प्रभु पूर्व में प्रकट हुआ है
क्यू झेन, चीन एक दिन, मेरी बहन ने मुझे फ़ोन किया और कहा कि वह उत्तर की अपनी यात्रा से वापस आ गई है और मुझे बताने के लिए उसके पास कोई...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
मैं वेनेजुएला में एक प्रदेश सरकार के लिए वेतन पर्यवेक्षक हुआ करता था। मुझे हर दिन वेतन के मसलों और बहुत-से लोगों की माँगों से निपटना पड़ता था। रोजाना मेरा ध्यान काम पर ही होता था और बहुत व्यस्त होने के बावजूद मेरा जीवन हमेशा बहुत शांतिपूर्ण रहता था। जब महामारी ने एकाएक धावा बोला, लोग दूसरों के साथ मिल-जुल नहीं सके और उनकी आमदनी उनके खाने-पीने के खर्चे की आधी जितनी भी नहीं रही। मेरा जीवन भी मुश्किल में आ गया। खाने-पीने की चीजों के लिए कतार में खड़े होना पड़ता था, गैस लेने के लिए 3 दिन तक लाइन लगती थी। तब मैंने सुकून पाने के लिए प्रभु के वचनों पर गौर किया।
मेरा पड़ोसी भी एक विश्वासी था, जब भी हम एक-दूसरे से मिलते, तो हम अपनी आस्था के बारे में कुछ न कुछ बातें करते। हम दोनों को लगता था कि इन तमाम आपदाओं की बाइबल में भविष्यवाणी हो चुकी है और मानवजाति की बुराई और भ्रष्टता ही इन सभी विनाशों की जड़ है। हम अंत के दिनों में हैं और बाइबल में भविष्यवाणी की गई है कि इस वक्त प्रभु यीशु हमारा न्याय करने के लिए लौट आएगा, इसलिए हमें परमेश्वर की सुरक्षा और उद्धार पाने के लिए प्रभु का स्वागत करना था। बुद्धि और मार्गदर्शन के लिए मैं रोजाना परमेश्वर से प्रार्थना करता था। मैं परमेश्वर को जानना चाहता था और मुझे उसे ढूँढ़ने की जरूरत थी, क्योंकि परमेश्वर का वचन ही एकमात्र तरीका था जिससे मैं सुकून पा सकता था। इसलिए मैंने बाइबल खोली और परमेश्वर से मुझे प्रबुद्ध करने की विनती की। मैंने भजन संहिता, नीतिवचन और प्रभु यीशु के पहाड़ी उपदेश पढ़े, लेकिन अब भी वह मार्ग नहीं मिला जिस पर मुझे चलना चाहिए। मैंने हारा हुआ महसूस किया, वित्तीय समस्याएँ बद से बदतर होती जा रही थीं। मेरा जीवन संकट में डूबता जा रहा था और मैं अपने परिवार को जरूरत की चीजें मुहैया नहीं कर पा रहा था। जब मेरी बेटी को जरूरतें थीं तो मैं उसकी मदद नहीं कर पाया। मैं सचमुच दुखी था और बस उसे यही कहकर दिलासा दे पा रहा था कि ये मुश्किलें कुछ वक्त की ही हैं, मगर मैं भी यह नहीं मान पा रहा था। उदासी ने मेरे दिल को घेर लिया। समझ नहीं आया कि क्या करूँ। मैं यह देश छोड़कर कहीं और बस जाना चाहता था, कोई और समाधान ढूँढ़ना चाहता था, मगर महामारी के कारण मैं अपना पासपोर्ट और सारे जरूरी दस्तावेज नहीं जुटा पाया। मेरी जिंदगी अस्त-व्यस्त होती जा रही थी। तभी मेरी पत्नी ने कहा कि वह अब मेरे साथ नहीं रहना चाहती। मेरे लिए यह आखिरी झटका था। मेरा मन दुखी हो गया और मुझे एहसास हुआ कि अब जीवन का कोई अर्थ नहीं रहा। मैं गहरे अवसाद में घिर गया—बहुत पीड़ा में था। मैं खूब रोता रहता और कई रातों में सो नहीं पाया। परमेश्वर से प्रार्थना करके ही मुझे थोड़ी शांति मिल सकती थी।
फिर एक दिन मुझे व्हाट्सऐप पर एक संदेश मिला। एक बहन ने मुझे परमेश्वर के वचन सुनने के लिए एक ईसाई क्लास में शामिल होने का न्योता दिया और पूछा कि क्या मैं इसका अध्ययन करना चाहता हूँ। मैंने “हाँ” कहा, तो उसने मुझे एक स्टडी ग्रुप में शामिल कर लिया। जब मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सुने तो मुझे लगा कि यह मेरी प्रार्थनाओं के लिए परमेश्वर का उत्तर था। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अधिकारपूर्ण वचनों की ओर खिंचा चला गया, इन वचनों ने मेरी बहुत-सी शंकाओं और धारणाओं को दूर कर दिया। मैंने जान लिया कि परमेश्वर लौट आया है और वह नया कार्य कर रहा है। इसका मुझ पर बहुत बड़ा प्रभाव पड़ा। अपने आश्चर्य, आनंद और कौतूहल के बीच मैंने मानवजाति को बचाने की परमेश्वर की 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना और उसके तीन चरणों के कार्य के बारे में जाना, यह भी जाना कि हर युग में वह एक अलग नाम धारण करता है (यहोवा, यीशु और सर्वशक्तिमान परमेश्वर), और प्रत्येक युग में उसके कार्य का अर्थ क्या है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे बहुत आकर्षित किया—मैं बहुत खुश था। मैं और भी सत्य समझना चाहता था, उन्हें दूसरों से साझा करना चाहता था, इसलिए मैंने अपने पड़ोसियों के समक्ष खुशी-खुशी सुसमाचार का प्रचार किया, उन्हें बताया कि प्रभु यीशु लौट आया है। मैंने सोचा कि