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I मनुष्यजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर उत्कृष्ट वचन

(I) व्यवस्था के युग के कार्य को प्रकट करने पर वचन

16. वह कार्य जो यहोवा ने इस्राएलियों पर किया, उसने मानवजाति के बीच पृथ्वी पर परमेश्वर के मूल स्थान को स्थापित किया जो कि वह पवित्र स्थान भी था जहाँ वह उपस्थित रहता था। उसने अपने कार्य को इस्राएल के लोगों तक ही सीमित रखा। आरम्भ में, उसने इस्राएल के बाहर कार्य नहीं किया; उसके बजाए, उसने ऐसे लोगों को चुना जिन्हें उसने अपने कार्यक्षेत्र को सीमित रखने के लिए उचित पाया। इस्राएल वह जगह है जहाँ परमेश्वर ने आदम और हव्वा की रचना की, और उस जगह की धूल से यहोवा ने मनुष्य को बनाया; यह स्थान पृथ्वी पर उसके कार्य का आधार बन गया। इस्राएली, जो नूह के वंशज थे, और आदम के भी वंशज थे, पृथ्वी पर यहोवा के कार्य की मानवीय बुनियाद थे।

इस समय, इस्राएल में यहोवा के कार्य का महत्व, उद्देश्य, और चरण, पूरी पृथ्वी पर उसके कार्य का सूत्रपात करने के लिए थे, जो इस्राएल को इसका केन्द्र लेते हुए, धीरे-धीरे अन्य-जाति राष्ट्रों में फैलते हैं। यही वह सिद्धांत है जिसके अनुसार वह तमाम विश्व में कार्य करता है—एक प्रतिमान स्थापना करना, और तब तक उसे फैलाना जब तक कि विश्व के सभी लोग उसके सुसमाचार को ग्रहण न कर लें। प्रथम इस्राएली नूह के वंशज थे। इन लोगों को केवल यहोवा की श्वास प्रदान की गई थी, और वे जीवन की मूल आवश्यकताओं को पर्याप्त रूप से समझते थे, किन्तु वे नहीं जानते थे कि यहोवा किस प्रकार का परमेश्वर है, या मनुष्य के लिए उसकी इच्छा को नहीं जानते थे, और यह तो बिलकुल भी नहीं जानते थे कि समस्त सृष्टि के प्रभु का सम्मान कैसे करें। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि क्या पालन करने के लिए नियम और व्यवस्थाएँ थी, और कि क्या ऐसा कार्य था जो सृजित किए गए प्राणी को सृष्टा के लिए करना चाहिए: आदम के वंशज इन बातो के बारे में कुछ नहीं जानते थे। वे बस इतना ही जानते थे कि पति को अपने परिवार का भरण पोषण करने के लिए पसीना बहाना और परिश्रम करना चाहिए, और पत्नी को अपने पति के लिए समर्पण करना चाहिए और उस मानव प्रजाति को बनाये रखना चाहिए जिसे यहोवा ने सृजित किया था। दूसरे शब्दों में, ये लोग, जिनके पास केवल यहोवा की श्वास और उसका जीवन था, इस बारे में कुछ भी नहीं जानते थे कि परमेश्वर की व्यवस्थाओं का पालन कैसे करें या समस्त सृष्टि के प्रभु को कैसे संतुष्ट करें। वे बहुत ही कम समझते थे। इसलिए भले ही उनके हृदय में कुछ भी कुटिलता या छल नहीं था और उनके बीच कभी-कभार ईर्ष्या और कलह उत्पन्न हो जाता था, फिर भी उन्हें समस्त सृष्टि के प्रभु, यहोवा के बारे में कोई ज्ञान या समझ नहीं थी। मनुष्य के ये पूर्वज केवल यहोवा की चीज़ों को खाना और यहोवा की चीज़ों का आनन्द लेना जानते थे, किन्तु वे यहोवा का आदर करना नहीं जानते थे; वे नहीं जानते थे कि यहोवा ही वह एक है जिसकी उन्हें घुटने टेककर आराधना करनी चाहिए। इसलिए वे उसका सृजन कैसे कहे जा सकते थे? यदि ऐसा हुआ होता, तो इन वचनों का क्या होता, "यहोवा समस्त सृष्टि का प्रभु है" और "उसने मनुष्य को सृजित किया ताकि मनुष्य उसे अभिव्यक्त कर सके, उसकी महिमा कर सके और उसका प्रतिनिधित्व कर सके"—क्या ये व्यर्थ में नहीं बोले गए होते? जिन लोगों में यहोवा के लिए आदर नहीं है वे उसकी महिमा के गवाह कैसे बन सकते थे? वे कैसे उसकी महिमा की अभिव्यक्तियाँ बन सकते थे? क्या यहोवा के ये वचन कि "मैंने मनुष्य को अपनी छवि में बनाया" तब दुष्टात्मा—शैतान के हाथों के हथियार नहीं बन जाते? क्या तब ये वचन यहोवा द्वारा मनुष्य के सृजन के लिए अपमान का एक चिह्न नहीं बन जाते? कार्य के उस चरण को पूरा करने के लिए, मनुष्य को बनाने के बाद यहोवा ने आदम के समय से नूह के समय तक उन्हें निर्देश या मार्गदर्शन नहीं दिया। बल्कि, जब जल प्रलय ने दुनिया को नष्ट कर दिया उसके बाद ही ऐसा हुआ कि उसने औपचारिक तौर पर उन इस्राएलियों का मार्गदर्शन करना आरम्भ किया जो नूह के और आदम के भी वंशज थे। इस्राएल में उसके कार्य और कथनों ने इस्राएल के सभी लोगों को मार्गदर्शन दिया जब वे पूरे इस्राएल देश में अपना जीवन जीते थे, और इस तरह मानवजाति को दिखाया कि यहोवा न केवल मनुष्य में अपना श्वास फूँकने में समर्थ है ताकि उसके पास परमेश्वर का जीवन हो सके, और मिट्टी में उठ कर एक सृजित किए गए मानव प्राणी बन सके, बल्कि वह मानवजाति पर शासन करने के लिए मानवजाति को भस्म कर सकता था, और मानवजाति को शाप दे सकता था और अपने राजदण्ड का उपयोग कर सकता था। तब भी, क्या उन्होंने देखा था कि यहोवा पृथ्वी पर मनुष्य के जीवन को मार्गदर्शन दे सकता था, और मानवजाति के बीच दिन और रात के समय के अनुसार बात कर सकता था और कार्य कर सकता था। उसने कार्य सिर्फ इसलिए किया था ताकि उसके जीवधारी जान सकें कि मनुष्य धूल से आया था, जिसे परमेश्वर द्वारा उन्नत किया गया, और इसके अलावा यह कि मनुष्य उसके द्वारा बनाया गया था। न केवल इतना, बल्कि उसने इस्राएल में जो कार्य आरम्भ किया था वह इस आशय से था कि दूसरे लोग और राष्ट्र (जो वास्तव में इस्राएल से पृथक नहीं थे, बल्कि इस्राएलियों से अलग हो गए थे, मगर फिर भी वे आदम और हव्वा के वंशज ही थे) इस्राएल से यहोवा के सुसमाचार को प्राप्त कर सकें, ताकि विश्व में सभी सृजित प्राणी यहोवा का आदर करने और उसे महान होना ठहराने में समर्थ हो सकें।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "व्यवस्था के युग का कार्य" से उद्धृत

