10.2. कैसे सत्य का अभ्यास करें, इसे समझें और वास्तविकता में प्रवेश करें पर

344. अभी राज्य का युग है। तुमने इस नए युग में प्रवेश किया है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुमने वास्तव में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं और उसके वचन तुम्हारी जीवन वास्तविकता बन चुके हैं या नहीं। परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति के सामने प्रकट किया गया है ताकि सभी लोग अंत में, वचन के संसार में जिएँ और परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से प्रबुद्ध और रोशन कर देगा। यदि इस दौरान, तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ने में लापरवाह हो और उसके वचन में तुम्हारी रुचि नहीं है तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी स्थिति में गड़बड़ी है। यदि तुम वचन के युग में प्रवेश करने में असमर्थ हो तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करेगा; यदि तुम इस युग में प्रवेश कर चुके हो तो वह तुम में अपना काम करेगा। पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए तुम वचन के युग की शुरुआत में क्या कर सकते हो? इस युग में, और तुम लोगों के बीच परमेश्वर इस तथ्य को पूरा करेगा : कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जिएगा, सत्य को अभ्यास में लाएगा और अपने दिल से परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों को अपनी नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में इस्तेमाल करेंगे और उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होगा; और परमेश्वर के वचन का अभ्यास करके मनुष्य परमेश्वर के साथ राज करेगा। यही कार्य परमेश्वर को पूरा करना है। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? आज, ऐसे बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे एक-दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन पढ़ना आवश्यक है, और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना काफी है। यही अहसास पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रदान करता है, और इसी प्रकार वह मनुष्य को प्रेरित करना शुरू करता है। अर्थात वह वचनों के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि वे परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। यदि परमेश्वर के वचन को केवल एक दिन भी बिना खाए-पिए तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, तुम्हें यह असह्य लगता हो, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे विमुख नहीं हुआ है। तब तुम इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम्हें कोई अंतर महसूस न हो या तुम्हें प्यास महसूस न हो, तुम थोड़ा भी प्रेरित महसूस न करो तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुमसे विमुख हो चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है और तुम उन लोगों में से हो जो पीछे छूट गए हैं। परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, और जब तुम इन वचनों को नहीं खाते-पीते हो, तब तुम्हारे पास अनुसरण का कोई मार्ग नहीं होता है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह इस तथ्य को तुम लोगों में पूरा करेगा। ऐसा कैसे होता था कि पहले लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सभी चीजों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है और उन्हें पूर्ण बनाया जाता है और अंत में इन वचनों के द्वारा राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्य को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्य को ज्योति और अभ्यास का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता से नहीं भटकते, हर दिन उसके वचनों को खाते-पीते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

345. परमेश्वर के वचनों के भीतर वे सत्य हैं जो लोगों के पास होने चाहिए, वे चीजें हैं जो लोगों के लिए सबसे अधिक लाभदायक और सहायक हैं। वे ऐसे टॉनिक और पोषण हैं जिनकी तुम लोगों के शरीर को आवश्यकता है, वे ऐसी चीजें हैं जो लोगों को अपनी सामान्य मानवता बहाल करने में मदद करती हैं और वे ऐसे सत्य हैं जिनसे लोगों को लैस होना चाहिए। तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, तुम लोगों का जीवन उतनी ही तेजी से विकसित होगा; तुम लोग परमेश्वर के वचनों का जितना अधिक अभ्यास करोगे, सत्य तुम लोगों के लिए उतना ही स्पष्ट होता जाएगा। जैसे-जैसे तुम लोगों का आध्यात्मिक कद बढ़ेगा, तुम लोग आध्यात्मिक क्षेत्र की चीजों को अधिक स्पष्ट रूप से देखोगे और तुम लोगों के पास शैतान पर विजय पाने के लिए अधिक शक्ति होगी। बहुत-सा सत्य जो तुम लोग नहीं समझते हो, वह तब स्पष्ट हो जाएगा जब तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करोगे। अधिकांश लोग केवल परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक पहलू को समझने से संतुष्ट हो जाते हैं और अनुभव करने और अभ्यास में गहराई तक जाने के बजाय स्वयं को धर्म-सिद्धांतों से लैस करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं—क्या यह फरीसियों का तरीका नहीं है? क्या कोई ऐसा करके “परमेश्वर के वचनों को अपने जीवन के रूप में रखना” वाक्यांश की वास्तविकता प्राप्त कर सकता है? लोगों का जीवन केवल परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने से ही विकसित हो सकता है; यह केवल उन्हें पढ़ने से विकसित नहीं होता। यदि तुम मानते हो कि जब तक तुम परमेश्वर के वचनों को समझते हो तब तक तुम्हारे पास जीवन और आध्यात्मिक कद होगा, तो तुम्हारी समझ दोषपूर्ण है। परमेश्वर के वचनों को वास्तव में समझना तब प्राप्त होता है जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो; तुम्हें यह समझना चाहिए कि “केवल सत्य का अभ्यास करके ही इसे कभी भी समझा जा सकता है।” आज, परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के बाद, तुम केवल यह कह सकते हो कि तुम परमेश्वर के वचनों से अवगत हो, लेकिन तुम यह नहीं कह सकते कि तुम उन्हें समझते हो। कुछ लोग कहते हैं कि किसी भी व्यक्ति को सत्य का अभ्यास करने से पहले सत्य को समझना चाहिए, लेकिन यह बात आंशिक रूप से ही सही है, यह पूरी तरह से सही नहीं है। इससे पहले कि तुम्हें किसी निश्चित सत्य का ज्ञान हो, वह तब होता है जब तुमने उस सत्य का अनुभव नहीं किया होता है। किसी धर्मोपदेश में इसके बारे में सुनकर यह महसूस करना कि तुम उस सत्य को समझते हो, वास्तव में इसे समझना नहीं है—यह केवल उस सत्य के शाब्दिक पहलू पर अधिकार करना है, उसमें निहित सच्चे अर्थ को समझे बिना। सत्य की केवल सतही परत को जानने का अर्थ यह नहीं है कि तुम वास्तव में सत्य को समझते हो या तुम्हें इसका ज्ञान है; सत्य का सच्चा अर्थ इसका अनुभव करने से आता है। इसलिए, केवल सत्य का अनुभव करने पर ही तुम इसे समझ सकते हो, और केवल अनुभव के माध्यम से ही तुम इसके छिपे हुए हिस्सों को समझ सकते हो। सत्य के संकेतार्थों को समझने और सत्य के सार को समझने के लिए तुम्हारा अपने अनुभव को गहरा करना ही एकमात्र तरीका है। इसलिए, केवल जब तुम्हारे पास सत्य होता है तभी तुम दुनिया भर में स्वतंत्र रूप से घूमने में सक्षम होते हो। यदि तुम्हारे पास सत्य नहीं है, तो बहुत से धार्मिक लोगों को अपनी बात मनवाने की तो बात ही छोड़ दो—यहाँ तक कि तुम्हारे परिवार के सदस्य भी तुम्हारी बात नहीं मानेंगे। सत्य के बिना तुम एक उड़ते हुए हिमकण की तरह हो, लेकिन सत्य के साथ तुम प्रसन्न और मुक्त रह सकते हो और कोई तुम पर आक्रमण नहीं कर सकता। कोई सिद्धांत कितना भी मजबूत क्यों न हो, वह सत्य को परास्त नहीं कर सकता। सत्य के साथ, तुम स्वर्ग और पृथ्वी को उलट-पुलट कर सकते हो और पहाड़ों और समुद्रों को हिला सकते हो; सत्य के बिना, भुनगे भी तुम्हारे शहर को भेद सकते हैं। यह एक स्पष्ट तथ्य है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए

346. मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षा मात्र वास्तविकता के विषय में बात करने के योग्य होना ही नहीं है; अगर ऐसा हो तो क्या यह अति सरल नहीं होगा? तब परमेश्वर जीवन प्रवेश के विषय में बात क्यों करता है? वह रूपांतरण के विषय में बात क्यों करता है? यदि लोग केवल वास्तविकता की खोखली बातें ही कर पायेंगे, तो क्या वे अपने स्वभाव में रूपांतरण ला सकते हैं? किसी समूह को राज्य के अच्छे सैनिक बनने के लिए प्रशिक्षित करने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें ऐसे लोग बनने के लिए प्रशिक्षित किया जाए जो केवल वास्तविकता की बातें करें या डींगें मारें; बल्कि इसका मतलब है कि उन्हें ऐसे लोग बनने के लिए प्रशिक्षित करना जो सदैव परमेश्वर के वचनों को जी सकें, चाहे कोई भी आघात लगे हार न मानें और हर समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जिएँ और संसार में न लौटें। यही वह वास्तविकता है जिसकी बात परमेश्वर करता है; मनुष्य से परमेश्वर की यही अपेक्षा है। इसलिए परमेश्वर द्वारा कही गई वास्तविकता को इतना सरल न समझो। मात्र पवित्र आत्मा के द्वारा प्रबुद्ध होना वास्तविकता रखने के समान नहीं है। मनुष्य का आध्यात्मिक कद ऐसा नहीं है, अपितु यह परमेश्वर का अनुग्रह है और इसमें मनुष्य का कोई योगदान नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को पतरस की पीड़ाएँ सहनी होंगी और इसके अलावा उसमें पतरस का गौरव होना चाहिए जिसे वे परमेश्वर के कार्य प्राप्त कर लेने के बाद जीते हैं। मात्र इसे ही वास्तविकता कहा जा सकता है। यह मत सोचो चूँकि तुम वास्तविकता के विषय में बात कर सकते हो इसलिए तुम्हारे पास वास्तविकता है। यह एक भ्रम है। इस तरह से सोचना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं और इसका कोई वास्तविक अर्थ नहीं है। भविष्य में ऐसी बातें मत करना—ऐसी बातों को समाप्त कर दो! जो परमेश्वर के वचनों की बेतुकी समझ रखते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। उनमें कोई भी वास्तविक ज्ञान नहीं है, उनमें वास्तविक आध्यात्मिक कद होने का तो सवाल ही नहीं है; वे वो लोग हैं जिनमें अंतर्दृष्टि और वास्तविकता नहीं है। कहने का अर्थ यह है कि जो परमेश्वर के वचनों के सार से बाहर जीवन जीते हैं, वे सभी अविश्वासी हैं। जिन्हें मनुष्यों के द्वारा अविश्वासी समझ लिया गया है, वे परमेश्वर की दृष्टि में जानवर हैं और जिन्हें परमेश्वर के द्वारा अविश्वासी समझा गया है, वे ऐसे लोग हैं जिनके पास जीवन के रूप में परमेश्वर के वचन नहीं हैं। अतः, वे लोग जिनमें परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता नहीं है और वे जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जीने में असफल हो जाते हैं, वे अविश्वासी हैं। परमेश्वर का इरादा प्रत्येक व्यक्ति को ऐसा बनाना है जिससे वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करे। न कि उसे ऐसा व्यक्ति बनाना कि वह केवल वास्तविकता के विषय में बात करे, बल्कि इस योग्य बनाना है कि हर कोई उसके वचनों की वास्तविकता को जी सके।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल सत्य का अभ्यास करना ही इंसान में वास्तविकता का होना है

