1. मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर के तीन चरणों के कार्य पर वचन

1. मेरी संपूर्ण प्रबंधन योजना, छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना, के तीन चरण या तीन युग हैं : आरंभ में व्यवस्था का युग; अनुग्रह का युग (जो छुटकारे का युग भी है); और अंत के दिनों का राज्य का युग। इन तीनों युगों में मेरे कार्य की विषयवस्तु प्रत्येक युग के अनुसार अलग-अलग है, परंतु प्रत्येक चरण में यह कार्य मनुष्य की आवश्यकताओं के अनुरूप किया गया है—या, ज्यादा सटीक रूप में, यह शैतान द्वारा उस युद्ध में चली जाने वाली चालों के अनुसार किया जाता है, जो मैं उससे लड़ रहा हूँ। इसका उद्देश्य शैतान को हराना, अपनी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करना, शैतान की सभी चालों को उजागर करना और परिणामस्वरूप समस्त मानवजाति को बचाना है, जो शैतान की सत्ता के अधीन रहती है। यह मेरी बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को प्रकट करने के लिए और शैतान की असहनीय विकरालता को सामने लाने के लिए है; इससे भी अधिक, यह सृजित प्राणियों को अच्छे और बुरे के बीच अंतर करने देने के लिए है, यह जानने देने के लिए कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ, यह स्पष्ट रूप से देखने देने के लिए कि शैतान मानवजाति का शत्रु है, अधम है, दुष्ट है; और उन्हें पूरी स्पष्टता के साथ अच्छे और बुरे, सत्य और भ्रांति, पवित्रता और मलिनता और क्या महान है और क्या हेय, इसके बीच अंतर करने में सक्षम बनाने के लिए है। यह अज्ञानी मानवजाति को मेरे लिए यह गवाही देने में सक्षम बनाने के लिए है कि वह मैं नहीं हूँ जो मानवजाति को भ्रष्ट करता है और यह कि केवल मैं—सृष्टिकर्ता—मानवजाति को बचाता हूँ और लोगों को उनके आनंद की वस्तुएँ प्रदान करता हूँ; यह उन्हें जानने देने के लिए है कि मैं सभी चीजों का संप्रभु हूँ और शैतान मात्र वह प्राणी है जिसका मैंने सृजन किया है और जिसने बाद में मुझसे विश्वासघात किया। मेरी छह-हजार-वर्षीय प्रबंधन योजना तीन चरणों में विभाजित है और मैं इस तरह इसलिए कार्य करता हूँ, ताकि सृजित प्राणियों को मेरे लिए गवाही देने, मेरे इरादे समझ पाने और यह जान पाने के योग्य बनाने का प्रभाव प्राप्त कर सकूँ कि मैं ही सत्य हूँ।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, छुटकारे के युग के कार्य की वास्तविक कहानी

2. मानवजाति के प्रबंधन का कार्य तीन चरणों में बंटा हुआ है, जिसका अर्थ यह है कि मानवजाति को बचाने का कार्य तीन चरणों में बंटा हुआ है। इन तीन चरणों में संसार की रचना का कार्य समाविष्ट नहीं है, बल्कि ये व्यवस्था के युग, अनुग्रह के युग और राज्य के युग के कार्य के तीन चरण हैं। संसार की रचना करने का कार्य संपूर्ण मानवजाति को उत्पन्न करने का कार्य था। यह मानवजाति को बचाने का कार्य नहीं था, और मानवजाति को बचाने के कार्य से कोई संबंध नहीं रखता है, क्योंकि जब संसार की रचना हुई थी तब मानवजाति शैतान के द्वारा भ्रष्ट नहीं की गई थी, और इसलिए मानवजाति के उद्धार का कार्य करने की कोई आवश्यकता नहीं थी। मानवजाति को बचाने का कार्य शैतान द्वारा मानवजाति को भ्रष्ट किए जाने के बाद ही आरंभ हुआ, और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन का कार्य भी मानवजाति को भ्रष्ट किए जाने के बाद ही आरंभ हुआ। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा मनुष्य का प्रबंधन मानवजाति को बचाने के उसके कार्य के साथ आरंभ हुआ; यह संसार की रचना के उसके कार्य के साथ आरंभ नहीं हुआ। मानवजाति के पास भ्रष्ट स्वभाव होने के बाद ही प्रबंधन का कार्य अस्तित्व में आया, और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन के कार्य में चार चरणों या चार युगों की बजाय तीन भागों का समावेश है। परमेश्वर के मानवजाति के प्रबंधन का उल्लेख करने का केवल यही सही तरीका है। जब अंतिम युग समाप्त होगा, तब तक मानवजाति को प्रबंधित करने का कार्य पूर्ण समाप्ति तक पहुँच चुका होगा। प्रबंधन के कार्य के समापन का अर्थ है कि समस्त मानवजाति को बचाने का कार्य पूरी तरह से समाप्त हो गया होगा, और तब से यह चरण मानवजाति के लिए पूरा हो चुका होगा। समस्त मानवजाति को बचाने के कार्य के बिना, मानवजाति के प्रबंधन के कार्य का कोई अस्तित्व नहीं होता, न ही कार्य के तीन चरण होते। यह निश्चित रूप से मानवजाति की नैतिक पतनशीलता की वजह से था और क्योंकि मानवजाति को उद्धार की इतनी जरूरी आवश्यकता थी कि यहोवा ने संसार का सृजन पूरा किया और व्यवस्था के युग का कार्य आरंभ कर दिया। केवल तभी मानवजाति के प्रबंधन का कार्य आरम्भ हुआ, जिसका अर्थ है कि केवल तभी मानवजाति को बचाने का कार्य आरम्भ हुआ। “मानवजाति का प्रबंधन करने” का अर्थ पृथ्वी पर नव-सृजित मानवजाति (कहने का अर्थ है, कि ऐसी मानवजाति जो अभी तक भ्रष्ट नहीं हुई थी) के जीवन का मार्गदर्शन करना नहीं है। बल्कि, यह उस मानवजाति के उद्धार का कार्य है जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, जिसका अर्थ है, कि यह इस भ्रष्ट मानवजाति को बदलने का कार्य है। “मानवजाति के प्रबंधन” का यही अर्थ है। मानवजाति को बचाने के कार्य में संसार की रचना करने का कार्य सम्मिलित नहीं है और इसलिए मानवजाति के प्रबंधन का कार्य संसार की रचना करने के कार्य को सम्मिलित नहीं करता है, बल्कि केवल इस कार्य के उन तीन चरणों को ही समाविष्ट करता है जो संसार की रचना से अलग हैं। मानवजाति के प्रबंधन के कार्य को समझने के लिए कार्य के तीन चरणों के इतिहास से अवगत होना आवश्यक है—बचाए जाने वाले प्रत्येक व्यक्ति को इससे अवगत अवश्य होना चाहिए। सृजित प्राणी के रूप में तुम्हें यह जानना चाहिए कि मनुष्य को परमेश्वर द्वारा रचा गया था, तुम्हें मानवजाति की भ्रष्टता के स्रोत को जानना चाहिए और इससे भी बढ़कर तुम्हें मनुष्य के उद्धार की प्रक्रिया को भी जानना चाहिए। यदि तुम लोग केवल परमेश्वर को प्रसन्न करने के प्रयास में कुछ विनियमों का पालन करना ही जानते हो, परंतु तुम्हें इस बात का कोई भान नहीं है कि परमेश्वर मानवजाति को किस प्रकार बचाता है, या मानवजाति की भ्रष्टता का स्रोत क्या है, तो एक सृजित प्राणी के रूप में यही तुम लोगों में कमी है। परमेश्वर के प्रबंधन कार्य के व्यापक दायरे से अनभिज्ञ रहते हुए, तुम्हें केवल उन कुछ सत्यों को समझकर ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए जिन्हें अभ्यास में लाया जा सकता है—यदि ऐसा मामला है, तो तुम बहुत ही हठधर्मी हो। कार्य के ये तीन चरण परमेश्वर द्वारा मनुष्य के प्रबंधन की वास्तविक कहानी हैं, समूचे संसार में सुसमाचार के आगमन का संकेत हैं, समस्त मानवजाति के बीच सबसे बड़ा रहस्य हैं और सुसमाचार के व्यापक प्रचार की आधारशिला भी हैं। यदि तुम केवल अपने जीवन से संबंधित सरल सत्यों को समझने का प्रयास करते हो, और उसके बारे में कुछ नहीं जानते हो जो सबसे बड़ा रहस्य और दर्शन है, तो क्या तुम्हारा जीवन किसी दोषपूर्ण उत्पाद के समान नहीं है, जो सिर्फ देखने के अलावा किसी काम का नहीं होता?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

