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सर्वशक्तिमान परमेश्वर, अंतिम दिनों के मसीह, के उत्कृष्ट वचन

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VI परमेश्वर के स्वभाव और उसके पास जो है और वह जो है, इस पर उत्कृष्ट वचन

1. परमेश्वर का आनन्द धार्मिकता और ज्योति की उपस्थिति और अभ्युदय से है; अँधकार और बुराई के विनाश से है। वह आनन्दित होता है क्योंकि वह मानवजाति के लिए ज्योति और अच्छा जीवन ले कर आया है; उसका आनन्द धार्मिकता का है, हर चीज़ के सकारात्मक होने का एक प्रतीक, और सब से बढ़कर कल्याण का प्रतीक। परमेश्वर का क्रोध मानवजाति को अन्याय की मौजूदगी और उसके हस्तक्षेप के कारण है पहुँचने वाली हानि के कारण है; बुराई और अँधकार की उपस्थिति के कारण, और ऐसी चीज़ों की उपस्थिति जो सत्य को बाहर धकेल देती है, और उस से भी बढ़कर ऐसी चीज़ों की उपस्थिति के कारण जो उनका विरोध करती हैं जो भला और सुन्दर है। उसका क्रोध एक चिह्न है कि वे सभी चीज़ें जो नकारात्मक हैं आगे से अस्तित्व में न रहें, और इसके अतिरिक्त यह पवित्रता का प्रतीक है। उसका दुखः मानवजाति के कारण है, जिसके लिए उस ने आशा की थी परन्तु वह अंधकार में गिर गई, क्योंकि जो कार्य वह मनष्यों के लिए करता है मनुष्य वह उसकी अपेक्षाओं पर खरा नहीं उतरता, और क्योंकि वह जिस मानवजाति से प्रेम करता है वह ज्योति में पूरी तरह जीवन नहीं जी पाती। वह अपनी भोलीभाली मानवजाति के लिए, ईमानदार किन्तु अनजान मनुष्य के लिए, और अच्छे और अनिश्चित भाव वाले मनुष्य के लिए दुखः की अनुभूति करता है। उसका दुखः उसकी भलाई और उसकी करूणा का चिह्नहै, और सुन्दरता और उदारता का चिह्नहै। उसकी प्रसन्नता, वास्तव में, अपने शत्रुओं को हराने और मनुष्यों के भले विश्वास को प्राप्त करने से आती है। इसके अतिरिक्त, सभी शत्रु ताकतों को भगाने और हराने से और मनुष्यों के द्वारा भले और शांतिपूर्ण जीवन को प्राप्त करने से आती है। परमेश्वर की प्रसन्नता, मनुष्य के आनंद के समान नहीं है; उसके बजाए, यह मनोहर फलों को प्राप्त करने का एहसास है, एक एहसास जो आनंद से बढ़कर है। उसकी प्रसन्नता इस बात का चिह्नहै कि मानवजाति दुखः की जंज़ीरों को तोड़कर आज़ाद होकर ज्योति के संसार में प्रवेश करती है। दूसरे रूप में, मानवजाति की भावनाएँ सिर्फ स्वयं के सारे स्वार्थों के उद्देश्य के तहत अस्तित्व में हैं, धार्मिकता, ज्योति, या जो सुन्दर है उसके लिए नहीं, और स्वर्ग के अनुग्रह के लिए तो बिल्कुल नहीं। मानव जाति की भावनाएँ स्वार्थी हैं और अँधकार के संसार से वास्ता रखती हैं। वे इच्छा के लिए नहीं हैं, परमेश्वर की योजना के लिए तो बिल्कुल नहीं। इसलिए मनुष्य और परमेश्वर को एक ही साँस मे बोला नहीं जा सकता है। परमेश्वर सर्वदा सर्वोच्च है और हमेशा आदरणीय है, जबकि मनुष्य सर्वदा तुच्छ और हमेशा से निकम्मा है। यह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर हमेशा बलिदान करता रहता है और मनुष्यों के लिए अपने आप को दे देता है; जबकि, मनुष्य हमेशा लेता है और सिर्फ अपने आप के लिए ही परिश्रम करता है। परमेश्वर सदा मानवजाति के अस्तित्व के लिए परिश्रम करता रहता है, फिर भी मनुष्य ज्योति और धार्मिकता में कभी भी कोई योगदान नहीं देता है। भले ही मनुष्य कुछ समय के लिए परिश्रम करे, लेकिन वह कमज़ोर होता है और हल्के से झटके का भी सामना नहीं सकता है, क्योंकि मनुष्य का परिश्रम केवल उसी के लिए होता है दूसरों के लिए नहीं। मनुष्य हमेशा स्वार्थी होता है, जबकि परमेश्वर सर्वदा स्वार्थविहीन होता है। परमेश्वर उन सब का स्रोत है जो धर्मी, अच्छा, और सुन्दर है, जबकि मनुष्य सब प्रकार की गन्दगी और बुराई का वाहक और फैलाने वाला है। परमेश्वर कभी भी अपनी धार्मिकता और सुन्दरता के सार-तत्व को नहीं पलटेगा, जबकि मनुष्य किसी भी समय धार्मिकता से विश्वासघात कर सकता है और परमेश्वर से दूर जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

2. सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक आध्यात्मिक शरीर में प्रकट हुआ है, और सिर से पैर तक देह या रक्त से बिल्‍कुल जुड़ा नहीं है। वह ब्रह्मांडीय दुनिया से परे है, और तीसरे स्वर्ग के गौरवशाली सिंहासन पर बैठा प्रशासन करता है! ब्रह्मांड की सभी चीज़ें मेरे हाथों में हैं। मैं जो भी कहूंगा वही होगा। मेरा आदेश पूरा होगा। शैतान मेरे पैरों के तले है, वह एक अथाह गड्ढे में है! मेरे एक आदेश के जारी होने पर तो आकाश और पृथ्वी टल जाएंगे और उनका कोई अस्तित्‍व नहीं रहेगा! सभी चीज़ें नवीनीकृत हो जाएंगी और यह एक अटल सत्य है, जो अत्‍यधिक सत्य है। मैंने दुनिया को जीत लिया है, सभी दुष्टों पर विजय प्राप्त की है। मैं यहाँ बैठा तुम लोगों से बात कर रहा हूँ; जिनके पास कान हैं, उन्हें सुनना चाहिए और जो जीवित हैं उन्हें स्वीकार करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 15" से उद्धृत

3. सर्वशक्तिमान परमेश्वर सर्वशक्तिसंपन्न, सर्वस्व प्राप्त करने वाला और पूरा सच्चा परमेश्वर है! वह न केवल सात सितारों को थामता है, सात आत्माओं को धारण करता है, सात आँखें रखता है, सात मुहरों को तोड़कर पुस्तक को खोलता है, लेकिन उससे भी अधिक वह सात विपत्तियों और सात कटोरों का प्रबंधन करता है और सात गर्जनों को खोलता है; बहुत पहले उसने सात तुरही बजाई हैं! उसके द्वारा बनाई और पूर्ण की गई सभी चीज़ों को उसकी प्रशंसा करनी चाहिए, उसे महिमा देनी चाहिए और उसके सिंहासन को सराहना चाहिए। हे, सर्वशक्तिमान परमेश्वर! तुम सर्वस्व हो, तुमने सब कुछ पूरा कर लिया है, और तुम्हारे साथ सब कुछ पूर्ण है, सब कुछ उज्ज्वल, बंधन से मुक्त, स्वतंत्र, मजबूत और शक्तिशाली है! गुप्त या छिपा हुआ कुछ भी नहीं है, तुम्हारे होते सभी रहस्य प्रकट हो जाते हैं। इसके अलावा, तुम अपने दुश्मनों के समूह का न्याय करते हो, अपने प्रताप को प्रदर्शित करते हो, अपनी उग्रता की आग दिखाते हो, अपना क्रोध दिखाते हो, और उससे भी अधिक तुम अपनी अभूतपूर्व, अनन्त, पूरी तरह से असीम महिमा को प्रदर्शित करते हो!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 34" से उद्धृत

4. सिय्योन! जयजयकार करो! सिय्योन! जोर-जोर से गाओ! मैं विजयोल्लास में वापस आ गया हूँ, मैं विजयी हो कर वापस आ गया हूँ! सभी लोग! व्यवस्थित रूप से पंक्तिबद्ध होने के लिए जल्दी करो! सभी चीज़ें! तुम सब पूरी तरह से ठहर जाओ, क्योंकि मेरा व्यक्तित्व पूरे ब्रह्मांड के सामने है और मेरा व्यक्तित्व दुनिया के पूर्व में प्रकट होता है! कौन आराधना में घुटने टेकने का साहस नहीं करता है? कौन सच्चे परमेश्वर के बारे में बात नहीं करने का साहस करता है? कौन सम्मान से नहीं देखने का साहस करता है? कौन स्तुति नहीं करने का साहस करता है? कौन जयघोष न करने का साहस करता है? मेरे लोग मेरी आवाज सुनेंगे, मेरे पुत्र मेरे राज्य के भीतर जीवित रहेंगे! पर्वत, नदियाँ, और सभी चीज़ें अविरत रूप से आनंदित होंगी, और बिना विराम के छलाँग लगाएँगी। इस समय, कोई भी पीछे हटने का साहस नहीं करेगा, कोई भी प्रतिरोध में उतरने का साहस नहीं करेगा। यह मेरा अद्भुत कर्म है, और उससे भी अधिक यह मेरी महान सामर्थ्य है! मैं अपने आप को सबसे उनके हृदयों में सम्मानित करवाऊँगा और उससे भी अधिक मैं सबसे अपनी स्तुति करवाऊँगा। छः हजार वर्षों की मेरी प्रबंधन योजना का यही अंतिम उद्देश्य है, और मैंने इसे नियत किया है। एक भी व्यक्ति, एक भी वस्तु या एक भी मामला, मेरा प्रतिरोध करने के लिए उठने का साहस नहीं करता है, या मेरा विरोध करने के लिए उठने का साहस नहीं करता है। मेरे सभी लोग मेरे पर्वत की ओर चले आएँगे (यह उस दुनिया को इंगित करता है जिसे मैं बाद में बनाऊँगा) और वे मेरे सामने समर्पण करेंगे क्योंकि मुझमें प्रताप और न्याय है, और मैं अधिकार रखता हूँ। (यह तब का उल्लेख करता है जब मैं शरीर में होता हूँ। मेरे पास देह में भी अधिकार है, किन्तु क्योंकि देह में समय और स्थान की सीमाओं से पार नहीं जाया जा सकता है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि मैंने पूरी महिमा प्राप्त कर ली है। यद्यपि मैं देह में ज्येष्ठ पुत्रों को प्राप्त करता हूँ, फिर भी यह अभी भी नहीं कहा जा सकता है कि मैंने महिमा प्राप्त कर ली है। जब मैं सिय्योन लौटता हूँ और अपने प्रकटन को बदलता हूँ केवल तभी ऐसा कहा जा सकता है कि मैं अधिकार रखता हूँ, अर्थात्, मैंने महिमा प्राप्त कर ली है)। मेरे लिए कुछ भी मुश्किल नहीं होगा। मेरे मुँह के वचनों से सब कुछ नष्ट हो जाएगा, और यह मेरे मुँह के वचनों की वजह से ही है कि वे अ-स्तित्व में आएँगे और पूर्ण बनाए जाएँगे, ऐसी मेरी महान सामर्थ्य है और ऐसा मेरा अधिकार है। क्योंकि मैं सामर्थ्य से भरपूर और अधिकार से परिपूर्ण हूँ, इसलिए कोई भी ऐसा व्यक्ति नहीं है जो मुझे बाधित करने का साहस कर सके। मैं पहले ही हर चीज़ पर विजय प्राप्त कर चुका हूँ और विद्रोह के सभी पुत्रों पर विजय प्राप्त कर चुका हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 120" से उद्धृत

