6. बाइबल पर वचन
240. बहुत सालों से, लोगों के विश्वास (दुनिया के तीन मुख्य धर्मों में से एक, ईसाई धर्म) का परंपरागत साधन बाइबल पढ़ना ही रहा है; बाइबल से दूर जाना प्रभु में विश्वास करना नहीं है, बाइबल से दूर जाना एक पाखंड और विधर्म है, और यहाँ तक कि जब लोग अन्य पुस्तकें पढ़ते हैं, तो उन पुस्तकों की बुनियाद भी बाइबल की व्याख्या ही होनी चाहिए। कहने का अर्थ है कि, यदि तुम प्रभु में विश्वास करते हो तो तुम्हें बाइबल अवश्य पढ़नी चाहिए, और बाइबल के अलावा तुम्हें ऐसी किसी अन्य पुस्तक की आराधना नहीं करनी चाहिए, जिसमें बाइबल शामिल न हो। यदि तुम करते हो, तो तुम परमेश्वर के साथ विश्वासघात कर रहे हो। जब से बाइबल अस्तित्व में आई है तभी से प्रभु में लोगों का विश्वास, बाइबल में विश्वास रहा है। यह कहने के बजाय कि लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, यह कहना बेहतर है कि वे बाइबल में विश्वास करते हैं; यह कहने के बजाय कि उन्होंने बाइबल पढ़नी आरंभ कर दी है, यह कहना बेहतर है कि उन्होंने बाइबल पर विश्वास करना आरंभ कर दिया है; और यह कहने के बजाय कि वे प्रभु के सामने लौट आए हैं, यह कहना बेहतर होगा कि वे बाइबल के सामने लौट आए हैं। इस तरह से, लोग बाइबल की आराधना ऐसे करते हैं मानो वह परमेश्वर हो और उसके साथ इस तरह से पेश आते हैं मानो वह उनका जीवन-रक्त हो और उसे खोना अपने जीवन को खोने के समान हो। लोग बाइबल को परमेश्वर जितना ही ऊँचा समझते हैं, और यहाँ तक कि कुछ लोग ऐसे भी हैं, जो उसे परमेश्वर से भी ऊँचा समझते हैं। यदि लोगों के पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, यदि वे परमेश्वर को महसूस नहीं कर सकते, तो वे जीते रह सकते हैं—परंतु जैसे ही वे बाइबल को खो देते हैं, या बाइबल के प्रसिद्ध अध्याय और उक्तियाँ खो देते हैं, तो यह ऐसा होता है, मानो उन्होंने अपना जीवन खो दिया हो। और इसलिए, जैसे ही लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, वैसे ही वे बाइबल पढ़ना और उसे याद करना आरंभ कर देते हैं, और जितना ज्यादा वे बाइबल को याद कर पाते हैं, उतना ही ज्यादा यह साबित होता है कि वे प्रभु से प्रेम करते हैं और उनकी आस्था बहुत गहरी है। जिन्होंने बाइबल पढ़ी है और जो उसके बारे में दूसरों से बात कर सकते हैं, वे सभी सबसे अच्छे भाई-बहन हैं। इन सारे वर्षों में, प्रभु के प्रति लोगों की आस्था और वफादारी बाइबल की उनकी समझ की सीमा के अनुसार मापी गई है। अधिकतर लोग साधारणतः यह नहीं समझते कि उन्हें परमेश्वर पर विश्वास क्यों करना चाहिए, और न ही वे यह समझते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास कैसे किया जाए, और वे बाइबल के अध्यायों का गूढ़ार्थ निकालने के लिए आँख बंद करके सुराग ढूँढ़ने के अलावा कुछ नहीं करते। लोगों ने कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा का अनुसरण नहीं किया है; शुरुआत से ही उन्होंने हताशापूर्वक बाइबल का अध्ययन और अन्वेषण करने के अलावा और कुछ नहीं किया है, और किसी ने कभी बाइबल के बाहर पवित्र आत्मा का कोई अधिक नया कार्य नहीं पाया है। कोई कभी बाइबल से दूर नहीं जा सकता, न ही किसी ने कभी ऐसा करने की हिम्मत की है। लोगों ने इन सभी वर्षों में बाइबल का अध्ययन किया है, वे बहुत-सी व्याख्याओं के साथ सामने आए हैं, और उन्होंने बहुत-सा काम किया है; उनमें भी बाइबल के बारे में कई मतभेद हैं, जिस पर वे अंतहीन बहस करते हैं, इतनी कि आज दो हज़ार से ज़्यादा अलग-अलग संप्रदाय बन गए हैं। वे सभी कुछ श्रेष्ठ व्याख्याओं या बाइबल के अधिक गंभीर रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, और वे उसकी छानबीन करना चाहते हैं, और उसमें इस्राएल में यहोवा के कार्य की पृष्ठभूमि का या यहूदिया में यीशु के कार्य की पृष्ठभूमि का या और अधिक रहस्यों का पता लगाना चाहते हैं, जिनके बारे में कोई नहीं जानता। बाइबल के प्रति लोगों का दृष्टिकोण जुनून और विश्वास का है, और उनमें से कोई भी बाइबल के पीछे की असली कहानी या बाइबल के सार के बारे में पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हो सकता। आज भी जब बाइबल की बात आती है, तो लोगों को अभी भी आश्चर्य का एक अवर्णनीय एहसास होता है, वे उसके प्रति और भी अधिक जुनूनी हो जाते हैं, उस पर और भी अधिक आस्था रखते हैं। आज, हर कोई बाइबल में अंत के दिनों के कार्य की भविष्यवाणियाँ ढूँढ़ना चाहता है, वह यह खोजना चाहता है कि अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर क्या कार्य करता है, और अंत के दिनों के क्या लक्षण हैं। इस तरह से, बाइबल की उनकी आराधना और अधिक उत्कट हो जाती है, और जितनी ज़्यादा वह अंत के दिनों के नज़दीक आती है, उतना ही ज़्यादा अंधविश्वास वे बाइबल की भविष्यवाणियों पर करने लगते हैं, विशेषकर उन पर, जो अंत के दिनों के बारे में हैं। बाइबल पर ऐसे अंधे विश्वास के साथ, बाइबल पर ऐसे भरोसे के साथ, उनमें पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की कोई इच्छा नहीं होती। अपनी धारणाओं के अनुसार, लोग सोचते हैं कि केवल बाइबल ही पवित्र आत्मा के कार्य को ला सकती है; केवल बाइबल में ही वे परमेश्वर के पदचिह्न खोज सकते हैं; केवल बाइबल में ही परमेश्वर के कार्य के रहस्य छिपे हुए हैं; केवल बाइबल—न कि अन्य पुस्तकें या लोग—परमेश्वर की हर चीज़ और उसके कार्य की संपूर्णता को स्पष्ट कर सकती है; बाइबल स्वर्ग के कार्य को पृथ्वी पर ला सकती है; और बाइबल युगों का आरंभ और अंत दोनों कर सकती है। इन धारणाओं के कारण लोगों का पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने की ओर कोई झुकाव नहीं होता। अतः अतीत में बाइबल लोगों के लिए चाहे जितनी मददगार रही हो, वह परमेश्वर के नवीनतम कार्य के लिए एक बाधा बन गई है। बाइबल के बिना ही लोग अन्यत्र परमेश्वर के पदचिह्न खोज सकते हैं, किंतु आज उसके पदचिह्न बाइबल द्वारा “सीमित” कर दिए गए हैं और उसके नवीनतम कार्य को फैलाना दोगुना कठिन और एक दुःसाध्य संघर्ष बन गया है। यह सब बाइबल के प्रसिद्ध अध्यायों एवं उक्तियों, और साथ ही बाइबल की अनगिनत भविष्यवाणियों की वजह से है। बाइबल लोगों के मन में एक आदर्श बन चुकी है, वह उनके मस्तिष्क में एक पहेली बन चुकी है, और वे यह विश्वास करने में सर्वथा असमर्थ हैं कि परमेश्वर बाइबल के बाहर भी काम कर सकता है, वे यह विश्वास करने में असमर्थ हैं कि लोग बाइबल के बाहर भी परमेश्वर को पा सकते हैं, और यह विश्वास करने में तो वे बिल्कुल ही असमर्थ हैं कि परमेश्वर अंतिम कार्य में बाइबल से प्रस्थान कर सकता है और नए सिरे से शुरुआत कर सकता है। यह लोगों के लिए अचिंत्य है; वे इस पर विश्वास नहीं कर सकते, और न ही वे इसकी कल्पना कर सकते हैं। लोगों द्वारा परमेश्वर के अधिक नए कार्य को स्वीकार करने में बाइबल एक बहुत बड़ी बाधा बन गई है और उसने परमेश्वर के अधिक नए कार्य को फैलाना कठिन बना दिया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
241. बाइबल वास्तव में किस प्रकार की पुस्तक है? पुराना विधान व्यवस्था के युग के दौरान किया गया परमेश्वर का कार्य है। बाइबल के पुराने विधान में व्यवस्था के युग के दौरान किया गया यहोवा का समस्त कार्य और उसका सृष्टि के निर्माण का कार्य दर्ज है। इसमें यहोवा द्वारा किया गया समस्त कार्य दर्ज है, और वह अंततः मलाकी की पुस्तक के साथ यहोवा के कार्य का वृत्तांत समाप्त करता है। पुराने विधान में परमेश्वर द्वारा किए गए दो तरह के कार्य दर्ज हैं : एक सृष्टि की रचना का कार्य, और दूसरा व्यवस्था की आज्ञा देना। दोनों ही यहोवा द्वारा किए गए कार्य थे। व्यवस्था का युग यहोवा परमेश्वर के नाम से किए गए कार्य का प्रतिनिधित्व करता है; यह मुख्यतः यहोवा के नाम से किए गए कार्य की समग्रता है। इस प्रकार, पुराने विधान में यहोवा का कार्य दर्ज है। नए विधान में यीशु का कार्य दर्ज है, वह कार्य जिसे मुख्यतः यीशु के नाम से किया गया था। यीशु के नाम का महत्व और उसके द्वारा किया गया कार्य अधिकांशतः नए विधान में दर्ज हैं। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा ने इस्राएल में मंदिर और वेदी का निर्माण किया, उसने पृथ्वी पर इस्राएलियों के जीवन का मार्गदर्शन कर साबित किया कि वे उसके चुने हुए लोग हैं, यह उसके द्वारा पृथ्वी पर चुने गए लोगों का ऐसा पहला समूह है जो उसके इरादों के अनुरूप है, वह पहला समूह जिसकी उसने व्यक्तिगत रूप से अगुआई की। इस्राएल के बारह कबीले यहोवा के चुने हुए पहले लोग थे, इसलिए उसने व्यवस्था के युग के यहोवा के कार्य का समापन हो जाने तक हमेशा उन पर कार्य किया। कार्य का दूसरा चरण नए विधान के अनुग्रह के युग का कार्य था, और उसे यहूदी लोगों के बीच, इस्राएल के बारह कबीलों में से एक के बीच किया गया था। उस कार्य का दायरा छोटा था, क्योंकि यीशु देहधारी हुआ परमेश्वर था। यीशु ने केवल यहूदिया की पूरी धरती पर काम किया और सिर्फ साढ़े तीन वर्षों का काम किया; इस प्रकार, जो कुछ नए विधान में दर्ज है, वह पुराने विधान में दर्ज कार्य की मात्रा से बहुत कम है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