3. परमेश्वर के 6,000 वर्षों के प्रबंधन कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है : व्यवस्था का युग, अनुग्रह का युग और राज्य का युग। कार्य के ये तीनों चरण मानव-जाति के उद्धार के वास्ते हैं, अर्थात् ये उस मानव-जाति के उद्धार के लिए हैं, जिसे शैतान द्वारा बुरी तरह से भ्रष्ट कर दिया गया है। किंतु, साथ ही, परमेश्वर शैतान के साथ युद्ध भी कर रहा है। इस प्रकार, जैसे उद्धार के कार्य को तीन चरणों में बाँटा जाता है, ठीक वैसे ही शैतान के साथ युद्ध को भी तीन चरणों में बाँटा जाता है, और परमेश्वर के कार्य के ये दो पहलू एक-साथ संचालित किए जाते हैं। शैतान के साथ युद्ध वास्तव में मानव-जाति के उद्धार के वास्ते है, और चूँकि मानव-जाति के उद्धार का कार्य कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे एक ही चरण में सफलतापूर्वक पूरा किया जा सकता हो, इसलिए शैतान के साथ युद्ध को भी चरणों और अवधियों में बाँटा जाता है, और मनुष्य की आवश्यकताओं और मनुष्य में शैतान की भ्रष्टता की सीमा के अनुसार शैतान के साथ युद्ध छेड़ा जाता है। कदाचित् मनुष्य अपनी कल्पना में यह विश्वास करता है कि इस युद्ध में परमेश्वर शैतान के विरुद्ध शस्त्र उठाएगा, वैसे ही, जैसे दो सेनाएँ आपस में लड़ती हैं। मनुष्य की बुद्धि मात्र यही कल्पना करने में सक्षम है; यह अत्यधिक अस्पष्ट और अवास्तविक सोच है, फिर भी मनुष्य यही विश्वास करता है। और चूँकि मैं यहाँ कहता हूँ कि मनुष्य के उद्धार का साधन शैतान के साथ युद्ध करने के माध्यम से है, इसलिए मनुष्य कल्पना करता है और मानता है कि युद्ध इसी तरह से संचालित किया जाता है। मनुष्य के उद्धार के कार्य के तीन चरण हैं, जिसका तात्पर्य है कि शैतान के साथ युद्ध को तीन चरणों में विभाजित किया गया है और इस प्रकार शैतान को हमेशा के लिए पराजित कर दिया जाएगा। किंतु शैतान के साथ युद्ध के समस्त कार्य की वास्तविक कहानी यह है कि इसके परिणाम कार्य के अनेक चरणों में हासिल किए जाते हैं : मनुष्य को अनुग्रह प्रदान करना, मनुष्य के लिए पाप-बलि बनना, मनुष्य के पापों को क्षमा करना, मनुष्य पर विजय पाना और मनुष्य को पूर्ण बनाना। सरल शब्दों में कहें तो शैतान के साथ युद्ध करना उसके विरुद्ध हथियार उठाना नहीं है, बल्कि यह मनुष्य को बचाने के जरिए परमेश्वर की गवाही देना है, मनुष्य के जीवन में कार्य करना है और मनुष्य के स्वभाव को बदलना है और इस तरह शैतान को पराजित करना है। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव को बदलने के माध्यम से शैतान को पराजित किया जाता है। जब शैतान को पराजित कर दिया जाएगा, अर्थात् जब मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा, तो अपमानित शैतान पूरी तरह से बंधन में डाल दिया जाएगा, और इस प्रकार मनुष्य को पूरी तरह से बचा लिया जाएगा। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का सार शैतान के विरुद्ध युद्ध है और यह युद्ध मुख्य रूप से मनुष्य के उद्धार में प्रतिबिंबित होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, मनुष्य के सामान्य जीवन को बहाल करना और उसे एक अद्भुत मंजिल पर ले जाना

4. कार्य के तीन चरणों का उद्देश्य समस्त मानवजाति का उद्धार करना है—जिसका अर्थ है शैतान की सत्ता से मनुष्य का पूर्ण उद्धार। यद्यपि कार्य के इन तीन चरणों में से प्रत्येक का एक भिन्न उद्देश्य और महत्व है, किंतु प्रत्येक मानवजाति को बचाने के कार्य का हिस्सा है, और प्रत्येक उद्धार का एक भिन्न कार्य है जो मानवजाति की आवश्यकताओं के अनुसार किया जाता है। एक बार जब तुम कार्य के तीन चरणों के उद्देश्य से अवगत हो जाओगे, तब तुम जान जाओगे कि तुम्हें कार्य के प्रत्येक चरण के महत्व को कैसे समझना है और तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए किस तरह से अभ्यास करना है। यदि तुम इस स्थिति तक पहुँच सकते हो, तो यह सबसे बड़ा दर्शन, परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास का आधार बन जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

5. कार्य के इन तीनों चरणों के मूल में मनुष्य का उद्धार है—अर्थात, सभी सृजित प्राणियों से सृष्टिकर्ता की आराधना करवाना। इस प्रकार, कार्य के प्रत्येक चरण का बहुत बड़ा अर्थ है; परमेश्वर ऐसा कुछ नहीं करता जिसका कोई अर्थ या मूल्य न हो। एक ओर, कार्य का यह चरण एक नए युग का सूत्रपात और पिछले दो युगों का अंत करता है; दूसरी ओर, यह लोगों की समस्त धारणाओं और लोगों के विश्वास के सभी पुराने तरीकों को और चीजों को समझने के पुराने तरीकों को खंडित करता है। पिछले दो युगों का कार्य मनुष्य की विभिन्न धारणाओं के अनुसार किया गया था; किंतु यह चरण मनुष्य की धारणाओं को पूरी तरह मिटा देता है, और ऐसा करके वह मानवजाति को पूरी तरह से जीत लेता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर समस्त सृजित प्राणियों का प्रभु है

6. यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं और ये सब एक ही आत्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही आत्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना एकदम आवश्यक है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही आत्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)

7. कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर द्वारा किए गए हैं; यही सबसे महान दर्शन है और यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। कार्य के तीनों चरण केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किए जा सकते हैं। कोई भी मनुष्य इस प्रकार का कार्य उसकी ओर से नहीं कर सकता है। कहने का तात्पर्य है कि आरंभ से लेकर आज तक केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता था। यद्यपि परमेश्वर के कार्य के तीनों चरण विभिन्न युगों और स्थानों में किए गए हैं, और यद्यपि प्रत्येक का कार्य भी अलग-अलग है, किंतु यह सब कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है। उन सभी दर्शनों में, जिनके बारे में मनुष्य को जानना आवश्यक है, यह सबसे महान दर्शन है, और यदि यह पूरी तरह से मनुष्य के द्वारा समझा जा सके, तो वह अडिग रहने में समर्थ होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

8. कार्य के तीनों चरण परमेश्वर के संपूर्ण प्रबंधन का मुख्य केंद्र हैं और उनमें परमेश्वर का स्वभाव और स्वरूप अभिव्यक्त होते हैं। जो लोग परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों के बारे में नहीं जानते हैं, वे यह जानने में अक्षम हैं कि परमेश्वर कैसे अपने स्वभाव को अभिव्यक्त करता है, न ही वे परमेश्वर के कार्य की बुद्धिमत्ता को जानते हैं। वे उन अनेक मार्गों से, जिनके माध्यम से परमेश्वर मानवजाति को बचाता है, और संपूर्ण मानवजाति के लिए उसके इरादों से भी अनभिज्ञ रहते हैं। कार्य के तीनों चरण मानवजाति को बचाने के कार्य की पूर्ण अभिव्यक्तियाँ हैं और जो लोग कार्य के तीन चरणों के बारे में नहीं जानते, वे पवित्र आत्मा के कार्य के विभिन्न तरीकों और सिद्धांतों से अनभिज्ञ रहेंगे। वे लोग जो सख्ती से केवल उन विनियमों से चिपके रहते हैं जो कार्य के किसी एक चरण से बचे रह जाते हैं, ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर को केवल विनियमों तक सीमित कर देते हैं, और परमेश्वर में जिनका विश्वास अस्पष्ट होता है—ऐसे लोग परमेश्वर के उद्धार को कभी भी प्राप्त नहीं करेंगे। केवल परमेश्वर के कार्य के तीन चरण ही परमेश्वर के स्वभाव की संपूर्णता को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर सकते हैं और संपूर्ण मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के इरादे को और मानवजाति के उद्धार की संपूर्ण प्रक्रिया को पूरी तरह से अभिव्यक्त कर सकते हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि परमेश्वर ने शैतान को हरा दिया है और मानवजाति को जीत लिया है, यह परमेश्वर की जीत का प्रमाण है और परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव की अभिव्यक्ति है। जो लोग परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों में से केवल एक चरण को ही समझते हैं, वे परमेश्वर के स्वभाव को केवल आंशिक रूप से ही जानते हैं। कार्य के इस अकेले चरण के आधार पर मनुष्य की धारणाओं के भीतर विनियमों के बनने की संभावना होती है, और इस बात की संभावना बन जाती है कि मनुष्य परमेश्वर को सीमित कर देगा और परमेश्वर के स्वभाव के इस अकेले भाग का परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव के प्रतिनिधि के रूप में उपयोग करेगा। इसके अलावा, मनुष्य के भीतर अनेक कल्पनाएँ इस कदर मिली-जुली रहती हैं कि वह परमेश्वर के स्वभाव, अस्तित्व और बुद्धि, साथ ही परमेश्वर के कार्य के सिद्धांतों को सीमित मापदंडों के भीतर कठोरता से बाँध देता है, यह मानते हुए कि यदि परमेश्वर एक बार ऐसा था, तो वह सदा वैसा ही रहेगा और अनंत काल तक नहीं बदलेगा। केवल उन लोगों के पास ही, जो कार्य के तीनों चरणों को जानते और समझते हैं, परमेश्वर का पूरा और सटीक ज्ञान हो सकता है। कम से कम, वे परमेश्वर को इस्राएलियों या यहूदियों के परमेश्वर के रूप में परिभाषित नहीं करेंगे और उसे ऐसे परमेश्वर के रूप में नहीं देखेंगे जिसे मनुष्य की खातिर सदैव के लिए सलीब पर चढ़ा दिया जाएगा। यदि कोई परमेश्वर को उसके कार्य के केवल एक चरण के माध्यम से जानता है, तो उसका ज्ञान बहुत अल्प है और समुद्र में एक बूँद से ज्यादा नहीं है। यदि नहीं, तो कई पुराने धर्म-रक्षकों ने परमेश्वर को जीवित सलीब पर क्यों चढ़ाया होता? क्या ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि मनुष्य परमेश्वर को निश्चित मापदंडों के भीतर सीमित कर देता है?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

9. कार्य के तीन चरण परमेश्वर के संपूर्ण कार्य का तथ्यात्मक अभिलेख हैं; ये परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के तथ्यात्मक अभिलेख हैं, और ये कल्पित नहीं हैं। यदि तुम लोग वास्तव में परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव के ज्ञान का अनुसरण करना चाहते हो, तो तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य के तीनों चरणों को जानना होगा और साथ ही तुम लोगों को किसी भी चरण को चूकना नहीं चाहिए। जो लोग परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हैं, उन्हें कम से कम इतना तो हासिल कर ही लेना चाहिए। मनुष्य स्वयं परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं रच सकता। यह ऐसा कुछ नहीं है जिसकी कल्पना मनुष्य स्वयं कर सकता हो, यह पवित्र आत्मा द्वारा किसी एक व्यक्ति को प्रदान किए जा रहे विशेष अनुग्रह का नतीजा तो बिल्कुल नहीं है। इसके बजाय, यह वह ज्ञान है जो तब आता है जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर लेता है, और यह परमेश्वर का वह ज्ञान है जो केवल परमेश्वर के कार्य के तथ्यों का अनुभव करने के बाद ही आता है। इस प्रकार का ज्ञान आसानी से हासिल नहीं किया जा सकता, न ही यह कोई ऐसी चीज है जिसे सिखाया जा सकता है। यह पूरी तरह से व्यक्तिगत अनुभव से संबंधित है। इन तीन चरणों के मूल में परमेश्वर द्वारा मनुष्यों का उद्धार निहित है, मगर उद्धार के कार्य के भीतर कार्य करने की कई विधियाँ शामिल हैं और साथ ही ऐसे कई साधन भी हैं, जिनके माध्यम से परमेश्वर का स्वभाव व्यक्त होता है। मनुष्य के लिए इसे पहचानना बेहद मुश्किल है। मनुष्य के लिए इसे समझना मुश्किल है। युगों का विभाजन, परमेश्वर के कार्य में बदलाव, कार्य के स्थान में बदलाव, इस कार्य को ग्रहण करने वाले में बदलाव आदि, ये सभी कार्य के तीन चरणों में समाविष्ट हैं। विशेष रूप से, पवित्र आत्मा के कार्य करने के तरीकों में भिन्नता, और साथ ही परमेश्वर के स्वभाव, छवि, नाम, पहचान में परिवर्तन या अन्य बदलाव, ये सभी कार्य के तीन चरणों के ही भाग हैं। कार्य का एक चरण केवल एक ही भाग का प्रतिनिधित्व कर सकता है, और यह एक निश्चित दायरे के भीतर ही सीमित है। इसमें युगों का विभाजन या परमेश्वर के कार्य में बदलाव शामिल नहीं है, इसमें अन्य पहलू तो बिल्कुल भी शामिल नहीं हैं। यह एक सुस्पष्ट तथ्य है। कार्य के तीन चरण मानवजाति को बचाने में परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को और उद्धार के कार्य में परमेश्वर के स्वभाव को अवश्य जानना चाहिए; इस तथ्य के बिना, परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान निराधार शब्दों के अलावा कुछ भी नहीं है, यह सैद्धांतिक बातों का दिखावा मात्र है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

10. परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के दौरान प्रकट किया गया है। वह सिर्फ अनुग्रह के युग में प्रकट नहीं किया गया है, न ही सिर्फ व्यवस्था के युग में, सिर्फ अंत के दिनों की इस अवधि में तो बिल्कुल भी नहीं। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य न्याय, कोप और ताड़ना को दर्शाता है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य व्यवस्था के युग के कार्य या अनुग्रह के युग के कार्य का स्थान नहीं ले सकता। किंतु तीनों चरण आपस में जुड़कर एक इकाई बनते हैं और वे सभी एक ही परमेश्वर के कार्य हैं। स्वाभाविक रूप से, इस कार्य का क्रियान्वयन तीन अलग-अलग युगों में विभाजित है। अंत के दिनों में किया जा रहा कार्य हर चीज को समाप्ति की ओर ले जाता है; व्यवस्था के युग में किया गया कार्य आरंभ करने का कार्य था; और अनुग्रह के युग में किया गया कार्य छुटकारे का कार्य था। जहाँ तक इस संपूर्ण छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना के कार्य के दर्शनों की बात है, कोई भी व्यक्ति उनके बारे में अंतर्दृष्टि या समझ प्राप्त करने में समर्थ नहीं है और ये दर्शन पहेली बने हुए हैं। अंत के दिनों में, राज्य के युग का सूत्रपात करने के लिए केवल वचन का कार्य किया जाता है, परंतु यह सभी युगों का प्रतिनिधि नहीं है। अंत के दिन अंत के दिनों से अधिक कुछ नहीं हैं और राज्य के युग से अधिक कुछ नहीं हैं, और वे अनुग्रह के युग या व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व नहीं करते। बात बस यह है कि अंत के दिनों के दौरान छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना का समस्त कार्य तुम लोगों पर प्रकट किया जा रहा है। यह रहस्य का अनावरण है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

11. छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना कार्य के तीन चरणों में विभाजित है। कोई भी एक चरण अकेला तीनों युगों के कार्य का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, बल्कि संपूर्ण कार्य के केवल एक भाग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। यहोवा नाम परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता। यह तथ्य कि उसने व्यवस्था के युग में अपना कार्य किया था, यह प्रमाणित नहीं करता कि परमेश्वर केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर हो सकता है। यहोवा ने मनुष्य से मंदिर और वेदियाँ बनाने के लिए कहा और उसके लिए व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं और उसे आज्ञाएँ दीं; जो कार्य उसने किया, वह केवल व्यवस्था के युग का प्रतिनिधित्व करता है। उसके द्वारा किया गया यह कार्य यह प्रमाणित नहीं करता कि परमेश्वर केवल वो परमेश्वर है जो मनुष्य से व्यवस्था बनाए रखने के लिए कहता है या वो परमेश्वर है जो मंदिर में रहता है या वो परमेश्वर है जो वेदी के सामने खड़ा रहता है। ऐसा कहना असत्य होगा। व्यवस्था के अंतर्गत किया गया कार्य केवल एक युग का ही प्रतिनिधित्व कर सकता है। इसलिए, यदि परमेश्वर ने केवल व्यवस्था के युग में ही कार्य किया होता तो मनुष्य यह कहते हुए परमेश्वर को परिसीमित कर देता, “परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मंदिर में रहता है और परमेश्वर की सेवा करने के लिए हमें याजकों वाले वस्त्र पहनकर मंदिर में प्रवेश करना चाहिए।” यदि अनुग्रह के युग का कार्य कभी न किया जाता और व्यवस्था का युग ही वर्तमान समय तक जारी रहता तो मनुष्य यह नहीं जान पाता कि परमेश्वर दयालु और प्रेमपूर्ण भी है। यदि व्यवस्था के युग में कोई कार्य न किया जाता और केवल अनुग्रह के युग में ही कार्य किया जाता तो मनुष्य बस इतना ही जान पाता कि परमेश्वर सिर्फ मनुष्य को छुटकारा दिलाता है और परमेश्वर मनुष्य के पाप क्षमा करता है। मनुष्य केवल इतना ही जान पाता कि परमेश्वर पवित्र और निर्दोष है और वह मनुष्य के लिए अपना बलिदान देने और सलीब पर चढ़ने में सक्षम है। मनुष्य केवल ये चीजें ही जान पाता और उसे किसी और चीज की समझ न होती। अतः प्रत्येक युग परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग का प्रतिनिधित्व करता है। व्यवस्था का युग परमेश्वर के स्वभाव के कुछ पहलू दर्शाता है और ऐसा ही अनुग्रह का युग और यह वर्तमान युग करता है—केवल ये तीनों चरण एक संपूर्ण इकाई में एकीकृत किए जाने पर ही परमेश्वर के स्वभाव की संपूर्णता प्रकट कर सकते हैं। इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही मनुष्य इसे पूरी तरह से समझ सकता है। तीनों चरणों में से एक भी चरण छोड़ा नहीं जा सकता। कार्य के इन तीनों चरणों को जान लेने के बाद ही तुम परमेश्वर के स्वभाव को उसकी संपूर्णता में देखोगे। यह तथ्य कि परमेश्वर ने व्यवस्था के युग में अपना कार्य पूरा किया, यह प्रमाणित नहीं करता कि वह केवल व्यवस्था के अंतर्गत ही परमेश्वर है और इस तथ्य का कि उसने छुटकारे का कार्य पूरा किया, यह अर्थ नहीं है कि परमेश्वर सदैव मानवजाति को छुटकारा देगा। ये सभी मनुष्यों द्वारा निर्मित परिसीमन हैं। अनुग्रह के युग के समाप्त हो जाने पर तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर केवल सलीब का परमेश्वर है और केवल सलीब ही परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले उद्धार का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसा करना परमेश्वर को सीमित करना होगा। वर्तमान चरण में परमेश्वर मुख्य रूप से वचन का कार्य कर रहा है, परंतु इससे तुम यह नहीं कह सकते कि परमेश्वर मनुष्य के प्रति कभी दयालु नहीं रहा है और वह बस ताड़ना और न्याय लाया है। अंत के दिनों का कार्य यहोवा और यीशु के कार्य को और उन सभी रहस्यों को प्रकट करता है, जिन्हें मनुष्य ने नहीं समझा था, इस तरह यह मानवजाति की मंजिलों और परिणामों को प्रकट करता है और मानवजाति के बीच उद्धार के समस्त कार्य को समाप्त करता है। अंत के दिनों में कार्य का यह चरण सभी चीजों को समाप्ति की ओर ले जाता है। मनुष्य द्वारा समझे न गए सभी रहस्यों को प्रकट किया ही जाना चाहिए, ताकि मनुष्य उनकी असलियत जान सके और उसके हृदय में उन सबकी समझ उत्पन्न हो सके। केवल तभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जा सकता है। केवल छह हजार वर्षीय प्रबंधन योजना पूर्ण होने के बाद ही मनुष्य परमेश्वर का स्वभाव उसकी संपूर्णता में समझ पाएगा, क्योंकि तब उसका प्रबंधन समाप्त हो चुका होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारण का रहस्य (4)

