मैंने रुतबे की चाहत छोड़ दी है

30 दिसम्बर, 2025

ली निंग, चीन

दिसंबर 2023 में मुझे प्रचारक चुना गया। जब मैंने यह खबर सुनी तो मैं थोड़ा चिंतित हुआ, “एक प्रचारक होने के नाते मुझे कई कलीसियाओं की जिम्मेदारी निभानी पड़ेगी। मुझे कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों के साथ नियमित रूप से सभा करने और कार्य का मार्गदर्शन करने के लिए उनके साथ संगति करने की जरूरत होगी। इसके लिए सत्य की समझ और समस्याओं के समाधान की खातिर सत्य पर संगति करने की क्षमता की जरूरत होती है। मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए बहुत कम समय हुआ है और सत्य के बारे में मेरी समझ उथली है। मैंने अभी-अभी प्रचारक के तौर पर प्रशिक्षण लेना शुरू किया है और मुझमें कई तरह की कमियाँ हैं। अगर मैं सभाओं के दौरान भाई-बहनों की समस्याएँ हल नहीं कर पाया, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? क्या वे सोचेंगे कि मैं इस कर्तव्य के लिए सक्षम नहीं हूँ और मुझे नीची नजरों से देखेंगे?” लेकिन फिर मैंने सोचा, “कर्तव्य मुझे परमेश्वर की अनुमति से मिला है और उससे भी बढ़कर यह परमेश्वर का अनुग्रह है। मैं परमेश्वर को निराश नहीं कर सकता और कार्य करने में मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा।” इसलिए मैंने यह कर्तव्य स्वीकार कर लिया।

शुरुआत में मैं कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों से सिर्फ पत्रों के जरिए ही कार्य के बारे में बात करता था, लेकिन यह ज्यादा कारगर नहीं रहा। कुछ कार्यों के लिए सभाओं की जरूरत होती थी ताकि हालात को व्यक्तिगत रूप से समझा जा सके और व्यावहारिक मार्गदर्शन दिया जा सके। मैंने सोचा कि ज्यादातर कलीसिया अगुआ मुझसे ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और निश्चित रूप से मुझसे ज्यादा सत्य समझते हैं। अगर मैं अच्छी तरह से संगति नहीं कर पाया, उनकी समस्याओं और मुश्किलों का समाधान नहीं कर पाया तो क्या यह बेहद शर्मनाक नहीं होगा? अगर हम पत्रों के जरिए बात करते, तो मैं उनकी समस्याओं पर विचार करने के लिए समय निकाल पाता और जो भी बात मुझे समझ नहीं आती, उसके बारे में अपने वरिष्ठों से पूछ लेता। कम से कम मुझे सबके सामने शर्मिंदा तो नहीं होना पड़ेगा। लेकिन सभाओं के बिना उनकी समस्याओं और मुश्किलों को विस्तार से समझने का कोई तरीका नहीं था, इसलिए मेरे पास उन्हें सभा में आमंत्रित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। मैं सभा के दौरान बहुत घबराया हुआ था। एक बहन ने कहा कि शुद्धिकरण का कार्य करते समय उसे कई समस्याओं का सामना करना पड़ा था और वह नहीं जानती थी कि उनका समाधान कैसे किया जाए और उसकी अवस्था भी खराब थी। मेरा दिमाग सुन्न हो गया और मैं तुरंत यह नहीं समझ पाया कि इन समस्याओं को कैसे हल किया जाए और इसलिए मैं और भी घबरा गया। मैंने मन ही मन सोचा, “बहन अभी इंतजार कर रही है कि मैं उसके साथ संगति करूँ। यह मेरी पहली सभा है। अगर मैं समस्याएँ हल नहीं कर पाया, तो भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह तो नहीं सोचेंगे कि इस स्तर का प्रचारक होकर भी मैं इन समस्याओं को हल नहीं कर पाता?” भाई-बहनों को अपनी असलियत जानने से रोकने के लिए मेरे पास मजबूरन परमेश्वर के वचन खोजने के अलावा कोई विकल्प नहीं था। काफी देर तक ढूँढ़ने के बाद भी मुझे बहन की अवस्था पर लागू होने वाले कोई वचन नहीं मिले। आखिरकार बड़ी मुश्किल से मुझे एक अंश मिला, लेकिन उसे पढ़ने के बाद किसी ने भी उस पर संगति नहीं की। कमरे में गहरा सन्नाटा छा गया और मैं शर्म से गड़ा जा रहा था। “यह बहुत शर्मनाक है। निश्चित रूप से जो अंश मुझे मिला है वह उपयुक्त नहीं है और इन समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता। भाई-बहनों को अब मेरा असली स्तर पता चल गया होगा। भविष्य में मैं उनका सामना कैसे कर पाऊँगा?” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही मुझे लगा कि मैं यह कर्तव्य नहीं निभा पाऊँगा। अंत में मैंने बस बेमन से कुछ वचनों पर संक्षेप में संगति की और कार्य के बारे में पूछना शुरू करके विषय बदल दिया। लेकिन क्योंकि मैं घबराया हुआ था, इस बात को लेकर चिंतित था कि यदि मैं समस्याएँ हल नहीं कर सका तो मेरे भाई-बहन मुझे किस नजर से देखेंगे, मुझे उनके काम के बारे में बस एक बहुत ही मोटा-मोटा अंदाजा हुआ और मैं किसी तरह बड़ी मुश्किल से सभा के समाप्त होने तक टिका रहा। घर पहुँचने पर मैं बहुत नकारात्मक था और मैंने मन ही मन सोचा, “आज की सभा पूरी तरह से नाकाम रही। न केवल मैं भाई-बहनों की समस्याओं का समाधान करने में नाकाम रहा, बल्कि मैंने अपने असली स्तर को भी पूरी तरह से उजागर कर दिया। भविष्य में मैं भाई-बहनों का सामना कैसे कर पाऊँगा?” उस दौरान मैं नकारात्मक अवस्था में जी रहा था और मुझमें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की कोई ऊर्जा नहीं थी। मैं कार्य का जायजा लेने में उतना तत्पर नहीं था और जानबूझकर सभाओं से बचता रहा। मैंने लगभग एक महीने तक अगुआओं और उपयाजकों के साथ सभा करने की हिम्मत भी नहीं की। कुछ कलीसिया अगुआ लोगों का भेद पहचानने के सिद्धांत नहीं समझ पाए थे, शुद्धिकरण सामग्री के आयोजन की प्रगति विशेष रूप से धीमी थी। पत्रों के जरिए कई बार संवाद करने के बाद भी कोई सुधार नहीं हुआ, इसलिए हमें व्यावहारिक मार्गदर्शन के लिए व्यक्तिगत रूप से मिलना था। हालाँकि, अपनी इज्जत बचाने के लिए मैंने उनसे मिलने और संगति करने की हिम्मत नहीं की। इससे कलीसिया के शुद्धिकरण कार्य में देरी हुई।

बाद में जब मैंने अपने सहकर्मियों के साथ सभा की तो मैंने उन्हें अपनी अवस्था के बारे में बताया। मेरी सहयोगी बहन ने मुझे परमेश्वर के वचनों के पाठ का एक वीडियो दिखाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब कोई व्यक्ति भाई-बहनों द्वारा अगुआ के रूप में चुना जाता है या परमेश्वर के घर द्वारा कोई निश्चित कार्य करने या कोई निश्चित कर्तव्य निभाने के लिए पदोन्नत किया जाता है तो इसका यह मतलब नहीं कि उसका कोई विशेष रुतबा या पद है या वह जिन सत्यों को समझता है, वे अन्य लोगों की तुलना में अधिक गहरे और संख्या में अधिक हैं—तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है कि यह व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम है और उसे धोखा नहीं देगा। निश्चय ही, इसका यह मतलब भी नहीं है कि ऐसे लोग परमेश्वर को जानते हैं और परमेश्वर का भय मानते हैं। वास्तव में उन्होंने इसमें से कुछ भी हासिल नहीं किया है। पदोन्नयन और संवर्धन सीधे मायने में केवल पदोन्नयन और संवर्धन ही है और यह पूर्वनियत होने या परमेश्वर की अभिस्वीकृति पाने के समतुल्य नहीं है। उनकी पदोन्नति और विकास का सीधा-सा अर्थ है कि उन्हें उन्नत किया गया है और वे विकसित किए जाने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। और इस विकसित किए जाने का अंतिम परिणाम इस बात पर निर्भर करता है कि क्या यह व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है और क्या वह सत्य के अनुसरण का रास्ता चुनने में सक्षम है। इस प्रकार, जब कलीसिया में किसी को अगुआ बनने के लिए पदोन्नत और विकसित किया जाता है तो उसे सीधे अर्थ में पदोन्नत और विकसित किया जाता है; इसका यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही अगुआ के रूप में मानक स्तर का है या सक्षम अगुआ है, कि वह पहले से ही अगुआई का काम करने में सक्षम है और वास्तविक कार्य कर सकता है—ऐसा नहीं है। ज्यादातर लोग इन चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते और अपनी कल्पनाओं के आधार पर वे इन पदोन्नत लोगों का सम्मान करते हैं, पर यह एक भूल है। जिन्हें पदोन्नत किया जाता है, उन्होंने चाहे कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, क्या उनके पास वास्तव में सत्य वास्तविकता होती है? ऐसा जरूरी नहीं है। क्या वे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ लागू करने में सक्षम हैं? अनिवार्य रूप से नहीं। क्या उनमें जिम्मेदारी की भावना है? क्या वे निष्ठावान हैं? क्या वे समर्पण करने में सक्षम हैं? जब उनके सामने कोई समस्या आती है तो क्या वे सत्य की खोज करने योग्य हैं? यह सब अज्ञात है। क्या इन लोगों के अंदर परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय हैं? और परमेश्वर का भय मानने वाले उनके हृदय कितने विशाल हैं? क्या काम करते समय वे अपनी इच्छा का पालन करना टाल पाते हैं? क्या वे परमेश्वर की खोज करने में समर्थ हैं? अगुआई का कार्य करने के दौरान क्या वे अक्सर परमेश्वर के इरादों की तलाश में परमेश्वर के सामने आने में सक्षम हैं? क्या वे लोगों के सत्य वास्तविकता में प्रवेश की अगुआई करने में सक्षम हैं? निश्चय ही वे ऐसी चीजें कर पाने में अक्षम होते हैं। उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला है और उनके पास पर्याप्त अनुभव भी नहीं है, इसलिए वे ये चीजें नहीं कर पाते। इसीलिए, किसी को पदोन्नत और विकसित करने का यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही सत्य को समझता है और न ही इसका अर्थ यह है कि वह पहले से ही अपना कर्तव्य एक मानक तरीके से करने में सक्षम है। तो किसी को पदोन्नत और विकसित करने का क्या उद्देश्य और मायने हैं? वह यह है कि इस व्यक्ति को, एक व्यक्ति के रूप में पदोन्नत किया गया है, ताकि वह अभ्यास कर सके और वह विशेष रूप से सिंचित और प्रशिक्षित हो सके, जिससे वह इस योग्य हो जाए कि सत्य सिद्धांतों और विभिन्न कामों को करने के सिद्धांतों और विभिन्न कार्य करने और विभिन्न समस्याओं को हल करने के सिद्धांतों, साधनों और तरीकों को समझ सके, साथ ही यह भी कि जब वह विभिन्न प्रकार के परिवेशों और लोगों का सामना करे तो परमेश्वर के इरादों के अनुसार और उस रूप में, जिससे परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा हो सके, उन्हें सँभालने और उनके साथ निपटने का तरीका सीख सके। इन बिंदुओं के आधार पर परखें तो क्या परमेश्वर के घर द्वारा पदोन्नत और विकसित किए गए प्रतिभाशाली लोग, पदोन्नत और विकसित किए जाने की अवधि के दौरान या पदोन्नत और विकसित किए जाने से पहले अपना कार्य और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में पर्याप्त सक्षम हैं? बेशक नहीं। इस प्रकार, यह अपरिहार्य है कि विकसित किए जाने की अवधि के दौरान ये लोग काट-छाँट और न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने, उजागर किए जाने, यहाँ तक कि बर्खास्तगी का भी अनुभव करेंगे; यह सामान्य बात है, यही है प्रशिक्षण और विकसित किया जाना(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (5))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि सिर्फ किसी व्यक्ति को पदोन्नत और विकसित करने भर का मतलब यह नहीं होता कि वह किसी और से बेहतर है या वह सत्य वास्तविकता रखता है या किसी भी समस्या को स्पष्ट रूप से देख और हल कर सकता है। जब कलीसिया किसी को पदोन्नत और विकसित करती है तो वह उसे जिम्मेदारी और दायित्व सौंपती है, उसे अभ्यास करने के ज्यादा अवसर देती है, समस्याएँ ढूँढ़ना और उनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज करना सिखाती है। यह बिल्कुल सामान्य है कि कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें वह समझ नहीं पाता या नहीं कर पाता। यह बिल्कुल वैसा ही था जैसे तब होता था जब मैं भाई-बहनों के साथ सभा करता था। क्योंकि मुझे परमेश्वर में विश्वास रखते हुए थोड़ा ही समय हुआ था और मैंने अभी-अभी यह कर्तव्य निभाना शुरू किया था, यह बहुत स्वाभाविक था कि मुझे कुछ समस्याओं का समाधान करना नहीं आता हो। लेकिन मेरा हमेशा से मानना था कि एक प्रचारक के रूप में मुझे सभी समस्याओं का समाधान करना आना चाहिए और मैं यह नहीं कह सकता था कि मुझे नहीं पता कि उनका समाधान कैसे करना है। जब मैं समस्याएँ हल नहीं कर पा रहा था तो अपनी कमियों को छिपा रहा था। मैं नकारात्मक भी था और यह मान बैठा था कि मैं एक प्रचारक के कर्तव्य के अयोग्य हूँ, लगभग एक महीने तक अगुआओं और उपयाजकों के साथ सभा करने की हिम्मत भी नहीं जुटा पाया था, जिससे कलीसिया के कार्य में देरी हो गई थी। असल में भले ही मैं प्रचारक था, मेरा आध्यात्मिक कद अब भी वैसा ही था। मुझमें अभी भी कई कमियाँ थीं, सत्य की एक उथली समझ थी और मुझे उन चीजों के बारे में और अधिक खोज करने और पूछने की जरूरत थी जो मुझे समझ में नहीं आती थीं या जो मैं नहीं कर सकता था, भाई-बहनों के साथ खुलकर संगति करनी थी, उनकी खूबियों का लाभ उठाकर अपनी कमजोरियों को दूर करना था, ताकि अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकूँ। यह समझने के बाद, मैं कलीसिया के अगुआओं और उपयाजकों के साथ एक सभा के लिए मिलने को तैयार था।

