11.2. परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव पर
554. युग का समापन करने के अपने अंतिम कार्य में परमेश्वर का स्वभाव ताड़ना और न्याय का है, जिसमें वह वो सब प्रकट करता है जो अधार्मिक है, वह अनगिनत लोगों का सरेआम न्याय करता है और उन लोगों को पूर्ण बनाता है जो सच्चे दिल से उससे प्रेम करते हैं। केवल इस तरह का स्वभाव ही युग का समापन कर सकता है। अंत के दिन पहले ही आ चुके हैं। सभी चीजें अपनी किस्म के अनुसार छाँटी जाती हैं और अपनी विभिन्न खूबियों के आधार पर विभिन्न श्रेणियों में विभाजित की जाती हैं। ठीक यही वह समय है जब परमेश्वर लोगों के परिणाम और गंतव्य प्रकट करता है। यदि लोग ताड़ना और न्याय का अनुभव न करें तो उनके विद्रोहीपन और अधार्मिकता को उजागर नहीं किया जा सकता है। केवल ताड़ना और न्याय के माध्यम से ही सभी चीजों का परिणाम प्रकट किया जा सकता है। लोग जो सच में हैं वह केवल तब दिखाते हैं जब उन्हें ताड़ना दी जाती है और उनका न्याय किया जाता है। बुरे को बुरे के साथ रखा जाएगा, भले को भले के साथ, और सभी लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा। ताड़ना और न्याय के माध्यम से सभी चीजों के परिणाम प्रकट किए जाएँगे ताकि बुरे को दंडित किया जा सके और अच्छे को पुरस्कृत किया जा सके, और अनगिनत लोग परमेश्वर के प्रभुत्व के सामने आत्मसमर्पण कर लें। यह समस्त कार्य धार्मिक ताड़ना और न्याय के माध्यम से पूरा करना होगा। चूँकि लोगों की भ्रष्टता अपने शिखर पर पहुँच गई है और उनका विद्रोहीपन अत्यंत गंभीर है, इसलिए केवल परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव ही, जो मुख्यतः ताड़ना और न्याय से युक्त है और अंत के दिनों में प्रकट होता है, लोगों को पूरी तरह से परिवर्तित कर सकता है और उन्हें पूर्ण कर सकता है, बुराई को उजागर कर सकता है, और इस तरह सभी अधार्मिकों को गंभीर रूप से दंडित किया जाएगा। इसलिए इस तरह के स्वभाव में युग का महत्व निहित है। प्रत्येक नए युग के कार्य की खातिर परमेश्वर के स्वभाव का प्रकटन और खुलासा होता है। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर अपने स्वभाव को मनमाने और निरर्थक ढंग से प्रकट करता है। मान लो कि लोगों के परिणामों के प्रकट होने के अंत के दिनों में अगर परमेश्वर अभी भी लोगों पर असीम दया और करुणा बरसाता रहता और उनसे प्रेम करता रहता, उन्हें धार्मिक न्याय के अधीन करने के बजाय उनके प्रति नरमी, धैर्य और क्षमा दर्शाता रहता और उन्हें माफ करता रहता, चाहे उनके पाप कितने भी गंभीर क्यों न हों, उन्हें रत्ती भर भी धार्मिक न्याय के अधीन न करता, तो फिर परमेश्वर के समस्त प्रबंधन का समापन कब होता? कब इस तरह का कोई स्वभाव सही मंजिल की ओर मानवजाति की अगुआई करने में सक्षम होगा? यह किसी ऐसे न्यायाधीश के समान है जो लोगों के प्रति हमेशा प्रेममय होता है, एक दयालु चेहरे और सौम्य हृदय वाला प्रेममय न्यायाधीश जो लोगों से प्यार करता है चाहे उन्होंने जो भी अपराध किए हों, और उन्हें प्रेम और सहनशीलता दिखाता है चाहे वे जो भी हों—ऐसा न्यायाधीश कब न्यायोचित निर्णय पर पहुँचेगा? अंत के दिनों के दौरान केवल धार्मिक न्याय ही लोगों को उनकी किस्म के अनुसार छाँट सकता है और उन्हें एक नए क्षेत्र में ला सकता है। इस तरह से परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के धार्मिक स्वभाव के माध्यम से समस्त युग का अंत किया जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
555. मेरा नाम घर-घर में, सभी राष्ट्रों में और सभी जगहों में फैलेगा और ब्रह्मांड दुनिया में वयस्कों और बच्चों के मुख से समान रूप से घोषित किया जाएगा; यह एक परम सत्य है। मैं स्वयं अद्वितीय परमेश्वर हूँ, इससे भी अधिक मैं परमेश्वर का एकमात्र व्यक्तित्व हूँ। इससे भी अधिक, मैं, देह की समग्रता, परमेश्वर की पूर्ण अभिव्यक्ति हूँ। जो कोई मेरा भय न मानने का साहस करता है, जो कोई अपनी आँखों से मेरा विरोध करने का साहस करता है, और जो कोई अपने होंठों से मेरा विरोध करने की हिम्मत करता है, वह निश्चित रूप से मेरे शापों और कोप से मारा जाएगा (मेरे कोप के कारण शाप दिए जाएँगे)। इतना ही नहीं, जो कोई मेरे प्रति निष्ठावान अथवा संतानोचित नहीं होने का दुस्साहस करता, और जो कोई मुझसे चालबाज़ी करने का दुस्साहस करता है, वह निश्चित रूप से मेरी घृणा से मर जाएगा। मेरी धार्मिकता, प्रताप और न्याय सदा-सदा के लिए कायम रहेंगे। पहले मैं प्रेममय और दयालु था, परंतु यह मेरी पूरी दिव्यता का स्वभाव नहीं है; केवल धार्मिकता, प्रताप और न्याय ही मेरा स्वभाव हैं—स्वयं पूर्ण परमेश्वर का स्वभाव। अनुग्रह के युग में मैं प्रेममय और दयालु था। जो कार्य मुझे पूरा करना था, उसके कारण मुझमें प्रेममय-कृपालुता और दया थी; उसके बाद ऐसी चीज़ों की कोई आवश्यकता न रही (और तबसे कोई भी नहीं रही है)। यह सब धार्मिकता, प्रताप और न्याय है और यह मेरी सामान्य मानवता के साथ जुड़ी मेरी पूर्ण दिव्यता का संपूर्ण स्वभाव है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 79
556. परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को समझने के लिए व्यक्ति को पहले परमेश्वर के आनंद, गुस्से, दुख और खुशी को समझना होगा : वह किससे घृणा करता है, किसे नापसंद करता है और किससे प्यार करता है; वह किसके प्रति सहिष्णु है, किसके प्रति दयालु है, और किस प्रकार के व्यक्ति पर वह दया करता है। यह एक महत्त्वपूर्ण बिंदु है। व्यक्ति को यह भी समझना चाहिए कि परमेश्वर मनुष्य से चाहे कितना भी प्रेम क्यों न करे, वह लोगों पर चाहे कितनी भी दया और प्रेममय करुणा क्यों न बरसाए, परमेश्वर की पहचान और उसका दर्जा किसी भी व्यक्ति से अपमान सहन नहीं करता और न ही उसकी गरिमा अपमान सहन करती है। भले ही परमेश्वर लोगों से प्रेम करता है, वह उन्हें सिर पर नहीं चढ़ाता। वह लोगों को अपना प्रेम, अपनी दया और अपनी सहिष्णुता देता है लेकिन वह उन्हें कभी लाड़-प्यार से नहीं बिगाड़ता। परमेश्वर के अपने सिद्धांत और अपनी सीमाएँ हैं। तुम्हें चाहे ऐसा लगे कि परमेश्वर ने तुम्हें कितना भी प्रेम दिया है, वह प्रेम तुम्हें चाहे कितना भी गहरा क्यों न लगे, तुम्हें परमेश्वर के साथ कभी भी ऐसा व्यवहार नहीं करना चाहिए मानो वह कोई इंसान हो। यद्यपि यह सच है कि परमेश्वर लोगों के साथ अपने सबसे प्यारे प्रियजनों के रूप में व्यवहार करता है, लेकिन यदि तुम परमेश्वर को इंसान के रूप में, एक ऐसे इंसान के रूप में देखते हो जो एक सृजित प्राणी के बराबर है या एक दोस्त या मूर्तिपूजन की वस्तु के रूप में देखते हो, तो परमेश्वर अपना चेहरा तुमसे छिपा लेगा और तुम्हें त्याग देगा। यह उसका स्वभाव है और किसी भी व्यक्ति को इस मुद्दे के बारे में लापरवाह होने की अनुमति नहीं है। इसलिए, हम अक्सर परमेश्वर द्वारा अपने स्वभाव के बारे में बोले गए ऐसे शब्द देखते हैं : इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम लोगों ने कितनी यात्रा की है, तुम लोगों ने कितना काम किया है या तुम लोगों ने कितना कष्ट सहा है, यदि तुम लोग परमेश्वर के स्वभाव को नाराज करते हो तो वह तुम लोगों में से प्रत्येक को तुम्हारे किए के आधार पर प्रतिफल देगा। इसका अर्थ यह है कि परमेश्वर लोगों के साथ अपने सबसे प्यारे प्रियजनों के रूप में व्यवहार करता है, फिर भी तुम्हें परमेश्वर के साथ किसी दोस्त या रिश्तेदार के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए। परमेश्वर के साथ अपने यार-दोस्त जैसा व्यवहार मत करो। चाहे तुम्हें कितना भी लगे कि परमेश्वर तुमसे प्रेम करता है और तुम्हारे प्रति सहनशील है, तुम्हें कभी भी परमेश्वर से अपने मित्र के रूप में व्यवहार नहीं करना चाहिए। यह परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VII
557. अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता उसका अद्वितीय सार है; परमेश्वर का कोप उसका अद्वितीय स्वभाव है; परमेश्वर का प्रताप उसका अद्वितीय सार है। परमेश्वर के क्रोध के पीछे का सिद्धांत उस पहचान और हैसियत का प्रतिनिधित्व है, जिसे सिर्फ वही धारण करता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि यह स्वयं अद्वितीय परमेश्वर के सार का एक प्रतीक भी है। परमेश्वर का स्वभाव उसका अपना अंतर्निहित सार है, जो समय के साथ बिल्कुल भी नहीं बदलता है और न ही यह भौगोलिक स्थान के बदल जाने के साथ बदलता है। उसका अंतर्निहित स्वभाव उसका मौलिक सार है, वह चाहे जिस पर भी अपना कार्य करे, उसका सार नहीं बदलता और न ही उसका धार्मिक स्वभाव बदलता है। जब कोई परमेश्वर को क्रोधित करता है, तो वह अपना अंतर्निहित स्वभाव प्रकट करता है; इस समय उसके क्रोध के पीछे का सिद्धांत नहीं बदलता, और न ही उसकी अद्वितीय पहचान और दर्जा बदलते हैं। वह अपने सार में परिवर्तन के कारण या अपने स्वभाव में विभिन्न तत्त्वों के उत्पन्न होने के कारण क्रोधित नहीं होता, बल्कि इसलिए होता है क्योंकि उसके विरुद्ध मनुष्य का विरोध उसके स्वभाव को ठेस पहुँचाता है। मनुष्य द्वारा परमेश्वर को खुले तौर पर उकसाना परमेश्वर की अपनी पहचान और दर्जे के लिए एक गंभीर चुनौती है। परमेश्वर की नजर में, जब मनुष्य उसे चुनौती देता है, तब मनुष्य उससे संघर्ष कर रहा है और उसके क्रोध की परीक्षा ले रहा होता है। जब मनुष्य परमेश्वर का विरोध करता है, जब मनुष्य परमेश्वर से संघर्ष करता है, जब मनुष्य लगातार उसके क्रोध की परीक्षा लेता है, ठीक उसी समय पाप बेकाबू होकर फैल जाता है—ऐसे ही अवसरों पर परमेश्वर का कोप स्वाभाविक रूप से अपने आपको प्रकट और प्रस्तुत करेगा। इसलिए, परमेश्वर के कोप का प्रकट होना इस बात का प्रतीक है कि समस्त बुरी शक्तियाँ अस्तित्व में नहीं रहेंगी और यह इस बात का प्रतीक है कि सभी विरोधी शक्तियाँ नष्ट कर दी जाएँगी। यह परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव और उसके कोप की अद्वितीयता है। जब परमेश्वर की गरिमा और पवित्रता को चुनौती दी जाती है, जब न्याय की ताकतों को बाधित किया जाता है और मनुष्य द्वारा नहीं देखा जाता है, तो यह ठीक वही समय होता है जब परमेश्वर अपना क्रोध प्रकट करेगा। परमेश्वर के सार के कारण, पृथ्वी पर वे सभी ताकतें जो परमेश्वर से संघर्ष करती हैं, उसके प्रति शत्रुतापूर्ण हैं और उसके साथ प्रतिस्पर्धा करने की कोशिश करती हैं, वे बुरी, भ्रष्ट और अन्यायपूर्ण हैं; वे शैतान से आती हैं और शैतान की हैं। चूँकि परमेश्वर न्यायसंगत, प्रकाश का और पवित्र और निष्कलंक है, इसलिए जब परमेश्वर का क्रोध प्रकट होगा तो सभी चीजें जो बुरी, भ्रष्ट और शैतान की हैं, वे गायब हो जाएँगी।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
558. जब परमेश्वर अपना क्रोध भेजता है, तो बुरी शक्तियों को रोका जाता है, बुरी चीजों को नष्ट किया जाता है, जबकि न्यायोचित और सकारात्मक चीज़ें परमेश्वर की देखरेख और सुरक्षा ग्रहण करती हैं और उन्हें जारी रहने दिया जाता है। परमेश्वर अपना कोप इसलिए भेजता है, क्योंकि अन्यायपूर्ण, नकारात्मक और बुरी चीज़ें न्यायोचित और सकारात्मक चीजों की सामान्य गतिविधि और विकास को रोकती, बाधित या नष्ट करती हैं। परमेश्वर के क्रोध का उद्देश्य अपने दर्जे और पहचान की रक्षा करना नहीं है, बल्कि न्यायोचित, सकारात्मक, सुंदर और अच्छी चीजों के अस्तित्व की रक्षा करना, मनुष्य के सामान्य अस्तित्व के नियमों और कायदों की रक्षा करना है। यह परमेश्वर के कोप का मूल कारण है। परमेश्वर का क्रोध उसके स्वभाव का बिल्कुल उचित, स्वाभाविक और वास्तविक प्रकाशन है। उसके क्रोध के कोई गुप्त अभिप्राय नहीं हैं, न ही उसमें चालाकी या षड्यंत्र हैं; इच्छाएँ, चतुराई, द्वेष, हिंसा, दुष्टता या भ्रष्ट मनुष्य में पाए जाने वाले अन्य लक्षणों के होने की तो बात ही छोड़ दो। अपना कोप भेजने से पहले परमेश्वर हर मामले के सार को पहले ही बिल्कुल स्पष्टता से जान चुका होता है; वह पहले ही सभी मामलों के संबंध में सटीक, स्पष्ट परिभाषाएँ और निष्कर्ष तैयार कर चुका होता है। इस प्रकार परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसमें उसका उद्देश्य और उसका रवैया बिल्कुल स्पष्ट होता है। वह भ्रमित, अंधा, आवेशपूर्ण या मनमाना नहीं है और वह निश्चित रूप से सिद्धांतहीन नहीं है। यह परमेश्वर के कोप का व्यावहारिक पहलू है, और परमेश्वर के कोप के इस व्यावहारिक पहलू के कारण ही मनुष्य सामान्य ढंग से जी सकता है। परमेश्वर के कोप के बिना मनुष्य जोखिम भरी जीवन-स्थितियों में पतित हो जाता और सभी न्यायोचित, सुंदर और अच्छी चीजों को नष्ट कर दिया जाता और वे अस्तित्व में न रहतीं। परमेश्वर के कोप के बिना सृजित प्राणियों के लिए अस्तित्व के सिद्धांत और नियम तोड़ दिए जाते या यहाँ तक कि पूरी तरह से उलट दिए जाते। मनुष्य के सृजन के समय से ही परमेश्वर ने मनुष्य के सामान्य अस्तित्व की रक्षा करने और उसे कायम रखने के लिए अपने धार्मिक स्वभाव का निरंतर इस्तेमाल किया है। क्योंकि उसके धार्मिक स्वभाव में कोप और प्रताप का समावेश है, इसलिए सभी बुरे लोग, चीजें और घटनाएँ और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व में बाधा डालने और उसे क्षति पहुँचाने वाली सभी चीजें उसके कोप के परिणामस्वरूप दंडित, नियंत्रित, और नष्ट कर दी जाती हैं। पिछले कई सहस्राब्दियों से परमेश्वर ने लगातार अपने धार्मिक स्वभाव का उपयोग करके सभी प्रकार के अशुद्ध आत्माओं और दुष्ट आत्माओं को मार गिराया और नष्ट किया है, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं और मनुष्य के प्रबंधन के परमेश्वर के कार्य में शैतान के सहयोगियों और सेवकों के रूप में कार्य करते हैं। इस प्रकार, मनुष्य के उद्धार का परमेश्वर का कार्य उसकी योजना के अनुसार सदैव आगे बढ़ता गया है। कहने का तात्पर्य है कि परमेश्वर के कोप के अस्तित्व के कारण मानवजाति के बीच के सर्वाधिक न्यायसंगत कार्य को कभी नष्ट नहीं किया गया है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
