जीवन में प्रवेश IV

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 483

तुम आखिर परमेश्वर में विश्वास क्यों करते हो? यह प्रश्न आने पर अधिकतर लोग अभी भी भ्रमित होते हैं और उनके पास व्यावहारिक परमेश्वर और स्वर्ग के परमेश्वर के बारे में हमेशा से दो बिल्कुल भिन्न दृष्टिकोण होते हैं। यह दिखाता है कि लोग समर्पण करने के लिए नहीं, बल्कि कुछ लाभ प्राप्त करने या आपदा के साथ आने वाली पीड़ा से बचने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं; केवल तभी वे थोड़ा-बहुत समर्पणशील होते हैं। इस तरह का समर्पण सशर्त होता है—उनके व्यक्तिगत भविष्य के हित उनके समर्पण की पूर्व-शर्त होते हैं; वे कोई विकल्प न होने के कारण समर्पण करते हैं। तो, तुम परमेश्वर में विश्वास आखिर क्यों करते हो? यदि यह केवल तुम्हारे भविष्य के हितों और तुम्हारे भाग्य के लिए है, तो बेहतर यही होगा कि तुम उसमें विश्वास ही न करो। इस प्रकार का विश्वास खुद को मूर्ख बनाना, खुद को आश्वस्त करना और अपनी सराहना करना है। यदि तुम्हारी आस्था परमेश्वर के प्रति समर्पण की नींव पर आधारित नहीं है, तो तुम्हें उसका विरोध करने के लिए अंततः दण्डित किया जाएगा। वे सब जो अपनी आस्था में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं खोजते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग सत्य की खोज करें, उसके वचनों के प्यासे बनें, उसके वचनों को खाएँ-पिएँ और उन्हें अभ्यास में लाएँ ताकि वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकें। यदि यही तुम्हारा सच्चा इरादा है, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा उत्कर्ष करेगा और निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रही होगा। यह निर्विवाद और अपरिवर्तनीय है। यदि तुम्हारा इरादा परमेश्वर के प्रति समर्पण का नहीं है और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—यहाँ तक कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ और इससे भी बढ़कर तुम्हारा प्रत्येक कदम भी—उसके विरोध में होगा। भले ही तुम्हारे बोल कोमल हों और तुम स्वभाव से सौम्य हो, भले ही तुम्हारा हर कदम और हर हाव-भाव दूसरों को उचित दिखाई दे, मानो तुम कोई समर्पणशील व्यक्ति हो, किन्तु जब परमेश्वर में आस्था को लेकर तुम्हारे इरादों और दृष्टिकोणों की बात आती है, तो तुम्हारा हरेक क्रियाकलाप परमेश्वर के विरोध में होता है, यह बुराई करना होता है। जो लोग भेड़ों जैसे आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परंतु जिनके हृदय में बुरे इरादे छिपे होते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं और सीधे परमेश्वर का अपमान करते हैं। परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी नहीं छोड़ेगा, और पवित्र आत्मा उनमें से एक-एक को बेनकाब कर देगा। हर कोई देख लेगा कि जो भी पाखंडी हैं वे सब पवित्र आत्मा द्वारा निश्चित रूप से ठुकरा दिए जाएंगे। अधीर मत बनो : परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से एक-एक का हिसाब और निपटान करेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 484

यदि तुम परमेश्वर से नए प्रकाश को स्वीकार करने में असमर्थ हो और जब तुम आज परमेश्वर के कार्य को स्पष्ट रूप से नहीं समझ पाते तो उसकी खोज नहीं करते, बल्कि उस पर संदेह करते हो, उसकी आलोचना करते हो तथा उसकी पड़ताल और विश्लेषण करते हो, तो ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पित होने की कोई इच्छा नहीं रखता। यदि जब वर्तमान प्रकाश प्रकट होता है, तब भी तुम बीते हुए कल का प्रकाश सँजोकर रखते हो और परमेश्वर के नए कार्य का विरोध करते हो, तो तुम एक बेतुके इंसान से बढ़कर और कुछ नहीं हो—तुम उनमें से हो जो जानबूझकर परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की कुंजी नवीनतम प्रकाश को स्वीकार करने और इसे स्वीकार कर पाने और अभ्यास में ला पाने में है। सिर्फ यही सच्चा समर्पण है। जिनमें परमेश्वर के प्रति लालायित रहने का संकल्प नहीं होता है वे उसके प्रति स्वेच्छा से समर्पण करने में अक्षम हैं और यथास्थिति से संतुष्ट होने के फलस्वरूप परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं। इंसान परमेश्वर के प्रति समर्पण इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह अभी भी उस चीज के वश में है जो पहले आ चुकी है। पहले आई हुई चीजों ने मनुष्य में परमेश्वर के बारे में तमाम तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ पैदा कीं और ये उसके दिमाग में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार वह जिस चीज में विश्वास करता है वह स्वयं उसी की धारणाएँ और उसकी अपनी ही कल्पनाओं के मापदण्ड हैं। यदि तुम अपनी कल्पना के परमेश्वर के सामने उस परमेश्वर को मापते हो जो आज व्यावहारिक कार्य करता है, तो तुम्हारी आस्था शैतान से आती है और तुम्हारी अपनी ही पसंदगियों पर आधारित है—परमेश्वर इस तरह की आस्था नहीं चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि लोगों की साख कितनी ऊँची है और उनकी खपाई की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके लिए कार्य करते हुए जीवनभर का प्रयास खपाया हो और वे अपनी जान कुर्बान करने की हद तक गए हों—परमेश्वर इस तरह की आस्था वाले किसी भी व्यक्ति को स्वीकृति नहीं देता है। वह उनके ऊपर मात्र थोड़ा-सा अनुग्रह करता है और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता, परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से प्रत्येक को निकाल देगा। चाहे कोई युवा हो या बुजुर्ग, ऐसे सभी लोग जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते और जिनकी मंशाएँ ग़लत हैं, जो विरोध करते हैं और गड़बड़ी करते हैं, ऐसे लोगों को परमेश्वर यकीनन निकाल देगा। वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की सुलभता और मनोहरता का कुछ-कुछ आभास है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों के प्रति समर्पण नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं या पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके समर्पण, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शोधन के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न हो जाना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और इसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का अनुसरण करना—यही सचेत होकर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का अर्थ है और ठीक इसी प्रकार की आस्था वह चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं या परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं; उनके पास केवल सतही समर्पण, धर्मनिष्ठा, प्रेम तथा धैर्य होता है। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है और वे ऐसी बातें करते हैं, जैसे, “परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है,” या “परमेश्वर मनुष्य के प्रति दया रखता है”। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इसका यह अर्थ है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं। यदि जब परमेश्वर के वचन उनका शोधन करते हैं या जब उनके सामने परमेश्वर के परीक्षण आते हैं, तब लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर पाते—बल्कि संदेह में पड़ जाते हैं और यहाँ तक कि ठोकर खा जाते हैं—तो वे रत्ती भर भी समर्पणशील नहीं होते। उनके अंदर परमेश्वर में आस्था को लेकर बहुत-से नियम और प्रतिबंध होते हैं, यहाँ तक कि दीर्घकालिक अनुभव होता है जो उन्होंने वर्षों की आस्था से अर्जित किया है या विभिन्न विनियम होते हैं जो बाइबल को अपना सिद्धांत मानते हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीजों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे कर सकते हैं? उनका “समर्पण” उनकी व्यक्तिगत पसंदगियों पर आधारित होता है—क्या परमेश्वर ऐसा समर्पण चाहेगा? यह विनियमों से चिपके रहना है, न कि परमेश्वर के प्रति समर्पण; यह स्वयं को तसल्ली देने और दिलासा देने भर की बात है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर के प्रति समर्पण है, तो क्या तुम ईशनिंदा नहीं कर रहे हो? तुम एक मिस्री फिरौन हो, तुम बुरे काम करते हो। तुम जान-बूझकर परमेश्वर का विरोध करने के काम में लिप्त होते हो—क्या परमेश्वर तुमसे इस तरह की सेवा चाहता है? तुम्हारे लिए सबसे अच्छा यही होगा कि जल्दी से जल्दी पश्चात्ताप करो और कुछ आत्म-जागरूकता पाने का प्रयत्न करो। ऐसा नहीं करने पर, घर चले जाने में ही तुम्हारी भलाई होगी; तुम्हारी “परमेश्वर के प्रति सेवा” से तो यही तुम्हारे लिए अधिक अच्छा होगा। तुम न गड़बड़ी करोगे और न विघ्न डालोगे; तुम्हें अपनी जगह पता होगी और सकुशल रहोगे—क्या यह बेहतर नहीं होगा? और तुम परमेश्वर का विरोध नहीं करोगे और दण्डित नहीं किए जाओगे!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 485