लेकिन जब मैंने उन्हें सभा के बारे में सूचित करने के लिए लिखा तो मेरी पिछली चिंताएँ अवचेतन रूप से फिर से उभर आईं। बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सभी भ्रष्ट मनुष्य एक आम समस्या से ग्रस्त होते हैं : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता तो वे किसी के साथ बातचीत करते या बोलते समय श्रेष्ठता का भाव नहीं दिखाते हैं, न ही वे अपनी बोली में कोई खास शैली या लहजा अपनाते हैं; वे वास्तव में साधारण और सामान्य होते हैं और उन्हें मुखौटा लगाने की जरूरत नहीं होती है। वे कोई मनोवैज्ञानिक दबाव महसूस नहीं करते और खुलकर, दिल से संगति कर सकते हैं। वे सुलभ होते हैं और उनके साथ बातचीत करना आसान होता है; दूसरों को यह महसूस होता है कि वे बहुत अच्छे लोग हैं। जैसे ही उन्हें कोई रुतबा प्राप्त होता है, वे घमंडी बन जाते हैं, साधारण लोगों की अनदेखी करते हैं, कोई उन तक नहीं पहुँच सकता; उन्हें लगता है कि वे श्रेष्ठ हैं और आम लोगों से भिन्न हैं। वे आम इंसान को हेय समझते हैं, बोलते समय श्रेष्ठता का भाव दिखाते हैं और दूसरों के साथ खुलकर संगति करना बंद कर देते हैं। वे अब खुले तौर पर संगति क्यों नहीं करते हैं? उन्हें लगता है कि अब उनके पास ओहदा है, और वे अगुआ हैं। उन्हें लगता है कि अगुआओं की एक निश्चित छवि होनी चाहिए, उन्हें आम लोगों की तुलना में थोड़ा ऊँचा होना चाहिए, उनका आध्यात्मिक कद बड़ा होता है और वे जिम्मेदारी सँभालने में बेहतर होते हैं; वे मानते हैं कि आम लोगों की तुलना में, अगुआओं में अधिक धैर्य होना चाहिए, उन्हें अधिक कष्ट उठाने और खपने में समर्थ होना चाहिए, और शैतान के किसी भी प्रलोभन का सामना करने में सक्षम होना चाहिए। वे सोचते हैं उनके माता-पिता या परिवार के दूसरे सदस्यों की मृत्यु पर भी उनमें ऐसा आत्म-नियंत्रण होना चाहिए कि वे न रोएँ या उन्हें रोना ही है, तो सबकी नजरों से दूर, गुपचुप रोना चाहिए, ताकि किसी को उनकी कमियाँ, दोष या कमजोरियाँ न दिखाई दें। उन्हें तो यह भी लगता है कि अगुआओं को किसी को भी यह भनक नहीं लगने देनी चाहिए कि वे निराश हो गए हैं; बल्कि उन्हें ऐसी सभी बातें छिपानी चाहिए। वे मानते हैं कि ओहदे वाले व्यक्ति को ऐसा ही करना चाहिए। जब वे इस हद तक अपना दमन करते हैं, तो क्या रुतबा उनका परमेश्वर, उनका प्रभु नहीं बन गया है? और ऐसा होने पर, क्या उनमें अभी भी सामान्य मानवता है? जब उनमें ये विचार होते हैं—जब वे खुद को इस तरह सीमित कर लेते हैं, और इस तरह का कार्य करते हैं—तो क्या वे रुतबे के प्रति आसक्त नहीं हो गए हैं?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, रुतबे के प्रलोभन और बंधन कैसे तोड़ें)। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन के माध्यम से, मैं समझ गया कि प्रचारक बनने के बाद से मैं अपनी कमियों और खामियों का सही ढंग से सामना इसलिए नहीं कर पाया था क्योंकि मैंने खुद को प्रचारक के रूप में एक ऊँचे स्थान पर रख दिया था। सभा से पहले जैसे ही मैंने सोचा कि जिन अगुआओं और उपयाजकों का मैं सामना करूँगा, वे कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं तो मैं घबरा गया, डर गया कि मैं समस्याएँ हल नहीं कर पाऊँगा, वे मुझे अक्षम प्रचारक मान लेंगे, जिससे मैं शर्मिंदा और असहज हो जाता। सभा के दौरान, भले ही मैं स्पष्ट रूप से बहन की समस्याओं को देख नहीं पाया था या उनका समाधान नहीं कर पाया था, फिर भी मेरा मानना था कि प्रचारक होने के नाते, मैं वास्तव में यह नहीं कह सकता कि मैं उनकी असलियत नहीं देख पा रहा था। इसलिए, मैंने यूँ ही परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ लिया था और अनमने ढंग से संगति कर ली थी, इस पर ध्यान दिए बिना कि बहन की समस्याएँ हल हुई हैं या नहीं, मैंने बातचीत को दूसरे काम के बारे में जानने की ओर मोड़ दिया था। फिर भी, क्योंकि