5. मैंने अपनी महिमा इज़राइल को दी और फिर उसे हटा लिया, इसके बाद मैं इज़राइलियों के साथ-साथ पूरी इंसानियत को पूरब में ले आया। मैं उन सभी को प्रकाश में लेकर आया हूँ ताकि वे इसके साथ फिर से मिल जाएं और इससे जुड़े रह सकें, और उन्हें इसकी खोज न करनी पड़े। जो प्रकाश की खोज कर रहे हैं उन्हें मैं फिर से प्रकाश देखने दूंगा और उस महिमा को देखने दूंगा जो मेरे पास इज़राइल में थी; मैं उन्हें यह देखने दूंगा कि मैं बहुत पहले एक सफ़ेद बादल पर सवार होकर मनुष्यों के बीच आ चुका हूँ, मैं उन्हें असंख्य सफ़ेद बादल और प्रचुर मात्रा में फलों के समूह देखने दूंगा। यही नहीं, मैं उन्हें इज़राइल के यहोवा परमेश्वर को देखने दूंगा। मैं उन्हें यहूदियों के स्वामी, बहुप्रतीक्षित मसीहा को देखने दूंगा, और अपने पूर्ण प्रकटन को देखने दूंगा जिसे हर युग के राजाओं द्वारा सताया गया है। मैं संपूर्ण ब्रह्मांड पर कार्य करूंगा और मैं महान कार्य पूरा करूंगा, जो अंत के दिनों में लोगों के सामने मेरी पूरी महिमा और मेरे सारे कार्यों को प्रकट कर देगा। मैं अपना भव्य मुखमंडल संपूर्ण रूप में उन लोगों को दिखाऊंगा, जिन्होंने कई वर्षों से मेरी प्रतीक्षा की है, जो मुझे सफ़ेद बादल पर सवार होकर आते हुए देखने के लिए लालायित रहे हैं। मैं अपना यह रूप इज़राइल को दिखाऊंगा जिसने मेरे एक बार फिर प्रकट होने की लालसा की है। मैं उन सभी लोगों को अपना यह रूप दिखाउंगा जो मुझे कष्ट पहुंचाते हैं, ताकि सभी लोग यह जान सकें कि मैंने बहुत पहले ही अपनी महिमा को हटा लिया है और इसे पूरब में ले आया हूँ, जिस कारण यह अब यहूदिया में नहीं रही। क्योंकि अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे" से उद्धृत

6. मैं पूरे ब्रह्मांड में अपना कार्य कर रहा हूँ, और पूरब से असंख्य गर्जनायें गूँज रही हैं, जो सभी राष्ट्रों और संप्रदायों को झकझोर रही हैं। यह मेरी वाणी है जिसने वर्तमान में सभी मनुष्यों की अगुवाई की है। मैं अपनी वाणी से सभी मनुष्यों को जीत लूंगा, उन्हें इस धारा में बहाऊंगा और अपने सामने समर्पण करवाऊंगा, क्योंकि मैंने बहुत पहले पूरी पृथ्वी से अपनी महिमा को वापस लेकर इसे नये सिरे से पूरब में जारी किया है। भला कौन मेरी महिमा को देखने के लिए लालायित नहीं है? कौन बेसब्री से मेरे लौटने का इंतज़ार नहीं कर रहा है? किसे मेरे पुनः प्रकटन की प्यास नहीं है? कौन मेरी सुंदरता को देखने के लिए तरस नहीं रहा है? कौन प्रकाश में नहीं आना चाहता? कौन कनान की समृद्धि को नहीं देखना चाहता? किसे उद्धारकर्ता के लौटने की लालसा नहीं है? कौन महान सर्वशक्तिमान परमेश्वर की आराधना नहीं करता है? मेरी वाणी पूरी पृथ्वी पर फ़ैल जाएगी; अपने चुने हुए लोगों के समक्ष, मैं चाहता हूँ कि मैं उनसे अधिक वचन बोलूँ। मैं पूरे ब्रह्मांड के लिए और पूरी मानवजाति के लिए अपने वचन बोलता हूँ, उन शक्तिशाली गर्जनाओं की तरह जो पर्वतों और नदियों को हिला देते हैं। इस प्रकार मेरे मुँह से निकले वचन मनुष्य के लिए खज़ाना बन जाते हैं, और सभी मनुष्य मेरे वचनों का आनंद लेते हैं। बिजली पूरब से चमकते हुए सीधे पश्चिम की ओर जाती है। मेरे वचन ऐसे हैं कि मनुष्य उन्हें छोड़ नहीं पाता है और साथ ही उसकी थाह भी नहीं ले सकता है, लेकिन उनका अधिक से अधिक आनंद उठाता है। एक नवजात शिशु की तरह, सभी मनुष्य खुश और आनंद से भरे हैं और मेरे आने की खुशी मना रहे हैं। अपने वचनों के माध्यम से, मैं सभी मनुष्यों को अपने समक्ष लाऊंगा। उसके बाद, मैं औपचारिक तौर पर मनुष्य जाति में प्रवेश करूंगा ताकि वे मेरी आराधना कर सकें। मुझसे निकलने वाली महिमा और मेरे मुँह से निकले वचनों से, मैं ऐसा इंतजाम करूंगा कि सभी मनुष्य मेरे समक्ष आएंगे और देखेंगे कि बिजली पूरब से चमक रही है और मैं भी पूरब में "जैतून के पर्वत" पर उतर चुका हूँ। वे यह देखेंगे कि मैं बहुत पहले से पृथ्वी पर मौजूद हूँ, यहूदियों के पुत्र के रूप में नहीं, बल्कि पूरब की बिजली के रूप में। क्योंकि बहुत पहले मेरा पुनरुत्थान हो चुका है, और मैं लोगों के बीच से जा चुका हूँ, और फिर महिमा के साथ लोगों के बीच प्रकट हुआ हूँ। मैं वही हूँ जिसकी आराधना अनगिनत साल पहले की गई थी, और मैं वह शिशु हूँ जिसे अनगिनत साल पहले इज़राइलियों ने त्याग दिया था। इसके अलावा, मैं वर्तमान युग का संपूर्ण-महिमामय सर्वशक्तिमान परमेश्वर हूँ! सब लोग मेरे सिंहासन के सामने आएं और मेरे भव्य मुखमंडल को देखें, मेरी वाणी सुनें और मेरे कर्मों को देखें। यही मेरी संपूर्ण इच्छा है; यही मेरी योजना का अंतिम पल और उसका चरम बिंदु है, यही मेरे प्रबंधन का उद्देश्य है। सभी राष्ट्र मेरी आराधना करें, हर ज़बान मुझे स्वीकार करें, हर इंसान मुझमें अपनी आस्था दिखाए और हर इंसान मुझ पर भरोसा करे!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सात गर्जनाएँ—भविष्यवाणी करती हैं कि राज्य के सुसमाचार पूरे ब्रह्माण्ड में फैल जाएंगे" से उद्धृत

7. जैसे-जैसे मेरी आवाज़ उत्सुकता में गहरी होती है, मैं विश्व की दशा का भी अवलोकन कर रहा हूँ। मेरे वचनों के माध्यम से, सृष्टि की असंख्य चीज़ों को नया बनाया जाता है। स्वर्ग बदलता है, और पृथ्वी भी बदलती है। मानवता अपने मूल रूप में उजागर होती है और, धीरे-धीरे, प्रत्येक अपने स्वभाव के अनुसार उजागर होता है, और मनुष्य अकस्मात् ही अपने-अपने परिवारों के आँचल में जाने के लिए अपना रास्ता ढूँढ़ लेता है। इस पर, मुझे बहुत अधिक प्रसन्‍नता होगी। मैं बाधाओं से मुक्त हूँ, अकस्मात् ही मेरा महान कार्य सम्पूर्ण हो जाता है, अकस्मात् ही सृष्टि की सभी असंख्य चीज़ें रूपान्तरित हो जाती हैं। जब मैंने संसार को बनाया था, तब मैंने सभी चीज़ों को उसके स्वभाव के अनुसार तराशा था, और प्रत्येक गोचर रूप की हर चीज़ को उसके स्वभाव के साथ एक साथ इकट्ठा किया था। ज्यों ही मेरी प्रबन्धन योजना का अंत नज़दीक आएगा, मैं सृष्टि की भूतपूर्व की दशा पुनर्स्थापित कर दूँगा, मैं प्रत्येक चीज़ को गहराई से बदलते हुए, हर चीज को उसी प्रकार पुनः स्थापित कर दूँगा जैसी वह मूल रूप से थी, ताकि हर चीज़ मेरी योजना के आँचल में वापस लौट जाए। समय आ चुका है! मेरी योजना की अंतिम अवस्था लगभग पूरी होने ही वाली है। आह, पुराना अपवित्र संसार! तुम निश्चित रूप से मेरे वचनों के अधीन आ जाओगे! मेरी योजना के द्वारा तुम निश्चित रूप से मिटा दिए जाओगे! आह, सृष्टि की असंख्य चीज़ो! तुम सभी को मेरे वचनों के भीतर नया जीवन मिलेगा, अब तुम्हारे पास एक सम्पूर्ण प्रभुत्व सम्पन्न प्रभु है! आह, शुद्ध और निष्कलंक नये संसार! तुम निश्चय ही मेरी महिमा के भीतर पुनः जीवित हो जाओगे! आह, सिय्योन पर्वत! अब और मौन मत रह। मैं विजयोल्लास में लौटा हूँ! सृष्टि के बीच से, मैं सारी पृथ्वी का सूक्ष्म परीक्षण करता हूँ। पृथ्वी पर मानवजाति ने एक नए जीवन की शुरूआत की है, और एक नई आशा को जीत लिया है। आह, मेरे लोगो! तुम लोग मेरे प्रकाश के भीतर जीवन में वापस कैसे नहीं आ सकते हो? तुम लोग मेरे मार्गदर्शन के अधीन आनन्द से उछल कैसे नहीं सकते हो? भूमियाँ उल्लास में चिल्ला रही हैं, जल कलकल की आवाज़ के साथ आनन्द से ठहाका मारकर हँस रहे हैं! आह, पुनर्जीवित इस्राएल! मेरे द्वारा पूर्वनियति के कारण तुम क्यों गर्व महसूस नहीं कर सकते हो? कौन रोया है? किसने विलाप किया है? पुराना इस्राएल समाप्त हो गया है, और आज का इस्राएल संसार में उदय हुआ है, सीधा खड़ा हुआ है और ऊँचा उठता जा रहा है, और समस्त मानवता के हृदय में उठ गया है। आज का इस्राएल मेरे लोगों के माध्यम से अस्तित्व के स्रोत को निश्चित रूप से प्राप्त करेगा! आह, घृणित मिस्र! निश्चित रूप से तू अब तो मेरे विरूद्ध खड़ा नहीं होता है? तू कैसे मेरी दया का लाभ उठा सकता है और मेरी ताड़ना से बचने की कोशिश कर सकता है? तू मेरी ताड़ना के भीतर कैसे अस्तित्व में बना नहीं रह सकता है? वे सभी जिनसे मैं प्रेम करता हूँ वे निश्चय ही अनन्त काल तक जीवित रहेंगे, और वे सभी जो मेरे विरूद्ध खड़े होते हैं उन्हें निश्चय ही मेरे द्वारा अनन्त काल तक ताड़ना दी जाएगी। क्योंकि मैं एक ईर्ष्यालु परमेश्वर हूँ, मैं उन सब के कारण जो मनुष्यों ने किया है उन्हें हल्के में नहीं छोडूँगा। मैं पूरी पृथ्वी पर निगरानी रखूँगा, और, संसार की पूर्व दिशा में धार्मिकता, प्रताप, कोप और ताड़ना के साथ प्रकट हो जाऊँगा, और मैं मानवता के असंख्य मेज़बानों पर स्वयं को प्रकट करूँगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 26" से उद्धृत

8. मैं अद्वितीय परमेश्‍वर स्‍वयं हूं, इसके अतिरिक्‍त मैं परमेश्‍वर का एकमात्र प्रतिनिधि हूं, और मैं, इस देह की समग्रता के साथ परमेश्‍वर का और अधिक पूर्ण प्रत्‍यक्षीकरण हूं। जो भी मेरा सम्‍मान न करने का साहस करता है, जो भी अपनी आंखों में अनादर प्रदर्शित करता है, जो भी मेरे विरूद्ध अवज्ञा के शब्‍द कहने की धृष्‍टता करता है वह निश्चित रूप से मेरे श्रापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण श्राप दिए जाएंगे)। और जो कोई भी मेरे प्रति निष्‍ठावान अथवा संतानोचित नहीं होता है, जो भी मुझसे चालबाज़ी करने का प्रयास करता है वह अवश्‍य मेरी घृणा में मारा जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय सदा-सदा के लिए बने रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी दिव्‍यता का पूर्ण स्‍वभाव नहीं है; धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय महज़ मेरे स्‍वभाव हैं—स्‍वयं पूर्ण परमेश्‍वर। अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे समाप्‍त करना था उस कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दयालुता थी, परंतु उसके पश्‍चात प्रेममय-कृपालुता या दयालुता की कोई आवश्‍यकता न रही (उसके पश्‍चात से कभी भी न रही)। यह अब पूरे तौर पर धार्मिकता, प्रताप और न्‍याय है और यह मेरी सामान्‍य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्‍यता का संपूर्ण स्वभाव है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 79" से उद्धृत

