहोवा का भय नहीं मानते, इसलिए यहोवा—हमारा परमेश्वर—तुम लोगों से घृणा करता है। वे यहूदी लोग इस बात को और भी अधिक मानते हैं : प्रभु यीशु ने हम यहूदियों की छवि ग्रहण की थी और वह ऐसा परमेश्वर है जिस पर यहूदियों का चिह्न है। परमेश्वर हमारे बीच ही कार्य करता है। परमेश्वर की छवि और हमारी छवि समान है; हमारी छवि परमेश्वर के करीब है। प्रभु यीशु हम यहूदियों का राजा है; अन्य-जाति राष्ट्र ऐसा महान उद्धार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। प्रभु यीशु हम यहूदियों के लिए पाप-बलि है। कार्य के केवल इन दो चरणों के आधार पर ही इस्राएलियों और यहूदियों ने ये सारी धारणाएँ बना ली थीं। वे रोब से स्वयं के लिए परमेश्वर पर दावा करते हैं, यह अनुमति नहीं देते कि परमेश्वर अन्य-जाति राष्ट्रों का भी परमेश्वर है। इस प्रकार, परमेश्वर अन्य-जातियों के दिल में एक रिक्त स्थान बन गया। क्योंकि हर कोई यह मानने लगा था कि परमेश्वर अन्य-जातियों का परमेश्वर नहीं बनना चाहता, वह केवल इस्राएलियों को ही पसंद करता है—जो उसके चुने हुए लोग हैं—और वह यहूदियों को पसंद करता है, विशेषकर उन अनुयायियों को जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि यहोवा और यीशु ने जो कार्य किया, वह सारी मानवजाति के अस्तित्व के लिए किया था? क्या तुम अब मानते हो कि परमेश्वर इस्राएल से बाहर पैदा हुए तुम सब लोगों का परमेश्वर है? क्या परमेश्वर आज ठीक यहीं तुम लोगों के बीच नहीं है? यह कोई सपना नहीं है, है न? क्या तुम लोग इस वास्तविकता को नहीं स्वीकारते? तुम लोग इस पर विश्वास करने की या इसके बारे में सोचने की हिम्मत नहीं करते। तुम लोग इसे जैसे चाहे देखो, लेकिन क्या परमेश्वर तुम लोगों के बीच यहाँ नहीं है? क्या तुम लोग अभी भी इन शब्दों पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते हो? इस दिन से, क्या वे सभी जिन पर विजय प्राप्त कर ली गई है और जो लोग परमेश्वर के अनुयायी बनना चाहते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं? क्या तुम सभी, जो आज अनुयायी हो, इस्राएल के बाहर चुने हुए लोग नहीं हो? क्या तुम लोगों की बिल्कुल वही पहचान नहीं है जो इस्राएलियों की है? क्या तुम लोगों को यह सब समझ नहीं लेना चाहिए? क्या तुम लोगों पर विजय पाने के कार्य का यही उद्देश्य नहीं है? क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को देख सकते हो, तो वह हमेशा ही तुम लोगों का परमेश्वर रहेगा, शुरू से लेकर भविष्य तक। जब तक तुम लोग उसका अनुसरण करने, उसके प्रति वफादार और समर्पित सृजित प्राणी बने रहने के लिए तैयार रहोगे, तब तक वह तुम लोगों को अकेला नहीं छोड़ेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)
146. अपनी पुरानी धारणाओं को एक तरफ रखकर ही तुम नए ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो, फिर भी पुराना ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुरानी धारणाएँ हो। मनुष्य द्वारा कल्पना की गई बातों को “धारणाएँ” कहते हैं जो वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खाती हैं। यदि पुराना ज्ञान, युगों के बीतने के साथ अप्रचलित हो गया है, तो इसे त्याग दिया जाना चाहिए। पुराना ज्ञान लोगों की धारणाओं का एक हिस्सा है और यह उन्हें नए कार्य में प्रवेश करने से रोकता है। यदि कोई इस पुराने ज्ञान के साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता है और पुराने और नए ज्ञान को मिलाने में सक्षम है, तो पुराना ज्ञान वास्तव में उसके लिए सहायक बन जाता है, वह आधार बन जाता है जिसके द्वारा वह नए युग में प्रवेश करता है। परमेश्वर को जानने के सबक के लिए कई सिद्धांतों में निपुण होना आवश्यक है : जैसे कि परमेश्वर को जानने के मार्ग पर किस प्रकार प्रवेश करें, परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें कौन-से सत्यों को समझना चाहिए और किस प्रकार से अपनी धारणाओं और पुराने स्वभावों को उतार फेंकना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर के नए कार्य की सभी व्यवस्थाओं के लिए समर्पण कर सको। यदि तुम परमेश्वर को जानने के सबक में प्रवेश करने के लिए इन सिद्धांतों का आधार के रूप में उपयोग करते हो, तो तुम्हारा ज्ञान और गहरा हो जाएगा। यदि तुम्हें कार्य के तीन चरणों—अर्थात परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना—का गहन ज्ञान है और यदि तुम वर्तमान चरण के साथ परमेश्वर के कार्य के पिछले दोनों चरणों को पूरी तरह से जोड़ सको और देख सको कि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो तुम्हारे पास सबसे अधिक गहरा आधार होगा। ... यदि मनुष्य कार्य के तीनों चरणों में यह देख सकता है कि वे विभिन्न समयों, स्थानों में और लोगों पर स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए जाते हैं, अगर मनुष्य यह देख सकता है कि यद्यपि कार्य भिन्न है, तब भी यह सब एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और चूँकि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो इसे सही और त्रुटिहीन होना चाहिए, और यह भी कि यद्यपि यह मनुष्यों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है, तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक ही परमेश्वर का कार्य है—यदि मनुष्य निश्चित होकर कह सके कि यह एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, तो मनुष्य की धारणाएँ तुच्छ हो जाएँगी और उनका उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं रहेगा। मनुष्य दर्शनों के बारे में अस्पष्ट है, वह केवल यहोवा को परमेश्वर के रूप में और यीशु को प्रभु के रूप में जानता है और आज के देहधारी परमेश्वर के बारे में दुविधा में है। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से लोग अभी भी यहोवा और यीशु के कार्यों से जुड़े हुए हैं, और आज के कार्य के बारे में धारणाओं से ग्रस्त हैं, अधिकांश लोग हमेशा अनिश्चित महसूस करते हैं और आज के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं। मनुष्य की कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में कोई धारणाएँ नहीं हैं, जो अदृश्य थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य पिछले दोनों चरणों की वास्तविकता को नहीं समझता है और व्यक्तिगत रूप से वह उनका साक्षी नहीं रहा है। चूँकि कार्य के इन चरणों को देखा नहीं जा सकता है, इसलिए मनुष्य इनके बारे में मनचाही कल्पनाएँ करता है; वह कुछ भी क्यों न सोचता रहे, पर इन कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं, और इन्हें सुधारने वाला भी कोई नहीं है। मनुष्य कोई सावधानी बरते बिना और अपनी कल्पनाओं को बेलगाम दौड़ाते हुए अपने मिजाज को खुली छूट दे देता है। उसकी कल्पनाओं को सत्यापित करने के लिए कोई तथ्य नहीं है, इसलिए मनुष्य की कल्पनाएँ “तथ्य” बन जाती हैं, भले ही वे जाँच-परख में सही सिद्ध हों या न हों। इस प्रकार, मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को ही मानने लगता है और वास्तविकता के परमेश्वर का अनुसरण नहीं करता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य के पास इसी प्रकार के विश्वास हैं क्योंकि उसने परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे सिर्फ अपने कानों से सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्य ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है, परंतु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार, वे जो केवल एक वर्ष से विश्वासी रहे हैं, परमेश्वर पर अपनी खुद की धारणाओं के माध्यम से विश्वास करते हैं और यही उन सभी के बारे में भी सही है जिन्होंने परमेश्वर पर जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें परमेश्वर के बारे में उनकी अपनी धारणाएँ हैं। मनुष्य यह मानता है कि उसने स्वयं को अपनी सभी पुरानी धारणाओं के बंधनों से मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य यह नहीं जानता कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाह है? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और त्रुटिहीन हैं और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह कई वर्षों से मन में जमी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। परमेश्वर का आज तक अनुसरण करने वाले कई लोगों की इस कार्य के प्रत्येक कदम के प्रति धारणाएँ और भी अधिक गंभीर हो गई हैं और इन लोगों ने धीरे-धीरे देहधारी परमेश्वर के प्रति एक दुराग्रही घृणा पैदा कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। तथ्य मनुष्य को अपनी कल्पना को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, किसी मनमाने खंडन के आगे झुकना तो दूर की बात है; मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं; इसके अलावा, मनुष्य तथ्यों के सही होने और उनकी प्रामाणिकता पर विचार नहीं करता और केवल अपनी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है और अपनी कल्पनाओं को विकसित करता रहता है। ठीक इसी कारण से मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, ऐसा कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
147. लोग कहते हैं, “परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है। अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे धार्मिक है। यदि मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है?” मैं सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ और सभी लोगों का न्याय अपने धार्मिक स्वभाव से करता हूँ, फिर भी मैं लोगों से जो अपेक्षाएँ रखता हूँ उन सबमें उचित शर्तें शामिल होती हैं, और मैं जो अपेक्षा करता हूँ वह सभी लोगों के लिए पूरा करना जरूरी है, चाहे वे कोई भी हों। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि तुम कितने वरिष्ठ हो या कितने अनुभवी हो; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तुम मेरे मार्ग का अनुसरण कर रहे हो या नहीं, सत्य के लिए तुममें प्रेम और प्यास है या नहीं। यदि तुममें सत्य की कमी है, और इसकी बजाय तुम मेरे नाम का अनादर करते हो, और मेरे मार्ग के अनुसार क्रिया-कलाप नहीं करते हो, कोई परवाह या चिंता किए बगैर सिर्फ अनुसरण मात्र कर रहे हो, तो मैं उस समय तुम पर प्रहार करूँगा और तुम्हारी बुराई के लिए तुम्हें दंड दूँगा, तब तुम्हारे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तुम यह कह पाओगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? यदि तुमने आज मेरे द्वारा बोले गए सभी वचनों का पालन किया है, तो तुम एक ऐसे इंसान हो जिसे मैं स्वीकृति देता हूँ। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हमेशा पीड़ा सही है, कि तुमने तूफानों के बीच उसका अनुसरण किया है और उसके साथ अच्छा और बुरा समय बिताया है, लेकिन तुमने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को नहीं जिया है; तुम हर दिन सिर्फ परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करना और उसके लिए स्वयं को खपाना चाहते हो, तुमने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में नहीं सोचा है। तुम यह भी कहते हो, “चाहे जो हो, मैं मानता हूँ कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं उसके लिए पीड़ा सहता हूँ, उसके लिए भाग-दौड़ करता हूँ और अपने आपको उसे समर्पित करता हूँ, और भले ही मेरे पास कोई उपलब्धियाँ न हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है; वह निश्चित ही मुझे याद रखेगा।” यह सच है कि परमेश्वर धार्मिक है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है : इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और यह देह या मानवीय लेन-देनों से दूषित नहीं है। जो लोग विद्रोही हैं और विरोध में हैं, जो उसके मार्ग का पालन नहीं करते हैं, उन सबको दंडित किया जाएगा; न तो किसी को क्षमा किया जाएगा, न ही किसी को बख्शा जाएगा! कुछ लोग कहते हैं, “आज मैं तुम्हारे लिए भाग-दौड़ करता हूँ; अंत में क्या तुम मुझे थोड़ा-सा आशीष दे सकते हो?” इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, “क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है?” तुम जिस धार्मिकता की बात करते हो, वह एक लेन-देन पर आधारित है। तुम केवल यह सोचते हो कि मैं धार्मिक हूँ, कि मैं सब लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे और मेरे आशीष प्राप्त करेंगे। “जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे,” मेरे इन वचनों का एक आंतरिक अर्थ है : जो लोग बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो मेरे द्वारा जीते जाने के बाद, सत्य खोजते हैं और जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। तुम कितनी अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हो? तुमने केवल अंत तक मेरा अनुसरण करने की अपेक्षा पूरी की है, लेकिन और क्या? क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है? तुमने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं है। तुमने बस सबसे सरल और आसान रास्ता ढूँढ़ लिया है और भाग्यशाली होने की उम्मीद के रवैये के साथ अनुसरण किया है। तुम्हारे जैसे इंसान के लिए मेरे धार्मिक स्वभाव का अर्थ सिर्फ ताड़ना और न्याय और धार्मिक प्रतिफल है; इसका अर्थ है बुरा काम करने वाले सभी लोगों के लिए धार्मिक दंड। जो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं उन सबको निश्चित ही दंड दिया जाएगा, भले ही वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। जब यह धार्मिक स्वभाव मनुष्य के दंड में व्यक्त होता है, तो मनुष्य भौंचक्का रह जाता है, और उसे अफसोस होता है कि परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उसने उसके मार्ग का अनुसरण क्यों नहीं किया। “उस समय, परमेश्वर का अनुसरण करते हुए मैंने केवल थोड़ा-सा ही कष्ट सहा, किंतु मैंने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया। इसके लिए क्या बहाने बनाये जा सकते हैं? ताड़ना दिए जाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है!” फिर भी वह अपने मन में सोच रहा होता है, “जो भी हो, मैंने तेरा अंत तक अनुगमन किया है, अगर तू मुझे ताड़ना भी देगा, तो वह ताड़ना बहुत कठोर नहीं हो सकती, और मेरी ताड़ना करने के बाद भी तू मुझे चाहेगा। मैं जानता हूँ कि तू धार्मिक है, और तू हमेशा मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेगा। आखिरकार, मैं उनके समान नहीं हूँ जिन्हें मिटा दिया जाएगा; जो मिटा दिए जाएँगे, उन्हें कठोर ताड़ना मिलेगी, जबकि मेरी ताड़ना हल्की होगी।” परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव वैसा नहीं है जैसा तुम कहते हो। ऐसा नहीं है कि जो लोग अपने पाप सही तरह से स्वीकारते हैं उनके साथ नरमी से निपटा जाता है। धार्मिकता पवित्रता है, और एक ऐसा स्वभाव है जो मनुष्य के द्वारा अपमान को सहन नहीं कर सकता, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक आज्ञा है : यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा हर उस व्यक्ति के लिए धार्मिक दंड है जिसमें सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और जिसके उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति को उसकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दंड दिया जाएगा। इसी समय मनुष्य के गंतव्य को भी प्रकट किया जाएगा; यह वह समय होगा जब उद्धार का कार्य भी समाप्त हो जाएगा, उसके बाद मनुष्य के उद्धार का कार्य नहीं किया जाएगा, और बुराई करने वाले हर इंसान को कठोर दंड दिया जाएगा। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर उनमें से हर एक को याद रखता है जो अक्सर उसके निकट होते हैं। वह हममें से किसी को भी नहीं भूलेगा। हमें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाएगा। परमेश्वर नीचे के लोगों में से किसी को याद नहीं रखेगा। यह निश्चित है कि नीचे के लोगों में से जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा, वे संख्या में हमसे कम हैं, हम जो अक्सर परमेश्वर से मेल-जोल करते हैं; परमेश्वर हममें से किसी को भी भुला नहीं पाएगा, हम सभी को परमेश्वर ने योग्य पाया है, और परमेश्वर निश्चित रूप से हमें पूर्ण बनाएगा।” तुम सभी के अंदर ऐसी ही धारणाएँ हैं। क्या यह धार्मिकता है? तुम सत्य को अभ्यास में लाए हो या नहीं? दरअसल, तुम इस तरह की बेबुनियाद अफवाहें फैलाते हो—तुममें कोई शर्म नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
