8. परमेश्वर के कार्य को जानने पर वचन
284. परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उसने उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की है और बाद में उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिए पाप-बलि बना और अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी पर और समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने अधिकार को बहाल करेगा। मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा और जब वे अपने-अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा जो उसकी आराधना करता है। पृथ्वी पर उसकी अनंत विजय होगी और वे सभी जो उसके विरोध में हैं, अनंतकाल के लिए नष्ट हो जाएँगे। इससे मनुष्य का सृजन करने की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी; इससे सब चीजों के सृजन की उसकी मूल इच्छा बहाल होगी और इससे पृथ्वी पर, सभी चीजों के बीच, और शत्रुओं के बीच उसका अधिकार भी बहाल हो जाएगा। ये उसकी संपूर्ण विजय के चिह्न होंगे। इसके बाद से मानवता विश्राम में प्रवेश करेगी और ऐसे जीवन में प्रवेश करेगी, जो सही मार्ग पर है। मानवता के साथ परमेश्वर भी अनंत विश्राम में प्रवेश करेगा और एक ऐसा अनंत जीवन आरंभ करेगा जिसे स्वयं वह और मनुष्य दोनों ही साझा करते हों। पृथ्वी से गंदगी और विद्रोहीपन मिट जाएगा, पृथ्वी पर से सारा विलाप भी समाप्त हो जाएगा और परमेश्वर का विरोध करने वाली प्रत्येक चीज का अस्तित्व नहीं रहेगा। केवल परमेश्वर और वही लोग बचेंगे, जिनका उसने उद्धार किया है; केवल उसकी सृष्टि ही बचेगी।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
285. मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप किया गया है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। इसका उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान की सत्ता के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता को सामने लाने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ, यह स्पष्ट रूप से देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी स्पष्टता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और भ्रांति, पवित्रता और मलिनता और क्या महान है और क्या हेय, इसके बीच अंतर करने में सक्षम बनाने के लिए है। यह अज्ञानी मानवजाति को मेरे लिए यह गवाही देने में सक्षम बनाने के लिए है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है और यह कि केवल मैं—सृष्टिकर्ता—मानवजाति को बचाता हूँ और लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान करता हूँ; यह उन्हें जानने देने के लिए है कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ और शैतान मात्र वह प्राणी है जिसका मैंने सृजन किया है और जिसने बाद में मुझसे विश्वासघात किया। मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरे लिए गवाही देने, मेरे इरादे समझ पाने और यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ कि मैं ही सत्य हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी
286. परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबंधन कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध भी कर रहा है। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है और मानता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है और इस प्रकार शैतान को हमेशा के लिए पराजित कर दिया जाएगा। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की वास्तविक कहानी यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पाप-बलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। सरल शब्दों में कहें तो शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के जरिए परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से बंधन में डाल दिया जाएगा, और इस प्रकार मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है। अंत के दिनों का चरण, जिसमें मनुष्य को जीता जाना है, शैतान के साथ युद्ध में कार्य का अंतिम चरण है, और यह शैतान की सत्ता से मनुष्य के संपूर्ण उद्धार का कार्य भी है। मनुष्य पर विजय का आंतरिक अर्थ मनुष्य पर विजय पाने के बाद शैतान के मूर्त रूप—मनुष्य, जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है—का अपने जीते जाने के बाद सृष्टिकर्ता के पास वापस लौटना है, जिसके माध्यम से वह शैतान से विद्रोह कर पूरी तरह से परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा। इस तरह मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इसलिए, विजय का कार्य शैतान के विरुद्ध युद्ध में अंतिम कार्य है, और यह परमेश्वर के प्रबंधन में अंतिम चरण है जो शैतान को पराजित करने के लिए है। इस कार्य के बिना मनुष्य का संपूर्ण उद्धार अंततः असंभव होगा, शैतान की संपूर्ण पराजय भी असंभव होगी, और मानव-जाति कभी भी अपनी अद्भुत मंज़िल में प्रवेश करने या शैतान के प्रभाव से छुटकारा पाने में सक्षम नहीं होगी। इसलिए, शैतान के साथ युद्ध की समाप्ति से पहले मनुष्य के उद्धार का कार्य समाप्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य का केंद्रीय भाग मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है। सबसे आरंभ में मानव-जाति परमेश्वर के हाथों में थी, किंतु शैतान के प्रलोभन और भ्रष्टता की वजह से, मनुष्य को शैतान द्वारा बाँध लिया गया और वह इस दुष्ट के हाथों में पड़ गया। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रबंधन कार्य में शैतान पराजित किए जाने का लक्ष्य बन गया। चूँकि शैतान ने मनुष्य पर कब्ज़ा कर लिया था, और चूँकि मनुष्य परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन की पूँजी है, इसलिए यदि मनुष्य को बचाया जाना है, तो उसे शैतान के हाथों से वापस लेना होगा, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य को, जिसे शैतान द्वारा बंदी बना लिया गया है, वापस लेना होगा। इस प्रकार, शैतान को मनुष्य के पुराने स्वभाव में बदलावों और मनुष्य के मूल विवेक को पुनर्स्थापित करने के माध्यम से पराजित किया जाना चाहिए। इस तरह से बंदी बना लिए गए मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस लिया जा सकता है। यदि मनुष्य शैतान के प्रभाव और बंधन से मुक्त हो जाता है, तो शैतान शर्मिंदा हो जाएगा, मनुष्य को अंततः वापस ले लिया जाएगा, और शैतान को हरा दिया जाएगा। और चूँकि मनुष्य को शैतान के अंधकारमय प्रभाव से मुक्त किया जा चुका है, इसलिए एक बार जब यह युद्ध समाप्त हो जाएगा, तो मनुष्य इस संपूर्ण युद्ध में जीत के परिणामस्वरूप प्राप्त हुआ लाभ बन जाएगा, और शैतान वह लक्ष्य बन जाएगा जिसे दंडित किया जाएगा, जिसके पश्चात् मानव-जाति के उद्धार का संपूर्ण कार्य पूरा कर लिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
287. परमेश्वर आदि और अंत है; स्वयं वही है, जो अपने कार्य को आरंभ करता है और इसलिए स्वयं उसी को पिछले युग का समापन करने वाला भी होना चाहिए। यही उसके द्वारा शैतान को पराजित करने और संसार पर विजय प्राप्त करने का प्रमाण है। हर बार जब स्वयं वह मनुष्य के बीच कार्य करता है, तो यह एक नए युद्ध की शुरुआत होती है। नए कार्य की शुरुआत के बिना स्वाभाविक रूप से पुराने कार्य का समापन नहीं होगा। और जब पुराने का समापन नहीं होता तो यह इस बात का प्रमाण है कि शैतान के साथ युद्ध अभी तक समाप्त नहीं हुआ है। केवल जब स्वयं परमेश्वर आकर मनुष्यों के बीच नया कार्य करता है, तभी मनुष्य शैतान की शक्ति से पूरी तरह मुक्त हो सकता है और एक नया जीवन तथा एक नई शुरुआत प्राप्त कर सकता है। अन्यथा, मनुष्य सदैव पुराने युग में जिएगा और हमेशा शैतान के पुराने प्रभाव के अधीन रहेगा। परमेश्वर द्वारा लाए गए प्रत्येक युग के साथ मनुष्य के एक भाग को मुक्त किया जाता है, और इस प्रकार परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ मनुष्य एक नए युग की ओर बढ़ता है। परमेश्वर की विजय का अर्थ उन सबकी विजय है, जो उसका अनुसरण करते हैं। यदि सृजित मानवजाति को युग के समापन का कार्यभार दिया जाता, तब चाहे यह मनुष्य के दृष्टिकोण से हो या शैतान के, यह परमेश्वर के विरोध या परमेश्वर के साथ विश्वासघात के कार्य से बढ़कर न होता, यह परमेश्वर के प्रति समर्पण का कार्य न होता, और मनुष्य का कार्य शैतान के फायदा उठाने का साधन बन जाता। केवल जब मनुष्य स्वयं परमेश्वर द्वारा सूत्रपात किए गए युग में परमेश्वर के प्रति समर्पण कर उसका अनुसरण करता है, तभी शैतान पूरी तरह से आश्वस्त हो सकता है, क्योंकि यह सृजित प्राणी का कर्तव्य है। इसलिए मैं कहता हूँ कि तुम लोगों को केवल अनुसरण और समर्पण करने की आवश्यकता है, और इससे अधिक तुम लोगों से किसी बात की अपेक्षा नहीं की जाती। प्रत्येक व्यक्ति के द्वारा अपने कर्तव्य का पालन करने और अपने संबंधित कार्य को क्रियान्वित करने का यही अर्थ है। परमेश्वर अपना काम करता है और उसे कोई आवश्यकता नहीं है कि मनुष्य उसके स्थान पर काम करे, और न ही वह सृजित प्राणियों के काम में भाग लेता है। मनुष्य अपना कर्तव्य करता है और परमेश्वर के कार्य में भाग नहीं लेता है। यही समर्पण का अर्थ है और यही शैतान की पराजय का प्रमाण है। स्वयं परमेश्वर द्वारा नए युग के सूत्रपात का कार्य पूरा कर देने के पश्चात् वह मनुष्यों के बीच स्वयं आकर कार्य करने नहीं आता। केवल तभी एक सृजित प्राणी के रूप में मनुष्य अपना कर्तव्य करने और मिशन पूरा करने के लिए आधिकारिक रूप से नए युग में कदम रखता है। ये वे सिद्धांत हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है, जिनका उल्लंघन किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता। केवल इस तरह से कार्य करना ही विवेकपूर्ण और तर्कसंगत है। परमेश्वर का कार्य स्वयं परमेश्वर ही करता है। वही है, जो अपने कार्य को आरंभ करता है और वही है, जो अपने कार्य का समापन करता है। वही है, जो कार्य की योजना बनाता है, और वही है, जो उसका प्रबंधन करता है, और इससे भी बढ़कर, वही है, जो अपने कार्य को उसकी पूर्णता तक पहुँचाता है। जैसा कि बाइबल में कहा गया है, “मैं ही आदि और अंत हूँ; मैं ही बोनेवाला और काटनेवाला हूँ।” परमेश्वर के प्रबंधन से संबंधित सारा कार्य स्वयं परमेश्वर ही करता है। वह छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना का संप्रभु है; कोई भी उसके स्थान पर उसका कार्य नहीं कर सकता और कोई भी उसके कार्य का समापन नहीं कर सकता, क्योंकि वही है, जो सब कुछ अपने हाथ में रखता है। संसार का सृजन कर, वह संपूर्ण संसार की अगुआई करेगा ताकि वह उसके प्रकाश में जिए और वही निश्चित रूप से सम्पूर्ण युग का अंत भी करेगा और इस प्रकार अपनी संपूर्ण योजना को परिपूर्ण कर देगा!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (1)
288. परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना का कार्य व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है। प्रथम चरण—संसार का सृजन—परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था और यदि ऐसा न किया जाता, तो कोई भी मानव-जाति का सृजन कर पाने में सक्षम न हुआ होता। दूसरा चरण, जो संपूर्ण मानवजाति के छुटकारे का था, उसे भी स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया गया था। तीसरा चरण स्वतः स्पष्ट है : परमेश्वर के संपूर्ण कार्य के अंत को स्वयं परमेश्वर द्वारा किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। संपूर्ण मानव-जाति के छुटकारे, उस पर विजय पाने, उसे प्राप्त करने, और उसे पूर्ण बनाने का समस्त कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। यदि वह व्यक्तिगत रूप से यह कार्य न करता, तो मनुष्य उसकी पहचान का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता था, न ही उसका कार्य मनुष्य द्वारा किया जा सकता था। शैतान को हराने, मानव-जाति को प्राप्त करने, और मनुष्य को पृथ्वी पर एक सामान्य जीवन प्रदान करने के लिए वह व्यक्तिगत रूप से मनुष्य की अगुआई करता है और व्यक्तिगत रूप से मनुष्यों के बीच कार्य करता है; अपनी संपूर्ण प्रबंधन योजना के वास्ते और अपने संपूर्ण कार्य के लिए उसे व्यक्तिगत रूप से इस कार्य को करना चाहिए। यदि मनुष्य केवल यह विश्वास करता है कि परमेश्वर इसलिए आया था कि मनुष्य उसे देख सके, या वह मनुष्य को खुश करने के लिए आया था, तो ऐसे विश्वास का कोई मूल्य, कोई महत्व नहीं है। मनुष्य की समझ बहुत ही सतही है! केवल स्वयं कार्यान्वित करके ही परमेश्वर इस कार्य को अच्छी तरह से और पूरी तरह से कर सकता है। यदि मनुष्य को यह कार्य करना हो, तो वह परमेश्वर का स्थान लेने में अक्षम होगा। चूँकि उसके पास परमेश्वर की पहचान या उसका सार नहीं है, इसलिए वह परमेश्वर का कार्य करने में असमर्थ है और यदि मनुष्य इसे करता भी, तो इसका कोई प्रभाव नहीं होता। पहली बार जब परमेश्वर ने देह धारण किया था, तो वह छुटकारे के वास्ते था, संपूर्ण मानव-जाति को पाप से छुटकारा देने के लिए था, मनुष्य को शुद्ध होने और उसके पापों को क्षमा किए जाने में सक्षम बनाने के लिए था। विजय का कार्य भी परमेश्वर द्वारा मनुष्यों के बीच व्यक्तिगत रूप से किया जाता है। इस चरण के दौरान यदि परमेश्वर को केवल भविष्यवाणी ही करनी होती, तो किसी नबी—किसी गुणी व्यक्ति—को उसका स्थान लेने के लिए ढूँढ़ा जा सकता था; यदि केवल भविष्यवाणी ही कहनी होती, तो मनुष्य परमेश्वर की जगह ले सकता था। किंतु व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर का कार्य करने और मनुष्य के जीवन का कार्य करने के संदर्भ में, मनुष्य इस कार्य को नहीं कर सकता था। इसे व्यक्तिगत रूप से स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किया जाना चाहिए : इस कार्य को करने के लिए परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से देह धारण करना चाहिए। वचन के युग में, यदि केवल भविष्यवाणी ही कही जाती, तो इस कार्य को करने के लिए नबी यशायाह या एलिय्याह को ढूँढ़ा जा सकता था, और इसे व्यक्तिगत रूप से करने के लिए स्वयं परमेश्वर की कोई आवश्यकता न होती। चूँकि इस चरण में किया जाने वाला कार्य मात्र भविष्यवाणी कहना नहीं है, और चूँकि इस बात का अत्यधिक महत्व है कि वचनों के कार्य का उपयोग मनुष्य पर विजय पाने और शैतान को पराजित करने के लिए किया जाता है, इसलिए इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता, और इसे स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना चाहिए। व्यवस्था के युग में यहोवा ने अपने कार्य का एक भाग किया था, जिसके पश्चात् उसने कुछ वचन कहे और नबियों के जरिये कुछ कार्य किया। ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य यहोवा के कार्य में उसका स्थान ले सकता था, और भविष्यद्रष्टा उसकी ओर से चीजों की भविष्यवाणी और कुछ स्वप्नों की व्याख्या कर सकते थे। उस समय किया गया कार्य सीधे-सीधे मनुष्य के स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य नहीं था, और वह मनुष्य के पाप से संबंध नहीं रखता था, और मनुष्य से केवल व्यवस्था का पालन करने की अपेक्षा की गई थी। अतः यहोवा देहधारी नहीं हुआ और उसने स्वयं को मनुष्य पर प्रकट नहीं किया; इसके बजाय उसने मूसा और अन्य लोगों से सीधे बातचीत की, उनसे बुलवाया और अपने स्थान पर कार्य करवाया, और उनसे मानव-जाति के बीच सीधे तौर पर कार्य करवाया। परमेश्वर के कार्य का पहला चरण मनुष्य की अगुआई का था। यह शैतान के विरुद्ध युद्ध का आरंभ था, किंतु यह युद्ध आधिकारिक रूप से शुरू होना बाक़ी था। शैतान के विरुद्ध आधिकारिक युद्ध परमेश्वर के प्रथम देहधारण के साथ आरंभ हुआ, और यह आज तक जारी है। इस युद्ध की पहली लड़ाई तब हुई, जब देहधारी परमेश्वर को सलीब पर चढ़ाया गया। देहधारी परमेश्वर के सलीब पर चढ़ाए जाने ने शैतान को पराजित कर दिया, और यह युद्ध में प्रथम सफल चरण था। जब देहधारी परमेश्वर ने सीधे मनुष्य के जीवन का कार्य करना आरंभ किया, तो यह मनुष्य को पुनः प्राप्त करने के कार्य की आधिकारिक शुरुआत थी। और चूँकि यह मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करने का कार्य था, इसलिए यह शैतान के साथ युद्ध करने का कार्य था। आरंभ में यहोवा द्वारा किए गए कार्य का चरण पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन की अगुआई मात्र था। यह परमेश्वर के कार्य का आरंभ था, और हालाँकि इसमें अभी कोई युद्ध या कोई बड़ा कार्य शामिल नहीं हुआ था, फिर भी इसने आने वाले युद्ध के कार्य की नींव डाली थी। बाद में, अनुग्रह के युग के दौरान दूसरे चरण के कार्य में मनुष्य के पुराने स्वभाव को परिवर्तित करना शामिल था, जिसका अर्थ है कि स्वयं परमेश्वर मनुष्य के जीवन का कार्य कर रहा था। इसे परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाना था। इसमें अपेक्षित था कि परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से देहधारी हो जाए। यदि वह देहधारी न हुआ होता, तो कार्य के इस चरण में कोई अन्य उसका स्थान नहीं ले सकता था, क्योंकि यह शैतान के विरुद्ध सीधी लड़ाई के कार्य को दर्शाता था। यदि परमेश्वर की ओर से मनुष्य ने शैतान की उपस्थिति में यह कार्य किया होता, तो उसे झुकाया नहीं जा सकता था; उसे हराना असंभव हो गया होता। देहधारी परमेश्वर को ही उसे हराने के लिए आना था, क्योंकि देहधारी परमेश्वर का सार फिर भी परमेश्वर है, वह फिर भी मनुष्य का जीवन है, और वह फिर भी सृष्टिकर्ता है; कुछ भी हो, उसकी पहचान और सार नहीं बदलेगा। और इसलिए, उसने देहधारण किया और शैतान को पूरी तरह झुकवाने का कार्य किया। अंत के दिनों के कार्य के चरण के दौरान, यदि मनुष्य को यह कार्य करना होता और उससे सीधे तौर पर वचनों को बुलवाया जाता, तो वह उन्हें बोलने में असमर्थ होता, और यदि भविष्यवाणी कही जाती, तो मनुष्य पर विजय प्राप्त करना असंभव हो जाता। देहधारी होकर परमेश्वर शैतान को हराने और उसे पूरी तरह झुकवाने के लिए आता है। जब वह शैतान को पूरी तरह से पराजित कर लेगा, पूरी तरह से मनुष्य पर विजय पा लेगा और मनुष्य को पूरी तरह से प्राप्त कर लेगा, तो कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा और सफलता प्राप्त कर ली जाएगी। परमेश्वर के प्रबंधन में मनुष्य परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। विशेष रूप से, युग की अगुआई करने और नया कार्य आरंभ करने का काम स्वयं परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किए जाने की और भी अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को प्रकाशन देना और उसे भविष्यवाणी प्रदान करना मनुष्य द्वारा किया जा सकता है, किंतु यदि यह ऐसा कार्य है जिसे व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर द्वारा किया जाना चाहिए, अर्थात् स्वयं परमेश्वर और शैतान के बीच युद्ध का कार्य, तो इस कार्य को मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। कार्य के प्रथम चरण के दौरान, जब शैतान के साथ कोई युद्ध नहीं लड़ा जा रहा था, तब यहोवा ने नबियों द्वारा बोली गई भविष्यवाणियों का उपयोग करके व्यक्तिगत रूप से इस्राएल के लोगों की अगुआई की थी। उसके बाद, कार्य का दूसरा चरण शैतान के साथ युद्ध था, और स्वयं परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से देहधारण किया और इस कार्य को करने के लिए देह में आया। जिस भी चीज में शैतान के साथ युद्ध शामिल होता है, उसमें परमेश्वर का देहधारण शामिल होता है, जिसका अर्थ है कि यह युद्ध मनुष्य द्वारा नहीं किया जा सकता। यदि मनुष्य को युद्ध करना पड़ता, तो वह शैतान को पराजित करने में असमर्थ होता। उसके पास उसके विरुद्ध लड़ने की ताकत कैसे हो सकती है, जबकि वह अभी भी उसकी सत्ता के अधीन है? मनुष्य बीच में है : यदि तुम शैतान की ओर झुकते हो तो तुम शैतान से संबंधित हो, किंतु यदि तुम परमेश्वर को संतुष्ट करते हो, तो तुम परमेश्वर से संबंधित हो। यदि इस युद्ध के कार्य में मनुष्य को प्रयास करना होता और उसे परमेश्वर का स्थान लेना होता, तो क्या वह कर पाता? यदि वह युद्ध करता, तो क्या वह बहुत पहले ही नष्ट नहीं हो गया होता? क्या वह बहुत पहले ही नरक में नहीं समा गया होता? इसलिए, परमेश्वर के कार्य में मनुष्य उसका स्थान लेने में अक्षम है, जिसका तात्पर्य है कि मनुष्य के पास परमेश्वर का सार नहीं है, और यदि तुम शैतान के साथ युद्ध करते, तो तुम उसे पराजित करने में अक्षम होते। मनुष्य केवल कुछ कार्य ही कर सकता है; वह कुछ लोगों को जीत सकता है, किंतु वह स्वयं परमेश्वर के कार्य में परमेश्वर का स्थान नहीं ले सकता। मनुष्य शैतान के साथ युद्ध कैसे कर सकता है? तुम्हारे शुरुआत करने से पहले ही शैतान ने तुम्हें बंदी बना लिया होता। केवल जब स्वयं परमेश्वर ही शैतान के साथ युद्ध करता है और मनुष्य इस आधार पर परमेश्वर का अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करता है, तभी मनुष्य को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और वह शैतान के बंधनों से बच सकता है। मनुष्य द्वारा अपनी स्वयं की बुद्धि और योग्यताओं से प्राप्त की जा सकने वाली चीजें बहुत ही सीमित हैं; वह मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ है, उसकी अगुआई करने में असमर्थ है, शैतान को हराने में तो और ज्यादा असमर्थ है। मनुष्य की प्रतिभा और बुद्धि शैतान के षड्यंत्रों को नाकाम करने में असमर्थ हैं, इसलिए मनुष्य उसके साथ युद्ध कैसे कर सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना
289. भिन्न-भिन्न युगों के आने-जाने के साथ छह हजार वर्षों के दौरान किए गए कार्य की समग्रता धीरे-धीरे बदलती गई है। इस कार्य में आए बदलाव समस्त संसार की परिस्थितियों और एक इकाई के तौर पर मानवजाति की विकासपरक प्रवृत्ति पर आधारित रहे हैं; प्रबंधन का कार्य तदनुसार केवल धीरे-धीरे बदला है। सृष्टि के आरंभ से इस सबकी योजना नहीं बनाई गई थी। संसार का सृजन होने से पहले या इसके तुरंत बाद तक यहोवा ने अभी कार्य के प्रथम चरण यानी व्यवस्था के कार्य, कार्य के दूसरे चरण यानी अनुग्रह के कार्य और कार्य के तीसरे चरण यानी विजय के कार्य की योजना नहीं बनाई थी, जिसमें वह पहले मोआब के कुछ वंशजों से शुरुआत करता और इसके माध्यम से समस्त ब्रह्मांड को जीतता। संसार का सृजन करने के बाद, उसने कभी ये वचन नहीं कहे; न ही उसने ये मोआब के बाद कहे, उसने ये वचन लूत से पहले तो बिल्कुल नहीं कहे। परमेश्वर का समस्त कार्य उसके आगे बढ़ने के साथ ही किया जाता है। उसका छह-हजार-वर्षों का समस्त प्रबंधन कार्य इसी तरह से आगे बढ़ा है; संसार का सृजन करने से पहले उसने किसी भी हाल में “मानवजाति के विकास के लिए सारांश चार्ट” जैसी कोई योजना नहीं लिखी थी। अपने कार्य में परमेश्वर सीधे अपना स्वरूप व्यक्त करता है; वह किसी योजना को बनाने पर मगजपच्ची नहीं करता है। निस्संदेह, बहुत से नबियों ने बहुत सी भविष्यवाणियाँ की हैं, परंतु फिर भी यह नहीं कहा जा सकता है कि परमेश्वर का कार्य सदैव एक सटीक योजना पर आधारित रहा है; वे भविष्यवाणियाँ परमेश्वर के उस समय के कार्य के अनुसार की गई थीं। वह जो भी कार्य करता है वह सबसे यथार्थवादी कार्य होता है। वह इसे युगों के विकास के अनुसार कार्यान्वित करता है और इसे यह आधार देता है कि चीजें कैसे बदलती हैं। उसके लिए, कार्य को संपन्न करना किसी बीमारी के लिए सही उपचार का नुस्खा देने के सदृश है; अपना कार्य करते समय वह अवलोकन करता है और अपने अवलोकनों के अनुसार कार्य जारी रखता है। अपने कार्य के प्रत्येक चरण में, परमेश्वर अपनी प्रचुर बुद्धि और अपनी सामर्थ्य को व्यक्त करने में सक्षम है; वह किसी युग विशेष के कार्य के अनुसार अपनी प्रचुर बुद्धि और अधिकार को प्रकट करता है, और उस युग के दौरान अपने द्वारा वापस लाए गए सभी लोगों को अपना समस्त स्वभाव देखने देता है। हर युग में जो भी कार्य करने की जरूरत है उसके अनुसार वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करता है, वह सब कार्य करता है जो उसे करना चाहिए। वह लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति इस आधार पर करता है कि शैतान ने उन्हें किस हद तक भ्रष्ट कर दिया है। ... मानवजाति के बीच परमेश्वर का कोई भी कार्य संसार के सृजन के समय पहले से तैयार नहीं किया गया था; बल्कि, यह चीजों का विकास ही है जिसने परमेश्वर को मानवजाति के बीच अधिक वास्तविक एवं व्यावहारिक रूप से कदम-दर-कदम अपना कार्य करने दिया है। उदाहरण के लिए, यहोवा परमेश्वर ने स्त्री को प्रलोभित करने के लिए साँप का सृजन नहीं किया था। यह उसकी कोई विशिष्ट योजना नहीं थी, न ही यह कुछ ऐसा था जिसे उसने जानबूझकर पूर्वनियत किया था। यह कहा जा सकता है कि यह अनपेक्षित घटना थी। इस प्रकार, इसी कारण से यहोवा ने आदम और हव्वा को अदन की वाटिका से निष्कासित किया और फिर कभी मनुष्य का सृजन न करने की शपथ ली। परंतु लोगों को केवल इसी आधार पर परमेश्वर की बुद्धि का पता चलता है। यह वैसा ही है जैसा मैंने पहले कहा था : “मैं अपनी बुद्धि शैतान की साजिशों के आधार पर प्रयोग में लाता हूँ।” चाहे मानवजाति कितनी भी भ्रष्ट हो जाए या साँप उन्हें कैसे भी प्रलोभित करे, यहोवा के पास तब भी अपनी बुद्धि है; इस तरह, जबसे उसने संसार का सृजन किया है, वह नए-नए कार्य में लगा रहा है और उसके कार्य का कोई भी कदम कभी भी दोहराया नहीं गया है। शैतान ने लगातार साजिशें की हैं; मानवजाति लगातार शैतान के द्वारा भ्रष्ट की गई है, और यहोवा परमेश्वर ने अपने बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को लगातार संपन्न किया है। वह कभी भी असफल नहीं हुआ है, और संसार के सृजन से लेकर अब तक उसने कार्य करना कभी नहीं रोका है। शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट करने के बाद से, परमेश्वर अपने उस शत्रु को परास्त करने के लिए उनके बीच लगातार कार्य करता रहा है जिसने मानवजाति को भ्रष्ट किया है। यह लड़ाई आरंभ से शुरू हुई है और संसार के अंत तक चलती रहेगी। इतना ज्यादा कार्य करते हुए, यहोवा परमेश्वर ने न केवल शैतान द्वारा भ्रष्ट की जा चुकी मनुष्यजाति को अपने द्वारा महान उद्धार को प्राप्त करने की अनुमति दी है, बल्कि उसे अपनी बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और अधिकार को देखने की अनुमति भी दी है। इसके अलावा, अंत में वह मानवजाति को दुष्टों को दंड और अच्छों को पुरस्कार देने वाला अपना धार्मिक स्वभाव देखने देगा। उसने आज के दिन तक शैतान के साथ युद्ध किया है और कभी भी पराजित नहीं हुआ है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह बुद्धिमान परमेश्वर है और वह अपनी बुद्धि शैतान की साजिशों के आधार पर प्रयोग करता है। और इसलिए परमेश्वर न केवल स्वर्ग की सब चीजों से अपने अधिकार का पालन करवाता है; बल्कि वह पृथ्वी की सभी चीज़ों को अपने पाँव रखने की चौकी के नीचे रखवाता है, और एक अन्य महत्वपूर्ण बात है, वह दुष्टों को, जो मानवजाति पर आक्रमण करते हैं और उसे सताते हैं, अपनी ताड़ना के अधीन करता है। इस कार्य के सभी नतीजे उसकी बुद्धि के कारण प्राप्त होते हैं। उसने मानवजाति के अस्तित्व से पहले अपनी बुद्धि कभी प्रकट नहीं की थी क्योंकि स्वर्ग में, पृथ्वी पर या समस्त ब्रह्मांड में उसका कोई शत्रु नहीं था, और सारी चीजों में अंधकार की शक्तियों की कोई घुसपैठ नहीं थी। जब प्रधान स्वर्गदूत ने उसके साथ विश्वासघात किया तो उसने पृथ्वी पर मानवजाति का सृजन किया, और मानवजाति के कारण ही उसने प्रधान स्वर्गदूत, शैतान के साथ अपना सहस्राब्दी लंबा युद्ध औपचारिक रूप से आरंभ किया—एक ऐसा युद्ध जो हर उत्तरोत्तर चरण के साथ और अधिक घमासान होता जाता है। इनमें से हर चरण में उसकी सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि उपस्थित रहती हैं। केवल तभी स्वर्ग और पृथ्वी में हर चीज परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की व्यावहारिकता को देख चुकी है। वह आज भी अपने कार्य को उसी व्यावहारिक तरीके से संपन्न करता है; इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे वह अपना कार्य करता है, वह अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को भी प्रकट करता है; वह तुम लोगों को कार्य के प्रत्येक चरण की वास्तविक कहानी को देखने देता है, यह देखने देता है कि परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता की आखिर कैसे व्याख्या की जाए और इससे भी बढ़कर परमेश्वर की व्यावहारिकता की निर्णायक व्याख्या को देखने देता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई
290. पवित्र आत्मा का कार्य सदैव उसके आगे बढ़ने के साथ ही किया जाता है; वह किसी भी समय अपने कार्य की योजना बना सकता है, और कभी भी उसे संपन्न कर सकता है। मैं क्यों सदैव कहता हूँ कि पवित्र आत्मा का कार्य यथार्थवादी होता है, और वह सदैव नया होता है, कभी पुराना नहीं होता, और सदैव सबसे अधिक ताजगी भरा होता है? जब संसार का सृजन किया गया था, तब उसके कार्य की योजना पहले से नहीं बनाई गई थी; ऐसा बिल्कुल भी नहीं हुआ था! कार्य का हर चरण अपने-अपने समय पर समुचित परिणाम प्राप्त करता है और ये चरण एक दूसरे को अस्त-व्यस्त नहीं करते हैं। बहुत बार तुम्हारे मन की योजनाएँ पवित्र आत्मा के नवीनतम कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकती हैं। उसका कार्य उतना सरल नहीं है जितने सरल होने का मनुष्य तर्क देता है, न ही उतना जटिल है जैसा मनुष्य कल्पना करता है—इसमें लोगों को उनकी जरूरतों के अनुसार किसी भी समय और किसी भी स्थान पर आपूर्ति करना शामिल है। कोई भी मनुष्यों के सार के बारे में उतना स्पष्ट नहीं है, जितना वह है, और ठीक इसी कारण से कोई भी चीज लोगों की यथार्थपरक आवश्यकताओं के उतनी अनुकूल नहीं हो सकती, जितना उसका कार्य है। इसलिए, मनुष्य के दृष्टिकोण से, उसका कार्य कई सहस्राब्दी पूर्व अग्रिम रूप से योजनाबद्ध किया गया प्रतीत होता है। अब जबकि वह तुम लोगों के बीच कार्य करता है, वह किसी भी समय और किसी भी जगह तुम लोगों की दशाओं के अनुसार कार्य करता और बोलता है। इन दशाओं से सामना होने पर उसके पास बोलने के लिए बिल्कुल सही वचन होते हैं, वह ठीक वे ही वचन बोलता है जिनकी लोगों को आवश्यकता होती है। उसके कार्य के पहले कदम को लो : ताड़ना का समय। उसके बाद परमेश्वर ने अपना कार्य लोगों की अभिव्यक्ति, उनकी विद्रोहशीलता, उनसे उभरी सकारात्मक और नकारात्मक दशाओं के आधार पर संचालित किया और साथ ही इस आधार पर भी कि जब उनकी नकारात्मकता किसी खास बिंदु पर पहुँच जाए तो वे कितने नकारात्मक हो सकते हैं; और परमेश्वर ने अपने कार्य में बेहतर नतीजा हासिल करने के लिए इन चीजों का फायदा उठाया और इनका इस्तेमाल किया। अर्थात, वह लोगों को पोषण देने का कार्य किसी समय-विशेष में उनकी वर्तमान दशा के अनुसार करता है; वह अपने कार्य का हर कदम लोगों की वास्तविक स्थितियों के अनुसार संपन्न करता है। समस्त सृजित प्राणी उसके हाथों में है, वह उन्हें कैसे नहीं जान सकता? परमेश्वर लोगों की स्थितियों के अनुसार, किसी भी समय और स्थान पर, कार्य के उस अगले कदम को कार्यान्वित करता है, जो किया जाना चाहिए। यह कार्य किसी भी तरह से अनादिकाल से पूर्वनियत नहीं किया गया है; यह एक मानवीय धारणा है! वह अपने कार्य के परिणाम देखकर कार्य करता है, और उसका कार्य लगातार अधिक गहन और विकसित होता जाता है; अपने कार्य के नतीजों का अवलोकन करने के बाद वह अपने कार्य के अगले कदम को कार्यान्वित करता है। वह धीरे-धीरे एक स्थिति से दूसरी स्थिति में जाने के लिए और समय के साथ लोगों को अपने नए कार्य का खुलासा करने के लिए कई चीजों का उपयोग करता है। कार्य का यह तरीका लोगों की आवश्यकताओं की आपूर्ति करने में समर्थ हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर सभी लोगों को बहुत अच्छी तरह से जानता है। वह अपने कार्य को स्वर्ग से इसी तरह संपन्न करता है। इसी प्रकार देहधारी परमेश्वर भी इसी ढंग से अपना कार्य करता है, वास्तविक परिस्थितियों के अनुसार व्यवस्थाएँ बनाता है और मनुष्यों के बीच कार्य करता है। उसका कोई भी कार्य संसार के सृजन से पहले व्यवस्थित नहीं किया गया था, न ही उसकी पहले से ध्यानपूर्वक योजना बनाई गई थी। संसार के सृजन के दो हजार वर्षों के बाद, यहोवा ने देखा कि मानवजाति किस स्तर तक भ्रष्ट हो गई है, इसलिए उसने यह भविष्यवाणी करने के लिए नबी यशायाह के मुख का उपयोग किया कि व्यवस्था के युग का अंत होने के बाद यहोवा अनुग्रह के युग में मानवजाति को छुटकारा दिलाने का अपना कार्य करेगा। निस्संदेह, यह यहोवा की योजना थी, किंतु यह योजना भी उन परिस्थितियों के अनुसार बनाई गई थी जिनका वह उस समय अवलोकन कर रहा था; उसने आदम का सृजन करने के तुरंत बाद इस बारे में नहीं सोचा था। यशायाह ने केवल भविष्यवाणी कही, किंतु यहोवा ने व्यवस्था के युग के दौरान इस कार्य के लिए अग्रिम तैयारियाँ नहीं की थीं; बल्कि उसने अनुग्रह के युग के आरंभ में इस कार्य की शुरुआत की, जब दूत यूसुफ के स्वप्न में इस प्रकाशन के साथ दिखाई दिया कि परमेश्वर देहधारी बनेगा और केवल तभी देहधारण का उसका कार्य आरंभ हुआ। परमेश्वर ने संसार के सृजन के ठीक बाद अपने देहधारण के कार्य के लिए तैयारी नहीं कर ली थी, जैसा कि लोग कल्पना करते हैं; इसका निर्णय केवल मानवजाति के विकास की मात्रा और शैतान के साथ परमेश्वर के युद्ध की स्थिति के आधार पर लिया गया था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई
291. परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन तीन चरणों में विभाजित है और प्रत्येक चरण में मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और आगे बढ़ते जाते हैं, समस्त मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार कदम-दर-कदम परमेश्वर के प्रबंधन का यह कार्य अपने चरम पर पहुँचता जाता है, इस तरह मनुष्य “वचन का देह में प्रकट होना” देख लेता है और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, साथ ही वह गवाही भी ऊँची हो जाती है जिसे देने की अपेक्षा मनुष्य से की जाती है। मनुष्य परमेश्वर के साथ वास्तव में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर महिमा प्राप्त कर सकता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है, जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो गवाही वह देता है, वह मनुष्य का अभ्यास है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये अटूट रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में मनुष्य से व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करना अपेक्षित था, और उससे धैर्यवान और विनम्र बनने की अपेक्षा की जाती थी। आज मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर की समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करे और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखे और अंततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण वे अपेक्षाएँ हैं, जो परमेश्वर अपने संपूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम-दर-कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरे जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक ऊँची होती हैं, और इस तरह परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। इसका कारण ठीक यह है कि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ निरंतर ऊँची होती जाती हैं, जिससे मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के निरंतर अधिक निकट आता जाता है और केवल तभी संपूर्ण मानवजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग हो जाती है। जब तक परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आएगा, संपूर्ण मानवजाति शैतान के प्रभाव से बचा ली गई होगी। जब वह समय आएगा, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का सहयोग अब नहीं होगा, और संपूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीएगी, और तब से परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोहशीलता या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई अपेक्षाएँ नहीं रखेगा, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण सहयोग होगा, ऐसा सहयोग जो मनुष्य और परमेश्वर दोनों का एक-साथ जीवन होगा, ऐसा जीवन, जो परमेश्वर के प्रबंधन का पूरी तरह से समापन होने और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचा लिए जाने के बाद आता है। जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों का निकट से अनुसरण नहीं कर सकते, वे ऐसा जीवन हासिल करने में अक्षम होते हैं। वे अंधकार में डूब चुके होंगे, जहाँ वे रोएँगे और अपने दाँत पीसेंगे; वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसका अनुसरण नहीं करते, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं किंतु उसके संपूर्ण कार्य के प्रति समर्पण नहीं करते। चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का निकटता से अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि “यहोवा परमेश्वर है” और “यीशु मसीह है,” जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
292. स्वयं परमेश्वर युग का सूत्रपात करने के लिए आता है, और स्वयं परमेश्वर युग का अंत करने के लिए आता है। युग का आरंभ और युग का समापन करने का कार्य करने में मनुष्य असमर्थ है। यदि आने के बाद यीशु यहोवा का कार्य समाप्त नहीं करता, तो यह इस बात का सबूत होता कि वह मात्र एक व्यक्ति है और परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में असमर्थ है। ठीक इसलिए, क्योंकि यीशु आया और उसने यहोवा के कार्य का समापन किया, यहोवा के कार्य को जारी रखा और, इसके अलावा, उसने अपना स्वयं का कार्य, एक नया कार्य किया, इससे साबित होता है कि यह एक नया युग था, और कि यीशु स्वयं परमेश्वर था। उन्होंने कार्य के स्पष्ट रूप से भिन्न दो चरण पूरे किए। एक चरण मंदिर में कार्यान्वित किया गया, और दूसरा मंदिर के बाहर संचालित किया गया। एक चरण व्यवस्था के अनुसार मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन करना था, और दूसरा, पापबलि चढ़ाना था। कार्य के ये दो चरण स्पष्ट रूप से भिन्न थे; यह नए युग को पुराने से विभाजित करता है, और यह कहना पूर्णतः सही है कि ये दो भिन्न युग हैं! उनके कार्य का स्थान भिन्न था, उनके कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, और उनके कार्य का उद्देश्य भिन्न था। इस तरह उन्हें दो युगों में विभाजित किया जा सकता है; नए और पुराने विधान नए और पुराने युगों को संदर्भित करते हैं। जब यीशु आया, तो वह मंदिर में नहीं गया, जिससे साबित होता है कि यहोवा का युग समाप्त हो गया था। उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, क्योंकि मंदिर में यहोवा का कार्य पूरा हो गया था, और उसे फिर से करने की आवश्यकता नहीं थी, और उसे पुनः करना उसे दोहराना होता। केवल मंदिर को छोड़ने, एक नया कार्य शुरू करने और मंदिर के बाहर एक नया मार्ग खोलकर ही वह परमेश्वर के कार्य को उसके शिखर पर पहुँचा सकता था। यदि वह अपना कार्य करने के लिए मंदिर से बाहर नहीं गया होता, तो परमेश्वर का कार्य मंदिर की बुनियाद पर रुक गया होता, और फिर कभी कोई नए परिवर्तन नहीं होते। और इसलिए, जब यीशु आया तो उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया, और अपना कार्य मंदिर में नहीं किया। उसने अपना कार्य मंदिर से बाहर किया, और शिष्यों की अगुआई करते हुए स्वतंत्र रूप से अपना कार्य किया। अपना कार्य करने के लिए मंदिर से परमेश्वर के प्रस्थान का अर्थ था कि परमेश्वर की एक नई योजना है। उसका कार्य मंदिर के बाहर कार्यान्वित किया जाना था, और इसे नया कार्य होना था, जो अपने कार्यान्वयन के तरीके में अप्रतिबंधित था। जैसे ही यीशु आया, उसने पुराने विधान के युग के दौरान यहोवा के कार्य को समाप्त किया। यद्यपि उन्हें दो भिन्न-भिन्न नामों से बुलाया गया, फिर भी यह एक ही आत्मा था, जिसने कार्य के दोनों चरण संपन्न किए, और जो कार्य किया गया वह सतत था। चूँकि नाम भिन्न था, और कार्य की विषय-वस्तु भिन्न थी, इसलिए युग भिन्न था। जब यहोवा आया, तो वह यहोवा का युग था, और जब यीशु आया, तो वह यीशु का युग था। और इसलिए, हर आगमन के साथ परमेश्वर को एक नाम से बुलाया जाता है, जो एक युग का प्रतिनिधित्व करता है, और वह एक नया मार्ग खोलता है; और हर नए मार्ग के लिए वह एक नया नाम अपनाता है। यह सब दर्शाता है कि परमेश्वर हमेशा नया रहता है और कभी पुराना नहीं पड़ता, और कि उसका कार्य आगे की दिशा में प्रगति करने से कभी नहीं रुकता। इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्ग खोलने चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, और अधिक नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए। इन सबके साथ, वह नए नाम और नया कार्य लाता है। क्षण-प्रतिक्षण परमेश्वर का आत्मा नया कार्य कर रहा है, कभी भी पुराने तरीकों या विनियमों से चिपका नहीं रहता। न ही उसका कार्य कभी रुका है, बल्कि हर गुज़रते पल के साथ घटित होता रहता है। ... यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं और ये सब एक ही आत्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही आत्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना एकदम आवश्यक है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही आत्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
