अपने झूठ बोलने का इलाज मैंने कैसे किया
मेरिनेट, फ्रांसपहले, मैं बिना सोचे-समझे झूठ बोलती और चापलूसी किया करती थी, क्योंकि मैं डरती थी कि कहीं सच बोलकर लोगों को निराश न कर दूँ या...
हम परमेश्वर के प्रकटन के लिए बेसब्र सभी साधकों का स्वागत करते हैं!
शनिवार, 3 दिसंबर 2022, हल्की बारिश
आज वर्कशीट व्यवस्थित करते समय मुझे संयोग से एक वीडियो मिला जिसे गलत तरीके से दो-दो बार प्रोडक्शन के लिए भेजकर मैंने एक ही काम दोहरा दिया। मुझे बहुत हैरानी हुई। ध्यान से जाँचने के बाद मुझे पता चला कि मैं प्रोडक्शन के लिए भेजने से पहले रिकॉर्ड जाँचना भूल गई थी। मुझे याद आया कि पहले भी रिकॉर्ड न जाँचने के कारण मैं दो बार ऐसी गलती कर चुकी थी। तब अगुआ ने सावधान न रहने के लिए मेरी आलोचना की थी और गलतियों के कारणों का सारांश देकर कहा था कि मैं यही गलती आइंदा दोहराने से बचूँ। मुझे उम्मीद नहीं थी कि इस बार फिर वही गलती कर बैठूँगी। मैं बहुत कमजोर महसूस कर रही थी। “मैं कुछ ही दिनों से पर्यवेक्षक बनी हूँ और मैंने फिर से इतनी निम्न स्तर की गलती कर दी है। अगर अगुआ को पता चल गया, तो वह मुझसे कितनी निराश होगी! अगर वह फिर से मेरी आलोचना और काट-छाँट करेगी तो मैं कैसे नजरें मिला पाऊँगी?” मुझे यह भी याद आया कि कुछ दिन पहले हमारे समूह में बहन नादिया को बर्खास्त कर दिया गया था क्योंकि वह हमेशा अपने कर्तव्यों में लापरवाह रहती थी। तब तो मैंने भी उसके साथ उसके कर्तव्य में लापरवाह रहने की प्रकृति और नतीजों पर संगति कर उन्हें उजागर किया था। लेकिन अब मैंने भी अपनी लापरवाही के कारण इतनी निम्न-स्तरीय गलती की है। अगर भाई-बहनों को पता चला तो वे पक्का कहेंगे कि मैं शब्द और धर्म-सिद्धांतों का खूब उपदेश देती हूँ लेकिन अपने कर्तव्य लापरवाही से निभाती हूँ और मेरे पास कोई सत्य वास्तविकता नहीं है, जिससे मैं पर्यवेक्षक बनने लायक नहीं हूँ। जितना अधिक मैंने इसके बारे में सोचा, उतना ही मैं असहज महसूस करने लगी और मुझे उस समय सावधानी से जाँच न करने का पछतावा हुआ। मैं इतनी शर्मिंदा थी कि सबके सामने अपनी गलती नहीं मान सकती थी, इसलिए मैंने पिछला प्रोडक्शन रिकॉर्ड हटा दिया। उसी पल परमेश्वर के वचनों का एक वाक्यांश मेरे दिमाग में कौंध गया : “मनुष्य के गुप्त शब्द और कर्म हमेशा मेरे न्याय के आसन के सामने रहते हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है)। मुझे अपने दिल में डर और कंपकंपी का एहसास हुआ : परमेश्वर मनुष्य के अंतरतम अस्तित्व की पड़ताल करता है। भले ही मैं इसे लोगों से छिपा सकती हूँ पर परमेश्वर को धोखा नहीं दे सकती। अगर मैं कपट का सहारा लेती हूँ तो परमेश्वर इसे स्पष्टता से देख लेगा और मेरी निंदा करेगा। मैं बहुत डर गई और हटाए गए रिकॉर्ड को मैंने फौरन बहाल कर दिया। इस रिकॉर्ड को देखना एक ऐसे दाग जैसा था जिसे मिटाया नहीं जा सकता था। लेकिन अगुआ के सामने अपनी गलती कबूलने का साहस मुझमें वाकई नहीं था। मैंने सोचा कि अगर मैंने कुछ नहीं कहा तो किसी को पता नहीं चलेगा, इसलिए मैंने जल्दी से वर्कशीट बंद कर दी।
रात भर मैं बिस्तर पर करवटें बदलती रही, सो नहीं पाई, बेचैन रही। मैंने साफ तौर पर एक गलती की थी जिससे काम को नुकसान हुआ, फिर भी मैंने इसके बारे में अनजान होने का नाटक किया और मैंने इस मुद्दे के बारे में अगुआ को बताने की योजना नहीं बनाई थी। मैं बेशर्मी से धोखेबाजी कर रही थी! बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “परमेश्वर उन लोगों को पूर्ण नहीं बनाता है जो धोखेबाज हैं। अगर तुम्हारा हृदय ईमानदार नहीं है—अगर तुम ईमानदार व्यक्ति बनने का प्रयास नहीं करते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त नहीं किए जाओगे। इसी तरह, तुम कभी भी सत्य को प्राप्त नहीं कर पाओगे और न ही तुम परमेश्वर को प्राप्त कर पाओगे। परमेश्वर को न पाने का क्या अर्थ है? अगर तुम परमेश्वर को प्राप्त नहीं करते हो और तुम सत्य को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर को नहीं जानोगे और तुम्हारे पास परमेश्वर से सुसंगत होने का कोई रास्ता नहीं होगा, ऐसा हुआ तो तुम परमेश्वर के शत्रु हो। अगर तुम परमेश्वर से सुसंगत नहीं हो, तो परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है; अगर परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर नहीं है, तो तुम्हें बचाया नहीं जा सकता। अगर तुम उद्धार प्राप्त करने का प्रयास नहीं करते, तो तुम परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? अगर तुम उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम हमेशा परमेश्वर के कट्टर शत्रु बनकर रहोगे और तुम्हारा परिणाम तय हो चुका होगा। इस प्रकार, अगर लोग चाहते हैं कि उन्हें बचाया जाए, तो उन्हें