148. तुम लोगों को पता होना चाहिए कि तुम लोग परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध या आज के कार्य को मापने के लिए अपनी ही धारणाओं का उपयोग इसलिए करते हो, क्योंकि तुम लोग परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को नहीं जानते हो, और क्योंकि तुम पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति लापरवाही बरतते हो। तुम लोगों द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध और पवित्र आत्मा के कार्य में अवरोध तुम लोगों की धारणाओं और तुम लोगों के अंतर्निहित अहंकार के कारण है। ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर का कार्य गलत है, बल्कि इसलिए है कि तुम लोग स्वाभाविक रूप से अत्यंत विद्रोही हो। परमेश्वर में विश्वास हो जाने के बाद भी, कुछ लोग यकीन से यह भी नहीं कह सकते हैं कि मनुष्य कहाँ से आया, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कार्य के सही और गलत होने के बारे में राय बनाते हुए सार्वजनिक भाषण देने का साहस करते हैं। यहाँ तक कि वे उन प्रेरितों को भी नसीहतें देते हैं जिनके पास पवित्र आत्मा का नया कार्य है, उन पर टिप्पणी करते हैं और अभद्र बातें बोलते रहते हैं; उनकी मानवता बहुत ही निम्न स्तर की है और उनमें रत्ती-भर भी विवेक नहीं है। क्या वह दिन नहीं आएगा जब इस प्रकार के लोग पवित्र आत्मा के कार्य के द्वारा ठुकरा दिए जाएँगे और नरक की आग द्वारा भस्म कर दिए जाएँगे? वे परमेश्वर के कार्यों को नहीं जानते हैं, फिर भी उसके कार्य पर राय बनाते हैं और परमेश्वर को यह निर्देश देने की कोशिश करते हैं कि कार्य किस प्रकार किया जाए। इस प्रकार के विवेक से रहित लोग परमेश्वर को कैसे जान सकते हैं? मनुष्य खोजने और अनुभव करने की प्रक्रिया के दौरान ही परमेश्वर को जान पाता है; मनुष्य द्वारा मनमाने आकलन करने के दौरान पवित्र आत्मा के प्रबोधन के माध्यम से परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं होता। परमेश्वर के बारे में लोगों का ज्ञान जितना अधिक सटीक होता जाता है, उतना ही कम वे उसका प्रतिरोध करते हैं। इसके विपरीत, लोग परमेश्वर के बारे में जितना कम जानते हैं, उतनी ही ज्यादा उनके द्वारा परमेश्वर का प्रतिरोध करने की संभावना रहती है। तुम्हारी धारणाएँ, तुम्हारी पुरानी प्रकृति और तुम्हारी मानवता, चरित्र और नैतिक दृष्टिकोण वह पूँजी है जिससे तुम परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो और जितनी अधिक तुम्हारी नैतिकता भ्रष्ट होती है, तुम्हारा चरित्र उतना ही अधिक नीच होता है और तुम्हारी मानवता जितनी निम्न स्तर की होती है, उतना ही अधिक तुम परमेश्वर के शत्रु बन जाते हो। जो लोग प्रबल धारणाएँ रखते हैं और आत्मतुष्ट स्वभाव के होते हैं, वे देहधारी परमेश्वर के प्रति और भी अधिक शत्रुतापूर्ण होते हैं; इस प्रकार के लोग मसीह-विरोधी हैं। यदि तुम्हारी धारणाओं में सुधार न किया जाए, तो वे सदैव परमेश्वर की विरोधी रहेंगी; तुम कभी भी परमेश्वर की अनुरूपता में नहीं होगे और सदैव उससे दूर रहोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
149. जबसे यीशु के देहधारी होने का सत्य सामने आया है, तबसे मनुष्य ने विश्वास कर लिया है कि स्वर्ग में न केवल पिता है, बल्कि पुत्र भी है और यहां तक कि आत्मा भी है। यह पारंपरिक धारणा है, जिसे मनुष्य धारण किए है कि इस तरह का एक परमेश्वर स्वर्ग में है : एक त्रयात्मक परमेश्वर जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है। समस्त लोगों में ये धारणाएं हैं : परमेश्वर एक परमेश्वर है, पर उसमें तीन भाग शामिल हैं, जिसे गंभीर रूप से पारंपरिक धारणाओं में जकड़े वे सभी लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मानते हैं। केवल इन्हीं तीनों भागों के एकाकार होने से संपूर्ण परमेश्वर बनता है। पवित्र पिता के बिना परमेश्वर संपूर्ण नहीं होगा। इसी प्रकार से, न ही पुत्र और पवित्र आत्मा के बिना परमेश्वर संपूर्ण होगा। अपनी धारणाओं में वे यह विश्वास करते हैं कि न तो अकेले पिता को और न अकेले पुत्र को ही परमेश्वर माना जा सकता है। केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक साथ मिलाकर परमेश्वर स्वयं माना जा सकता है। अब, सभी धार्मिक विश्वासी और तुम लोगों में से प्रत्येक अनुयायी भी इस बात पर विश्वास करता है। फिर भी, जहाँ तक इसकी बात है कि यह विश्वास सही है कि नहीं, तुम लोगों में से कोई नहीं समझा सकता, क्योंकि तुम लोग हमेशा स्वयं परमेश्वर के मामलों को लेकर भ्रम के कोहरे में रहते हो। यहाँ तक कि जब इंसानी धारणाओं पर आधारित ज्ञान की बात आती है, तब तुम लोग नहीं जानते कि यह सही है या गलत क्योंकि तुम लोग