पवित्र आत्मा का कार्य दिन-ब-दिन बदलता रहता है। वह हर एक कदम के साथ ऊँचा उठता जाता है, आने वाले कल का प्रकाशन आज से कहीं ज़्यादा ऊँचा होता है। कदम-दर-कदम ऊपर चढ़ता जाता है। ऐसे ही कार्य के द्वारा परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण करता है। यदि मनुष्य कदम से कदम न मिला पाए, तो उसे किसी भी समय निकाला जा सकता है। यदि उसका हृदय समर्पण करने वाला न हो, तो वह अंत तक अनुसरण नहीं कर सकेगा। पहले का युग गुज़र चुका है; यह एक नया युग है। और नए युग में, नया कार्य करना चाहिए। विशेषकर अंतिम युग में, जिसमें लोगों को पूर्ण बनाया जाता है, परमेश्वर ज़्यादा तेजी से अधिक नया कार्य करेगा, इसलिए अगर लोग इरादतन समर्पण नहीं करते हैं तो उनके लिए परमेश्वर के पदचिह्नों पर चलना कठिन होगा। परमेश्वर किसी भी विनियम से बाध्य नहीं होता, न ही वह अपने कार्य के किसी भी चरण को हमेशा के लिए अपरिवर्तित मानता है। बल्कि वह लगातार ऐसा कार्य करता है जो हमेशा अधिक नया और हमेशा उच्चतर होता है। हर चरण के साथ उसका कार्य और भी व्यावहारिक होता जाता है, और मनुष्य की वास्तविक ज़रूरतों के अनुरूप होता जाता है। केवल ऐसे कार्य का अनुभव करने से ही लोग अपने स्वभावों में अंतिम परिवर्तन प्राप्त कर सकते हैं। जीवन के बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक उच्चतर स्तरों तक पहुँचता जाता है, और उसी तरह परमेश्वर का कार्य भी अधिक उच्चतर स्तरों तक पहुँचता जाता है। इसी तरह से मनुष्य को पूर्ण बनाया जा सकता है और वह परमेश्वर के उपयोग के लायक हो सकता है। परमेश्वर एक ओर, मनुष्य की धारणाओं का खंडन करने और उन्हें पलटने के लिए इस तरह से कार्य करता है, और दूसरी ओर, मनुष्य की उच्चतर तथा और अधिक व्यावहारिक दशा में, परमेश्वर में आस्था के उच्चतम क्षेत्र में अगुवाई करने के लिए इस तरह कार्य करता है, ताकि अंत में, परमेश्वर की इच्छा पूरी हो सके। जो लोग विद्रोही प्रकृति के होते हैं और जानबूझ कर विरोध करते हैं, परमेश्वर के तीव्र और शक्तिशाली कार्य के इस चरण द्वारा निकाल दिए जाएँगे; जो इरादतन समर्पण करते हैं और जो खुशी-खुशी खुद को विनम्र बनाते हैं केवल वही मार्ग के अंत तक प्रगति कर सकते हैं। इस प्रकार के कार्य में, तुम सभी लोगों को सीखना चाहिए कि समर्पण कैसे करें और अपनी धारणाओं को कैसे छोड़ें। तुम लोगों को हर कदम पर सतर्क रहना चाहिए। यदि तुम लोग लापरवाह बनोगे, तो तुम्हें निश्चित रूप से पवित्र आत्मा द्वारा ठुकरा दिया जाएगा, और तुम परमेश्वर के कार्य में गड़बड़ करोगे। कार्य के इस चरण से गुजरने से पहले, मनुष्य के पुराने नियम-कानून इतने अधिक थे कि उसने तार्किकता खो दी और वह दंभी हो गया और खुद को भूल गया। ये सारी ऐसी बाधाएँ हैं जो मनुष्य को परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार करने से रोकती हैं; ये मनुष्य के परमेश्वर-ज्ञान की शत्रु हैं। मनुष्य के हृदय में समर्पण और सत्य के लिए लालसा न होना खतरनाक है। यदि तुम केवल सरल कार्यों और वचनों के प्रति ही समर्पित होते हो, और गहन कार्यों या वचनों को स्वीकार नहीं पाते हो, तो तुम पुराने मार्गों से चिपके रहने वाले व्यक्ति हो और पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाकर नहीं चल सकते।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 486

हर युग में परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अलग होता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के किसी एक चरण में अच्छी तरह समर्पण करते हो, मगर अगले ही चरण में उसके कार्य के प्रति तुम्हारा समर्पण कम हो जाता है या तुम समर्पण ही नहीं कर पाते, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है, तब तुम उसके साथ कदम मिलाकर चलते हो और जब वह अगला कदम उठाए, तब भी तुम्हें उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए; तभी तुम पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित बनोगे। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें अपने समर्पण में निरंतर बने रहना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम जब चाहो समर्पण करो और जब न चाहो तब समर्पण करने से इनकार कर दो। परमेश्वर इस प्रकार के समर्पण की स्वीकृति नहीं देता। यदि तुम नए कार्य के बारे में मेरी संगति के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो और पुरानी बातों से ही चिपके रहते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों से तुम्हें पोषण देना है। यदि तुम उसके वचनों के प्रति समर्पण करोगे, उन्हें स्वीकारोगे, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिल्कुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं बता रहा हूँ; जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम्हारे निहारने के लिए नया प्रकाश प्रकट करता हूँ और तुम लोगों को आज के प्रकाश में लाता हूँ, और जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुममें कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अवज्ञाकारी हो सकते हैं, कहेंगे, “तुम जो कहते हो मैं उसका अभ्यास बिल्कुल नहीं करूँगा।” ऐसी स्थिति में, मैं कहूँगा कि तुम मार्ग के अंत पर आ चुके हो; तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुम जीवन से रहित हो। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपांतरण का अनुभव करने में आज के प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना सबसे अहम है। पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। अगली अवधि के दौरान शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें तत्काल उसका अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। जैसे-जैसे तुम खुद चीजों से होकर गुजरोगे, जिस चीज से वे गुजरे उसका वास्तविक अनुभव हासिल करोगे तो तुम्हें और भी उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। इस तरह से अभ्यास करने के माध्यम से तुम अधिक तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य की पूर्णता का मार्ग है और वह साधन है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना या चीज के जरिए वह तुम्हें चीजों को हासिल करने और देखने में सक्षम बनाएगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीजों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीजों का अनुभव करते हो, तो यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसके प्रति समर्पण करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए और हर चीज से सबक सीखने चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन वृद्धि कर सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।