17. यहोवा ने मनुष्यजाति का निर्माण किया, अर्थात्, उसने मनुष्यजाति के पूर्वजों, हव्वा और आदम, का सृजन किया, किन्तु उसने उन्हें आगे कोई ज्ञान या बुद्धि प्रदान नहीं की। यद्यपि वे पहले से ही पृथ्वी पर रह रहे थे, किन्तु उन्हें समझ में लगभग कुछ नहीं आता था। और इसलिए, मनुष्यजाति का सृजन करने का यहोवा का कार्य केवल आधा-समाप्त हुआ था, और पूर्ण नहीं था। उसने केवल मिट्टी से मनुष्य का एक नमूना बनाया था और उसे अपनी साँस दे दी थी, किन्तु परमेश्वर का सम्मान करने की मनुष्य को पर्याप्त इच्छा प्रदान किए बिना। आरंभ में, मनुष्य का मन परमेश्वर का सम्मान करने, या उससे डरने का नहीं था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि उसके वचनों को कैसे सुनना है, किन्तु पृथ्वी पर जीवन के बुनियादी ज्ञान और जीवन के उचित नियमों के बारे में अनभिज्ञ था। और इसीलिए, यद्यपि यहोवा ने पुरुष और स्त्री का सृजन किया और सात दिन की परियोजना को पूरा किया, फिर भी उसने किसी भी प्रकार से मनुष्य के सृजन को पूरा नहीं किया, क्योंकि मनुष्य केवल एक भूसा था, और उसमें मनुष्य होने की वास्तविकता का अभाव था। मनुष्य केवल इतना ही जानता था कि यह यहोवा था जिसने मनुष्यजाति का सृजन किया था, किन्तु उसे इस बात का कोई आभास नहीं था कि कैसे यहोवा के वचनों और व्यवस्थाओं का पालन किया जाए। और इसलिए, मनुष्यजाति के सृजन के बाद, यहोवा का कार्य अभी ख़त्म होने से बहुत दूर था। उसे अभी भी मनुष्यजाति का पूरी तरह से मार्गदर्शन करना था ताकि वह उसके सामने आए, ताकि वे धरती पर एक साथ रहने और उसका सम्मान करने में समर्थ हो जाएँ, और ताकि वे उसके मार्गदर्शन से धरती पर एक उचित मानव जीवन के सही रास्ते पर प्रवेश करने में समर्थ हो जाएँ। केवल इसी तरह से वह कार्य पूर्णतः सम्पन्न हुआ जिसे मुख्यतः यहोवा के नाम के अधीन आयोजित किया गया था; अर्थात्, केवल इसी तरह से दुनिया का सृजन करने का यहोवा का कार्य पूरी तरह से सम्पन्न हुआ था। और इसलिए, मनुष्यजाति का सृजन करके, उसे पृथ्वी पर हजारों वर्षों तक मनुष्यजाति के जीवन का मार्गदर्शन करना था, ताकि मनुष्यजाति उसके आदेशों और व्यवस्थाओं का पालन करने, और पृथ्वी पर एक सामान्य मानव जीवन की सभी गतिविधियों में हिस्सा ले पाने में समर्थ हो जाए। केवल तभी यहोवा का कार्य पूर्णतः सम्पन्न हुआ था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)" से उद्धृत

