1.1. परमेश्वर के व्यवस्था के युग में अपने कार्य को प्रकट करने पर

21. उस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य की महत्ता, उद्देश्य और कदम अपना कार्य पूरी पृथ्वी पर कार्यान्वित करने के लिए थे, जो इस्राएल को अपना केंद्र बनाकर धीरे-धीरे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैल गया। वह इसी सिद्धांत के अनुसार पूरे ब्रह्मांड के भीतर कार्य करता है—एक निश्चित बिंदु से आरंभ कर संपूर्ण को संचालित करता है और फिर अपने कार्य को तब तक फैलाता है जब तक कि ब्रह्मांड के सभी लोग उसके सुसमाचार को प्राप्त न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी और वे जीवन की मूल आवश्यकताएँ पूरी करना जानते थे, किंतु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है या मनुष्य के लिए उसके इरादे क्या हैं, और वे यह तो बिल्कुल भी नहीं जानते थे कि सृष्टिकर्ता का भय कैसे मानें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या ऐसे विनियम और व्यवस्थाएँ हैं जिनका पालन किया जाना था,[क] या क्या सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता के लिए कोई कर्तव्य करना चाहिए, आदम के वंशज इन बातों के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और पत्नी को अपने पति के प्रति समर्पित होकर यहोवा द्वारा सृजित मानव-जाति को बनाए रखना चाहिए। दूसरे शब्दों में, वे लोग जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या सृष्टिकर्ता को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल-कपट नहीं था, और उनके बीच ईर्ष्या और कलह कभी-कभार ही उत्पन्न होते थे, फिर भी उन्हें सृष्टिकर्ता, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीजों को खाना और उनका आनंद लेना जानते थे, किंतु वे यहोवा का भय मानना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि उन्हें घुटने टेककर यहोवा की आराधना करनी चाहिए। तो वे उसके सृजित प्राणी कैसे कहला सकते थे? यदि ऐसा होता, तो क्या इन वचनों का बोला जाना, “यहोवा सृष्टिकर्ता है” और “उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसे महिमामंडित कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके”—व्यर्थ न हो जाता? जिन लोगों के पास यहोवा का भय मानने वाला हृदय नहीं था, वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे उसकी महिमा की अभिव्यक्ति कैसे बन सकते थे? तब क्या यहोवा के इन वचनों “मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया” का फायदा उठाकर शैतान, वह दुष्ट हमला न करता? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन को लेकर शर्म का एक चिह्न न बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद, यहोवा ने आदम से नूह तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जल-प्रलय द्वारा दुनिया को नष्ट किए जाने के बाद ही उसने औपचारिक तौर पर इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरंभ किया था जो नूह के वंशज थे और आदम के भी। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल में रहने वाले सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया और इस तरह मानव-जाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में श्वास फूँकने में समर्थ है, ताकि वह परमेश्वर से जीवन प्राप्त कर सके और मिट्टी में से उठकर एक सृजित मानव बन सके, बल्कि वह मानव-जाति को भस्म भी कर सकता है, उसे शाप भी दे सकता है और उस पर अपने राजदंड का उपयोग कर शासन भी कर सकता है। इसलिए उन्होंने देखा कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन का मार्गदर्शन कर सकता है और मानव-जाति के बीच दिन और रात के समय के अनुसार बोल सकता है और कार्य कर सकता है। जो कार्य उसने किया, वह केवल इसलिए किया ताकि उसके सृजित प्राणी जान सकें कि मनुष्य उसके द्वारा उठाई गई धूल से उत्पन्न हुआ है। इसके अलावा, मनुष्य उसके द्वारा ही बनाया गया है। इतना ही नहीं, बल्कि उसने पहले इस्राएल में कार्य किया ताकि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा का सुसमाचार प्राप्त कर सकें, ताकि ब्रह्मांड में सभी सृजित प्राणी यहोवा का भय मान सकें और उसे महान मानते हुए सम्मान दे सकें। यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरंभ न किया होता, बल्कि मनुष्यों को बनाने के बाद उन्हें बस पृथ्वी पर निश्चिंत जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की भौतिक प्रकृति को देखते हुए (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीजों को कभी नहीं जान सकता, जिन्हें वह देख नहीं सकता, अर्थात् वह कभी नहीं जान पाएगा कि मानव-जाति को यहोवा ने बनाया है, और यह तो बिल्कुल नहीं जान पाएगा कि उसने ऐसा क्यों किया), वह न तो कभी जान पाएगा कि यहोवा ने ही मानवजाति को बनाया है, न ही यह कि वह सभी चीजों का प्रभु है। यदि यहोवा ने मनुष्य का सृजन करके उसे पृथ्वी पर छोड़ दिया होता और एक अवधि तक मनुष्यों का मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने के बजाय ऐसे ही अपने हाथ झाड़कर चला गया होता, तो सारी मानव-जाति शून्य बना दी गई होती; यहाँ तक कि स्वर्ग, पृथ्वी और उसके द्वारा सृजित सभी चीजें और समस्त मानव-जाति शून्य बना दी गई होती और इतना ही नहीं, शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। ऐसा होता तो, यहोवा की यह इच्छा “पृथ्वी पर अर्थात्, उसके सृजन के बीच, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान हो” चकनाचूर हो गई होती। इसलिए मानवजाति को बनाने के बाद, वह मनुष्यों के जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहा और उनसे बात की—यह सब उसका अपनी इच्छा और योजना को साकार करने के लिए था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

