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सबसे असल है परमेश्वर का प्रेम

I

ईश्वर के तुम सब में जीत के कार्य, ये कितना महान उद्धार है।

तुम में से हर एक शख़्स, भरा है पाप और अनैतिकता से।

अब तुम हुए रूबरू ईश्वर से, वो ताड़ना देता है और न्याय करता है।

तुम पाते हो उसका महान उद्धार, तुम पाते हो उसका महानतम प्यार।

ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है।

ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है।

ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

II

ईश्वर नहीं चाहता कि वो नष्ट करे मानवजाति

को जिसे बनाया उसने अपने हाथों से।

वो बचाने की पूरी कोशिश कर रहा है,

तुम्हारे बीच में वह बोलता और काम करता है।

ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है।

ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

III

ईश्वर तुमसे नफरत नहीं करता है, उसका प्यार निश्चित ही है सबसे सच्चा।

वो जांचता है क्योंकि मानव नाफ़रमानी करता है,

ये बचाने की केवल एक ही राह है।

क्योंकि तुम नहीं जानते कि कैसे जीना है,

और तुम जीते हो ऐसी जगह में, मैली और पाप से भरी,

उसे न्याय करना ही होगा तुम्हें बचाने को।

IV

ईश्वर नहीं चाहते कि तुम नीचे गिरो, ना जीओ इस मैली जगह में।

शैतान द्वारा कुचले या नर्क में गिर जाओ।

मानव को बचाने के लिए है ईश्वर की जीत।

ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है।

ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

ईश्वर जो भी करता है वो प्यार है। तुम्हारे पापों का न्याय करता है।

ताकि परखो तुम खुद को। ताकि तुम्हें प्राप्त हो उद्धार।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं प्रश्न 26: बाइबल ईसाई धर्म का अधिनियम है और जो लोग प्रभु में विश्वास करते हैं, उन्होंने दो हजार वर्षों से बाइबल के अनुसार ऐसा विश्वास किया हैं। इसके अलावा, धार्मिक दुनिया में अधिकांश लोग मानते हैं कि बाइबल प्रभु का प्रतिनिधित्व करती है, कि प्रभु में विश्वास बाइबल में विश्वास है, और बाइबल में विश्वास प्रभु में विश्वास है, और यदि कोई बाइबल से भटक जाता है तो उसे विश्वासी नहीं कहा जा सकता। कृपया बताओ, क्या मैं पूछ सकता हूँ कि इस तरीके से प्रभु पर विश्वास करना प्रभु की इच्छा के अनुरूप है या नहीं?