9. सिंहासन से सात गर्जनें निकलती हैं, वे ब्रह्मांड को हिला देती हैं, स्वर्ग और पृथ्वी को उलट-पुलट कर देती हैं, और आकाश में गूँजती हैं! यह आवाज़ इतनी भेदक है कि लोग न तो इससे बचकर भाग सकते हैं, और न ही इससे छिप सकते हैं। बिजली की चमक और गरज की गूँजें भेजी जाती हैं, एक क्षण में स्वर्ग और पृथ्वी दोनों रूपांतरित हो जाते हैं, और लोग मृत्यु की कगार पर हैं। फिर, आकाश से बरसता एक प्रचंड तूफ़ान बिजली की रफ़्तार से समस्त ब्रह्माण्ड को अपनी लपेट में ले लेता है! धरती के सुदूर कोनों तक, जैसे कि सब कोनों और दरारों में बहती कोई मूसलाधार वर्षा हो, कहीं एक दाग़ तक बाक़ी नहीं रहता है, और जब यह तूफ़ान हर किसी को सिर से पैर तक धो डालता है, उससे तब कुछ भी छिपा नहीं रहता है और न ही कोई व्यक्ति इससे बचाया जा सकता है। बिजली की सर्द चकाचौंध की तरह ही, उसके गर्जन की गड़गड़ाहट, मनुष्यों को भय से थरथरा देती है। तेज दुधारी तलवार विद्रोह के पुत्रों को मार गिराती है, और शत्रुओं को घोर विपत्ति का सामना करना पड़ता है, ऐसा कोई भी कोई आश्रय नहीं बचता है जहाँ वे भाग कर जा सकें, उनके सिर तूफ़ान की उग्रता में चकराते हैं, और वे तुरंत बेहोश होकर बहते पानी में गिर जाते हैं और बहा लिए जाते हैं। वे बस मर जाते हैं, उनके पास बचाए जाने का कोई रास्ता नहीं होता है। सात गर्जनें मुझसे निकलती हैं, और मिस्र के ज्येष्ठ पुत्रों को मार गिराने, दुष्टों को दंडित करने और मेरी कलीसियाओं को शुद्ध करने के मेरे इरादे को व्यक्त करती हैं, ताकि सभी कलीसियाएँ एक-दूसरे से निकटता से जुड़ी रहें, वे एक ही तरह सोचें और काम करें, और वे मेरे साथ एक ही दिल की हों, और ब्रह्मांड की सभी कलीसियाओं को एक ही सूत्र में बाँधा जा सके। यह मेरा उद्देश्य है।

जब गर्जन होती है, रोने-चीखने की आवाज़ें फूट निकलती हैं। कुछ अपनी नींद से जगा दिए जाते हैं, और, बहुत घबड़ा कर, वे अपने आत्माओं में गहरी खोज करते हैं और सिंहासन के सामने वापस भाग आते हैं। वे चालाकी, धोखेबाज़ी और अपराध करना रोक देते हैं, और ऐसे लोगों के जाग जाने में अभी देर नहीं हुई है। मैं सिंहासन से देखता हूँ। मैं लोगों के दिलों में गहराई से झाँकता हूँ। मैं उन लोगों को बचाता हूँ जो मुझे नेकी और उत्कंठा से चाहते हैं, और मैं उन पर दया करता हूँ। मैं अनंत काल तक उन लोगों को बचाऊँगा जो अपने दिलों में मुझे सब से अधिक प्यार करते हैं, जो मेरी इच्छा को समझते हैं, और जो मार्ग के अंत तक मेरा अनुसरण करते हैं। मेरा हाथ उन्हें सुरक्षित रखेगा ताकि वे इस परिस्थिति का सामना न करें और उन्हें कोई भी नुकसान न पहुँचे। जब कुछ लोग चमकती बिजली के इस दृश्य को देखते हैं, तो उनके दिल में एक ऐसा क्लेश होता है जिसे व्यक्त करना उनके लिए बहुत कठिन होता है, और उन्हें अफ़सोस बहुत देर से हुआ है। अगर वे इस तरह के व्यवहार में बने रहते हैं, तो उनके लिए बहुत देर हो चुकी है। ओह, सब कुछ, सब कुछ! यह सब कुछ किया जाएगा। यह उद्धार के मेरे साधनों में से एक है। मैं उन लोगों को बचाता हूँ जो मुझसे प्यार करते हैं और मैं दुष्टों को मार गिराता हूँ। तो मेरा राज्य पृथ्वी पर सधा हुआ और सुस्थिर रहेगा और राष्ट्र और लोग और विश्व के अंतिम छोरों के लोगों को पता चलेगा कि मैं प्रताप हूँ, मैं भड़कती आग हूँ, मैं वो परमेश्वर हूँ जो हर व्यक्ति के अंतरतम हृदय की तलाशी लेता है। इस समय से, महान श्वेत सिंहासन का न्याय लोगों के सामने सार्वजनिक रूप से प्रकट किया जाता है और सभी लोगों के सामने यह घोषणा की जाती है कि न्याय शुरू हो गया है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 35" से उद्धृत

10. एक ज़बरदस्त आवाज़ बाहर निकलती है, पूरे ब्रह्मांड को थरथरा देती है, लोगों के कान फोड़ देती है, उन्हें रास्ते से बच निकलने में बहुत देर हो जाती है, और कुछ मारे जाते हैं, कुछ नष्ट हो जाते हैं, और कुछ का न्याय किया जाता है। यह वास्तव में ऐसा नज़ारा है जैसा पहले किसी ने नहीं देखा है। ध्यानपूर्वक सुनो, गरज के विस्फोटों के साथ रोने की आवाज़ें आती हैं, और यह आवाज़ अधोलोक से आती है, यह आवाज़ नरक से आती है। यह विद्रोह के उन पुत्रों की कटु आवाज है जिनका मेरे द्वारा न्याय किया गया है। जो लोग वह नहीं सुनते हैं और जो मेरे वचनों का अभ्यास नहीं करते हैं, उनका गंभीर रूप से न्याय किया जाता है और वे मेरे कोप का अभिशाप प्राप्त करते हैं। मेरी आवाज़ न्याय और कोप है, और मैं किसी के प्रति भी बहुत उदार नहीं होता हूँ और किसी के प्रति भी दया नहीं दिखाता हूँ, क्योंकि मैं स्वयं धार्मिक परमेश्वर हूँ, और मैं कुपित हूँ, मैं जला रहा हूँ, मैं शुद्ध कर रहा हूँ, और मैं नष्ट कर रहा हूँ। मुझमें छुपा हुआ कुछ भी नहीं है, भावनात्मक कुछ भी नहीं है, बल्कि सब कुछ स्पष्ट, धार्मिक और निष्पक्ष है। क्योंकि मेरे ज्येष्ठ पुत्र पहले से ही मेरे साथ सिंहासन पर हैं, सभी राष्ट्रों और सभी लोगों पर शासन कर रहे हैं, इसलिए अन्यायपूर्ण और अनैतिक चीज़ों और लोगों का न्याय किया जाना शुरू हो रहा है। मैं एक-एक करके उनकी जाँच करूँगा, कुछ भी नहीं छोड़ूँगा, उन्हें पूर्णतः प्रकट करूँगा। क्योंकि मेरा न्याय पूरी तरह से प्रकट हो गया है और पूरी तरह से स्पष्ट कर दिया गया है, और कुछ भी रोक कर नहीं रखा गया है; इसलिए जो कुछ भी मेरी इच्छा के अनुकूल नहीं होता है मैं उसे बाहर फेंक दूँगा और उसे अथाह गड्ढे में सदैव के लिए नष्ट होने दूँगा; मैं उसे अथाह गड्ढे में सदा के लिए जलने दूँगा। यह मेरी धार्मिकता है; यह मेरी ईमानदारी है। कोई भी इसे बदल नहीं सकता है, और यह अवश्य मेरे आदेश पर होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 103" से उद्धृत

11. मैं धर्मी हूँ, मैं वफ़ादार हूँ, मैं वो परमेश्वर हूँ जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की जाँच करता है! मैं एक क्षण में इसे प्रकट कर दूँगा कि कौन सच्चा और कौन झूठा है। घबड़ाने की कोई ज़रूरत नहीं है, सभी चीजें मेरे समय पर काम करती हैं। कौन मुझे ईमानदारी से चाहता है, कौन मुझे ईमानदारी से नहीं चाहता—मैं तुम सब को बता दूँगा। बस अच्छी तरह से (मेरे वचनों को) खाओ, पीओ, मेरे सामने आओ और मेरे करीब आ जाओ, और मैं अपना काम स्वयं करूँगा। तात्कालिक परिणामों के लिए बहुत चिंतित न हो जाओ, मेरा काम कुछ ऐसा नहीं है जो सारा एक साथ किया जा सके। इसके भीतर मेरे चरण और मेरा ज्ञान निहित हैं, ताकि मेरा ज्ञान प्रकट किया जा सके। मैं तुम सभी को देखने दूँगा कि मेरे हाथों से क्या किया जाता है—बुराई को दण्डित और भलाई को पुरस्कृत किया जाता है। मैं निश्चय ही किसी से पक्षपात नहीं करता हूँ। मैं नेकी से उनसे प्यार करता हूँ जो मुझसे प्यार करते हैं, और मेरा क्रोध उन लोगों के साथ हमेशा रहेगा जो नेकी से मुझसे प्यार नहीं करते हैं, ताकि वे हमेशा याद रख सकें कि मैं सच्चा परमेश्वर हूँ, ऐसा परमेश्वर जो मनुष्यों के अंतरतम हृदय की जाँच करता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 44" से उद्धृत

12. मैं उन सभी से प्यार करता हूँ जो ईमानदारी से मेरे लिए खुद को व्यय करते हैं और खुद को मेरे प्रति समर्पित करते हैं। मैं उन सभी से नफ़रत करता हूँ जो मुझ से जन्मे हैं, मगर मुझे नहीं जानते हैं, यहाँ तक कि मेरा विरोध भी करते हैं। मैं ऐसे किसी भी व्यक्ति का परित्याग नहीं करूँगा जो ईमानदारी से मेरे लिए है, बल्कि मैं उसके आशीषों को दुगुना कर दूँगा। जो लोग कृतघ्न हैं, मैं उन्हें दुगुनी सजा दूँगा, और उन्हें हल्के में नहीं छोड़ूगा। मेरे राज्य में कोई कुटिलता या छल नहीं है, कोई सांसारिकता नहीं है, अर्थात् मृतकों की कोई गंध नहीं है, बल्कि सारी सत्यपरायणता, धार्मिकता है, सारी शुद्धता और सारा खुलापन है, कुछ भी छुपाया गया या परदे में रखा गया नहीं है; सब कुछ ताज़ा है, आनंदपूर्ण है, सब कुछ आत्मिक उन्नति है। अगर कोई मृतकों की गंध को बनाये रखता है, तो निश्चित रूप से वह मेरे राज्य में नहीं रह सकता है, बल्कि उसे मेरे लौहदण्ड द्वारा शासित किया जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 70" से उद्धृत

13. जो लोग वास्तव में राजाओं के रूप में शासन करते हैं, मेरे द्वारा पूर्वनियति और चयन पर निर्भर करते हैं, और इसमें अवश्य कोई मानवीय इच्छा नहीं होगी। यदि कोई इसमें हिस्सा लेने की हिम्मत करता है, तो उसे अवश्य मेरे हाथ के प्रहार को झेलना होगा, और वह मेरी उग्र अग्नि का लक्ष्य होगा; यह मेरी धार्मिकता और प्रताप का एक और पक्ष है। मैंने कहा है, मैं सभी चीज़ों पर शासन करता हूँ, मैं ही वह बुद्धिमान परमेश्वर हूँ जो पूर्ण सत्ता का उपयोग करता है, और मैं किसी भी व्यक्ति के प्रति उदार नहीं हूँ, निष्ठुर हूँ, किसी के प्रति मेरी कोई व्यक्तिगत भावना नहीं है। मैं हर किसी के साथ अपनी धार्मिकता, सत्यपरायणता, और अपने प्रताप के साथ व्यवहार करता हूँ (चाहे कोई कितना भी अच्छा क्यों न बोलता हो, मैं उसे नहीं छोड़ूँगा), और इस बीच मैं हर किसी को मेरे कर्मों के चमत्कार को बेहतर ढंग से देखने, मेरे कर्मों का अर्थ क्या है इसे समझने में सक्षम बनाता हूँ। मैं दुष्ट आत्माओं के सभी प्रकार के कर्मों को एक-एक करके दण्डित करता हूँ, उन्हें एक-एक करके अथाह गड्ढे में डाल देता हूँ। यह कार्य मैंने उनके लिए कोई पदवी न छोड़ते हुए, उनके लिए उनके कार्य करने की कोई जगह न छोड़ते हुए, समय शुरू होने से पहले ही पूरा कर लिया था। मेरे सभी चुने हुए लोग, जो मेरे द्वारा पूर्वनियत और चयनित हैं, किसी भी समय उनके कब्ज़े में नहीं हो सकते हैं, बल्कि वे हमेशा पवित्र होते हैं। जिन लोगों को मैंने पूर्वनियत और चयनित नहीं किया है, उन्हें मैं शैतान को सौंप देता हूँ और उन्हें अब और नहीं रहने देता हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 70" से उद्धृत