धार्मिक धारणाओं से बुरी तरह संक्रमित हो गए हो। तुम लोगों ने धर्म की इन पारंपरिक धारणाओं को बहुत गहराई से स्वीकार कर लिया है और यह ज़हर तुम्हारे भीतर बहुत गहरे रिसकर चला गया है। इसलिए इस मामले में भी तुम इन हानिकारक प्रभावों के आगे झुक गए हो क्योंकि त्रयात्मक परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। इसका मतलब यह है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व अस्तित्व में ही नहीं है। ये सब मनुष्य की पारंपरिक धारणाएं हैं और मनुष्य के भ्रामक विश्वास हैं। कई सदियों से मनुष्य का इस त्रित्व पर विश्वास रहा है, ये मनुष्य के मन में धारणाओं से जन्मा, मनुष्य द्वारा गढ़ा गया और मनुष्य द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। इन अनेक वर्षों के दौरान बाइबल के कई प्रतिपादक हुए हैं, जिन्होंने त्रित्व का “सही अर्थ” समझाया है, पर तीन भिन्न व्यक्तियों के रूप में त्रयात्मक परमेश्वर की ऐसी व्याख्याएं अनिश्चित और अस्पष्ट रही हैं और सभी लोग परमेश्वर की “संरचना” के बारे में संभ्रमित हैं। कोई भी महान व्यक्ति कभी भी इसकी पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं रहा है; अधिकांश व्याख्याएं, तर्क के मामले में और कागज़ पर जायज़ ठहरती हैं, परंतु एक भी व्यक्ति को इसके अर्थ की पूरी तरह स्पष्ट समझ नहीं है। यह इसलिए क्योंकि यह महान त्रित्व, जो मनुष्य अपने हृदय में धारण किए है, वह अस्तित्व में है ही नहीं। ...
यदि त्रित्व की इस अवधारणा के अनुसार काम के तीन चरणों का मूल्यांकन किया जाना है, तो तीन परमेश्वर होने चाहिए क्योंकि प्रत्येक द्वारा क्रियान्वित कार्य एकसमान नहीं हैं। यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में है, तो समझाओ कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य नहीं था? क्या उस समय यहोवा का कार्य भी उसी आत्मा द्वारा नहीं किया गया था जिसने यीशु का कार्य किया? परमेश्वर में कितने आत्माएँ हो सकते हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन व्यक्ति एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएँ हैं, लेकिन तीन आत्माओं के होने का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं, जो एक सच्चा परमेश्वर नहीं होगा। इस प्रकार के परमेश्वर में अभी भी परमेश्वर का निहित सार कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका पुत्र या पिता कैसे हो सकता है? क्या ये सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा बाइबल में लिखा गया है कि “केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक परमेश्वर है।” जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो, वे चाहे अस्तित्व में हों, कुल मिलाकर परमेश्वर एक ही है और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार, जिसे तुम लोग मानते हो, पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है लेकिन वह देहधारण करने और लोगों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में और पूरे ब्रह्मांड में और उसके ऊपर हो सकता है। चूँकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा से बिल्कुल विभाजित नहीं किया जा सकता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है और केवल एक ही व्यक्ति है; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि जैसा तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक विषय है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक अन्य विषय है। उनके व्यक्ति अलग हैं और उनके सार अलग हैं, तो उनमें से प्रत्येक एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकता है? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझना आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना है; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है और निश्चित रूप से वह भी एक आत्मा है। तो इस आत्मा और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच का संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का संबंध है या एक इंसान और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि उनके पास एक आत्मा है। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्माओं की शक्ति भिन्न होती और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करती है और प्रत्येक को एक ओहदा और आत्मा देकर उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करती है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ कि क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा द्वारा बनाई गई थीं? कुछ कहते हैं कि उन्होंने यह सब मिलकर बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ कहते हैं कि वह पुत्र था, जिसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया था। तो फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा की देहधारी देह नहीं है? एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से देह स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाती है। क्या तुम्हें पता नहीं कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर के साथ एक है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है। पुत्र का यह विचार