18. यदि यहोवा ने अपना कार्य इस्राएल में आरम्भ नहीं किया होता, बल्कि उसके बजाए, मनुष्यों को बनाने के बाद, उन्हें पृथ्वी पर निश्चिन्त जीवन जीने दिया होता, तो उस स्थिति में, मनुष्य की शारीरिक प्रकृति के कारण (प्रकृति का अर्थ है कि मनुष्य उन चीज़ों को कभी नहीं जान सकता है जिन्हें वह देख नहीं सकता है, जिसका अर्थ है कि वह नहीं जानेगा कि यहोवा ने मानवजाति को बनाया है, और इस बात को तो बिल्कुल भी नहीं जानेगा कि उसने ऐसा क्यों किया है), वह कभी नहीं जानेगा कि यह यहोवा था जिसने मानवजाति को बनाया है अथवा कि वह समस्त सृष्टि का प्रभु है। यदि यहोवा ने मनुष्य का सृजन किया होता और उसे पृथ्वी पर रखा होता, और एक अवधि तक मनुष्यों को मार्गदर्शन देने के लिए उनके बीच रहने की अपेक्षा ऐसे ही अपने हाथों की धूल झाड़ कर चला गया होता, तब उस स्थिति में सारी मानवता वापस शून्यता की ओर लौट गयी होती; यहाँ तक कि स्वर्ग, पृथ्वी और उसकी बनाई हुई असंख्य चीज़ें, और समस्त मानवजाति, शून्यता की ओर लौट गयी होती और इसके अलावा शैतान द्वारा कुचल दी गई होती। इस तरह से यहोवा की यह इच्छा कि "पृथ्वी पर, अर्थात्, उसके सृजन के बीच में, उसके पास पृथ्वी पर खड़े होने के लिए एक स्थान, एक पवित्र स्थान होना चाहिए" टूटकर बिखर गई होती। और इसलिए, मानवजाति को बनाने के बाद, वह उनके जीवन में मार्गदर्शन करने के लिए उनके बीच रहने, और उनके बीच में से उनके साथ बात करने में समर्थ था, सब कुछ अपनी इच्छा को साकार करने, और अपनी योजना को प्राप्त करने के लिए था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "व्यवस्था के युग का कार्य" से उद्धृत