14. तुझे जानना होगा कि मैं किस प्रकार के लोगों की इच्छा करता हूँ; ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें राज्य में प्रवेश करने की अनुमति नहीं है, ऐसे लोग जो अशुद्ध हैं उन्हें पवित्र भूमि को गंदा करने की अनुमति नहीं है। भले ही तूने अधिक कार्य किया हो, और कई सालों तक कार्य किया हो, फिर भी अन्त में तू दुखदाई रूप से मैला है—यह स्वर्ग की व्यवस्था के लिए असहनीय है कि तू मेरे राज्य में प्रवेश करने की कामना करता है! संसार की स्थापना से लेकर आज तक, मैंने कभी भी उन लोगों को अपने राज्य में आसान प्रवेश नहीं दिया है जो अनुग्रह पाने के लिए मेरी खुशामद करते हैं। यह स्वर्गीय नियम है, और इसे कोई तोड़ नहीं सकता है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सफलता या असफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर मनुष्य चलता है" से उद्धृत

15. जब सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा, तो यह वह दिन होगा जब मैं सिय्योन लौटूँगा, और इस दिन को सभी लोगों द्वारा मनाया जाएगा। जब मैं सिय्योन लौटूँगा, तो पृथ्वी पर सभी चीज़ें चुप हो जाएँगी और पृथ्वी पर सभी चीज़ें शांति में होंगी। जब मैं सिय्योन लौट चुका होऊँगा, तो सभी अपने मूल प्रकटन को पुनः प्राप्त कर लेंगे। उस समय, मैं सिय्योन में अपना कार्य शुरू करूँगा, मैं दुष्टों को दंड दूँगा और अच्छों को इनाम दूँगा, मैं अपनी धार्मिकता को प्रभावी करूँगा और अपने न्याय को कार्यान्वित करूँगा। मैं हर चीज़ को पूरा करने के लिए अपने वचनों का उपयोग करूँगा और हर किसी को और हर चीज़ को मेरे उस हाथ का अनुभव करवाऊँगा जो ताड़ना देता है। मैं सभी लोगों को मेरी समस्त महिमा, मेरी पूरी बुद्धि, मेरी पूरी उदारता देखने के लिए तैयार करूँगा। कोई भी व्यक्ति आलोचना करने के लिए उठने का साहस नहीं करेगा क्योंकि सब मेरे साथ पूरा हो जाता है। इसमें, हर कोई मेरा पूरा सम्मान देखेगा और सभी मेरी पूरी जीत का अनुभव करेंगे क्योंकि सब कुछ मेरे साथ व्यक्त होता है। इससे, कोई भी मेरी महान सामर्थ्य को और मेरे अधिकार को देखने में अच्छी तरह से सक्षम होता है। कोई भी मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करेगा, कोई भी मुझे बाधित करने का साहस नहीं करेगा। मेरे साथ सब कुछ सार्वजनिक किया जाता है, कौन कोई भी चीज़ छुपाने का साहस करेगा? मैं निश्चित रूप से उस पर दया नहीं दिखाऊँगा! इस तरह के अभागों को मेरी गंभीर सजा अवश्य मिलनी चाहिए और इस तरह के बदमाशों को मेरी दृष्टि से अवश्य हटा दिया जाना चाहिए। मैं, जरा सी भी दया के बिना और उनकी भावनाओं को चोट पहुँचाते हुए, उन पर लोहे की छड़ी के साथ शासन करूँगा और मैं उनका न्याय करने के लिए अपने अधिकार का उपयोग करूँगा, क्योंकि मैं स्वयं परमेश्वर हूँ जो भावना से रहित है और प्रतापी है और जिसका अपमान नहीं किया जा सकता है। यह सभी के द्वारा समझ लिया जाना चाहिए और सभी के द्वारा देख लिया जाना चाहिए ताकि, जब समय आ जाए, तो "बिना कारण या तर्क" के मेरे द्वारा मार डाले, मेरे द्वारा पूर्णतया नष्ट किए जाने से बचा जाए, क्योंकि मेरी छड़ी उन सभी को मार डालेगी जो मुझे अपमानित करते हैं। मेरे लिए यह बात कोई मायने नहीं रखेगी कि वे मेरी प्रशासनिक आज्ञाओं को जानते हैं या नहीं; यह मेरे लिए किसी भी तरह से महत्वपूर्ण नहीं होगी क्योंकि मेरा व्यक्तित्व किसी के द्वारा भी अपमान को बर्दाश्त नहीं कर सकता है। यही कारण है कि ऐसा कहा जाता है कि मैं एक शेर हूँ; मैं जिस किसी को भी छूता हूँ, मैं तुझे मार डालूँगा। यही कारण है कि ऐसा कहा जाता है कि अब यह कहना कि मैं करुणा और दयालुता का परमेश्वर हूँ मेरी निंदा करना है। मैं सार रूप में एक मेम्ना नहीं बल्कि एक शेर हूँ। कोई भी मुझे अपमानित करने का साहस नहीं करता है और जो कोई भी अपमान करेगा मैं, बिल्कुल भी किसी भावना के बिना, तुरंत मृत्यु दण्ड दूँगा!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 120" से उद्धृत

16. मैं एक ख़ाक कर देने वाली अग्नि हूँ और मैं अपमान बर्दाश्त नहीं करता हूँ। क्योंकि सभी मानव मेरे द्वारा बनाए गए थे, इसलिए मैं जो कुछ भी कहता और करता हूँ, उन्हें अवश्य उसका पालन करना चाहिए और विद्रोह नहीं करना चाहिए। लोगों को मेरे कार्य में हस्तक्षेप करने का अधिकार नहीं है, और वे इस बात का विश्लेषण करने के योग्य तो बिल्कुल नहीं है कि मेरे कार्य और मेरे वचनों में क्या सही या ग़लत है। मैं सृष्टि का प्रभु हूँ, और सृजित प्राणियों को मेरे लिए श्रद्धापूर्ण हृदय के साथ वह सब कुछ प्राप्त करना चाहिए जिसकी मैं अपेक्षा करता हूँ; उन्हें मेरे साथ तर्क नहीं करना चाहिए, और विशेष रूप से उन्हें मेरा विरोध नहीं करना चाहिए। मैं अपने अधिकार के साथ अपने लोगों पर शासन करता हूँ, और वे सभी जो लोग मेरी सृष्टि का हिस्सा हैं, उन्हें मेरे अधिकार के प्रति समर्पण करना चाहिए। यद्यपि आज तुम लोग मेरे सामने निर्लज्ज और धृष्ट हो, तुम लोग उन वचनों की अवज्ञा करते हो जिनसे मैं तुम लोगों को शिक्षा देता हूँ, और तुम लोगों को कोई डर नहीं लगता है, किन्तु मैं केवल तुम लोगों की विद्रोहशीलता का सहिष्णुता से सामना करता हूँ; मैं अपना आपा नहीं खोऊँगा और अपने कार्य को प्रभावित नहीं करूँगा क्योंकि छोटे-छोटे तुच्छ भुनगों ने गोबर के ढेर की गंदगी को उलट दिया है। जब तक मेरे कथन पूर्ण नहीं हो जाते हैं, जब तक मेरा बिल्कुल अंतिम क्षण नहीं आ जाता है, तब तक मैं अपने पिता की इच्छा के वास्ते उस हर चीज़ के अविरत अस्तित्व को सहता हूँ जिससे मैं घृणा करता हूँ और जिनसे में नफ़रत करता हूँ।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "जब झड़ती हुई पत्तियाँ अपनी जड़ों की ओर लौटेंगी, तो तुझे उन सभी बुराइयों पर पछतावा होगा जो तूने की हैं" से उद्धृत

17. मेरी दया उन पर व्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और अपने आपको नकारते हैं। दुष्टों को मिला दण्ड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध का साक्षी है। जब आपदा आएगी, तो उन सभी पर अकाल और महामारी आ पड़ेगी जो मेरा विरोध करते हैं और वे विलाप करेंगे। जो लोग सभी तरह की दुष्टता कर चुके हैं, किन्तु जिन्होंने बहुत वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी युगों-युगों तक कदाचित ही देखी गई आपदा में पड़ते हुए, लगातार आंतक और भय की स्थिति में जीते रहेंगे। केवल मेरे ऐसे अनुयायी जिन्होंने मेरे प्रति निष्ठा दर्शायी है मेरी सामर्थ्य का आनंद लेंगे और तालियाँ बजाएँगे। वे अवर्णनीय संतुष्टि का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने पहले कभी मानवजाति को प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्यों के अच्छे कर्मों को सँजोए रखता हूँ और उनके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने सबसे पहले मानवजाति की अगुवाई करनी आरंभ की, तब से मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को प्राप्त करने की आशा करता आ रहा हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले हों। मैं उन लोगों को नहीं भूला हूँ जो मेरे साथ एक से मन वाले नहीं हैं; केवल उन्हें अपना प्रतिफल देने के अवसर की प्रतीक्षा करते हुए, जिसे देखना मुझे आनंद देगा, मैंने उन्हें अपने हृदय में घृणा के साथ धारण किया हुआ है। अंततः आज मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो" से उद्धृत

18. चूंकि तुमने पहले से ही मेरी सेवा करने का दृढ़ संकल्प किया है, मैं तुम्हें जाने नहीं दूँगा। मैं ऐसापरमेश्वर हूं जो बुराई से घृणा करता है, और मैं एक ऐसा परमेश्वर हूं जिसके दिल में मनुष्य के लिए जलन है। चूंकि तुमने पहले से ही अपने वचनों को वेदिका पर रख दिया है, मैं यह बर्दाश्त नहीं करूँगा कि तुम मेरी ही आंखों के सामने से भाग जाओ, और मैं यह भी बर्दाश्त नहीं करूँगा कि तुम दो स्वामियों की सेवा करो। क्या तुम्हें लगता है कि मेरी वेदिका पर अपने वचनों को रखकर, मेरी आँखों के सामने उन्हें रखकर, तुम किसी दूसरे से प्रेम कर सकते हो? मैं लोगों को इस तरह से स्वयं को मूर्ख बनाने कैसे दे सकता हूं? क्या तुम्हें लगा कि तुम आसानी से प्रतिज्ञा कर सकते हो, अपनी जीभ से मेरे प्रति शपथ ले सकते हो? तुम मेरे सिंहासन के प्रति, जो सबसे ऊँचा है, कैसे अपनी शपथ ले सकते हो? क्या तुम्हें लगा कि तुम्हारी शपथ पहले से ही समाप्त हो चुकी है? मैं तुम लोगों को बताना चाहता हूँ कि भले ही तुम्हारी देह समाप्त हो जाए, तुम्हारी शपथ समाप्त नहीं हो सकती। अंत में, मैं तुम लोगों की शपथ के आधार पर तुम्हारी निंदा करूँगा। फिर भी तुम लोगों को लगता है मुझसे निपटने के लिए तुम अपने वचनों को मेरे सामने रख सकते हो और तुम लोगों के दिल अशुद्ध आत्माओं और बुरी आत्माओं की सेवा करते रहेंगे। मेरा क्रोध उन कुत्तों और सुअर जैसे लोगों को कैसे बर्दाश्त कर सकता है जो मुझे धोखा देते हैं? मुझे अपने प्रशासनिक नियमों को पूरा करना होगा, और अशुद्ध आत्माओं के हाथों से उन सभी घुटते हुए, "पवित्र" लोगों को निकालना होगा जो मेरा बैल बनने, मेरा घोड़ा बनने और जो मेरे द्वारा वध किए जाने की दया पाने के लिये मुझ पर विश्वास करते हैं, एक व्यवस्थित ढंग से "मेरी प्रतीक्षा" करते हैं। मैं तुमसे तुम्हारा पिछला दृढ़ संकल्प फिर से उठवाऊँगा और एक बार फिर से अपनी सेवा करवाऊँगा। सृष्टि की कोई भी वस्तु मुझे धोखा दे, यह मैं सहन नहीं करूँगा। तुम्हें क्या लगा कि तुम स्वच्छंदता से अनुरोध कर सकते हो और मेरे सामने स्वच्छंदता से झूठ बोल सकते हो? तुम्हें लगता है कि मैं तुम्हारें वचनों और कर्मों को सुन या देख नहीं सकता हूँ? तुम्हारे वचन और कर्म मेरी दृष्टि से कैसे बच सकते हैं? मैं लोगों को इस तरह से धोखा कैसे देने दे सकता हूं?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "कितना नीच है तुम्हारा चरित्र!" से उद्धृत