12. आज के कार्य ने अनुग्रह के युग के कार्य को आगे बढ़ाया है; अर्थात्, समस्त छह हजार सालों की प्रबंधन योजना का कार्य आगे बढ़ा है। यद्यपि अनुग्रह का युग समाप्त हो गया है, किन्तु परमेश्वर के कार्य ने अधिक और गहरी प्रगति की है। मैं क्यों बार-बार कहता हूँ कि कार्य का यह चरण अनुग्रह के युग और व्यवस्था के युग पर आधारित है? दूसरी तरह से कहा जाए तो आज का कार्य अनुग्रह के युग में किए गए कार्य की निरंतरता और व्यवस्था के युग में किए गए कार्य की प्रगति है। तीनों चरण आपस में घनिष्ठता से जुड़े हुए हैं और श्रृंखला की हर कड़ी निकटता से अगली कड़ी से जुड़ी है। मैं यह भी क्यों कहता हूँ कि कार्य का यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित है? मान लो, यह चरण यीशु द्वारा किए गए कार्य पर आधारित न होता, तो फिर इस चरण में क्रूस पर चढ़ाए जाने का कार्य फिर से करना होता, और पहले किए गए छुटकारे के कार्य को फिर से करना पड़ता। यह अर्थहीन होता। इसलिए, ऐसा नहीं है कि कार्य पूरी तरह समाप्त हो चुका है, बल्कि युग आगे बढ़ गया है और कार्य को पहले से अधिक ऊँचा कर दिया गया है। यह कहा जा सकता है कि कार्य का यह चरण व्यवस्था के युग की नींव और यीशु के कार्य की चट्टान पर निर्मित है। परमेश्वर का कार्य चरण-दर-चरण निर्मित किया जाता है, और यह चरण कोई नई शुरुआत नहीं है। सिर्फ तीनों चरणों के कार्य के संयोजन को ही छह हजार सालों की प्रबंधन योजना माना जा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, दो देहधारण पूरा करते हैं देहधारण के मायने

13. इन तीन चरणों में से एक चरण को भी अपने आपमें एकमात्र ऐसा दर्शन नहीं माना जा सकता है जिसे समस्त मानवजाति को जानना होगा, क्योंकि उद्धार के कार्य की संपूर्णता कार्य के तीन चरण हैं न कि उनमें से कोई एक चरण। जब तक उद्धार का कार्य पूर्ण नहीं होता, तब तक परमेश्वर का प्रबंधन पूरी तरह से समाप्त नहीं हो पाएगा। परमेश्वर का अस्तित्व, स्वभाव और बुद्धि उद्धार के कार्य की संपूर्णता में व्यक्त होते हैं, उनके बारे में मनुष्य को आरंभ में नहीं बताया जाता है, बल्कि उद्धार के कार्य में धीरे-धीरे व्यक्त किया जाता है। उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण परमेश्वर के स्वभाव के एक भाग को और उसके अस्तित्व के एक भाग को व्यक्त करता है; कार्य का कोई एक चरण प्रत्यक्षतः और पूर्णतः परमेश्वर के अस्तित्व की संपूर्णता को व्यक्त नहीं कर सकता है। इस तरह, चूँकि उद्धार का कार्य केवल तभी पूरी तरह से संपन्न हो सकता है, जब कार्य के ये तीनों चरण पूरे हो जाते हैं, परमेश्वर की संपूर्णता के बारे में मनुष्य के ज्ञान को परमेश्वर के कार्य के तीनों चरणों से अलग नहीं किया जा सकता। कार्य के एक चरण से मनुष्य जो प्राप्त करता है वह सिर्फ परमेश्वर का वह स्वभाव है जो उसके कार्य के सिर्फ एक भाग में व्यक्त होता है। यह उस स्वभाव और अस्तित्व का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, जो इससे पहले या बाद के चरणों में व्यक्त होते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि मानवजाति को बचाने का कार्य सीधे एक ही अवधि के दौरान या किसी एक स्थान पर समाप्त नहीं होता है, बल्कि भिन्न-भिन्न समयों और स्थानों पर मनुष्य के विकास की स्थिति के अनुसार यह धीरे-धीरे अधिक गहरा होता जाता है। यह वह कार्य है जो चरणों में किया जाता है, और एक ही चरण में पूरा नहीं होता है। इसलिए, परमेश्वर की संपूर्ण बुद्धि किसी एक अलग चरण में नहीं, बल्कि तीनों चरणों में मूर्त रूप लेती है। उसके संपूर्ण अस्तित्व और उसकी संपूर्ण बुद्धि इन तीन चरणों के बीच आवंटित किए जाते हैं—प्रत्येक चरण में उसके अस्तित्व का समावेश होता है और प्रत्येक चरण उसके कार्य की बुद्धिमत्ता का अभिलेख है। मनुष्य को इन तीन चरणों में व्यक्त परमेश्वर के संपूर्ण स्वभाव को जानना चाहिए। परमेश्वर का यह अस्तित्व समस्त मानवजाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, और यदि लोगों को परमेश्वर की आराधना करते समय यह ज्ञान न हो, तो वे उन लोगों से किसी भी प्रकार से भिन्न नहीं हैं जो बुद्ध की पूजा करते हैं। मनुष्यों के बीच परमेश्वर का कार्य मनुष्यों से छिपा नहीं है, और उन सभी को यह जानना चाहिए जो परमेश्वर की आराधना करते हैं। चूँकि परमेश्वर ने मनुष्यों के बीच उद्धार के कार्य के तीन चरणों को पूरा कर लिया है, इसलिए मनुष्य को कार्य के इन तीन चरणों के दौरान जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, इसकी अभिव्यक्ति को जानना चाहिए। यह काम मनुष्य को अवश्य करना चाहिए। परमेश्वर मनुष्य से जो कुछ छिपाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य प्राप्त करने में अक्षम है और जिसे मनुष्य को नहीं जानना चाहिए, जबकि परमेश्वर मनुष्य को जो कुछ दिखाता है वह ऐसी चीज है जिसे मनुष्य को जानना चाहिए, और जो मनुष्य के पास होना चाहिए। कार्य के तीनों चरणों में से प्रत्येक चरण पूर्ववर्ती चरण की बुनियाद पर पूरा किया जाता है; इसे स्वतंत्र रूप से, उद्धार के कार्य से पृथक नहीं किया जाता है। यद्यपि किए गए कार्य और युग में काफी बड़े अंतर हैं, पर इसके मूल में मानवजाति का उद्धार ही है, और उद्धार के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण से ज्यादा गहरा होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

14. परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन तीन चरणों में विभाजित है और प्रत्येक चरण में मनुष्य से यथोचित अपेक्षाएँ की जाती हैं। इसके अतिरिक्त, जैसे-जैसे युग बीतते और आगे बढ़ते जाते हैं, समस्त मानवजाति से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और अधिक ऊँची होती जाती हैं। इस प्रकार कदम-दर-कदम परमेश्वर के प्रबंधन का यह कार्य अपने चरम पर पहुँचता जाता है, इस तरह मनुष्य “वचन का देह में प्रकट होना” देख लेता है और इस तरह मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ अधिक ऊँची हो जाती हैं, साथ ही वह गवाही भी ऊँची हो जाती है जिसे देने की अपेक्षा मनुष्य से की जाती है। मनुष्य परमेश्वर के साथ वास्तव में सहयोग करने में जितना अधिक सक्षम होता है, उतना ही अधिक परमेश्वर महिमा प्राप्त कर सकता है। मनुष्य का सहयोग वह गवाही है, जिसे देने की उससे अपेक्षा की जाती है, और जो गवाही वह देता है, वह मनुष्य का अभ्यास है। इसलिए, परमेश्वर के कार्य का उचित प्रभाव हो सकता है या नहीं, और सच्ची गवाही हो सकती है या नहीं, ये अटूट रूप से मनुष्य के सहयोग और गवाही से जुड़े हुए हैं। जब कार्य समाप्त हो जाएगा, अर्थात् जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तो मनुष्य से अधिक ऊँची गवाही देने की अपेक्षा की जाएगी, और जब परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच जाएगा, तब मनुष्य का अभ्यास और प्रवेश अपनी पराकाष्ठा पर पहुँच जाएँगे। अतीत में मनुष्य से व्यवस्था और आज्ञाओं का पालन करना अपेक्षित था, और उससे धैर्यवान और विनम्र बनने की अपेक्षा की जाती थी। आज मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह परमेश्वर की समस्त व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करे और परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखे और अंततः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह क्लेश के बीच भी परमेश्वर से प्रेम करे। ये तीन चरण वे अपेक्षाएँ हैं, जो परमेश्वर अपने संपूर्ण प्रबंधन के दौरान कदम-दर-कदम मनुष्य से करता है। परमेश्वर के कार्य का प्रत्येक चरण पिछले चरण की तुलना में अधिक गहरे जाता है, और प्रत्येक चरण में मनुष्य से की जाने वाली अपेक्षाएँ पिछले चरण की तुलना में और अधिक ऊँची होती हैं, और इस तरह परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन धीरे-धीरे आकार लेता है। इसका कारण ठीक यह है कि मनुष्य से की गई अपेक्षाएँ निरंतर ऊँची होती जाती हैं, जिससे मनुष्य का स्वभाव परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानकों के निरंतर अधिक निकट आता जाता है और केवल तभी संपूर्ण मानवजाति धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से अलग हो जाती है। जब तक परमेश्वर का कार्य पूर्ण समाप्ति पर आएगा, संपूर्ण मानवजाति शैतान के प्रभाव से बचा ली गई होगी। जब वह समय आएगा, तो परमेश्वर का कार्य अपनी समाप्ति पर पहुँच चुका होगा, और अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए परमेश्वर के साथ मनुष्य का सहयोग अब नहीं होगा, और संपूर्ण मानवजाति परमेश्वर के प्रकाश में जीएगी, और तब से परमेश्वर के प्रति कोई विद्रोहशीलता या विरोध नहीं होगा। परमेश्वर भी मनुष्य से कोई अपेक्षाएँ नहीं रखेगा, और मनुष्य और परमेश्वर के बीच अधिक सामंजस्यपूर्ण सहयोग होगा, ऐसा सहयोग जो मनुष्य और परमेश्वर दोनों का एक-साथ जीवन होगा, ऐसा जीवन, जो परमेश्वर के प्रबंधन का पूरी तरह से समापन होने और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को शैतान के शिकंजों से पूरी तरह से बचा लिए जाने के बाद आता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास

15. परमेश्वर का प्रबंधन ऐसा है : वह मनुष्य को शैतान के हवाले करता है—वह मनुष्य जो यह जानता ही नहीं कि परमेश्वर क्या है, सृष्टिकर्ता क्या है, परमेश्वर की आराधना कैसे करें या उसे परमेश्वर के प्रति समर्पण क्यों करना चाहिए—और वह शैतान को मनमाने ढंग से उसे भ्रष्ट करने देता है; कदम-दर-कदम, परमेश्वर तब मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस ले लेता है, जब तक कि मनुष्य पूरी तरह से परमेश्वर की आराधना नहीं करने लगता और शैतान को अस्वीकार नहीं कर देता। यही परमेश्वर का प्रबंधन है। यह किसी मिथक-कथा जैसा और समझने में मुश्किल लग सकता है। लोगों को यह किसी मिथक-कथा जैसा इसलिए लगता है, क्योंकि उन्हें इसका भान नहीं है कि पिछले हज़ारों सालों में मनुष्य के साथ कितना कुछ घटित हुआ है, और यह तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते कि इस ब्रह्मांड और नभमंडल में कितनी कहानियाँ घट चुकी हैं। और इससे भी बढ़कर, ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अपनी नश्वर आँखों से उस अधिक अद्भुत, अधिक भय पैदा करने वाली दुनिया को नहीं देख सकते जो भौतिक दुनिया से परे मौजूद है। यह उन्हें समझ से बाहर लगता है क्योंकि उन्हें परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार के महत्व या उसके प्रबंधन कार्य के महत्व की कोई समझ नहीं है और वे यह नहीं समझते कि परमेश्वर वास्तव में किस प्रकार की मानवजाति चाहता है। क्या वह ऐसी मानवजाति है जो शैतान द्वारा बिल्कुल भी भ्रष्ट न की गई हो, जैसे आदम और हव्वा थे? नहीं! परमेश्वर के प्रबंधन का उद्देश्य लोगों के एक ऐसे समूह को प्राप्त करना है, जो उसकी आराधना करे और उसके प्रति समर्पित हो। हालाँकि ये लोग शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जा चुके हैं, परंतु वे अब शैतान को अपने पिता के रूप में नहीं देखते; इसके बजाय, वे शैतान के भयानक चेहरे को पहचानते हैं और उसे अस्वीकार करते हैं, और वे परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने के लिए उसके सामने आते हैं। वे जान जाते हैं कि कुरूप और पवित्र में क्या अंतर है, वे परमेश्वर की महानता और शैतान की बुराई को भी पहचान जाते हैं। इस प्रकार के मनुष्य अब शैतान की सेवा नहीं करेंगे, या शैतान की आराधना नहीं करेंगे, या शैतान को प्रतिष्ठापित नहीं करेंगे। इसका कारण यह है कि यह एक ऐसे लोगों का समूह है, जो सचमुच परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं। यही परमेश्वर द्वारा मानवजाति का प्रबंधन करने के कार्य की महत्ता है। इस प्रबंधन कार्य के दौरान, मानवजाति शैतान की भ्रष्टता की पात्र है और साथ ही मानवजाति परमेश्वर के उद्धार की पात्र भी है; यह वह उत्पाद है जिसके लिए परमेश्वर और शैतान लड़ रहे हैं। जैसे-जैसे परमेश्वर अपना कार्य करता है, वह कदम-दर-कदम मनुष्य को शैतान के हाथों से वापस प्राप्त कर रहा है और इस प्रकार मनुष्य परमेश्वर के और भी करीब आता जाता है ...