242. बाइबल इतिहास की पुस्तक है। निस्संदेह, उसमें नबियों की कुछ भविष्यवाणियाँ भी शामिल हैं, और वे भविष्यवाणियाँ किसी भी मायने में इतिहास नहीं हैं। बाइबल में कई भाग शामिल हैं—उसमें केवल भविष्यवाणियाँ ही नहीं हैं या केवल यहोवा का कार्य ही नहीं है और न ही उसमें मात्र पौलुस की पत्रियाँ हैं। तुम्हें ज्ञात होना चाहिए कि बाइबल में कितने भाग शामिल हैं; पुराने विधान में उत्पत्ति, निर्गमन शामिल हैं..., और उसमें नबियों द्वारा लिखी गई भविष्यवाणियों की पुस्तकें भी हैं। अंत में, पुराना विधान मलाकी की पुस्तक के साथ समाप्त होता है। इसमें व्यवस्था के युग का कार्य दर्ज किया गया है, जिसकी अगुआई यहोवा द्वारा की गई थी; उत्पत्ति से लेकर मलाकी की पुस्तक तक, यह व्यवस्था के युग के समस्त कार्य का समग्र अभिलेख है। अर्थात्, पुराने विधान में वह सब कुछ दर्ज है, जिसे उन लोगों द्वारा अनुभव किया गया था, जिनका व्यवस्था के युग में यहोवा द्वारा मार्गदर्शन किया गया था। पुराने विधान के व्यवस्था के युग के दौरान यहोवा ने बड़ी संख्या में नबियों को खड़ा किया ताकि वे उसके लिए भविष्यवाणी करें, विभिन्न कबीलों एवं राष्ट्रों को निर्देश दें और यहोवा द्वारा किए जाने वाले कार्य के बारे में पहले से बता दें। इन सभी खड़े किए गए लोगों को यहोवा द्वारा भविष्यवाणी की आत्मा दी गई थी। वे यहोवा के दर्शनों को देखने और उसकी वाणी सुनने में सक्षम थे; इस प्रकार, वे उसके द्वारा प्रेरित थे और उन्होंने भविष्यवाणियाँ लिखीं। उन्होंने जो कार्य किया, वह यहोवा की आवाज़ की अभिव्यक्ति था, यहोवा की भविष्यवाणी की अभिव्यक्ति था, और उस समय यहोवा का कार्य केवल आत्मा का उपयोग करके लोगों का मार्गदर्शन करना था; उसने देह धारण नहीं किया और लोगों ने उसका चेहरा बिल्कुल नहीं देखा। इस प्रकार, उसने अपना कार्य करने के लिए बहुत-से नबियों को खड़ा किया और उन्हें आकाशवाणियाँ दीं, जिन्हें उन्होंने इस्राएल के प्रत्येक कबीले और वंश को सौंप दिया। उनका कार्य भविष्यवाणी करना था और उनमें से कुछ ने उन्हें दिए गए यहोवा के निर्देश लिख लिए ताकि वे अन्य लोगों को दिखा सकें। यहोवा ने इन लोगों को भविष्यवाणी करने, भविष्य के कार्य या उस कार्य के बारे में पूर्वकथन कहने के लिए खड़ा किया था जो उस युग के दौरान अभी किया जाना था, ताकि लोग यहोवा की चमत्कारिकता एवं बुद्धि को देख सकें। भविष्यवाणी की ये पुस्तकें बाइबल की अन्य पुस्तकों से काफी अलग थीं; वे उन लोगों द्वारा बोले या लिखे गए वचन थे, जिन्हें भविष्यवाणी की आत्मा दी गई थी—उनके द्वारा, जिन्होंने यहोवा के दर्शनों या वाणी को प्राप्त किया था। भविष्यवाणी की पुस्तकों के अलावा, पुराने विधान में हर चीज़ उन अभिलेखों से बनी है, जिन्हें लोगों द्वारा तब तैयार किया गया था, जब यहोवा ने अपना काम समाप्त कर लिया था। ये पुस्तकें यहोवा द्वारा खड़े किए गए नबियों द्वारा की गई भविष्यवाणियों का स्थान नहीं ले सकतीं; उदाहरण के लिए, उत्पत्ति और निर्गमन की तुलना यशायाह की पुस्तक और दानिय्येल की पुस्तक से नहीं की जा सकती। भविष्यवाणियाँ कार्य पूरा होने से पहले की गई थीं; जबकि अन्य पुस्तकें कार्य पूरा होने के बाद लिखी गई थीं, जिसे करने में लोग समर्थ थे। उस समय के नबी यहोवा द्वारा प्रेरित थे और उन्होंने कुछ भविष्यवाणियाँ कीं, उन्होंने कई वचन बोले, और अनुग्रह के युग की चीजों, और साथ ही अंत के दिनों में संसार के विनाश—वह कार्य, जिसे करने की यहोवा की योजना थी—के बारे में भविष्यवाणी की। बाकी सभी पुस्तकों में यहोवा के द्वारा इस्राएल में किए गए कार्य को दर्ज किया गया है। इस प्रकार, जब तुम बाइबल पढ़ते हो, तो तुम मुख्य रूप से यहोवा द्वारा इस्राएल में किए गए कार्यों के बारे में पढ़ रहे होते हो; बाइबल के पुराने विधान में मुख्यतः इस्राएल का मार्गदर्शन करने का यहोवा का कार्य और मिस्र से बाहर इस्राएलियों का मार्गदर्शन करने के लिए उसके द्वारा मूसा का उपयोग, उन्हें फिरौन की बेड़ियों से छुटकारा दिलाना और उन्हें बाहर सुनसान जंगल में ले जाना, उसके बाद उनका कनान में प्रवेश और फिर इसके बाद कनान में उनके जीवन के बारे में दर्ज किया गया है। इसके अलावा सब पूरे इस्राएल में यहोवा के कार्य के अभिलेख से निर्मित है। पुराने विधान में दर्ज सब कुछ इस्राएल में यहोवा का कार्य है—यानी वह कार्य है जिसे यहोवा ने उस भूमि पर किया, जिसमें उसने आदम और हव्वा को बनाया था। जबसे परमेश्वर ने नूह के बाद आधिकारिक रूप से पृथ्वी पर लोगों की अगुआई करनी आरंभ की, तब से पुराने विधान में दर्ज सब कुछ इस्राएल का कार्य है। और उसमें इस्राएल के बाहर का कोई भी कार्य दर्ज क्यों नहीं किया गया है? क्योंकि इस्राएल की भूमि मानवजाति का पालना है और शुरुआत में, इस्राएल के अलावा कोई अन्य देश नहीं था, और यहोवा ने अन्य किसी स्थान पर कार्य नहीं किया। इस तरह, बाइबल के पुराने विधान में जो कुछ भी दर्ज है, वह केवल उस समय इस्राएल में किया गया परमेश्वर का कार्य है। नबियों द्वारा, यशायाह, दानिय्येल, यिर्मयाह और यहेज़केल द्वारा बोले गए वचन ... उनके वचन पृथ्वी पर उसके अन्य कार्य के बारे में पूर्वकथन करते हैं, वे स्वयं यहोवा परमेश्वर के कार्य का पूर्वकथन करते हैं। यह पूरी तरह से परमेश्वर से आया, यह पवित्र आत्मा का कार्य था, और नबियों की इन पुस्तकों के अलावा, बाकी हर चीज़ उस समय यहोवा के कार्य के बारे में लोगों के अनुभवों का अभिलेख है।
सृष्टि की रचना का कार्य मानवजाति के आने से पहले हुआ, किंतु उत्पत्ति की पुस्तक मानवजाति के आने के बाद ही आई; यह व्यवस्था के युग के दौरान मूसा द्वारा लिखी गई पुस्तक थी। यह आज तुम लोगों के बीच होने वाली चीज़ों के समान है : तुम उन्हें उनके होने के बाद भविष्य में लोगों को दिखाने के लिए, और भविष्य के लोगों के लिए, लिख लेते हो; जो कुछ भी तुम लोगों ने दर्ज किया, वे ऐसी चीज़ें हैं जो अतीत में घटित हुई थीं—उन्हें केवल इतिहास के रूप में पढ़ा जा सकता है। पुराने विधान में दर्ज की गई चीजें इस्राएल में यहोवा के कार्य हैं और जो कुछ नए विधान में दर्ज हैं, वे अनुग्रह के युग के दौरान यीशु के कार्य हैं; वे परमेश्वर द्वारा दो भिन्न-भिन्न युगों में किए गए कार्य के दस्तावेज हैं। पुराना विधान व्यवस्था के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य का दस्तावेजीकरण करता है, और इसलिए पुराना विधान एक इतिहास की पुस्तक है। नया विधान अनुग्रह के युग के कार्य का उत्पाद है और जब नया कार्य आरंभ हुआ, तो नया विधान भी पुराना पड़ गया, इसलिए नया विधान भी एक इतिहास की पुस्तक है। निस्संदेह, नया विधान पुराने विधान के समान सुव्यवस्थित नहीं है, न ही उसमें उतनी बातें दर्ज हैं। यहोवा द्वारा बोले गए अनेक वचनों में से सभी बाइबल के पुराने विधान में दर्ज किए गए हैं, जबकि सुसमाचार की चार पुस्तकों में यीशु के कुछ ही वचन दर्ज किए गए हैं। निस्संदेह, यीशु ने भी बहुत काम किया, किंतु उसे विस्तार से दर्ज नहीं किया गया। नए विधान में कम दर्ज किया गया है, क्योंकि यीशु ने कम काम किया; पृथ्वी पर साढ़े तीन वर्षों के दौरान किए गए उसके कार्य और प्रेरितों के कार्य की मात्रा यहोवा के कार्य से बहुत ही कम थी। और इसलिए, पुराने विधान की तुलना में नए विधान में कम पुस्तकें हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