19. जब स्वर्गदूत मेरी स्तुति में संगीत बजाते हैं, तो मनुष्य पर अपनी अनुकम्पा उँड़ेलने के अलावा मेरे पास अन्य कोई विकल्प नहीं होता है। तत्काल मेरा हृदय उदासी से भर जाता है, और मेरे लिए इस दुःखदायी भाव से छुटकारा पाना असंभव हो जाता है। मनुष्य से पृथक होने और फिर एक होने के आनन्द और दुःखों में, हम मनोभावों का आदान-प्रदान करने में असमर्थ होते है। ऊपर स्वर्ग और नीचे पृथ्वी पर पृथक हुए, मैं और मनुष्य नियमित रूप से मिलने में असमर्थ हैं। पूर्व की भावनाओं के विषाद से कौन मुक्त हो सकता है? कौन अतीत के बारे में स्मरण करने से अपने आप को रोक सकता है? कौन अतीत के मनोभावों की निरंतरता की आशा नहीं करेगा? कौन मेरी वापसी की अभिलाषा नहीं करेगा? कौन मनुष्य के साथ मेरे फिर से एक हो जाने की लालसा नहीं करेगा? मेरा हृदय अत्यंत अशांत है, और मनुष्य की आत्मा गहराई तक चिंतित हैं। यद्यपि आत्माओं में एक समान हैं, फिर भी हम प्रायः एक साथ नहीं हो सकते हैं, और हम प्रायः एक दूसरे को नहीं देख सकते हैं। इस प्रकार समस्त मानवजाति का जीवन व्यथा से भरा है और उसमें प्राणशक्ति की कमी है, क्योंकि मनुष्य हमेशा मेरे लिए तड़पा है। यह ऐसा है मानो कि मानवजाति स्वर्ग से गिराए गए पदार्थ हों; वे ज़मीन पर से मेरी ओर टकटकी लगाकर देखते हुए, पृथ्वी से मेरे नाम की दोहाई देते हों—परन्तु वे खूँखार भेड़िए के जबड़े से कैसे बच कर भाग सकते हैं? वे उसके ख़तरे और प्रलोभन से स्वयं को कैसे मुक्त कर सकते हैं? मानवजाति मेरी योजना की व्यवस्था के प्रति आज्ञाकारिता के रूप में स्वयं को बलिदान कैसे नहीं कर सकती है? जब वे जोर से गिड़गिड़ाते हैं, तो मैं उनसे अपना मुँह फेर लेता हूँ, मैं उन्हें देखना अब और सहन नहीं कर सकता हूँ; हालाँकि, मैं उनकी अश्रुपूरित पुकारों को कैसे नहीं सुन सकता हूँ? मैं मानवीय संसार के इन अन्यायों को सही करूँगा। मैं अपने लोगों को फिर से नुकसान पहुँचाने से शैतान को रोकते हुए, शत्रु को पुनः जो चाहे वह करने से रोकते हुए, पूरे संसार में अपने स्वयं के हाथों से अपना कार्य करूँगा। मैं अपने सभी शत्रुओं को ज़मीन पर गिराते हुए और अपने सामने उनसे उनके अपराधों को अंगीकार करवाते हुए, पृथ्वी पर राजा बन जाऊँगा और वहाँ अपना सिंहासन ले जाऊँगा। अपने दुःख में, जिसमें क्रोध मिश्रित है, मैं किसी को नहीं छोड़ते हुए, और अपने शत्रुओं को भयभीत करते हुए समस्त विश्व को कुचल कर समतल कर दूँगा। मैं इस पृथ्वी को खण्डहर में बदल दूँगा, और अपने शत्रुओं को खण्डहर में गिरा दूँगा, ताकि अब से वे मानवजाति को अब और भ्रष्ट नहीं कर सकें। मेरी योजना पहले से ही निर्धारित है, और कोई भी, चाहे वह कोई भी हो, इसे बदलने में समर्थ नहीं होगा। जब मैं ब्रह्माण्ड के ऊपर प्रतापी ठाट-बाट के साथ चलूँगा, तो समस्त मानवजाति नए सिरे से बन जाएगी, और हर चीज़ पुनर्जीवित हो जाएगी। मनुष्य अब और नहीं रोएगा, और सहायता के लिए अब और मेरी दोहाई नहीं देगा। तब मेरा हृदय आनन्दित होगा, और लोग उत्सव मनाते हुए मेरे पास लौटेंगे। पूरा विश्व, ऊपर से नीचे तक, हर्षोल्लास में झूमेगा ...

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 27" से उद्धृत

20. दुनिया के विशाल विस्तार में, अनगिनत परिवर्तन हो चुके हैं, बार-बार महासागर गाद भरने से मैदानों बदल रहे हैं, खेत बाढ़ से महासागरों में बदल रहे हैं। सिवाय उसके जो ब्रह्मांड में सभी चीजों पर शासन करता है, कोई भी इस मानव जाति की अगुआई और मार्गदर्शन करने में समर्थ नहीं है। इस मानवजाति के लिए श्रम करने या उसके लिए तैयारी करने वाला कोई भी शक्तिशाली नहीं है, और ऐसा तो कोई है ही नहीं जो इस मानवजाति को प्रकाश की मंजिल की ओर ले जा सके और इसे सांसारिक अन्यायों से मुक्त कर सके। परमेश्वर मनुष्यजाति के भविष्य पर विलाप करता है, मनुष्यजाति के पतन पर शोक करता है, और उसे पीड़ा होती है कि मनुष्यजाति, कदम-दर-कदम, क्षय की ओर और ऐसे मार्ग की ओर आगे बढ़ रही है जहाँ से वापसी नहीं है। ऐसी मनुष्यजाति जिसने परमेश्वर का हृदय तोड़ दिया है और बुराई की तलाश करने के लिए उसका त्याग कर दिया है: क्या किसी ने कभी उस दिशा पर विचार किया है जिसमें ऐसी मनुष्यजाति जा सकती है? ठीक इसी कारण से है कोई भी परमेश्वर के कोप को महसूस नहीं करता है, कोई भी परमेश्वर को खुश करने के तरीके को नहीं खोजता है या परमेश्वर के करीब आने की कोशिश नहीं करता है, और इससे भी अधिक, कोई भी परमेश्वर के दुःख और दर्द को समझने की कोशिश नहीं करता है। परमेश्वर की वाणी सुनने के बाद भी, मनुष्य अपने रास्ते पर चलता रहता है, परमेश्वर से दूर जाने, परमेश्वर के अनुग्रह और देखभाल को अनदेखा करने और उसके सत्य से दूर रहने, अपने आप को परमेश्वर के दुश्मन, शैतान, को बेचना पसंद करने में लगा रहता है। और किसने इस बात पर कोई विचार किया है—क्या मनुष्य को इस बात के लिये दुराग्रही बने रहना चाहिये—कि परमेश्वर इस मानवजाति की ओर कैसे कार्य करेगा जिसने उसे पीछे एक नज़र डाले बिना खारिज कर दिया? कोई नहीं जानता कि परमेश्वर के बार-बार याद दिलाने और प्रोत्साहनों का कारण यह है कि वह अपने हाथों में एक अभूतपूर्व आपदा रखता है जिसे उसने तैयार किया है, एक ऐसी आपदा जो मनुष्य की देह और आत्मा के लिए असहनीय होगी। यह आपदा केवल देह का नहीं बल्कि आत्मा का भी दण्ड है। तुम्हें यह जानने की आवश्यकता है: जब परमेश्वर की योजना निष्फल होती है और जब उसके अनुस्मारकों और प्रोत्साहनों को कोई उत्तर नहीं मिलता है, तो वह किस प्रकार के क्रोध को छोड़ेगा? यह ऐसा होगा जिसे अब से पहले किसी सृजित प्राणी द्वारा अनुभव नहीं किया या नहीं सुना गया है। और इसलिए मैं कहता हूँ, यह आपदा बेमिसाल है और कभी भी दोहराई नहीं जाएगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि यह केवल इस एक बार मनुष्यजाति का सृजन करने और केवल इस एक बार मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर की योजना है। यह पहली और अंतिम बार है। इसलिए, इस बार जिस श्रमसाध्य इरादों और उत्साहपूर्ण प्रत्याशा से परमेश्वर इंसान को बचाता है, उसे कोई समझ नहीं सकता।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है" से उद्धृत

21. मैं पहले यह कह चुका हूँ: मैं एक बुद्धिमान परमेश्वर हूँ। मैं अपनी सामान्य मानवता का उपयोग सभी लोगों और शैतानी व्यवहार को प्रकट करने के लिए करता हूँ, उन लोगों को उघाड़ता हूँ जो गलत इरादों वाले हैं, जो दूसरों के सामने तो एक तरह से पेश आते हैं और उनकी पीठ के पीछे दूसरी तरह से, जो मेरा विरोध करते हैं, जो मेरे प्रति विश्वासघाती हैं, जो दौलत के लालच में हैं, जो मेरे बोझ के प्रति विचारशील नहीं हैं, जो अपने भाइयों और बहनों के साथ धोखाधड़ी और कुटिलता में लगे हुए हैं, जो लोगों को खुश करने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातें करते हैं, और जो अपने भाइयों और बहनों के साथ अपने दिलोदिमाग में सर्वसम्मति से सहयोग नहीं कर सकते हैं। मेरी सामान्य मानवता के कारण, बहुत से लोग गुप्त रूप से मेरा विरोध करते हैं और धोखाधड़ी और कुटिलता में लगे होते हैं, वे यह मान लेते हैं कि मेरी सामान्य मानवता को पता नहीं होता है। और बहुत से लोग मेरी सामान्य मानवता पर विशेष ध्यान देते हैं, मुझे खाने और पीने के लिए अच्छी चीज़ें देते हैं, सेवकों की तरह मेरी सेवा करते हैं, और उनके दिल में जो कुछ भी होता है, उसे कहते हैं, जबकि मेरी पीठ के पीछे बिलकुल दूसरी तरह से काम करते हैं। अंधे मनुष्यों! तुम मुझे—उस परमेश्वर को जो मनुष्य के दिल में गहराई से देखता है—बिल्कुल नहीं जानते हो। तुम अभी भी मुझे नहीं जानते हो; तुम अभी भी सोचते हो कि मुझे पता नहीं है कि तुम क्या करने जा रहे हो। इसके बारे में सोचो: मेरी सामान्य मानवता के कारण कितने लोगों ने खुद को बर्बाद कर दिया है? जागो! मुझे अब और धोखा मत दो। तुम्हें अपने समस्त आचरण और व्यवहार को, तुम्हारे प्रत्येक शब्द और कार्य को, मेरे सामने अर्पित कर देना चाहिए, और मेरे द्वारा किए गए इसके निरीक्षण को स्वीकार करना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 76" से उद्धृत

22. मेरी योजना में, शैतान ने हमेशा हर कदम का बहुत तेजी से पीछा किया है, और मेरी बुद्धि की विषमता के रूप में, हमेशा मेरी वास्तविक योजना को बिगाड़ने के लिए उसने तरीके और संसाधनों को खोजने की कोशिश की है। परन्तु क्या मैं उसकी धोखेबाज़ योजनाओं से परास्त हो सकता हूँ? सभी जो स्वर्ग में और पृथ्वी पर हैं मेरी सेवा करते हैं—क्या शैतान की कपटपूर्ण योजनाएँ कुछ अलग हो सकती हैं? यह निश्चित रूप से मेरे ज्ञान का प्रतिच्छेदन है, यह निश्चित रूप से वह है जो मेरे कर्मों के बारे में चमत्कारिक है, और यही वह सिद्धांत है जिसके द्वारा मेरी पूरी प्रबंधन योजना चलती है। राज्य के निर्माण के दौरान भी मैं शैतान की कपटपूर्ण योजनाओं से बचता नहीं हूँ, बल्कि उस कार्य को करता रहता हूँ जो मुझे करना होता है। ब्रह्मांड में सभी वस्तुओं के बीच, मैंने अपनी विषमता के रूप में शैतान के कर्मों को चुना है। क्या यह मेरी बुद्धि नहीं है? क्या यह निश्चित रूप से वह नहीं है जो मेरे कार्यों के बारे में अद्भुत है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 8" से उद्धृत

23. जब मैं औपचारिक रूप से अपना कार्य शुरू करता हूँ, तो सभी लोग वैसे ही चलते हैं जैसे मैं चलता हूँ, इस तरह कि समस्त संसार के लोग मेरे साथ कदम मिलाते हुए चलने लगते हैं, संसार भर में "उल्लास" होता है, और मनुष्य को मेरे द्वारा आगे की ओर प्रेरित किया जाता है। परिणामस्वरूप, बड़ा लाल अजगर मेरे द्वारा उन्माद और व्याकुलता की स्थिति में डाल दिया जाता है, और वह मेरा कार्य करता है, और, अनिच्छुक होने के बावजूद भी, अपनी स्वयं की इच्छाओं का अनुसरण करने में समर्थ नहीं होता है, और उसके पास मेरे नियन्त्रण में समर्पित होने के अलावा कोई विकल्प नहीं रहता है। मेरी सभी योजनाओं में, बड़ा लाल अजगर मेरी विषमता, मेरा शत्रु, और मेरा सेवक भी है; वैसे तो, मैंने उससे अपनी "अपेक्षाओं" को कभी भी शिथिल नहीं किया है। इसलिए, मेरे देहधारण के काम का अंतिम चरण उसके घराने में पूरा होता है। इस तरह से, बड़ा लाल अजगर मेरी उचित तरीके से सेवा करने में अधिक समर्थ है, जिसके माध्यम से मैं उस पर विजय पाऊँगा और अपनी योजना को पूरा करूँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 29" से उद्धृत

