अपनी गलतियाँ स्वीकारना इतना मुश्किल क्यों है?

21 अप्रैल, 2023

मार्था, इटली

मैं अपनी कलीसिया में वीडियो कार्य के लिए जिम्मेदार हूँ। एक दिन मेरी एक बहन ने जल्दबाजी में मुझे फोन किया। उसने एक वीडियो ठीक से जाँचा नहीं था, अब उस पर फिर से काम करना था, जिससे देरी हो गई थी, श्रम और संसाधनों का खर्च भी बढ़ गया था। उस वीडियो का नाम सुनकर एहसास हुआ कि उसकी जाँच में तो मैंने भी मदद की थी, मगर मुझे भी कोई गलती नहीं दिखी थी। फोन सुनते ही मैं यह पता लगाने भागी कि आखिर बात क्या है, पता चला कि वीडियो का नाम ही गलत लिखा गया था। बेशक, काम की गलतियों के बारे में अगुआ को रिपोर्ट करनी चाहिए या हर किसी के लिए विचलन की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि आगे ऐसी समस्याएँ न हों। मगर फिर मैं हिचकिचाई : “मैंने ऐसी बुनियादी गलती कर दी है। इसके बाद अगुआ मुझे कैसी नजर से देखेगा? क्या उसे लगेगा कि मैं अपने कर्तव्य में गंभीर या भरोसेमंद नहीं हूँ? ऐसा हुआ तो मैं प्रभारी का अपना ओहदा गँवा दूँगी।” फिर सोचा कि कैसे मैं हमेशा भाई-बहनों को वीडियो बनाने के काम में पूरा ध्यान रखने के महत्व पर जोर देती थी। अगर सबको मेरी यह गलती पता चल गई तो क्या वे यह नहीं सोचेंगे कि मैं प्रभारी बनने लायक नहीं हूँ? फिर मेरी क्या इज्जत रह जाएगी? इसलिए मैं दूसरों को अपनी गलती बताना नहीं चाहती थी। मैंने बहाने ढूँढ़े, “हमने जानबूझकर अनमनापन नहीं दिखाया। जो कुछ जाँचना जरूरी था हमने जाँचा। मैंने ऐसे विशेष हालात की अपेक्षा नहीं की थी। जो नुकसान हो चुका उसे पलटा तो नहीं जा सकता, लेकिन आगे से सतर्क रहने पर सब ठीक रहेगा। और सिर्फ मैंने ही तो इस वीडियो को नहीं जाँचा था। अगर सबको सच पता चल गया, तब भी दोष सिर्फ मेरा तो नहीं होगा। बात यहीं खत्म हो सकती है। जो लोग शामिल हैं उन्हें ही पता चलेगा और इतना काफी है।” इसलिए मैंने अगुआ को या समूह के अन्य भाई-बहनों को कुछ नहीं बताया। भले ही थोड़ा असहज लगा और जानती थी कि मैं जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रही हूँ, मगर जब सोचा कि इस गलती को मानने का मेरी इज्जत और ओहदे पर क्या असर पड़ेगा तो मैं अड़ियल बनते हुए काम में लग गई मानो कुछ हुआ ही न हो।

एक दिन मैंने परमेश्वर के वचन में यह पढ़ा : “भ्रष्ट मनुष्य छद्मवेश धारण करने में कुशल होते हैं। चाहे वे कुछ भी करें या किसी भी तरह की भ्रष्टता प्रकट करें, वे हमेशा छद्मवेश धारण करने की कोशिश करते हैं। अगर कुछ गलत हो जाता है या वे कुछ गलत करते हैं, तो वे दूसरों पर दोष मढ़ना चाहते हैं। वे चाहते हैं कि अच्छी चीजों का श्रेय उन्हें मिले और बुरी चीजों के लिए दूसरों को दोष दिया जाए। क्या वास्तविक जीवन में इस तरह का छद्मवेश बहुत अधिक धारण नहीं किया जाता? ऐसा बहुत होता है। गलतियाँ करना या छद्मवेश धारण करना : इनमें से कौन-सी चीज भ्रष्ट स्वभावों से संबंधित है? छद्मवेश धारण करना भ्रष्ट स्वभावों का मामला है, इसमें अहंकारी स्वभाव, दुष्टता और धूर्तता शामिल होती है; परमेश्वर इससे विशेष रूप से घृणा करता है। वास्तव में, जब तुम छद्मवेश धारण करते हो, तो हर कोई समझता है कि क्या हो रहा है, लेकिन तुम्हें लगता है कि दूसरे इसे नहीं देखते, और तुम अपनी इज्जत बचाने और इस प्रयास में कि दूसरे सोचें कि तुमने कुछ गलत नहीं किया, बहस करने और खुद को सही ठहराने की पूरी कोशिश करते हो। क्या यह बेवकूफी नहीं है? दूसरे इसका मूल्यांकन कैसे करते हैं? वे क्या महसूस करते हैं? जुगुप्सा और बेइंतहा घृणा। यदि, कोई गलती करने के बाद, तुम उसके साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकते हो और हर किसी को इसके बारे में बात करने, इस पर टिप्पणी करने और इसका भेद पहचानने दे सकते हो, तुम इसका गहन-विश्लेषण कर सकते