19. जब परमेश्वर ने प्रबन्धन योजना के अपने आधिकारिक कार्य की शुरुआत की, तो उसने अनेक नियम निर्धारित किए जिनका पालन मनुष्य के द्वारा किया जाना था। ये नियम पृथ्वी पर मनुष्य को साधारण जीवन जीने देने के लिए थे, मनुष्य का ऐसा साधारण जीवन जो परमेश्वर और उसके मार्गदर्शन से अवियोज्य हो। परमेश्वर ने सबसे पहले मनुष्य को बताया कि वेदियों को किस प्रकार बनाएँ, वेदियों को किस प्रकार स्थापित करें। उसके बाद, उसने मनुष्य को बताया कि कैसे बलि चढ़ाएँ, और स्थापित किया कि मनुष्य को किस प्रकार से जीवन जीना था—उसे जीवन में किस पर ध्यान देना था, उसे किसका पालन करना था, उसे क्या करना और क्या नहीं करना चाहिए। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए जो कुछ निर्दिष्ट किया था वह सर्वव्यापी था, और इन रिवाजों, नियमों, और सिद्धान्तों के साथ उसने लोगों के व्यवहार को मानकीकृत किया, उनकी ज़िन्दगियों का मार्गदर्शन किया, परमेश्वर के नियमों के प्रति उनकी दीक्षा का मार्ग दर्शन किया, परमेश्वर की वेदी के सामने आने के लिए उनका मार्गदर्शन किया, और सभी चीज़ों के बीच ऐसा जीवन पाने के लिए मार्गदर्शन किया जिन्हें परमेश्वर ने मनुष्य के लिए बनाया था जो व्यवस्थित क्रम, नियमितता, और संयम को धारण किए हुए था। परमेश्वर ने मनुष्य के लिए सीमाओं को तय करने के लिए सबसे पहले इन साधारण नियमों और सिद्धान्तों का उपयोग किया था, ताकि पृथ्वी पर मनुष्य के पास परमेश्वर की आराधना करने का एक साधारण जीवन हो, और उसके पास मनुष्य का साधारण जीवन हो; उसकी छः हज़ार वर्षीय प्रबंधन योजना की शुरुआत की विशिष्ट विषयवस्तु ऐसी ही है। ये नियम और व्यवस्थाएँ बहुत ही व्यापक विषयवस्तु को आवृत करती हैं, वे व्यवस्था के युग के दौरान मनुष्यजाति के लिए परमेश्वर के मार्गदर्शन के विशिष्ट विवरण हैं, उन लोगों के द्वारा इन्हें स्वीकार और इनका आदर किया जाना था जो व्यवस्था के युग से पहले आए, ये व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के द्वारा किए गए कार्य का अभिलेख हैं, और वे संपूर्ण मनुष्यजाति की परमेश्वर के द्वारा अगुवाई और मार्गदर्शन का वास्तविक प्रमाण हैं।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II" से उद्धृत

20. व्यवस्था के युग के दौरान, यहोवा ने मूसा के लिए अनेक आज्ञाएँ निर्धारित की, जैसे कि वह उन्हें उन इस्राएलियों के लिए आगे बढ़ा दे जिन्होंने मिस्र से बाहर उसका अनुसरण किया था। ये आज्ञाएँ यहोवा द्वारा इस्राएलियों को दी गई थीं, और उनका मिस्र के लोगों से कोई संबंध नहीं था; वे इस्राएलियों को नियन्त्रण में रखने के अभिप्राय से थीं। उसने उनसे माँग करने के लिए इन आज्ञाओं का उपयोग किया। उन्होंने सब्त का पालन किया या नहीं, उन्होंने अपने माता-पिता का आदर किया या नहीं, उन्होंने मूर्तियों की आराधना की या नहीं, इत्यादि: यही वे सिद्धांत थे जिनसे उनके पापी या धार्मिक होने का आकलन किया जाता था। उनमें से, कुछ ऐसे थे जो यहोवा की आग से त्रस्त थे, कुछ ऐसे थे जिन्हें पत्थऱ मार कर मार डाला गया था, और कुछ ऐसे थे जिन्होंने यहोवा का आशीष प्राप्त किया था, और इसका निर्धारण इस बात के अनुसार किया जाता था कि उन्होंने इन आज्ञाओं का पालन किया या नहीं। जो सब्त का पालन नहीं करते थे, उन्हें पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। जो याजक सब्त का पालन नहीं करते थे उन्हें यहोवा की आग से त्रस्त किया जाएगा। जो अपने माता-पिता का आदर नहीं करते थे उन्हें भी पत्थर मार कर मार डाला जाएगा। यह सब कुछ यहोवा द्वारा कहा गया था। यहोवा ने अपनी आज्ञाओं और व्यवस्थाओं को स्थापित किया था ताकि, जब वह उनके जीवन में उनकी अगुवाई करे, तब लोग उसके वचन को सुनें और उसके वचन का पालन करें और उसके विरूद्ध विद्रोह न करें। उसने नई जन्मी हुई मानव प्रजाति को नियन्त्रण में रखने, अपने भविष्य के कार्य की नींव को बेहतर ढंग से डालने के लिए इन व्यवस्थाओं का उपयोग किया। इसलिए, उस कार्य के आधार पर जो यहोवा ने किया, प्रथम युग को व्यवस्था का युग कहा गया था।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "व्यवस्था के युग का कार्य" से उद्धृत

