10.3 कैसे खुद को जानें और सच्चा पश्चात्ताप पाएँ पर
358. कई हजार सालों की भ्रष्टता के दौरान, सब लोग सुन्न और मंदबुद्धि-वाले हो गए हैं; वे सब परमेश्वर का विरोध करने वाले दुष्ट दानव बन गए हैं, इस हद तक कि परमेश्वर के प्रति उनकी विद्रोहशीलता इतिहास की पुस्तकों में दर्ज की गई है और यहाँ तक कि लोग स्वयं भी अपने विद्रोही व्यवहार का पूरा लेखा-जोखा देने में असमर्थ हैं—क्योंकि वे शैतान द्वारा बहुत गहराई से भ्रष्ट कर दिए गए हैं और शैतान द्वारा रास्ते से इस तरह भटका दिए गए हैं कि वे नहीं जानते कि उन्हें किस ओर जाना है। यहाँ तक कि आज भी, लोग परमेश्वर के साथ विश्वासघात करते हैं। जब वे परमेश्वर को देखते हैं, तो वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं और जब वे परमेश्वर को नहीं देख पाते, तब भी वे उसके साथ विश्वासघात करते हैं। यहाँ तक कि ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के शापों और कोप को देखने के बाद भी उसके साथ विश्वासघात करते हैं। इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य के विवेक ने अपना मूल कार्य खो दिया है और मनुष्य की अंतरात्मा ने भी अपना मूल कार्य खो दिया है। मेरी नजर में, सभी लोग मनुष्य के चोले में जानवर और जहरीले साँप हैं। चाहे वे मेरी आँखों के सामने कितना भी दयनीय दिखने की कोशिश करें, मैं उन पर कभी दया नहीं करूँगा, क्योंकि उन्हें काले और सफेद के बीच के अंतर की बिल्कुल भी समझ नहीं है और उनमें से कोई भी सत्य और असत्य के बीच के अंतर को नहीं समझता है। उनका विवेक इतना सुन्न हो चुका है, फिर भी वे आशीष पाना चाहते हैं; उनकी मानवता इतनी नीच है, फिर भी वे राजाओं की तरह राज करना और ताकत का इस्तेमाल करना चाहते हैं। ऐसे विवेक के साथ वे किसके राजा बन सकते हैं? ऐसी मानवता के साथ वे सिंहासन पर कैसे बैठ सकते हैं? लोग सचमुच बेशर्म हैं! वे ऐसे घृणित लोग हैं जो खुद को अपनी हैसियत से बढ़कर समझते हैं! मेरा सुझाव है कि तुम लोग, जो आशीष पाना चाहते हो, पहले एक आईना ढूँढ़ो और अपना बदसूरत चेहरा देखो। क्या तुममें राजा बनने की योग्यता है? क्या तुम्हारे पास चेहरे की ऐसी विशेषताएँ हैं जो आशीष पा सकने वाले व्यक्ति में होती हैं? तुम्हारे स्वभाव में जरा-सा भी बदलाव नहीं आया है और तुम किसी भी सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाए हो, फिर भी तुम एक सुनहरे कल की कामना करते हो। यह कोरा भ्रम है! मनुष्य, जो ऐसी गंदी भूमि में जन्मा, समाज द्वारा गंभीर हद तक संक्रमित हो गया है, वह सामंती नैतिकता से अनुकूलित कर दिया गया है और उसने “उच्चतर शिक्षा संस्थानों” की शिक्षा प्राप्त की है। पिछड़ी सोच, भ्रष्ट नैतिकता, जीवन को लेकर घटिया दृष्टिकोण, सांसारिक आचरण के घृणित फलसफे, नितांत मूल्यहीन अस्तित्व, नीच रीति-रिवाज और दैनिक जीवन—ये सभी चीजें मनुष्य के हृदय में गंभीर घुसपैठ करती रही हैं, उसकी अंतरात्मा को गंभीरता से नुकसान पहुँचाती और उस पर गंभीर प्रहार करती रही हैं। फलस्वरूप, मनुष्य परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता जा रहा है और उसका अधिकाधिक विरोधी होता जा रहा है। मनुष्य का स्वभाव दिन-प्रतिदिन और अधिक नृशंस हो रहा है और एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के लिए कुछ भी त्याग करता हो, एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति समर्पण करता हो और ऐसा व्यक्ति तो और भी नहीं है जो स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रकटन की खोज करता हो। इसके बजाय, इंसान शैतान की सत्ता में अपने दिल के तृप्त होने तक सुख का अनुसरण करता है और कीचड़ में अपनी देह को भरपूर भ्रष्ट करता है। जो लोग अंधकार में जीते हैं उनमें सत्य सुनने के बाद भी इसका अभ्यास करने की कोई इच्छा नहीं होती है और यह देखने के बाद भी कि परमेश्वर पहले ही प्रकट हो चुका है वे खोजने की ओर उन्मुख नहीं होते हैं। ऐसी भ्रष्ट मानवजाति के पास उद्धार की कोई गुंजाइश कैसे हो सकती है? ऐसी पतित मानवजाति रोशनी में कैसे जी सकती है?