हो और इसे दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख सकते हो तो तुम्हारे बारे में सभी की राय क्या होगी? वे निश्चित रूप से कहेंगे कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो, क्योंकि तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए खुला है और वे तुम्हारे क्रियाकलापों और व्यवहार के माध्यम से तुम्हारा दिल देख सकते हैं। लेकिन यदि तुम खुद को छद्मवेश में रखने और सभी को धोखा देने की कोशिश करते हो, तो वे तुम्हारे बारे में अच्छी राय नहीं रखेंगे और कहेंगे कि तुम एक मूर्ख और बुद्धिहीन व्यक्ति हो। यदि तुम दिखावा करने या खुद को उचित ठहराने की कोशिश नहीं करते, यदि तुम अपनी गलती मान सकते हो, तो सभी कहेंगे कि तुम ईमानदार और बुद्धिमान हो। और क्या तुम्हें बुद्धिमान बनाता है? हर कोई गलतियाँ करता है। हर किसी में कमियाँ और दोष होते हैं। और हर किसी में समान भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। खुद को दूसरों से अधिक श्रेष्ठ, पूर्ण और दयालु मत समझो; ऐसा सोचना विवेक से अत्यधिक रहित है! एक बार जब तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभावों और उनके भ्रष्ट सार के असली चेहरे को स्पष्ट रूप से देख पाते हो और तुम अपनी गलतियों को छिपाने की कोशिश नहीं करते, दूसरे लोगों को उनकी गलतियों के लिए दोषी नहीं ठहराते और दोनों के प्रति सही तरीका अपनाने में सक्षम हो जाते हो, तभी तुम चीजों को गहराई से देखोगे और मूर्खतापूर्ण काम नहीं करोगे और तुम एक बुद्धिमान व्यक्ति होगे। वे सभी जो विवेक से रहित हैं, वे बुद्धिमान लोग नहीं हैं, वे मूर्ख हैं। जब भी वे कोई गलती करते हैं या कुछ बेतुका करते हैं और उनकी काट-छाँट की जाती है, तो वे उसी पर अटके रहते हैं, हमेशा खुद को उचित ठहराने और अपना बचाव करने की कोशिश करते हैं, जबकि पर्दे के पीछे छिपकर अपना काम करते हैं। यह देखकर घृणा होती है। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह दूसरों को तुरंत जाहिर हो जाता है, फिर भी वे खुल्लम-खुल्ला ढोंग कर रहे हैं। लोगों को यह मसखरों जैसा प्रदर्शन लगता है। क्या यह मूर्खता नहीं है? यह सच में मूर्खता ही है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, व्यक्ति के स्व-आचरण का मार्गदर्शन करने वाले सिद्धांत)। परमेश्वर के वचनों से एहसास हुआ कि झूठा दिखावा करना, लीपापोती करना और अपनी गलती स्वीकार न करना सामान्य-सी गलती करने से कहीं अधिक गंभीर है। वे कपटी और धूर्त हैं! इसके उलट, जब लोग खुद को खोलकर अपनी गलती की जिम्मेदारी लेते हैं तो दूसरे उन्हें नीची नजरों से नहीं देखते, बल्कि सरलता से और खुलकर सच बोलने के लिए उनका सम्मान करते हैं। हम सब कभी-न-कभी गलतियाँ करते हैं। परमेश्वर लोगों की गलतियों के लिए यूं ही उनकी निंदा नहीं करता, वह देखता है कि वे सच्चे मन से पश्चात्ताप करते हैं या नहीं। मगर मैं यह समझ नहीं पाई। मैंने सोचा कि गलतियाँ करना शर्मनाक है, खासकर पर्यवेक्षक होने के नाते, अगर मैंने बुनियादी गलतियाँ कीं तो लोग मुझे नीची नजर से देखेंगे। वे सोचेंगे कि मैं भाई-बहनों से बेहतर नहीं हूँ और मुझे बदला भी जा सकता है। इसलिए मेरे जाँचे वीडियो में गलती मिलने पर, मुझे खुलकर बोलने की हिम्मत नहीं हुई, मैं लीपापोती करती रही। जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ने के लिए मैंने ऐसा दिखाया मानो कुछ हुआ ही न हो और मामले को ठंडे बस्ते में डाल दिया। यह सोचकर अपराध-बोध हुआ, पर मैं अभी भी सबको सच बताने को तैयार नहीं थी। कितनी बड़ी धूर्तता थी! मैंने साफ तौर पर कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाया, पर कुछ न बोलकर अपनी गलती पर परदा डालने की कोशिश की। मैंने अगुआ और भाई-बहनों को सिर्फ अपना अच्छा पहलू