ईमानदार लोग बनना शुरू करना होगा। ऐसे लोग जिन्हें अंत में परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाएगा, उनमें एक खास चिह्न होता है। क्या तुम लोग जानते हो कि वह क्या है? बाइबल में, प्रकाशितवाक्य में लिखा है : ‘उनके मुँह से कभी झूठ न निकला था, वे निर्दोष हैं’ (प्रकाशितवाक्य 14:5)। कौन हैं ‘वे’? ये वे लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा बचाया, पूर्ण किया और प्राप्त किया जाता है। परमेश्वर उनका वर्णन कैसे करता है? उनके स्व-आचरण की विशेषताएँ और अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? वे निर्दोष हैं। उनके मुँह से कोई झूठ नहीं निकलता। तुम सब लोग शायद समझ-बूझ और पकड़ सकते हो कि ‘कोई झूठ नहीं’ का क्या अर्थ है : इसका अर्थ ईमानदार होना है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन संवृद्धि के छह संकेतक)। “सभी में कपटी स्वभाव होता है; फर्क सिर्फ इतना है कि यह कितना गंभीर है। भले ही तुम सभाओं में अपना हृदय खोलकर अपनी समस्याओं के बारे में संगति कर लो लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि तुममें कपटी स्वभाव नहीं है? ऐसा नहीं है, तुममें भी कपटी स्वभाव है। मैं यह क्यों कह रहा हूँ? यह रहा उदाहरण : तुम संगति में उन चीजों के बारे में तो खुलकर बात कर सकते हो जो तुम्हारे गर्व या अभिमान को नहीं छूतीं, जो शर्मनाक नहीं हैं और जिनके बारे में अगर तुम दूसरे लोगों को बता देते हो तो तुम्हारी काट-छाँट नहीं की जाएगी—लेकिन अगर तुमने कुछ ऐसा किया हो जो सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन करता हो, जिससे हर कोई बेहद घृणा और जुगुप्सा करे तो क्या तुम सभाओं में उसके बारे में खुलकर संगति कर पाओगे? और अगर तुमने कुछ ऐसा किया हो जिसे बयान नहीं किया जा सकता, तो उसके बारे में खुलकर बोलना और खुद को खोलकर रख देना तुम्हारे लिए और भी मुश्किल होगा। अगर कोई इस मामले की जाँच करे या इसके लिए दोष तय करने का प्रयास करे तो तुम इसे छिपाने के लिए अपने सभी हथकंडे अपनाओगे और इस बात से भयभीत रहोगे कि यह उजागर हो सकता है। तुम हमेशा उस पर पर्दा डालने और उससे बच निकलने की कोशिश करोगे। क्या यह कपटी स्वभाव नहीं है? तुम्हें लग सकता है कि अगर तुम इसे जोर से नहीं कहते तो किसी को इसका पता नहीं चलेगा, यहाँ तक कि परमेश्वर के पास भी इसे जानने का कोई तरीका नहीं होगा। यह गलत है! परमेश्वर लोगों के अंतरतम की पड़ताल करता है। अगर तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो तुम परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते। कपटी लोग न सिर्फ दूसरों को छलते हैं—वे परमेश्वर को छलने की कोशिश करने की हिम्मत भी करते हैं और उसका प्रतिरोध करने के लिए कपटपूर्ण हथकंडे आजमाते हैं। क्या ऐसे लोग परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं? परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक और पवित्र है, और कपटी लोगों से वह सबसे ज्यादा घृणा करता है। अतः कपटी लोग वे हैं जिनके लिए उद्धार प्राप्त करना सबसे कठिन है। कपटी प्रकृति के लोग सबसे ज्यादा झूठ बोलने वाले होते हैं। यहाँ तक कि वे परमेश्वर से भी झूठ बोलते हैं और उसे भी छलने की कोशिश करते हैं, और हठपूर्वक पश्चात्ताप नहीं करते। इसका अर्थ है कि वे परमेश्वर का उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, छह प्रकार के भ्रष्ट स्वभावों को जानने का अर्थ ही वास्तव में खुद को जानना है)। गलती करने के बाद परमेश्वर के वचनों की तुलना अपने विचारों और कार्यों से करने पर मुझे एहसास हुआ कि मैं एक धोखेबाज स्वभाव प्रकट कर रही थी। यह एक तथ्य था कि मैंने अपने कर्तव्य अनमने ढंग से निभाए थे, जिसके परिणामस्वरूप बार-बार काम दोहराना पड़ा और मानव और भौतिक संसाधनों की बर्बादी हुई। मुझे एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए और अगुआ के सामने अपनी गलती सच्चाई से स्वीकारनी चाहिए और जिम्मेदारी लेनी चाहिए। लेकिन मुझे डर था कि अगुआ और भाई-बहन मुझे नीची नजर से देखेंगे, इसलिए मैंने पिछला प्रोडक्शन रिकॉर्ड हटाकर अपनी गलती छिपा दी और सोचा कि किसी को भी समस्या का पता नहीं चलेगा। भले ही मैंने बाद में रिकॉर्ड बहाल कर दिया, फिर भी मैं अपनी गलती स्वीकारना नहीं चाहती थी, मुझे उम्मीद थी कि इसे कोई नहीं पकड़ पाएगा; जब तक किसी को पता नहीं चलता, तब तक मामला अनसुलझा ही रहेगा। अगर किसी को बाद में इसके बारे में पता चलता है तो मैं कह दूँगी कि मैंने इसे देखा तो था लेकिन इसका उल्लेख करना भूल गई थी, ऐसा नहीं कि मैं जानबूझकर इसे छिपा रही थी। इस तरह मैं धोखेबाज दिखे बिना अपनी गलती छिपा सकती थी। मैं बहुत धोखेबाज थी! परमेश्वर का सार पवित्र है और वह ईमानदार लोगों को पसंद करता है और धोखेबाज लोगों से घृणा करता है। यह जानते हुए भी कि परमेश्वर हर चीज की पड़ताल करता है, फिर भी मैं कपट और चालबाजी में लगी रही। मेरे कार्यों से परमेश्वर को घृणा हुई। अगर मैं पश्चात्ताप नहीं करती और ईमानदार नहीं बनती तो भले ही मैंने बाहरी रूप से कितना भी त्याग किया हो, अंत में मुझे बचाया नहीं जाएगा। लेकिन अगुआ के सामने अपनी गलती स्वीकारना बहुत अपमानजनक था। मुझे डर था कि अगुआ मुझसे निराश हो जाएगी और मेरी काट-छाँट करेगी और मुझमें बोलने की हिम्मत नहीं हुई। मेरे दिल में द्वंद्व और दर्द महसूस हुआ।
