जीवन में प्रवेश I

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 374

सर्वशक्तिमान परमेश्वर, सभी चीजों का मुखिया, अपने सिंहासन से अपनी राजसी सामर्थ्य का उपयोग करता है। वह समस्त ब्रह्मांड और सभी चीजों पर राज करता है और संपूर्ण पृथ्वी पर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। हमेशा उसके समीप रहो और शांतचित्त होकर उसके सम्मुख आओ, कभी एक पल भी मत खोना—सीखने के लिए हमेशा सबक होते हैं। चारों ओर के परिवेश, लोग, घटनाएँ और चीजें उसके सिंहासन की अनुमति से अस्तित्व में हैं। किसी भी वजह से अपने दिल में शिकायतें मत पनपने दो, अन्यथा परमेश्वर तुम्हें अपना अनुग्रह प्रदान नहीं करेगा। जब तुम पर बीमारी आती है तो यह परमेश्वर का प्रेम है और इसमें उसके अच्छे इरादे निश्चित ही निहित हैं। भले ही तुम्हारी देह को थोड़ी-सी पीड़ा सहनी पड़े, लेकिन शैतान से कोई भी विचार स्वीकार मत करो। बीमारी के मध्य परमेश्वर की स्तुति करो और अपनी स्तुति के मध्य परमेश्वर में आनंदित हो। बीमारी की हालत में निराश न हो, अपनी खोज निरंतर जारी रखो और हिम्मत न हारो, और परमेश्वर तुम्हें रोशन और प्रबुद्ध करेगा। अय्यूब की आस्था कैसी थी? सर्वशक्तिमान परमेश्वर एक सर्वशक्तिशाली चिकित्सक है! बीमारी में रहने का मतलब बीमार होना है, परंतु आत्मा में रहने का मतलब स्वस्थ होना है। जब तक तुम्हारी एक भी साँस बाकी है, परमेश्वर तुम्हें मरने नहीं देगा।

हमारे अंदर मसीह का पुनरुत्थित जीवन है। हममें वास्तव में परमेश्वर की उपस्थिति में आस्था की कमी है : परमेश्वर हमें सच्ची आस्था दे। परमेश्वर के वचन निश्चित ही मधुर हैं! परमेश्वर के वचन गुणकारी दवा हैं! वे दानवों और शैतान को शर्मिंदा करते हैं! परमेश्वर के वचनों को समझने से हमें सहारा मिलता है। उसके वचन हमारे हृदय को बचाने के लिए शीघ्रता से कार्य करते हैं! वे सभी चीजों को दूर करते हैं और सर्वत्र शांति बहाल करते हैं। आस्था एक ही लट्ठे से बने पुल की तरह है : जो लोग जीवन से चिपके रहते हैं और मृत्यु से डरते हैं उन्हें इसे पार करने में परेशानी होगी, परन्तु जो अपनी जान देने को तैयार रहते हैं वे सधे हुए कदमों से और बेफिक्र होकर इसे पार कर सकते हैं। अगर लोग कायर और भययुक्त विचार पालते हैं तो ऐसा इसलिए है कि शैतान उन्हें मूर्ख बना चुका है; उसे डर है कि हम परमेश्वर में प्रवेश करने के लिए आस्था का पुल पार कर लेंगे। शैतान अपने विचार हमें भेजने के लिए हर संभव प्रयास कर रहा है। हमें हर पल परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमें रोशन और प्रबुद्ध करे, हर पल परमेश्वर पर निर्भर रहना चाहिए ताकि वह हमारे भीतर से शैतान के जहर को शुद्ध कर दे, हर पल अपनी आत्मा के भीतर परमेश्वर के निकट आने का अभ्यास करना चाहिए; हमें अपने संपूर्ण अस्तित्व पर परमेश्वर को प्रभुत्व रखने और उसमें पूरी तरह से बसने देना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 6

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 375

जब लोगों में अपने साथ होने वाली चीजों के बारे में अंतर्दृष्टि की कमी होती है, और वे यह नहीं जानते कि क्या करना उचित है, तो उन्हें पहले क्या करना चाहिए? उन्हें पहले प्रार्थना करनी चाहिए; प्रार्थना पहले आती है। प्रार्थना करने से क्या प्रकट होता है? यही कि तुम धर्मनिष्ठ हो, तुम्हारे पास कुछ हद तक परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, तुम परमेश्वर को खोजना जानते हो, और यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर को पहले स्थान पर रखते हो। जब तुम्हारे दिल में परमेश्वर होता है, और वहाँ उसके लिए जगह होती है, और तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो, तो फिर तुम धर्मनिष्ठ ईसाई हो। कई बुजुर्ग विश्वासी हैं, जो रोज एक ही समय प्रार्थना में घुटने टेकते हैं। वे हर बार एक-दो घंटे घुटने टेके रहते हैं लेकिन उन्हें इस तरह घुटने टेके चाहे कितने ही साल हो चुके हों, इससे उनकी पाप की कई समस्याएँ दूर नहीं हुई हैं। इस बात को पहले एक तरफ रख देते हैं कि ऐसी धार्मिक प्रार्थना किसी काम की है या नहीं। कम से कम ये बुजुर्ग भाई-बहन थोड़े धर्मनिष्ठ तो हैं। इस मामले में वे युवाओं से काफी बेहतर हैं। अगर तुम परमेश्वर के सामने जीना और उसके कार्य का अनुभव करना चाहते हो, तो जब तुम्हें कुछ होता है तो पहली चीज जो तुम्हें करनी चाहिए, वह है प्रार्थना। प्रार्थना करने का मतलब यह नहीं है कि रटे-रटाए वाक्यांश बिना सोचे-समझे दोहरा दो और बस छुट्टी पा लो; इससे तुम कहीं नहीं पहुँचोगे। तुम्हें दिल से प्रार्थना करना सीखना है। हो सकता है कि ऐसा आठ-दस बार करने के बाद भी तुम्हें कुछ फर्क न दिखाई दे, लेकिन निराश मत होओ : तुम्हें अभ्यास करते जाना है। जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो पहले प्रार्थना करो। पहले परमेश्वर को बताओ और उसे स्थिति सँभालने दो। परमेश्वर को मदद करने दो, तुम्हारा मार्गदर्शन करने दो, रास्ता दिखाने दो। यह साबित करेगा कि तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, और तुम परमेश्वर को सर्वोपरि रखते हो। जब तुम्हें कुछ होता है या तुम किसी कठिनाई का सामना करते हो और निराश और गुस्सा हो जाते हो, तो यह तुम्हारे हृदय में परमेश्वर की अनुपस्थिति और उसका भय न मानने की निशानी है। अपने असल जीवन में तुम्हारे सामने जो भी कठिनाइयाँ आएँ, तुम्हें परमेश्वर के सामने आना चाहिए। पहला काम है प्रार्थना में घुटने टेकना। यही सबसे महत्वपूर्ण चीज है। प्रार्थना दिखाती है कि तुम्हारे हृदय में परमेश्वर के लिए स्थान है। जब तुम कठिनाई में होते हो तो परमेश्वर की ओर देखना, उससे प्रार्थना करना और खोजना यह दर्शाता है कि तुम्हारे पास थोड़ा-सा परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है; अगर तुम्हारे दिल में परमेश्वर न होता तो तुम ऐसा न करते। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, फिर भी उसने मुझे प्रबुद्ध नहीं किया!” ऐसा नहीं कहना चाहिए। तुम्हें पहले यह देखना चाहिए कि प्रार्थना करते समय तुम्हारा इरादा सही है या नहीं। अगर तुम ईमानदारी से सत्य की खोज करते हो, और अक्सर परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तो कोई हो सकता है कि किसी विशेष मामले में परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करे और इसे समझने दे। हर हाल में परमेश्वर तुम्हें समझा देगा। अगर परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध न करे, तो तुम अपने आप नहीं समझ पाओगे। कुछ चीजें ऐसी होती हैं जो मनुष्य के विचार से परे हैं, फिर चाहे तुम्हारे पास समझने की शक्ति हो या नहीं, और तुम कितने भी काबिल हो। जब तुम समझते भी हो, तो क्या यह तुम्हारे अपने दिमाग की उपज है? परमेश्वर के इरादों और पवित्र आत्मा के कार्य के बारे में, अगर पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करता, तो तुम्हें ऐसा कोई नहीं मिलेगा जो इसका अर्थ जानता हो। जब परमेश्वर खुद तुम्हें बताता है कि इसका क्या अर्थ है, तभी तुम जानोगे। और इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ होता है तो पहली चीज है प्रार्थना करना। जब तुम प्रार्थना करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के प्रति अपने विचार, मत और दृष्टिकोण व्यक्त करने चाहिए, और समर्पण की मानसिकता के साथ उससे सत्य खोजना चाहिए; यही अभ्यास लोगों को करना चाहिए। बेमन से प्रार्थना करने से तुम्हें कोई नतीजा नहीं मिलेगा, और तुम्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि पवित्र आत्मा ने तुम्हें प्रबुद्ध नहीं किया है। मैंने पाया है कि परमेश्वर पर अपनी आस्था में कुछ लोग केवल धार्मिक अनुष्ठानों का पालन और धार्मिक कृत्य करते हैं। परमेश्वर का उनके हृदय में कोई स्थान नहीं होता; वे तो पवित्र आत्मा के कार्य को भी नकार देते हैं। वे न तो प्रार्थना करते हैं, न परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं। वे बस सभा में जाते रहते हैं, और कुछ नहीं। क्या यही परमेश्वर पर आस्था है? वे अपने ढंग से विश्वास करते जाते हैं, लेकिन परमेश्वर उनकी आस्था से गायब है। उनके दिल में परमेश्वर नहीं है, वे अब और परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करना चाहते, वे अब परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए भी तैयार नहीं हैं। तो क्या वे गैर-विश्वासी नहीं बन गए हैं? विशेष रूप से कुछ अगुआ और कार्यकर्ता अक्सर सामान्य मामले सँभालते हैं। वे जीवन प्रवेश पर कभी ध्यान नहीं देते, बल्कि सामान्य कार्यों को अपना मुख्य काम मानते हैं। इससे वे कार्य प्रबंधक बनकर रह गए हैं, और ऐसा कोई भी कार्य नहीं करते हैं जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं के लिए अनिवार्य है। नतीजतन, बीस-तीस वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी उनके पास बताने के लिए कोई जीवन-अनुभव नहीं होता, और उन्हें परमेश्वर का कोई सच्चा ज्ञान नहीं होता है। वे केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत सुना सकते हैं। क्या वे इस तरह नकली अगुआ नहीं बन गए हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर पर अपने विश्वास में, वे अपने उचित कर्तव्यों को नहीं निभाते या सत्य का अनुसरण नहीं करते। केवल कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों की अपनी समझ पर भरोसा करने से कुछ हल नहीं होगा। जैसे ही उनका परीक्षण किया जाता है, विपदा झेलते या बीमार पड़ते ही वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करने लगते हैं। उन्हें सच्चा आत्मज्ञान नहीं है, और उनके पास कोई अनुभवजन्य गवाही नहीं है। यह दिखाता है कि उन्होंने इतने साल से परमेश्वर पर विश्वास के दौरान सत्य का अनुसरण नहीं किया, वे केवल दुनियादारी में व्यस्त रहे, नतीजतन उन्होंने खुद को नष्ट कर दिया है। लोग चाहे कितने ही वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास कर रहे हों, अगर उन्हें यह सुनिश्चित करना है कि वे गिरें नहीं, बुराई न करें, हटा न दिए जाएँ, तो उन्हें कम से कम कुछ सत्यों की समझ हासिल करनी चाहिए। इतना तो उनमें होना ही चाहिए। कुछ लोग आधे-अधूरे दिल से उपदेश सुनते हैं, और परमेश्वर के वचनों पर विचार नहीं करते। उनके साथ चाहे कुछ भी हो जाए, वे सत्य की तलाश नहीं करते। वे शब्दों और धर्म-सिद्धांतों को समझने मात्र से संतुष्ट रहते हैं, और मान लेते हैं कि उन्होंने सत्य हासिल कर लिया है। फिर जब परीक्षा ली जाती है तो उन्हें कोई ज्ञान नहीं होता, उनके दिल शिकवे-शिकायतों से भरे होते हैं जिन्हें वे बताना तो चाहते हैं मगर बताने की हिम्मत नहीं करते। क्या ऐसे लोग निपट दयनीय नहीं होते हैं? बहुत-से लोग अपना कर्तव्य निभाते समय हमेशा अनमने रहते हैं। जब उनकी काट-छाँट की जाती है तो वे आत्मचिंतन नहीं करते या खुद को जानने की कोशिश नहीं करते हैं। वे हमेशा खुद को सही ठहराते रहते हैं, लिहाजा भिन्न-भिन्न तरह से उनका भोंडापन सामने आ जाता है, उनका खुलासा करके हटा दिया जाता है, और वे अंत तक कभी भी खुद को नहीं जान पाते हैं। भला उनके कुछ धर्म-सिद्धांत समझ लेने भर में क्या तुक है? इसमें कोई तुक नहीं है। लोग चाहे कितने ही वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास करते आए हों, केवल धर्म-सिद्धांत समझ पाने और इनका बखान कर सकने का कोई फायदा नहीं है। उन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया, बल्कि भटक चुके हैं। इसलिए, जब तुम्हारे साथ कुछ घटता है और तुम परमेश्वर से प्रार्थना कर उसके इरादे खोजते हो, तो समस्या हल करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण है सत्य की समझ प्राप्त करना। यही सही मार्ग है, और तुम्हें इस तरह से निरंतर अभ्यास करते रहना चाहिए।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सत्य प्राप्त करना सबसे महत्वपूर्ण चीज है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 376

सभी चीजों में परमेश्वर की तरफ देखना और उस पर निर्भर रहना परम बुद्धिमानी है। आम लोग इस बात को नहीं समझते। सभी लोग सोचते हैं कि सभाओं में ज्यादा जाने, ज्यादा उपदेश सुनने, भाई-बहनों के साथ ज्यादा संगति करने, ज्यादा त्याग करने, ज्यादा कष्ट उठाने और ज्यादा कीमत चुकाने से उन्हें परमेश्वर की स्वीकृति और उद्धार मिल जाएगा। उन्हें लगता है कि इस तरह से अभ्यास करना सबसे बड़ी समझदारी है, पर वे सबसे महत्वपूर्ण चीज को अनदेखा कर देते हैं : परमेश्वर की तरफ देखना और उस पर निर्भर रहना। वे तुच्छ मानवीय चालाकी को बुद्धिमानी समझते हैं और उस अंतिम प्रभाव की अनदेखी कर देते हैं जो उनके क्रियाकलापों से पड़ना चाहिए। यह एक भूल है। लोग चाहे जो भी कर्तव्य करें, उनका आध्यात्मिक कद कितना भी बड़ा या छोटा क्यों न हो या वे चाहे कैसे भी परिवेश में क्यों न हों, वे सत्य की खोज करना कभी नहीं छोड़ सकते, और उन्हें सभी चीजों में परमेश्वर से प्रार्थना करनी होगी, परमेश्वर की ओर देखना होगा और परमेश्वर पर भरोसा करना होगा। यही और केवल यही सबसे बड़ी बुद्धिमानी है। मैं इसे सर्वोच्च प्रकार की बुद्धि क्यों कहता हूँ? किसी ने कुछ सत्य समझ भी लिए हों तो क्या परमेश्वर पर भरोसा किए बिना काम चल सकता है? कुछ लोग बहुत वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हैं और उन्होंने बहुत-से परीक्षणों का अनुभव किया है, उनके पास कुछ व्यावहारिक अनुभव है, थोड़ा-बहुत सत्य समझते हैं, और सत्य का थोड़ा व्यावहारिक ज्ञान है, लेकिन वे नहीं जानते कि परमेश्वर पर भरोसा कैसे करना है और वे यह भी नहीं जानते कि परमेश्वर की तरफ देखकर उस पर भरोसा कैसे करना है। क्या ऐसे लोगों में बुद्धि होती है? ऐसे लोग सबसे ज्यादा मूर्ख होते हैं, और खुद को चतुर समझते हैं; वे परमेश्वर का भय नहीं मानते और बुराई से दूर नहीं रहते। कुछ लोग कहते हैं, “मैं कई सत्य समझता हूँ और मेरे पास सत्य वास्तविकताएँ हैं। बस सिद्धांतसम्मत तरीके से काम करना ठीक है। मैं परमेश्वर के प्रति वफादार हूँ और मैं जानता हूँ कि परमेश्वर के करीब कैसे जाना है। क्या इतना पर्याप्त नहीं है कि जब मेरे साथ चीजें घटित होती हैं तो मैं सत्य का अभ्यास करता हूँ? परमेश्वर से प्रार्थना करने या परमेश्वर की तरफ देखने की कोई जरूरत नहीं है।” सत्य का अभ्यास करना सही है, लेकिन कई मौके और स्थितियाँ ऐसी होती हैं, जिनमें लोगों को पता नहीं चलता कि सत्य क्या है, या इस मामले में कौन-से सत्य सिद्धांत लागू होते हैं। व्यावहारिक अनुभव वाले लोग यह समझते हैं। उदाहरण के तौर पर, जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो शायद तुम्हें यह पता न हो कि इस मुद्दे से कौन-सा सत्य जुड़ा हुआ है, या इस मुद्दे से जुड़े सत्य का अभ्यास कैसे करना चाहिए या इसे कैसे लागू करना चाहिए। तुम्हें ऐसे मौकों पर क्या करना चाहिए? चाहे तुम्हें कितना भी व्यावहारिक अनुभव हो, तुम सभी स्थितियों में सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ सकते। चाहे तुमने कितने ही लंबे समय तक परमेश्वर पर विश्वास किया हो, चाहे तुमने कितनी ही चीजों का अनुभव किया हो, चाहे तुम कितनी ही काट-छाँट और अनुशासन से गुज़रे हो, अगर तुम सत्य को समझते भी हो तो भी क्या यह कहने का साहस कर सकते हो कि तुम ही सत्य हो? क्या तुम यह कहने का साहस कर सकते हो कि तुम सत्य के स्रोत हो? कुछ लोग कहते हैं, “मुझे ‘वचन देह में प्रकट होता है’ पुस्तक के सभी जाने-माने कथन और अंश याद हैं। मुझे परमेश्वर पर भरोसा करने या परमेश्वर की ओर देखने की आवश्यकता नहीं है। जब समय आएगा, मैं परमेश्वर के इन वचनों पर ही भरोसा करके आराम से काम चला लूँगा।” जिन वचनों को तुमने याद किया है, वे गतिहीन हैं, लेकिन जिन परिवेशों और अवस्थाओं का तुम सामना करते हो, वे गतिशील हैं। तुम शब्द और धर्म-सिद्धांत के शब्द उगल सकते हो, लेकिन जब तुम्हारे साथ कुछ घटता है तो तुम उनके साथ कुछ नहीं कर सकते, जिससे साबित होता है कि तुम सत्य को नहीं समझते। तुम शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलने में भले ही कितने ही माहिर क्यों न हो, इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम सत्य को समझते हो, सत्य के अभ्यास में सक्षम होना तो दूर की बात है। इस तरह, यहाँ सीखने के लिए एक बहुत महत्वपूर्ण सबक है। और यह सबक क्या है? वो यह है कि लोगों को सभी बातों में परमेश्वर की ओर देखने की जरूरत है और ऐसा करके, लोग परमेश्वर पर भरोसा हासिल कर सकते हैं। परमेश्वर पर भरोसा रखने से ही लोगों को अनुसरण का मार्ग और पवित्र आत्मा का कार्य मिलेगा। अन्यथा, तुम सही तरीके से और सत्य का उल्लंघन किए बिना कोई काम कर तो सकते हो, लेकिन यदि तुम परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हो, तो तुम्हारे क्रियाकलाप मनुष्य के अच्छे व्यवहारों के अलावा कुछ नहीं हैं, और यह परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकता। चूँकि लोगों को सत्य की इतनी उथली समझ होती है, इसलिए संभव है कि वे विनियम लागू करें और विभिन्न परिस्थितियों का सामना होने पर एक ही सत्य का उपयोग करते हुए शब्द और धर्म-सिद्धांतों से हठपूर्वक चिपके रहें। यह मुमकिन है कि वे कई मामलों को आम तौर पर सत्य सिद्धांतों के अनुरूप पूरा कर लें, लेकिन उसमें परमेश्वर के मार्गदर्शन को या पवित्र आत्मा के कार्य को नहीं देखा जा सकता है। यहाँ पर एक गंभीर समस्या है, वो यह है कि लोग अपने अनुभव और उन्होंने जो विनियम समझे हैं उन पर, और कुछ मानवीय कल्पनाओं पर निर्भर रहकर बहुत-से काम करते हैं। परमेश्वर से सच्ची प्रार्थना हासिल करना और जो कुछ भी वे करते हैं उसमें सचमुच परमेश्वर की ओर देखना और उस पर भरोसा करना मुश्किल है। अगर कोई परमेश्वर के इरादों को समझता भी है, तो भी परमेश्वर के मार्गदर्शन और सत्य सिद्धांतों के अनुसार काम करने का प्रभाव हासिल करना मुश्किल है। इसलिए मैं कहता हूँ कि सबसे बड़ी बुद्धिमानी परमेश्वर की तरफ देखना और सभी बातों में परमेश्वर पर भरोसा करना है।

लोग सभी चीजों में परमेश्वर की ओर देखने और परमेश्वर पर निर्भर रहने का अभ्यास कैसे कर सकते हैं? कुछ लोग कहते हैं, “मैं कमउम्र हूँ, मेरा आध्यात्मिक कद छोटा है, और मुझे परमेश्वर में विश्वास करते थोड़ा ही समय हुआ है। मुझे नहीं पता कि कुछ घटने पर परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर निर्भर रहने का अभ्यास कैसे करें।” क्या यह एक समस्या है? परमेश्वर में विश्वास करने में बहुत-सी कठिनाइयाँ हैं, और तुम्हें बहुत-से क्लेशों, परीक्षणों और पीड़ाओं से गुजरना पड़ता है। इन कठिन घड़ियों को झेल पाने के लिए परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर निर्भर रहने की जरूरत पड़ती है। अगर तुम परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर निर्भर रहने का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम कठिनाइयाँ झेल नहीं पाओगे, और परमेश्वर का अनुसरण नहीं कर पाओगे। परमेश्वर की तरफ देखना और उस पर निर्भर रहना कोई खोखला धर्म-सिद्धांत नहीं है, न ही यह परमेश्वर में विश्वास करने का मंत्र है। बल्कि यह एक मुख्य सत्य है, ऐसा सत्य जो परमेश्वर में विश्वास करने और उसका अनुसरण करने के लिए तुम्हारे पास होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “परमेश्वर की ओर देखना और उस पर निर्भर रहना केवल तभी चाहिए जब कोई बड़ी घटना हो जाती है। उदाहरण के लिए, जब तुम क्लेशों, परीक्षणों, गिरफ्तारी और अत्याचार का सामना करते हो, या जब तुम अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों का सामना करते हो, या जब तुम्हारी काट-छाँट होती है तब तुम्हें केवल परमेश्वर की ओर देखने और उस पर निर्भर रहने की जरूरत होती है। व्यक्तिगत जीवन के छोटे-मोटे और मामूली मामलों के लिए परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर निर्भर रहने की जरूरत नहीं होती, क्योंकि परमेश्वर उनकी परवाह नहीं करता।” क्या यह वक्तव्य सही है? यह कतई सही नहीं है। यहाँ एक भटकाव है। बड़े मामलों में परमेश्वर की तरफ देखना जरूरी है, लेकिन क्या तुम जीवन के मामूली और छोटे मामलों को बिना सिद्धांतों के सँभाल सकते हो? पहनावे और खानपान के मामलों में क्या तुम सिद्धांतों के बिना चल सकते हो? बिल्कुल नहीं। और लोगों और मसलों से निपटने के मामले में? बिल्कुल नहीं। रोजाना की जिंदगी और मामूली मामलों में भी तुम्हारे पास मनुष्य के समान जी सकने के सिद्धांत होने चाहिए। सिद्धांतों से जुड़ी समस्याएँ सत्य से जुड़ी समस्याएँ होती हैं। क्या लोग इन्हें अपने आप हल कर सकते हैं? निश्चित ही नहीं। इसलिए तुम्हें परमेश्वर की ओर देखना होगा और परमेश्वर पर निर्भर रहना होगा। परमेश्वर की प्रबुद्धता और सत्य की समझ हासिल करने के बाद ही ये मामूली मामले सुलझाए जा सकते हैं। अगर तुम परमेश्वर की तरफ नहीं देखते और उस पर निर्भर नहीं रहते तो क्या तुम लोग समझते हो कि सिद्धांतों से जुड़े ये मामले सुलझाए जा सकते हैं? आसानी से तो बिल्कुल नहीं। यह कहा जा सकता है कि उन सभी चीजों में जिन्हें लोग स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते हैं जो लोगों से सत्य खोजने की माँग करती हैं, उन्हें परमेश्वर की ओर देखना चाहिए और उस पर निर्भर करना चाहिए। मामला चाहे कितना भी बड़ा या छोटा हो, जिस भी समस्या को सत्य से सुलझाना होता है, उसमें परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर निर्भर रहने की जरूरत होती है। यह एक अनिवार्यता है। अगर लोग सत्य समझते भी हों, और खुद ही समस्याएँ सुलझा सकते हों, तो भी यह समझ और ये समाधान बहुत सीमित और सतही होते हैं। अगर लोग परमेश्वर की तरफ न देखें और उस पर निर्भर न करें तो उनका प्रवेश कभी भी अधिक गहरा नहीं होगा। उदाहरण के लिए, अगर तुम आज बीमार हो और इससे तुम्हारे कर्तव्य के निर्वाह पर असर पड़ता है, तो तुम्हें जरूरत है कि इस मामले में प्रार्थना करके यह कहो, “परमेश्वर, मैं आज ठीक महसूस नहीं कर रहा, मैं खा नहीं पा रहा और इससे मेरे कर्तव्य के निर्वाह पर असर पड़ रहा है। मुझे अपनी जाँच करनी है। मेरे बीमार होने का असली कारण क्या है? क्या अपने कर्तव्य में समर्पित न होने के कारण परमेश्वर मुझे अनुशासित कर रहा है? परमेश्वर, मैं तुमसे मुझे प्रबुद्ध करने और राह दिखाने की विनती करता हूँ।” तुम्हें इसी तरह पुकारना चाहिए। यह परमेश्वर की तरफ देखना हुआ। पर जब तुम परमेश्वर की तरफ देखते हो तो तुम औपचारिकताओं और विनियमों के चक्कर में नहीं पड़ सकते। अगर तुम समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य नहीं खोजते हो तो तुम चीजों में देरी कर दोगे। परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी ओर देखने के बाद भी तुम्हें अपना जीवन, अपना कर्तव्य निभाने में देरी किए बिना, वैसे ही जीना चाहिए, जैसे कि तुमसे अपेक्षित है। अगर तुम बीमार हो तो तुम्हें डॉक्टर के पास जाना चाहिए, जो कि उचित है। साथ ही, तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, आत्मचिंतन करना चाहिए, और समस्या को सुलझाने के लिए सत्य की खोज करनी चाहिए। इस तरह अभ्यास करना ही पूरी तरह उपयुक्त है। कुछ चीजों के लिए, अगर लोगों को उन्हें ठीक-से करना आता है, तो उन्हें ऐसा ही करना चाहिए। लोगों को इसी तरह सहयोग करना चाहिए। पर क्या इन मामलों में इच्छित प्रभाव और लक्ष्य को पूरी तरह हासिल किया जा सकता है, यह परमेश्वर की तरफ देखने और उस पर भरोसा करने पर निर्भर करता है। जिन समस्याओं को लोग साफ-साफ समझ नहीं पाते और उनसे अच्छी तरह निपट नहीं पाते, उनके समाधान के लिए उनका परमेश्वर की तरफ देखना और सत्य की खोज करना और भी जरूरी है। सामान्य मानवता वाले हर इंसान में ऐसा कर पाने की क्षमता होनी चाहिए। परमेश्वर की तरफ देखने में कई सबक सीखने होते हैं। परमेश्वर की तरफ देखने की प्रक्रिया में तुम पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो, और तुम्हें एक रास्ता मिलेगा, या अगर परमेश्वर के वचन तुम पर आते हैं तो तुम सहयोग करना जान जाओगे, या शायद परमेश्वर तुम्हारे लिए कुछ सबक सीखने की स्थितियाँ आयोजित करे, जिनमें परमेश्वर के अच्छे इरादे होंगे। परमेश्वर की तरफ देखने की प्रक्रिया में तुम्हें परमेश्वर का मार्गदर्शन और अगुआई दिखाई देगी, और इनसे तुम कई सबक सीख सकोगे और परमेश्वर की बेहतर समझ हासिल कर सकोगे। परमेश्वर की तरफ देखने का यह प्रभाव होता है। इसलिए, परमेश्वर की तरफ देखना एक ऐसा सबक है जिसे परमेश्वर के अनुयायियों को अवश्य सीखना चाहिए, और यह एक ऐसी चीज है जिसे वे जीवन भर अनुभव करते रहेंगे। बहुत-से लोगों को बहुत सतही अनुभव होता है और वे परमेश्वर के क्रियाकलाप नहीं देख पाते, इसलिए वे सोचते हैं, “बहुत-सी ऐसी छोटी-छोटी चीजें हैं जो मैं खुद कर सकता हूँ, इसके लिए मुझे परमेश्वर की तरफ देखने की जरूरत नहीं है।” यह गलत है। कुछ छोटी चीजें बड़ी चीजों की तरफ ले जाती हैं, और कुछ छोटी चीजों में परमेश्वर के इरादे छिपे होते हैं। बहुत-से लोग छोटी चीजों की अवहेलना करते हैं, और परिणामस्वरूप वे छोटे मामलों के कारण बड़ी विफलताओं के शिकार हो जाते हैं। जिनके पास छोटे-बड़े सभी मामलों में सचमुच परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है, वे परमेश्वर की तरफ देखेंगे, परमेश्वर से प्रार्थना करेंगे, सब कुछ परमेश्वर को सौंप देंगे और फिर देखेंगे कि कैसे परमेश्वर उनकी अगुआई और मार्गदर्शन करता है। एक बार जब तुम्हें ऐसा अनुभव हो जाता है तो तुम सभी चीजों में परमेश्वर की तरफ देखने में सक्षम हो जाओगे, और तुम्हें इसका जितना ज्यादा अनुभव होगा, उतना ही तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर की तरफ देखना अत्यंत व्यावहारिक लगेगा। जब तुम किसी मामले में परमेश्वर की तरफ देखते हो, तो संभव है कि परमेश्वर तुम्हें कोई एहसास न करवाए, कोई स्पष्ट अर्थ न दे, और स्पष्ट निर्देश तो बिल्कुल ही न दे, पर वह तुम्हें मामले की सटीक प्रासंगिकता के साथ एक विचार समझाएगा, और यह परमेश्वर का एक अलग तरीके से तुम्हारा मार्गदर्शन करना और तुम्हें एक रास्ता देना है। अगर तुम इसका बोध कर सके, इसे समझ सके, तो तुम्हें लाभ होगा। हो सकता है तुम उस क्षण कुछ भी न समझ पाओ, पर तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करते और उसकी तरफ देखते रहना चाहिए। इसमें कुछ भी गलत नहीं है, और देर-सवेर तुम्हें प्रबुद्धता प्राप्त होगी। इस तरह अभ्यास करने का मतलब विनियमों का पालन करना नहीं है। इसके बजाय, यह आत्मा की जरूरत को पूरा करना है, और लोगों को इसी तरह अभ्यास करना चाहिए। हो सकता है कि परमेश्वर की तरफ देखने और प्रार्थना करने के बाद तुम्हें हर बार प्रबुद्धता और मार्गदर्शन प्राप्त न हो, पर लोगों को इसी तरह अभ्यास करते रहना चाहिए, और अगर वे सत्य को समझना चाहते हैं तो उन्हें इसी तरह अभ्यास करने की जरूरत है। यह जीवन और आत्मा की सामान्य अवस्था होती है और सिर्फ इसी तरीके से लोग परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध कायम रख सकते हैं, ताकि उनके दिल परमेश्वर से दूर न होते जाएँ। इसलिए ऐसा कहा जा सकता है कि परमेश्वर की तरफ देखना, दिल में परमेश्वर के साथ सामान्य बातचीत है। भले ही तुम परमेश्वर की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन प्राप्त कर सको या नहीं, तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर से प्रार्थना करना और उसकी तरफ देखना चाहिए। यह परमेश्वर के समक्ष जीने का आवश्यक मार्ग भी है। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं, तो उन्हें हमेशा परमेश्वर की तरफ देखने की मनोस्थिति में होना चाहिए। सामान्य मानवता वाले लोगों की यही मनोस्थिति होनी चाहिए। कभी-कभी परमेश्वर की ओर देखने का मतलब परमेश्वर से कुछ करने को कहने या उससे मार्गदर्शन माँगने या उसकी सुरक्षा माँगने के लिए विशिष्ट वचनों का उपयोग करना नहीं होता है। बल्कि, इसका मतलब है किसी समस्या का सामना करने पर, लोगों का उसे ईमानदारी से पुकारने में सक्षम होना। तो, जब लोग परमेश्वर को पुकारते हैं तो वह क्या कर रहा होता है? जब किसी के हृदय में हलचल होती है और वह सोचता है : “हे परमेश्वर, मैं यह खुद नहीं कर सकता, मुझे नहीं पता कि यह कैसे करना है, और मैं कमज़ोर और नकारात्मक महसूस करता हूँ...,” जब उनके मन में यह विचार आता है, तो क्या परमेश्वर इसके बारे में नहीं जानता है? जब यह विचार लोगों के मन में उठता है, तो क्या उनके हृदय ईमानदार होते हैं? जब वे इस तरह से ईमानदारी से परमेश्वर को पुकारते हैं, तो क्या परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है? इस तथ्य के बावजूद कि हो सकता है कि उन्होंने एक वचन भी नहीं बोला हो, वे ईमानदारी दिखाते हैं, और इसलिए परमेश्वर उनकी मदद करने की सहमति देता है। जब कोई विशेष रूप से किसी जटिल समस्या का सामना करता है, जब ऐसा कुछ भी नहीं और कोई नहीं होता जिस पर वह निर्भर रह सके और जब वह विशेष रूप से असहाय महसूस करता है, तो वह परमेश्वर में अपनी एकमात्र आशा रखता है। ऐसे लोगों की प्रार्थनाएँ किस तरह की होती हैं? उनकी मनःस्थिति क्या होती है? क्या वे सच्चे होते हैं? क्या उस समय कोई मिलावट होती है? केवल तभी तुम्हारा हृदय सच्चा होता है, जब तुम परमेश्वर पर इस तरह भरोसा करते हो मानो कि वह अंतिम तिनका है जिसे तुमने कसकर पकड़ रखा है और यह उम्मीद करते हो कि वह तुम्हारी मदद करेगा। यद्यपि तुमने ज्यादा कुछ नहीं कहा होगा, लेकिन तुम्हारा हृदय पहले से ही उद्वेलित है—तुमने परमेश्वर को अपना सच्चा हृदय दिया है—और परमेश्वर सुनता है। जब परमेश्वर सुनता है, तो वह तुम्हारी कठिनाइयों को देखता है, और वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हारी सहायता करेगा। मनुष्य का हृदय कब सबसे सच्चा होता है? मनुष्य का हृदय तब सबसे सच्चा होता है जब कोई रास्ता न होने पर वह परमेश्वर की तरफ देखता है। परमेश्वर की तरफ देखने के लिए तुम्हारे पास जो सबसे महत्वपूर्ण चीज होनी चाहिए, वह है एक ईमानदार दिल। तुम्हें ऐसी अवस्था में होना चाहिए जहाँ तुम्हें सचमुच परमेश्वर की जरूरत हो। अर्थात, लोगों के दिल कम-से-कम ईमानदार तो होने चाहिए, न कि अनमने; ऐसा नहीं होना चाहिए कि वे सिर्फ अपने मुँह ही हिलाएँ, और उनका दिल प्रेरित न हो। अगर तुम परमेश्वर से बात करते हुए सिर्फ खानापूर्ति करते हो, पर तुम्हारा दिल भाव-विह्वल नहीं होता, तो तुम्हारा अभिप्राय होता है कि “मैंने पहले ही अपनी योजनाएँ बना ली हैं, परमेश्वर, मैं बस तुम्हें सूचित कर रहा हूँ। भले ही तुम सहमत हो या नहीं, मैं उन्हीं के अनुसार चलूँगा। मैं सिर्फ खानापूर्ति कर रहा हूँ,” तो यह परेशानी की बात है। तुम परमेश्वर को धोखा दे रहे हो, उसके साथ खेल कर रहे हो, और यह परमेश्वर के प्रति अनादर की अभिव्यक्ति भी है। इसके बाद परमेश्वर तुम्हारे साथ कैसा व्यवहार करेगा? परमेश्वर तुम्हारी तरफ ध्यान नहीं देगा और तुम्हें एक तरफ रख देगा, और तुम पूरी तरह शर्मिंदा होकर रह जाओगे। अगर तुम सक्रियता से परमेश्वर को नहीं खोजते हो, और सत्य में प्रयास नहीं करते हो, तो तुम्हें निकाल दिया जाएगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर में विश्वास की शुरुआत संसार की बुरी प्रवृत्तियों की असलियत देखने से होनी चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 377