मनुष्य के स्वभाव में बदलाव उसके अपने सार के ज्ञान से और अपनी सोच, प्रकृति और मानसिक दृष्टिकोण में बदलाव के माध्यम से—मूलभूत परिवर्तनों से शुरू होना चाहिए। केवल इसी ढंग से मनुष्य के स्वभाव में सच्चे बदलाव प्राप्त किए जा सकेंगे। मनुष्य में उत्पन्न होने वाले भ्रष्ट स्वभावों का मूल कारण शैतान का गुमराह करना, भ्रष्ट करना और जहर देना है। मनुष्य को शैतान द्वारा बाँधा और नियंत्रित किया गया है, और उसकी सोच, नैतिकता, अंतर्दृष्टि और विवेक शैतान द्वारा सब बुरी तरह नष्ट किए जा चुके हैं। शैतान ने इंसान की मूलभूत चीजों को भ्रष्ट कर दिया है, और वे बिल्कुल भी वैसी नहीं हैं जैसा परमेश्वर ने मूल रूप से उन्हें बनाया था, ठीक इसी वजह से मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है और सत्य को नहीं स्वीकार पाता। इसलिए मनुष्य के स्वभाव में बदलाव लाने के लिए सबसे पहले जो किया जाना चाहिए वह है उसकी सोच, अंतर्दृष्टि और विवेक के संदर्भ में परमेश्वर के बारे में और सत्य के बारे में उसके ज्ञान में बदलाव लाना। जो लोग सर्वाधिक गहराई तक भ्रष्ट स्थानों में जन्मे हैं, वे इस बारे में और भी अधिक अज्ञानी हैं कि परमेश्वर क्या है या परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है। लोग जितने अधिक भ्रष्ट होते हैं, वे उतना ही कम परमेश्वर के अस्तित्व के बारे में जानते हैं, और उनका विवेक और अंतर्दृष्टि उतनी ही खराब होती है। परमेश्वर के प्रति मनुष्य के विरोध और उसकी विद्रोहशीलता का मूल कारण शैतान द्वारा उसकी भ्रष्टता है। शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिए जाने के कारण मनुष्य का जमीर सुन्न हो गया है, वह नैतिक रूप से भ्रष्ट हो गया है, उसके विचार पतित हो गए हैं और उसका मानसिक दृष्टिकोण पिछड़ा हुआ है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने से पहले मनुष्य शुरू में परमेश्वर के प्रति समर्पण करता था और उसके वचन सुनने के बाद उनके प्रति समर्पण करता था। वह शुरुआत में सही-सलामत विवेक और जमीर वाला और सामान्य मानवता वाला था। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य का मूल विवेक, जमीर और मानवता—ये सब सुन्न पड़ गए और शैतान द्वारा बिगाड़ दिए गए। इस प्रकार, उसने परमेश्वर के प्रति अपना समर्पण और प्रेम खो दिया है। मनुष्य का विवेक असामान्य हो गया है, उसका स्वभाव पशु के समान हो गया है और परमेश्वर के खिलाफ उसकी विद्रोहशीलता लगातार बढ़ती जा रही है और अधिक गंभीर होती जा रही है। फिर भी मनुष्य इसे न तो जानता है और न ही समझता है, बस लगातार विरोध और विद्रोह करता रहता है। मनुष्य के स्वभाव के खुलासे उसके विवेक, अंतर्दृष्टि और जमीर की अभिव्यक्तियाँ हैं। क्योंकि उसका विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि सही-सलामत नहीं हैं और उसका जमीर अत्यंत सुन्न पड़ गया है, इसलिए उसका स्वभाव परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही है। यदि मनुष्य के विवेक और उसकी अंतर्दृष्टि में बदलाव नहीं हो सकता है तो उसके स्वभाव में बदलाव होने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता, न ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने का कोई प्रश्न उठता है। यदि मनुष्य का विवेक सही-सलामत नहीं है तो वह परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकता है और परमेश्वर के उपयोग के लिए अनुपयुक्त है। “सामान्य विवेक” का अर्थ है परमेश्वर के प्रति समर्पण करना और वफादार होना, परमेश्वर के लिए लालायित रहना, परमेश्वर के प्रति एकचित्त होना और परमेश्वर के प्रति अंतरात्मा रखना। इसका अर्थ है परमेश्वर के साथ एकदिल और एकमन होना और जानबूझकर परमेश्वर का विरोध न करना। असामान्य विवेक का होना ऐसा नहीं है। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य ने परमेश्वर के बारे में धारणाएँ बना ली हैं और उसमें परमेश्वर के लिए कोई निष्ठा या तड़प नहीं है, परमेश्वर के प्रति जमीर होने की तो बात ही छोड़ो। मनुष्य जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करता है, उसकी आलोचना करता है और इसके अलावा, उसकी पीठ पीछे उस पर अपशब्दों की बौछार करता है। यह अच्छी तरह से जानते हुए भी कि वह परमेश्वर है, मनुष्य उसकी पीठ पीछे उसकी आलोचना करता है; मनुष्य परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का कोई इरादा नहीं रखता, बल्कि केवल परमेश्वर से माँगें और अनुरोध ही करता रहता है। ऐसे लोग—जिनका विवेक असामान्य होता है—अपने घृणित व्यवहार को जानने या अपने विद्रोह के कृत्यों पर पछताने में अक्षम होते हैं। यदि लोग अपने आप को जानने में सक्षम हैं, तो उन्होंने अपना विवेक थोड़ा-सा पुनः प्राप्त कर लिया है; लोग जितना अधिक परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही होते हैं और फिर भी अपने आप को नहीं जानते हैं, वे उतने ही कम सही-सलामत विवेक वाले होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, स्वभाव में बदलाव के बिना होना परमेश्वर के साथ शत्रुता रखना है