परमेश्वर का अंत के दिनों का सुसमाचार सुनने वाला कोई भी विश्वासी खुशी से झूमकर सत्य खोजेगा और खुशी-खुशी सुसमाचार स्वीकार कर लेगा। लेकिन इसका उल्टा हुआ। उन्होंने मुझसे पूछा, “बाइबल में इनमें से कुछ भी दर्ज नहीं है, तुम्हें यह कहाँ से मिला?” मैंने उन्हें बताया, “मैंने इस बारे में एक ऑनलाइन स्टडी ग्रुप से जाना और अभी-अभी इसका अध्ययन शुरू किया है, इसलिए मेरा ज्ञान सीमित है, लेकिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे सचमुच अपनी तरफ खींच लिया है।” उन्होंने मुझे सतर्क रहने को कहा और बताया कि अंत के दिनों में बहुत-से झूठे मसीह उठ खड़े होंगे। फिर उन्होंने मुझे बाइबल के कुछ पद भेजे : “उस समय यदि कोई तुम से कहे, ‘देखो, मसीह यहाँ है,’ या ‘देखो, वहाँ है,’ तो प्रतीति न करना; क्योंकि झूठे मसीह और झूठे पैगंबरों का उत्थान होगा, और वे संकेत और चमत्कार दिखाएँगे, अगर यह मुमकिन हुआ, तो परमेश्वर के चुने हुए लोग भी गुमराह हो जाएँगे। पर तुम चौकस रहो; देखो, मैं ने तुम्हें सब बातें पहले ही से बता दी हैं” (मरकुस 13:21-23)। उन्होंने कहा कि मैं एक झूठे धर्म पर गौर कर रहा था, 21वीं सदी की इस उन्नत टेक्नोलॉजी वाली दुनिया में अगर प्रभु यीशु लौट आया, तो वह यकीनन ऐसा बहुत बड़ा चमत्कार दिखाएगा, जो सारी दुनिया में हड़कंप मचा देगा, लेकिन अब तक ऐसा कुछ नहीं हुआ। साथ ही, हमने प्रभु यीशु द्वारा रोगियों को चंगा करना, मृतकों को जीवित करना या ऐसी चीजें होते हुए नहीं देखी थीं, यानी प्रभु अब तक लौटकर नहीं आया। उनकी बात सुनकर, मेरा दिल शंकाओं से भर गया। मैं प्रभु यीशु को धोखा देने से डरता था। मुझे धोखा खाने और झूठे मसीह के अनुसरण को लेकर फिक्र थी। शुरू से ही मुझे हमेशा यकीन था कि प्रभु यीशु बादलों पर सवार होकर वापस आएगा और एक विशाल सफेद सिंहासन पर बैठकर हर इंसान का उसके किए के अनुसार न्याय करेगा, लेकिन सुसमाचार प्रचारकों ने कहा कि परमेश्वर देहधारी हो चुका है और हमारे पापों का न्याय करने के लिए वचन बोल रहा है। इन सारी चीजों से मैं असमंजस में था, बहुत बेचैन हो गया था। वैसे तो मैं वास्तव में हमारी शाम की संगति की बाट जोह रहा था और इसकी जाँच जारी रखना चाहता था, लेकिन अपने पड़ोसियों की बातें मेरे दिल में गहरे बैठ गई थीं, इसलिए मैं सतर्क था। उपदेश शुरू होने पर, मैंने ग्रुप को छोड़ने का फैसला कर लिया। मैंने व्हाट्सऐप पर ग्रुप छोड़ देने का स्पष्टीकरण देते हुए एक संदेश लिखा, मैंने अपनी चिंताएँ भी बताईं और कहा कि मुझे किसी झूठे मसीह से धोखा खाने की चिंता है, मैंने अपने पड़ोसियों से मिले बाइबल के पद साथ में जोड़ दिए। जैसे ही मैं संदेश भेजकर ग्रुप छोड़ देने को था, मुझे अचानक एक सूचना मिली कि मेरे मोबाइल की बैटरी खत्म हो चुकी है और वह बंद होने वाला है। मैं हैरान था, क्योंकि सभाओं से पहले मैं हमेशा अपना फोन पूरी तरह चार्ज कर लेता था, तो अचानक बैटरी क्यों खत्म हो गई? लेकिन मैंने ग्रुप छोड़ने का मन बना लिया था। मैंने खुद से कहा : मसीह अगर लौट आया है तो बड़े चमत्कार कैसे नहीं हो रहे? मैंने फिर से प्लग लगाया और निर्णय लिया जब मेरा फोन चालू करने लायक न्यूनतम चार्ज हो जाएगा तो मैं फिर से संदेश टाइप करके भेज दूँगा। बैटरी के 5% होने पर, मैंने फोन चालू किया, तो देखा कि बाइबल के कुछ पद ग्रुप को भेजे गए थे। कौतूहल से मैंने उन्हें पढ़ा : “देख, मैं द्वार पर खड़ा हुआ खटखटाता हूँ; यदि कोई मेरा शब्द सुनकर द्वार खोलेगा, तो मैं उसके पास भीतर आकर उसके साथ भोजन करूँगा और वह मेरे साथ” (प्रकाशितवाक्य 3:20)। “मेरी भेड़ें मेरा शब्द सुनती हैं; मैं उन्हें जानता हूँ, और वे मेरे पीछे पीछे चलती हैं” (यूहन्ना 10:27)। मैंने भाई-बहनों को यह कहते हुए संदेश भेजते देखा, “परमेश्वर के वचन से हम समझ सकते हैं कि प्रभु वापस आने पर, दरवाजे पर दस्तक देगा, और अपनी भेड़ों को अपने वचनों से पुकारेगा। हम प्रभु का स्वागत कर सकते हैं या नहीं, यह मुख्यतः इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम उसकी वाणी सुनते हैं। हमें समर्थ होना होगा कि प्रभु की वाणी सुनें, दरवाजा खोलें, उसका स्वागत करें और उसके साथ भोजन करें। तो अगर आप किसी को गवाही देते सुनें कि प्रभु लौट आया है, तो दरवाजा बंद न करें, धोखा खाने से न डरें, बल्कि एक बुद्धिमान कुँवारी बनें—प्रभु की वाणी को सुनने पर ध्यान देना अहम है।” फिर मैंने देखा कि एक बहन ने ग्रुप में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा था, जो कहता है : “यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न कोई जालसाज होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। कार्य का यीशु का चरण पहले ही पूरा हो चुका है, और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। ... मनुष्य की धारणाओं के अनुसार परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दानवों को बहिष्कृत करना चाहिए और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर अब भी चिह्न और चमत्कार दिखाए और अब भी दानवों को बहिष्कृत करे और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने की कोशिश करती हैं और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीका बदलकर भिन्न तरीका अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, बुरी आत्माएँ उसकी नकल करने का प्रयास करती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान)। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों और दूसरों की संगति ने मुझे ताज्जुब में डाल दिया। इसमें वो तमाम जवाब थे जो मैं चाहता था। मैंने खुद से कहा : यह बिल्कुल सही है! परमेश्वर हमेशा नया होता है, कभी पुराना नहीं होता और वह हमेशा नया कार्य करता है। वह अपना पुराना कार्य नहीं दोहराता। प्रभु यीशु ने व्यवस्था के युग का कार्य नहीं दोहराया था, तो परमेश्वर लौटकर आने पर अनुग्रह के युग जैसा ही कार्य क्यों करेगा? अब सर्वशक्तिमान परमेश्वर आया है, उसने नया युग शुरू किया है, वह राज्य के युग का नया कार्य कर रहा है। यह कार्य पहले कभी नहीं किया गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें चेताया भी है : “यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह बुरी आत्माओं द्वारा उत्पन्न कोई जालसाज होगा, जो यीशु की नकल उतार रहा होगा।” हाँ, सिर्फ बुरी आत्माएँ ही परमेश्वर के पुराने कार्य की नकल करती हैं, और लोगों को गुमराह करने के लिए चमत्कार करके परमेश्वर होने का नाटक करती हैं। यह बात सचमुच प्रबुद्ध करने वाली थी। मैंने जान लिया कि झूठे मसीहों में से सच्चे वाले मसीह को कैसे जानें-समझें और राज्य के युग में परमेश्वर द्वारा संकेत और चमत्कार न दिखाए जाने का असली कारण क्या है। अंत के दिनों में, परमेश्वर सत्य व्यक्त कर न्याय, शुद्धिकरण और मानवजाति को बचाने का कार्य करता है, इंसान को अपने राज्य में ले जाता है। एक बार यह समझ लेने पर मैंने सभाओं में जाना जारी रखा।
बाद में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : “जो भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को शाप देने या निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास विवेक है और जो सत्य स्वीकार करता है। शायद सत्य का मार्ग सुन लेने और जीवन का वचन पढ़ लेने के बाद तुम्हें यह लगता है कि इन वचनों में से केवल दस हजार में एक वचन तुम्हारी समझ और बाइबल के अनुरूप है और फिर तुम्हें इन्हीं वचनों के उस दस हजारवें हिस्से में खोज जारी रखनी चाहिए। मैं तुम्हें सुझाव भी देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो और बहुत अभिमानी न बनो। तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला जो थोड़ा-सा दिल है उसके चलते तुम और अधिक रोशनी प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्य पढ़कर, कुछ लोग इन वचनों की आँखें मूँदकर यह कहते हुए निंदा करेंगे, ‘यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है’ या ‘यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को गुमराह करने आया है।’ जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे बहुत अज्ञानी हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः शुरू से आरंभ करने की सलाह देता हूँ! तुम लोगों को सिर्फ इस वजह से कि अंत के दिनों में झूठे मसीह प्रकट होंगे, परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त वचनों की आँख मूँदकर निंदा नहीं करनी चाहिए, तुम्हें गुमराह होने के डर से ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करता हो। क्या यह बहुत ही पछतावे की बात नहीं होगी? यदि बार-बार जाँच के बाद अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दंडित किए जाओगे और आशीष के बिना होगे। यदि तुम ऐसा सत्य, जो इतने सादे और स्पष्ट ढंग से कहा गया है, स्वीकार नहीं कर सकते, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसमें परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आने की यह आशीष ही नहीं है? इस बारे में सोचो! उतावले और अविवेकी न बनो और परमेश्वर में विश्वास के साथ खेल की तरह पेश न आओ। अपनी मंज़िल के लिए, अपनी संभावनाओं के वास्ते, अपने जीवन के लिए सोचो और स्वयं से खेल न करो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि अंत के दिनों में परमेश्वर की वापसी को लेकर हमें मसीह के प्रकटन को उतावलेपन से नकारना नहीं चाहिए। झूठे मसीह अंत के दिनों में प्रकट होंगे, इसका यह अर्थ नहीं कि हम आँख मूँदकर परमेश्वर के नए कार्य और वचनों को ठुकरा दें और उनकी निंदा करें। हमें ठीक बुद्धिमान कुँवारियों के समान बनना चाहिए, हमें परमेश्वर की वाणी सुनना सीखना चाहिए, और विनम्र बनकर खोजी रवैये के साथ परमेश्वर के कार्य की जाँच-पड़ताल करनी चाहिए। परमेश्वर की वाणी सुनने और प्रभु का स्वागत करने का यही एकमात्र मार्ग है। वरना, हम परमेश्वर का उद्धार खो देंगे। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “उतावले और अविवेकी न बनो और परमेश्वर में विश्वास के साथ खेल की तरह पेश न आओ। अपनी मंज़िल के लिए, अपनी संभावनाओं के वास्ते, अपने जीवन के लिए सोचो और स्वयं से खेल न करो। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?” सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों ने मुझे दिखाया कि जब पड़ोसियों के भ्रामक विचारों ने मुझे उसके कार्य की जाँच-पड़ताल करने से रोक दिया तो मैंने उन विचारों को स्वीकार करने में उतावलापन दिखाया। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को ज्यादा गहराई से समझने की कोशिश नहीं की, न ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया के दूसरे लोगों के पास जाकर अपने सवालों के जवाब खोजे। मैंने आवेग से ग्रुप छोड़ देने और सच्चे मार्ग पर गौर करना बंद करने का फैसला ले लिया। अपने उतावलेपन में मैंने अंत के दिनों में परमेश्वर का उद्धार लगभग खो दिया था। फिर मैं जान गया कि असमंजस और शंकाओं का सामना होने पर मुझे आवेग में झुकना नहीं चाहिए, न ही उतावलेपन से फैसला देना चाहिए; मुझे सतर्क रहना चाहिए, हर समय परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए। मुझे परमेश्वर के वचनों के साथ सम्मान से पेश आना चाहिए, विनम्रता से सत्य खोजना चाहिए, ताकि उसके मार्गदर्शन से परमेश्वर की वाणी पहचान सकूँ और प्रभु के वापस आने का स्वागत कर सकूँ। इसके बाद हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से मुझे बाइबल की गहरी समझ मिली और मुझे यकीन हो गया कि यह अंत के दिनों में परमेश्वर का प्रकटन और कार्य ही था, और मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर को बेझिझक स्वीकार कर लिया।
एक दिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े : “ऐसी चीज की जाँच करना कठिन नहीं है, परंतु इसके लिए जरूरी है कि हममें से प्रत्येक व्यक्ति पहले इस सत्य को जान ले : जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर का सार है और जो देहधारी परमेश्वर है उसके पास परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। चूँकि परमेश्वर देहधारी बना है, इसलिए वह उस कार्य को अपने साथ लाता है जो वह करना चाहता है और चूँकि वह देहधारी परमेश्वर है, इसलिए वह परमेश्वर का स्वरूप व्यक्त करता है और वह मनुष्य के लिए सत्य ला सकता है, उसे जीवन प्रदान कर सकता है और उसे मार्ग दिखा सकता है। जिस देह में परमेश्वर का सार नहीं है, वह निश्चित रूप से देहधारी परमेश्वर नहीं है; इसमें कोई संदेह नहीं। अगर मनुष्य यह जाँच करना चाहता है कि क्या यह परमेश्वर की देहधारी देह है, तो उसे इसका निर्धारण उसके द्वारा व्यक्त स्वभाव और उसके द्वारा बोले गए वचनों से करना चाहिए। अर्थात्, यह निर्धारित करने के लिए कि यह परमेश्वर की देहधारी देह है या नहीं और यह सच्चा मार्ग है या नहीं, व्यक्ति को उसके सार के आधार पर यह अंतर करना चाहिए। अतः यह देहधारी परमेश्वर की देह है कि नहीं, यह निर्धारित करने की कुंजी उसके बाहरी स्वरूप के बजाय उसके सार (यानी उसके कार्य, उसके कथनों, उसके स्वभाव और बहुत-से अन्य पहलुओं) में निहित होती है। यदि मनुष्य केवल उसके बाहरी स्वरूप की ही जाँच करता है, और परिणामस्वरूप उसके सार की अनदेखी करता है, तो इससे उसके मूर्ख और अज्ञानी होने का पता चलता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना)। “देहधारी