बिल्कुल असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी कार्य क्रियान्वित करता है, यह स्वयं परमेश्वर है जो इसे क्रियान्वित करता है—यानी यह परमेश्वर का आत्मा है जो कार्य करता है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है, जो यीशु में कार्य करता है? यदि कार्य पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर का आत्मा) द्वारा क्रियान्वित नहीं किया गया था, तो क्या उसका कार्य स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? जब प्रार्थना करते हुए यीशु ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया, तो यह केवल एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से किया गया था, केवल इसलिए कि परमेश्वर के आत्मा ने एक सामान्य और साधारण देह का चोला धारण किया था और उसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का था। भले ही उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा था, उसका बाहरी प्रकटन अभी भी एक सामान्य मनुष्य का था; दूसरे शब्दों में, वह “मनुष्य का पुत्र” बन गया था, जिसके बारे में सभी लोगों ने और साथ ही स्वयं यीशु ने भी बात की थी। यह देखते हुए कि वह मनुष्य का पुत्र कहलाता है, वह एक व्यक्ति है (चाहे पुरुष हो या महिला, हर हाल में एक इंसान के बाहरी आवरण के साथ) जो सामान्य लोगों के साधारण परिवार में पैदा हुआ। इसलिए, यीशु का स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना, वैसा ही था जैसे तुम लोगों ने पहले उसे पिता कहा था; उसने एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से ऐसा किया। क्या तुम लोगों को अभी भी प्रभु की प्रार्थना याद है, जो यीशु ने तुम लोगों को याद करने के लिए सिखाई थी? “स्वर्ग में हमारे पिता...” उसने सभी लोगों से स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाने को कहा। और चूँकि वह भी उसे पिता कहता था, उसने ऐसा उस व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से किया, जो तुम सभी के साथ समान स्तर पर खड़ा था। चूँकि तुम लोगों ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया था, यीशु ने स्वयं को तुम सबके साथ समान स्तर पर देखा और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा चुने गए मनुष्य (अर्थात परमेश्वर के पुत्र) के रूप में देखा। यदि तुम लोग परमेश्वर को पिता कहते हो, तो क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम लोग सृजित प्राणी हो? पृथ्वी पर यीशु का अधिकार चाहे जितना अधिक हो, क्रूस पर चढ़ने से पहले, वह मात्र मनुष्य का पुत्र था, पवित्र आत्मा (यानी परमेश्वर) द्वारा नियंत्रित था और पृथ्वी के सृजित प्राणियों में से एक था क्योंकि अभी भी उसका अपना कार्य करना बाकी था। इसलिए, स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना पूरी तरह से उसकी विनम्रता और आज्ञाकारिता थी। हालाँकि उसका परमेश्वर (अर्थात स्वर्ग में आत्मा) को इस प्रकार संबोधन करना यह साबित नहीं करता कि वह स्वर्ग में परमेश्वर के आत्मा का पुत्र है। बल्कि, यह केवल यही है कि उसका दृष्टिकोण अलग था, न कि वह एक अलग व्यक्ति था। अलग व्यक्तियों का अस्तित्व एक मिथ्या है! क्रूस पर चढ़ने से पहले, यीशु मनुष्य का पुत्र था, जो देह की सीमाओं से बंधा था और उसमें पूरी तरह आत्मा का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि वह केवल एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमपिता परमेश्वर के इरादे खोज सकता था। यह वैसा ही है जैसा गतसमनी में उसने तीन बार प्रार्थना की थी : “जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।” क्रूस पर रखे जाने से पहले, वह बस यहूदियों का राजा था; मनुष्य का पुत्र, मसीह, था और महिमा का शरीर नहीं था। यही कारण है कि एक सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से, उसने परमेश्वर को पिता बुलाया। अब तुम यह नहीं कह सकते कि सभी जो परमेश्वर को पिता बुलाते हैं, पुत्र हैं। यदि ऐसा होता, तो क्या यीशु द्वारा प्रभु की प्रार्थना सिखाए जाने के बाद, तुम सभी पुत्र नहीं बन गए होते? यदि तुम लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो तो मुझे बताओ, वह कौन है जिसे तुम सब पिता कहते हो? यदि तुम यीशु की बात कर रहे हो तो तुम सबके लिए यीशु का पिता कौन है? यीशु के चले जाने के बाद पिता और पुत्र का यह विचार नहीं रहा। यह विचार केवल उन वर्षों के लिए उपयुक्त था जब यीशु देह में था; अन्य सभी परिस्थितियों में, जब तुम परमेश्वर को पिता कहते हो, तो यह वह रिश्ता है, जो सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणी के बीच होता है। ऐसा कोई समय नहीं, जिस पर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के त्रित्व का विचार खड़ा रह सके; यह भ्रांति है, जो युगों तक शायद ही कभी देखी गई है और इसका अस्तित्व नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