पवित्र आत्मा तुम्हारे असली अनुभवों के माध्यम से तुम्हें प्रबुद्ध करता है और तुम्हारी आस्था के जरिए तुम्हें पूर्ण बनाता है। क्या तुम सचमुच पूर्ण बनना चाहते हो? यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बना दिए जाना चाहते हो, तो तुम्हारे अंदर अपनी देह का परित्याग करने का साहस होगा, तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर पाओगे और तुम नकारात्मक या कमजोर नहीं होगे। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसके प्रति तुम समर्पण कर पाओगे, और तुम अपने सभी कृत्यों को परमेश्वर के सामने रख सकोगे, तुमने उन्हें चाहे दूसरों के सामने किया हो या उनकी पीठ पीछे। यदि तुम ईमानदार इंसान के रूप में कार्य करते हो और सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करते हो, तो तुम वह व्यक्ति होगे जिसे पूर्ण बनाया जाता है। ऐसे धोखेबाज लोग जो दूसरों के सामने एक तरह से व्यवहार करते हैं और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से, वे पूर्ण बनने के इच्छुक नहीं होते हैं। वे सब बरबादी के पुत्र होते हैं और विनाश के पुत्र होते हैं; वे शैतान के होते हैं और वे परमेश्वर के नहीं हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर नहीं चुनता! यदि तुम्हारे क्रियाकलापों और व्यवहार को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत नहीं किया जा सके या परमेश्वर के आत्मा द्वारा इनकी पड़ताल न की जा सके, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम्हारे साथ कुछ गड़बड़ है। तुम्हें परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार जरूर करना चाहिए और अपने स्वभाव के रूपांतरण पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए; केवल तभी तुम पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रख पाओगे। यदि तुम परमेश्वर द्वारा सच में पूर्ण बनाए जाना और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलना चाहते हो, तो तुम्हें, बिना किसी शिकायत के, बिना परमेश्वर के कार्य की कोई मनमानी आलोचना किए या निष्कर्ष निकाले, परमेश्वर के सभी कार्यों के प्रति समर्पण करना चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की ये न्यूनतम आवश्यकताएँ हैं। जो लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं उनके लिए अनिवार्य आवश्यकता यह है : हर काम परमेश्वर-प्रेमी हृदय से करो। हर काम परमेश्वर-प्रेमी हृदय से करने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि तुम्हारे सारे काम और आचरण को परमेश्वर के सामने प्रस्तुत किया जा सकता है। चूँकि तुम्हारे इरादे सही हैं, इसलिए चाहे तुम्हारे काम सही हों या गलत, तुम उन्हें परमेश्वर या भाई-बहनों को दिखाने से नहीं डरोगे; तुम परमेश्वर के सामने शपथ लेने का साहस रखोगे। तुम्हें अपना हर इरादा, विचार और कल्पना परमेश्वर के सामने पड़ताल के लिए प्रस्तुत करना चाहिए; यदि तुम इस प्रकार से अभ्यास और प्रवेश करोगे, तो जीवन में तुम्हारी प्रगति शीघ्र होगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 487

चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें परमेश्वर के सभी वचनों और कार्यों में आस्था रखनी चाहिए। अर्थात्, चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसके प्रति समर्पण किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और छद्म-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों के प्रति समर्पण कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के आगे झुकने से इनकार करते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। वे परमेश्वर के शत्रु हैं, मसीह-विरोधी हैं। वे हमेशा परमेश्वर के नए कार्य के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं; उनमें कभी भी समर्पण करने की जरा-सी भी प्रवृत्ति नहीं होती, न ही उन्होंने कभी खुशी-खुशी समर्पण किया है या खुद को विनम्र किया है। दूसरों के सामने, वे सबसे अधिक अभिमानी होते हैं और वे कभी किसी के आगे समर्पण नहीं करते। परमेश्वर के सामने, वे खुद को ‘धर्मोपदेशों’ का प्रचार करने में सर्वश्रेष्ठ और दूसरों पर कार्य करने में सबसे कुशल मानते हैं। वे अपने पास मौजूद ‘खजानों’ को कभी नहीं छोड़ते; बल्कि वे उन्हें पारिवारिक विरासत मानते हैं जिनकी पूजा की जानी चाहिए और जिनके बारे में दूसरों को प्रचार किया जाना चाहिए; वे उनका उपयोग उन बुद्धुओं को व्याख्यान देने के लिए करते हैं जो उन्हें पूजते हैं। कलीसिया में वास्तव में ऐसे कुछ लोग हैं। यह कहा जा सकता है कि वे ‘अदम्य नायकों का एक राजवंश’ हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले रहते हैं। वे ‘धर्मोपदेशों’ (सिद्धांतों) का प्रचार करने को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं। साल-दर-साल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वे अपने ‘पावन और अलंघनीय’ कर्तव्य को सख्ती से पूरा करते रहते हैं। कोई भी उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुले तौर पर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं करता। वे परमेश्वर के घर में ‘राजा’ बन जाते हैं, युग-युग तक दूसरों पर अत्याचार करते हुए निरंकुश होकर कहर ढाते हैं। दुष्ट दानवों का यह झुंड मेरे कार्य को नष्ट करने के लिए हाथ मिलाना चाहता है; मैं इन जीते-जागते दानवों को अपनी आँखों के सामने कैसे रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा समर्पण करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी इसका एक अंश ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उनके प्राप्त किए जाने की आशा और भी कम नहीं है? विजय-कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विजय का उद्देश्य धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करना, मनुष्य के दंड के लिए प्रमाण प्राप्त करना, बुरे लोगों को दंडित करना, और इससे भी अधिक उन लोगों को पूर्ण बनाने के लिए विजय पाना है जो इच्छापूर्वक समर्पण करते हैं। अंत में, सबको उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, और जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा उनके विचार और ख्याल समर्पण से परिपूर्ण होंगे। यही वह कार्य है जो अंततः संपन्न किया जाएगा। जबकि, जो लोग विद्रोहीपन के कृत्यों से परिपूर्ण होंगे उन्हें दंडित किया जाएगा और जलती आग में झोंक दिया जाएगा और वे अनंतकाल तक शाप के भागी होंगे। जब वह समय आएगा, तो युगों-युगों में विद्यमान रहा वह “महान और अदम्य नायकों का वंश” सबसे नीच और परित्यक्त “कमजोर और नपुंसक कायरों का वंश” बन जाएगा। केवल यही परमेश्वर की समस्त धार्मिकता और उसके उस स्वभाव को प्रकट कर सकता है जो मनुष्य से अपमान बर्दाश्त नहीं करता है, मात्र यही मेरे हृदय की घृणा को शांत कर सकता है। क्या तुम लोगों को यह पूरी तरह तर्कपूर्ण नहीं लगता?

न तो पवित्र आत्मा के कार्य का अनुभव करने वाले तमाम लोग जीवन पा सकते हैं, और न ही इस धारा में रहने वाले जीवन पा सकते हैं। जीवन कोई आम संपत्ति नहीं है जिसे सभी लोग साझा करें, और उन सबके द्वारा स्वभाव में बदलाव आसानी से हासिल नहीं किए जाते हैं। परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण में अवश्य ही वास्तविकता होनी चाहिए और इसे जीना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पायी जा सकती है, अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलुओं के प्रति समर्पण करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है। परमेश्वर के प्रति समर्पण और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक ही बात है। जो लोग केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते, उन्हें समर्पित नहीं माना जा सकता, और उन्हें तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता जो सचमुच समर्पण न करके, सतही तौर पर चापलूस होते हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य के माध्यम से नया ज्ञान प्राप्त करने और नए बदलावों से गुजरने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग ही परमेश्वर की स्वीकृति पाते हैं, ऐसे लोग ही पूर्ण बनाए जाते हैं, और ऐसे लोग ही हैं जिनके स्वभाव का रूपांतरण होता है। जो लोग खुशी से परमेश्वर के प्रति, उसके वचन और कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वही परमेश्वर की स्वीकृति पाते हैं। ऐसे लोग ही सही लोग हैं; ऐसे लोग ही ईमानदारी से परमेश्वर की कामना करते हैं और ईमानदारी से परमेश्वर को खोजते हैं। जहाँ तक ऐसे लोगों का सवाल है जो परमेश्वर में आस्था की केवल बात करते हैं, पर वास्तव में उसे अपशब्द कहते हैं, ऐसे लोग मुखौटा लगाकर रखते हैं, ऐसे लोगों के अंदर साँप का ज़हर होता है; ऐसे लोग सबसे अधिक विश्वासघाती होते हैं। कभी न कभी, ऐसे खलनायकों के गिरोह का मुखौटा अवश्य उतरेगा। क्या आज यही कार्य नहीं किया जा रहा है? बुरे लोग हमेशा बुरे ही रहेंगे, वे कभी दण्ड के दिन से बच नहीं सकते हैं। अच्छे लोग हमेशा अच्छे रहेंगे और उन्हें तब प्रकट किया जाएगा जब परमेश्वर का कार्य समाप्त हो जाएगा। किसी भी बुरे इंसान को धार्मिक नहीं समझा जाएगा, न ही किसी धार्मिक को बुरा समझा जाएगा। क्या मैं किसी इंसान पर गलत दोषारोपण होने दूँगा?

