अपने कर्तव्य में सही दृष्टिकोण का महत्व
एला, फ़िलीपीन्सअक्तूबर 2020 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकार किया। मैं सभाओं में सक्रिय रूप से भाग लेती और...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के बाद, मैंने देखा कि कलीसिया के अगुआ भाई-बहनों के साथ उनकी समस्याओं और मुश्किलों को सुलझाने के लिए परमेश्वर के वचनों की अक्सर संगति करते थे। इसलिए, मैं मानती थी कि जो लोग कलीसिया में अगुआ थे, वे सत्य समझते थे, निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा अनुमोदित थे और उनके पास उद्धार पाने की आशा थी। मार्च 2021 में, मुझे कलीसिया में एक अगुआ के रूप में चुना गया। मुझे अंदर से बहुत अच्छा लगा और मैंने सोचा कि अगर मैं इसी तरह अपना अनुसरण जारी रखूँगी, तो परमेश्वर के घर में मेरा भविष्य उज्ज्वल होगा और मैं परमेश्वर का अनुमोदन पा सकूँगी। हालाँकि, मुझे उम्मीद नहीं थी कि अपनी खराब काबिलियत और व्यावहारिक कार्य न कर पाने की वजह से बाद में मुझे बरखास्त कर दिया जाएगा। यह खबर मुझ पर बिजली की तरह गिरी और मैं रोए जा रही थी। मैंने मन ही मन सोचा, “खराब काबिलियत एक घातक समस्या है। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि मुझे भविष्य में अगुआ बनने का मौका नहीं मिलेगा?” एक महीने से ज्यादा समय के बाद, कलीसिया ने मुझे सामान्य मामलों के काम की जिम्मेदारी सौंपी। मुझे लगा कि दिन भर कुछ सामान्य मामलों में उलझे रहना मेरे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद नहीं होगा। यह एक अगुआ का कर्तव्य करने जैसा नहीं होगा, जहाँ तुम सत्य पर संगति करने और विभिन्न समस्याओं को हल करने का प्रशिक्षण पा सकते हो, अधिक सत्य और बचाए जाने का ज्यादा मौका पा सकते हो। खास तौर पर, जब मैं उस बहन से मिली जिसके साथ मैंने पहले अगुआई के कर्तव्य में सहयोग किया था और उसे कलीसिया के कुछ मसलों से निपटने और उन्हें सुलझाने के बारे में बात करते सुना, तो मुझे बहुत बुरा लगा। मैंने सोचा कि उसकी तरह एक अगुआ का कर्तव्य कर पाना वाकई बहुत अच्छा था, लेकिन मैं केवल सामान्य मामलों का काम ही कर सकती थी, जो मुझे पसंद नहीं था। जब मैंने सोचा कि ऊपरी अगुआ कहेंगे कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं अगुआ होने की शर्तें पूरी नहीं करती, तो मेरे दिल में बहुत पीड़ा हुई और मैं चुपचाप रोई। मुझे लगा कि मेरा भविष्य अंधकारमय है और मेरे उद्धार पाने की उम्मीदें बहुत कम हैं। मैं अपने कर्तव्य को करने में कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाई और बस यंत्रवत काम करती रही, कोई नतीजा हासिल नहीं हुआ। बाद में, मुझे एहसास हुआ कि मेरी अवस्था गलत थी और मैं सोचने लगी, “जब मैं दूसरों को अगुआ बनते देखती हूँ तो मुझे कमी का एहसास क्यों होता है? मैं परमेश्वर में अपने विश्वास में आखिर किसका अनुसरण कर रही हूँ?”
एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो अंश पढ़े और अपनी अवस्था के बारे में कुछ समझ हासिल की। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब किसी मसीह-विरोधी को बर्खास्त किया जाता है तो उसकी पहली प्रतिक्रिया ऐसी होती है जैसे उस पर बिजली गिर गई हो, मानो आसमान टूट पड़ा हो और उनकी दुनिया ही ढह गई हो। जिस चीज पर वह अपनी उम्मीदें टिकाए हुए था, वह जा चुकी होती है और रुतबे के तमाम फायदों के साथ जीने का मौका भी हाथ से निकल जाता है, साथ ही वह इच्छा भी मिट जाती है जो उसे अंधाधुंध ढंग से बुरे काम करने को प्रेरित करती है। यह उसके लिए सबसे अस्वीकार्य होता है। ... जब वे सोचते हैं कि आशीष पाने की उनकी उम्मीदें नष्ट हो गई हैं या बहुत ही कम हो गई हैं, तो उन्हें ऐसा लगता है जैसे उनका सिर फटने वाला है, ऐसा लगता है जैसे उनके दिल पर हथौड़े से प्रहार किया जा रहा है और उन्हें यह चाकू से काटे जाने जैसा दर्दनाक लगता है। जब वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का आशीष खोने वाले होते हैं जिसके लिए वे दिन-रात इतने लालायित रहते हैं, तो उन्हें यह एक अकस्मात आ टपके भयानक समाचार की तरह लगता है। मसीह-विरोधी की नजर में अपना कोई रुतबा न होना आशीष पाने की कोई उम्मीद न होने के समान होता है और वे एक चलती-फिरती लाश की तरह हो जाते हैं, उनका शरीर एक खोल बनकर रह जाता है, जिसमें आत्मा नहीं होती, जिसमें उनके जीवन को दिशा देने के लिए कुछ नहीं होता। उनके पास कोई उम्मीद नहीं बचती और आगे के लिए कुछ भी नहीं होता। जब कोई मसीह-विरोधी उजागर और बर्खास्त होने का सामना करता है तो उसके मन में सबसे पहले यही आता है कि उसने आशीष पाने की हर उम्मीद खो दी है। तो इस बिंदु पर क्या वे बस हार मान लेंगे? क्या वे समर्पण करने के लिए तैयार होंगे? क्या वे इस अवसर का उपयोग अपनी आशीष की इच्छा छोड़ने, रुतबे को त्यागने, स्वेच्छा से नियमित अनुयायी बनने और खुशी-खुशी परमेश्वर के लिए काम करने और अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाने के लिए करेंगे? (नहीं।) क्या यह उनके लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ हो सकता है? क्या यह महत्वपूर्ण मोड़ उन्हें अच्छी दिशा में और सकारात्मक तरीके से विकसित करेगा या यह उन्हें एक बदतर दिशा और नकारात्मक तरीके से विकसित करेगा? किसी मसीह-विरोधी के प्रकृति सार के आधार पर यह स्पष्ट है कि उसकी बर्खास्तगी उसके आशीष की इच्छा छोड़ने या सत्य को प्रेम करने और खोजने की शुरुआत बिल्कुल नहीं होती। इसके बजाय वह आशीष पाने की आशा और अवसर के लिए लड़ने की खातिर और भी अधिक मेहनत करेगा; वह किसी भी ऐसे अवसर को झपट लेगा जो उसे आशीष दिला सकता है जो उसे वापसी करने में मदद कर अपना रुतबा वापस पाने में सक्षम बना सकता है। इसीलिए बर्खास्तगी का सामना करते समय मसीह-विरोधी परेशान, निराश और विरोधी तो होगा ही, वह बर्खास्त किए जाने के खिलाफ भी जी-जान से लड़ेगा और स्थिति को पलटने और बदलने का प्रयास करेगा” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। “इस प्रकार के लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, फिर भी वे परमेश्वर के घर में हमेशा पदोन्नति और महत्वपूर्ण भूमिका पाना चाहते हैं। अपने दिलों में वे मानते हैं कि किसी व्यक्ति में जितनी अधिक कार्य क्षमता होती है, उसे उतने ही अधिक महत्वपूर्ण पद प्राप्त होते हैं, जितना अधिक उन्हें परमेश्वर के घर में पदोन्नति और सम्मान मिलता है, आशीष, मुकुट और पुरस्कार प्राप्त करने की उनकी संभावना उतनी ही अधिक हो जाती है। वे मानते हैं कि यदि किसी व्यक्ति में कार्य क्षमता नहीं है या उसके पास कोई खास विशेषता नहीं है, तो वह आशीष पाने के योग्य नहीं है। वे सोचते हैं कि किसी व्यक्ति की खूबियाँ, खास विशेषताएँ, योग्यताएँ, कौशल, शिक्षा का स्तर, कार्य क्षमता, और यहाँ तक कि उसकी मानवता के भीतर तथाकथित ताकत और गुण जो दुनिया में मूल्यवान होते हैं जैसे कि दूसरों से आगे निकलने का उसका संकल्प और अदम्य रवैया, आशीष और पुरस्कार प्राप्त करने के लिए पूँजी के रूप में काम कर सकते हैं। यह किस प्रकार का मानक है? क्या यह ऐसा मानक है जो सत्य के अनुरूप है? (नहीं।) यह सत्य के मानकों के अनुरूप नहीं है। तो, क्या यह शैतान का तर्क नहीं है? क्या यह दुष्ट युग और दुष्ट सांसारिक प्रवृत्तियों का तर्क नहीं है? (है।) इस तरह के लोगों द्वारा चीजों का मूल्यांकन करने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले तर्क, तरीकों और मानदंडों के साथ-साथ इन चीजों के प्रति उनके रवैये और निपटने के तरीके को देखें तो ऐसा लगेगा जैसे उन्होंने परमेश्वर के वचनों को कभी सुना या पढ़ा ही नहीं, कि वे उनके बारे में पूरी तरह से अनभिज्ञ थे। लेकिन, वास्तव में वे हर दिन परमेश्वर के वचनों को सुन रहे हैं, पढ़ रहे हैं और इनका प्रार्थना-पाठ कर रहे हैं। तो उनका दृष्टिकोण कभी क्यों नहीं बदलता? एक बात तो तय है—चाहे वे परमेश्वर के वचनों को कितना भी सुन या पढ़ लें, वे अपने दिलों में कभी भी इस बारे में निश्चित नहीं होंगे कि परमेश्वर के वचन सत्य हैं और हर चीज को मापने का मानदंड हैं; वे दिल से इस तथ्य को नहीं समझेंगे या स्वीकार नहीं करेंगे। इसीलिए उनका दृष्टिकोण चाहे कितना भी बेतुका और विकृत क्यों न हो, वे हमेशा उससे चिपके रहेंगे और परमेश्वर के वचन चाहे कितने भी सही क्यों न हों, वे इन्हें अस्वीकार कर इनकी निंदा करते रहेंगे। यह मसीह-विरोधियों की क्रूर प्रकृति होती है। जैसे ही वे कोई महत्वपूर्ण भूमिका पाने में विफल होते हैं और उनकी इच्छाएँ और महत्वाकांक्षाएँ पूरी नहीं हो पातीं, उनका शैतानी चरित्र प्रकट हो जाता है, उनकी क्रूर प्रकृति दिखने लगती है और वे परमेश्वर के अस्तित्व को नकारना चाहते हैं। वास्तव में, परमेश्वर के अस्तित्व को नकारने से पहले ही वे इस बात को नकार देते हैं कि परमेश्वर के वचन सत्य होते हैं” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद बारह : जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता या आशीष पाने की आशा नहीं होती तो वे पीछे हटना चाहते हैं)। परमेश्वर उजागर करता है कि एक बार जब मसीह-विरोधियों को बरखास्त कर दिया जाता है, तो वे मानते हैं कि उनके पास आशीष पाने की कोई उम्मीद नहीं है। वे न केवल समर्पण करने और आत्म-चिंतन करने में असमर्थ होते हैं, बल्कि वे नकारात्मक हो जाते हैं और प्रतिरोध करते हैं, वापसी करने और रुतबा फिर से हासिल करने के ख्याली पुलाव पकाते हैं। लोगों, घटनाओं और चीजों को मापने के लिए वे शैतानी तर्क का उपयोग करते हैं। वे मानते हैं कि परमेश्वर के घर द्वारा उन्हें जितना अधिक बढ़ावा और महत्व दिया जाएगा, उनके आशीष और मुकुट पाने की संभावना उतनी ही अधिक होगी। जब मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया, मुझे एहसास हुआ कि बरखास्त किए जाने के बाद मेरा व्यवहार बिल्कुल एक मसीह-विरोधी जैसा था और चीजों के प्रति मेरा नजरिया बिल्कुल एक मसीह-विरोधी जैसा ही था। मैंने सोचा कि मुझे एक अगुआ होने के रुतबे की इतनी परवाह क्यों थी। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं मानती थी कि अगर मुझे परमेश्वर के घर में एक अगुआ के रूप में बढ़ावा दिया गया, तो मैं हर दिन समस्याओं को हल करने के लिए सत्य का उपयोग करने का प्रशिक्षण पा सकती थी, मेरे जीवन की प्रगति तेज होगी और मेरे पास उद्धार पाने और आशीष पाने का एक बड़ा अवसर होगा। जब मुझे एक अगुआ के रूप में चुना गया, तो मैं बहुत खुश हुई और सोचा कि परमेश्वर में मेरे विश्वास का भविष्य उज्ज्वल है। जब मैं एक अगुआ थी, उस दौरान मैंने बिना किसी शिकायत के सारी कड़ी मेहनत की और एक अगुआ के रूप में अपने रुतबे की सावधानी से रक्षा की, मुझे बेनकाब होने और बरखास्त किए जाने का बहुत डर था। जब मैंने अगुआओं को मुझे बरखास्त करते समय यह कहते हुए सुना कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं एक अगुआ होने की जरूरी शर्तें पूरी नहीं करती, मैं मानती थी कि खराब काबिलियत एक घातक समस्या है और मुझे भविष्य में फिर कभी बढ़ावा और महत्व पाने का मौका नहीं मिल सकता है, इसलिए मेरे दिल में बहुत दर्द था। मुझे लगा कि परमेश्वर में एक विश्वासी के रूप में मेरा भविष्य अंधकारमय है और आशीष पाने की मेरी उम्मीद बहुत कम है। क्योंकि मेरे ये गलत विचार और सोच थी, जब अगुआओं ने मुझे सामान्य मामलों का कर्तव्य सौंपा, मैं मानती थी कि इस कर्तव्य का मतलब सिर्फ हर दिन बाहरी मामलों में व्यस्त रहना है और यह मेरे लिए सत्य पाने और बचाए जाने के लिए फायदेमंद नहीं है। मैं इसे अपने दिल की गहराइयों से नापसंद करती थी और अपने कर्तव्य में कोई ऊर्जा नहीं जुटा पाई। मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर में अपने विश्वास में मैं जिस चीज का अनुसरण करती थी, वह रुतबा और आशीषें थीं। मैंने रुतबे को आशीषों के बराबर माना और एक बार जब मैंने अपना रुतबा खो दिया, तो मुझे लगा कि मैंने आशीष पाने की सारी