347. परमेश्वर के वचनों की सच्ची समझ पाना कोई सरल बात नहीं है। इस तरह मत सोचो : “मैं परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर सकता हूँ, और हर कोई मेरी व्याख्या को अच्छा कहता है और मुझे शाबाशी देता है, तो इसका अर्थ है कि मैं परमेश्वर के वचनों को समझता हूँ।” यह परमेश्वर के वचनों को समझने के समान नहीं है। यदि तुमने परमेश्वर के कथनों के भीतर से कुछ प्रकाश प्राप्त किया है और उसके वचनों के वास्तविक अर्थ को महसूस किया है, यदि तुम उसके वचनों के पीछे के इरादे को और वे अंततः जो प्रभाव प्राप्त करेंगे, उसको व्यक्त कर सकते हो, अगर तुम्हें इन सब बातों की स्पष्ट समझ हो, तो यह माना जा सकता है कि तुम्हारे पास कुछ अंश तक परमेश्वर के वचनों की समझ है। इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों को समझना इतना आसान नहीं है। सिर्फ इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचनों के शाब्दिक अर्थ की एक लच्छेदार और अतिश्योक्तिपूर्ण व्याख्या दे सकते हो, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम इन्हें समझते हो। तुम चाहे उनके शाब्दिक अर्थ की व्याख्या कर पाओ, तुम्हारी व्याख्या तब भी मनुष्य की कल्पना और मनुष्य के सोचने के तरीके पर आधारित होगी। यह बेकार है! तुम परमेश्वर के वचनों को कैसे समझ सकते हो? मुख्य बात है उनके भीतर से सत्य खोजना। केवल इसी तरह तुम परमेश्वर के वचनों को सच में समझ सकते हो। परमेश्वर कभी भी खोखले शब्द नहीं बोलता। उसके द्वारा कथित प्रत्येक वाक्य में ऐसे विवरण निहित होते हैं जो उसके वचनों में निश्चित रूप से और अधिक उजागर किए जाने हैं, और वे अलग तरीके से व्यक्त किए जा सकते हैं। जिन तरीकों से परमेश्वर सत्य अभिव्यक्त करता है मनुष्य उसकी थाह नहीं पा सकता। परमेश्वर के कथन बहुत गहरे हैं और उन्हें मनुष्य की सोच से आसानी से नहीं समझा जा सकता। अगर लोग प्रयास करें, तो वे सत्य के हर पहलू का लगभग पूरा अर्थ जान सकते हैं। शेष बचे विवरण उनके बाद के अनुभव के दौरान, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता द्वारा भरे जाने हैं। एक हिस्सा है परमेश्वर के वचनों पर चिंतन कर उन्हें समझना, उन्हें पढ़कर उनकी विशिष्ट विषयवस्तु खोजना। दूसरा हिस्सा अनुभव करके और पवित्र आत्मा से प्रबोधन प्राप्त करके परमेश्वर के वचनों के अर्थ को समझना है। इन दो पहलुओं में निरंतर प्रगति से, तुम परमेश्वर के वचनों को समझ सकते हो। यदि तुम इनका शाब्दिक अर्थ निकालोगे या अपनी सोच और कल्पनाओं से व्याख्या करोगे, तो आलंकारिक रूप से सजाकर व्याख्या करने पर भी तुम सत्य नहीं समझते और यह अब भी मानवीय सोच और कल्पनाओं पर ही आधारित होगा। यह पवित्र आत्मा के प्रबोधन से प्राप्त नहीं हुआ है। लोग अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर के वचनों की व्याख्या करने की ओर प्रवृत्त रहते हैं, वे परमेश्वर के वचनों की गलत व्याख्या भी कर सकते हैं, जिससे उनके परमेश्वर को गलत समझकर उसकी आलोचना करने की संभावना होती है, और यह कष्टप्रद है। इसलिए, सत्य मुख्यतः परमेश्वर के वचनों को समझने और पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध किए जाने से प्राप्त होता है। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझकर उसकी व्याख्या कर पाने का मतलब यह नहीं कि तुमने सत्य प्राप्त कर लिया है। अगर परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझने का मतलब यह हो कि तुमने सत्य समझ लिया है, तो तुम्हारे लिए केवल थोड़ी-बहुत शिक्षा और ज्ञान ही काफी है, फिर तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन की क्या आवश्यकता है? क्या परमेश्वर के कार्य को इंसानी दिमाग समझ सकता है? इसलिए, सत्य समझना मानवीय धारणाओं या कल्पनाओं पर आधारित नहीं है। वास्तविक अनुभवजन्य ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम्हें पवित्र आत्मा के प्रबोधन, प्रकाशन और मार्गदर्शन की आवश्यकता है। यह सत्य समझने और प्राप्त करने की प्रक्रिया है और यह एक आवश्यक शर्त भी है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें

348. यदि तुमने परमेश्वर के बहुत सारे वचन पढ़े हैं लेकिन केवल उनका शाब्दिक अर्थ समझते हो और वास्तविक परिस्थितियों के माध्यम से परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का प्रयास नहीं करते, तो तुम परमेश्वर के वचनों को नहीं जानोगे और तुम्हारे लिए परमेश्वर के वचन जीवन नहीं बल्कि केवल बेजान शब्द होंगे। और यदि तुम केवल बेजान शब्दों को पकड़े रहते हो, तो तुम परमेश्वर के वचनों के सार को नहीं समझ सकते और न ही तुम उसके इरादों को जानोगे। केवल जब तुम अपने वास्तविक अनुभवों में उसके वचनों का अनुभव करते हो तभी परमेश्वर के वचनों का आध्यात्मिक अर्थ तुम्हारे सामने खुलेगा। केवल अनुभव के माध्यम से ही तुम कई सत्यों के आध्यात्मिक अर्थ को समझ सकते हो और परमेश्वर के वचनों के रहस्यों को खोल सकते हो। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, तो परमेश्वर चाहे कितनी भी स्पष्टता से क्यों न बोले, तुम्हारे हाथों में केवल खाली शब्द और धर्म-सिद्धांत होंगे जो तुम्हारे धार्मिक विनियम बन जाते हैं। क्या फरीसियों ने बिल्कुल ऐसा ही नहीं किया था? अगर तुम लोग परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाओ और उनका अनुभव करो, तो ये तुम लोगों के लिए व्यावहारिक बन जाएँगे; अगर तुम इनका अभ्यास करने का प्रयास न करो, तो तुम लोगों के लिए परमेश्वर का वचन तीसरे स्वर्ग की किंवदंती से ज्यादा कुछ नहीं है। वास्तव में, तुम लोगों के लिए परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया उसके वचनों का अनुभव करने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने की प्रक्रिया है। इसे थोड़ा और स्पष्ट रूप से कहें तो परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ उसके वचनों को जानना और समझना और उसके वचनों का अनुभव करना और उन्हें जीना है; यह परमेश्वर में तुम लोगों के विश्वास की वास्तविकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का अनुसरण किए बिना केवल अनंत जीवन की आशा में परमेश्वर में विश्वास करते हो, तो तुम सभी मूर्ख हो। यह बिल्कुल ऐसा ही होगा जैसे किसी दावत में जाकर केवल भोज्य-पदार्थों को देखकर और उनमें से किसी भी चीज का स्वाद चखे बिना या उनमें से किसी को भी खाए या पिए बिना उन्हें बस ध्यान में रख लिया। क्या ऐसा व्यक्ति मूर्ख नहीं होगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सत्य को समझने के बाद, तुम्हें उस पर अमल करना चाहिए

349. लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ उतनी ऊँची भी नहीं हैं। अगर लोग लगन और ईमानदारी से अभ्यास करें, तो उन्हें “उत्तीर्ण ग्रेड” प्राप्त होगा। सच कहा जाए, तो सत्य की समझ, ज्ञान और बोध प्राप्त करना सत्य का अभ्यास करने से कहीं अधिक जटिल है। पहले जितना तू समझता है उतना अभ्यास कर, और जो तूने बूझ लिया है उसका अभ्यास कर। इस तरह तू धीरे-धीरे सत्य का सच्चा ज्ञान और समझ हासिल करने में सक्षम होगा। ये वे कदम और साधन हैं, जिनके द्वारा पवित्र आत्मा कार्य करता है। अगर तू इस तरह से समर्पण का अभ्यास नहीं करेगा, तो तू कुछ भी हासिल नहीं करेगा। अगर तू हमेशा अपनी इच्छा से कार्य करता है और समर्पण का अभ्यास नहीं करता, तो क्या पवित्र आत्मा तुझ पर कार्य करेगा? क्या पवित्र आत्मा तेरी इच्छानुसार कार्य करता है? या वह तेरी कमी के अनुसार और परमेश्वर के वचनों के आधार पर कार्य करता है? अगर तुझे यह स्पष्ट नहीं है, तो तू सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर पाएगा। ऐसा क्यों है कि अधिकांश लोगों ने परमेश्वर के वचनों को पढ़ने में काफी मेहनत की है, लेकिन इसके पश्चात उनके पास मात्र ज्ञान है और व्यावहारिक मार्ग के बारे में कुछ नहीं कह पाते? क्या तुझे लगता है कि ज्ञान से युक्त होना सत्य से युक्त होने के बराबर है? क्या यह भ्रांत दृष्टिकोण नहीं है? तू ज्ञान के उतने अंश बोल पाता है जितने समुद्र-तट पर रेत के कण होते हैं, फिर भी इसमें से कुछ भी व्यावहारिक मार्ग नहीं है। यह करके क्या तू लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयत्न नहीं कर रहा है? क्या तू खोखला प्रदर्शन नहीं कर रहा है, जिसके समर्थन के लिए कुछ भी ठोस नहीं है? ऐसा समूचा व्यवहार लोगों के लिए हानिकारक है! जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत और उतना ही अधिक यह वास्तविकता से रहित, उतना ही अधिक यह लोगों को वास्तविकता में ले जाने में अक्षम है। जितना अधिक ऊँचा सिद्धांत, उतना ही अधिक यह तुझसे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और विरोध करवाता है। आध्यात्मिक सिद्धांत में लिप्त मत हो—इसका कोई फायदा नहीं! कुछ लोग आध्यात्मिक सिद्धांत के बारे में दशकों से बात कर रहे हैं, और वे महान आध्यात्मिक हस्तियाँ बन गए हैं, लेकिन अंततः, इतने पर वे भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने में विफल हैं। चूँकि उन्होंने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं किया है, इसलिए उनके पास अभ्यास के लिए कोई सिद्धांत या मार्ग नहीं है। ऐसे लोगों के पास स्वयं सत्य वास्तविकता नहीं होती, तो वे अन्य लोगों को परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर कैसे ला सकते हैं? वे केवल लोगों को गुमराह कर सकते हैं। क्या यह दूसरों को और खुद को नुकसान पहुँचाना नहीं है? कम से कम, तुझे वास्तविक समस्याएँ हल करने में सक्षम होना चाहिए, जो ठीक तेरे सामने हैं। अर्थात्, तुझे परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करने और सत्य को अभ्यास में लाने में सक्षम होना चाहिए। केवल यही परमेश्वर के प्रति समर्पण है। जीवन प्रवेश पा लेने पर ही तू परमेश्वर के लिए काम करने के योग्य होता है, और परमेश्वर के लिए सच्चे मन से खुद को खपाने पर ही तू परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जा सकता है। हमेशा बड़े-बड़े वक्तव्य न दिया कर और आडंबरपूर्ण सिद्धांत की बात मत किया कर; यह वास्तविक नहीं है। लोगों से अपनी प्रशंसा करवाने के लिए आध्यात्मिक सिद्धांत बघारना परमेश्वर की गवाही देना नहीं है, बल्कि अपनी शान दिखाना है। यह लोगों के लिए बिलकुल भी लाभदायक नहीं है और उन्हें कुछ सिखाता नहीं, और उन्हें आसानी से आध्यात्मिक सिद्धांत की आराधना करने और सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित न करने के लिए प्रेरित कर सकता है—और क्या यह लोगों को गुमराह करना नहीं है? इसी तरह करते रहना कई खोखले सिद्धांतों और साथ ही बहुत-से विनियमों को जन्म देगा, जो लोगों को बाधित करेंगे और फँसाएँगे; यह वाकई शर्मनाक है। इसलिए ह ज्यादा कह जो वास्तविक है, उन समस्याओं के बारे में ज्यादा बात कर जो वास्तव में मौजूद हैं, वास्तविक समस्याएँ हल करने के लिए सत्य की खोज करने में ज्यादा समय बिता; यही सबसे महत्वपूर्ण है। सत्य का अभ्यास सीखने में देरी न कर : यह वास्तविकता में प्रवेश का मार्ग है। अन्य लोगों के अनुभवजन्य ज्ञान को अपनी निजी संपत्ति की तरह मत ले और उन्हें दूसरों की प्रशंसा पाने के लिए पकड़कर मत रख। तुम्हारे पास अपना जीवन प्रवेश होना चाहिए। केवल सत्य का अभ्यास करने का तरीका जानकर और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने से ही तुझे जीवन प्रवेश मिलेगा। प्रत्येक व्यक्ति को इसी का अभ्यास और इसी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता पर अधिक ध्यान केंद्रित करो

350. जब तुम लोग सत्य को समझने की कोशिश करते हो, तो क्या तुम उसे अपनी दशाओं से जोड़ते हो? वास्तविक जीवन में, तुम्हें पहले यह सोचना होगा कि जिन लोगों, घटनाओं और चीजों का तुमने सामना किया है, वे किन सत्यों से संबंधित हैं; इन्हीं सत्यों के भीतर तुम परमेश्वर के इरादे पा सकते हो और जिस चीज का तुमने सामना किया है उसे परमेश्वर के इरादों से जोड़ सकते हो। यदि तुम यह नहीं जानते कि जिन चीजों का तुमने सामना किया है, वे सत्य के किन पहलुओं से संबंधित हैं, और इसके बजाय सीधे परमेश्वर के इरादे खोजने लगते हो, तो यह एक अंधा तरीका है जिससे परिणाम हासिल नहीं हो सकते। यदि तुम सत्य खोजना और परमेश्वर के इरादे समझना चाहते हो, तो तुम्हें पहले यह देखने की जरूरत है कि तुम्हारे साथ घटित होने वाली चीजें किस श्रेणी में आती हैं, और वे सत्य के किन पहलुओं से संबंधित हैं, परमेश्वर के वचन में उस विशिष्ट सत्य को ढूँढ़ो जो तुम्हारे अनुभव के अनुरूप हो, और फिर उस सत्य के भीतर अभ्यास का ऐसा मार्ग खोजो जिस पर तुम चल सको। इस तरह, तुम अप्रत्यक्ष रूप से परमेश्वर के इरादे समझ सकते हो। सत्य को खोजना और उसका अभ्यास करना यंत्रवत किसी विनियम को लागू करना या किसी सूत्र का पालन करना नहीं है। सत्य कोई सूत्र नहीं है, न ही यह कोई निश्चित नियम है। यह मृत नहीं है—यह जीवन है, यह एक जीवित चीज है, और यह वह नियम है जिसका एक सृजित प्राणी को अपने जीवन में पालन करना ही चाहिए और वह नियम है जो किसी इंसान के अस्तित्व के लिए आवश्यक है। यह कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें अनुभव के माध्यम से और अधिक समझने-बूझने की कोशिश करनी चाहिए। तुम्हारे अनुभवों की गहराई चाहे कितनी भी हो, तुम कभी भी परमेश्वर के वचन या सत्य के बिना नहीं रह सकते। तुम परमेश्वर के जिस स्वभाव को समझते हो, साथ ही परमेश्वर की जिन चीजों और अस्तित्व को तुम जानते हो, वे सभी उसके वचनों में व्यक्त हैं; वे सत्य से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं। परमेश्वर का स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, वे अपने आप में सत्य हैं; सत्य परमेश्वर के स्वभाव और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है, उसकी एक प्रामाणिक अभिव्यक्ति है। यह उसे ठोस और स्पष्ट बनाता है जो उसके पास है और जो वह स्वयं है; यह तुम्हें और अधिक सीधे तौर पर बताता है कि परमेश्वर क्या पसंद करता है और क्या नहीं, वह तुमसे क्या करवाना चाहता है और क्या करने की अनुमति नहीं देता, वह किन लोगों से घृणा करता है और किन लोगों से प्रसन्न होता है। परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों के पीछे, लोग उसकी खुशी, क्रोध, दुःख और आनंद के साथ-साथ उसके सार को भी देख सकते हैं—ये उसके स्वभाव के प्रकाशन हैं। परमेश्वर के वचन से यह जानने के अलावा कि उसके पास क्या है और वह क्या है और उसके स्वभाव को समझने के अलावा, लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात वास्तविक अनुभव के माध्यम से इस समझ और ज्ञान तक पहुँचना है। यदि कोई व्यक्ति वास्तविक जीवन से अलग हो जाता है, तो उसके लिए परमेश्वर को जानना असंभव होगा। भले ही कुछ ऐसे लोग हों जो परमेश्वर के वचन से कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेते हैं, लेकिन उनका ज्ञान धर्म-सिद्धांतों और शब्दों तक ही सीमित रहता है, और इसके और जो परमेश्वर वास्तव में है, उसके बीच एक अंतर होता है।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III