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 488

जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन प्रगति करेगा, तुम्हारे अंदर हमेशा नया प्रवेश और नई, उच्चतर अंतर्दृष्टि होनी चाहिए, जो हर कदम के साथ और गहरे होते जाते हैं। इसी में हर इंसान को प्रवेश करना चाहिए। अगर संगति करने, धर्मोपदेश सुनने, परमेश्वर का वचन पढ़ने या किसी मसले को सँभालकर तुम्हें नई अंतर्दृष्टि और नई प्रबुद्धता प्राप्त होती है, तुम पुराने विनियमों और पुराने दौर में नहीं जीते हो और हमेशा नई ज्योति में जीते हो, परमेश्वर के वचन से भटकते नहीं हो, तो इसी को सही पथ पर आना कहते हैं। किसी सतही तौर पर कीमत चुकाने मात्र से काम नहीं चलेगा; परमेश्वर का वचन दिन-प्रतिदिन उच्चतर ऊँचाइयों पर पहुँचता है और हर दिन नई चीजें दिखाई देती हैं, और इंसान को भी हर दिन नया प्रवेश करना चाहिए। जब परमेश्वर बोलता है, तो वह उस सबको साकार करता है जो उसने बोला है, और यदि तुम ताल मिलाकर नहीं चलोगे, तो पीछे रह जाओगे। अपनी प्रार्थनाओं में और गहराई लाओ; रुक-रुक कर परमेश्वर के वचनों को खाया-पिया नहीं जा सकता। प्राप्त होने वाली प्रबुद्धता एवं रोशनी को और गहरा करो, इससे तुम्हारी धारणाएँ और कल्पनाएँ धीरे-धीरे कम होती जाएँगी। अपने आकलन को और मजबूत करो, और जो भी समस्याएँ आएँ, उनके बारे में तुम्हारे अपने विचार और अपना दृष्टिकोण होना चाहिए। आत्मा के कुछ मामलों को समझकर तुम्हें बाहरी चीजों में अंतर्दृष्टि हासिल करनी चाहिए और इन मसलों का सार समझना चाहिए। यदि तुममें ये चीजें न हों, तो तुम कलीसिया की अगुआई कैसे कर पाओगे? यदि तुम किसी वास्तविकता और अभ्यास के मार्ग के बिना, केवल शब्दों और धर्म-सिद्धांतों की बात करोगे, तो तुम केवल थोड़े समय के लिए ही काम चला पाओगे। नए विश्वासियों से बात करते हुए इसे थोड़ा स्वीकार किया जा सकता है, लेकिन कुछ समय बाद जब नए विश्वासी कुछ व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लेंगे, तो तुम उन्हें अब और पोषण नहीं दे पाओगे। फिर तुम परमेश्वर के उपयोग के लिए लायक कैसे हुए? नई प्रबुद्धता के बिना तुम कार्य नहीं कर सकते। जो लोग नई प्रबुद्धता से रहित हैं, वे नहीं जानते कि अनुभव कैसे करना है, और ऐसे लोग कभी भी नया ज्ञान या नया अनुभव प्राप्त नहीं कर पाते। जीवन आपूर्ति करने के मामले में, वे न तो कभी अपना कार्य कर सकते हैं, न ही परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल के लिए उपयुक्त हो सकते हैं। ऐसा व्यक्ति एकदम अनुपयोगी होता है, बस बेकार होता है। दरअसल, ऐसे लोग कार्य में अपनी भूमिका निभाने के लिए पूरी तरह से अयोग्य होते हैं, और एकदम अनुपयोगी होते हैं। वे लोग अपनी भूमिका तो निभाते ही नहीं, ऊपर से कलीसिया के लिए अनावश्यक परेशानी भी खड़ी करते हैं। मैं इन “आदरणीय वृद्ध जनों” को जल्दी से जल्दी कलीसिया छोड़ने के लिए आग्रह करता हूँ ताकि फिर लोग तुम्हें न देखें। ऐसे लोगों को नए कार्य की कोई समझ नहीं होती और वे धारणाओं से भरे होते हैं। वे लोग कलीसिया में कोई काम नहीं करते हैं; बल्कि, वे हर जगह मतभेद के बीज बोते हैं और नकारात्मक टिप्पणियाँ फैलाते हैं और यहाँ तक कि कलीसिया में अनाप-शनाप ढंग से दुष्कृत्य करते हैं और परेशानी पैदा करते हैं, जिससे विवेकशीलता की कमी वाले लोगों को भ्रम और उलझन में झोंक देते हैं। इन जीते-जागते दानवों को, इन दुष्ट आत्माओं को, जितना जल्दी हो सके कलीसिया छोड़ देनी चाहिए, कहीं ऐसा न हो कि तुम्हारे कारण कलीसिया को नुकसान सहना पड़े। हो सकता है तुम आज के कार्य से भयभीत न हो, किन्तु क्या तुम आने वाले कल के धार्मिक दण्ड से भी भयभीत नहीं हो? कलीसिया में बहुत-से लोग मुफ्तखोर हैं, और बड़ी तादाद में भेड़िए हैं जो परमेश्वर के सामान्य कार्य को बर्बाद करने की कोशिश करते हैं। ये सब दानव हैं जिन्हें दानवों के सरदार ने भेजा है, क्रूर भेड़िए हैं जो नादान मेमनों को निगलने की ताक में रहते हैं। अगर इन तथाकथित लोगों को निकाला नहीं गया, तो ये कलीसिया में परजीवी और चढ़ावों को हड़पने वाले कीट-पतंगे बन जाएँगे। देर-सवेर ऐसा दिन आएगा जब इन कुत्सित, अज्ञानी, नीच और घटिया भुनगों को दंडित किया जाएगा!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 489

वास्तविकता का ज्ञान प्राप्त करना और परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ—ये दोनों उसके वचनों में दिखाई देते हैं, और केवल परमेश्वर के वचनों के माध्यम से ही तुम प्रबुद्धता प्राप्त कर सकते हो। इसलिए तुम्हें खुद को परमेश्वर के वचनों से अधिक लैस करना चाहिए। परमेश्वर के वचनों को लेकर अपनी समझ पर संगति करो, ताकि तुम्हारी संगति से दूसरे प्रबुद्ध हो सकें और उन्हें आगे का मार्ग मिल सके—यह एक व्यावहारिक मार्ग है। इससे पहले कि परमेश्वर तुम्हारे लिए किसी परिवेश का इंतजाम करे, तुम लोगों में से प्रत्येक को पहले उसके वचनों से लैस होना चाहिए। यह एक ऐसी चीज है, जो हर किसी को करनी चाहिए; यह एक अत्यावश्यक प्राथमिकता है। पहले, एक ऐसे बिंदु पर पहुँचो, जहाँ तुम्हें पता हो कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना और पीना है। जिस चीज को करने का तरीका तुम नहीं जानते, उसके लिए परमेश्वर के वचनों से अभ्यास का मार्ग तलाशो, और अपनी समझ में न आने वाले मुद्दों या अपनी कठिनाइयों का हल उसके वचनों में खोजो। परमेश्वर के वचनों को अपनी आपूर्ति बनाओ, और उन्हें अपनी असली कठिनाइयाँ और समस्याएँ सुलझाने में अपनी सहायता करने दो, साथ ही उसके वचनों को जीवन में अपना सहायक बनने दो। इन चीजों के लिए तुम्हारी तरफ से प्रयास आवश्यक होगा। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से तुम्हें परिणाम प्राप्त होने ही चाहिए; तुम्हें उसके सामने अपना हृदय शांत करने में समर्थ होना चाहिए। जब भी तुम समस्याओं का सामना करते हो, उसके कथनों के अनुसार अभ्यास करो, और जब तुम्हारा सामना किसी भी चीज से न हो, तो तुम्हें बस उसके वचनों को खाने और पीने पर ध्यान देना चाहिए। कभी-कभी तुम प्रार्थना कर सकते हो और परमेश्वर के प्रेम के बारे में चिंतन कर सकते हो, उसके वचनों की अपनी समझ पर संगति कर सकते हो, और अपने अंदर अनुभव होने वाली प्रबुद्धता और रोशनी, और उन वचनों को पढ़ते समय हुई प्रतिक्रियाओं के बारे में संगति कर सकते हो। इसके अलावा, तुम लोगों को आगे का रास्ता दे सकते हो। केवल यही व्यावहारिक है। ऐसा करने का लक्ष्य परमेश्वर के वचनों को अपनी व्यावहारिक आपूर्ति बनने देना है।