हुए परमेश्वर को मसीह कहा जाता है, और इसलिए उस मसीह को जो लोगों को सत्य दे सकता है, परमेश्वर कहना थोड़ी-भी अतिशयोक्ति नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार होता है, और उसमें परमेश्वर का स्वभाव और परमेश्वर के कार्य की बुद्धि होती है, जो मनुष्य के लिए अप्राप्य हैं। जो अपने आप को मसीह कहते हैं, परंतु परमेश्वर का कार्य नहीं कर सकते, वे धोखेबाज हैं। मसीह पृथ्वी पर परमेश्वर की अभिव्यक्ति मात्र नहीं है, बल्कि वह विशेष देह भी है, जिसे धारण करके धरती पर परमेश्वर मनुष्यों के बीच रहकर अपना कार्य करता है और अपना कार्य पूरा करता है। कोई मनुष्य इस देह की जगह नहीं ले सकता, बल्कि यह वह देह है जो पृथ्वी पर परमेश्वर के कार्य का पर्याप्त रूप से बीड़ा उठा सकती है, जो परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त कर सकती है, जो पर्याप्त रूप से परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकती है, और जो मनुष्य को जीवन प्रदान कर सकती है। मसीह का भेस धारण करने वाले लोगों का देर-सबेर पतन हो जाएगा, क्योंकि हालाँकि वे मसीह होने का दावा करते हैं, किंतु उनमें मसीह के सार का लेशमात्र भी नहीं है। और इसलिए मैं कहता हूँ कि मसीह की प्रामाणिकता मनुष्य द्वारा निर्धारित नहीं की जा सकती, बल्कि इसका उत्तर और निर्णय स्वयं परमेश्वर द्वारा ही दिया-लिया जाता है। इस तरह, यदि तुम सचमुच जीवन का मार्ग खोजना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह स्वीकार करना होगा कि परमेश्वर मनुष्य के बीच आता है ताकि वह उसे जीवन का मार्ग प्रदान करने का कार्य कर सके और तुम्हें स्वीकार करना होगा कि अंत के दिनों के दौरान ही वह मनुष्य को जीवन का मार्ग प्रदान करने के लिए मनुष्य के बीच आता है—अतीत में नहीं बल्कि आज” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि सच्चे मसीह को झूठे मसीहों से हम रंग-रूप, कद-काठी देखकर भेद नहीं कर सकते, हमें उनके सार पर गौर करना चाहिए, यानी यह देखना चाहिए कि क्या वे परमेश्वर का कार्य कर सकते हैं, परमेश्वर के वचन और स्वभाव को व्यक्त कर सकते हैं। परमेश्वर देहधारण करके पृथ्वी पर आया है, वह सत्य व्यक्त कर रहा है और अपना कार्य कर रहा है। परमेश्वर वही प्रकट करता है जो उसके पास है और जो वह स्वयं है—यह पूरी तरह से परमेश्वर का स्वभाव है, और वह जो कार्य करता है वह लोगों को बचा सकता है। ये सब ऐसी चीजें हैं जो किसी भी इंसान में नहीं होती हैं, न ही वह इन्हें हासिल कर सकता है। इसलिए कोई मसीह है या नहीं, यह तय करने का सबसे सही तरीका यह देखना ही है कि क्या वह परमेश्वर का कार्य कर सकता है, परमेश्वर के वचन और स्वभाव व्यक्त कर सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य की जाँच करने और उसके वचन पढ़ने के दौरान इंसान के लिए उसके वचनों के जरिए प्रकट हुए उसके प्रेम के अलावा, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता, क्रोध और प्रताप को भी देखा। उसके वचन धारदार तलवार की तरह हैं, जो हमारे दिलों में गहरे पैठी भ्रष्टता को सामने लाते हैं, हमारी परमेश्वर-प्रतिरोधी शैतानी प्रकृति को उजागर कर देते हैं। हम अपनी अंदरूनी भ्रष्टता को सीधे देख सकते हैं, साथ ही उस मार्ग को भी, जिस पर हमें अपनी आस्था में चलना चाहिए। उसके वचनों का अभ्यास करके हम धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव को ठीक कर सकते हैं और सामान्य मानवता के साथ जी सकते हैं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन सत्य के बहुत-से रहस्यों को जाहिर करते हैं और हमें मानवजाति को बचाने की उसकी 6,000-वर्षीय प्रबंधन योजना के बारे में जानने देते हैं। ये चीजें बाइबल या किसी धर्म में नहीं मिलतीं। ये सब सत्य के रहस्य हैं जिनसे परमेश्वर मानवजाति के लिए अंत के दिनों में परदा उठा रहा है, ये सब ऐसी बातें हैं जिन्हें लोगों ने पहले न कभी सुना और न ही देखा है। कोई भी मशहूर या महान विभूति सत्य व्यक्त नहीं कर सकती और मानवता को नहीं बचा सकती। केवल देहधारी परमेश्वर ही सत्य व्यक्त कर सकता है और मनुष्य के न्याय और शुद्धिकरण का कार्य कर सकता है, और हमारे लिए मार्ग, सत्य और जीवन ला सकता है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों से मैंने पक्का कर लिया कि वह अंत के दिनों का मसीह है, वही परमेश्वर है जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सारी चीजें बनाईं, वही