559. समस्त मानवजाति के प्रति, उस मानवजाति के प्रति जो कि मूर्ख और जाहिल है, परमेश्वर का व्यवहार मुख्य रूप से दया और सहिष्णुता का है। दूसरी ओर, उसका कोप अधिकांश समय और अधिकांश घटनाओं में छिपाकर और मनुष्य के लिए अज्ञात रखा जाता है। परिणामस्वरूप, परमेश्वर को अपना कोप व्यक्त करते हुए देखना मनुष्य के लिए कठिन है, और उसके कोप को समझना भी उसके लिए कठिन है। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के कोप को हल्के में लेता है। लोग जब परमेश्वर के अंतिम कार्य और मनुष्य के प्रति सहिष्णुता दिखाने और उसे बख्श देने के कदम का सामना करते हैं—अर्थात्, जब परमेश्वर की दया की अंतिम घटना और अंतिम चेतावनी लोगों पर आती है—यदि लोग फिर भी उसी तरह से परमेश्वर का विरोध करते रहते हैं और जरा-भी पश्चाताप नहीं करते, अपना रास्ता नहीं पलटते या उसकी दया को स्वीकार नहीं करते, तो परमेश्वर आगे उन्हें अपनी सहिष्णुता और धैर्य नहीं दिखाएगा। इसके विपरीत, उस समय परमेश्वर अपनी दया वापस ले लेगा। इसके बाद वह केवल अपना कोप ही भेजेगा। वह विभिन्न तरीकों से अपना कोप व्यक्त कर सकता है, वैसे ही, जैसे वह लोगों को दंड देने और नष्ट करने के लिए विभिन्न पद्धतियाँ इस्तेमाल कर सकता है।
सदोम नगर का विनाश करने के लिए परमेश्वर ने आग का इस्तेमाल किया था। परमेश्वर की नजरों में, यह मनुष्य या किसी अन्य चीज़ को पूरी तरह से नष्ट करने की तीव्रतम पद्धति है। सदोम के लोगों को जलाना बस उनके शरीर को नष्ट करने के लिए नहीं था; बल्कि पूरी तरह से उनकी आत्माओं, उनके प्राण और उनके शरीर को नष्ट करने के लिए था, इसने यह सुनिश्चित किया कि उस नगर के लोग न तो भौतिक संसार में अस्तित्व में रहें और न ही उस संसार में, जो मनुष्य के लिए अदृश्य है। यह परमेश्वर द्वारा अपना कोप प्रकाशित और अभिव्यक्त करने का एक तरीका है। इस तरह का प्रकाशन और अभिव्यक्ति परमेश्वर के कोप के सार का एक पहलू है, ठीक वैसे ही, जैसे यह स्वाभाविक रूप से परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के सार का प्रकाशन भी है। जब परमेश्वर अपना कोप भेजता है, तो वह कोई दया या प्रेममय करुणा प्रकट करना बंद कर देता है, न ही वह आगे अपनी सहनशीलता या धैर्य दिखाता है; कोई ऐसा व्यक्ति, वस्तु या कारण नहीं है, जो उसे धैर्य धारण किए रहने, फिर से दया दिखाने, एक बार फिर अपनी सहनशीलता दिखाने के लिए राज़ी कर सके। इन चीजों के स्थान पर, एक पल की भी देरी किए बिना, परमेश्वर अपना क्रोध और प्रताप व्यक्त करता है और जो उसका इरादा है वह करता है, वह ऐसा एक तेज और साफ तरीके से करता है और यह सुनिश्चित करता है कि यह उसका वांछित परिणाम प्राप्त करे। यह वह तरीका है जिससे परमेश्वर अपना क्रोध और प्रताप व्यक्त करता है, जिसका मनुष्य को अपमान बिल्कुल नहीं करना चाहिए और यह उसके धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति भी है। जब लोग परमेश्वर को मनुष्य के प्रति चिंता और प्रेम दिखाते हुए देखते हैं, तो वे उसके कोप को भाँपने में, उसके प्रताप को देखने में या अपमान के प्रति उसकी असहनशीलता अनुभव करने में असमर्थ होते हैं। इन चीजों ने हमेशा लोगों को यह गलत विश्वास दिलाया है कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव केवल दया, सहनशीलता और प्रेम का है। किंतु जब कोई परमेश्वर को किसी नगर का विनाश करते हुए या मनुष्य के प्रति उसकी नफरत को देखता है, मनुष्य को नष्ट करने में उसका क्रोध और उसका प्रताप लोगों को उसके धार्मिक स्वभाव का अन्य पक्ष देखने देता है जो कि अपमान के प्रति परमेश्वर की असहिष्णुता है। परमेश्वर का कोई अपमान सहन न करने वाला स्वभाव किसी भी सृजित प्राणी की कल्पना से परे है, और ग़ैर-सृजित प्राणियों में से कोई उसके स्वभाव के साथ दखलंदाज़ी करने या उसे प्रभावित करने में सक्षम नहीं है; उसका ढोंग या नकल करना तो बिल्कुल संभव नहीं। इस प्रकार, परमेश्वर के स्वभाव का यह ऐसा पहलू है, जिसे मानवता को सबसे अधिक जानना ही चाहिए। केवल स्वयं परमेश्वर का ही ऐसा स्वभाव है, और केवल स्वयं परमेश्वर ही ऐसे स्वभाव से युक्त है। परमेश्वर का ऐसा धार्मिक स्वभाव इसलिए है, क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहशीलता और शैतान ने मानवजाति को भ्रष्ट करने और निगलने में जो तमाम बुरे कर्म किए हैं, इनसे घृणा करता है, क्योंकि वह अपने विरुद्ध पाप के सारे कृत्यों से घृणा करता है, और इसलिए भी, क्योंकि उसका सार पवित्र और निष्कलंक है। यही कारण है कि वह किसी भी सृजित या ग़ैर-सृजित प्राणी द्वारा खुला विरोध या स्वयं से मुकाबला सहन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कोई ऐसा व्यक्ति भी, जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई हो या जिसका उसने चुनाव किया हो, जैसे ही वह उसके स्वभाव को भड़काता है और उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धांतों के खिलाफ अपराध करता है, परमेश्वर थोड़ी-सी भी दया या संकोच दिखाए बिना, अपमान बरदाश्त न करने वाला अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट और प्रकाशित कर देगा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
560. यद्यपि परमेश्वर के कोप का उफान उसके धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्ति का एक पहलू है, किंतु परमेश्वर का क्रोध अपने लक्ष्य के प्रति किसी भी तरह से विवेकशून्य नहीं है, और न ही वह सिद्धांतविहीन है। इसके विपरीत, परमेश्वर क्रोध करने में बिल्कुल भी उतावलापन नहीं दिखाता, और न ही वह अपने कोप और प्रताप को हलकेपन से प्रकट करता है। इतना ही नहीं, परमेश्वर का कोप पूरी तरह से नियंत्रित और नपा-तुला होता है; उसकी तुलना मनुष्य के क्रोध से आगबबूला होने या अपना गुस्सा प्रकट करने से बिल्कुल नहीं की जा सकती। मनुष्य और परमेश्वर के बीच हुए अनेक वार्तालाप बाइबल में दर्ज हैं। इनमें से कुछ लोगों के कथन सतही, अज्ञानता से भरे और बचकाने थे, किंतु परमेश्वर ने उन्हें मार नहीं गिराया, और न ही उनकी भर्त्सना की। विशेष रूप से, अय्यूब के परीक्षण के दौरान, यहोवा परमेश्वर ने अय्यूब के तीन मित्रों और दूसरे लोगों द्वारा अय्यूब से कही गई बातें सुनने के बाद उनके साथ कैसा बरताव किया था? क्या उसने उनकी भर्त्सना की थी? क्या वह उन पर आगबबूला हो गया था? उसने ऐसा कुछ नहीं किया था! इसके बजाय उसने अय्यूब को उनकी ओर से विनती करने और उनके लिए प्रार्थना करने के लिए कहा, और स्वयं परमेश्वर ने उनकी गलतियों को गंभीरता से नहीं लिया। ये सभी उदाहरण भ्रष्ट एवं अबोध मानवजाति के साथ परमेश्वर के मौलिक