फुटनोट :

क. मूल पाठ में, “पालन किया जाना था” यह वाक्यांश नहीं है।


22. व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा को उन इस्राएलियों तक पहुँचाने के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित कीं, जो उसका अनुसरण करते हुए मिस्र के बाहर निकले थे। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को प्रदान की गई थीं, उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियंत्रित करने के लिए थीं, उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। वे सब्त का पालन करते थे या नहीं, अपने माता-पिता का सम्मान करते थे या नहीं, मूर्तियों की आराधना करते थे या नहीं, इत्यादि—यही वे सिद्धांत थे, जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से जला दिए गए, कुछ ऐसे थे जो पत्थरों से मार डाले गए, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया, इसका निर्धारण इस बात से किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थरों से मार डाला गया। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें यहोवा की आग में जला दिया गया। जो अपने माता-पिता का सम्मान नहीं करते थे, उन्हें भी पत्थरों से मार डाला गया। यह सब यहोवा द्वारा स्वीकृत था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को इसलिए स्थापित किया था, ताकि जब वह लोगों के जीवन की अगुआई करे, तो वे उसके वचन सुनकर उनके प्रति समर्पण करें, उसके विरुद्ध विद्रोह न करें। उसने नवजात मानव-जाति को नियंत्रण में रखने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया, जिससे वह अपने भविष्य के कार्य की नींव डाले। इसलिए, यहोवा द्वारा किए गए कार्य के आधार पर प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

23. व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा के नाम से मानवजाति का मार्गदर्शन करने का कार्य किया गया था, और पृथ्वी पर कार्य का पहला चरण आरंभ किया गया था। इस चरण के कार्य में मंदिर और वेदी का निर्माण करना, इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करने के लिए व्यवस्था का उपयोग करना और इस्राएल के लोगों के बीच कार्य करना शामिल था। इस्राएल के लोगों का मार्गदर्शन करके उसने पृथ्वी पर अपने कार्य के लिए एक आधार का इंतजाम किया। इस आधार से उसने अपने कार्य का फैलाव इस्राएल से बाहर किया, जिसका अर्थ है कि इस्राएल से शुरू करके उसने अपने कार्य को बाहर फैलाया, जिससे बाद की पीढ़ियों को धीरे-धीरे पता चला कि यहोवा परमेश्वर था, और कि वह यहोवा ही था, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी और सभी चीजों का निर्माण किया, और कि वह यहोवा ही था, जिसने सभी सृजित प्राणियों को बनाया था। उसने इस्राएल के लोगों के माध्यम से अपने कार्य को उनसे परे फैलाया। इस्राएल की भूमि पृथ्वी पर यहोवा के कार्य का पहला पवित्र स्थान थी, और इस्राएल की भूमि पर ही परमेश्वर ने पृथ्वी पर सबसे पहले कार्य किया। वह व्यवस्था के युग का कार्य था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

24. जब परमेश्वर ने अपनी प्रबंधन योजना का आधिकारिक कार्य आरंभ किया, तब उसने अनेक अध्यादेश निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य द्वारा किया जाना था। ये अध्यादेश मनुष्य को पृथ्वी पर मनुष्य का सामान्य जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का सामान्य जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य है। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियाँ कैसे बनाएँ, वेदियाँ किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि बलि कैसे चढ़ाएँ, और निर्धारित किया कि मनुष्य को किस प्रकार जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो निर्धारित किया वह सर्वव्यापी था, और इन विनियमों, अध्यादेशों और सिद्धांतों के साथ उसने लोगों के व्यवहार के मानक तय किए, उनके जीवन का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की व्यवस्थाओं में उनकी दीक्षा का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के समक्ष आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और उन सभी चीज़ों के बीच जीवन पाने के लिए उनका मार्गदर्शन किया जो परमेश्वर ने व्यवस्था, नियमितता, और संयम से युक्त मनुष्य के लिए बनाई थीं। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाएँ निर्धारित करने के उद्देश्य से सबसे पहले इन सरल अध्यादेशों और सिद्धांतों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने वाला सामान्य जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का सामान्य जीवन हो; ऐसी है उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना के आरंभ की विशिष्ट विषयवस्तु। इन अध्यादेशों और शर्तों में बहुत व्यापक विषयवस्तु समाहित है, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, इन्हें व्यवस्था के युग के लोगों द्वारा स्वीकार और इनका पालन किया जाना था, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर द्वारा अगुआई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II