सत्य स्वयं परमेश्वर का जीवन है; यह उसके स्वभाव, सार और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, का प्रतिनिधित्व करता है। अगर तुम कहते हो कि कुछ अनुभवजन्य ज्ञान होने से तुमने सत्य पा लिया है, तो क्या तुमने पवित्रता प्राप्त कर ली है? तुम अभी भी भ्रष्टता प्रकट क्यों करते हो? तुम विभिन्न प्रकार के लोगों के बीच अंतर क्यों नहीं कर पाते? तुम परमेश्वर की गवाही क्यों नहीं दे पाते? अगर तुम कुछ सत्य समझते भी हो, तो भी क्या तुम परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के स्वभाव को जी सकते हो? तुम्हारे पास एक सत्य के किसी निश्चित पहलू के बारे में कुछ अनुभवजन्य ज्ञान हो सकता है, और तुम अपने भाषण में उस पर थोड़ा प्रकाश डालने में सक्षम हो सकते हो, लेकिन तुम लोगों को जो प्रदान कर सकते हो, वह बेहद सीमित है और लंबे समय तक नहीं टिक सकता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि तुम्हारी समझ और तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया गया प्रकाश सत्य के सार का प्रतिनिधित्व नहीं करते, और वे सत्य की संपूर्णता का प्रतिनिधित्व भी नहीं करते। वे सत्य के केवल एक पक्ष या एक छोटे-से पहलू का प्रतिनिधित्व करते हैं, वे केवल एक स्तर हैं जिसे मनुष्य द्वारा प्राप्त किया जा सकता है और जो अभी भी सत्य के सार से दूर है। यह थोड़ा-सा प्रकाश, प्रबुद्धता, अनुभवजन्य ज्ञान कभी सत्य का स्थान नहीं ले सकता। भले ही सभी लोगों ने सत्य का अनुभव कर कुछ परिणाम प्राप्त किए हों और उनके समस्त अनुभवजन्य ज्ञान को एक साथ रख दिया जाए, फिर भी वह उस सत्य की एक भी पंक्ति की संपूर्णता और सार तक नहीं पहुँच पाएगा। अतीत में कहा गया है, “मैं इसे मानव-संसार के लिए एक सूक्ति के साथ सारांशित करता हूँ : मनुष्यों में, कोई भी ऐसा नहीं है जो मुझे प्रेम करता है।” यह वाक्य सत्य, जीवन का सच्चा सार, सबसे गहन चीज, और स्वयं परमेश्वर की अभिव्यक्ति है। तुम अनुभवों से गुजरते हो और तीन वर्षों के अनुभव के बाद तुम्हें थोड़ी सतही समझ हो सकती है, और सात-आठ वर्षों के बाद तुम्हें थोड़ी और समझ हो सकती है, लेकिन यह समझ कभी सत्य की इस पंक्ति की जगह नहीं ले सकती। दो साल के बाद किसी और को थोड़ी समझ हो सकती है या दस साल बाद कुछ अधिक समझ हो सकती है या एक जीवनकाल के बाद अपेक्षाकृत ऊँची समझ हो सकती है, लेकिन तुम दोनों की साझा समझ सत्य की इस पँक्ति का स्थान नहीं ले सकती है। तुम दोनों के पास कितनी भी अंतर्दृष्टि, प्रकाश, अनुभव या ज्ञान हो, वे सत्य की इस पंक्ति की जगह कभी नहीं ले सकते। कहने का तात्पर्य यह है कि मानव-जीवन हमेशा मानव-जीवन होता है, और तुम्हारा ज्ञान कैसे भी सत्य, परमेश्वर के इरादों या परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप हो, वह सत्य का स्थान कभी नहीं ले सकता। लोगों के पास सत्य है, यह कहने का अर्थ यह होता है कि लोग वास्तव में सत्य को समझते हैं, परमेश्वर के वचनों की कुछ वास्तविकताओं को जीते हैं, परमेश्वर के बारे में कुछ वास्तविक ज्ञान रखते हैं, और परमेश्वर का उत्कर्ष कर उसकी गवाही दे सकते हैं। लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि लोगों के पास पहले से ही सत्य है, क्योंकि सत्य बहुत गहन है। परमेश्वर के वचनों की सिर्फ एक पंक्ति का अनुभव करने में भी लोगों का पूरा जीवन लग सकता है, और कई जन्मों या हजारों वर्षों के अनुभव के बाद भी परमेश्वर के वचनों की एक भी पंक्ति का पूरी तरह से अनुभव नहीं किया जा सकता। यह स्पष्ट है कि सत्य को समझने और परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया वास्तव में अंतहीन है, और इस बात की एक सीमा है कि लोग जीवन भर के अनुभव में कितना सत्य समझ सकते हैं। परमेश्वर के वचनों का शाब्दिक अर्थ समझते ही कुछ लोग कहते हैं कि सत्य उनके हाथ आ गया है। क्या यह बकवास नहीं है? प्रकाश और ज्ञान दोनों के संदर्भ में, बात गहराई की है। जीवन भर विश्वास रखकर जिन सत्य वास्तविकताओं में इंसान प्रवेश कर सकता है, वे सीमित हैं। इसलिए, तुम्हारे पास कुछ ज्ञान और प्रकाश होने का यह मतलब नहीं कि तुम्हारे पास सत्य वास्तविकताएँ हैं। मुख्य बात जो तुम्हें देखनी चाहिए, यह है कि वह प्रकाश और ज्ञान सत्य के सार को छूता है या नहीं। यह सबसे महत्वपूर्ण बात है। कुछ लोगों को लगता है कि चूँकि वे प्रकाश डाल सकते हैं या उसकी थोड़ी सतही समझ प्रदान कर सकते हैं, इसलिए उनके पास सत्य है। इससे वे खुश हो जाते हैं, इसलिए वे दंभी और अहंकारी हो जाते हैं। वास्तव में वे अभी भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने से बहुत दूर होते हैं। लोगों के पास क्या सत्य है? जिन लोगों के पास सत्य है, क्या वे कभी और कहीं भी गिर सकते हैं? जब लोगों के पास सत्य है, तो वे तब भी परमेश्वर का प्रतिरोध कैसे कर सकते हैं और कैसे उसे धोखा दे सकते हैं? अगर तुम दावा करते हो कि तुम्हारे पास सत्य है तो यह साबित करता है कि तुम्हारे भीतर मसीह का जीवन है—यह चौंकाने वाली बात है! तुम प्रभु बन गए, तुम मसीह बन गए? यह एक बेतुका कथन है और यह पूरी तरह से लोगों द्वारा निकाला हुआ निष्कर्ष है; यह मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं से संबंधित है और परमेश्वर के साथ एक निभने योग्य स्थिति नहीं है।

जब लोगों के सत्य समझने और इसे अपने जीवन के रूप में रखने की बात करते हैं, तो इस संदर्भ में “जीवन” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि उनके हृदय में सत्य का ही शासन है, इसका तात्पर्य है कि वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवनयापन करते हैं और इसका अर्थ है कि उन्हें परमेश्वर के वचनों का सच्चा ज्ञान है और सत्य की वास्तविक समझ है। जब लोगों के अंदर यह नया जीवन होता है, तो यह पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों के अभ्यास और अनुभव से हासिल होता है, यह परमेश्वर के वचनों के सत्य की बुनियाद पर बना होता है और इसे सत्य के दायरे में रहते हुए हासिल किया जाता है; लोगों के जीवन में जो कुछ भी होता है, वह उनका सत्य का ज्ञान और अनुभव होता है। यही वह दायरा है जिसके भीतर यह आता है; जीवन प्राप्त करने का अर्थ है सत्य प्राप्त करना। परमेश्वर के वचनों के सत्य के अनुसार जी पाने का मतलब यह नहीं है कि सत्य का जीवन लोगों के अंदर है, न ही यह है कि अगर उनमें सत्य अपने जीवन के रूप में है तो वे सत्य बन जाते हैं और उनका आंतरिक जीवन सत्य का जीवन बन जाता है; यह तो छोड़ ही दो कि वे सत्य और जीवन हैं। आखिरकार, उनका जीवन इंसान का जीवन ही है। कहने का मतलब है कि अगर तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सको और सत्य का ज्ञान रख सको, अगर यह ज्ञान तुम्हारे अंदर जड़ जमा सके और तुम्हारा जीवन बन जाए और अनुभव से जो सत्य तुमने पाया है, वह तुम्हारे अस्तित्व की नींव बन जाए, अगर तुम परमेश्वर के इन वचनों के अनुसार जिओ, तो तुम्हें कोई भी नहीं बदल सकता, शैतान तुम्हें गुमराह या भ्रष्ट नहीं कर सकता, तब तुम सत्य और जीवन पा लोगे। यानी तुम्हारे जीवन में केवल सत्य होगा, सत्य की तुम्हारी समझ होगी और अनुभव होगा; तुम चाहे कुछ भी करो, तुम इन्हीं सत्यों के अनुसार जिओगे, तुम उनके दायरे से बाहर नहीं जाओगे। तब तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता होगी और अंत में परमेश्वर अपने कार्य के माध्यम से ऐसे ही लोगों को प्राप्त करना चाहता है। लेकिन लोग चाहे जितने भी सत्य समझ लें, उनका सार तो फिर भी मानवता का सार ही होता है, इसकी तुलना परमेश्वर के सार से बिल्कुल नहीं की जा सकती। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे कभी संपूर्ण सत्य का अनुभव नहीं कर सकते, और उनके लिए सत्य को पूरी तरह से जी पाना असंभव है, वे केवल उसी बेहद सीमित सत्य को ही जी सकते हैं जो मनुष्यों के लिए प्राप्य है। तो, फिर वे परमेश्वर कैसे बन सकते हैं? ... अगर तुम्हें परमेश्वर के वचनों का थोड़ा-बहुत अनुभव है, और तुम सत्य के सच्चे अनुभवजन्य ज्ञान के अनुसार जी रहे हो, तब परमेश्वर के वचन धीरे-धीरे तुम्हारा जीवन बन जाते हैं। फिर भी, तुम यह नहीं कह सकते कि सत्य तुम्हारा जीवन है या तुम जो व्यक्त करते हो, वह सत्य है; अगर तुम्हारा यह विचार है, तो तुम गलत हो। यदि तुम्हारे पास केवल सत्य के किसी एक खास पहलू के अनुसार कुछ अनुभव है, तो क्या यह इस बात का प्रतिनिधित्व कर सकता है कि तुम्हारे पास सत्य है? क्या इसे सत्य प्राप्त करना कहा जा सकता है? क्या तुम सत्य की पूरी व्याख्या कर सकते हो? क्या तुम सत्य से परमेश्वर के स्वभाव का और जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, उसका पता लगा सकते हो? अगर ये परिणाम नहीं प्राप्त किए जाते, तो इससे साबित होता है कि केवल सत्य के किसी पहलू का अनुभव पा लेने को वास्तव में सत्य की समझ हासिल कर लेना या परमेश्वर को जान लेना नहीं माना जा सकता, इसे सत्य प्राप्त कर लेना तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता। प्रत्येक व्यक्ति को सत्य के सिर्फ एक पहलू और दायरे का ही अनुभव होता है; वे इसे उसके सीमित दायरे में अनुभव करते हैं और सत्य के अनगिनत पहलुओं को नहीं छू पाते। क्या लोग सत्य के मूल अर्थ को जी सकते हैं? तुम्हारा ज़रा-सा अनुभव किसके बराबर है? समुद्र तट पर रेत के एक कण के बराबर; महासागर में पानी की एक बूँद के बराबर। इसलिए, भले ही तुम्हारे अनुभव से प्राप्त समझ और अनुभूतियां कितनी भी अनमोल हों, फिर भी उन्हें सत्य नहीं माना जा सकता। उन्हें केवल सत्य के अनुरूप ही माना जा सकता है। सत्य परमेश्वर से आता है, और सत्य के आंतरिक अर्थ और वास्तविकताओं का दायरा बहुत व्यापक है और न कोई थाह पा सकता है और न ही खंडन कर सकता है। अगर तुम्हें सत्य और परमेश्वर की वास्तविक समझ है, तुम थोड़े-बहुत सत्य समझ लोगे, कोई भी इस वास्तविक समझ का खंडन नहीं कर पाएगा और सत्य वास्तविकताओं वाली गवाहियाँ हमेशा अडिग होती हैं। परमेश्वर उनका अनुमोदन करता है, जिनके पास सत्य वास्तविकताएँ होती हैं। अगर तुम्हारा परिवेश चाहे जैसा भी हो, तुम सत्य का अनुसरण करते हो, परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा करते हो और सत्य को अपने जीवन के रूप में स्वीकार कर सकते हो, तो तुम्हारे पास एक मार्ग होगा, तुम जीवित रह पाओगे और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करोगे। भले ही लोग जो थोड़ा-बहुत प्राप्त करते हैं वह सत्य के अनुरूप होता है, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि यह सत्य है, यह तो बिल्कुल नहीं कहा जा सकता कि उन्होंने सत्य प्राप्त कर लिया है। लोगों ने जो थोड़ा-सा प्रकाश प्राप्त किया है वह केवल एक निश्चित दायरे में खुद के लिए या कुछ अन्य लोगों के लिए ही उपयुक्त है, वो एक अलग दायरे में उपयुक्त नहीं है। किसी व्यक्ति का अनुभव कितना भी गहन हो, लेकिन वो होता बहुत ही सीमित है, किसी व्यक्ति का अनुभव सत्य की गहराई तक कभी नहीं पहुँच सकता। किसी व्यक्ति के प्रकाश और उसकी समझ की तुलना सत्य से कभी नहीं की जा सकती।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 378

अगर तुम सत्य का अभ्यास करना और उसे समझना चाहते हो, तो अपनी वास्तविक जिंदगी में चीजें घटित होने पर तुम्हें सबसे पहले सत्य खोजना चाहिए। इसका अर्थ है कि तुम्हें चीजों को परमेश्वर के वचनों और सत्य के आधार पर देखना चाहिए; जब समस्या का सार स्पष्ट हो जाएगा, तो तुम्हारी समझ में आ जाएगा कि सत्य सिद्धांतों के अनुसार कैसे अभ्यास करना है। और अगर तुम हमेशा ही चीजों को इस तरह से परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखोगे तो तुम्हें तुम्हारे आसपास घटने वाली हर चीज में परमेश्वर का हाथ और परमेश्वर के कर्म नजर आने लगेंगे। कुछ लोगों को लगता है कि उनके आसपास जो भी होता है, उसका परमेश्वर में उनकी आस्था या सत्य से कोई संबंध नहीं है; वे शैतान के फलसफों का उपयोग करते हुए बस अपनी ही पसंद के अनुसार इससे निपटते हैं। क्या इस तरह वे कोई सबक सीख सकते हैं? बिल्कुल नहीं। यही कारण है कि बहुत-से लोग दस या बीस वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते आ रहे हैं, फिर भी वे सत्य को नहीं समझते और उनका कोई जीवन प्रवेश नहीं है। वे परमेश्वर को अपने वास्तविक जीवन में नहीं ला सकते और अपने आसपास होने वाली हर चीज का सामना परमेश्वर के वचनों के आधार पर नहीं कर सकते हैं। परिणामस्वरूप, वे अपने सामने आने वाले सभी मामलों का भेद नहीं पहचान सकते या उन्हें सत्य सिद्धांतों के आधार पर नहीं सँभाल सकते और ऐसे लोगों का कोई जीवन प्रवेश नहीं होता। कुछ लोग सिर्फ सभा में परमेश्वर के वचन पढ़ते हुए अपना दिमाग लगाते हैं; ऐसे अवसरों पर वे थोड़े-बहुत ज्ञान की बात कर सकते हैं, पर वे वास्तविक जीवन में अपने साथ होने वाली किसी भी चीज के साथ परमेश्वर के वचनों को लागू नहीं कर सकते, न ही वे जानते हैं कि सत्य का अभ्यास कैसे करना है, और इसलिए वे सोचते हैं कि उनके दैनिक जीवन में जो कुछ घटता है वह सत्य से जुड़ा नहीं होता, और उसका परमेश्वर के वचनों से कोई संबंध नहीं होता। परमेश्वर में अपनी आस्था में, ऐसा लगता है कि वे परमेश्वर के वचनों और सत्य को सिर्फ ज्ञान का क्षेत्र मानकर चलते हैं, जिसका उनकी रोज की जिंदगी से कोई संबंध नहीं है, और जो उनके विचारों, उनके जीवन के लक्ष्यों और जीवन के अनुसरणों से पूरी तरह कटा हुआ है। परमेश्वर में विश्वास के ऐसे स्वरूप के बारे में क्या? क्या वे सत्य को समझ पाने और वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम होंगे? जब वे परमेश्वर में इस तरह विश्वास करते हैं, तो क्या वे परमेश्वर के अनुयायी हैं? वे परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने वाले लोग नहीं हैं, उनका अनुयायी होना तो दूर की बात है। अपने जीवन की सभी समस्याओं को—इनमें परिवार, शादी, कामकाज या उनकी संभावनाओं से जुड़ा सब कुछ शामिल हैं—वे ऐसी समस्याएँ मानते हैं जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं होता, इसलिए वे इन्हें मानवीय उपायों से सुलझाने की कोशिश करते हैं। इस तरह के अनुभव से वे कभी भी सत्य प्राप्त नहीं कर पाएंगे, कभी भी यह नहीं समझ पाएंगे कि परमेश्वर लोगों में क्या करना चाहता है, और उनमें क्या परिणाम हासिल करना चाहता है। परमेश्वर लोगों को बचाने, उनके भ्रष्ट स्वभाव को शुद्ध करके बदलने के लिए सत्य व्यक्त करता है, पर उन्हें यह पता ही नहीं है कि सिर्फ सत्य को स्वीकार करके और इसका अनुसरण करके ही वे अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान कर सकते हैं; उन्हें पता ही नहीं है कि अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचनों का अनुभव और अभ्यास करके ही वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं। क्या ऐसे लोग मूर्ख और अज्ञानी नहीं हैं? क्या वे सबसे बेवकूफ, हास्यास्पद लोग नहीं हैं? कुछ लोगों ने परमेश्वर में अपनी आस्था में कभी भी सत्य का अनुसरण नहीं किया है। उन्हें लगता है कि परमेश्वर में आस्था का मतलब है सभाओं में भाग लेना, प्रार्थना करना, भजन गाना और परमेश्वर के वचन पढ़ना; वे धार्मिक अनुष्ठानों को काफी महत्व देते हैं और वे कभी परमेश्वर के वचनों का अभ्यास या अनुभव नहीं करते। धार्मिक लोग इसी तरीके से परमेश्वर में विश्वास करते हैं। ये लोग परमेश्वर में विश्वास के बड़े मामले को धार्मिक विश्वास मानने लगते हैं—क्या वे छद्म-विश्वासी नहीं हैं? क्या वे गैर-विश्वासी नहीं हैं? सत्य के अनुसरण के लिए बहुत-सी प्रक्रियाओं का अनुभव करने की जरूरत होती है। इसका एक सरल पक्ष है, और इसका एक जटिल पक्ष भी है। सरल शब्दों में कहें तो हमें पहले अपने आसपास होने वाली हर चीज में सत्य की खोज करनी चाहिए और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास और अनुभव करना चाहिए। फिर तुम अधिक से अधिक यह देखोगे कि तुम्हें परमेश्वर पर अपने विश्वास में कितना अधिक सत्य हासिल करने और उसका अनुसरण करने की जरूरत है; साथ ही, यह कि सत्य बहुत व्यावहारिक है और सत्य ही जीवन है। परमेश्वर मानवजाति को बचाता है ताकि मानवजाति सत्य को जीवन के रूप में प्राप्त कर सके। सारी सृजित मानवजाति को सत्य को जीवन के रूप में स्वीकार करना चाहिए, सिर्फ उन्हें ही नहीं जो अपने कर्तव्यों को करते हैं या जो अगुआ और कार्यकर्ता हैं या जो परमेश्वर की सेवा करते हैं। परमेश्वर के वचन समूची मानवजाति के लिए हैं, और परमेश्वर समूची मानवजाति से बात करता है। इसलिए सभी सृजित प्राणियों—समूची मानवजाति—को परमेश्वर के वचनों और सत्य को स्वीकार करना चाहिए, सभी चीजों में सत्य की खोज करनी चाहिए, और फिर सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, ताकि वे सत्य का अभ्यास और इसके प्रति समर्पण कर सकें। सत्य का अभ्यास अगर सिर्फ अगुआओं और कार्यकर्ताओं से अपेक्षित हो, तो यह परमेश्वर के इरादे के बिल्कुल विपरीत होगा, क्योंकि परमेश्वर द्वारा व्यक्त किया गया सत्य समूची मानवजाति के लिए है, और इसे मानवजाति को बचाने के लिए व्यक्त किया जाता है, न कि सिर्फ कुछ लोगों को बचाने के लिए। अगर ऐसी बात होती तो परमेश्वर द्वारा व्यक्त वचनों का थोड़ा अर्थ ही होता। क्या अब तुम लोगों के पास सत्य के अनुसरण का मार्ग है? सत्य का अनुसरण करते हुए सबसे पहले किस चीज का अभ्यास करना चाहिए? सबसे पहले, तुम्हें परमेश्वर के ज्यादा वचनों को खाना और पीना, ज्यादा धर्मोपदेश और संगति सुनना और जब तुम्हारे सामने कोई समस्या आए, तो ज्यादा प्रार्थना करना और खोजना चाहिए। जब तुम अधिक सत्य से युक्त हो जाओगे, जब तुम लोग तेजी से विकसित होगे और तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद होगा, तो तुम अपने कर्तव्य कर पाओगे, कुछ काम की जिम्मेदारी ले पाओगे और कुछ परीक्षणों और प्रलोभनों के सामने टिके रहने में सक्षम हो जाओगे। उस समय तुम महसूस करोगे कि तुमने वास्तव में कुछ सत्य समझ और पा लिए हैं, और तुम जानोगे कि परमेश्वर द्वारा कहे गए सभी वचन सत्य हैं, वे भ्रष्ट मानवजाति के उद्धार के लिए सबसे आवश्यक सत्य हैं और वे सटीक तौर पर अनूठे सृष्टिकर्ता द्वारा प्रदान किए गए जीवन के सत्य हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य के अनुसरण का महत्व और मार्ग

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 379

अगर परमेश्वर पर विश्वास करते हुए लोग बचाए जाना चाहते हैं, तो मुख्य यह है कि उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है या नहीं, उनके हृदय में परमेश्वर का स्थान है या नहीं और वे परमेश्वर के सामने जीने और उसके साथ सामान्य संबंध बनाए रखने में सक्षम हैं या नहीं। अहम यह है कि लोग सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त करने में सक्षम हैं या नहीं। ये बचाए जाने के मार्ग और शर्तें हैं। अगर तुम्हारा हृदय परमेश्वर के सामने जीने में सक्षम नहीं है, अगर तुम परमेश्वर से अक्सर प्रार्थना और संगति नहीं करते, और परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध खो देते हो, तो तुम कभी बचाए नहीं जाओगे, क्योंकि तुमने उद्धार का मार्ग अवरुद्ध कर दिया है। यदि तुम्हारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है तो तुम विनाश के मार्ग पर चल रहे हो। यदि परमेश्वर तुम्हारे दिल में नहीं है तो महज यह दावा करना कि तुममें आस्था है और नाममात्र के लिए परमेश्वर में विश्वास करना बेकार है। तुम चाहे कितने भी प्रतिभाशाली क्यों न हो, तुम कितने भी शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करने में सक्षम हो या तुमने परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण कितना भी कष्ट क्यों न सहा हो, यह बेकार है। जब तक तुम्हारे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है और तुम परमेश्वर का भय नहीं मानते और सत्य के एक छोटे-से अंश का भी अभ्यास नहीं कर सकते तो तुम परमेश्वर में चाहे जैसे भी विश्वास करो यह बेकार है और परमेश्वर कहता है, “मुझसे दूर हो जाओ, कुकर्मी।” ऐसे व्यक्ति को कुकर्मी के रूप में वर्गीकृत किया जाता है क्योंकि वह सत्य का अभ्यास नहीं कर सकता और उसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है। और इसलिए भले ही तुमने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारा परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है; परमेश्वर कहता है कि तुम एक अविश्वासी और बुरे व्यक्ति हो और वह तुम्हारा प्रभु या तुम्हारा परमेश्वर नहीं है। हालाँकि तुम स्वीकार करते हो कि परमेश्वर सभी पर संप्रभु है, और स्वीकार करते हो कि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, मगर तुम उसकी आराधना नहीं करते, उसकी संप्रभुता के प्रति समर्पित नहीं होते। तुम शैतान और दानवों का अनुसरण करते हो, केवल शैतान और दानव ही तुम्हारे प्रभु हैं। अगर सभी चीजों में तुम खुद पर भरोसा करते हो, और अपनी ही इच्छा का पालन करते हो, अगर तुम मानते हो कि तुम्हारा भाग्य तुम्हारे अपने हाथों में है, तो तुम खुद में ही विश्वास रखते हो। भले ही तुम परमेश्वर पर विश्वास करने और उसे स्वीकार करने का दावा करते हो, मगर परमेश्वर तुम्हें स्वीकार नहीं करता। तुम्हारा परमेश्वर के साथ कोई संबंध नहीं है, और इसलिए तुम अंततः परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत किए जाने, दंडित किए जाने, और उसके द्वारा निकाल दिए जाने के लिए नियत हो; परमेश्वर तुम जैसे लोगों को नहीं बचाता। परमेश्वर में वास्तव में विश्वास करने वाले वही लोग होते हैं, जो परमेश्वर को उद्धारकर्ता के रूप में स्वीकार करते हैं, जो यह स्वीकार करते हैं कि वह सत्य, मार्ग और जीवन है और जो उसके लिए खुद को ईमानदारी से खपाने और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य करने में सक्षम होते हैं। जो वे अनुभव करते हैं वह परमेश्वर का कार्य है; वे जिसका अभ्यास करते हैं वह उसके वचन और सत्य हैं; और वे जिस मार्ग पर चलते हैं वह सत्य का अनुसरण करने का मार्ग है। वे ऐसे लोग होते हैं जो परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करते हैं, और जो परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलते हैं। केवल इस तरह परमेश्वर में विश्वास करके ही कोई बचाया जा सकता है; यदि नहीं तो उसे दोषी ठहराया जाएगा। यदि परमेश्वर में अपने विश्वास में लोग खयाली पुलाव पकाते हैं और हमेशा अपनी धारणाओं और अस्पष्ट कल्पनाओं से चिपके रहते हैं तो क्या वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं? क्या वे अंततः उद्धार प्राप्त कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं तो उन्हें अवश्य परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना चाहिए, उन्हें सत्य को अवश्य स्वीकार करना चाहिए, उसकी अपेक्षाओं के अनुसार उसमें विश्वास करना चाहिए और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में सक्षम होना चाहिए, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण हासिल करना चाहिए; केवल तभी वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। तुम जो कुछ भी करो तुम्हें खयाली पुलाव नहीं पकाना चाहिए और केवल आशीष पाने के लिए परमेश्वर में विश्वास नहीं करना चाहिए; यह परमेश्वर को धोखा देना और उसके साथ सौदेबाजी करना है और यह तुम्हें केवल बर्बाद करेगा। इस विषय पर संगति करना लोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, है न? यह तुम लोगों के लिए एक चेतावनी है।

अब जबकि तुम लोगों ने ये शब्द सुन लिए हैं, तो तुम्हें सत्य समझ जाना चाहिए और इस बारे में स्पष्ट होना चाहिए कि उद्धार में क्या शामिल है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि लोग क्या पसंद करते हैं, किस चीज के लिए प्रयास करते हैं, किस चीज के प्रति जुनूनी होते हैं, इनमें से कुछ भी महत्वपूर्ण नहीं है। जो सबसे महत्वपूर्ण है, वह है सत्य स्वीकारना। अंतिम विश्लेषण में, सत्य प्राप्त करने में सक्षम होना सबसे महत्वपूर्ण है और सही मार्ग वह है जो तुम्हें परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने दे सकता है। अगर तुमने कई वर्षों से परमेश्वर पर विश्वास किया है और हमेशा उन चीजों की खोज पर ध्यान केंद्रित किया है जिनका सत्य से कोई संबंध नहीं, तो तुम्हारी आस्था का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, परमेश्वर से कोई लेना-देना नहीं है। तुम परमेश्वर में विश्वास करने और मौखिक रूप से उसे स्वीकार करने का दावा कर सकते हो, लेकिन परमेश्वर तुम्हारा प्रभु नहीं है, वह तुम्हारा परमेश्वर नहीं है; तुम अपने भाग्य पर परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकार नहीं करते, तुम उन सबके प्रति समर्पित नहीं होते जिनका परमेश्वर तुम्हारे लिए आयोजन करता है, तुम यह तथ्य स्वीकार नहीं करते कि परमेश्वर सत्य है। इस स्थिति में तुम्हारी उद्धार की आशा चूर-चूर हो गई है। अगर तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू नहीं करते हो, तो तुम विनाश के मार्ग पर चलते हो। अगर हर वह चीज, जिसका तुम अनुसरण करते हो, जिस पर ध्यान केंद्रित करते हो, जिसके बारे में प्रार्थना करते हो, और जिसके लिए अपील करते हो, परमेश्वर के वचनों और उसकी अपेक्षाओं पर आधारित है, और अगर तुम्हें अधिकाधिक यह लगता है कि तुम सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण कर रहे हो और उसकी आराधना कर रहे हो, और महसूस करते हो कि परमेश्वर तुम्हारा प्रभु, तुम्हारा परमेश्वर है, अगर तुम उन सबके प्रति समर्पण करने में अधिकाधिक प्रसन्न होते हो जिनका परमेश्वर तुम्हारे लिए आयोजन और व्यवस्था करता है, और परमेश्वर के साथ तुम्हारा रिश्ता पहले से ज्यादा घनिष्ठ, ज्यादा सामान्य होता है, और अगर परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम और अधिक शुद्ध और सच्चा होता है, तो परमेश्वर के बारे में तुम्हारी शिकायतें और गलतफहमियाँ, और परमेश्वर के प्रति तुम्हारी अत्यधिक इच्छाएँ हमेशा कम होती जाएँगी, और तुम पूरी तरह से परमेश्वर का भय मानने लगोगे और बुराई से दूर हो जाओगे, जिसका अर्थ है कि तुम पहले से ही उद्धार के मार्ग पर कदम रख चुके होगे। हालाँकि उद्धार के मार्ग पर चलना परमेश्वर के अनुशासन, काट-छाँट, न्याय और ताड़ना के साथ आता है, और इनके कारण तुम्हें बहुत पीड़ा होती है, लेकिन यह परमेश्वर का प्रेम है जो तुम पर आ रहा है। यदि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम केवल आशीष, रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ का अनुसरण करते हो और तुम्हें कभी अनुशासित किया, काटा-छाँटा नहीं जाता या तुम्हारा न्याय किया और ताड़ना दी नहीं जाती—आराम का जीवन जीने के बावजूद तुम्हारा दिल परमेश्वर से अधिकाधिक दूर होता जाता है, तुम परमेश्वर के साथ अपना सामान्य संबंध खो देते हो और तुम परमेश्वर की पड़ताल को स्वीकार करने के अनिच्छुक होते हो, अपना खुद का स्वामी बनना चाहते हो—यह सब साबित करता है कि तुम जिस मार्ग पर चलते हो वह सही मार्ग नहीं है। अगर तुम कुछ समय तक परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हो और तुम्हें इसका अधिकाधिक एहसास होता है कि मानवजाति कितनी गहराई तक भ्रष्ट और परमेश्वर का विरोध करने में कितनी प्रवृत्त है, और अगर तुम इस बात से डरते हो कि शायद किसी दिन तुम कुछ ऐसा कर दोगे जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है और परमेश्वर को नाराज करता है और तुम उसके द्वारा त्याग दिए जाओगे, और इस तरह तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का प्रतिरोध करने से ज्यादा भयानक कुछ नहीं है, तो तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होगा। तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर में विश्वास रखते समय लोगों को परमेश्वर से भटकना नहीं चाहिए; अगर वे उससे भटक जाते हैं, अगर वे उसके अनुशासन से, उसके न्याय और ताड़ना से भटक जाते हैं, तो यह परमेश्वर की सुरक्षा और देखभाल खोने के बराबर है, परमेश्वर के आशीष खोने के बराबर है, और यह लोगों के लिए सब कुछ खत्म हो जाना है; वे केवल और अधिक भ्रष्ट ही हो सकते हैं, और वे उसमें विश्वास करते हुए परमेश्वर का प्रतिरोध करने में समर्थ होंगे जैसे धार्मिक जगत के लोग करते हैं—और इससे वे मसीह-विरोधी बन गए होंगे। अगर तुम इसे महसूस कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे, “परमेश्वर! कृपया मेरा न्याय करो और मुझे ताड़ना दो। मैं विनती करता हूँ कि मैं जो कुछ भी करूँ, उसमें तुम मेरी पड़ताल करो। अगर मैं कुछ ऐसा करूँ, जो सत्य का उल्लंघन करता हो, जो तुम्हारे इरादों के विरुद्ध जाता हो, तो मेरा गंभीर रूप से न्याय कर मुझे ताड़ना दो—मैं तुम्हारे न्याय और ताड़ना के बिना नहीं रह सकता।” यह सही मार्ग है, जिस पर लोगों को परमेश्वर में अपनी आस्था में चलना चाहिए। तो इस मानक के अनुसार मापो : क्या तुम लोग यह कहने की हिम्मत करते हो कि तुमने उद्धार के मार्ग पर कदम रख दिया है? तुम लोग हिम्मत नहीं कर सकते, क्योंकि तुम अभी तक सत्य का अनुसरण करनेवाले लोगों में से एक नहीं बने हो, कई चीजों में तुम सत्य नहीं खोजते, और तुम काट-छाँट स्वीकार कर उनके प्रति समर्पित होने में समर्थ नहीं हो—जो साबित करता है कि तुम लोग उद्धार के मार्ग पर चलने से बहुत दूर हो। अगर तुम सत्य का अनुसरण करने वाले व्यक्ति नहीं हो, तो क्या उद्धार के मार्ग पर कदम रखना आसान है? दरअसल, यह आसान नहीं है। अगर लोगों ने परमेश्वर के न्याय और ताड़ना का अनुभव नहीं किया है, अगर उन्होंने परमेश्वर के अनुशासन, ताड़ना और काट-छाँट का अनुभव नहीं किया है, तो उनके लिए सत्य का अनुसरण करने वाला इंसान बनना आसान नहीं है, और नतीजतन उनके लिए उद्धार की राह पर कदम रखना बहुत मुश्किल है। अगर ये शब्द सुनने के बाद तुम जान जाते हो कि ये सत्य हैं, फिर भी तुमने अभी तक सत्य का अनुसरण करके उद्धार प्राप्त करने के मार्ग पर कदम नहीं रखा है, तुम इसे कोई गंभीर चीज नहीं समझते, और महसूस करते हो कि देर-सबेर वह दिन आएगा जब तुम इसे कर लोगे—जल्दी क्या है—तो यह कैसा दृष्टिकोण है? ऐसा दृष्टिकोण रखने से तुम मुश्किल में हो, तुम्हें उद्धार के मार्ग पर कदम रखने में कठिनाई होगी। तो इस मार्ग पर कदम रखने में सक्षम होने के लिए तुम्हारे पास किस तरह का संकल्प होना चाहिए? तुम्हें कहना चाहिए, “आह! अभी मैंने उद्धार के मार्ग पर कदम नहीं रखा—यह बहुत खतरनाक है! परमेश्वर कहता है कि लोगों को हर समय उसके सामने जीना चाहिए, अधिक प्रार्थना करनी चाहिए, और उनके दिल शांत होने चाहिए, उतावले नहीं—इसलिए मुझे यह सब अभी से अभ्यास में लाना शुरू कर देना चाहिए।” इस तरह से अभ्यास करना परमेश्वर में आस्था के सही रास्ते पर प्रवेश करना है; यह इतना सरल है। वे किस तरह के लोग होते हैं, जो परमेश्वर के वचन सुनते हैं, फिर उन्हें अमल में लाते हैं? क्या वे अच्छे लोग होते हैं? वे अच्छे लोग होते हैं—वे ऐसे लोग होते हैं, जो सत्य से प्रेम करते हैं। वे किस तरह के इंसान होते हैं, जो परमेश्वर के वचन सुनने के बाद सुन्न, उदासीन, जिद्दी बने रहते हैं—जो परमेश्वर के वचनों को हल्के में लेते हैं, और अनसुनी कर आँखें फेर लेते हैं? क्या वे भ्रमित नहीं हैं? लोग हमेशा पूछते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखते समय क्या बचाए जाने का कोई छोटा रास्ता है। मैं तुम्हें बताता हूँ कि कोई छोटा रास्ता नहीं है, और फिर मैं तुम लोगों को इस सरल मार्ग के बारे में बताता हूँ, लेकिन इसे सुनने के बाद तुम लोग इसे अमल में नहीं लाते—जो किसी अच्छी चीज के बारे में सुनकर भी उसे न पहचानने का मामला है। क्या ऐसे लोग बचाए जा सकते हैं? उनके लिए थोड़ी आशा हो, तो भी अधिक नहीं है; उद्धार बहुत कठिन होगा। हो सकता है एक दिन वे नींद से जागें, और मन-ही-मन सोचें, “मैं अब जवान नहीं रहा, और इन तमाम वर्षों में परमेश्वर में विश्वास रखते हुए मैंने अपने उचित कर्तव्य नहीं निभाए। परमेश्वर अपेक्षा रखता है कि लोग हर समय उसके सामने जियें, और मैं परमेश्वर के सामने नहीं जिया। मुझे जल्दी से प्रार्थना करनी चाहिए।” अगर वे अपने दिल से होश में आ जाएँ और अपने उचित कर्तव्य निभाना शुरू कर दें, तो बहुत देर नहीं हुई। लेकिन इसमें बहुत देर न करो; अगर तुम लोग सत्तर-अस्सी साल के होने की प्रतीक्षा करते हो, और तुम्हारा शरीर जवाब देने लगता है, तुममें कोई ऊर्जा नहीं बचती, तो क्या सत्य का अनुसरण करने में बहुत देर नहीं हो जाएगी? अगर तुम लोग अपने जीवन के सर्वश्रेष्ठ वर्ष व्यर्थ की बातों में बिता देते हो, और सत्य की खोज टाल देते हो या उससे चूक जाते हो, जोकि सबसे महत्वपूर्ण चीज है, तो क्या यह अत्यंत मूर्खतापूर्ण नहीं है? क्या इससे बढ़कर भी कोई मूर्खता है? बहुत-से लोग सच्चे मार्ग से अच्छी तरह परिचित हैं और फिर भी उसे स्वीकारने और उसका अनुसरण करने के लिए भविष्य की प्रतीक्षा करते हैं—वे सब मूर्ख हैं। वे नहीं जानते कि जीवन पाने से पहले सत्य के अनुसरण के लिए दशकों तक प्रयास करना पड़ता है। अगर वे बचाए जाने का सबसे अच्छा समय गँवा देते हैं, तो पछताने में बहुत देर हो जाएगी!