दिखाया, अपनी गलती नहीं देखने दी। इस तरह हर कोई सोचेगा मैं अपने काम में गंभीर और व्यावहारिक हूँ। ऐसा करके मैं अपनी छवि और पर्यवेक्षक का ओहदा कायम रखूँगी। यह मेरा बेहद घिनौना बर्ताव था! मुझे डर था कहीं लोगों को मेरी गलती न पता चल जाए, इसलिए खुद को छिपाने की भरसक कोशिश की। मैंने अपने गंदे पहलू को ढककर लोगों से धोखेबाजी की और सच छिपाया। मैं चरित्र या गरिमा के बिना जी रही थी। मैं अपनी गलती पर परदा डालती और लोगों से धोखेबाजी करती नहीं रह सकती थी। इसलिए मैंने इस स्थिति के बारे में अगुआ को लिखकर बताया और सबके साथ अपनी भ्रष्टता के बारे में खुलकर बात की। मैंने उन्हें सच बताया, ताकि वे मेरी मिसाल से सीख सकें। ऐसा करके मुझे थोड़ा सुकून मिला।

बाद में जब मैंने हमारी कार्यसूची खोली तो पता चला कि शायद एक और वीडियो दो बार बन गया था। मुझे यकीन ही नहीं हुआ। मैं किसे कौन-सा काम सौंप रही हूँ, इसका हिसाब रखती थी, फिर एक और गलती कैसे हो सकती थी? मगर जाँचने पर पता चला, वीडियो सच में दो बार बनाया गया था। उस वक्त मुझे काठ मार गया : बहुत बुरी बात थी। मैंने अगुआ के सामने अपनी गलती स्वीकार ली और वह स्थिति को अच्छे से समझ पाता, इससे पहले ही मैंने फिर से गड़बड़ कर दी। वह मेरे बारे में क्या सोचेगा? क्या उसे लगेगा कि मैं लगातार गलतियाँ कर रही हूँ और प्रभारी बनने लायक नहीं हूँ? और अगर भाई-बहनों को पता चला तो क्या वे सोचेंगे कि मैं भरोसे के लायक नहीं हूँ और ऐसी बुनियादी गलतियाँ करती रहती हूँ? अगली बार जब मैं हमारे कर्तव्यों में गंभीर और जिम्मेदार होने के बारे में संगति करूँगी, तब भी क्या वे इसे गंभीरता से लेंगे? नहीं, मुझे पता लगाना ही होगा कि इस गलती की वजह क्या थी, मुझे उम्मीद थी कि मैं इसके लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार नहीं थी। अगर मेरा कुछ दोष होगा भी तो वह बहुत मामूली-सा होगा। इस तरह मेरी छवि खराब नहीं होगी और मेरा रुतबा बचा रहेगा। आखिर सावधानी से छानबीन करने पर पता चला कि काम सौंपने के बाद मैंने उसे सिर्फ पुरानी कार्यसूची में लिखा, जिससे समूह अगुआ को इसका पता नहीं चला और उसने वह काम किसी और को सौंप दिया। बेशक—मैं ही मुख्य रूप से जिम्मेदार थी। यह एहसास होने पर मैं सन्न रह गई। मैं इतनी बदकिस्मत कैसे हो सकती हूँ? मैं इन समस्याओं में उलझ गई जो होनी ही नहीं चाहिए थीं। किस्मत ही खराब थी! मैं एकदम उलझन में पड़ गई। इस गलती के बारे में अगुआ को बताऊँ या नहीं? अगर सब जान गए कि मैंने लगातार दो बुनियादी गलतियाँ की हैं तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? मैं अगुआ को सच बताना नहीं चाहती थी। लेकिन मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया, जो छिपाव के बारे में बात करते हैं कि झूठ और कपट कैसे सामान्य गलतियों से कहीं अधिक गंभीर हैं, परमेश्वर को इन चीजों से बहुत नफरत है। मैं बहुत डर गई। मुझे कड़वा घूँट पीकर अगुआ को इस गलती के बारे में बताना पड़ा, मगर मेरा डर खत्म नहीं हुआ। मैं आशंकाओं से भर गई। दिल भारी हो गया, मानो उस पर कोई भारी पत्थर रख दिया हो। अपना कर्तव्य करते हुए ध्यान भटकने लगा और रातों की नींद उड़ गई। मैं जानती थी कि यह मनोदशा ठीक नहीं है, इसलिए परमेश्वर से प्रार्थना कर खुद को जानने के लिए प्रबोधन और मार्गदर्शन माँगा।

