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प्रार्थना का महत्व

I

प्रार्थनाएँ वह मार्ग होती हैं जो जोड़ें मानव को परमेश्वर से,

जिससे वह पुकारे पवित्र आत्मा को

और प्राप्त करे स्पर्श परमेश्वर का।

जितनी करोगे प्रार्थना, उतना ही स्पर्श पाओगे,

प्रबुद्ध होगे और मन में शक्ति आएगी।

ऐसे ही लोगों को मिल सकती है पूर्णता शीघ्र ही,

शीघ्र ही, शीघ्र ही, शीघ्र ही।

II

तो जो ना करे प्रार्थना वह है जैसे मृत बिना आत्मा के।

ना मिले स्पर्श परमेश्वर का,

ना कर सके अनुपालन परमेश्वर के कार्यों के।

जो नहीं करोगे प्रार्थना तो छूट जाएगा सामान्य आत्मिक जीवन,

नहीं पाओगे परमेश्वर का साथ; वो तुमको अपनाएगा नहीं,

वो तुमको अपनाएगा नहीं।

जितनी करोगे प्रार्थना, उतना ही स्पर्श पाओगे,

प्रबुद्ध होगे और मन में शक्ति आएगी।

ऐसे ही लोगों को मिल सकती है पूर्णता शीघ्र ही,

ऐसे ही लोगों को मिल सकती है पूर्णता शीघ्र ही,

शीघ्र ही, शीघ्र ही, शीघ्र ही, शीघ्र ही।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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प्रश्न 24: तुम यह प्रमाण देते हो कि प्रभु यीशु पहले से ही सर्वशक्तिमान परमेश्वर के रूप में वापस आ चुका है, कि वह पूरी सच्चाई को अभिव्यक्त करता है जिससे कि लोग शुद्धिकरण प्राप्त कर सकें और बचाए जा सकें, और वर्तमान में वह परमेश्वर के घर से शुरू होने वाले न्याय के कार्य को कर रहा है, लेकिन हम इसे स्वीकार करने की हिम्मत नहीं करते। यह इसलिए है क्योंकि धार्मिक पादरियों और प्राचीन लोगों का हमें बहुधा यह निर्देश है कि परमेश्वर के सभी वचन और कार्य बाइबल में अभिलेखित हैं और बाइबल के बाहर परमेश्वर का कोई और वचन या कार्य नहीं हो सकता है, और यह कि बाइबल के विरुद्ध या उससे परे जाने वाली हर बात विधर्म है। हम इस समस्या को समझ नहीं सकते हैं, तो तुम कृपया इसे हमें समझा दो। केवल परमेश्वर के प्रबंधन के मध्य ही मनुष्य बचाया जा सकता है परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है बुलाए हुए बहुत हैं, परन्तु चुने हुए कुछ ही हैं