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर का भय मानकर ही इंसान उद्धार के मार्ग पर चल सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 380

कलीसिया का अगुआ होने के नाते तुम्‍हें समस्याएँ सुलझाने के लिए केवल सत्य का प्रयोग सीखने की आवश्‍यकता ही नहीं है, बल्कि प्रतिभाशाली लोगों का पता लगाने और उन्‍हें विकसित करना सीखने की आवश्‍यकता भी है, जिनसे तुम्‍हें बिल्कुल ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए या जिनका बिल्कुल दमन नहीं करना चाहिए। इस तरह अभ्यास करना कलीसिया के कार्य के लिए लाभकारी है। अगर तुम अपने साथ सहयोग करने और हर एक काम अच्छे से करने के लिए सत्य का अनुसरण करने वाले कुछ लोगों को विकसित कर सकते हो और अंत में उन सबके पास अनुभवजन्‍य गवाहियाँ होती हैं तो फिर तुम एक मानक स्तर के अगुआ या कार्यकर्ता हो। यदि तुम हर चीज सिद्धांतों के अनुसार सँभाल सको, तो तुम समर्पित इंसान हो। कुछ लोग हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनसे बेहतर और ऊपर हैं, अन्‍य लोगों को पहचान मिलेगी, जबकि उन्हें अनदेखा किया जाएगा, और इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या यह स्‍वार्थपूर्ण और घृणित नहीं है? यह कैसा स्वभाव है? यह एक क्रूर स्वभाव है। जो लोग दूसरों के बारे में सोचे बिना या परमेश्वर के घर के हितों को ध्‍यान में रखे बिना केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं, जो केवल अपनी स्‍वार्थपूर्ण इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं, वे बुरे स्वभाव वाले होते हैं और परमेश्वर उन्हें पसंद नहीं करता। अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने में वाकई समर्थ हो तो तुम दूसरे लोगों से निष्पक्ष ढंग से पेश आने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी अच्छे व्यक्ति की सिफारिश करते हो और उसे प्रशिक्षित होने और कोई कर्तव्य निर्वहन करने देते हो, और इस तरह एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को परमेश्वर के घर में शामिल करते हो, तो क्या उससे तुम्‍हारा काम और आसान नहीं हो जाएगा? तब क्या तुम अपने कर्तव्‍य में समर्पित नहीं होगे? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है; यह वह न्यूनतम अंतरात्मा और विवेक है जो अगुआ के रूप में कार्य करने वालों के पास होना चाहिए। जो लोग सत्य को अभ्‍यास में लाने में समर्थ हैं वे जो चीजें करते हैं उनमें परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं। जब तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करते हो तो तुम्‍हारा हृदय सही हो जाएगा। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही चीजें करते हो और हमेशा दूसरों की प्रशंसा और सराहना प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते हो तो क्या तब भी परमेश्वर तुम्‍हारे हृदय में है? ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्‍हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्‍हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्‍हारे कर्तव्‍य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य और कलीसिया के कार्य पर पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्‍हें इन चीजों के बारे में अवश्‍य विचार करना चाहिए। अगर तुम इन पर बार-बार विचार करते हो और इन्हें समझ लेते हो, तो तुम्‍हारे लिए अपना कर्तव्‍य अच्‍छी तरह से निभाना आसान हो जाएगा। अकेला अपवाद यह है कि अगर तुम्‍हारी काबिलियत खराब है या तुम्‍हारा अनुभव उथला है या तुम अपने पेशेवर कार्य में पर्याप्त रूप से दक्ष नहीं हो और नतीजतन तुम्‍हारे कार्य में कुछ गलतियाँ या कमियाँ पैदा होती हैं, और यह अच्‍छे परिणाम मिलने से रोकता है, पर तुम पहले ही अपना सर्वश्रेष्‍ठ कर रहे हो। तुम अपनी स्‍वार्थपूर्ण इच्छाओं या पसंद को संतुष्ट करने के लिए कार्य नहीं कर रहे। इसके बजाय, तुम हर मामले में कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के घर के हितों पर विचार कर रहे हो। यूँ तो हो सकता है कि तुम अपने कर्तव्‍य में अच्छे नतीजे प्राप्त न कर रहे हो, तुम्‍हारा हृदय सही दशा में है; इसके अलावा अगर तुम अपने कर्तव्य में समस्याओं का समाधान करने के लिए सत्य खोजने में समर्थ हो तो तुम अपने कर्तव्‍य निर्वहन में मानक स्तर के होओगे और साथ ही तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे। तब तुम्हारे पास गवाही होगी।

कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास तो करते हैं, लेकिन सत्य का अनुसरण नहीं करते। वे हमेशा देह के अनुसार जीते हैं, दैहिक सुखों के लिए ललचाते हैं, हमेशा अपनी स्वार्थपूर्ण कामनाओं को संतुष्ट करते हैं। वे चाहे कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करें, वे कभी भी सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं करेंगे। यह परमेश्वर का अनादर करने का संकेत है। तुम कहते हो, “मैंने परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला कोई काम नहीं किया। मैंने उसका अनादर कैसे कर दिया?” तुम्‍हारे सभी विचार और सोच दुष्टतापूर्ण हैं। तुम जो करते हो उसके पीछे की मंशाएँ, लक्ष्‍य और गुप्त उद्देश्‍य और तुम्‍हारे क्रियाकलापों के परिणाम सभी शैतान को संतुष्‍ट करते हैं, तुम्हें उपहास का पात्र बनाते हैं और उसे तुम्हारी कमजोरी लपकने देते हैं। तुमने एक भी गवाही नहीं दी है जो एक ईसाई को देनी चाहिए। तुम शैतान के हो। तुम सभी चीजों में परमेश्वर के नाम का अनादर करते हो और तुम्‍हारे पास सच्ची गवाही नहीं है। क्या परमेश्वर तुम्‍हारे द्वारा किए गए कृत्यों को याद रखेगा? अंत में परमेश्वर तुम्‍हारे सभी क्रियाकलापों, व्‍यवहार और उन कर्तव्‍यों के बारे में क्या निष्कर्ष निकालेगा जो तुम कर चुके हो? क्या उसका कोई नतीजा नहीं निकलना चाहिए, किसी प्रकार का कोई वक्तव्य नहीं आना चाहिए? बाइबल में, प्रभु यीशु कहता है, “उस दिन बहुत-से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्‍टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत-से आश्‍चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:22-23)। प्रभु यीशु ने ऐसा क्यों कहा? धर्मोपदेश देने, दुष्टात्माओं को निकालने और प्रभु के नाम पर इतने चमत्कार करने वालों में से इतने सारे लोग कुकर्मी क्यों हो गए? इसका कारण यह था कि उन्होंने प्रभु यीशु द्वारा व्यक्त किए गए सत्‍यों को स्वीकार नहीं किया, उन्‍होंने उसकी आज्ञाओं का पालन नहीं किया, और सत्य के लिए उनके दिल में कोई प्रेम नहीं था। वे सिर्फ प्रभु के लिए किए गए अपने काम, उठाए गए कष्टों और त्यागों के बदले में स्वर्ग के राज्य के आशीष चाहते थे। ऐसा करके, वे परमेश्वर के साथ एक सौदा करने की कोशिश कर रहे थे, और वे परमेश्वर का इस्तेमाल करने और परमेश्वर को धोखा देने की कोशिश कर रहे थे, इसलिए प्रभु यीशु उनसे विमुख होता था, उनसे घृणा करता था और उनकी कुकर्मियों के रूप में निंदा करता था। आज लोग परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार कर रहे हैं, लेकिन कुछ अब भी नाम और रुतबे के पीछे भागते हैं, और हमेशा विशिष्ट दिखना चाहते हैं; हमेशा अगुआ और कार्यकर्ता बनना चाहते हैं ताकि वे नाम और रुतबा पा सकें और इस प्रकार रुतबे के लाभ का आनंद ले सकें। हालाँकि वे सभी कहते हैं कि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसका अनुसरण करते हैं, और वे परमेश्वर के लिए चीजों को छोड़ देते हैं और खपते हैं, पर वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा पाने के लिए ही अपने कर्तव्य का निर्वहन करते हैं और उनकी अपनी चालें हमेशा रहती हैं। वे परमेश्वर के प्रति समर्पित या वफादार नहीं हैं, वे थोड़ा भी आत्मचिंतन किए बिना अनियंत्रित रूप से बुरी चीजें कर सकते हैं, इसलिए वे कुकर्मी बन जाते हैं। परमेश्वर इन बुरे लोगों से घृणा करता है, और बुरे लोगों को बचाता नहीं है। वह मानक क्या है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति के कर्मों को अच्छे या बुरे के रूप में आँका जाता है? वह यह है कि वह अपने विचारों, खुलासों और क्रियाकलापों में सत्य को अभ्यास में लाने और सत्य वास्तविकता को जीने की गवाही रखता है या नहीं। यदि तुम्‍हारे पास यह वास्तविकता नहीं है या तुम इसे नहीं जीते, तो बेशक, तुम एक कुकर्मी हो। परमेश्वर कुकर्मियों को कैसे देखता है? परमेश्वर की नजर में, तुम्हारे विचार और बाहरी क्रियाकलाप परमेश्वर की गवाही नहीं देते हैं, न ही वे शैतान को शर्मिंदा करते या हराते हैं; बल्कि वे परमेश्वर का अनादर करते हैं और उसका अनादर करने के निशानों से भरे हुए हैं। तुम परमेश्वर की गवाही नहीं दे रहे हो, न ही तुम खुद को परमेश्वर के लिए खपा रहे हो, तुम परमेश्वर की खातिर अपनी जिम्मेदारियों और दायित्वों को भी पूरा नहीं कर रहे हो; बल्कि केवल अपनी खातिर कार्य कर रहे हो। “केवल अपनी खातिर” का क्या मतलब है? इसका सही-सही मतलब है, शैतान की खातिर। इसलिए अंत में परमेश्वर यही कहेगा, “हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ।” परमेश्वर की नजर में तुम्‍हारे कार्यों को अच्‍छे कर्मों के रूप में नहीं देखा जाएगा, बल्कि उन्‍हें बुरे कर्म माना जाएगा। उन्‍हें न केवल परमेश्वर की स्वीकृति हासिल नहीं होगी—बल्कि उनकी निंदा भी की जाएगी। परमेश्वर में ऐसे विश्‍वास से कोई क्‍या हासिल करने की आशा कर सकता है? क्या इस तरह का विश्‍वास अंततः व्‍यर्थ नहीं हो जाएगा?

अपने कर्तव्य को निभाने वाले सभी लोगों के लिए, चाहे सत्य को लेकर उनकी समझ कितनी भी उथली या गहरी क्यों न हो, सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का सबसे सरल अभ्यास यह है कि हर मोड़ पर परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचा जाए, अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, व्यक्तिगत मंशाओं, गुप्त उद्देश्यों, गौरव और रुतबे का त्याग किया जाए और परमेश्वर के घर के हितों को सबसे आगे रखा जाए—कम से कम इतना तो उन्हें करना ही चाहिए। अपना कर्तव्य निभाने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य निभाने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपना कर्तव्य निभाना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों के बारे में सोचना चाहिए, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और कलीसिया के कार्य का ध्यान रखना चाहिए। इन चीजों को पहले स्थान पर रखना चाहिए; उसके बाद ही तुम अपने रुतबे की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्‍हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता कर सकते हो। इसे दो चरणों में बाँटो, थोड़ा-सा समझौता कर लो—क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि इससे चीजें थोड़ी आसान हो जाती हैं? यदि तुम कुछ समय तक इस तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हें महसूस होने लगेगा कि परमेश्वर को संतुष्ट करना कोई मुश्किल काम नहीं है। इसके अलावा, यदि तुम अपनी जिम्मेदारियों को पूरा कर सकते हो; अपने दायित्वों और कर्तव्य को पूरा कर सकते हो; अपनी स्वार्थपूर्ण इच्छाओं, मंशाओं और गुप्त उद्देश्यों को एक तरफ रख सकते हो; परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो; और परमेश्वर के घर के हितों, कलीसिया के कार्य और उस कर्तव्य को जिसे तुम्हें निभाना चाहिए, सबसे पहले रख सकते हो, तो कुछ समय तक इस तरह अनुभव करने के बाद, तुम्हें महसूस होगा कि इस तरह से आचरण करना अच्छा है, लोगों को ईमानदारी और स्पष्टवादिता से जीना चाहिए और उन्हें नैतिक साहस से विहीन, घिनौना, नीच अस्तित्व नहीं जीना चाहिए, बल्कि उन्हें ईमानदार और न्यायसंगत होना चाहिए। तुम्हें महसूस होगा कि यही वह छवि है जिसे व्यक्ति को जीना चाहिए। धीरे-धीरे, अपने हितों को तुष्‍ट करने की तुम्‍हारी इच्छा घटती चली जाएगी। इस समय, भले ही तुम लोग कितने ही वर्षों से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हो, लेकिन सत्य का अनुसरण करने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश से संबंधित सबकों में तुम्‍हारे प्रवेश और अनुभव में गहराई की कमी है, और तुम्हें उनका कोई सच्चा अनुभव नहीं है, इसलिए तुम सच्ची गवाही नहीं दे सकते। अब मैंने तुम लोगों को यह सरल-सा तरीका बता दिया है : इस तरह के अभ्‍यास के साथ शुरुआत करो, और जब एक बार तुम कुछ समय तक ऐसा कर लोगे, तो तुम लोगों की आंतरिक अवस्‍था बदलने लगेगी और तुम्‍हें पता भी नहीं चलेगा। यह उस दुविधापूर्ण अवस्‍था, जिसमें तुम न तो परमेश्वर में विश्‍वास करने में बहुत अधिक रुचि रखते हो और न ही उस अवस्‍था से बहुत अधिक विमुख होते हो, से उस अवस्‍था में बदल जाएगी जिसमें तुम्‍हें लगेगा कि परमेश्वर में विश्‍वास करना और एक ईमानदार इंसान होना अच्‍छी चीजें हैं, और जिसमें एक ईमानदार इंसान होने में तुम्‍हारी रुचि होगी और तुम्‍हें लगेगा कि इस तरह जीवन जीना अर्थपूर्ण और पुष्टिकर है। तुम स्थिर, शान्‍त और अपने हृदय में आनंद महसूस करोगे। तुम इस अवस्‍था में आ जाओगे। अपनी मंशाओं, हितों और स्‍वार्थपूर्ण इच्‍छाओं को छोड़ देने पर यह परिणाम प्राप्‍त होता है। यह उसका परिणाम है। यह आंशिक रूप से मानवीय सहयोग का नतीजा है और आंशिक रूप से पवित्र आत्‍मा के कार्य का नतीजा है। पवित्र आत्मा लोगों के सहयोग के बिना कार्य नहीं करेगा।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 381

स्वभाव में परिवर्तन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो? स्वभाव में परिवर्तन सार रूप में व्यवहार में परिवर्तन से भिन्न हैं, और वे अभ्यास में परिवर्तन के मामले में भी अलग हैं—सार में वे सभी अलग-अलग हैं। अधिकांश लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में व्यवहार पर विशेष जोर देते हैं और परिणामस्वरूप उनके व्यवहार में कुछ निश्चित परिवर्तन आते हैं। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद वे धूम्रपान और मदिरापान बंद कर देते हैं और वे दूसरों से होड़ नहीं करते और नुकसान होने पर भी सहन करना पसंद करते हैं। उनमें कुछ व्यवहार संबंधी परिवर्तन आते हैं। कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने के बाद परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, कुछ सत्य को समझते हैं, पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करते हैं और अपने हृदय में बहुत आनंद महसूस करते हैं और इस प्रकार परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के इच्छुक होते हैं और यहाँ तक कि कुछ भी त्यागने और कोई भी कष्ट सहने में सक्षम होते हैं। लेकिन यदि कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद लोग लगातार सत्य का अनुसरण करने में विफल रहते हैं तो उनके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन न होने के कारण वे अनिवार्य रूप से वही पुरानी गलतियाँ करते रहते हैं। वे न केवल अपने शैतानी स्वभाव को त्यागने में विफल रहते हैं बल्कि यह और भी बदतर हो जाता है। वे सत्ता और लाभ के लिए होड़ करने के लिए अपनी वरिष्ठता पर भरोसा करते हैं, वे कलीसिया के धन का लालच करते हैं और जब भी वे किसी और को परमेश्वर के घर का लाभ उठाते देखते हैं तो वे ईर्ष्या करते हैं, बस अपने लिए अधिक लाभ हासिल करने की उम्मीद करते हैं—वे परमेश्वर के घर के भीतर परजीवी और कीड़े बन जाते हैं। परिणामस्वरूप कुछ लोग नकली अगुआ और मसीह-विरोधी बन जाते हैं और उन्हें प्रकट किया जाता है और हटा दिया जाता है। और ये तथ्य क्या साबित करते हैं? केवल व्यवहार संबंधी परिवर्तन टिकाऊ नहीं हैं; यदि लोगों के जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता है तो देर-सबेर वे अपना असली रंग दिखा देंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यवहार संबंधी परिवर्तनों का स्रोत उत्साह है और इसके अलावा पवित्र आत्मा इस समय कुछ कार्य कर रहा है और इसलिए लोगों के लिए उत्साही होना या थोड़े समय के लिए कुछ दयालुता प्रदर्शित करना बेहद आसान हो जाता है। जैसा कि अविश्वासी लोग कहते हैं, “एक अच्छी चीज करना आसान है; मुश्किल तो जीवन भर अच्छी चीजें करते रहना है।” लोग अपने पूरे जीवन भर अच्छी चीजें करने में अक्षम क्यों हैं? क्योंकि प्रकृति से लोग दुष्ट, स्वार्थी और भ्रष्ट होते हैं। किसी व्यक्ति का व्यवहार उसकी प्रकृति से निर्देशित होता है; उस व्यक्ति की प्रकृति जो भी हो, वैसे ही उसके स्वाभाविक प्रकटन होते हैं और केवल वही जो वे स्वाभाविक रूप से प्रकट करते हैं, वे उनकी प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं। दिखावा टिक नहीं सकता। जब परमेश्वर मनुष्य को बचाने के लिए कार्य करता है, तो यह मनुष्य को अच्छे व्यवहार से सजाने के लिए नहीं होता—परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य लोगों के स्वभाव को बदलना है, उन्हें उनकी हड्डियों तक बदलना है और उन्हें नए लोगों में बदलना है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन सभी उसके स्वभाव को बदलने का काम करते हैं ताकि वह परमेश्वर के प्रति समर्पण और वफादारी प्राप्त कर सके और वास्तव में उसकी आराधना कर सके। यह वह परिणाम है जिसे परमेश्वर अपने कार्य में प्राप्त करना चाहता है और यह परमेश्वर के कार्य का उद्देश्य भी है। अच्छी तरह से व्यवहार करना परमेश्वर के प्रति समर्पित होने के समान नहीं है, और यह मसीह के अनुरूप होने के बराबर तो और भी नहीं है। व्यवहार में परिवर्तन सिद्धांत पर आधारित होते हैं, और उत्साह से पैदा होते हैं; वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान पर या सत्य पर आधारित नहीं होते हैं, पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन पर आश्रित होना तो दूर की बात है। यद्यपि ऐसे मौके होते हैं जब लोगों को पवित्र आत्मा का थोड़ा-बहुत प्रबोधन और मार्गदर्शन मिलता है, यह उनके जीवन का खुलासा नहीं है। उन्होंने अभी तक सत्य वास्तविकताओं में प्रवेश नहीं किया है और उनके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं आया है। चाहे किसी व्यक्ति का व्यवहार कितना भी अच्छा हो, इससे यह साबित नहीं होता कि वह परमेश्वर के प्रति समर्पण करता है या वह सत्य का अभ्यास करता है। व्यवहार संबंधी बदलावों का मतलब यह नहीं है कि जीवन स्वभाव में परिवर्तन आ गया और इन्हें जीवन के खुलासे नहीं माना जा सकता है।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 382

चाहे कोई व्यक्ति कितने ही अच्छे कर्म क्यों न करे, इसका मतलब यह नहीं है कि उसमें सत्य वास्तविकताएँ हैं। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है सत्य का अभ्यास करना और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। सत्य वास्तविकता के होने का अर्थ है परमेश्वर का भय मानना और बुराई से दूर रहना। ऐसे लोग होते हैं जो उत्साही होते हैं, वे सिद्धांत बोल सकते हैं, विनियमों का पालन करते हैं और कई अच्छी चीजें करते हैं, लेकिन उनके बारे में इतना ही कहा जा सकता है कि उनमें थोड़ी-सी मानवता है। यह जरूरी नहीं कि जो लोग सिद्धांत बोल सकते हों और हमेशा विनियमों का पालन करते हों, वे सत्य का अभ्यास भी करते हों। भले ही वे जो कुछ कहते हैं वह सही होता है और ऐसा लगता है यह समस्या-मुक्त है, लेकिन सत्य के सार से संबंधित मामलों में उनके पास कहने को कुछ नहीं होता। इसलिए, कोई कितने भी सिद्धांत बोले, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे सत्य की समझ है, वह चाहे कितना भी सिद्धांत समझता हो, कोई समस्या नहीं सुलझा सकता। धार्मिक सिद्धांतकार बाइबल की व्याख्या कर सकते हैं, लेकिन अंत में, उन सभी का पतन हो जाता है, क्योंकि वे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किसी भी सत्य को नहीं स्वीकारते। जिन लोगों ने अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव किया है, वे अलग हैं; उन्होंने सत्य समझ लिया है, वे सभी मुद्दों पर विवेकी होते हैं, वे जानते हैं कि कैसे परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना है, कैसे सत्य सिद्धांत के अनुसार कार्य करना है, कैसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए कार्य करना है, और वे उस भ्रष्टता की प्रकृति को समझते हैं जो उनसे प्रकट होती है। जब उनके अपने विचार और धारणाएँ प्रकट होती हैं, तो वे विवेकी बन सकते और देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हैं। स्वभाव में परिवर्तन इसी तरह से दिखता है। जिन लोगों का स्वभाव बदल चुका है, उनकी मुख्य अभिव्यक्ति यह है कि उन्होंने सत्य को स्पष्ट रूप से समझ लिया है और कार्य करते समय तो वे काफी सटीकता के साथ सत्य का अभ्यास करते हैं और वे अक्सर भ्रष्टता प्रकट नहीं करते। आम तौर पर, जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे खासकर तर्कसंगत और विवेकपूर्ण प्रतीत होते हैं, और सत्य की अपनी समझ के कारण, वे उतनी आत्मतुष्टता और अहंकार प्रकट नहीं करते। वे अपनी प्रकट हुई ज्यादातर भ्रष्टता की असलियत जान लेते हैं और उसका भेद पहचान लेते हैं, इसलिए उनमें अभिमान उत्पन्न नहीं होता। उन्हें कौन-सा स्थान लेना चाहिए, विवेकयुक्त व्यक्ति समझा जाने के लिए उन्हें क्या करना चाहिए, अपने कर्तव्यों का पालन कैसे करना चाहिए, क्या कहना और क्या नहीं कहना चाहिए, और किन लोगों से क्या कहना और क्या करना चाहिए—इस बारे में उन्हें एक विवेकपूर्ण समझ होती है। इस प्रकार जिन लोगों का स्वभाव बदल गया है, वे अपेक्षाकृत विवेकी होते हैं और सही मायनों में ऐसे लोग ही मानव के समान जीवन जीते हैं। क्योंकि उन्हें सत्य की समझ होती है, वे सत्य के अनुरूप बोलने और मामलों को देखने में समर्थ होते हैं और वे जो भी करते हैं, उसमें सिद्धांत का पालन करते हैं; वे किसी व्यक्ति, घटना या चीज़ के प्रभाव में नहीं होते, उनका अपना दृष्टिकोण होता है और वे सत्य सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं। उनका स्वभाव काफी स्थिर होता है, वे भावनात्मक रूप से अस्थिर नहीं होते, चाहे उनकी स्थिति कैसी भी हो, वे जानते हैं कि कैसे उन्हें अपने कर्तव्यों को अच्छे से निभाना है और कैसे उस ढंग से व्यवहार करना है जो परमेश्वर को संतुष्ट करता है। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं वे इस पर ध्यान नहीं देते कि बाहरी तौर पर ऐसा क्या करना चाहिए ताकि दूसरे उनके बारे में अच्छा सोचें; अपने दिलों में वे स्पष्ट हैं कि परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए क्या करना है। इसलिए, हो सकता है कि बाहर से लगे कि वे उतने उत्साही नहीं हैं या उन्होंने बहुत-से बड़े काम नहीं किए हैं, लेकिन वो जो कुछ भी करते हैं वह सार्थक होता है, मूल्यवान होता है, और उसके परिणाम वास्तविक होते हैं। जिन लोगों के स्वभाव बदल गए हैं उनके अंदर निश्चित रूप से बहुत-सी सत्य वास्तविकताएँ होती हैं, और इस बात की पुष्टि चीज़ों के बारे में उनके दृष्टिकोण और उनके कार्यकलाप के सिद्धांतों के आधार पर की जा सकती है। जिन लोगों ने सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन स्वभाव में बिल्कुल कोई परिवर्तन नहीं हुआ होता है। स्वभाव में परिवर्तन कैसे लाया जाता है? मनुष्यों को शैतान द्वारा गहराई से भ्रष्ट किया गया है, वे सभी परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं, और परमेश्वर का प्रतिरोध करना ही उनकी प्रकृति है। परमेश्वर द्वारा मनुष्य के उद्धार का अर्थ है जिन लोगों की प्रकृति परमेश्वर का प्रतिरोध करना है और जो परमेश्वर का प्रतिरोध कर सकते हैं, उन्हें उन लोगों में बदलना जो परमेश्वर के प्रति समर्पण कर और उसका भय मान सकते हैं। जिनके स्वभाव में बदलाव हो चुका है वे ऐसे लोग होते हैं। कोई व्यक्ति कितना भी भ्रष्ट क्यों न हो या उसके पास कितने भी भ्रष्ट स्वभाव हों, अगर वह सत्य स्वीकार सकता है, परमेश्वर का न्याय और ताड़ना स्वीकार सकता है, विभिन्न परीक्षण और शोधन स्वीकार सकता है, तो उसमें परमेश्वर की सच्ची समझ होगी, और साथ ही, वह स्पष्ट रूप से अपने प्रकृति सार को भी देख पाएगा। जब वह स्वयं को वास्तव में जान लेगा, तो उसे स्वयं से और शैतान से घृणा हो जाएगी, और वह शैतान से विद्रोह करने को तैयार हो जाएगा और पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पण करेगा। जब किसी व्यक्ति में यह संकल्प आ जाता है तो वह सत्य का अनुसरण करेगा। जब किसी व्यक्ति को परमेश्वर का सच्चा ज्ञान होता है, जब उसका शैतानी स्वभाव शुद्ध कर दिया जाता है और परमेश्वर के वचन उसके भीतर जड़ें जमा लेते हैं और उसका जीवन और उसके अस्तित्व का आधार बन जाते हैं, जब वह परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकता है और पूरी तरह से बदलकर नया व्यक्ति बन गया है, केवल तभी उसके जीवन स्वभाव में बदलाव आया है। स्वभाव में बदलाव का मतलब परिपक्व और अनुभवी मानवता होना नहीं है या यह नहीं है कि लोग पहले की तुलना में स्वभाव में अधिक नम्र दिखाई देते हैं—अतीत में अहंकारी होने से लेकर अब विवेक से बोलने में सक्षम होने तक, या अतीत में किसी की न सुनने से लेकर अब दूसरों की बात थोड़ा-बहुत सुनने में सक्षम होने तक। ऐसे बाहरी परिवर्तनों को स्वभाव में परिवर्तन नहीं कहा जा सकता। बेशक स्वभाव में बदलाव में ऐसी अभिव्यक्तियाँ शामिल होती हैं लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि व्यक्ति का आंतरिक जीवन बदल जाता है। यह पूरी तरह इसलिए है क्योंकि परमेश्वर के वचनों और सत्य ने उनमें अंदर जड़ें जमा ली हैं, उनके भीतर वे शासन करने लग गए हैं और वे उनका जीवन बन गए हैं। चीजों पर उनके विचार भी बदल गए हैं। वे दुनिया और मानवजाति को स्पष्ट रूप से देख सकते हैं। वे पूरी तरह से इसकी असलियत जान सकते हैं कि शैतान मानवजाति को कैसे भ्रष्ट करता है, बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का प्रतिरोध कैसे करता है और बड़े लाल अजगर का सार क्या है। वे अपने दिलों में बड़े लाल अजगर और शैतान से घृणा कर पाते हैं और वे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़कर उसका अनुसरण कर सकते हैं। इसका अर्थ है कि उनका जीवन स्वभाव बदल गया है और वे परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं। जीवन स्वभाव में परिवर्तन मौलिक परिवर्तन होता है, जबकि व्यवहार में परिवर्तन सतही होता है। जिन लोगों ने जीवन स्वभाव में परिवर्तन प्राप्त कर लिया है, उन्हीं लोगों ने सत्य प्राप्त किया है और केवल वही परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 383