243. नए नियम की सुसमाचार की पुस्तकें यीशु को सूली पर चढ़ाए जाने के बीस से तीस साल बाद लिखी गई थीं। उससे पहले इस्राएल के लोग केवल पुराना नियम ही पढ़ते थे। दूसरे शब्दों में, अनुग्रह के युग की शुरुआत में लोग पुराना नियम ही पढ़ते थे। नया नियम केवल अनुग्रह के युग के दौरान ही प्रकट हुआ। यीशु के काम करने के समय नया नियम मौजूद नहीं था; लोगों ने उसके कार्य को उसके पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद दर्ज किया। केवल तभी चार सुसमाचार और पौलुस व पतरस के धर्मपत्र और साथ ही प्रकाशितवाक्य की पुस्तक सामने आई। यीशु के स्वर्ग जाने के तीन सौ साल से अधिक समय के बाद आगामी पीढ़ियों ने चुनिंदा रूप से इन दस्तावेजों को उचित क्रम में एकत्र और संयोजित किया, तब जाकर बाइबल का नया नियम अस्तित्व में आया। केवल इस कार्य के पूरा होने के बाद ही नया नियम अस्तित्व में आया था; यह पहले मौजूद नहीं था। परमेश्वर ने वह सब कार्य किया था, और पौलुस और अन्य प्रेरितों ने विभिन्न स्थानों पर स्थित कलीसियाओं को बहुत-से धर्मपत्र लिखे थे। उनके बाद के लोगों ने उनके धर्मपत्रों को संयुक्त किया और पतमुस के द्वीप में यूहन्ना द्वारा देखे गए उसके सबसे बड़े दर्शन का ब्यौरा संलग्न किया, जिसमें अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के बारे में भविष्यवाणी की गई थी। लोगों ने यह क्रम बनाया था, जो आज के कथनों से अलग है। आज जो दर्ज किया जा रहा है, वह परमेश्वर के कार्य के चरणों के अनुसार है; आज लोग जिसके संपर्क में आते हैं, वह परमेश्वर द्वारा व्यक्तिगत रूप से किया जाने वाला कार्य और उसके द्वारा व्यक्तिगत रूप से बोले गए वचन हैं। तुम्हें यानी कि मनुष्यजाति को हस्तक्षेप करने की आवश्यकता नहीं है; आत्मा से सीधे आने वाले वचनों को कदम-दर-कदम व्यवस्थित किया गया है और यह व्यवस्था लोगों के अभिलेखों की व्यवस्था से अलग है। कहा जा सकता है कि जो कुछ उन्होंने दर्ज किया है, वह उनकी शिक्षा के स्तर और मानवीय काबिलियत के अनुसार था। उन्होंने जो कुछ दर्ज किया, वे मानवीय अनुभव थे और प्रत्येक के पास दर्ज करने का अपना साधन था और उनकी अपनी समझ थी और प्रत्येक अभिलेख अलग था। इसलिए, यदि तुम बाइबल की परमेश्वर के रूप में आराधना करते हो, तो तुम बहुत ही ज़्यादा नासमझ और मूर्ख हो! तुम आज के परमेश्वर के कार्य को क्यों नहीं खोजते हो? केवल परमेश्वर का कार्य ही मनुष्य को बचा सकता है। बाइबल मनुष्य को नहीं बचा सकती, लोग हज़ारों सालों तक इसे पढ़ते रह सकते हैं और फिर भी उनमें ज़रा-सा भी परिवर्तन नहीं होगा, और यदि तुम बाइबल की आराधना करते हो, तो तुम्हें पवित्र आत्मा का कार्य कभी प्राप्त नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (3)
244. बहुत से लोग मानते हैं कि बाइबल को समझना और उसकी व्याख्या कर पाना सच्चे मार्ग को पाने के समान है—परन्तु वास्तव में, क्या बात इतनी सरल है? बाइबल की इस वास्तविकता को कोई नहीं जानता कि यह परमेश्वर के कार्य के ऐतिहासिक अभिलेख और उसके कार्य के पिछले दो चरणों की गवाही से बढ़कर और कुछ नहीं है, और इससे तुम्हें परमेश्वर के कार्य के उद्देश्य की कोई समझ हासिल नहीं होती। बाइबल पढ़ने वाला हर व्यक्ति जानता है कि इसमें व्यवस्था के युग और अनुग्रह के युग के दौरान परमेश्वर के कार्य के दो चरणों को दर्ज किया गया है। पुराना नियम सृष्टि के समय से लेकर व्यवस्था के युग के अंत तक इस्राएल के इतिहास और यहोवा के कार्य करने के तरीके को लिपिबद्ध करता है। पृथ्वी पर यीशु का कार्य, जो चार सुसमाचारों में है और पौलुस का कार्य नए नियम में दर्ज हैं; क्या ये ऐतिहासिक अभिलेख नहीं हैं? अतीत की चीज़ों को आज सामने लाना उन्हें इतिहास बना देता है, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी सच्ची और यथार्थ हैं, वे हैं तो इतिहास ही—और इतिहास वर्तमान को संबोधित नहीं कर सकता, क्योंकि परमेश्वर पीछे मुड़कर इतिहास नहीं देखता! तो यदि तुम केवल बाइबल को समझते हो और परमेश्वर आज जो कार्य करना चाहता है, उसके बारे में कुछ नहीं समझते और यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो, किन्तु पवित्र आत्मा के कार्य की खोज नहीं करते, तो तुम्हें पता ही नहीं कि परमेश्वर को खोजने का क्या अर्थ है। यदि तुम इस्राएल के इतिहास का अध्ययन करने के लिए और परमेश्वर द्वारा समस्त स्वर्गों और पृथ्वी की सृष्टि के इतिहास पर शोध करने के लिए बाइबल पढ़ते हो, तो तुम परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते। किन्तु आज, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और चूँकि तुम जीवन का अनुसरण करते हो, परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण करते हो और मृत शब्दों और धर्म-सिद्धांतों या इतिहास की समझ का अनुसरण नहीं करते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के वर्तमान इरादे खोजने चाहिए और पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा की तलाश करनी चाहिए। यदि तुम पुरातत्ववेत्ता होते तो तुम बाइबल पढ़ सकते थे—लेकिन तुम नहीं हो, तुम उनमें से एक हो जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और अच्छा होगा कि तुम परमेश्वर के वर्तमान इरादों की खोज करो।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
245. यदि तुम व्यवस्था के युग के कार्य को देखना चाहते हो, और यह देखना चाहते हो कि इस्राएली किस प्रकार यहोवा के मार्ग का अनुसरण करते थे, तो तुम्हें पुराना विधान पढ़ना चाहिए; यदि तुम अनुग्रह के युग के कार्य को समझना चाहते हो, तो तुम्हें नया विधान पढ़ना चाहिए। मगर तुम अंत के दिनों के कार्य को किस प्रकार देखते हो? तुम्हें आज परमेश्वर की अगुआई स्वीकार करनी चाहिए, और आज के कार्य में प्रवेश करना चाहिए, क्योंकि यह नया कार्य है, और किसी ने पूर्व में इसे बाइबल में दर्ज नहीं किया है। आज परमेश्वर देहधारी हो चुका है और उसने चीन में अन्य चुने हुए लोगों को चुन लिया है। परमेश्वर इन लोगों पर कार्य करता है, वह पृथ्वी पर अपना काम जारी रख रहा है, और अनुग्रह के युग के कार्य से आगे जारी रख रहा है। आज का कार्य वह राह है जिस पर मनुष्य कभी नहीं चला है और ऐसा मार्ग है जिसे कभी किसी ने नहीं देखा है। यह वह कार्य है जो पहले कभी नहीं किया गया है—यह पृथ्वी पर परमेश्वर का नवीनतम कार्य है। इस प्रकार, जो कार्य पहले कभी नहीं किया गया, वह इतिहास नहीं है, क्योंकि अभी तो अभी है, और वह अभी अतीत नहीं बना है। लोग नहीं जानते कि परमेश्वर ने पृथ्वी पर और इस्राएल के बाहर पहले से बड़ा और नया काम किया है, जो पहले ही इस्राएल के दायरे के बाहर और नबियों के पूर्वकथनों के पार जा चुका है, वह भविष्यवाणियों के बाहर नया और अद्भुत, और इस्राएल के परे नवीनतर कार्य है, और ऐसा कार्य, जिसकी लोग न तो थाह ले सकते हैं और न ही उसकी कल्पना कर सकते हैं। बाइबल ऐसे कार्य के सुस्पष्ट अभिलेखों को कैसे समाविष्ट कर सकती है? कौन आज के कार्य के प्रत्येक अंश को, बिना किसी चूक के, अग्रिम रूप से दर्ज कर सकता है? कौन इस अधिक महान, अधिक बुद्धिमत्तापूर्ण कार्य को, जो परंपरा के विरुद्ध जाता है, उस पुस्तक में दर्ज कर सकता है जो इतनी पुरानी है कि एकदम घिसी-पिटी हो चुकी है? वर्तमान कार्य इतिहास नहीं है, और इसलिए, यदि तुम आज के नए पथ पर चलना चाहते हो, तो तुम्हें बाइबल से विदा लेनी चाहिए, तुम्हें बाइबल की भविष्यवाणियों या इतिहास की पुस्तकों के परे जाना चाहिए। केवल तभी तुम नए मार्ग पर उचित तरीके से चल पाओगे, और केवल तभी तुम एक नए राज्य और नए कार्य में प्रवेश कर पाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि आज तुमसे बाइबल न पढ़ने के लिए क्यों कहा जा रहा है, क्यों एक अन्य कार्य है जो बाइबल से अलग है, क्यों परमेश्वर बाइबल में कोई अधिक नवीन और अधिक विस्तृत अभ्यास नहीं खोजता; इसके बजाय, बाइबल के बाहर अधिक प्रतापी कार्य क्यों है। यही सब है, जो तुम लोगों को समझना चाहिए। तुम्हें पुराने और नए कार्य के बीच का अंतर जानना चाहिए, और भले ही तुम बाइबल को न पढ़ते हो, फिर भी तुम्हें उसका गहन-विश्लेषण करने में सक्षम होना चाहिए; यदि नहीं, तो तुम अभी भी बाइबल की आराधना करोगे, और तुम्हारे लिए नए कार्य में प्रवेश करना और नए परिवर्तनों से गुजरना कठिन होगा। जब एक उच्चतर मार्ग मौजूद है, तो फिर निम्न, पुराने मार्ग का अध्ययन क्यों करते हो? जब यहाँ अधिक नवीन कथन और अधिक नया कार्य उपलब्ध है, तो अभी भी पुराने ऐतिहासिक अभिलेखों के मध्य क्यों जीते हो? नए कथन तुम्हारा भरण-पोषण कर सकते हैं, जिससे साबित होता है कि यह नया कार्य है; पुराने अभिलेख तुम्हें तृप्त नहीं कर सकते या तुम्हारी वर्तमान आवश्यकताएँ पूरी नहीं कर सकते, जिससे साबित होता है कि वे इतिहास हैं और वर्तमान कार्य नहीं हैं। उच्चतम मार्ग नवीनतम कार्य है, और नए कार्य के साथ, भले ही अतीत का मार्ग कितना भी ऊँचा हो, वह सिर्फ इतिहास है जिसे लोग पीछे मुड़कर देख रहे हैं, और भले ही संदर्भ के रूप में उसका कितना भी महत्व हो, वह फिर भी एक पुराना मार्ग है। भले ही वह “पवित्र पुस्तक” में दर्ज किया गया हो, फिर भी पुराना मार्ग इतिहास है; भले ही ऐसा एक भी पृष्ठ नहीं है जो इसे “पवित्र पुस्तक” में दर्ज करता हो, फिर भी नया मार्ग वर्तमान मार्ग है। यह मार्ग तुम्हें बचा सकता है, और यह मार्ग तुम्हें बदल सकता है, क्योंकि यह पवित्र आत्मा का कार्य है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