मुझे चिंता थी कि मैं अपनी खोजी हुई समस्याओं का समाधान नहीं कर पाया था, मैंने कार्य के बारे में बहुत संक्षेप में ही पूछा था। नतीजतन, सभा में कोई समस्या हल नहीं हुई। अगर मैं उस समय खुलकर और ईमानदारी से अपनी बात कह पाता और फिर सबके साथ मिलकर संगति और खोज करता, तो बहन की समस्याएँ कुछ हद तक हल हो सकती थीं। और अगर वे सचमुच हल नहीं हो पातीं, तो मैं बाद में दूसरों से खोज सकता था। लेकिन मैंने हर मोड़ पर प्रचारक के रूप में अपने रुतबे और छवि की रक्षा की थी। लगातार दिखावा करता रहा और खुद को छिपाता रहा। मैंने सोचा कि जब ऊपरी अगुआ मेरे साथ सभा कर रहे थे, मैंने जितना समझा, उतनी संगति की और जो कुछ भी मुझे समझ नहीं आया, उसके बारे में अपना दिल खोलकर पूछताछ की। उन सभाओं के दौरान मुझे सुकून और मुक्ति का एहसास हुआ। लेकिन जब भी मैं भाई-बहनों के साथ सभा करता था तो सुकून और मुक्ति का यह एहसास पूरी तरह से गायब हो जाता था। मेरा मानना था कि प्रचारक के तौर पर मैं उनकी समस्याओं का समाधान करने के लिए वहाँ था और इसलिए मैंने अवचेतन रूप में खुद को प्रचारक के तौर पर एक ऊँचे स्थान पर बैठा लिया था। मैंने लगातार अपनी कमियाँ छिपाने की कोशिश की थी और नतीजतन, मैं परमेश्वर की अगुआई प्राप्त नहीं कर पाया था। इससे सभाओं में मेरी संगति नीरस और बेजान हो गई और इसने मुझे बहुत थका हुआ महसूस कराया।

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन होते हैं और वह लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार यही होता है : ‘मेरे रुतबे का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे अच्छी प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरा रुतबा बढ़ेगा?’ यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार होता है—और केवल इसी कारण वे चीजों को इस तरह से देखते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, ये कोई बाहरी चीज तो बिल्कुल भी नहीं है जिसके बिना उनका काम चल सकता हो। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़ा होता है। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर उजागर करता है कि एक मसीह-विरोधी प्रतिष्ठा और रुतबे को ही अपना जीवन मानता है। वह चाहे कुछ भी करे, हमेशा अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को सबसे पहले महत्व देता है, प्रतिष्ठा और रुतबे के बिना उसके पास कुछ भी करने की कोई प्रेरणा नहीं होती। यह उसके प्रकृति सार से निर्धारित होता है। मैंने भी हर मोड़ पर अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की रक्षा की। प्रचारक चुने जाने के बाद, मैं किसी भी सभा में जाने से पहले ही समस्याएँ हल न कर पाने की चिंता करने लगा था। मैं सभाओं में नहीं जाना चाहता था क्योंकि मुझे डर था कि भाई-बहन मेरा असली स्तर देख लेंगे। हालाँकि मुझे अच्छी तरह पता था कि भाई-बहन शुद्धिकरण सामग्री को व्यवस्थित करने के सिद्धांत नहीं समझते हैं और उन्हें आमने-सामने के मार्गदर्शन की जरूरत है, मैं उनके सामने मूर्ख बनने और अपनी इज्जत खोने से डरता था, इसलिए मैं सभा में नहीं जाता था। इसका मतलब था कि शुद्धिकरण कार्य संबंधी समस्याओं के समाधान में बहुत देरी हो गई थी, जिससे काम में देरी हुई थी। मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत ज्यादा परवाह की थी! अतीत में, जब मैं सांसारिकता में था, तो मुझमें प्रतिष्ठा और रुतबे की खास तौर पर तीव्र इच्छा थी। जब मैं कार्य करता था तो अक्सर बैठकों में शिफ्ट का अगुआ मेरी तारीफ करता था क्योंकि मुझमें जबर्दस्त कार्य नैतिकता थी और कुछ कौशल भी थे। मालिक भी मुझे बहुत मानता था और उसने मुझे कुछ कार्यों की जिम्मेदारी लेने को कहा था। इससे मुझे बहुत खुशी हुई थी। लेकिन जब मेरे कार्य को दोबारा करने की जरूरत पड़ी और शिफ्ट के प्रमुखों ने मेरी आलोचना की, क्योंकि मुझे लगा कि इतने सारे लोगों के सामने मेरी इज्जत चली गई है तो मैं बस इस्तीफा देना चाहता था। परमेश्वर के घर अपना कर्तव्य करने आने के बाद भी मैं अपने अभिमान और रुतबे को सबसे पहले रखता था और यह मानने को तैयार नहीं होता था कि कुछ कार्य ऐसे