स्वभाव में बदलाव व्यवहार में बदलाव नहीं होता, न ही यह झूठा बाह्य परिवर्तन होता है, यह जोश में आकर अस्थायी बदलाव भी नहीं होता। ये परिवर्तन कितने भी अच्छे क्यों न हों, वे जीवन स्वभाव में परिवर्तन का स्थान नहीं ले सकते। इन सबका कारण यह है कि ये बाहरी परिवर्तन मानवीय प्रयासों से लाए जा सकते हैं, लेकिन जीवन स्वभाव में परिवर्तन केवल व्यक्ति के अपने प्रयासों से नहीं लाए जा सकते। इसके लिए परमेश्वर के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन का अनुभव करना और साथ ही पवित्र आत्मा की पूर्णता आवश्यक है। भले ही परमेश्वर में विश्वास रखने वाले लोगों का व्यवहार थोड़ा अच्छा होता है, लेकिन उनमें से कोई भी वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करता, वास्तव में परमेश्वर से प्रेम नहीं करता या परमेश्वर की इच्छा के अनुसार नहीं चल सकता। ऐसा क्यों है? क्योंकि ऐसा करने के लिए जीवन स्वभाव में बदलाव की आवश्यकता होती है, केवल व्यवहार में बदलाव बिल्कुल भी काफी नहीं होता। स्वभाव में बदलाव का मतलब है कि तुम्हारे अंदर सत्य का ज्ञान और अनुभव है, सत्य तुम्हारा जीवन बन गया है, यह तुम्हारे जीवन और तुम्हारी हर चीज को निर्देशित कर सकता है और उन पर इसका प्रभुत्व हो सकता है। यह तुम्हारे जीवन स्वभाव में आया बदलाव है। जिन लोगों के लिए सत्य जीवन बन गया है, केवल उनके ही स्वभाव बदले हैं। हो सकता है पहले कुछ सत्य ऐसे रहे हों जिन्हें तुमने समझ तो लिया था, लेकिन उन्हें अभ्यास में नहीं ला पाए, लेकिन अब तुम सत्य के हर उस पहलू को, जिसे तुम समझते हो, बिना बाधाओं या कठिनाई के अभ्यास में ला सकते हो। जब तुम सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम खुद को शांति और प्रसन्नता से भरा महसूस करते हो, लेकिन यदि तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, तो तुम्हें पीड़ा का अनुभव होता है और तुम्हारी अंतरात्मा विचलित हो जाती है। तुम हर चीज में सत्य का अभ्यास कर सकते हो, परमेश्वर के वचनों के अनुसार जी सकते हो और जीने का आधार पा सकते हो। इसका मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है। अब तुम आसानी से अपनी धारणाएँ, कल्पनाएँ, दैहिक प्राथमिकताएँ, लक्ष्य और ऐसी चीजें त्याग सकते हो जिन्हें तुम पहले नहीं छोड़ सकते थे। तुम्हें लगने लगता है कि परमेश्वर के वचन वास्तव में अच्छे हैं और सत्य का अभ्यास करना सबसे अच्छी बात है। इसका मतलब है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है। अपना स्वभाव बदलना बहुत सरल लगता है, लेकिन यह वास्तव में एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें बहुत सारे अनुभव शामिल होते हैं। इस अवधि के दौरान, लोगों को बहुत कष्ट सहने पड़ते हैं—उन्हें अपने शरीर को वश में करना और अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करना पड़ता है, उन्हें न्याय, ताड़ना, काट-छाँट, परीक्षणों और शोधन का कष्ट भी सहना पड़ता है, उन्हें कई असफलताओं का अनुभव करना और ठोकर भी खाना पड़ता है; आंतरिक संघर्षों और यंत्रणा का कष्ट भी सहना पड़ता है। इन अनुभवों के बाद ही लोगों को अपनी प्रकृति की कुछ समझ हो पाती है, लेकिन कुछ समझ से तुरंत पूर्ण परिवर्तन नहीं होता; उन्हें परीक्षणों, शोधन और काट-छाँट की एक लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है, उन्हें लगातार सत्य को खोजने और सत्य का अभ्यास करने की आवश्यकता होती है, तभी वे थोड़ा-थोड़ा करके अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग देने में सक्षम हो पाएँगे। इसीलिए अपने स्वभाव को बदलने में पूरा जीवन लग जाता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम किसी मामले में भ्रष्टता दिखाते हो, तो क्या इसका एहसास होते ही, तुम तुरंत सत्य का अभ्यास कर सकते हो? नहीं। समझने के इस चरण में, दूसरे तुम्हारी काट-छाँट करते हैं और तब तुम्हारा परिवेश तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए बाध्य करता है। कभी-कभी तुम ऐसा करने के लिए इच्छुक नहीं होते हो और तुम अपने आपसे कहते हो, “क्या मुझे इसे ऐसे ही करना पड़ेगा? मैं इसे अपने हिसाब से क्यों नहीं कर सकता? मुझे हमेशा सत्य का अभ्यास करने के लिए क्यों कहा जाता है? मैं यह नहीं करना चाहता, इसके लिए मुझमें ऊर्जा नहीं है!” परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए निम्न प्रक्रिया से गुजरना होता है : सत्य का अभ्यास करने का अनिच्छुक होने से लेकर सहर्ष सत्य का अभ्यास करने तक; नकारात्मकता और कमजोरी से लेकर सशक्त बनने और देह के खिलाफ विद्रोह कर पाने की क्षमता तक। जब लोग अनुभव के एक निश्चित बिंदु तक पहुँच जाते हैं और फिर कुछ परीक्षणों और शोधन से गुजरकर अंततः परमेश्वर के इरादे और कुछ सत्य समझने लगते हैं, तब वे थोड़े खुश होकर सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने को तैयार हो जाते हैं। शुरू में लोग थोड़ी अनिच्छा से सत्य का अभ्यास करते हैं। उदाहरण के तौर पर, समर्पित होकर अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने को ही ले लो : तुम्हारे अंदर अपने कर्तव्य निभाने में कुछ समर्पण, परमेश्वर के प्रति समर्पित होने की कुछ समझ और सत्य की थोड़ी समझ है, लेकिन तुम पूरी तरह से समर्पित होने में कब समर्थ होगे और कब नाम और कर्म दोनों में तुम अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर सकोगे? इसमें प्रक्रिया की आवश्यकता है। इस प्रक्रिया के दौरान तुम्हें कई कठिनाइयों को झेलना पड़ सकता है। शायद कुछ लोग तुम्हारी काट-छाँट करें, कुछ तुम्हारी आलोचना करें। सबकी निगाहें तुम पर लगी रहेंगी, तुम्हारी पड़ताल कर रही होंगी, केवल तब जाकर तुम्हें एहसास होगा कि तुम गलत हो, तुम ही हो जिसने गलती की है, अपने कर्तव्य के निर्वहन में लगन की कमी होना अस्वीकार्य है और यह भी कि तुम्हें लापरवाह नहीं होना चाहिए। पवित्र आत्मा तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करता है और जब तुम कोई भूल करते हो, तो वह तुम्हें फटकारता है। इस प्रक्रिया के दौरान तुम अपने बारे में कुछ बातें समझने लगोगे और जान जाओगे कि तुममें बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं, तुम्हारे अंदर निजी इरादे भरे पड़े हैं और अपने कर्तव्य निभाते समय तुम्हारे अंदर बहुत सारी असंयमित इच्छाएँ होती हैं। जब तुम इन चीजों के सार को समझ जाते हो, तब अगर तुम परमेश्वर के समक्ष आकर उससे प्रार्थना कर सच्चा प्रायश्चित कर सकते हो, तो तुम्हारी वे भ्रष्ट चीजें शुद्ध की जा सकती हैं। यदि इस तरह अपनी वास्तविक समस्याओं का समाधान करने के लिए तुम अक्सर सत्य की खोज करोगे, तो तुम आस्था के सही मार्ग पर कदम-दर-कदम आगे बढ़ पाओगे; तुम्हें सच्चे जीवन अनुभव होने लगेंगे और धीरे-धीरे तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव शुद्ध होने लगेंगे। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव जितने अधिक शुद्ध होते जाएँगे, तुम्हारा जीवन स्वभाव उतना ही परिवर्तित होगा।

भले ही अब बहुत-से लोग अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, लेकिन सार रूप में, ऐसे कितने लोग हैं जो बेमन से अपने कर्तव्य निभा रहे हैं? कितने लोग सत्य को स्वीकार कर सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपने कर्तव्य निभा सकते हैं? कितने लोग अपने स्वभाव में बदलाव आने के बाद परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य निभाते हैं? इन बातों की ज्यादा जाँच करके तुम जान सकते हो कि क्या कर्तव्यों का निर्वहन करने में तुम मानक के अनुरूप हो, तुम यह भी स्पष्ट रूप से देख पाओगे कि तुम्हारे स्वभाव में कोई बदलाव आया है या नहीं। स्वभाव में रूपांतरण लाना कोई आसान बात नहीं है; इसका मतलब महज व्यवहार में थोड़ा-सा बदलाव लाना और सत्य का थोड़ा ज्ञान हासिल कर लेना, सत्य के हर पहलू के बारे में अपने अनुभव पर थोड़ा बात कर लेना, या अनुशासित किए जाने के बाद थोड़ा बदल जाना या थोड़ा-सा समर्पित हो जाना नहीं है। ये चीजें किसी व्यक्ति के जीवन स्वभाव में परिवर्तन के बराबर नहीं हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यद्यपि तुममें कुछ बदलाव आया हो, फिर भी तुम वास्तव में समर्पण नहीं कर रहे हो। तुम कभी-कभी सत्य का अभ्यास करने में इसलिए सक्षम हो सकते हो क्योंकि परिवेश अनुकूल है या कोई तुम्हारा पर्यवेक्षण कर रहा है और केवल तभी तुम कुछ हद तक समर्पण कर पाते हो। इसके अलावा, जब तुम्हारा मिजाज अच्छा होता है और तुम्हारी मनोदशा सामान्य होती है या जब तुममें पवित्र आत्मा का कार्य होता है, तब तुम सत्य का अभ्यास कर सकते हो। लेकिन यदि तुम किसी परीक्षण से गुजर रहे हो—जब तुम परीक्षण के बीच अय्यूब की तरह कष्ट उठा रहे हो या जब तुम मौत के परीक्षण का सामना करते हो—क्या तुम तब भी सत्य का अभ्यास कर पाओगे और गवाही में अडिग रह पाओगे? क्या तुम कुछ ऐसा कह पाओगे जैसा कि पतरस ने कहा था, “अगर तुझे जानने के बाद मुझे मरना भी पड़े, तो मैं ऐसा हर्ष और प्रसन्नता के साथ कैसे नहीं करूँगा?” पतरस ने किस चीज को महत्व दिया? पतरस ने समर्पण को महत्व दिया, उसने परमेश्वर को जानने को सर्वाधिक महत्वपूर्ण समझा, तभी वह मृत्युपर्यंत समर्पण कर पाया। स्वभाव में परिवर्तन रातोंरात नहीं होता; इसमें जीवन भर का अनुभव लग जाता है। सत्य को समझना थोड़ा आसान होता है, लेकिन विभिन्न संदर्भों में सत्य का अभ्यास करना कठिन होता है। सत्य का अभ्यास करने में हमेशा कुछ कठिनाइयाँ क्यों होती हैं, जबकि अपनी इच्छा के अनुसार चलने पर कोई कठिनाई नहीं होती? यह दर्शाता है कि जब लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, तो वे हमेशा अपने भ्रष्ट स्वभावों द्वारा बाधित होते हैं; इसका बाहरी परिवेश से बहुत कम लेना-देना है। इसलिए सत्य का अभ्यास करने में लोगों की सबसे बड़ी कठिनाई उनके अपने भ्रष्ट स्वभाव हैं। चाहे किसी भी प्रकार की कठिनाई हो, उसका सीधा संबंध व्यक्ति के भ्रष्ट स्वभावों से होता है; सभी कठिनाइयाँ इसलिए हैं क्योंकि उनके भ्रष्ट स्वभाव हावी हो रहे हैं और बाधाएँ पैदा कर रहे हैं। इस प्रकार, सत्य का अभ्यास करने के लिए देह के खिलाफ विद्रोह करना और अपने भ्रष्ट स्वभावों के खिलाफ विद्रोह करना आवश्यक है; सत्य का अभ्यास कर सकने से पहले लोगों को कष्ट सहने और कीमत चुकाने की आवश्यकता होती है। यदि उनमें भ्रष्ट स्वभाव नहीं होते, तो उन्हें सत्य का अभ्यास करने के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने की आवश्यकता नहीं होती। क्या यह स्पष्ट तथ्य नहीं है? कभी-कभी ऐसा लग सकता है जैसे तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो, लेकिन वास्तव में, तुम्हारे क्रियाकलापों की प्रकृति सत्य का अभ्यास करने की प्रकृति नहीं है। परमेश्वर का अनुसरण करने में कई लोग अपने परिवार और काम-धंधे त्याग करके अपने कर्तव्य करने में सक्षम होते हैं, इसलिए वे मानते हैं कि वे सत्य का अभ्यास कर रहे हैं। लेकिन वे कभी सच्ची अनुभवात्मक गवाही देने में सक्षम नहीं होते। यहाँ असल में क्या चल रहा है? मनुष्य की धारणाओं से उन्हें मापने पर वे सत्य का अभ्यास करते प्रतीत होते हैं, फिर भी परमेश्वर नहीं मानता कि वे जो कर रहे हैं, वह सत्य का अभ्यास करना है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे जो कुछ भी करते हैं वह परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए नहीं, बल्कि आशीष और प्रतिफल पाने के लिए होता है। यदि तुम्हारे द्वारा किए जाने वाले कार्यों में तुम्हारी व्यक्तिगत मंशाओं की मिलावट है, तो तुम्हारे सिद्धांतों से भटकने की संभावना है और यह नहीं कहा जा सकता कि तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो; यह केवल एक प्रकार का आचरण है। सख्ती से कहा जाए तो तुम्हारे इस प्रकार के आचरण की परमेश्वर द्वारा निंदा किए जाने की संभावना है; इसे उसके द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाएगी या याद नहीं रखा जाएगा। इसके सार और स्रोत का आगे गहन-विश्लेषण करने पर पता चलेगा कि यह शैतान की प्रकृति से उत्पन्न होता है। तब यह तुम्हें एक कुकर्मी बनाता है और फिर तुम्हारा यह आचरण परमेश्वर का प्रतिरोध करना है। मानवीय परिप्रेक्ष्य से, शायद कुछ लोग जिनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, वे कहेंगे, “यह बुराई करना नहीं है, न ही यह गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करना है और इससे कोई नुकसान नहीं हुआ है। जो कहा और किया गया, वह भी तार्किक और उचित लगता है।” लेकिन लोग जिस बात की असलियत नहीं जान पाते वह यह है कि उनके भीतर की मिलावट और मंशाएँ बुरे तत्व हैं, इसलिए उनके क्रियाकलाप बुरे कर्म हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध हैं। इसलिए परमेश्वर के वचनों के प्रयोग से और अपने क्रियाकलापों के पीछे के इरादों को देखकर तुम्हें यह तय करना चाहिए कि क्या तुम्हारे स्वभाव में कोई परिवर्तन हुआ है और क्या तुम सत्य को अभ्यास में ला रहे हो। यह इस पर निर्भर नहीं करता कि तुम्हारे क्रियाकलाप इंसानी कल्पनाओं और विचारों के अनुरूप हैं या नहीं या वे तुम्हारी रुचि के लिए उपयुक्त हैं या नहीं; यह इन चीजों पर निर्भर नहीं करता है। बल्कि, यह परमेश्वर के इस निर्णय पर निर्भर करता है कि तुम उसके इरादों के अनुसार काम करते हो या नहीं, तुम्हारे क्रियाकलापों में सत्य वास्तविकता है या नहीं, और वे उसके अपेक्षित मानकों को पूरा करते हैं या नहीं। केवल परमेश्वर की अपेक्षाओं से तुलना करके अपने आप को मापना ही सटीक है। स्वभाव में रूपांतरण और सत्य को अभ्यास में लाना उतना सहज और आसान नहीं है जैसा लोग सोचते हैं। क्या तुम लोग अब इस बात को समझ गए? क्या इसका तुम सबको कोई अनुभव है? जब इस मामले के सार की बात आती है, तो शायद तुम लोग इसे नहीं समझ सकोगे; तुम लोगों का प्रवेश बहुत ही उथला रहा है। तुम लोग सुबह से शाम तक दिन भर भागते-दौड़ते हो, सुबह जल्दी उठते हो और देर से सोते हो, फिर भी तुम्हारा जीवन स्वभाव परिवर्तित नहीं हुआ है और तुम लोग इस बात को समझ नहीं सकते कि स्वभावगत परिवर्तन क्या है। इसका अर्थ है कि तुम्हारा प्रवेश बहुत ही उथला है, है न? चाहे तुम लोगों ने कितने भी लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास रखा हो, फिर भी हो सकता है कि तुम लोग स्वभाव में परिवर्तन की मूल प्रकृति और उससे जुड़ी गहरी चीजों को महसूस न कर सको। क्या यह कहा जा सकता है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है? तुम कैसे जानते हो कि परमेश्वर तुम्हें स्वीकृति देता है या नहीं? कम से कम, तुम अपने हर काम में जबरदस्त आंतरिक शांति महसूस करोगे और तुम महसूस करोगे कि जब तुम अपने कर्तव्य निभा रहे हो, परमेश्वर के घर में या अपने रोजमर्रा के जीवन में कोई भी काम कर रहे हो, पवित्र आत्मा तुम्हारा मार्गदर्शन और प्रबोधन कर रहा है और तुममें कार्य कर रहा है। तुम यह देखने में सक्षम होगे कि कैसे तुम्हारे क्रियाकलाप परमेश्वर के वचनों के अनुरूप हैं, वे सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होंगे और जब तुमने चीजों को कुछ हद तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम महसूस करोगे कि अतीत में तुमने जो कुछ किया वह अपेक्षाकृत उपयुक्त था। लेकिन अगर कुछ समय तक चीजों का अनुभव करने के बाद, तुम महसूस करो कि अतीत में तुम्हारे द्वारा किए गए कुछ काम उपयुक्त नहीं थे, तुम उनसे असंतुष्ट हो, और तुम्हें लगे कि वे सत्य के अनुरूप नहीं थे, तो इससे यह साबित होता है कि तुमने जो कुछ भी किया, वह परमेश्वर के विरोध में था। यह साबित करता है कि तुम्हारी सेवा विद्रोहशीलता, प्रतिरोध और काम करने के मानवीय तरीकों से भरी हुई थी और तुम अपने स्वभाव में बदलाव लाने में पूरी तरह से नाकाम रहे हो।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, स्वभावगत परिवर्तन के बारे में क्या जानना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 384

लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं, यह आकलन करने में मुख्य बात यह है कि क्या उनमें उसके प्रति असंयत इच्छाएँ या गुप्त अभिप्राय हैं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके प्रति समर्पित नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार नहीं करते, तुम सत्य की तलाश नहीं करते, हमेशा अपने लिए तर्क-वितर्क करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि सिर्फ तुम सही हो, और यहाँ तक कि तुम अभी भी यह संदेह करने में सक्षम हो कि परमेश्वर सत्य और धार्मिकता है, तो तुम संकट में पड़ जाओगे। ऐसे लोग सबसे अहंकारी और परमेश्वर के प्रति सबसे अधिक विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच्चे रूप से उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो यह साबित करता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपनी ही इच्छा चुन रहे हो, और इसी के अनुसार कार्य कर रहे हो। यह परमेश्वर से विश्वासघात करना है और समर्पण का अभाव है। परमेश्वर से माँग करना अपने आप में ही विवेक का अभाव होना है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँगने की हिम्मत नहीं करोगे—जिसके तुम वैसे भी योग्य नहीं हो—फिर चाहे वे उचित हों या नहीं। अगर तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास है, और विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो फिर तुम सिर्फ उसकी आराधना और उसके प्रति समर्पण करोगे—इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं है। आज, लोग न सिर्फ अपनी पसंद-नापसंद खुद चुनते हैं, बल्कि वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करे। वे न केवल परमेश्वर के प्रति समर्पण न मानने का फैसला करते हैं, बल्कि वे परमेश्वर से भी कहते हैं कि वह उनके प्रति समर्पण करे। क्या यह इतना विवेकशून्य नहीं है? इसलिए, अगर मनुष्य में कोई सच्ची आस्था नहीं है, कोई सारभूत विश्वास नहीं है, तो वह कभी भी परमेश्वर से स्वीकृति नहीं पा सकता। जब लोग परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम होते हैं, तो उनमें सच्ची आस्था और समर्पण अधिक होता है और उनका विवेक अपेक्षाकृत सामान्य होता है। अक्सर ऐसा होता है कि लोग बहस करने के जितने अधिक इच्छुक होते हैं, उतना ही अधिक कठिन उन्हें सँभालना होता है। उनकी बहुत-सी माँगें तो होती ही हैं, उन्हें उँगली पकड़ाओ तो वे सिर पर चढ़ जाते हैं। एक मामले में संतुष्ट होने पर वे दूसरे मामले में माँग करने लगते हैं। उन्हें सभी मामलों में संतुष्ट करना होता है, वरना वे शिकायत करने लगते हैं, और हार मान लेते हैं और हर चीज खंड-खंड होने देते हैं। ऐसा करने के बाद वे ऋणी और पछतावा महसूस करते हैं, फूट-फूटकर रोते हैं और मरना चाहते हैं। इसका क्या फायदा? क्या यह अविवेकी और निरंतर परेशानी पैदा करने वाला होना नहीं है? उनके भ्रष्ट स्वभाव से समस्याओं की यह कड़ी हल करनी होगी, जो इन सबकी जड़ है। यदि तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है और तुम इसे दूर नहीं करते, यदि तुम इसे दूर करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करते हो, जब तक कि तुम मुसीबत में न पड़ जाओ या कोई बड़ी विपत्ति न खड़ी कर बैठो, तो उस हानि की भरपाई तुम कैसे करोगे? क्या यह कुछ-कुछ अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत जैसा नहीं है? अपने भ्रष्ट स्वभाव की समस्या पूरी तरह से हल करने के लिए तुम्हें तभी सत्य खोज लेना होगा जब भ्रष्ट स्वभाव पहली बार सामने आता है। तुम्हें भ्रष्ट स्वभाव पनपते ही इसका समाधान कर लेना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तुमसे कोई गलती न हो और भविष्य में परेशानियाँ खड़ी न हों। यदि भ्रष्ट स्वभाव जड़ें जमा ले और वह व्यक्ति के विचार या उसका दृष्टिकोण बन जाए, तो वह इंसान को बुरा व्यवहार करने के लिए निर्देशित करने में सक्षम होगा। इसलिए, आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान का मुख्य उद्देश्य अपने भ्रष्ट स्वभाव का पता लगाना और उसे हल करने के लिए शीघ्रता से सत्य की खोज करना है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारी प्रकृति में क्या चीजें हैं, तुम्हें क्या पसंद है, तुम किसका अनुसरण करते हो और तुम क्या हासिल करना चाहते हो। तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार इन चीजों का गहन-विश्लेषण करना चाहिए ताकि यह जान सको कि क्या वे परमेश्वर के इरादों के अनुसार हैं, और ये किस लिहाज से भ्रामक हैं। जब तुम इन चीजों को समझ लो, तो तुम्हें अपने असामान्य विवेक की समस्या अर्थात् अपनी विवेकहीनता और निरंतर परेशानी खड़ी करने की प्रवृत्ति की समस्या, हल करनी चाहिए। यह केवल तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की समस्या नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी संबंधित है कि तुम विवेकशील व्यक्ति हो या नहीं। विशेष रूप से उन मामलों में, जहाँ प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का संबंध है, जब लोग प्रसिद्धि और लाभ से उन्मत्त हो जाते हैं, उनका विवेक असामान्य हो जाता है; ऐसा लगता है जैसे उनकी नसों में कुछ खराबी आ गई है। यह भी लोगों की घातक कमजोरी है। कुछ लोगों को लगता है कि उनमें कोई खास काबिलियत और कुछ गुण हैं, और अलग दिखने के लिए वे हमेशा अगुआ बनना चाहते हैं, इसलिए वे परमेश्वर से उनका उपयोग करने की माँग करते हैं। यदि परमेश्वर उनका उपयोग नहीं करता, तो वे कहते हैं, “परमेश्वर मुझ पर कृपादृष्टि क्यों नहीं डाल सकता? परमेश्वर, अगर कुछ महत्वपूर्ण करने के लिए तुम मेरा इस्तेमाल करोगे, तो मैं तुम्हारे लिए खुद को खपाने का वादा करता हूँ!” क्या इस तरह का इरादा सही है? परमेश्वर के लिए खुद को खपाना अच्छी बात है, लेकिन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की इच्छा के पीछे उनकी अपनी मंशाएँ हैं। वे अपने रुतबे से प्यार करते हैं और इसी पर उनका ध्यान केंद्रित होता है। जब लोग सच्चा समर्पण करने लायक हो सकें, परमेश्वर चाहे उनका उपयोग करे या न करे, वे पूरे मन से उसका अनुसरण कर सकें, चाहे उनके पास रुतबा हो या न हो, वे परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकें, तो ऐसे लोगों को ही विवेकशील और परमेश्वर के प्रति समर्पित माना जा सकता है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने को तैयार होना अच्छी बात है और परमेश्वर भी ऐसे लोगों का उपयोग करने को तैयार रहता है, लेकिन यदि वे सत्य से युक्त नहीं हैं, तो परमेश्वर किसी भी तरह उनका उपयोग नहीं कर सकता। यदि लोग सत्य के लिए प्रयास और सहयोग करने के इच्छुक हैं, तो एक तैयारी का चरण होना ही चाहिए। लोगों को जब सत्य की समझ हो जाती है और वे वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं तभी परमेश्वर औपचारिक रूप से उनका उपयोग कर सकता है। प्रशिक्षण का यह चरण अनिवार्य है। आज सभी अगुआ और कार्यकर्ता इसी प्रशिक्षण चरण में हैं। जब उन्हें जीवन का अनुभव हो जाएगा और वे सिद्धांतों के अनुसार मामलों को सँभालने लगेंगे, तब वे परमेश्वर द्वारा उपयोग के लायक हो जाएँगे।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 385

एक सृजित प्राणी का अपने सृष्टिकर्ता के प्रति जो एकमात्र रवैया होना चाहिए, वह है समर्पण का, ऐसा समर्पण जो बिना शर्त हो। यह ऐसी चीज़ है, जिसे आज कुछ लोग स्वीकार करने में असमर्थ हो सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि उनका आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और वे सत्य वास्तविकता से रहित हैं। जब परमेश्वर ऐसी चीजें करता है जो तुम्हारी धारणाओं से उलट होती हैं, तो अगर तुममें परमेश्वर को गलत समझने की प्रवृत्ति होती है—तुम परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह तक कर सकते हो और उसे धोखा दे सकते हो—तो फिर तुम परमेश्वर के समक्ष समर्पण कर पाने से बहुत दूर हो। जिस दौरान लोगों को परमेश्वर के वचन द्वारा पोषण और सिंचन प्रदान किया जाता है, वे वास्तव में एक ही लक्ष्य के लिए प्रयास कर रहे होते हैं, जो अंततः परमेश्वर के प्रति बिना शर्त पूर्ण समर्पण करने में सक्षम होना है—उस बिंदु पर तुम, एक सृजित प्राणी, मानक स्तर के हो जाओगे। कभी-कभी परमेश्वर जानबूझकर तुम्हारी धारणाओं से उलट चीजें करता है, या जानबूझकर ऐसी चीजें करता है जो तुम्हारी इच्छा के विपरीत जाती हैं। ऐसा प्रतीत हो सकता है कि ये चीजें सत्य के अनुसार नहीं हैं, तुम्हारे प्रति विचारहीन और तुम्हारी पसंद के विरुद्ध हैं। इन चीजों को स्वीकार करना तुम्हारे लिए मुश्किल हो सकता है, तुम उनका कोई मतलब नहीं समझ पाते, और चाहे तुम उनका कैसे भी विश्लेषण करो, तुम्हें वे गलत प्रतीत हो सकती हैं और शायद तुम उन्हें स्वीकार न कर पाओ, तुम्हें ऐसा लग सकता है कि परमेश्वर ने ऐसा किया है इसलिए वह तर्कविहीन है—पर दरअसल परमेश्वर ऐसा जानबूझकर करता है। तो फिर ऐसी चीजें करने के पीछे परमेश्वर का क्या लक्ष्य होता है? यह तुम्हारी परीक्षा लेने और तुम्हें प्रकट करने के लिए होता है, यह देखने के लिए कि तुम सत्य की खोज करने में सक्षम हो या नहीं, कि तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है या नहीं। परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जिसकी भी अपेक्षा करता है उसका कोई आधार न खोजो, उसका कारण न पूछो। परमेश्वर के सामने अपना मामला पेश करने का कोई लाभ नहीं है। तुम्हें बस यह पुष्टि करनी है कि परमेश्वर सत्य है, और तुम्हें पूरी तरह समर्पण करने में सक्षम होना है। जब तक तुम यह पुष्टि करते हो कि परमेश्वर तुम्हारा सृष्टिकर्ता और तुम्हारा परमेश्वर है, यह अकेले ही किसी भी तर्क से ऊपर है, हर सांसारिक ज्ञान से ऊपर है, हर मानवीय नैतिकता, संहिता, ज्ञान, फलसफे या पारंपरिक संस्कृति से ऊपर है—यह मानवीय भावनाओं, मानवीय वफादारी और तथाकथित मानवीय प्रेम से भी ऊपर है। यह हर चीज से ऊपर है। अगर तुम स्पष्ट रूप से इसे नहीं देख पाते हो तो देर-सवेर तुम्हारे साथ कुछ होगा और तुम गिर पड़ोगे। सबसे कम गंभीर स्थिति में तुम परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर दोगे और अलग राह पर निकल जाओगे; अगर तुम आखिर में प्रायश्चित करने में सफल रहते हो, और परमेश्वर की मनोहरता को पहचान लेते हो, स्वयं पर परमेश्वर के कार्य के महत्व को पहचान लेते हो, तब भी तुम्हारे उद्धार की उम्मीद बाकी रहेगी—पर अगर तुम इसकी वजह से गिर पड़ते हो और वापस उठ नहीं पाते, तो तुम्हारे लिए कोई उम्मीद नहीं रहेगी। परमेश्वर लोगों का न्याय करे, उन्हें ताड़ना दे, शाप दे, ये सब उन्हें बचाने के लिए हैं, और डरने की कोई जरूरत नहीं है। वास्तव में किससे डरना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर के ऐसा कहने से डरना चाहिए, “मैं तुम्हें ठुकराता हूँ।” अगर परमेश्वर ऐसा कहता है तो तुम मुसीबत में हो : इसका मतलब है कि परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाएगा, और तुम्हारे उद्धार की बिल्कुल कोई उम्मीद नहीं होगी। और इसलिए, परमेश्वर के कार्य को स्वीकार करने में लोगों को परमेश्वर के इरादे समझने चाहिए। तुम जो भी करो, परमेश्वर के वचनों की बात आने पर वचनों पर यह कहते हुए मत अटको, “न्याय और ताड़ना ठीक हैं, पर निंदा, शाप और विनाश—क्या इनका मतलब यह नहीं कि मेरे लिए सब खत्म हो चुका है? तो मैं सृजित प्राणी रहूँ ही क्यों? इसलिए मैं अब से सृजित प्राणी नहीं रहने वाला हूँ और तुम मेरे परमेश्वर नहीं होगे।” अगर तुम परमेश्वर को नकार दोगे, अपनी गवाही में डटकर नहीं खड़े रहोगे, तो परमेश्वर तुम्हें सचमुच त्याग सकता है। क्या तुम्हारे पास यह समझ है? लोग चाहे कितने ही समय से परमेश्वर में विश्वास करते रहे हों, उन्होंने चाहे कितने ही रास्ते तय किए हों, कितना ही काम किया हो, कितने ही कर्तव्य निभाए हों, इस अवधि में उन्होंने जो कुछ भी किया है वह सब एक चीज की तैयारी के लिए है। वह क्या है? वे अंततः परमेश्वर के प्रति संपूर्ण समर्पण, बिना शर्त समर्पण दिखाने में सक्षम होने की तैयारी करते रहे हैं। “बिना शर्त” का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम कोई सफाई नहीं देते, और अपने वस्तुनिष्ठ कारणों की कोई बात नहीं करते, इसका अर्थ है कि तुम किसी चीज पर मोल-भाव नहीं कर रहे हो। एक सृजित प्राणी के तौर पर तुम परमेश्वर के सामने अपने मामले पर बहस करने और शर्तें रखने के अयोग्य हो। जब तुम परमेश्वर के साथ मोल-भाव करते हो तो तुम अपनी जगह नहीं पहचान पाते, और जब तुम परमेश्वर के सामने अपना मामला पेश करने की कोशिश करते हो—तो एक बार फिर तुम अपनी जगह नहीं पहचान पाते। परमेश्वर के साथ बहस मत करो, हमेशा कारण समझने की कोशिश न करो, समर्पण कर पाने से पहले समझने पर अड़े न रहो—अगर तुम नहीं समझते तो तुम समर्पण नहीं करोगे। जब तुम ऐसा करते हो तो तुम गलत स्थान पर खड़े होते हो, जिसका मतलब है कि परमेश्वर के प्रति तुम्हारा समर्पण संपूर्ण नहीं है, यह सापेक्षिक और सशर्त समर्पण है। वे लोग जो परमेश्वर के प्रति अपने समर्पण के लिए शर्तें रखते हैं, क्या परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण करने वाले लोग हैं? क्या तुम परमेश्वर से परमेश्वर की तरह व्यवहार कर रहे हो? क्या तुम परमेश्वर की सृष्टिकर्ता के रूप में आराधना करते हो? अगर नहीं, तो परमेश्वर तुम्हें अभिस्वीकृत नहीं करता। परमेश्वर के प्रति संपूर्ण और बिना शर्त समर्पण हासिल करने के लिए तुम्हें क्या अनुभव करना चाहिए? और इसे कैसे अनुभव करना चाहिए? एक बात तो यह कि लोगों को परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करना चाहिए और उन्हें काट-छाँट स्वीकार करनी चाहिए। इसके साथ ही उन्हें परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करना चाहिए, और अपना कर्तव्य निभाने के दौरान उन्हें सत्य का अनुसरण करना चाहिए। उन्हें जीवन प्रवेश से जुड़े सत्य के विभिन्न पहलुओं को समझना चाहिए और परमेश्वर के इरादों की समझ हासिल करनी चाहिए। कई बार, यह लोगों की काबिलियत से बाहर होता है, और उनमें सत्य की समझ प्राप्त करने के लिए अंतर्दृष्टि का अभाव होता है, और वे दूसरों से मिली संगति पर निर्भर करके और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित की गई विभिन्न स्थितियों के माध्यम से सबक सीखने के द्वारा ही थोड़ा-बहुत समझ पाते हैं। पर तुम्हें यह बोध होना चाहिए कि तुम्हारे पास परमेश्वर की आज्ञा मानने वाला दिल होना चाहिए, तुम्हें परमेश्वर के सामने अपना मामला पेश करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए या कोई शर्त नहीं रखनी चाहिए; परमेश्वर जो भी करता है वह वही होता है जो किया जाना चाहिए। क्योंकि परमेश्वर सृष्टिकर्ता है और तुम एक सृजित प्राणी हो, तुम्हारा रवैया समर्पण का अवश्य होना चाहिए, तुम्हें हमेशा चीजों के होने के कारण के बारे में नहीं पूछना चाहिए या शर्तें सामने नहीं रखनी चाहिए। अगर तुम्हारे अंदर समर्पण का सबसे बुनियादी रवैया भी नहीं है, और तुम परमेश्वर के बारे में अटकलें लगाने और उससे सावधान रहने की ओर भी प्रवृत्त हो सकते हो, या अपने मन में यह सोच सकते हो, “मुझे यह देखना होगा कि क्या परमेश्वर मुझे सचमुच बचाएगा और क्या परमेश्वर सचमुच धार्मिक है। हर कोई कहता है कि परमेश्वर प्रेम है—तो ठीक है, मुझे यह देखना ही है कि मेरे प्रति परमेश्वर के कार्यों में क्या सचमुच प्रेम शामिल है, क्या वे सचमुच प्रेम हैं,” अगर तुम निरंतर यह पड़ताल करते रहते हो कि परमेश्वर जो कुछ करता है वह तुम्हारी धारणाओं और रुचियों के अनुरूप है या नहीं, यहाँ तक कि जिसे तुम सत्य समझते हो उसके अनुरूप है या नहीं, तो तुम गलत स्थान ले रहे हो और तुम मुसीबत में हो—संभव है कि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नाराज कर दोगे। समर्पण का सत्य बहुत अहम है, और किसी भी सत्य को सिर्फ दो-तीन वाक्यों में पूरी तरह और स्पष्ट रूप से समझाया नहीं जा सकता; वे सब लोगों की विभिन्न अवस्थाओं और भ्रष्टता से जुड़े हुए हैं। सत्य वास्तविकता में प्रवेश एक या दो—या तीन या पाँच—वर्षों में हासिल नहीं किया जा सकता। इसके लिए बहुत-सी चीजों के अनुभव की, परमेश्वर के वचनों के बहुत-से न्याय और ताड़ना के अनुभव की, बहुत-सी काट-छाँट के अनुभव की जरूरत होती है। केवल जब तुम अंततः सत्य का अभ्यास करने की क्षमता प्राप्त कर लोगे तभी तुम्हारा सत्य का अनुसरण असरदार होगा और केवल तभी तुम सत्य वास्तविकता को प्राप्त करोगे। जिनके पास सत्य वास्तविकता है, केवल वही सच्चे अनुभव वाले लोग होते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 386

परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते समय, चाहे तुम कितनी भी बार असफल हुए हो, लड़खड़ाए हो या तुम्हारी काट-छाँट की गई हो या तुम प्रकट किए गए हो, ये बुरी चीजें नहीं हैं। चाहे तुम्हारी कैसे भी काट-छाँट की गई हो—चाहे वह अगुआओं, कार्यकर्ताओं या तुम्हारे भाई-बहनों द्वारा की गई हो—यह हमेशा अच्छी चीज होती है। तुम्हें यह बात याद रखनी चाहिए : चाहे तुम्हें कितना भी कष्ट हो, तुम्हें असल में इससे लाभ होता है। कोई भी अनुभव वाला व्यक्ति इसकी पुष्टि कर सकता है। चाहे कुछ भी हो जाए, काट-छाँट या प्रकट किया जाना हमेशा अच्छा होता है। यह कोई दोषी ठहराना नहीं है। यह परमेश्वर का उद्धार है और तुम्हारे लिए स्वयं को जानने का सर्वोत्तम अवसर है। यह तुम्हारे जीवन अनुभव में एक मोड़ ला सकता है। इसके बिना तुम्हारे पास न तो अवसर होगा, न स्थितियाँ, न ही अपनी भ्रष्टता के सत्य की समझ पाने का संदर्भ। अगर तुम सत्य को सचमुच समझते हो और अपने दिल की गहराइयों में छिपी भ्रष्ट चीजों का पता लगाने में सक्षम हो, अगर तुम स्पष्ट रूप से उनका भेद पहचान सकते हो, तो यह अच्छी बात है, इससे जीवन-प्रवेश की एक बड़ी समस्या हल हो जाती है, और यह स्वभाव में बदलाव के लिए भी बहुत लाभदायक है। स्वयं को सच में जानने में सक्षम होना तुम्हारे लिए गहन रूपांतरण से गुजरने और एक नया व्यक्ति बनने का सबसे अच्छा मौका है; यह तुम्हारे लिए नया जीवन पाने का सबसे अच्छा अवसर है। एक बार जब तुम सच में खुद को जान लोगे, तो तुम यह देख पाओगे कि जब सत्य किसी का जीवन बन जाता है, तो यह निश्चय ही अनमोल होता है, तुममें सत्य की प्यास होगी, तुम सत्य का अभ्यास करोगे और वास्तविकता में प्रवेश करोगे। यह बहुत अच्छी चीज है! यदि तुम इस अवसर को लपक सको और असफल होने या नीचे गिरने पर ईमानदारी से आत्मचिंतन कर सको और अपने बारे में वास्तविक ज्ञान प्राप्त कर सको, तो नकारात्मकता और कमजोरी के बीच तुम फिर से खड़े हो पाओगे। एक बार जब तुम इस बाधा को पार कर लोगे, तब तुम आगे एक बड़ा कदम उठा पाओगे और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर पाओगे।