351. जबसे लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उन्होंने कई ग़लत इरादों को प्रश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारे सभी इरादे सही हैं, किंतु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत-से गलत इरादे हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम पहचान लेते हो कि तुम्हारे इरादे ग़लत हैं, यदि तुम अपनी धारणाओं और इरादों के अनुसार अभ्यास करने से बच पाते हो और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो, और अपने साथ घटित होने वाली हर बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। जब तुम देह के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान तुमसे अपना अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा, तुमसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने और देह के हितों की रक्षा करवाने की कोशिश करेगा—किंतु परमेश्वर के वचन भीतर से तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करेंगे, और उस समय यह तुम पर निर्भर करेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो या शैतान का। जब परमेश्वर लोगों से सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है, तो वह मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों की काट-छाँट करने और उनके उन विचारों और धारणाओं की, जो परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं हैं, काट-छाँट करने के लिए होता है—पवित्र आत्मा लोगों के हृदयों को छूता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सबके पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर से प्रेम करने का अभ्यास करते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है और यद्यपि बाहरी रूप से उनकी देह में सब कुछ ठीक दिखाई दे सकता है, किंतु वास्तव में उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार का निर्णय हो सकता है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। चूँकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं से मेल नहीं खाता, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शोधन सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीजें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का स्वभाव बहुत विद्रोही है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुजरने के लिए कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना हो, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो : “परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कष्ट सहना चाहता हूँ, और चाहे मैं कितनी भी बड़ी असफलताओं का सामना करूँ, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना जीवन भी त्यागना पड़े, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए!” इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे, तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, हर बार जब वे शोधन से गुजरते हैं, हर बार जब उनकी परीक्षा ली जाती है और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, तो उन्हें चरम पीड़ा सहनी पड़ती है। यह सब लोगों के लिए एक परीक्षा है और इसलिए उन सबके भीतर एक संघर्ष होता है। यही वह वास्तविक मूल्य है जो वे चुकाते हैं। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना और अधिक दौड़-भाग करना भी एक तरह की क़ीमत ही है। यही है जो लोगों को करना चाहिए, यही उनका कर्तव्य और उनकी जिम्मेदारी है, जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, किंतु लोगों को अपने भीतर की उन बातों को त्याग देना चाहिए, जिन्हें त्याग दिए जाने की आवश्यकता है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो चाहे तुम्हारी बाहरी पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ करते हो, सब व्यर्थ रहेगा! कहने का अर्थ है कि केवल तुम्हारे भीतर के बदलाव ही निर्धारित कर सकते हैं कि तुम्हारी बाहरी पीड़ा का कोई मूल्य है या नहीं। जब तुम्हारा आंतरिक स्वभाव बदल जाता है और तुम सत्य को अभ्यास में ले आते हो, तब तुम्हारी समस्त बाहरी पीड़ाओं को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हो जाएगा; यदि तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो चाहे तुम कितनी भी बड़ी पीड़ा क्यों न सह लो या तुम बाहर कितनी भी दौड़-भाग क्यों न कर लो, परमेश्वर की ओर से कोई अनुमति नहीं होगी—और ऐसी पीड़ा व्यर्थ है जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं है। इसलिए, तुम्हारे द्वारा जो क़ीमत चुकाई गई है, वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित की जाती है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि तुम्हारे भीतर कोई बदलाव आया है या नहीं; साथ ही यह कि परमेश्वर के इरादों की संतुष्टि, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी प्राप्त करने के लिए तुम सत्य को अभ्यास में लाते हो या नहीं और अपने इरादों और धारणाओं के खिलाफ विद्रोह करते हो या नहीं। चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न करो, यदि तुमने कभी अपने इरादों के खिलाफ विद्रोह करना नहीं जाना, बल्कि केवल बाहरी कर्मों और बाहरी उत्साह का ही अनुसरण करते रहे और कभी अपने जीवन पर ध्यान नहीं दिया, तो तुम्हारी पीड़ा व्यर्थ रही होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