बाद में परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़कर मैंने अपनी मनोदशा समझी। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कोई मसीह-विरोधी चाहे कितने भी और किसी भी तरह के गलत काम करे, चाहे वह गबन करना हो, अपव्यय करना हो, परमेश्वर की भेंटों का दुरुपयोग करना हो, या चाहे वह कलीसिया के काम को बाधित कर रहा और बिगाड़ रहा हो और उसमें भारी गड़बड़ी करके परमेश्वर का क्रोध भड़का रहा हो, वह हमेशा शांत, संयमित और पूरी तरह से बेफिक्र रहता है। मसीह-विरोधी चाहे किसी भी तरह की बुराई करे या उसके जो भी परिणाम हों, वह अपने पाप स्वीकारने और पश्चात्ताप करने के लिए कभी यथाशीघ्र परमेश्वर के सामने नहीं आता या वह कभी अपनी गलतियाँ मानने, अपने अपराध जानने और अपनी भ्रष्टता पहचानने और अपने बुरे कर्मों पर पछतावा करने के लिए खुद को उजागर करने और अपना दिल खोलने के रवैये के साथ भाई-बहनों के सामने नहीं आता। इसके बजाय, वह जिम्मेदारी से बचने के लिए तमाम बहाने खोजने को अपना दिमाग चलाता है और अपनी इज्जत और रुतबा बहाल करने के लिए दोष दूसरों पर मढ़ देता है। वह कलीसिया के काम की नहीं, बल्कि इस बात की परवाह करता है कि उसकी प्रतिष्ठा और रुतबा किसी भी तरह से नष्ट या प्रभावित तो नहीं हो रहा। वह अपने अपराधों के कारण परमेश्वर के घर को हुए नुकसान पर विचार नहीं करता या इसकी भरपाई करने के तरीकों के बारे में नहीं सोचता और न ही वह परमेश्वर के प्रति अपना ऋण चुकाने का प्रयास करता है। कहने का तात्पर्य यह है कि वह कभी यह स्वीकार नहीं करता कि वह कुछ गलत कर सकता है या उससे कोई भूल हो गई है। मसीह-विरोधियों के दिलों में, सक्रिय रूप से गलतियाँ स्वीकार करना और तथ्यों का ईमानदार लेखा-जोखा देना अक्षमता और मूर्खता है। अगर उनके बुरे कर्मों का पता चल जाता है और उनका पर्दाफाश हो जाता है, तो मसीह-विरोधी केवल असावधानी से हुई कोई क्षणिक गलती ही स्वीकार करेंगे, कर्तव्य में अपनी चूक और गैर-जिम्मेदारी कभी स्वीकार नहीं करेंगे और वे अपने ऊपर से दाग हटाने के लिए जिम्मेदारी किसी और पर डालने का प्रयास करेंगे। ऐसे समय, मसीह-विरोधी इस बात की चिंता नहीं करते कि परमेश्वर के घर को हुए नुकसान की भरपाई कैसे करें, खुलकर बात कैसे करें, अपनी गलतियों को कैसे स्वीकार करें या परमेश्वर के चुने हुए लोगों को इसका हिसाब कैसे दें। वे ऐसे तरीके खोजने में लगे रहते हैं जिनसे बड़ी समस्याओं को छोटी दिखा सकें और छोटी समस्याओं को ऐसे दिखा सकें जैसे वे कोई समस्या ही न हों। वे दूसरों को समझाने और उनकी सहानुभूति पाने के लिए वस्तुनिष्ठ कारण देते हैं। वे दूसरे लोगों के मन में अपनी प्रतिष्ठा बहाल करने, खुद पर अपने अपराधों के पड़ने वाले अत्यंत नकारात्मक प्रभाव को कम से कम करने और यह सुनिश्चित करने की भरसक कोशिश करते हैं कि ऊपरवाले पर उनके बारे में कोई गलत प्रभाव न पड़े और ऊपरवाला कभी भी उन्हें जवाबदेह न ठहराए, उन्हें बर्खास्त न करे, स्थिति की जाँच न करे या उनसे निपट न ले। अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा बहाल करने के लिए, ताकि उनके हितों को नुकसान न पहुँचे, मसीह-विरोधी कितनी भी पीड़ा सहने के लिए तैयार रहते हैं और वे कोई भी कठिनाई हल करने के लिए हर संभव तरीका सोचते हैं। अपने अपराध या गलती की शुरुआत से ही मसीह-विरोधियों का कभी भी अपने द्वारा किए गए गलत कामों की जिम्मेदारी लेने का कोई इरादा नहीं होता, अपने गलत कामों के पीछे के उद्देश्यों, मंशाओं और भ्रष्ट स्वभावों को स्वीकार करने, उनके बारे में संगति करने, उन्हें उजागर करने या उनका गहन-विश्लेषण करने का उनका कोई इरादा नहीं होता और स्वयं द्वारा कलीसिया के काम को पहुँचाई गई क्षति और परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को पहुँचाए गए नुकसान की भरपाई करने का उनका कोई इरादा तो निश्चित रूप से नहीं होता। इसलिए, चाहे तुम इस मामले को किसी भी दृष्टिकोण से देखो, मसीह-विरोधी वे लोग होते हैं, जो हठपूर्वक अपने गलत कार्यों को स्वीकार करने से इनकार कर देते हैं और पश्चात्ताप करने की अपेक्षा मरना पसंद करते हैं। छुटकारे की आशा से रहित, मसीह-विरोधी बेशर्म और मोटी चमड़ी वाले होते हैं और वे जीवित शैतानों से कम नहीं