यदि तुम परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास करते हो, तो तुम्हें यह मानना होगा कि जो चीजें हर दिन घटित होती हैं, चाहे वे अच्छी हों या बुरी, वे यूँ ही नहीं होती हैं। ऐसा नहीं है कि कोई जानबूझकर तुम पर सख्त हो रहा है या तुम पर निशाना साध रहा है; यह सब परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और आयोजित है। परमेश्वर इन चीजों की योजना क्यों बनाता है? तुम कौन हो यह उजागर करने या तुम्हें प्रकट करके हटा देने के लिए नहीं है; तुम्हें प्रकट करना अंतिम लक्ष्य नहीं है। लक्ष्य तुम्हें पूर्ण बनाना और बचाना है। परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कैसे बनाता है? और वह तुम्हें कैसे बचाता है? वह तुम्हें तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों से अवगत कराने और तुम्हें तुम्हारा प्रकृति सार, तुम्हारी कमियाँ और तुम्हारा अभाव ज्ञात कराने से शुरुआत करता है। उन्हें समझकर और जानकर ही तुम सत्य का अनुसरण कर सकते हो और धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभाव छोड़ सकते हो। यह परमेश्वर का तुम्हें एक अवसर प्रदान करना है। यह परमेश्वर की दया है। तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना आना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के प्रति प्रतिरोधी नहीं होना चाहिए, उसके प्रति अवज्ञाकारी नहीं होना चाहिए या उसे गलत नहीं समझना चाहिए। विशेष रूप से उन लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते समय, जिनकी परमेश्वर तुम्हारे आसपास व्यवस्था करता है, लगातार यह महसूस मत करो कि वे वैसी नहीं हैं जैसी तुम चाहते हो, हमेशा उनसे बच निकलने की मत सोचो या परमेश्वर के बारे में शिकायत मत करो या उसे गलत मत समझो। अगर तुम लगातार ऐसा कर रहे हो तो तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं कर रहे हो और इससे तुम्हारे लिए सत्य वास्तविकता में प्रवेश करना बहुत मुश्किल हो जाएगा। चाहे तुम्हारा ऐसी किसी भी चीज से सामना हो जिसे तुम पूरी तरह समझ न पाओ या जो तुम्हें कठिन लगे, तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। तुम्हें पहले परमेश्वर के सामने आकर और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए। इस तरह, इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम्हारी आंतरिक अवस्था में एक बदलाव आएगा और तुम समस्या हल करने के लिए सत्य की तलाश कर पाओगे। इस तरह तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर पाओगे। जब ऐसा होगा तो तुम्हारे भीतर सत्य वास्तविकता गढ़ी जाएगी, और इस तरह से तुम प्रगति करोगे और तुम्हारे जीवन की अवस्था का रूपांतरण होगा। एक बार जब तुम इस बदलाव से गुजर चुको और तुममें यह सत्य वास्तविकता आ जाए, तब तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, और जब तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा, तब जीवन होगा। यदि कोई हमेशा शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर जीता है, तो फिर चाहे उसमें कितना भी उत्साह या प्रबल प्रेरणा हो, यह नहीं माना जा सकता कि उसके पास आध्यात्मिक कद या जीवन है। जब परमेश्वर हर व्यक्ति में कार्य करता है, भले ही उसकी विधि कुछ भी हो, सेवा करने के लिए वो किस प्रकार के लोगों, घटनाओं या चीज़ों का प्रयोग करता है, या उसकी बातों का लहजा कैसा है, परमेश्वर का केवल एक ही अंतिम लक्ष्य होता है : तुम्हें बचाना। और वह तुम्हें कैसे बचाता है? तुम्हें बदलकर। तो तुम थोड़ी-बहुत पीड़ा कैसे नहीं सह सकते? तुम्हें थोड़ी-बहुत पीड़ा तो सहनी ही होगी। इस पीड़ा में कई चीजें शामिल हो सकती हैं। पहले, जब लोग परमेश्वर के वचनों का न्याय और ताड़ना स्वीकारते हैं, तो उन्हें कष्ट होता है। जब परमेश्वर के वचन बहुत कठोर और स्पष्ट होते हैं तब लोग परमेश्वर को गलत समझ लेते हैं, यहाँ तक कि वे धारणाएँ भी विकसित कर लेते हैं और उन्हें थोड़ा-बहुत कष्ट भी होता है। कभी-कभी परमेश्वर लोगों की भ्रष्टता प्रकट करने के लिए और उनसे आत्मचिंतन और आत्मज्ञान करवाने के लिए उनके आसपास एक परिवेश बना देता है और तब उन्हें थोड़ा कष्ट भी होता है। कई बार जब लोगों की सीधे काट-छाँट कर उन्हें उजागर किया जाता है, तब वे कष्ट सहते हैं। भ्रष्ट स्वभाव हल करना सर्जरी कराने जैसा ही है—बिना कष्ट सहे तुम कोई परिणाम नहीं पा सकते। यदि हर बार जब तुम्हारी काट-छाँट की जाती है और हर बार जब तुम किसी परिवेश द्वारा प्रकट किए जाते हो, यह तुम्हारे हृदय को झकझोरता है और तुम्हें बढ़ावा देता है, तुम्हें सत्य खोजने और आत्मचिंतन करने, अपनी भ्रष्टता और विद्रोहशीलता जानने और परमेश्वर के सामने सच में पश्चात्ताप करने के लिए प्रेरित करता है—यदि तुम इस तरह से चीजों को अनुभव करते हो तो तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे और तुम्हारा आध्यात्मिक कद होगा। यदि, हर बार काटे-छांटे जाने और किसी परिवेश द्वारा प्रकट किए जाने पर, तुम्हें थोड़ी-भी पीड़ा या असुविधा महसूस नहीं होती और कुछ भी महसूस नहीं होता, और तुम परमेश्वर के इरादे खोजने उसके सामने नहीं आते, न प्रार्थना करते हो, न ही सत्य की खोज करते हो, तो तुम बहुत सुन्न हो! यदि तुम परमेश्वर के वचन नहीं पढ़ते और सत्य समझने की कोशिश नहीं करते, किसी स्थिति का सामना करने पर सत्य खोजना तो दूर की बात है, और तुम्हारी आत्मा के भीतर एक मृत व्यक्ति की तरह थोड़ी-सी भी जागरूकता या प्रतिक्रिया नहीं होती, तो परमेश्वर अब तुममें कार्य नहीं करेगा। वह कहेगा, “यह व्यक्ति बहुत सुन्न और बहुत गहराई तक भ्रष्ट है। इसे चाहे कैसे भी नियंत्रण में रखा जाए, इसकी कैसे भी काट-छाँट की जाए या इसे कैसे भी अनुशासित किया जाए, यह फिर भी किसी तरह इसके दिल को नहीं झकझोरता या इसकी आत्मा को नहीं जगाता। इसके बचाए जाने की संभावना नहीं है।” मान लो परमेश्वर तुम्हारे लिए विशेष परिवेशों, लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम करता है, या वह तुम्हारी काट-छाँट करता है और तुम इससे सबक सीखते हो; तुम परमेश्वर के सामने आना, सत्य खोजना सीखते हो और अनजाने ही प्रबुद्ध और रोशन हो जाते हो और सत्य प्राप्त कर लेते हो; तुम इन परिवेशों में बदलावों का अनुभव करते हो, कुछ प्राप्त करते हो और प्रगति करते हो, और तुम परमेश्वर के इरादे की थोड़ी समझ प्राप्त करना शुरू कर देते हो और शिकायत करना बंद कर देते हो। इसका मतलब है कि तुम इन परिवेशों के परीक्षणों के बीच में अडिग रहे हो और तुमने परीक्षा सहन कर ली है। उस स्थिति में तुमने इस बाधा को पार कर लिया होगा। इम्तिहान में खरे उतरने वालों को परमेश्वर किस नजर से देखेगा? परमेश्वर कहेगा कि उनके पास सच्चे हृदय हैं; वह कहेगा कि वे इस तरह की पीड़ा सह सकते हैं, वे अपने हृदयों में सत्य से प्रेम करते हैं और वे सत्य हासिल करना चाहते हैं। अगर परमेश्वर का तुम्हारे बारे में इस तरह का आकलन है तो क्या तुम आध्यात्मिक कद वाले नहीं हो? तब क्या तुम्हारे पास जीवन नहीं है? और यह जीवन कैसे प्राप्त किया जाता है? क्या यह परमेश्वर द्वारा प्रदत्त है? परमेश्वर तुम्हें कई तरह से आपूर्ति करता है और तुम्हें प्रशिक्षित करने के लिए विभिन्न लोगों, घटनाओं और चीजों का इस्तेमाल करता है। यह बिल्कुल ऐसा है जैसे परमेश्वर खुद तुम्हें भोजन और जल प्रदान कर रहा हो, खुद खाने की विभिन्न वस्तुएँ तुम तक पहुँचा रहा हो ताकि तुम पेट भरकर खाओ और आनंदित रहो; तभी तुम विकसित और मजबूती से खड़े हो सकते हो। तुम्हें इसी तरह से चीजों को अनुभव करना और समझना चाहिए; परमेश्वर से आने वाली हर चीज के प्रति समर्पित होने का यही अर्थ है। तुम्‍हारा विनम्र रवैया होना चाहिए और तुम्हें सत्य खोजना सीखना चाहिए। अपनी परेशानियों के लिए तुम्हें हमेशा बाहरी कारण नहीं खोजने चाहिए या लगातार दूसरों को दोष नहीं देना चाहिए और लोगों की कमियाँ नहीं निकालनी चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के इरादे समझने चाहिए। बाहर से, ऐसा लग सकता है कि कुछ लोगों की तुम्‍हारे बारे में धारणाएँ हैं या पूर्वाग्रह हैं, लेकिन तुम्‍हें इस रूप में चीजों को नहीं देखना चाहिए। अगर तुम इस तरह के दृष्टिकोण से चीजों को देखोगे, तो तुम केवल बहस करने की कोशिश करोगे और तुम कुछ भी प्राप्‍त नहीं कर पाओगे। तुम्हें चीजों को वस्तुगत ढंग से देखना चाहिए; और सब कुछ परमेश्वर से स्वीकार लेना चाहिए। जब तुम चीजों को इस तरीके से देखते हो तो तुम्हारे लिए परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण करना आसान हो जाता है, और तुम सत्य खोजने और परमेश्वर के इरादे समझने में सक्षम हो जाते हो। एक बार जब तुम्हारा दृष्टिकोण और मनोदशा सही हो जाएगी, तब तुम सत्य प्राप्त करने में सक्षम हो जाओगे। तो सहर्ष ऐसा क्यों नहीं कर देते? तुम अवज्ञाकारी क्यों होते हो? अगर तुम अवज्ञाकारी होना बंद कर दो, तो तुम सत्य प्राप्त कर लोगे। अगर तुम अवज्ञाकारी होगे, तो तुम्हें कुछ नहीं मिलेगा और तुम परमेश्वर को दुखी और निराश भी कर दोगे। परमेश्वर क्यों निराश होगा? क्योंकि तुम सत्य नहीं स्वीकारते, तुम्हारे पास उद्धार की कोई आशा नहीं है और परमेश्वर तुम्हें प्राप्त नहीं कर पाता। वह निराश कैसे न हो? जब तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते हो तो यह खुद परमेश्वर द्वारा तुम्हें परोसे गए भोजन को दूर हटाने के समान होता है। तुम कहते हो कि तुम्हें भूख नहीं है और तुम्हें इसकी जरूरत नहीं है; परमेश्वर बार-बार तुम्हें खाने की सलाह देता है, लेकिन तुम फिर भी खाना नहीं चाहते। इसके बजाय तुम भूखे रहना पसंद करोगे। तुम सोचते हो कि तुम्हारा पेट भरा है, जबकि वास्तव में तुम्हारे पास बिल्कुल कुछ भी नहीं है। ऐसे लोगों में विवेक का बहुत अभाव होता है और वे बहुत आत्मतुष्ट होते हैं; वास्तव में वे कोई अच्छी चीज देखकर भी इसे पहचान नहीं पाते हैं, वे लोगों में सबसे अधिक दरिद्र और दयनीय होते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य प्राप्त करने के लिए अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों से सबक सीखना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 387

अपने कार्य में, कलीसिया के अगुआओं और कार्यकर्ताओं को दो सिद्धांतों पर ध्यान अवश्य देना चाहिए : एक यह कि उन्हें बिल्कुल कार्य व्यवस्थाओं द्वारा निर्धारित सिद्धांतों के अनुसार ही कार्य करना चाहिए, उन सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करना चाहिए और कल्पनाएँ नहीं करनी चाहिए या अपने विचारों के अनुसार कार्य नहीं करना चाहिए। जो कुछ भी वे करें, उन्हें कलीसिया के कार्य के लिए विचारशीलता दिखानी चाहिए, और हमेशा परमेश्वर के घर के हित सबसे पहले रखने चाहिए। दूसरी बात, जो बेहद अहम है, वह यह है कि जो कुछ भी वे करें, उसमें उन्हें पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करने पर अवश्य ध्यान देना चाहिए और परमेश्वर के वचनों का कड़ाई से पालन करते हुए काम करना चाहिए। यदि वे अभी भी पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के विरुद्ध जा सकते हैं और यहाँ तक कि वे जिद्दी बनकर अपने विचारों और अपनी कल्पना के अनुसार कार्य करते हैं, तो उनके कृत्य को परमेश्वर के प्रति एक अति गंभीर विरोध माना जाएगा। पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन से अक्सर मुँह फेरना उन्हें बंद गली की ओर ले जाएगा। यदि वे पवित्र आत्मा के कार्य को गँवा देते हैं, तो वे कार्य नहीं कर पाएँगे; और यदि वे बस किसी तरह कुछ कार्य करने का प्रबंध कर भी लेते हैं, तो भी उसके कोई नतीजे नहीं निकलेंगे। कार्य करते समय दो मुख्य सिद्धांत ये हैं जिनका पालन अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करना चाहिए : एक है कार्य को ऊपरवाले से प्राप्त कार्य व्यवस्थाओं के अनुसार सटीकता से करना और साथ ही ऊपरवाले द्वारा तय किए गए सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना। और दूसरा सिद्धांत है, अपने भीतर के पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन का पालन करना। एक बार जब वे इन दोनों सिद्धांतों को अच्छी तरह से समझ लेंगे, तो उनकी अपने काम में गलतियाँ करने की आशंका नहीं रहेगी। कलीसिया का कार्य करने में तुम लोगों का अनुभव अभी भी सीमित है और जब तुम काम करते हो, तो वह कुछ हद तक तुम्हारे अपने विचारों से दूषित होता है। कभी-कभी, हो सकता है कि तुम अपने भीतर के प्रबोधन और मार्गदर्शन को न समझ पाओ जो पवित्र आत्मा से आता है; और कभी, ऐसा लगता है कि तुम इसे समझ गये हो परन्तु बहुत संभव है कि तुम इसकी अनदेखी कर दो। तुम लोग हमेशा अपने भीतर अपनी कल्पनाएँ करते या अटकलें लगाते हो, जैसा तुम्हें उचित लगता है वैसा करते हो और पवित्र आत्मा की इच्छाओं की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हो। तुम पूरी तरह से अपने विचारों का पालन करते हो और पवित्र आत्मा के किसी भी प्रबोधन को दरकिनार कर देते हो। ऐसी स्थितियां अक्सर होती हैं। पवित्र आत्मा का आंतरिक मार्गदर्शन अलौकिक नहीं है; वास्तव में यह बिल्कुल ही सामान्य है। यानी, अपने दिल की गहराई में तुम्हें लगता है कि कार्य करने का यही उपयुक्त और सर्वोत्तम तरीका है। ऐसा विचार वास्तव में बहुत ही स्पष्ट है; यह तुम्हारे अपने मन की उपज नहीं होता और कभी-कभी तुम पूरी तरह से नहीं समझ पाते कि तुम्हें इस तरह से कार्य क्यों करना चाहिए। यह अक्सर पवित्र आत्मा का प्रबोधन ही होता है। ऐसा सबसे अधिक अनुभवी लोगों के साथ होता है। पवित्र आत्मा चाहे जैसे भी लोगों को प्रबुद्ध करे या उनका मार्गदर्शन करे, सामान्य लोग इसे अपने हृदय में कुछ हद तक महसूस कर सकते हैं—यदि पूरी तरह से नहीं तो कम से कम वे इसका एक हिस्सा तो महसूस कर ही सकते हैं। वे सभी बता सकते हैं कि यह मानवीय सोच का नतीजा नहीं है बल्कि उनके दिलों के भीतर की एक भावना है : अचानक वे समझ जाते हैं, उनके पास आगे बढ़ने का एक मार्ग है और वे स्पष्टता प्राप्त कर लेते हैं। वे महसूस करते हैं कि एक निश्चित तरीके से कार्य करना सबसे अच्छा है, यह जाने बिना कि उन्हें उस तरह से कार्य करना क्यों पसंद है। यह पवित्र आत्मा से आ सकता है। किसी व्यक्ति के विचार अक्सर उसकी सोच से आते हैं और वे सभी निजी इच्छाओं से दूषित होते हैं; वे हमेशा इस बारे में सोचते हैं कि कोई चीज उन्हें कैसे लाभ पहुँचाती है और यह क्या फायदे प्रदान करती है। लोग जो भी कार्य करने का निर्णय लेते हैं, उसमें ये चीजें होती हैं। लेकिन पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन में ऐसी मिलावट बिल्कुल भी नहीं होती। पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन और प्रबोधन पर सावधानीपूर्वक ध्यान देना बहुत आवश्यक है; विशेषकर तुम्हें मुख्य विषयों में बहुत सचेत रहना होगा ताकि इन्हें समझा जा सके। ऐसे लोग जो अपना दिमाग लगाना पसंद करते हैं और जो अपने विचारों पर ही कार्य करना पसंद करते हैं, यह सर्वाधिक संभव है कि वे ऐसे मार्गदर्शन और प्रबोधन से चूक जाएँ। मानक के अनुरूप अगुआ और कर्मी ऐसे लोग होते हैं जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य होता है, जो हर पल पवित्र आत्मा के कार्य पर ध्यान देते हैं और जो पवित्र आत्मा के प्रति समर्पण करते हैं, परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय रखते हैं, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहते हैं और बिना थके सत्य के अनुसरण का प्रयास करते हैं। अपना कर्तव्य उचित रूप से पूरा करने और परमेश्वर की गवाही देने के लिए तुम्हें अक्सर इस बात पर विचार करना चाहिए कि तुम्हारे अपना कर्तव्य निभाने में कितने व्यक्तिगत इरादे और मिलावट हैं, तुम्हारे कौन-से विचार और दृष्टिकोण तुम्हारी अपनी सोच से उत्पन्न होते हैं, कौन-से पवित्र आत्मा के प्रबोधन से पैदा होते हैं और कौन-से परमेश्वर के वचनों के अनुसार हैं। तुम्हें निरंतर और सभी परिस्थितियों में इस बात पर विचार करना चाहिए कि क्या तुम्हारे शब्द और कर्म सत्य के अनुसार हैं। इस तरह से निरंतर अभ्यास करने से तुम परमेश्वर की सेवा करने के सही मार्ग पर आ जाओगे। परमेश्वर के इरादों के अनुरूप उसकी सेवा करने के लिए, सत्य वास्तविकताओं का होना आवश्यक है। सत्य को समझकर ही लोग भेद पहचानने के काबिल बनते हैं और वे यह पहचानने के योग्य होते हैं कि उनके अपने विचारों से क्या उत्पन्न होता है और इंसानी मंशाओं से क्या उत्पन्न होता है। वे मानवीय अशुद्धता को पहचानने के योग्य हो जाते हैं, और यह भी पहचान पाते हैं कि सत्य के अनुसार कार्य करना क्या होता है। भेद कर पाने के बाद ही यह सुनिश्चित हो सकता है कि वे सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं और पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हैं। सत्य को समझे बिना लोगों के लिए भेद कर पाना असंभव है। एक भ्रमित व्यक्ति शायद आजीवन परमेश्वर पर विश्वास करे, लेकिन यह नहीं समझ पाता कि अपनी भ्रष्टता को प्रकट करने का क्या अर्थ होता है या परमेश्वर का विरोध करने का क्या अर्थ होता है, क्योंकि वह सत्य को नहीं समझता; उसके मन में वह विचार ही मौजूद तक नहीं है। सत्य बेहद निम्न काबिलियत वाले लोगों की पहुँच से बाहर होता है; तुम उनके साथ किसी भी प्रकार से संगति करो, फिर भी वे नहीं समझते। ऐसे लोग भ्रमित होते हैं। अपनी आस्था में, इस प्रकार के भ्रमित लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; वे थोड़ी-सी मजदूरी ही कर सकते हैं। अगर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अपने कर्तव्य अच्छे से निभाने हैं, तो उनकी काबिलियत बहुत खराब नहीं होनी चाहिए। कम-से-कम उनमें आध्यात्मिक समझ तो होनी ही चाहिए और उन्हें चीजों को विशुद्ध रूप से समझना चाहिए, ताकि वे आसानी से सत्य को समझकर उसका अभ्यास कर सकें। कुछ लोगों का अनुभव बहुत उथला होता है, इसलिए कभी-कभी उनकी सत्य की समझ में विकृतियाँ होती हैं और उनकी गलतियाँ करने की बहुत अधिक संभावना रहती है। जब उनकी समझ में विकृतियाँ होती हैं तो वे सत्य का अभ्यास करने योग्य नहीं रहते। जब लोगों की सत्य की समझ में विकृतियाँ होती हैं तो संभावना है कि वे विनियमों के अनुसार चलेंगे और जब वे विनियमों के अनुसार चलते हैं तो गलतियाँ करना आसान होता है और वे सत्य के अभ्यास के योग्य नहीं रहते। जब समझ में विकृतियाँ होती हैं तो मसीह-विरोधियों के हाथों गुमराह और इस्तेमाल होना भी आसान होता है। इसलिए समझ में विकृतियों के कारण बहुत-सी गलतियाँ हो सकती हैं। इसके परिणामस्वरूप, वे न केवल अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाने में असफल हो जाएँगे, वे आसानी से भटक भी सकते हैं, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के जीवन प्रवेश को हानि पहुँचाता है। इस तरह से अपना कर्तव्य निभाने का क्या महत्व रह जाता है? वे ऐसे लोग बन गए हैं जो बस कलीसिया के काम में गड़बड़ी करते और बाधा डालते हैं। इसके अलावा, इन असफलताओं से सबक सीखने चाहिए। परमेश्वर के सौंपे गए कार्य को करने के लिए अगुआ और कार्यकर्ताओं को ये दो सिद्धांत में महारत हासिल कर अभ्यास में लाने चाहिए : कर्तव्य निभाते समय ऊपरवाले की कार्य व्यवस्था का कड़ाई से पालन करना और परमेश्वर के वचनों के अनुसार पवित्र आत्मा के किसी भी मार्गदर्शन पर ध्यान देकर इसके प्रति समर्पण करना। जब इन दोनों सिद्धांतों में महारत हासिल कर अभ्यास में लाया जाएगा, तभी किसी व्यक्ति का कार्य कारगर हो सकता है और परमेश्वर के इरादे पूरे हो सकते हैं।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 388

पतरस ने स्वयं को जानने का और यह जाँचने का प्रयत्न किया था कि परमेश्वर के वचनों के शुद्धिकरण से और परमेश्वर द्वारा उसके लिए उपलब्ध कराए गए विभिन्न परीक्षणों के भीतर उसमें क्या प्रकट हुआ था। जब वह वास्तव में खुद को जान गया, तो पतरस को एहसास हुआ कि मनुष्य कितनी गहराई तक भ्रष्ट हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने की दृष्टि से कितने बेकार और अयोग्य हैं, और कि वे परमेश्वर के समक्ष जीने के लायक नहीं हैं। पतरस तब परमेश्वर के सामने दंडवत हो गया। चीजों का इस तरह अत्यधिक अनुभव करने के बाद, अंततः पतरस को लगा, “परमेश्वर को जानना सबसे मूल्यवान है! अगर मैं परमेश्वर को जानने से पहले मर गया, तो यह बहुत अफसोसजनक होगा; परमेश्वर को जानना सबसे महत्त्वपूर्ण, सबसे अर्थपूर्ण बात है। यदि मनुष्य परमेश्वर को नहीं जानता, तो वह जीने का हकदार नहीं है, वह पशु के समान ही है और उसके पास कोई जीवन नहीं है।” जब तक पतरस का अनुभव इस बिंदु तक पहुँचा, तब तक वह अपनी प्रकृति को जान गया था और वह अपेक्षाकृत स्पष्ट ढंग से इसका एहसास कर सकता था। हालाँकि वह इसे उतनी अच्छी तरह नहीं समझा सकता था जितना आजकल लोग समझाने में सक्षम हैं, लेकिन वह निस्संदेह इस स्थिति में पहुँच गया था। इसलिए, सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने और परमेश्वर से पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के वचनों के भीतर से अपनी प्रकृति को जानने, और साथ ही अपनी प्रकृति के विभिन्न पहलुओं को जानने और शब्दों में उसका सटीक रूप से वर्णन करने, स्पष्ट और सादे ढंग से बोलने की जरूरत है। सही मायने में खुद को जानना यही है और केवल इसी तरीके से तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित परिणाम प्राप्त कर पाओगे। यदि तुम्हारा ज्ञान इस बिंदु तक नहीं पहुँचा है, फिर भी तुम खुद को समझने का दावा करते हो और कहते हो कि तुमने जीवन प्राप्त कर लिया है, तो क्या तुम केवल डींग नहीं मार रहे हो? तुम खुद को नहीं जानते, और न ही तुम यह जानते हो कि तुम परमेश्वर के सामने क्या हो, तुमने वास्तव में एक इंसान होने के मानक पूरे कर लिए हैं या नहीं, या तुम्हारे भीतर अभी भी कितने शैतानी तत्त्व हैं। तुम अभी भी इस बारे में अस्पष्ट हो कि तुम किससे संबंधित हो और तुम्हारे पास कोई आत्म-जागरूकता तक नहीं है—फिर परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास विवेक कैसे हो सकता है? जब पतरस जीवन की खोज कर रहा था, तो उसने अपने परीक्षणों के दौरान खुद को जानने और अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान केंद्रित किया, और उसने परमेश्वर को जानने का प्रयास किया। अंत में उसने सोचा, “लोगों को जीवन में परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण अवश्य करना चाहिए; उसे जानना सबसे महत्त्वपूर्ण बात है। अगर मैं परमेश्वर को नहीं जानता, तो मरने पर मुझे शांति नहीं मिलेगी। एक बार जब मैं उसे जान लूँगा, उसके बाद यदि परमेश्वर मुझे मरने भी दे तो मैं सर्वाधिक संतुष्ट महसूस करूँगा। मैं जरा भी शिकायत नहीं करूँगा और महसूस करूँगा कि मेरा पूरा जीवन सार्थक रहा है।” पतरस परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के तुरंत बाद यह ज्ञान प्राप्त करने या इस बिंदु तक पहुँचने में सक्षम नहीं था; इसके बजाय वह बहुत-से परीक्षणों से गुजरा। एक निश्चित हद तक चीजों का अनुभव करने और स्वयं को पूरी तरह से जानने के बाद ही उसने परमेश्वर को जानने के मूल्य को महसूस किया। इसलिए, पतरस ने जो मार्ग अपनाया, वह सत्य का अनुसरण करने, जीवन प्राप्त करने और पूर्ण बनाए जाने का मार्ग था। उसका विशिष्ट अभ्यास मुख्य रूप से इसी पहलू पर केंद्रित था।

परमेश्वर में अपनी आस्था में, अब तुम लोग किस मार्ग पर चल रहे हो? अगर तुम पतरस की तरह जीवन, अपने बारे में समझ और परमेश्वर संबंधी ज्ञान की खोज नहीं करते, तो तुम पतरस के मार्ग पर नहीं चल रहे हो। इन दिनों, अधिकांश लोग इस तरह की दशा में हैं : आशीष प्राप्त करने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाना होगा और परमेश्वर के लिए कीमत चुकानी होगी। आशीष पाने के लिए मुझे परमेश्वर के लिए सब कुछ त्याग देना चाहिए; मुझे उसके द्वारा सौंपा गया काम पूरा करना चाहिए, और मुझे अपना कर्तव्य अवश्य अच्छे से करना चाहिए। यह आशीष प्राप्त करने के इरादे से प्रेरित होता है और वे पूरी तरह से उससे पुरस्कार प्राप्त करने और मुकुट हासिल करने के उद्देश्य से ही परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हैं। ऐसे लोगों के दिलों में सत्य नहीं होता है और यह निश्चित है कि वे केवल कुछ शब्द और धर्म-सिद्धांत समझते हैं और जहाँ भी जाते हैं दिखावा करते हैं। उनका मार्ग ठीक पौलुस का मार्ग है। ऐसे लोगों के लिए, परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ केवल लगातार काम करना है। उनके मन में, यह ऐसा है मानो वे जितना अधिक काम करेंगे, परमेश्वर के प्रति उनकी वफादारी उतनी ही अधिक साबित होगी और वह निश्चित रूप से उतना ही अधिक संतुष्ट होगा; यह ऐसा है मानो वे जितना अधिक काम करेंगे, वे परमेश्वर के सामने मुकुट दिए जाने के उतने ही अधिक योग्य होंगे और वे उतने ही बड़े आशीष प्राप्त करेंगे। वे सोचते हैं कि यदि वे उपदेश दे सकते हैं, कष्ट सह सकते हैं और मसीह के लिए अपने जीवन का बलिदान कर सकते हैं और यदि वे उन कर्तव्यों को पूरा कर सकते हैं जो परमेश्वर ने उन्हें सौंपे हैं तो वे ऐसे लोग होंगे जो सबसे बड़े आशीष प्राप्त करेंगे और यह निश्चित है कि उन्हें मुकुट दिया जाएगा। पौलुस ने ठीक यही कल्पना की थी और इसी का अनुसरण किया था। यही वह मार्ग है जिस पर वह चला था, और ऐसे ही विचार लेकर उसने परमेश्वर की सेवा करने का काम किया था। क्या इन विचारों और इरादों की उत्पत्ति शैतान की प्रकृति से नहीं होती? यह सांसारिक मनुष्यों की तरह है, जो मानते हैं कि पृथ्वी पर रहते हुए उन्हें ज्ञान की खोज अवश्य करनी चाहिए, और उसे प्राप्त करने के बाद वे भीड़ से अलग दिखाई दे सकते हैं, पदाधिकारी बन सकते और हैसियत प्राप्त कर सकते हैं। वे सोचते हैं कि जब उनके पास हैसियत हो जाएगी, तो वे अपनी महत्वाकांक्षाएँ पूरी कर सकते हैं और अपने व्यवसाय और पारिवारिक पेशे को समृद्धि के एक निश्चित स्तर पर ले जा सकते हैं। क्या सभी गैर-विश्वासी इसी मार्ग पर नहीं चलते? जिन लोगों पर इस शैतानी प्रकृति का वर्चस्व है, वे अपने विश्वास में केवल पौलुस की तरह हो सकते हैं। वे सोचते हैं : “मुझे परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की खातिर सब कुछ त्याग देना चाहिए। मुझे परमेश्वर के समक्ष समर्पित होना चाहिए, और अंततः मुझे बड़े पुरस्कार और एक बड़ा मुकुट मिलेगा।” यह वही सोच है, जो उन सांसारिक लोगों की होती है, जो सांसारिक चीजें पाने की कोशिश करते हैं; यह बिल्कुल समान है और समान प्रकृति से प्रेरित है। जब लोगों की शैतानी प्रकृति इस प्रकार की होगी, तो दुनिया में वे ज्ञान, शिक्षा, हैसियत प्राप्त करने और भीड़ से अलग दिखने की कोशिश करेंगे। यदि वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे बड़े मुकुट और बड़े आशीष प्राप्त करने की कोशिश करेंगे। यदि परमेश्वर में विश्वास करते हुए लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, तो उनका इस मार्ग पर चलना निश्चित है। यह तथ्य किसी भी व्यक्ति द्वारा नहीं बदला जा सकता है, यह एक प्राकृतिक नियम है। सत्य का अनुसरण न करने वाले लोग जो मार्ग अपनाते हैं, वह पतरस के मार्ग से एकदम विपरीत होता है। तुम लोग फिलहाल किस मार्ग पर हो? हालाँकि तुमने पौलुस के मार्ग पर चलने की योजना नहीं बनाई होगी, लेकिन तुम्हारी प्रकृति ने यह तय कर दिया है कि तुम उसी मार्ग पर चल रहे हो, और न चाहते हुए भी तुम उसी दिशा में जा रहे हो। हालाँकि तुम पतरस के मार्ग पर चलना चाहते हो, लेकिन अगर तुम्हें यह स्पष्ट नहीं है कि यह कैसे करना है, तो तुम अनजाने में ही पौलुस के मार्ग पर चल दोगे : स्थिति की यही वास्तविकता है। इन दिनों वास्तव में पतरस के मार्ग पर कैसे चलना चाहिए? अगर तुम पतरस और पौलुस के मार्गों में अंतर न कर पाओ, या तुम उनसे बिल्कुल परिचित नहीं हो, तो तुम पतरस के मार्ग पर चलने का चाहे कितना भी दावा करो, तुम्हारे वे शब्द बस खोखले ही हैं। पहले तो, तुम्हें इस बात का स्पष्ट पता होना चाहिए कि पतरस का मार्ग क्या है और पौलुस का मार्ग क्या है। जब तुम सचमुच समझ जाते हो कि पतरस का मार्ग ही जीवन के अनुसरण का मार्ग है, और वही पूर्णता का एकमात्र मार्ग है, तो तुम पतरस के मार्ग पर चल पाओगे, उसकी तरह अनुसरण कर पाओगे और उन सिद्धांतों का अभ्यास कर पाओगे जिनका अभ्यास उसने किया था। यदि तुम पतरस के मार्ग को नहीं समझते, तो तुम्हारे द्वारा लिए गए मार्ग का पौलुस का मार्ग होना निश्चित है, क्योंकि तुम्हारे लिए कोई दूसरा मार्ग नहीं होगा; तुम्हारे पास इस मामले में कोई विकल्प नहीं होगा। जो लोग सत्य नहीं समझते और जो उसका अनुसरण नहीं कर पाते, तो संकल्प के बावजूद, उन्हें पतरस के मार्ग पर चलना मुश्किल लगेगा। यह कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर का अनुग्रह और उन्नयन है कि उसने अब तुम्हारे लिए उद्धार और पूर्णता का मार्ग प्रकट किया है। वही है जो पतरस के मार्ग पर तुम्हारा मार्गदर्शन कर रहा है। परमेश्वर के मार्गदर्शन और प्रबुद्धता के बिना कोई भी पतरस के मार्ग पर नहीं चल पाएगा, और तबाही की तरफ पौलुस के नक्शेकदमों पर चलते हुए पौलुस के मार्ग पर आगे बढ़ना ही एकमात्र विकल्प होगा। उस समय पौलुस को यह नहीं लगा कि उस मार्ग पर चलना गलत है; वह पूरी तरह से मानता था कि यह सही है। उसने सत्य प्राप्त नहीं किया था, और उसके स्वभाव में कोई बदलाव नहीं आया था। वह खुद पर बहुत अधिक विश्वास करता था, और सोचता था कि उस तरह विश्वास करने में कोई समस्या नहीं है। आत्मविश्वास से भरकर और पूरी तरह से आश्वस्त होकर वह आगे बढ़ता रहा। उसे अंत तक होश नहीं आया। फिर भी वो यही सोचता रहा कि उसके लिए जीना ही मसीह है। इस प्रकार, पौलुस अंत तक उसी मार्ग पर चलता रहा, और अंततः जब उसे दंडित किया गया, तब तक उसके लिए सब कुछ खत्म हो चुका था। पौलुस का मार्ग खुद को जानने का मार्ग नहीं था, स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करने का मार्ग तो वह और भी कम था। उसने कभी अपनी प्रकृति का गहन-विश्लेषण नहीं किया, न ही उसने इसका कोई ज्ञान प्राप्त किया कि वह क्या है। वह बस इतना जानता था कि वह यीशु के उत्पीड़न में मुख्य अपराधी है। लेकिन उसे अपनी प्रकृति की थोड़ी-सी भी समझ नहीं थी, और अपना काम खत्म करने के बाद पौलुस को लगा कि वह मसीह की तरह जी रहा है और उसे पुरस्कृत किया जाना चाहिए। पौलुस ने जो काम किया, वह केवल परमेश्वर के लिए प्रदान की गई सेवा थी। हालाँकि पौलुस को पवित्र आत्मा से कुछ प्रकाशन मिले थे, फिर भी व्यक्तिगत रूप से उसने सत्य या जीवन प्राप्त नहीं किया था। इसलिए उसे परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं गया। बल्कि उसे परमेश्वर द्वारा दंडित किया गया। ऐसा क्यों कहा जाता है कि पतरस का मार्ग पूर्णता का मार्ग है? वह इसलिए, क्योंकि अपने अभ्यास में पतरस ने जीवन पर, परमेश्वर को जानने का प्रयास करने पर और खुद को जानने पर विशेष बल दिया। परमेश्वर के कार्य के अपने अनुभव से उसने खुद को जाना, मनुष्य की भ्रष्ट अवस्थाओं की समझ हासिल की, अपनी कमियों को जाना, और उस सबसे मूल्यवान चीज की खोज की, जिसका लोगों को अनुसरण करना चाहिए। वह परमेश्वर से ईमानदारी से प्रेम कर पाया, उसने जाना कि परमेश्वर का ऋण कैसे चुकाया जाए, उसने कुछ सत्य हासिल किया, उसमें वह वास्तविकता थी जिसकी परमेश्वर अपेक्षा करता है। अपने परीक्षणों के दौरान पतरस ने जो कुछ कहा, उन सबसे यह देखा जा सकता है कि वह निस्संदेह परमेश्वर की सबसे अधिक समझ रखने वाला व्यक्ति था। चूँकि उसे परमेश्वर के वचनों से इतना अधिक सत्य समझ में आ गया था, इसलिए उसका मार्ग और अधिक उज्ज्वल और परमेश्वर के इरादों के और अधिक अनुरूप होता गया। यदि पतरस में यह सत्य न होता, तो उसने जो मार्ग अपनाया, वह इतना सही नहीं हो पाता।