352. सटीक रूप से, अपने विश्वास में पतरस के मार्ग को अपनाने का अर्थ है, सत्य को खोजने के मार्ग पर चलना, जो वास्तव में स्वयं को जानने और अपने स्वभाव को बदलने का मार्ग भी है। केवल पतरस के मार्ग पर चलने के द्वारा ही कोई परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर होगा। किसी को भी इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि वास्तव में कैसे पतरस के मार्ग पर चलना है साथ ही कैसे इसे अभ्यास में लाना है। पहले तो, किसी को भी अपने स्वयं के इरादों, अनुचित प्रयासों, और यहाँ तक कि अपने परिवार और अपनी स्वयं की देह की सभी चीजों को एक ओर रखना होगा। एक व्यक्ति को पूर्ण हृदय से समर्पित अवश्य होना चाहिए, अर्थात्, स्वयं को पूरी तरह से परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसकी आकांक्षाओं की खोज पर अवश्य ध्यान केंद्रित करना चाहिए, और हर चीज में परमेश्वर के इरादों को समझने का प्रयास करना चाहिए। यह अभ्यास की सबसे बुनियादी और प्राणाधार पद्धति है। यह वही था जो पतरस ने यीशु को देखने के बाद किया था, और केवल इस तरह से अभ्यास करने से ही कोई सबसे अच्छा परिणाम प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर के वचन के प्रति हार्दिक समर्पण में मुख्यतः परमेश्वर के वचनों में सत्य और उसके आकांक्षाओं की खोज करना, परमेश्वर के इरादों को समझने पर ध्यान केंद्रित करना, और परमेश्वर के वचनों से सत्य को समझना व और अधिक प्राप्त करना शामिल है। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते समय, पतरस ने सिद्धांतों को समझने पर ध्यान केंद्रित नहीं किया था और धर्म-विद्या का ज्ञान प्राप्त करने पर तो उसका ध्यान और भी केंद्रित नहीं था। इसके बजाय, उसने सत्य को समझने और परमेश्वर के इरादों पर पकड़ बनाने पर, साथ ही परमेश्वर के स्वभाव और मनोहरता का ज्ञान प्राप्त करने पर ध्यान केंद्रित किया। पतरस ने परमेश्वर के वचनों से मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं, मनुष्य के प्रकृति सार और मनुष्य की वास्तविक कमियों को जानने का भी प्रयास किया। केवल इसी तरीके से वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसकी अपेक्षाओं को आसानी से पूरा कर सकता था। जब परमेश्वर के वचनों की बात आती थी तो पतरस के पास बहुत-से सटीक अभ्यास थे। यह परमेश्वर के इरादों के सर्वाधिक अनुरूप था, और यह वो सर्वोत्तम तरीका था जिससे कोई व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हुए सहयोग कर सकता था। परमेश्वर के भेजे हुए सैकड़ों परीक्षणों का अनुभव करते समय पतरस मनुष्य का न्याय और उसे उजागर करने वाले परमेश्वर के हर वचन और मनुष्य से उसकी माँगों के हर वचन से सख्ती से अपना मिलान करता था, स्वयं को जाँचता था और परमेश्वर के वचनों का अर्थ ठीक-ठीक समझने का प्रयास करता था। यीशु उससे जो कुछ कहता था, उस पर वह गंभीरता से मनन करता था, हर वचन को मन में दृढ़ता से धारण करता था—और इस तरीके से बहुत अच्छे परिणाम मिलते थे। इस तरीके से अभ्यास कर उसने परमेश्वर के वचनों के जरिए स्वयं को जान लिया और वह न केवल मनुष्य की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और कमियों को जान गया, बल्कि वह मनुष्य के सार और प्रकृति को भी जान गया। खुद को वास्तव में जानना यही होता है। परमेश्वर के वचनों से पतरस ने एक ओर अपने बारे में सच्चा ज्ञान हासिल किया और दूसरी ओर उसने देखा परमेश्वर द्वारा व्यक्त धार्मिक स्वभाव, जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, परमेश्वर के अपने कार्य के लिए इरादे और मानवजाति से परमेश्वर की माँगें। इन वचनों से उसने परमेश्वर को सच में जाना, उसका स्वभाव और उसका सार उसे पता चला; जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, वे बातें उसने जानीं और समझीं, साथ ही परमेश्वर की मनोहरता और मनुष्य से परमेश्वर की माँगें भी जानीं। भले ही परमेश्वर ने उस समय उतना नहीं बोला, जितना आज वह बोलता है, किन्तु पतरस में इन पहलुओं में परिणाम उत्पन्न हुआ था। यह एक दुर्लभ और बहुमूल्य चीज थी। पतरस सैकड़ों परीक्षणों से गुजरा; उसका कष्ट सहना व्यर्थ नहीं गया। न केवल उसने परमेश्वर के वचनों और कार्यों से स्‍वयं को जाना बल्कि उसने परमेश्वर को भी जान लिया। इसके साथ ही, परमेश्वर के वचनों में पतरस ने विशेष रूप से मनुष्य से परमेश्वर की माँगों पर और उन पहलुओं पर ध्यान दिया जिनमें मनुष्य को परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए ताकि वह परमेश्वर के इरादे के अनुसार हो सके, और वह इन बातों में अत्यधिक प्रयास लगाने में समर्थ रहा और उनमें उसे पूरी स्पष्टता प्राप्त हुई। उसके जीवन प्रवेश के लिए यह अत्‍यंत लाभकारी था। परमेश्वर के वचनों का चाहे कोई भी पहलू हो, अगर वे वचन जीवन के रूप में कार्य करने योग्य थे और सत्य थे, तो पतरस उन्हें अपने हृदय में उकेर लेता था, जहाँ वह अक्सर उन पर विचार करता और उन्हें समझता था। यीशु के वचनों को सुनकर, वह उन्‍हें अपने हृदय में उतार सका, जिससे पता चलता है कि उसका ध्‍यान विशेष रूप से परमेश्वर के वचनों पर ही था, और अंत में उसने वास्‍तव में परिणाम प्राप्‍त कर लिए। अर्थात्, वह परमेश्वर के वचनों को कुशलतापूर्वक अभ्यास में ला सका, वह सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य सटीक ढंग से कर सका, वह पूरी तरह परमेश्वर की इच्छाओं के अनुसार कार्य कर सका और अपने निजी मतों और कल्पनाओं का त्याग कर सका। इस तरीके से पतरस ने परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया। पतरस की सेवा परमेश्वर के इरादों के अनुसार मुख्यतः इसीलिए थी क्‍योंकि उसने ऐसा किया था।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

353. अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्रेम परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उन्हें उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूर्ण समर्पण कर सकते हो, उसके इरादों के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो और देह के लिए, परिवार के लिए और अपनी इच्छाओं के लिए काम नहीं करते हो, बल्कि परमेश्वर के घर के हितों के लिए काम करते हो, परमेश्वर के वचनों को हर चीज में अपने सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो, तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और परिप्रेक्ष्य सब सही होंगे और तब तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर की उपस्थिति में उसकी स्वीकृति प्राप्त करता है। परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके प्रति अनन्य हैं; वह उन लोगों को पसंद करता है जो केवल उसके प्रति वफादार हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, वे वो लोग हैं जो उसके प्रति आधे मन के हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है, जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्रेम करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है, जो धोखा देने के लिए वाक्पटु और लच्छेदार शब्दों का उपयोग करते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रति वास्तव में समर्पित नहीं हैं या जिन्होंने वास्तव में उसके प्रति समर्पण नहीं किया है, वे प्रकृति से अत्यधिक विद्रोही और अत्यधिक अभिमानी हैं। खासकर जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में समर्पित नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं, वे अपना पूरा अस्तित्व उसे समर्पित कर देते हैं और खुद को उसके सामने रख देते हैं—वे उसके सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण कर पाते हैं, उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते और उन्हें अपने अस्तित्व की नींव के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, और उसके वचनों में जिन हिस्सों का अभ्यास किया जाना है उनकी गंभीरता से खोज कर सकते हैं। ऐसे लोग ही होते हैं, जो वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं। अगर तुम इस तरह अभ्यास करोगे, तो यह तुम्हारे जीवन के लिए लाभदायक होगा। उसके वचनों को खाने और पीने के माध्यम से तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों का ज्ञान पा सकते हो, जीवन की अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हो और अपनी कमियों की भरपाई कर सकते हो, ताकि तुम्हारा जीवन स्वभाव रूपांतरित हो जाएगा। यह परमेश्वर के इरादे पूरे करेगा। अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, अगर तुम देह को संतुष्ट नहीं करते, बल्कि उसके इरादे पूरे करते हो, तो इससे तुम उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके होगे। परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने का अर्थ है कि तुम अपना कर्तव्य निभा सकते हो और परमेश्वर के कार्य की जरूरतें पूरी कर सकते हो। केवल इस प्रकार के व्यावहारिक कार्यों को ही उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना कहा जा सकता है। अगर तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हो, तो तुममें सत्य होगा। यह वास्तविकता में प्रवेश करने की शुरुआत है; तुम्हें पहले यह प्रशिक्षण लेना चाहिए और केवल उसके बाद ही तुम गहरी वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं

354. परमेश्वर व्यावहारिक परमेश्वर है : उसका समस्त कार्य व्यावहारिक है, उसके द्वारा कहे जाने वाले सभी वचन व्यावहारिक हैं, और उसके द्वारा व्यक्त किए जाने वाले सभी सत्य व्यावहारिक हैं। हर वह चीज, जो उसका वचन नहीं है, खोखली, अस्तित्वहीन है और टिकती नहीं है। आज पवित्र आत्मा लोगों का मार्गदर्शन करके उन्हें परमेश्वर के वचनों में प्रवेश कराता है। यदि लोगों को वास्तविकता में प्रवेश का प्रयास करना है, तो उन्हें वास्तविकता की खोज करनी होगी, वास्तविकता को जानना होगा, उसके बाद वास्तविकता का अनुभव करना होगा और वास्तविकता को जीना होगा। लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उतना ही अधिक वे यह भेद पहचानने में समर्थ होते हैं कि दूसरों के शब्द वास्तविक हैं या नहीं; लोग वास्तविकता को जितना अधिक जानते हैं, उनमें धारणाएँ उतनी ही कम होती हैं; लोग वास्तविकता का जितना अधिक अनुभव करते हैं, उतना ही अधिक वे व्यावहारिक परमेश्वर के कर्मों को जानते हैं, और उनके लिए अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त होना उतना ही अधिक आसान होता है; लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे उतना ही अधिक परमेश्वर को जानते हैं, और इस प्रकार उतना ही अधिक देह से घृणा और सत्य से प्रेम करते हैं; और लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होती है, वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के उतना ही अधिक निकट होते हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाते हैं, वे वो लोग होते हैं जिनमें वास्तविकता होती है, जो वास्तविकता को जानते हैं और जो वास्तविकता का अनुभव करके परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को जान गए हैं। तुम परमेश्वर के साथ व्यावहारिक ढंग से जितना अधिक सहयोग करोगे और अपने शरीर को जितना अधिक अनुशासित करोगे, उतना ही अधिक तुम पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करोगे, उतना ही अधिक तुम वास्तविकता को प्राप्त करोगे, और उतना ही अधिक तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाओगे, और इस तरह तुम्हें परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों का उतना ही अधिक ज्ञान होगा। यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश में रह पाओ, तो तुम्हें अभ्यास का वर्तमान मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा, और तुम अतीत की धार्मिक धारणाओं एवं पुराने अभ्यासों से अपने आपको अलग करने में अधिक सक्षम हो जाओगे। आज असलियत पर ध्यान केंद्रित है : लोगों के पास जितनी अधिक वास्तविकता होगी, सत्य का उनका ज्ञान उतना ही अधिक स्पष्ट होगा, और परमेश्वर के इरादों की उनकी समझ अधिक बड़ी होगी। वास्तविकता सभी शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर विजय पा सकती है; यह समस्त सैद्धांतिक ज्ञान पर भी विजय पा सकती है और लोग जितना अधिक वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हैं, उतना ही अधिक वे परमेश्वर से सच्चा प्रेम कर पाते हैं और उसके वचनों के लिए लालायित रहते हैं। यदि तुम हमेशा वास्तविकता पर ध्यान केंद्रित करते हो, तो तुम्हारा सांसारिक आचरण का फलसफा, धार्मिक धारणाएँ और प्राकृतिक चरित्र परमेश्वर के कार्य के आगे बढ़ने के साथ-साथ स्वाभाविक रूप से समाप्त हो जाएँगे। जो वास्तविकता की खोज नहीं करते, और जिन्हें वास्तविकता का कोई ज्ञान नहीं है, उनके द्वारा अलौकिक चीजों की खोज किए जाने की संभावना है, और वे आसानी से छले जाएँगे। पवित्र आत्मा के पास ऐसे लोगों में कार्य करने का कोई उपाय नहीं है, और इसलिए वे खालीपन महसूस करते हैं, और उनके जीवन का कोई अर्थ नहीं होता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, वास्तविकता को कैसे जानें

355. जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं, और सत्य से प्रेम करने वाले इसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक सत्य उनके पास होता है; वे उसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम उनके पास होता है; और वे जितना अधिक उसे अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर उन्हें आशीष देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें ठीक वैसे ही उत्तरोत्तर उसे देखने में सक्षम बनाएगा, जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों पर व्यावहारिक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें बनाई हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को अपना प्रेम प्रदान करने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : “क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और कदम उठाते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।” यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन में टटोलना और तलाशना होगा और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना होगा। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। शायद तुम परमेश्वर को इस बार संतुष्ट न करो, क्योंकि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें थोड़ा प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें बना सकता है, उसने देह धारण किया है ताकि लोग उसे वास्तविक और मूर्त तरीके से देख सकें और वह उनके साथ वास्तविक और मूर्त तरीके से जुड़ता है; तुम देखोगे कि वह मनुष्य के बीच चलने में सक्षम है और उसका आत्मा वास्तविक जीवन में लोगों को पूर्ण बना सकता है; तुम देखोगे कि यह सब लोगों को उसकी मनोहरता देखने और उसके अनुशासन, उसकी ताड़ना और उसके आशीषों का अनुभव करने की अनुमति देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम धिक्कार और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें त्याग देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा त्यागे जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हें इसका बोध होता है, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

356. परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में लोगों का सबसे बड़ा दोष यह है कि उनका विश्वास केवल शाब्दिक होता है, और परमेश्वर उनके रोजमर्रा के जीवन से पूरी तरह अनुपस्थित होता है। दरअसल सभी लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं होता। परमेश्वर से बहुत सारी प्रार्थनाएँ लोग अपने मुख से तो करते हैं, किन्तु उनके हृदय में परमेश्वर के लिए जगह बहुत थोड़ी होती है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य का परीक्षण करता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य का परीक्षण करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और इन परीक्षणों से गुजरते हुए स्वयं को पहचान ले। अन्यथा, मानवजाति प्रधान दूत की वंशज बन जाएगी, और निरंतर और भ्रष्ट होती जाएगी। परमेश्वर में अपने विश्वास की प्रक्रिया में, हर व्यक्ति अपने बहुत सारे व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ता चलता है, जैसे-जैसे वह परमेश्वर के निरंतर शुद्धिकरण से गुजरता है। अन्यथा, परमेश्वर के पास किसी भी व्यक्ति को उपयोग में लाने का कोई रास्ता नहीं होगा और न ही वह लोगों में अपेक्षित कार्य ही कर पाएगा। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। केवल तभी परमेश्वर अपना जीवन मनुष्य में डाल सकता है और सिर्फ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग कहते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, यदि तुम्हारे पास सिर्फ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम केवल स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो, और सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते, तो यह भी एक प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं है, और यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर का नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके ही उसे जाना जा सकता है : यह अंतिम उद्देश्य है और यह मनुष्य के अनुसरण का अंतिम लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने का प्रयास करना चाहिए, ताकि तुम्हारे अभ्यास में उन्हें साकार किया जा सके। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। यदि तुम इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप माना जाएगा। इस मार्ग पर बहुत-से लोग बहुत ज्ञान की बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय उनकी आँखें आँसुओं से भर आती हैं और वे इस बात से घृणा करते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बेकार कर दिया और बुढ़ापे तक जीना व्यर्थ हो गया। वे केवल धर्म-सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते और न ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं; वे बस इधर-उधर दौड़ते रहते हैं, अपने काम में काफी व्यस्त दिखते हैं और केवल मृत्यु के कगार पर ही वे अंततः देख पाते हैं कि उनके पास सच्ची गवाही नहीं है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य का अनुसरण क्यों नहीं करते जिससे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो या इसे पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में अगर वे थोड़ा-सा भी प्रयास करें तो ऐसे कई मामले हैं जिनमें लोग सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यह केवल इसलिए है क्योंकि लोगों के मन हमेशा भ्रमित रहते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के लिए कार्य नहीं कर सकते, और अपनी देह की खातिर लगातार भाग-दौड़ करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। इसी कारण लोगों को लगातार परेशानियाँ और कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। क्या ये शैतान से आए कष्ट नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? तुम्हें बस झूठी बातों से परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए—तुम्हें वास्तव में अभ्यास करना चाहिए। खुद को धोखा मत दो—ऐसा करने से क्या फायदा? अपनी देह के वास्ते जीकर और प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करके तुम क्या प्राप्त कर लोगे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

357. जो लोग सचमुच में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, ये वे लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार रहते हैं, और सत्य को अभ्यास में लाने को तैयार हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग रह सकते हैं, वे लोग भी हैं जो उसके वचनों को अभ्यास में लाने को तैयार हैं और जो सचमुच सत्य के पक्ष में खड़े हो सकते हैं। जो लोग कुटिल और अधर्मी अभ्यासों में लिप्त होते हैं, उन सभी में सत्य का अभाव होता है, वे सभी परमेश्वर का अनादर करते हैं। जो लोग कलीसिया में कलह में संलग्न रहते हैं, वे शैतान के सेवक हैं, और शैतान के मूर्तरूप हैं। इस प्रकार का व्यक्ति बहुत दुर्भावनापूर्ण होता है। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है और जो सत्य के पक्ष में खड़े होने में असमर्थ होते हैं वे सभी वे लोग हैं जो दुष्ट इरादों को आश्रय देते हैं और सत्य को मलिन करते हैं। वे शैतान के अधिक ठेठ प्रतिनिधि हैं; वे छुटकारे से परे हैं और स्वाभाविक रूप से हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर का घर उन लोगों को बने रहने की अनुमति नहीं देता है जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, और न ही यह उन लोगों को बने रहने की अनुमति देता है जो जानबूझकर कलीसियाओं को ध्वस्त करते हैं। हालाँकि, अभी निष्कासन के कार्य को करने का समय नहीं है; ऐसे लोगों को सिर्फ प्रकट किया जाएगा और अंत में निकाल दिया जाएगा। इन लोगों पर व्यर्थ का कार्य और नहीं किया जाना है; जो शैतान हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े नहीं रह सकते, जबकि जो सत्य की खोज करते हैं, वे सत्य के पक्ष में खड़े रह सकते हैं। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, वे सत्य के वचन को सुनने के अयोग्य हैं और सत्य के लिए गवाही देने के अयोग्य हैं। सत्य बस उनके कानों के लिए नहीं है; बल्कि, यह उन पर निर्देशित है जो इसका अभ्यास करते हैं। इससे पहले कि हर व्यक्ति के परिणाम का खुलासा किया जाए, जो लोग कलीसिया में बाधा डालते हैं और कार्य में गड़बड़ी करते हैं, अभी के लिए उन्हें सबसे पहले किनारे कर दिया जाएगा और अकेला छोड़ दिया जाएगा। एक बार जब कार्य पूरा हो जाएगा, तो इन लोगों को एक-एक करके बेनकाब किया जाएगा और फिर हटा दिया जाएगा। फिलहाल, जबकि सत्य प्रदान किया जा रहा है, तो उनकी उपेक्षा की जाएगी। जब मानवजाति के सामने पूर्ण सत्य प्रकट कर दिया जाएगा, तो लोगों को हटाना शुरू कर दिया जाएगा; यही वह समय होगा जब सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। जिन लोगों में भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जाएँगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये बुरे लोगों का अनुसरण करते हैं, ये बुरे लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे बुरे लोग बुराई प्रकट करते हैं, फिर भी वे अड़ियल बन जाते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य से मुँह मोड़ लेते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं लेकिन विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, बुराई नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो “सम्राटों” की तरह पेश आते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में धकेल रही है? जो लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, अंत में, उन्हें सत्य की वजह से बचा लिया जाएगा और पूर्ण बना दिया जाएगा। जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं, अंत में, वे सत्य की वजह से विनाश को आमंत्रण देंगे। ये वे परिणाम हैं जो उन लोगों की प्रतीक्षा में हैं जो सत्य का अभ्यास करते हैं और जो नहीं करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी

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