हैं जिन्हें मैं सँभाल नहीं पाता। मैंने ज्यादा समय तक परमेश्वर में विश्वास नहीं किया था, लेकिन मुझ पर परमेश्वर का अनुग्रह था कि मैं एक प्रचारक के रूप में अपना कर्तव्य निभा सका। परमेश्वर का इरादा था कि मैं अपने कर्तव्य में समस्याओं को हल करने के लिए सत्य खोजने का प्रशिक्षण लूँ। यह सत्य प्राप्त करने का एक अच्छा अवसर था। लेकिन मैंने यह नहीं सोचा कि मैं अपना कर्तव्य कैसे अच्छी तरह करूँ और परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करूँ, बल्कि मैंने अपने अभिमान और रुतबे की रक्षा करने की पूरी कोशिश की। जब मैंने कलीसिया के काम में ऐसी समस्याएँ देखीं जिनका समाधान जरूरी था, तो मैं अपना आत्म-सम्मान और रुतबा बचाने के लिए पीछे हट गया और उन्हें हल करने से कतराने लगा। मैंने कलीसिया के काम पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं दिया। मैं खास तौर पर स्वार्थी और घिनौना था। मैं जिस मार्ग पर चल रहा था, वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला, मसीह-विरोधियों का मार्ग था! जब मुझे यह बात समझ में आई तो मुझे लगा कि मेरी अवस्था बहुत खतरनाक है, मैं जल्दी से पश्चात्ताप करके चीजों को बदलने के लिए तैयार था।

बाद में जब उच्च अगुआओं को मेरी अवस्था के बारे में पता चला तो उन्होंने मेरे साथ परमेश्वर के वचनों के दो अंश साझा किए, जिनसे मुझे रुतबे को त्यागने का अभ्यास करने का मार्ग मिला। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम साधारण और सामान्य इंसान कैसे बन सकते हो? ... पहली बात, खुद को यह कहते हुए कोई उपाधि देकर उससे बँधे मत रहो, ‘मैं अगुआ हूँ, मैं टीम अगुआ हूँ, मैं पर्यवेक्षक हूँ, इस काम को मुझसे बेहतर कोई नहीं जानता, मुझसे ज्यादा इन कौशलों को कोई नहीं समझता।’ अपनी स्व-प्रदत्त उपाधि के फेर में मत पड़ो। जैसे ही तुम ऐसा करते हो, वह तुम्हारे हाथ-पैर बाँध देगी, और तुम जो कहते और करते हो, वह प्रभावित होगा। तुम्हारी सामान्य सोच और निर्णय भी प्रभावित होंगे। तुम्हें इस रुतबे की बेबसी से खुद को आजाद करना होगा। पहली बात, खुद को इस आधिकारिक उपाधि और पद से नीचे ले आओ और एक आम इंसान की जगह खड़े हो जाओ। अगर तुम ऐसा करते हो, तो तुम्हारी मानसिकता कुछ हद तक सामान्य हो जाएगी। तुम्हें यह भी स्वीकार करना और कहना चाहिए, ‘मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मुझे वह भी समझ नहीं आया—मुझे कुछ शोध और अध्ययन करना होगा,’ या ‘मैंने कभी इसका अनुभव नहीं किया है, इसलिए मुझे नहीं पता कि क्या करना है।’ जब तुम वास्तव में जो सोचते हो, उसे कहने और ईमानदारी से बोलने में सक्षम होते हो, तो तुम सामान्य विवेक से युक्त हो जाओगे। दूसरों को तुम्हारा वास्तविक स्वरूप पता चल जाएगा, और इस प्रकार वे तुम्हारे बारे में एक सामान्य दृष्टिकोण रखेंगे, और तुम्हें कोई दिखावा नहीं करना पड़ेगा, न ही तुम पर कोई बड़ा दबाव होगा, इसलिए तुम लोगों के साथ सामान्य रूप से संवाद कर पाओगे। इस तरह जीना सुखद और आसान है; जिसे भी जीवन थका देने वाला लगता है, उसने उसे ऐसा खुद बनाया है। ढोंग या दिखावा मत करो। पहली बात, जो कुछ तुम अपने दिल में सोच रहे हो, उसे खुलकर बताओ, अपने सच्चे विचारों के बारे में खुलकर बात करो, ताकि हर कोई उन्हें जान और उन्हें समझ ले। नतीजतन, तुम्हारी चिंताएँ और तुम्हारे और दूसरों के बीच की बाधाएँ और संदेह समाप्त हो जाएँगे। तुम किसी और चीज से बाधित हो। तुम हमेशा खुद को टीम प्रमुख, अगुआ, कार्यकर्ता, या किसी पदवी, रुतबे और प्रतिष्ठा वाला इंसान मानते हो : अगर तुम कहते हो कि तुम कोई चीज नहीं समझते, या कोई काम नहीं कर सकते, तो क्या तुम खुद को बदनाम नहीं कर रहे? जब तुम अपने दिल की ये बेड़ियाँ हटा देते हो, जब तुम खुद को एक अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सोचना बंद कर देते हो, और जब तुम यह सोचना बंद कर देते हो कि तुम अन्य लोगों से बेहतर हो और महसूस करते हो कि तुम अन्य सभी के समान एक आम इंसान हो, और कुछ क्षेत्र ऐसे हैं जिनमें तुम दूसरों से कमतर हो—जब तुम इस रवैये के साथ सत्य और काम से संबंधित मामलों में संगति करते हो, तो प्रभाव अलग होता