293. जब प्रभु यीशु आया तो उसने लोगों को यह बताने के लिए अपने व्यावहारिक कार्यों का उपयोग किया कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग को अलविदा कह दिया है और नया कार्य शुरू किया है, और इस नए कार्य में सब्त का पालन करना आवश्यक नहीं है। परमेश्वर का सब्त के दिन की सीमाओं से बाहर आना उसके नए कार्य का बस एक पूर्वाभास था; वास्तविक और महान कार्य अभी आना बाकी था। जब प्रभु यीशु ने अपना कार्य प्रारंभ किया, तब वह पहले ही व्यवस्था के युग की “बाध्यताओं” से परे जा चुका था और उस युग में निर्धारित नियम और सिद्धांत तोड़ चुका था। उसमें व्यवस्था से जुड़ी किसी भी बात का कोई निशान नहीं था; उसने उसे पूरी तरह से छोड़ दिया था और अब उसका पालन नहीं करता था, और उसने लोगों से आगे उसका पालन करने की अपेक्षा नहीं की। इसलिए तुम यहाँ देखते हो कि प्रभु यीशु सब्त के दिन अनाज के खेतों से होकर गुजरा और प्रभु ने आराम नहीं किया; वह बाहर काम कर रहा था और आराम नहीं कर रहा था। उसके इस कार्य ने लोगों की धारणाओं का खंडन किया और इसने उन्हें सूचित किया कि वह अब व्यवस्था के अधीन नहीं रह रहा था, और वह सब्त से परे जा चुका था और एक पूरी तरह से नई छवि में और कार्य करने के एक नए तरीके के साथ लोगों के सामने और उनके बीच प्रकट हुआ था। उसके इस कार्य ने लोगों को बताया कि वह अपने साथ एक नया कार्य लाया है, जो व्यवस्था के अधीन रहने से उभरने और सब्त से अलग होने से आरंभ हुआ था। जब परमेश्वर ने अपना नया कार्य किया, तो वह अतीत से चिपका नहीं रहा और वह अब व्यवस्था के युग के नियमों के बारे में चिंतित नहीं था, न ही वह पूर्ववर्ती युग के अपने कार्य से प्रभावित था, बल्कि उसने सब्त के दिन भी उसी तरह से कार्य किया, जैसे वह दूसरे दिनों में करता था और सब्त के दिन जब उसके चेले भूखे थे, तो वे अनाज की बालें तोड़कर खा सकते थे। यह सब परमेश्वर की निगाहों में बिल्कुल सामान्य था। परमेश्वर जो अपना बहुत-सा कार्य करना चाहता है और जो वचन वह कहना चाहता है, उन सबकी नई शुरुआत हो सकती है। जब वह एक नई शुरुआत करता है, तो वह न तो अपने पिछले कार्य का उल्लेख करता है, न ही उसे जारी रखता है। क्योंकि परमेश्वर के पास उसके कार्य के अपने सिद्धांत हैं, जब वह नया कार्य शुरू करना चाहता है, तो यह तब होता है जब वह मानवजाति को अपने कार्य के एक नए चरण में ले जाना चाहता है, और जब उसका कार्य एक उच्चतर चरण में प्रवेश करता है। यदि लोग पुरानी कहावतों या नियमों के अनुसार काम करते रहते हैं या उनसे चिपटे रहते हैं, तो वह इसे याद नहीं रखेगा या इसका अनुमोदन नहीं करेगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह पहले ही एक नया कार्य ला चुका है, और अपने कार्य के एक नए चरण में प्रवेश कर चुका है। जब वह नया कार्य लाता है, तो वह लोगों के सामने पूर्णतः नई छवि में, पूर्णतः नए कोण से और पूर्णतः नए तरीके से प्रकट होता है, ताकि लोग उसके स्वभाव के विभिन्न पहलुओं और जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसे देख सकें। यह उसके नए कार्य में उसके लक्ष्यों में से एक है। परमेश्वर पुरानी चीजों से नहीं चिपका रहता है, न ही घिसी-पिटी राह पर चलता है; जब वह कार्य करता और बोलता है तो वह वैसा नहीं होता है जैसी लोग कल्पना करते हैं, यह चीज या वह चीज निषिद्ध करने वाला। परमेश्वर में सब कुछ स्वतंत्र और मुक्त है और कोई निषेध नहीं है, कोई बंधन नहीं है—वह मानवजाति के लिए जो कुछ भी लाता है वह सब आजादी और मुक्ति है। वह एक जीवित परमेश्वर है, ऐसा परमेश्वर जो वास्तव में, सच में मौजूद है। वह कोई कठपुतली या मिट्टी की आकृति नहीं है और वह उन मूर्तियों से बिल्कुल भिन्न है जिन्हें लोग प्रतिष्ठापित करते हैं और जिनकी आराधना करते हैं। वह जीवित और जीवंत है और उसके वचन और उसका कार्य मानवजाति के लिए पूरी तरह जीवन और रोशनी लेकर आते हैं, पूरी तरह स्वतंत्रता और मुक्ति लेकर आते हैं, क्योंकि उसके पास सत्य, जीवन और मार्ग है और वह जो भी कार्य करना चाहता है वह सब किसी भी चीज से बाधित हुए बिना करता है। लोग चाहे जो भी कहें और जिस प्रकार भी उसके नए कार्य को देखें या इसका आकलन करें, वह जो कार्य करना चाहता है उसे निसंकोच करेगा। वह किसी की धारणाओं के बारे में चिंता नहीं करेगा, न अपने कार्य और वचनों को लेकर उनके उँगली उठाने की चिंता करेगा, न ही अपने नए कार्य के प्रति उनके प्रबल विरोध और प्रतिरोध तक की चिंता करेगा। परमेश्वर जो करता है उसे मापने या उस पर फैसला देने, उसके कार्य को बदनाम करने, उसमें बाधा डालने या उसे नुकसान पहुँचाने के लिए सृजित प्राणियों में से किसी के लिए भी मानवीय तर्क या मानवीय कल्पनाओं, ज्ञान या नैतिकता का उपयोग करना असंभव होगा। उसके कार्य में और जो वह करता है उसमें, कोई निषेध नहीं है; यह किसी भी व्यक्ति, घटना या चीज से बाधित नहीं होगा, न ही यह किसी शत्रुतापूर्ण शक्ति द्वारा बाधित होगा। जहाँ तक उसके नए कार्य का संबंध है, वह एक सर्वदा विजयी राजा है और हर शत्रुतापूर्ण शक्ति और मानवजाति के सभी पाखंड और भ्रांतियाँ उसकी चरण-पीठ के नीचे कुचल दिए जाते हैं। वह अपने कार्य का चाहे जो भी नया चरण कार्यान्वित कर रहा हो, इसे निश्चित रूप से मानवजाति के बीच विकसित और विस्तारित किया जाएगा और इसे निश्चित रूप से संपूर्ण ब्रह्मांड में अबाध रूप से कार्यान्वित किया जाएगा और पूर्ण सफल बनाया जाएगा। यह परमेश्वर की सर्वशक्तिमत्ता और बुद्धि है, उसका अधिकार और सामर्थ्य है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर III
294. परमेश्वर भिन्न-भिन्न युगों के अनुसार अपने वचन कहता है और अपना कार्य करता है, तथा भिन्न-भिन्न युगों में वह भिन्न-भिन्न वचन कहता है। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता, या एक ही कार्य को दोहराता नहीं है और न अतीत की बातों के प्रति मोह रखता है। वह ऐसा परमेश्वर है जो सदैव नया है और कभी पुराना नहीं होता, और वह हर दिन नए वचन बोलता है। तुम्हें उसका पालन करना चाहिए, जिसका आज पालन किया जाना चाहिए; यही मनुष्य की जिम्मेदारी और कर्तव्य है। यह महत्वपूर्ण है कि वर्तमान समय में अभ्यास परमेश्वर की रोशनी और वचनों के आस-पास केंद्रित हो। परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता और अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता प्रकट करने के लिए विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने में सक्षम है। यह मायने नहीं रखता कि वह आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता है या मनुष्य के या अन्य पुरुष के परिप्रेक्ष्य से—परमेश्वर सदैव परमेश्वर है, और तुम उसके मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से बोलने की वजह से यह नहीं कह सकते कि वह परमेश्वर नहीं है। परमेश्वर के विभिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलने के परिणामस्वरूप कुछ लोगों ने धारणाएँ विकसित कर ली हैं। ऐसे लोगों में परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं है, और उसके कार्य का कोई ज्ञान नहीं है। यदि परमेश्वर सदैव किसी एक ही परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या मनुष्य परमेश्वर को परिसीमित न कर देता? क्या परमेश्वर मनुष्य को इस तरह से कार्य करने दे सकता है? परमेश्वर चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, उसके पास वैसा करने का प्रयोजन है। यदि परमेश्वर सदैव आत्मा के परिप्रेक्ष्य से बोलता, तो क्या तुम उसके साथ जुड़ने में सक्षम होते? इसलिए, तुम्हें पोषण प्रदान करने और वास्तविकता में तुम्हारा मार्गदर्शन करने के लिए कभी-कभी वह अन्य पुरुष के परिप्रेक्ष्य से भी बोलता है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उपयुक्त होता है। संक्षेप में, यह सब परमेश्वर द्वारा किया जाता है और तुम्हें इस पर संदेह नहीं करना चाहिए। वह परमेश्वर है, और इसलिए वह चाहे किसी भी परिप्रेक्ष्य से बोले, वह हमेशा परमेश्वर ही रहेगा। यह एक अडिग सत्य है। वह जैसे भी कार्य करे, वह फिर भी परमेश्वर है, और उसका सार नहीं बदलेगा! पतरस परमेश्वर से बहुत प्रेम करता था और वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप इंसान था, किंतु परमेश्वर ने उसके प्रभु या मसीह होने की गवाही नहीं दी, क्योंकि किसी प्राणी का सार वही होता है, जो वह है, और वह कभी नहीं बदल सकता। अपने कार्य में परमेश्वर विनियमों का पालन नहीं करता, किंतु वह अपने कार्य को प्रभावी बनाने और अपने बारे में मनुष्य के ज्ञान को गहरा करने के लिए भिन्न-भिन्न तरीके उपयोग में लाता है। उसके कार्य करने के प्रत्येक तरीके के पीछे का उद्देश्य मनुष्य की उसे जानने में सहायता करना और मनुष्य को पूर्ण बनाना है। चाहे वह कार्य करने का कोई भी तरीका उपयोग में लाए, प्रत्येक तरीका मनुष्य को बनाने और उसे पूर्ण करने के लिए है। भले ही उसके तरीकों में से कोई एक तरीका बहुत लंबे समय तक चला हो, यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास को तपाकर दृढ़ बनाने के लिए है। इसलिए तुम लोगों के हृदयों में कोई संदेह नहीं होना चाहिए। ये सभी परमेश्वर के कार्य के चरण हैं, और तुम लोगों को इनके प्रति समर्पण करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है
295. अंत के दिनों में परमेश्वर मुख्य रूप से अपने वचनों को कहने, वह सब समझाने जो मनुष्य के जीवन के लिए आवश्यक है, वह बताने जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, मनुष्य को परमेश्वर के कर्मों को दिखाने, और मनुष्य को परमेश्वर की बुद्धि, सर्वशक्तिमत्ता और चमत्कारिकता दिखाने के लिए देहधारी हुआ है। परमेश्वर जिन कई तरीकों से बोलता है, उनके माध्यम से मनुष्य परमेश्वर की सर्वोच्चता, परमेश्वर की महानता और इससे भी बढ़कर, परमेश्वर की विनम्रता और अदृश्यता को निहारता है। मनुष्य देखता है कि परमेश्वर सर्वोच्च है, परंतु वह विनम्र और छिपा हुआ है, और सबसे छोटा हो सकता है। उसके कुछ वचन सीधे आत्मा के दृष्टिकोण से कहे गए हैं, कुछ सीधे मनुष्य के दृष्टिकोण से, और कुछ तीसरे व्यक्ति के दृष्टिकोण से। इसमें यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर के कार्य करने का ढंग बहुत भिन्न-भिन्न है, और वह इसे वचनों के माध्यम से ही मनुष्य को देखने देता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक दोनों है, और इस प्रकार अंत के दिनों में लोगों के समूह को समस्त परीक्षणों में से सबसे बड़े परीक्षण से गुज़ारा जाता है। परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता के कारण, सभी लोग परीक्षणों में प्रवेश कर चुके हैं; मनुष्य परमेश्वर के परीक्षणों में उतरा है, तो उसका कारण परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता ही है। यीशु के युग के दौरान कोई धारणाएँ या परीक्षण नहीं थे। चूँकि यीशु द्वारा किया गया अधिकांश कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप था, इसलिए लोगों ने उसका अनुसरण किया, और उसके बारे में उनकी कोई धारणाएँ नहीं थीं। आज के परीक्षण मनुष्य द्वारा अब तक झेले गए परीक्षणों में सबसे बड़े हैं, और जब यह कहा जाता है कि ये लोग महाक्लेश से निकल आए हैं, तो उसका अर्थ यही क्लेश है। आज परमेश्वर इन लोगों में आस्था, प्रेम, कष्ट की स्वीकृति और समर्पण बढ़ाने के लिए बोलता है। अंत के दिनों के देहधारी परमेश्वर द्वारा कहे गए वचन मनुष्य के प्रकृति सार, मनुष्य के व्यवहार और अभिव्यक्तियों और वर्तमान में जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए, उसके अनुरूप हैं। उसके वचन व्यावहारिक और सामान्य दोनों हैं : वह आने वाले कल की बात नहीं करता है, न ही वह पीछे मुड़कर बीते हुए कल को देखता है; वह केवल उसी की बात करता है जिसमें आज प्रवेश करना चाहिए, जिसे आज अभ्यास में लाना चाहिए और जिसे आज समझना चाहिए। यदि वर्तमान समय में ऐसा कोई व्यक्ति उभरे, जो संकेत और चमत्कार प्रदर्शित करने, दुष्टात्माओं को निकालने, बीमारों को चंगा करने और कई चमत्कार दिखाने में समर्थ हो, और यदि वह व्यक्ति दावा करे कि वह यीशु है जो आ गया है, तो यह एक बुरी आत्मा द्वारा उसका वेश धारण करना होगा, यह एक बुरी आत्मा द्वारा यीशु की नकल करने का कृत्य होगा। यह याद रखो! परमेश्वर वही कार्य नहीं दोहराता। यीशु के कार्य का चरण पहले ही पूरा हो चुका है और परमेश्वर कार्य के उस चरण को पुनः कभी हाथ में नहीं लेगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता; उदाहरण के लिए, पुराने नियम ने मसीहा के आगमन की भविष्यवाणी की, और फिर पता चला कि जो आया था वह यीशु था। इसलिए एक और मसीहा का आना ग़लत होगा। यीशु एक बार पहले ही आ चुका है और यदि “यीशु” को इस समय फिर से आना हो, तो यह गलत होगा। प्रत्येक युग के लिए एक नाम है और प्रत्येक नाम में उस युग का चरित्र चित्रण होता है। मनुष्य की धारणाओं के अनुसार परमेश्वर को सदैव चिह्न और चमत्कार दिखाने चाहिए, सदैव बीमारों को चंगा करना और दानवों को बहिष्कृत करना चाहिए और सदैव ठीक यीशु के समान होना चाहिए। परंतु इस बार परमेश्वर इसके समान बिल्कुल नहीं है। यदि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर अब भी चिह्न और चमत्कार दिखाए और अब भी दानवों को बहिष्कृत करे और बीमारों को चंगा करे—यदि वह बिल्कुल यीशु की तरह करे—तो परमेश्वर वही कार्य दोहरा रहा होगा और यीशु के कार्य का कोई महत्व या मूल्य नहीं रह जाएगा। इसलिए परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य का एक चरण पूरा करता है। ज्यों ही उसके कार्य का प्रत्येक चरण पूरा होता है, बुरी आत्माएँ शीघ्र ही उसकी नकल करने की कोशिश करती हैं और जब शैतान परमेश्वर के बिल्कुल पीछे-पीछे चलने लगता है, तब परमेश्वर तरीका बदलकर भिन्न तरीका अपना लेता है। ज्यों ही परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण पूरा करता है, बुरी आत्माएँ उसकी नकल करने का प्रयास करती हैं। तुम लोगों को इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए। आज परमेश्वर का कार्य यीशु के कार्य से भिन्न क्यों है? आज परमेश्वर चिह्न और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता है, दानवों को क्यों नहीं निकालता है और बीमारों को चंगा क्यों नहीं करता है? यदि यीशु का कार्य व्यवस्था के युग के दौरान किए गए कार्य के समान ही होता, तो क्या वह अनुग्रह के युग के परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर पाता? क्या वह सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा कर पाता? यदि यीशु मंदिर में गया होता और व्यवस्था के युग की तरह उसने सब्त को माना होता, उसे किसी ने नहीं सताया होता और सबने उसे गले लगाया होता, तो क्या उसे सलीब पर चढ़ाया जा सकता था? क्या वह छुटकारे का कार्य पूरा कर सकता था? यदि अंत के दिनों का देहधारी परमेश्वर यीशु के समान चिह्न और चमत्कार दिखाता, तो इसका क्या अर्थ होता? यदि परमेश्वर अंत के दिनों के दौरान अपने कार्य का एक और भाग करता है, जो उसकी प्रबंधन योजना के भाग का प्रतिनिधित्व करता है, तो केवल तभी मनुष्य परमेश्वर का अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त कर सकता है और परमेश्वर की प्रबंधन योजना पूर्ण हो सकती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वर्तमान कार्य का ज्ञान