रवैये को दर्शाते हैं। इसलिए, परमेश्वर के कोप का प्रस्फुटन किसी भी तरह से उसकी मनःस्थिति की अभिव्यक्ति नहीं है, न ही वह उसके द्वारा अपनी भावनाएँ जाहिर करने का तरीका है। मनुष्य की गलतफहमी के विपरीत, परमेश्वर का कोप पूरी तरह से गुस्से का फूट पड़ना नहीं है। परमेश्वर अपने कोप को इसलिए नहीं प्रकट करता कि वह अपनी मनःस्थिति पर काबू पाने में असमर्थ है या कि उसका क्रोध चरम पर पहुँच गया है और उसे बाहर निकालना आवश्यक है। इसके विपरीत, उसका कोप उसके धार्मिक स्वभाव का प्रदर्शन और उसकी वास्तविक अभिव्यक्ति है, और यह उसके पवित्र सार का सांकेतिक प्रकटन है। परमेश्वर कोप है, और वह अपमानित किया जाना सहन नहीं करता—इसका तात्पर्य यह नहीं है कि परमेश्वर का क्रोध कारणों के बीच अंतर नहीं करता या वह सिद्धांतविहीन है; क्रोध के सिद्धांतविहीन, बेतरतीब विस्फोट पर तो एकमात्र अधिकार भ्रष्ट मनुष्य का है, उस प्रकार का क्रोध, कारणों के बीच अंतर नहीं करता। एक बार जब किसी व्यक्ति के पास रुतबा आ जाता है, तो उसे अक्सर अपनी भावनाओं को नियंत्रित करना मुश्किल लगता है और इसलिए वह अपना असंतोष जाहिर करने और अपनी भावनाओं की भड़ास निकालने के अवसरों का लाभ उठाना पसंद करता है; वह अक्सर बिना किसी कारण के गुस्सा हो जाता है, ताकि वह अपनी क्षमताओं का प्रदर्शन कर सके और दूसरों को यह बता सके कि उसका रुतबा और पहचान दूसरे लोगों से अलग है। निस्संदेह, बिना किसी रुतबे वाले भ्रष्ट लोग भी अक्सर अपनी भावनाओं पर नियंत्रण खो देते हैं। उनका क्रोध अक्सर उनके अपने हितों को नुकसान पहुँचने के कारण होता है। अपने रुतबे और गरिमा की रक्षा करने के लिए वे बार-बार अपनी भावनाएँ व्यक्त और अपनी अहंकारी प्रकृति प्रकट करते हैं। मनुष्य पाप के अस्तित्व का बचाव करने के लिए क्रोध से आग-बबूला हो जाता है, अपनी भावनाएँ जाहिर करता है और इन्हीं तरीकों से मनुष्य अपना असंतोष व्यक्त करता है; वे अशुद्धताओं, कुचक्रों और साजिशों से, मनुष्य की भ्रष्टता और दुष्टता से, और अन्य किसी भी चीज से बढ़कर, मनुष्य की महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं से लबालब भरे हैं। जब न्याय दुष्टता से टकराता है, तो मनुष्य न्याय के अस्तित्व का बचाव करने के लिए क्रोध से आगबबूला नहीं होता; इसके विपरीत, जब न्याय की शक्तियों को धमकाया, सताया और उन पर आक्रमण किया जाता है, तब मनुष्य का स्वभाव नज़रअंदाज़ करने, टालने या मुँह फेरने वाला होता है। लेकिन दुष्ट शक्तियों से सामना होने पर मनुष्य का रवैया समझौतापरक, झुकने और मक्खन लगाने वाला होता है। इसलिए, मनुष्य का क्रोध निकालना दुष्ट शक्तियों के लिए बच निकलने का मार्ग है, और देहयुक्त मनुष्य के अनियंत्रित और रोके न जा सकने वाले दुष्ट आचरण की अभिव्यक्ति है। किंतु जब परमेश्वर अपने कोप को भेजता है, तो सारी दुष्ट शक्तियों को रोका जाएगा, मनुष्य को हानि पहुँचाने वाले सारे पापों पर अंकुश लगाया जाएगा, परमेश्वर के कार्य में बाधा डालने वाली सभी विरोधी ताकतों को बेनकाब, अलग और शापित किया जाएगा, परमेश्वर का विरोध करने वाले शैतान के सभी सहयोगियों को दंडित किया जाएगा और उन्हें जड़ से उखाड़ दिया जाएगा। उनके स्थान पर, परमेश्वर का कार्य बाधाओं से मुक्त होकर आगे बढ़ेगा, परमेश्वर की प्रबंधन योजना निर्धारित समय के अनुसार कदम-दर-कदम विकसित होती रहेगी, और परमेश्वर के चुने हुए लोग शैतान द्वारा और बाधित व गुमराह नहीं होंगे, और परमेश्वर का अनुसरण करने वाले लोग स्वस्थ और शांतिपूर्ण माहौल के बीच परमेश्वर की अगुआई और आपूर्ति का आनंद लेंगे। परमेश्वर का कोप वह सुरक्षा कवच है जो सभी बुरी शक्तियों को पनपने और बेलगाम होने से रोकता है, और यही यह भी सुनिश्चित करता है कि सभी न्यायसंगत और सकारात्मक चीज़ें अस्तित्व में रह सकें, प्रसार कर सकें और कभी मिटाई या उखाड़ फेंकी न जा सकें।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
561. परमेश्वर के प्रत्येक कार्य के साथ व्यवहार करते समय, तुम्हें पहले निश्चित होना चाहिए कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव किसी भी मिलावट से मुक्त है और वह पवित्र और निर्दोष है। इन कार्यों में परमेश्वर द्वारा मनुष्य को मार गिराना, दंड देना, और नष्ट करना शामिल है। बिना किसी अपवाद के, परमेश्वर का हर कार्य ठीक उसके अंतर्निहित स्वभाव और उसकी योजना के अनुसार व्यक्त किया जाता है। उसमें मनुष्य के ज्ञान, परंपरा और दर्शन का कोई अंश शामिल नहीं होता बल्कि वह पूरी तरह परमेश्वर के स्वभाव और सार की अभिव्यक्ति है, जिसका ऐसी किसी चीज़ से संबंध नहीं है, जो भ्रष्ट मनुष्य से संबंधित हो। मनुष्य की धारणा है कि केवल मानवजाति के प्रति परमेश्वर का प्रेम, दया और सहिष्णुता ही दोषरहित, मिलावटरहित और पवित्र है, और कोई नहीं जानता कि परमेश्वर का गुस्सा और कोप भी इसी तरह से मिलावटरहित हैं; इतना ही नहीं, किसी ने भी इन प्रश्नों पर विचार नहीं किया है कि परमेश्वर कोई अपमान क्यों नहीं सहता या उसका गुस्सा इतना ज्यादा क्यों है। इसके विपरीत, कुछ लोग गलती से परमेश्वर के कोप को बुरा मिजाज समझ लेते हैं, जैसा कि भ्रष्ट मनुष्य का होता है, और परमेश्वर के गुस्से को भ्रष्ट मनुष्य के गुस्से के समान ही समझने की गलती करते हैं। यहाँ तक कि वे गलती से यह मान लेते हैं कि परमेश्वर का गुस्सा मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों के स्वाभाविक प्रकटन के समान ही है। वे गलत ढंग से मानते हैं कि परमेश्वर के कोप का जारी होना भ्रष्ट लोगों के उस समय प्रकट होने वाले क्रोध के समान ही है, जब वे किसी अप्रिय स्थिति का सामना करते हैं, और वे गलत ढंग से यह तक मानते हैं कि परमेश्वर के कोप का प्रस्फुटन उसकी मनःस्थिति का प्रदर्शन है। इस सहभागिता के बाद, मैं आशा करता हूँ कि अब से तुम लोगों में से कोई भी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के संबंध में किसी प्रकार की गलत धारणा, कल्पना या अनुमान नहीं रखेगा। मैं आशा करता हूँ कि मेरे वचनों को सुनने के बाद तुम अपने हृदय में परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कोप की सच्ची पहचान रख सकते हो, उससे जुड़ी कोई पिछली भ्रामक समझ अलग हटा सकते हो, तुम परमेश्वर के कोप के सार के संबंध में अपने गलत विश्वास और दृष्टिकोण बदल सकते हो। इतना ही नहीं, मैं आशा करता हूँ कि तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर के स्वभाव की कोई सटीक परिभाषा हो सकती है, तुम्हारे मन में अब से परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को लेकर कोई संदेह नहीं होगा, और तुम परमेश्वर के सच्चे स्वभाव पर कोई मानवीय तर्क या अनुमान नहीं थोपोगे। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव परमेश्वर का अपना सच्चा सार है। यह मनुष्य द्वारा सृजित या लिखी गई कोई चीज़ नहीं है। उसका धार्मिक स्वभाव उसका धार्मिक स्वभाव है और उसका सृजित प्राणियों से कोई संबंध या वास्ता नहीं है। स्वयं परमेश्वर स्वयं परमेश्वर है, और वह कभी सृजित प्राणी नहीं बनेगा। यदि वह सृजित प्राणियों का सदस्य बनता भी है, तो भी उसका अंतर्निहित स्वभाव और उसका सार नहीं बदलेगा। इसलिए, परमेश्वर को जानना किसी वस्तु को जानने के समान नहीं है; परमेश्वर को जानना किसी चीज़ की चीर-फाड़ करना नहीं है, न ही यह किसी व्यक्ति को समझने के समान है। यदि तुम किसी वस्तु को जानने या किसी व्यक्ति को समझने की अपनी अवधारणा या पद्धति का उपयोग परमेश्वर को जानने के लिए करते हो, तो तुम कभी भी परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं कर पाओगे। परमेश्वर को जानना अनुभव या कल्पनाओं पर निर्भर नहीं हो सकता और इसलिए तुम्हें कभी भी अपने अनुभव या कल्पनाओं को परमेश्वर पर नहीं थोपना चाहिए। तुम्हारा अनुभव और कल्पनाएँ चाहे कितनी भी समृद्ध क्यों न हों, वे फिर भी सीमित हैं। इससे भी बड़ी बात यह है कि तुम्हारी कल्पनाएँ तथ्यों के अनुरूप नहीं हैं, सत्य के अनुरूप तो बिल्कुल भी नहीं हैं और परमेश्वर के सच्चे स्वभाव और सार के साथ असंगत हैं। यदि तुम परमेश्वर के सार को समझने के लिए अपनी कल्पनाओं पर निर्भर रहते हो तो तुम कभी सफल नहीं होओगे। एकमात्र रास्ता यह है : वह सब स्वीकार करो, जो परमेश्वर से आता है, फिर धीरे-धीरे उसे अनुभव करो और जानो। एक दिन ऐसा आएगा, जब परमेश्वर तुम्हारे सहयोग के कारण और सत्य के लिए तुम्हारी भूख और प्यास के कारण तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, ताकि तुम सच में उसे समझ और जान सको।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
562. परमेश्वर अपने कार्यों में कभी अस्थिर या संकोची नहीं होता; उसके कार्यों के पीछे के सिद्धांत और उद्देश्य स्पष्ट और पारदर्शी, शुद्ध और दोषरहित होते हैं, जिनमें कोई धोखा या षड्यंत्र बिल्कुल भी मिला नहीं होता। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर के सार में कोई अंधकार या दुष्टता शामिल नहीं होती। परमेश्वर नीनवे के नागरिकों से इसलिए क्रोधित हुआ, क्योंकि उनकी दुष्टता के कार्य उसकी नज़रों में आ गए थे; उस समय उसका क्रोध उसके सार से निकला था। किंतु जब परमेश्वर का कोप जाता रहा और उसने नीनवे के लोगों पर एक बार फिर से सहनशीलता दिखाई, तो वह सब जो उसने प्रकट किया, वह भी उसका अपना सार ही था। यह संपूर्ण परिवर्तन परमेश्वर के प्रति मनुष्य के रवैये में हुए बदलाव के कारण था। इस पूरी अवधि के दौरान परमेश्वर का अनुल्लंघनीय स्वभाव नहीं बदला, परमेश्वर का सहनशील सार नहीं बदला, परमेश्वर का प्रेममय और दयालु सार नहीं बदला। जब लोग दुष्टता के काम करते हैं और परमेश्वर को ठेस पहुँचाते हैं, तो वह उन पर क्रोध करता है। जब लोग सच में पश्चात्ताप करते हैं, तो परमेश्वर का हृदय बदलता है, और उसका क्रोध थम जाता है। जब लोग हठपूर्वक परमेश्वर का विरोध करते हैं, तो उसका कोप निरंतर बना रहता है और धीरे-धीरे उन्हें तब तक दबाता रहता है, जब तक वे नष्ट नहीं हो जाते। यह परमेश्वर के स्वभाव का सार है। परमेश्वर अपने स्वभाव के बारे में जो कुछ भी व्यक्त और प्रकट करता है—चाहे वह उसका क्रोध हो या उसकी दया और प्रेममय दयालुता हो—यह लोगों के आचरण और व्यवहार और उनके दिल की गहराई में परमेश्वर के प्रति उनके रवैये पर निर्भर करता है। यदि परमेश्वर किसी व्यक्ति पर निरंतर अपना क्रोध बनाए रखता है, तो निस्संदेह ऐसे व्यक्ति का हृदय परमेश्वर का विरोध करता है। चूँकि इस व्यक्ति ने कभी सच में पश्चात्ताप नहीं किया है, परमेश्वर के सम्मुख अपना सिर नहीं झुकाया है या परमेश्वर में सच्चा विश्वास नहीं रखा है, इसलिए उसने कभी परमेश्वर की दया और सहनशीलता प्राप्त नहीं की है। यदि कोई व्यक्ति अक्सर परमेश्वर की देखरेख, उसकी दया और उसकी सहनशीलता प्राप्त करता है, तो निस्संदेह ऐसे व्यक्ति के हृदय में परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास है, और उसका हृदय परमेश्वर के विरुद्ध नहीं है। यह व्यक्ति अक्सर सच में परमेश्वर के सम्मुख पश्चात्ताप करता है; इसलिए, भले ही परमेश्वर का अनुशासन अक्सर इस व्यक्ति के ऊपर आए, पर उसका कोप नहीं आएगा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
563. परमेश्वर नीनवे के लोगों से चाहे जितना भी क्रोधित रहा हो, लेकिन जैसे ही उन्होंने उपवास की घोषणा की और टाट ओढ़कर राख पर बैठ गए, उसका हृदय धीरे-धीरे नरम पड़ने लगा और उसने अपना मन बदलना शुरू कर दिया। उनसे यह घोषणा करने के एक क्षण पहले कि वह उनके नगर को नष्ट कर देगा—उनके द्वारा अपने पाप स्वीकार करने और पश्चात्ताप करने से पहले के क्षण तक भी—परमेश्वर अभी भी उनसे क्रोधित था। लेकिन जब उन्होंने पश्चात्ताप के एक के बाद एक अनेक कदम उठाए तो नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर का क्रोध धीरे-धीरे उनके प्रति दया और क्षमाशीलता में बदल गया। एक ही घटना में परमेश्वर के स्वभाव के इन दो पहलुओं के प्रकाशन में कोई विरोधाभास नहीं है। तो विरोध के न होने को कैसे समझना और जानना चाहिए? नीनवे के लोगों द्वारा पश्चात्ताप करने के पहले और बाद में परमेश्वर ने ये दो काफी अलग सार अभिव्यक्त और प्रकाशित किए, जिससे लोगों ने परमेश्वर का वह सार देखा जो वास्तविक है और कोई अपमान नहीं सहता है। परमेश्वर ने लोगों को निम्नलिखित बातें बताने के लिए अपने रवैये का उपयोग किया : ऐसा नहीं है कि परमेश्वर लोगों को सहन नहीं करता है या वह उन पर दया नहीं दिखाना चाहता है; बल्कि वे परमेश्वर के सामने शायद ही कभी सच्चा पश्चात्ताप करते हैं और उनका सचमुच अपने कुमार्ग को छोड़ना और हिंसा त्यागना एक दुर्लभ बात है। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर मनुष्य से क्रोधित होता है, तो वह आशा करता है कि मनुष्य सच में पश्चात्ताप कर सकता है और वह मनुष्य का सच्चा पश्चात्ताप देखने की आशा करता है, और उस दशा में वह मनुष्य पर उदारता से अपनी दया और सहनशीलता बरसाता रहेगा। कहने का तात्पर्य है कि मनुष्य के बुरे कर्म परमेश्वर के कोप को जन्म देते हैं, जबकि परमेश्वर की दया और सहनशीलता उन लोगों पर बरसती है जो परमेश्वर की बात सुनते हैं और उसके सामने वास्तव में पश्चात्ताप करते हैं, जो अपने बुरे रास्तों को छोड़ देते हैं और अपने हाथों से हिंसा त्याग देते हैं। नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के व्यवहार में उसका रवैया बहुत साफ तौर पर प्रकट हुआ था : परमेश्वर की दया और सहनशीलता पाना कठिन नहीं है; और वह इंसान से सच्चा पश्चात्ताप चाहता है। अगर लोग अपने बुरे तरीकों से दूर रहेंगे और हिंसा छोड़ देंगे, तो परमेश्वर उनके प्रति अपना हृदय और रवैया बदल लेगा।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