359. इससे पहले कि लोग परमेश्वर के कार्य का अनुभव करें और सत्य को समझें, शैतान की प्रकृति नियंत्रण सँभाल लेती है और उन पर भीतर से प्रभुत्व जमाती है। उस प्रकृति में विशिष्ट रूप से क्या शामिल होता है? उदाहरण के लिए, तुम स्वार्थी क्यों हो? तुम अपने रुतबे की रक्षा क्यों करते हो? तुम अपनी भावनाओं से इतने प्रभावित क्यों होते हो? तुम उन अधार्मिक और बुरी चीजों को क्यों पसंद करते हो? तुम्हें ऐसी चीजें पसंद आने का आधार क्या है? ये चीजें कहाँ से आती हैं? तुम इन्हें पसंद और स्वीकार क्यों करते हो? अब तक, तुम सब लोगों ने यह समझ लिया है : मुख्य कारण यह है कि मनुष्य के भीतर शैतान के जहर भरे हैं। तो शैतान के जहर क्या हैं? इन्हें कैसे व्यक्त किया जा सकता है? उदाहरण के लिए, यदि तुम पूछते हो, “लोगों को कैसे जीना चाहिए? लोगों को किसलिए जीना चाहिए?” तो सभी जवाब देंगे, “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए।” बस यह अकेला वाक्यांश समस्या की जड़ को व्यक्त करता है। शैतान का फलसफा और तर्क लोगों का जीवन बन गए हैं। लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करें, वास्तव में वे यह अपने लिए ही करते हैं—और इसलिए वे सभी अपने लिए जीते हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए”—यही मनुष्य का जीवन-दर्शन है, और इंसानी प्रकृति का भी प्रतिनिधित्व करता है। ये शब्द पहले ही भ्रष्ट इंसान की प्रकृति बन गए हैं, और वे भ्रष्ट इंसान की शैतानी प्रकृति की सच्ची तस्वीर हैं। यह शैतानी प्रकृति पूरी तरह से भ्रष्ट मानवजाति के अस्तित्व का आधार बन चुकी है। कई हजार सालों से वर्तमान दिन तक भ्रष्ट मानवजाति ने शैतान के इस जहर के अनुसार जीवन जिया है। शैतान का हर काम अपनी आकांक्षाओं, महत्वाकांक्षाओं और उद्देश्यों के लिए होता है। वह परमेश्वर से आगे जाना चाहता है, परमेश्वर से मुक्त होना चाहता है और परमेश्वर द्वारा रची गई सभी चीजों पर नियंत्रण पाना चाहता है। आज लोग शैतान द्वारा इस हद तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं। उन सभी में शैतानी प्रकृति है, उनमें परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति होती है और वे अपने भाग्य का नियंत्रण अपने हाथों में रखना चाहते हैं; वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का विरोध करने की कोशिश करते हैं। उनकी महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ पहले से ही बिल्कुल शैतान की महत्वाकांक्षाओं और आकांक्षाओं जैसी हैं। इसलिए, मनुष्यों की प्रकृति शैतान की प्रकृति है। वास्तव में, लोगों के बहुत-से नीति-वाक्य और सूक्तियाँ मानव प्रकृति को दर्शाती हैं और मनुष्य के भ्रष्ट सार को प्रतिबिंबित करती हैं। लोग जो चीजें चुनते हैं वे उनकी अपनी पसंद को दर्शाती हैं और वे सभी लोगों के स्वभावों और अनुसरणों का प्रतिनिधित्व करती हैं। इंसान जो कुछ कहता और करता है, उसका भेष कितना भी बदला हुआ क्यों न हो, यह भेष उसकी प्रकृति नहीं छिपा सकता। जैसे, फरीसी आमतौर पर बहुत अच्छा उपदेश देते थे, लेकिन जब उन्होंने यीशु द्वारा व्यक्त धर्मोपदेश और सत्य सुने, तो उन्हें स्वीकारने के बजाय उनकी निंदा करने लगे। इसने फरीसियों के सत्य से विमुख होने और घृणा करने वाले प्रकृति सार को उजागर कर दिया। कुछ लोग बहुत अच्छा बोलते हैं और खुद को बहुत अच्छे से छिपा लेते हैं, लेकिन जब अन्य लोग कुछ समय के लिए उनसे जुड़ते हैं, तो वे जान जाते हैं कि वे लोग प्रकृति में अत्यंत धोखेबाज हैं और ज़रा भी ईमानदार नहीं हैं। लंबे समय तक उन लोगों के साथ जुड़ने के बाद, उन्हें उनके प्रकृति सार का पता चल जाता है। अंत में, वे यह निष्कर्ष निकालते हैं : वे लोग कभी एक शब्द भी सच नहीं बोलते और वे धोखेबाज हैं। यह कथन उन लोगों की प्रकृति को दर्शाता है और यह उनके प्रकृति सार का सर्वोत्तम चित्रण और सबूत है। सांसारिक आचरण का उनका फलसफा है किसी को सच न बताना, और साथ ही किसी पर विश्वास न करना। मनुष्य की शैतानी प्रकृति बड़ी मात्रा में शैतान के फलसफों और विषों से युक्त है। कभी-कभी तुम खुद भी उनसे अनजान होते हो। यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुम शैतान के स्वभाव का भेद नहीं पहचान सकते। और फिर भी, तुम हर दिन हर मिनट शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो और तुम सोचते हो कि यह काफी सही और उचित है, यह बिल्कुल भी गलत नहीं है। यह दिखाने के लिए पर्याप्त है कि जब तुम शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हो, तो तुम शैतान के स्वभाव के अनुसार जी रहे हो, और यह कि शैतान के फलसफे और स्वभाव तुम्हारी प्रकृति बन गए हैं। अक्सर, लोग शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं लेकिन फिर भी इसे बहुत अच्छा मानते हैं और उनमें पश्चात्ताप की कोई भावना नहीं होती है। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग सत्य को नहीं समझते। इसलिए, वे हर मोड़ पर लगातार अपनी शैतानी प्रकृति प्रकट कर रहे हैं और वे हर मोड़ पर लगातार शैतान के फलसफों के अनुसार जी रहे हैं। शैतान की प्रकृति मनुष्य का जीवन है और यह मनुष्य का प्रकृति सार है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें
360. तुम मनुष्य की प्रकृति को कैसे समझते हैं? सबसे महत्वपूर्ण बात इसे मनुष्य की विश्वदृष्टि, जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों के परिप्रेक्ष्य से सूक्ष्मता से पहचानना है। जो लोग दानवों के हैं वे स्वयं के लिए जीते हैं। उनके जीवन के दृष्टिकोण और नीति-वाक्य मुख्यतः शैतान की कहावतों से आते हैं, जैसे कि “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं,” और ऐसी अन्य भ्रांतियाँ। उन दानव राजाओं, महान हस्तियों और दार्शनिकों द्वारा बोले गए शब्द मनुष्य का जीवन बन गए हैं। विशेष रूप से, चीनी लोगों द्वारा “ऋषि” के रूप में प्रचारित किए जाने वाले कन्फ़्यूशियस के अधिकांश वचन, मनुष्य का जीवन बन गए हैं। ये बौद्ध धर्म और ताओवाद की मशहूर कहावतें, और प्रसिद्ध व्यक्तियों द्वारा अक्सर दोहराई गई अनुकरणीय कहावतें हैं। ये सभी शैतान के फ़लसफों और शैतान की प्रकृति का सारांश हैं। वे शैतान की प्रकृति के सबसे अच्छे उदाहरण और स्पष्टीकरण भी हैं। ये विष, जिन्हें मनुष्य के हृदय में बैठा दिया गया है, सब शैतान से आते हैं, और उनमें से एक भी परमेश्वर से नहीं आता है। ये शैतानी वचन भी परमेश्वर के वचन के बिल्कुल विरुद्ध हैं। यह पूरी तरह से स्पष्ट है कि सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता परमेश्वर से आती है, और सभी नकारात्मक चीजें जो मनुष्य में विष भरती हैं, वे शैतान से आती हैं। इसलिए, तुम किसी व्यक्ति की प्रकृति को और वह किससे संबंधित है इस बात को उसके जीवन के दृष्टिकोण और मूल्यों को देखकर जान सकते हो। शैतान राष्ट्रीय सरकारों और प्रसिद्ध एवं महान व्यक्तियों की शिक्षा और गहरे प्रभाव के माध्यम से लोगों को भ्रष्ट करता है। उनके शैतानी शब्द मनुष्य का जीवन और प्रकृति बन गए हैं। “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए” एक प्रसिद्ध शैतानी कथन है जो हर किसी में रिस चुका है और यह उसका जीवन बन गया है। सांसारिक आचरण के फलसफों के कुछ अन्य शब्द हैं जो इसी तरह के हैं। शैतान लोगों को शिक्षित करने, गुमराह करने और भ्रष्ट करने के लिए प्रत्येक देश की पारंपरिक संस्कृति का इस्तेमाल करता है, मानवजाति को विनाश की अतल खाई में गिराता है और अंत में, परमेश्वर द्वारा इसे नष्ट करा देता है क्योंकि वह शैतान की सेवा करती है और परमेश्वर का प्रतिरोध करती है। कुछ लोग समाज में दशकों से लोक अधिकारी रहे हैं। कल्पना करो कि तुम उनसे यह सवाल पूछते हो: "यह देखते हुए कि तुम एक अधिकारी बन पाए और तुम्हारा इतना सुगम करियर हो सका तो वे कौन-सी मशहूर कहावतें हैं जिनके बल पर तुमने यह हासिल किया?" वे शायद कहेंगे, "मैं तो बस एक ही बात समझता हूँ: 'अधिकारी उपहार देने वालों के लिए मुश्किलें खड़ी नहीं करते, और जो चापलूसी नहीं करते हैं वे कुछ भी हासिल नहीं करते हैं।'" उन्होंने अधिकारी बनने के लिए इसी शैतानी फलसफे का सहारा लिया। क्या ये शब्द ऐसे लोगों की प्रकृति के परिचायक नहीं हैं? पद हासिल करने के लिए गलत हथकंडों का सहारा लेना उनकी प्रकृति बन गया है। एक ऐसा अधिकारी बनना जो सबसे अलग दिखे और तेजी से तरक्की पाए, यही उनका लक्ष्य है। लोगों के जीवन, क्रियाकलापों और स्व-आचरण में शैतान के और भी बहुत-से ज़हर हैं। उदाहरण के लिए, उनके सांसारिक आचरण के फलसफे, उनके काम करने के हथकंडे और उनके सूत्रवाक्य, ये सभी बड़े लाल अजगर के ज़हर से भरे हैं, और ये सब शैतान से आते हैं। इस प्रकार, वे सभी चीजें जो लोगों की हड्डियों और खून में समाई हुई हैं, शैतान की हैं। वे सभी अधिकारी, जो शक्ति रखते हैं, और जो कामयाब हैं, उन सभी के पास सफलता के अपने रास्ते और रहस्य होते हैं। क्या ऐसे रहस्य उनकी प्रकृति के पूर्ण परिचायक नहीं हैं? वे दुनिया में बड़े-बड़े उपक्रमों को कार्यान्वित करने में सक्षम हैं, और कोई भी उनके पीछे की साजिशों और दुरभिसंधियों की असलियत को नहीं देख पाता है। इससे पता चलता है कि उनकी प्रकृति कितनी कपटी और दुर्भावनापूर्ण है। शैतान ने मनुष्य को गंभीर ढंग से भ्रष्ट कर दिया है। शैतान का विष हर व्यक्ति के रक्त में बहता है, और यह कहा जा सकता है कि मनुष्य की प्रकृति भ्रष्ट, दुष्ट, प्रतिरोधात्मक और परमेश्वर के विरोध में है, शैतान के फलसफों और विषों से भरी हुई और उनमें डूबी हुई है। यह पूरी तरह शैतान का प्रकृति-सार बन गया है। इसी कारण लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। अगर लोगों की प्रकृति का गहन-विश्लेषण इस तरह किया जा सके, तो वे आसानी से खुद को जानने की स्थिति में आ सकते हैं।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें
361. तुम मानव प्रकृति को कैसे समझते हो? अपनी प्रकृति को समझने का वास्तविक अर्थ है अपनी आत्मा की गहराई में मौजूद चीजों का विश्लेषण करना; उन चीजों का विश्लेषण करना जो तुम्हारे जीवन में हैं उन शैतानी तर्क और शैतान के फलसफों का विश्लेषण करना जिनके अनुसार तुम जीते आ रहे हो—जो कि शैतान का जीवन है जो तुम जी रहे हो। केवल अपने आत्मा में गहरे मौजूद चीजों को बाहर निकाल कर ही तुम अपनी प्रकृति को समझ सकते हो। इन चीजों को कैसे निकाला जा सकता है? मात्र एक या दो मामलों द्वारा, उन्हें निकाला और विश्लेषित नहीं किया जा सकता। कई बार काम खत्म कर लेने के बाद भी तुम्हारे पास कोई समझ नहीं होती। थोड़ी-सी भी पहचान या समझ प्राप्त कर सकने में तीन या पाँच वर्ष लग सकते हैं। इसलिए, बहुत-सी परिस्थितियों में तुम्हें आत्म-चिंतन कर खुद को जानना चाहिए। कोई परिणाम देखने के लिए तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार गहराई तक खोदना चाहिए और आत्म-विश्लेषण करना चाहिए। जैसे-जैसे सत्य की तुम्हारी समझ ज्यादा से ज्यादा गहरी होती जाएगी, तुम आत्मचिंतन और आत्मज्ञान के जरिये धीरे-धीरे अपने प्रकृति सार को जान जाओगे।
अपनी प्रकृति जानने के लिए, तुम्हें कुछ चीजों के द्वारा इसकी समझ हासिल करनी चाहिए : सबसे पहले, तुम्हें इस बात की स्पष्ट समझ होनी चाहिए कि तुम्हें क्या पसंद है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि तुम क्या खाना या पहनना पसंद करते हो, बल्कि इसका मतलब है कि तुम किस तरह की चीजों का आनन्द लेते हो, किन चीजों से तुम ईर्ष्या करते हो, किन चीजों की तुम आराधना करते हो, किन चीजों का तुम अनुसरण करते हो, और किन चीजों की ओर तुम अपने हृदय में ध्यान देते हो, किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आने का तुम आनन्द लेते हो, और किस प्रकार के लोगों को तुम पसंद करते हो और अपना आदर्श मानते हो। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग ऐसे लोगों को पसंद करते हैं जो महान हों, जो अपनी बोल-चाल में शानदार हों या उन लोगों को पसंद करते हैं जो चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं या उन्हें जो कि दिखावा करते हैं। यह पूर्वोक्त उस बारे में है कि वे कैसे लोगों के साथ बातचीत करना पसंद करते हैं। जहाँ तक इसकी बात है कि लोग किन चीजों को पसंद करते हैं, इसमें शामिल है ऐसी कुछ चीजों को करने के लिए तैयार होना जिन्हें करना आसान है, उन चीजों को करने में आनन्द पाना जिन्हें दूसरे अच्छा मानते हैं, और जिन्हें लोग स्वीकृति देंगे और जिनकी तारीफ करेंगे। लोगों की प्रकृति में, जिन चीजों को वे पसंद करते हैं, उनकी एक जैसी विशिष्टता होती है। अर्थात्, वे उन लोगों, घटनाओं, और चीजों को पसंद करते हैं जिनके बाहरी दिखावे की वजह से अन्य लोग उनसे ईर्ष्या करते हैं, वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो सुंदर और शानदार दिखते हैं, और वे उन लोगों, घटनाओं और चीजों को पसंद करते हैं जो लोगों से अपनी आराधना करवाते हैं। ये चीजें जिन्हें लोग अत्यधिक पसंद करते हैं वे बढ़िया, चमकदार, भव्य और आलीशान होती हैं। सभी लोग इन चीजों की आराधना करते हैं। यह देखा जा सकता है कि लोगों में कोई सच्चाई नहीं होती है, न ही उनमें वास्तविक मानव की सदृशता होती है। इन चीजों की आराधना करने का लेशमात्र भी महत्व नहीं है, मगर लोग तब भी इन चीजों को पसंद करते हैं। ये चीजें, जिन्हें लोग पसंद करते हैं, उन लोगों को विशेष रूप से अच्छी लगती प्रतीत होती हैं, जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, और ये वही चीजें होती हैं जिनका लोग विशेष रूप से अनुसरण करने के इच्छुक होते हैं। ... जिन चीजों का लोग अनुसरण और लालसा करते हैं, वे सांसारिक प्रवृत्तियों से संबंधित होती हैं, ये चीजें शैतान और दुष्टों की होती हैं, परमेश्वर उनसे घृणा करता है, वे सत्य से रहित होती हैं। जिन चीजों के लिए लोग तरसते हैं, वे उनकी प्रकृति सार का पता लगाने की अनुमति देती हैं। लोगों की पसंद उनके कपड़े पहनने के तरीके में देखी जा सकती है। कुछ लोग ध्यान खींचने वाले, रंगीन कपड़े या विचित्र पोशाक पहनने के इच्छुक होते हैं। वे ऐसी चीजें पहनने को तैयार होते हैं जो पहले किसी और ने नहीं पहनी होतीं, और वे ऐसी चीजें पसंद करते हैं जो विपरीत लिंग को आकर्षित कर सकें। उनका ये कपड़े और चीजें पहनना उनके जीवन और दिल की गहराइयों में इन चीजों के लिए उनकी प्राथमिकता दर्शाता है। जो चीजें वे पसंद करते हैं, वे गरिमापूर्ण या शालीन नहीं होतीं। वे सामान्य व्यक्ति द्वारा पसंद की जाने वाली चीजें नहीं होतीं। इन चीजों के लिए उनके लगाव में अधार्मिकता है। उनका दृष्टिकोण बिल्कुल वैसा ही है, जैसा सांसारिक लोगों का होता है। व्यक्ति उनमें ऐसा कुछ भी नहीं देख पाता जिनमें सत्य से जरा भी कोई सामंजस्य हो। इसलिए, तुम क्या पसंद करते हो, तुम किस पर ध्यान केंद्रित करते हो, तुम किसकी आराधना करते हो, तुम किससे ईर्ष्या करते हो, और रोज तुम अपने दिल में क्या सोचते हो, ये सब तुम्हारी अपनी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करती हैं। इन सांसारिक चीजों से तुम्हारा अनुराग यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि तुम्हारी प्रकृति अधार्मिकता की शौकीन है, और गंभीर परिस्थितियों में तुम्हारी प्रकृति दुष्टतापूर्ण और असाध्य है। तुम्हें इस तरह अपनी प्रकृति का विश्लेषण करना चाहिए; यह जाँचो कि तुम क्या पसंद करते हो और तुम अपने जीवन में क्या त्यागते हो। तुम कुछ समय के लिए किसी के प्रति अच्छे हो सकते हो, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि तुम उसके चाहने वाले हो। जिसके तुम वाकई शौकीन हो, वह ठीक वो है जो तुम्हारी प्रकृति में है; भले ही तुम्हारी हड्डियाँ टूट गयी हों, तुम फिर भी उसका आनंद लोगे और कभी भी इसे त्याग नहीं पाओगे। इसे बदलना आसान नहीं है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए
362. स्वभाव में बदलाव लाने की कुंजी अपनी प्रकृति को जानना है और यह परमेश्वर के प्रकाशन के अनुसार ही होना चाहिए। केवल परमेश्वर के वचनों में ही व्यक्ति अपनी घिनौनी प्रकृति, अपनी प्रकृति के भीतर छिपे शैतान के विभिन्न विषों, अपनी मूर्खता और अज्ञानता, और अपनी प्रकृति के कमजोर और नकारात्मक तत्वों को जान सकता है। इन बातों को तुम्हारे पूरी तरह से जानने के बाद, और तुम्हारे सच में खुद से नफरत करने, देह से विद्रोह करने, परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में लगे रहने, स्वभाव में बदलाव लाने के लिए अपना कर्तव्य निभाते हुए सत्य के अनुसरण में लगे रहने और सच में परमेश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्ति बनने में सक्षम हो जाने के बाद, तुम पतरस के मार्ग पर चल पड़े होगे। परमेश्वर के अनुग्रह या पवित्रात्मा से मिलने वाले प्रबोधन और मार्गदर्शन के बिना, इस मार्ग पर चलना मुश्किल होगा, क्योंकि सत्य के बिना, लोग खुद से विद्रोह नहीं कर सकते। पतरस के पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर चलना मुख्य रूप से संकल्प रखने, आस्था रखने और परमेश्वर पर निर्भर रहने पर निर्भर करता है। इसके अलावा, व्यक्ति को पवित्रात्मा के कार्य के प्रति समर्पण करना चाहिए और सभी चीजों में, परमेश्वर के वचनों से कभी भी भटकना नहीं चाहिए। ये वे महत्वपूर्ण पहलू हैं जिनका कभी भी उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए। अपने अनुभवों के दौरान, खुद को जानना बहुत मुश्किल होता है और पवित्रात्मा के कार्य के बिना, कोई परिणाम नहीं मिलेगा। पतरस के मार्ग पर चलने के लिए, व्यक्ति को खुद को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
363. एक ओर, परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान मनुष्य अपनी कमियाँ जान पाता है और देख पाता है कि वह तुच्छ, घृणित और निकृष्ट है, कि उसके पास कुछ नहीं है और वह कुछ नहीं है; तो दूसरी ओर, परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए कुछ परिवेशों का इंतजाम करता है ताकि उनमें मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता का बेहतर अनुभव कर सके। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो इससे उबरना असंभव हो जाता है—यहाँ तक कि यह हृदय-विदारक दुख तक पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उस पर परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, मनुष्य के सार को जानने में सक्षम तो वह बिल्कुल भी नहीं है, और केवल परमेश्वर के न्याय और शोधन दोनों के माध्यम से, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियाँ जान सकता है, और यह जान सकता है कि उसके पास कुछ नहीं है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो
364. आत्म-चिंतन और स्वयं को जानने की कुंजी है : जितना अधिक तुम महसूस करते हो कि तुमने किसी निश्चित क्षेत्र में अच्छा किया है या सही चीज को कर लिया है, और जितना अधिक तुम सोचते हो कि तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सकते हो या तुम कुछ क्षेत्रों में शेखी बघारने में सक्षम हो, उतना ही अधिक उन क्षेत्रों में अपने आप को जानना उचित है, और यह देखने के लिए कि तुममें कौन-सी अशुद्धियाँ हैं और साथ ही तुममें कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकती हैं उतना ही अधिक उनमें खोजबीन करना उचित है। आओ, पौलुस का उदाहरण लें। पौलुस अत्यंत जानकार था, प्रचार और काम के दौरान उसने बहुत कष्ट उठाए और बहुत सारे लोग विशेष रूप से उसकी आराधना करते थे। नतीजतन, बहुत सारा काम पूरा करने के बाद, उसने मान लिया कि उसके लिए एक मुकुट पहले ही अलग करके रखा हुआ था। इससे वह गलत राह पर बढ़ते-बढ़ते बहुत दूर चला गया, और अंत में उसे परमेश्वर ने दंडित किया। यदि उसने उस समय आत्म-चिंतन किया होता और अपना गहन-विश्लेषण किया होता, तो उसने वे अहंकारी बातें नहीं कही होतीं जो विवेक से रहित थीं। सुसमाचार का प्रचार करने के अपने समय के दौरान पौलुस ने केवल कार्य करने पर ध्यान केंद्रित किया और सत्य का अनुसरण नहीं किया। पौलुस की पत्रियों से यह देखा जा सकता है कि उसने कभी प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचनों को नहीं खोजा या एकत्र नहीं किया, न ही उसने अपनी