परमेश्वर, जिसने पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को रास्ता दिखाने के लिए व्यवस्था जारी की, वही परमेश्वर जिसे पूरी मानवजाति के छुटकारे के लिए सूली पर चढ़ा दिया गया और इससे भी ज्यादा, वह परमेश्वर जो अंत के दिनों में हमें हमारे पापों से बचाने लौट आया है। बेशक, परमेश्वर आदि और अंत है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही प्रभु यीशु का लौटकर आना है। ये झूठे मसीह बहुरूपिए हैं, जो देर-सबेर ढेर हो जाएँगे, क्योंकि वे सत्य व्यक्त नहीं कर सकते, वे परमेश्वर का नया कार्य करने में समर्थ नहीं हैं, और वे लोगों को अपनी भ्रष्टता त्याग कर बचाए जाने में मदद नहीं कर सकते। वे बस लोगों को गुमराह कर भ्रष्ट करने के लिए परमेश्वर के पुराने कार्य की नकल कर सकते हैं। अब अंत के दिनों का मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर सत्य व्यक्त कर रहा है, परमेश्वर के घर से शुरू करके न्याय कार्य कर रहा है। वह लोगों की भ्रष्टता को शुद्ध कर उन्हें बदल रहा है और मानवजाति को पाप से बचा रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के कार्य और वचन पूरी तरह साबित करते हैं कि वही सच्चे परमेश्वर का प्रकटन है। इसमें कोई शक नहीं।
पहले मैं अपनी धारणाओं से चिपका हुआ था। सोचता था कि परमेश्वर अंत के दिनों में आकाश में एक विशाल सफेद सिंहासन पर बैठकर मनुष्य के पापों का न्याय करेगा, मगर सभाओं में जाने और परमेश्वर के वचन पढ़ने से मेरी यह धारणा बदल गई। ऐसा इसलिए क्योंकि मैंने जान लिया कि परमेश्वर अंत के दिनों में अपने न्याय कार्य से कैसे लोगों को शुद्ध करता है। मैंने देखा कि प्रभु यीशु ने कहा था : “मुझे तुम से और भी बहुत-सी बातें कहनी हैं, परन्तु अभी तुम उन्हें सह नहीं सकते। परन्तु जब वह अर्थात् सत्य का आत्मा आएगा, तो तुम्हें सब सत्य का मार्ग बताएगा, क्योंकि वह अपनी ओर से न कहेगा परन्तु जो कुछ सुनेगा वही कहेगा, और आनेवाली बातें तुम्हें बताएगा” (यूहन्ना 16:12-13)। “सत्य के द्वारा उन्हें पवित्र कर : तेरा वचन सत्य है” (यूहन्ना 17:17)। “यदि कोई मेरी बातें सुनकर न माने, तो मैं उसे दोषी नहीं ठहराता; क्योंकि मैं जगत को दोषी ठहराने के लिए नहीं, परन्तु जगत का उद्धार करने के लिए आया हूँ। वो जो मुझे नकार देता है, और मेरे वचन नहीं स्वीकारता, उसका भी न्याय करने वाला कोई है : मैंने जो वचन बोले हैं वे ही अंत के दिन उसका न्याय करेंगे” (यूहन्ना 12:47-48)। मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े : “मनुष्य को छुटकारा दिए जाने से पहले उसके अंदर शैतान के बहुत-से ज़हर पहले ही डाल दिए गए थे और हजारों वर्षों तक शैतान द्वारा भ्रष्ट होने के बाद मनुष्य के भीतर एक ऐसी प्रकृति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। इसलिए जब मनुष्य को छुटकारा दिलाया गया तो यह छुटकारे के मामले से बढ़कर कुछ नहीं था। यानी मनुष्य को एक ऊँची कीमत पर वापस खरीद लिया गया, किंतु उसके भीतर की विषैली प्रकृति हटाई नहीं गई थी। मनुष्य, जो इतना मलिन है, उसे परमेश्वर की सेवा करने के योग्य होने से पहले परिवर्तन से होकर गुजरना चाहिए। न्याय और ताड़ना के इस कार्य के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर के गंदे और भ्रष्ट सार को पूरी तरह जान जाएगा, वह पूरी तरह बदल सकेगा और शुद्ध हो पाएगा। केवल इसी तरीके से मनुष्य परमेश्वर के सिंहासन के सामने वापस लौटने के योग्य हो सकता है। सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए ताकि वचनों के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के माध्यम से मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके। इस चरण के कार्य को उद्धार का कार्य मानने के बजाय यह कहना कहीं अधिक उचित होगा कि यह शुद्धिकरण का कार्य है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4))। “अंत के दिनों का मसीह मनुष्य को सिखाने, उसके सार को उजागर करने और उसके वचनों और कर्मों का गहन-विश्लेषण करने के लिए विभिन्न प्रकार के सत्यों का उपयोग करता है। इन वचनों में विभिन्न सत्यों का समावेश है, जैसे कि मनुष्य का कर्तव्य, मनुष्य को परमेश्वर के प्रति समर्पण किस प्रकार करना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होना चाहिए, मनुष्य को किस प्रकार सामान्य मानवता जीनी चाहिए, और साथ ही परमेश्वर की बुद्धि और उसका स्वभाव, इत्यादि। ये सभी वचन मनुष्य के सार और