296. अंत के दिनों में परमेश्वर वचन का उपयोग मुख्यतः मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए करता है। वह मनुष्य को जबरन आश्वस्त करने के लिए चिह्नों और चमत्कारों का उपयोग नहीं करता; यह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट नहीं कर सकता। यदि परमेश्वर केवल चिह्न और चमत्कार दिखाता तो इससे परमेश्वर की व्यावहारिकता प्रकट न होती और इससे मनुष्य पूर्ण न बनाया जा सकता। परमेश्वर संकेतों और चमत्कारों से मनुष्य को पूर्ण नहीं बनाता, अपितु उसे सींचने और उसकी चरवाही करने के लिए वचन का उपयोग करता है, जिसके बाद मनुष्य परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण कर सकता है और परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। यही उसके द्वारा किए जाने वाले कार्य और बोले जाने वाले वचनों का उद्देश्य है। परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए संकेत एवं चमत्कार दिखाने की विधि का उपयोग नहीं करता—वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचनों और कार्य की कई विधियों का उपयोग करता है। चाहे वह शोधन, काट-छाँट या वचनों का पोषण हो, मनुष्य को पूर्ण बनाने और उसे परमेश्वर के कार्य, उसकी बुद्धि और चमत्कारिकता का अधिक ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम बनाने के लिए परमेश्वर कई भिन्न-भिन्न परिप्रेक्ष्यों से बोलता है। अंत के दिनों में परमेश्वर द्वारा युग का समापन करने के समय जब मनुष्य को पूर्ण किया जाएगा, तब वह संकेत और चमत्कार देखने योग्य हो जाएगा। जब तुम परमेश्वर को जान लेते हो और इस बात की परवाह किए बिना कि वह क्या करता है, उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हो जाते हो, तब संकेत और चमत्कार देखकर तुम परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं बनाते। इस समय तुम भ्रष्ट हो और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण करने में अक्षम हो—तुम क्या अपने को चिह्न और चमत्कार देखने योग्य समझते हो? जब परमेश्वर संकेत और चमत्कार दिखाता है, तो यह तब होता है, जब वह मनुष्य को दंड देता है, और तब भी, जब युग बदलता है, और इतना ही नहीं, जब युग का समापन होता है। जब परमेश्वर का कार्य सामान्य रूप से किया जा रहा हो, तो वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता। संकेत और चमत्कार दिखाना उसके लिए बहुत ही आसान है, किंतु वह परमेश्वर के कार्य का सिद्धांत नहीं है, न ही वह परमेश्वर के मनुष्य के प्रबंधन का लक्ष्य है। यदि मनुष्य संकेत और चमत्कार देखते और उन्हें परमेश्वर की आध्यात्मिक देह भी प्रकट होती तो क्या सभी लोग परमेश्वर “में विश्वास” न करते? मैंने पहले कहा था कि पूर्व से विजेताओं का एक समूह प्राप्त किया जाएगा, ऐसे विजेताओं का जो महाक्लेश से निकलेंगे। इन वचनों का क्या अर्थ है? उनका अर्थ है कि ये जो लोग प्राप्त किए गए हैं, वे केवल न्याय, ताड़ना, काट-छाँट और सभी प्रकार के शोधन से गुजरने के बाद सचमुच ही समर्पणशील होते हैं। इन लोगों का विश्वास कल्पित नहीं, बल्कि व्यावहारिक है। उन्होंने कोई संकेत और चमत्कार या कोई अचंभा नहीं देखा है; वे ऊँचे शब्द और धर्म-सिद्धांत कहने या गहन अंतर्दृष्टियों को व्यक्त करने में सक्षम नहीं हैं; इसके बजाय, उनके पास वास्तविकता है और परमेश्वर के वचन हैं और परमेश्वर का व्यावहारिक और सच्चा ज्ञान है। क्या ऐसा समूह परमेश्वर के महान सामर्थ्य को प्रकट करने में अधिक सक्षम नहीं है? अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर का कार्य व्यावहारिक कार्य है। यीशु के युग के दौरान, वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए नहीं, बल्कि छुटकारा दिलाने के लिए आया, और इसलिए उसने लोगों से अपना अनुसरण करवाने के लिए कुछ चमत्कार प्रदर्शित किए। क्योंकि वह मुख्य रूप से सलीब पर चढ़ने का कार्य पूरा करने आया था, और संकेत दिखाना उसकी सेवकाई का हिस्सा नहीं था। इस प्रकार के संकेत और चमत्कार ऐसे कार्य थे, जो उसके कार्य को कारगर बनाने के लिए किए गए थे; वे अतिरिक्त कार्य थे, और संपूर्ण युग के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान भी परमेश्वर ने कुछ संकेत और चमत्कार दिखाए—किंतु आज परमेश्वर जो कार्य करता है, वह व्यावहारिक कार्य है, और वह अब निश्चित रूप से संकेत और चमत्कार नहीं दिखाएगा। यदि उसने संकेत और चमत्कार दिखाए, तो उसका व्यावहारिक कार्य अस्तव्यस्त हो जाएगा, और वह कोई और कार्य करने में असमर्थ होगा। यदि परमेश्वर कहता कि वह मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचन का उपयोग करेगा, लेकिन साथ ही संकेत और चमत्कार भी दिखाता, तो क्या इससे यह प्रकट हो पाता कि मनुष्य वास्तव में उस पर विश्वास करता है या नहीं? इसलिए परमेश्वर इस तरह की चीजें नहीं करता। मनुष्य के भीतर धर्म की अतिशय बातें हैं; अंत के दिनों में परमेश्वर मनुष्य के भीतर से सभी धार्मिक धारणाओं और अलौकिक बातों को बाहर निकालने, मनुष्य को परमेश्वर की व्यावहारिकता का ज्ञान कराने और परमेश्वर की वह छवि हटाने के लिए आया है, जो अज्ञात और काल्पनिक है और कहा जा सकता है कि उसका अस्तित्व ही नहीं है। और इसलिए, अब तुम्हारे लिए जो एकमात्र बहुमूल्य चीज है, वह है व्यावहारिकता का ज्ञान होना! सत्य सभी चीजों पर प्रबल है। आज तुम्हारे पास कितना सत्य है? क्या वे सब, जो संकेत और चमत्कार दिखाते हैं, परमेश्वर हैं? दुष्टात्माएँ भी संकेत और चमत्कार दिखा सकती हैं; तो क्या वे सब परमेश्वर हैं? परमेश्वर पर अपने विश्वास में मनुष्य जिसे खोजता है वह सत्य है, और वह जिसका अनुसरण करता है वह संकेतों और चमत्कारों के बजाय, जीवन है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, उन सबका यही लक्ष्य होना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है
297. यहोवा का कार्य दुनिया का सृजन था, वह आरंभ था; कार्य का यह चरण कार्य का अंत है, और यह समापन है। आरंभ में, परमेश्वर का कार्य इस्राएल के चुने हुए लोगों के बीच किया गया था और यह सभी जगहों में से सबसे पवित्र जगह पर एक अभूतपूर्व कार्य था। कार्य का अंतिम चरण दुनिया का न्याय करने और युग को समाप्त करने के लिए सभी देशों में से सबसे गंदे देश में किया जा रहा है। पहले चरण में, परमेश्वर का कार्य सबसे प्रकाशमान स्थान पर किया गया था और अंतिम चरण सबसे अंधकारमय स्थान पर किया जाता है, और यह अंधकार भगा दिया जाएगा, रोशनी लाई जाएगी और सब लोगों पर विजय प्राप्त की जाएगी। जब इस सबसे गंदे और सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी और समस्त आबादी स्वीकार कर लेगी कि परमेश्वर होता है, जो कि सच्चा परमेश्वर है, और हर व्यक्ति पूरी तरह से कायल हो जाएगा, तब समस्त ब्रह्मांड पर विजय प्राप्त करने का कार्य कार्यान्वित करने के लिए इस तथ्य का उपयोग किया जाएगा। कार्य का यह चरण प्रातिनिधिक है : एक बार इस युग का कार्य समाप्त हो गया, तो छह हजार वर्षों का प्रबंधन कार्य पूरी तरह से समाप्त हो जाएगा। जब सबसे अंधकारमय स्थान के लोगों को जीत लिया जाएगा, तो कहने की जरूरत नहीं है कि बाकी सब जगह भी ऐसा ही होगा। इस तरह, केवल चीन में विजय का कार्य ही प्रातिनिधिक महत्व रखता है। चीन अंधकार की सभी शक्तियों का मूर्त रूप है और चीन के लोग उन सभी लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं जो देह के हैं, शैतान के हैं, दैहिक हैं। चीनी लोग ही बड़े लाल अजगर द्वारा सबसे ज्यादा भ्रष्ट किए गए हैं, वही परमेश्वर के सबसे कट्टर विरोधी हैं, उन्हीं की मानवता सबसे अधम और सबसे गंदी है, इसलिए वे समस्त भ्रष्ट मानवता के आद्यरूप हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि अन्य देशों में कोई समस्या नहीं है; मनुष्य की धारणाएँ समान हैं, यद्यपि इन देशों के लोग अच्छी काबिलियत वाले हो सकते हैं, किन्तु यदि वे परमेश्वर को नहीं जानते हैं, तो अवश्य ही वे उसका विरोध करते होंगे। यहूदियों ने भी परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह क्यों किया? फरीसियों ने भी उसका विरोध क्यों किया? यहूदा ने यीशु के साथ विश्वासघात क्यों किया? उस समय, बहुत-से अनुयायी यीशु को नहीं जानते थे। यीशु को सूली पर चढ़ाये जाने और उसके फिर से जी उठने के बाद भी, लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया? क्या मनुष्य का विद्रोहीपन बिल्कुल समान नहीं है? बात बस इतनी है कि चीन के लोग इसके एक उदाहरण के रूप में पेश किए जाते हैं, जब उन पर विजय प्राप्त कर ली जाएगी तो वे एक मॉडल और नमूना बन जाएँगे और दूसरों के लिए संदर्भ का काम करेंगे। मैंने हमेशा क्यों कहा है कि तुम लोग मेरी प्रबंधन योजना का केवल एक गौण अंग हो? चीन के लोगों में ही भ्रष्टता, अशुद्धता, अधार्मिकता, विरोध और विद्रोहशीलता सर्वाधिक पूर्णता से व्यक्त होती हैं और अपने विविध रूपों में प्रकट होती हैं। एक लिहाज से, वे खराब काबिलियत के हैं और दूसरे लिहाज से, उनका जीवन और उनकी मानसिकता पिछड़ी हुई है, उनकी आदतें, सामाजिक वातावरण, जिस परिवार में वे जन्मे हैं—सभी दयनीय और सर्वाधिक पिछड़े हैं। उनकी हैसियत भी निम्न है। इस स्थान पर कार्य प्रातिनिधिक है, एक बार जब यह परीक्षा-कार्य पूरी तरह से कार्यान्वित हो जाएगा, तो परमेश्वर का उसके ठीक बाद का कार्य अधिक आसान हो जाएगा। जब कार्य का यह चरण पूरा हो जाएगा, तब अगला कार्य बिल्कुल भी कठिन नहीं होगा। एक बार जब कार्य का यह चरण सम्पन्न हो जाएगा, तो बड़ी सफलता पूरी तरह प्राप्त हो चुकी होगी और समस्त ब्रह्माण्ड में विजय का कार्य पूर्ण अंत तक पहुँच चुका होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (2)
298. परमेश्वर ने ब्रह्माण्ड में अपने कार्य का सम्पूर्ण ध्यान लोगों के इस समूह पर रखा है। उसने तुम लोगों के लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित कर दिया है; वह ब्रह्माण्ड में आत्मा का समस्त कार्य वापस ले चुका है और तुम लोगों को दे चुका है। इसी कारण से तुम लोग सौभाग्यशाली हो। इतना ही नहीं, वह अपनी महिमा इस्राएल, अपने चुने हुए लोगों से हटाकर तुम लोगों के ऊपर ले आया है और वह इस समूह के माध्यम से अपनी योजना का उद्देश्य पूर्ण रूप से प्रत्यक्ष करेगा। इसलिए तुम लोग ही वे हो जो परमेश्वर की विरासत प्राप्त करोगे और इससे भी अधिक, तुम परमेश्वर की महिमा के वारिस हो। तुम सब लोगों को शायद ये वचन स्मरण हों : “क्योंकि हमारा पल भर का हल्का-सा क्लेश हमारे लिए कहीं अधिक और अनन्त महिमा उत्पन्न करता जाता है।” तुम सब लोगों ने पहले भी ये वचन सुने हैं, किंतु तुममें से किसी ने भी उनका सच्चा अर्थ नहीं समझा। आज तुम उनके वास्तविक अर्थ से गहराई से अवगत हो। ये वचन परमेश्वर द्वारा अंत के दिनों के दौरान पूरे किए जाएँगे और वे उन लोगों में पूरे किए जाएँगे जिन्हें बड़े लाल अजगर द्वारा निर्दयतापूर्वक उत्पीड़ित किया गया है, उस देश में जहाँ वह कुण्डली मारकर बैठा है। बड़ा लाल अजगर परमेश्वर को सताता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे होते हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य उस देश में कार्यान्वित करता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए उसका संपूर्ण कार्य प्रचंड बाधाओं का सामना करता है और उसके बहुत-से वचन तुरंत पूरे नहीं हो सकते हैं; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो पीड़ा सहने का हिस्सा भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है। लोगों की पीड़ा के माध्यम से, उनकी काबिलियत के माध्यम से और इस गंदे देश के लोगों के समस्त शैतानी स्वभावों के माध्यम से ही परमेश्वर शुद्धिकरण और विजय का अपना कार्य करता है, ताकि इससे वह महिमा प्राप्त कर सके और उन लोगों को प्राप्त कर सके जो उसके कर्मों की गवाही देते हैं। परमेश्वर ने इस समूह के लोगों के लिए जो समस्त कीमत चुकाई है, उसका सम्पूर्ण अर्थ यही है। अर्थात्, परमेश्वर विजय का कार्य उन्हीं लोगों के माध्यम से करता है जो उसका विरोध करते हैं, और केवल इसी प्रकार परमेश्वर की महान सामर्थ्य प्रकट हो सकती है। दूसरे शब्दों में, गंदे देश के लोग ही परमेश्वर की महिमा को विरासत में पाने के योग्य हैं, और केवल यही परमेश्वर की महान सामर्थ्य को उभारकर सामने ला सकता है। इसी कारण गंदे देश से ही, और गंदे देश में रहने वालों से ही परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है—परमेश्वर का ऐसा ही इरादा है। यह बिल्कुल यीशु के कार्य के चरण जैसा है : वह केवल उन्हीं फरीसियों के बीच महिमा प्राप्त कर सकता था जिन्होंने उसे सताया था; यदि फरीसियों द्वारा किया गया उत्पीड़न और यहूदा द्वारा दिया गया धोखा नहीं होता, तो यीशु का उपहास नहीं उड़ाया जाता या उसे लांछित नहीं किया जाता, सलीब पर तो और भी नहीं चढ़ाया जाता, और उसे कभी महिमा प्राप्त नहीं हो सकती थी। जहाँ परमेश्वर प्रत्येक युग में कार्य करता है, और जहाँ वह देह में कार्य करता है वहीं वह महिमा प्राप्त करता है और वहीं वह उन्हें प्राप्त करता है जिन्हें वह प्राप्त करना चाहता है। यही परमेश्वर के कार्य की योजना है और यही उसका प्रबंधन है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