होते(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद ग्यारह)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि मसीह-विरोधी खासकर अपनी इज्जत और रुतबे को अहमियत देते हैं। उनके कर्तव्य में चाहे जितने भी विचलन या चूक आएँ या कलीसिया के काम को बड़ा नुकसान पहुँचे, वे कभी गलती नहीं मानेंगे। वे डरते हैं कि लोग उनकी कमियाँ जान जाएँगे और उन्हें नीची नजर से देखेंगे। इसलिए, ऐसी किसी गलती का एहसास होने पर, जो उन्हें नीचा दिखाएगी, वे परेशान हो जाते हैं, उनका खाना या सोना भी मुश्किल हो जाता है। वे अपनी गलतियों को छिपाने और अपनी इज्जत वापस पाने के तरीके ढूँढ़ने में दिमाग लड़ाते हैं। मेरा व्यवहार भी ऐसा ही था। मैं अपनी इज्जत और रुतबे को इतना अहम मानती थी कि काम में कोई समस्या दिखने पर मुझे अपनी चूक के लिए कोई पछतावा नहीं होता था। आगे ऐसी गलती से बचने के लिए जो कुछ हुआ उस पर विचार नहीं करती थी। मैं सिर्फ यह सोचती थी कि जब लोगों को मेरी इन बुनियादी गलतियों का पता चलेगा तो वे क्या सोचेंगे, क्या वे मुझे नीची नजर से देखेंगे या सोचेंगे कि मैं इस काम के लायक ही नहीं। अपनी इज्जत और रुतबा कायम रखने की चिंता में मैं दिन भर बेचैन रहती, यहाँ तक कि सो भी नहीं पाती। मैं सिर्फ अपनी गलती छिपाने और लोगों की नजर से बचने के तरीके सोचती रहती थी। मैं अपनी जिम्मेदारी से बचना, अपनी गलतियाँ छिपाना और दूसरों को इसका पता नहीं चलने देना चाहती थी। मैं आगे बढ़कर अपनी गलती नहीं स्वीकारना चाहती थी। मैं बहुत धूर्त थी, मुझमें चरित्र या गरिमा नहीं थी! असल में एक प्रभारी के तौर पर मैं उन तरीकों से अच्छी तरह वाकिफ थी। बेशक मुख्य रूप से मैं ही जिम्मेदार थी। फिर भी उम्मीद करती थी कि इससे बच निकलूँगी और दोष औरों पर लगा दूँगी। अंत में यह एहसास होने पर कि मैं अपनी जिम्मेदारी से नहीं बच सकती, अड़ियल बनकर खुद को पीड़िता की तरह दिखाने और इसे अपनी बदकिस्मती बताने लगी। आत्मचिंतन नहीं किया। बस अपनी बदकिस्मती का रोना रोती रही। मैंने अपनी गलतियों पर पर्दा डाला और अपना रुतबा बचाने के लिए धोखेबाजी की। यह मसीह-विरोधी व्यवहार था। यह एहसास होने पर मैं डर गई। मैं जानती थी, इस तरह बिना पश्चात्ताप किए काम करते रहना कितना खतरनाक था, जैसे कोई मसीह-विरोधी करता है!

मुझे यह भी एहसास हुआ कि मैं इतनी अड़ियल क्यों थी और अपनी गलती क्यों नहीं स्वीकारना चाहती थी, दरअसल प्रभारी होने के नाते मैं अपने ओहदे से बंधी और बेबस थी, जिसके कारण अपनी गलतियों से ठीक से नहीं निपट पाई। फिर मुझे इससे जुड़े परमेश्वर के कुछ वचन मिले। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “एक साधारण और सामान्य इंसान बनने के लिए तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? यह कैसे प्राप्त किया जा सकता है? ... सबसे पहले, खुद को कोई उपाधि मत दो और फिर खुद को सीमित मत होने दो, यह कहते हुए, ‘मैं अगुआ हूँ, मैं टीम का प्रभारी हूँ, मैं पर्यवेक्षक हूँ या मैं इस क्षेत्र में सबसे अधिक जानकार और तकनीकी रूप से कुशल व्यक्ति हूँ।’ अपनी खुद की दी हुई उपाधि से बाधित मत हो। जैसे ही ऐसा होता है, यह तुम्हें कसकर बाँध देगा; तुम्हारी कथनी-करनी इससे प्रभावित होगी, साथ ही तुम्हारी सामान्य सोच और निर्णय भी। तुम्हें इस रुतबे की बाधाओं से खुद को मुक्त करना चाहिए। सबसे पहले, इस आधिकारिक उपाधि के स्थान से नीचे उतरो और एक साधारण व्यक्ति का स्थान ग्रहण करो। तब तुम्हारी मानसिकता कुछ हद तक सामान्य हो जाएगी। तुम्हें यह भी स्वीकार करना है : ‘मैं नहीं जानता कि इसे कैसे करना है और मैं उस चीज को नहीं समझता हूँ—मुझे कुछ शोध और अध्ययन करना है’ या ‘मैंने इसका कभी अनुभव नहीं किया है, इसलिए मुझे नहीं पता कि क्या करना है।’ जब तुम वह कह सकते हो जो तुम वास्तव में सोच रहे हो और इस तरह ईमानदारी से बोल सकते हो, तो तुम सामान्य विवेक से युक्त होगे। यदि तुम दूसरों को अपनी असलियत जानने देते हो, तो वे तुम्हारे बारे में एक सामान्य दृष्टिकोण रखेंगे और तुम्हें कोई मुखौटा नहीं लगाना पड़ेगा। तुम अब भारी दबाव महसूस नहीं करोगे और तुम दूसरों के साथ सामान्य रूप से संवाद कर पाओगे। इस तरह जीना मुक्त और सहज है। जिस किसी को भी जीवन बहुत ही थकाऊ लगता है, इसके लिए वह खुद ही दोषी है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर के वचनों को सँजोना परमेश्वर में विश्वास की नींव है)। “जब कलीसिया में किसी को अगुआ बनने के लिए पदोन्नत और विकसित किया जाता है तो उसे सीधे अर्थ में पदोन्नत और विकसित किया जाता है; इसका यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही अगुआ के रूप में मानक स्तर पर है और एक सक्षम अगुआ है, कि वह पहले से ही अगुआई का काम करने में सक्षम है और वास्तविक कार्य कर सकता है—ऐसा नहीं है। ज्यादातर लोग इन चीजों की असलियत नहीं देख सकते और अपनी कल्पनाओं के आधार पर वे इन पदोन्नत लोगों को ऊँचा मानने लगते हैं। यह एक भूल है। जिन्हें पदोन्नत किया जाता है, उन्होंने चाहे कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, क्या उनके पास वास्तव में सत्य वास्तविकता होती है? ऐसा जरूरी नहीं है। क्या वे परमेश्वर के घर की कार्य-व्यवस्थाएँ लागू करने में सक्षम हैं? अनिवार्य रूप से नहीं। क्या उनमें जिम्मेदारी की भावना है? क्या वे निष्ठावान हैं? क्या वे समर्पण करने में सक्षम हैं? जब उनके सामने कोई समस्या आती है तो क्या वे सत्य खोज पाते हैं? यह सब अज्ञात है। क्या इन लोगों के अंदर परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय हैं? और उनके परमेश्वर का भय मानने वाले हृदय कितने गहरे हैं? क्या काम करते समय वे अपनी इच्छा का पालन करना टाल पाते हैं? क्या वे परमेश्वर की खोज करने में समर्थ हैं? अगुआई का कार्य करने के दौरान क्या वे अक्सर परमेश्वर के इरादों की तलाश में परमेश्वर के सामने आने में सक्षम हैं? क्या वे लोगों के सत्य वास्तविकता में प्रवेश की अगुआई करने में सक्षम हैं? निश्चित रूप से वे ऐसी चीजें कर पाने में अक्षम होते हैं। उन्हें प्रशिक्षण नहीं मिला है और उन्होंने पर्याप्त अनुभव भी हासिल नहीं किया है, इसलिए वे इन चीजों को करने में सक्षम नहीं हैं। इसीलिए, किसी को पदोन्नत और विकसित करने का यह मतलब नहीं कि वह पहले से ही सत्य को समझता है और न ही इसका अर्थ यह है कि वह पहले से ही अपना कर्तव्य ऐसे तरीके से निभाने में सक्षम है जो एक मानक स्तर का है(वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (5))। परमेश्वर के वचनों से मैं समझ गई कि अगुआ या प्रभारी होने का सीधा-सीधा अर्थ यह नहीं होता कि तुम दूसरों के मुकाबले अधिक योग्य, ऊँचे और उनसे बेहतर हो। यह विकसित किए जाने और कोई काम करने के लिए प्रशिक्षित किए जाने का मौका है। प्रशिक्षण के दौरान तुम अपने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट कर सकते हो, रुकावटों और नाकामियों का सामना कर सकते हो। यह बिल्कुल सामान्य है। लेकिन जब मैंने खुद को प्रभारी के ओहदे पर रखकर देखा तो लगा मुझे दूसरों से बेहतर होना चाहिए, उनकी तरह गलतियाँ नहीं दोहरानी चाहिए या उनकी जैसी भ्रष्टता नहीं दिखानी चाहिए। इसलिए कोई गलती करने पर उसे स्वीकारना नहीं चाहती थी। बस बहाने बनाती और लीपापोती करती रहती थी। मैं हर वक्त चिंता में रहती थी, जीना मुश्किल और थकाऊ होता था, सिर्फ इसलिए कि मैं अपनी इज्जत और रुतबे को अहमियत देती थी। मुझे यह भी एहसास हुआ कि गलतियाँ करना और शर्मिंदगी उठाना असल में बुरी चीजें नहीं हैं। जैसे कि परमेश्वर के वचन कहते हैं : “यूँ तो तुमने अपनी