पत्रियों में प्रभु यीशु द्वारा बोले गए वचनों का प्रसार किया। जाहिर तौर पर, पौलुस ने कभी प्रभु यीशु के वचनों के भीतर आत्म-चिंतन नहीं किया, न ही उसने प्रभु यीशु के वचनों की बहुमूल्यता को देखा, इसलिए यह कहना कठिन है कि पौलुस को प्रभु यीशु का क्या सच्चा ज्ञान था। पौलुस ने केवल यह सोचा कि वह बाइबल को समझता है और केवल अपनी धारणाओं और कल्पनाओं पर विश्वास किया। उसने सोचा कि जब तक उसके पास कुछ अच्छे अभ्यास हैं और वह कुछ अच्छे व्यवहार प्रदर्शित करता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर द्वारा पुरस्कृत किया जा सकता है। नतीजतन, वह परमेश्वर की सेवा करने और फिर भी उसका विरोध करने के मार्ग पर चल पड़ा। और फिर भी पिछले दो हजार वर्षों से प्रभु के विश्वासी उसका भेद नहीं पहचान पाए हैं। वे नहीं जानते कि पौलुस कौन था या वह किस मार्ग पर चला था। केवल इसलिए कि उसकी पत्रियाँ बाइबल में दर्ज की गई थीं, लोगों ने हमेशा पौलुस की पूजा की है, उसे अपने अनुसरण का लक्ष्य बनाया है और उसे एक ऐसा आदर्श माना है जिसकी वे आकांक्षा करते हैं और जिसके जैसा वे बनना चाहते हैं। नतीजतन, वे सभी जो पौलुस की पूजा और नकल करते हैं, मसीह-विरोधियों के मार्ग पर चल पड़े हैं। पौलुस का मामला परमेश्वर के चुने हुए लोगों में से प्रत्येक के लिए एक चेतावनी के रूप में कार्य करता है। विशेष रूप से जब हम, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, अपने कर्तव्यों और परमेश्वर की अपनी सेवा में कष्ट सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं और इस प्रकार महसूस करते हैं कि हम समर्पित हैं और हम ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं—ऐसे समय में, हमें उस मार्ग के संबंध में और भी अधिक आत्म-चिंतन करना चाहिए और खुद को समझना चाहिए जिस पर हम चल रहे हैं, जो कि बहुत आवश्यक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यह निर्धारित करोगे कि जिन चीजों को तुम अपनी खूबियाँ मानते हो और जिन चीजों के बारे में तुम्हें लगता है कि तुमने सही तरीके से किया है वे सही हैं और तुम उन पर संदेह नहीं करोगे, उन पर विचार नहीं करोगे या यह गहन-विश्लेषण नहीं करोगे कि क्या उनमें ऐसा कुछ है जो परमेश्वर का विरोध करता है। उदाहरण के लिए, कुछ ऐसे लोग हैं जो खुद को बेहद नेकदिल मानते हैं। वे कभी दूसरों से नफरत या उनका नुकसान नहीं करते, और वे हमेशा ऐसे भाई या बहन की मदद करते हैं जिनका परिवार जरूरतमंद होता है, कहीं ऐसा न हो कि उनकी समस्या अनसुलझी रह जाए। उनके पास बहुत सद्भावना होती है और वे हर किसी की मदद करने की भरसक कोशिश करते हैं। फिर भी वे कभी सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, और उनका कोई जीवन-प्रवेश नहीं होता। ऐसी मदद का परिणाम क्या है? वे अपने जीवन के लिए बाधा बनते हैं। फिर भी वे खुद से काफी प्रसन्न हैं, और उन सबसे बेहद संतुष्ट हैं जो उन्होंने किया है। इतना ही नहीं, वे इसमें बहुत गर्व का अनुभव करते हैं, यह विश्वास करते हुए कि उन्होंने जो कुछ भी किया है, उसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो सत्य के विरुद्ध हो, और यह निश्चित रूप से परमेश्वर के इरादों को पूरा करेगा, और वे परमेश्वर के सच्चे विश्वासी हैं। वे अपनी स्वाभाविक सद्भावना को पूँजी के रूप में देखते हैं, वे इसे सत्य मानकर चलते हैं। वास्तव में, वे जो कुछ भी करते हैं, वह मानवीय भलाई है। वे सत्य का जरा भी अभ्यास नहीं करते, क्योंकि वे यह मनुष्य के सामने करते हैं, परमेश्वर के सामने नहीं, और वे परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य के अनुसार अभ्यास तो बिल्कुल भी नहीं करते। इसलिए, उनका सब किया-धरा व्यर्थ हो जाता है। उनका कोई भी कार्य सत्य या परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं है, वह उसकी इच्छा का पालन तो बिल्कुल भी नहीं है; बल्कि वे मानवीय सद्भावना और अच्छे व्यवहार का उपयोग दूसरों की मदद करने के लिए करते हैं। संक्षेप में, वे अपने कार्यों में परमेश्वर के इरादे नहीं खोजते, न ही वे उसकी अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हैं। परमेश्वर मनुष्य के ऐसे अच्छे व्यवहार को स्वीकृति नहीं देता; परमेश्वर के लिए यह निंदनीय है, और परमेश्वर द्वारा स्मरण किए जाने योग्य नहीं है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने गलत विचारों को जानकर ही खुद को सचमुच बदला जा सकता है
