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लक्ष्य जिसका अनुसरण करना चाहिये विश्वासियों को

I

कितना कार्य तुम में ईश्वर ने किया है?

कितना तुमने अनुभव किया है?

वो तुम्हें परखता है, अनुशासित करता है,

वो तुमपे अपना कार्य पूरा कर रहा है।

जैसे हो कोई ऐसा जो ईश्वर की पूर्णता मांगता है,

क्या तुम उसके हर काम को व्यक्त कर सकते हो,

दूसरों को प्रदान कर सकते हो अनुभव के द्वारा

और खुद को ख़र्च कर सकते हो करने को उसके कार्य?

ईश्वर के कार्यों को व्यक्त करो।

बनो एक सच्ची अभिव्यक्ति और उसकी अभिव्यंजना।

उसके द्वारा इस्तेमाल के योग्य बनो।

II

ईश्वर के कार्यों की गवाही देने के लिए,

अपने अनुभवों से दूसरों को दिखाओ,

और ज्ञान से और पीड़ा से जो तुमने सहे।

चाहो और, वो तुम्हें पूर्ण करेगा।

यदि तुम ईश्वर की पूर्णता मांगो केवल अंत में उसकी आशीष पाने के लिए,

यह साबित करता है कि तुम्हारा नज़रिया ईश्वर में आस्था पे अपवित्र है।

ईश्वर के कार्यों को व्यक्त करो।

बनो एक सच्ची अभिव्यक्ति और उसकी अभिव्यंजना।

उसके द्वारा इस्तेमाल के योग्य बनो।

III

वास्तविक जीवन में

तुम्हें सदा ईश्वर के कर्मों को देखने की कोशिश करनी चाहिए

और कैसे उसको संतुष्ट करना है जब वो अपनी इच्छा तुमपे दर्शाये।

उसकी विस्मयता और प्रज्ञा की तुम्हें गवाही देनी चाहिए,

सीखना चाहिए कि तुम्हें कैसे है दिखाना

उसका अनुशासन और व्यवहार तुम पर।

यदि तुम्हारा प्रेम केवल उसकी महिमा को साझा करना है,

यह उसकी अपेक्षाओं तक न पहुंच पाएगा।

उसके कर्मों के साक्षी बनो, उसकी मांगों को पूरा करो,

लोगों पर उसके कार्यों को अनुभव करो।

चाहे दर्द, आसूं या दुःख हो, अभ्यास में इनका अनुभव करो।

ईश्वर का साक्षी बनने को तुम्हें इन सब कार्यो को करना होगा।

ईश्वर के कार्यों को व्यक्त करो।

बनो एक सच्ची अभिव्यक्ति और उसकी अभिव्यंजना।

उसके द्वारा इस्तेमाल के योग्य बनो।

ईश्वर के कार्यों को व्यक्त करो।

बनो एक सच्ची अभिव्यक्ति और उसकी अभिव्यंजना।

उसके द्वारा इस्तेमाल के योग्य बनो, उसके द्वारा इस्तेमाल के योग्य बनो।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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