जग-हँसाई करा दी, लेकिन इससे तुम यह सीख सकते हो कि तुम्हारी समस्याएँ और कमियाँ क्या हैं, तुम यह सीख सकते हो कि तुममें मिथ्याभिमान के लिए प्यार है और तुम यह समझ सकते हो कि तुम एक पूर्ण व्यक्ति नहीं हो। यह तुम्हारे आत्म-ज्ञान के लिए फायदेमंद है, इसलिए अपनी जग-हँसाई कराना कोई बुरी बात नहीं है। कोई भी पूर्ण व्यक्ति नहीं होता है; सारे लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होता है, साथ ही कमियाँ और अपर्याप्तताएँ भी होती हैं और सभी लोग भ्रष्टता प्रकट करते हैं, ऐसी चीजें कहते और करते हैं जो गलत हैं और झटकों और असफलताओं का सामना करते हैं। इसलिए वे सभी ऐसे समय का अनुभव करते हैं जब वे अपनी जग-हँसाई करा बैठते हैं और शर्मिंदा होते हैं। यह बहुत सामान्य है। लोग अपनी जग-हँसाई कराने से मुख्य रूप से इसलिए डरते हैं क्योंकि वे बहुत मिथ्याभिमानी होते हैं। जब तुम अपने मिथ्याभिमान को छोड़ सकते हो और इस मामले को सही ढंग से देख सकते हो तो अगली बार अपनी जग-हँसाई कराने पर तुम्हें अब और शर्म महसूस नहीं होगी, तुम्हें इसकी परवाह नहीं होगी कि यह तुम्हारी प्रतिष्ठा पर असर डालता है और तुम इसके कारण अब और हताश नहीं होगे। इस समय तुम्हारी मानवता परिपक्व हो चुकी होगी। क्या यह एक अच्छी बात नहीं है? (है।) इसलिए जब अपनी जग-हँसाई करा बैठते हो तो यह मत सोचो कि तुम्हारी किस्मत खराब है और अपने मिथ्याभिमान और आत्मसम्मान की रक्षा के लिए बहाने मत खोजो। जब दूसरे अपनी जग-हँसाई करा बैठें तो उन पर भी मत हँसो। ये चीजें बहुत सामान्य हैं और हर कोई इनका अनुभव करेगा। जब तुम बहुत सारे झटकों और असफलताओं का अनुभव करते हो तो तुम्हारी मानवता धीरे-धीरे परिपक्व और मँजी हुई हो जाती है और फिर जब तुम दोबारा इन चीजों का सामना करते हो तो तुम अब और बाधित नहीं होगे और तुम सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभा सकोगे। इस समय तुम्हारी मानवता सामान्य होगी और तुम्हारा विवेक भी सामान्य होगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। लगातार गलतियाँ करने और उन्हें छिपाने की शर्मनाक कोशिशों के बाद आखिर मुझे खुद की थोड़ी समझ हुई। मैंने देखा कि मैं भाई-बहनों से कोई बेहतर नहीं थी। मैंने अपना कर्तव्य लापरवाही से किया, अपनी इज्जत और रुतबे की बहुत अधिक परवाह की। अपनी गलती के बारे में खुलकर बोलने की हिम्मत तक नहीं की। मैं लीपापोती कर सभी को धोखा देना चाहती थी। मैं एक धोखेबाज पाखंडी थी। दरअसल, अपना कर्तव्य करने में समस्याओं का सामना करना कोई डरने वाली बात नहीं है। अगर तुम सच्चे और ईमानदार हो, शांत होकर अपनी गलतियों का सामना करते हुए उन पर सोच-विचार कर सकते हो तो आगे ऐसी गलतियाँ करने से बच सकते हो और कुछ हासिल कर सकते हो। यही रवैया और सूझ-बूझ लोगों में होना जरूरी है। अब परमेश्वर का इरादा समझने के बाद मुझे कोई परवाह नहीं कि लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे। मैं पहले ही काम बिगाड़ चुकी हूँ। मुझे इन गलतियों की असली वजह जाननी होगी, ताकि उन्हें दोहराने से बच सकूँ।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “यदि कोई लगनशील हो सकता है, जिम्मेदारी ले सकता है और अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगा सकता है तो कार्य अच्छी तरह से हो जाएगा। कभी-कभी तुम्हारी गलत मानसिकता होती है, तुम हमेशा आत्मतुष्ट होते हो और भले ही कोई स्पष्ट गलती हो, फिर भी तुम उसे खोज या ढूँढ़ नहीं पाते हो। यदि तुम्हारी मानसिकता सही है और तुम सत्य खोजते हो, तो पवित्र आत्मा के प्रबोधन और मार्गदर्शन के माध्यम से, तुम समस्या का पता लगा लोगे। यदि पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन करता है और तुम्हें बोध कराता है, इस तरह कि तुम्हारा दिल