299. परमेश्वर की कई हज़ार वर्षों की योजना में, कार्य के दो भाग देह में किए गए हैं : पहला है सलीब पर चढ़ाए जाने का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है; दूसरा है अंत के दिनों में विजय और पूर्णता का कार्य, जिसके लिए वह महिमा प्राप्त करता है। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। इसलिए परमेश्वर के कार्य, या तुम लोगों को दिए गए परमेश्वर के आदेश को सीधी-सादी बात मत समझो। तुम सभी लोग परमेश्वर की कहीं अधिक असाधारण और अनंत महत्व की महिमा के वारिस हो, और यह परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से निश्चित किया गया था। उसकी महिमा के दो भागों में से एक तुम लोगों में अभिव्यक्त किया जाता है; परमेश्वर की महिमा का एक समूचा भाग तुम लोगों को प्रदान किया गया है, ताकि यह तुम लोगों की विरासत हो सके। यही परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है, और यह वह योजना भी है जो उसने बहुत पहले पूर्वनिर्धारित कर दी थी। जहाँ बड़ा लाल अजगर रहता है उस देश में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य की महानता को देखते हुए, यदि यह कार्य कहीं और ले जाया जाता, तो यह बहुत पहले अत्यंत फलदायी हो गया होता और मनुष्य द्वारा तत्परता से स्वीकार कर लिया जाता। यही नहीं, परमेश्वर में विश्वास करने वाले पश्चिम के पादरियों के लिए इस कार्य को स्वीकार कर पाना अत्यंत आसान होता, क्योंकि यीशु के कार्य का चरण एक मिसाल का काम करता है। यही कारण है कि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का यह चरण कहीं और पूरा कर पाने में असमर्थ है; जब कार्य का लोगों द्वारा समर्थन किया जाता है और उसे राज्य द्वारा मान्यता प्राप्त होती है तो परमेश्वर की महिमा स्थापित होने के लिए कोई जगह नहीं होती है। इस देश में कार्य के इस चरण का यही असाधारण महत्व है। तुम लोगों के बीच एक भी व्यक्ति नहीं है जो कानून द्वारा सुरक्षित है—बल्कि तुम कानून द्वारा दंडित किए जाते हो। इससे भी अधिक कठिनाई यह है कि लोग तुम लोगों को समझते नहीं हैं : चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र या तुम्हारे सहकर्मी हों, उनमें से कोई भी तुम लोगों को समझता नहीं है। जब परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को “त्याग दिया” जाता है, तब तुम लोगों के लिए इस दुनिया में जीते रह पाना असंभव हो जाता है, किंतु फिर भी, लोग परमेश्वर से दूर होना अभी भी सहन नहीं कर सकते हैं। यही परमेश्वर द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने का महत्व है और यही परमेश्वर की महिमा है। तुम लोगों ने आज के दिन जो विरासत पाई है वह युग-युगांतर से प्रेरितों और नबियों की विरासत से भी बढ़कर है और यहाँ तक कि मूसा और पतरस की विरासत से भी अधिक है। आशीष एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं; उन्हें एक बड़ी कीमत पर अर्जित किया जाना चाहिए। कहने का तात्पर्य यह है, तुम लोगों के पास वह प्रेम होना ही चाहिए जिसका शोधन हो चुका है, तुममें अत्यधिक आस्था होनी ही चाहिए, और तुम्हारे पास वे बहुत-से सत्य होने ही चाहिए जो परमेश्वर माँग करता है कि तुम प्राप्त करो; इससे भी बढ़कर, तुम्हें बिना भयभीत हुए या पीछे हटे न्याय की ओर मुड़ने में समर्थ होना चाहिए और ऐसा परमेश्वर-प्रेमी हृदय रखना चाहिए जो मृत्युपर्यंत स्थिर हो। तुम लोगों में संकल्प होना ही चाहिए, तुम लोगों के जीवन स्वभाव जरूर बदलने चाहिए; तुम लोगों की भ्रष्टता की चंगाई होनी ही चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सारे आयोजन बिना शिकायत स्वीकार करने ही चाहिए, और यहाँ तक कि मृत्युपर्यंत समर्पण करने में भी समर्थ होना चाहिए। यही तुम्हें हासिल करना है, यही परमेश्वर के कार्य का अंतिम लक्ष्य है और यही अपेक्षा परमेश्वर लोगों के इस समूह से करता है। चूँकि वह तुम लोगों को देता है, इसलिए वह बदले में तुम लोगों से निश्चय ही माँगेगा, और निश्चय ही तुमसे उचित माँगें रखेगा। इसलिए, परमेश्वर द्वारा किए गए समस्त कार्य के पीछे एक कारण होता है। इससे यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर बार-बार ऐसा कार्य क्यों करता है जो इतने उच्च मानक स्थापित करता और कड़ी अपेक्षाएँ करता है। इसलिए, तुम लोगों को परमेश्वर में आस्था से ओतप्रोत होना चाहिए। संक्षेप में, परमेश्वर का समूचा कार्य तुम लोगों के लिए किया जाता है, यह इसलिए किया जाता है ताकि तुम लोग उसकी विरासत पाने के योग्य बन सको। यह कहने के बजाय कि यह परमेश्वर की अपनी महिमा के लिए है, यह कहना बेहतर होगा कि यह तुम लोगों के उद्धार के लिए है और इस समूह के लोगों को पूर्ण बनाने के लिए है जो गंदे देश में अत्यंत पीड़ित हैं। तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा समझना चाहिए। और इसलिए, मैं बहुत-से ऐसे अज्ञानी लोगों को नसीहत देता हूँ जिनमें न कोई अंतर्दृष्टि है न विवेक : परमेश्वर की परीक्षा मत लो, तथा अब और प्रतिरोध मत करो। परमेश्वर पहले ही ऐसी सारी पीड़ा से गुजर चुका है जो मनुष्य ने कभी नहीं सही है और वह बहुत पहले मनुष्य के बदले और भी अधिक अपमान सह चुका है। तो फिर ऐसा क्या है जिसे तुम छोड़ नहीं सकते? परमेश्वर के इरादे से अधिक महत्वपूर्ण और क्या हो सकता है? परमेश्वर के प्रेम से बढ़कर और क्या हो सकता है? परमेश्वर के लिए इस गंदे देश में कार्य करना पहले से ही काफी कठिन है; उस पर यदि मनुष्य जानबूझकर और सोच-समझकर गलत काम करता है, तो परमेश्वर का कार्य और लंबा खींचना पड़ेगा। संक्षेप में, यह किसी के हित में नहीं है, और इसमें किसी का लाभ नहीं है। परमेश्वर समय से बंधा नहीं है; उसका कार्य और उसकी महिमा सबसे पहले आते हैं। इसलिए, जब तक कोई चीज उसके कार्य का हिस्सा है तो वह उसके लिए कोई भी कीमत चुकाएगा, चाहे इसमें जितना भी समय लगे। यह परमेश्वर का स्वभाव है : वह तब तक विश्राम नहीं करेगा जब तक उसका कार्य पूरा नहीं हो जाता है। उसका कार्य तभी समाप्त होगा जब वह अपनी महिमा का दूसरा भाग प्राप्त कर लेता है। समस्त ब्रह्माण्ड में यदि परमेश्वर महिमा पाने के कार्य का दूसरा भाग पूरा नहीं कर पाता है, तो उसका दिन कभी नहीं आएगा, उसका हाथ अपने चुने हुए लोगों पर से कभी नहीं हटेगा, उसकी महिमा इस्राएल पर कभी नहीं उतरेगी, और उसकी योजना कभी समाप्त नहीं होगी। तुम लोगों को परमेश्वर का इरादा देखने में सक्षम होना चाहिए और तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना सरल नहीं है। ऐसा इसलिए है क्योंकि आज का कार्य उन लोगों का रूपांतरण करना है जो भ्रष्ट किए जा चुके हैं, जो बेहद सुन्न हैं, यह उन्हें शुद्ध करने के लिए है जो सृजित किए गए थे किंतु शैतान द्वारा संसाधित किए गए थे। यह आदम और हव्वा का सृजन नहीं है, यह प्रकाश का सृजन, या प्रत्येक पौधे और पशु का सृजन तो और भी नहीं है। परमेश्वर शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दी गई चीजों को शुद्ध करता है और फिर उन्हें नए सिरे से प्राप्त करता है, उन्हें ऐसी चीजें बनाता है, जो उसकी होती हैं और उन्हें अपनी महिमा बनाता है। यह स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के सृजन जितना आसान नहीं है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, न ही यह शैतान को अथाह कुंड में जाने का शाप देने के कार्य जैसा है जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है। बल्कि, यह मनुष्य का कायापलट करने का कार्य है, उन चीजों को जो नकारात्मक हैं, और उसकी नहीं हैं, ऐसी चीजों में बदलने का कार्य है जो सकारात्मक हैं और उसकी हैं। परमेश्वर के कार्य के इस चरण के पीछे की यही वास्तविक कहानी है। तुम लोगों को यह समझना ही चाहिए, और विषयों को अत्यधिक सरलीकृत करने से बचना चाहिए। परमेश्वर का कार्य किसी भी साधारण कार्य के समान नहीं है। इसकी अद्भुतता और बुद्धि मनुष्य की सोच से परे हैं। परमेश्वर कार्य के इस चरण के दौरान सभी चीजों का सृजन नहीं करता है, किंतु वह उन्हें नष्ट भी नहीं करता है। इसके बजाय, वह अपनी सृजित की गई सभी चीजों का कायापलट करता है, और शैतान द्वारा दूषित कर दी गई सभी चीजों को शुद्ध करता है। और इस प्रकार, परमेश्वर एक महान उद्यम आरंभ करता है। यही परमेश्वर के कार्य का संपूर्ण महत्व है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?
300. परमेश्वर लोगों के प्रबंधन का उपयोग शैतान को पराजित करने के लिए करता है। लोगों को भ्रष्ट करके शैतान लोगों के भाग्य का अंत कर देता है और परमेश्वर के कार्य में बाधा डालता है। दूसरी ओर, परमेश्वर का कार्य मनुष्यों का उद्धार करना है। परमेश्वर के कार्य का कौन-सा कदम मानवजाति को बचाने के अभिप्राय से नहीं है? कौन-सा कदम लोगों को शुद्ध करने, उनसे धार्मिक आचरण करवाने और उन्हें एक प्यारी छवि जीने देने के लिए नहीं है? लेकिन शैतान ऐसा नहीं करता है। वह मानवजाति को भ्रष्ट करता है; मानवजाति को भ्रष्ट करने के अपने कार्य को ब्रह्मांड के अंदर निरंतर करता रहता है। निस्संदेह, परमेश्वर भी अपना स्वयं का कार्य करता है। वह शैतान की ओर जरा भी ध्यान नहीं देता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि शैतान के पास कितना अधिकार है, उसे यह अधिकार परमेश्वर द्वारा ही दिया गया था; परमेश्वर ने उसे अपना पूरा अधिकार नहीं दिया था, और इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर से आगे नहीं बढ़ सकता और सदैव परमेश्वर की पकड़ में रहेगा। परमेश्वर ने स्वर्ग में रहने के समय अपने किसी भी कर्म को प्रकट नहीं किया। उसने शैतान को स्वर्गदूतों पर नियंत्रण रखने की अनुमति देने के लिए उसे अपने अधिकार में से मात्र कुछ हिस्सा ही दिया था। इसलिए वह चाहे जो कुछ करे, वह परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर नहीं हो सकता है, क्योंकि परमेश्वर ने मूल रूप से उसे जो अधिकार दिया है वह सीमित है। जैसे-जैसे परमेश्वर कार्य करता है, शैतान बाधा डालता है। अंत के दिनों में, उसके विघ्न समाप्त हो जाएंगे; उसी तरह, परमेश्वर का कार्य भी पूरा हो जाएगा, और परमेश्वर जिन लोगों को पूर्ण करना चाहता है उन्हें पूर्ण कर दिया जाएगा। परमेश्वर लोगों को सकारात्मक रूप से निर्देशित करता है; उसका जीवन जीवित जल है, अपार और असीम है। शैतान ने मनुष्य को एक हद तक भ्रष्ट किया है; अंत में, जीवन का जीवित जल मनुष्य को पूर्ण करेगा और शैतान के लिए हस्तक्षेप करना और अपना कार्य करना असंभव हो जाएगा। इस प्रकार, परमेश्वर इन लोगों को पूर्णतः प्राप्त करने में समर्थ हो जाएगा। शैतान अब भी विद्रोही बना रहता है; वह लगातार परमेश्वर से होड़ करने की कोशिश में लगा रहता है, परंतु परमेश्वर उस पर कोई ध्यान नहीं देता है। परमेश्वर ने कहा है, “मैं शैतान की सभी अंधकार की शक्तियों के ऊपर और उसके सभी अंधकारमय प्रभावों के ऊपर विजय प्राप्त करूँगा।” यही वह कार्य है जो देह में किया जाना है और यही परमेश्वर के देहधारण का महत्व भी है : अंत के दिनों में शैतान को पराजित करने के कार्य के चरण को पूरा करना और शैतान की सभी चीजों को मिटाना। परमेश्वर की शैतान पर विजय अपरिहार्य है! वास्तव में शैतान बहुत पहले ही असफल हो चुका है। जब बड़े लाल अजगर के पूरे देश में सुसमाचार फैलने लगा—अर्थात्, जब देहधारी परमेश्वर ने कार्य करना आरंभ किया और यह कार्य आगे बढ़ने लगा—शैतान बुरी तरह परास्त हो गया था, क्योंकि देहधारण का मूल उद्देश्य ही शैतान को पराजित करना था। शैतान ने देखा कि परमेश्वर एक बार फिर से देहधारी हुआ है और उसने अपना कार्य करना भी आरंभ कर दिया, जिसे कोई भी शक्ति रोक नहीं सकती, और जब उसने इस कार्य को देखा, तो वह अवाक रह गया और उसने कुछ और करने का साहस नहीं किया। पहले-पहल तो शैतान ने सोचा कि उसके पास भी प्रचुर बुद्धि है, और उसने परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ी की और विघ्न डाला; लेकिन, उसने यह आशा नहीं की थी कि परमेश्वर एक बार फिर देह बन जाएगा, या अपने कार्य में, परमेश्वर शैतान के विद्रोहीपन का उपयोग मानवजाति को उजागर करने और उसका न्याय करने में करेगा, जिससे वह मनुष्यों को जीतेगा और शैतान को पराजित करेगा। परमेश्वर शैतान की अपेक्षा अधिक बुद्धिमान है, और उसका कार्य शैतान के कार्य से बहुत बढ़कर है। इसलिए, जैसा मैंने पहले कहा था : “मैं जिस कार्य को करता हूँ वह शैतान की साजिशों के जवाब में किया जाता है; अंत में, मैं अपनी सर्वशक्तिमत्ता और शैतान की सामर्थ्यहीनता को प्रकट करूँगा।” परमेश्वर अपना कार्य करते हुए सामने रहेगा, जबकि शैतान बाधा डालने के लिए लगातार उसके पीछे लगा रहेगा, जब तक कि अंत में वह अंततः नष्ट नहीं हो जाता है—उसे पता भी नहीं चलेगा कि उस पर किस चीज ने प्रहार किया! कुचलकर चूर-चूर कर दिए जाने के बाद ही उसे सत्य का ज्ञान होगा और तब तक वह आग की झील में पहले ही जलाया जा चुका होगा। तब क्या वह पूरी तरह से विश्वस्त नहीं हो जाएगा? क्योंकि उसके पास चलने के लिए और कोई चालें नहीं होंगी!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई
301. बड़े लाल अजगर के देश में मैंने कार्य का एक ऐसा चरण पूरा कर लिया है जिसकी थाह मनुष्य नहीं पा सकते, जिसके कारण वे हवा में डोलने लगते हैं, जिसके बाद कई लोग हवा के वेग में चुपचाप बह जाते हैं। सचमुच, यह एक ऐसा “खलिहान” है जिसे मैं साफ करने वाला हूँ, यही मेरी लालसा है और यही मेरी योजना है। क्योंकि मेरे कार्य करते समय कई कुकर्मी घुस आए हैं, लेकिन मुझे उन्हें खदेड़ने की कोई जल्दी नहीं है। इसके बजाय, सही समय आने पर मैं उन्हें तितर-बितर कर दूँगा। केवल इसके बाद ही मैं जीवन का सोता बनूँगा, और जो लोग मुझसे सच में प्रेम करते हैं, उन्हें अपने से अंजीर के पेड़ का फल और कुमुदिनी की सुगंध प्राप्त करने दूँगा। जिस देश में शैतान का डेरा है, जो गर्दो-गुबार का देश है, वहाँ शुद्ध सोना नहीं रहा, सिर्फ रेत ही रेत है, और इसलिए, इन हालात को देखते हुए, मैं कार्य का ऐसा चरण पूरा करता हूँ। तुम्हें पता होना चाहिए कि मैं जो प्राप्त करता हूँ, वह रेत नहीं, शुद्ध, परिष्कृत सोना है। कुकर्मी लोग मेरे घर में कैसे रह सकते हैं? मैं लोमड़ियों को अपने स्वर्ग में परजीवियों की तरह जीने देना कैसे सहन कर सकता हूँ? मैं उन्हें खदेड़ने के लिए हर संभव तरीका अपनाता हूँ। मेरे इरादे प्रकट होने से पहले कोई यह नहीं जानता कि मैं क्या करने वाला हूँ। इस अवसर का लाभ उठाते हुए मैं उन कुकर्मियों को दूर खदेड़ देता हूँ, और वे मेरी उपस्थिति छोड़कर जाने के लिए मजबूर हो जाते हैं। मैं कुकर्मियों के साथ यही करता हूँ, लेकिन फिर भी उनके लिए एक ऐसा दिन होगा जब वे मेरे लिए सेवा करेंगे। लोगों की आशीष पाने की इच्छा अत्यंत प्रबल है; इसलिए मैं उनकी ओर पीठ फेर लेता हूँ और अन्य-जाति राष्ट्रों को अपना महिमामय मुखमंडल दिखाता हूँ, ताकि सब लोग अपनी दुनिया में जी सकें और अपना आकलन कर सकें, इस दौरान मैं वे वचन कहता रहता हूँ जो मुझे कहने चाहिए और लोगों को उस चीज की आपूर्ति करता रहता हूँ जिसकी उन्हें आवश्यकता है। जब लोगों को होश आएगा, उससे बहुत पहले ही मैं अपने कार्य को फैला चुका हूँगा। उसके बाद मैं उनके सामने अपने इरादे व्यक्त करूँगा और उन पर अपने कार्य का दूसरा भाग शुरू करूँगा और सब लोगों को करीब से अपना अनुसरण करने दूँगा ताकि वे मेरे कार्य के साथ सहयोग करें, और उन्हें उनकी क्षमता के अनुसार वह सब कुछ करने दूँगा, जिससे वे मेरे साथ मिलकर उस कार्य को कर सकें जो मुझे अवश्य करना है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सात गर्जनाएँ गरजती हैं—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य का सुसमाचार पूरे ब्रह्मांड में फैल जाएगा
302. मेरी योजना में शैतान शुरू से लेकर अब तक प्रत्येक कदम के पीछे लगा रहा है और मेरी बुद्धि की विषमता के रूप में वह हमेशा मेरी मूल योजना में गड़बड़ी पैदा करने के तरीके और साधन खोजने की कोशिश करता रहा है। फिर भी क्या मैं उसकी साजिशों के आगे झुक सकता हूँ? क्या स्वर्ग और पृथ्वी में कुछ भी ऐसा है जो मेरी सेवा करने वाले के रूप में कार्य न करता हो? क्या शैतान की साजिशें संभवतः कोई अपवाद हो सकती हैं? ठीक यही वह जगह है जहाँ मेरी बुद्धि आकर मिलती है; ठीक यही वह है जो मेरे कर्मों के बारे में अद्भुत है और यही मेरी पूरी प्रबंधन योजना के परिचालन का सिद्धांत है। राज्य के निर्माण के युग के दौरान भी मैं शैतान की साजिशों से बचता नहीं हूँ, बल्कि वही कार्य करता रहता हूँ जो मुझे करना ही चाहिए। ब्रह्मांड और सभी चीजों के बीच मैंने अपनी विषमता के रूप में शैतान के कर्मों को चुना है। क्या यह मेरी बुद्धि की अभिव्यक्ति नहीं है? क्या यह ठीक वही नहीं है जो मेरे कार्य के बारे में अद्भुत है? राज्य के युग में प्रवेश के अवसर पर स्वर्ग में और स्वर्ग के नीचे सभी चीजों का पूर्णतः कायापलट हो जाता है और वे आनंदित और उल्लसित हो उठती हैं। क्या तुम लोग कोई अलग हो? किसके हृदय में शहद की मिठास नहीं है? किसका हृदय आनंद के लिए नहीं उमड़ रहा है? खुशी से किसके हाथ-पैर नृत्य नहीं करते? किसका मुख स्तुति के वचन नहीं बोलता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 8
303. जब परमेश्वर के सभी लोग पूर्ण किए जा चुके होंगे और पृथ्वी के सभी देश मसीह का राज्य बन चुके होंगे, तो यही वह समय होगा जब सात गर्जनाएँ गूँजेंगी। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में एक लंबा कदम है; उस दिन की ओर बढ़ने के लिए धावा बोल दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है और निकट भविष्य में यह साकार हो जाएगी। लेकिन, परमेश्वर जो कुछ भी कहता है, वह सब पहले ही उसके द्वारा पूरा कर दिया गया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं, ढह जाने के कगार पर हैं—अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना पूरी तरह से सफल हो, स्वर्गदूत मानव संसार में उतर आए हैं, उन्होंने परमेश्वर को संतुष्ट करने का भरसक प्रयास करना शुरू कर दिया है और देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में स्वयं मौजूद है। जहाँ देहधारी देह होती है, वहीं शत्रु पूर्णतया नष्ट हो जाता है। सबसे पहले चीन नष्ट होगा; परमेश्वर के हाथों इसका सर्वनाश कर दिया जाएगा। परमेश्वर इस पर कतई कोई भी दया नहीं दिखाएगा। जैसे-जैसे परमेश्वर के लोग अधिक परिपक्व होते जाते हैं, वैसे-वैसे यह सिद्ध होता जाता है कि बड़ा लाल अजगर और भी ढहता जा रहा है; यह मनुष्य के लिए स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर है। परमेश्वर के लोगों की परिपक्वता दुश्मन के पतन का संकेत है। यह “प्रतिस्पर्धा करने” के अर्थ का थोड़ा स्पष्टीकरण है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 10
304. मैं राज्य में शासन करता हूँ, और इससे भी अधिक, मैं पूरे ब्रह्मांड में शासन करता हूँ; मैं राज्य का राजा और ब्रह्मांड का मुखिया दोनों हूँ। अब से मैं उन सभी को इकट्ठा करूँगा, जो चुने हुए लोग नहीं हैं और अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपना कार्य आरंभ करूँगा, और मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए अपने प्रशासनिक आदेशों की घोषणा करूँगा, ताकि मैं सुचारु रूप से अपने कार्य के अगले चरण की शुरुआत कर सकूँ। अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपने कार्य को फैलाने के लिए मैं ताड़ना का उपयोग करूँगा, जिसका अर्थ है कि मैं उन सभी के विरुद्ध “बल” का उपयोग करूँगा, जो अन्यजातियाँ हैं। स्वाभाविक रूप से, यह कार्य उसी समय किया जाएगा, जिस समय मेरा कार्य चुने हुए लोगों के बीच किया जाएगा। जब मेरे लोग पृथ्वी पर बतौर राजा शासन करेंगे और सामर्थ्य का उपयोग करेंगे, तो यही वह दिन भी होगा जब पृथ्वी के सभी लोगों को जीत लिया जाएगा, और, इससे भी अधिक, यही वह समय होगा जब मैं विश्राम करूँगा—और तभी मैं उन सबके सामने प्रकट होऊँगा, जिन्हें जीता जा चुका है। मैं पवित्र राज्य के समक्ष प्रकट होता हूँ, और अपने आपको मलिनता की भूमि से छिपा लेता हूँ। वे सभी, जिन्हें जीता जा चुका है और जो मेरे सामने समर्पित हो गए हैं, अपनी आँखों से मेरे चेहरे को देखने और अपने कानों से मेरी वाणी सुनने में समर्थ हैं। यह उन लोगों के लिए आशीष है, जो अंत के दिनों में पैदा हुए हैं, यह मेरे द्वारा पूर्वनियत किया गया आशीष है, और यह किसी भी मनुष्य के द्वारा अपरिवर्तनीय है। आज मैं भविष्य के कार्य के वास्ते इस तरीके से कार्य करता हूँ। मेरा समस्त कार्य परस्पर-संबंधित है, इस सबमें एक आह्वान और अनुक्रिया है : कभी भी कोई चरण अचानक नहीं रुका है, और कभी भी किसी भी कदम को किसी भी अन्य कदम से स्वतंत्र रूप से नहीं किया गया है। क्या ऐसा नहीं है? क्या अतीत का कार्य आज के कार्य की नींव नहीं है? क्या अतीत के वचन आज के वचनों के अग्रदूत नहीं हैं? क्या अतीत के चरण आज के चरणों के उद्गम नहीं हैं? जब मैं औपचारिक रूप से पुस्तक खोलता हूँ, तो ऐसा तब होता है जब संपूर्ण ब्रह्मांड के लोगों को ताड़ना दी जाती है, जब दुनिया भर के लोगों को परीक्षणों के अधीन किया जाता है, और यह मेरे काम की पराकाष्ठा है; सभी लोग एक प्रकाशरहित भूमि में रहते हैं, और सभी लोग अपने वातावरण द्वारा खड़े किए गए खतरे के बीच रहते हैं। दूसरे शब्दों में, यही वह जीवन है, जिसे मनुष्य ने सृष्टि की उत्पत्ति के समय से लेकर आज तक कभी अनुभव नहीं किया है, और युगों-युगों से किसी ने भी इस प्रकार के जीवन का “आनंद” नहीं लिया है, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मैंने वह कार्य किया है, जो पहले कभी नहीं किया गया है। यह मामलों की वास्तविक स्थिति है, और यही आंतरिक अर्थ है। चूँकि मेरा दिन समस्त मानवजाति के नजदीक आ रहा है, चूँकि यह दूर प्रतीत नहीं होता, बल्कि यह मनुष्य की आँखों के बिल्कुल सामने ही है, तो परिणामस्वरूप कौन भयभीत नहीं हो सकता? और कौन इसमें आनंदित नहीं हो सकता? बेबिलोन के गंदे शहर का अंततः अपने आखिरी दिन से सामना हो गया है; मनुष्य का एक बिलकुल नए संसार से पुनर्मिलन करा दिया गया है, स्वर्ग और पृथ्वी परिवर्तित और नवीकृत कर दिए गए हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 29
305. जब पृथ्वी पर सीनियों का देश साकार होगा—जब राज्य साकार होगा—तो पृथ्वी पर और युद्ध नहीं होंगे; फिर कभी अकाल, महामारी और भूकंप नहीं आएँगे, लोग हथियारों का उत्पादन बंद कर देंगे; सभी शांति और स्थिरता में रहेंगे; लोगों के बीच सामान्य व्यवहार होंगे और देशों के बीच भी सामान्य व्यवहार होंगे। फिर भी वर्तमान की इससे कोई तुलना नहीं है। स्वर्ग के नीचे सब कुछ अराजक है और हर देश में धीरे-धीरे तख़्तापलट की शुरुआत हो रही है। परमेश्वर के कथनों के साथ-साथ, लोग धीरे-धीरे बदल रहे हैं और आंतरिक रूप से, हर देश धीरे-धीरे टूट रहा है। रेत के महल की तरह बेबीलोन की स्थिर नींव हिलनी शुरू हो गयी है, और जैसे ही परमेश्वर के इरादों में बदलाव होता है, दुनिया में अनजाने में भारी बदलाव होने लगते हैं, और किसी भी समय हर तरह के चिह्न प्रकट होने लगते हैं, जो दिखाता है कि दुनिया के अंत का दिन आ गया है! यह परमेश्वर की योजना है और इन्हीं कदमों के जरिए वह कार्य करता है। निश्चित रूप से हर देश टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर जाएगा और पुराने सदोम का दूसरी बार सर्वनाश होगा। इस प्रकार परमेश्वर कहता है, “संसार का स्खलन हो रहा है! बेबीलोन पंगु होने की स्थिति में है!” स्वयं परमेश्वर के अलावा और कोई इसे पूरी तरह से समझ नहीं सकता; आख़िरकार, लोगों की जागरूकता की एक सीमा है। उदाहरण के लिए, आंतरिक मामलों के मंत्रियों को पता हो सकता है कि वर्तमान परिस्थितियाँ अस्थिर और अराजक हैं, लेकिन वे उनका समाधान करने में असमर्थ हैं। वे केवल धारा के संग बह सकते हैं, अपने हृदय में उस दिन की आस लगाए हुए, जब वे अपने मस्तक उन्नत रख सकेंगे, जब सूर्य एक बार फिर से पूर्व में उगेगा, देश भर में चमकेगा और इस दुःखद स्थिति को पलट देगा। लेकिन उन्हें पता नहीं कि जब सूर्य दूसरी बार उगता है, तो इसका उदय चीजों को पहले जैसी स्थिति में लाने के उद्देश्य से नहीं होता है—यह एक पुनरुत्थान होता है, एक संपूर्ण परिवर्तन। पूरे ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर की योजना ऐसी ही है। वह एक नई दुनिया को अस्तित्व में लाएगा लेकिन सबसे पहले वह इंसान का नवीनीकरण करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 22 के साथ अध्याय 23
306. यह कहा जा सकता है कि आज के सभी वचन भविष्य के मामलों की भविष्यवाणी करते हैं और वे परमेश्वर के कार्य के अगले कदम के लिए उसकी व्यवस्थाओं का वर्णन करते हैं। परमेश्वर ने कलीसिया के लोगों पर अपना काम लगभग पूरा कर लिया है और इसके बाद वह सभी लोगों के सामने क्रोध के साथ प्रकट होगा। जैसा कि परमेश्वर कहता है, “मैं धरती के लोगों से अपने कार्यों को स्वीकार करवाऊँगा और ‘न्यायपीठ’ के सामने अपने कर्म साबित करवाऊँगा, पूरी पृथ्वी के लोगों के बीच अपने कर्म स्वीकार करवाऊँगा और सभी को झुका दूँगा।” क्या तुम लोगों ने इन वचनों में कुछ देखा? इनमें परमेश्वर के कार्य के अगले हिस्से का सारांश है। पहले परमेश्वर उन सभी संरक्षक कुत्तों को, जो राजनीतिक शक्ति का संचालन करते हैं, पूरी तरह से आश्वस्त करेगा और वे इतिहास के मंच से खुद अपनी मर्जी से पीछे हट जाएँगे, ताकि वे फिर कभी प्रतिष्ठा के लिए न लड़ें और फिर कभी कुचक्रों तथा षड्यंत्रों में न उलझें। यह कार्य परमेश्वर द्वारा पृथ्वी पर लाई गई विभिन्न आपदाओं के जरिये करना होगा। लेकिन परमेश्वर प्रकट नहीं होगा। इस समय, बड़े लाल अजगर का देश अभी भी गंदगी की भूमि होगा, और इसलिए परमेश्वर प्रकट नहीं होगा, परंतु केवल ताड़ना के रूप में उभरेगा। ऐसा है परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, जिससे कोई बच नहीं सकता। इस दौरान, बड़े लाल अजगर के देश में रहने वाले सभी लोग विपत्ति झेलेंगे, जिसमें स्वाभाविक रूप से पृथ्वी पर राज्य (कलीसिया) भी शामिल है। यह वही समय है जब लोगों के ऊपर तथ्य आएँगे। इसलिए इसका अनुभव सभी लोगों द्वारा किया जाता है, और कोई बच नहीं पाएगा। यह परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत किया गया है। ठीक कार्य के इसी चरण के कारण परमेश्वर कहता है, “यही समय है महान योजनाओं को पूरा करने का।” क्योंकि भविष्य में पृथ्वी पर कोई कलीसिया नहीं होगी और आपदाओं के आगमन के कारण लोग केवल उसी के बारे में सोच पाएँगे, जो उनके सामने होगा और बाकी हर चीज़ को वे नज़रअंदाज़ कर देंगे, और आपदाओं के बीच परमेश्वर का आनंद लेना उनके लिए मुश्किल होगा। इसलिए, लोगों से कहा जाता है कि वे इस अद्भुत समय में परमेश्वर से खुलकर और पूरी तरह से प्रेम करें, ताकि वे इस अवसर को गँवा न बैठें। जब यह तथ्य गुज़र जाएगा, तो परमेश्वर ने बड़े लाल अजगर को पूरी तरह हरा दिया होगा, और इस प्रकार परमेश्वर के लोगों का उसके लिए गवाही देने का कार्य समाप्त हो गया होगा; इसके बाद परमेश्वर कार्य के अगले चरण की शुरुआत करेगा, वह बड़े लाल अजगर के देश को तबाह कर देगा, और अंततः पूरे ब्रह्मांड के लोगों को सलीब पर उलटा लटका देगा, जिसके बाद वह पूरी मानवजाति को नष्ट कर देगा—ये परमेश्वर के कार्य के भावी चरण हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 42