—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पतरस के मार्ग पर कैसे चलें

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 389

पतरस बहुत वर्षों तक मेरे प्रति समर्पित रहा, किंतु वह कभी बड़बड़ाया नहीं और न ही उसके पास कोई शिकायत वाला हृदय था; यहाँ तक कि अय्यूब भी उसके बराबर नहीं था, और युगों-युगों के दौरान सारे संत, पतरस से बहुत पीछे रहे। उसने न केवल मुझे जानने का प्रयास किया बल्कि मुझे उस समय जाना जब शैतान अपने षड्यंत्र रच रहा था। और इसलिए पतरस की मेरे प्रति बरसों की सेवा मेरे इरादों के अनुसार थी और इसी कारण शैतान द्वारा उसका कभी उपयोग नहीं हुआ। पतरस ने अय्यूब की आस्था से सीख ली, लेकिन साथ ही उसकी कमियों को भी स्पष्ट रूप से जाना। यूँ तो अय्यूब बहुत ही आस्थावान था, किंतु उसमें आध्यात्मिक क्षेत्र के विषयों के ज्ञान का अभाव था, इसलिए उसने बहुत-सी ऐसी बातें कहीं जो वास्तविकता से मेल नहीं खाती थीं; यह दर्शाता है कि अय्यूब का ज्ञान उथला रहा और पूर्णता तक पहुँचने में असमर्थ था। इसलिए, पतरस हमेशा अपनी आत्मा के अंदर की भावनाओं को समझने के प्रयास पर ध्यान केंद्रित करता था और हमेशा आध्यात्मिक क्षेत्र की गतिविधियों का अवलोकन करने पर ध्यान देता था। लिहाजा, वह न केवल मेरे इरादों को थोड़ा-सा समझ पाया, बल्कि उसे शैतान के षड्यंत्रों का भी थोड़ा-बहुत ज्ञान था। इस कारण, मेरे बारे में उसे युगों-युगों के दौरान किसी भी अन्य की अपेक्षा सर्वाधिक ज्ञान था।

पतरस के अनुभव से, यह देख पाना कठिन नहीं है कि यदि मनुष्य मुझे जानना चाहते हैं, तो उन्हें उस चीज को समझने का सावधानीपूर्वक प्रयास करने पर ध्यान केंद्रित करना ही चाहिए जो आत्मा के अंदर है, न कि मुझे बाहरी तौर पर कुछ मात्रा “समर्पित” करने पर; यह गौण मामला है। यदि तुम मुझे नहीं जानते हो, तो तुम जिस आस्था, प्रेम और निष्ठा की बात करते हो वे सब भ्रम और बुलबुले के सिवाय कुछ नहीं हैं, और तुम निश्चित रूप से ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जो मेरे सामने बड़ी बातें करता है किंतु स्वयं को नहीं जानता है। ऐसे में, तुम एक बार फिर शैतान के द्वारा फँसा लिए जाओगे और अपने आपको छुड़ा नहीं पाओगे; तुम तबाही के पुत्र और विनाश के पात्र बन जाओगे। हालाँकि, यदि तुम मेरे वचनों के प्रति उदासीनता दिखाते हो तो तुम निस्संदेह मेरा विरोध करते हो। यह एक तथ्य है। तुम्हारे लिए अच्छा होगा कि तुम आध्यात्मिक क्षेत्र के द्वार से उन कई और विभिन्न आत्माओं को देखो जिन्हें मेरे द्वारा ताड़ना दी गई है—उनमें से किसके लिए यह मेरे वचनों के प्रति नकारात्मकता और उदासीनता से पेश आने और उन्हें स्वीकार न करने का परिणाम नहीं था? उनमें से किसमें मेरे वचनों को लेकर उपहास का रवैया नहीं था? उनमें से किसने मेरे वचनों में दोष ढूँढ़ने की कोशिश नहीं की? उनमें से किसने मेरे वचनों का स्वयं को “बचाने” के लिए “रक्षात्मक हथियार” के रूप में उपयोग नहीं किया? उन्होंने मेरे वचनों के माध्यम से मेरे ज्ञान का अनुसरण नहीं किया बल्कि केवल उनका उपयोग किया और उनके साथ ऐसे खेले जैसे कि वे खिलौने हों। इसमें, क्या वे सीधे मेरा प्रतिरोध नहीं कर रहे थे? मेरे वचन कौन हैं? मेरा आत्मा कौन है? मैंने इतनी अधिक बार ऐसे प्रश्न तुम लोगों से पूछे हैं, फिर भी क्या तुम लोगों को उनके बारे में कभी थोड़ी-भी उच्चतर और स्पष्ट अंतर्दृष्टि मिली है? क्या तुमने सच में कभी उनका अनुभव किया है? मैं तुम्हें एक बार फिर याद दिलाता हूँ : यदि तुम मेरे वचनों को नहीं जानते हो, न ही उन्हें स्वीकार करते हो, न ही उन्हें अभ्यास में लाते हो, तो तुम अपरिहार्य रूप से मेरी ताड़ना के लक्ष्य बनोगे! तुम निश्चित रूप से शैतान के शिकार बनोगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 8

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 390

यद्यपि बहुत सारे लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, लेकिन कुछ ही लोग यह समझते हैं कि परमेश्वर में विश्वास का अर्थ क्या है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए उन्हें वास्तव में कैसे कार्य करना चाहिए। ऐसा इसलिए है कि लोग यूँ तो “परमेश्वर” शब्द को और “परमेश्वर का कार्य” जैसे वाक्यांशों को जानते हैं, लेकिन वे परमेश्वर को नहीं जानते और उससे भी कम वे उसके कार्य को जानते हैं। तो कोई आश्चर्य नहीं कि वे सभी, जो परमेश्वर को नहीं जानते, उसमें अपने विश्वास में भ्रमित होते हैं। लोग परमेश्वर में विश्वास को गंभीरता से नहीं लेते और यह सर्वथा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर में विश्वास करना उनके लिए बहुत ही अनजाना, बहुत ही अज्ञात है। इस प्रकार वे परमेश्वर की अपेक्षाओं पर बहुत कम खरे उतरते हैं। दूसरे शब्दों में, यदि लोग परमेश्वर को नहीं जानते और उसके कार्य को नहीं जानते, तो वे परमेश्वर के उपयोग के योग्य नहीं हो सकते और उसके इरादों को पूरा करने में तो वे और भी असमर्थ होते हैं। “परमेश्वर में विश्वास” का अर्थ यह मानना है कि परमेश्वर है; यह परमेश्वर में विश्वास की सरलतम अवधारणा है। इस अवधारणा को एक कदम आगे ले जाएँ तो परमेश्वर के अस्तित्व को मानना परमेश्वर में सचमुच विश्वास करने जैसा नहीं है; बल्कि यह गहरे धार्मिक रंग वाली एक प्रकार की साधारण आस्था है। परमेश्वर में सच्चे विश्वास का अर्थ यह है : इस विश्वास के आधार पर कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, व्यक्ति उसके वचनों और उसके कार्य का अनुभव करता है और इस प्रकार से अपने भ्रष्ट स्वभाव त्याग देता है, परमेश्वर के इरादे पूरे करता है और परमेश्वर को जान पाता है। केवल इस प्रकार की यात्रा को ही “परमेश्वर में विश्वास” कहा जा सकता है। फिर भी लोग परमेश्वर में विश्वास को अक्सर बहुत सरल और तुच्छ मामला समझते हैं। जब लोग परमेश्वर में इस तरह विश्वास करते हैं तो यह अपना अर्थ खो देता है और भले ही वे बिल्कुल अंत तक विश्वास करते रहें, वे कभी परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं करेंगे, क्योंकि वे गलत मार्ग पर चलते हैं। वे लोग जो आज तक शब्दों और खोखले धर्म-सिद्धांतों के मध्य परमेश्वर में विश्वास करते हैं, वे अभी भी यह नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास के सार का उनमें अभाव है और वे परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं। फिर भी वे परमेश्वर से शांति और पर्याप्त अनुग्रह के आशीष के लिए प्रार्थना करते हैं। आओ अपने हृदय शांत करें और गहन विचार करें : क्या ऐसा हो सकता है कि परमेश्वर में विश्वास करना पृथ्वी पर सबसे आसान बात हो? क्या परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ परमेश्वर से अधिक अनुग्रह पाने से बढ़कर कुछ नहीं हो सकता है? क्या परमेश्वर को जाने बिना उसमें विश्वास करने वाले या उसमें विश्वास करने के बावजूद उसका विरोध करने वाले लोग सचमुच उसके इरादे पूरे कर पाते हैं?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, प्रस्तावना

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 391

मनुष्य ने जब पहली बार परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया था, तब से उसने क्या पाया है? तुमने परमेश्वर के बारे में क्या जाना है? परमेश्वर में अपने विश्वास के कारण तुम कितने बदले हो? आज, तुम सभी लोग यह जानते हो कि परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास सिर्फ आत्मा के उद्धार और दैहिक कल्याण के लिए नहीं है, और न ही यह परमेश्वर से प्रेम करने के माध्यम से अपने जीवन को समृद्ध बनाने इत्यादि के लिए है। वर्तमान स्थिति में, यदि तुम परमेश्वर से प्रेम दैहिक कल्याण या क्षणिक आनंद के लिए करते हो, तो भले ही अंत में परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम अपने शिखर पर पहुँच जाए और तुम इससे ज्यादा और कुछ न माँगो, लेकिन तुम जिस प्रेम के लिए प्रयास करते हो वह अभी भी मिलावटी प्रेम ही है और परमेश्वर के लिए प्रसन्नतादायक नहीं है। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करने का उपयोग अपने नीरस जीवन को समृद्ध बनाने और अपने हृदय के खालीपन को भरने के लिए करते हैं, वे उस तरह के लोग हैं जो आराम के लिए लालायित रहते हैं, न कि वे जो सच में परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करते हैं। इस प्रकार का प्रेम जबरदस्ती का प्रेम है, यह मानसिक सुख की खोज है और परमेश्वर को इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। तो फिर, तुम्हारा प्रेम किस तरह का है? तुम परमेश्वर से किसलिए प्रेम करते हो? अभी तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए कितना सच्चा प्रेम है? तुम लोगों में से अधिकांश का प्रेम उपर्युक्त प्रकार का है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ यथास्थिति बरकरार रख सकता है; यह अपरिवर्तनीयता प्राप्त नहीं कर सकता, न ही यह मनुष्य में जड़ें जमा सकता है। इस प्रकार का प्रेम सिर्फ ऐसे फूल की तरह होता है, जो खिलता है पर फल दिए बिना ही मुरझा जाता है। दूसरे शब्दों में, जब तुम एक बार परमेश्वर से इस तरीके से प्रेम कर लेते हो, तब अगर तुम्हें इस मार्ग पर आगे ले जाने वाला कोई नहीं है तो तुम ढह जाओगे। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करने के समय ही परमेश्वर से प्रेम कर सकते हो, लेकिन बाद में तुम्हारा जीवन स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, तो फिर तुम अंधकार के प्रभाव के आवरण में रहोगे, इससे निकलने में असमर्थ रहोगे, और तुम शैतान के बंधन और उसके द्वारा मूर्ख बनाए जाने से खुद को मुक्त करने में असमर्थ रहोगे। इस तरह का कोई भी व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता; अंततः उसकी आत्मा, प्राण और शरीर शैतान के ही रहेंगे। इसमें कोई संदेह नहीं हो सकता। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त नहीं किए जा सकते, वे सभी अपने मूल स्थान लौट जाएंगे, अर्थात् शैतान के पास लौट जाएंगे, और वे परमेश्वर के दंड का अगला चरण स्वीकार करने के लिए आग और गंधक की झील में उतर जाएंगे। परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाले वे होते हैं, जो शैतान के खिलाफ विद्रोह करते हैं और उसकी सत्ता से बच निकलते हैं। उन्हें राज्य के लोगों में आधिकारिक रूप से गिना जाता है। यहीं से राज्य के लोगों का प्रारंभ हुआ। क्या तुम इस प्रकार का व्यक्ति बनना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाना चाहते हो? क्या तुम शैतान की सत्ता से बच निकलना और परमेश्वर के पास लौटना चाहते हो? क्या तुम अब शैतान के हो या राज्य के लोगों में से एक हो? ये चीजें पहले ही स्पष्ट हो जानी चाहिए और इन्हें आगे किसी स्पष्टीकरण की आवश्यकता नहीं पड़नी चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 392

अतीत में, बहुत-से लोग अनियंत्रित महत्वाकांक्षा और धारणाओं के साथ अनुसरण करते थे, वे अपनी आशाओं के परिणामस्वरूप अनुसरण करते थे। फिलहाल ऐसे मुद्दे एक ओर रख देते हैं; अभी सबसे महत्वपूर्ण है अभ्यास का ऐसा तरीका खोजना, जो तुममें से प्रत्येक को परमेश्वर के सम्मुख सामान्य स्थिति बनाए रखने और धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव के बंधनों से मुक्त होने में सक्षम करे, ताकि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सको और पृथ्वी पर वैसे जियो, जैसे परमेश्वर तुमसे माँग करता है। केवल इसी तरीके से तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा कर सकते हो। परमेश्वर में विश्वास तो बहुत लोग करते हैं, लेकिन वे न तो यह जानते हैं कि परमेश्वर क्या चाहता है और न ही यह कि शैतान क्या चाहता है। वे भ्रमित ढंग से विश्वास करते हैं, भेड़चाल में चलते हैं, और इसलिए वे कभी एक सामान्य ईसाई जीवन नहीं जी पाए; इतना ही नहीं, उनके व्यक्तिगत संबंध भी कभी सामान्य नहीं रहे, परमेश्वर के साथ संबंध सामान्य होने की तो बात ही छोड़ो। इससे यह देखा जा सकता है कि मनुष्य की समस्याएँ और कमियाँ और परमेश्वर की इच्छा के आड़े आ सकने वाली चीजें बहुत-सी हैं। यह साबित करने के लिए पर्याप्त है कि मनुष्य अभी तक परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर नहीं आया है, न ही उसने मानव जीवन के वास्तविक अनुभव में प्रवेश किया है। तो परमेश्वर में विश्वास करने के सही रास्ते पर आने का क्या अर्थ है? सही रास्ते पर आने का अर्थ है कि तुम हर वक्त परमेश्वर के सामने अपना हृदय शांत रख सकते हो और परमेश्वर के साथ सामान्य संगति में शामिल हो सकते हो, धीरे-धीरे यह जानने लगोगे कि मनुष्य में क्या कमी है और धीरे-धीरे परमेश्वर के बारे में अधिक गहरा ज्ञान प्राप्त करने लगोगे। इसके जरिए तुम्हारी आत्मा प्रतिदिन नई अंतर्दृष्टि और प्रबुद्धता प्राप्त करती है; तुम्हारी लालसा बढ़ती है, तुम सत्य में प्रवेश करने का प्रयास करते हो और हर दिन नई रोशनी और नई समझ आती है। इस मार्ग पर चलकर तुम धीरे-धीरे शैतान के प्रभाव से मुक्त होते जाते हो और अपने जीवन में संवृद्धि करते हो। ऐसे लोग सही पथ में प्रवेश कर चुके हैं। अपने वास्तविक अनुभवों का मूल्यांकन करो और उस मार्ग को जाँचो, जिसका तुमने अपनी आस्था में अनुसरण किया है : जब तुम उन्हें ऊपर किए गए वर्णन के सापेक्ष कसते हो तो क्या तुम स्वयं को सही रास्ते पर पाते हो? तुम किन मामलों में शैतान के बंधन और शैतान के प्रभाव से मुक्त हो चुके हो? यदि अभी तुम्हारा सही रास्ते पर आना बाकी है, तो शैतान के साथ तुम्हारे संबंध टूटे नहीं हैं। ऐसे में, क्या तुम्हारा परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास तुम्हें एक ऐसे प्रेम की ओर ले जाएगा, जो प्रामाणिक, अनन्य और शुद्ध हो? तुम कहते हो कि परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम दृढ़ और दिली है, फिर भी तुम शैतान के बंधन से मुक्त नहीं हुए हो। क्या तुम परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं कर रहे हो? यदि तुम ऐसी स्थिति प्राप्त करना चाहते हो, जिसमें परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम बिना मिलावट के हो, और तुम परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से प्राप्त किए जाना और राज्य के लोगों में गिने जाना चाहते हो, तो तुम्हें पहले खुद को परमेश्वर में विश्वास के सही रास्ते पर लाना होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, विश्वासियों को क्या दृष्टिकोण रखना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 393

सभी मनुष्यों के साथ एक आम समस्या यह है कि वे सत्य को समझते तो हैं लेकिन उसे अभ्यास में नहीं ला पाते। ऐसा इसलिए है क्योंकि एक तरफ वे इसकी कीमत चुकाने के लिए तैयार नहीं हैं, तो दूसरी तरफ, उनकी भेद पहचानने की क्षमता बहुत खराब है; वे दैनिक जीवन की बहुत सारी कठिनाइयों के असली स्वरूप को देख नहीं पाते और नहीं जानते कि समुचित अभ्यास कैसे करें। ऐसा इसलिए है क्योंकि लोगों के अनुभव बहुत सतही हैं, उनकी काबिलियत बहुत खराब है, सत्य की उनकी समझ सीमित है और उनके पास अपने दैनिक जीवन में आने वाली कठिनाइयों को हल करने का कोई तरीका नहीं है। वे सिर्फ़ दिखावटी आस्था रखते हैं, और परमेश्वर को अपने रोज़मर्रा के जीवन में अंगीकार करने में असमर्थ हैं। तात्पर्य यह कि परमेश्वर परमेश्वर है, जीवन जीवन है, और मानो उनके जीवन के साथ परमेश्वर का कोई संबंध ही नहीं। ऐसा ही सभी सोचते हैं। इस तरह, परमेश्वर में केवल विश्वास करने से लोग वास्तव में उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते और न ही पूर्ण बनाए जा सकते हैं। वास्तव में, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर का वचन स्पष्ट रूप से व्यक्त नहीं किया गया है, बल्कि लोगों की बोध क्षमता ही बहुत खराब है। यह कहा जा सकता है कि लगभग कोई भी व्यक्ति परमेश्वर की मूल इच्छाओं के अनुरूप काम नहीं करता, बल्कि हर व्यक्ति अपनी मर्जी से काम करता है। हर व्यक्ति पूर्व से चली आ रही अपनी धार्मिक धारणाओं और कार्य करने के अपने तरीकों के अनुसार परमेश्वर में विश्वास करता है। कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो परमेश्वर के वचन को स्वीकार कर स्वयं में बदलाव लाते हैं और उसके इरादों के अनुसार कार्य करना शुरू करते हैं। बल्कि, वे होश में आने से इनकार कर देते हैं। जब लोग परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, तो वे धर्म के पारंपरिक नियमों के आधार पर ऐसा करते हैं; वे पूरी तरह से सांसारिक आचरण के अपने फलसफे के आधार पर जीते हैं, आचरण करते हैं और संसार से निपटते हैं। कहा जा सकता है कि दस लोगों में से नौ के साथ ऐसा ही है। ऐसे लोग बहुत ही कम हैं जो परमेश्वर में विश्वास रखना शुरू करने के बाद कोई अलग योजना बनाते हैं और एक नई शुरुआत करते हैं। मानवजाति परमेश्वर के वचन को सत्य मानने या उस तरह से उसका अभ्यास करने में विफल रही है।

उदाहरण के लिए, यीशु में आस्था को ही ले लो। चाहे किसी ने अभी-अभी विश्वास करना शुरू किया हो या काफी लंबे समय से विश्वास करता आ रहा हो, इन सभी ने बस अपने भीतर मौजूद गुणों का उपयोग और प्राप्त क्षमताओं का प्रदर्शन ही किया है। लोगों ने ये तीन शब्द “परमेश्वर में आस्था” बस अपने सामान्य जीवन में जोड़ लिए, लेकिन अपने स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं किया और परमेश्वर में उनकी आस्था लेशमात्र भी नहीं बढ़ी। उनका अनुसरण न उत्साह से परिपूर्ण था और न उदासीन। लोगों ने यह नहीं कहा कि वे अपनी आस्था को छोड़ देंगे, मगर उन्होंने अपना सब कुछ परमेश्वर को समर्पित भी नहीं किया। उन्होंने न कभी परमेश्वर से सचमुच प्रेम किया, न ही कभी उसके प्रति समर्पण किया। परमेश्वर में उनकी आस्था असली और नकली का सम्मिश्रण थी, वे इससे एक आँख खोलकर और एक आँख बंद करके पेश आते थे और इसे गंभीरता से नहीं लेते थे। वे असमंजस की ऐसी ही स्थिति में बने रहे और अंत में उन्हें एक संभ्रमित मौत का सामना करना पड़ा। इन सबके क्या मायने हैं? आज, व्यावहारिक परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में तुम्हें सही रास्ते पर कदम रखना होगा। परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें बस आशीष नहीं खोजने चाहिए; इसके बजाय तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को जानने का अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर की प्रबुद्धता के माध्यम से और अपने व्यक्तिगत अनुसरण के द्वारा तुम्हें उसके वचनों को खाने और पीने, परमेश्वर के बारे में सच्ची समझ विकसित करने और अपने अंतरतम से आने वाला परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम रखने में सक्षम होना चाहिए। दूसरे शब्दों में, जब परमेश्वर के प्रति तुम्हारा प्रेम सबसे सच्चा हो और उसके प्रति तुम्हारे प्रेम को कोई नष्ट न कर सके या इसके मार्ग में आड़े न आ सके तो तब जाकर तुम परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में सही रास्ते पर होते हो। यह साबित करता है कि तुम परमेश्वर के हो, क्योंकि तुम्हारा हृदय पहले से ही परमेश्वर के अधिकार में आ चुका है और तब कोई भी दूसरी चीज तुम पर अधिकार नहीं कर सकती। तुम अपने अनुभव, चुकाए गए मूल्य और परमेश्वर के कार्य के माध्यम से परमेश्वर के लिए एक स्वाभाविक प्रेम विकसित करने में समर्थ हो जाते हो—और जब तुम ऐसा कर लोगे तो तुम शैतान के प्रभाव से मुक्त हो जाओगे और परमेश्वर के वचन के प्रकाश में जीने लग जाओगे। तुम अंधकार के प्रभाव को तोड़कर जब मुक्त हो जाते हो, केवल तभी यह माना जा सकता है कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है। परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में तुम्हें इस लक्ष्य का अनुसरण करने का प्रयास करना ही होगा। यह तुममें से हर एक व्यक्ति की जिम्मेदारी है। तुममें से किसी को भी वर्तमान स्थिति से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। तुम परमेश्वर के कार्य के प्रति दो मन नहीं रख सकते और न ही इसे हल्के में ले सकते हो। तुम्हें सभी पहलुओं में और हर समय परमेश्वर को अपने मन में रखना चाहिए और उसके लिए सब कुछ करना चाहिए। और अपनी कथनी और करनी में तुम्हें परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखना चाहिए। केवल इसी तरह तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 394

परमेश्वर के प्रति अपने विश्वास में लोगों का सबसे बड़ा दोष यह है कि उनका विश्वास केवल शाब्दिक होता है, और परमेश्वर उनके रोजमर्रा के जीवन से पूरी तरह अनुपस्थित होता है। दरअसल सभी लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास तो करते हैं, लेकिन परमेश्वर उनके दैनिक जीवन का हिस्सा नहीं होता। परमेश्वर से बहुत सारी प्रार्थनाएँ लोग अपने मुख से तो करते हैं, किन्तु उनके हृदय में परमेश्वर के लिए जगह बहुत थोड़ी होती है, और इसलिए परमेश्वर बार-बार मनुष्य का परीक्षण करता है। चूँकि मनुष्य अशुद्ध है, इसलिए परमेश्वर के पास मनुष्य का परीक्षण करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं है, ताकि वह शर्मिंदगी महसूस करे और इन परीक्षणों से गुजरते हुए स्वयं को पहचान ले। अन्यथा, मानवजाति प्रधान दूत की वंशज बन जाएगी, और निरंतर और भ्रष्ट होती जाएगी। परमेश्वर में अपने विश्वास की प्रक्रिया में, हर व्यक्ति अपने बहुत सारे व्यक्तिगत इरादे और उद्देश्य छोड़ता चलता है, जैसे-जैसे वह परमेश्वर के निरंतर शुद्धिकरण से गुजरता है। अन्यथा, परमेश्वर के पास किसी भी व्यक्ति को उपयोग में लाने का कोई रास्ता नहीं होगा और न ही वह लोगों में अपेक्षित कार्य ही कर पाएगा। परमेश्वर सबसे पहले मनुष्य को शुद्ध करता है। इस प्रक्रिया में, मनुष्य स्वयं को जान सकता है और परमेश्वर मनुष्य को बदल सकता है। केवल तभी परमेश्वर अपना जीवन मनुष्य में डाल सकता है और सिर्फ इसी ढंग से मनुष्य के हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ा जा सकता है। इसलिए, परमेश्वर में विश्वास करना इतना आसान नहीं है जितना कि लोग कहते हैं। परमेश्वर की दृष्टि में, यदि तुम्हारे पास सिर्फ ज्ञान है किन्तु जीवन के रूप में उसका वचन नहीं है; यदि तुम केवल स्वयं के ज्ञान तक ही सीमित हो, और सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते या परमेश्वर के वचन को जी नहीं सकते, तो यह भी एक प्रमाण है कि तुम्हारे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं है, और यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर का नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करके ही उसे जाना जा सकता है : यह अंतिम उद्देश्य है और यह मनुष्य के अनुसरण का अंतिम लक्ष्य है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को जीने का प्रयास करना चाहिए, ताकि तुम्हारे अभ्यास में उन्हें साकार किया जा सके। यदि तुम्हारे पास सिर्फ़ सैद्धांतिक ज्ञान है, तो परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास बेकार हो जाएगा। यदि तुम इसे अभ्यास में लाते हो और उसके वचन को जीते हो तभी तुम्हारा विश्वास पूर्ण और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप माना जाएगा। इस मार्ग पर बहुत-से लोग बहुत ज्ञान की बातें कर सकते हैं, लेकिन मृत्यु के समय उनकी आँखें आँसुओं से भर आती हैं और वे इस बात से घृणा करते हैं कि उन्होंने अपना पूरा जीवन बेकार कर दिया और बुढ़ापे तक जीना व्यर्थ हो गया। वे केवल धर्म-सिद्धांत समझते हैं, लेकिन सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते और न ही परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं; वे बस इधर-उधर दौड़ते रहते हैं, अपने काम में काफी व्यस्त दिखते हैं और केवल मृत्यु के कगार पर ही वे अंततः देख पाते हैं कि उनके पास सच्ची गवाही नहीं है, वे परमेश्वर को बिल्कुल नहीं जानते हैं। क्या तब बहुत देर नहीं हो गई होती है? फिर तुम वर्तमान समय का लाभ क्यों नहीं उठाते और उस सत्य का अनुसरण क्यों नहीं करते जिससे तुम प्रेम करते हो? कल तक का इंतज़ार क्यों? यदि जीवन में तुम सत्य के लिए कष्ट नहीं उठाते हो या इसे पाने का प्रयास नहीं करते हो, तो क्या तुम मरने के समय पछताना चाहते हो? यदि ऐसा है, तो फिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? वास्तव में अगर वे थोड़ा-सा भी प्रयास करें तो ऐसे कई मामले हैं जिनमें लोग सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं। यह केवल इसलिए है क्योंकि लोगों के मन हमेशा भ्रमित रहते हैं, इसलिए वे परमेश्वर के लिए कार्य नहीं कर सकते, और अपनी देह की खातिर लगातार भाग-दौड़ करते हैं, लेकिन अंत में उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता। इसी कारण लोगों को लगातार परेशानियाँ और कठिनाइयाँ झेलनी पड़ती हैं। क्या ये शैतान से आए कष्ट नहीं हैं? क्या यह देह की भ्रष्टता नहीं है? तुम्हें बस झूठी बातों से परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए—तुम्हें वास्तव में अभ्यास करना चाहिए। खुद को धोखा मत दो—ऐसा करने से क्या फायदा? अपनी देह के वास्ते जीकर और प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करके तुम क्या प्राप्त कर लोगे?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम्हें सत्य के लिए जीना चाहिए क्योंकि तुम्हें परमेश्वर में विश्वास है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 395

अब तुम लोगों को परमेश्वर के लोग बनने का प्रयास करना है और तुम सभी चीजों में सही मार्ग पर प्रवेश करना शुरू करोगे। परमेश्वर के लोग होने का अर्थ है, राज्य के युग में प्रवेश करना। आज तुम आधिकारिक तौर पर राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश शुरू कर रहे हो और तुम लोगों के भावी जीवन अब पहले की तरह सुस्त और बेपरवाह नहीं रहेंगे; इस तरह जीकर परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक हासिल करना असंभव है। यदि तुम कोई तात्कालिकता महसूस नहीं करते हो तो यह दिखाता है कि तुममें प्रगति करने की कोई आकांक्षा नहीं है, तुम्हारा अनुसरण अव्यवस्थित और भ्रमित है और यह परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ है। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का अर्थ है, परमेश्वर के लोगों के जीवन की शुरुआत—क्या तुम इस तरह का प्रशिक्षण स्वीकार करने के लिए तैयार हो? क्या तुम तात्कालिकता महसूस करने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर के अनुशासन में जीने के लिए तैयार हो? क्या तुम परमेश्वर की ताड़ना के तहत जीने के लिए तैयार हो? जब परमेश्वर के वचन तुम पर आएँगे और तुम्हारा परीक्षण करेंगे तो तुम कैसे पेश आओगे? और जब सभी तरह के तथ्यों से तुम्हारा सामना होगा, तो तुम क्या करोगे? अतीत में तुम्हारा ध्यान जीवन पर केंद्रित नहीं था; आज तुम्हें जीवन वास्तविकता में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने का प्रयास करना चाहिए। यही है जो राज्य के लोगों द्वारा हासिल किया जाना चाहिए। जो परमेश्वर के लोग हैं उन सबके पास जीवन होना चाहिए, उन्हें राज्य का प्रशिक्षण स्वीकार करना चाहिए और अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन लाने का प्रयास करना चाहिए। परमेश्वर राज्य के लोगों से यही अपेक्षा रखता है।

राज्य के लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ इस प्रकार हैं :

1. उन्हें परमेश्वर के आदेशों को अवश्य स्वीकार करना होगा। यानी उन्हें अंत के दिनों के परमेश्वर के कार्य के दौरान कहे गए सभी वचन स्वीकार करने होंगे।

2. उन्हें राज्य के प्रशिक्षण में अवश्य प्रवेश करना होगा।

3. उन्हें प्रयास करना होगा कि परमेश्वर उनके दिलों को स्पर्श करे। जब तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो जाता है और तुम्हारा जीवन सामान्य रूप से आध्यात्मिक होता है, तो तुम स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहोगे, जिसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के प्रेम की देख-रेख और सुरक्षा में जिओगे। अगर तुम परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहते हो, केवल तभी तुम कोई ऐसे व्यक्ति होते हो जिसे परमेश्वर द्वारा चुना गया है।

4. उन्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त होना होगा।

5. उन्हें पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना होगा।

ये पाँच बातें तुम सबके लिए मेरे आदेश हैं। मेरे वचन परमेश्वर के लोगों से कहे जाते हैं और यदि तुम इन आदेशों को स्वीकार करने के इच्छुक नहीं हो, तो मैं तुम्हें मजबूर नहीं करूँगा—लेकिन अगर तुम सचमुच उन्हें स्वीकार करते हो, तो तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने में सक्षम होंगे। आज तुम लोग परमेश्वर के आदेश स्वीकार करना शुरू करते हो और राज्य के लोग बनने और राज्य के लोगों के लिए आवश्यक मानक हासिल करने का प्रयास करते हो। यह प्रवेश का पहला चरण है। यदि तुम पूरी तरह से परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना चाहते हो, तो तुम्हें इन पाँच आदेशों को स्वीकार करना होगा और यदि तुम ऐसा कर पाने में सक्षम रहे, तो तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होगे और परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा महान उपयोग करेगा। आज जो अत्यंत महत्वपूर्ण है वह है राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश में आध्यात्मिक जीवन शामिल है। इससे पहले आध्यात्मिक जीवन की कोई बात नहीं होती थी लेकिन आज, जैसे ही तुम राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करना शुरू करते हो, तुम आधिकारिक तौर पर आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करते हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 396