दिन भर में तुम कितने घंटे वास्तव में परमेश्वर के सामने होते हो? तुम्हारे दिन का कितना हिस्सा वास्तव में परमेश्वर को दिया जाता है? कितना देह को दिया जाता है? अपना हृदय हमेशा परमेश्वर की ओर उन्मुख रखना परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने के सही रास्ते पर पहला कदम है। अगर तुम अपना हृदय, शरीर और अपना समस्त वास्तविक प्रेम परमेश्वर को समर्पित कर सकते हो, उन्हें उसके सामने रख सकते हो, उसके प्रति पूर्ण समर्पण कर सकते हो, उसके इरादों के प्रति पूर्णतः विचारशील हो सकते हो और देह के लिए, परिवार के लिए और अपनी इच्छाओं के लिए काम नहीं करते हो, बल्कि परमेश्वर के घर के हितों के लिए काम करते हो, परमेश्वर के वचनों को हर चीज में अपने सिद्धांत और नींव के रूप में ले सकते हो, तो ऐसा करने से तुम्हारे इरादे और परिप्रेक्ष्य सब सही होंगे और तब तुम ऐसे व्यक्ति होगे जो परमेश्वर की उपस्थिति में उसकी स्वीकृति प्राप्त करता है। परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो उसके प्रति अनन्य हैं; वह उन लोगों को पसंद करता है जो केवल उसके प्रति वफादार हो सकते हैं। जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, वे वो लोग हैं जो उसके प्रति आधे मन के हैं, और जो उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं। वह उन लोगों से घृणा करता है, जो उस पर विश्वास तो करते हैं और हमेशा उसका आनंद लेना चाहते हैं, लेकिन उसके लिए स्वयं को पूरी तरह से खपा नहीं सकते। वह उन से घृणा करता है जो कहते हैं कि वे उससे प्रेम करते हैं, लेकिन अपने हृदय में उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं; वह उनसे घृणा करता है, जो धोखा देने के लिए वाक्पटु और लच्छेदार शब्दों का उपयोग करते हैं। जो लोग परमेश्वर के प्रति वास्तव में समर्पित नहीं हैं या जिन्होंने वास्तव में उसके प्रति समर्पण नहीं किया है, वे प्रकृति से अत्यधिक विद्रोही और अत्यधिक अभिमानी हैं। खासकर जो लोग सामान्य, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने वास्तव में समर्पित नहीं हो सकते, वे तो और भी अधिक अभिमानी हैं, और वे विशेष रूप से महादूत के कर्तव्यनिष्ठ वंशज हैं। जो लोग वास्तव में खुद को परमेश्वर के लिए खपाते हैं, वे अपना पूरा अस्तित्व उसे समर्पित कर देते हैं और खुद को उसके सामने रख देते हैं—वे उसके सभी वचनों और कार्य के प्रति समर्पण कर पाते हैं, उसके वचनों को अभ्यास में ला सकते और उन्हें अपने अस्तित्व की नींव के रूप में स्वीकार कर सकते हैं, और उसके वचनों में जिन हिस्सों का अभ्यास किया जाना है उनकी गंभीरता से खोज कर सकते हैं। ऐसे लोग ही होते हैं, जो वास्तव में परमेश्वर के सामने रहते हैं। अगर तुम इस तरह अभ्यास करोगे, तो यह तुम्हारे जीवन के लिए लाभदायक होगा। उसके वचनों को खाने और पीने के माध्यम से तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों का ज्ञान पा सकते हो, जीवन की अपनी जरूरतों को पूरा कर सकते हो और अपनी कमियों की भरपाई कर सकते हो, ताकि तुम्हारा जीवन स्वभाव रूपांतरित हो जाएगा। यह परमेश्वर के इरादे पूरे करेगा। अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करते हो, अगर तुम देह को संतुष्ट नहीं करते, बल्कि उसके इरादे पूरे करते हो, तो इससे तुम उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके होगे। परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने का अर्थ है कि तुम अपना कर्तव्य निभा सकते हो और परमेश्वर के कार्य की जरूरतें पूरी कर सकते हो। केवल इस प्रकार के व्यावहारिक कार्यों को ही उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करना कहा जा सकता है। अगर तुम इस वास्तविकता में प्रवेश करने में सक्षम हो, तो तुममें सत्य होगा। यह वास्तविकता में प्रवेश करने की शुरुआत है; तुम्हें पहले यह प्रशिक्षण लेना चाहिए और केवल उसके बाद ही तुम गहरी वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। विचार करो कि कैसे आज्ञाओं का पालन करना है और कैसे परमेश्वर के सामने समर्पित होना है; हमेशा यह न सोचो कि कब तुम राज्य में प्रवेश कर पाओगे। अगर तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता, तो तुम जो भी सोचोगे, वह बेकार होगा! परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए पहले तुम्हें उस स्थिति में पहुँचना चाहिए, जहाँ तुम्हारे सभी ख्याल और विचार परमेश्वर के लिए हों—यह मूलभूत आवश्यकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 490

वर्तमान में कई लोग हैं, जो परीक्षणों के बीच में हैं और परमेश्वर के कार्य को नहीं समझते, लेकिन मैं तुमसे कहता हूँ : अगर तुम इसे नहीं समझते, तो बेहतर है कि तुम इसके बारे में आलोचनाएँ ना करो। संभवतः एक दिन आएगा, जब तथ्य अपनी संपूर्णता में प्रकाश में आ जाएगा, और तब तुम समझोगे। आलोचनाएँ न करना तुम्हारे लिए लाभदायक होगा, लेकिन तुम निष्क्रिय होकर प्रतीक्षा भी नहीं कर सकते। तुम्हें सक्रिय रूप से प्रवेश करने का प्रयास करना चाहिए; केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बन पाओगे, जिसके पास वास्तविक प्रवेश है। अपनी विद्रोहशीलता के कारण लोग हमेशा व्यावहारिक परमेश्वर के बारे में धारणाएँ विकसित करते हैं। इसलिए सभी लोगों का यह सीखना आवश्यक हो जाता है कि समर्पित कैसे बना जाए, क्योंकि व्यावहारिक परमेश्वर मानव-जाति के लिए एक बहुत बड़ा परीक्षण है। अगर तुम अडिग नहीं रह सकते, तो सब कुछ खत्म हो जाता है; अगर तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की व्यावहारिकता की समझ नहीं है, तो तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने में सक्षम नहीं होगे। लोगों को पूर्ण बनाया जा सकता है या नहीं, इसके लिए एक महत्वपूर्ण कदम परमेश्वर की व्यावहारिकता की उनकी समझ है। देहधारी परमेश्वर के पृथ्वी पर आने की व्यावहारिकता प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक परीक्षण है; अगर तुम इस बारे में अडिग रहने में सक्षम हो, तो तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर को जानता है, और तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जो उससे सच में प्रेम करता है। अगर तुम इस बारे में अडिग नहीं रह सकते, और अगर तुम केवल आत्मा में विश्वास करते हो और परमेश्वर की व्यावहारिकता पर विश्वास नहीं कर सकते, तो परमेश्वर पर तुम कितनी भी अच्छी तरह से विश्वास क्यों न करो, वह बेकार होगा। अगर तुम दृष्टिगोचर परमेश्वर में विश्वास नहीं कर सकते, तो क्या तुम परमेश्वर के आत्मा में विश्वास कर सकते हो? क्या तुम सिर्फ परमेश्वर को बेवकूफ बनाने की कोशिश नहीं कर रहे? तुम दृष्टिगोचर और मूर्त परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो, तो क्या तुम आत्मा के प्रति समर्पित होने में सक्षम हो? आत्मा अदृश्य और अमूर्त है, इसलिए जब तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर के आत्मा के प्रति समर्पण करते हो, तो क्या तुम सिर्फ बकवास नहीं कर रहे हो? आज्ञाओं का पालन करने की कुंजी व्यावहारिक परमेश्वर की समझ प्राप्त करना है। एक बार तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ प्राप्त हो जाए, तो तुम आज्ञाओं का पालन करने में सक्षम हो जाओगे। उनका पालन करने के दो पहलू हैं : एक है उसके आत्मा के सार को दृढ़ता से थामे रखना और आत्मा के सामने आत्मा की पड़ताल स्वीकार करने में सक्षम होना; और दूसरा है परमेश्वर के देहधारी शरीर की वास्तविक समझ प्राप्त करने में सक्षम होना और वास्तविक समर्पण प्राप्त करना। चाहे देह के सामने हो या आत्मा के सामने, व्यक्ति के पास हमेशा ऐसा हृदय होना चाहिए जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करे और उसका भय माने। केवल इस तरह का व्यक्ति ही पूर्ण बनाए जाने के योग्य है। अगर तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की व्यावहारिकता की समझ है—अर्थात् अगर तुम इस परीक्षण में अडिग रहे हो—तो तुम्हारे लिए कुछ भी बहुत अधिक मुश्किल नहीं होगा।