सोमवार, 5 दिसंबर 2022, बादल छाए हुए
दो दिन बीत चुके हैं और मुझमें अभी भी अगुआ को बताने की हिम्मत नहीं है। पिछले दो दिनों से मैं इस घटना को अपनी स्मृति से मिटा देने के लिए बेचैन रही; ऐसा करने से मुझे अपनी गलती स्वीकारने और शर्मिंदगी का सामना करने की जरूरत नहीं पड़ती। मैंने खुद को पूरी तरह से अपने काम में झोंक दिया है, जिससे अस्थायी तौर पर मुझे इस घटना को भूलने में मदद मिली है। लेकिन फुर्सत के पल मिलने पर मैं फिर से इस बारे में सोचने से बच नहीं पाती। यह गलती मुझे एक बुरे सपने की तरह जकड़े रहती है। चाहे मैं खा रही हूँ, सफाई कर रही हूँ या चल रही हूँ, इसके बारे में सोचने से मेरा दिल ऐसा दुखता है मानो इसे मरोड़ दिया गया हो। मानो मेरे दिमाग में कोई आवाज लगातार मुझे दोषी ठहरा रही हो : “तुम एक ईमानदार इंसान नहीं हो; तुम्हें बचाया नहीं जा सकता।” मैं रात को भी चैन से सो नहीं पाती हूँ और मेरा दिल पीड़ा में रहता है। मैं परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचती हूँ : “संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने क्रियाकलापों और शब्दों में शुद्ध होना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। मैं जो कहता हूँ वह बहुत सरल है, किंतु तुम लोगों के लिए यह दोगुना मुश्किल है। बहुत-से लोग ईमानदारी से बोलने और कार्य करने के बजाय नरक में डाले जाना पसंद करेंगे। इसमें कोई आश्चर्य नहीं कि जो बेईमान हैं उनसे निपटने के लिए मेरे पास अन्य तरीके भी तैयार हैं” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ)। परमेश्वर के ये वचन मैंने पहले पढ़े थे तो तब इन्हें पूरी तरह समझ नहीं पाई थी। मैं सोचती थी, “क्या ईमानदार इंसान होना वाकई इतना कठिन है? परमेश्वर स्पष्टता से कहता है कि अगर हम ईमानदार व्यक्ति नहीं बनते हैं तो हमें बचाया नहीं जा सकता। चूँकि मैं दुष्परिणाम जानती हूँ, इसलिए बचाए जाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार ईमानदारी से बोलना और कार्य करना चाहिए, चाहे मुझे कितना भी कष्ट क्यों न सहना पड़े। यह मुश्किल नहीं होना चाहिए! इसके अलावा मेरी प्रकृति सीधे-सादे व्यक्तित्व की है; मैं अपनी बात तुरंत बोल देती हूँ, इसलिए ईमानदार होना और सच बोलना मेरे लिए मुश्किल नहीं होना चाहिए।” लेकिन तथ्यों के उजागर होने में मुझे एहसास हुआ कि एक ईमानदार इंसान होना उतना आसान नहीं है जितना मैंने सोचा था। मुझमें अपनी गलती स्वीकारने का साहस भी नहीं है। अपने अभिमान और रुतबे को बचाने के लिए मैंने सच्चाई छिपाने के लिए तरकीबें भी अपनाईं। स्पष्टता से जानने के बावजूद कि मैं ईमानदार हुए बिना बचाई जा नहीं सकती, मैं अभी भी अपनी गलती स्वीकारना नहीं चाहती। क्या मैं उस प्रकार की इंसान नहीं हूँ जिसके बारे में परमेश्वर ने बताया है, जो ईमानदारी से बोलने की अपेक्षा नरक में जाना पसंद करेगी? मैं सोचती हूँ कि कैसे मैं दस साल से अधिक समय से परमेश्वर पर विश्वास कर रही हूँ, फिर भी इस छोटे से मामले में भी ईमानदार नहीं बन पाई और न ही मैं अपनी गलती को सच्चाई से स्वीकार सकी। मेरे पास थोड़ी-सी भी सत्य वास्तविकता नहीं है! मैं खुद से बहुत निराश और हताश हूँ। मैं हमेशा घोषणा करती हूँ कि मैं सत्य का अभ्यास करना चाहती हूँ, लेकिन जब मेरे सामने अपने अभिमान और रुतबे से संबंधित कोई मामला आता है तो मैं जानबूझकर सत्य का अभ्यास करने में नाकाम रहती हूँ। मैं उदास रहती हूँ और भाई-बहनों से बात नहीं करना चाहती; मुझे हमेशा लगता है कि मैं सत्य का अभ्यास नहीं करती और मैं एक ईमानदार इंसान नहीं हूँ, इसलिए मैं उनका सामना नहीं कर सकती। रात में सोने से पहले, आँखों में आँसू लिए, मैं रो-रोकर अपने दिल का दर्द बयाँ कर परमेश्वर से प्रार्थना करती हूँ : “हे परमेश्वर, मैं देखती हूँ कि मैं कितनी दयनीय हूँ। मैं इतनी छोटी सी बात में भी सत्य का अभ्यास नहीं कर सकती; मैं एक भी सच्चा बयान नहीं बोल सकती या अपनी गलती स्वीकार नहीं सकती। मैं शैतान द्वारा बुरी तरह भ्रष्ट हो चुकी हूँ! हे परमेश्वर, मैं बहुत निराश हूँ। मैं इस तरह नहीं जीना चाहती; मुझे बचा लो।”