है, और परिवेश भी अलग होता है। अगर तुम्हारे दिल में हमेशा शंकाएँ रहती हैं, अगर तुम हमेशा तनावग्रस्त और बाधित महसूस करते हो, और अगर तुम इन चीजों से छुटकारा पाना चाहते हो लेकिन नहीं पा सकते, तो तुम्हें परमेश्वर से गंभीरता से प्रार्थना करनी चाहिए, आत्मचिंतन करना चाहिए, अपनी कमियाँ देखनी चाहिए और सत्य की दिशा में प्रयास करना चाहिए। अगर तुम सत्य को अभ्यास में ला सकते हो, तो तुम्हें परिणाम मिलेंगे। चाहे जो करो, पर किसी विशेष पद से या किसी विशेष पदवी का उपयोग करके बात या काम न करो। पहली बात, यह सब एक तरफ कर दो, और खुद को एक आम इंसान के स्थान पर रखो(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। “तुम्हारे लिए रुतबे का अर्थ क्या है? दरअसल, रुतबा बस एक फालतू, अतिरिक्त चीज है, एक वस्त्र या एक टोपी की तरह। यह बस एक आभूषण है। इसका कोई वास्तविक उपयोग नहीं है, और इसकी मौजूदगी किसी को प्रभावित नहीं करती। तुम्हारा कोई रुतबा हो या न हो, तुम अभी भी वही व्यक्ति हो। लोग सत्य को समझ कर सत्य और जीवन को हासिल कर सकते हैं या नहीं, इसका रुतबे से कुछ लेना-देना नहीं है। अगर तुम रुतबे को बहुत बड़ी चीज नहीं मानते, तो यह तुम्हें विवश नहीं कर सकता। अगर तुम रुतबे से प्रेम कर उस पर विशेष जोर देते हो, हमेशा उसे महत्वपूर्ण चीज मानते हो, तो यह तुम्हें अपने नियंत्रण में रखेगा; तुम खुलने, अपना असली रूप दिखाने, खुद को जानने या अपनी अगुआई की भूमिका को दरकिनार कर, दूसरों के साथ कार्य करने, बात करने, संसर्ग करने और अपना कर्तव्य निभाने के लिए तैयार नहीं होगे। यह कैसी समस्या है? क्या यह रुतबे के आगे विवश होने का मामला नहीं है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि तुम रुतबे वाले स्थान से बोलते और कार्य करते हो और अपने ऊँचे पद से उतर नहीं सकते हो। ऐसा करके क्या तुम खुद को ही तकलीफ नहीं दे रहे हो? अगर तुम सचमुच सत्य समझते हो और रुतबा रखते हो पर रुतबे के पद से कार्य नहीं करते, बल्कि अच्छे ढंग से अपना कर्तव्य निभाने में ध्यान लगा सकते हो, वह हर चीज कर सकते हो और अपना वह कर्तव्य पूरा कर सकते हो, जो तुम्हें करना चाहिए, और अगर तुम खुद को एक साधारण भाई-बहन की तरह देखते हो, तो क्या रुतबे के नियंत्रण से मुक्त होने में सक्षम नहीं होगे?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, रुतबे के प्रलोभन और बंधन कैसे तोड़ें)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे समझ आया कि “प्रचारक” शब्द सिर्फ एक ओहदा है और यह किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं करता। ऐसा नहीं था कि मैं सिर्फ प्रचारक होने के कारण तुरंत सत्य समझ सकता था और समस्याएँ हल कर सकता था; मेरा आध्यात्मिक कद अब भी पहले जैसा ही था और मैं उन चीजों को अब भी नहीं कर पाता जो मैं नहीं कर सकता था। परमेश्वर आशा करता है कि मैं एक व्यावहारिक, साधारण व्यक्ति बन सकूँ; ओहदों से बंधा या बेबस न रहूँ; सभाओं के दौरान अपनी भ्रष्टता और कमियों के बारे में खुलकर बता सकूँ, जितना मैं समझता हूँ, उतनी ही संगति कर सकूँ; एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास कर सकूँ और जब ऐसी समस्याओं या मुश्किलों का सामना करूँ जिनका मैं समाधान नहीं कर सकता तो “मुझे नहीं पता” कह सकूँ; भाई-बहनों के साथ खोज और संगति कर सकूँ और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से कर सकूँ। परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मैं इस संबंध में प्रवेश करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करने को तैयार था। बाद में सभाओं के दौरान मैं खुद को प्रचारक के ऊँचे स्थान पर नहीं रखता था, जब मेरे सामने समस्याएँ आतीं जो मुझे समझ में न आतीं तो मैं सबके साथ मिलकर उन पर चर्चा करता और उनका समाधान करता था।