कुछ लोग कहते हैं, “आज्ञाओं का पालन करना आसान है; तुम्हें सिर्फ परमेश्वर के सामने सच्चाई से और श्रद्धापूर्वक बोलने की आवश्यकता है, और कोई हाव-भाव नहीं दिखाना है; यही आज्ञाओं का पालन करना है।” क्या यह सही है? तो अगर तुम परमेश्वर की पीठ पीछे कुछ ऐसी चीजें करते हो, जो परमेश्वर की विरोधी हैं, तो क्या इसे आज्ञाओं का पालन करना माना जाता है? तुम लोगों को इस बात की पूरी समझ होनी चाहिए कि आज्ञाओं का पालन करने में क्या शामिल है। यह इस बात से संबंधित है कि तुम्हें परमेश्वर की व्यावहारिकता की वास्तविक समझ है या नहीं; अगर तुम्हें व्यावहारिकता की समझ है और तुम इस परीक्षण के दौरान लड़खड़ाते और गिरते नहीं, तो तुम्हें एक ऐसा व्यक्ति माना जा सकता है, जिसके पास मजबूत गवाही है। परमेश्वर के लिए एक जबरदस्त गवाही देना मुख्यतः इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने समर्पण करने में सक्षम हो या नहीं, जो न केवल साधारण है बल्कि सामान्य भी है, और मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो या नहीं। अगर तुम इस समर्पण के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तव में गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हो। अगर तुम मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो, और उसके सामने शिकायतें नहीं करते, आलोचनाएँ नहीं करते, बदनामी नहीं करते, धारणाएँ नहीं रखते, और कोई गुप्त मंशा नहीं रखते, तो इस तरह परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। किसी सामान्य व्यक्ति, जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है, के सम्मुख समर्पण करने और किसी भी धारणा के बिना मृत्युपर्यंत समर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है। परमेश्वर जिस वास्तविकता में प्रवेश करने की लोगों से अपेक्षा करता है, वह यह है कि तुम उसके वचनों के प्रति समर्पण करने, उन्हें अभ्यास में लाने, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने झुकने और अपनी भ्रष्टता जानने, उसके सामने अपना हृदय खोलने, और अंततः उसके इन वचनों के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाने में सक्षम हो जाओ। जब ये वचन तुम्हें जीत लेते हैं और तुम्हें उसके सामने पूर्णतः समर्पित बना देते हैं, तो परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है; इसके माध्यम से वह शैतान को लज्जित करता है और अपना कार्य पूरा करता है। जब तुम्हारी देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता के बारे में कोई धारणा नहीं होती—अर्थात्, जब तुम इस परीक्षण में अडिग रहते हो—तो तुम एक अच्छी गवाही देते हो। अगर ऐसा दिन आता है, जब तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की पूरी समझ हो जाती है और तुम पतरस की तरह मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाओगे और पूर्ण बना दिए जाओगे। परमेश्वर द्वारा की जाने वाली हर वह चीज, जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती, तुम्हारे लिए एक परीक्षण होती है। अगर परमेश्वर का कार्य तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो तुम्हें कष्ट सहने या शोधन किए जाने की आवश्यकता न होती। चूँकि उसका कार्य इतना व्यावहारिक है और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार नहीं है कि यह तुम्हारे लिए अपनी धारणाओं को छोड़ देना आवश्यक बनाता है। यही कारण है कि यह तुम्हारे लिए एक परीक्षण है। यह परमेश्वर की व्यावहारिकता के कारण ही है कि सभी लोग परीक्षणों के बीच में हैं; उसका कार्य व्यावहारिक है, अलौकिक नहीं। उसके व्यावहारिक वचनों और उसके व्यावहारिक कथनों को बिना किसी धारणा के पूरी तरह से समझकर, और उसका कार्य जितना अधिक व्यावहारिक हो तुम उतना ही उसे वास्तव में प्रेम करने में सक्षम होकर उसके द्वारा प्राप्त किए जाओगे। लोगों के जिस समूह को परमेश्वर प्राप्त करेगा, उसमें वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, अर्थात्, जो उसकी व्यावहारिकता को जानते हैं। इससे भी अधिक ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य के प्रति समर्पित होने में सक्षम हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 491

जब तक परमेश्वर देह में है, जिस समर्पण की वह लोगों से अपेक्षा करता है, उसमें आलोचना या विरोध करने से बचना शामिल नहीं है, जैसा कि वे कल्पना करते हैं; इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों का अपने जीने के सिद्धांत और अपने अस्तित्व की नींव के रूप में उपयोग करें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे बिल्कुल उसके इरादे पूरे करें। लोगों से देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने का उल्लेख करता है, जबकि दूसरा पहलू उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता के प्रति समर्पण करने के बारे में बताता है। ये दोनों बेशर्त होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं, वे सब वे हैं जिनके पास सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय है। वे सब वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना वे अपने जीवन से करते हैं। देहधारी परमेश्वर अपने कार्य में सामान्य और व्यावहारिक मानवता रखता है। इस प्रकार, उसकी सामान्य और व्यावहारिक मानवता, दोनों का बाह्य आवरण लोगों के लिए एक बड़ा परीक्षण बन जाता है; यह उनकी सबसे बड़ी कठिनाई बन जाता है। किंतु परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता से बचा नहीं जा सकता। उसने समाधान खोजने के लिए सब कुछ करने का प्रयास किया, लेकिन अंत में वह स्वयं को अपनी सामान्य मानवता के बाहरी आवरण से मुक्त नहीं कर सका। यह इसलिए था, क्योंकि अंततः, वह देहधारी परमेश्वर है, न कि स्वर्ग में आत्मा का परमेश्वर। वह ऐसा परमेश्वर नहीं है, जिसे लोग देख न सकें, बल्कि ऐसा परमेश्वर है, जिसने एक सृजित प्राणी का आवरण पहना है। इसलिए, उसे खुद को अपनी सामान्य मानवता के आवरण से मुक्त करना किसी भी तरह से आसान नहीं होगा। इसलिए कुछ भी हो जाए, वह अभी भी वह कार्य करता है, जो वह देह के परिप्रेक्ष्य से करना चाहता है। यह कार्य सामान्य और व्यावहारिक परमेश्वर की अभिव्यक्ति है, इसलिए लोगों का उसके प्रति समर्पण न करना सही कैसे हो सकता है? परमेश्वर के कर्मों के बारे में लोग आखिर क्या कर सकते हैं? वह जो चाहता है, करता है; उसे जैसे अच्छा लगता है, वह वैसे कार्य करता है। अगर लोग समर्पण नहीं करते, तो उनके पास और कौन-सी ठोस योजनाएँ हो सकती हैं? अभी तक, सिर्फ समर्पण ही लोगों को बचा सका है; किसी के पास कोई अन्य उज्ज्वल विचार नहीं थे। अगर परमेश्वर लोगों का परीक्षण करना चाहता है, तो वे इसके बारे में क्या कर सकते हैं? लेकिन इसमें से कुछ भी स्वर्ग के परमेश्वर की इच्छा नहीं है; यह देहधारी परमेश्वर की इच्छा है। वह ऐसा करना चाहता है, इसलिए कोई व्यक्ति इसे बदल नहीं सकता। देहधारी परमेश्वर जो कुछ करता है, उसमें स्वर्ग का परमेश्वर हस्तक्षेप नहीं करता, तो क्या लोगों को उसके प्रति और भी अधिक समर्पण नहीं करना चाहिए? यद्यपि वह व्यावहारिक और सामान्य दोनों है, फिर भी वह पूरी तरह से देहधारी परमेश्वर है। उसकी जो इच्छा होती है वह वो करता है। स्वर्ग के परमेश्वर ने उसे सभी कार्य सौंप दिए हैं; तुम्हें उस सबके प्रति समर्पित होना चाहिए, जो वह करता है। यद्यपि उसमें मानवता है और वह बहुत सामान्य है, लेकिन उसने यह सब जानबूझकर व्यवस्थित किया है, इसलिए लोग उसे अस्वीकृति के साथ आँखें तरेरकर कैसे देख सकते हैं? वह सामान्य होना चाहता है, इसलिए वह सामान्य है। वह मानवता के भीतर रहना चाहता है, इसलिए वह मानवता के भीतर रहता है। वह दिव्यता के भीतर रहना चाहता है, इसलिए वह दिव्यता के भीतर रहता है। लोग इसे जैसे चाहें देख सकते हैं, लेकिन परमेश्वर हमेशा परमेश्वर रहेगा और मनुष्य हमेशा मनुष्य रहेंगे। किसी मामूली ब्योरे की वजह से उसके सार को अस्वीकार नहीं किया जा सकता, न ही उसे किसी छोटी-सी चीज के कारण परमेश्वर के “व्यक्तित्व” के बाहर धकेला जा सकता है। लोगों के पास मनुष्यों की आजादी है, और परमेश्वर के पास परमेश्वर की गरिमा है; ये एक-दूसरे के साथ हस्तक्षेप नहीं करते। क्या लोग परमेश्वर को थोड़ी-सी स्वतंत्रता नहीं दे सकते? क्या वे परमेश्वर का थोड़ा और अनौपचारिक होना सहन नहीं कर सकते? परमेश्वर के साथ इतने कठोर मत बनो! प्रत्येक को एक-दूसरे के प्रति सहिष्णुता रखनी चाहिए; क्या तब हर चीज का समाधान नहीं हो जाएगा? क्या फिर भी कोई मनमुटाव रह जाएगा? अगर कोई इतनी छोटी-सी बात भी बरदाश्त नहीं कर सकता, तो वह ऐसा कुछ भी कैसे कह सकता है, “प्रधानमंत्री का दिल इतना बड़ा है कि उसमें नाव तैर सकती है”? वह एक सच्चा आदमी कैसे हो सकता है? यह परमेश्वर नहीं है जो मनुष्यों के लिए कठिनाई पैदा करता है, बल्कि मनुष्य ही हैं जो परमेश्वर के लिए कठिनाई पैदा करते हैं। वे हमेशा राई का पहाड़ बनाकर चीजें सँभाला करते हैं। वे वास्तव में तिल का ताड़ बना लेते हैं, और यह कुछ ऐसा है जो उन्हें बिल्कुल नहीं करना चाहिए! जब परमेश्वर सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर कार्य करता है, तो वह जो करता है, वह मनुष्य का कार्य नहीं होता, बल्कि परमेश्वर का कार्य होता है। फिर भी, लोग उसके कार्य का सार नहीं देखते; वे हमेशा उसकी मानवता का बाहरी आवरण ही देखते हैं। उन्होंने इतना बड़ा कार्य नहीं देखा है, इसके बजाय उन्होंने उसकी साधारण और सामान्य मानवता देखी है, और वे इसे छोड़ेंगे नहीं। इसे परमेश्वर के प्रति समर्पित होना कैसे कहा जा सकता है? स्वर्ग का परमेश्वर अब पृथ्वी के परमेश्वर में “बदल गया” है, और पृथ्वी का परमेश्वर अब स्वर्ग का परमेश्वर है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता अगर उनके बाह्य रूप-रंग एक-से हैं, न ही इससे कोई फर्क पड़ता है कि असल में वे किस तरह काम करते हैं। अंत में, जो परमेश्वर का कार्य करता है, वह स्वयं परमेश्वर है। तुम्हें अवश्य समर्पण करना चाहिए, चाहे तुम करना चाहो या नहीं—यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसमें तुम्हारे पास कोई विकल्प हो! मनुष्यों द्वारा परमेश्वर के प्रति समर्पण किया जाना चाहिए, और मनुष्यों को जरा-सा भी दिखावा किए बिना परमेश्वर के प्रति पूरी तरह से समर्पण करना चाहिए।

जिन लोगों के समूह को आज देहधारी परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है, वे वो लोग हैं जो उसके इरादों के हिसाब से हैं। लोगों को केवल उसके कार्य के प्रति समर्पण करने की, और स्वर्ग के परमेश्वर की इच्छाओं के बारे में लगातार चिंता करना, कल्पनाशीलता में जीना, और देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाना बंद करने की आवश्यकता है। जो लोग उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं, वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं को मानते हैं। ऐसे लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में कैसा हो सकता है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मनुष्य पर किस प्रकार का कार्य कर रहा होगा; वे पृथ्वी के परमेश्वर को पूरी तरह से अपना हृदय अर्पित करते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, न ही वे देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कभी अधिक शिकायत करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है, जो लोगों को वादे और आशीष प्रदान करता है। लोगों को हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर को महान मानकर उसका आदर नहीं करना चाहिए, और पृथ्वी के परमेश्वर को केवल एक साधारण व्यक्ति नहीं समझना चाहिए; यह अन्यायपूर्ण है। स्वर्ग में उनका परमेश्वर असाधारण बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु उसका अस्तित्व बिल्कुल नहीं है। पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही साधारण और मामूली है, और बहुत सामान्य भी है। उसके पास असाधारण दिमाग नहीं है और न ही वह दुनिया बदल देने वाला कार्य करता है, वह तो बस बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है, और वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता और न ही हवा और बारिश बुलाता है। लेकिन वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का देहधारण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। लोगों को उसे परमेश्वर नहीं मानना चाहिए जिसे वे समझ सकते हैं और जो उनकी कल्पनाओं से मेल खाता है, या उसे महान मानकर आदर नहीं करना चाहिए, जबकि जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते और जिसकी वे बिल्कुल भी कल्पना नहीं कर सकते उसे तुच्छ नहीं मानना चाहिए। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता से आता है; यह सब परमेश्वर के प्रति मानव-जाति के विरोध का स्रोत है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 492

लोग अगर केवल अपनी अंतरात्मा की भावनाओं की सुनें, तो वे परमेश्वर की मनोहरता महसूस नहीं कर सकते। अगर वे परमेश्वर से प्रेम करने के लिए सिर्फ अपनी अंतरात्मा पर भरोसा करेंगे, तो वे अनुत्साहित महसूस करेंगे। यदि तुम केवल परमेश्वर के अनुग्रह और प्रेम का कर्ज़ चुकाने की बात करते हो, तो तुम्हारे पास उसके प्रति अपने प्रेम में कोई जोश नहीं होगा; अपनी अंतरात्मा की भावनाओं के आधार पर उससे प्रेम करना एक नकारात्मक तरीका है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह एक नकारात्मक तरीका है? यह एक व्यावहारिक मुद्दा है। परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम किस तरह का प्रेम है? क्या वह परमेश्वर को मूर्ख बनाने की कोशिश करना और उसके लिए बेमन से काम करना नहीं है? अधिकांश लोगों का मानना है कि चूँकि परमेश्वर से प्रेम करने के लिए कोई पुरस्कार नहीं है, और उससे प्रेम न करने के लिए बराबर से ताड़ना दी जाएगी, तो कुल मिलाकर पाप न करना ही काफी है। इसलिए अपनी अंतरात्मा की भावनाओं के आधार पर परमेश्वर से प्रेम करना और उसके प्रेम को चुकाना एक नकारात्मक तरीका है, और वह परमेश्वर के लिए किसी के हृदय से निकला स्वाभाविक प्रेम नहीं है। परमेश्वर के लिए जिस प्रेम की बात मैं करता हूँ, वह व्यक्ति के हृदय की गहराई से निकला एक वास्तविक मनोभाव होना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं : “मैं खुद परमेश्वर का अनुसरण करने और उसका अनुगमन करने के लिए तैयार हूँ। अब भले ही परमेश्वर मुझे त्याग देना चाहे, मैं फिर भी उसका अनुसरण करूँगा। वह मुझे चाहे या न चाहे, मैं फिर भी उससे प्रेम करता रहूँगा, और अंत में मुझे उसे प्राप्त करना होगा। मैं अपना हृदय परमेश्वर को अर्पण करता हूँ, और चाहे वह कुछ भी करे, मैं अपने पूरे जीवन उसका अनुसरण करूँगा। चाहे कुछ भी हो, मुझे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए और उसे प्राप्त करना चाहिए; मैं तब तक आराम नहीं करूँगा, जब तक मैं उसे प्राप्त नहीं कर लेता।” क्या तुम इस तरह का संकल्प रखते हो?