सोमवार, 12 दिसंबर 2022, बादल छाए हुए, मौसम साफ हो रहा है
मैं असल में अगुआ के सामने अपनी गलती स्वीकारना चाहती थी लेकिन जब बोलने का समय आया तो मेरे मन में अभी भी काफी आशंका थी। मैं सोचने से खुद को रोक नहीं पाई : मेरे लिए अपनी गलती स्वीकारना और सच बोलना इतना कठिन क्यों है? मुझे ईमानदार होने से क्या रोक रहा है? मैंने बहन ट्रेसी को अपनी दशा बताई तो उसने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा, जिससे आखिरकार इस मामले में मुझे कुछ समझ मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “यदि तुम केवल कुछ महत्वहीन कर्तव्यों को निभाने और कुछ सरल सत्यों का अभ्यास करने की कोशिश कर रहे हो और इसमें सही और गलत की गंभीर समस्याएँ शामिल नहीं हैं, तो यह कुछ ऐसा है जिसे तुममें थोड़ा-सा भी संकल्प होने पर एक ही प्रयास में हासिल किया जा सकता है। हालाँकि, यदि तुम सत्य सिद्धांतों से जुड़े मामलों का सामना करते हो, तो संभवतः दो प्रयास भी पर्याप्त नहीं होंगे—तुम्हें सत्य सिद्धांतों को समझना होगा। सिर्फ एक बार सच बोलने और झूठ न बोलने से तुम किसी भी तरह से हमेशा के लिए ईमानदार व्यक्ति नहीं बन जाते। ईमानदार व्यक्ति बनने में तुम्हारे स्वभावों को बदलना शामिल है और इसके लिए दस या बीस साल के अनुभव की आवश्यकता होती है। ईमानदार व्यक्ति होने के मानक को मूल रूप से पूरा करने से पहले तुम्हें झूठ बोलने और धोखा देने के अपने कपटी स्वभाव को उतार फेंकना होगा। क्या यह हर किसी के लिए मुश्किल है? यह एक बहुत बड़ी चुनौती है। परमेश्वर अब लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाना और प्राप्त करना चाहता है और जो भी सत्य का अनुसरण करते हैं, उन्हें न्याय और ताड़ना, परीक्षणों और शोधन को स्वीकार करना होगा। परमेश्वर के इस तरह से कार्य करने का उद्देश्य उनके कपटी स्वभावों का समाधान करना और उन्हें ईमानदार लोग और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने वाले लोग बनाना है। यह कुछ ऐसा नहीं है जिसे एक ही प्रयास में हासिल किया जा सकता है; इसके लिए सच्ची आस्था की आवश्यकता होती है, इसे हासिल करने से पहले व्यक्ति को परीक्षणों और शोधन से बहुत कष्ट झेलना पड़ता है। मान लो कि परमेश्वर अब तुमसे एक ईमानदार व्यक्ति बनने और किसी चीज के बारे में सच बताने के लिए कहता है, जिसमें तथ्य या तुम्हारा भविष्य और तुम्हारी नियति शामिल है। तुम्हारे ऐसा करने के परिणाम शायद तुम्हारे लाभ के लिए न हों : हो सकता है कि दूसरे अब तुम्हारा बहुत आदर न करें और तुम्हें लगे कि तुम्हारी प्रतिष्ठा नष्ट हो गई है। ऐसी परिस्थितियों में, क्या तुम स्पष्टवादी हो सकते हो और सच बोल सकते हो? क्या तुम ईमानदार हो सकते हो? यह करना सबसे मुश्किल काम है, अपना जीवन देने से भी कहीं ज्यादा मुश्किल। तुम शायद कहो, ‘मैं परमेश्वर के लिए मर सकता हूँ, लेकिन अगर परमेश्वर मुझसे सच बोलने को कहे, तो मैं यह नहीं कर सकता। मैं बिल्कुल भी ईमानदार व्यक्ति नहीं बनना चाहता। मैं मरना पसंद करूँगा बजाय इसके कि हर कोई मुझे नीचा दिखाए, बजाय इसके कि हर कोई देखे कि मैं बस एक साधारण व्यक्ति हूँ।’ इससे यह देखा जा सकता है कि लोग जिसे सबसे ज्यादा सँजोते हैं, वह अभी भी रुतबा और प्रतिष्ठा है—वे इन चीजों को अपने जीवन से भी ज्यादा सँजोते हैं। यह स्पष्ट है कि वे अभी भी शैतानी स्वभावों के बीच जीते हैं और उनके दिल अभी भी शैतान द्वारा नियंत्रित हैं। यदि वे बड़े खतरे का सामना करते हैं, तो वे शायद एक ही झटके में अपनी जान जोखिम में डाल सकते हैं, लेकिन उनके लिए रुतबा और प्रतिष्ठा छोड़ना आसान नहीं है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उनके लिए अपना जीवन देना सबसे अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग सत्य को स्वीकार करें, और वास्तव में ऐसे ईमानदार लोग बनें जो अपने दिल की बात कहते, खुलकर बोलते और सबके सामने खुद को उजागर करते हैं। क्या ऐसा करना आसान है? (नहीं, यह आसान नहीं है।) वास्तव में, परमेश्वर तुमसे अपना जीवन त्यागने के लिए नहीं कहता। क्या तुम्हारा जीवन तुम्हें परमेश्वर ने ही नहीं दिया था? परमेश्वर के लिए तुम्हारे जीवन का क्या उपयोग होगा? परमेश्वर उसे नहीं चाहता। वह चाहता है कि तुम सच्चाई से बोलो, यह बताओ कि तुम किस तरह के व्यक्ति हो और अपने दिल में क्या सोचते हो। क्या तुम ये बातें कह सकते हो? यहाँ, चीजें कठिन हो जाती हैं और तुम कह सकते हो, ‘अगर तुम मुझसे कड़ी मेहनत करवाओ, तो मुझमें उसे करने की ताकत होगी। अगर मुझसे अपनी सारी संपत्ति का त्याग करने को कहा जाए, तो मैं ऐसा कर सकता हूँ। मैं आसानी से अपने माता-पिता और बच्चों, अपनी शादी और आजीविका का त्याग कर सकता हूँ। लेकिन मुझसे अपने दिल की एक बात कहलवाना या एक ईमानदार वाक्य बुलवाना—यही एक काम मैं नहीं कर सकता।’ क्या कारण है कि तुम ऐसा नहीं कर सकते? इसका कारण यह है कि तुम्हारे ऐसा करने के बाद जो कोई भी तुम्हें जानता है या तुमसे परिचित है, वह तुम्हें अलग तरह से देखेगा। वह अब तुम्हारा आदर नहीं करेगा। तुम्हारी मान-मर्यादा चली जाएगी और तुम बुरी तरह से अपमानित होगे, तुम्हारी सत्यनिष्ठा और गरिमा खत्म हो जाएगी। दूसरों के दिलों में तुम्हारा ऊँचा रुतबा और प्रतिष्ठा नहीं रहेगी। इसलिए ऐसे हालात में चाहे कुछ भी हो जाए, तुम सच नहीं कहोगे। जब लोगों के सामने यह स्थिति आती है, तो उनके दिलों में एक जंग होती है। जब वह जंग खत्म होती है, तो कुछ लोग अंततः अपनी कठिनाइयों से निकल आते हैं, जबकि अन्य अपने शैतानी स्वभावों की बेड़ियों और बाधाओं को आज तक तोड़ नहीं पाए हैं और अपने रुतबे, अभिमान, घमंड और तथाकथित गरिमा से नियंत्रित होते रहते हैं। यह एक कठिनाई है, है न? ईमानदारी से बोलना और सच बोलना कोई बड़ी बात नहीं है, फिर भी इतने सारे बहादुर नायक, इतने सारे लोग जिन्होंने परमेश्वर के सामने खुद को समर्पित करने, खुद को खपाने और परमेश्वर के लिए अपना जीवन बिताने की गंभीर शपथें ली हैं और जिन्होंने परमेश्वर से इतने सारे भव्य शब्द कहे हैं, वे इस कठिनाई को दूर करने में असमर्थ हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि मैं अगुआ के सामने अपनी गलती स्वीकारने की हिम्मत नहीं कर पाई क्योंकि मैं अपने अभिमान और रुतबे को बहुत महत्व देती हूँ और मैं दूसरों की नजरों में अपनी छवि को लेकर बहुत ज्यादा चिंतित रहती हूँ। बचपन से ही मैं शैतान के जहरों को समझदारी वाली बातें मानती आई हूँ, जैसे कि “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है” और “एक व्यक्ति जहाँ रहता है वहाँ अपना नाम छोड़ता है, जैसे कि एक हंस जहाँ कहीं उड़ता है आवाज करता जाता है।” मैंने हमेशा अपने अभिमान और रुतबे को बहुत महत्व दिया है। मैं जो भी करती हूँ, उससे मैं दूसरों पर अच्छी छाप छोड़ना चाहती हूँ और उनकी तारीफ पाना चाहती हूँ। जब मैं खराब प्रदर्शन करती हूँ और अपना सम्मान खो देती हूँ तो मुझे बहुत दुख होता है। बीती बातें याद करूँ तो जब मैं स्कूल में थी तो शिक्षक गलती करने वाले छात्रों से हाथ उठाने के लिए कहते थे। जब मैं बार-बार गलतियाँ करती थी तो मुझे लगता था कि शिक्षक और मेरे सहपाठी मुझे बेवकूफ समझेंगे और मुझ पर हँसेंगे, इसलिए मैं अपना हाथ खड़ा करने की हिम्मत नहीं करती थी। जब शिक्षक मेरे पास से गुजरते थे तो मैं अपनी गलतियाँ छिपा लेती थी ताकि शिक्षक उन्हें न देख सकें। अपना अभिमान कायम रखने के लिए मैंने छोटी उम्र में ही चालाकी और धोखेबाजी सीख ली थी। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद मैंने कलीसिया में वीडियो प्रोडक्शन पर काम किया। मुझे पता था कि इस काम में विवरणों पर बहुत ध्यान देने की आवश्यकता है क्योंकि कोई भी छोटी सी गलती बहुत बड़ा नुकसान पहुँचा सकती है। इसलिए मैंने भरसक सावधानी बरतने की कोशिश की, मैं चाहती थी कि भाई-बहन सोचें कि मैं मेहनती और जिम्मेदार हूँ और मेरा अच्छा प्रभाव पड़े। मुझे यह भी उम्मीद थी कि अगुआ मेरी कद्र करेगी। खासकर हाल ही में वीडियो निर्माण कार्य का प्रभारी बनने के बाद मुझे लगा कि ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि हर कोई मुझे अच्छा मानता है और मुझे एक गंभीर, जिम्मेदार और भरोसेमंद इंसान के रूप में देखता है। इसलिए गलतियाँ करने पर मुझे पहली फिक्र अपने अभिमान और रुतबे की होती थी। मुझे चिंता होती थी कि अगर अगुआ को पता चल गया कि मैंने ऐसी बुनियादी गलती की है तो वह निश्चित रूप से मुझ पर भरोसा नहीं करेगी या मेरी कद्र नहीं करेगी और भाई-बहन मुझे नीची नजर से देखेंगे और सोचेंगे कि मैं गैर-जिम्मेदार और घटिया हूँ, जिससे मेरी बरसों की बनी-बनाई अच्छी छवि नष्ट हो जाएगी। अपने अभिमान की रक्षा करने और सबकी नजरों में अपनी अच्छी छवि बनाए रखने के लिए मैंने छल-कपट और धोखाधड़ी की और अपनी गलती छिपाने की कोशिश की। मैंने तो यहाँ तक सोचा कि इस मुद्दे को नजरअंदाज कर दूँ, किसी से इसका जिक्र न करूँ ताकि इसे अहमियत न मिले और मैं बच निकलूँ। मैं बहुत धोखेबाज थी! मैं अच्छी तरह जानती थी कि परमेश्वर हर चीज की पड़ताल करता है, फिर भी मैंने अपनी गलती छिपाने की कोशिश की, जिससे यह दिखा कि मैं न केवल धोखेबाज हूँ, बल्कि बहुत ही अड़ियल भी हूँ। मुझे एहसास हुआ कि मेरा अभिमान और रुतबा एक ईमानदार इंसान होने में सबसे बड़ी बाधाएँ हैं। अगर मैं अपने अभिमान और रुतबे के बंधन और बाध्यता से मुक्त नहीं हो पाई तो मैं सत्य का अभ्यास नहीं कर पाऊँगी और अंत में मुझे हटा दिया जाएगा।
