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बेहद दयालु और अत्यंत क्रोधी है परमेश्वर

I

परमेश्वर की दया और उसके क्रोध का अस्तित्व है,

ये कितना असली, कितना सच्चा है,

मगर जब अपने क्रोध को वो बेलगाम करता है,

तो उसकी पवित्रता और धार्मिकता

इंसान को परमेश्वर का वो पहलू भी दिखाते हैं

जो अपमान सहन नहीं करता।

जब इंसान परमेश्वर के आदेशों का अनुसरण और पालन कर पाता है

और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार चल पाता है,

तो इंसान के लिये विपुल और भरपूर होती है दया परमेश्वर की।

जब भर जाता है इंसान दूषण से, घृणा से और शत्रुता से परमेश्वर के लिये,

तो दिखाएगा अतिशय क्रोध परमेश्वर।

और किस हद तक होगा क्रोध परमेश्वर का?

बना रहेगा क्रोध उसका तब तक,

देख न ले वो इंसान में बचे नहीं दुष्कर्म और विरोध तब तक,

नहीं हैं वे परमेश्वर की नज़र के सामने तब तक।

विलीन होगा परमेश्वर का क्रोध तभी।

II

कोई भी हो इंसान, दूर हो गया दिल उसका परमेश्वर से अगर,

कभी न लौटने के लिये मुँह फेर लिया परमेश्वर से अगर,

दिखाने भर को या इच्छा से करना चाहता हो आराधना,

अनुसरण और आज्ञापालन परमेश्वर का तन से या विचारों से,

एक बार गर हो गया दिल दूर परमेश्वर से,

तो प्रवाहित होगा क्रोध परमेश्वर का बिना रुके।

देकर मौके इंसान को बहुतायत में,

जब करता है परमेश्वर क्रोध प्रवाहित गहराई से,

तो राह नहीं होगी कोई भी वापस लेने की इसे,

फिर कभी न होगा दयावान और सहनशील परमेश्वर,

ऐसे मानव के लिये।

ये एक पहलू है परमेश्वर के उस स्वभाव का,

जो करता नहीं सहन कभी अपमान कोई।

चीज़ें जो सुंदर हैं, उदार हैं, अच्छी हैं,

वो सहनशील हैं, दयावान हैं उनके लिये।

चीज़ें जो बुरी हैं, पापमयी हैं और दुष्ट हैं,

वो महाक्रोधी है उनके लिये,

इतना कि वो अनवरत करता है क्रोध प्रवाहित,

इतना कि वो अनवरत करता है क्रोध प्रवाहित।

यही दो मुख्य पहलू हैं परमेश्वर के स्वभाव के,

आदि से अंत तक प्रकट करता है इन्हें परमेश्वर:

भरपूर दया और अत्यंत क्रोध।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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