उम्मीद खो दी है और मेरे दिल में असहनीय दर्द हुआ। मैं शैतानी नजरिए से चीजों को तौल रही थी। अविश्वासी दुनिया में, ऐसा होता है कि तुम्हें जितना अधिक बढ़ावा दिया जाता है, तुम्हारे पास विकास की उतनी ही अधिक संभावनाएँ होती हैं। मैं मानती थी कि परमेश्वर के घर में भी ऐसा ही है और एक अगुआ के रूप में बढ़ावा दिए जाने का मतलब है उद्धार पाने और आशीष पाने का बड़ा अवसर मिलना। यह परमेश्वर के वचनों के बिल्कुल भी अनुरूप नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके बचाए जा सकते हैं या नहीं, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि व्यक्ति कौन-सा कर्तव्य करता है या उसके पास कोई रुतबा है या नहीं। कर्तव्य एक ऐसी जिम्मेदारी है जिसे एक सृजित प्राणी को पूरा करना चाहिए; यह एक बिल्कुल स्वाभाविक और उचित बात है। इसे आशीष या पुरस्कार पाने के लिए सौदेबाजी के साधन के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। हालाँकि, जब मुझे सामान्य मामलों का कर्तव्य सौंपा गया, मैं मानती थी कि यह कर्तव्य मेरे लिए परमेश्वर में मेरे विश्वास में आशीष पाने के लिए फायदेमंद नहीं है, इसलिए मैंने परमेश्वर के बारे में शिकायत की और अपने कर्तव्य में कोई बोझ नहीं उठाया। मैंने अपना कर्तव्य छोड़ने के बारे में भी सोचा। मुझे एहसास हुआ कि मेरी अपनी प्रकृति एक मसीह-विरोधी की तरह ही स्वार्थी और खुद की सेवा करने वाली थी। जैसे ही मैं आशीष नहीं पा सकी, मैंने परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और उसके साथ विश्वासघात किया। यह बहुत खतरनाक था!
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कई लोग स्पष्ट रूप से नहीं जानते कि बचाए जाने का क्या अर्थ होता है। कुछ लोगों का मानना है कि अगर उन्होंने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया है, तो उनके बचाए जाने की संभावना है। कुछ लोग सोचते हैं कि अगर वे बहुत सारे आध्यात्मिक सिद्धांत समझते हैं, तो उनके बचाए जाने की संभावना है या कुछ लोग सोचते हैं कि अगुआ और कार्यकर्ता निश्चित रूप से बचाए जाएँगे। ये सभी मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। महत्वपूर्ण बात यह है कि लोगों को समझना चाहिए कि उद्धार का क्या अर्थ होता है। मुख्य रूप से बचाए जाने का अर्थ है पाप से मुक्त होना, शैतान के प्रभाव से मुक्त होना, सही मायने में परमेश्वर की ओर मुड़ना और परमेश्वर के प्रति समर्पण करना। पाप से और शैतान के प्रभाव से मुक्त होने के लिए तुम्हारे पास क्या होना चाहिए? सत्य होना चाहिए। अगर लोग सत्य प्राप्त करने की आशा रखते हैं, तो उन्हें परमेश्वर के कई वचनों से युक्त होना चाहिए, उन्हें उनका अनुभव और अभ्यास करने में सक्षम होना चाहिए, ताकि वे सत्य को समझकर वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। तभी उन्हें बचाया जा सकता है। किसी को बचाया जा सकता है या नहीं, इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं कि उसने कितने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया है, उसके पास कितना ज्ञान है, उसमें गुण या खूबियाँ हैं या नहीं या वह कितना कष्ट सहता है। एकमात्र चीज जिसका उद्धार से सीधा संबंध है, यह है कि व्यक्ति सत्य प्राप्त कर सकता है या नहीं। तो आज तुमने वास्तव में कितने सत्य समझे हैं? और परमेश्वर के कितने वचन तुम्हारा जीवन बन गए हैं? परमेश्वर की समस्त अपेक्षाओं में से तुमने किसमें प्रवेश किया है? परमेश्वर में अपने विश्वास के वर्षों के दौरान तुमने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में कितना प्रवेश किया है? अगर तुम नहीं जानते या तुमने परमेश्वर के किसी भी वचन की किसी वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है, तो स्पष्ट रूप से तुम्हारे उद्धार की कोई आशा नहीं है। तुम्हें बचाया नहीं जा सकता। यह कुछ महत्व नहीं रखता कि तुम्हारे पास उच्च स्तर का ज्ञान है या नहीं या तुमने लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास किया है या नहीं, तुम्हारा रूप-रंग अच्छा है या नहीं, तुम अच्छा बोल सकते हो या नहीं और तुम कई वर्षों तक अगुआ या कार्यकर्ता रहे हो या नहीं। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते और परमेश्वर के वचनों का ठीक से अभ्यास और अनुभव नहीं करते और तुममें वास्तविक अनुभवजन्य गवाही की कमी है, तो तुम्हारे बचाए जाने की कोई आशा नहीं है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। “आखिरकार, लोग उद्धार प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं है कि वे कौन-सा कर्तव्य निभाते हैं, बल्कि इस बात पर निर्भर है कि वे सत्य को समझ और हासिल कर सकते हैं या नहीं, और अंत में, वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित हो सकते हैं या नहीं, खुद को उसके आयोजन की दया पर छोड़ सकते हैं या नहीं, अपने भविष्य और नियति पर कोई ध्यान न देकर एक ऐसा सृजित प्राणी बन सकते हैं जो मानक के अनुरूप हो। परमेश्वर धार्मिक और पवित्र है और ये वे मानक हैं जिनका उपयोग वह पूरी मानवजाति को मापने के लिए करता है। ये मानक अपरिवर्तनीय हैं, और यह तुम्हें याद रखना चाहिए। इन मानकों को अपने मन में अंकित कर लो, और किसी अवास्तविक चीज को पाने की कोशिश करने के लिए कोई दूसरा मार्ग ढूँढ़ने की मत सोचो। उद्धार पाने की इच्छा रखने वाले सभी लोगों के लिए परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक हमेशा के लिए अपरिवर्तनशील हैं। वे वैसे ही रहते हैं, फिर चाहे तुम कोई भी क्यों न हो” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने के बाद, मैं समझ गई कि कोई व्यक्ति बचाया जाएगा या नहीं, इसे परमेश्वर इस आधार पर नहीं मापता कि वह कौन-सा कर्तव्य करता है, वह कितना कष्ट सहता है या उसके पास क्या गुण या कौशल हैं, बल्कि इस आधार पर मापता है कि क्या वह सत्य को समझ सकता है, सत्य को पा सकता है और परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकता है। परमेश्वर ने कभी नहीं कहा कि अगुआओं के पास उद्धार की अधिक आशा है। मुख्य बात यह देखना है कि कोई व्यक्ति किस मार्ग पर चलता है। एक अगुआ होने का मतलब है कि तुम कई लोगों के संपर्क में आते और कई चीजों का सामना करते हो। अगर तुम सत्य का अनुसरण करने पर ध्यान केंद्रित कर सकते हो, तो तुम्हें सत्य पाने के अधिक अवसर मिलेंगे और तुम जल्द से जल्द सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते और बचाए जा सकते हो। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते हो और सत्य को स्वीकार या परमेश्वर के वचनों का अभ्यास किए बिना, केवल कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से खुद को लैस करने से ही संतुष्ट रहते हो, तो चाहे तुम कितने भी वर्षों तक एक अगुआ का कर्तव्य करो, तुम उद्धार प्राप्त नहीं करोगे। इसके अलावा, दूसरे कर्तव्य करने का यह मतलब नहीं है कि तुम्हारे पास उद्धार का कम मौका है। तुम चाहे कोई भी कर्तव्य करो, जब तक तुम सत्य का अनुसरण करने और अपने भ्रष्ट स्वभावों को सुलझाने पर ध्यान केंद्रित करते हो, लोगों और चीजों को देखते हो और परमेश्वर के वचनों के अनुसार आचरण और कार्य करते हो और परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करते हो, तो तुम्हारे पास उद्धार का मौका होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है : “जिन लोगों को पदोन्नत और विकसित किया गया है, वे महज अपनी काबिलियत और अपनी विभिन्न दशाओं के कारण सत्य वास्तविकता में पहले प्रवेश कर सकेंगे। लेकिन इस तरह पहले प्रवेश करने का यह अर्थ नहीं है कि सिर्फ वे ही लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकेंगे। इसका बस यह अर्थ है कि वे थोड़ा पहले थोड़ा ज्यादा हासिल कर सकेंगे और थोड़ा पहले सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकेंगे। जिन लोगों को पदोन्नत नहीं किया गया है, वे उनसे थोड़ा पीछे रह जाएँगे, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर सकेंगे। कोई सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है या नहीं, यह उसके प्रयासों पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (5))। मैंने उन अगुआओं के बारे में सोचा जिन्हें मैं पहले से जानती थी। उनमें से कुछ के पास कुछ काबिलियत और गुण थे और वे अक्सर अपने भाई-बहनों की समस्याओं और मुश्किलों को सुलझाते थे। हालाँकि, वे खुद सत्य का अभ्यास नहीं करते थे और अपने भ्रष्ट स्वभावों पर भरोसा करके अपना कर्तव्य करते थे। उन्होंने कलीसिया के काम में गड़बड़ी की और बाधा डाली, हठपूर्वक पश्चाताप करने से इनकार कर दिया और अंततः उन्हें बाहर निकाल दिया गया। इसके विपरीत, कुछ भाई-बहन साधारण कर्तव्य करते हैं, लेकिन वे सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जितना वे समझते हैं उतना अभ्यास करते हैं, अपनी क्षमताओं के अनुसार अपने कर्तव्य अच्छी तरह से करते हैं और कलीसिया के काम की रक्षा करते हैं। कुछ समय बाद, वे अपने