आध्यात्मिक जीवन किस तरह का जीवन है? आध्यात्मिक जीवन वह है जिसमें तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुका होता है और परमेश्वर के प्रेम के बारे में सोच पाता है। यह वह है, जिसमें तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो और तुम्हारे दिल को कोई भी दूसरी चीज घेरे नहीं रहती है, और तुम परमेश्वर के वर्तमान इरादे समझ पाते हो और अपना कर्तव्य निभाने के लिए पवित्र आत्मा की वर्तमान रोशनी से मार्गदर्शन प्राप्त करते हो। मनुष्य और परमेश्वर के बीच ऐसा जीवन आध्यात्मिक जीवन है। यदि तुम वर्तमान रोशनी का अनुसरण करने में असमर्थ हो, तो परमेश्वर के साथ तुम्हारे संबंध में दूरी आ जाएगी—हो सकता है यह समाप्त भी हो जाए—और तुम एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन से रहित हो जाओगे। परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध परमेश्वर के वर्तमान वचनों को स्वीकार करने की नींव पर बनता है। क्या तुम्हारा एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन है? क्या परमेश्वर के साथ तुम्हारा एक सामान्य संबंध है? क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है? यदि तुम पवित्र आत्मा की वर्तमान रोशनी का अनुसरण कर पाते हो और परमेश्वर के वचनों में उसके इरादों को समझ सकते हो और उसके वचनों में प्रवेश कर सकते हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण करता है। यदि तुम पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण नहीं करते हो, तो तुम निस्संदेह सत्य का अनुसरण नहीं करते। जो खुद को सुधारने की इच्छा नहीं रखते, पवित्र आत्मा के उनके भीतर काम करने की कोई संभावना नहीं है, और नतीजतन ऐसे लोग कभी अपनी ताकत को नहीं जगा पाते और हमेशा नकारात्मक रहते हैं। क्या तुम आज पवित्र आत्मा के प्रवाह का अनुसरण करते हो? क्या तुम पवित्र आत्मा के प्रवाह में हो? क्या तुम नकारात्मक दशा से बाहर निकल आए हो? वो सभी जो परमेश्वर के वचनों में विश्वास करते हैं, जो परमेश्वर के कार्य को आधार के रूप में लेते हैं और पवित्र आत्मा की वर्तमान रोशनी का अनुसरण करते हैं—वे सभी पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं। यदि तुम मानते हो कि परमेश्वर के वचन निस्संदेह सच्चे और सही हैं और यदि परमेश्वर चाहे जो भी कहे तुम उसके वचनों में विश्वास करते हो तो तुम वह व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के कार्य में प्रवेश का प्रयास करता है और इस तरह से तुम परमेश्वर के इरादे पूरे करते हो।

पवित्र आत्मा के प्रवाह में प्रवेश के लिए तुम्हारा परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध होना आवश्यक है और तुम्हें सबसे पहले अपनी नकारात्मक दशा को उतार फेंकना होगा। कुछ लोग हमेशा भीड़ का अनुसरण करते हैं और उनके दिल परमेश्वर से बहुत दूर भटक जाते हैं; ऐसे लोगों में प्रगति करने की कोई इच्छा नहीं होती है और वे जिन मानकों का अनुसरण करते हैं वे बहुत ही निम्न होते हैं। परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना ही परमेश्वर का इरादा है। कुछ लोग ऐसे हैं, जो परमेश्वर के प्रेम का मूल्य चुकाने के लिए केवल अपनी अंतरात्मा का उपयोग करते हैं, लेकिन इससे परमेश्वर के इरादे पूरे नहीं होते; तुम जितने ऊँचे मानकों का अनुसरण करोगे, उतना ही अधिक यह परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होगा। सामान्य लोगों के रूप में और परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने वाले लोगों के रूप में, राज्य में प्रवेश करना और परमेश्वर के लोग बनना तुम्हारा सच्चा भविष्य है और एक ऐसा जीवन है जो अत्यंत मूल्यवान और सार्थक है; कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। मैं यह क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे देह के लिए जीते हैं और वे शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम लोग परमेश्वर के लिए जीते हो और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने के लिए जीते हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सबसे सार्थक है। केवल इसी समूह के लोग, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, सबसे सार्थक जीवन जीने में सक्षम हैं : पृथ्वी पर और कोई तुम्हारे जितना मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने में सक्षम नहीं है। क्योंकि तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए हो और परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उन्नयन किया गया है और इससे भी अधिक परमेश्वर के प्रेम के कारण तुम लोग सच्चे जीवन को समझ चुके हो और यह जानते हो कि सर्वाधिक मूल्यवान तरीके से कैसे जिएँ। ऐसा इसलिए नहीं है कि तुम लोग अच्छी तरह से अनुसरण करते हो, बल्कि यह परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; यह परमेश्वर ही था, जिसने तुम्हारी आध्यात्मिक आँखें खोलीं, और यह परमेश्वर का आत्मा ही था, जिसने तुम्हारे दिलों को छुआ था और इस प्रकार तुम्हें परमेश्वर के सामने आने का सौभाग्य प्रदान किया। यदि परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हें प्रबुद्ध न किया होता, तो परमेश्वर के बारे में क्या सुंदर है, यह देखने में तुम असमर्थ होते, न ही तुम्हारे लिए परमेश्वर से प्रेम करना संभव होता। यह पूरी तरह से परमेश्वर के आत्मा द्वारा लोगों के दिलों को छू लेने के कारण ही है कि उनके दिल परमेश्वर उन्मुख हो चुके हैं। कभी-कभी, जब तुम परमेश्वर के वचनों का आनंद ले रहे होते हो, तुम्हारी आत्मा द्रवित हो जाती है और तुम्हें लगता है कि तुम्हें परमेश्वर से अवश्य ही प्रेम करना चाहिए, कि तुम्हारे भीतर अत्यधिक शक्ति है और ऐसा कुछ नहीं है जिसे तुम छोड़ नहीं सकते हो। यदि तुम ऐसा महसूस करते हो, तो परमेश्वर के आत्मा ने तुम्हें स्पर्श कर लिया है, और तुम्हारा दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुका है और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे : “परमेश्वर! हम वास्तव में तुम्हारे द्वारा पूर्वनिर्धारित किए गए और चुने गए हैं। तुम्हारी महिमा में मुझे गौरव मिलता है और तुम्हारे लोगों में से एक होना मुझे सम्मान की बात लगता है। तुम्हारी इच्छा के अनुसार चलने के लिए मैं कुछ भी खपा दूँगा और कुछ भी अर्पित कर दूँगा और अपने सभी वर्ष और इस जीवन की अपनी सारी ऊर्जा तुम्हें समर्पित कर दूँगा।” जब तुम इस तरह प्रार्थना करते हो, तो तुम्हारे दिल में परमेश्वर के प्रति असीम प्रेम और सच्चा समर्पण होगा। क्या तुम्हें कभी ऐसा अनुभव हुआ है? यदि लोगों को अक्सर परमेश्वर के आत्मा द्वारा छुआ जाता है तो वे परमेश्वर से विशेष समर्पण की प्रार्थनाएँ करेंगे : “परमेश्वर! मैं वह दिन देखना चाहता हूँ जिस दिन तुम महिमा प्राप्त करोगे और मैं तुम्हारे लिए जीना चाहता हूँ—तुम्हारे लिए जीने के मुकाबले कुछ भी ज्यादा योग्य या सार्थक नहीं है और मेरी शैतान और देह के लिए जीने की लेशमात्र भी इच्छा नहीं है। तुम आज मुझे तुम्हारे लिए जीने हेतु सक्षम बनाकर मेरा उन्नयन करते हो।” जब तुम इस तरह प्रार्थना कर लोगे तो तुम्हें महसूस होगा कि तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर को अपना दिल देना चाहिए, कि तुम्हें परमेश्वर को प्राप्त करना चाहिए और तुम जब तक जीवित हो, परमेश्वर को पाए बिना मर जाने से नफरत करोगे। ऐसी प्रार्थना करने के बाद, तुम्हारे भीतर एक अक्षय ताकत आएगी और तुम नहीं जान पाओगे कि यह कहाँ से आती है; तुम्हारे हृदय के अंदर असीम शक्ति होगी और तुम्हें आभास होगा कि परमेश्वर बहुत सुंदर है, और वह प्रेम करने के योग्य है। यह तब होगा जब तुम परमेश्वर द्वारा छू लिए जा चुके होंगे। जिन सभी लोगों को इस तरह का अनुभव हुआ है, वो सभी परमेश्वर द्वारा छू लिए गए हैं। जहाँ तक उन लोगों की बात है जिन्हें परमेश्वर अक्सर स्पर्श करता है, उनके जीवन में परिवर्तन होते हैं, वे परमेश्वर को पूरी तरह से प्राप्त करने के लिए संकल्प लेने में सक्षम होते हैं, उनके परमेश्वर-प्रेमी हृदय अपेक्षाकृत मजबूत होते हैं और उनके दिल पूरी तरह से परमेश्वर उन्मुख हो चुके होते हैं। अपने मन से अपने परिवारों, दुनिया, उलझनों और अपनी संभावनाओं को पूरी तरह निकाल चुके होते हैं और वे अपने जीवन की सारी ऊर्जा परमेश्वर को समर्पित करने के इच्छुक होते हैं। जिन्हें परमेश्वर के आत्मा द्वारा छुआ जाता है, वे सब ऐसे लोग होते हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनके पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आशा होती है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 397

परमेश्वर का अनुसरण करने में प्रमुख महत्व इस बात का है कि हर चीज परमेश्वर के वर्तमान वचनों के अनुसार होनी चाहिए : चाहे तुम जीवन प्रवेश का अनुसरण कर रहे हो या परमेश्वर के इरादों को पूरा कर रहे हो, सब कुछ परमेश्वर के वर्तमान वचनों के इर्द-गिर्द केंद्रित होना चाहिए। यदि तुम जो संगति करते हो और जिसमें प्रवेश करने का प्रयास करते हो, वह परमेश्वर के वर्तमान वचनों के इर्द-गिर्द केंद्रित नहीं है, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों से बाहर है और तुम्हारे पास बिल्कुल भी पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है। परमेश्वर ऐसे लोग चाहता है जो उसके पदचिह्नों का अनुसरण करें। भले ही जो तुमने पहले समझा था वह कितना ही अद्भुत और शुद्ध क्यों न हो, परमेश्वर उसे नहीं चाहता और यदि तुम ऐसी चीजों को दूर नहीं कर सकते, तो वो भविष्य में तुम्हारे प्रवेश के लिए एक भयंकर बाधा होंगी। वे सभी धन्य हैं, जो पवित्र आत्मा की आज की रोशनी का अनुसरण करने में सक्षम हैं। पिछले युगों और पीढ़ियों के लोग भी परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलते थे, फिर भी वे आज तक अनुसरण करना जारी नहीं रख सके; यह अंत के दिनों के लोगों के लिए आशीष है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण कर सकते हैं और जो परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में सक्षम हैं, चाहे परमेश्वर उन्हें जहाँ भी ले जाए वो उसका अनुसरण करते हैं—ये वो लोग हैं, जिन्हें परमेश्वर का आशीष प्राप्त है। जो लोग पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य का अनुसरण नहीं करते हैं, उन्होंने परमेश्वर के वचनों के कार्य में प्रवेश नहीं किया है और चाहे वो कितना भी कार्य करें या उनकी पीड़ा कितनी भी अधिक हो या वे कितनी ही भागदौड़ करें, इनमें से किसी भी चीज का परमेश्वर के लिए कोई महत्व नहीं है और वह उन्हें स्वीकृति नहीं देगा। आज वो सभी जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों का अनुसरण करते हैं, वो पवित्र आत्मा के प्रवाह में हैं; जो परमेश्वर के वर्तमान वचनों से बाहर हैं वे पवित्र आत्मा के प्रवाह से बाहर हैं और ऐसे लोगों को परमेश्वर द्वारा स्वीकृति नहीं दी जाती है। जो सेवा पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों से बाहर हो वह देह और धारणाओं की सेवा है और इसका परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना असंभव है। यदि लोग धार्मिक धारणाओं के बीच जीते हैं तो वे ऐसा कुछ भी करने में असमर्थ होते हैं जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो और भले ही वे परमेश्वर की सेवा करें, वे अपनी कल्पनाओं और धारणाओं के घेरे में ही सेवा करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने में पूरी तरह असमर्थ होते हैं। जो लोग पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करने में असमर्थ हैं, वो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते और जो परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते, वो परमेश्वर की सेवा नहीं कर सकते। परमेश्वर ऐसी सेवा चाहता है जो उसके इरादों के अनुरूप हो; वह ऐसी सेवा नहीं चाहता, जो धारणाओं और देह की हो। यदि लोग पवित्र आत्मा के कार्य के चरणों का पालन करने में असमर्थ हैं, तो वो धारणाओं के बीच रहते हैं। ऐसे लोगों की सेवा गड़बड़ी और विघ्न पैदा करती है और ऐसी सेवा परमेश्वर के विरुद्ध चलती है। इस प्रकार, जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वे परमेश्वर की सेवा करने में असमर्थ हैं; जो लोग परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलने में असमर्थ हैं, वे निश्चित रूप से परमेश्वर का विरोध करते हैं और वे निश्चित रूप से परमेश्वर के अनुरूप होने में अक्षम हैं। “पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण” करने का मतलब है परमेश्वर के वर्तमान इरादों को समझना और परमेश्वर की वर्तमान अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करने में सक्षम होना, आज के परमेश्वर का अनुसरण करना और उसके प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के नवीनतम वचनों के अनुरूप प्रवेश करना। केवल यही ऐसा है जो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुसरण करता है और पवित्र आत्मा के प्रवाह में है। ऐसे लोग न केवल परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करने और परमेश्वर को देखने में सक्षम हैं बल्कि परमेश्वर के नवीनतम कार्य से उसके स्वभाव को भी जान सकते हैं और परमेश्वर के नवीनतम कार्य से मनुष्य की धारणाओं और उसके विद्रोहीपन को, मनुष्य की प्रकृति और सार को जान सकते हैं; इसके अलावा, वो अपनी सेवा के दौरान धीरे-धीरे अपने स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने में सक्षम होते हैं। केवल ऐसे लोग ही हैं, जो परमेश्वर को प्राप्त करने में सक्षम हैं और जो सचमुच में सच्चा मार्ग पा चुके हैं। जिन लोगों को पवित्र आत्मा के कार्य द्वारा हटा दिया गया है वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य का अनुसरण करने में अक्षम हैं और जो परमेश्वर के नवीनतम कार्य के विरुद्ध हो जाते हैं। ऐसे लोग खुलेआम परमेश्वर का विरोध इसलिए करते हैं क्योंकि परमेश्वर ने नया कार्य किया है और क्योंकि परमेश्वर की छवि उनकी धारणाओं के अनुरूप नहीं है—जिसके परिणामस्वरूप वो परमेश्वर का खुलेआम विरोध करते हैं और परमेश्वर पर निर्णय देते हैं, जिसके नतीजे में परमेश्वर उन्हें ठुकरा देता है। परमेश्वर के नवीनतम कार्य का ज्ञान रखना कोई आसान बात नहीं है, लेकिन अगर लोग उद्देश्यपूर्ण ढंग से परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं और परमेश्वर के कार्य को खोज सकते हैं तो उन्हें परमेश्वर को देखने का मौका मिलेगा, और उन्हें पवित्र आत्मा का नवीनतम मार्गदर्शन प्राप्त करने का मौका मिलेगा। जो जानबूझकर परमेश्वर के कार्य का विरोध करते हैं, वे पवित्र आत्मा का प्रबोधन या परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त नहीं कर सकते हैं; इस प्रकार, लोग परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त कर सकते हैं या नहीं, यह परमेश्वर के अनुग्रह पर निर्भर करता है, साथ ही यह उनके अनुसरण और उनके इरादों पर निर्भर करता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 398

जो पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों के प्रति समर्पण कर पाते हैं वे सब धन्य हैं। इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि लोग कैसे हुआ करते थे या उनमें पवित्र आत्मा कैसे कार्य किया करता था—जिन्होंने परमेश्वर का नवीनतम कार्य प्राप्त किया है, वे सब सर्वाधिक धन्य हैं और जो आज नवीनतम कार्य का अनुसरण नहीं कर पाते हैं, वे सब हटा दिए जाएँगे। परमेश्वर उन्हें चाहता है जो नई रोशनी स्वीकार करने में सक्षम हैं और वह उन्हें चाहता है जो उसके नवीनतम कार्य को स्वीकार करते और जानते हैं। ऐसा क्यों कहा गया है कि तुम लोगों को पवित्र कुँवारी होना चाहिए? एक पवित्र कुँवारी पवित्र आत्मा के कार्य को खोजने में और नई चीज़ों को समझने में सक्षम होती है, और इसके अलावा, पुरानी धारणाओं को भुलाकर परमेश्वर के आज के कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम होती है। इस समूह के लोग, जो आज के नवीनतम कार्य को स्वीकार करते हैं, परमेश्वर द्वारा युगों पहले ही पूर्वनिर्धारित किए जा चुके थे और वे सबसे अधिक धन्य लोग हैं। तुम लोग सीधे परमेश्वर की आवाज सुनते हो और परमेश्वर का प्रकटन देखते हो और इस तरह समस्त स्वर्ग और पृथ्वी पर और सारे युगों और पीढ़ियों में, कोई भी तुम लोगों, लोगों के इस समूह से अधिक धन्य नहीं रहा है। यह सब परमेश्वर के कार्य के कारण है, परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण और चयन के कारण और परमेश्वर के अनुग्रह के कारण है; अगर परमेश्वर ने बात न की होती और अपने वचन नहीं कहे होते, तो क्या तुम लोगों की स्थितियाँ वैसी होतीं जैसी आज हैं? इस प्रकार, सारी महिमा और प्रशंसा परमेश्वर की हो क्योंकि यह सब परमेश्वर का उत्कर्ष है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए क्या तुम अभी भी नकारात्मक रह पाओगे? क्या तुम्हारी शक्ति अभी भी ऊपर उठने लायक नहीं होगी?

तुम्हारा आज परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, प्रहार और शोधन को स्वीकार करने में सक्षम होना और इससे भी अधिक परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार कर पाना, युगों से पहले ही परमेश्वर ने पूर्वनिर्धारित कर दिया था और इस प्रकार जब तुम्हें ताड़ना दी जाए तो तुम्हें बहुत व्यथित नहीं होना चाहिए। तुम लोगों पर जो कार्य किया गया है और तुम्हें जो आशीष दिए गए हैं उन्हें कोई नहीं ले जा सकता है और जो तुम लोगों को दिया गया है, वह सब कोई भी नहीं ले जा सकता है। धार्मिक लोग तुम लोगों के साथ तुलना में नहीं ठहर सकते। तुम लोगों के पास उनके जितना बाइबल का ज्ञान नहीं है और तुम्हारे पास वे धर्म-सिद्धांत नहीं हैं जो उनके पास हैं, लेकिन चूँकि परमेश्वर ने तुम पर कार्य किया है, तुमने सारे युगों में अन्य किसी से अधिक प्राप्त किया है—और इसलिए यह तुम्हारा सबसे बड़ा आशीष है। इस कारण तुम लोगों को खुद को परमेश्वर के प्रति और भी अधिक अर्पित करना चाहिए और उसके प्रति निष्ठावान होना चाहिए। परमेश्वर द्वारा उत्कर्ष के कारण तुम्हें अपने प्रयासों को बढ़ाना चाहिए, और परमेश्वर के आदेश स्वीकार करने के लिए अपने आध्यात्मिक कद को तैयार रखना चाहिए। परमेश्वर द्वारा तुम्हें जो स्थान दिया गया है उस पर अडिग रहना, परमेश्वर के लोगों में से एक बनने का प्रयास करना, राज्य के प्रशिक्षण को स्वीकार करना, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना और अंततः परमेश्वर की एक गौरवपूर्ण गवाही बनना—क्या तुम्हारे पास ये संकल्प हैं? यदि तुम्हारे पास ऐसे संकल्प हैं, तो अंततः तुम निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे और परमेश्वर के लिए एक गौरवपूर्ण गवाही बन जाओगे। तुम्हें यह समझना चाहिए कि प्रमुख आदेश परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाला होना है और परमेश्वर के लिए एक गौरवपूर्ण गवाही बन जाना है। यही परमेश्वर का इरादा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 399

पवित्र आत्मा के वर्तमान वचन पवित्र आत्मा के कार्य की गतिशीलता हैं और इस दौरान पवित्र आत्मा द्वारा मनुष्य का निरंतर प्रबोधन, पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति है। और आज पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति क्या है? यह परमेश्वर के वर्तमान कार्य में और एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन में परमेश्वर के लोगों की अगुआई करना है। सामान्य आध्यात्मिक जीवन में प्रवेश करने के कई चरण हैं :

1. सबसे पहले, तुम्हें अपना दिल परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के अतीत में कहे वचनों का अनुसरण नहीं करना है और तुम्हें उनका अध्ययन नहीं करना है, आज के वचनों से उनकी तुलना करने की बात तो छोड़ ही दो। इसके बजाय, तुम्हें परमेश्वर के वर्तमान वचनों में अपना दिल पूरी तरह लगाना चाहिए। अगर ऐसे लोग हैं जो अभी भी अतीत काल के परमेश्वर के वचन, आध्यात्मिक पुस्तकें या दूसरे धर्मोपदेश पढ़ना चाहते हैं और जो पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों का अनुसरण नहीं करते हैं, तो वे सभी लोगों में सबसे अधिक मूर्ख हैं; परमेश्वर ऐसे लोगों से घृणा करता है। यदि तुम आज पवित्र आत्मा की वर्तमान रोशनी स्वीकार करने के इच्छुक हो तो फिर अपना दिल परमेश्वर के वर्तमान वचनों में पूरी तरह लगा दो। यह पहली चीज है जो तुम्हें हासिल करनी है।

2. तुम्हें परमेश्वर द्वारा बोले गए वर्तमान वचनों के आधार पर प्रार्थना करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करना चाहिए और परमेश्वर के साथ संगति करनी चाहिए और परमेश्वर के समक्ष अपने संकल्प करने चाहिए, यह निर्धारित करना चाहिए कि तुम अपने अनुसरण में कौन-से मानकों तक पहुँचना चाहते हो।

3. पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की नींव पर तुम्हें सत्य में अधिक गहरे प्रवेश का प्रयास करना चाहिए। अतीत के पुराने कथनों और धर्म-सिद्धांतों को मत थामे रहो।

4. तुम्हें पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने और परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने की कोशिश करनी चाहिए।

5. तुम्हें उस पथ पर प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए जिस पर वर्तमान में पवित्र आत्मा चलता है।

और तुम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने का प्रयास कैसे करते हो? अहम चीज है परमेश्वर के वर्तमान वचनों में जीना और परमेश्वर की अपेक्षाओं की नींव पर प्रार्थना करना। इस तरह प्रार्थना कर चुकने के बाद पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करना निश्चित है। यदि तुम परमेश्वर द्वारा कहे गए वर्तमान वचनों की नींव के आधार पर खोजने का प्रयास नहीं करते हो तो यह व्यर्थ है। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए और कहना चाहिए : “परमेश्वर! मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं तुम्हारा बहुत ऋणी हूँ; मैं बहुत विद्रोही हूँ और तुम्हें कभी भी संतुष्ट नहीं कर पाता हूँ। परमेश्वर, मैं चाहता हूँ कि तुम मुझे बचा लो, मैं अंत तक तुम्हारे लिए सेवा करना चाहता हूँ, मैं तुम्हारे लिए मर जाना चाहता हूँ। तुम मेरा न्याय करते हो और मुझे ताड़ना देते हो और मुझे कोई शिकायत नहीं है; मैं तुम्हारा विरोध करता हूँ और मैं मर जाने लायक हूँ ताकि मेरी मृत्यु में सभी लोग तुम्हारा धार्मिक स्वभाव देख सकें।” जब तुम इस तरह अपने दिल से प्रार्थना करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारी सुनेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा; यदि तुम पवित्र आत्मा के वर्तमान वचनों के आधार पर प्रार्थना नहीं करते हो तो पवित्र आत्मा द्वारा तुम्हें स्पर्श करने की कोई संभावना नहीं है। मान लो तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार और आज परमेश्वर जो करना चाहता है उसके अनुसार प्रार्थना करते हो। तुम कहते हो, “परमेश्वर! मैं तुम्हारे आदेश स्वीकार करना चाहता हूँ और तुम्हारे आदेशों के प्रति समर्पित होना चाहता हूँ, और मैं अपना पूरा जीवन तुम्हारी महिमा को समर्पित करने के लिए तैयार हूँ ताकि मैं जो कुछ भी करता हूँ वह परमेश्वर के लोगों के मानकों तक पहुँच सके और ताकि मेरा दिल तुम्हारे द्वारा स्पर्श किया जा सके। मैं चाहता हूँ कि तुम्हारा आत्मा सदैव मुझे प्रबुद्ध करे, ताकि मैं जो कुछ भी करूँ वह शैतान को शर्मिंदा करे और ताकि मैं अंततः तुम्हारे द्वारा प्राप्त किया जाऊँ।” यदि तुम परमेश्वर के इरादों के इर्द-गिर्द केंद्रित रहकर इस तरह प्रार्थना करते हो तो पवित्र आत्मा अपरिहार्य रूप से तुम में कार्य करेगा। यह महत्वपूर्ण नहीं है कि तुम्हारी प्रार्थनाओं में कितने शब्द हैं—महत्वपूर्ण यह है कि तुम परमेश्वर के इरादे समझते हो या नहीं। तुम सबको निम्नलिखित अनुभव हुआ हो सकता है : कभी-कभी किसी सभा में प्रार्थना करते समय पवित्र आत्मा के कार्य की गतिशीलता अपने चरम बिंदु तक पहुँच जाती है, जिससे सभी की ताकत बढ़ती है। परमेश्वर के सामने ग्लानि से अभिभूत होकर कुछ लोग फूट-फूटकर रोते हैं और प्रार्थना करते हुए आँसू बहाते हैं, तो कुछ लोग अपना संकल्प दिखाते हैं और प्रतिज्ञा करते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य से प्राप्त प्रभाव ऐसा होता है। आज यह अहम है कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों में पूरी तरह अपना दिल लगाएँ। उन वचनों पर ध्यान न दो, जो पहले बोले गए थे; यदि तुम अभी भी उसे थामे रहोगे जो पहले आया था, तो पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य नहीं करेगा। क्या तुम देखते हो कि यह कितना महत्वपूर्ण है?

क्या तुम सब उस मार्ग को जानते हो, जिस पर पवित्र आत्मा आज चलता है? ऊपर दी गई विभिन्न बातें वे हैं, जो पवित्र आत्मा द्वारा आज और भविष्य में पूरी की जानी हैं; ये वह मार्ग हैं जिसे पवित्र आत्मा ने अपनाया है और वह चीज हैं जिसमें लोगों को प्रवेश का प्रयास करना चाहिए। अपने जीवन प्रवेश में तुम्हें कम से कम अपना दिल परमेश्वर के वचनों में लगाना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए; तुम्हारा दिल परमेश्वर के लिए लालायित रहना चाहिए, तुम्हें सत्य में और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित उद्देश्यों में अधिक गहरे प्रवेश का प्रयास करना चाहिए। जब तुम्हारे पास यह शक्ति होती है, तो इससे पता चलता है कि परमेश्वर तुम्हारा स्पर्श कर चुका है और तुम्हारा दिल परमेश्वर उन्मुख होना शुरू हो चुका है।

जीवन प्रवेश का पहला कदम पूरी तरह से परमेश्वर के वचनों में अपना दिल लगाना है और दूसरा कदम पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करना है। वह क्या प्रभाव है जो पवित्र आत्मा द्वारा स्पर्श किए जाने को स्वीकार करने से मिलना है? यह है अधिक गहरे सत्यों के लिए लालायित हो पाना, इन्हें खोज पाना और इनका अन्वेषण कर पाना और चीजों के सकारात्मक पहलू में परमेश्वर के साथ सहयोग के लिए सक्षम होना। आज परमेश्वर के साथ सहयोग करने का अर्थ है कि तुम्हारे अनुसरण, तुम्हारी प्रार्थनाओं और परमेश्वर के वचनों के बारे में तुम्हारी संगति का एक उद्देश्य है और तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप अपना कर्तव्य निभाते हो—परमेश्वर के साथ सहयोग करना सिर्फ यही है। यदि तुम केवल परमेश्वर को कार्य करने देने की बात करते हो, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं करते, न प्रार्थना करते हो और न ही खोज, तो क्या इसे सहयोग कहा जा सकता है? यदि तुम्हारे भीतर सहयोग का कोई अंश नहीं है और प्रवेश के लिए एक ऐसे प्रशिक्षण का अभाव है जिसका एक उद्देश्य हो, तो तुम सहयोग नहीं कर रहे हो। कुछ लोग कहते हैं : “सब कुछ परमेश्वर के विधान पर निर्भर करता है, यह सब स्वयं परमेश्वर द्वारा किया जाता है; अगर परमेश्वर ने ऐसा नहीं किया तो मनुष्य कैसे कर सकता था?” परमेश्वर का कार्य सामान्य है और जरा भी अलौकिक नहीं है और तुम जो सक्रिय खोज करते हो केवल उसी माध्यम से पवित्र आत्मा कार्य करता है क्योंकि परमेश्वर मनुष्य को मजबूर नहीं करता—तुम्हें परमेश्वर को कार्य करने का अवसर देना चाहिए और यदि तुम अनुसरण या प्रवेश नहीं करते और अगर तुम्हारे दिल में थोड़ी-सी भी उत्कंठा नहीं है, तो परमेश्वर के कार्य करने की कोई संभावना नहीं है। तुम किस मार्ग के जरिए परमेश्वर द्वारा स्पर्श किए जाने की कोशिश कर सकते हो? प्रार्थना के माध्यम से और परमेश्वर के करीब आकर। मगर याद रखो, सबसे महत्वपूर्ण बात है, यह परमेश्वर द्वारा कहे गए वचनों की नींव पर खड़ा होना चाहिए। जब तुम अक्सर परमेश्वर द्वारा स्पर्श किए जाते हो तो तुम देह द्वारा बाधित नहीं होते हो : पति, पत्नी, बच्चे और धन—ये सब तुम्हें बाधित करने में असमर्थ रहते हैं और तुम केवल सत्य का अनुसरण करना और परमेश्वर के समक्ष जीना चाहते हो। इस समय, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे, जो स्वतंत्रता के क्षेत्र में रहता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 400

परमेश्वर ने मनुष्य को पूर्ण करने का निश्चय कर लिया है। वह चाहे जिस दृष्टिकोण से भी बोलता हो, सारी बातें लोगों को पूर्ण बनाने के लिए हैं। आत्मा के दृष्टिकोण से बोले गये वचन समझने में लोगों को कठिनाई होती है और उन्हें उनपर अमल करने का मार्ग नहीं मिलता, क्योंकि मनुष्य की बोध क्षमता सीमित है। परमेश्वर के कार्य के विभिन्न प्रभाव होते हैं और उसके कार्य के प्रत्येक चरण का एक उद्देश्य है। साथ ही उसे अनिवार्यतः अलग-अलग दृष्टिकोण से बात करनी होगी, क्योंकि ऐसा करने पर ही वह मनुष्य को पूर्ण बना सकता है। यदि वह केवल आत्मा के दृष्टिकोण से अपनी बात बोले, तो परमेश्वर के इस चरण के कार्य का पूरा होना संभव नहीं होगा। उसके बात करने के लहजे से तुम जान सकते हो कि वह लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिये दृढ़-संकल्पित है। तो परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा करने वाले प्रत्येक व्यक्ति का पहला कदम क्या होना चाहिए? सबसे पहले तुम्हें परमेश्वर के काम के बारे में जानना चाहिए। आज, परमेश्वर के कार्य में एक नई पद्धति शुरू हो चुकी है, युग रूपांतरित हो गया है, परमेश्वर के काम करने का तरीका भी बदल गया है, और उसके बोलने का ढंग अलग है। वर्तमान में न केवल परमेश्वर के कार्य के साधन बदले हैं, बल्कि युग भी बदल गया है। अभी राज्य का युग है और यह परमेश्वर से प्रेम करने का युग भी है। यह सहस्राब्दि राज्य के युग का पूर्वदर्शन है; सहस्राब्दि राज्य का युग वचन का युग भी है, जिसमें परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए बहुत सारे तरीकों से बोलता है और मनुष्य को आपूरित करने के लिए विभिन्न दृष्टिकोण से बोलता है। सहस्राब्दि राज्य के युग में प्रवेश करने पर परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण बनाने के लिए वचन का उपयोग करना शुरू करता है, मनुष्य को जीवन वास्तविकता में प्रवेश के योग्य बनाता और उन्हें सही मार्ग पर लाता है। मनुष्य ने परमेश्वर के कार्य के बहुत से चरणों का अनुभव किया है और यह देखा है कि परमेश्वर का कार्य बिना बदले नहीं रहता। बल्कि यह कार्य लगातार विकसित और गहरा होता जाता है। लोगों ने इतने लंबे समय तक इसका अनुभव किया है, जिसके दौरान कार्य बार-बार बदला है, बार-बार परिवर्तित हुआ है। हालाँकि परिवर्तन चाहे जितना भी हो, वह मानवजाति तक उद्धार लाने के परमेश्वर के उद्देश्य से कभी नहीं भटकता है। दस हजार परिवर्तनों से गुजरने के बाद भी वह अपने मूल उद्देश्य से कभी नहीं भटकता है। परमेश्वर के कार्य करने का तरीका चाहे जैसे भी बदले, यह काम कभी सत्य या जीवन से अलग नहीं होता। कार्य करने की विधि में परिवर्तन में केवल कार्य के प्रारूप और परमेश्वर के बोलने के दृष्टिकोण में परिवर्तन शामिल हैं, उसके कार्य के केन्द्रीय उद्देश्य में परिवर्तन नहीं आया है। बोलने के लहजे और कार्य की पद्धति में परिवर्तन का उद्देश्य कार्य में प्रभावशीलता लाना है। आवाज के लहजे में परिवर्तन का अर्थ कार्य के उद्देश्य या सिद्धांत में परिवर्तन नहीं है। परमेश्वर में विश्वास करने का अर्थ मुख्य रूप से जीवन का अनुसरण करना है; यदि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो परंतु जीवन, सत्य या परमेश्वर के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते, तब यह परमेश्वर में विश्वास नहीं है! और क्या अभी भी राजा बनने के लिए राज्य में प्रवेश करने का अनुसरण करना यथार्थपरक है? जीवन का अनुसरण करने के माध्यम से परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम हासिल करना—सिर्फ यही वास्तविकता है; सत्य का अनुसरण और सत्य का अभ्यास—यह सब वास्तविकता है। परमेश्वर के वचन पढ़ने और साथ ही इन वचनों का अनुभव करने से तुम वास्तविक अनुभव के द्वारा परमेश्वर के ज्ञान को प्राप्त करोगे, और यही सच्चा अनुसरण है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 401