24. मैं शुरुआत हूं, और मैं अंत हूं। मैं ही पुनर्जीवित और पूर्ण सच्चा परमेश्वर हूं। मैं तुम लोगों के सामने अपने वचन बोलता हूं, और जो मैं कहता हूं तुम लोगों को उस पर दृढ़ता से विश्वास करना चाहिए। आकाश और धरती समाप्त हो सकते हैं, लेकिन जो भी मैं कहता हूं उसका एक अक्षर या एक रेखा भी कभी समाप्त नहीं होगी। यह याद रखना! यह याद रखना! एक बार जब मैं बोल देता हूं, तो एक वचन भी कभी वापस नहीं लिया जाएगा और प्रत्येक वचन पूरा होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में आरम्भ में मसीह के कथन के "अध्याय 53" से उद्धृत

25. मैंने जो कहा है, उसका ख्याल करना चाहिए, जिसका ख्याल किया जाता है वह पूरा किया जाना चाहिए, और यह किसी के द्वारा बदला नहीं जा सकता है; यह परम सत्य है। चाहे वह हो जो मैंने अतीत में कहा है या वह जो मैं भविष्य में कहूँगा, वह सब कुछ घटित होगा, और समस्त मानव जाति इसको देखेगी। यह मेरे वचनों के कार्य का सिद्धांत है। ...संसार में जो कुछ भी होता है, उसमें से ऐसा कुछ भी नहीं है जिस पर अंतिम बात मेरी न हो। ऐसा क्या मौजूद है जो मेरे हाथों में नहीं? जो कुछ मैं कहता हूँ वही होता है, और मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है जो मेरे मन को बदल सकता है? क्या यह वह अनुबंध हो सकता है जो मैंने धरती पर बनाया था? मेरी योजना में कोई भी चीज़ बाधा नहीं डाल सकती; मैं अपने कार्य में और अपनी प्रबंधन योजना में हमेशा उपस्थित हूँ। कौन-सा मनुष्य हस्तक्षेप कर सकता है? क्या मैंने ही इन व्यवस्थाओं को व्यक्तिगत रूप से नहीं बनाया है? आज इस स्थिति में प्रवेश कर, यह अभी भी मेरी योजना से या मेरे पूर्वानुमान से भटका नहीं है; यह सब बहुत पहले मेरे द्वारा निर्धारित किया गया था। आप में से कौन इस चरण के लिए मेरी योजना की थाह ले सकता है? मेरी प्रजा मेरी आवाज़ सुनेगी, और उनमें से हर एक जो मुझसे सच्चा प्रेम करता है, मेरे सिंहासन के सामने लौट आएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 1" से उद्धृत

26. हमें विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ प्राप्त करना चाहता है उस मार्ग में कोई भी देश या शक्ति ठहर नहीं सकती है। वे जो परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं, परमेश्वर के वचन का विरोध करते हैं, परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते हैं और उसे बिगाड़ते हैं, अंततः परमेश्वर के द्वारा दण्डित किए जाएँगे। वह जो परमेश्वर के कार्य की अवज्ञा करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी राष्ट्र जो परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करता है, उसे नष्ट कर दिया जाएगा; कोई भी देश जो परमेश्वर के कार्य का विरोध करने के लिए उठता है, वह इस पृथ्वी पर से मिटा दिया जाएगा; और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

27. सब कुछ मेरे वचनों के द्वारा पूरा हो जाएगा। चाहे कोई मनुष्य भागी न हो, और न कोई मनुष्य वह काम कर सकता है जिसे मैं करूँगा। मैं सारी भूमि की हवा पोंछ के स्वच्छ करूँगा और पृथ्वी पर से दुष्टात्माओं का पूर्ण रूप से नाश कर दूँगा। मैं पहले से ही शुरू कर चुका हूँ, और अपनी ताड़ना कार्य के पहले कदम को उस बड़े लाल अजगर के निवास स्थान में आरम्भ करूँगा। इस प्रकार यह देखा जा सकता है कि मेरी ताड़ना पूरे ब्रह्माण्ड के ऊपर आ गई है, और वह बड़ा लाल अजगर और सभी प्रकार की अशुद्ध आत्माएँ मेरी ताड़ना से बच पाने में समर्थ नहीं होंगी क्योंकि मैं समूची भूमि पर निगाह रखता हूं। जब मेरा कार्य पृथ्वी पर पूरा हो जाएगा अर्थात्, जब न्याय का युग समाप्त होगा, तब मैं औपचारिक रूप से उस बड़े लाल अजगर को ताड़ना दूँगा। मेरे लोग उस बड़े लाल अजगर की न्याय परायण ताड़ना को देखेंगे, मेरी धार्मिकता के कारण स्तुति को उड़ेल देंगे, और मेरी धार्मिकता के कारण सदा सर्वदा मेरे पवित्र नाम की बड़ाई करते रहेंगे। अब से तुम लोग अपने कर्तव्यों को औपचारिक तौर पर निभा पाओगे, और सारी धरती पर औपचारिक तौर पर मेरी स्तुति करोगे, हमेशा-हमेशा के लिए!

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 28" से उद्धृत

28. जब राज्य की सलामी गूंजती है-जो तब भी होता है जब सात बार मेघों की गड़गड़ाहट होती है-यह ध्वनि स्वर्ग और पृथ्वी को झंझोड़ देती है, और उच्चतम स्वर्ग को कम्पित करती है और हर एक मानव के हृदय के तारों को कंपाती है। उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र में सम्मान के साथ राज्य का स्तुति गान हवा में गूंजने लगता है, इस बात को साबित करते हुए कि मैंने उस बड़े लाल अजगर के राष्ट्र को नष्ट कर दिया है और तब मेरा राज्य स्थापित हो जाता है। उस से भी अधिक महत्वपूर्ण, मेरा राज्य पृथ्वी पर स्थापित हो जाता है। इस समय, मैं अपने स्वर्गदूतों को संसार के राष्ट्रों में भेजना प्रारम्भ करता हूँ ताकि वे मेरे पुत्रों, अर्थात् मेरी प्रजा की चरवाही कर सकें; यह मेरे काम के अगले कदम की जरूरतों को पूरा करने के लिए भी है। लेकिन मैं व्यक्तिगत रूप से, लाल अजगर से युद्ध करने, उस स्थान पर जाता हूँ जहाँ वह दुबककर बैठा है। और जब सारी मानवता मुझे देह में पहचान जाती है, और मेरे देह के द्वारा किए गए कार्यों को देखने के योग्य हो जाती है, तब उस बड़े लाल अजगर की मांद राख में बदल जाती है और बिना किसी नामों निशान के विलुप्त हो जाती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 10" से उद्धृत

29. जब सभी लोगों को पूर्ण बना लिया गया होगा और पृथ्वी के सभी राष्ट्र मसीह का राज्य बन गए होंगे, तब वह समय होगा जब गर्जन के सात शब्द सुनाई देते हैं। वर्तमान दिन उस चरण की दिशा में आगे एक लंबा कदम है, आने वाले समय पर आवेश उन्मुक्त कर दिया गया है। यह परमेश्वर की योजना है—निकट भविष्य में इसका एहसास हो जाएगा। हालाँकि, परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा है, वह सब पहले ही पूरा कर दिया है। इस प्रकार, यह स्पष्ट है कि धरती के देश केवल रेत के किले हैं जो ज्वार आने पर काँप जाते हैं: अंत का दिन सन्निकट है और बड़ा लाल अजगर परमेश्वर के वचन के नीचे गिर जाएगा। यह सुनिश्चित करने के लिए कि परमेश्वर की योजना को सफलतापूर्वक पूरा किया जाता है, परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना पूरा प्रयास करते हुए, स्वर्ग के स्वर्गदूत पृथ्वी पर उतर गए हैं। स्वयं देहधारी परमेश्वर दुश्मन से लड़ाई करने के लिए युद्ध के मैदान में तैनात हुआ है। जहाँ कहीं भी देहधारण प्रकट होता है, उस जगह से दुश्मन नष्ट हो जाता है। परमेश्वर के हाथ से सर्वनाश किए जाने वालों, बर्बाद किए जाने वालों में चीन सबसे पहला है। परमेश्वर चीन पर बिल्कुल भी दया नहीं दिखाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 10" से उद्धृत

30. मैं राज्य में शासन करता हूँ, और, इसके अतिरिक्त, मैं पूरे ब्रह्माण्ड में शासन करता हूँ; मैं राज्य का राजा और ब्रह्माण्ड का मुखिया दोनों हूँ। अब से, मैं उन सभी को इकट्ठा करूँगा जो चुने हुए नहीं हैं और अन्यजातियों के बीच अपना कार्य आरम्भ करूँगा, और मैं पूरे ब्रह्माण्ड के लिए अपनी प्रशासनिक आज्ञाओं की घोषणा करूँगा, ताकि मैं अपने कार्य में अगले कदम की शुरूआत कर सकूँ। अन्यजातियों के बीच अपने कार्य को फैलाने के लिए मैं ताड़ना का उपयोग करूँगा, जिसका अर्थ है, कि मैं उन सभी के विरूद्ध बल का उपयोग करूँगा जो अन्यजातियाँ हैं। स्वाभाविक रूप से, यह कार्य उसी समय किया जाएगा जिस समय मेरा कार्य चुने हुओं के बीच किया जाएगा। जब मेरे लोग पृथ्वी पर शासन करेंगे और सामर्थ्य का उपयोग करेंगे तो यही वह दिन भी होगा जब पृथ्वी के सभी लोगों को जीत लिया गया है, और, इसके अतिरिक्त, यही वह समय होगा जब मैं विश्राम करूँगा—और केवल तभी मैं उन सबके सामने प्रकट होऊँगा जिन्हें जीता जा चुका है। मैं पवित्र राज्य पर प्रकट होता हूँ, और अपने आप को अपवित्र भूमि से छिपा लेता हूँ। वे सभी जिन्हें जीता जा चुका है और जो मेरे सामने आज्ञाकारी बन गए हैं अपनी आँखों से मेरे चेहरे को देखने में समर्थ हैं, और अपने कानों से मेरी आवाज़ को सुनने में समर्थ हैं। यह उन लोगों के लिए आशीष है जो अंत के दिनों में पैदा हुए हैं, यह मेरे द्वारा पहले से ही नियत किया गया आशीष है, और यह किसी भी मनुष्य के द्वारा अपरिवर्तनीय है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 29" से उद्धृत

31. संसार का पतन हो रहा है! बेबीलोन गतिहीनता में है! धार्मिक संसार—कैसे इसे पृथ्वी पर मेरी सामर्थ्य द्वारा नष्ट नहीं किया जा सकता था? कौन अभी भी मेरी अवज्ञा और मेरा विरोध करने का साहस करता है? धर्म शास्त्र? सभी धार्मिक अधिकारी? पृथ्वी के शासक और अधिकारी? स्वर्गदूत? कौन मेरे शरीर की सिद्धता और परिपूर्णता का उत्सव नहीं मनाता है? सभी लोगों में से, कौन बिना रूके मेरी स्तुति नहीं गाता है, कौन बिना नागा किए प्रसन्न नहीं है? मैं बड़े लाल अजगर की माँद के देश में रहता हूँ, फिर भी मैं इसके कारण डर कर थरथराता या भागता नहीं हूँ, क्योंकि उसके सभी लोगों ने पहले से ही उससे घृणा करना प्रारम्भ कर दिया है। उस अजगर के सामने किसी भी चीज़ के "कर्तव्य" को कभी नहीं किया गया है; इसके बजाए, सभी चीज़ें जैसा वे उचित देखती हैं, उस तरीके से काम करती हैं और उस मार्ग को चुनती हैं जो उनके लिए सबसे अनुकूल है। पृथ्वी के राष्ट्रों का विनाश कैसे नहीं हो सकता है? पृथ्वी के राष्ट्रों का पतन कैसे नहीं हो सकता है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "अध्याय 22" से उद्धृत