कर्तव्यों और जीवन प्रवेश में प्रगति कर पाते हैं और वे भी सत्य पा सकते हैं और परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं। कोई व्यक्ति परमेश्वर द्वारा अनुमोदित किया जा सकता है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि वह किस स्तर का अगुआ है, बल्कि यह परमेश्वर, सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति उसके रवैये से निर्धारित होता है; यह इस बात पर निर्भर करता है कि वह सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलता है या नहीं। इससे मैंने परमेश्वर के स्वभाव की पवित्रता और धार्मिकता को देखा। सत्य के सामने हर कोई बराबर है और अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते और सत्य का अभ्यास नहीं करते, तो चाहे तुम कितने भी बड़े अगुआ क्यों न हो, तुम अंततः अडिग रहने में असफल हो जाओगे। जब मैं यह समझ गई, मेरा दिल रोशन हो गया। भले ही मेरी काबिलियत औसत है, मैं परमेश्वर के वचन समझ सकती हूँ और मैं चाहे कोई भी कर्तव्य करूँ, जब तक मैं सत्य खोजने और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करती हूँ, मेरे पास बचाए जाने की आशा है।
इसके बाद, मैंने परमेश्वर के वचनों के दो और अंश पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य सक्रिय रूप से निभाना ही सफलता का पथ है; परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम के पथ की खोज करना ही सबसे सही पथ है; अपने पुराने स्वभाव में बदलावों की खोज करना, और परमेश्वर के प्रति शुद्ध प्रेम की खोज करना ही सफलता का पथ है। सफलता का ऐसा ही पथ मूल कर्तव्य की पुनः प्राप्ति का और साथ ही सृजित प्राणी के मूल प्रकटन का पथ भी है। यह पुनः प्राप्ति का पथ है, और यह आरंभ से अंत तक परमेश्वर के समस्त कार्य का लक्ष्य भी है। यदि मनुष्य का अनुसरण व्यक्तिगत असंयमी माँगों और विवेकहीन लालसाओं से कलंकित है, तो प्राप्त किया गया प्रभाव मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन नहीं होगा। यह पुनः प्राप्ति के कार्य के विपरीत है। यह निस्संदेह पवित्र आत्मा द्वारा किया गया कार्य नहीं है, और इसलिए यह साबित करता है कि इस प्रकार का अनुसरण परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है। उस अनुसरण का भला क्या महत्व है जो परमेश्वर द्वारा स्वीकृत नहीं है?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है)। “सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य को सृजित प्राणी का कर्तव्य अच्छे से निभाने की कोशिश करनी चाहिए और दूसरे विकल्पों को छोड़कर परमेश्वर से प्रेम करने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि परमेश्वर मनुष्य के प्रेम के योग्य है। वे जो परमेश्वर के प्रेम का अनुसरण करते हैं, उन्हें किसी व्यक्तिगत लाभ का अनुसरण नहीं करना चाहिए या उसका अनुसरण नहीं करना चाहिए जिसके लिए वे व्यक्तिगत रूप से लालायित हैं; यह अनुसरण का सबसे सही माध्यम है। यदि तुम जिसका अनुसरण करते हो वह सत्य है, तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह सत्य है और यदि तुम जो प्राप्त करते हो वह तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन है, तो तुम जिस पथ पर कदम रखते हो वह सही पथ है। यदि तुम जिसका अनुसरण करते हो वह देह के आशीष हैं और तुम जिसे अभ्यास में लाते हो वह तुम्हारी अपनी अवधारणाओं का सत्य है और यदि तुम्हारे स्वभाव में बिल्कुल कोई भी परिवर्तन नहीं होता है और तुम देहधारी परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी समर्पित नहीं हो और तुम अभी भी अस्पष्टता में जीते हो, तो तुम जिसका अनुसरण कर रहे हो वह निश्चय ही तुम्हें नरक ले जाएगा, क्योंकि जिस पथ पर तुम चल रहे हो वह विफलता का पथ है। तुम्हें पूर्ण बनाया जाएगा या निकाला जाएगा यह तुम्हारे अपने अनुसरण पर निर्भर करता है, जिसका तात्पर्य यह भी है कि सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है)। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने के बाद, मैं समझ गई कि तुम परमेश्वर में विश्वास करने में कौन-सा मार्ग अपनाते हो, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर चाहता है कि लोग सृजित प्राणियों के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करें और पतरस की तरह, परमेश्वर को समझने और परमेश्वर से प्रेम करने का अनुसरण करें। केवल इसी तरह से कोई व्यक्ति स्वभाव में बदलाव हासिल कर सकता है और परमेश्वर के सभी आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकता है; व्यक्ति को पौलुस की तरह केवल आशीष और मुकुट पाने के लिए काम करना और खुद को खपाना नहीं चाहिए। पौलुस का अनुसरण परमेश्वर की अपेक्षाओं के विपरीत था। उसने अंत तक विश्वास किया, लेकिन उसके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया, वह अभी भी परमेश्वर से माँगों और अनुरोधों से भरा था और उसकी प्रकृति अभी भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाली थी। मैं पौलुस के असफल मार्ग पर चल रही थी। मैं हमेशा मानती थी कि एक अगुआ होने से मुझे प्रशिक्षण के कई अवसर मिलेंगे, जिससे मुझे बचाए जाने की अधिक आशा मिलेगी। इसलिए, मैं लगातार एक अगुआ बनना चाहती थी। परमेश्वर में अपने विश्वास में मैं जिसका अनुसरण करती थी, वह था आशीष और मुकुट पाना, न कि सत्य और अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करना। इसलिए, जब मुझे मेरी खराब काबिलियत के कारण बरखास्त कर दिया गया और मुझे लगा कि मुझे फिर कभी एक अगुआ बनने का अवसर नहीं मिल सकता है और आशीष पाने की मेरी उम्मीदें बहुत कम हैं, मैं नकारात्मक और उदासीन हो गई और अपने कर्तव्य पर कोई ध्यान नहीं दिया। मुझे एहसास हुआ कि मैंने परमेश्वर के प्रति बिल्कुल भी कोई निष्ठा नहीं दिखाई। अगर मैं किसी गलत रास्ते पर चलती रही, और सत्य का अनुसरण नहीं करती, तो मेरा जीवन स्वभाव नहीं बदलता और मैं परमेश्वर के आयोजन और व्यवस्थाओं के प्रति बिल्कुल भी समर्पण नहीं दिखाती। तो अंत में, क्या मेरा परिणाम बिल्कुल पौलुस जैसा नहीं होता? जब मैं यह समझ गई, मैंने अपने दिल की गहराइयों से परमेश्वर का धन्यवाद किया कि उसने मेरे गलत नजरिये को उजागर करने के लिए ऐसे परिवेश का इंतजाम किया। यह मुझे बचा रहा था! जब मैं यह समझ गई, तो मैं इस बात को लेकर अब और परेशान नहीं हुई कि मेरी काबिलियत खराब है और मैं एक अगुआ होने की जरूरी शर्तें पूरी नहीं करती। मैं एक सृजित प्राणी हूँ और मुझे आशीषों का अनुसरण नहीं करना चाहिए या परमेश्वर के साथ सौदेबाजी करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसके बजाय, मुझे एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए और परमेश्वर से प्रेम करने और उसके प्रति समर्पण करने का प्रयास करना चाहिए। जीवन में यही सही मार्ग है और एक सृजित प्राणी को ऐसा ही होना चाहिए। उसके बाद, सामान्य मामलों के कर्तव्य के प्रति मेरा रवैया और अधिक उचित हो गया और मैं व्यावहारिक तरीके से अपने कर्तव्य कर पाई। एक बार जब मेरी अवस्था बदल गई, तो मेरी कार्य कुशलता में भी थोड़ा सुधार हुआ।
बाद में, जब भी मैं अपने सामान्य मामलों के कर्तव्य में व्यस्त हो जाती, मुझे अब भी लगता था कि इस कर्तव्य में मुख्य रूप से बाहरी मामलों में व्यस्त रहना शामिल है और यह मेरे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद नहीं होगा। हालाँकि, मैं जानती थी कि यह दृष्टिकोण गलत था और इसलिए मैंने यह खोजा कि इस कर्तव्य को करते हुए मुझे जीवन प्रवेश पर कैसे ध्यान केंद्रित करना चाहिए। मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “क्या तुम लोग ऐसी अवस्थाओं का अनुभव करते हो, जिनमें चाहे कुछ भी हो जाए, या चाहे तुम जिस भी प्रकार का कर्तव्य निभाओ, तुम अक्सर परमेश्वर के सामने शांत रह पाते हो, और उसके वचनों पर विचार करने, सत्य की खोज करने और इस बात पर विचार करने में अपना दिल लगा पाते हो कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप तुम्हें वह कर्तव्य कैसे निभाना चाहिए और वह कर्तव्य मानक स्तर पर निभाने के लिए तुम्हारे पास कौन-से सत्य होने चाहिए? क्या ऐसे बहुत सारे अवसर होते हैं जिनमें तुम इस तरीके से सत्य खोजते हो? (नहीं।) अपना कर्तव्य दिल लगाकर करने और इसकी जिम्मेदारी लेने के लिए तुम्हें पीड़ा सहने और एक कीमत चुकाने की ज़रूरत है—इन चीजों के बारे में बात करना ही काफी नहीं है। यदि तुम अपना कर्तव्य दिल लगाकर नहीं करते हो, बल्कि हमेशा कड़ी मेहनत करना चाहते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निश्चित ही अच्छी तरह नहीं निभेगा। तुम बस बेमन से काम करते रहोगे, और कुछ नहीं, और तुम्हें पता नहीं चलेगा कि तुमने अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभाया है या नहीं। यदि तुम दिल लगाकर काम करोगे, तो तुम धीरे-धीरे सत्य को समझोगे; लेकिन अगर तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम नहीं समझोगे। जब तुम दिल लगाकर अपना कर्तव्य निभाते हो