21. यद्यपि यहोवा ने बहुत से कथन कहे और बहुत से कार्य किये, किंतु उसने इन अज्ञानी लोगों को यह सिखाते हुए कि इंसान कैसे बनें, कैसे जीएँ, यहोवा के मार्ग को कैसे समझें, लोगों का केवल सकारात्मक ढंग से मार्गदर्शन किया। इनमें से ज़्यादातर, उसने जो कार्य किया वह लोगों से उसके मार्ग का पालन करवाना और उसकी व्यवस्थाओं का अनुसरण करवाना था। कार्य उन लोगों पर किया गया था जो कम गहराई तक भ्रष्ट थे; यह उनके स्वभाव का रूपान्तरण करने या जीवन में प्रगति तक विस्तारित नहीं था। वह लोगों को सीमित और नियन्त्रित करने के लिए केवल व्यवस्था का उपयोग करने तक केंद्रित था। उस समय इस्राएलियों के लिए, यहोवा मात्र मन्दिर का एक परमेश्वर, स्वर्ग का एक परमेश्वर था। वह बादल का एक खम्भा, आग का एक खम्भा था। वह सब जो यहोवा उनसे करने की अपेक्षा करता था, वह था उन बातों का पालन करना जिन्हें आज लोग उसकी व्यवस्थाओं और आज्ञाओं—कोई इन्हें नियम भी कह सकता है—के रूप में जानते हैं, क्योंकि जो यहोवा ने किया वह उन्हें रूपान्तरित करने के अभिप्राय से नहीं था, बल्कि उन्हें बहुत सी वस्तुएँ देने के लिए था जो मनुष्य के पास होनी चाहिए, उन्हें स्वयं अपने मुँह से निर्देश देना था, क्योंकि सृजित किए जाने के बाद, मनुष्य के पास ऐसा कुछ नहीं था जो उसके पास होना चाहिए। इसलिए, जिन लोगों की यहोवा ने अगुवाई की थी उन्हें उनके पूर्वजों, आदम और हव्वा से भी श्रेष्ठ बनाते हुए, उसने लोगों को वे वस्तुएँ दी जो पृथ्वी पर उनके जीवन के लिए उनके पास होनी चाहिए, क्योंकि जो कुछ यहोवा ने उन्हें दिया था वह उससे बढ़कर था जो उसने आदम और हव्वा को आरंभ में दिया था। इसके बावजूद, यहोवा ने इस्राएल में जो कार्य किया, वह केवल मानवजाति का मार्गदर्शन करने और मानवजाति से उनके रचयिता की पहचान करवाने के लिए था। उसने उन्हें जीता नहीं या उन्हें रूपान्तरित नहीं किया, बल्कि मात्र उनका मार्गदर्शन किया। व्यवस्था के युग में यहोवा के कार्य का यही सारांश है। इस्राएल की संपूर्ण धरती पर यह उसके कार्य की पृष्ठभूमि, सच्ची कहानी और सार है, जो छः हज़ार वर्षों के उसके कार्य—मानवजाति को यहोवा के हाथ के नियन्त्रण के अधीन रखने—का आरंभ है। इसमें से उसकी छः-हज़ार-वर्षों की प्रबन्धन योजना में और अधिक कार्य पैदा हुए थे।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "व्यवस्था के युग का कार्य" से उद्धृत

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