307. सभी लोगों को पृथ्वी पर मेरे कार्य के प्रयोजन को समझने की आवश्यकता है, अर्थात् मैं अंततः क्या प्राप्त करने का इरादा रखता हूँ, और इस कार्य को पूरा करने से पहले मुझे इसमें कौन-सा स्तर प्राप्त कर लेना चाहिए। यदि आज तक मेरे साथ चलते रहने के बाद भी लोग यह नहीं समझते कि मेरा कार्य क्या है, तो क्या वे मेरे साथ व्यर्थ में नहीं चले? यदि लोग मेरा अनुसरण करते हैं, तो उन्हें मेरे इरादे जानने चाहिए। मैं पृथ्वी पर हज़ारों सालों से कार्य कर रहा हूँ और आज भी मैं अपना कार्य इसी तरह से जारी रखे हुए हूँ। यद्यपि मेरे कार्य में कई परियोजनाएँ शामिल हैं, किंतु इसका उद्देश्य अपरिवर्तित है; यद्यपि, उदाहरण के लिए, मैं मनुष्य के प्रति न्याय और ताड़ना से भरा हुआ हूँ, फिर भी मैं जो करता हूँ, वह उसे बचाने के वास्ते, और मनुष्य के पूर्ण किए जाने के बाद अपने सुसमाचार को बेहतर ढंग से फैलाने और अन्य-जाति देशों के बीच अपने कार्य को बेहतर ढंग से बढ़ाने के वास्ते है। इसलिए आज, एक ऐसे वक्त, जब कई लोग लंबे समय से अत्यधिक निराश रह चुके हैं, मैं अभी भी अपना कार्य जारी रखे हुए हूँ, मैं वह कार्य जारी रखे हुए हूँ जो मनुष्य को न्याय और ताड़ना देने के लिए मुझे करना चाहिए। इस तथ्य के बावजूद कि जो कुछ मैं कहता हूँ, मनुष्य उससे उकता गया है और मेरे कार्य से जुड़ने की उसकी कोई इच्छा नहीं है, मैं फिर भी वह कार्य कर रहा हूँ जो कि मुझे उचित रूप से करना चाहिए क्योंकि मेरे कार्य का उद्देश्य अपरिवर्तित है और मेरी मूल योजना भंग नहीं होगी। मेरे न्याय का उद्देश्य मनुष्य को मेरे प्रति बेहतर ढंग से समर्पण करने में सक्षम बनाना है, और मेरी ताड़ना का उद्देश्य मनुष्य को बेहतर ढंग से बदलाव हासिल करने में सक्षम बनाना है। यद्यपि मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह मेरे प्रबंधन के वास्ते है, फिर भी मैंने कभी ऐसा कोई कार्य नहीं किया है, जो मनुष्य के लाभ के लिए न रहा हो, क्योंकि मैं इस्राएल से बाहर की सभी जातियों को इस्राएलियों के समान ही समर्पित बनाने का इरादा रखता हूँ, उन्हें वास्तविक मनुष्य बनाना चाहता हूँ, ताकि इस्राएल के बाहर की भूमियों में मेरे लिए एक आधार बन सके। यही मेरा प्रबंधन है; यही मेरा अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच कार्य है। अभी भी बहुत-से लोग मेरे प्रबंधन को नहीं समझते, क्योंकि वे ऐसी बातों की परवाह नहीं करते हैं और इसके बजाय वे अपने स्वयं के भविष्य और मंजिल की ही परवाह करते हैं। मैं चाहे कुछ भी कहूँ, लोग उस कार्य के प्रति उदासीन रहते हैं जो मैं करता हूँ, इसके बजाय वे पूरे दिल से अपनी भविष्य की मंजिलों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं। अगर चीजें इसी तरह से चलती रहीं, तो मेरा कार्य कैसे फैल सकता है? मेरे सुसमाचार का पूरे संसार में कैसे प्रचार किया जा सकता है? तुम लोगों को जानना चाहिए कि जब मेरा कार्य फैलेगा, तो मैं तुम लोगों को तितर-बितर कर दूँगा और तुम्हें उसी प्रकार प्रहार करूँगा, जैसे यहोवा ने इस्राएल के प्रत्येक गोत्र पर प्रहार किया था। यह सब इसलिए किया जाएगा, ताकि मेरा सुसमाचार सारी पृथ्वी पर फैल सके और अन्य-जाति राष्ट्रों तक मेरा कार्य फैल सके, इस प्रकार मेरे नाम का वयस्कों और बच्चों, सभी के बीच, महान मानकर आदर किया जाएगा और मेरे पवित्र नाम की महिमा सभी जातियों और राष्ट्रों के लोगों के मुख से की जाएगी। इस अंतिम युग में मेरा नाम अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच बड़ाई पा सके, मेरे कर्म अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों द्वारा देखे जा सकें, ताकि मेरे कर्मों के कारण वे मुझे सर्वशक्तिमान कहें और मेरे वचन शीघ्र ही साकार हो सकें। मैं सभी लोगों को ज्ञात करवाऊँगा कि मैं केवल इस्राएलियों का परमेश्वर नहीं हूँ, बल्कि समस्त अन्य-जाति राष्ट्रों के लोगों का भी परमेश्वर हूँ, यहाँ तक कि उन राष्ट्रों का भी परमेश्वर हूँ जिन्हें मैंने शाप दिया है। मैं सभी लोगों को यह दिखाऊँगा कि मैं सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर हूँ। यह मेरा सबसे बड़ा कार्य है, अंत के दिनों के लिए मेरी कार्य-योजना का उद्देश्य है और यह एकमात्र कार्य है जिसे मैं अंत के दिनों में पूरा करने का इरादा रखता हूँ।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है
308. क्या तुम लोगों ने देखा है कि इस समूह के लोगों में परमेश्वर कौन-सा कार्य पूरा करेगा? परमेश्वर ने एक बार कहा था कि सहस्राब्दि राज्य में भी लोगों को उसके कथनों का पालन आगे करते रहना होगा और भविष्य में कनान के उत्तम देश में परमेश्वर के कथन मनुष्य के जीवन का सीधे तौर पर मार्गदर्शन करेंगे। जब मूसा निर्जन प्रदेश में था, तो परमेश्वर ने सीधे तौर पर उसे निर्देश दिया और उससे बात की। परमेश्वर ने लोगों के आनंद के लिए स्वर्ग से भोजन, पानी और मन्ना भेजा था और आज भी ऐसा ही है : लोगों के आनंद के लिए परमेश्वर ने स्वयं खाने और पीने की चीजें भिजवाई हैं और उसने लोगों को ताड़ना देने के लिए स्वयं शाप भेजे हैं। और इसलिए, अपने कार्य का प्रत्येक कदम व्यक्तिगत तौर पर परमेश्वर द्वारा ही उठाया जाता है। आज लोग तथ्यों के घटित होने की ताक में रहते हैं, वे संकेत और चमत्कार देखने का प्रयास करते हैं और संभव है कि ऐसे सभी लोग त्याग दिए जाएँगे, क्योंकि परमेश्वर का कार्य अधिकाधिक व्यावहारिक होता जा रहा है। कोई नहीं जानता कि परमेश्वर स्वर्ग से अवरोहण कर चुका है, वे इस बात से भी अनभिज्ञ हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग से भोजन और शक्तिवर्धक पेय भेजे हैं—किंतु परमेश्वर वास्तव में विद्यमान है और लोग सहस्राब्दि राज्य के जिस रोमांचक दृश्य की कल्पना करते हैं, वह भी परमेश्वर के स्वयं कथन व्यक्त करने का दृश्य है। यह तथ्य है, और केवल इसे ही पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना कहा जाता है। पृथ्वी पर परमेश्वर के साथ राज करना देह को संदर्भित करता है। जो देह का नहीं होता है वह पृथ्वी पर विद्यमान नहीं होता है, और इस प्रकार जो तीसरे स्वर्ग में जाने पर ध्यान केंद्रित करते हैं वे सब ऐसा व्यर्थ ही करते हैं। एक दिन, जब संपूर्ण विश्व परमेश्वर के पास वापस लौट जाएगा, तो ब्रह्मांड में उसके कार्य का केंद्र उसके कथनों का अनुसरण करेगा। अन्यत्र परमेश्वर के कथनों को प्राप्त करने के लिए कुछ लोग टेलीफोन का उपयोग करेंगे, कुछ लोग विमान पकड़ेंगे, कुछ लोग समुद्र के पार जाने के लिए नाव लेंगे और कुछ लोग लेज़र का उपयोग करेंगे। हर कोई सराहना और लालसा से परिपूर्ण होगा। वे सभी परमेश्वर के निकट आएँगे और परमेश्वर की ओर एकत्र हो जाएँगे और सभी परमेश्वर की आराधना करेंगे। और ये सब परमेश्वर के कर्म होंगे। इसे स्मरण रखो! परमेश्वर निश्चित रूप से कभी अन्यत्र कहीं फिर से आरंभ नहीं करेगा। परमेश्वर इस तथ्य को पूर्ण करेगा : वह ब्रह्मांड के सभी लोगों को अपने सम्मुख लाएगा और उनसे पृथ्वी के परमेश्वर की आराधना कराएगा। अन्य स्थानों पर उसका कार्य समाप्त हो जाएगा और लोगों को सच्चा मार्ग तलाशने के लिए मजबूर किया जाएगा। यह यूसुफ की तरह होगा : हर कोई भोजन के लिए उसके पास आया, और उसके सामने झुका, क्योंकि उसके पास खाने की चीजें थीं। अकाल के प्रकोप से बचने के लिए लोग सच्चा मार्ग तलाशने के लिए बाध्य होंगे। संपूर्ण धार्मिक जगत गंभीर अकाल से ग्रस्त होगा और केवल आज का परमेश्वर ही मनुष्य के आनंद के लिए हमेशा बहने वाले स्रोत से युक्त, जीवन देने वाले जल का स्रोत है और लोग आकर उस पर निर्भर हो जाएँगे। यह वह समय होगा जब परमेश्वर के कर्म प्रकट होंगे और जब परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा; ब्रह्मांड के सभी लोग इस साधारण “मनुष्य” के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने आएंगे। क्या यह परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का दिन नहीं होगा? एक दिन, बूढ़े पादरी जीवन के जल के झरने से पानी की माँग करते हुए टेलीग्राम भेजेंगे। वे बुज़ुर्ग होंगे, फिर भी वे इस व्यक्ति की आराधना करने आएँगे जिसे वे तुच्छ निगाहों से देखते थे। वे उसे अपने मुँह से स्वीकृति देंगे और अपने हृदय से उस पर विश्वास करेंगे—क्या यही संकेत और चमत्कार नहीं है? जिस दिन संपूर्ण राज्य आनंद करेगा, वह परमेश्वर के महिमा प्राप्त करने का दिन होगा, और जो कोई तुम लोगों के पास आएगा और परमेश्वर के शुभ समाचार को स्वीकार करेगा, वह परमेश्वर द्वारा धन्य किया जाएगा, और जो देश तथा लोग ऐसा करेंगे, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाएँगे और उनकी देखभाल की जाएगी। भविष्य की दिशा यह होगी : जो लोग परमेश्वर के कथन प्राप्त करेंगे उनके पास पृथ्वी पर आगे का मार्ग होगा और जो लोग परमेश्वर के कथनों से रहित हैं, वे चाहे व्यवसाय, वैज्ञानिक शोध या शिक्षा या उद्योग में लगे हुए हों, वे एक कदम चलना भी असंभव पाएंगे और सच्चा मार्ग खोजने के लिए बाध्य होंगे। “सत्य के साथ तुम संपूर्ण संसार में चलोगे; सत्य के बिना तुम कहीं नहीं पहुँचोगे” का यही अर्थ है। ये तथ्य हैं : संपूर्ण ब्रह्मांड को नियंत्रित करने और मानवजाति का स्वामी बनने और इसे जीतने के लिए परमेश्वर मार्ग का (अर्थात अपने समस्त वचनों का) उपयोग करता है। लोग हमेशा उन साधनों में एक बड़े बदलाव की आशा करते हैं, जिनके द्वारा परमेश्वर कार्य करता है। ईमानदारी से कहें तो, वचनों के माध्यम से ही परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करता है, और तुम्हें वह जो कहता है, उसे पूरा करना चाहिए, चाहे तुम्हारी वैसा करने की इच्छा हो या न हो; यह एक वस्तुनिष्ठ तथ्य है और सबको अवश्य स्वीकार होना चाहिए, और इसी तरह यह अपरिहार्य है और सबको ज्ञात है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है
309. परमेश्वर के वचन असंख्य घरों में फैलेंगे, सबको ज्ञात हो जाएँगे और केवल तभी उसका कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैल चुका होगा। कहने का अर्थ है कि अगर परमेश्वर का कार्य संपूर्ण ब्रह्मांड में फैलना है तो उसके वचनों का फैलना आवश्यक है। जिस दिन परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा, उस दिन परमेश्वर के वचन अपना अधिकार और शक्ति प्रदर्शित करेंगे। युगों के पहले से लेकर आज तक का उसका हर एक वचन पूरा और घटित होगा। इस प्रकार से, परमेश्वर पृथ्वी पर महिमा प्राप्त कर चुका होगा—कहने का अर्थ है, कि उसके वचन पृथ्वी पर सामर्थ्य का उपयोग करेंगे। परमेश्वर के मुँह से बोले गए वचनों के परिणामस्वरूप सभी बुरे लोगों को ताड़ित किया जाएगा और उसके मुँह से बोले गए वचनों के परिणामस्वरूप सभी धार्मिक लोग धन्य होंगे और उसके मुँह से बोले गए वचनों द्वारा सब कुछ स्थापित और संपन्न किया जाएगा। वह कोई संकेत या चमत्कार नहीं दिखाएगा; सब-कुछ उसके वचनों के द्वारा पूर्ण होगा, और उसके वचन तथ्यों को उत्पन्न करेंगे। पृथ्वी पर हर व्यक्ति परमेश्वर के वचनों का गुणगान और स्तुति करेगा; चाहे बालिग हों या बच्चे, स्त्री, पुरुष, बूढ़े या युवा, सभी लोग परमेश्वर के वचनों के अधीन आत्मसमर्पण करेंगे। परमेश्वर के वचन देह में प्रकट होते हैं, और लोगों को उन्हें पृथ्वी पर जीवंत और सजीव रूप में देखने में सक्षम बनाते हैं। वचन के देहधारी होने का यही अर्थ है। परमेश्वर पृथ्वी पर मुख्य रूप से “वचन देहधारी हुआ” के तथ्य को पूर्ण करने आया है, जिसका अर्थ है कि वह इसलिए आया है, ताकि उसके वचन देह से निर्गत हों (पुराने नियम में मूसा के समय की तरह नहीं, जब परमेश्वर की वाणी सीधे स्वर्ग से निर्गत होती थी)। इसके बाद उसके सारे वचन सहस्राब्दि राज्य के युग के दौरान पूर्ण होंगे, वे मनुष्यों की नजरों के सामने दिखाई देने वाले तथ्य बन जाएँगे और उनमें लेशमात्र भी अंतर के बिना लोग उन्हें अपनी आँखों से देखेंगे। यही परमेश्वर के देहधारण की बहुत बड़ी सार्थकता है। कहने का अर्थ है कि आत्मा का कार्य देह के माध्यम से और वचनों के माध्यम से पूर्ण होता है। यही “वचन देहधारी हुआ” और “वचन का देह में प्रकट होना” का सही अर्थ है। केवल परमेश्वर ही आत्मा के इरादों को व्यक्त कर सकता है और केवल देहधारी परमेश्वर ही आत्मा की ओर से बोल सकता है; परमेश्वर के वचन देहधारी परमेश्वर में अभिव्यक्त होते हैं और अन्य सभी उनके द्वारा मार्गदर्शित होते हैं। कोई भी इससे बाहर नहीं हो सकता है, सभी इसके दायरे के भीतर मौजूद हैं। केवल इन कथनों से ही लोग जागरूक हो सकते हैं; इनके बिना अगर लोग यह सोचते हैं कि वे कथनों को स्वर्ग से प्राप्त कर सकते हैं तो वे सपना देख रहे हैं। देहधारी परमेश्वर की देह में इस तरह का अधिकार प्रदर्शित होता है, जिससे सभी लोग उस पर पूरी आस्था के साथ विश्वास करते हैं। यहाँ तक कि सर्वाधिक सम्मानित विशेषज्ञ और धार्मिक पादरी भी इन वचनों को नहीं बोल सकते। उन सबको इनके नीचे आत्मसमर्पण करना चाहिए, और अन्य कोई भी दूसरी शुरुआत करने में सक्षम नहीं होगा। परमेश्वर ब्रह्मांड को जीतने के लिए वचनों का उपयोग करेगा। वह ऐसा अपने देहधारी शरीर के द्वारा नहीं, बल्कि संपूर्ण ब्रह्मांड के सभी लोगों को जीतने के लिए देहधारी हुए परमेश्वर के मुँह से कथनों के उपयोग द्वारा करेगा; केवल यही है देह बनने का तरीका और केवल यही है वचन का देह में प्रकट होना। शायद लोगों को ऐसा प्रतीत होता है कि मानो परमेश्वर ने कोई महान कार्य नहीं किया है—किंतु जब परमेश्वर अपने वचन कहेगा तो वे पूरी तरह आश्वस्त और स्तब्ध हो जाएँगे। बिना तथ्यों के, लोग चीखते और चिल्लाते हैं; परमेश्वर के वचनों से वे शांत हो जाते हैं। परमेश्वर इस तथ्य को निश्चित रूप से पूरा करेगा, क्योंकि यह परमेश्वर की लंबे समय से स्थापित योजना है : पृथ्वी पर वचन के आगमन के तथ्य का पूर्ण होना। वास्तव में, मुझे इसे बताने की कोई आवश्यकता नहीं है—पृथ्वी पर सहस्राब्दि राज्य का आगमन ही पृथ्वी पर परमेश्वर के वचनों का आगमन है। स्वर्ग से नए यरूशलेम का अवरोहण मनुष्य के बीच रहने, मनुष्य के प्रत्येक क्रियाकलाप और उसके प्रत्येक विचार और ख्याल में साथ देने के लिए परमेश्वर के वचनों का आगमन है। यह भी एक तथ्य है, जिसे परमेश्वर पूरा करेगा; यही सहस्राब्दि राज्य की खूबसूरती है। यह परमेश्वर द्वारा निर्धारित योजना है : उसके वचन एक हज़ार वर्षों तक पृथ्वी पर प्रकट होंगे, और वे उसके सभी कर्मों को प्रकट करेंगे और पृथ्वी पर उसके समस्त कार्य को पूरा करेंगे, जिसके बाद मानवजाति के इस चरण का अंत हो जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सहस्राब्दि राज्य आ चुका है