उज्ज्वल हो जाता है और तुम जान जाते हो कि त्रुटि कहाँ है, तो तुम विचलन को ठीक करने और सत्य सिद्धांतों की ओर प्रयास करने में सक्षम होगे। यदि तुम्हारी सही मानसिकता नहीं है और तुम अनमने और लापरवाह हो, तो क्या तुम त्रुटि का पता लगा पाओगे? तुम नहीं लगा पाओगे। इससे क्या देखा जा सकता है? अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने के लिए, यह बहुत महत्वपूर्ण है कि लोग अपनी भूमिका निभाएँ; उनकी मानसिकताएँ अहम हैं; और वे अपने विचारों और ख्यालों को कहाँ केंद्रित करते हैं, यह बहुत महत्वपूर्ण है। लोग जब अपने कर्तव्य निभाते हैं तो परमेश्वर यह पड़ताल करता है और देख सकता है कि लोगों की मानसिकताएँ कैसी हैं और वे अपने कर्तव्य में कितना दिल लगाते हैं। अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगाना अहम है, और अपनी भूमिका निभाना महत्वपूर्ण है। लोगों को यह प्रयास करना चाहिए कि उन्होंने जो कर्तव्य पूरे किए हैं और जो चीजें की हैं, उनके बारे में कोई पछतावा न हो और वे परमेश्वर के प्रति ऋणी न हों। अपना पूरा दिल और अपनी पूरी ताकत लगाने का यही सच्चा अर्थ है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन कहते हैं कि जब किसी की मानसिकता गलत होती है और वे अपने कर्तव्य में बेपरवाह और ढीले होते हैं, वे अपनी आँखों के सामने हो रहीं गलतियाँ भी नहीं देख पाते। मेरी हालत वैसी ही थी जैसा परमेश्वर कहता है। ये दोनों गलतियाँ मेरी नजरों के सामने थीं—अगर मैं थोड़ा और ध्यान देती तो आसानी से उन्हें पकड़ लेती। मगर मैंने ध्यान ही नहीं दिया। एक वीडियो पर दोबारा काम करना था और दूसरा दो बार बन गया था, जो श्रम और संसाधनों की बरबादी थी। दरअसल, यह सब उस वक्त की मेरी मानसिकता के कारण हुआ। मैं सोचती थी कि मुझे इस काम में महारत हासिल है और मैं कार्यप्रक्रिया को अपनी हथेली की तरह जानती हूँ, इसलिए पहले जैसी सतर्क नहीं रही। मैं अहंकारी और लापरवाह थी। खासकर शुरुआती जाँचों के मामले में, मुझे लगा यह चुटकियों का खेल है, मानो पिछले अनुभव के आधार पर बस इधर-उधर देख लेना काफी था। मैंने काम पर ध्यान ही नहीं दिया, सावधानी से जाँच तक नहीं की और आखिर में ऐसी बुनियादी गलतियाँ कर बैठी। इन सबकी वजह यही थी कि मैं अहंकारी स्वभाव में जी रही थी, अपने कर्तव्य में लापरवाह थी। बाद में मैंने अपने कर्तव्य में हुई गलतियों के बारे में भाई-बहनों को खुलकर बताया। काम की समस्याओं का सारांश तैयार कर कुछ मानक सुझाये ताकि आगे ऐसी समस्याओं को रोकने में मदद मिले। ऐसा करके मेरे मन को थोड़ा सुकून मिला।

जल्दी ही मैं एक नए प्रोजेक्ट की प्रभारी बन गई। चूँकि मैंने इस तरह का वीडियो कभी नहीं बनाया था, मुझे इसकी बारीकियों की समझ नहीं थी, इसलिए वीडियो बनाने के दौरान कुछ समस्याएँ आईं। भले ही कई बार चिंता हुई कि लोग क्या सोचेंगे, मैंने अपने अहंकार और रुतबे से बेबस हुए बिना उन समस्याओं का सही सोच के साथ सामना किया। हर गलती के बारे में लिखा और समस्याओं और विचलनों का सारांश तैयार किया, ताकि ऐसा रास्ता खोजा जा सके जिससे दोबारा यह गलती न दोहराई जाए। ऐसा करने पर, मुझे परमेश्वर का मार्गदर्शन मिला, कलीसिया को कोई नुकसान पहुँचे, इससे पहले ही बहुत-सी समस्याएँ पकड़ में आ गईं और उन्हें ठीक भी किया। इस अनुभव से मैंने सीखा कि सही मानसिकता रखना और पूरी लगन से अपना कर्तव्य करने पर परमेश्वर का मार्गदर्शन और सुरक्षा मिलती है। साथ ही मैंने यह भी सीखा कि गलतियों या नाकामियों के कारण शर्मिंदा होना कोई बुरी बात नहीं है। इससे मुझे अपनी कमियाँ और भ्रष्टता जानने, अपनी प्रतिष्ठा की अत्यधिक चिंता न करने और अपने आप के साथ सही व्यवहार करने में मदद मिली। परमेश्वर का धन्यवाद!

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