365. अधिकतर लोगों को अपनी बहुत सतही समझ होती है। वे अपनी प्रकृति के भीतर की चीजों को बिल्कुल भी साफ तौर पर नहीं जानते। उन्हें अपने द्वारा प्रकट की जाने वाली कुछ भ्रष्ट दशाओं, अपने द्वारा संभावित रूप से की जाने वाली चीजों या अपनी कमियों की जानकारी होती है और इससे उन्हें लगता है कि वे खुद को जानते हैं। फिर अगर वे कुछ विनियमों का पालन कर लेते हैं, यह सुनिश्चित कर लेते हैं कि वे कुछ क्षेत्रों में गलतियाँ न करें, और कुछ अपराध करने से बच जाते हैं, तो वे सोचने लगते हैं कि परमेश्वर में उनके विश्वास में वास्तविकता है और मान लेते हैं कि वे बचा लिए जाएँगे। यह सिर्फ इंसानी कल्पना है, और कुछ नहीं। अगर तुम उन चीजों का पालन करते हो, तो क्या तुम सच में अपराध करने से बचने में समर्थ हो जाओगे? क्या तुमने सच में अपने स्वभाव में कोई बदलाव प्राप्त कर लिया होगा? क्या तुम सच में एक मानव के समान जी लिए होगे? क्या तुम सच में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे? बिल्कुल नहीं। यह निश्चित है। लोगों के पास परमेश्वर में विश्वास करने का एक ऊँचा मानक अवश्य होना चाहिए : उन्हें अवश्य सत्य प्राप्त करना और अपने जीवन स्वभाव में कुछ बदलाव लाना चाहिए। इसके लिए सबसे पहले जरूरी है कि लोग खुद को जानने की कोशिश करें। अगर किसी व्यक्ति का खुद के बारे में ज्ञान बहुत उथला है, तो इससे कोई भी समस्या कतई हल नहीं होगी और उसका जीवन स्वभाव बिल्कुल नहीं बदलेगा। तुम्हें खुद को बहुत गहराई से जानना होगा। इसका मतलब है अपनी प्रकृति को जानना, यह जानना कि उसमें कौन-से तत्व शामिल हैं, ये चीजें कहाँ से पैदा होती हैं और कहाँ से आती हैं। इसके अलावा, क्या तुम सच में इन चीजों से नफरत करने में समर्थ हो? क्या तुमने अपनी बदसूरत आत्मा और अपनी दुष्ट प्रकृति को देखा है? अगर तुम सच में अपनी सच्चाई देख लो, तो तुम खुद से नफरत करने लगोगे। जब तुम खुद से नफरत करते हो और फिर परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने की कोशिश करते हो, तो तुम देह से विद्रोह कर पाओगे और सत्य का अभ्यास करने की ताकत पा लोगे, और तब यह संघर्ष जैसा महसूस नहीं होगा। कई लोग अपनी दैहिक पसंद के अनुसार काम क्यों करते हैं? क्योंकि वे खुद को काफी अच्छा समझते हैं और महसूस करते हैं कि उनके काम काफी उचित और जायज हैं, उनमें कोई त्रुटि नहीं है और यहाँ तक कि वे पूरी तरह से सही हैं और इसलिए वे पूरी आत्म-निश्चितता से काम करते हैं। जब वे सच में जान लेंगे कि उनकी प्रकृति कैसी है—यह कितनी बदसूरत, घिनौनी और दयनीय है—तो वे खुद को इतना बड़ा समझना और इतना घमंड करना बंद कर देंगे और वे खुद से इतने खुश नहीं रहेंगे। वे सोचेंगे, “मुझे जमीन से जुड़े रहकर परमेश्वर के कुछ वचनों का अभ्यास करना चाहिए। वरना, मैं मानव होने के मानक पर खरा नहीं उतरूँगा और परमेश्वर के सामने जीने में मुझे शर्म आएगी।” वे सच में खुद को छोटा और नितांत तुच्छ समझेंगे। इस मुकाम पर, उनके लिए सत्य का अभ्यास करना आसान हो जाएगा और वे कुछ-कुछ वैसे दिखने लगेंगे जैसा एक इंसान को दिखना चाहिए। जब कोई व्यक्ति सच में खुद से नफरत करता है, केवल तभी वह देह से विद्रोह कर पाता है। अगर वह खुद से नफरत नहीं करता, तो वह देह से विद्रोह नहीं कर पाएगा। खुद से सचमुच नफरत करना कोई आसान मामला नहीं है। इसके लिए व्यक्ति को कुछ सत्य समझने की आवश्यकता होती है : सबसे पहले उन्हें अपनी प्रकृति का ज्ञान अवश्य होना चाहिए। दूसरे, उसे यह देखना चाहिए कि वह दीन-हीन और दयनीय है, वह अत्यंत छोटा और तुच्छ है, और उसे अपनी दयनीय, गंदी आत्मा को देखना चाहिए। जब वह पूरी तरह से देख लेता है कि वह असल में क्या है—जब यह नतीजा हासिल हो जाता है—तो उसे सच में खुद का ज्ञान मिलता है और तब कहा जा सकता है कि खुद के बारे में उसका ज्ञान बिल्कुल सटीक है। केवल इस मुकाम पर वह खुद से नफरत कर सकता है, यहाँ तक कि खुद को कोस सकता है और सच में यह महसूस कर सकता है कि शैतान ने इंसानों को इतनी गहराई तक भ्रष्ट कर दिया है कि वे किसी भी मानवीय स्वरूप से रहित हैं। एक दिन, अगर उस पर सच में मौत का खतरा मँडराएगा, तो वह सोचेगा, “यह परमेश्वर का धार्मिक दंड है। परमेश्वर सच में धार्मिक है। मैं मरने के ही लायक हूँ!” इस मुकाम पर, वह अपनी कोई शिकायत व्यक्त नहीं करेगा, परमेश्वर की शिकायत करने की तो बात ही दूर है—वह सिर्फ यह महसूस करेगा कि वह अत्यंत दीन-हीन, दयनीय, गंदा और भ्रष्ट है और उसे परमेश्वर द्वारा हटाकर नष्ट कर दिया जाना चाहिए और वह महसूस करेगा कि उसकी जैसी आत्मा इस धरती पर जीने के लायक नहीं है। इसलिए, वह परमेश्वर की शिकायत या उसका प्रतिरोध नहीं करेगा और उसे धोखा देने का तो सवाल ही नहीं उठता। लेकिन अगर वह खुद को नहीं जानता और अब भी खुद को काफी अच्छा समझता है, तो जब मौत का खतरा करीब आएगा, तो वह सोचेगा, “मैंने अपनी आस्था में बहुत अच्छा किया है। मैंने इतनी मेहनत से सत्य का अनुसरण किया है, इतना कुछ त्यागा है और इतने कष्ट सहे हैं, लेकिन आखिर में, परमेश्वर मुझे मरने दे रहा है। मुझे नहीं पता कि परमेश्वर की धार्मिकता कहाँ है। वह मुझे क्यों मरने दे रहा है? अगर मुझ जैसा इंसान भी मरेगा, तो फिर कौन बचाया जा सकेगा? क्या पूरी मानवजाति का अंत नहीं हो गया?” सबसे पहले, उसके मन में परमेश्वर को लेकर धारणाएँ बनेंगी। दूसरे, वह परमेश्वर की शिकायत करेगा और उसमें जरा भी समर्पण नहीं होगा। वह बिल्कुल पौलुस की तरह है, जो मरते दम तक खुद को नहीं जान पाया। जब परमेश्वर का दंड उन पर आएगा, तब बहुत देर हो चुकी होगी।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन