धर्म-संबंधी धारणाओं का खुलासा
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 281
परमेश्वर और मनुष्य के बारे में बराबरी पर बात नहीं की जा सकती। परमेश्वर का सार और कार्य मनुष्य के लिए सर्वाधिक अथाह और समझ से परे हैं। यदि परमेश्वर मानवजाति के बीच व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य न करे और अपने वचन न कहे तो चाहे कुछ भी हो जाए, मनुष्य कभी भी परमेश्वर के इरादे नहीं समझ पाएगा। और इसलिए वे लोग भी जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर को समर्पित कर दिया है, उसका अनुमोदन प्राप्त नहीं कर पाएँगे। यदि परमेश्वर कार्य करना शुरू न करे तो मनुष्य चाहे कितना भी अच्छा क्यों न करे, वह सब व्यर्थ हो जाएगा क्योंकि परमेश्वर के विचार मनुष्य के विचारों से सदैव ऊँचे रहेंगे और परमेश्वर की बुद्धि की थाह कोई भी व्यक्ति नहीं ले सकता है। और इसीलिए मैं कहता हूँ कि जो लोग परमेश्वर और उसके कार्य को “पूरी तरह से समझते हैं” वे अयोग्यों की जमात हैं; वे सभी अहंकारी और अज्ञानी हैं। मनुष्य को परमेश्वर के कार्य को सीमित नहीं करना चाहिए; और तो और, मनुष्य परमेश्वर के कार्य को सीमित नहीं कर सकता है। परमेश्वर की दृष्टि में मनुष्य तो एक चींटी से भी छोटा है; तो फिर वह परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? जो लोग हमेशा बढ़-चढ़कर कहते फिरते हैं, “परमेश्वर इस तरह से या उस तरह से कार्य नहीं करता,” या “परमेश्वर ऐसा है या वैसा है”—क्या वे अहंकारपूर्वक नहीं बोलते? हम सबको जानना चाहिए कि मनुष्य, जो कि देह का है, शैतान द्वारा भ्रष्ट किया जा चुका है, कि उसकी प्रकृति ही है परमेश्वर का विरोध करना, और यह कि वह परमेश्वर के समान नहीं हो सकता, परमेश्वर के कार्य की जहाँ तक बात है, उसके लिए तो वह कोई परामर्श बिल्कुल भी नहीं दे सकता। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि परमेश्वर मनुष्य का मार्गदर्शन कैसे करता है, तो यह स्वयं परमेश्वर का कार्य है। यह उचित है कि इस या उस दृष्टिकोण को पालने के बजाय मनुष्य को समर्पण करना चाहिए, क्योंकि मनुष्य धूल मात्र है। चूँकि हमारा उद्देश्य परमेश्वर की खोज करना है, इसलिए हमें अपनी धारणाएँ मानो परमेश्वर के विचारार्थ उसके कार्य पर नहीं थोपनी चाहिए और अपने भ्रष्ट स्वभाव का उपयोग करके जानबूझकर तथा हठपूर्वक परमेश्वर के कार्य का विरोध तो बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए। क्या ऐसा करना हमें मसीह-विरोधी नहीं बनाएगा? ऐसे लोगों को बिल्कुल भी परमेश्वर में विश्वास करने वाले कैसे कहा जा सकता है? चूँकि हम विश्वास करते हैं कि परमेश्वर है, और चूँकि हम उसे संतुष्ट करना और उसे देखना चाहते हैं, इसलिए हमें सत्य का मार्ग खोजना चाहिए, और परमेश्वर की अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए। हमें परमेश्वर के अड़ियल विरोध में खड़े नहीं होना चाहिए। ऐसे क्रियाकलापों से क्या भला हो सकता है?
आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है। हो सकता है, तुम इन वचनों को स्वीकार न कर पाओ और ये तुम्हें असामान्य लगें, पर मैं तुम्हें सलाह दूँगा कि तुम फिलहाल अपनी स्वाभाविकता प्रकट मत करो, क्योंकि जो लोग परमेश्वर के समक्ष धार्मिकता के लिए सचमुच भूख-प्यास रखते हैं केवल वे ही सत्य को प्राप्त कर सकते हैं, और जो सचमुच धर्मनिष्ठ हैं केवल वे ही परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जा सकते हैं और उसका मार्गदर्शन पा सकते हैं। नतीजे संयम और शांति के साथ सत्य खोजने से मिलते हैं, झगड़े और विवाद से नहीं। जब मैं यह कहता हूँ कि “आज परमेश्वर ने नया कार्य किया है” तो मैं परमेश्वर के देह में लौटने की बात कर रहा हूँ। शायद ये वचन तुम्हें व्याकुल न करते हों; शायद तुम इनका तिरस्कार करते हो; या शायद ये तुम्हारे लिए बड़े रुचिकर हों। चाहे जो भी मामला हो, मुझे आशा है कि जो लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रकट होने की लालसा रखते हैं, वे इस तथ्य का सामना करेंगे और इसके बारे में जल्दबाज़ी में निष्कर्ष निकालने के बजाय इसकी सावधानीपूर्वक जाँच करेंगे; एक बुद्धिमान व्यक्ति को यही करना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 282
परमेश्वर पर विश्वास करने में, परमेश्वर को कैसे जानना चाहिए? परमेश्वर को बिना किसी भटकाव या भ्रामकता के उसके वर्तमान वचनों और कार्य के आधार पर जानना चाहिए, और अन्य सभी चीजों से पहले परमेश्वर के कार्य को जानना चाहिए, जो स्वयं परमेश्वर को जानने का आधार है। वे तमाम प्रकार की भ्रांतियाँ जिनमें परमेश्वर के वचनों की शुद्ध समझ नहीं है, धार्मिक धारणाएँ हैं, वे विकृत समझ हैं। धार्मिक हस्तियों का सबसे बड़ा कौशल यह है कि वे अतीत में समझे गए परमेश्वर के वचनों के आधार पर उसके आज के वचनों की जाँच करते हैं। यदि आज के परमेश्वर की सेवा करते हुए, तुम अतीत में पवित्र आत्मा के प्रबोधन द्वारा खुलासा की गई बातों को पकड़े रहते हो, तो तुम्हारी सेवा गड़बड़ी पैदा करेगी, वह एक तरह से पुराना अभ्यास बन जाएगी, जो धार्मिक अनुष्ठानों से अधिक कुछ नहीं होगा। यदि तुम यह विश्वास करते हो कि जो परमेश्वर की सेवा करते हैं उनमें बाह्य रूप से, अन्य गुणों के साथ-साथ, विनम्रता और धैर्य का होना आवश्यक है, और यदि तुम आज इस प्रकार के ज्ञान को अभ्यास में लाते हो, तो ऐसा ज्ञान एक धार्मिक धारणा है; इस प्रकार से अभ्यास करना पाखंड प्रदर्शित करना है। “धार्मिक धारणाएँ” उन बातों को दर्शाती हैं जो पुरानी हो चुकी हैं (इनमें परमेश्वर द्वारा पहले कहे गए वचनों की समझ और पवित्र आत्मा के सीधे प्रबोधन का प्रकाश शामिल है) और यदि उन्हें आज अभ्यास में लाया जाता है, तो वे परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ करती हैं और मनुष्य को कोई लाभ नहीं पहुँचाती हैं। यदि मनुष्य स्वयं को उन चीजों से मुक्त नहीं कर पाता है जो धार्मिक धारणाओं से जुड़ी हैं, तो ये चीजें मनुष्य द्वारा परमेश्वर की सेवा में बहुत बड़ी बाधा बन जाएँगी। धार्मिक धारणाओं वाले लोगों के पास पवित्र आत्मा के कार्यों के साथ कदम से कदम मिलाकर चलने का कोई उपाय नहीं है, वे एक कदम, फिर दो कदम पीछे हो जाएंगे—क्योंकि ये धार्मिक धारणाएँ मनुष्य को बेहद आत्मतुष्ट और घमंडी बना देती हैं। परमेश्वर अतीत में कही गई अपनी बातों और अपने द्वारा किए गए कार्यों के प्रति कोई मोह महसूस नहीं करता, यदि कुछ अप्रचलित हो गया है, तो वह उसे हटा देता है। क्या तुम सचमुच अपनी धारणाओं को त्यागने में असमर्थ हो? यदि तुम परमेश्वर के पूर्व में कहे गए वचनों से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध होता है कि तुम परमेश्वर के कार्य को जानते हो? यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान प्रकाश को स्वीकार करने में असमर्थ हो और इसके बजाय अतीत के प्रकाश से चिपके रहते हो, तो क्या इससे यह सिद्ध हो सकता है कि तुम परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते हो? क्या तुम अभी भी धार्मिक धारणाओं को छोड़ पाने में असमर्थ हो? यदि ऐसा है, तो तुम परमेश्वर का विरोध करने वाले बन जाओगे।
यदि लोग धार्मिक धारणाओं को छोड़ सकें, तो वे आज परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य को मापने के लिए अपने दिमाग का इस्तेमाल नहीं करेंगे, और इसके बजाय सीधे तौर पर समर्पण करेंगे। भले ही परमेश्वर का आज का कार्य साफ़ तौर पर अतीत के कार्य से अलग है, तुम फिर भी अतीत के विचारों का त्याग कर पाने और आज सीधे तौर पर परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो। यदि तुम यह समझने में सक्षम हो कि तुम्हारे लिए परमेश्वर के आज के कार्य को सबसे प्रमुख स्थान देना जरूरी है, चाहे अतीत में परमेश्वर ने कैसे भी कार्य किया हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो अपनी धारणाओं को छोड़ चुका है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है, और जो परमेश्वर के कार्य और वचनों के प्रति समर्पण करने और उसके पदचिह्नों पर चलने में सक्षम है। इस तरह, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है। तुम परमेश्वर के कार्य का विश्लेषण या जांच नहीं करते हो; यह ऐसा है मानो परमेश्वर अपने अतीत के कार्य को भूल चुका है और तुम भी उसे भूल चुके हो। वर्तमान ही वर्तमान है, और अतीत बीता हुआ कल हो चुका है, और चूँकि आज परमेश्वर ने अतीत में किए गए अपने कार्य को अलग कर दिया है, तुम्हें भी उस पर टिके नहीं रहना चाहिए। केवल ऐसा ही व्यक्ति वह व्यक्ति है जो परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण करता है और जिसने अपनी धार्मिक धारणाओं को पूरी तरह से त्याग दिया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 283
क्योंकि परमेश्वर के कार्य में हमेशा नई प्रगति होती रहती है, कुछ ऐसा कार्य है जो नए कार्य के सामने आने पर अप्रचलित और पुराना हो जाता है। ये विभिन्न प्रकार के नए और पुराने कार्य परस्पर विरोधी नहीं हैं, बल्कि एक-दूसरे के पूरक हैं; हर अगला चरण पिछले चरण का अनुसरण करता है। क्योंकि नया कार्य हो रहा है, इसलिए पुरानी चीजें बेशक हटा दी जानी चाहिए। उदाहरण के लिए, लंबे समय से चली आ रही कुछ प्रथाओं और पारंपरिक कहावतों ने, मनुष्य के कई सालों के अनुभव और सीखे गए सबकों के साथ मिलकर, मनुष्य के मन में अनेक तरह और रूपों की धारणाएँ बना दी हैं। परमेश्वर ने अभी तक अपना वास्तविक चेहरा और अंतर्निहित स्वभाव मनुष्य के सामने पूरी तरह से प्रकट नहीं किया है—साथ ही अतीत से लेकर वर्तमान तक कई वर्षों से परंपरागत सिद्धांतों का फैलाव जारी है—जो मनुष्य के ऐसी धारणाएँ बनाने में और भी अधिक सहायक है। ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास में, विभिन्न धारणाओं का प्रभाव रहा है जिसके कारण लोगों में परमेश्वर के बारे में सभी प्रकार की धारणात्मक समझ निरंतर उत्पन्न और विकसित होती रही है, जिसके कारण कई ऐसे धार्मिक लोग जो परमेश्वर की सेवा करते हैं, उसके शत्रु बन गए हैं। इसलिए, लोगों की धार्मिक धारणाएं जितनी अधिक मजबूत होती हैं, वे परमेश्वर का विरोध उतना ही अधिक करते हैं, और वे परमेश्वर के उतने ही अधिक दुश्मन बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता—वह कभी भी विनियम नहीं बनाता है; बल्कि यह निरंतर विभिन्न स्तरों के बदलाव और नवीनीकरण से गुजरता रहता है। परमेश्वर का इस तरह कार्य करना उसके अंतर्निहित स्वभाव की अभिव्यक्ति है। यह परमेश्वर के कार्य का निहित सिद्धांत भी है और कार्य करने के उन तरीकों में से एक है जिनके माध्यम से परमेश्वर अपना प्रबंधन निष्पादित करता है। यदि परमेश्वर इस प्रकार से कार्य न करे, तो मनुष्य नहीं बदलेगा या परमेश्वर को जान नहीं पाएगा और शैतान पराजित नहीं होगा। इसलिए, उसके कार्य में निरंतर परिवर्तन होता रहता है जो अनिश्चित दिखाई देता है, परंतु वास्तव में ये निश्चित अवधियों में होने वाले परिवर्तन हैं। हालाँकि, मनुष्य जिस प्रकार से परमेश्वर में विश्वास करता है, वह बहुत अलग है। वह पुराने, परिचित विनियमों और पद्धतियों से चिपका रहता है, और वे जितने पुराने होते हैं, उसे उतने ही प्रिय लगते हैं। मनुष्य का मूर्ख मन, जो पत्थर के समान अपरिवर्तनशील है, परमेश्वर के इतने सारे अथाह नए कार्यों और वचनों को कैसे स्वीकार कर सकता है? मनुष्य हमेशा नया बने रहने वाले और कभी पुराना न पड़ने वाले परमेश्वर को नापसंद करता है; वह हमेशा ही केवल उस पुराने परमेश्वर को पसंद करता है जिसके दाँत लंबे और बाल सफेद हैं और जो चल-फिर नहीं सकता है। इस प्रकार, क्योंकि परमेश्वर और मनुष्य, दोनों की अपनी-अपनी “पसंद” है, मनुष्य परमेश्वर का बैरी बन गया है। इनमें से बहुत से विरोधाभास आज भी मौजूद हैं, एक ऐसे समय में जब परमेश्वर लगभग छह हजार सालों से नया कार्य करता आ रहा है। तो वे किसी भी इलाज से परे हैं। शायद मनुष्य के हठ के कारण या शायद किसी भी मनुष्य द्वारा परमेश्वर के प्रशासनिक आदेशों की अलंघनीयता के कारण, वे पुरुष और महिला पादरी अभी भी घिसी-पिटी किताबों और दस्तावेजों से चिपके रहते हैं, जबकि परमेश्वर अपने प्रबंधन के अपूर्ण कार्य को पूरा करने में इस तरह लगा रहता है मानो कोई भी देख नहीं रहा हो। भले ही ऐसे प्रतिकूल विरोधाभास मौजूद हैं जिनका समाधान करना संभव नहीं है, परमेश्वर उन पर बिल्कुल ध्यान नहीं देता है, मानो वे होकर भी नहीं हैं। लेकिन मनुष्य तब भी अपने विश्वास और धारणाओं से चिपका रहता है और उन्हें कभी छोड़ता नहीं है। फिर भी, एक बात स्वतःस्पष्ट है : भले ही मनुष्य अपने रुख से विचलित नहीं होता है, परमेश्वर के “कदम” हमेशा एक स्थान पर टिके नहीं रहते हैं और वह अपना रुख परिवेश के अनुसार हमेशा बदलता रहता है। अंत में, यह मनुष्य ही होगा जो बिना लड़ाई लड़े हार जाएगा। परमेश्वर, इस समय, अपने पराजित दुश्मनों का “सबसे बड़ा शत्रु” है और वह मानवजाति का “परम विजेता” भी है, समान रूप से पराजित और अपराजित दोनों का। परमेश्वर के साथ कौन लड़ सकता है और विजयी हो सकता है? मनुष्य की धारणाएँ परमेश्वर से आती हुई प्रतीत होती हैं, क्योंकि उनमें से कई परमेश्वर के कार्य के साथ ही थोड़ा-थोड़ा करके आई हैं। जो भी हो, परमेश्वर इस कारण से मनुष्य को क्षमा नहीं कर देता, वह अपने कार्य के साथ ही खेप-दर-खेप “परमेश्वर के लिए” ऐसे उत्पाद उत्पन्न करने के लिए मनुष्य की प्रशंसा तो बिल्कुल नहीं करता है जो उसके कार्यक्षेत्र के बाहर हों। इसके बजाय, वह मनुष्य की धारणाओं और पुरानी भक्ति से बेहद घृणा करता है और उसका इरादा उस तारीख पर ध्यान देने तक का नहीं है जब ये धारणाएँ सबसे पहले सामने आई थीं। वह इस बात को बिल्कुल स्वीकार नहीं करता है कि ये धारणाएँ उसके कार्य के कारण पैदा हुई हैं, क्योंकि मनुष्य की धारणाएँ मनुष्य के संसर्ग से आती हैं; उनका स्रोत मनुष्य की सोच और दिमाग है—परमेश्वर नहीं, बल्कि शैतान है। परमेश्वर का इरादा हमेशा यही रहा है कि उसके कार्य नए और जीवित रहें, पुराने या मृत नहीं, और जिन बातों को वह मनुष्य को दृढ़ता से थामे रखने के लिए कहता है वे युगों और कालों में विभाजित हैं, न कि अनंत और स्थिर हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वह परमेश्वर ही है जिसके कारण मनुष्य जीवित रहता है और नया बनता है, न कि शैतान जो मनुष्य को मृत और पुराना बने रहने देना चाहता है। क्या तुम लोग अभी भी यह नहीं समझते हो? तुममें परमेश्वर के बारे में धारणाएँ हैं और तुम उन्हें छोड़ पाने में सक्षम नही हो, ऐसा चीजों को समझने में तुम्हारी विफलता के कारण है—ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर के कार्य के भीतर तर्क का बहुत अभाव है और न ही इसलिए कि परमेश्वर का कार्य मनुष्य के प्रति विचारशील नहीं है; ऐसा इसलिए तो बिल्कुल नहीं है क्योंकि परमेश्वर अपने उचित कार्य पर कभी ध्यान नहीं देता है। तुम अपनी धारणाओं को इसलिए नहीं छोड़ पाते हो क्योंकि तुम्हारे अंदर समर्पण की अत्यधिक कमी है, और क्योंकि तुममें परमेश्वर द्वारा सृजित प्राणी की थोड़ी सी भी समानता नहीं है; ऐसा इसलिए नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजों को कठिन बना रहा है। यह सब कुछ तुम्हारे ही कारण हुआ है और इसका परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है; सारे कष्ट और विपदा मनुष्य ने ही पैदा किए हैं। परमेश्वर की सोच हमेशा अच्छी होती है : वह तुम्हें धारणाएँ विकसित करने देना नहीं चाहता, बल्कि वह चाहता है कि युगों के बदलने के साथ-साथ तुम भी नवीनीकृत हो जाओ और परिवर्तन से गुजरो। फिर भी तुम नहीं जानते कि तुम्हारे लिए क्या अच्छा है, और तुम हमेशा परख या विश्लेषण कर रहे होते हो। ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम्हारे लिए चीजें मुश्किल बना रहा है, बल्कि तुममें ही परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है और तुम्हारी विद्रोहशीलता बहुत ज्यादा है। एक अदना-सा सृजित प्राणी पूर्व में परमेश्वर द्वारा दी गई किसी चीज के एक मामूली-से हिस्से को लेकर और पलटकर उसी से परमेश्वर पर प्रहार करने का साहस करता है—क्या यह मनुष्य का विद्रोह नहीं है? यह कहना उचित होगा कि परमेश्वर के सामने अपने विचारों को व्यक्त करने में मनुष्य पूरी तरह से अयोग्य है, और वह अपनी व्यर्थ की, बदबूदार, सड़ी-गली, पुरानी शब्दावली के साथ अपनी मनमानी करने में तो और भी अयोग्य है—उन घिसी-पिटी धारणाओं का तो कहना ही क्या। क्या वे और भी बेकार नहीं हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो परमेश्वर के वर्तमान कार्य को जानते हैं वे ही परमेश्वर की सेवा कर सकते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 284
परमेश्वर का कार्य निरंतर आगे बढ़ता रहता है और यद्यपि उसके कार्य का प्रयोजन नहीं बदलता, फिर भी जिन तरीकों से वह कार्य करता है वे निरंतर बदलते रहते हैं; इसलिए जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे भी निरंतर बदलते रहते हैं। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, परमेश्वर के बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक पूर्ण होता जाता है। परमेश्वर के कार्य के परिणामस्वरूप मनुष्य के स्वभाव में तदनुरूप बदलाव आता है। लेकिन चूँकि परमेश्वर का कार्य हमेशा बदलता रहता है, इसलिए पवित्र आत्मा के कार्य को न समझने वाले और वे बेतुके लोग जो सत्य नहीं समझते, परमेश्वर का विरोध करने वाले लोग बन जाते हैं। परमेश्वर का कार्य कभी भी मनुष्यों की धारणाओं के अनुरूप नहीं होता, क्योंकि उसका कार्य हमेशा नया होता है और कभी भी पुराना नहीं होता, न ही वह कभी पुराने कार्य को दोहराता है, बल्कि वह कार्य करता है जिसे उसने पहले कभी नहीं किया है। चूँकि परमेश्वर अपने कार्य को दोहराता नहीं और मनुष्य परमेश्वर द्वारा अतीत में किए गए कार्य के आधार पर ही उसके आज के कार्य का आकलन करता है, इस कारण परमेश्वर के लिए नए युग के कार्य के प्रत्येक चरण को करना लगातार अत्यंत कठिन हो गया है। मनुष्य के सामने बहुत अधिक मुश्किलें हैं! मनुष्य की सोच बहुत ही रूढ़िवादी है! कोई भी मनुष्य परमेश्वर के कार्य को नहीं जानता, फिर भी हर कोई उसे सीमा में बांध देता है। जब मनुष्य परमेश्वर से दूर जाता है, तो वह जीवन, सत्य और परमेश्वर के आशीषों को खो देता है, फिर भी मनुष्य न तो सत्य, और न ही जीवन को स्वीकार करता है, परमेश्वर द्वारा मानवजाति को प्रदान किए जाने वाले अधिक बड़े आशीषों को तो बिल्कुल ग्रहण नहीं करता। सभी लोग परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हैं, लेकिन परमेश्वर के कार्य में कोई बदलाव सहन नहीं करते। जो लोग परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार नहीं करते, उन्हें लगता है परमेश्वर का कार्य अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा ठहरा रहता है। उनके विश्वास के अनुसार, परमेश्वर से अनंत उद्धार प्राप्त करने के लिए जो कुछ भी आवश्यक है, वह है व्यवस्था का पालन करना, जब तक वे पश्चात्ताप करेंगे और अपने पापों को स्वीकार करेंगे, परमेश्वर के इरादे हमेशा संतुष्ट होंगे। वे इस विचार के हैं कि परमेश्वर केवल वही हो सकता है जो व्यवस्था के अधीन है और जिसे मनुष्य के लिए सलीब पर चढ़ाया गया था; उनका यह भी विचार है कि परमेश्वर न तो बाइबल से बढ़कर होना चाहिए और न ही वो हो सकता है। उनके इन्हीं विचारों ने उन्हें पुरानी व्यवस्था से दृढ़ता से बाँध रखा है और मृत विनियमों में जकड़कर रखा है। ऐसे लोग तो और भी हैं जो यह मानते हैं कि परमेश्वर का नया कार्य जो भी हो, उसे भविष्यवाणियों द्वारा सही साबित किया जाना ही चाहिए और कार्य के प्रत्येक चरण में, जो भी “सच्चे” मन से उसका अनुसरण करते हैं, उन्हें प्रकाशन भी अवश्य दिखाया जाना चाहिए; अन्यथा वह कार्य परमेश्वर का कार्य नहीं हो सकता। परमेश्वर को जानना मनुष्य के लिए पहले ही आसान कार्य नहीं है। मनुष्य के बेतुके हृदय और उसकी अभिमान एवं दंभी विद्रोही प्रकृति को देखते हुए, परमेश्वर के नए कार्य को ग्रहण करना मनुष्य के लिए और भी अधिक कठिन है। मनुष्य न तो परमेश्वर के नए कार्य की सावधानीपूर्वक जाँच करता है, न ही उसे विनम्रता से स्वीकार करता है; इसके बजाय मनुष्य परमेश्वर से प्रकाशन और मार्गदर्शन का इंतजार करते हुए उसके प्रति तिरस्कार का रवैया अपनाता है। क्या ये अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर से विद्रोह और उसका विरोध करने वाले मनुष्य की नहीं हैं? इस प्रकार के मनुष्य कैसे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त कर सकते हैं?
यीशु ने कहा था कि यहोवा का कार्य अनुग्रह के युग में पीछे छूट गया था, वैसे ही जैसे मैं आज कहता हूँ कि यीशु का कार्य भी पीछे छूट गया है। यदि केवल व्यवस्था का युग होता और अनुग्रह का युग न होता, तो यीशु को सलीब पर नहीं चढ़ाया गया होता और वह पूरी मानवजाति को छुटकारा नहीं दिला पाता; यदि केवल व्यवस्था का युग होता, तो क्या मानवजाति कभी आज तक पहुँच पाती? इतिहास आगे बढ़ता है, और क्या इतिहास परमेश्वर के कार्य के सामान्य नियमों में से एक नहीं है? क्या यह संपूर्ण ब्रह्मांड में मनुष्य के लिए उसके प्रबंधन का चित्रण नहीं है? इतिहास आगे बढ़ता है, वैसे ही परमेश्वर का कार्य भी आगे बढ़ता है। परमेश्वर के इरादे निरंतर बदल रहे हैं। वह कार्य के एक ही चरण में छः हज़ार साल तक नहीं रह सकता था, क्योंकि हर कोई जानता है कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी पुराना नहीं होता है, और वह हमेशा सलीब पर चढ़ने जैसा काम नहीं कर सकता, सलीब पर एक बार, दो बार, तीन बार नहीं चढ़ सकता...। एक बेतुका व्यक्ति चीजों को इसी तरह देखेगा। परमेश्वर वही कार्य करता नहीं रहता; उसका कार्य हमेशा बदलता रहता है और हमेशा नया रहता है, ठीक वैसे ही जैसे मैं प्रतिदिन तुम लोगों से नए वचन कहता और नया कार्य करता हूँ। यही वह कार्य है जो मैं करता हूँ, और कुंजी है “नया” और “अद्भुत”, इन शब्दों में। “परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, और परमेश्वर हमेशा परमेश्वर ही रहेगा” : यह कहावत वास्तव में सच है; परमेश्वर का सार कभी भी नहीं बदलता, परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है और वह कभी शैतान नहीं बन सकता, परंतु इससे यह सिद्ध नहीं होता है कि उसका कार्य उसके सार की तरह ही शाश्वत रूप से अपरिवर्तनीय है। तुम कहते हो कि परमेश्वर अपरिवर्तनशील है, परन्तु फिर तुम किस प्रकार से यह समझा सकते हो कि परमेश्वर हमेशा नया है और कभी भी पुराना नहीं होता? परमेश्वर का कार्य हमेशा फैलता और निरंतर बदलता रहता है, उसके इरादे निरंतर प्रकट किए जाकर मनुष्य को ज्ञात कराए जाते हैं। जैसे-जैसे मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, मनुष्य का स्वभाव बिना रुके बदलता जाता है, और उसका ज्ञान भी बदलता जाता है। तो फिर, यह परिवर्तन कहाँ से उत्पन्न होता है? क्या यह परमेश्वर के चिर-परिवर्तनशील कार्य से नहीं होता? यदि मनुष्य का स्वभाव बदल सकता है, तो मनुष्य मेरे कार्य और मेरे वचनों को भी निरंतर बदलने क्यों नहीं दे सकता? क्या मेरा मनुष्यों के प्रतिबंधों के अधीन होना आवश्यक है? इसमें, क्या तुम जबर्दस्ती के तर्क इस्तेमाल नहीं कर रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 285
सभी यहूदी पुराने नियम पढ़ते थे और यशायाह की भविष्यवाणी को जानते थे कि चरणी में एक नर शिशु जन्म लेगा। तो फिर इस भविष्यवाणी को भलीभाँति जानते हुए भी उन्होंने यीशु को क्यों सताया? क्या ऐसा उनकी विद्रोही प्रकृति और पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति अज्ञानता के कारण नहीं हुआ? उस समय, फरीसियों को विश्वास था कि यीशु का कार्य उस भविष्यवाणी से भिन्न था जो वे नर शिशु के बारे में जानते थे; और आज लोग परमेश्वर को इसलिए अस्वीकार करते हैं क्योंकि देहधारी परमेश्वर का कार्य बाइबल के अनुरूप नहीं है। क्या परमेश्वर के विरुद्ध उनके विद्रोहीपन का सार समान नहीं है? क्या तुम बिना अपवाद के पवित्र आत्मा के समस्त कार्य को स्वीकार कर सकते हो? यदि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, तो यह धारा सही है और तुम्हें बिना किसी आशंका के इसे स्वीकार कर लेना चाहिए; और क्या स्वीकार करना है, इसे लेकर तुम्हें चयन नहीं करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर के प्रति अपनी अंतर्दृष्टि का अधिक प्रयोग करने और उसके प्रति ज्यादा सावधानी बरतने का प्रयास करते हो, तो क्या यह अनावश्यक नहीं है? तुम्हें बाइबल से और अधिक प्रमाण नहीं खोजने चाहिए; बल्कि निरपवाद रूप से पवित्र आत्मा का कार्य स्वीकार कर लेना चाहिए, क्योंकि तुम परमेश्वर का अनुसरण करने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तुम्हें उसकी जाँच-पड़ताल नहीं करनी चाहिए। यह दिखाने के लिए कि मैं तुम्हारा परमेश्वर हूँ, तुम्हें मुझे लेकर और सबूत नहीं खोजने चाहिए, बल्कि तुम्हें यह भेद पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि क्या मैं तुम्हारे लिए लाभदायक हूँ, यही सबसे महत्वपूर्ण बात है। भले ही तुम्हें बाइबल में और अधिक अकाट्य सबूत प्राप्त हो जाएँ, फिर भी ये तुम्हें पूरी तरह से मेरे सामने नहीं ला सकते। तुम केवल बाइबल के दायरे में ही रहते हो, न कि मेरे सामने; बाइबल मुझे जानने में तुम्हारी सहायता नहीं कर सकती है, न ही यह मेरे लिए तुम्हारे प्रेम को गहरा कर सकती है। यद्यपि बाइबल में भविष्यवाणी की गई थी कि एक नर शिशु जन्म लेगा, मगर कोई इसकी थाह नहीं पा सका कि किस पर यह भविष्यवाणी खरी उतरेगी, क्योंकि मनुष्य को परमेश्वर का कार्य नहीं पता था, और यही कारण था कि फरीसियों ने यीशु का प्रतिरोध किया। कुछ लोग जानते हैं कि मेरा कार्य मनुष्य के हित में है, फिर भी वे निरंतर यह विश्वास करते रहते हैं कि यीशु और मैं, दो पूरी तरह से अलग, परस्पर असंगत प्राणी हैं। उस समय, यीशु ने अपने शिष्यों को बस इन विषयों पर अनुग्रह के युग के धर्मोपदेशों की एक श्रृंखला दी कि अनुग्रह के युग में अभ्यास कैसे करें, सभा कैसे करें, प्रार्थना में याचना कैसे करें, और दूसरों से कैसे व्यवहार करें इत्यादि। उसने अनुग्रह के युग का कार्य किया, और उसने केवल इस बारे में बोला कि शिष्य और उस समय जो लोग उसका अनुसरण करते थे, कैसे अभ्यास करें। उस समय उसने केवल अनुग्रह के युग का ही कार्य किया और अंत के दिनों का कोई कार्य नहीं किया। जब यहोवा ने व्यवस्था के युग में पुराने नियम की व्यवस्थाएँ निर्धारित कीं, तब उसने अनुग्रह के युग का कार्य क्यों नहीं किया? उसने पहले से ही अनुग्रह के युग के कार्य को स्पष्ट क्यों नहीं किया? क्या यह मनुष्यों को इसे स्वीकार करने में मदद नहीं करता? उसने केवल यह भविष्यवाणी की कि एक नर शिशु जन्म लेगा और सामर्थ्य में आएगा, परन्तु उसने पहले से ही अनुग्रह के युग का कार्य नहीं किया। प्रत्येक युग में परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट सीमाएँ हैं; वह केवल वर्तमान युग का कार्य करता है और कभी भी कार्य का आगामी चरण पहले से नहीं करता। केवल इस तरह से उसका प्रत्येक युग का प्रतिनिधि कार्य सामने लाया जा सकता है। यीशु ने केवल अंत के दिनों के चिह्नों के बारे में बात की, उसने सिर्फ यह कहा कि उस समय के लोगों को कैसे धैर्य रखना चाहिए, उन्हें कैसे बचाया जाना चाहिए, उन्हें कैसे पश्चात्ताप करना चाहिए और कैसे अपने पाप स्वीकार करने चाहिए, उन्हें कैसे सलीब धारण करना चाहिए और कैसे कष्ट सहने चाहिए। उसने कभी इस बारे में बात नहीं की कि अंत के दिनों में मनुष्य को किस प्रकार प्रवेश हासिल करना चाहिए, या उसे परमेश्वर के इरादे पूरे करने का किस प्रकार प्रयास करना चाहिए। ऐसे में, क्या अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य को बाइबल के अंदर खोजना बेतुका नहीं है? महज़ बाइबल को हाथों में पकड़कर तुम क्या देख सकते हो? चाहे बाइबल का व्याख्याता हो या उपदेशक, आज के कार्य को कौन पहले से स्पष्ट रूप से देख सकता था?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन लोगों ने परमेश्वर को अपनी ही धारणाओं में सीमित कर दिया है, वे किस प्रकार उसके प्रकाशनों को प्राप्त कर सकते हैं?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 286
क्या तुम लोग इसकी जड़ जानना चाहते हो कि फरीसियों ने यीशु का विरोध क्यों किया? क्या तुम लोग फरीसियों के सार को जानना चाहते हो? वे मसीहा के बारे में कल्पनाओं से भरे हुए थे। इससे भी ज़्यादा, उन्होंने केवल इस पर विश्वास किया कि मसीहा आएगा, फिर भी जीवन सत्य का अनुसरण नहीं किया। इसलिए वे आज भी मसीहा की प्रतीक्षा करते हैं क्योंकि उन्हें जीवन के मार्ग का कोई ज्ञान नहीं है, और वे नहीं जानते कि सत्य का मार्ग क्या है। तुम्हीं लोग बताओ ऐसे मूर्ख, हठधर्मी और अज्ञानी लोग परमेश्वर का आशीष कैसे प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे मसीहा को देख सकते हैं? उन्होंने यीशु का विरोध किया क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य की दिशा नहीं जानते थे, क्योंकि वे यीशु द्वारा बताए गए सत्य के मार्ग को नहीं जानते थे और इससे भी अधिक इसलिए क्योंकि वे मसीहा को नहीं समझते थे। और चूँकि उन्होंने मसीहा को कभी नहीं देखा था और कभी मसीहा के साथ नहीं जुड़े थे, उन्होंने मसीहा के बस नाम के साथ चिपके रहने की ग़लती की, जबकि हर मुमकिन ढंग से मसीहा के सार का विरोध करते रहे। ये फरीसी सार रूप से हठधर्मी एवं अभिमानी थे और सत्य का आज्ञापालन नहीं करते थे। परमेश्वर में उनके विश्वास का सिद्धांत था : इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा उपदेश कितना गहरा है, इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारा अधिकार कितना ऊँचा है, जब तक तुम्हें मसीहा नहीं कहा जाता, तुम मसीह नहीं हो। क्या यह सोच हास्यास्पद और बेतुकी नहीं है? मैं तुम लोगों से आगे पूछता हूँ : क्या तुम लोगों के लिए वो गलतियाँ करना बेहद आसान नहीं जो उस समय के फरीसियों ने की थीं, क्योंकि तुम लोगों के पास यीशु की थोड़ी-भी समझ नहीं है? क्या तुम सत्य के मार्ग का भेद पहचान सकते हो? क्या तुम सचमुच विश्वास दिला सकते हो कि तुम मसीह का विरोध नहीं करोगे? क्या तुम पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में समर्थ हो? यदि तुम नहीं जानते कि तुम मसीह का विरोध करोगे या नहीं, तो मेरा कहना है कि तुम पहले ही मौत की कगार पर जी रहे हो। जो लोग मसीहा को नहीं जानते थे, वे सभी यीशु का विरोध करने वाले कार्य करने, यीशु को अस्वीकार करने, उसे बदनाम करने में सक्षम थे। जो लोग यीशु को नहीं समझते, वे सब उसे अस्वीकार करने एवं उसे बुरा-भला कहने में सक्षम हैं। इससे भी अधिक, वे यीशु के लौटने को शैतान द्वारा गुमराह किए जाने की तरह देखने में सक्षम हैं और ज्यादातर लोग देह में लौटे यीशु की निंदा करेंगे। क्या इस सब से तुम लोगों को डर नहीं लगता? जिसका तुम लोग सामना करते हो, वह पवित्र आत्मा के खिलाफ निंदा होगी, कलीसियाओं के लिए कहे गए पवित्र आत्मा के वचनों को चीरना होगा और यीशु द्वारा व्यक्त किए गए समस्त वचनों को ठुकराना होगा। यदि तुम लोग इतने संभ्रमित हो तो यीशु से क्या प्राप्त कर सकते हो? यदि तुम हठपूर्वक होश में आने से इनकार करते हो तो तुम लोग उस कार्य को कैसे समझ सकते हो जिसे यीशु श्वेत बादल पर देह में लौटने पर करता है? मैं तुम लोगों को यह बताता हूँ : जो लोग सत्य स्वीकार नहीं करते, फिर भी अंधों की तरह श्वेत बादलों पर यीशु के आगमन का इंतजार करते हैं, वे निश्चित रूप से वो लोग हैं जो पवित्र आत्मा की ईश-निंदा करते हैं और ये वो वर्ग है जो निश्चित तौर पर नष्ट कर दिया जाएगा। तुम लोग सिर्फ यीशु के अनुग्रह की कामना करते हो और सिर्फ स्वर्ग के सुखद क्षेत्र का आनंद लेना चाहते हो, तुमने यीशु के कहे वचनों का कभी पालन नहीं किया और जब यीशु देह में लौटता है तो उसके द्वारा व्यक्त किए गए सत्य को तुमने कभी नहीं स्वीकारा। यीशु के एक श्वेत बादल पर लौटने के तथ्य के बदले तुम लोग क्या दोगे? क्या वही ईमानदारी जिससे तुम लोग बार-बार पाप करते हो और फिर बार-बार उनकी स्वीकारोक्ति करते हो? श्वेत बादल पर लौटने वाले यीशु को तुम बलिदान में क्या अर्पण करोगे? क्या यह कार्य के कई वर्षों की वह पूँजी है, जिसके जरिए तुम लोग अपनी बड़ाई करते हो? तुम किस चीज को पेश करोगे, ताकि लौटकर आए यीशु को तुम पर भरोसा हो? क्या वह तुम लोगों की अभिमानी प्रकृति है, जो किसी भी सत्य को समर्पित नहीं होती?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 287
तुम लोगों की निष्ठा सिर्फ वचन में है, तुम लोगों का ज्ञान सिर्फ सोच और धारणाओं का है, तुम लोगों की कड़ी मेहनत सिर्फ स्वर्ग की आशीष पाने के लिए है तो तुम लोगों की आस्था किस प्रकार की होगी? आज भी, तुम लोग सत्य के प्रत्येक वचन को अनसुना कर देते हो। तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि मसीह क्या है, तुम लोग नहीं जानते कि यहोवा का भय कैसे मानें, तुम लोग नहीं जानते कि कैसे पवित्र आत्मा के कार्य में प्रवेश करें और तुम लोग नहीं जानते कि परमेश्वर स्वयं के कार्य और मनुष्य द्वारा गुमराह किए जाने के बीच कैसे भेद करें। तुम परमेश्वर द्वारा व्यक्त सत्य के किसी भी ऐसे वचन की केवल निंदा करना ही जानते हो, जो तुम्हारे विचारों के अनुरूप नहीं होता। तुम्हारी विनम्रता कहाँ है? तुम्हारा समर्पण कहाँ है? तुम्हारी निष्ठा कहाँ है? सत्य खोजने का तुम्हारा रवैया कहाँ है? परमेश्वर का भय मानने वाला तुम्हारा हृदय कहाँ है? मैं तुम लोगों को बता दूँ कि जो परमेश्वर में संकेतों की वजह से विश्वास करते हैं, वे निश्चित रूप से वह श्रेणी होगी, जो नष्ट की जाएगी। जो देह में लौटे यीशु के वचनों को स्वीकारने में अक्षम हैं, वे निश्चित ही नरक के वंशज, महा देवदूत के वंशज हैं, उस श्रेणी में हैं जो हमेशा के लिए नष्ट कर दी जाएगी। बहुत-से लोगों को शायद इसकी परवाह न हो कि मैं क्या कहता हूँ, किंतु फिर भी मैं यीशु का अनुसरण करने वाले हर तथाकथित संत को बताना चाहता हूँ कि जब तुम लोग यीशु को एक श्वेत बादल पर स्वर्ग से उतरते अपनी आँखों से देखोगे तो यह धार्मिकता के सूर्य के सार्वजनिक प्रकटन का समय होगा। शायद वह तुम्हारे लिए एक बड़ी उत्तेजना का समय होगा। हालाँकि तुम्हें पता होना चाहिए कि जिस समय तुम यीशु को स्वर्ग से उतरते देखोगे तो यह वह समय भी होगा जब तुम दंडित किए जाने के लिए नीचे नरक में जाओगे, वह समय होगा जब परमेश्वर की प्रबंधन योजना की समाप्ति की घोषणा की जा चुकी होगी और जब परमेश्वर अच्छे लोगों को पुरस्कार और बुरे लोगों को दंड देगा। क्योंकि परमेश्वर का न्याय उस समय से पहले ही समाप्त हो चुका होगा जब मनुष्य चिह्न देखता है, जब सिर्फ सत्य की अभिव्यक्ति होती है। वे जो सत्य को स्वीकार करते हैं और चिह्न नहीं खोजते हैं और इस प्रकार शुद्ध कर दिए गए हैं, वे परमेश्वर के सिंहासन के सामने लाए जा चुके होंगे और सृष्टिकर्ता के आलिंगन में प्रवेश कर चुके होंगे। सिर्फ वे जो इस विश्वास में बने रहते हैं कि “ऐसा यीशु जो श्वेत बादल पर सवारी नहीं करता, एक झूठा मसीह है” अनंत दंड के अधीन कर दिए जाएँगे, क्योंकि वे सिर्फ उस यीशु में विश्वास करते हैं जो चिह्न प्रदर्शित करता है, पर उस यीशु को स्वीकार नहीं करते जो कड़ा न्याय अभिव्यक्त करता है और जीवन और सच्चा मार्ग प्रदान करता है। इसलिए केवल यही हो सकता है कि जब यीशु खुलेआम श्वेत बादल पर वापस लौटे तो वह उनसे निपटे। वे बहुत हठधर्मी, अपने आप में बहुत आश्वस्त, बहुत अहंकारी हैं। ऐसे नीच लोग यीशु द्वारा कैसे पुरस्कृत किए जा सकते हैं? यीशु की वापसी उन लोगों के लिए एक महान उद्धार है, जो सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, पर जो सत्य को स्वीकार करने में असमर्थ हैं उनके लिए यह दोषी ठहराए जाने का संकेत है। तुम लोगों को अपना स्वयं का रास्ता चुनना चाहिए, और पवित्र आत्मा के खिलाफ ईशनिंदा नहीं करनी चाहिए और सत्य को अस्वीकार नहीं करना चाहिए। तुम लोगों को अज्ञानी और अभिमानी व्यक्ति नहीं बनना चाहिए, बल्कि ऐसा बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करता हो और सत्य के लिए प्यासा होकर इसकी खोज करता हो; सिर्फ इसी तरीके से तुम लोग लाभान्वित होगे। मैं तुम लोगों को परमेश्वर में विश्वास के रास्ते पर सावधानी से चलने की सलाह देता हूँ। स्वेच्छाचारी रूप से निष्कर्ष पर मत पहुँचो; और परमेश्वर में अपने विश्वास में लापरवाह और ढीले-ढाले तो और भी मत रहो। तुम लोगों को जानना चाहिए कि कम से कम, जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं उनके पास विनम्र और परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए। जिन्होंने सत्य सुन लिया है और फिर भी इस पर अपनी नाक-भौंह सिकोड़ते हैं, वे मूर्ख और अज्ञानी हैं। जो सत्य को सुन चुके हैं और फिर भी लापरवाही से निष्कर्षों तक पहुँचते हैं या इसे दोषी ठहराते हैं वे अहंकारी लोग हैं। जो भी यीशु पर विश्वास करता है वह दूसरों को शाप देने या निंदा करने के योग्य नहीं है। तुम सब लोगों को ऐसा व्यक्ति होना चाहिए जिसके पास विवेक है और जो सत्य स्वीकार करता है। शायद सत्य का मार्ग सुन लेने और जीवन का वचन पढ़ लेने के बाद तुम्हें यह लगता है कि इन वचनों में से केवल दस हजार में एक वचन तुम्हारी समझ और बाइबल के अनुरूप है और फिर तुम्हें इन्हीं वचनों के उस दस हजारवें हिस्से में खोज जारी रखनी चाहिए। मैं तुम्हें सुझाव भी देता हूँ कि विनम्र बनो, अति-आत्मविश्वासी न बनो और बहुत अभिमानी न बनो। तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला जो थोड़ा-सा दिल है उसके चलते तुम और अधिक रोशनी प्राप्त करोगे। यदि तुम इन वचनों की सावधानी से जाँच करो और इन पर बार-बार मनन करो, तब तुम समझोगे कि वे सत्य हैं या नहीं, वे जीवन हैं या नहीं। शायद, केवल कुछ वाक्य पढ़कर, कुछ लोग इन वचनों की आँखें मूँदकर यह कहते हुए निंदा करेंगे, “यह पवित्र आत्मा की थोड़ी प्रबुद्धता से अधिक कुछ नहीं है” या “यह एक झूठा मसीह है जो लोगों को गुमराह करने आया है।” जो लोग ऐसी बातें कहते हैं वे बहुत अज्ञानी हैं! तुम परमेश्वर के कार्य और बुद्धि को बहुत कम समझते हो और मैं तुम्हें पुनः शुरू से आरंभ करने की सलाह देता हूँ! तुम लोगों को सिर्फ इस वजह से कि अंत के दिनों में झूठे मसीह प्रकट होंगे, परमेश्वर द्वारा अभिव्यक्त वचनों की आँख मूँदकर निंदा नहीं करनी चाहिए, तुम्हें गुमराह होने के डर से ऐसा व्यक्ति नहीं बनना चाहिए जो पवित्र आत्मा की ईशनिंदा करता हो। क्या यह बहुत ही पछतावे की बात नहीं होगी? यदि बार-बार जाँच के बाद अब भी तुम्हें लगता है कि ये वचन सत्य नहीं हैं, मार्ग नहीं हैं और परमेश्वर की अभिव्यक्ति नहीं हैं, तो फिर अंततः तुम दंडित किए जाओगे और आशीष के बिना होगे। यदि तुम ऐसा सत्य, जो इतने सादे और स्पष्ट ढंग से कहा गया है, स्वीकार नहीं कर सकते, तो क्या तुम परमेश्वर के उद्धार के अयोग्य नहीं हो? क्या तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसमें परमेश्वर के सिंहासन के सामने लौट आने की यह आशीष ही नहीं है? इस बारे में सोचो! उतावले और अविवेकी न बनो और परमेश्वर में विश्वास के साथ खेल की तरह पेश न आओ। अपनी मंज़िल के लिए, अपनी संभावनाओं के वास्ते, अपने जीवन के लिए सोचो और स्वयं को मूर्ख न बनाओ। क्या तुम इन वचनों को स्वीकार कर सकते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जब तक तुम यीशु के आध्यात्मिक शरीर को देखोगे, परमेश्वर स्वर्ग और पृथ्वी को फिर से बना चुका होगा
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 288
उस समय, यीशु के कार्य का कुछ हिस्सा पुराने विधान के अनुसार था और साथ ही व्यवस्था के युग के दौरान के यहोवा के वचनों और मूसा की व्यवस्थाओं के अनुसार भी था। इन सब चीजों का उपयोग यीशु ने अपने काम के एक हिस्से को करने में किया। उसने यहूदी उपासनाघरों में लोगों को उपदेश दिया और पढ़ाया, और उसने पैगंबरों द्वारा पुराने विधान में की गई भविष्यवाणियों का इस्तेमाल उन फरीसियों को फटकार लगाने में किया जो उससे बैर रखते थे, और उनका विद्रोहीपन उजागर करने के लिए पवित्रशास्त्र के वचनों का इस्तेमाल किया और इस तरह उनकी निंदा की। क्योंकि वे उससे घृणा करते थे जो यीशु ने किया था; विशेष रूप से, यीशु का बहुत-सा कार्य पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुसार नहीं किया गया था, और इसके अलावा, जो उसने सिखाया वह उनके शब्दों से बढ़कर था, यहाँ तक कि वह पवित्रशास्त्र में पैगंबरों द्वारा की गई भविष्यवाणियों से भी बढ़कर था। यीशु का काम केवल मनुष्य के छुटकारे और सूली पर चढ़ाए जाने के लिए था, और इस प्रकार, किसी भी व्यक्ति को जीतने के लिए उसे अधिक वचन कहने की कोई जरूरत नहीं थी। उसने लोगों को जो कुछ भी सिखाया, उसमें से काफी कुछ पवित्रशास्त्र के वचनों से लिया गया था, और भले ही उसका काम पवित्रशास्त्र से आगे नहीं बढ़ा, फिर भी वह सूली पर चढ़ाए जाने का काम पूरा कर पाया। उसका काम वचन का काम नहीं था, न ही वह मानवजाति पर विजय पाने की खातिर किया गया काम था, बल्कि मानवजाति के छुटकारे के लिए किया गया काम था। वह मानवजाति के लिए पापबलि ही बना और मानवजाति के लिए वचन का स्रोत नहीं बना। उसने अन्यजातियों का काम नहीं किया, जो कि मनुष्य को जीतने का काम था, बल्कि सूली पर चढ़ने का काम किया, वह काम जो उन लोगों के बीच किया गया था, जो परमेश्वर के होने में विश्वास करते थे। भले ही उसका काम पवित्रशास्त्र की बुनियाद पर किया गया था, और भले ही उसने पुराने पैगंबरों की भविष्यवाणियों का इस्तेमाल फरीसियों की निंदा करने के लिए किया, फिर भी यह सूली पर चढ़ाए जाने का कार्य पूरा करने के लिए पर्याप्त था। यदि आज का कार्य भी पवित्रशास्त्र में की गई पुराने पैगंबरों की भविष्यवाणियों की बुनियाद पर किया जाता, तो तुम लोगों को जीतना नामुमकिन होता, क्योंकि पुराने विधान में तुम चीनी लोगों का कोई विद्रोहीपन और पाप दर्ज नहीं है, और तुम लोगों के पापों का कोई इतिहास नहीं है। इसलिए अगर यह कार्य बाइबल के दायरे तक सीमित रहता तो तुम लोग कभी नहीं मानते। बाइबल में इस्राएलियों का केवल एक सीमित इतिहास दर्ज है, जो यह स्थापित करने में असमर्थ है कि तुम लोग बुरे हो या अच्छे, और वह तुम लोगों का न्याय करने में भी असमर्थ है। कल्पना करो कि मुझे तुम लोगों का न्याय इस्राएलियों के इतिहास के अनुसार करना होता—तो क्या तुम लोग मेरा वैसे ही अनुसरण करते, जैसे आज करते हो? क्या तुम लोग जानते हो कि तुम लोग कैसी टेढ़ी खीर हो? अगर इस चरण के दौरान कोई वचन न बोले जाते, तो विजय का काम पूरा करना असंभव होता। चूँकि मैं क्रूस पर चढ़ाए जाने के लिए नहीं आया हूँ, इसलिए मुझे बाइबल से अलग वचन ही बोलने होंगे, ताकि तुम लोगों पर विजय प्राप्त हो सके। यीशु द्वारा किया गया कार्य पुराने विधान से महज एक चरण ऊँचा था; इसे एक युग शुरू करने के लिए और उस युग की अगुआई करने के लिए इस्तेमाल किया गया था। उसने क्यों कहा था, “मैं व्यवस्था नष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि व्यवस्था पूरी करने आया हूँ”? फिर भी उसके काम में बहुत-कुछ ऐसा था, जो पुराने विधान के इस्राएलियों द्वारा पालन की जाने वाली व्यवस्थाओं और आज्ञाओं से अलग था, क्योंकि वह व्यवस्था का पालन करने नहीं आया था, बल्कि उसे पूरा करने के लिए आया था। उसे पूरा करने की प्रक्रिया में कई व्यावहारिक चीजें शामिल थीं : उसका कार्य अधिक व्यावहारिक और यथार्थपरक था, और इसके अलावा, यह अधिक जीवंत था और विनियमों का कठोर पालन नहीं था। क्या इस्राएली सब्त का पालन नहीं करते थे? जब यीशु आया, तो उसने सब्त का पालन नहीं किया, क्योंकि उसने कहा कि मनुष्य का पुत्र सब्त का प्रभु है, और जब सब्त का प्रभु आएगा, तो वह जैसा चाहेगा वैसा करेगा। वह पुराने विधान की व्यवस्थाएँ पूरी करने और उन्हें बदलने के लिए आया था। आज जो कुछ किया जाता है, वह वर्तमान पर आधारित है, फिर भी वह अब भी व्यवस्था के युग में किए गए यहोवा के कार्य की नींव पर टिका है, और वह इस दायरे का उल्लंघन नहीं करता। उदाहरण के लिए, अपनी जबान सँभालना, व्यभिचार न करना—क्या ये पुराने विधान की व्यवस्थाएँ नहीं हैं? आज, तुम लोगों से जो अपेक्षित है, वह केवल दस आज्ञाओं तक ही सीमित नहीं है, बल्कि उसमें ऐसी आज्ञाएँ और व्यवस्थाएँ शामिल हैं, जो पहले आई आज्ञाओं और व्यवस्थाओं के मुकाबले अधिक उच्च कोटि की हैं। किंतु इसका यह मतलब नहीं है कि जो कुछ पहले आया, उसे खत्म कर दिया गया है, क्योंकि परमेश्वर के काम का प्रत्येक चरण पिछले चरण की नींव पर पूरा किया जाता है। जहाँ तक यहोवा द्वारा उस समय इस्राएल में किए गए कार्य की बात है, जैसे कि लोगों से अपेक्षा करना कि वे बलिदान दें, माँ-बाप का आदर करें, मूर्तियों की पूजा न करें, दूसरों पर वार न करें या उन्हें अपशब्द न कहें, व्यभिचार न करें, धूम्रपान या मदिरापान न करें, और मरी हुई चीजें न खाएँ या रक्तपान न करें—क्या यह आज भी तुम लोगों के अभ्यास की नींव नहीं है? अतीत की नींव पर ही आज तक काम किया गया है। यूँ तो अतीत की व्यवस्थाओं का अब और उल्लेख नहीं किया जाता और तुमसे नई अपेक्षाएँ की गई हैं, फिर भी, इन व्यवस्थाओं को समाप्त किए जाने के बजाय और ऊँचा उठा दिया गया है। उन्हें समाप्त कर दिया गया कहने का मतलब है कि पिछला युग पुराना पड़ गया है, जबकि कुछ आज्ञाएँ ऐसी हैं, जिनका तुम्हें अनंतकाल तक पालन करना चाहिए। अतीत की आज्ञाएँ पहले ही अभ्यास में लाई जा चुकी हैं, वे पहले ही मनुष्य का अस्तित्व बन चुकी हैं और “धूम्रपान मत करो”, “मदिरापान मत करो”, आदि आज्ञाओं पर विशेष जोर देने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसी नींव पर आज तुम लोगों की जरूरत के अनुसार, तुम लोगों के आध्यात्मिक कद के अनुसार और आज के काम के अनुसार नई आज्ञाएँ निर्धारित की जाती हैं। नए युग के लिए आज्ञाएँ निर्धारित करने का मतलब अतीत के युग की आज्ञाएँ खत्म करना नहीं है, बल्कि इन्हें इसी नींव पर और ऊँचा उठाना है, ताकि मनुष्य के क्रियाकलाप और अधिक पूर्ण और अधिक व्यावहारिक बनाए जाएँ। यदि आज तुम लोगों को सिर्फ पुराने विधान की आज्ञाओं और व्यवस्थाओं का पालन करना होता और इस्राएलियों की तरह कार्य करना होता और यदि तुम लोगों को यहोवा द्वारा निर्धारित व्यवस्थाओं को भी याद रखना होता, तो तुम लोगों के बदल सकने की कोई संभावना न होती। यदि तुम लोगों को केवल उन कुछ सीमित आज्ञाओं का पालन करना होता या असंख्य व्यवस्थाओं को याद करना होता, तो तुम्हारा पुराना स्वभाव गहरी जड़ें जमाए रहता और इसके उन्मूलन का कोई उपाय नहीं होता। इस प्रकार तुम लोग और अधिक भ्रष्ट हो जाते, और तुम लोगों में से कोई भी समर्पित न बनता। कहने का अर्थ यह है कि कुछ सरल आज्ञाएँ या अनगिनत व्यवस्थाएँ यहोवा के कर्म जानने में तुम्हारी मदद नहीं कर सकतीं। तुम लोग इस्राएलियों के समान नहीं हो : बस व्यवस्थाओं का पालन करके और आज्ञाएँ याद करके वे यहोवा के कर्म देख पाए और सिर्फ उसे अपनी वफादारी दे पाए। लेकिन तुम लोग यह हासिल करने में नितांत असमर्थ हो और पुराने विधान के युग की चंद आज्ञाएँ न केवल तुम्हें अपना हृदय देने के लिए प्रेरित करने या तुम्हारी रक्षा करने में असमर्थ हैं, बल्कि वे तुम लोगों को शिथिल बना देंगी और रसातल में गिरा देंगी। क्योंकि मेरा कार्य विजय का कार्य है और इसके निशाने पर तुम लोगों का विद्रोहीपन और तुम्हारा पुराना स्वभाव है। यहोवा और यीशु के दयालु वचन आज न्याय के कठोर वचनों के सामने बहुत ही पीछे रह जाते हैं। ऐसे कठोर वचनों के बिना तुम “विशेषज्ञों” पर विजय प्राप्त करना असंभव होगा, जो हजारों सालों से विद्रोही रहे हैं। पुराने विधान की व्यवस्थाओं ने बहुत पहले ही तुम लोगों पर अपनी शक्ति खो दी और आज का न्याय उस समय की व्यवस्थाओं की तुलना में कहीं ज्यादा विकट है। तुम लोगों के लिए जो सबसे उपयुक्त है वह है न्याय, न कि व्यवस्थाओं के हलके प्रतिबंध, क्योंकि तुम लोग बिल्कुल प्रारंभ वाली मानव-जाति नहीं हो, बल्कि वह मानव-जाति हो जो हजारों वर्षों से भ्रष्ट है। अब मनुष्य से जो हासिल करने की माँग की जाती है वह उसकी आज की वास्तविक दशा पर आधारित है, आज के मनुष्य की काबिलियत और वास्तविक आध्यात्मिक कद के अनुसार है, और तुमसे विनियमों का पालन करने को नहीं कहा जा रहा है। यह इसलिए है, ताकि तुम्हारे पुराने स्वभाव में बदलाव हासिल किया जा सके, और तुम अपनी धारणाएँ त्याग सको।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (1)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 289
इतिहास हमेशा आगे बढ़ रहा है, और परमेश्वर का कार्य हमेशा आगे बढ़ रहा है। उसकी छह-हज़ार-वर्षीय प्रबंधन योजना को अंत तक पहुँचने के लिए उसे आगे की दिशा में प्रगति करते रहना चाहिए। हर दिन उसे नया कार्य करना चाहिए, हर वर्ष उसे नया कार्य करना चाहिए; उसे नए मार्ग खोलने चाहिए, नए युगों का सूत्रपात करना चाहिए, और अधिक नया और अधिक बड़ा कार्य आरंभ करना चाहिए। इन सबके साथ, वह नए नाम और नया कार्य लाता है। क्षण-प्रतिक्षण परमेश्वर का आत्मा नया कार्य कर रहा है, कभी भी पुराने तरीकों या विनियमों से चिपका नहीं रहता। न ही उसका कार्य कभी रुका है, बल्कि हर गुज़रते पल के साथ घटित होता रहता है। यदि तुम कहते हो कि पवित्र आत्मा का कार्य सदैव अपरिवर्तनीय है, तो फिर क्यों यहोवा ने तो याजकों को मंदिर में अपनी सेवा करने के लिए कहा, जबकि जिस यीशु के आने पर लोगों ने उसे महायाजक और दाऊद के घराने का कहा था, उसने मंदिर में प्रवेश नहीं किया बावजूद इस तथ्य के कि उसे महायाजक और महान राजा कहा जाता था? और उसने बलियाँ क्यों नहीं चढ़ाईं? मंदिर में प्रवेश करना या नहीं करना—क्या यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य नहीं है? यदि, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, यीशु पुनः आएगा और अंत के दिनों में तब भी यीशु कहलाएगा, और तब भी एक सफेद बादल पर यीशु की छवि में मनुष्य के बीच अवरोहण करेगा : तो क्या यह उसके कार्य की पुनरावृत्ति नहीं होगी? क्या पवित्र आत्मा पुराने से चिपके रह सकता है? मनुष्य जो कुछ भी मानता है, वे धारणाएँ हैं, और जो कुछ भी मनुष्य समझता है, वह शाब्दिक अर्थ के अनुसार है, और साथ ही उसकी कल्पनाओं के अनुसार है; वे पवित्र आत्मा के कार्य के सिद्धांतों के प्रतिकूल हैं, और परमेश्वर के विचारों से मेल नहीं खाते हैं। परमेश्वर उस तरह से कार्य नहीं करेगा; परमेश्वर इतना अज्ञानी और नासमझ नहीं है, और उसका कार्य इतना सरल नहीं है जितना कि तुम कल्पना करते हो। लोगों की कल्पनाओं के अनुसार, यीशु एक बादल पर सवार होकर आएगा और तुम लोगों के बीच उतरेगा। तुम लोग उसे देखोगे, जो एक बादल पर सवारी करते हुए तुम लोगों को बताएगा कि वह यीशु है। तुम लोग उसके हाथों में कीलों के निशान भी देखोगे, और उसे यीशु के रूप में जानोगे। और वह तुम लोगों को फिर से बचाएगा, और तुम लोगों का शक्तिशाली परमेश्वर होगा। वह तुम लोगों को बचाएगा, तुम लोगों को एक नया नाम प्रदान करेगा, और तुम लोगों में से प्रत्येक को एक सफ़ेद पत्थर देगा, जिसके बाद तुम लोगों को स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने दिया जाएगा और स्वर्ग में तुम्हारा स्वागत किया जाएगा। क्या इस तरह के विश्वास मनुष्य की धारणाएँ नहीं हैं? क्या परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य करता है, या क्या वह मनुष्य की धारणाओं के विपरीत कार्य करता है? क्या मनुष्य की सभी धारणाएँ शैतान से नहीं आतीं? क्या सब मनुष्य शैतान द्वारा भ्रष्ट नहीं किए गए हैं? यदि परमेश्वर मनुष्य की धारणाओं के अनुसार अपना कार्य करता, तो क्या वह शैतान नहीं बन गया होता? क्या वह उसी प्रकार का नहीं होता, जैसे सृजित प्राणी हैं? चूँकि सृजित प्राणी अब शैतान द्वारा इतने भ्रष्ट हो गए हैं और मनुष्य शैतान का मूर्त रूप बन गया है, इसलिए यदि परमेश्वर शैतान की चीज़ों के अनुसार कार्य करता, तो क्या वह शैतान के साथ मिला हुआ नहीं होता? मनुष्य परमेश्वर के कार्य की थाह कैसे पा सकता है? इसलिए, परमेश्वर कभी मनुष्य की धारणाओं के अनुसार कार्य नहीं करेगा, और कभी उस तरह से कार्य नहीं करेगा, जैसी तुम कल्पना करते हो। तुम कह सकते हो कि स्वयं परमेश्वर ने कहा था कि वह एक बादल पर आएगा। यह सच है कि परमेश्वर ने स्वयं ऐसा कहा था, पर क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के रहस्यों की थाह नहीं पा सकता? क्या तुम नहीं जानते कि कोई मनुष्य परमेश्वर के वचनों की व्याख्या नहीं कर सकता? क्या तुम, बिना लेशमात्र संदेह के, निश्चित हो कि तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा प्रबुद्ध और रोशन कर दिया गया था? निश्चित रूप से ऐसा नहीं था कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें इतने प्रत्यक्ष तरीके से निर्देश दिया था? क्या वह पवित्र आत्मा था, जिसने तुम्हें निर्देश दिए थे, या तुम्हारी स्वयं की धारणाओं ने तुम्हें ऐसा सोचने के लिए प्रेरित किया? तुम कह सकते हो, “यह स्वयं परमेश्वर द्वारा कहा गया था।” किंतु हम परमेश्वर के वचनों को मापने के लिए अपनी धारणाओं और मन का उपयोग नहीं कर सकते। जहाँ तक यशायाह के वचनों की बात है, क्या तुम पूरी निश्चितता के साथ उसके वचनों की व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम उसके वचनों की व्याख्या करने का साहस करते हो? चूँकि तुम यशायाह के वचनों की व्याख्या करने का साहस नहीं करते, तो तुम यीशु के वचनों की व्याख्या करने का साहस क्यों करते हो? कौन अधिक बड़ा है, यीशु अथवा यशायाह? चूँकि उत्तर यीशु है, तो तुम यीशु द्वारा बोले गए वचनों की व्याख्या क्यों करते हो? क्या परमेश्वर अपने कार्य के बारे में तुम्हें अग्रिम रूप से बताएगा? कोई एक सृजित प्राणी भी नहीं जान सकता, यहाँ तक कि स्वर्ग के दूत भी नहीं, और न ही मनुष्य का पुत्र जान सकता है, तो तुम कैसे जान सकते हो? मनुष्य में बहुत कमी है। अभी तुम लोगों के लिए जो महत्वपूर्ण है, वह है कार्य के तीन चरणों को जानना। यहोवा के कार्य से लेकर यीशु के कार्य तक और यीशु के कार्य से लेकर इस वर्तमान चरण तक, ये तीन चरण परमेश्वर के प्रबंधन के पूर्ण विस्तार को एक सतत सूत्र में पिरोते हैं और ये सब एक ही आत्मा का कार्य हैं। दुनिया के सृजन से परमेश्वर हमेशा मानवजाति का प्रबंधन करता आ रहा है। वही आरंभ और अंत है, वही प्रथम और अंतिम है, और वही एक है जो युग का आरंभ करता है और वही एक है जो युग का अंत करता है। विभिन्न युगों और विभिन्न स्थानों में कार्य के तीन चरण अचूक रूप में एक ही आत्मा का कार्य हैं। इन तीन चरणों को पृथक करने वाले सभी लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। अब तुम्हारे लिए यह समझना एकदम आवश्यक है कि प्रथम चरण से लेकर आज तक का समस्त कार्य एक ही परमेश्वर का कार्य है, एक ही आत्मा का कार्य है। इस बारे में कोई संदेह नहीं हो सकता।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य का दर्शन (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 290
चूँकि मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है, इसलिए उसे परमेश्वर के हर पदचिह्न का निकटता से अनुसरण करना चाहिए; और उसे “जहाँ कहीं मेमना जाता है उसका अनुसरण करना” चाहिए। जो लोग ऐसा करते हैं, केवल वे ही सचमुच सच्चे मार्ग की खोज करते हैं, वे ही पवित्र आत्मा के कार्य को जानते हैं। जो लोग हठपूर्वक शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से चिपके रहते हैं वे ऐसे लोग हैं जिन्हें पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है। प्रत्येक समयावधि में परमेश्वर नया कार्य आरंभ करेगा और प्रत्येक अवधि में मनुष्य के बीच एक नई शुरुआत होगी। यदि मनुष्य केवल इन सत्यों का ही पालन करता है कि “यहोवा परमेश्वर है” और “यीशु मसीह है,” जो ऐसे सत्य हैं जिनमें से हर एक केवल एक युग पर ही लागू होता है, तो मनुष्य कभी भी पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम नहीं मिला पाएगा और वह हमेशा के लिए पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करता हो, यदि मनुष्य बिना किसी संदेह के अनुसरण करता है और वह निकटता से अनुसरण करता है, तो फिर पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य को कैसे निकाला जा सकता है? परमेश्वर चाहे जो भी करे, जब तक मनुष्य निश्चित है कि यह पवित्र आत्मा का कार्य है, और बिना किसी आशंका के पवित्र आत्मा के कार्य के साथ सहयोग करता है, और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने का प्रयास करता है, तो उसे कैसे दंड दिया जा सकता है? परमेश्वर का कार्य कभी नहीं रुका है, उसके कदम कभी नहीं थमे हैं, और अपने प्रबंधन-कार्य की पूर्णता से पहले वह सदैव व्यस्त रहा है और कभी नहीं रुकता। किंतु मनुष्य अलग है : पवित्र आत्मा के कार्य का थोड़ा-सा अंश प्राप्त करने के बाद वह उसके साथ इस तरह व्यवहार करता है मानो वह कभी नहीं बदलेगा; जरा-सा ज्ञान प्राप्त करने के बाद वह परमेश्वर के नए कार्य के पदचिह्नों का अनुसरण करने के लिए आगे नहीं बढ़ता; परमेश्वर के कार्य का थोड़ा-सा ही अंश देखने के बाद वह तुरंत ही परमेश्वर को लकड़ी की एक विशिष्ट आकृति के होने में सीमित कर देता है और यह मानता है कि परमेश्वर सदैव इसी छवि में बना रहेगा जिसे वह देखता है, कि यह अतीत में भी ऐसा ही था और भविष्य में भी ऐसा ही रहेगा; सिर्फ थोड़ा-सा सतही स्तर का ज्ञान प्राप्त करने के बाद मनुष्य इतना घमंडी हो जाता है कि स्वयं को भूल जाता है और परमेश्वर के स्वभाव और अस्तित्व के बारे में बेहूदा ढंग से घोषणा करने लगता है, जिसका कोई अस्तित्व ही नहीं होता; और पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण के बारे में निश्चित हो जाने के बाद परमेश्वर के नए कार्य की घोषणा करने वाला व्यक्ति चाहे किसी भी प्रकार का क्यों न हो, मनुष्य उस नए कार्य को स्वीकार नहीं करता। इस तरह के लोग पवित्र आत्मा के नए कार्य को स्वीकार नहीं कर सकते; वे बहुत रूढ़िवादी हैं और नई चीजों को स्वीकार करने में अक्षम हैं। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, किंतु परमेश्वर को अस्वीकार भी करते हैं। मनुष्य का मानना है कि इस्राएलियों का “केवल यहोवा में विश्वास करना और यीशु में विश्वास न करना” ग़लत था, किंतु अधिकतर लोग ऐसी ही भूमिका निभाते हैं, जिसमें वे “केवल यहोवा में विश्वास करते हैं और यीशु को अस्वीकार करते हैं” और “मसीहा के लौटने की लालसा करते हैं, किंतु उस मसीहा का विरोध करते हैं जिसे यीशु कहते हैं।” तो कोई आश्चर्य नहीं कि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के एक चरण को स्वीकार करने के पश्चात् अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जीते हैं, और अभी भी परमेश्वर के आशीष प्राप्त नहीं करते। क्या यह मनुष्य की विद्रोहशीलता का परिणाम नहीं है? दुनिया भर में ईसाई धर्म के सभी लोग, जिन्होंने आज के नए कार्य के साथ कदम नहीं मिलाया है, यह मानते हुए कि परमेश्वर उनकी संबंधित इच्छाएँ पूरी करेगा, इस उम्मीद से चिपके रहते हैं कि वे भाग्यशाली होंगे। फिर भी वे पूरी निश्चितता से यह नहीं कह सकते कि क्यों परमेश्वर उन्हें तीसरे स्वर्ग तक ले जाएगा या कैसे यीशु उन्हें अपने साथ ले जाने के लिए सफेद बादल पर सवार होकर आएगा, वे तो पूर्ण निश्चितता के साथ यह भी नहीं कह सकते कि यीशु वास्तव में उस दिन सफेद बादल पर सवार होकर आएगा या नहीं, जिस दिन की वे कल्पना करते हैं। वे सभी चितित और हैरान हैं; वे स्वयं भी नहीं जानते कि परमेश्वर उनमें से प्रत्येक को ऊपर ले जाएगा या नहीं, जो विभिन्न समूहों के थोड़े-से मुट्ठी भर लोग हैं, जो हर पंथ से आते हैं। परमेश्वर द्वारा अभी किया जाने वाला कार्य, वर्तमान युग, परमेश्वर के इरादे—इनमें से किसी भी चीज की उन्हें कोई समझ नहीं है और वे अपनी उँगलियों पर दिन गिनने के सिवाय कुछ नहीं कर सकते। जो लोग बिल्कुल अंत तक मेमने के पदचिह्नों का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही अंतिम आशीष प्राप्त कर सकते हैं, जबकि वे “चतुर लोग,” जो बिल्कुल अंत तक अनुसरण करने में असमर्थ हैं, किंतु विश्वास करते हैं कि उन्होंने सब कुछ प्राप्त कर लिया है, वे परमेश्वर के प्रकटन को देखने में असमर्थ हैं। वे सभी विश्वास करते हैं कि वे पृथ्वी पर सबसे चतुर व्यक्ति हैं, और वे बिना किसी कारण परमेश्वर के कार्य के निरंतर विकास को बीच में ही रोक देते हैं, तथा पूर्ण निश्चय के साथ विश्वास करते प्रतीत होते हैं कि परमेश्वर उन्हें स्वर्ग तक ले जाएगा—वे, जिनकी “परमेश्वर के प्रति अटूट निष्ठा है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, और परमेश्वर के वचनों का पालन करते हैं।” भले ही उनमें परमेश्वर द्वारा बोले गए वचनों के प्रति “अटूट निष्ठा” हो, फिर भी उनकी कथनी और करनी अत्यंत घिनौनी है, क्योंकि वे पवित्र आत्मा के कार्य का विरोध करते हैं और कपट और बुराई करते हैं। जो लोग बिल्कुल अंत तक अनुसरण नहीं कर सकते और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ तालमेल नहीं बिठा सकते और केवल पुराने कार्य से चिपके रहते हैं, वे न केवल परमेश्वर के प्रति वफादारी हासिल करने में असफल हुए हैं, बल्कि इसके विपरीत वे ऐसे लोग बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, जो नए युग द्वारा ठुकरा दिए जाते हैं और जो दंडित किए जाएँगे। क्या उनसे भी अधिक दयनीय कोई है? अनेक तो यहाँ तक विश्वास करते हैं कि जो लोग प्राचीन व्यवस्था को ठुकराते हैं और नए कार्य को स्वीकार करते हैं वे सभी अंतरात्मा विहीन हैं। ये लोग, जो केवल “अंतरात्मा” पर ध्यान केंद्रित करते हैं, फिर भी पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते, अंततः अपनी ही अंतरात्मा द्वारा अपने भविष्य की संभावनाओं को बीच में नहीं रोकेंगे। यहाँ तक कि परमेश्वर भी अपने कार्य में विनियमों का पालन नहीं करता, और भले ही वह उसका अपना कार्य हो, फिर भी परमेश्वर उससे चिपका नहीं रहता। जिसे नकारा जाना चाहिए उसे नकारा जाता है, जिसे निकाल दिया जाना चाहिए उसे निकाल दिया जाता है। फिर भी मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के कार्य के एक छोटे-से भाग को ही पकड़े रहकर खुद को उसके विरोध में खड़ा कर लेता है। क्या यह मनुष्य की बेहूदगी नहीं है? क्या यह मनुष्य की अज्ञानता नहीं है? आशीष प्राप्त न करने के डर से लोग जितना अधिक कायर और अति-सतर्क होते हैं, उतना ही अधिक वे और अधिक आशीष प्राप्त करने और अंतिम आशीष पाने में असमर्थ होते हैं। जो लोग हठपूर्वक व्यवस्था का पालन करते हैं वे सभी व्यवस्था के प्रति अटूट निष्ठा प्रदर्शित करते हैं और जितनी अधिक वे व्यवस्था के प्रति ऐसी वफादारी दिखाते हैं, उतना ही अधिक वे ऐसे विद्रोही होते हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। चूँकि अब व्यवस्था का युग नहीं, राज्य का युग है, इसलिए आज के कार्य और अतीत के कार्य का उल्लेख एक-साथ नहीं किया जा सकता, न ही अतीत के कार्य की तुलना आज के कार्य से की जा सकती है। परमेश्वर का कार्य बदल चुका है और मनुष्य का अभ्यास भी बदल चुका है; वह व्यवस्था को थामे रहना या सलीब उठाना नहीं है। इसलिए, व्यवस्था और सलीब के प्रति लोगों की वफादारी को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं होगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 291
आज तुम पर विजय प्राप्त करने का उद्देश्य यही है कि तुम स्वीकार करो कि परमेश्वर तुम्हारा परमेश्वर है और वह दूसरों का भी परमेश्वर है, और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह उन सभी का परमेश्वर है जो उससे प्यार करते हैं, वह सभी सृजित प्राणियों का परमेश्वर है। वह इस्राएलियों का परमेश्वर है और मिस्र के लोगों का भी परमेश्वर है। वह अंग्रेजों का भी परमेश्वर है और अमेरिकियों का भी। वह केवल आदम और हव्वा का परमेश्वर नहीं है, बल्कि उनके सभी वंशजों का भी परमेश्वर है। वह स्वर्ग और पृथ्वी की हर चीज का परमेश्वर है। इस्राएली परिवार और अन्य-जाति परिवार सभी एक ही परमेश्वर के हाथों में हैं। उसने न केवल कई हजार सालों तक इस्राएल में कार्य किया और एक बार यहूदिया में जन्म लिया, बल्कि आज वह चीन में उतरा है, इस जगह जहाँ बड़ा लाल अजगर कुंडली मारे बैठा है। यदि यहूदिया में पैदा होना उसे यहूदियों का राजा बना देता है, तो क्या तुम सभी के बीच में आज उसका अवतरण उसे तुम लोगों का परमेश्वर नहीं बना देता है? उसने इस्राएलियों की अगुआई की और यहूदिया में पैदा हुआ, और वह एक अन्य-जाति भूमि में भी पैदा हुआ है। क्या उसका सभी कार्य उस मानवजाति के लिए नहीं किया जाता जिसकी उसने रचना की है? क्या वह इस्राएलियों को सौ गुना चाहता है और अन्य-जाति लोगों से एक हज़ार गुना घृणा करता है? क्या यह तुम लोगों की धारणा नहीं है? ऐसा नहीं है कि परमेश्वर कभी तुम लोगों का परमेश्वर नहीं था, बल्कि बात केवल इतनी है कि तुम उसे बिल्कुल भी अंगीकार नहीं करते हो; ऐसा नहीं है कि परमेश्वर तुम लोगों का परमेश्वर बनने के लिए तैयार नहीं है, बल्कि तुम लोग परमेश्वर को ठुकराते हो। सृजित प्राणियों में ऐसा कौन है जो सर्वशक्तिमान के हाथों में नहीं है? क्या आज तुम लोगों पर विजय प्राप्त करने का यही लक्ष्य नहीं है कि तुम लोग मानो कि परमेश्वर तुम्हारा ही परमेश्वर है? यदि तुम लोग अभी भी यही मानते हो कि परमेश्वर केवल इस्राएलियों का परमेश्वर है, इस्राएल में दाऊद का घर ही परमेश्वर का जन्म-स्थान है और इस्राएल के अलावा कोई भी राष्ट्र परमेश्वर को “उत्पन्न” करने के योग्य नहीं है, और तो और, कोई अन्य-जाति परिवार यहोवा के कार्यों को निजी तौर पर प्राप्त करने के लिए सक्षम नहीं है—अगर तुम अभी भी इस तरह सोचते हो, तो क्या यह तुम्हें एक जिद्दी विरोधी नहीं बनाता है? हमेशा इस्राएल पर मत अटके रहो। परमेश्वर तुम लोगों के बीच अभी उपस्थित है। स्वर्ग की ओर भी देखते मत रहो। स्वर्ग के अपने परमेश्वर के लिए तड़पना बंद करो! परमेश्वर तुम लोगों के बीच आ गया है, तो वह स्वर्ग में कैसे हो सकता है? तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए बहुत लंबा समय नहीं हुआ है, फिर भी तुममें उसके प्रति बहुत सारी धारणाएँ हैं, इस हद तक कि तुम इस बारे में एक क्षण के लिए भी यह सोचने की हिम्मत नहीं करते कि इस्राएलियों का परमेश्वर अपनी उपस्थिति से तुम लोगों पर अनुग्रह करेगा। यह जानते हुए कि तुम कितने अधिक मलिन हो, तुम लोग इस बारे में सोचने की हिम्मत तो बिल्कुल नहीं करते कि तुम कैसे परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से प्रकट होते हुए देख सकते हो। न ही तुम लोगों ने कभी यह सोचा है कि कैसे एक अन्य-जाति भूमि में परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अवतरित हो सकता है। उसे तो सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर अवतरित होकर इस्राएलियों के समक्ष प्रकट होना चाहिए। क्या अन्य-जाति (यानी इस्राएल से बाहर के लोग) के सभी लोग उसकी घृणा के पात्र नहीं हैं? वह व्यक्तिगत रूप से उनके बीच कैसे काम कर सकता है? ये सब ऐसी गहरी जड़ों वाली धारणाएँ हैं जो तुम लोगों ने बहुत वर्षों में विकसित की हैं। आज तुम लोगों पर विजय प्राप्त करने का उद्देश्य है तुम लोगों की इन धारणाओं को ध्वस्त करना। इस तरह तुम लोग परमेश्वर को व्यक्तिगत रूप से अपने बीच में प्रकट होते हुए देखते हो—सिनाई पर्वत पर या जैतून पर्वत पर नहीं, बल्कि उन लोगों के बीच जिनकी उसने पहले कभी अगुआई नहीं की है। जब परमेश्वर ने इस्राएल में अपने दो चरणों का कार्य कर लिया तो उसके बाद इस्राएलियों और सारे अन्य-जाति राष्ट्रों ने समान रूप से यह धारणा अपना ली कि यूँ तो यह सच है कि परमेश्वर ने सभी चीजें बनाई हैं, लेकिन वह केवल इस्राएलियों का परमेश्वर बनने का इच्छुक है, अन्य-जाति राष्ट्रों का नहीं। इस्राएली मानते हैं कि परमेश्वर केवल हमारा परमेश्वर हो सकता है, तुम सभी अन्य-जातियों का नहीं, और क्योंकि तुम लोग यहोवा का भय नहीं मानते, इसलिए यहोवा—हमारा परमेश्वर—तुम लोगों से घृणा करता है। वे यहूदी लोग इस बात को और भी अधिक मानते हैं : प्रभु यीशु ने हम यहूदियों की छवि ग्रहण की थी और वह ऐसा परमेश्वर है जिस पर यहूदियों का चिह्न है। परमेश्वर हमारे बीच ही कार्य करता है। परमेश्वर की छवि और हमारी छवि समान है; हमारी छवि परमेश्वर के करीब है। प्रभु यीशु हम यहूदियों का राजा है; अन्य-जाति राष्ट्र ऐसा महान उद्धार प्राप्त करने के योग्य नहीं हैं। प्रभु यीशु हम यहूदियों के लिए पाप-बलि है। कार्य के केवल इन दो चरणों के आधार पर ही इस्राएलियों और यहूदियों ने ये सारी धारणाएँ बना ली थीं। वे रोब से स्वयं के लिए परमेश्वर पर दावा करते हैं, यह अनुमति नहीं देते कि परमेश्वर अन्य-जाति राष्ट्रों का भी परमेश्वर है। इस प्रकार, परमेश्वर अन्य-जातियों के दिल में एक रिक्त स्थान बन गया। क्योंकि हर कोई यह मानने लगा था कि परमेश्वर अन्य-जातियों का परमेश्वर नहीं बनना चाहता, वह केवल इस्राएलियों को ही पसंद करता है—जो उसके चुने हुए लोग हैं—और वह यहूदियों को पसंद करता है, विशेषकर उन अनुयायियों को जो उसका अनुसरण करते हैं। क्या तुम नहीं जानते कि यहोवा और यीशु ने जो कार्य किया, वह सारी मानवजाति के अस्तित्व के लिए किया था? क्या तुम अब मानते हो कि परमेश्वर इस्राएल से बाहर पैदा हुए तुम सब लोगों का परमेश्वर है? क्या परमेश्वर आज ठीक यहीं तुम लोगों के बीच नहीं है? यह कोई सपना नहीं है, है न? क्या तुम लोग इस वास्तविकता को नहीं स्वीकारते? तुम लोग इस पर विश्वास करने की या इसके बारे में सोचने की हिम्मत नहीं करते। तुम लोग इसे जैसे चाहे देखो, लेकिन क्या परमेश्वर तुम लोगों के बीच यहाँ नहीं है? क्या तुम लोग अभी भी इन शब्दों पर विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते हो? इस दिन से, क्या वे सभी जिन पर विजय प्राप्त कर ली गई है और जो लोग परमेश्वर के अनुयायी बनना चाहते हैं, वे परमेश्वर के चुने हुए लोग नहीं हैं? क्या तुम सभी, जो आज अनुयायी हो, इस्राएल के बाहर चुने हुए लोग नहीं हो? क्या तुम लोगों की बिल्कुल वही पहचान नहीं है जो इस्राएलियों की है? क्या तुम लोगों को यह सब समझ नहीं लेना चाहिए? क्या तुम लोगों पर विजय पाने के कार्य का यही उद्देश्य नहीं है? क्योंकि तुम लोग परमेश्वर को देख सकते हो, तो वह हमेशा ही तुम लोगों का परमेश्वर रहेगा, शुरू से लेकर भविष्य तक। जब तक तुम लोग उसका अनुसरण करने, उसके प्रति वफादार और समर्पित सृजित प्राणी बने रहने के लिए तैयार रहोगे, तब तक वह तुम लोगों को अकेला नहीं छोड़ेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विजय के कार्य की वास्तविक कहानी (3)
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 292
अपनी पुरानी धारणाओं को एक तरफ रखकर ही तुम नए ज्ञान को प्राप्त कर सकते हो, फिर भी पुराना ज्ञान आवश्यक नहीं कि पुरानी धारणाएँ हो। मनुष्य द्वारा कल्पना की गई बातों को “धारणाएँ” कहते हैं जो वास्तविकताओं के साथ मेल नहीं खाती हैं। यदि पुराना ज्ञान, युगों के बीतने के साथ अप्रचलित हो गया है, तो इसे त्याग दिया जाना चाहिए। पुराना ज्ञान लोगों की धारणाओं का एक हिस्सा है और यह उन्हें नए कार्य में प्रवेश करने से रोकता है। यदि कोई इस पुराने ज्ञान के साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता है और पुराने और नए ज्ञान को मिलाने में सक्षम है, तो पुराना ज्ञान वास्तव में उसके लिए सहायक बन जाता है, वह आधार बन जाता है जिसके द्वारा वह नए युग में प्रवेश करता है। परमेश्वर को जानने के सबक के लिए कई सिद्धांतों में निपुण होना आवश्यक है : जैसे कि परमेश्वर को जानने के मार्ग पर किस प्रकार प्रवेश करें, परमेश्वर को जानने के लिए तुम्हें कौन-से सत्यों को समझना चाहिए और किस प्रकार से अपनी धारणाओं और पुराने स्वभावों को उतार फेंकना चाहिए, ताकि तुम परमेश्वर के नए कार्य की सभी व्यवस्थाओं के लिए समर्पण कर सको। यदि तुम परमेश्वर को जानने के सबक में प्रवेश करने के लिए इन सिद्धांतों का आधार के रूप में उपयोग करते हो, तो तुम्हारा ज्ञान और गहरा हो जाएगा। यदि तुम्हें कार्य के तीन चरणों—अर्थात परमेश्वर की संपूर्ण प्रबंधन योजना—का गहन ज्ञान है और यदि तुम वर्तमान चरण के साथ परमेश्वर के कार्य के पिछले दोनों चरणों को पूरी तरह से जोड़ सको और देख सको कि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो तुम्हारे पास सबसे अधिक गहरा आधार होगा। कार्य के तीनों चरण एक ही परमेश्वर द्वारा किए गए हैं; यही सबसे महान दर्शन है और यह परमेश्वर को जानने का एकमात्र मार्ग है। कार्य के तीनों चरण केवल स्वयं परमेश्वर द्वारा ही किए जा सकते हैं। कोई भी मनुष्य इस प्रकार का कार्य उसकी ओर से नहीं कर सकता है। कहने का तात्पर्य है कि आरंभ से लेकर आज तक केवल स्वयं परमेश्वर ही अपना कार्य कर सकता था। यद्यपि परमेश्वर के कार्य के तीनों चरण विभिन्न युगों और स्थानों में किए गए हैं, और यद्यपि प्रत्येक का कार्य भी अलग-अलग है, किंतु यह सब कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है। उन सभी दर्शनों में, जिनके बारे में मनुष्य को जानना आवश्यक है, यह सबसे महान दर्शन है, और यदि यह पूरी तरह से मनुष्य के द्वारा समझा जा सके, तो वह अडिग रहने में समर्थ होगा। आज विभिन्न धर्मों और संप्रदायों के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि वे पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं जानते हैं और वे पवित्र आत्मा के कार्य तथा जो कार्य पवित्र आत्मा के नहीं हैं, उनके बीच अंतर नहीं कर पाते—और इस कारण वे भेद नहीं कर सकते कि क्या कार्य का यह चरण भी, कार्य के पिछले दो चरणों के समान, यहोवा परमेश्वर के द्वारा किया गया है। यद्यपि लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, तब भी उनमें से अधिकांश लोग अभी भी यह भेद करने में समर्थ नहीं हैं कि क्या यही सही मार्ग है। मनुष्य चिंता करता रहता है कि क्या यही वह मार्ग है जिसकी अगुवाई स्वयं परमेश्वर ने व्यक्तिगत रूप से की है और क्या परमेश्वर का देहधारण एक तथ्य है, और अधिकांश लोगों को तब भी कुछ पता नहीं होता कि इन चीजों को कैसे जानें। जो लोग परमेश्वर का अनुसरण करते हैं उन्हें इस मार्ग के बारे में सुनिश्चित नहीं है और इसलिए जो धर्मोपदेश दिए जाते हैं उनका इन लोगों पर केवल आंशिक प्रभाव पड़ता है और वे पूरा प्रभाव डालने में असमर्थ रहते हैं और फिर यह ऐसे लोगों के जीवन प्रवेश को प्रभावित करता है। यदि मनुष्य कार्य के तीनों चरणों में यह देख सकता है कि वे विभिन्न समयों, स्थानों में और लोगों पर स्वयं परमेश्वर के द्वारा किए जाते हैं, अगर मनुष्य यह देख सकता है कि यद्यपि कार्य भिन्न है, तब भी यह सब एक ही परमेश्वर के द्वारा किया गया है, और चूँकि यह कार्य एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया है, तो इसे सही और त्रुटिहीन होना चाहिए, और यह भी कि यद्यपि यह मनुष्यों की धारणाओं से मेल नहीं खाता है, तो भी इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह एक ही परमेश्वर का कार्य है—यदि मनुष्य निश्चित होकर कह सके कि यह एक ही परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य है, तो मनुष्य की धारणाएँ तुच्छ हो जाएँगी और उनका उल्लेख करना भी आवश्यक नहीं रहेगा। मनुष्य दर्शनों के बारे में अस्पष्ट है, वह केवल यहोवा को परमेश्वर के रूप में और यीशु को प्रभु के रूप में जानता है और आज के देहधारी परमेश्वर के बारे में दुविधा में है। इसके परिणामस्वरूप बहुत-से लोग अभी भी यहोवा और यीशु के कार्यों से जुड़े हुए हैं, और आज के कार्य के बारे में धारणाओं से ग्रस्त हैं, अधिकांश लोग हमेशा अनिश्चित महसूस करते हैं और आज के कार्य को गंभीरता से नहीं लेते हैं। मनुष्य की कार्य के पिछले दो चरणों के बारे में कोई धारणाएँ नहीं हैं, जो अदृश्य थे। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य पिछले दोनों चरणों की वास्तविकता को नहीं समझता है और व्यक्तिगत रूप से वह उनका साक्षी नहीं रहा है। चूँकि कार्य के इन चरणों को देखा नहीं जा सकता है, इसलिए मनुष्य इनके बारे में मनचाही कल्पनाएँ करता है; वह कुछ भी क्यों न सोचता रहे, पर इन कल्पनाओं को सिद्ध करने के लिए कोई तथ्य नहीं हैं, और इन्हें सुधारने वाला भी कोई नहीं है। मनुष्य कोई सावधानी बरते बिना और अपनी कल्पनाओं को बेलगाम दौड़ाते हुए अपने मिजाज को खुली छूट दे देता है। उसकी कल्पनाओं को सत्यापित करने के लिए कोई तथ्य नहीं है, इसलिए मनुष्य की कल्पनाएँ “तथ्य” बन जाती हैं, भले ही वे जाँच-परख में सही सिद्ध हों या न हों। इस प्रकार, मनुष्य अपने मन में कल्पित परमेश्वर को ही मानने लगता है और वास्तविकता के परमेश्वर का अनुसरण नहीं करता है। यदि एक व्यक्ति का एक प्रकार का विश्वास है, तो सौ लोगों के बीच सौ प्रकार के विश्वास होंगे। मनुष्य के पास इसी प्रकार के विश्वास हैं क्योंकि उसने परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य को नहीं देखा है, क्योंकि उसने इसे सिर्फ अपने कानों से सुना है और अपनी आँखों से नहीं देखा है। मनुष्य ने उपाख्यानों और कहानियों को सुना है, परंतु उसने परमेश्वर के कार्य के तथ्यों के ज्ञान के बारे में शायद ही सुना है। इस प्रकार, वे जो केवल एक वर्ष से विश्वासी रहे हैं, परमेश्वर पर अपनी खुद की धारणाओं के माध्यम से विश्वास करते हैं और यही उन सभी के बारे में भी सही है जिन्होंने परमेश्वर पर जीवन भर विश्वास किया है। जो लोग तथ्यों को नहीं देख सकते वे ऐसे विश्वास से बच नहीं सकते जिसमें परमेश्वर के बारे में उनकी अपनी धारणाएँ हैं। मनुष्य यह मानता है कि उसने स्वयं को अपनी सभी पुरानी धारणाओं के बंधनों से मुक्त कर लिया है और एक नए क्षेत्र में प्रवेश कर लिया है। क्या मनुष्य यह नहीं जानता कि उन लोगों का ज्ञान जो परमेश्वर का असली चेहरा नहीं देख सकते, केवल धारणाएँ और अफ़वाह है? मनुष्य सोचता है कि उसकी धारणाएँ सही हैं और त्रुटिहीन हैं और सोचता है कि ये धारणाएँ परमेश्वर की ओर से आती हैं। आज जब मनुष्य परमेश्वर के कार्य देखता है, वह कई वर्षों से मन में जमी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है। अतीत की कल्पनाएँ और विचार इस चरण के कार्य में अवरोध बन गए हैं और मनुष्य के लिए इस प्रकार की धारणाओं को छोड़ना और इस प्रकार के विचारों का खंडन करना कठिन हो गया है। परमेश्वर का आज तक अनुसरण करने वाले कई लोगों की इस कार्य के प्रत्येक कदम के प्रति धारणाएँ और भी अधिक गंभीर हो गई हैं और इन लोगों ने धीरे-धीरे देहधारी परमेश्वर के प्रति एक दुराग्रही घृणा पैदा कर ली है। इस घृणा का स्रोत मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं। तथ्य मनुष्य को अपनी कल्पना को खुली छूट देने की अनुमति नहीं देते, किसी मनमाने खंडन के आगे झुकना तो दूर की बात है; मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ तथ्यों के अस्तित्व को बर्दाश्त नहीं कर सकतीं; इसके अलावा, मनुष्य तथ्यों के सही होने और उनकी प्रामाणिकता पर विचार नहीं करता और केवल अपनी धारणाओं को खुलकर व्यक्त कर देता है और अपनी कल्पनाओं को विकसित करता रहता है। ठीक इसी कारण से मनुष्य की धारणाएँ और कल्पनाएँ आज के कार्य की शत्रु बन गई हैं, ऐसा कार्य जो मनुष्य की धारणाओं से मेल नहीं खाता। इसे केवल मनुष्यों की धारणाओं का दोष ही कहा जा सकता है, इसे परमेश्वर के कार्य का दोष नहीं कहा जा सकता। मनुष्य जो चाहे कल्पना कर सकता है, परंतु वह परमेश्वर के कार्य के किसी भी चरण या इसके छोटे-से अंश का भी खंडन नहीं कर सकता है; परमेश्वर के कार्य का तथ्य मनुष्य द्वारा अनुल्लंघनीय है। तुम अपनी कल्पनाओं को खुली छूट दे सकते हो, और यहाँ तक कि यहोवा एवं यीशु के कार्यों के बारे में बढ़िया कथाओं का भी संकलन कर सकते हो, परंतु तुम यहोवा और यीशु के कार्य के प्रत्येक चरण के तथ्य का खंडन नहीं कर सकते; यह एक सिद्धांत है, और एक प्रशासनिक आदेश भी है और तुम लोगों को इन मामलों के महत्व को समझना चाहिए। मनुष्य यह समझता है कि कार्य का यह चरण मनुष्य की धारणाओं के साथ असंगत है, जबकि पिछले दो चरणों के कार्य के साथ ऐसी कोई बात नहीं है। अपनी कल्पना में मनुष्य यह विश्वास करता है कि पिछले दोनों चरणों का कार्य निश्चित रूप से आज के कार्य के समान नहीं है—परंतु क्या तुमने कभी यह विचार किया है कि परमेश्वर के कार्य के सभी सिद्धांत एक ही हैं, कि उसका कार्य हमेशा व्यावहारिक होता है और युग चाहे कोई भी हो, ऐसे लोगों की हमेशा भरमार होगी जो उसके कार्य के तथ्य का प्रतिरोध और विरोध करते हैं? आज जो लोग कार्य के इस चरण का प्रतिरोध और विरोध करते हैं वे निस्संदेह अतीत में भी परमेश्वर का प्रतिरोध करते, क्योंकि इस प्रकार के लोग सदैव परमेश्वर के शत्रु रहेंगे। वे लोग जो परमेश्वर के कार्य के तथ्य को जानते हैं, कार्यों के इन तीन चरणों को एक ही परमेश्वर के कार्य के रूप में देखेंगे, और अपनी धारणाओं को छोड़ देंगे। ये वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, और सचमुच परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। जब परमेश्वर का संपूर्ण प्रबंधन समाप्ति के निकट होगा, तो परमेश्वर सभी चीजों को उनकी किस्म के अनुसार छाँटेगा। मनुष्य सृष्टिकर्ता के हाथों से रचा गया था और अंत में वह मनुष्य को पूरी तरह से अपने प्रभुत्व में वापस ले लेगा; कार्य के तीन चरणों की यही परिणति है। अंत के दिनों में कार्य का चरण और इस्राएल एवं यहूदा में पिछले दो चरण, संपूर्ण ब्रह्मांड में परमेश्वर के प्रबंधन की योजना हैं। इसे कोई नकार नहीं सकता है, और यह परमेश्वर के कार्य का तथ्य है। यद्यपि लोगों ने इस कार्य के बहुत-से हिस्से का अनुभव नहीं किया है या इसके साक्षी नहीं हैं, परंतु तथ्य तब भी तथ्य ही हैं और इसे किसी भी मनुष्य के द्वारा नकारा नहीं जा सकता है। ब्रह्मांड में हर जगह जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे सभी कार्य के इन तीनों चरणों को स्वीकार करेंगे। यदि तुम कार्य के किसी एक विशेष चरण को ही जानते हो, और कार्य के अन्य दो चरणों को नहीं समझते हो, अतीत में परमेश्वर द्वारा किए गए कार्यों को नहीं समझते हो, तो तुम परमेश्वर के प्रबंधन की समस्त योजना के संपूर्ण सत्य के बारे में बात करने में असमर्थ हो, और परमेश्वर के बारे में तुम्हारा ज्ञान एक-पक्षीय है, क्योंकि तुम परमेश्वर को जानते या समझते नहीं हो, और इसलिए तुम परमेश्वर के गवाह बनने के लिए योग्य नहीं हो। इन चीज़ों के बारे में तुम्हारा वर्तमान ज्ञान चाहे गहरा हो या सतही, अंत में तुम सभी लोगों के पास ज्ञान होना ही चाहिए और तुम्हें पूरी तरह से आश्वस्त होना चाहिए और सभी लोग परमेश्वर के कार्य की संपूर्णता को देखेंगे और उसके प्रभुत्व के अधीन समर्पित होंगे। इस कार्य के अंत में सभी धर्म एक हो जाएँगे, सभी सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व के अधीन लौट जाएँगे, सभी सृजित प्राणी एक सच्चे परमेश्वर की आराधना करेंगे और सभी दुष्ट धर्म नष्ट हो जाएँगे और फिर कभी भी प्रकट नहीं होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों को जानना ही परमेश्वर को जानने का मार्ग है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 293
परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य, लोगों पर उसके कार्य का अभीष्ट प्रभाव और लोगों के लिए उसके इरादे असल में क्या हैं, यह समझना ही वह चीज है जिसे परमेश्वर का अनुसरण करने वाले हर व्यक्ति को प्राप्त करना चाहिए। परमेश्वर के कार्य का ज्ञान ही वास्तव में वह चीज है जिसकी आजकल सभी लोगों में कमी पाई जाती है। दुनिया रचने से लेकर आज तक परमेश्वर ने लोगों के साथ क्या किया है, परमेश्वर का समस्त कार्य और असल में उसके इरादे क्या रहे हैं—लोग इन चीजों को नहीं बूझते और न ही समझते हैं। यह कमी न सिर्फ पूरे धार्मिक जगत में, बल्कि इससे भी बढ़कर उन तमाम लोगों में पाई जाती है जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं। जब वह दिन आता है जब तुम सचमुच परमेश्वर को देखते हो, उसकी बुद्धि की सराहना करते हो, उसके द्वारा किए गए समस्त कर्म देखते हो और परमेश्वर जो है और जो उसके पास है, उसे जानते हो—जब तुमने उसकी प्रचुरता, बुद्धि, अद्भुतता और वह समस्त कार्य देख लिया होता है जो उसने लोगों पर किया है—तभी तुमने वास्तविक सफलता के साथ परमेश्वर में विश्वास किया होगा। जब यह कहा जाता है कि परमेश्वर सर्वसमावेशी और प्रचुरता से परिपूर्ण है तो असल में वह किस रूप में सर्वसमावेशी होता है और किस रूप में प्रचुरता से परिपूर्ण होता है? अगर तुम यह नहीं समझते तो तुम्हें परमेश्वर में विश्वास करने वाला नहीं माना जा सकता। मैं यह क्यों कहता हूँ कि धार्मिक जगत के लोग परमेश्वर में विश्वास करने वाले नहीं होते, बल्कि कुकर्मी होते हैं, दानवों की किस्म के होते हैं? जब मैं यह कहता हूँ कि वे कुकर्मी हैं, तो वह इसलिए कि वे परमेश्वर के इरादे नहीं समझते और उसकी बुद्धि देख पाने में असमर्थ रहते हैं। परमेश्वर अपना कार्य उन पर कभी प्रकट नहीं करता। वे सब अंधे हैं और परमेश्वर के कर्म नहीं देख सकते। वे परमेश्वर द्वारा त्याग दिए गए हैं और वे उसकी देखभाल और सुरक्षा से पूरी तरह वंचित हैं, पवित्र आत्मा के कार्य की तो बात ही छोड़ दो। जिन लोगों के पास परमेश्वर का कार्य नहीं होता, वे सब कुकर्मी और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग होते हैं। मैं परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले जिन लोगों की बात कर रहा हूँ, उनका तात्पर्य उन लोगों से है जो परमेश्वर को नहीं जानते—जो जबान से तो परमेश्वर को स्वीकारते हैं लेकिन उसके बारे में कोई ज्ञान नहीं रखते; जो परमेश्वर का अनुसरण तो करते हैं लेकिन उसके प्रति समर्पण नहीं करते; जो उसके अनुग्रह का आनंद तो उठाते हैं लेकिन उसके लिए अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाते। अगर व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता और परमेश्वर जो कार्य लोगों पर करता है उसे नहीं समझता तो वह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हो सकता और परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग नहीं रह सकता। लोगों के परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कारण एक ओर उनके भ्रष्ट स्वभावों से उत्पन्न होता है; दूसरी ओर इसका कारण यह है कि वे परमेश्वर को नहीं जानते और उन सिद्धांतों को नहीं समझते जिनके द्वारा वह कार्य करता है या यह कि लोगों के लिए उसके क्या इरादे हैं। एक-साथ लेने पर ये दोनों पहलू परमेश्वर के प्रति मनुष्य के प्रतिरोध का इतिहास बनाते हैं। जिन लोगों ने अभी-अभी परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है, वे उसका प्रतिरोध इसलिए करते हैं क्योंकि मनुष्यों में परमेश्वर का प्रतिरोध करने की प्रकृति होती है; जो लोग कई सालों से परमेश्वर में विश्वास कर रहे हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध इसलिए करते हैं क्योंकि वे उसे नहीं जानते और साथ ही उनमें भ्रष्ट स्वभाव होते हैं। परमेश्वर के देहधारी होने से पहले के समय में इस बात का पैमाना कि कोई परमेश्वर का प्रतिरोध करता था या नहीं, इस बात पर आधारित होता था कि उसने स्वर्ग स्थित परमेश्वर द्वारा निर्धारित आदेशों का पालन किया था या नहीं। उदाहरण के लिए, व्यवस्था के युग में जो कोई यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करता था वह परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा होता था; जो कोई भी यहोवा को चढ़ाई गई भेंटें चुराता था या उन लोगों का प्रतिरोध करता था जिन पर यहोवा कृपादृष्टि रखता था, वह परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहा होता था और उसे पत्थर मारकर मार डाला जाता था; जो कोई अपने माता-पिता का आदर नहीं करता था या दूसरे लोगों को मारता-पीटता और उनका अपमान करता था, वह व्यवस्थाओं की अवज्ञा कर रहा होता था और वे सब जो यहोवा की व्यवस्थाओं का पालन नहीं करते थे, वे उसका प्रतिरोध करने वाले लोग होते थे। अनुग्रह के युग में चीजें अलग थीं, जहाँ वे सब जो यीशु का प्रतिरोध करते थे, वे परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहे होते थे और वे सब जो यीशु द्वारा कहे गए वचनों के प्रति समर्पण नहीं करते थे, वे परमेश्वर का प्रतिरोध कर रहे होते थे। इस अवधि की “परमेश्वर का प्रतिरोध करने” की परिभाषा अधिक सटीक और व्यावहारिक थी। परमेश्वर के देहधारी होने से पहले इस बात का पैमाना कि कोई व्यक्ति परमेश्वर का प्रतिरोध करता था या नहीं, इस बात पर आधारित होता था कि वह स्वर्ग में स्थित अदृश्य परमेश्वर की आराधना और उसका आदर करता था या नहीं। उस अवधि की “परमेश्वर का प्रतिरोध करने” की परिभाषा उतनी व्यावहारिक नहीं थी, क्योंकि लोग परमेश्वर को देख नहीं सकते थे और यह नहीं जानते थे कि परमेश्वर की छवि कैसी है या वह वास्तव में कैसे काम करता और बोलता है। लोगों के मन में परमेश्वर के बारे में कोई धारणाएँ नहीं थीं और वे एक अस्पष्टता की स्थिति से परमेश्वर में विश्वास करते थे क्योंकि परमेश्वर अभी तक मनुष्य के सामने प्रकट नहीं हुआ था। इसलिए चाहे लोग अपनी कल्पनाओं के आधार पर परमेश्वर में कैसे भी विश्वास करते हों, परमेश्वर ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया या उनसे बहुत ज्यादा माँगें नहीं कीं क्योंकि वे परमेश्वर को देखने में पूरी तरह असमर्थ थे। जब परमेश्वर देहधारी होता है और लोगों के बीच कार्य करने आता है तो सभी उसे देखते हैं और उसके वचन सुनते हैं और देहधारी परमेश्वर के कर्म देखते हैं, जिसके बाद हर किसी की धारणाएँ बुलबुलों की तरह फूट जाती हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो परमेश्वर को देह में प्रकट होते देखते हैं, अगर वे इरादतन उसके प्रति समर्पण कर देते हैं तो उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा, जबकि जो उसका उद्देश्यपूर्वक प्रतिरोध करते हैं उन लोगों का निरूपण ऐसे लोगों के रूप में किया जाएगा जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। ऐसे लोग मसीह-विरोधी होते हैं, वे शत्रु होते हैं जो जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं, लेकिन फिर भी स्वेच्छा से उसके प्रति समर्पण करते हैं, उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाएगा। परमेश्वर लोगों को उनके इरादों और उनके द्वारा की जाने वाली चीजों के आधार पर दोषी ठहराता है, उनके विचारों और खयालों के आधार पर नहीं। अगर वह लोगों को उनके विचारों और खयालों के आधार पर दोषी ठहराता तो एक भी व्यक्ति परमेश्वर के क्रोधित हाथों से न बच पाता। जो लोग जानबूझकर देहधारी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उन्हें उनकी अवज्ञा के लिए दंडित किया जाएगा। इन लोगों का प्रतिरोध उनके द्वारा परमेश्वर के बारे में रखी गई धारणाओं से उत्पन्न होता है जो उन्हें ऐसी चीजें करने की ओर ले जाती हैं जो परमेश्वर के कार्य में बाधा डालती हैं। ऐसे तमाम लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करते हैं और उसे विघटित करने का प्रयास करते हैं। वे न सिर्फ परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं—बल्कि वे ऐसी गतिविधियों में भी संलग्न होते हैं जो उसके कार्य में बाधा डालती हैं और इसी कारण उन्हें दोषी ठहराया जाता है। जो लोग जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में बाधा नहीं डालते, उन्हें पापियों के रूप में दोषी नहीं ठहराया जाएगा क्योंकि वे स्वेच्छा से समर्पण करने में सक्षम होते हैं और ऐसी चीजें नहीं करते जिनसे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न हों। ऐसे लोगों को दोषी नहीं ठहराया जाएगा। लेकिन जब कोई व्यक्ति कई वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर चुका हो और फिर भी उसके बारे में धारणाएँ रखता हो और देहधारी परमेश्वर के कार्य को जानने में असमर्थ हो, और चाहे उसने जितने भी वर्षों तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव किया हो, फिर भी वह उसके बारे में धारणाओं से भरा रहता हो और उसे जान पाने में असमर्थ रहता हो; इसके बावजूद कि उसने आवश्यक रूप से ऐसा कोई कार्य न किया हो जिससे बाधाएँ उत्पन्न हों, फिर भी उसका हृदय परमेश्वर के बारे में धारणाओं से भरा रहता हो—और भले ही ये धारणाएँ स्पष्ट रूप से दिखाई न देती हों, फिर भी ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य के लिए किसी तरह से सहायक नहीं होता, वह परमेश्वर के लिए सुसमाचार का प्रचार करने या उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहने में असमर्थ रहता है—इसका अर्थ है कि ऐसा व्यक्ति बिल्कुल निकम्मा और मूर्ख होता है। चूँकि वह परमेश्वर को नहीं जानता और साथ ही वह उसके बारे में अपनी धारणाएँ छोड़ने में पूरी तरह से असमर्थ होता है, इसलिए उसे दोषी ठहराया जाता है। इसे इस तरह कहा जा सकता है : जिन लोगों ने अभी-अभी परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उनके मन में उसके बारे में धारणाएँ होना या उनका उसे न जानना सामान्य बात है; लेकिन अगर कोई व्यक्ति कई वर्षों से परमेश्वर में विश्वास कर रहा है और उसने उसके कार्य का अच्छा-खासा अनुभव किया है और फिर भी वह उसके बारे में धारणाएँ रखता है, तो यह सामान्य नहीं है और अगर उसे परमेश्वर के बारे में कोई ज्ञान नहीं है तो यह और भी ज्यादा असामान्य है। चूँकि यह एक सामान्य अवस्था नहीं है, इसलिए उसे दोषी ठहराया जाता है। ये सभी असामान्य लोग बेकार हैं; ये वे लोग हैं जो परमेश्वर का सबसे ज्यादा प्रतिरोध करते हैं और जिन्होंने परमेश्वर के अनुग्रह का व्यर्थ ही आनंद उठाया है। ऐसे सभी लोग अंत में हटा दिए जाएँगे!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 294
जो लोग परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग होते हैं। यह बात उन लोगों पर और भी ज्यादा लागू होती है जो परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य तो समझते हैं फिर भी परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास नहीं करते। ऐसे भी लोग हैं, जो बड़ी-बड़ी कलीसियाओं में बाइबल पढ़ते हैं और दिन भर उसके अंशों का पाठ करते रहते हैं, फिर भी उनमें से एक भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझता, न ही उनमें से कोई ऐसा होता है जो परमेश्वर को जान सकता है—उनमें से किसी के परमेश्वर के इरादों के अनुरूप चलने वाला होने की तो बात ही छोड़ दो। वे सब बेकार, नीच लोग होते हैं, जो “परमेश्वर” को उपदेश देने के लिए ऊँचे स्थानों पर खड़े होते हैं। वे ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर के बैनर तले काम करते हैं, फिर भी जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, जो परमेश्वर में विश्वास करने का लेबल लगाते हैं, लेकिन मनुष्य का मांस खाते और उनका रक्त पीते हैं। ऐसे तमाम लोग दुष्ट दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाते हैं, वे प्रधान राक्षस हैं जो जानबूझकर लोगों को सही मार्ग पर चलने से बाधित करते हैं और वे ऐसी अड़चनें हैं जो लोगों को परमेश्वर की खोज करने से रोकती हैं। वे देखने में भले ही “शारीरिक रूप से हृष्ट-पुष्ट” लगते हों, लेकिन उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे मसीह-विरोधी हैं जो लोगों को परमेश्वर का प्रतिरोध करने की ओर ले जाते हैं? उनके अनुयायियों को यह कैसे पता चलेगा कि वे ऐसे जीवित दानव हैं जो मनुष्यों की आत्माएँ निगल जाने के लिए समर्पित हैं? जो लोग परमेश्वर की उपस्थिति में खुद को कुलीन समझते हैं, वे वास्तव में सबसे नीच हैं, जबकि जो लोग खुद को नीचा समझते हैं, वे सबसे कुलीन हैं। और जो लोग यह मान बैठते हैं कि वे परमेश्वर के कार्य को जानते हैं और जो परमेश्वर पर अपनी नजरें जमाए हुए, बिना किसी रोक-टोक के दूसरों के सामने उसके कार्य की घोषणा कर सकते हैं, वे सबसे ज्यादा अज्ञानी हैं। ऐसे लोगों के पास परमेश्वर की कोई गवाही नहीं होती और वे सब अहंकारी और घमंडी होते हैं। जो लोग यह मानते हैं कि वे परमेश्वर के बारे में बहुत कम जानते हैं लेकिन वास्तव में जिनके पास परमेश्वर का व्यावहारिक अनुभव और व्यावहारिक ज्ञान होता है, वे ही परमेश्वर को सबसे ज्यादा प्रिय होते हैं। सिर्फ ऐसे लोगों के पास ही सच्ची गवाही होती है और सिर्फ ऐसे लोग ही वास्तव में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में सक्षम होते हैं। जो लोग परमेश्वर के इरादे नहीं समझते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर के इरादे तो समझते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अभ्यास नहीं करते, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर के वचन तो खाते-पीते हैं लेकिन फिर भी परमेश्वर के वचनों के सार के विरुद्ध चलते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाएँ रखते हैं और तो और जानबूझकर विद्रोह में संलग्न होते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। जो लोग परमेश्वर की आलोचना करते हैं, वे परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। और जो कोई भी परमेश्वर को जानने में असमर्थ है और उसकी गवाही नहीं दे सकता, वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इसलिए मैं तुम लोगों को नसीहत देता हूँ : अगर तुम लोगों में वास्तव में इस मार्ग पर चलने की आस्था है तो अनुसरण करते रहो। लेकिन अगर तुम लोग खुद को परमेश्वर का प्रतिरोध करने से नहीं रोक पाते तो बेहतर यही होगा कि बहुत देर होने से पहले ही तुम लोग पीछे हट जाओ वरना तुम लोगों के लिए चीजें वाकई अच्छी नहीं होंगी, क्योंकि तुम लोगों की प्रकृति ही बहुत ज्यादा भ्रष्ट है। तुम लोगों में वफादारी नहीं है, समर्पण नहीं है, ऐसा हृदय नहीं है जो धार्मिकता और सत्य के लिए प्यासा हो और तुममें परमेश्वर के लिए प्रेम नहीं है। यह कहा जा सकता है कि परमेश्वर के सामने तुम लोगों की अवस्था मूलभूत रूप से पूरी गड़बड़ है। तुम उसका पालन करने में असमर्थ हो जिसका तुम्हें पालन करना चाहिए, वह कहने में असमर्थ हो जो तुम्हें कहना चाहिए, उसका अभ्यास करने में असमर्थ हो जिसका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए और वह प्रकार्य पूरा करने में असमर्थ हो जिसे तुम्हें पूरा करना चाहिए; तुम लोगों में वह वफादारी नहीं है जो होनी चाहिए, वह जमीर नहीं है जो होना चाहिए, वह समर्पण नहीं है जो होना चाहिए या वह संकल्प नहीं है जो होना चाहिए; तुमने वह कष्ट नहीं सहा है जो तुम्हें सहना चाहिए था और तुममें वह आस्था भी नहीं है जो होनी चाहिए। तुम लोगों में पूरी तरह से कोई गुण नहीं है। इस तरह जीते रहने पर क्या तुम लोगों को शर्म नहीं आती? मैं तुम लोगों को सलाह देता हूँ कि तुम लोग जल्द से जल्द अनंत विश्राम में अपनी आँखें मूँद लो और ऐसा करके परमेश्वर को तुम्हारी चिंता करने और तुम्हारी खातिर कष्ट उठाने से बख्श दो। तुम लोग परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसके इरादे नहीं समझते; तुम परमेश्वर के वचन खाते-पीते हो फिर भी मनुष्य से परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप चलने में असमर्थ हो। तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसे नहीं जानते और तुम बिना किसी लक्ष्य के लिए प्रयास किए, बिना किसी मूल्य के या बिना किसी अर्थ के अपना जीवन जीते हो। तुम इंसान हो फिर भी तुममें जरा भी जमीर, ईमानदारी या विश्वसनीयता नहीं है—क्या तुम लोग अभी भी खुद को इंसान कह सकते हो? तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो फिर भी उसे धोखा देते हो; यहाँ तक कि तुम परमेश्वर के पैसों के लिए भी ललचाते हो और उसे चढ़ाई गई भेंटें भी खा जाते हो। और फिर भी, अंत में तुम परमेश्वर की भावनाओं के प्रति जरा भी विचारशीलता या उसके प्रति जरा भी जमीर दिखाने में असफल रहते हो। यहाँ तक कि तुम परमेश्वर द्वारा की गई एक छोटी-सी अपेक्षा भी पूरी नहीं कर सकते। क्या तुम लोग अभी भी खुद को इंसान कह सकते हो? तुम वही खाना खाते हो जो परमेश्वर तुम्हें देता है, उसी ऑक्सीजन से साँस लेते हो जो वह तुम्हें देता है और उसके अनुग्रह का आनंद उठाते हो, लेकिन अंत में तुम्हें परमेश्वर का जरा-सा भी ज्ञान नहीं होता। इसके विपरीत, तुम ऐसे निकम्मे बन गए हो जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। क्या यह तुम्हें एक ऐसा जानवर नहीं बना देता जिसकी तुलना कुत्ते से भी नहीं की जा सकती? जानवरों में क्या कोई ऐसा जानवर है जो तुम लोगों से ज्यादा दुर्भावनापूर्ण हो?
वे पादरी और एल्डर जो ऊँचे स्थान पर खड़े होकर दूसरों को उपदेश देते हैं, वे वो लोग हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं; वे सब शैतान के साथी हैं। जहाँ तक तुम लोगों में से उनकी बात है जो ऊँचे स्थान पर नहीं होते और दूसरों को उपदेश देते हैं, क्या तुम परमेश्वर का और भी ज्यादा प्रतिरोध नहीं करते? क्या तुम लोगों की शैतान के साथ और भी ज्यादा साठ-गाँठ नहीं है? जो लोग परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य नहीं समझते, वे नहीं जानते कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कैसे हुआ जाए। क्या यह संभव है कि उन लोगों के साथ भी यही मामला हो जो उसके कार्य का उद्देश्य समझते हैं? परमेश्वर का कार्य कभी गलत नहीं होता; बल्कि, समस्या लोगों के अनुसरण में होती है। क्या वे पतित लोग जो जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, उन पादरियों और एल्डरों की तुलना में और भी ज्यादा कपटी और अनिष्टार्थी नहीं हैं? बहुत-से लोग हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, लेकिन उनमें परमेश्वर का प्रतिरोध करने की विभिन्न अवस्थाएँ भी बहुत सारी हैं। जैसे हर तरह के विश्वासी होते हैं, वैसे ही परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले भी हर तरह के होते हैं, हर कोई दूसरे से अलग होता है। जो लोग परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य स्पष्ट रूप से पहचानने में असफल रहते हैं, उनमें से एक भी बचाया नहीं जा सकता। किसी ने अतीत में कैसे भी परमेश्वर का प्रतिरोध किया हो, जब वह परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य समझ जाता है और परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करने में सक्षम हो जाता है, तब परमेश्वर उसके सभी पिछले पाप मिटा देता है। जब तक व्यक्ति सत्य खोजकर उसका अभ्यास कर सकता है तब तक परमेश्वर उनके द्वारा की गई तमाम चीजें याद नहीं रखेगा। इसके अलावा, परमेश्वर लोगों को इस आधार पर धार्मिकता के अनुरूप मानता है कि वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं या नहीं। यही परमेश्वर की धार्मिकता है। परमेश्वर को देखने या उसके कार्य का अनुभव करने से पहले किसी ने परमेश्वर के साथ कैसा भी व्यवहार किया हो, वह उसे याद नहीं रखता। लेकिन जब व्यक्ति परमेश्वर को देख लेता है और उसके कार्य का अनुभव कर लेता है, तब उसके सभी कर्म और कार्यकलाप परमेश्वर द्वारा “वर्षवृत्त” में दर्ज कर लिए जाते हैं क्योंकि उसने परमेश्वर को देखा है और उसके कार्य के बीच जीवन बिताया है।
जब व्यक्ति परमेश्वर के पास जो है और जो वह है, इसे सचमुच देख लेता है, परमेश्वर की सर्वोच्चता निहार लेता है और सच में परमेश्वर के कार्य को जान लेता है—और, इसके अलावा, जब उसका पुराना स्वभाव बदल जाता है—तो उसने अपना वह विद्रोही स्वभाव पूरी तरह से त्याग दिया होगा जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। इसे इस तरह से कहा जा सकता है : हर किसी ने परमेश्वर का प्रतिरोध किया है और हर किसी ने परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह किया है। लेकिन अगर तुम इरादतन देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो और इस बिंदु से आगे अपनी वफादारी से परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकते हो, उस सत्य का अभ्यास कर सकते हो जिसका अभ्यास तुम्हें करना चाहिए, वह कर्तव्य निभा सकते हो जो तुम्हें निभाना चाहिए और उन विनियमों का पालन कर सकते हो जिनका तुम्हें पालन करना चाहिए तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी विद्रोहशीलता त्यागने को तैयार है और जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है। अगर तुम हठपूर्वक अपने गलत तरीकों पर अड़े रहते हो, तुम्हारे हृदय में कोई पछतावा नहीं होता और तुम परमेश्वर के साथ सहयोग करने और उसे संतुष्ट करने का जरा भी इरादा रखे बिना अपना विद्रोही आचरण जारी रखते हो तो तुम जैसा हठी और सुधर न सकने वाला व्यक्ति दंडित किए जाने के लिए चिह्नित किया जाएगा और ऐसे व्यक्ति के रूप में चिह्नित किया जाएगा जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जाएगा। अगर ऐसा होता है तो तुम आज परमेश्वर के शत्रु होगे और कल भी परमेश्वर के शत्रु होगे और उसके अगले दिन भी परमेश्वर के शत्रु बने रहोगे—तुम हमेशा के लिए ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है, परमेश्वर का शत्रु है। तब ये कैसे संभव है कि परमेश्वर तुम्हें दंडित किए बिना छोड़ दे? लोगों की प्रकृति परमेश्वर का प्रतिरोध करने की होती है लेकिन उन्हें इसलिए जानबूझकर परमेश्वर का प्रतिरोध करने का “रहस्य” नहीं खोजना चाहिए कि व्यक्ति की प्रकृति बदलना बहुत कठिन होता है। अगर तुम इसकी कोशिश करते हो तो बेहतर होगा कि तुम बहुत देर होने से पहले ही चले जाओ, कहीं ऐसा न हो कि भविष्य में तुम्हारी ताड़ना और अधिक कठोर हो जाए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारी पाशविक प्रकृति भभक जाए और अनियंत्रित हो जाए और अंततः परमेश्वर द्वारा तुम्हारी शारीरिक देह का अंत कर दिया जाए। तुम आशीष प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हो; लेकिन अगर अंत में तुम्हें इसके बजाय शाप का सामना करना पड़े तो तुम्हारा विश्वास वास्तव में पूरी तरह व्यर्थ रहा होगा। मैं तुम लोगों को नसीहत देता हूँ, बेहतर होगा कि तुम कोई दूसरी योजना बना लो। क्या तुम्हारे लिए परमेश्वर में विश्वास करने के बजाय कुछ और करना बेहतर नहीं होगा? क्या तुम सच में विश्वास करते हो कि तुम्हारे लिए यही एकमात्र रास्ता है? क्या तुम सत्य खोजे बिना भी जीवित नहीं रह सकते? इस तरह खुद को परमेश्वर के खिलाफ खड़ा क्यों करते हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले लोग हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 295
मैं मनुष्यों के मध्य बहुत कार्य कर चुका हूँ और इस दौरान मैंने कई वचन भी व्यक्त किए हैं। ये समस्त वचन मनुष्य के उद्धार के लिए हैं, और इसलिए व्यक्त किए गए थे, ताकि मनुष्य मेरे अनुरूप बन सके। फिर भी, पृथ्वी पर मैंने थोड़े ही लोग पाए हैं, जो मेरे अनुरूप हैं, और इसलिए मैं कहता हूँ कि मनुष्य मेरे वचनों को नहीं सँजोता—ऐसा इसलिए है, क्योंकि मनुष्य मेरे अनुरूप नहीं है। इस तरह, मैं जो कार्य करता हूँ, वह सिर्फ़ इसलिए नहीं किया जाता कि मनुष्य मेरी आराधना कर सके; बल्कि उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण रूप से वह इसलिए किया जाता है ताकि मनुष्य मेरे अनुरूप बन सके। मनुष्य जो भ्रष्ट हो चुके हैं, जो शैतान के जाल में जीते हैं, वे सभी देह में जीते हैं, स्वार्थपूर्ण अभिलाषाओं में जीते हैं और उनके मध्य एक भी व्यक्ति नहीं जो मेरे अनुरूप हो। जो कहते हैं कि वे मेरे अनुरूप हैं, वे सब अज्ञात मूर्तियों की आराधना करते हैं। भले ही वे मेरे नाम को पवित्र मानने का दावा करते हैं, पर वे उस रास्ते पर चलते हैं जो मेरे विपरीत जाता है, और उनके शब्द घमंड और आत्मविश्वास से भरे हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सब स्वाभाविक रूप से मेरे विरोध में हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। प्रतिदिन वे बाइबल में मेरे निशान ढूँढ़ते हैं, और यों ही “उपयुक्त” अंश तलाश लेते हैं, जिन्हें वे अंतहीन रूप से पढ़ते रहते हैं और उनका वाचन पवित्रशास्त्र के रूप में करते हैं। वे नहीं जानते कि मेरे अनुरूप कैसे बनें, न ही वे यह जानते हैं कि मेरे विरुद्ध होने का क्या अर्थ है। वे केवल पवित्रशास्त्रों को आँख मूँदकर पढ़ते रहते हैं। वे एक अज्ञात परमेश्वर को जिसे उन्होंने देखा ही नहीं है और आधारभूत रूप से देख भी नहीं सकते, बाइबल की सीमाओं के भीतर परिसीमित करते हैं, वे फुरसत के समय में बाइबल निकालकर पढ़ते हैं। वे मेरा अस्तित्व मात्र बाइबल के दायरे में ही सीमित मानते हैं, और वे मेरी बराबरी बाइबल से करते हैं; बाइबल के बिना मैं नहीं हूँ, और मेरे बिना बाइबल नहीं है। वे मेरे अस्तित्व या क्रियाकलापों पर कोई ध्यान नहीं देते, बल्कि पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर परम और विशेष ध्यान देते हैं। बहुत-से लोग तो यहाँ तक मानते हैं कि अपनी इच्छा से मुझे ऐसा कुछ नहीं करना चाहिए, जो पवित्रशास्त्र द्वारा पहले से न कहा गया हो। वे पवित्रशास्त्र को बहुत अधिक महत्त्व देते हैं। कहा जा सकता है कि वे निरे शब्दों को बहुत महत्त्वपूर्ण समझते हैं, इस हद तक कि हर एक वचन जो मैं बोलता हूँ, वे उसे मापने और मेरी निंदा करने के लिए बाइबल के छंदों का उपयोग करते हैं। वे मेरे साथ अनुरूपता का मार्ग या सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग नहीं खोजते, बल्कि बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने का मार्ग खोजते हैं और विश्वास करते हैं कि कोई भी चीज जो बाइबल के अनुसार नहीं है, बिना किसी अपवाद के, मेरा कार्य नहीं है। क्या ऐसे लोग फरीसियों के कर्तव्यपरायण वंशज नहीं हैं? यहूदी फरीसी यीशु को दोषी ठहराने के लिए मूसा की व्यवस्था का उपयोग करते थे। वे उस समय के यीशु के अनुरूप होने का प्रयास नहीं करते थे, बल्कि व्यवस्था के प्रत्येक अनुच्छेद के साथ इतनी गंभीरता से पेश आते थे कि—यीशु पर यह दोष लगाने के बाद कि वह पुराने नियम की व्यवस्था का पालन नहीं करता और मसीहा नहीं है—अंततः उन्होंने निर्दोष यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। उनका सार क्या था? क्या यह ऐसा नहीं था कि उन्होंने सत्य के साथ अनुरूपता के मार्ग की खोज नहीं की? वे केवल पवित्रशास्त्र के हर एक वचन पर ध्यान देते थे, जबकि मेरे इरादों और मेरे कार्य के चरणों और विधियों पर उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया। वे सत्य की खोज करने वाले लोग नहीं, बल्कि पवित्रशास्त्र के शब्दों से ढिठाई से चिपकने वाले लोग थे; वे परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोग नहीं, बल्कि बाइबल में विश्वास करने वाले लोग थे। अगर बात की तह में जाएँ तो वे बाइबल के ठेकेदार बन बैठे थे। बाइबल के हितों की रक्षा करने, बाइबल की गरिमा बनाए रखने और बाइबल की प्रतिष्ठा बचाने के लिए वे यहाँ तक चले गए कि उन्होंने दयालु यीशु को सूली पर चढ़ा दिया। ऐसा उन्होंने सिर्फ़ बाइबल का बचाव करने के लिए और लोगों के हृदय में बाइबल के हर एक शब्द का रुतबा बनाए रखने के लिए किया। इसलिए उन्होंने अपना भविष्य त्यागना और पापबलि को प्राप्त न करना पसंद किया ताकि पवित्रशास्त्र के नियमों के अनुरूप न होने के कारण यीशु को मृत्यु-दंड दे सकें। क्या वे लोग पवित्रशास्त्र के एक-एक शब्द के दास नहीं थे?
और आज के लोगों के बारे में क्या कहूँ? वे उस मसीह को, जो सत्य को प्रकट करने आया है, इस संसार से निकाल देना ज्यादा पसंद करेंगे, ताकि वे स्वर्ग में प्रवेश हासिल कर सकें और अनुग्रह प्राप्त कर सकें। वे बाइबल के हितों की रक्षा करने के लिए सत्य के आगमन को पूरी तरह से नकारना और बाइबल का चिरस्थायी अस्तित्व सुनिश्चित करने के लिए देह में लौटे मसीह को फिर से सूली पर चढ़ाना पसंद करेंगे। मनुष्य मेरा उद्धार कैसे प्राप्त कर सकता है, जब उसका हृदय इतनी अधिक दुर्भावना से भरा है और उसकी प्रकृति मेरे प्रति इतनी विरोधी है? मैं मनुष्य के मध्य रहता हूँ, फिर भी मनुष्य मेरे अस्तित्व के बारे में नहीं जानता। जब मैं मनुष्य पर अपना प्रकाश डालता हूँ, तब भी वह मेरे अस्तित्व से अनभिज्ञ रहता है। जब मैं मनुष्य पर अपना क्रोध बरसाता हूँ तो वह और भी अधिक मेरे अस्तित्व को नकारता है। मनुष्य शब्दों और बाइबल के साथ अनुरूपता खोजता है, फिर भी कोई भी मेरे सामने सत्य के साथ अनुरूपता का मार्ग खोजने नहीं आता। मैं स्वर्ग में रहूँ तो मनुष्य मेरा आदर करता है और स्वर्ग में मेरे अस्तित्व की विशेष चिंता करता है, लेकिन देह में रहूँ तो कोई मेरी परवाह नहीं करता, क्योंकि मैं जो मनुष्य के बीच रहता हूँ, अत्यंत महत्त्वहीन हूँ। जो लोग सिर्फ बाइबल के शब्दों के अनुरूप होने की खोज करते हैं और जो लोग सिर्फ एक अज्ञात परमेश्वर के अनुरूप होने की खोज करते हैं, वे मेरी दृष्टि में तुच्छ हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे मृत शब्दों की आराधना करते हैं और एक ऐसे परमेश्वर की आराधना करते हैं, जो उन्हें अथाह धन देने में सक्षम है; वे जिस परमेश्वर की पूजा करते हैं, वह ऐसा परमेश्वर है जो स्वयं को मनुष्य की दया पर रख देता है—ऐसा परमेश्वर, जिसका अस्तित्व ही नहीं है। तो फिर, ऐसे लोग मुझसे क्या प्राप्त कर सकते हैं? मनुष्य की तुच्छता शब्दों से परे है। जो मेरे विरोध में हैं, जो मुझसे असीमित माँगें करते हैं, जिनमें सत्य के लिए कोई प्रेम नहीं है, जो मेरे प्रति विद्रोही हैं—वे मेरे अनुरूप कैसे हो सकते हैं?
जो लोग मेरे विरुद्ध हैं, वे मेरे अनुरूप नहीं हैं। ऐसा ही मामला उनका है, जो सत्य से प्रेम नहीं करते। जो मेरे प्रति विद्रोह करते हैं, वे मेरे और भी अधिक विरुद्ध हैं और मेरे अनुरूप नहीं हैं। जो मेरे अनुरूप नहीं हैं, मैं उन सभी को उस दुष्ट के हाथों में छोड़ देता हूँ, जो मेरे अनुरूप नहीं हैं, मैं उन सभी को उस दुष्ट द्वारा भ्रष्ट किए जाने के लिए त्याग देता हूँ, उन्हें अपने बुरे कर्म प्रकट करने के लिए असीमित स्वतंत्रता दे देता हूँ, और अंत में उस दुष्ट को सौंप देता हूँ कि वह उन्हें निगल जाए। मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मेरी आराधना करते हैं, अर्थात्, मैं इस बात की परवाह नहीं करता कि कितने लोग मुझ पर विश्वास करते हैं। मुझे सिर्फ इस बात की फिक्र है कि कितने लोग मेरे अनुरूप हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे सब जो मेरे अनुरूप नहीं हैं, वे ऐसे दुष्ट हैं जो मुझे धोखा देते हैं और मेरे शत्रु हैं। मैं अपने शत्रुओं को अपने घर में “प्रतिष्ठित” नहीं करूँगा। जो मेरे अनुरूप हैं, वे हमेशा मेरे घर में मेरी सेवा करेंगे, और जो मेरे विरुद्ध जाते हैं, वे हमेशा मेरी सज़ा भुगतेंगे। जो सिर्फ़ बाइबल के शब्दों पर ही ध्यान देते हैं और न तो सत्य में दिलचस्पी रखते हैं और न मेरे पदचिह्न खोजने में—वे मेरे विरुद्ध हैं, क्योंकि वे मुझे बाइबल के दायरे में सीमांकित कर देते हैं, बाइबल की सीमाओं में सीमित कर देते हैं, और यह मेरे विरुद्ध घोर निंदा का कार्य है। ऐसे लोग मेरे सामने कैसे आ सकते हैं? वे जिस पर ध्यान देते हैं वे मेरे कर्म या मेरे इरादे या सत्य नहीं हैं, पर शब्दों पर ध्यान देते हैं—शब्द जो मार देते हैं। ऐसे लोग मेरे अनुरूप कैसे हो सकते हैं?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें मसीह के प्रति अनुरूपता का मार्ग खोजना चाहिए
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 296
जबसे यीशु के देहधारी होने का सत्य सामने आया है, तबसे मनुष्य ने विश्वास कर लिया है कि स्वर्ग में न केवल पिता है, बल्कि पुत्र भी है और यहां तक कि आत्मा भी है। यह पारंपरिक धारणा है, जिसे मनुष्य धारण किए है कि इस तरह का एक परमेश्वर स्वर्ग में है : एक त्रयात्मक परमेश्वर जो पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा है। समस्त लोगों में ये धारणाएं हैं : परमेश्वर एक परमेश्वर है, पर उसमें तीन भाग शामिल हैं, जिसे गंभीर रूप से पारंपरिक धारणाओं में जकड़े वे सभी लोग पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा मानते हैं। केवल इन्हीं तीनों भागों के एकाकार होने से संपूर्ण परमेश्वर बनता है। पवित्र पिता के बिना परमेश्वर संपूर्ण नहीं होगा। इसी प्रकार से, न ही पुत्र और पवित्र आत्मा के बिना परमेश्वर संपूर्ण होगा। अपनी धारणाओं में वे यह विश्वास करते हैं कि न तो अकेले पिता को और न अकेले पुत्र को ही परमेश्वर माना जा सकता है। केवल पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा को एक साथ मिलाकर परमेश्वर स्वयं माना जा सकता है। अब, सभी धार्मिक विश्वासी और तुम लोगों में से प्रत्येक अनुयायी भी इस बात पर विश्वास करता है। फिर भी, जहाँ तक इसकी बात है कि यह विश्वास सही है कि नहीं, तुम लोगों में से कोई नहीं समझा सकता, क्योंकि तुम लोग हमेशा स्वयं परमेश्वर के मामलों को लेकर भ्रम के कोहरे में रहते हो। यहाँ तक कि जब इंसानी धारणाओं पर आधारित ज्ञान की बात आती है, तब तुम लोग नहीं जानते कि यह सही है या गलत क्योंकि तुम लोग धार्मिक धारणाओं से बुरी तरह संक्रमित हो गए हो। तुम लोगों ने धर्म की इन पारंपरिक धारणाओं को बहुत गहराई से स्वीकार कर लिया है और यह ज़हर तुम्हारे भीतर बहुत गहरे रिसकर चला गया है। इसलिए इस मामले में भी तुम इन हानिकारक प्रभावों के आगे झुक गए हो क्योंकि त्रयात्मक परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। इसका मतलब यह है कि पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व अस्तित्व में ही नहीं है। ये सब मनुष्य की पारंपरिक धारणाएं हैं और मनुष्य के भ्रामक विश्वास हैं। कई सदियों से मनुष्य का इस त्रित्व पर विश्वास रहा है, ये मनुष्य के मन में धारणाओं से जन्मा, मनुष्य द्वारा गढ़ा गया और मनुष्य द्वारा पहले कभी नहीं देखा गया है। इन अनेक वर्षों के दौरान बाइबल के कई प्रतिपादक हुए हैं, जिन्होंने त्रित्व का “सही अर्थ” समझाया है, पर तीन भिन्न व्यक्तियों के रूप में त्रयात्मक परमेश्वर की ऐसी व्याख्याएं अनिश्चित और अस्पष्ट रही हैं और सभी लोग परमेश्वर की “संरचना” के बारे में संभ्रमित हैं। कोई भी महान व्यक्ति कभी भी इसकी पूर्ण व्याख्या प्रस्तुत करने में सक्षम नहीं रहा है; अधिकांश व्याख्याएं, तर्क के मामले में और कागज़ पर जायज़ ठहरती हैं, परंतु एक भी व्यक्ति को इसके अर्थ की पूरी तरह स्पष्ट समझ नहीं है। यह इसलिए क्योंकि यह महान त्रित्व, जो मनुष्य अपने हृदय में धारण किए है, वह अस्तित्व में है ही नहीं। क्योंकि कभी भी किसी ने परमेश्वर के सच्चे स्वरूप को नहीं देखा है न ही कोई इतना भाग्यशाली रहा है कि परमेश्वर के निवास-स्थान पर यह देखने जाए कि जहाँ परमेश्वर लेटता है वहाँ क्या-क्या चीज़ें हैं, इसकी जाँच कर सके, इसका निर्धारण कर सके कि “परमेश्वर के परिवार” में कितनी हजारों-लाखों या लाखों-करोड़ों पीढ़ियाँ हैं या यह जांच सके कि परमेश्वर की निहित रचना कितने भागों से निर्मित है। जिसकी मुख्यतः जांच होनी चाहिए, वह है : पिता और पुत्र की आयु, साथ ही पवित्र आत्मा की आयु; प्रत्येक व्यक्ति का अपना-अपना रूप; वास्तव में यह कैसे होता है कि वे अलग हो जाते हैं और यह कैसे होता है कि वे एक हो जाते हैं। दुर्भाग्यवश, इन सभी वर्षों में, कोई एक भी व्यक्ति इन मामलों में तथ्य का निर्धारण नहीं कर पाया है। वे बस अनुमान लगाते हैं, क्योंकि एक भी व्यक्ति कभी स्वर्ग के दौरे पर नहीं गया और न समस्त मानवजाति के लिए “जांच रिपोर्ट” लेकर वापस आया है ताकि वह इस मामले के सत्य की सूचना उन उत्साही और निष्ठावान धार्मिक विश्वासियों को दे सके, जो त्रित्व के बारे में परवाह करते हैं। निश्चय ही, ऐसी धारणाएं बनाने के लिए मनुष्य को पूरी तरह से दोष नहीं दिया जा सकता कि क्यों पिता यहोवा ने पुत्र यीशु को मानवजाति की सृष्टि के समय अपने साथ नहीं रखा था? यदि आरंभ में, तीनों का नाम यहोवा होता, तो यह बेहतर होता। यदि दोष देना ही है तो, यह यहोवा परमेश्वर की क्षणिक चूक पर डालना चाहिए, जिसने सृष्टि के समय पुत्र और पवित्र आत्मा को अपने सामने नहीं बुलाया, बल्कि अपना कार्य अकेले क्रियान्वित किया। यदि उन सभी ने एक साथ कार्य किया होता, तो क्या वे एक ही नहीं बन गए होते? यदि उत्पत्ति से लेकर अंत तक, केवल यहोवा का ही नाम होता और अनुग्रह के युग से यीशु का नाम न होता या तब भी उसे यहोवा ही पुकारा जाता, तो क्या परमेश्वर मानवजाति के इस विभाजन की यातना से बच नहीं जाता? निश्चित रूप से इस सबके लिए यहोवा को दोष नहीं दिया जा सकता; यदि दोष ही देना है तो पवित्र आत्मा को देना चाहिए, जो यहोवा, यीशु और यहां तक कि पवित्र आत्मा के नाम से हज़ारों सालों से अपना कार्य करता रहा है और उसने मनुष्य को ऐसा भ्रमित और चकरा दिया है कि वह जान ही नहीं पाया कि असल में परमेश्वर कौन है। यदि स्वयं पवित्र आत्मा ने किसी रूप या छवि के बिना कार्य किया होता और ज्यादा महत्वपूर्ण रूप से, यीशु जैसे नाम के बिना कार्य किया होता और मनुष्य उसे न छू पाता न देख पाता, केवल गर्जना की आवाज़ सुन पाता तो क्या इस प्रकार का कार्य मनुष्यों के लिए और अधिक फायदेमंद नहीं होता? तो अब क्या किया जा सकता है? मनुष्य की धारणाएं एकत्रित होकर पर्वत के समान ऊँची और समुद्र के समान व्यापक हो गई हैं, इस हद तक कि आज का परमेश्वर उन्हें अब और नहीं सह सकता और पूरी तरह उलझन में है। अतीत में जब केवल यहोवा, यीशु और उन दोनों के मध्य पवित्र आत्मा था, तो मनुष्य पहले ही हैरान था कि कैसे इनका सामना करे और अब उसमें सर्वशक्तिमान भी जुड़ गया है, जिसे भी “परमेश्वर का एक भाग” कहा जाता है। कौन जानता है कि वह कौन है और त्रित्व के किस व्यक्ति के साथ कौन है वह जो न जाने कितने सालों से परस्पर मिश्रित है या भीतर छिपा हुआ है? मनुष्य इसे कैसे सह सकता है? पहले तो अकेले त्रयात्मक परमेश्वर ही मनुष्य के लिए जीवनभर व्याख्या के लिए काफ़ी था, पर अब यहाँ “एक परमेश्वर में चार व्यक्ति” है। इसकी व्याख्या कैसे की जा सकती है? क्या तुम इसकी व्याख्या कर सकते हो? भाइयो और बहनो! तुम लोगों ने आज तक इस प्रकार के परमेश्वर पर विश्वास कैसे किया है? मैं तुम लोगों से बेहद प्रभावित हूँ। त्रयात्मक परमेश्वर ही झेलने के लिए पर्याप्त था; तुम लोगों का इस चार व्यक्तियों में एक परमेश्वर पर इतना अटूट विश्वास कैसे हो सकता है? तुम लोगों से बाहर निकलने का आग्रह किया गया है, फिर भी तुम मना करते हो। समझ से परे है! तुम लोग कमाल हो! एक व्यक्ति “चार परमेश्वरों” पर विश्वास तक कर जाता है और उसे कोई बड़ी बात न समझे; तुम लोगों को नहीं लगता कि यह एक चमत्कार है? तुम लोगों को देखकर, कोई नहीं जान सकता कि तुम लोग इतना महान चमत्कार करने में सक्षम हो! मैं बताता हूँ कि वास्तव में, ब्रह्मांड के ऊपर या पूरे ब्रह्मांड में कहीं भी “त्रयात्मक परमेश्वर” का अस्तित्व नहीं है। परमेश्वर का न पिता है और न पुत्र, और इस ख्याल का तो और भी वजूद नहीं है कि पिता और पुत्र संयुक्त तौर पर पवित्र आत्मा का उपकरण के रूप में उपयोग करते हैं। इस संसार में यह सबसे बड़ा भ्रम है और इसका कोई अस्तित्व नहीं है! फिर भी इस प्रकार के भ्रम का अपना मूल है और यह पूरी तरह निराधार नहीं है, क्योंकि तुम लोगों के मन इतने साधारण नहीं हैं और तुम लोगों की ये संकल्पनाएँ अकारण नहीं हैं। बल्कि, वे काफी उपयुक्त और चतुर हैं, इतने कि किसी शैतान द्वारा भी अभेद्य हैं। अफसोस यह है कि ये सभी संकल्पनाएँ भ्रांतियाँ हैं और इनका अस्तित्व ही नहीं है! तुम लोगों ने सत्य बिल्कुल नहीं देखा है कि वास्तव में वह क्या है; तुम लोग केवल तर्क और कल्पनाएं कर रहे हो, फिर धोखे से दूसरों का विश्वास प्राप्त करने और सबसे अधिक बुद्धिहीन या तर्कहीन लोगों पर पूरा नियंत्रण करने के लिए इस सबको कहानी में पिरो रहे हो, ताकि वे तुम लोगों की महान और प्रसिद्ध “विशेषज्ञ शिक्षाओं” पर विश्वास करें। क्या यह सत्य है? क्या यह जीवन का मार्ग है जो मनुष्य को समझना चाहिए? यह सब बकवास है! एक शब्द भी उचित नहीं है! इतने सालों में, तुम लोगों के द्वारा परमेश्वर इस प्रकार विभाजित किया गया है, हर पीढ़ी के साथ अधिक से अधिक बारीकी से विभाजित किया गया है, कि एक परमेश्वर को खुलकर तीन परमेश्वरों में बांट दिया गया है। और अब मनुष्य के लिए यह पूरी तरह असंभव है कि वह परमेश्वर को फिर से एक बना पाए, क्योंकि तुम लोगों ने उसे बहुत ही सूक्ष्मता से बांटा है! यदि मेरा कार्य सही समय पर शुरू न हुआ होता तो कहना कठिन है कि तुम लोग कब तक इसी तरह बेधड़क जारी रखते! इस प्रकार से परमेश्वर को विभाजित करना जारी रखने से, वह अब तक तुम्हारा परमेश्वर कैसे रह सकता है? क्या तुम लोग अब भी परमेश्वर को पहचान सकते हो? क्या तुम लोग अभी भी अपना उद्गम खोज पाते और अपनी जड़ों की ओर लौट पाते? यदि मैं थोड़ा और बाद में आता, तो हो सकता है कि तुम लोग “पिता और पुत्र,” यहोवा और यीशु को इस्राएल वापस भेज चुके होते और दावा करते कि तुम लोग स्वयं ही परमेश्वर का एक भाग हो। भाग्यवश, अब ये अंत के दिन हैं। अंततः वह दिन आ गया है, जिसकी मुझे बहुत प्रतीक्षा थी और इस चरण का कार्य व्यक्तिगत रूप से करने के लिए मेरे आने से ही तुम लोगों द्वारा स्वयं परमेश्वर का विभाजन रुका है। यदि यह नहीं होता, तो तुम लोग और आगे बढ़ जाते, यहां तक कि अपने बीच सभी शैतानों को तुमने आराधना के लिए अपनी मेज़ों पर रख लिया होता। यह तुम लोगों की चाल है! परमेश्वर को बांटने के तुम्हारे तरीके! क्या तुम सब अभी भी ऐसा ही करोगे? मैं तुमसे पूछता हूँ : कितने परमेश्वर हैं? कौन सा परमेश्वर तुम लोगों के लिए उद्धार लाएगा? पहला परमेश्वर, दूसरा या फिर तीसरा, जिससे तुम सब हमेशा प्रार्थना करते हो? तुम लोग हमेशा किस पर विश्वास करते हो? पिता पर? या फिर पुत्र पर? या फिर आत्मा पर? मुझे बताओ कि तुम किस पर विश्वास करते हो। यद्यपि तुम्हारे मुँह से निकले हर शब्द में यही होता है कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, लेकिन तुम लोग जिस पर वास्तव में विश्वास करते हो, वह तुम्हारा दिमाग है। तुम लोगों के हृदय में परमेश्वर है ही नहीं! फिर भी तुम सबके दिमाग़ में इस प्रकार के कई “त्रित्व” हैं! क्या तुम लोग इससे सहमत नहीं हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 297
यदि त्रित्व की इस अवधारणा के अनुसार काम के तीन चरणों का मूल्यांकन किया जाना है, तो तीन परमेश्वर होने चाहिए क्योंकि प्रत्येक द्वारा क्रियान्वित कार्य एकसमान नहीं हैं। यदि तुम लोगों में से कोई भी कहता है कि त्रित्व वास्तव में है, तो समझाओ कि तीन व्यक्तियों में यह एक परमेश्वर क्या है। पवित्र पिता क्या है? पुत्र क्या है? पवित्र आत्मा क्या है? क्या यहोवा पवित्र पिता है? क्या यीशु पुत्र है? फिर पवित्र आत्मा का क्या? क्या पिता एक आत्मा नहीं है? पुत्र का सार भी क्या एक आत्मा नहीं है? क्या यीशु का कार्य पवित्र आत्मा का कार्य नहीं था? क्या उस समय यहोवा का कार्य भी उसी आत्मा द्वारा नहीं किया गया था जिसने यीशु का कार्य किया? परमेश्वर में कितने आत्माएँ हो सकते हैं? तुम्हारे स्पष्टीकरण के अनुसार, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के तीन व्यक्ति एक हैं; यदि ऐसा है, तो तीन आत्माएँ हैं, लेकिन तीन आत्माओं के होने का अर्थ है कि तीन परमेश्वर हैं, जो एक सच्चा परमेश्वर नहीं होगा। इस प्रकार के परमेश्वर में अभी भी परमेश्वर का निहित सार कैसे हो सकता है? यदि तुम मानते हो कि केवल एक ही परमेश्वर है, तो उसका पुत्र या पिता कैसे हो सकता है? क्या ये सब केवल तुम्हारी धारणाएं नहीं हैं? केवल एक परमेश्वर है, इस परमेश्वर में केवल एक ही व्यक्ति है, और परमेश्वर का केवल एक आत्मा है, वैसा ही जैसा बाइबल में लिखा गया है कि “केवल एक पवित्र आत्मा और केवल एक परमेश्वर है।” जिस पिता और पुत्र के बारे में तुम बोलते हो, वे चाहे अस्तित्व में हों, कुल मिलाकर परमेश्वर एक ही है और पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का सार, जिसे तुम लोग मानते हो, पवित्र आत्मा का सार है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर एक आत्मा है लेकिन वह देहधारण करने और लोगों के बीच रहने के साथ-साथ सभी चीजों से ऊँचा होने में सक्षम है। उसका आत्मा समस्त-समावेशी और सर्वव्यापी है। वह एक ही समय पर देह में और पूरे ब्रह्मांड में और उसके ऊपर हो सकता है। चूँकि सभी लोग कहते हैं कि परमेश्वर एकमात्र सच्चा परमेश्वर है, फिर एक ही परमेश्वर है, जो किसी की इच्छा से बिल्कुल विभाजित नहीं किया जा सकता! परमेश्वर केवल एक आत्मा है और केवल एक ही व्यक्ति है; और वह परमेश्वर का आत्मा है। यदि जैसा तुम कहते हो, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा, तो क्या वे तीन परमेश्वर नहीं हैं? पवित्र आत्मा एक विषय है, पुत्र दूसरा है, और पिता एक अन्य विषय है। उनके व्यक्ति अलग हैं और उनके सार अलग हैं, तो उनमें से प्रत्येक एक इकलौते परमेश्वर का हिस्सा कैसे हो सकता है? पवित्र आत्मा एक आत्मा है; यह मनुष्य के लिए समझना आसान है। यदि ऐसा है तो, पिता और भी अधिक एक आत्मा है। वह पृथ्वी पर कभी नहीं उतरा और कभी भी देह नहीं बना है; वह मनुष्यों के दिल में यहोवा परमेश्वर है और निश्चित रूप से वह भी एक आत्मा है। तो इस आत्मा और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह पिता और पुत्र के बीच का संबंध है? या यह पवित्र आत्मा और पिता के आत्मा के बीच का रिश्ता है? क्या प्रत्येक आत्मा का सार एकसमान है? या पवित्र आत्मा पिता का एक साधन है? इसे कैसे समझाया जा सकता है? और फिर पुत्र और पवित्र आत्मा के बीच क्या संबंध है? क्या यह दो आत्माओं का संबंध है या एक इंसान और आत्मा के बीच का संबंध है? ये सभी ऐसे मामले हैं, जिनकी कोई व्याख्या नहीं हो सकती! यदि वे सभी एक आत्मा हैं, तो तीन व्यक्तियों की कोई बात नहीं हो सकती, क्योंकि उनके पास एक आत्मा है। यदि वे अलग-अलग व्यक्ति होते, तो उनकी आत्माओं की शक्ति भिन्न होती और बस वे एक ही आत्मा नहीं हो सकते थे। पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा की यह अवधारणा सबसे बेतुकी है! यह परमेश्वर को खंडित करती है और प्रत्येक को एक ओहदा और आत्मा देकर उसे तीन व्यक्तियों में विभाजित करती है; तो कैसे वह अब भी एक आत्मा और एक परमेश्वर हो सकता है? मुझे बताओ कि क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें पिता, पुत्र या पवित्र आत्मा द्वारा बनाई गई थीं? कुछ कहते हैं कि उन्होंने यह सब मिलकर बनाया। फिर किसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया? क्या यह पवित्र आत्मा था, पुत्र था या पिता? कुछ कहते हैं कि वह पुत्र था, जिसने मानवजाति को छुटकारा दिलाया था। तो फिर सार में पुत्र कौन है? क्या वह परमेश्वर के आत्मा की देहधारी देह नहीं है? एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से देह स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाती है। क्या तुम्हें पता नहीं कि यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के गर्भधारण से हुआ था? उसके भीतर पवित्र आत्मा है; तुम कुछ भी कहो, वह अभी भी स्वर्ग के परमेश्वर के साथ एक है, क्योंकि वह परमेश्वर के आत्मा का देहधारी देह है। पुत्र का यह विचार बिल्कुल असत्य है। यह एक आत्मा है जो सभी कार्य क्रियान्वित करता है, यह स्वयं परमेश्वर है जो इसे क्रियान्वित करता है—यानी यह परमेश्वर का आत्मा है जो कार्य करता है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है? क्या यह पवित्र आत्मा नहीं है, जो यीशु में कार्य करता है? यदि कार्य पवित्र आत्मा (अर्थात, परमेश्वर का आत्मा) द्वारा क्रियान्वित नहीं किया गया था, तो क्या उसका कार्य स्वयं परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता था? जब प्रार्थना करते हुए यीशु ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया, तो यह केवल एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से किया गया था, केवल इसलिए कि परमेश्वर के आत्मा ने एक सामान्य और साधारण देह का चोला धारण किया था और उसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का था। भले ही उसके भीतर परमेश्वर का आत्मा था, उसका बाहरी प्रकटन अभी भी एक सामान्य मनुष्य का था; दूसरे शब्दों में, वह “मनुष्य का पुत्र” बन गया था, जिसके बारे में सभी लोगों ने और साथ ही स्वयं यीशु ने भी बात की थी। यह देखते हुए कि वह मनुष्य का पुत्र कहलाता है, वह एक व्यक्ति है (चाहे पुरुष हो या महिला, हर हाल में एक इंसान के बाहरी आवरण के साथ) जो सामान्य लोगों के साधारण परिवार में पैदा हुआ। इसलिए, यीशु का स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना, वैसा ही था जैसे तुम लोगों ने पहले उसे पिता कहा था; उसने एक सृजित मनुष्य के परिप्रेक्ष्य से ऐसा किया। क्या तुम लोगों को अभी भी प्रभु की प्रार्थना याद है, जो यीशु ने तुम लोगों को याद करने के लिए सिखाई थी? “स्वर्ग में हमारे पिता...” उसने सभी लोगों से स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाने को कहा। और चूँकि वह भी उसे पिता कहता था, उसने ऐसा उस व्यक्ति के परिप्रेक्ष्य से किया, जो तुम सभी के साथ समान स्तर पर खड़ा था। चूँकि तुम लोगों ने स्वर्ग के परमेश्वर को पिता के नाम से बुलाया था, यीशु ने स्वयं को तुम सबके साथ समान स्तर पर देखा और पृथ्वी पर परमेश्वर द्वारा चुने गए मनुष्य (अर्थात परमेश्वर के पुत्र) के रूप में देखा। यदि तुम लोग परमेश्वर को पिता कहते हो, तो क्या यह इसलिए नहीं है कि तुम लोग सृजित प्राणी हो? पृथ्वी पर यीशु का अधिकार चाहे जितना अधिक हो, क्रूस पर चढ़ने से पहले, वह मात्र मनुष्य का पुत्र था, पवित्र आत्मा (यानी परमेश्वर) द्वारा नियंत्रित था और पृथ्वी के सृजित प्राणियों में से एक था क्योंकि अभी भी उसका अपना कार्य करना बाकी था। इसलिए, स्वर्ग के परमेश्वर को पिता बुलाना पूरी तरह से उसकी विनम्रता और आज्ञाकारिता थी। हालाँकि उसका परमेश्वर (अर्थात स्वर्ग में आत्मा) को इस प्रकार संबोधन करना यह साबित नहीं करता कि वह स्वर्ग में परमेश्वर के आत्मा का पुत्र है। बल्कि, यह केवल यही है कि उसका दृष्टिकोण अलग था, न कि वह एक अलग व्यक्ति था। अलग व्यक्तियों का अस्तित्व एक मिथ्या है! क्रूस पर चढ़ने से पहले, यीशु मनुष्य का पुत्र था, जो देह की सीमाओं से बंधा था और उसमें पूरी तरह आत्मा का अधिकार नहीं था। यही कारण है कि वह केवल एक सृजित प्राणी के परिप्रेक्ष्य से परमपिता परमेश्वर के इरादे खोज सकता था। यह वैसा ही है जैसा गतसमनी में उसने तीन बार प्रार्थना की थी : “जैसा मैं चाहता हूँ वैसा नहीं, परन्तु जैसा तू चाहता है वैसा ही हो।” क्रूस पर रखे जाने से पहले, वह बस यहूदियों का राजा था; मनुष्य का पुत्र, मसीह, था और महिमा का शरीर नहीं था। यही कारण है कि एक सृजित प्राणी के दृष्टिकोण से, उसने परमेश्वर को पिता बुलाया। अब तुम यह नहीं कह सकते कि सभी जो परमेश्वर को पिता बुलाते हैं, पुत्र हैं। यदि ऐसा होता, तो क्या यीशु द्वारा प्रभु की प्रार्थना सिखाए जाने के बाद, तुम सभी पुत्र नहीं बन गए होते? यदि तुम लोग अभी भी आश्वस्त नहीं हो तो मुझे बताओ, वह कौन है जिसे तुम सब पिता कहते हो? यदि तुम यीशु की बात कर रहे हो तो तुम सबके लिए यीशु का पिता कौन है? यीशु के चले जाने के बाद पिता और पुत्र का यह विचार नहीं रहा। यह विचार केवल उन वर्षों के लिए उपयुक्त था जब यीशु देह में था; अन्य सभी परिस्थितियों में, जब तुम परमेश्वर को पिता कहते हो, तो यह वह रिश्ता है, जो सृष्टिकर्ता और सृजित प्राणी के बीच होता है। ऐसा कोई समय नहीं, जिस पर पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा के त्रित्व का विचार खड़ा रह सके; यह भ्रांति है, जो युगों तक शायद ही कभी देखी गई है और इसका अस्तित्व नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 298
यह अधिकांश लोगों को उत्पत्ति में परमेश्वर के वचनों की याद दिला सकता है : “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार अपनी समानता में बनाएँ” (उत्पत्ति 1:26)। यह देखते हुए कि परमेश्वर कहता है, “हम मनुष्य को अपने स्वरूप के अनुसार बनाएँ,” तो “हम” का अर्थ है दो या अधिक; चूँकि उसने “हम” कहा, तो फिर सिर्फ़ एक ही परमेश्वर नहीं है। इस तरह, मनुष्य ने अमूर्त अलग व्यक्तियों के बारे में सोचना शुरू कर दिया, और इन वचनों से पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का विचार उभरा। तो फिर पिता कैसा है? पुत्र कैसा है? और पवित्र आत्मा कैसा है? क्या संभवतः यह हो सकता है कि आज की मानवजाति ऐसी छवि में बनाई गई थी, जो तीनों से मिलकर बनती है? तो मनुष्य की छवि क्या पिता की तरह है, या पुत्र की तरह या पवित्र आत्मा की तरह है? मनुष्य परमेश्वर के किस व्यक्ति की छवि है? मनुष्य का यह विचार बिल्कुल ग़लत और बेतुका है! यह केवल एक परमेश्वर को कई परमेश्वरों में विभाजित कर सकता है। जिस समय मूसा ने उत्पत्ति ग्रंथ लिखा था, उस समय तक दुनिया की सृष्टि के बाद मानवजाति का सृजन हो चुका था। बिल्कुल शुरुआत में, जब परमेश्वर ने दुनिया बनाई, तो मूसा मौजूद नहीं था। और मूसा ने बहुत बाद में बाइबल लिखी तो वह यह कैसे जान सकता था कि स्वर्ग में परमेश्वर ने क्या बोला? उसे ज़रा भी भान नहीं था कि परमेश्वर ने कैसे दुनिया बनाई। बाइबल के पुराने नियम में, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का उल्लेख नहीं है, केवल एक ही सच्चे परमेश्वर यहोवा का उल्लेख है, जिसने इस्राएल में अपने कार्य को क्रियान्वित किया था। जैसे युग बदलता है, उसके अनुसार परमेश्वर को अलग-अलग नामों से बुलाया जाता है, लेकिन इससे यह साबित नहीं हो सकता कि प्रत्येक नाम एक अलग व्यक्ति का हवाला देता है। यदि ऐसा होता तो क्या परमेश्वर में असंख्य व्यक्ति न होते? पुराने नियम में जो लिखा है, वह यहोवा का कार्य है, व्यवस्था के युग में स्वयं परमेश्वर के कार्य का वह चरण, जो कि शुरुआती कार्य का चरण था। यह परमेश्वर का कार्य था, जहाँ वह बोला और यह अस्तित्व में आ गया और उसने आज्ञा दी और यह स्थिर हो गया। यहोवा ने कभी नहीं कहा कि वह पिता है जो कार्य क्रियान्वित करने आया है, न ही उसने कभी पुत्र के मानवजाति के छुटकारे के लिए आने की भविष्यवाणी की। जब यीशु के समय की बात आई, तो केवल यह कहा गया कि परमेश्वर समस्त मानवजाति को छुड़ाने के लिए देहधारी हुआ था, न कि यह कि पुत्र आया था। चूँकि युग एक जैसे नहीं होते और जो कार्य स्वयं परमेश्वर करना चाहता है, वह भी अलग होता है, उसे अपने कार्य को अलग-अलग क्षेत्रों में क्रियान्वित करना होता है। इस तरह, वह पहचान भी अलग होती है, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है। मनुष्य का मानना है कि यहोवा यीशु का पिता है, लेकिन यह वास्तव में यीशु ने स्वीकार नहीं किया था, जिसने कहा : “हम पिता और पुत्र के रूप में कभी अलग नहीं थे; मैं और स्वर्ग में पिता एक हैं। पिता मुझ में है और मैं पिता में हूँ; जब मनुष्य पुत्र को देखता है, तो वह स्वर्गिक पिता को देख रहा होता है।” जब यह सब कहा जा चुका है, पिता हो या पुत्र, वे एक आत्मा हैं, अलग-अलग व्यक्तियों में विभाजित नहीं हैं। जब मनुष्य समझाने की कोशिश करता है, तो अलग-अलग व्यक्तियों के विचार के साथ ही मामला जटिल हो जाता है, साथ ही पिता, पुत्र और आत्मा के बीच का संबंध भी। जब मनुष्य अलग-अलग व्यक्तियों की बात करता है, तो क्या यह परमेश्वर को मूर्तरूप नहीं देता? यहाँ तक कि मनुष्य व्यक्तियों को पहले, दूसरे और तीसरे के रूप में स्थान भी देता है; ये सभी बस मनुष्य की कल्पनाएँ हैं, संदर्भ के योग्य नहीं हैं और पूरी तरह अवास्तविक हैं! यदि तुमने उससे पूछा : “कितने परमेश्वर हैं?” तो वह कहेगा कि परमेश्वर एक सच्चा परमेश्वर है जिसमें पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का त्रित्व है। यदि तुमने आगे पूछा : “पिता कौन है?” वह कहेगा : “पिता स्वर्ग में परमेश्वर का आत्मा है; वह सबका प्रभारी है और स्वर्ग का स्वामी है।” “तो क्या यहोवा आत्मा है?” वह कहेगा : “हाँ!” यदि तुमने फिर उससे पूछा, “पुत्र कौन है?” तो वह कहेगा कि निश्चित रूप से यीशु पुत्र है। “तो यीशु की कहानी क्या है? वह कहाँ से आया था?” वह कहेगा : “यीशु का जन्म पवित्र आत्मा के द्वारा मरियम के गर्भधारण करने से हुआ था।” तो क्या उसका सार भी आत्मा नहीं है? क्या उसका कार्य भी पवित्र आत्मा का प्रतिनिधित्व नहीं करता? यहोवा आत्मा है और उसी तरह यीशु का सार भी है। अब अंत के दिनों में, यह कहने की ज़रूरत कम है कि यह अभी भी आत्मा है; वे अलग-अलग व्यक्ति कैसे हो सकते हैं? क्या यह महज़ परमेश्वर का आत्मा नहीं जो आत्मा के कार्य को अलग-अलग परिप्रेक्ष्यों से क्रियान्वित कर रहा है? ऐसे तो, व्यक्तियों के बीच कोई अंतर नहीं है। यीशु पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था और सुनिश्चित रूप से, उसका कार्य सटीक रूप से पवित्र आत्मा का कार्य था। यहोवा द्वारा क्रियान्वित किए गए कार्य के पहले चरण में, वह न तो देहधारी हुआ और न मनुष्य के सामने प्रकट हुआ। तो मनुष्य ने कभी उसके प्रकटन को नहीं देखा। चाहे वह कितना भी बड़ा और कितना भी ऊँचा था, वह फिर भी आत्मा था, स्वयं परमेश्वर जिसने आरंभ में मनुष्य को बनाया था। अर्थात, वह परमेश्वर का आत्मा था। वह बादलों में से मनुष्य से बात करता था, केवल एक आत्मा, और किसी ने भी उसका प्रकटन नहीं देखा। केवल अनुग्रह के युग में जब परमेश्वर का आत्मा देह में आया और यहूदिया में देहधारी हुआ, तो मनुष्य ने पहली बार एक यहूदी के रूप में परमेश्वर के देहधारी देह की छवि देखी। उसमें यहोवा जैसा कुछ भी नहीं था। हालांकि, वह पवित्र आत्मा द्वारा गर्भ में आया था, अर्थात स्वयं यहोवा के आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और यीशु का जन्म तब भी परमेश्वर के आत्मा के मूर्तरूप में हुआ था। उस समय मनुष्य ने जो देखा, वह यह था कि पवित्र आत्मा यीशु पर एक कबूतर की तरह उतर रहा था; यह यीशु के लिए विशेष आत्मा नहीं था, बल्कि पवित्र आत्मा था। तो क्या यीशु का आत्मा पवित्र आत्मा से अलग हो सकता है? अगर यीशु यीशु है, पुत्र है, और पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है, तो वे एक कैसे हो सकते हैं? यदि ऐसा है तो कार्य क्रियान्वित नहीं किया जा सकता। यीशु के भीतर का आत्मा, स्वर्ग में आत्मा और यहोवा का आत्मा सब एक हैं। इसे पवित्र आत्मा, परमेश्वर का आत्मा, सात गुना सशक्त आत्मा और सर्वसमावेशी आत्मा कहा जाता है। परमेश्वर का आत्मा बहुत से कार्य क्रियान्वित कर सकता है। वह दुनिया को बनाने और पृथ्वी को बाढ़ द्वारा नष्ट करने में सक्षम है; वह सारी मानवजाति को छुटकारा दिला सकता है इससे भी अधिक, वह सारी मानवजाति को जीत और नष्ट कर सकता है। यह सारा कार्य स्वयं परमेश्वर द्वारा क्रियान्वित किया गया है और उसके स्थान पर परमेश्वर के व्यक्तियों में से किसी के द्वारा नहीं किया जा सकता है। उसके आत्मा को यहोवा और यीशु के नाम से, साथ ही सर्वशक्तिमान के नाम से भी बुलाया जा सकता है। वह प्रभु और मसीह है। वह मनुष्य का पुत्र भी बन सकता है। वह स्वर्ग में भी है और पृथ्वी पर भी है; वह ब्रह्मांडों के ऊपर और अनगिनत लोगों के बीच में है। वह स्वर्ग और पृथ्वी का एकमात्र स्वामी है! सृष्टि के समय से अब तक, यह कार्य स्वयं परमेश्वर के आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया गया है। यह कार्य स्वर्ग में हो या देह में, सब कुछ उसके अंतर्निहित आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। सभी प्राणी, चाहे स्वर्ग में हों या पृथ्वी पर, उसकी सर्वशक्तिमान हथेली में हैं; यह सब स्वयं परमेश्वर का कार्य है और उसके स्थान पर किसी अन्य के द्वारा नहीं किया जा सकता। स्वर्ग में वह आत्मा है, लेकिन स्वयं परमेश्वर भी है; लोगों के बीच वह देह है, पर स्वयं परमेश्वर बना रहता है। यद्यपि उसे सैकड़ों-हज़ारों नामों से बुलाया जा सकता है, तो भी वह स्वयं है, और उसका समस्त कार्य उसके आत्मा की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति है। उसके क्रूसीकरण के माध्यम से सारी मानवजाति का छुटकारा उसके आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य था और अंत के दिनों के दौरान सभी देशों और सभी भूभागों के लिए उसका निर्देश भी आत्मा का प्रत्यक्ष कार्य है। हर समय परमेश्वर को केवल सर्वशक्तिमान एक सच्चा परमेश्वर ही कहा जा सकता है, वह स्वयं सर्व-समावेशी परमेश्वर है। परमेश्वर में ये व्यक्ति बिल्कुल अस्तित्व में नहीं हैं, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा का यह विचार तो बिल्कुल नहीं है! स्वर्ग में और पृथ्वी पर केवल एक ही परमेश्वर है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 299
परमेश्वर की प्रबंधन योजना छह हजार वर्षों तक फैली है और उसके कार्य में अंतर के आधार पर तीन युगों में विभाजित है : पहला युग पुराने नियम का व्यवस्था का युग है; दूसरा अनुग्रह का युग है; और तीसरा वह है जो कि अंत के दिनों का है—राज्य का युग। प्रत्येक युग में एक अलग पहचान का प्रतिनिधित्व किया जाता है। यह केवल कार्य में अंतर यानी कार्य की आवश्यकताओं के कारण है। व्यवस्था के युग के दौरान कार्य का पहला चरण इस्राएल में क्रियान्वित किया गया था और छुटकारे के कार्य का दूसरा चरण यहूदिया में पूरा किया गया था। छुटकारे के कार्य के लिए पवित्र आत्मा के गर्भधारण से और एकमात्र पुत्र के रूप में यीशु का जन्म हुआ। यह सब कार्य की आवश्यकताओं के कारण था। अंत के दिनों में, परमेश्वर अपना कार्य अन्यजाति राष्ट्रों में फैलाना और वहाँ के लोगों पर विजय प्राप्त करना चाहता है ताकि उनके बीच उसका नाम महान हो। वह सभी सत्य को समझने और उसमें प्रवेश करने में मनुष्य का मार्गदर्शन करना चाहता है। यह सब कार्य एक आत्मा द्वारा क्रियान्वित किया जाता है। हालाँकि वह अलग-अलग दृष्टिकोण से ऐसा कर सकता है तो भी, कार्य की प्रकृति और सिद्धांत एक समान रहते हैं। एक बार जब तुम उस कार्य के सिद्धांतों और प्रकृति को देखते हो, जो उन्होंने क्रियान्वित किया है, तो तुम्हें पता चल जाएगा कि यह सब एक आत्मा द्वारा किया जाता है। फिर भी कुछ कह सकते हैं : “पिता पिता है; पुत्र पुत्र है; पवित्र आत्मा पवित्र आत्मा है और अंत में वे एक बनेंगे।” तो तुम उन्हें एक कैसे बना सकते हो? पिता और पवित्र आत्मा को एक कैसे बनाया जा सकता है? यदि वे मूल रूप से दो थे, तो चाहे वे एक साथ कैसे भी जोड़े जाएं, क्या वे दो हिस्से नहीं बने रहेंगे? जब तुम दो हिस्सों को एक बनाने को कहते हो, तो क्या यह बस दो अलग हिस्सों को जोड़कर एक बनाना नहीं है? लेकिन क्या पूर्ण बनाए जाने से पहले वे दो हिस्से नहीं थे? प्रत्येक आत्मा का एक विशिष्ट सार होता है और दो आत्माएँ एक नहीं बन सकतीं। आत्मा कोई भौतिक वस्तु नहीं है और भौतिक दुनिया की किसी भी अन्य वस्तु के समान नहीं है। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता एक आत्मा है, पुत्र दूसरा, और पवित्र आत्मा एक और, फिर तीन आत्माएँ एक साथ तीन गिलास पानी की तरह मिलकर पूरा एक बनते हैं। तो क्या यह तीन को एक बनाना नहीं होगा? यह एक शुद्ध रूप से भ्रामक व्याख्या है! क्या यह परमेश्वर को विभाजित करना नहीं है? पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी को एक कैसे बनाया जा सकता है? क्या वे भिन्न प्रकृति वाले तीन भाग नहीं हैं? अन्य लोग हैं, जो कहते हैं, “क्या परमेश्वर ने स्पष्ट रूप से यह नहीं बताया कि यीशु उसका प्रिय पुत्र है?” यीशु परमेश्वर का प्रिय पुत्र है, जिस पर वह प्रसन्न है—यह निश्चित रूप से परमेश्वर ने स्वयं ही कहा था। यह परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना था, लेकिन केवल एक अलग परिप्रेक्ष्य से, स्वर्ग में आत्मा द्वारा अपने ही देहधारी देह की गवाही देना था। यीशु उसका देहधारी शरीर है, स्वर्ग में उसका पुत्र नहीं। क्या तुम समझते हो? यीशु के वचन, “मैं पिता में हूँ और पिता मुझ में है,” क्या यह संकेत नहीं देते कि वे एक आत्मा हैं? और क्या यह देहधारण के कारण नहीं है कि वे स्वर्ग और पृथ्वी के बीच अलग हो गए थे? वास्तव में, वे अभी भी एक हैं; चाहे कुछ भी हो, यह केवल परमेश्वर द्वारा अपनी गवाही देना है। युग में परिवर्तन, कार्य की जरूरतों और उसकी प्रबंधन योजना के विभिन्न चरणों के कारण, जिस नाम से मनुष्य उसे बुलाता है, वह भी अलग हो जाता है। जब वह कार्य के पहले चरण को क्रियान्वित करने आया था, तो उसे केवल यहोवा कहा जा सकता था, जो इस्राएलियों का चरवाहा था। दूसरे चरण में, देहधारी परमेश्वर को केवल प्रभु और मसीह कहा जा सकता था। परंतु उस समय, स्वर्ग में आत्मा ने केवल यह बताया था कि वह परमेश्वर का प्यारा पुत्र है और उसके परमेश्वर का एकमात्र पुत्र होने का कोई उल्लेख नहीं किया था। ऐसा हुआ ही नहीं था। परमेश्वर की एकमात्र संतान कैसे हो सकती है? तब क्या परमेश्वर मनुष्य नहीं बन जाता? क्योंकि वह देहधारी देह था, उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा गया और इससे पिता और पुत्र के बीच का संबंध आया। यह बस स्वर्ग और पृथ्वी के बीच जो विभाजन है, उसके कारण हुआ। यीशु ने देह के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना की। चूँकि उसने इस तरह की सामान्य मानवता की देह को धारण किया था, और देह के परिप्रेक्ष्य से कहा, “मेरा बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का है; चूँकि मैंने इस धरती पर आने के लिए देहधारण किया है, इसलिए मैं अब स्वर्ग से बहुत दूर हूँ।” इस कारण से, वह केवल परमपिता परमेश्वर से देह के परिप्रेक्ष्य से ही प्रार्थना कर सकता था। यह उसका कर्तव्य था और यह वह था, जो परमेश्वर के आत्मा के देहधारी देह में होना चाहिए। यह नहीं कहा जा सकता कि वह परमेश्वर नहीं था क्योंकि वह देह के दृष्टिकोण से पिता से प्रार्थना करता था। यद्यपि उसे परमेश्वर का प्रिय पुत्र कहा जाता था, वह अभी भी स्वयं परमेश्वर था क्योंकि वह आत्मा का ही देहधारी देह था और उसका सार अब भी आत्मा का था। लोग ताज्जुब करते हैं कि वह क्यों प्रार्थना करता था, जब वह स्वयं परमेश्वर था। यह इसलिए क्योंकि वह देहधारी परमेश्वर था, देह के भीतर रह रहा परमेश्वर था, न कि स्वर्ग में आत्मा। जैसे मनुष्य इसे देखता है, पिता, पुत्र और पवित्र आत्मा सभी परमेश्वर हैं। केवल तीनों से एक बनने वाला ही एक सच्चा परमेश्वर माना जा सकता है और इस तरह उसकी शक्ति असाधारण रूप से महान है। ऐसे लोग हैं, जो कहते हैं कि केवल इस तरह से वह सात गुना सशक्त आत्मा है। जब पुत्र ने अपने आने के बाद प्रार्थना की, तो उसने उस आत्मा से प्रार्थना की थी। वास्तव में, वह एक सृजित प्राणी होने के परिप्रेक्ष्य से प्रार्थना कर रहा था। क्योंकि देह पूर्ण नहीं है, वह पूर्ण नहीं था और जब वह देह में आया, तो उसमें कई कमजोरियां थीं और वह देह में अपना कार्य क्रियान्वित करते हुए बहुत बाधित था। यही कारण है कि क्रूस पर चढ़ने से पहले उसने परमपिता परमेश्वर से तीन बार प्रार्थना की और साथ ही उससे पहले भी कई बार प्रार्थना की थी। उसने अपने शिष्यों के बीच प्रार्थना की; अकेले एक पहाड़ पर प्रार्थना की; उसने मछली पकड़ने वाली नाव पर रहते हुए प्रार्थना की; उसने लोगों की भीड़ के बीच प्रार्थना की; रोटी तोड़ते वक्त प्रार्थना की; और दूसरों को आशीष देते समय उसने प्रार्थना की। उसने ऐसा क्यों किया? उसने आत्मा से प्रार्थना की थी; वह आत्मा से प्रार्थना कर रहा था, स्वर्ग में परमेश्वर से, देह के परिप्रेक्ष्य से। इसलिए मनुष्य के दृष्टिकोण से, यीशु कार्य के उस चरण में पुत्र बन गया। इस चरण में हालांकि देहधारी परमेश्वर प्रार्थना नहीं करता। ऐसा क्यों है? इसका कारण है कि वह जो लाता है, वह वचन का कार्य है और वचन का न्याय और ताड़ना है। उसे प्रार्थना की कोई आवश्यकता नहीं है और उसकी सेवकाई बोलने की है। वह क्रूस पर नहीं चढ़ाया जाता और लोग उसे उन्हें नहीं सौंपते, जो सत्ता में हैं। उसे केवल अपना कार्य सीधे तौर पर करना है। जिस वक्त यीशु ने प्रार्थना की, तो वह स्वर्ग के राज्य के अवतरण के लिए पिता की इच्छा पूरी होने और आने वाले कार्य के लिए परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना कर रहा था। इस चरण में, स्वर्ग का राज्य पहले ही उतर चुका है, तो क्या उसे अब भी प्रार्थना करने की ज़रूरत है? उसका कार्य युग खत्म करने का है और अब कोई नया युग नहीं है, इसलिए क्या अगले चरण के लिए प्रार्थना करने की आवश्यकता है? मुझे ऐसा बिल्कुल नहीं लगता!
मनुष्य के स्पष्टीकरण में कई विरोधाभास हैं। बेशक, ये सभी मनुष्य की धारणाएँ हैं; बिना किसी जाँच-पड़ताल के तुम सभी विश्वास कर लोगे कि वे सही हैं। क्या तुम नहीं जानते कि परमेश्वर के त्रित्व होने जैसे विचार केवल मनुष्य की धारणाएँ हैं? मनुष्य का कोई ज्ञान संपूर्ण नहीं होता। हमेशा अशुद्धियाँ होती हैं और उसके भीतर मनुष्य के बहुत अधिक विचार होते हैं। यह दर्शाता है कि एक सृजित प्राणी, परमेश्वर के कार्य की व्याख्या कर ही नहीं सकता। मनुष्य के मन में बहुत कुछ है, ये सब तर्क और विचार से आते हैं, और यह सब सत्य के विपरीत है। क्या तुम्हारा तर्क परमेश्वर के कार्य का पूरी तरह से विश्लेषण कर सकता है? क्या तुम यहोवा के सभी कार्यों की अंतर्दृष्टि पा सकते हो? क्या यह तुम ही हो जो एक मनुष्य के रूप में इन सबकी असलियत जान सकते हो या स्वयं परमेश्वर ही अनंत से अनंत तक देखने में सक्षम है? क्या यह तुम ही हो जो अनादि काल से आने वाले अनंत काल तक देख सकते हो या यह परमेश्वर है, जो ऐसा कर सकता है? तुम्हारा क्या कहना है? परमेश्वर की व्याख्या करने के लिए तुम कैसे योग्य हो? तुम्हारे स्पष्टीकरण का आधार क्या है? क्या तुम परमेश्वर हो? स्वर्ग और पृथ्वी, और सभी चीज़ें स्वयं परमेश्वर द्वारा बनाई गई थीं। यह तुम नहीं थे जिसने यह किया था, तो तुम निरर्थक व्याख्याएँ क्यों दे रहे हो? अब, क्या तुम त्रयात्मक परमेश्वर में विश्वास करना जारी रखते हो? क्या तुम्हें नहीं लगता कि इस तरह यह बहुत बोझिल है? तुम्हारे लिए सबसे अच्छा होगा कि तुम एक परमेश्वर में विश्वास करो, न कि तीन में। हल्का होना सबसे अच्छा है क्योंकि प्रभु का भार हल्का है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या त्रित्व का अस्तित्व है?