25. यहोवा ने मानवजाति का सृजन किया, अर्थात्, उसने मानवजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किंतु उसने उन्हें और कोई मेधा या बुद्धि प्रदान नहीं की। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किंतु वे समझते लगभग कुछ नहीं थे। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा ही समाप्त हुआ था, और पूर्ण रूप से पूरा नहीं हुआ था। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किंतु उसने मनुष्य को परमेश्वर का भय मानने का पर्याप्त संकल्प प्रदान नहीं किया था। आरंभ में मनुष्य के पास परमेश्वर का भय मानने या उससे डरने वाला हृदय नहीं था। मनुष्य केवल उसके वचनों को सुनना जानता था, किंतु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और मानव-जीवन के सामान्य नियमों से वह अनभिज्ञ था। और इसलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना पूरी कर दी, किंतु उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा है, जिसने मानवजाति का सृजन किया है, किंतु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि यहोवा के वचनों और नियमों का पालन कैसे किया जाए। और इसलिए, मानवजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी पूर्ण रूप से पूरा नहीं हुआ था। उसे अभी भी मनुष्यों को अपने सामने लाने के लिए उनका पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था, ताकि वे धरती पर एक-साथ रहने और उसका भय मानने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक सामान्य मानव-जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी रूप में मुख्यतः यहोवा के नाम से संचालित कार्य पूरी तरह से संपन्न हुआ था; अर्थात्, केवल इसी रूप में दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से समाप्त हुआ था। और इसलिए, मानवजाति का सृजन करने के बाद उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मानवजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना पड़ा, ताकि मानवजाति उसके आदेशों और नियमों का पालन कर सके और पृथ्वी पर सामान्य मानवीय क्रियाकलापों में भाग ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः पूरा हुआ था।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

26. जिन दो हजार वर्षों के दौरान यहोवा ने कार्य किया, उनके पूर्व मनुष्य कुछ नहीं जानता था, और लगभग समस्त मानव-जाति पतित हो चुकी थी, जल-प्रलय द्वारा संसार के विनाश से पहले तक, मनुष्य स्वच्छंद संभोग और भ्रष्टता की गहराई में गिर चुका था, उसके हृदय में यहोवा बिल्कुल नहीं था और उसका मार्ग तो बिल्कुल नहीं था। उसने उस कार्य को कभी नहीं समझा था, जिसे यहोवा करने जा रहा था; लोगों में विवेक का अभाव था, ज्ञान और भी कम था, और एक साँस लेती हुई मशीन के समान वे मनुष्य, परमेश्वर, सभी चीजें, जीवन आदि से पूर्णतया अनभिज्ञ थे। पृथ्वी पर वे साँप के समान, बहुत-से प्रलोभनों में लिप्त थे, और बहुत-सी ऐसी बातें कहते थे जो यहोवा के लिए अपमानजनक थीं, लेकिन चूँकि वे अनभिज्ञ थे, इसलिए यहोवा ने उन्हें ताड़ना नहीं दी या अनुशासित नहीं किया। केवल जल-प्रलय के बाद ही, जब नूह 601 वर्ष का था, तो यहोवा ने औपचारिक रूप से नूह के सामने प्रकट होकर उसका तथा उसके परिवार का मार्गदर्शन किया और 2,500 वर्षों तक चले व्यवस्था के युग की समाप्ति तक नूह और उसके वंशजों के साथ-साथ, जल-प्रलय में जिंदा बचे पक्षियों और जानवरों की अगुआई की। वह इस्राएल में कार्यरत था, अर्थात् कुल 2,000 वर्षों तक औपचारिक रूप से इस्राएल में कार्यरत था और 500 वर्षों तक इस्राएल और उसके बाहर एक-साथ कार्यरत था, जो मिलकर 2,500 वर्ष होते हैं। इस दौरान उसने इस्राएलियों को निर्देश दिया कि यहोवा की सेवा करने के लिए उन्हें एक मंदिर का निर्माण करना चाहिए, याजकों के लबादे पहनने चाहिए और उषाकाल में नंगे पाँव मंदिर में प्रवेश करना चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि उनके जूते यहोवा के मंदिर को अपवित्र कर दें और मंदिर के शिखर से उन पर आग गिरा दी जाए और उन्हें जलाकर मार डाला जाए। उन्होंने अपने कर्तव्य किए और यहोवा की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो गए। उन्होंने मंदिर में यहोवा से प्रार्थना की, और यहोवा का प्रकाशन प्राप्त करने के बाद, अर्थात् यहोवा के बोलने के बाद, उन्होंने जनसाधारण की अगुआई की और उन्हें सिखाया कि उन्हें उनके परमेश्वर, यहोवा के प्रति भय दिखाना चाहिए। यहोवा ने उनसे कहा कि उन्हें एक मंदिर और एक वेदी बनानी चाहिए, और यहोवा के समय पर, अर्थात् फसह के पर्व पर उन्हें यहोवा की सेवा के लिए बलि के रूप में वेदी पर रखने के लिए पहलौठे बछड़े और मेमने तैयार करने चाहिए, जिससे लोगों को नियंत्रण में रखा जा सके और उनके हृदय में यहोवा के लिए भय उत्पन्न किया जा सके। उनका इस व्यवस्था का पालन करना या न करना यहोवा के प्रति उनकी वफादारी का पैमाना बन गया। यहोवा ने उनके लिए सब्त का दिन भी नियत किया, जो उसकी सृष्टि की रचना का सातवाँ दिन था। सब्त के अगले दिन उसने पहला दिन बनाया, अर्थात् उनके द्वारा यहोवा की स्तुति करने, उसे चढ़ावा चढ़ाने और उसके लिए संगीत बजाने का दिन। इस दिन यहोवा ने सभी याजकों को एक-साथ बुलाकर वेदी पर रखे चढ़ावे को लोगों के खाने हेतु बाँटने के लिए कहा, ताकि वे यहोवा की वेदी के चढ़ावों का आनंद उठा सकें। यहोवा ने कहा कि वे धन्य हैं कि उन्होंने उसके साथ एक हिस्सा साझा किया, और कि वे उसके चुने हुए लोग हैं (जो कि इस्राएलियों के साथ यहोवा की वाचा थी)। यही कारण है कि आज तक भी इस्राएल के लोग यही कहते हैं कि यहोवा केवल उनका ही परमेश्वर है, वह अन्य-जाति राष्ट्रों का परमेश्वर नहीं है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