246. तुम सभी लोगों को बाइबल को समझना चाहिए—यह कार्य परम आवश्यक है! आज तुम्हें बाइबल को पढ़ने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें कुछ भी नया नहीं है; सब कुछ पुराना है। बाइबल एक इतिहास की पुस्तक है और यदि तुमने अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान को खाया और पीया होता और यदि तुम अनुग्रह के युग के दौरान पुराने विधान के समय में जो अपेक्षित था, उसे व्यवहार में लाए होते, तो यीशु ने तुम्हें अस्वीकार कर दिया होता और तुम्हारी निंदा की होती; यदि तुमने पुराने विधान को यीशु के कार्य में लागू किया होता, तो तुम एक फरीसी होते। यदि आज तुम पुराने और नए विधान को खाने और पीने के लिए एक-साथ रखोगे और अभ्यास करोगे, तो आज का परमेश्वर तुम्हारी निंदा करेगा; तुम पवित्र आत्मा के आज के कार्य में पिछड़ गए होगे! यदि तुम पुराने विधान और नए विधान को खाते और पीते हो, तो तुम पवित्र आत्मा की धारा के बाहर हो! यीशु के समय में, यीशु ने अपने भीतर पवित्र आत्मा के कार्य के अनुसार यहूदियों की और उन सबकी अगुआई की थी, जिन्होंने उस समय उसका अनुसरण किया था। उसने जो कुछ किया, उसमें उसने बाइबल को आधार नहीं बनाया, बल्कि वह अपने कार्य के अनुसार बोला; उसने इस पर कोई ध्यान नहीं दिया कि बाइबल क्या कहती है, और न ही उसने अपने अनुयायियों की अगुआई करने के लिए बाइबल में कोई मार्ग ढूँढ़ा। ठीक अपना कार्य आरंभ करने के समय से ही उसने पश्चात्ताप के मार्ग का प्रचार किया—एक ऐसा शब्द, जिसका पुराने विधान की असंख्य भविष्यवाणियों में बिल्कुल भी उल्लेख नहीं किया गया था। उसने न केवल बाइबल के अनुसार कार्य नहीं किया, बल्कि एक अधिक नए मार्ग की अगुआई भी की और अधिक नया कार्य किया। उपदेश देते समय उसने कभी बाइबल का उल्लेख नहीं किया। व्यवस्था के युग के दौरान, बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने के उसके चमत्कार करने में कभी कोई सक्षम नहीं हो पाया था। इसी तरह उसका कार्य, उसकी शिक्षाएँ, उसके भाषण का अधिकार और सामर्थ्य भी व्यवस्था के युग में किसी भी मनुष्य से परे थी। यीशु ने मात्र अपना अधिक नया काम किया, और भले ही बहुत-से लोगों ने बाइबल का उपयोग करते हुए उसकी निंदा की—और यहाँ तक कि उसे सलीब पर चढ़ाने के लिए पुराने विधान का उपयोग किया—फिर भी उसका कार्य पुराने विधान से आगे निकल गया; यदि ऐसा न होता, तो लोग उसे सलीब पर क्यों चढ़ाते? क्या यह इसलिए नहीं था, क्योंकि पुराने विधान में उसकी शिक्षाओं और बीमारों को चंगा करने और दुष्टात्माओं को निकालने की उसकी सामर्थ्य के बारे में कुछ नहीं कहा गया था? उसका कार्य एक अधिक नए मार्ग की अगुआई करने के लिए था, वह जानबूझकर बाइबल के विरुद्ध लड़ाई करने या जानबूझकर पुराने विधान को अनावश्यक बना देने के लिए नहीं था। वह केवल अपनी सेवकाई करने और उन लोगों के लिए नया कार्य लाने के लिए आया था, जो उसके लिए लालायित थे और उसे खोजते थे। वह पुराने विधान की व्याख्या करने या उसके कार्य का समर्थन करने के लिए नहीं आया था। उसका कार्य व्यवस्था के युग को लगातार विकसित होने देने के लिए नहीं था। उसने इस बात पर कोई विचार नहीं किया कि बाइबल उसके कार्य का आधार थी या नहीं, बल्कि वह तो केवल वही कार्य करने के लिए आया था, जो उसे करना ही था; इसलिए, उसने पुराने विधान की भविष्यवाणियों की व्याख्या नहीं की, न ही उसने पुराने विधान के व्यवस्था के युग के वचनों के अनुसार कार्य किया। उसने इस बात को नज़रअंदाज़ किया कि पुराने विधान में क्या कहा गया है, उसने इस बात की परवाह नहीं की कि पुराना विधान उसके कार्य से सहमत है या नहीं, और उसने इस बात की परवाह नहीं की कि लोग उसके कार्य के बारे में क्या जानते हैं या कैसे उसकी निंदा करते हैं। वह बस वह कार्य करता रहा जो उसे करना चाहिए था, भले ही बहुत-से लोगों ने उसकी निंदा करने के लिए पुराने विधान के नबियों के पूर्वकथनों का उपयोग किया। लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ, मानो उसके कार्य का कोई आधार नहीं था, और उसमें बहुत-कुछ ऐसा था, जो पुराने विधान के अभिलेखों से मेल नहीं खाता था। क्या यह मनुष्य की भ्रामकता नहीं थी? क्या परमेश्वर को अपने कार्य पर विनियम लागू करने की आवश्यकता है? और क्या परमेश्वर के कार्य का नबियों के पूर्वकथनों के अनुसार होना आवश्यक है? आखिरकार कौन बड़ा है : परमेश्वर या बाइबल? परमेश्वर को बाइबल के अनुसार कार्य करना क्यों आवश्यक है? क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर को बाइबल से आगे निकलने का कोई अधिकार न हो? क्या परमेश्वर बाइबल से दूर नहीं जा सकता और अन्य काम नहीं कर सकता? यीशु और उसके शिष्यों ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया? यदि उसे सब्त के अनुसार और पुराने विधान की आज्ञाओं के अनुसार अभ्यास करना था, तो आने के बाद यीशु ने सब्त का पालन क्यों नहीं किया, बल्कि इसके बजाय क्यों उसने पाँव धोए, सिर ढका, रोटी तोड़ी और दाखरस पिया? क्या यह सब पुराने विधान की आज्ञाओं में अनुपस्थित नहीं है? यदि यीशु पुराने विधान का पालन करता था, तो उसने इन विनियमों को क्यों तोड़ा? तुम्हें पता होना चाहिए कि पहले कौन आया, परमेश्वर या बाइबल! सब्त का प्रभु होते हुए, क्या वह बाइबल का भी प्रभु नहीं हो सकता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (1)
247. सभी यहूदी पुराने नियम पढ़ते थे और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरणी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर इस भविष्यवाणी को भलीभाँति जानते हुए भी उन्होंने यीशु को क्यों सताया? क्या ऐसा उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं हुआ? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उस भविष्यवाणी से भिन्न था जो वे नर शिशु के बारे में जानते थे; और आज लोग परमेश्वर को इसलिए अस्वीकार करते हैं क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार समान नहीं है? क्या तुम बिना अपवाद के पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को स्वीकार कर सकते हो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह धारा सही है और तुम्हें बिना किसी आशंका के इसे स्वीकार कर लेना चाहिए; और क्या स्वीकार करना है, इसे लेकर तुम्हें चयन नहीं करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपनी अंतर्दृष्टि का अधिक प्रयोग करने और उसके प्रति ज्यादा सावधानी बरतने का प्रयास करते हो, तो क्या यह अनावश्यक नहीं है? तुम्हें बाइबल से और अधिक प्रमाण नहीं खोजने चाहिए; बल्कि निरपवाद रूप से पवित्र आत्मा का कार्य स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसकी जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हें मुझे लेकर और सबूत नहीं खोजने चाहिए, बल्कि तुम्हें यह भेद पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभदायक हूँ, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में और अधिक अकाट्य सबूत प्राप्त हो जाएँ, फिर भी ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते। तुम केवल बाइबल के दायरे में ही रहते हो, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई थी कि एक नर शिशु जन्म लेगा, मगर कोई इसकी थाह नहीं पा सका कि किस पर यह भविष्यवाणी खरी उतरेगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता था, और यही कारण था कि फरीसियों ने यीशु का प्रतिरोध किया। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हित में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं, दो पूरी तरह से अलग, परस्पर असंगत प्राणी हैं। उस समय, यीशु ने अपने शिष्यों को बस इन विषयों पर अनुग्रह के युग के धर्मोपदेशों की एक श्रृंखला दी कि अनुग्रह के युग में अभ्यास कैसे करें, सभा कैसे करें, प्रार्थना में याचना कैसे करें, और दूसरों से कैसे व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल इस बारे में बोला कि शिष्य और उस समय जो लोग उसका अनुसरण करते थे, कैसे अभ्यास करें। उस समय उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम की व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, उसने सिर्फ यह कहा कि उस समय के लोगों को कैसे धैर्य रखना चाहिए, उन्हें कैसे बचाया जाना चाहिए, उन्हें कैसे पश्चात्ताप करना चाहिए और कैसे अपने पाप स्वीकार करने चाहिए, उन्हें कैसे सलीब धारण करना चाहिए और कैसे कष्ट सहने चाहिए। उसने कभी इस बारे में बात नहीं की कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए, या उसे परमेश्वर के इरादे पूरे करने का किस प्रकार प्रयास करना चाहिए। ऐसे में, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना बेतुका नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से स्पष्ट रूप से देख सकता था?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?
248. आज लोग हमेशा यह सोचते हैं कि बाइबल परमेश्वर है और परमेश्वर बाइबल है। इसलिए वे यह भी विश्वास करते हैं कि बाइबल के वचन ही वे वचन हैं, जिन्हें परमेश्वर ने बोला था और कि वे सब परमेश्वर द्वारा बोले गए वचन थे। परमेश्वर के सभी विश्वासी यहाँ तक सोचते हैं कि यद्यपि पुराने और नए नियम की सभी छियासठ पुस्तकें लोगों द्वारा लिखी गई थीं, फिर भी वे सभी परमेश्वर की अभिप्रेरणा द्वारा दी गई थीं, और वे पवित्र आत्मा के कथनों के अभिलेख हैं। यह मनुष्य की विकृत समझ है, और यह तथ्यों से पूरी तरह मेल नहीं खाती। वास्तव में, भविष्यवाणियों की पुस्तकों को छोड़कर, पुराने नियम का अधिकांश भाग ऐतिहासिक अभिलेख है। नए नियम के कुछ धर्मपत्र लोगों के व्यक्तिगत अनुभवों से आए हैं, और कुछ पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से आए हैं; उदाहरण के लिए, पौलुस के धर्मपत्र मनुष्य के कार्य से उत्पन्न हुए थे, वे सभी पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता के परिणाम थे, और वे कलीसियाओं के लिए लिखे गए थे, और वे कलीसियाओं के भाई-बहनों के लिए समझाने-बुझाने और प्रोत्साहन के वचन थे। वे पवित्र आत्मा द्वारा बोले गए वचन नहीं थे—पौलुस पवित्र आत्मा की ओर से नहीं बोल सकता था, और न ही वह कोई नबी था, और उसने उन दर्शनों को तो बिल्कुल नहीं देखा था जिन्हें यूहन्ना ने देखा था। उसके धर्मपत्र इफिसुस, कुरिंथुस और गलातिया की कलीसियाओं, और उस समय की अन्य कलीसियाओं के लिए लिखे गए थे। और इस प्रकार, नए नियम में पौलुस के धर्मपत्र वे धर्मपत्र हैं, जिन्हें पौलुस ने कलीसियाओं के लिए लिखा था, और वे पवित्र आत्मा की अभिप्रेरणाएँ नहीं हैं, न ही वे पवित्र आत्मा के प्रत्यक्ष कथन हैं। वे महज प्रोत्साहन, दिलासा और प्रेरणा के वचन हैं, जिन्हें उसने अपने कार्य के दौरान कलीसियाओं के लिए लिखा था। इस प्रकार वे पौलुस के उस समय के अधिकांश कार्य के अभिलेख भी हैं। वे प्रभु में विश्वास करने वाले सभी भाई-बहनों के लिए लिखे गए थे और ताकि उस समय की कलीसियाओं के भाई-बहन उसकी सलाह को सुनें और प्रभु यीशु द्वारा बताए गए पश्चात्ताप के मार्ग का अनुसरण करें। किसी भी तरह से पौलुस ने यह नहीं कहा कि, चाहे वे उस समय की कलीसियाएँ हों या भविष्य की, सभी को उसके द्वारा लिखी गई चीज़ों को खाना और पीना चाहिए, न ही उसने कहा कि उसके सभी वचन परमेश्वर से आए हैं। उस समय की कलीसियाओं की परिस्थितियों के अनुसार, बात बस इतनी थी कि उसने भाई-बहनों के साथ संगति की थी और उन्हें प्रोत्साहित किया था, उन्हें उनकी आस्था में प्रेरित किया था और उसने बस लोगों में प्रचार किया था या उन्हें स्मरण दिलाया था और उन्हें प्रोत्साहित किया था। उसके वचन उसके स्वयं के दायित्व पर आधारित थे, और उसने इन वचनों के जरिये लोगों को सहारा दिया था। उसने उस समय की कलीसियाओं के प्रेरित का कार्य किया था, वह एक कार्यकर्ता था जिसे प्रभु यीशु द्वारा इस्तेमाल किया गया था, इस प्रकार उसे कलीसियाओं की जिम्मेदारी लेनी थी, कलीसियाओं का कार्य सँभालना था और भाई-बहनों की दशाओं के बारे में जानना था—और इसी कारण उसने प्रभु में विश्वास करने वाले सभी भाई-बहनों के लिए धर्मपत्र लिखे थे। उसके सभी वचन जो लोगों के लिए शिक्षाप्रद और सकारात्मक थे, वे सही थे, किंतु वे पवित्र आत्मा के कथनों का प्रतिनिधित्व नहीं करते थे और वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते थे। यदि लोग किसी व्यक्ति के अनुभवों के अभिलेखों और किसी व्यक्ति के धर्मपत्रों को पवित्र आत्मा द्वारा कलीसियाओं को बोले गए वचन मान लें, तो यह एक बेहद गलत समझ और जबरदस्त ईश-निंदा है! यह पौलुस द्वारा कलीसियाओं के लिए लिखे गए धर्मपत्रों के संबंध में विशेष रूप से सत्य है, क्योंकि उसके धर्मपत्र उस समय प्रत्येक कलीसिया की परिस्थितियों और उनकी स्थिति के आधार पर भाइयों एवं बहनों के लिए लिखे गए थे, और वे प्रभु में विश्वास करने वाले भाइयों एवं बहनों को प्रेरित करने के लिए थे, ताकि वे प्रभु यीशु का अनुग्रह प्राप्त कर सकें। उसके धर्मपत्र उस समय के भाइयों एवं बहनों को जाग्रत करने के लिए थे। ऐसा कहा जा सकता है कि यह उसका स्वयं का दायित्व था, और यह वह दायित्व भी था, जो उसे पवित्र आत्मा द्वारा दिया गया था; आखिरकार, वह एक प्रेरित था जिसने उस समय की कलीसियाओं की अगुआई की थी और कलीसियाओं के लिए धर्मपत्र लिखना और उन्हें प्रोत्साहित करना उसकी जिम्मेदारी थी। उसकी पहचान मात्र काम करने वाले एक प्रेरित की थी, वह मात्र एक प्रेरित था जिसे परमेश्वर द्वारा भेजा गया था, वह नबी नहीं था और न ही भविष्यवक्ता था। उसके लिए उसका अपना कार्य और भाई-बहनों का जीवन अत्यधिक महत्वपूर्ण था। इस प्रकार, वह पवित्र आत्मा की ओर से नहीं बोल सकता था और उसके वचन पवित्र आत्मा के वचन नहीं थे, उन्हें परमेश्वर के वचन तो बिल्कुल भी नहीं कहा जा सकता, क्योंकि वह एक सृजित प्राणी से बढ़कर कुछ नहीं था और वह देहधारी परमेश्वर तो निश्चित रूप से नहीं था। उसकी पहचान यीशु के समान नहीं थी। यीशु के वचन पवित्र आत्मा के वचन थे, वे परमेश्वर के वचन थे, क्योंकि उसकी पहचान मसीह—परमेश्वर के पुत्र की थी। पौलुस को उसके बराबर कैसे माना जा सकता है? यदि लोग पौलुस जैसे लोगों के धर्मपत्रों या शब्दों को पवित्र आत्मा के कथन मान लेते हैं और उनकी परमेश्वर के रूप में आराधना करते हैं, तो सिर्फ यह कहा जा सकता है कि उनमें भेद पहचानने की क्षमता का बहुत अभाव है। और अधिक गंभीर शब्दों में कहा जाए तो, क्या यह स्पष्ट रूप से ईश-निंदा नहीं है? कोई इंसान परमेश्वर की ओर से कैसे बोल सकता है? और लोग एक इंसान के धर्मपत्रों के अभिलेखों और उसके द्वारा बोले गए वचनों के सामने इस तरह कैसे झुक सकते हैं, मानो वे कोई पवित्र पुस्तक या स्वर्गिक पुस्तक हों? क्या परमेश्वर के वचन किसी इंसान के द्वारा बस यूँ ही बोले जा सकते हैं? कोई इंसान परमेश्वर की ओर से कैसे बोल सकता है? तो तुम क्या कहते हो—क्या वे धर्मपत्र, जिन्हें उसने कलीसियाओं के लिए लिखा था, उसके स्वयं के विचारों से दूषित नहीं हो सकते? वे उन चीजों से दूषित कैसे नहीं हो सकते जो उसके अपने विचारों से आए थे? उसने अपने व्यक्तिगत अनुभवों और अपने ज्ञान के आधार पर कलीसियाओं के लिए धर्मपत्र लिखे थे। उदाहरण के लिए, पौलुस ने गलातियाई कलीसियाओं को एक धर्मपत्र लिखा, जिसमें एक निश्चित राय थी, और