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 3 : मनुष्य को केवल परमेश्वर के प्रबंधन के बीच ही बचाया जा सकता है

16. जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन समाप्ति के निकट होगा, तो परमेश्वर सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटेगा। मनुष्य सृष्टिकर्ता के हाथों से रचा गया था और अंत में वह मनुष्य को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में वापस ले लेगा; कार्य के तीन चरणों की यही परिणति है। अंत के दिनों में कार्य का चरण और इस्राएल एवं यहूदा में पिछले दो चरण, संपूर्ण ब्रह्मांड में परमेश्वर के प्रबंधन की योजना हैं। इसे कोई नकार नहीं सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का तथ्य है। यद्यपि लोगों ने इस कार्य के बहुत-से हिस्से का अनुभव नहीं किया है या इसके साक्षी नहीं हैं, परंतु तथ्य तब भी तथ्य ही हैं और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। ब्रह्मांड में हर जगह जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सभी कार्य के इन तीनों चरणों को स्वीकार करेंगे। यदि तुम कार्य के किसी एक विशेष चरण को ही जानते हो, और कार्य के अन्य दो चरणों को नहीं समझते हो, अतीत में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रबंधन की समस्त योजना के संपूर्ण सत्य के बारे में बात करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान एक-पक्षीय है, क्योंकि तुम परमेश्वर को जानते या समझते नहीं हो, और इसलिए तुम परमेश्वर के गवाह बनने के लिए योग्य नहीं हो। इन चीज़ों के बारे में तुम्हारा वर्तमान ज्ञान चाहे गहरा हो या सतही, अंत में तुम सभी लोगों के पास ज्ञान होना ही चाहिए और तुम्हें पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहिए और सभी लोग परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता को देखेंगे और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होंगे। इस कार्य के अंत में सभी धर्म एक हो जाएँगे, सभी सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगे, सभी सृजित प्राणी एक सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे और सभी दुष्ट धर्म नष्ट हो जाएँगे और फिर कभी भी प्रकट नहीं होंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

17. कार्य के इन तीनों चरणों का निरंतर उल्लेख क्यों किया जा रहा है? युगों का बीतना, सामाजिक विकास और प्रकृति का बदलता हुआ स्वरूप सभी कार्य के तीनों चरणों में परिवर्तनों का अनुसरण करते हैं। मानवजाति परमेश्वर के कार्य के साथ-साथ बदलती है और अपने-आप विकसित नहीं होती। परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों का उल्लेख सभी सृजित प्राणियों को और प्रत्येक धर्म और सम्प्रदाय के लोगों को एक ही परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लाने के लिए है। चाहे तुम किसी भी धर्म से संबंधित हो, अंततः तुम परमेश्वर के प्रभुत्व के आगे आत्मसमर्पण कर दोगे। स्वयं परमेश्वर ही इस कार्य को कर सकता है; इसे कोई धर्म-प्रमुख नहीं कर सकता। संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, प्रत्येक का अपना प्रमुख या अगुआ है और उनके अनुयायी संसार भर के विभिन्न देशों और क्षेत्रों में सभी ओर फैले हुए हैं; लगभग प्रत्येक देश में, चाहे वह छोटा हो या बड़ा, भिन्न-भिन्न धर्म हैं। फिर भी संसार भर में चाहे कितने ही धर्म क्यों न हों, ब्रह्मांड के सभी लोग अंततः एक ही परमेश्वर के मार्गदर्शन के अधीन अस्तित्व में हैं, धर्म के प्रमुखों या अगुआओं के मार्गदर्शन के अधीन नहीं हैं। कहने का अर्थ है कि मानवजाति किसी विशेष धर्म-प्रमुख या अगुवा द्वारा मार्गदर्शित नहीं है; बल्कि संपूर्ण मानवजाति को एक ही सृष्टिकर्ता के द्वारा मार्गदर्शित किया जाता है, जिसने स्वर्ग और पृथ्वी का और सभी चीजों का और मानवजाति का भी सृजन किया है—यह एक तथ्य है। यद्यपि संसार में कई प्रमुख धर्म हैं, किंतु वे कितने ही बड़े क्यों न हों, वे सभी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन अस्तित्व में हैं और उनमें से कोई भी इस प्रभुत्व के दायरे से बाहर नहीं जा सकता है। मानवजाति का विकास, समाज का परिवर्तन, प्राकृतिक विज्ञानों का उन्नत होना—प्रत्येक सृष्टिकर्ता की व्यवस्थाओं से अविभाज्य है और यह कार्य ऐसा नहीं है जो किसी धर्म-प्रमुख द्वारा किया जा सके। धर्म-प्रमुख मात्र किसी धर्म विशेष के अगुआ हैं, और वे परमेश्वर का, या उसका जिसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों को रचा है, प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते हैं। धर्म-प्रमुख पूरे धर्म के भीतर सभी का नेतृत्व कर सकते हैं, परंतु वे स्वर्ग के नीचे के सभी सृजित प्राणियों को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं—यह सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत तथ्य है। एक धर्म-प्रमुख मात्र अगुआ है, और वह परमेश्वर (सृष्टिकर्ता) के समकक्ष खड़ा नहीं हो सकता। सभी चीजें सृष्टिकर्ता के हाथों में हैं और अंत में वे सभी सृष्टिकर्ता के हाथों में लौट जाएँगी। मानवजाति परमेश्वर द्वारा बनाई गई थी और प्रत्येक धर्म परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन आ जाएगा—यह अपरिहार्य है। केवल परमेश्वर ही सभी चीज़ों में सर्वोच्च है, और सभी सृजित प्राणियों में उच्चतम शासक को भी उसके प्रभुत्व के अधीन आना होगा। किसी इंसान का रुतबा चाहे कितना भी ऊँचा क्यों न हो, वह मानवजाति को किसी उपयुक्त गंतव्य तक नहीं ले जा सकता और कोई भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटने में सक्षम नहीं है। स्वयं यहोवा ने मानवजाति की रचना की और प्रत्येक को उसकी किस्म के आधार पर छाँटा और जब अंत का समय आएगा तो वह तब भी सभी चीजों को उनकी किस्म के आधार पर छाँटते हुए अपना कार्य स्वयं ही करेगा—इस कार्य में कोई भी इंसान परमेश्वर की जगह नहीं ले सकता। आरंभ से लेकर आज तक किए गए कार्य के सभी तीन चरण स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं और एक ही परमेश्वर के द्वारा किए गए हैं। कार्य के तीन चरणों का तथ्य परमेश्वर की समस्त मानवजाति की अगुआई का तथ्य है, एक ऐसा तथ्य जिसे कोई नकार नहीं सकता। कार्य के तीन चरणों के अंत में सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा और वे परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगी, क्योंकि ब्रह्मांड के ऊपर और संपूर्ण ब्रह्मांड में केवल इसी एक परमेश्वर का अस्तित्व है, और कोई दूसरे धर्म नहीं हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