32. मेरा अंतिम कार्य न केवल मनुष्यों को दण्ड देने के वास्ते है बल्कि मनुष्य की मंजिल की व्यवस्था करने के वास्ते भी है। इससे भी अधिक, यह उन सभी कार्यों के लिए सभी से स्वीकृति प्राप्त करने के वास्ते है जो मैं कर चुका हूँ। मैं चाहता हूँ कि हर एक मनुष्य देखे कि जो कुछ मैंने किया है, वह सही है, और जो कुछ मैंने किया है वह मेरे स्वभाव की अभिव्यक्ति है; यह मनुष्य का कार्य नहीं है, और प्रकृति का तो बिल्कुल नहीं है, जिसने मानवजाति को उत्पन्न किया है। इसके विपरीत, यह मैं हूँ जो सृष्टि में हर जीवित प्राणी का पोषण करता है। मेरे अस्तित्व के बिना, मानव जाति केवल नष्ट होगी और विपत्तियों के दण्ड से गुज़रेगी। कोई भी मानव सुन्दर सूर्य और चंद्रमा या हरे-भरे संसार को फिर कभी नहीं देखेगा; मानवजाति केवल शीत रात्रि और मृत्यु की छाया की निर्मम घाटी का सामना करेगी। मैं ही मनुष्यजाति का एक मात्र उद्धार हूँ। मैं ही मनुष्यजाति की एकमात्र आशा हूँ और, इससे भी बढ़कर, मैं ही वह हूँ जिस पर संपूर्ण मानवजाति का अस्तित्व निर्भर करता है। मेरे बिना, मानवजाति तुरंत निस्तब्ध हो जाएगी। मेरे बिना मानवजाति तबाही झेलेगी और सभी प्रकार के भूतों द्वारा कुचली जाएगी, इसके बावजूद कोई भी मुझ पर ध्यान नहीं देगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "अपनी मंज़िल के लिए पर्याप्त संख्या में अच्छे कर्मों की तैयारी करो" से उद्धृत

33. जब मैं पुनः वापस आऊँगा, तो सारे देश पहले से ही मेरी जलती हुई आग की लपटों द्वारा निर्धारित सीमाओं में विभाजित हो चुके होंगे। उस समय, मैं अपने आप को नए सिरे से मानवजाति के सामने झुलसाने वाले सूरज के समान व्यक्त करूँगा, और पवित्र व्यक्ति की छवि में अपने आपको स्पष्ट रूप से उन्हें दिखाऊँगा जिसे उन्होंने कभी नहीं देखा है, और असंख्य देशों के बीच चलूँगा, ठीक जैसे मैं, यहोवा, कभी यहूदी कबीलों के बीच चला था। तब से, मैं पृथ्वी पर मानवजाति के जीवन में उनकी अगुवाई करूँगा। वे वहाँ मेरी महिमा को निश्चित रूप से देखेंगे, और उनके जीवन में उनकी अगुवाई के लिए हवा में बादल के एक खम्भे को भी वे निश्चित रूप से देखेंगे, क्योंकि मैं अपना प्रकटन पवित्र स्थानों में करता हूँ। मनुष्य मेरी धार्मिकता के दिन और मेरी महिमामय अभिव्यक्ति को भी देखेगा। वैसा तब होगा जब मैं सारी पृथ्वी पर शासन करूँगा और अपने कई पुत्रों को महिमा में लाऊँगा। पृथ्वी में हर कहीं, मनुष्य नीचे झुकेगा और मानवजाति के बीच मेरा तम्बू उस कार्य की नींव पर दृढ़ता से खड़ा होगा जिसे मैं आज कर रहा हूँ। मनुष्य मन्दिर में भी मेरी सेवा करेंगे। गन्दी और घृणास्पद चीज़ों से ढकी हुई वेदी को मैं टुकड़ों में चूर-चूर कर दूँगा और नए सिरे से बनाऊँगा। पवित्र वेदी पर नवजात मेमनों और बछड़ों का चट्टा लग जाएगा। मैं आज के मन्दिर को तबाह कर दूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। वह मन्दिर जो अब खड़ा है, जो घृणास्पद लोगों से भरा हुआ है, ढह जाएगा और वह मन्दिर जो मैं बनाऊँगा वह मेरे प्रति वफादार सेवकों से भरा होगा। वे मेरे मन्दिर की महिमा के वास्ते एक बार फिर से खड़े होंगे और मेरी सेवा करेंगे। तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को देखोगे जब मैं बड़ी महिमा को प्राप्त करूँगा, तुम लोग निश्चित रूप से उस दिन को भी देखोगे जब मैं मन्दिर को तबाह करूँगा और एक नया मन्दिर बनाऊँगा। तुम लोग मनुष्यों के संसार में मेरे तम्बू के आने के दिन को भी देखोगे। जैसे ही मैं मन्दिर को चकनाचूर करूँगा, जब लोग मुझे उतरते हुए देखेंगे, वैसे ही मैं अपने तम्बू को मनुष्यों के संसार में ले आऊँगा। जब मैं सभी देशों को चकनाचूर कर दूँगा, तब से अपने मन्दिर को बनाते हुए और अपनी वेदी को स्थापित करते हुए, मैं उन्हें नए सिरे से एक साथ इकट्ठा करूँगा ताकि सभी मुझे बलिदान अर्पित करें, मेरे मंदिर में मेरी सेवा करें, और अन्यजाति देशों में मेरे कार्य के प्रति स्वयं को निष्ठापूर्वक समर्पित करें। वे एक याजक के लबादे और एक मुकुट के साथ, मुझ यहोवा की महिमा के बीच होंगे, और मेरा प्रताप उनके ऊपर मँडराते हुए और उनके साथ बने रहते हुए, आज के दिन के इस्राएलियों के जैसे होंगे। अन्यजाति देशों में भी मेरा कार्य उसी तरह से पूरा किया जाएगा। जैसा मेरा कार्य इस्राएल में है, वैसा ही मेरा कार्य अन्यजाति देशों में भी होगा क्योंकि मैं इस्राएल में अपने कार्य का विस्तार करूँगा और इसे अन्यजातियों के देशों में फैलाऊँगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्यों को बचाने का कार्य भी है" से उद्धृत

34. लोग मेरी जय-जयकार करते हैं, लोग मेरी स्तुति करते हैं; सभी अपने मुख से एकमात्र सच्चे ईश्वर का नाम लेते हैं, सभी लोगों की दृष्टि मेरे कर्मों को देखने के लिए उठती है। राज्य लोगों के जगत में अवतरित होता है, मेरा व्यक्तित्व समृद्ध और प्रचुर है। इस पर कौन खुश न होगा? कौन है जो इसके लिए आनंदित हो, नृत्य न करेगा? ओह, सिय्योन! मेरा जश्न मनाने के लिए अपनी विजयी-पताका उठाओ! जीत का अपना विजय-गीत गाओ और मेरा पवित्र नाम फैलाओ! पृथ्वी की समस्त वस्तुओ! मुझे अर्पण होने के लिए स्वयं को शुद्ध करो! आसमान के तारो! अब अपने स्थानों पर लौट जाओ और नभ-मंडल में मेरा प्रबल सामर्थ्य दिखाओ! मैं पृथ्वी के लोगों की उन आवाज़ों को सुन रहा हूं, जो अपने गायन में मेरे लिए असीम प्रेम और श्रद्धा प्रकट कर रही हैं! इस दिन, जबकि हर चीज़ फिर से जीवित होती है, मैं पृथ्वी पर आता हूं। इस पल, फूल खिलते हैं, पक्षी एक सुर में गाते हैं, हर चीज़ पूरे उल्लास से धड़कती है! राज्य के अभिनंदन की ध्वनि में, शैतान का राज्य ध्वस्त हो गया है, राज्य-गान के प्रतिध्वनित होते समूह-गान में नष्ट हो गया है। और ये अब फिर कभी सिर नहीं उठाएगा!

पृथ्वी पर कौन है जो सिर उठाने और विरोध करने का साहस करे? जब मैं पृथ्वी पर आता हूं तो ज्वलन, क्रोध, और तमाम विपदाएं लाता हूं। पृथ्वी के सारे राज्य अब मेरे राज्य हैं! ऊपर आकाश में बादल गोते लगाते और तरंगित होते हैं; आकाश के नीचे झीलें और नदियाँ हिलोरे मारती हैं और जिससे मधुर संगीत निकलता है। अपनी मांद में विश्राम करते जीव-जंतु बाहर निकलते हैं और जो लोग उनींदी अवस्था में थे, उन्हें भी मैं जगा देता हूं। हर कोई जिसकी प्रतीक्षा में था, वो दिन आखिर आ गया! वे मुझे सर्वाधिक सुंदर गीत भेंट करते हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन के "राज्य गान" से उद्धृत

35. जीवन का मार्ग कोई साधारण चीज़ नहीं है जो चाहे कोई भी प्राप्त कर ले, न ही इसे सभी के द्वारा आसानी से प्राप्त किया जा सकता है। यह इसलिए कि जीवन केवल परमेश्वर से ही आता है, कहने का अर्थ है कि केवल स्वयं परमेश्वर ही जीवन के तत्व का अधिकारी है, स्वयं परमेश्वर के बिना जीवन का मार्ग नहीं है, और इसलिए केवल परमेश्वर ही जीवन का स्रोत है, और जीवन के जल का सदा बहने वाला सोता है। जब से उसने संसार को रचा है, परमेश्वर ने जीवन की प्राणशक्ति से जुड़े बहुत से कार्य किये हैं, बहुत सारा कार्य मनुष्य को जीवन प्रदान करने के लिए किया है और बहुत अधिक मूल्य चुकाया है ताकि मनुष्य जीवन को प्राप्त करे, क्योंकि परमेश्वर स्वयं ही अनन्त जीवन है, और वह स्वयं ही वह मार्ग है जिससे मनुष्य नया जन्म लेता है। परमेश्वर मनुष्य के हृदय से कभी भी दूर नहीं रहा है और हर समय उनके मध्य में रहता है। वह मनुष्यों के जीवन यापन की असली ताकत है, मनुष्य के अस्तित्व का आधार है, जन्म के बाद मनुष्य के अस्तित्व के लिए उर्वर संचय है। वह मनुष्य को नया जन्म लेने देता है, और प्रत्येक भूमिका में दृढ़तापूर्वक जीने के लिये सक्षम बनाता है। उसकी सामर्थ्य के लिए और उसकी सदा जीवित रहने वाली जीवन की शक्ति के लिए धन्यवाद, मनुष्य पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहता है, जिसके द्वारा परमेश्वर के जीवन की सामर्थ्य मनुष्य के अस्तित्व के लिए मुख्य आधार बनती है और जिसके लिए परमेश्वर ने कीमत चुकाई है जिसे कोई भी साधारण मनुष्य कभी भी नहीं चुका सकता। परमेश्वर की जीवन शक्ति किसी भी शक्ति पर प्रभुत्व कर सकती है; इसके अलावा, वह किसी भी शक्ति से अधिक है। उसका जीवन अनन्त काल का है, उसकी सामर्थ्य असाधारण है, और उसके जीवन की शक्ति आसानी से किसी भी प्राणी या शत्रु की शक्ति से पराजित नहीं हो सकती। परमेश्वर की जीवन-शक्ति का अस्तित्व है, और अपनी शानदार चमक से चमकती है, चाहे वह कोई भी समय या स्थान क्यों न हो। परमेश्वर का जीवन सम्पूर्ण स्वर्ग और पृथ्वी की उथल-पुथल के मध्य हमेशा के लिए अपरिवर्तित रहता है। हर चीज़ का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा, परन्तु परमेश्वर का जीवन फिर भी अस्तित्व में रहेगा। क्योंकि परमेश्वर ही सभी चीजों के अस्तित्व का स्रोत है, और उनके अस्तित्व का मूल है। मनुष्य का जीवन परमेश्वर से निकलता है, स्वर्ग का अस्तित्व परमेश्वर के कारण है, और पृथ्वी का अस्तित्व भी परमेश्वर की जीवन शक्ति से ही उद्भूत होता है। कोई वस्तु कितनी भी महत्वपूर्ण हो, परमेश्वर के प्रभुत्व से बढ़कर श्रेष्ठ नहीं हो सकती, और कोई भी वस्तु शक्ति के साथ परमेश्वर के अधिकार की सीमा को तोड़ नहीं सकती है। इस प्रकार से, चाहे वे कोई भी क्यों न हों, सभी को परमेश्वर के अधिकार के अधीन ही समर्पित होना होगा, प्रत्येक को परमेश्वर की आज्ञा में रहना होगा, और कोई भी उसके नियंत्रण से बच कर नहीं जा सकता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल अंतिम दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनन्त जीवन का मार्ग दे सकता है" से उद्धृत