564. जब नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर का हृदय-परिवर्तन हुआ, तो क्या उसकी दया और सहिष्णुता एक दिखावा थी? बिल्कुल नहीं! तो फिर परमेश्वर द्वारा इस एक स्थिति से निपटने के दौरान उसके स्वभाव के इन दो पहलुओं के बीच बदलाव से क्या दिखाया गया है? परमेश्वर का स्वभाव पूरी तरह से संपूर्ण है—वह बिल्कुल भी विभाजित नहीं है। चाहे वह लोगों पर क्रोध प्रकट कर रहा हो या दया और सहिष्णुता दिखा रहा हो, ये सब उसके धार्मिक स्वभाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। परमेश्वर का स्वभाव जीवंत और सजीव है, वह अपने विचार और रवैये चीजों के विकसित होने के हिसाब से बदलता है। नीनवे के लोगों के प्रति उसके रवैये का रूपांतरण मनुष्य को बताता है कि उसके अपने विचार और ख्याल हैं, वह कोई मशीन या मिट्टी का पुतला नहीं है, बल्कि स्वयं जीवित परमेश्वर है—वह नीनवे के लोगों से क्रोधित हो सकता था, वैसे ही जैसे उनके रवैये के कारण वह उनके अतीत को क्षमा कर सकता था; वह नीनवे के लोगों के ऊपर आपदा लाने का निर्णय ले सकता था और उनके पश्चात्ताप के कारण वह अपना निर्णय बदल भी सकता था। लोग रूढ़ियों को कठोरता से लागू करना, और ऐसी रूढ़ियों का परमेश्वर को सीमांकित और परिभाषित करने के लिए उपयोग करना पसंद करते हैं, वैसे ही जैसे वे परमेश्वर के स्वभाव को समझने के लिए सूत्रों का उपयोग करना पसंद करते हैं। इसलिए, जहाँ तक मानवीय विचारों के दायरे का संबंध है, परमेश्वर न तो सोचता है, न ही उसके पास कोई ठोस विचार हैं। वास्तव में परमेश्वर के विचार चीज़ों और वातावरण में परिवर्तन के अनुसार निरंतर रूपांतरण की स्थिति में रहते हैं। जब उसके विचार रूपांतरित हो रहे होते हैं, तब परमेश्वर के सार के विभिन्न पहलू प्रकट हो रहे होते हैं। रूपांतरण की इस प्रक्रिया के दौरान, ठीक उसी क्षण, जब परमेश्वर अपना मन बदलता है, तब वह मानवजाति को अपने जीवन का वास्तविक अस्तित्व दिखाता है और यह भी दिखाता है कि उसका धार्मिक स्वभाव जीवंत और सजीव है। उसी समय, परमेश्वर मानवजाति के सामने अपने कोप, अपनी दया, अपनी प्रेममय करुणा और अपनी सहिष्णुता के अस्तित्व की सच्चाई प्रमाणित करने के लिए अपने सच्चे प्रकाशनों का उपयोग करता है। उसका सार चीज़ों के विकसित होने के ढंग के अनुसार किसी भी समय और स्थान पर प्रकट होगा। उसमें एक सिंह का कोप और एक माता की दया और सहिष्णुता है। उसका धार्मिक स्वभाव किसी भी व्यक्ति द्वारा प्रश्न किए जाने, उल्लंघन किए जाने, बदले जाने या तोड़े-मरोड़े जाने की अनुमति नहीं देता। समस्त घटनाओं और चीज़ों में परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, अर्थात् परमेश्वर का कोप और उसकी दया, किसी भी समय और स्थान पर प्रकट हो सकती है। वह समस्त सृष्टि के प्रत्येक कोने में इन पहलुओं को जीवंत अभिव्यक्ति देता है, और हर गुज़रते पल में उन्हें जीवंतता के साथ लागू करता है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव समय या स्थान द्वारा सीमित नहीं है; दूसरे शब्दों में, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव समय या स्थान की बाधाओं के अनुसार यांत्रिक रूप से व्यक्त या प्रकाशित नहीं होता, बल्कि, किसी भी समय और स्थान पर बिल्कुल आसानी से व्यक्त और प्रकाशित होता है। जब तुम परमेश्वर को अपना मन बदलते, अपने कोप को थामते और नीनवे के शहर का नाश करने से पीछे हटते हुए देखते हो, तो क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर केवल दयालु और प्रेमपूर्ण है? क्या तुम कह सकते हो कि परमेश्वर का कोप खोखले वचनों से युक्त है? जब परमेश्वर अपने प्रचंड कोप को बरसाता है और अपनी दया वापस ले लेता है, तो क्या तुम कह सकते हो कि उसके पास मनुष्यों के प्रति कोई सच्चा प्रेम नहीं है? यह प्रचंड कोप परमेश्वर द्वारा लोगों के बुरे कर्मों के प्रत्युत्तर में व्यक्त किया जाता है; उसका कोप दोषपूर्ण नहीं है। परमेश्वर का हृदय लोगों के पश्चात्ताप की प्रतिक्रिया में द्रवित हो जाता है, और इसके कारण उसका हृदय परिवर्तन हो जाता है। जब वह द्रवित महसूस करता है, जब उसका हृदय परिवर्तन होता है और जब वह मनुष्य के प्रति अपनी दया और सहिष्णुता दिखाता है तो ये सब पूरी तरह से दागमुक्त होते हैं; ये स्वच्छ, शुद्ध, निष्कलंक और मिलावट-रहित हैं। परमेश्वर की सहिष्णुता विशुद्ध सहिष्णुता है, उसकी दया विशुद्ध दया है। उसका स्वभाव मनुष्य की विभिन्न अभिव्यक्तियों और उसके पश्चात्ताप के अनुसार कोप प्रकट करता है या दया और सहिष्णुता व्यक्त करता है। वह चाहे जो कुछ भी प्रकट और व्यक्त करता हो, यह सब शुद्ध और सीधा होता है; यह किसी भी सृजित प्राणी के सार से अलग होता है। परमेश्वर जो कार्यकलाप का सिद्धांत व्यक्त करता है उसके तहत उसके विचार और ख्याल, साथ ही वह जो भी निर्णय लेता है और जो भी कदम उठाता है, उनमें कोई भी त्रुटि या दाग नहीं होता है। चूँकि परमेश्वर ने ऐसा निर्णय लिया है और चूँकि उसने इस तरह से कार्य किया है, यही है वो जिसे वह पूरा करता है और यह नतीजा सही और दोषरहित है, क्योंकि इसका स्रोत दोषरहित और निष्कलंक है। परमेश्वर का क्रोध दोषरहित है। इसी तरह, परमेश्वर की दया और सहिष्णुता पवित्र और दोषरहित हैं, जो किसी भी सृजित प्राणी के पास नहीं हैं और विचारशील मनन और अनुभव का सामना करने में सक्षम हैं।
नीनवे की कहानी समझने के बाद, क्या तुम लोग अब परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के सार का दूसरा पक्ष देखते हो? क्या तुम परमेश्वर के अद्वितीय धार्मिक स्वभाव का दूसरा पक्ष देखते हो? क्या मनुष्यों में से किसी का इस प्रकार का स्वभाव है? क्या किसी में इस प्रकार का कोप, परमेश्वर का कोप, है? क्या किसी में वैसी दया और सहनशीलता है, जैसी परमेश्वर में है? सृजित प्राणियों में ऐसा कौन है, जो इतना अधिक कोप प्रकट कर सकता है और मानवजाति को नष्ट करने या उस पर विपदा लाने का निर्णय ले सकता है? मनुष्य पर दया करने, उसे सहन करने, क्षमा करने, और परिणामस्वरूप मनुष्य को नष्ट करने का अपना पिछला निर्णय बदलने योग्य कौन है? सृष्टिकर्ता अपना धार्मिक स्वभाव अपनी अनोखी पद्धतियों और सिद्धांतों के माध्यम से व्यक्त करता है; वह किन्हीं लोगों, घटनाओं या चीज़ों द्वारा थोपे गए नियंत्रण या प्रतिबंधों के अधीन नहीं है। उसके अद्वितीय स्वभाव के भीतर कोई भी उसके विचारों और सोच को बदलने में सक्षम नहीं है, न ही कोई उसे मनाने और उसका कोई निर्णय बदलने में सक्षम है। सृजित प्राणियों के समस्त व्यवहार और विचार उसके धार्मिक स्वभाव के निर्णयादेश के अधीन अस्तित्व में रहते हैं। वह कोप बरसाता है या दया करता है, इसे कोई भी नियंत्रित नहीं कर सकता; केवल सृष्टिकर्ता का सार—या दूसरे शब्दों में, सृष्टिकर्ता का धार्मिक स्वभाव—ही यह तय कर सकता है। ऐसी है सृष्टिकर्ता के धार्मिक स्वभाव की अद्वितीय प्रकृति!