150. बाइबल के पुराने नियम में, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का उल्लेख नहीं है, केवल एक ही सच्चे परमेश्वर यहोवा का उल्लेख है, जिसने इस्राएल में अपने कार्य को क्रियान्वित किया था। जैसे युग बदलता है, उसके अनुसार परमेश्वर को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं हो सकता कि प्रत्येक नाम एक अलग व्यक्ति का हवाला देता है। यदि ऐसा होता तो क्या परमेश्वर में असंख्य व्यक्ति न होते? पुराने नियम में जो लिखा है, वह यहोवा का कार्य है, व्यवस्था के युग में स्वयं परमेश्वर के कार्य का वह चरण, जो कि शुरुआती कार्य का चरण था। यह परमेश्वर का कार्य था, जहाँ वह बोला और यह अस्तित्व में आ गया और उसने आज्ञा दी और यह स्थिर हो गया। यहोवा ने कभी नहीं कहा कि वह पिता है जो कार्य क्रियान्वित करने आया है, न ही उसने कभी पुत्र के मानवजाति के छुटकारे के लिए आने की भविष्यवाणी की। जब यीशु के समय की बात आई, तो केवल यह कहा गया कि परमेश्वर समस्त मानवजाति को छुड़ाने के लिए देहधारी हुआ था, न कि यह कि पुत्र आया था। चूँकि युग एक जैसे नहीं होते और जो कार्य स्वयं परमेश्वर करना चाहता है, वह भी अलग होता है, उसे अपने कार्य को अलग-अलग क्षेत्रों में क्रियान्वित करना होता है। इस तरह, वह पहचान भी अलग होती है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का मानना है कि यहोवा यीशु का पिता है, लेकिन यह वास्तव में यीशु ने स्वीकार नहीं किया था, जिसने कहा : “हम पिता और पुत्र के रूप में कभी अलग नहीं थे; मैं और स्वर्ग में पिता एक हैं। पिता मुझ में है और मैं पिता में हूँ; जब मनुष्य पुत्र को देखता है, तो वह स्वर्गिक पिता को देख रहा होता है।” जब यह सब कहा जा चुका है, पिता हो या पुत्र, वे एक आत्मा हैं, अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं हैं। जब मनुष्य समझाने की कोशिश करता है, तो अलग-अलग व्यक्तियों के विचार के साथ ही मामला जटिल हो जाता है, साथ ही पिता, पुत्र और आत्मा के बीच का संबंध भी। जब मनुष्य अलग-अलग व्यक्तियों की बात करता है, तो क्या यह परमेश्वर को मूर्तरूप नहीं देता? यहाँ तक कि मनुष्य व्यक्तियों को पहले, दूसरे और तीसरे के रूप में स्थान भी देता है; ये सभी बस मनुष्य की कल्पनाएँ हैं, संदर्भ के योग्य नहीं हैं और पूरी तरह अवास्तविक हैं! यदि तुमने उससे पूछा : “कितने परमेश्वर हैं?” तो वह कहेगा कि परमेश्वर एक सच्चा परमेश्वर है जिसमें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व है। यदि तुमने आगे पूछा : “पिता कौन है?” वह कहेगा : “पिता स्वर्ग में परमेश्वर का आत्मा है; वह सबका प्रभारी है और स्वर्ग का स्वामी है।” “तो क्या यहोवा आत्मा है?” वह कहेगा : “हाँ!” यदि तुमने फिर उससे पूछा, “पुत्र कौन है?” तो वह कहेगा कि निश्चित रूप से यीशु पुत्र है। “तो यीशु की कहानी क्या है? वह कहाँ से आया था?” वह कहेगा : “यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा मरियम के गर्भधारण करने से हुआ था।” तो क्या उसका सार भी आत्मा नहीं है? क्या उसका कार्य भी पवित्र आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं करता? यहोवा आत्मा है और उसी तरह यीशु का सार भी है। अब अंत के दिनों में, यह कहने की ज़रूरत कम है कि यह अभी भी आत्मा है; वे अलग-अलग व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? क्या यह महज़ परमेश्वर का आत्मा नहीं जो आत्मा के कार्य को अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से क्रियान्वित कर रहा है? ऐसे तो, व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यीशु पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था और सुनिश्चित रूप से, उसका कार्य सटीक रूप से पवित्र आत्मा का कार्य था। यहोवा द्वारा क्रियान्वित किए गए कार्य के पहले चरण में, वह न तो देहधारी हुआ और न मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। तो मनुष्य ने कभी उसके प्रकटन को नहीं देखा। चाहे वह कितना भी बड़ा और कितना भी ऊँचा था, वह फिर भी आत्मा था, स्वयं परमेश्वर जिसने आरंभ में मनुष्य को बनाया था। अर्थात, वह परमेश्वर का आत्मा था। वह बादलों में से मनुष्य से बात करता था, केवल एक आत्मा, और किसी ने भी उसका प्रकटन नहीं देखा। केवल अनुग्रह के युग में जब परमेश्वर का आत्मा देह में आया और यहूदिया में देहधारी हुआ, तो मनुष्य ने पहली बार एक यहूदी के रूप में परमेश्वर के देहधारी देह की छवि देखी। उसमें यहोवा जैसा कुछ भी नहीं था। हालांकि, वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था, अर्थात स्वयं यहोवा के आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और यीशु का जन्म तब भी परमेश्वर के आत्मा के मूर्तरूप में हुआ था। उस समय मनुष्य ने जो देखा, वह यह था कि पवित्र आत्मा यीशु पर एक कबूतर की तरह उतर रहा था; यह यीशु के लिए विशेष आत्मा नहीं था, बल्कि पवित्र आत्मा था। तो क्या यीशु का आत्मा पवित्र आत्मा से अलग हो सकता है? अगर यीशु यीशु है, पुत्र है, और पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, तो वे एक कैसे हो सकते हैं? यदि ऐसा है तो कार्य क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्वसमावेशी आत्मा कहा जाता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कार्य क्रियान्वित कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है इससे भी अधिक, वह सारी मानवजाति को जीत और नष्ट कर सकता है। यह सारा कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा क्रियान्वित किया गया है और उसके स्थान पर परमेश्वर के व्यक्तियों में से किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और