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127 परमेश्वर की इच्छा खुली रही है सबके लिए

I

इन्सान के सृजन से,

परमेश्वर का स्वरूप, उसकी इच्छा, स्वभाव और वो जो है,

इन्सान के सृजन से,

परमेश्वर का स्वरूप, उसकी इच्छा, स्वभाव और वो जो है,

रहा है खुला, खुला सभी के लिए, रहा है खुला, खुला सभी के लिए।

II

परमेश्वर ने जानकर अपना सार छुपाया नहीं कभी,

न अपना स्वभाव, न इच्छा ही।

चूँकि इन्सान नहीं देता उसके कार्य, इच्छा पर ध्यान,

इन्सान की परमेश्वर के बारे में समझ है अति कमज़ोर।

इन्सान के सृजन से,

परमेश्वर का स्वरूप, उसकी इच्छा, स्वभाव और वो जो है,

रहा है खुला, खुला सभी के लिए, रहा है खुला, खुला सभी के लिए।

III

मायने हैं इसके कि जब परमेश्वर अपना व्यक्तित्व छुपाता है,

वो इन्सान के साथ ही हर समय खड़ा रहता है,

हर पल अपनी इच्छा, स्वभाव और सार प्रकट करता है।

एक अर्थ में, परमेश्वर का व्यक्तित्व सबके लिए खुला है।

चूँकि इन्सान अनाज्ञाकारी और अँधा है,

परमेश्वर के प्रकटन को वो देख नहीं पाता है,

परमेश्वर के प्रकटन को देख नहीं पाता है।

इन्सान के सृजन से,

परमेश्वर का स्वरूप, उसकी इच्छा, स्वभाव और वो जो है,

रहा है खुला, खुला सभी के लिए, रहा है खुला, खुला सभी के लिए।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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