मैंने परमेश्वर के ये वचन भी पढ़े : “जब लोग ईमानदार होने का अनुभव करते हैं, तो कई व्यावहारिक समस्याएँ उत्पन्न होती हैं। कभी-कभी वे बिना सोचे-समझे बोलते हैं; वे अपनी सोच के संदर्भ में क्षण भर के लिए चूक कर बैठते हैं और क्योंकि वे गलत मंशा या उद्देश्य से या झूठे दिखावे और छवि बचाने की कोशिश से संचालित होते हैं, वे झूठ बोलते हैं। नतीजतन, उन्हें इसे छिपाने के लिए ज्यादा से ज्यादा झूठ बोलना पड़ता है। अंत में उन्हें अपने दिलों में शांति महसूस नहीं होती, लेकिन वे वो झूठ वापस नहीं ले पाते, उनमें अपनी गलतियाँ सुधारने का, यह स्वीकारने का साहस नहीं होता कि उन्होंने झूठ बोले थे, और इस तरह उनकी गलतियाँ लगातार होती जाती हैं। इसके बाद उन्हें हमेशा ऐसा लगता है जैसे उनके दिल किसी चट्टान के नीचे दबे जा रहे हों; वे हमेशा अपना भेद खोलने, गलती स्वीकारने और पश्चात्ताप करने का अवसर ढूँढ़ना चाहते हैं, लेकिन वे इसे कभी अभ्यास में नहीं ला पाते। अंततः वे इस पर विचार कर मन ही मन कहते हैं, ‘मैं जब भविष्य में अपना कर्तव्य निभाऊँगा तो इसकी भरपाई कर दूँगा।’ वे हमेशा कहते हैं कि वे इसकी भरपाई कर देंगे, लेकिन कभी करते नहीं। यह झूठ बोलने के बाद माफी माँगने जितना आसान नहीं है—क्या तुम झूठ बोलने और धोखे में शामिल होने के नुकसान और परिणामों की भरपाई कर सकते हो? अगर अत्यधिक आत्म-घृणा के बीच तुम पश्चात्ताप का अभ्यास करने में सक्षम रहते हो और फिर कभी झूठ नहीं बोलते या धोखा नहीं देते, तो तुम्हें परमेश्वर की सहनशीलता और दया प्राप्त हो सकती है। अगर तुम मीठी बातें बोलते हो और कहते हो कि तुम भविष्य में अपने झूठ की भरपाई कर दोगे, लेकिन वास्तव में पश्चात्ताप नहीं करते, और बाद में झूठ बोलना और धोखा देना जारी रखते हो, तो तुम जिद्दी बनकर पश्चात्ताप करने से इनकार करते हो और तुम्हें निश्चित रूप से हटा दिया जाएगा। ... धोखेबाजी में लिप्त होना एक भ्रष्ट स्वभाव का खुलासा है, यह परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना है, इसलिए यह तुम्हें बहुत अधिक पीड़ा देगा। जब तुम झूठ बोलते और धोखा देते हो, तो तुम्हें लग सकता है कि तुमने बहुत चतुराई और चालाकी से बात की है, और तुमने कोई छोटा-मोटा सुराग भी नहीं छोड़ा—लेकिन बाद में तुम्हें अपने दिल में जो आत्म-भर्त्सना और दोषारोपण महसूस होगा वह जीवन भर तुम्हारा पीछा कर सकता है। अगर तुम इरादतन और जानबूझकर झूठ बोलते और धोखा देते हो, और एक दिन तुम्हें इसकी गंभीरता का एहसास होता है तो यह एक शूल की तरह तुम्हारे दिल को बेध देगा। तुम हमेशा सुधार करने का मौका ढूँढ़ना चाहोगे—जो तुम्हें करना ही चाहिए—जब तक कि तुम्हारे पास कोई जमीर न हो, तुमने कभी अपने जमीर के अनुसार जीवन न जिया हो, तुममें कोई मानवता न हो और तुम सत्यनिष्ठा या गरिमा की परवाह न करते हो। अगर तुममें अंतरात्मा की थोड़ी-सी भी जागरूकता है, थोड़ी-सी भी सत्यनिष्ठा और गरिमा है, तो जब तुम्हें यह एहसास होगा कि तुम झूठ बोल रहे हो और छल-कपट में लिप्त हो रहे हो तो तुम्हें अपना यह व्यवहार शर्मनाक, अपमानजनक और ओछा लगेगा; तुम खुद से घृणा करोगे और खुद को तुच्छ समझोगे, झूठ और धोखे का मार्ग ठुकरा दोगे और ईमानदार बनने का प्रयास करोगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई सच्चे मानव के समान जी सकता है)। परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद मैं बहुत प्रभावित हुई। पिछले कुछ दिनों में मैंने कर्तव्य निभाने में अपनी गलती के बारे में किसी को नहीं बताया। भले ही मेरे अभिमान को कोई आँच नहीं आई है, फिर भी जब मैं खाली होती हूँ तो मेरे दिल में लगातार चुभन होती है। इससे मैं हर दिन बेचैन और असहज रहती हूँ; मैं रात को ठीक से सो नहीं पाती और मेरा दिल अपराध बोध से भरा रहता है। मुझे गहराई से एहसास होता है कि एक ईमानदार इंसान बने बिना शांति या खुशी नहीं मिलती। धोखे और दिखावे का सहारा लेकर मैंने फिलहाल अपना अभिमान तो बचा लिया लेकिन अपनी गरिमा और ईमानदारी गवाँ दी और अपराध बोध से होने वाला दर्द बहुत बढ़ गया। पीछे मुड़कर देखती हूँ तो मुझे एहसास होता है कि मैंने कई बार वही गलतियाँ कीं क्योंकि मैंने वीडियो बनाने से पहले पिछले रिकॉर्ड की जाँच नहीं की। अगर मैंने काम की प्रक्रियाओं का पालन किया होता और सब कुछ ठीक से जाँच लिया होता तो इन गलतियों से बचा जा सकता था। हालाँकि अगुआ ने मेरी पहली दो गलतियों के बाद फॉर्म भरने और जाँचने के महत्व पर जोर दिया था पर मुझे यह प्रक्रिया बहुत परेशानी भरी लगी और मैं जोखिम उठाती रही और मैंने सोचा कि जाँच न करने से शायद कोई समस्या नहीं होगी। कभी-कभी जब मैं व्यस्त होती तो मैं इस चरण को छोड़ देती थी। मैंने देखा कि अपने कर्तव्य निभाने में न सिर्फ मैं अनमनी थी, बल्कि अहंकारी और आत्मतुष्ट भी थी और बहुत ही घटिया थी। जब गलतियाँ हुईं तो मैंने उन्हें छिपाने की भी कोशिश की; मैंने भेष बदला, खुद को सजाकर पेश किया और झूठी छवि के साथ दूसरों को धोखा दिया। यह वास्तव में घृणित और शर्मनाक है! इस मुद्दे की गंभीरता समझते हुए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और पश्चात्ताप किया।
मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश भी पढ़ा और अभ्यास का मार्ग पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “केवल ईमानदार लोग स्वर्ग के राज्य में शामिल हो सकते हैं। यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश नहीं करोगे, सत्य का अनुसरण करने की दिशा में अनुभव प्राप्त नहीं करोगे और अभ्यास नहीं करोगे, यदि अपनी कुरूपता उजागर नहीं करोगे और यदि खुद को खोलकर पेश नहीं करोगे, तो तुम कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे। चाहे तुम कुछ भी करो, या कोई भी कर्तव्य निभाओ, तुम्हारा रवैया ईमानदार होना चाहिए। ईमानदार रवैये के बिना तुम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से नहीं कर सकते। अगर तुम अपना कर्तव्य हमेशा लापरवाही से निभाते हो, तुम कुछ चीजें अच्छी तरह नहीं कर पाते और कलीसिया के काम पर इसका असर पड़ता है, तो तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए, खुद को जानना चाहिए, खुलकर बोलना चाहिए, खुद को उजागर करना चाहिए और अपना गहन-विश्लेषण करना चाहिए। फिर तुम्हें सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए और अगली बार लापरवाह होने के बजाय अच्छा काम करने की कोशिश करनी चाहिए” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मेरा हृदय झट से स्पष्ट हो गया। जब कर्तव्य निर्वहन में गलतियाँ होती हैं तो मुझे आत्म-चिंतन करना चाहिए, विचलनों का विश्लेषण करना चाहिए और सबके सामने खुलकर, खुद को पूरी तरह उजागर कर, गहन-विश्लेषण करते हुए उनके पर्यवेक्षण को स्वीकारना चाहिए। इससे भविष्य में गलतियाँ रोकने में मदद मिल सकती है और यह एक ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास भी है। पर्यवेक्षक के रूप में मेरी भूमिका ऐसा अवसर है जो परमेश्वर ने मुझे अभ्यास करने के लिए सौंपा है। इसके अलावा परमेश्वर के घर ने कभी भी यह अपेक्षा नहीं की है कि लोग अपने कर्तव्य निभाते समय कोई गलती न करें, गलतियाँ करने के लिए लोगों को वर्गीकृत करना तो दूर की बात है। महत्वपूर्ण बात यह है कि क्या कोई व्यक्ति गलती करने के बाद तुरंत कारणों की समीक्षा कर सकता है, आत्म-चिंतन कर सकता है, सत्य सिद्धांतों की तलाश कर सकता है और वही गलतियाँ दोहराने से बच सकता है। अगर कोई अपना कर्तव्य निभाते हुए लगातार लापरवाह न रहे और सुधार से परे न हो तो परमेश्वर का घर उसके साथ सही व्यवहार करेगा और उसे अवसर देगा। भ्रष्ट स्वभावों से प्रेरित होकर अपने कर्तव्य निभाने में मेरी लापरवाही गलतियों का कारण बनी, जिससे कलीसिया के हितों को नुकसान हुआ। यह एक तथ्य है। मुझे एक ईमानदार इंसान होना चाहिए, खुद को बेनकाब करना चाहिए और अपना गहन-विश्लेषण करना चाहिए, अपने भ्रष्ट स्वभाव दूर करने के लिए सत्य खोजने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और अपने कर्तव्य पूरी लगन से निभाने चाहिए। सत्य स्वीकारने का यही रवैया होता है। अगर मैं गलतियाँ छिपाती हूँ और धोखा देती हूँ और अपने कर्तव्य निभाने में स्पष्ट रूप से लापरवाही बरतने के बावजूद झूठी छवि के जरिए अपनी गलतियों पर पर्दा डालकर दूसरों को भ्रमित करती हूँ तो भले ही मैं फौरी तौर पर अपने अभिमान और रुतबे को कायम रख लूँ, मेरी लापरवाही की समस्या अनसुलझी रहेगी और मैं अपने कर्तव्य उस तरह से नहीं कर पाऊँगी जो मानक स्तर के हों। यह वास्तव में खुद को नुकसान पहुँचाना है। मैं अब अपने अभिमान को बचाने के लिए खुद को अच्छा दिखाकर पेश नहीं कर सकती; मुझे सत्य का अभ्यास करना चाहिए और एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए। मैंने दूसरे भाई-बहनों के बारे में सोचा जिन्हें भी प्रोडक्शन में दोहराव से समस्याएँ थीं। एक पर्यवेक्षक के रूप में मुझे खुद मिसाल पेश करनी चाहिए, अपनी समस्याएँ उजागर करनी चाहिए, सबके साथ इनका सारांश बनाकर एक रास्ता खोजना चाहिए। और काम को नुकसान पहुँचा सकने वाली एक जैसी गलतियाँ दोहराने से सबको रोकना चाहिए। यह सोचकर मुझे सत्य का अभ्यास करने की प्रेरणा मिली और अपनी गलती स्वीकार करने का साहस मिला।
बुधवार, 14 दिसंबर 2022, धूप खिली है