18. शायद, जब कार्य के तीन चरणों की पहेली मानवजाति को बताई जाएगी, तो अनुक्रम से परमेश्वर को जानने वाले प्रतिभावान लोगों का एक समूह प्रकट होगा। बेशक, मैं आशा करता हूँ कि ऐसा ही हो और साथ ही मैं इस कार्य को करने की प्रक्रिया में हूँ। मैं निकट भविष्य में ऐसे और भी अधिक प्रतिभावान लोगों के उभरने की आशा करता हूँ और यह आशा करता हूँ कि वे कार्य के इन तीन चरणों के तथ्य के गवाह बनें—जिसका बेशक यह अर्थ है कि वे कार्य के इन तीनों चरणों की गवाही देने वाले प्रथम लोग बनेंगे। परंतु इससे अधिक दुखद और खेदजनक कुछ भी नहीं होगा कि परमेश्वर के कार्य की समाप्ति के दिन इस प्रकार के प्रतिभावान लोग प्रकट न हों, या केवल ऐसे एक या दो ही लोग सामने आएँ और वे वही लोग हों जिन्होंने देहधारी परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना व्यक्तिगत रूप से स्वीकार कर लिया हो। फिर भी, यह सिर्फ़ सबसे बुरी संभावना है। चाहे जो भी हो, मैं अभी भी आशा करता हूँ कि जो वास्तव में परमेश्वर के अनुसरण में हैं, वे इस आशीष को प्राप्त कर पाएँ। समय के आरम्भ से ही, इस प्रकार का कार्य पहले कभी नहीं हुआ; मानव विकास के इतिहास में कभी भी इस प्रकार का उपक्रम नहीं हुआ है। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर को जानने वालों में सबसे प्रथम लोगों में से एक हुए, तो क्या यह सभी सृजित प्राणियों में सर्वोच्च गरिमा की बात नहीं होगी? क्या मानवजाति में ऐसा कोई सृजित प्राणी होगा जो परमेश्वर की इससे अधिक स्वीकृति प्राप्त कर सके? इस प्रकार का कार्य कर पाना आसान नहीं है, परंतु इसके बावजूद अंत में परिणाम देगा। लिंग या राष्ट्रीयता से निरपेक्ष, वे सभी लोग जो परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में सक्षम हैं, अंत में उनके पास परमेश्वर का सबसे महान सम्मान होगा और एकमात्र वे ही परमेश्वर के अधिकार को प्राप्त करेंगे। यही आज का कार्य है, और भविष्य का कार्य भी है; यह 6,000 सालों के कार्य में निष्पादित किया जाने वाला अंतिम और सबसे ऊँचा कार्य है और यह कार्य करने का ऐसा तरीका है, जो मनुष्य की प्रत्येक श्रेणी को प्रकट करता है। मनुष्य को परमेश्वर का ज्ञान करवाने के कार्य के माध्यम से, लोगों की सभी प्रकार की श्रेणियाँ प्रकट होती हैं : जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने और उसके वादों की विरासत पाने के योग्य होते हैं, जबकि जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के आशीषों और उसके वादों की विरासत को पाने के योग्य नहीं होते हैं। जो परमेश्वर को जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग होते हैं, और जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं वे परमेश्वर के अंतरंग नहीं कहे जा सकते हैं; परमेश्वर के अंतरंग परमेश्वर का कोई भी आशीष प्राप्त कर सकते हैं, परन्तु जो उसके घनिष्ठ नहीं हैं वे उसके किसी भी काम के योग्य नहीं हैं। चाहे यह क्लेश, शोधन या न्याय हो, ये सभी चीजें अंततः मनुष्य को परमेश्वर को जानने और उसके प्रति समर्पण करने के योग्य बनाने की खातिर हैं। यही एकमात्र प्रभाव है जो अंततः प्राप्त किया जाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

19. जब कार्य के तीन चरण समाप्ति पर पहुँचेंगे, तो ऐसे लोगों का एक समूह बनाया जाएगा जो परमेश्वर की गवाही देंगे, ऐसे लोगों का समूह जो परमेश्वर को जानते हैं। ये सभी लोग परमेश्वर को जानेंगे। वे सत्य को अभ्यास में लाने में समर्थ होंगे और उनमें मानवता और समझ होगी। उन्हें परमेश्वर के उद्धार के कार्य के तीनों चरणों का ज्ञान होगा। यही कार्य अंत में निष्पादित होगा, और यही लोग 6,000 साल के प्रबंधन के कार्य की परिणति हैं और शैतान की अंतिम पराजय की सबसे शक्तिशाली गवाही हैं। जो परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं वे ही परमेश्वर की प्रतिज्ञा और आशीष को प्राप्त करने में समर्थ होंगे, और ऐसा समूह होंगे जो बिल्कुल अंत तक जीवित रहेगा, वह समूह जो परमेश्वर के अधिकार को धारण करेगा और परमेश्वर की गवाही देगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है

20. परमेश्वर ने आज तक अपना छह हजार वर्षों का कार्य किया है और अपने बहुत-से कर्म प्रकट किए हैं, इसका मुख्य उद्देश्य शैतान को पराजित करना और समस्त मानवजाति को बचाना है। इस अवसर के माध्यम से परमेश्वर स्वर्ग की सारी चीजों, पृथ्वी पर की सारी चीजों और समुद्र के अंदर की सारी चीजों और यहाँ तक कि पृथ्वी के हर अंतिम प्राणी को अपनी सर्वशक्तिमत्ता और अपने सारे कर्म देखने देता है। वह शैतान को पराजित करने के इस अवसर के माध्यम से मानवजाति को अपने सारे कर्म प्रकट करता है ताकि वे उसकी स्तुति करें और शैतान को पराजित करने में उसकी बुद्धि का गुणगान कर सकें। पृथ्वी पर, स्वर्ग में और समुद्र के भीतर की सारी चीजें परमेश्वर को महिमा प्रदान करती हैं, उसकी सर्वशक्तिमत्ता की स्तुति करती हैं, उसके हर एक कर्म की स्तुति करती हैं और उसके पवित्र नाम को ऊँचे स्वर में पुकारती हैं। यह उसके द्वारा शैतान को हराने का प्रमाण है; यह शैतान पर उसकी विजय का प्रमाण है। उससे भी अधिक, यह उसके द्वारा मानवजाति के उद्धार का प्रमाण है। परमेश्वर की समस्त सृष्टि उसे महिमा प्रदान करती है, अपने शत्रु को पराजित करने और विजयी होकर लौटने के लिए उसकी स्तुति करती है और एक महान विजयी राजा के रूप में उसका गुणगान करती है। उसका उद्देश्य केवल शैतान को पराजित करना नहीं है, इसीलिए उसका कार्य छह हजार वर्ष से जारी रहा है। वह मानवजाति को बचाने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है; वह अपने सभी कर्मों को प्रकट करने के लिए और अपनी सारी महिमा को प्रकट करने के लिए शैतान की पराजय का उपयोग करता है। वह महिमा प्राप्त करेगा और स्वर्गदूतों की समस्त सभा उसकी सारी महिमा देखेगी। स्वर्ग में दूत, पृथ्वी पर मनुष्य और पृथ्वी पर उसकी समस्त सृष्टि सृष्टिकर्ता की महिमा देखेंगे। यही वह कार्य है जो वह करता है। स्वर्ग में और पृथ्वी पर उसकी सृष्टि, सभी उसकी महिमा को देखेंगे और वह शैतान को सर्वथा पराजित करने के बाद विजयोल्लास के साथ वापस लौटेगा, पूरी मानवजाति उसकी प्रशंसा करेगी—यह वह कार्य है जो एक बार में दो लक्ष्य हासिल करता है। अंत में समस्त मानवजाति उसके द्वारा जीत ली जाएगी, और वह ऐसे हर व्यक्ति को मिटा देगा जो उसका विरोध या विद्रोह करेगा, अर्थात्, वह उन सभी को मिटा देगा जो शैतान के हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें पता होना चाहिए कि समस्त मानवजाति आज के दिन तक कैसे विकसित हुई

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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