अनगिनत लोगों के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह कार्य स्वयं परमेश्वर के आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसके अंतर्निहित आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। स्वर्ग में वह आत्मा है, लेकिन स्वयं परमेश्वर भी है; लोगों के बीच वह देह है, पर स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे सैकड़ों-हज़ारों नामों से बुलाया जा सकता है, तो भी वह स्वयं है, और उसका समस्त कार्य उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानवजाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य था और अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भूभागों के लिए उसका निर्देश भी आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य है। हर समय परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान एक सच्चा परमेश्वर ही कहा जा सकता है, वह स्वयं सर्व-समावेशी परमेश्वर है। परमेश्वर में ये व्यक्ति बिल्कुल अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग में और पृथ्वी पर केवल एक ही परमेश्वर है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
151. फिर भी कुछ कह सकते हैं : “पिता पिता है; पुत्र पुत्र है; पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है और अंत में वे एक बनेंगे।” तो तुम उन्हें एक कैसे बना सकते हो? पिता और पवित्र आत्मा को एक कैसे बनाया जा सकता है? यदि वे मूल रूप से दो थे, तो चाहे वे एक साथ कैसे भी जोड़े जाएं, क्या वे दो हिस्से नहीं बने रहेंगे? जब तुम दो हिस्सों को एक बनाने को कहते हो, तो क्या यह बस दो अलग हिस्सों को जोड़कर एक बनाना नहीं है? लेकिन क्या पूर्ण बनाए जाने से पहले वे दो हिस्से नहीं थे? प्रत्येक आत्मा का एक विशिष्ट सार होता है और दो आत्माएँ एक नहीं बन सकतीं। आत्मा कोई भौतिक वस्तु नहीं है और भौतिक दुनिया की किसी भी अन्य वस्तु के समान नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता एक आत्मा है, पुत्र दूसरा, और पवित्र आत्मा एक और, फिर तीन आत्माएँ एक साथ तीन गिलास पानी की तरह मिलकर पूरा एक बनते हैं। तो क्या यह तीन को एक बनाना नहीं होगा? यह एक शुद्ध रूप से भ्रामक व्याख्या है! क्या यह परमेश्वर को विभाजित करना नहीं है? पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी को एक कैसे बनाया जा सकता है? क्या वे भिन्न प्रकृति वाले तीन भाग नहीं हैं? अन्य लोग हैं, जो कहते हैं, “क्या परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि यीशु उसका प्रिय पुत्र है?” यीशु परमेश्वर का प्रिय पुत्र है, जिस पर वह प्रसन्न है—यह निश्चित रूप से परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था। यह परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना था, लेकिन केवल एक अलग परिप्रेक्ष्य से, स्वर्ग में आत्मा द्वारा अपने ही देहधारी देह की गवाही देना था। यीशु उसका देहधारी शरीर है, स्वर्ग में उसका पुत्र नहीं। क्या तुम समझते हो? यीशु के वचन, “मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है,” क्या यह संकेत नहीं देते कि वे एक आत्मा हैं? और क्या यह देहधारण के कारण नहीं है कि वे स्वर्ग और पृथ्वी के बीच अलग हो गए थे? वास्तव में, वे अभी भी एक हैं; चाहे कुछ भी हो, यह केवल परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना है। युग में परिवर्तन, कार्य की जरूरतों और उसकी प्रबंधन योजना के विभिन्न चरणों के कारण, जिस नाम से मनुष्य उसे बुलाता है, वह भी अलग हो जाता है। जब वह कार्य के पहले चरण को क्रियान्वित करने आया था, तो उसे केवल यहोवा कहा जा सकता था, जो इस्राएलियों का चरवाहा था। दूसरे चरण में, देहधारी परमेश्वर को केवल प्रभु और मसीह कहा जा सकता था। परंतु उस समय, स्वर्ग में आत्मा ने केवल यह बताया था कि वह परमेश्वर का प्यारा पुत्र है और उसके परमेश्वर का एकमात्र पुत्र होने का कोई उल्लेख नहीं किया था। ऐसा हुआ ही नहीं था। परमेश्वर की एकमात्र संतान कैसे हो सकती है? तब क्या परमेश्वर मनुष्य नहीं बन जाता? क्योंकि वह देहधारी देह था, उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा गया और इससे पिता और पुत्र के बीच का संबंध आया। यह बस स्वर्ग और पृथ्वी के बीच जो विभाजन है, उसके कारण हुआ। यीशु ने देह के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना की। चूँकि उसने इस तरह की सामान्य मानवता की देह को धारण किया था, और देह के परिप्रेक्ष्य से कहा, “मेरा बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का है; चूँकि मैंने इस धरती पर आने के लिए देहधारण किया है, इसलिए मैं अब स्वर्ग से बहुत दूर हूँ।” इस कारण से, वह केवल परमपिता परमेश्वर से देह के परिप्रेक्ष्य से ही प्रार्थना कर सकता था। यह उसका कर्तव्य था और यह वह था, जो परमेश्वर के आत्मा के देहधारी देह में होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर नहीं था क्योंकि वह देह के दृष्टिकोण से पिता से प्रार्थना करता था। यद्यपि उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा जाता था, वह अभी भी स्वयं परमेश्वर था क्योंकि वह आत्मा का ही देहधारी देह था और उसका सार अब भी आत्मा का था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?