नीनवे के लोगों के प्रति परमेश्वर के रवैये के रूपांतरण की व्याख्या करने से क्या तुम लोग परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव में पाई जाने वाली दया का वर्णन करने के लिए “अद्वितीय” शब्द का उपयोग कर सकते हो? हमने पहले कहा कि परमेश्वर का कोप उसके अद्वितीय धार्मिक स्वभाव के सार का एक पहलू है। अब मैं दो पहलुओं—परमेश्वर का कोप और परमेश्वर की दया—को उसके धार्मिक स्वभाव के रूप में परिभाषित करूँगा। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव पवित्र है; यह अपमान बर्दाश्त नहीं करता, न ही यह किसी के द्वारा प्रश्न किया जाना बर्दाश्त करता है; यह किसी भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी के पास नहीं है। वह परमेश्वर के लिए अद्वितीय और अनन्य दोनों है। कहने का तात्पर्य है, परमेश्वर का कोप पवित्र है और अपमान सहन नहीं करता। इसी प्रकार, परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का दूसरा पहलू—परमेश्वर की दया—भी पवित्र है और उसका भी अपमान नहीं किया जा सकता। परमेश्वर जो भी करने का इरादा रखता है उसे करने में कोई भी सृजित या गैर-सृजित प्राणी उसका स्थान नहीं ले सकता या उसका प्रतिनिधित्व नहीं कर सकता, और न ही कोई सदोम के विनाश या नीनवे के उद्धार में परमेश्वर का स्थान ले सकता था या उसका प्रतिनिधित्व कर सकता था। यह परमेश्वर के अद्वितीय धार्मिक स्वभाव की सच्ची अभिव्यक्ति है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
565. यद्यपि जिन लोगों से नीनवे का नगर भरा हुआ था वे बिल्कुल सदोम के लोगों के समान ही भ्रष्ट, दुष्ट और हिंसक थे, किंतु उनके पश्चात्ताप के कारण परमेश्वर का मन बदल गया और उसने उन्हें नष्ट न करने का फैसला किया। क्योंकि वे परमेश्वर के वचनों और निर्देशों के प्रति जिस तरीके से पेश आते थे वह एक ऐसे रवैये को दर्शाता था जो सदोम के नागरिकों के रवैये के बिल्कुल विपरीत था, और परमेश्वर के प्रति उनके वास्तविक समर्पण और वास्तविक पश्चात्ताप और साथ ही साथ समस्त पहलुओं में उनके सच्चे और हार्दिक व्यवहार के कारण, उनके लिए परमेश्वर का स्नेह एक बार फिर उसके दिल से आया और उसने यह उन्हें प्रदान कर दिया। कोई भी मानवजाति को उस तरह से चीजें प्रदान नहीं कर सकता और उन्हें संजो नहीं सकता जैसे कि परमेश्वर करता है; किसी भी व्यक्ति में परमेश्वर की दया, उसकी सहिष्णुता या मानवजाति के प्रति उसका सच्चा स्नेह नहीं होता है। क्या कोई है, जिसे तुम महान पुरुष या स्त्री मानते हो, या कोई अतिमानव मानते हो, जो एक ऊँचे मुकाम से, एक महान पुरुष या स्त्री के रूप में, या सबसे ऊँचे मुकाम पर बोलते हुए, मानवजाति या सृजित प्राणियों के लिए इस प्रकार का कथन कहेगा? मनुष्यों में से कौन मानव-जीवन की स्थितियों को भली-भाँति जान सकता है? कौन मनुष्य के अस्तित्व का दायित्व और जिम्मेदारी उठा सकता है? कौन किसी नगर के विनाश की घोषणा करने के योग्य है? और कौन किसी नगर को क्षमा करने के योग्य है? कौन कह सकता है कि वह अपनी सृष्टि को सँजोए? केवल सृष्टिकर्ता! केवल सृष्टिकर्ता इस मानवजाति के प्रति कोमल प्रेम महसूस करता है। केवल सृष्टिकर्ता इस मानवजाति के प्रति कोमल स्नेह दिखाता है। केवल सृष्टिकर्ता इस मानवजाति के प्रति सच्चा स्नेह रखता है जिसे तोड़ना कठिन है। इसके अलावा, केवल सृष्टिकर्ता ही इस मानवजाति पर दया कर सकता है और केवल वही अपने सभी सृजित प्राणियों को सँजोता है। उसका दिल मनुष्य के हर एक कार्य के साथ खिंचा चला जाता है : वह मनुष्य की दुष्टता और भ्रष्टता पर क्रोधित, परेशान और दुखी होता है; वह प्रसन्न और उल्लसित महसूस करता है और उसका हृदय-परिवर्तन होता है और वह मनुष्य के पश्चात्ताप, विश्वास और समर्पण से आनंदित होता है; उसका हर विचार और सोच मानवजाति के लिए होते हैं और उसी के इर्द-गिर्द घूमते हैं; जो उसके पास है और जो वह स्वयं है उसे पूरी तरह से मानवजाति के लिए व्यक्त किया गया है; उसकी संपूर्ण भावनाएँ मानवजाति के अस्तित्व के साथ गुँथी हैं। मनुष्य के वास्ते वह भ्रमण करता है और यहाँ-वहाँ भागता है; वह खामोशी से अपने जीवन का कतरा-कतरा दे देता है; वह अपने जीवन का हर पल और हर क्षण अर्पित कर देता है...। उसने कभी नहीं जाना कि अपने ही जीवन को किस प्रकार सँभाल कर रखे, किंतु उसने हमेशा उस मानवजाति को सँजोया है, जिसकी रचना उसने स्वयं की है...। वह अपना सब कुछ इस मानवजाति को दे देता है...। वह बिना किसी शर्त के और बिना किसी प्रतिफल की अपेक्षा के अपनी दया और सहनशीलता प्रदान करता है। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है, ताकि मानवजाति उसकी नजरों के सामने और जीवन के उसके प्रावधान के तहत जीवित रह सके। वह ऐसा सिर्फ इसलिए करता है, ताकि मानवजाति एक दिन उसके सम्मुख आत्मसमर्पण कर दे और यह जान जाए कि वही मनुष्य के अस्तित्व का पोषण करता है और समूची सृष्टि के जीवन की आपूर्ति करता है।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II
566. परमेश्वर की दया और सहिष्णुता तो सचमुच हैं ही, किंतु जब वह अपने क्रोध का बाँध खोलता है तब परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता मनुष्य को परमेश्वर का वह पहलू भी दिखाती है जो कोई अपमान सहन नहीं करता। जब मनुष्य परमेश्वर के आदेशों का पालन करने में पूर्णतः सक्षम होता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करता है, तब परमेश्वर मनुष्य के प्रति अपनी दया से भरपूर होता है; लेकिन जब मनुष्य भ्रष्टता से भरा होता है और उसके प्रति वैर-भाव और शत्रुता से लबालब भर जाता है, तब परमेश्वर प्रचंड क्रोध में होता है। वह किस हद तक क्रोध में होता है? उसका क्रोध तब तक बना रहेगा जब तक उसे मनुष्य का प्रतिरोध और दुष्ट कर्म दिखने बंद नहीं होते, जब तक वे उसकी नजरों के सामने अब और नहीं होते। तब कहीं जाकर परमेश्वर का क्रोध गायब होगा। दूसरे शब्दों में, चाहे जो भी व्यक्ति हो, यदि उसका हृदय परमेश्वर से दूर हो गया है और परमेश्वर से विमुख हो गया है और उसे वापस नहीं लाया जा सकता है, तब फिर वह अपने शरीर में या अपनी सोच में, अपने सभी स्वरूपों या अपनी व्यक्तिपरक इच्छाओं की दृष्टि से, परमेश्वर की चाहे जितनी आराधना, अनुसरण और उसके प्रति समर्पण करना चाहता हो, जब तक उसका दिल परमेश्वर से दूर होगा, परमेश्वर के क्रोध का बाँध टूटता जाएगा और रुकेगा नहीं। यह ऐसे होगा कि मनुष्य को प्रचुर अवसर देने के बाद, जब परमेश्वर अपने प्रचंड क्रोध का बाँध खोलता है, तब इसे वापस लेने का कोई रास्ता न होगा और ऐसे व्यक्ति के प्रति वह फिर कभी दयावान और सहिष्णु नहीं होगा। यह परमेश्वर के स्वभाव का एक पक्ष है जो कोई अपमान सहन नहीं करता है। ... वह उन चीजों के प्रति सहिष्णु और दयालु है जो भली, सुंदर और अच्छी हैं; जो चीजें बुरी, पापमय और दुष्ट हैं, उनके प्रति वह प्रचंड रूप से क्रोधित होता है, इतना कि उसका क्रोध रुकता नहीं है। ये परमेश्वर के स्वभाव के दो प्राथमिक पहलू हैं जो सबसे महत्वपूर्ण, सबसे प्रमुख हैं और इससे भी बढ़कर, इन्हें परमेश्वर ने आरंभ से लेकर अंत तक प्रकट किया है : प्रचुर दया और प्रचंड क्रोध।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर II