36. इस विशाल ब्रह्मांड में ऐसे कितने प्राणी हैं जो सृष्टि के नियम का बार-बार पालन करते हुए, एक ही निरंतर नियम पर चल रहे हैं और प्रजनन कार्य में लगे हैं। जो लोग मर जाते हैं वे जीवितों की कहानियों को अपने साथ ले जाते हैं और जो जीवित हैं वे मरे हुओं के वही त्रासदीपूर्ण इतिहास को दोहराते रहते हैं। मानवजाति बेबसी में स्वयं से पूछती हैः हम क्यों जीवित हैं? और हमें मरना क्यों पड़ता है? यह संसार किसके आदेश पर चलता है? मानवजाति को किसने रचा है? क्या वास्तव में मानवजाति प्रकृति के द्वारा ही रची गई है? क्या मानवजाति वास्तव में स्वयं के भाग्य के नियंत्रण में है? ... हज़ारों सालों से मानवजाति ने बार-बार ये प्रश्न किए हैं। दुर्भाग्य से, मानवजाति जितना अधिक इन प्रश्नों के जूनून से घिरती गई, विज्ञान के लिए उसके भीतर उतनी ही अधिक प्यास उत्पन्न होती गई है। देह के लिए विज्ञान संक्षिप्त संतुष्टि और क्षणिक आनन्द प्रदान करता है, परन्तु मानवजाति को तनहाई, अकेलेपन और उसकी आत्मा में छुपे आतंक और गहरी लाचारी को दूर करने के लिए काफी नहीं। मानवजाति नग्न आंखों से देखे और दिमाग से समझे जा सकने वाले विज्ञान के ज्ञान का उपयोग महज इसलिए करती है कि अपने हृदय को चेतनाशून्य कर सके, फिर भी ऐसा वैज्ञानिक ज्ञान मानवजाति को रहस्यों का पता लगाने से रोक नहीं सकता है। मनुष्य नहीं जानता कि ब्रह्मांड की सत्ता किसके पास है, मानवजाति की उत्पत्ति और भविष्य तो वह बिल्कुल नहीं जानता। मानवजाति सिर्फ मजबूरन इन नियमों के अधीन रहती है। न तो इससे कोई बच सकता है और न ही कोई इसे बदल सकता है, क्योंकि इन सबके मध्य और स्वर्ग में केवल एक ही शाश्वत सत्ता है जो सभी पर अपनी सम्प्रभुता रखती है। और ये वह है जिसे कभी भी मनुष्य ने देखा नहीं है, जिसे मानवजाति ने कभी जाना नहीं है, जिसके अस्तित्व में मनुष्य ने कभी भी विश्वास नहीं किया, फिर भी वही एक है जिसने मानवजाति के पूर्वजों को श्वास दी और मानवजाति को जीवन प्रदान किया। वही मानवजाति के अस्तित्व के लिए आपूर्ति और पोषण प्रदान करता है, और आज तक मानवजाति को मार्गदर्शन प्रदान करता आया है। इसके अलावा, उसी और सिर्फ़ उसी पर मानवजाति अपने अस्तित्व के लिए निर्भर करती है। इस ब्रह्माण्ड में उसी की सत्ता है और हर प्राणी पर उसी का शासन है। वह चारों मौसमों पर उसी का अधिकार है और वही वायु, शीत, बर्फ और बरसात संचालित करता है। वही मानवजाति को धूप प्रदान करता है और रात्रि लेकर आता है। उसी ने स्वर्ग और पृथ्वी की नींव डाली, मनुष्य को पहाड़, झील और नदियां तथा उसमें जीवित प्राणी उपलब्ध कराए। उसके कार्य सभी जगह हैं, उसका सामर्थ्य सभी जगह है, उसका ज्ञान चारों ओर है, और उसका अधिकार भी सभी जगह है। प्रत्येक नियम और व्यवस्था उसी के कार्य का मूर्त रूप है, और उनमें से प्रत्येक उसकी बुद्धि और अधिकार प्रगट करता है। कौन है जो उसके प्रभुत्व से बच सकता है? कौन है जो उसकी रूपरेखा से मुक्त रह सकता है? प्रत्येक चीज़ उसकी निगाह में है और सभी कुछ उसकी अधीनता में है उसके कार्य और शक्ति मनुष्य के पास सिवाय यह मानने के और कोई विकल्प नहीं छोड़ते कि वास्तव में उसका अस्तित्व है और हर चीज़ पर उसी का अधिकार है। उसके अलावा कोई और ब्रह्मांड को नियंत्रित नहीं कर सकता, उसके अलावा कोई और तो मानवजाति को अथक पोषण प्रदान कर ही नहीं कर सकता। इस बात से परे कि चाहे तुम परमेश्वर के कार्यों को पहचानन के योग्य हो या नहीं और परमेश्वर के अस्तित्व पर भरोसा करते हो या नहीं, इसमें कोई संदेह नहीं है कि तुम्हारा भाग्य परमेश्वर के विधान के अंतर्गत ही रहता है, और इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि परमेश्वर प्रत्येक चीज़ पर अपनी सम्प्रभुता बनाए रखेगा। उसका अस्तित्व और अधिकार कभी भी किसी चीज़ पर आधारित नहीं होते हैं चाहे वे मनुष्य के द्वारा पहचाने और समझे जाएं या नहीं। केवल वही मनुष्यों के अतीत, वर्तमान और भविष्य को जानता है और वही केवल मानवजाति के भाग्य को निर्धारित कर सकता है। इस बात से परे कि तुम इस सत्य को स्वीकारने के योग्य हो अथवा नहीं, अब ज्यादा समय नहीं रह गया है कि मानवजाति स्वयं अपनी आंखों से इन बातों की गवाही देगी और यह सत्य है कि परमेश्वर इसे जल्द ही पूरा करेगा। मानवजाति परमेश्वर की निगाह तले जीवित रहती और समाप्त हो जाती है। मानवजाति परमेश्वर के प्रबंधन में रहती है और जब उसकी आंखें अंतिम समय में बंद हो जाती हैं, तो वह भी उसी के प्रबंधन में होता है। बार-बार, मनुष्य आता-जाता रहता है। बिना अपवाद के, यह सब कुछ परमेश्वर के प्रारूप और सम्प्रभुता का भाग है। परमेश्वर का प्रबंधन निरंतर आगे बढ़ता रहता है और कभी रुका नहीं है। वह मानवजाति को अपने अस्तित्व से अवगत कराएगा, अपनी सम्प्रभुता पर विश्वास कराएगा, अपने कार्यों को दिखाएगा, और अपने राज्य में वापस लाएगा। यही उसकी योजना है, और यही वह कार्य है जो वह हज़ार सालों से करता आ रहा है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है" से उद्धृत

37. परमेश्वर का स्वभाव एक ऐसा विषय है जो बहुत गूढ़ दिखाई देता है और जिसे आसानी से स्वीकार नहीं किया जाता, क्योंकि उसका स्वभाव मनुष्यों के व्यक्तित्व के समान नहीं है। परमेश्वर के पास भी आनन्द, क्रोध, दुखः, और खुशी की भावनाएँ हैं, परन्तु ये भी भावनाएँ उन मनुष्यों की भावनाओं से जुदा हैं। परमेश्वर का अपना अस्तित्व और स्वत्वबोध है। जो कुछ वह प्रकट और उजागर करता है वह उसके सार और उसकी पहचान का प्रस्तुतिकरण है। उसकी हस्ती, उसका स्वत्वबोध, साथ ही उसके सार और पहचान को किसी मनुष्य के द्वारा बदला नहीं जा सकता है। उसका स्वभाव मानव जाति के प्रति उसके प्रेम, मानवजाति के लिए उसकी दिलासा, मानवजाति के प्रति नफरत, और उस से भी बढ़कर, मानवजाति की सम्पूर्ण समझ के चारों ओर घूमता रहता है। फिर भी, मुनष्य का व्यक्तित्व आशावादी, जीवन्त, या कठोर हो सकता है। परमेश्वर का स्वभाव सब बातों में सभी चीज़ों और जीवित प्राणियों के शासक, सारी सृष्टि के प्रभु से सम्बन्ध रखता है। उसका स्वभाव आदर, सामर्थ, कुलीनता, महानता, और सब से बढ़कर, सर्वोच्चता का प्रतिनिधित्व करता है। उसका स्वभाव अधिकार और उन सब का प्रतीक है जो धर्मी, सुन्दर, और अच्छा है। इस के अतिरिक्त, यह इस का भी प्रतीक है कि परमेश्वर को अंधकार और शत्रु के बल के द्वारा दबाया या उस पर आक्रमण नहीं किया जा सकता है,[क] साथ ही इस बात का प्रतीक भी है कि उसे किसी भी सृजे गए प्राणी के द्वारा ठेस नहीं पहुंचाई जा सकती है (और उसे ऐसा करने की अनुमति नहीं है)।[ख] उसका स्वभाव सब से ऊँची सामर्थ का प्रतीक है। कोई भी मनुष्य उसके कार्य और उसके स्वभाव को अस्थिर नहीं कर सकता है। परन्तु मनुष्य का व्यक्तित्व पशुओं से थोड़ा बेहतर होने के चिह्न से बढ़कर कुछ भी नहीं है। मनुष्य के पास अपने आप में और स्वयं में कोई अधिकार नहीं है, कोई स्वायत्तता नहीं है, और स्वयं को श्रेष्ठ करने की कोई योग्यता भी नहीं है, बल्कि उसके सार में है कि वो हर किसी व्यक्ति की चालाकी, घटना, या वस्तु की शक्ति के सामने झुक जाता है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

38. हर एक वाक्य जो मैं ने कहा है वह परमेश्वर के स्वभाव को सिद्ध करता है। आप यदि मेरे वचनों पर सावधानी से मनन करोगे तो अच्छा होगा, और आप निश्चय ही उनसे बड़ा लाभ उठाएंगे। परमेश्वर के सार-तत्व को समझना बड़ा ही कठिन काम है, परन्तु मैं भरोसा करता हूँ कि आप सभी के पास कम से कम परमेश्वर के स्वभाव का कुछ तो ज्ञान है। तब, मैं आशा करता हूँ कि आप वह कार्य जिससे परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचती है और भी अधिक करेंगे और मुझे दिखाएँगे। तब ही मुझे पुनः आश्वासन मिलेगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर को हर समय अपने दिल में रखिए। जब आप कार्य करते हैं तो उसके वचनों के साथ बने रहिये। सब बातों में उसके विचारों की खोज कीजिए, और ऐसा कोई भी काम मत कीजिए जिससे परमेश्वर का अनादर और अपमान हो। इसके अतिरिक्त, परमेश्वर को अपने हृदय के भविष्य के खालीपन को भरने के लिए अपने मन में मत रखिये। यदि आप ऐसा करेंगे, तो आप परमेश्वर के स्वभाव को ठेस लगायेंगे। यदि आपने परमेश्वर के विरूद्ध कभी भी ईशनिन्दा की टिप्पणी या शिकायत नहीं की है और अपने सम्पूर्ण जीवन में जो कुछ उसने आपको सौंपा है उस से यथोचित कार्य करने में समर्थ रहे हैं, साथ ही परमेश्वर के वचनों के लिए पूर्णतया समर्पण कर दिया है, तो आप प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करने से बच गये हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप ने कभी ऐसा कहा है, "मैं ऐसा क्यों न सोचूँ कि वह परमेश्वर है?", "मैं सोचता हूँ कि ये शब्द पवित्र आत्मा के प्रकाशन से बढ़कर और कुछ नहीं हैं", "मैं नहीं सोचता कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह सही है", "परमेश्वर की मानवीयता मेरी मानवीयता से बढ़कर नहीं है", "परमेश्वर का वचन सामान्य रूप से विश्वास करने योग्य नहीं है," या अन्य प्रकार की दोषारोपण संबंधी टीका टिप्पणियाँ, तो मैं आपसे आग्रह करता हूँ कि आप अपने पापों का अंगीकार करें और पश्चाताप करें। अन्यथा, आपको पापों की क्षमा के लिए कभी अवसर नहीं मिलेगा, क्योंकि आपने किसी मनुष्य को नहीं, बल्कि स्वयं परमेश्वर को ठेस पहुँचाई है। आप सोच सकते हैं कि आप मात्र एक मनुष्य पर न्याय-विचार कर रहे हैं, किन्तु परमेश्वर का आत्मा इस रीति से विचार नहीं करता है। उसके देह का अनादर उसके अनादर के बराबर है। यदि ऐसा है, तो क्या आपने परमेश्वर के स्वभाव को ठेस नहीं पहुँचाई है? आपको याद रखना होगा कि जो कुछ भी परमेश्वर के आत्मा के द्वारा किया गया है वह उसकेदेह में उसके कार्य का समर्थन करने और ऐसे कार्य को भली भांति करने के लिए किया गया है। यदि आप इसे महत्व न दें, तब मैं कह सकता हूँ आप ही वो शख्स हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करने में कभी सफल नहीं हो पाएँगे। क्योंकि आपने परमेश्वर के क्रोध को भड़का दिया है, इस प्रकार आपको सज़ा देने के लिए उसे उचित दण्ड का इस्तेमाल करना होगा।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के स्वभाव को समझना अति महत्वपूर्ण है" से उद्धृत

फुटनोट:

क. मूल पाठ में लिखा है "यह असमर्थ होने का प्रतीक है"।

ख. ख. मूल पाठ में लिखा है "साथ ही अपमान के अयोग्य (और अपमान सहन न करने) होने का भी प्रतीक है"।

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