उसके भ्रष्ट स्वभावों पर निर्देशित हैं। खास तौर पर वे वचन, जो यह उजागर करते हैं कि मनुष्य किस प्रकार परमेश्वर को अस्वीकार करता है, इस पर और भी अधिक निर्देशित हैं कि किस प्रकार मनुष्य शैतान का मूर्त रूप और परमेश्वर के विरुद्ध शत्रु-बल है। अपने न्याय का कार्य करने में परमेश्वर कुछ वचनों में मनुष्य की प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझाता है; बल्कि वह लंबे समय तक उसे उजागर करता है और उसकी काट-छाँट करता है। उजागर और काट-छाँट करने की इन विभिन्न विधियों को साधारण वचनों से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; बल्कि उजागर और काट-छाँट करने के इस कार्य को करने में उस सत्य का उपयोग किया जाता है जो मनुष्य के पास बिल्कुल भी नहीं होता है। केवल इस तरह की विधियाँ ही न्याय कही जा सकती हैं; केवल इस तरह के न्याय द्वारा ही मनुष्य को वशीभूत और परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से आश्वस्त किया जा सकता है, और इतना ही नहीं, बल्कि मनुष्य परमेश्वर का सच्चा ज्ञान भी प्राप्त कर सकता है। न्याय का कार्य मनुष्य में परमेश्वर के असली चेहरे और उसकी स्वयं की विद्रोहशीलता के सत्य की समझ पैदा करने का काम करता है। न्याय के कार्य ने मनुष्य को परमेश्वर के इरादों, परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य और उन रहस्यों के बारे में काफी समझ प्राप्त करने में सक्षम बनाया है जो उसकी समझ से परे होते हैं। इसने मनुष्य को अपने भ्रष्ट सार और अपनी भ्रष्टता की जड़ को समझने और जानने, साथ ही अपने कुरूप चेहरे का पता लगाने में सक्षम बनाया है। ये सभी प्रभाव न्याय के कार्य द्वारा लाए जाते हैं, क्योंकि इस कार्य का सार वास्तव में परमेश्वर के सत्य, मार्ग और जीवन को उन सभी के लिए उद्घाटित करने का कार्य है जो उसमें आस्था रखते हैं। यह कार्य परमेश्वर के द्वारा किया जाने वाला न्याय का कार्य है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मसीह न्याय का कार्य सत्य के साथ करता है)। मैंने जाना कि परमेश्वर देहधारी होकर अंत के दिनों का न्याय कार्य कर रहा है, मानवजाति का न्याय करने और उसे शुद्ध करने के लिए सत्य व्यक्त कर रहा है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने वचन बोले हैं, इंसान की शैतानी प्रकृति और उसके भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा किया है, जिसमें अहंकार, धोखेबाजी और सत्य से विमुख होने जैसी चीजें शामिल हैं। उसने इंसान के स्वार्थ और लालच का भी खुलासा किया है। यह सब लोगों को उसके वचनों के न्याय के जरिए अपनी भ्रष्टता का सत्य देखने की अनुमति देता है, ताकि वे खुद से घृणा कर परमेश्वर के सामने प्रायश्चित्त करें और परमेश्वर का भय और समर्पण प्राप्त करें। मनुष्य के शैतानी स्वभावों को ठीक करने का एकमात्र मार्ग सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का न्याय कार्य ही है। कोई इंसान यह नहीं कर सकता। मुझे एहसास हुआ कि अगर परमेश्वर आकाश में विशाल सफेद सिंहासन से हर इंसान का न्याय करे तो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए किसी भी इंसान को उद्धार का मौका नहीं मिल पाएगा। ऐसा इसलिए क्योंकि पूरी मानवजाति शैतान की भ्रष्टता से गहराई में डूबी हुई है। हालाँकि प्रभु यीशु के सूली के उद्धार से हम सभी छुटकारा पा चुके हैं और हमारे पापों को माफी मिल गई है, मगर हम अब भी पापी हैं। हम बार-बार पाप करने और उसे कबूल करने के कुचक्र से होकर गुजरते रहते हैं। अगर हम न्याय का अनुभव न करें तो हमारी भ्रष्टता शुद्ध नहीं की जा सकती और आखिरकार, परमेश्वर हमें दोषी ठहराकर हटा देगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों से न्याय पाकर और उजागर होकर ही, हम खुद को सही मायनों में जान सकते हैं, सचमुच पश्चात्ताप कर सकते हैं, बदल सकते हैं और हमारी भ्रष्टता शुद्ध की जा सकती है। जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सारा वर्तमान कार्य इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य को शुद्ध किया और बदला जा सके; ऐसा इसलिए ताकि वचनों के न्याय और ताड़ना के माध्यम से और शोधन के माध्यम से मनुष्य अपनी भ्रष्टता छोड़ सके और शुद्ध किया जा सके” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4))।