पतरस ने दूसरा धर्मपत्र लिखा, जिसमें दूसरा विचार था। उनमें से कौन-सा पवित्र आत्मा से आया था? कोई निश्चित तौर पर नहीं कह सकता। इस प्रकार, सिर्फ इतना कहा जा सकता है कि उन दोनों ने कलीसियाओं के लिए दायित्व वहन किया था, फिर भी उनके पत्र उनके आध्यात्मिक कद का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे भाइयों एवं बहनों के लिए उनके पोषण एवं समर्थन का, और कलीसियाओं के प्रति उनके दायित्व का प्रतिनिधित्व करते हैं, और वे केवल मनुष्य के कार्य का प्रतिनिधित्व करते हैं; वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा के नहीं थे। यदि तुम कहते हो कि उसके धर्मपत्र पवित्र आत्मा के वचन हैं, तो तुम बेतुके हो, और तुम ईश-निंदा कर रहे हो! पौलुस के धर्मपत्र और नए नियम के अन्य धर्मपत्र बहुत हाल की आध्यात्मिक हस्तियों के संस्मरणों के बराबर हैं : वे वाचमैन नी की पुस्तकों या लॉरेंस आदि के अनुभवों के समतुल्य हैं। सीधी-सी बात है कि हाल ही की आध्यात्मिक हस्तियों की पुस्तकों को नए नियम में संकलित नहीं किया गया है, फिर भी इन लोगों का सार एकसमान था : वे पवित्र आत्मा द्वारा एक निश्चित अवधि के दौरान इस्तेमाल किए गए लोग थे, और वे सीधे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते थे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (3)
249. आज, तुम लोगों में से कौन यह कहने का साहस कर सकता है कि पवित्र आत्मा के द्वारा उपयोग किए गए लोगों द्वारा कहे गए सभी वचन पवित्र आत्मा से आये थे? क्या किसी में ऐसी चीज़ें कहने का साहस है? यदि तुम ऐसी चीज़ें कहते हो, तो फिर क्यों एज्रा की भविष्यवाणी की पुस्तक को हटा दिया गया था, और क्यों यही उन प्राचीन संतों और भविष्यवक्ताओं की पुस्तकों के साथ किया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आयी थीं, तो तुम लोग क्यों ऐसे मनमाने चुनाव करने का साहस करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य को चुनने के योग्य हो? इस्राएल की बहुत सारी कहानियों को भी हटा दिया गया था। और यदि तुम मानते हो कि अतीत के ये सभी लेख पवित्र आत्मा से आये, तो फिर क्यों कुछ पुस्तकों को हटा दिया गया था? यदि वे सभी पवित्र आत्मा से आये, तो उन सब को सुरक्षित रखा जाना चाहिए था, और पढ़ने के लिए कलीसियाओं के भाइयों और बहनों को भेजा जाना चाहिए था, उन्हें मानवीय इच्छा के अनुसार मनमाने ढंग से चुना या नामंज़ूर नहीं किया जाना चाहिए था—केवल ऐसा करना ही सही होता। यह कहना कि पौलुस और यूहन्ना के अनुभव उनकी व्यक्तिगत अंतर्दृष्टियों के साथ घुल-मिल गए थे इसका यह मतलब नहीं है कि उनका अनुभवजन्य ज्ञान शैतान से आया था, बल्कि बात केवल इतनी है कि उनके पास ऐसी चीज़ें थीं जो उनके व्यक्तिगत अनुभवों और अंतर्दृष्टियों से आई थीं। उनका ज्ञान उस समय के उनके वास्तविक अनुभवों की पृष्ठभूमि पर आधारित था। कौन आत्मविश्वास के साथ कह सकता था कि यह सब पवित्र आत्मा से आया था? यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आए, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना में से प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ भिन्न कहा? यदि तुम लोग इस पर विश्वास नहीं करते हो, तो फिर तुम बाइबल के विवरणों में देखो कि किस प्रकार पतरस ने प्रभु को तीन बार नकारा था : वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक की अपनी विशेषताएँ हैं। बहुत-से अज्ञानी लोग कहते हैं, “देहधारी परमेश्वर भी एक मनुष्य है, तो क्या जो वचन वह कहता है, वे पूरी तरह से पवित्र आत्मा से आ सकते हैं? जब पौलुस और यूहन्ना के शब्द मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए थे, तो क्या जिन वचनों को वो कहता है वे वास्तव में मानवीय इच्छा के साथ मिले हुए नहीं हैं?” जो लोग ऐसी बातें करते हैं वे अन्धे और अज्ञानी हैं! चारों सुसमाचारों को ध्यान से पढ़ो : यीशु ने जो कहा और किया, उसके बारे में प्रत्येक व्यक्ति का विवरण एक-दूसरे से लगभग पूरी तरह भिन्न है और प्रत्येक लेखक का अपना दृष्टिकोण है। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था, वह सब पवित्र आत्मा से आया, तो यह सब एक समान और सुसंगत होना चाहिए। तो फिर उनमें विसंगतियाँ क्यों हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है जो इसे देखने में असमर्थ है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पदवियों और पहचान के संबंध में
250. नए नियम में मत्ती का सुसमाचार यीशु की वंशावली दर्ज करता है। प्रारंभ में वह कहता है कि यीशु अब्राहम और दाऊद का वंशज और यूसुफ का पुत्र था; आगे वह कहता है कि वह पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और कुँआरी से जन्मा था—जिसका अर्थ है कि वह यूसुफ का पुत्र या अब्राहम और दाऊद का वंशज नहीं था। यद्यपि वंशावली यीशु का संबंध यूसुफ से जोड़ने पर ज़ोर देती है। आगे वंशावली उस प्रक्रिया को दर्ज करना प्रारंभ करती है, जिसके तहत यीशु का जन्म हुआ था। वह कहती है कि यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, उसका जन्म कुँआरी से हुआ था, और वह यूसुफ का पुत्र नहीं था। फिर भी वंशावली में यह साफ-साफ लिखा हुआ है कि यीशु यूसुफ का पुत्र था, और चूँकि वंशावली यीशु के लिए लिखी गई है, इसलिए वह बयालीस पीढ़ियों को दर्ज करती है। जब वह यूसुफ की पीढ़ी पर जाती है, तो वह जल्दी से कह देती है कि यूसुफ मरियम का पति था, ये वचन यह साबित करने के लिए दिए गए हैं कि यीशु अब्राहम का वंशज था। क्या यह विरोधाभास नहीं है? वंशावली साफ-साफ यूसुफ की वंश-परंपरा को दर्ज करती है, वह स्पष्ट रूप से यूसुफ की वंशावली है, किंतु मत्ती दृढ़ता से कहता है कि यह यीशु की वंशावली है। क्या यह यीशु के पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आने के तथ्य को नहीं नकारता? इस प्रकार, क्या मत्ती द्वारा दी गई वंशावली मानवीय विचार नहीं है? यह और भी ज्यादा हास्यास्पद है! इस तरह से तुम जान सकते हो कि यह पुस्तक बिल्कुल भी पूरी तरह से पवित्र आत्मा से नहीं आई थी। शायद ऐसे कुछ लोग हैं जो यह सोचते हैं कि पृथ्वी पर परमेश्वर की वंशावली अवश्य होनी चाहिए, जिसके परिणामस्वरूप वे यीशु को अब्राहम की बयालीसवीं पीढ़ी बताते हैं। यह वास्तव में हास्यास्पद है! पृथ्वी पर आने के बाद परमेश्वर की वंशावली कैसे हो सकती है? यदि तुम कहते हो कि परमेश्वर की वंशावली है, तो क्या तुम उसे सृजित प्राणियों की श्रेणी में ही शामिल नहीं कर देते? परमेश्वर पृथ्वी का नहीं है, वह सृष्टिकर्ता है, और भले ही वह देह में आ गया है, फिर भी उसका सार मनुष्य के सार जैसा नहीं है, तो तुम परमेश्वर को सृजित प्राणी के समान दर्जा कैसे दे सकते हो? अब्राहम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता; वह उस समय यहोवा के कार्य का पात्र था, वह एक वफादार सेवक मात्र था जिसे यहोवा ने योग्य पाया था और वह इस्राएल के लोगों में से एक था। वह यीशु का पूर्वज कैसे हो सकता है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (3)