एक बार, मैं एक कलीसिया में उसके काम के बारे में जानने गया और एक भाई को देखा जिससे मैं पहले भी संपर्क में था। उसका जीवन प्रवेश काफी अच्छा था और वह समस्याओं को हल करने के लिए सत्य पर संगति कर सकता था। मैं सोचने लगा, “अगर मैं समस्याओं को सुलझाने में उतना अच्छा नहीं रहा जितना वह है तो भाई-बहन मेरे बारे में क्या सोचेंगे? कहीं वे यह तो नहीं सोचेंगे कि मैं, एक प्रचारक, सत्य का उपयोग करके समस्याओं का समाधान भी नहीं कर सकता? यह बहुत शर्मनाक होगा!” मुझे एहसास हुआ कि मैं फिर से अपने रुतबे और ओहदे से बेबस हो रहा हूँ और अतीत की सभाओं के बारे में सोचा, जब मैंने हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए चीजें छिपाई थीं और खुद को छिपाया था, उन बातों को खुलकर कहने और उजागर करने की हिम्मत नहीं की थी जो मुझे समझ नहीं आती थीं या जो मैं नहीं कर सकता था। सभाओं में दिखावा करना वाकई बहुत दुखद और पीड़ादायक था! मैं अब ऐसा नहीं करना चाहता था। मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आए : “अगर तुम आग में बैठकर भुनना नहीं चाहते तो तुम्हें ये सभी उपाधियाँ और प्रभामंडल त्याग देने चाहिए और अपने भाई-बहनों को अपने दिल की वास्तविक दशाएँ और विचार बताने चाहिए। इस तरह, भाई-बहन तुम्हारे साथ ठीक से पेश आ सकेंगे और तुम्हें भेष बदलने की जरूरत नहीं पड़ेगी। अब जबकि तुम खुल गए हो और अपनी वास्तविक दशा पर प्रकाश डाल रहे हो, तो क्या तुम्हारा दिल ज्यादा सहज, ज्यादा सुकून महसूस नहीं करता? अपनी पीठ पर इतना भारी बोझ लेकर क्यों चला जाए? अगर तुम अपनी वास्तविक दशा बता दोगे तो क्या भाई-बहन वास्तव में तुम्हें हेय दृष्टि से देखेंगे? क्या वे सचमुच तुम्हें त्याग देंगे? बिल्कुल नहीं। इसके विपरीत भाई-बहन तुम्हारा अनुमोदन करेंगे और अपने दिल की बात बताने का साहस करने के लिए तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। वे कहेंगे कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। इससे कलीसिया में तुम्हारे काम में कोई बाधा नहीं आएगी, न ही उस पर थोड़ा-सा भी नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। अगर भाई-बहन वास्तव में देखेंगे कि तुम्हें कठिनाइयाँ हैं तो वे स्वेच्छा से तुम्हारी मदद करेंगे और तुम्हारे साथ सहयोग करेंगे। तुम लोग क्या कहते हो? क्या ऐसा ही नहीं होगा?(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे समझ आया कि अगर मैं रुतबे और ओहदे को छोड़ना चाहता हूँ तो मुझे ईमानदार इंसान बनना होगा, बिना किसी बात को छिपाए या बिना भेष बदले, भाई-बहनों के साथ अपने सच्चे विचारों के बारे में खुलकर संगति करनी होगी, भाई-बहनों से पूछूँ और उन बातों के बारे में सबके साथ संगति करूँ जो मुझे समझ नहीं आतीं, अपनी कमजोरियों की भरपाई के लिए एक-दूसरे की खूबियों से सीखूँ। यह मेरे और कलीसिया के कार्य, दोनों के लिए फायदेमंद है। इसलिए, मैंने मन ही मन परमेश्वर से प्रार्थना की कि वह मुझे राह दिखाए ताकि मैं अपना घमंड और रुतबा त्याग सकूँ, ओहदे के बंधनों को उतार फेंकूँ, एक ईमानदार व्यक्ति बनूँ और संगति में खुलकर अपनी बात रखूँ। सभा के दौरान मैंने खुलकर कहा कि मुझमें कई कमियाँ हैं और अगर किसी को कोई समस्या है, तो हम एक साथ संगति कर सकते हैं और एक-दूसरे की खूबियों से सीख सकते हैं। जब मैंने खुद को प्रचारक के ऊँचे स्थान पर रखना बंद कर दिया, तो मैं सभा में अब उतना तनावग्रस्त या बेबस नहीं होता था। इसके बजाय उस पूरी सभा में मैं सचमुच मुक्त और आजाद महसूस कर रहा था। मुझे भाई-बहनों की संगति से भी कुछ रोशनी मिली, मैंने समस्याओं को और स्पष्ट रूप से देखा। मुझे अपने दिल की गहराइयों से लगा कि सभा के दौरान रुतबे और ओहदे को छोड़ देना कितना सुकून देने वाला है।

इस दौरान अपने अनुभव से, मैंने समझा कि अपने कर्तव्य करते हुए प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करने से मुझे केवल पीड़ा और कष्ट ही मिले, मैं जिस मार्ग पर चल रहा था, वह मसीह-विरोधियों का और परमेश्वर का प्रतिरोध करने का मार्ग था। आखिरकार परमेश्वर द्वारा मुझे हटा दिया जाता। केवल एक सृजित प्राणी की उचित स्थिति में खड़े होकर, व्यावहारिक बनकर और सीधे-सीधे खुलकर और एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही मैं अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकता हूँ।

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

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