एक बार मैंने एक सभा में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिससे मेरे दिल में हलचल मच गई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जो सत्य को नहीं समझते, वे हमेशा दूसरों का अनुसरण करते हैं : यदि लोग कहते हैं कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो तुम भी कहते हो कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है; यदि लोग कहते हैं कि यह दुष्टात्मा का कार्य है, तो तुम्हें भी संदेह हो जाता है, या तुम भी कहते हो कि यह किसी दुष्टात्मा का कार्य है। तुम हमेशा दूसरों के शब्दों को तोते की तरह दोहराते हो और स्वयं किसी भी चीज का भेद पहचानने में अक्षम हो, न ही तुम स्वयं सोचने में सक्षम होते हो। इस तरह के व्यक्ति का कोई स्पष्ट रुख नहीं होता, जिसे भेद की कोई पहचान नहीं होती—ऐसा व्यक्ति बिल्कुल निकम्मा होता है! तुम हमेशा दूसरों के वचनों को दोहराते हो : आज ऐसा कहा जाता है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु संभव है, कल कोई कहे कि यह पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है और कि यह असल में मनुष्य के कर्मों के अतिरिक्त कुछ नहीं है—फिर भी तुम इसका भेद नहीं पहचान पाते और जब तुम इसे दूसरों के द्वारा कहा गया देखते हो, तो तुम भी वही बात कहते हो। यह वास्तव में पवित्र आत्मा का कार्य है, परंतु तुम कहते हो कि यह मनुष्य का कार्य है; क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य की ईशनिंदा करने वालों में से एक नहीं बन गए हो? इसमें, क्या तुमने परमेश्वर का इसलिए विरोध नहीं किया है, क्योंकि तुममें भेद पहचान की क्षमता नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर को और उसके कार्य को जानते हैं, केवल वे ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं)। परमेश्वर के वचनों ने सच्चे मार्ग की जाँच करते समय दूसरों के मार्गदर्शन पर आँख मूँदकर ध्यान देने, और इंसानी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर के कार्य का आकलन करने के खिलाफ चेताया है। ऐसा करने से हम संभवतः परमेश्वर का विरोध करेंगे और उसके स्वभाव को नाराज करेंगे, जिससे हम उद्धार का मौका खो सकते हैं। यह दुखभरी वास्तविकता हममें से किसी के भी साथ घट सकती है। अपने इतना मूर्ख और आवेगी होने पर मुझे शर्म आई। ऐसा कैसे था कि परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी और यह महसूस करके भी कि इन वचनों में अधिकार और सामर्थ्य है, मैं अपने पड़ोसियों के प्रभाव में आ गया और उनकी बातों से गुमराह हो गया? अपनी बेवकूफी और आवेग के कारण मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया लगभग छोड़ दी थी, प्रभु यीशु की वापसी लगभग गँवा बैठा था और उद्धार का अपना मौका लगभग बरबाद कर चुका था। अपने अंधेपन और अज्ञानता के कारण मुझे ऐसे भयानक परिणाम मिलने वाले थे! मैं समझ गया कि मुझे हर समय बुद्धिमान कुँवारी बने रहना चाहिए। परमेश्वर की वाणी सुनने पर हमें उसे अविचल रूप में स्वीकार करना चाहिए क्योंकि हम सभी सृजित प्राणी हैं और हमें हर समय परमेश्वर के वचनों का पालन करना चाहिए। ठीक वैसे ही जैसे पतरस ने प्रभु यीशु के वचन सुने थे और फिर प्रभु का अनुसरण किया था। अपनी पहले की मूर्खता और अज्ञानता के बारे में सोचकर मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर से प्रार्थना की, अपनी गलतियों के लिए उससे क्षमा माँगी। मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर को और परमेश्वर के न्याय और उद्धार को स्वीकारने को तैयार था।
तब से मैं हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़ता हूँ। कमजोर होने पर परमेश्वर से आस्था और शक्ति देने की विनती करता हूँ, ताकि मैं लड़खड़ाकर गिर न पडूँ। परमेश्वर के मार्गदर्शन और मदद से मेरी दशा अब बहुत बेहतर हो गई है। मैं एक नया काम भी करने लगा हूँ। मुझे लगता है कि यह सब परमेश्वर की अद्भुत व्यवस्थाओं से ही संभव हुआ है। धीरे-धीरे मेरा जीवन काफी हद तक सुधर गया है। अहम बात यह है कि मैं हर दिन सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों को खा-पी सकता हूँ और दूसरों के साथ सभा और संगति कर सकता हूँ। अब मैं सुसमाचार का प्रसार करने और परमेश्वर के वचनों की गवाही देने लगा हूँ, परमेश्वर की वाणी सुनने और अंत के दिनों के उसके उद्धार को स्वीकारने में सच्चे मार्ग के प्यासे अधिक सच्चे विश्वासियों की मदद करने लगा हूँ।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
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