251. आज मैं इस तरह से बाइबल का गहन-विश्लेषण कर रहा हूँ, लेकिन इसका यह अर्थ बिल्कुल नहीं है कि मैं इससे नफरत करता हूँ या संदर्भ के लिए इसके महत्व को नकारता हूँ। मैं तुम्हें बाइबल के अंतर्निहित मूल्य और इसकी उत्पत्ति के बारे में समझा रहा हूँ और इसे स्पष्ट कर रहा हूँ, ताकि तुम हमेशा अंधकार में न रहो। ऐसा इसलिए है क्योंकि बाइबल के बारे में लोगों के इतने अधिक विचार हैं और उनमें से अधिकांश गलत हैं; इस तरह बाइबल पढ़ना न केवल उन्हें वह प्राप्त करने से रोकता है जो उन्हें प्राप्त करना ही चाहिए, बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि यह उस कार्य में भी बाधा डालता है जिसे मैं करना चाहता हूँ; यह भविष्य के कार्य में अत्यधिक गड़बड़ी पैदा करता है और इसमें दोष ही दोष हैं, लाभ तो कोई है ही नहीं। इस प्रकार, मैं तुम्हें बस बाइबल के सार और बाइबल के पीछे की असली कहानी समझने के लिए कह रहा हूँ। मैं यह नहीं कह रहा हूँ कि तुम बाइबल मत पढ़ो या तुम सार्वजनिक तौर पर यह घोषणा करते फिरो कि यह मूल्यविहीन है, बल्कि मैं सिर्फ यह चाहता हूँ कि तुम्हारे पास बाइबल का सही ज्ञान और दृष्टिकोण हो। तुम्हारी दृष्टि एकतरफा न हो! यद्यपि बाइबल इतिहास की पुस्तक है जो मनुष्य के द्वारा लिखी गई थी, लेकिन इसमें कई ऐसे सिद्धांत भी लिपिबद्ध हैं जिनके अनुसार प्राचीन संत और नबी परमेश्वर की सेवा करते थे और साथ ही इसमें परमेश्वर की सेवा करने के अपेक्षाकृत हाल के दिनों के प्रेरितों के अनुभव भी दर्ज हैं—यह सब इन लोगों की वास्तविक अंतर्दृष्टि और ज्ञान था और यह सच्चे मार्ग का अनुसरण करने में इस युग के लोगों के लिए संदर्भ का काम कर सकता है। इस प्रकार, बाइबल को पढ़ने से लोग जीवन के अनेक मार्ग भी प्राप्त कर सकते हैं जो अन्य पुस्तकों में नहीं मिल सकते। ये मार्ग पवित्र आत्मा के कार्य के जीवन के मार्ग हैं जिनका अनुभव नबियों और प्रेरितों ने बीते युगों में किया था, बहुत से वचन काफी अनमोल हैं, जो लोगों की आवश्यकताओं के हिसाब से आपूर्ति कर सकते हैं। इस प्रकार, सभी लोग बाइबल पढ़ना पसंद करते हैं। क्योंकि बाइबल में इतना कुछ छिपा है, इसके प्रति लोगों के विचार महान आध्यात्मिक हस्तियों के किसी लेखन के प्रति उनके विचारों से भिन्न हैं। बाइबल पुराने और नए युग में यहोवा और यीशु की सेवा करने वाले लोगों के अनुभवों और ज्ञान का अभिलेख एवं संकलन है, और इसलिए बाद की पीढ़ियाँ इससे अत्यधिक प्रबुद्धता, रोशनी और अभ्यास करने के मार्ग प्राप्त करने में सक्षम रही हैं। बाइबल किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती के लेखन से उच्चतर है, तो उसका कारण यह है कि उनका समस्त लेखन बाइबल से ही लिया गया है, उनके समस्त अनुभव बाइबल से ही आए हैं और वे सभी बाइबल की व्याख्याएँ हैं। इसलिए, यद्यपि लोग किसी भी महान आध्यात्मिक हस्ती की पुस्तकों से पोषण प्राप्त कर सकते हैं, फिर भी वे बाइबल की ही आराधना करते हैं, क्योंकि यह उन्हें ऊँची और गहन प्रतीत होती है! यद्यपि बाइबल में पौलुस के धर्मपत्र और पतरस के धर्मपत्र जैसी जीवन के वचनों की कुछ पुस्तकों को एक साथ लाया गया है; यद्यपि ये पुस्तकें लोगों को पोषण और सहायता प्रदान कर सकती हैं, किन्तु फिर भी ये पुस्तकें अप्रचलित हैं और पुराने युग की हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे केवल एक कालखंड के लिए ही उपयुक्त हैं, चिरस्थायी नहीं हैं। क्योंकि परमेश्वर का कार्य निरन्तर विकसित हो रहा है, यह केवल पौलुस और पतरस के समय पर ही नहीं रुक सकता, यानी यह हमेशा अनुग्रह के युग में ही बना नहीं रह सकता जिसमें यीशु को सलीब पर चढ़ा दिया गया था। अतः, ये पुस्तकें केवल अनुग्रह के युग के लिए उपयुक्त हैं, अंत के दिनों के राज्य के युग के लिए नहीं। ये केवल अनुग्रह के युग के विश्वासियों को पोषण प्रदान कर सकती हैं, राज्य के युग के संतों को नहीं, और इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे कितनी अच्छी हैं, वे अब भी अप्रचलित ही हैं। यहोवा के सृष्टि के कार्य या इस्राएल के उसके कार्य के साथ भी ऐसा ही है : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि यह कार्य कितना बड़ा था, यह अब भी अप्रचलित हो जाएगा, और वह समय अब भी आएगा जब यह व्यतीत हो जाएगा। परमेश्वर का कार्य भी ऐसा ही है : चाहे यह कितना भी महान हो, किन्तु एक समय आएगा जब यह समाप्त हो जाएगा; यह न तो सृष्टि के कार्य के बीच और न ही सलीब पर चढ़ाने के कार्य के बीच हमेशा बना रह सकता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि सलीब पर चढ़ाने का कार्य कितना विश्वास दिलाने वाला था या शैतान को पराजित करने में यह कितना कारगर था, कार्य आख़िर कार्य ही है, और युग आख़िर युग ही हैं; कार्य हमेशा उसी नींव पर टिका नहीं रह सकता, न ही ऐसा हो सकता है कि समय कभी न बदले, क्योंकि सृष्टि थी और अंत के दिन भी अवश्य होंगे। यह अवश्यम्भावी है! इस प्रकार, आज नया नियम—प्रेरितों के धर्मपत्र और चार सुसमाचार—में जीवन के वचन इतिहास की पुस्तकें बन गए हैं, वे पुराने पंचांग बन गए हैं, और पुराने पंचांग लोगों को नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? चाहे ये पंचांग लोगों को जीवन प्रदान करने में कितने भी समर्थ हों, वे सलीब तक लोगों की अगुआई करने में कितने भी सक्षम हों, क्या वे पुराने नहीं हो गए हैं? क्या वे मूल्य से वंचित नहीं हैं? इसलिए, मैं कहता हूँ कि तुम्हें आँख बंद करके इन पंचांगों पर विश्वास नहीं करना चाहिए। ये अत्यधिक पुराने हैं, ये तुम्हें नए कार्य में नहीं पहुँचा सकते, ये केवल तुम्हारे ऊपर बोझ लाद सकते हैं। केवल यही नहीं कि ये तुम्हें नए कार्य में और नए प्रवेश में नहीं ले जा सकते, बल्कि ये तुम्हें पुरानी धार्मिक कलीसियाओं में ले जाते हैं—और यदि ऐसा हो, तो क्या तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में पीछे नहीं लौट रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, बाइबल के विषय में (4)
252. मैं मनुष्यों के मध्य बहुत कार्य कर चुका हूँ और इस दौरान मैंने कई वचन भी व्यक्त किए हैं। ये समस्त वचन मनुष्य के उद्धार के लिए हैं, और इसलिए व्यक्त किए गए थे, ताकि मनुष्य मेरे अनुरूप बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने थोड़े ही लोग पाए हैं, जो मेरे अनुरूप हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को नहीं सँजोता—ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुरूप नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूँ, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं किया जाता कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; बल्कि उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप से वह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुरूप बन सके। मनुष्य जो भ्रष्ट हो चुके हैं, जो शैतान के जाल में जीते हैं, वे सभी देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं जो मेरे अनुरूप हो। जो कहते हैं कि वे मेरे अनुरूप हैं, वे सब अज्ञात मूर्तियों की आराधना करते हैं। भले ही वे मेरे नाम को पवित्र मानने का दावा करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सब स्वाभाविक रूप से मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही “उपयुक्त” अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचन पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुरूप कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे एक अज्ञात परमेश्वर को जिसे उन्होंने देखा ही नहीं है और आधारभूत रूप से देख भी नहीं सकते, बाइबल की सीमाओं के भीतर परिसीमित करते हैं, वे फुरसत के समय में बाइबल निकालकर पढ़ते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापों पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत-से लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे निरे शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं, इस हद तक कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुरूपता का मार्ग या सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने का मार्ग खोजते हैं और विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। वे उस समय के यीशु के अनुरूप होने का प्रयास नहीं करते थे, बल्कि व्यवस्था के प्रत्येक अनुच्छेद के साथ इतनी गंभीरता से पेश आते थे कि—यीशु पर यह दोष लगाने के बाद कि वह पुराने नियम की व्यवस्था का पालन नहीं करता और मसीहा नहीं है—अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुरूपता के मार्ग की खोज नहीं की? वे केवल पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर ध्यान देते थे, जबकि मेरे इरादों और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि पवित्रशास्त्र के शब्दों से ढिठाई से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। अगर बात की तह में जाएँ तो वे बाइबल के ठेकेदार बन बैठे थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक शब्द का रुतबा बनाए रखने के लिए किया। इसलिए उन्होंने अपना भविष्य त्यागना और पापबलि को प्राप्त न करना पसंद किया ताकि पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुरूप न होने के कारण यीशु को मृत्यु-दंड दे सकें। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक शब्द के दास नहीं थे?
और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? वे उस मसीह को, जो सत्य को प्रकट करने आया है, इस संसार से निकाल देना ज्यादा पसंद करेंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकारना और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ाना पसंद करेंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतनी अधिक दुर्भावना से भरा है और उसकी प्रकृति मेरे प्रति इतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे में नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं मनुष्य पर अपना क्रोध बरसाता हूँ तो वह और भी अधिक मेरे अस्तित्व को नकारता है। मनुष्य शब्दों और बाइबल के साथ अनुरूपता खोजता है, फिर भी कोई भी मेरे सामने सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग खोजने नहीं आता। मैं स्वर्ग में रहूँ तो मनुष्य मेरा आदर करता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में रहूँ तो कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो मनुष्य के बीच रहता हूँ, अत्यंत महत्त्वहीन हूँ। जो लोग सिर्फ बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ एक अज्ञात परमेश्वर के अनुरूप होने की खोज करते हैं, वे मेरी दृष्टि में तुच्छ हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अथाह धन देने में सक्षम है; वे जिस परमेश्वर की पूजा करते हैं, वह ऐसा परमेश्वर है जो स्वयं को मनुष्य की दया पर रख देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य की तुच्छता शब्दों से परे है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मुझसे असीमित माँगें करते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुरूप कैसे हो सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए
253. स्वयं परमेश्वर ही जीवन और सत्य है और उसका जीवन और सत्य सह-अस्तित्व में हैं। जो लोग सत्य प्राप्त करने में असमर्थ हैं, वे निश्चित ही जीवन प्राप्त नहीं करेंगे। सत्य के मार्गदर्शन, सहारे और पोषण के बिना तुम जो कुछ भी प्राप्त करते हो वह केवल शब्द, धर्म-सिद्धांत और इससे भी अधिक मृत्यु है। परमेश्वर का जीवन सदा विद्यमान है, और उसका सत्य और जीवन साथ-साथ सह-अस्तित्व में हैं। यदि तुम सत्य का स्रोत नहीं पा सकते हो तो तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं करोगे; यदि तुम जीवन का पोषण प्राप्त नहीं कर सकते हो तो तुम्हारे पास निश्चित ही कोई सत्य नहीं होगा, और कल्पनाओं और धारणाओं के अलावा तुम्हारे संपूर्ण अस्तित्व में तुम्हारी देह—तुम्हारी दुर्गंधित देह—के सिवाय कुछ भी नहीं होगा। यह जान लो कि महज किताबों के शब्द जीवन नहीं हो सकते हैं, इतिहास के अभिलेखों को सत्य के रूप में पूजित नहीं किया जा सकता और अतीत के विनियम परमेश्वर के वर्तमान वचनों का लेखा-जोखा नहीं हो सकते हैं, और परमेश्वर पृथ्वी पर आकर मनुष्य के बीच रहकर जो वचन अभिव्यक्त करता है केवल वही सत्य हैं, जीवन हैं, परमेश्वर के इरादे हैं और उसके कार्य करने का वर्तमान तरीका हैं। यदि तुम अतीत के युगों के दौरान परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों के अभिलेखों को लेते हो और आज उनका पालन करते हो तो यह तुम्हें पुरातत्ववेत्ता बना देता है, ऐसे में तुम्हें ऐतिहासिक धरोहरों के शोध का विशेषज्ञ कहना ही सबसे उपयुक्त होगा। तुम हमेशा परमेश्वर द्वारा विगत युगों में किए गए कार्य के चिह्नों पर विश्वास करते हो, तुम केवल पूर्व में मनुष्यों के बीच कार्य करते समय छोड़ी गई परमेश्वर की परछाई में विश्वास करते हो और केवल पिछले युगों में परमेश्वर द्वारा अपने अनुयायियों को बताए गए मार्ग में विश्वास करते हो, लेकिन तुम परमेश्वर के आज के कार्य की दिशा पर विश्वास नहीं करते, परमेश्वर के आज के महिमामय मुखमंडल में विश्वास नहीं करते और परमेश्वर द्वारा वर्तमान में व्यक्त किए जा रहे सत्य के मार्ग पर विश्वास नहीं करते। इसलिए तुम निर्विवाद रूप से एक दिवास्वप्नदर्शी हो जो पूरी तरह वास्तविकता से दूर है। यदि तुम अब भी उन शब्दों से चिपके रहते हो जो मनुष्य को जीने देने में समर्थ बनाने में अक्षम हैं तो तुम एक लाइलाज सड़ी-गली लकड़ी हो, क्योंकि तुम अत्यंत रूढ़िवादी, अत्यंत हठी, अत्यंत विवेकहीन हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है
254. अंत के दिनों का मसीह जीवन लाता है, और सत्य का स्थायी और शाश्वत मार्ग लाता है। यह सत्य वह मार्ग है, जिसके द्वारा मनुष्य जीवन प्राप्त करता है, और यही एकमात्र मार्ग है जिसके द्वारा मनुष्य परमेश्वर को जानेगा और परमेश्वर द्वारा स्वीकृत किया जाएगा। यदि तुम अंत के दिनों के मसीह द्वारा प्रदान किया गया जीवन का मार्ग नहीं खोजते, तो तुम यीशु की स्वीकृति कभी प्राप्त नहीं करोगे, और स्वर्ग के राज्य के द्वार में प्रवेश करने के योग्य कभी नहीं हो पाओगे, क्योंकि तुम इतिहास की कठपुतली और कैदी दोनों ही हो। जो लोग विनियमों से, शब्दों से और इतिहास की बेड़ियों से नियंत्रित होते हैं, वे न तो कभी जीवन प्राप्त कर पाएँगे और न ही जीवन का अनंत मार्ग प्राप्त कर पाएँगे। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे जो प्राप्त करते हैं वह सिंहासन से प्रवाहित होने वाले जीवन के जल के बजाय बस मैला पानी ही है, जिससे वे हजारों सालों से चिपके हुए हैं। जिन्हें जीवन के जल की आपूर्ति नहीं की जाती, वे हमेशा मुर्दे, शैतान के खिलौने और नरक की संतानें बने रहेंगे। फिर वे कैसे परमेश्वर के दर्शन कर सकते हैं? तुम केवल अतीत को पकड़े रखने की खोज में रहते हो, स्थिर खड़े रहने और चीजों को वैसे ही रखने की कोशिश करते हो और यथास्थिति को बदलने और इतिहास को छोड़ने की खोज में नहीं रहते, इसलिए क्या तुम हमेशा परमेश्वर के विरोधी नहीं होगे? परमेश्वर के कार्य के कदम उमड़ती लहरों और घुमड़ते गर्जनों की तरह जबरदस्त और शक्तिशाली हैं—फिर भी तुम निष्क्रियता से बैठकर तबाही का इंतजार करते हो, उससे चिपके रहते हो जो पुराना है और चीजों के अपनी गोद में आ गिरने की प्रतीक्षा करते हो। इस तरह, तुम्हें मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करने वाला व्यक्ति कैसे माना जा सकता है? यह कैसे दिखा सकता है कि तुम जिस परमेश्वर को थामे हो, वह वही परमेश्वर है जो हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता? और तुम्हारी पीली पड़ चुकी किताबों के शब्द तुम्हें पार कराकर नए युग में कैसे ले जा सकते हैं? वे परमेश्वर के कार्य के चरणों को खोजने में तुम्हारी अगुआई कैसे कर सकते हैं? और वे तुम्हें ऊपर स्वर्ग में कैसे ले जा सकते हैं? जिन्हें तुम अपने हाथों में थामे हो, वे केवल शब्द हैं, जो तुम्हें केवल अस्थायी सांत्वना दे सकते हैं, वे तुम्हें जीवन देने में सक्षम सत्य नहीं हैं। धर्मशास्त्र के शब्द जिन्हें तुम पढ़ते हो, वे केवल तुम्हारी जिह्वा को समृद्ध कर सकते हैं; वे बुद्धिमानी के शब्द नहीं हैं जो मानव जीवन को जानने में तुम्हारी मदद कर सकते हों, उनके तुम्हें पूर्णता की ओर ले जाने वाला मार्ग होने की बात तो दूर रही। क्या यह विसंगति तुम्हारे लिए चिंतन का कारण नहीं है? क्या यह तुम्हें इसके भीतर समाहित रहस्यों के बारे में अंतर्दृष्टि नहीं देती है? क्या तुम अपने बल पर परमेश्वर से मिलने के लिए अपने आप को स्वर्ग भिजवाने में समर्थ हो? परमेश्वर के आए बिना, क्या तुम परमेश्वर के साथ पारिवारिक आनंद मनाने के लिए अपने आप को स्वर्ग में ले जा सकते हो? क्या तुम अभी भी स्वप्न देख रहे हो? तो मेरा उपदेश यह है कि तुम स्वप्न देखना बंद कर दो और उसकी ओर देखो जो अभी कार्य कर रहा है—देखो कि अब अंत के दिनों में मनुष्य को बचाने का कार्य कौन कर रहा है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो तुम कभी भी सत्य प्राप्त नहीं करोगे, और न ही कभी जीवन प्राप्त करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल अंत के दिनों का मसीह ही मनुष्य को अनंत जीवन का मार्ग दे सकता है