27. यद्यपि यहोवा ने बहुत-से कथन कहे और बहुत कार्य किया, किंतु उसने केवल लोगों का सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया और उन अज्ञानी लोगों को आचरण करना सिखाया, जीना सिखाया, और यहोवा के मार्ग को समझना सिखाया। उसके द्वारा किए गए कार्य का अधिकांश भाग लोगों से अपने मार्ग का पालन करवाना और अपनी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। यह कार्य उन लोगों पर किया गया, जो कम भ्रष्ट थे; यह उनके स्वभाव का रूपांतरण या उनके जीवन का विकास करने की हद तक नहीं पहुँचा था। लोगों से व्यवस्थाओं का पालन करवाने के द्वारा उसने उन्हें बस अंकुश और नियंत्रण में किया। उस समय इस्राएलियों के लिए यहोवा मात्र मंदिर में विद्यमान परमेश्वर, स्वर्ग का परमेश्वर था। वह बादल का एक खंभा, आग का एक खंभा था। यहोवा का उद्देश्य मात्र लोगों से उन बातों का आज्ञापालन करवाना था जिन्हें आज लोग व्यवस्थाओं और आज्ञाओं के तौर पर जानते हैं—विनियम भी कह सकते हैं—क्योंकि यहोवा ने जो किया, वह उन्हें रूपांतरित करने के लिए नहीं था, बल्कि उन्हें और बहुत-सी वस्तुएँ प्रदान करने के लिए था, जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें व्यक्तिगत रूप से ये चीजें देनी थी, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद मनुष्य के पास ऐसा कुछ नहीं था, जो उसके पास होना चाहिए। इसलिए, यहोवा ने लोगों को वे वस्तुएँ प्रदान कीं, जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए थीं, और ऐसा करके उन लोगों को, जिनकी यहोवा ने अगुआई की थी, उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बना दिया, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें प्रदान किया, वह उससे बढ़कर था जो उसने आरंभ में आदम और हव्वा को प्रदान किया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया, वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और उससे सृष्टिकर्ता को स्वीकृत करवाने के लिए था। उसने उन्हें जीता या रूपांतरित नहीं किया था, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया था। यह व्यवस्था के युग में यहोवा का संपूर्ण कार्य था। यह इस्राएल की संपूर्ण धरती पर उसके कार्य की पृष्ठभूमि, उसकी असली कहानी और उसका सार है, जो मानव-जाति को यहोवा के नियंत्रण में रखने के लिए—उसके छह हज़ार वर्षों के कार्य का आरंभ है। इसी से उसकी छह हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना में और अधिक कार्य उत्पन्न हुआ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, व्यवस्था के युग का कार्य

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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