अभी राज्य का युग है। तुमने इस नए युग में प्रवेश किया है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुमने वास्तव में परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश किया है या नहीं और उसके वचन तुम्हारी जीवन वास्तविकता बन चुके हैं या नहीं। परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति के सामने प्रकट किया गया है ताकि सभी लोग अंत में, वचन के संसार में जिएँ और परमेश्वर का वचन प्रत्येक व्यक्ति को भीतर से प्रबुद्ध और रोशन कर देगा। यदि इस दौरान, तुम परमेश्वर के वचन को पढ़ने में लापरवाह हो और उसके वचन में तुम्हारी रुचि नहीं है तो यह दर्शाता है कि तुम्हारी स्थिति में गड़बड़ी है। यदि तुम वचन के युग में प्रवेश करने में असमर्थ हो तो पवित्र आत्मा तुम में कार्य नहीं करेगा; यदि तुम इस युग में प्रवेश कर चुके हो तो वह तुम में अपना काम करेगा। पवित्र आत्मा के कार्य को प्राप्त करने के लिए तुम वचन के युग की शुरुआत में क्या कर सकते हो? इस युग में, और तुम लोगों के बीच परमेश्वर इस तथ्य को पूरा करेगा : कि प्रत्येक व्यक्ति परमेश्वर के वचन को जिएगा, सत्य को अभ्यास में लाएगा और अपने दिल से परमेश्वर से प्रेम करेगा; कि सभी लोग परमेश्वर के वचनों को अपनी नींव के रूप में और अपनी वास्तविकता के रूप में इस्तेमाल करेंगे और उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होगा; और परमेश्वर के वचन का अभ्यास करके मनुष्य परमेश्वर के साथ राज करेगा। यही कार्य परमेश्वर को पूरा करना है। क्या तुम परमेश्वर के वचन को पढ़े बिना रह सकते हो? आज, ऐसे बहुत से लोग हैं जो महसूस करते हैं कि वे एक-दो दिन भी परमेश्वर के वचन को बिना पढ़े नहीं रह सकते। उन्हें परमेश्वर का वचन प्रतिदिन पढ़ना आवश्यक है, और यदि समय न मिले तो वचन को सुनना काफी है। यही अहसास पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रदान करता है, और इसी प्रकार वह मनुष्य को प्रेरित करना शुरू करता है। अर्थात वह वचनों के द्वारा मनुष्य को नियंत्रित करता है ताकि वे परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर सकें। यदि परमेश्वर के वचन को केवल एक दिन भी बिना खाए-पिए तुम्हें अंधकार और प्यास का अनुभव हो, तुम्हें यह असह्य लगता हो, तब ये बातें दर्शाती हैं कि पवित्र आत्मा तुम्हें प्रेरित कर रहा है और वह तुमसे विमुख नहीं हुआ है। तब तुम इस धारा में हो। किंतु यदि परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना एक या दो दिन के बाद, तुम्हें कोई अंतर महसूस न हो या तुम्हें प्यास महसूस न हो, तुम थोड़ा भी प्रेरित महसूस न करो तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा तुमसे विमुख हो चुका है। इसका अर्थ है कि तुम्हारी भीतरी दशा सही नहीं है; तुमने वचन के युग में प्रवेश नहीं किया है और तुम उन लोगों में से हो जो पीछे छूट गए हैं। परमेश्वर लोगों को नियंत्रित करने के लिए वचनों का उपयोग करता है; जब तुम परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते हो तो तुम्हें अच्छा महसूस होता है, और जब तुम इन वचनों को नहीं खाते-पीते हो, तब तुम्हारे पास अनुसरण का कोई मार्ग नहीं होता है। परमेश्वर का वचन मनुष्यों का भोजन और उन्हें संचालित करने वाली शक्ति बन जाता है। बाइबल में लिखा है, “मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा” (मत्ती 4:4)। यही वह कार्य है जो परमेश्वर आज संपन्न करेगा। वह इस तथ्य को तुम लोगों में पूरा करेगा। ऐसा कैसे होता था कि पहले लोग परमेश्वर का वचन बिना पढ़े बहुत दिन रहते थे, पर खाते-पीते और काम करते थे? अब ऐसा क्यों नहीं होता? इस युग में परमेश्वर सभी चीजों को नियंत्रित करने के लिए मुख्य रूप से वचनों का उपयोग करता है। परमेश्वर के वचन के द्वारा मनुष्य का न्याय किया जाता है और उन्हें पूर्ण बनाया जाता है और अंत में इन वचनों के द्वारा राज्य में ले जाया जाता है। केवल परमेश्वर का वचन मनुष्य को जीवन दे सकता है, केवल परमेश्वर का वचन ही मनुष्य को ज्योति और अभ्यास का मार्ग दे सकता है, विशेषकर राज्य के युग में। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता से नहीं भटकते, हर दिन उसके वचनों को खाते-पीते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 402

जीवन की खोज कोई जल्दबाजी की चीज़ नहीं है; जीवन में विकास एक या दो दिन में नहीं आता। परमेश्वर का कार्य सामान्य और व्यावहारिक है और इसे एक आवश्यक प्रक्रिया से गुजरना होता है। देहधारी यीशु को क्रूस पर अपने कार्य को समाप्त करने में तेंतीस वर्ष और छः माह लगे, तो मनुष्य को शुद्ध करना और उसका जीवन रूपांतरित करना कितना कठिन होगा, जो कि अतिशय मुश्किल कार्य है? ऐसा सामान्य व्यक्ति बनाना, जो परमेश्वर को अभिव्यक्त करता हो, आसान काम नहीं है। यह विशेष रूप से बड़े लाल अजगर के देश में जन्मे लोगों के लिए और भी कठिन है, जिनकी काबिलियत खराब है, उन्हें लंबे समय तक परमेश्वर के वचन और कार्य की आवश्यकता है। इसलिए परिणाम पाने के लिए जल्दबाजी न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के लिये तुम्हें पहले से ही सक्रिय होना होगा और परमेश्वर के वचनों पर अधिक से अधिक परिश्रम करना होगा। उसके वचनों को पढ़ने के बाद, तुम्हें इस योग्य हो जाना चाहिए कि तुम वास्तव में उन पर अमल करो, परमेश्वर के वचनों में ज्ञान, अंतर्दृष्टि, परख और बुद्धि को विकसित करते हुए। और इसके द्वारा तुम बदल जाओगे और तुम्हें महसूस भी नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने, उन्हें पढ़ने, उन्हें जानने, उनका अनुभव करने और उनका अभ्यास करने को अपना सिद्धांत बना लो तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम परिपक्वता हासिल कर लोगे। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर का वचन पढ़ने के बाद भी उस पर अमल नहीं कर पाते! तुम किस जल्दबाजी में हो? जब तुम एक निश्चित आध्यात्मिक कद तक पहुंच जाओगे तो तुम परमेश्वर के वचन पर अमल करने योग्य बन जाओगे। क्या चार या पांच वर्ष का बालक कहेगा कि वह अपने माता-पिता को सहारा देने या उनका आदर करने में असमर्थ है? तुम्हें जान लेना चाहिए कि तुम्हारा वर्तमान आध्यात्मिक कद क्या है, तुम जिनपर अमल कर सकते हो, अमल करो और परमेश्वर के प्रबंधन को बिगाड़ने वाले मत बनो। केवल परमेश्वर के वचनों को खाओ-पीओ और आगे बढ़ते हुए उन्हें अपना सिद्धांत बना लो। इस समय इस बारे में चिन्ता मत करो कि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण कर सकता है या नहीं। अभी इस विषय में सोच-विचार मत करो। बस परमेश्वर के वचन लो और उन्हें खाओ-पीओ, और परमेश्वर निश्चित ही तुम्हें पूर्ण करेगा। हालाँकि, परमेश्वर के वचन को खाने-पीने का एक सिद्धांत है। आँखें मूँदकर यह न करो। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने में, एक ओर उन शब्दों को खोजो जिन्हें तुम्हें जानना चाहिए—उन्हें जिनका संबंध दर्शनों से है, और दूसरी ओर उसे खोजो जिस पर वास्तव में तुम्हें अमल करना चाहिए—जिसमें तुम्हें प्रवेश करना चाहिए। एक पहलू का संबंध ज्ञान से है और दूसरे का प्रवेश से। जब तुम इन दोनों को पा लेते हो, अर्थात जब तुम उसे समझ लेते हो जिसे तुम्हें जानना चाहिए और जिस पर अमल करना चाहिए, तब तुम सीख लोगे कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाया और पिया जाता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 403

आगे बढ़ने पर, परमेश्वर के वचन के बारे में बात करना तुम्हारी बातचीत का सिद्धांत होना चाहिए। आमतौर पर, जब तुम लोग आपस में मिलते हो, तुम लोगों को परमेश्वर के वचन के बारे में संगति करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को संगति की विषयवस्तु के रूप में लेना चाहिए; बात करना चाहिए कि परमेश्वर के वचन के बारे में तुम लोग क्या जानते हो, उसके वचन को अभ्यास में कैसे लाते हो और पवित्र आत्मा कैसे काम करता है। जब तक तुम परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हें प्रकाशित करेगा। परमेश्वर के वचन के संसार को प्राप्त करने के लिए मनुष्य के सहयोग की आवश्यकता है। यदि तुम इसमें प्रवेश नहीं करते हो तो परमेश्वर अपना काम नहीं कर पाएगा। यदि तुम अपना मुँह बंद रखोगे और परमेश्वर के वचन के बारे में बातचीत नहीं करोगे तो वह तुम्हें रोशन नहीं कर पाएगा। जब भी तुम कोई दूसरा काम नहीं कर रहे, परमेश्वर के वचनों के बारे में बात करो, और बेकार की बातचीत में मत लगो! अपने जीवन को परमेश्वर के वचन से भर जाने दो; तभी तुम एक समर्पित विश्वासी होते हो। कोई बात नहीं यदि तुम्हारी सहभागिता सतही है। सतह के बिना कोई गहराई नहीं हो सकती। एक प्रक्रिया का होना ज़रूरी है। अपने प्रशिक्षण द्वारा तुम पवित्र आत्मा से प्राप्त रोशनी को समझ लोगे और यह भी जान लोगे कि परमेश्वर के वचन को प्रभावी तरीके से कैसे खाएँ-पिएँ। इस प्रकार खोजबीन में कुछ समय देने के बाद तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता में प्रवेश कर जाओगे। अगर तुममें सहयोग करने का संकल्प है, केवल तभी तुम पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त करने में समर्थ होगे।

परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के सिद्धांत के दो पहलू हैं : एक का संबंध ज्ञान से है और दूसरे का प्रवेश करने से है। तुम्हें कौन से वचन जानने चाहिए? तुम्हें दर्शन से जुड़े वचन जानने चाहिए (जैसे कि परमेश्वर का कार्य अब किस युग में प्रवेश कर चुका है, अब परमेश्वर क्या प्राप्त करना चाहता है, देहधारण क्या है और ऐसी अन्य बातें, ये सभी बातें दर्शन से संबंधित हैं)। उस मार्ग के क्या मायने हैं जिसमें मनुष्य को प्रवेश करना चाहिए? यह परमेश्वर के उन वचनों का उल्लेख करता है जिन पर मनुष्य को अमल करना और प्रवेश करना चाहिए। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने के ये दो पहलू हैं। अब से, तुम परमेश्वर के वचन को इसी तरह खाओ-पियो। यदि तुम्हें दर्शन के बारे में वचनों की स्पष्ट समझ है तो सब समय पढ़ते रहने की आवश्यकता नहीं है। मुख्य महत्व है प्रवेश करने से संबंधित वचनों को अधिक खाने-पीने का, जैसे कि किस प्रकार परमेश्वर की ओर अपने हृदय को मोड़ना है, किस प्रकार परमेश्वर के समक्ष अपने हृदय को शांत करना है, कैसे देह के खिलाफ विद्रोह करना है। यही सब है जिस पर तुम्हें अमल करना है। परमेश्वर के वचन को कैसे खाएँ-पिएँ यह जाने बिना असली सहभागिता संभव नहीं है। जब एक बार तुम जान लेते हो कि परमेश्वर के वचन को कैसे खाएँ-पिएँ और समझ लेते हो कि कुंजी क्या है तो सहभागिता तुम्हारे लिए निर्बाध हो जाएगी। जो भी मामले उठेंगे, तुम उनके बारे में सहभागिता कर पाओगे और वास्तविकता को समझ लोगे। अगर परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति करते समय तुममें वास्तविकता नहीं है, तो तुमने यह नहीं समझा है कि कुंजी क्या है, जो यह दर्शाता है कि तुम परमेश्वर के वचन को खाना-पीना नहीं जानते। कुछ लोग परमेश्वर का वचन पढ़ते समय ऊब जाते हैं। यह दशा सामान्य नहीं है। वास्तव में सामान्य बात यह है कि परमेश्वर का वचन पढ़ते हुए तुम कभी ऊबते नहीं, सदैव उसकी भूख-प्यास बनी रहती है, तुम सदैव सोचते हो कि परमेश्वर का वचन भला है। जिस व्यक्ति के पास वास्तविक प्रवेश है, वह परमेश्वर के वचन ऐसे ही खाता-पीता है। जब तुम अनुभव करते हो कि परमेश्वर का वचन सचमुच व्यावहारिक है और मनुष्य को इसमें प्रवेश करना ही चाहिए; जब तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का वचन मनुष्य के लिए बेहद सहायक और लाभदायक है, यह मनुष्य के जीवन के लिए रसद है, यह पवित्र आत्मा है जो तुम्हें ऐसी भावना देता है, और तुम्हें प्रेरित करता है। यह बात साबित करती है कि पवित्र आत्मा तुम्हारे भीतर कार्य कर रहा है और परमेश्वर तुमसे विमुख नहीं हुआ है। यह जानकर कि परमेश्वर सदैव बातचीत करता है, कुछ लोग उसके वचनों से ऊब जाते हैं, वे सोचते हैं कि परमेश्वर के वचन पढ़ने या न पढ़ने से कोई फर्क नहीं पड़ता। यह सामान्य दशा नहीं है। उनका हृदय वास्तविकता में प्रवेश करने की इच्छा नहीं करता, और ऐसे लोग न तो पूर्ण बनाए जाने की लालसा रखते हैं और न ही उसे महत्व देते हैं। जब भी तुम्हें लगता है कि तुममें परमेश्वर के वचन की प्यास नहीं है तो यह संकेत है कि तुम्हारी दशा सामान्य नहीं है। अतीत में, परमेश्वर तुमसे कहीं विमुख तो नहीं हो गया, इसका पता इस बात से चलता था कि तुम्हारे भीतर शांति है या नहीं और तुम आनंद का अनुभव कर रहे या नहीं। अब मुख्य यह है कि क्या तुममें परमेश्वर के वचन की प्यास है, क्या उसके वचन तुम्हारी वास्तविकता हैं, क्या तुम वफादार हो और क्या तुम वह करने योग्य हो जो तुम परमेश्वर के लिए कर सकते हो। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को परमेश्वर के वचन की वास्तविकता के द्वारा जाँचा-परखा जाता है। परमेश्वर अपने वचनों को सभी मनुष्यों की ओर निर्देशित करता है। यदि तुम उसे पढ़ने के लिए तैयार हो तो वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा, यदि नहीं तो वह तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा। परमेश्वर उन्हें प्रबुद्ध करता है जो धार्मिकता के भूखे-प्यासे हैं और परमेश्वर को खोजते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि परमेश्वर ने वचन पढ़ने के बाद भी उन्हें प्रबुद्ध नहीं किया। परमेश्वर के वचनों को तुमने कैसे पढ़ा था? यदि तुमने उसके वचनों को सतही तौर पर पढ़ा और वास्तविकता को कोई महत्व नहीं दिया, तो परमेश्वर कैसे तुम्हें प्रबुद्ध कर सकता है? कैसे वह व्यक्ति जो परमेश्वर के वचन को सँजोकर नहीं रखता परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है? यदि तुम परमेश्वर के वचन को सँजोकर नहीं रखते, तब तुम्हारे पास न तो सत्य होगा और न ही वास्तविकता होगी। यदि तुम उसके वचन को सँजोकर रखते हो, तब तुम सत्य का अभ्यास कर पाओगे; और तब ही तुम वास्तविकता को पाओगे। इसलिए स्थिति चाहे जो भी हो, तुम्हें परमेश्वर के वचन को खाना और पीना चाहिए, तुम चाहे व्यस्त हो या न हो, परिस्थितियाँ विपरीत हों या न हों, चाहे तुम परखे जा रहे हो या नहीं परखे जा रहे हो। कुल मिलाकर परमेश्वर का वचन मनुष्य के अस्तित्व का आधार है। किसी को भी उसके वचनों से मुँह नहीं मोड़ना चाहिए, उसके वचन को ऐसे खाना होगा जैसे वे दिन में तीन बार भोजन करते हैं। क्या परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना और प्राप्त किया जाना इतना आसान हो सकता है? अभी तुम इसे समझो या न समझो, तुम्हारे भीतर परमेश्वर के कार्य को समझने की अंतर्दृष्टि हो या न हो, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अधिक से अधिक खाना-पीना चाहिए। यह तत्परता और सक्रियता के साथ प्रवेश करना है। परमेश्वर के वचन को पढ़ने के बाद, जिसमें प्रवेश कर सको उस पर अमल करने की तत्परता दिखाओ, तुम जो नहीं कर सकते, उसे कुछ समय के लिए दरकिनार कर दो। आरंभ में हो सकता है, परमेश्वर के बहुत से वचन तुम समझ न पाओ, पर दो या तीन माह बाद या फिर एक वर्ष के बाद तुम समझने लगोगे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर एक या दो दिन में मनुष्य को पूर्ण नहीं कर सकता। अधिकतर समय, जब तुम परमेश्वर के वचन पढ़ते हो, तुम उन्हें तुरंत नहीं समझ पाओगे। उस समय चाहे तुम उन्हें कैसे भी पढ़ो, वे महज पाठ से ज्यादा कुछ नहीं लगेंगे; केवल कुछ समय के अनुभव के बाद ही तुम उसे समझने योग्य बन जाओगे। परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है इसलिए उसके वचन को खाने-पीने के लिए तुम्हें अधिक से अधिक प्रयास करना चाहिए। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम समझने लगोगे, तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब पवित्र आत्मा मनुष्य को प्रबुद्ध करता है, तब अक्सर मनुष्य को उसका ज्ञान नहीं होता। वह तुम्हें प्रबुद्ध करता है और मार्गदर्शन देता है जब तुम उसके प्यासे होते हो, उसे खोजते हो। पवित्र आत्मा के कार्य का सिद्धांत यह है कि वह परमेश्वर के वचनों के इर्द-गिर्द केंद्रित होता है जिन्हें तुम खाते-पीते हो। वे सब जो परमेश्वर के वचन को महत्व नहीं देते और उसके प्रति सदैव एक अलग तरह का दृष्टिकोण रखते हैं—अपनी संभ्रमित सोच में यह विश्वास करते हुए कि वे उसके वचन पढ़ते हैं या नहीं, यह मामला कोई मायने नहीं रखता—ऐसे लोग हैं जिनके पास वास्तविकता नहीं है। ऐसे व्यक्ति में न तो पवित्र आत्मा का कार्य और न ही उसके द्वारा दी गई प्रबुद्धता दिखाई देती है। ऐसे लोग मुफ्तखोर होते हैं, वे बिना असली योग्यताओं के मात्र दिखावा करने वाले होते हैं, जैसे कि एक नीतिकथा में नैनगुओ थे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 404

जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं, तब तुम्हें तुरंत उन्हें प्राप्त करना और खाना-पीना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम कितना समझते हो, जिस दृष्टिकोण पर तुम्हें अवश्य कायम रहना चाहिए वह यह है कि तुम वचन को खाने और पीने, उसे जानने और उसका अभ्यास करने पर अपना ध्यान केंद्रित करोगे। यह कुछ ऐसा है जिसे करने में तुम्हें समर्थ होना चाहिए। इस बात की चिंता न करो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद कितना बड़ा हो जाएगा; केवल परमेश्वर के वचन को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करो। इसी तरह से मनुष्य को परमेश्वर का सहयोग करना चाहिए। अपने आत्मिक जीवन में तुम्हें मुख्यतः वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, जहां तुम परमेश्वर के वचनों को खाओ-पिओ और उनका अभ्यास करो। तुम्हें अन्य किसी बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करना चाहिए। कलीसिया की अगुआई करने वालों को अपने सभी भाई-बहनों का मार्गदर्शन करने में सक्षम होना चाहिए ताकि वे जान जाएँ कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना-पीना है। यह हर उस व्यक्ति की जिम्मेदारी है, जो कलीसिया की अगुआई करता है। वे चाहे युवा हों या वृद्ध, सभी को परमेश्वर के वचन को खाने-पीने को महत्व देना चाहिए और उन वचनों को अपने हृदय में रखना चाहिए। इस वास्तविकता में प्रवेश करने का अर्थ है राज्य के युग में प्रवेश करना। आजकल, ज़्यादातर लोग महसूस करते हैं कि वे परमेश्वर के वचन को खाए-पिए बिना नहीं रह सकते, और महसूस करते हैं कि समय के निरपेक्ष परमेश्वर का वचन नया है। इसका अर्थ यह है कि मनुष्य सही मार्ग पर चलना आरंभ कर रहा है। परमेश्वर अपना काम करने और मनुष्य की आपूर्ति करने के लिए वचनों का उपयोग करता है। जब सभी लोग परमेश्वर के वचनों की लालसा और प्यास रखते हैं तो लोग परमेश्वर के वचनों के संसार में प्रवेश करेंगे।

परमेश्वर बहुत सारी बातें कह चुका है। तुम कितना जान पाए हो? तुम उनमें कितना प्रवेश कर पाए हो? यदि कलीसिया की अगुआई करने वाले लोगों ने अपने भाई-बहनों का परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में मार्गदर्शन नहीं किया है तो वे अपनी जिम्मेदारी निभाने में चूक जाएँगे और अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने में असफल होंगे! चाहे तुम्हारी समझ गहन हो या सतही, तुम्हारी समझ के स्तर की परवाह किए बिना, तुम्हें अवश्य ज्ञात होना चाहिए कि उसके वचनों को कैसे खाया और पिया जाए, तुम्हें उसके वचनों की ओर बहुत ध्यान अवश्य देना चाहिए और उन्हें खाने-पीने के महत्व और उसकी आवश्यकता को समझना चाहिए। परमेश्वर ने बहुत कुछ कह दिया है। यदि तुम उसके वचन को नहीं खाते-पीते, उसका अनुसरण नहीं करते या उन्हें अभ्यास में नहीं लाते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उसके वचन को खाना-पीना चाहिए, उसका अनुभव करना चाहिए और उसे जीना चाहिए। केवल यही परमेश्वर पर विश्वास करना है! यदि तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, परंतु उसके किसी वचन को अभ्यास में नहीं ला पाते या कोई वास्तविकता सामने नहीं ला पाते तो यह नहीं माना जा सकता कि तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो। ऐसा करना “भरपेट निवाले खाने की कोशिश” में रहने जैसा है। बिना किसी वास्तविकता के केवल छोटी-छोटी बातों की गवाही, अनुपयोगी और सतही मामलों पर बातें करना, परमेश्वर पर विश्वास करना नहीं है, और तुमने बस परमेश्वर में विश्वास करने का सही मार्ग नहीं समझा है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को और ज्यादा क्यों खाना-पीना चाहिए? यदि तुम उसके वचनों को खाते-पीते नहीं और केवल स्वर्ग जाना चाहते हो तो क्या यह विश्वास माना जाएगा? परमेश्वर में विश्वास रखने वाले का पहला कदम क्या होता है? परमेश्वर किस मार्ग से मनुष्य को पूर्ण बनाता है? क्या परमेश्वर के वचन को बिना खाए-पिए तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो? क्या परमेश्वर के वचन को बिना अपनी वास्तविकता बनाए, तुम परमेश्वर के राज्य के व्यक्ति माने जा सकते हो? परमेश्वर में विश्वास भला क्या होता है? परमेश्वर में विश्वास रखने वालों का कम-से-कम बाहरी तौर पर आचरण अच्छा होना चाहिए; और सबसे महत्वपूर्ण बात है परमेश्वर के वचनों से युक्त होना। किसी भी परिस्थिति में तुम उसके वचन से विमुख नहीं होगे। परमेश्वर को जानना और उसके इरादों को पूरा करना, सब उसके वचन के द्वारा हासिल किया जाता है। सभी देश, संप्रदाय, धर्म और प्रदेश भी भविष्य में वचन के द्वारा जीते जाएँगे। परमेश्वर सीधे बात करेगा, सभी लोग अपने हाथों में परमेश्वर का वचन थामकर रखेंगे और इसके द्वारा वे पूर्ण बनाए जाएँगे। भीतर और बाहर, परमेश्वर के वचन सर्वत्र व्याप्त हो जाएँगे : हर व्यक्ति अपने मुँह से परमेश्वर के वचन बोलेगा, परमेश्वर के वचन के अनुसार आचरण करेगा, और अपने हृदय में परमेश्वर का वचन रखेगा, भीतर और बाहर पूरी तरह परमेश्वर के वचन में डूबा रहेगा। इस तरह उन्हें पूर्ण बनाया जाएगा। जो लोग परमेश्वर के इरादे पूरे करते हैं और उसके लिए गवाही देने में सक्षम हैं, वे वो लोग हैं जिनके पास परमेश्वर के वचन उनकी वास्तविकता के रूप में होते हैं।

वचन के युग अर्थात सहस्राब्दि राज्य के युग में प्रवेश करना वह कार्य है जो अभी पूरा किया जा रहा है। अब से परमेश्वर के वचनों के बारे में संगति करने का अभ्यास करो। केवल परमेश्वर के वचन को खाने-पीने और अनुभव करने से ही तुम परमेश्वर के वचन को जीने में समर्थ होगे। दूसरे लोगों को आश्वस्त करने के लिए तुम्हें कुछ व्यावहारिक अनुभव दिखाने होंगे। यदि तुम परमेश्वर के वचन की वास्तविकता को नहीं जी सकते तो किसी को भी यकीन नहीं दिलाया जा सकता! परमेश्वर द्वारा उपयोग किए जाने वाले सभी लोग वे हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता को जी सकते हैं। यदि तुम परमेश्वर की गवाही देने के लिए इस वास्तविकता को सामने नहीं ला सकते तो यह दर्शाता है कि पवित्र आत्मा ने तुममें काम नहीं किया है और तुम पूर्ण नहीं बनाए गए हो। यह परमेश्वर के वचन का महत्व है। क्या तुम्हारे पास ऐसा हृदय है जो परमेश्वर के वचन की प्यास रखता हो? जो परमेश्वर के वचन के प्यासे हैं, उनमें सत्य की प्यास है और केवल ऐसे ही लोगों को परमेश्वर का आशीष प्राप्त है। भविष्य में, परमेश्वर सभी धर्मों और संप्रदायों के लोगों से और भी ज्यादा वचन बोलेगा। वह सबसे पहले तुम लोगों के बीच बोलता और अपनी वाणी सुनाता है और तुम्हें पूर्ण करता है और उसके बाद वह अन्य-जाति राष्ट्रों को जीतने के लिए उनके बीच बोलने और अपनी वाणी सुनाने की ओर बढ़ता है। वचन के द्वारा सभी लोग ईमानदारी से और पूरी तरह से कायल किए जाएँगे। परमेश्वर के वचनों और उसके खुलासों के जरिये मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव में कमी आती है, वह इंसान का रूप-रंग प्राप्त करता है और मनुष्य के विद्रोही स्वभाव में कमी आती है। वचन मनुष्य में अधिकार के साथ काम करता है और परमेश्वर की ज्योति के भीतर मनुष्य को जीतता है। परमेश्वर वर्तमान युग में जो कार्य करता है, साथ ही उसके कार्य के निर्णायक मोड़, ये सब कुछ परमेश्वर के वचन के भीतर मिल सकते हैं। यदि तुम उसके वचन को नहीं पढ़ते तो तुम कुछ नहीं समझोगे। उसके वचन को खाने-पीने से, भाइयों और बहनों के साथ सहभागिता करके और अपने वास्तविक अनुभव से तुम परमेश्वर के वचनों का पूरा ज्ञान प्राप्त करोगे। केवल इसी प्रकार से तुम सचमुच उनकी वास्तविकता को जी सकोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, राज्य का युग वचन का युग है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 405

मैंने पहले कहा है कि “वे सब, जो चिह्न और चमत्कार देखने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, त्याग दिए जाएँगे; ये वे लोग नहीं हैं, जो पूर्ण बनाए जाएँगे।” मैंने बहुत-से वचन कहे हैं, फिर भी मनुष्य को इस कार्य का लेशमात्र भी ज्ञान नहीं है और इस बिंदु तक आकर भी लोग अभी भी संकेतों और चमत्कारों की माँग करते हैं। क्या परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास संकेतों और चमत्कारों की खोज से अधिक कुछ नहीं, या यह जीवन प्राप्त करने के उद्देश्य से है? यीशु ने भी बहुत-से वचन कहे थे और उनमें से कुछ अभी भी पूरे होने शेष हैं। क्या तुम कह सकते हो कि यीशु परमेश्वर नहीं है? परमेश्वर ने गवाही दी कि वह मसीह और परमेश्वर का प्यारा पुत्र है। क्या तुम इस बात से इनकार कर सकते हो? आज परमेश्वर केवल वचन कहता है, और यदि तुम इसे पूरी तरह से नहीं जानते, तो तुम अडिग नहीं रह सकते। तुम उसमें इसलिए विश्वास करते हो क्योंकि वह परमेश्वर है, या फिर तुम उसमें इस आधार पर विश्वास करते हो कि उसके वचन पूरे होते हैं या नहीं? क्या तुम संकेतों और चमत्कारों पर विश्वास करते हो, या तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो? आज वह संकेत और चमत्कार नहीं दिखाता—क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? यदि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे नहीं होते, तो क्या वह वास्तव में परमेश्वर है? क्या परमेश्वर का सार इस बात से निश्चित होता है कि उसके द्वारा कहे गए वचन पूरे होते हैं या नहीं? ऐसा क्यों है कि कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करने से पहले सदैव उसके द्वारा कहे गए वचनों के पूरे होने की प्रतीक्षा करते हैं? क्या इसका अर्थ यह नहीं कि वे परमेश्वर को नहीं जानते? ऐसी धारणाएँ रखने वाले लोग परमेश्वर को नकारते हैं। वे परमेश्वर को मापने के लिए धारणाओं का उपयोग करते हैं; यदि परमेश्वर के वचन पूरे हो जाते हैं तो वे परमेश्वर में विश्वास करते हैं, और यदि वचन पूरे नहीं होते तो वे उसमें विश्वास नहीं करते; और वे हमेशा चिह्नों और चमत्कारों का अनुसरण करते हैं। क्या ये लोग आधुनिक युग के फरीसी नहीं हैं? तुम अडिग रहने में समर्थ हो या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम व्यावहारिक परमेश्वर को जानते हो या नहीं—यह महत्वपूर्ण है! परमेश्वर के वचनों की जितनी अधिक वास्तविकता तुममें होगी, परमेश्वर की व्यावहारिकता का तुम्हारा ज्ञान उतना ही अधिक होगा, और परीक्षणों के दौरान उतना ही अधिक अडिग रहने में तुम समर्थ होगे। जितना अधिक तुम संकेत और चमत्कार देखने पर ध्यान दोगे, उतना ही कम तुम अडिग रहने में समर्थ होगे और परीक्षणों के बीच गिर जाओगे। संकेत और चमत्कार बुनियाद नहीं हैं; केवल परमेश्वर की व्यावहारिकता ही जीवन है। कुछ लोग उन प्रभावों को नहीं जानते जिन्हें परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त किया जाना है। वे परमेश्वर के कार्य के ज्ञान की खोज न करते हुए भ्रम में अपने दिन व्यतीत करते हैं। उनकी खोज का उद्देश्य सदैव परमेश्वर से केवल अपनी इच्छाएँ पूरी करवाना होता है, और केवल तभी वे अपने विश्वास में गंभीर होते हैं। वे कहते हैं कि यदि परमेश्वर के वचन पूरे होंगे, तो वे जीवन की खोज करेंगे, किंतु यदि उसके वचन पूरे नहीं होते, तब उनके द्वारा जीवन की खोज किए जाने की कोई संभावना नहीं है। लोग सोचते हैं कि परमेश्वर पर विश्वास करना चिह्नों और चमत्कारों को देखने का अनुसरण करना है और स्वर्ग और तीसरे स्वर्ग तक आरोहण करने का भी प्रयास है। उनमें से कोई यह नहीं कहता कि परमेश्वर पर उसका विश्वास वास्तविकता में प्रवेश करने की खोज करना, जीवन की खोज करना, और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने की खोज करना है। ऐसी खोज का क्या मूल्य है? वे लोग, जो परमेश्वर के ज्ञान और उसकी संतुष्टि का अनुसरण नहीं करते, वे वो लोग नहीं हैं जो परमेश्वर पर विश्वास करते हैं; वे वो लोग हैं जो ईशनिंदा करते हैं!

अब क्या तुम लोग समझते हो कि परमेश्वर में विश्वास क्या है? क्या परमेश्वर में विश्वास का अर्थ चिह्न और चमत्कार देखना है? क्या इसका अर्थ स्वर्ग जाना है? परमेश्वर में विश्वास करना किसी भी तरह से कोई सरल मामला नहीं है। विश्वास के धार्मिक तरीकों को हटा दिया जाना चाहिए; बीमारों को चंगा करने और दानवों को निकालने का अनुसरण करना, चिह्नों और चमत्कारों पर ध्यान केंद्रित करना, परमेश्वर के अधिक अनुग्रह, शांति और आनंद का लालच करना, देह की संभावनाओं और सुख-सुविधाओं का अनुसरण करना—ये विश्वास के धार्मिक तरीके हैं और विश्वास के ऐसे तरीके कल्पित किस्म की आस्था हैं। आज परमेश्वर में व्यावहारिक विश्वास क्या है? यह परमेश्वर के वचन को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना, परमेश्वर के वचन से उसको जानना और इस प्रकार उसके प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करना है। स्पष्ट रूप से कहूँ तो : परमेश्वर में विश्वास इसलिए है ताकि तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सको, परमेश्वर से प्रेम कर सको और उस कर्तव्य को पूरा कर सको जिसे एक सृजित प्राणी द्वारा पूरा किया जाना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने का यही उद्देश्य है। तुम्हें परमेश्वर की मनोहरता को जानना चाहिए, यह जानना चाहिए कि परमेश्वर श्रद्धा के कितने योग्य है और यह जानना चाहिए कि परमेश्वर अपने सृजित प्राणियों में जो कार्य करता है, वह उनका उद्धार और उनकी पूर्णता है—ये परमेश्वर में तुम्हारे विश्वास की नितांत आवश्यक बातें हैं। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से देह के जीवन से परमेश्वर से प्रेम करने के जीवन में बदलना है, भ्रष्टता में जीने से परमेश्वर के वचनों के जीवन में जीने में बदलना है; यह शैतान की शक्ति के अधीन होने से बाहर आना और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में जीना है; यह इसलिए है ताकि तुम देह के बजाय परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो सको, ताकि परमेश्वर तुम्हारे पूरे हृदय को प्राप्त कर सके और तुम्हें पूर्ण बना सके, ताकि तुम शैतानी भ्रष्ट स्वभावों से मुक्त हो सको। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से इसलिए है ताकि परमेश्वर की महान सामर्थ्य और महिमा तुममें अभिव्यक्त हो सके, ताकि तुम परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल सको, ताकि परमेश्वर की योजना पूरी हो सके और ताकि तुम शैतान के सामने परमेश्वर के लिए गवाही दे सको। परमेश्वर में विश्वास चिह्नों और चमत्कारों को देखने की इच्छा के इर्द-गिर्द नहीं घूमना चाहिए, न ही यह तुम्हारी अपनी देह के वास्ते होना चाहिए। यह परमेश्वर को जानने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने और पतरस की तरह, मृत्यु तक परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के अनुसरण के बारे में होना चाहिए। मुख्य उद्देश्य इसे प्राप्त करना है। कोई व्यक्ति परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने के लिए भी परमेश्वर के वचन को खाता और पीता है। परमेश्वर के वचन को खाने और पीने से तुम्हें परमेश्वर का अधिक ज्ञान मिलता है, जिसके बाद ही तुम उसके प्रति समर्पण कर सकते हो। केवल परमेश्वर के ज्ञान से ही तुम उससे प्रेम कर सकते हो और परमेश्वर में अपने विश्वास में मनुष्य का यही एकमात्र लक्ष्य होना चाहिए। यदि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम हमेशा चिह्न और चमत्कार देखना चाहते हो, तो परमेश्वर में विश्वास पर यह दृष्टिकोण गलत है। परमेश्वर में विश्वास मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों को अपनी जीवन वास्तविकता के रूप में स्वीकार करना है। जब परमेश्वर के मुख से निकले वचन लोगों द्वारा अभ्यास में लाए जाते हैं और उनमें साकार होते हैं, तो परमेश्वर का उद्देश्य प्राप्त हो जाता है। परमेश्वर में विश्वास करते हुए, मनुष्य को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम होने और परमेश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण प्राप्त करने का अनुसरण करना चाहिए। यदि तुम बिना किसी शिकायत के परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हो, परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो सकते हो और पतरस के आध्यात्मिक कद को प्राप्त कर सकते हो, परमेश्वर द्वारा बताई गई पतरस की शैली को धारण कर सकते हो, तभी तुमने परमेश्वर में विश्वास में सफलता प्राप्त की होगी और यह इस बात का प्रतीक होगा कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के वचन से सब कुछ पूरा हो जाता है

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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