567. लोग कहते हैं, “परमेश्वर एक धार्मिक परमेश्वर है। अगर मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो वह निश्चित रूप से मनुष्य के प्रति निष्पक्ष होगा, क्योंकि वह सबसे धार्मिक है। यदि मनुष्य अंत तक उसका अनुसरण करता रहे, तो क्या वह मनुष्य को दरकिनार कर सकता है?” मैं सभी लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ और सभी लोगों का न्याय अपने धार्मिक स्वभाव से करता हूँ, फिर भी मैं लोगों से जो अपेक्षाएँ रखता हूँ उन सबमें उचित शर्तें शामिल होती हैं, और मैं जो अपेक्षा करता हूँ वह सभी लोगों के लिए पूरा करना जरूरी है, चाहे वे कोई भी हों। मैं इसकी परवाह नहीं करता कि तुम कितने वरिष्ठ हो या कितने अनुभवी हो; मैं सिर्फ इसकी परवाह करता हूँ कि तुम मेरे मार्ग का अनुसरण कर रहे हो या नहीं, सत्य के लिए तुममें प्रेम और प्यास है या नहीं। यदि तुममें सत्य की कमी है, और इसकी बजाय तुम मेरे नाम का अनादर करते हो, और मेरे मार्ग के अनुसार क्रिया-कलाप नहीं करते हो, कोई परवाह या चिंता किए बगैर सिर्फ अनुसरण मात्र कर रहे हो, तो मैं उस समय तुम पर प्रहार करूँगा और तुम्हारी बुराई के लिए तुम्हें दंड दूँगा, तब तुम्हारे पास कहने के लिए क्या होगा? क्या तुम यह कह पाओगे कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? यदि तुमने आज मेरे द्वारा बोले गए सभी वचनों का पालन किया है, तो तुम एक ऐसे इंसान हो जिसे मैं स्वीकृति देता हूँ। तुम कहते हो कि तुमने परमेश्वर का अनुसरण करते हुए हमेशा पीड़ा सही है, कि तुमने तूफानों के बीच उसका अनुसरण किया है और उसके साथ अच्छा और बुरा समय बिताया है, लेकिन तुमने परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों को नहीं जिया है; तुम हर दिन सिर्फ परमेश्वर के लिए भाग-दौड़ करना और उसके लिए स्वयं को खपाना चाहते हो, तुमने कभी भी एक अर्थपूर्ण जीवन जीने के बारे में नहीं सोचा है। तुम यह भी कहते हो, “चाहे जो हो, मैं मानता हूँ कि परमेश्वर धार्मिक है। मैं उसके लिए पीड़ा सहता हूँ, उसके लिए भाग-दौड़ करता हूँ और अपने आपको उसे समर्पित करता हूँ, और भले ही मेरे पास कोई उपलब्धियाँ न हो, फिर भी मैंने कठिनाई सही है; वह निश्चित ही मुझे याद रखेगा।” यह सच है कि परमेश्वर धार्मिक है, फिर भी इस धार्मिकता पर किसी अशुद्धता का दाग नहीं है : इसमें कोई मानवीय इच्छा नहीं है, और यह देह या मानवीय लेन-देनों से दूषित नहीं है। जो लोग विद्रोही हैं और विरोध में हैं, जो उसके मार्ग का पालन नहीं करते हैं, उन सबको दंडित किया जाएगा; न तो किसी को क्षमा किया जाएगा, न ही किसी को बख्शा जाएगा! कुछ लोग कहते हैं, “आज मैं तुम्हारे लिए भाग-दौड़ करता हूँ; अंत में क्या तुम मुझे थोड़ा-सा आशीष दे सकते हो?” इसलिए मैं तुमसे पूछता हूँ, “क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है?” तुम जिस धार्मिकता की बात करते हो, वह एक लेन-देन पर आधारित है। तुम केवल यह सोचते हो कि मैं धार्मिक हूँ, कि मैं सब लोगों के प्रति निष्पक्ष हूँ, और जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे और मेरे आशीष प्राप्त करेंगे। “जो बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे सब निश्चित रूप से बचा लिए जाएँगे,” मेरे इन वचनों का एक आंतरिक अर्थ है : जो लोग बिल्कुल अंत तक मेरा अनुसरण करेंगे वे ऐसे लोग होंगे जिन्हें मेरे द्वारा पूरी तरह से प्राप्त कर लिया जाएगा, वे ऐसे लोग हैं जो मेरे द्वारा जीते जाने के बाद, सत्य खोजते हैं और जिन्हें पूर्ण बनाया जाता है। तुम कितनी अपेक्षाएँ पूरी कर चुके हो? तुमने केवल अंत तक मेरा अनुसरण करने की अपेक्षा पूरी की है, लेकिन और क्या? क्या तुमने मेरे वचनों का पालन किया है? तुमने मेरी पाँच अपेक्षाओं में से एक को पूरा किया है, लेकिन बाकी चार को पूरा करने का तुम्हारा कोई इरादा नहीं है। तुमने बस सबसे सरल और आसान रास्ता ढूँढ़ लिया है और भाग्यशाली होने की उम्मीद के रवैये के साथ अनुसरण किया है। तुम्हारे जैसे इंसान के लिए मेरे धार्मिक स्वभाव का अर्थ सिर्फ ताड़ना और न्याय और धार्मिक प्रतिफल है; इसका अर्थ है बुरा काम करने वाले सभी लोगों के लिए धार्मिक दंड। जो लोग मेरे मार्ग का अनुसरण नहीं करते हैं उन सबको निश्चित ही दंड दिया जाएगा, भले ही वे बिल्कुल अंत तक अनुसरण करते रहें। यह परमेश्वर की धार्मिकता है। जब यह धार्मिक स्वभाव मनुष्य के दंड में व्यक्त होता है, तो मनुष्य भौंचक्का रह जाता है, और उसे अफसोस होता है कि परमेश्वर का अनुसरण करते हुए उसने उसके मार्ग का अनुसरण क्यों नहीं किया। “उस समय, परमेश्वर का अनुसरण करते हुए मैंने केवल थोड़ा-सा ही कष्ट सहा, किंतु मैंने परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण नहीं किया। इसके लिए क्या बहाने बनाये जा सकते हैं? ताड़ना दिए जाने के सिवाय और कोई विकल्प नहीं है!” फिर भी वह अपने मन में सोच रहा होता है, “जो भी हो, मैंने तेरा अंत तक अनुगमन किया है, अगर तू मुझे ताड़ना भी देगा, तो वह ताड़ना बहुत कठोर नहीं हो सकती, और मेरी ताड़ना करने के बाद भी तू मुझे चाहेगा। मैं जानता हूँ कि तू धार्मिक है, और तू हमेशा मेरे साथ इस प्रकार का व्यवहार नहीं करेगा। आखिरकार, मैं उनके समान नहीं हूँ जिन्हें मिटा दिया जाएगा; जो मिटा दिए जाएँगे, उन्हें कठोर ताड़ना मिलेगी, जबकि मेरी ताड़ना हल्की होगी।” परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव वैसा नहीं है जैसा तुम कहते हो। ऐसा नहीं है कि जो लोग अपने पाप सही तरह से स्वीकारते हैं उनके साथ नरमी से निपटा जाता है। धार्मिकता पवित्रता है, और एक ऐसा स्वभाव है जो मनुष्य के द्वारा अपमान को सहन नहीं कर सकता, और वह सब कुछ जो अशुद्ध है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, वह परमेश्वर की घृणा का पात्र है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव व्यवस्था नहीं, बल्कि प्रशासनिक आज्ञा है : यह राज्य के भीतर एक प्रशासनिक आज्ञा है, और यह प्रशासनिक आज्ञा हर उस व्यक्ति के लिए धार्मिक दंड है जिसमें सत्य नहीं है और जो परिवर्तित नहीं हुआ है, और जिसके उद्धार की कोई गुंजाइश नहीं है। क्योंकि जब प्रत्येक व्यक्ति को उसकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, तो अच्छे को पुरस्कार और बुरे को दंड दिया जाएगा। इसी समय मनुष्य के गंतव्य को भी प्रकट किया जाएगा; यह वह समय होगा जब उद्धार का कार्य भी समाप्त हो जाएगा, उसके बाद मनुष्य के उद्धार का कार्य नहीं किया जाएगा, और बुराई करने वाले हर इंसान को कठोर दंड दिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
568. मेरी दया उन पर अभिव्यक्त होती है जो मुझसे प्रेम करते हैं और स्वयं का त्याग करते हैं। इस बीच, कुकर्मियों को मिला दंड निश्चित रूप से मेरे धार्मिक स्वभाव का प्रमाण है, और उससे भी बढ़कर, मेरे क्रोध की गवाही है। जब आपदा आएगी, तो मेरा विरोध करने वाले सभी अकाल और महामारी के शिकार हो जाएँगे और विलाप करेंगे। जिन्होंने कई वर्षों तक मेरा अनुसरण किया है, लेकिन सभी तरह के बुरे कर्म किए हैं, वे अपने पापों का फल भुगतने से नहीं बचेंगे; वे भी लाखों वर्षों में कभी-कभार ही दिखने वाली आपदा में डुबा दिए जाएँगे, और वे लगातार आतंक और भय की स्थिति में जिएँगे। और मेरे वे अनुयायी, जिन्होंने मेरे प्रति परम निष्ठा दर्शाई है, वे आनंद लेंगे और गुणगान करेंगे, मेरी शक्ति की प्रशंसा करेंगे। वे बेफिक्र खुशी की अवर्णनीय मनोदशा का अनुभव करेंगे और ऐसे आनंद में रहेंगे जो मैंने मानवजाति को पहले कभी प्रदान नहीं किया है। क्योंकि मैं मनुष्य के अच्छे कर्मों को सँजोकर रखता हूँ और उसके बुरे कर्मों से घृणा करता हूँ। जबसे मैंने पहली बार मानवजाति की अगुआई करनी आरंभ की, तबसे मैं उत्सुकतापूर्वक मनुष्यों के ऐसे समूह को पाने की आशा करता रहा हूँ, जो मेरे साथ एकचित्त हों। इस बीच मैं उन लोगों को कभी नहीं भूलता, जो मेरे साथ एकचित्त नहीं हैं; अपने हृदय में मैं हमेशा उनसे नफरत करता हूँ, उन्हें बुरे कर्मों के जवाब देने को मजबूर करने के अवसर की प्रतीक्षा करता हूँ, जो कुछ ऐसा है जिसे देखकर मुझे खुशी होगी। अब अंततः मेरा दिन आ गया है, और मुझे अब और प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार करो