और सत्य का अनुसरण करते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के इरादे समझने, अपनी भ्रष्टता और कमियों का पता लगाने और अपनी सभी विभिन्न अवस्थाओं को समझने में सक्षम हो जाओगे। जब तुम्हारा ध्यान केवल प्रयास करने पर ही केंद्रित होता है, और तुम अपना दिल आत्मचिंतन करने पर नहीं लगाते हो, तो तुम अपने दिल की वास्तविक अवस्थाओं और विभिन्न परिवेशों में अपनी असंख्य प्रतिक्रियाओं और भ्रष्टता के प्रकाशनों का पता लगाने में असमर्थ होगे। अगर तुम नहीं जानते कि समस्याएँ अनसुलझी रहने पर क्या परिणाम होंगे, तो तुम बहुत परेशानी में हो। यही कारण है कि भ्रमित तरीके से परमेश्वर में विश्वास करना अच्छा नहीं है। तुम्हें हर समय, हर जगह परमेश्वर के सामने रहना चाहिए; तुम पर जो कुछ भी आ पड़े, तुम्हें हमेशा सत्य की खोज करनी चाहिए, और ऐसा करते हुए तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए और जानना चाहिए कि तुम्हारी अवस्था में क्या समस्याएँ हैं, और उन्हें हल करने के लिए फौरन सत्य की तलाश करनी चाहिए। केवल इसी तरह तुम अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा सकते हो और कार्य में देरी करने से बच सकते हो। तुम न सिर्फ अपना कर्तव्य अच्छी तरह से निभा पाओगे, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि तुम्हारे पास जीवन-प्रवेश भी होगा और तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने में सक्षम होगे। केवल इसी तरह से तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई सच्चे मानव के समान जी सकता है)। परमेश्वर के वचनों से, मुझे एहसास हुआ कि सत्य पाना और उद्धार प्राप्त करना इस बात पर निर्भर नहीं करता कि हम कौन-से कर्तव्य करते हैं। इसके बजाय, यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या हम अपने कर्तव्य करने में सत्य सिद्धांतों को खोजते हैं, अपनी खुद की भ्रष्टता और कमियों पर चिंतन करते हैं और अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सत्य खोजते हैं, जिससे हम अपने कर्तव्य करने में जीवन प्रवेश हासिल करते हैं। अगर हम अपने कर्तव्य करने में सत्य खोजने और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, तो हम चाहे कोई भी कर्तव्य करें, हम सत्य पा सकते हैं। उदाहरण के लिए, मैं अब सामान्य मामलों के काम में अधिक शामिल हूँ। अगर मैं सब कुछ लापरवाही और उलझे ढंग से करती हूँ और इसे कर्तव्यनिष्ठा से नहीं करती, तो मैं कलीसिया के हितों को नुकसान पहुँचा सकती हूँ। इसके अलावा, सामान्य मामलों का कर्तव्य करने का मतलब शून्य में रहना नहीं है। मेरा सामना अभी भी हर दिन कुछ लोगों, घटनाओं और चीजों से होता है, जिससे हर तरह के सक्रिय विचार प्रकट होते हैं। अगर मैं हर दिन प्रकट होने वाले भ्रष्ट स्वभावों, विचारों और सोच के माध्यम से आत्म-चिंतन करने और खुद को जानने पर ध्यान केंद्रित कर सकती हूँ और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकती हूँ, तो मैं कई सबक सीख सकूँगी और सत्य पा सकूँगी। जब मैं यह समझ गई, तो मुझे बहुत अधिक सहज महसूस हुआ।
बाद में, अपना कर्तव्य करते समय मैंने हर दिन अपने विचारों और सोच की जाँच करने पर ध्यान केंद्रित किया। जब मेरी काट-छाँट की गई, मैंने सक्रिय रूप से सत्य भी खोजा और भाई-बहनों की अनुभवजन्य गवाहियाँ देखीं, यह देखा कि जब दूसरों पर चीजें आ पड़ती थीं तो वे कैसे आत्म-चिंतन करते थे और सबक सीखते थे। उदाहरण के लिए, पहले, मेरे भाई-बहनों ने बताया था कि मेरा स्वभाव घमंडी था और जब चीजें मुझ पर आती थीं तो मैं बहस करने लगती थी। मैंने इसे स्वीकार किया, आत्म-चिंतन किया और खुद को जाना और इस पहलू में पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे। मैंने भाई-बहनों के सामने खुलकर अपनी बात रखी और अपनी बहस करने की समस्या को हल करने का तरीका खोजा। मैं अक्सर अनुभवजन्य गवाही लेख लिखने के लिए भी समय निकालती हूँ और मैंने अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभाव की एक स्पष्टतर और अधिक गहरी समझ हासिल की है। इस तरह से अपना कर्तव्य करते समय मैं अपने दिल में शांति और सुकून महसूस करती हूँ। मैं इस तरह से जितना अधिक प्रशिक्षण लेती हूँ, मेरा दिमाग उतना ही तेज होता जाता है। मैं अपने कर्तव्य में समस्याओं को तुरंत खोजने में अधिक सक्षम हूँ और अपना कर्तव्य करने में मेरे पास परमेश्वर की अगुआई और आशीष है। परमेश्वर का धन्यवाद!
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