सभा के दौरान मैंने अपनी अवस्था सबके साथ खुलकर साझा की, अपनी भ्रष्टता और गलती को उजागर किया और सभी को इन सबकों से सीखने की याद दिलाई। सभा के बाद मुझे लगा जैसे मेरे सीने से एक भारी बोझ आखिर उतर गया है। मेरे दिल को राहत मिली और मैंने उस मिठास और सहजता का अनुभव किया जो खुलेपन और सच बोलने से आती है। मेरी उम्मीदों के विपरीत अगुआ ने मुझे नीची नजरों से नहीं देखा, बल्कि मेरी मदद करने के लिए परमेश्वर के वचनों की संगति की, जो बहुत ही शिक्षाप्रद थी। मैंने अपने कर्तव्य निभाने में बेपरवाह होने की समस्या सुलझाने पर ध्यान केंद्रित करने का मन बना लिया, ताकि मेरे कर्तव्यों से अच्छे परिणाम प्राप्त हो सकें।
इस अनुभव के माध्यम से मुझे एहसास हुआ कि एक ईमानदार व्यक्ति होना उतना आसान नहीं है जितना मैंने सोचा था। यह एक सीधा-सादा व्यक्तित्व और मुँहफट होना नहीं है। यह मेरी विकृत समझ थी। मैं शैतान द्वारा बुरी तरह भ्रष्ट हो गई हूँ, धोखेबाजी, अहंकार और स्वार्थ जैसे भ्रष्ट स्वभावों से भर गई हूँ। अपने अभिमान और रुतबे की रक्षा के लिए मैं झूठ बोल सकती हूँ और धोखा दे सकती हूँ। मुझे परिवर्तन से गुजरने के लिए परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना और काट-छाँट को स्वीकार करने की आवश्यकता है। मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मैंने पहले पढ़ा था : “परमेश्वर की दृष्टि में, ईमानदार इंसान होने में समर्थ होने में आचरण और व्यवहार में परिवर्तन के साथ और भी बहुत कुछ लगता है; इसमें व्यक्ति की मानसिकता और विभिन्न मामलों पर उसके नजरियों में मूलभूत परिवर्तन भी शामिल होते हैं। उसमें अब झूठ बोलने और धोखा देने का इरादा नहीं होता है, उसकी बातों या कृत्यों में बिल्कुल भी झूठ या धोखा नहीं होता है और उसकी बातें और कर्म ज्यादा-से-ज्यादा सच्चे हो जाते हैं। यानी, उसके ईमानदार शब्दों की संख्या बढ़ जाती है। मिसाल के तौर पर, जब तुमसे पूछा जाए कि क्या तुमने कुछ किया है, तो मान लेने पर भले ही काट-छाँट की जाए या दंड दिया जाए, तुम अभी भी सत्य बोल पाते हो। इसे मानने से भले ही तुम पर कोई भारी जिम्मेदारी आ जाए, मृत्यु या विनाश का सामना करना पड़े, फिर भी तुम सत्य बोलने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करने को तैयार हो जाते हो। इससे पता चलता है कि परमेश्वर के वचनों के प्रति तुम्हारा रवैया काफी दृढ़ हो गया है। चाहे यह कभी भी हो, जब तुम एक ईमानदार व्यक्ति बन जाते हो, तो तुम काफी स्वाभाविक रूप से परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों को अभ्यास में लाने में सक्षम होगे, तुम्हारे लिए इसे करना मुश्किल नहीं होगा और तुम्हें बाहरी परिस्थितियों के अंकुशों, अगुआओं और कार्यकर्ताओं के मार्गदर्शन या तुम्हारे बगल में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल की भावना की आवश्यकता नहीं होगी। तुम इन चीजों को अपने आप आसानी से करने में सक्षम होगे। न तो बाहरी परिस्थितियों के अंकुशों, परमेश्वर के अनुशासन के भय के कारण और न ही तुम्हारी अंतरात्मा की फटकार के भय के कारण और दूसरों द्वारा तुम पर हँसने या तुम्हारा पर्यवेक्षण करने के भय के कारण तो और भी कम—बल्कि, तुम स्वयं अपने व्यवहार की सक्रिय रूप से जाँच करने, उसके सही या गलत होने को मापने और यह मूल्यांकन करने में सक्षम होगे कि क्या यह सत्य के अनुरूप है और क्या यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है। उस मुकाम पर, एक ईमानदार इंसान बनने के संदर्भ में, तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानदंड पर खरे उतर चुके होगे और मूल रूप से मानक स्तर के होगे” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपनी धारणाओं का समाधान करके ही व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चल सकता है (3))। परमेश्वर द्वारा अपेक्षित एक ईमानदार व्यक्ति के मानक से अपनी तुलना करते हुए मैं जानती हूँ कि मैं अभी भी बहुत पीछे हूँ। लेकिन मैं एक ईमानदार इंसान बनने के लिए परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करने के लिए तैयार हूँ, हर परिस्थिति सामने आने पर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने को तैयार हूँ, सच्चाई से बोलने पर ध्यान केंद्रित करने और सत्य का अभ्यास करने को तैयार हूँ।
परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?
मेरिनेट, फ्रांसपहले, मैं बिना सोचे-समझे झूठ बोलती और चापलूसी किया करती थी, क्योंकि मैं डरती थी कि कहीं सच बोलकर लोगों को निराश न कर दूँ या...
रोनाल्ड, म्यांमारअक्तूबर 2019 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों के कार्य को स्वीकार किया। सभाओं में मैंने देखा कि भाई-बहन...
वू मिंग, चीन 2004 में एक सहेली ने एक दिन मुझसे कहा: "हर दिन तुम जल्दी उठती हो और दिन भर कपड़े काटने में व्यस्त रहती हो, तुम खुद को थका देती...
झांग दी, चीननवंबर 2023 के अंत में मैं कई कलीसियाओं में सिंचन कार्य की देखरेख के लिए दो बहनों के साथ सहयोग करती थी। हर बार जब हम अपने काम...