परमेश्वर पर विश्वास करने का मार्ग उससे प्रेम करने का मार्ग ही है। यदि तुम उस पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम करना ही चाहिए; हालाँकि उससे प्रेम करने का तात्पर्य केवल उसके प्रेम का प्रतिदान करना या उससे अपनी अंतरात्मा की भावनाओं के आधार पर प्रेम करना नहीं है—यह परमेश्वर के लिए शुद्ध प्रेम है। कभी-कभी लोग सिर्फ अपनी अंतरात्मा के आधार पर परमेश्वर के प्रेम को महसूस करने में सक्षम नहीं होते। मैंने हमेशा क्यों कहा : “परमेश्वर का आत्मा हमारी आत्माओं को प्रेरित करे”? मैंने परमेश्वर से प्रेम करने के लिए लोगों की अंतरात्मा को प्रेरित करने की बात क्यों नहीं की? इसका कारण यह है कि लोगों की अंतरात्मा परमेश्वर की मनोहरता को महसूस नहीं कर सकती। यदि तुम इन वचनों से आश्वस्त नहीं हो, तो उसके प्रेम को महसूस करने के लिए अपनी अंतरात्मा का उपयोग करो। उस पल तुम्हारे पास कुछ प्रेरणा हो सकती है, लेकिन वह जल्दी ही गायब हो जाएगी। यदि तुम परमेश्वर की मनोहरता को महसूस करने के लिए केवल अपनी अंतरात्मा का उपयोग करते हो, तो प्रार्थना करते समय तो तुम प्रेरणा प्राप्त करोगे, लेकिन उसके बाद जल्दी ही वह चली जाएगी और गायब हो जाएगी। ऐसा क्यों होता है? यदि तुम केवल अपनी अंतरात्मा का उपयोग करते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए अपना प्रेम जगाने में असमर्थ होगे; जब तुम वास्तव में अपने हृदय में उसकी मनोहरता महसूस करते हो, तो तुम्हारी आत्मा उसके द्वारा प्रेरित होगी, और केवल उसी समय तुम्हारी अंतरात्मा अपनी मूल भूमिका निभाने में सक्षम होगी। अर्थात जब परमेश्वर मनुष्य की आत्मा को प्रेरित करता है और जब मनुष्य के पास ज्ञान होता है और वह हृदय में प्रोत्साहित होता है, अर्थात जब वह अनुभव प्राप्त कर लेता है, केवल तभी वह अपनी अंतरात्मा से परमेश्वर को प्रभावी रूप से प्रेम करने में सक्षम होगा। अपनी अंतरात्मा से परमेश्वर से प्रेम करना गलत नहीं है—यह परमेश्वर को प्रेम करने का सबसे निम्न स्तर है। “परमेश्वर के अनुग्रह के मात्र योग्य होने के लिए” प्रेम करना मनुष्य को सक्रिय ढंग से प्रवेश करने के लिए प्रेरित नहीं कर सकता। जब लोग पवित्र आत्मा का कुछ कार्य प्राप्त करते हैं, यानी जब वे अपने वास्तविक अनुभव में परमेश्वर का प्रेम देखते और उसे महसूस करते हैं, जब उन्हें परमेश्वर का कुछ ज्ञान होता है और वे वास्तव में देखते हैं कि परमेश्वर मानव-जाति के प्रेम के कितना योग्य है और उसमें कितनी मनोहरता है, केवल तभी वे परमेश्वर को सच में प्रेम करने में सक्षम होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 493

जब लोग परमेश्वर से जुड़ने के लिए अपने हृदय का इस्तेमाल करते हैं, जब उनके हृदय पूरी तरह से उसकी ओर मुड़ने में सक्षम होते हैं, तो यह परमेश्वर के प्रति मानव के प्रेम का पहला कदम होता है। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हो, तो तुम्हें सबसे पहले उसकी ओर अपना हृदय मोड़ने में सक्षम होना होगा। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना क्या है? ऐसा तब होता है जब तुम अपने हृदय में जो कुछ भी खोजते हो, वह परमेश्वर से प्रेम करने और उसे पाने के लिए होता है। इससे पता चलता है कि तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ लिया है। परमेश्वर और उसके वचनों के अलावा तुम्हारे हृदय में लगभग कुछ नहीं होता (परिवार, धन, पति, पत्नी, बच्चे आदि)। यहाँ तक कि अगर है भी तो ऐसी चीजें तुम्हारे हृदय पर कब्जा नहीं कर सकतीं, और तुम अपने भविष्य की संभावनाओं के बारे में नहीं सोचते, केवल परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करने की ही सोचते हो। उस समय तुमने पूरी तरह से अपना हृदय परमेश्वर की ओर मोड़ दिया होगा। मान लो, तुम अब भी अपने हृदय में अपने लिए योजना बना रहे हो और हमेशा अपने निजी लाभ के लिए प्रयास करते रहते हो, और हमेशा सोचते हो कि : “मैं कब परमेश्वर से कुछ माँग सकता हूँ? कब मेरा परिवार धनी बनेगा? मैं कैसे कुछ अच्छे कपड़े प्राप्त कर सकता हूँ? ...” यदि तुम उस अवस्था में रह रहे हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। यदि तुम्हारे हृदय में केवल परमेश्वर के वचन हैं और तुम हर समय परमेश्वर से प्रार्थना कर पाते हो और उसके करीब हो सकते हो—मानो वह तुम्हारे बहुत करीब हो, मानो परमेश्वर तुम्हारे भीतर हो और तुम उसके भीतर हो—यदि तुम उस तरह की अवस्था में हो, तो इसका मतलब है कि तुम्हारा हृदय परमेश्वर की उपस्थिति में है। यदि तुम हर रोज़ परमेश्वर से प्रार्थना करते हो और उसके वचनों को खाते और पीते हो, हमेशा कलीसिया के कार्य के बारे में सोचा करते हो, यदि तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाते हो, अपने हृदय का उपयोग उससे सच्चा प्रेम करने और उसके हृदय को संतुष्ट करने के लिए करते हो, तो तुम्हारा हृदय परमेश्वर का होगा। यदि तुम्हारा हृदय अन्य कई चीजों में लिप्त है, तो उस पर अभी भी शैतान का कब्ज़ा है और वह सच में परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ा है। जब किसी का हृदय वास्तव में परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तो उसमें परमेश्वर के लिए सच्चा, स्वाभाविक प्रेम होगा और वह परमेश्वर के कार्य पर विचार करने में सक्षम होगा। यद्यपि वे अज्ञानता और विवेकहीनता की अवस्थाओं में पड़ सकते हैं, फिर भी वे परमेश्वर के घर के हितों, उसके कार्य, और अपने स्वभाव में बदलाव के संबंध में विचार करने में सक्षम होंगे और उनका हृदय सही ठिकाने पर होगा। कुछ लोग हमेशा यह दावा करते हैं कि वे जो कुछ भी करते हैं, वह कलीसिया के लिए होता है; लेकिन वास्तव में वे अपने फायदे के लिए कार्य कर रहे हैं। ऐसे लोगों के इरादे गलत होते हैं। वे कुटिल और धोखेबाज हैं और वे जो अधिकांश चीज़ें करते हैं, वे उनके निजी लाभ के लिए होती हैं। इस तरह के व्यक्ति परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास नहीं करते; उनका हृदय अब भी शैतान का है और वह परमेश्वर की ओर नहीं मुड़ सकता। इसलिए परमेश्वर के पास ऐसे व्यक्ति को प्राप्त करने का कोई उपाय नहीं है।

यदि तुम सच में परमेश्वर से प्रेम करना और उसके द्वारा प्राप्त किया जाना चाहते हो, तो उसका पहला चरण है, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ना। हर एक चीज़ में, जो तुम करते हो, आत्म-निरीक्षण करो और पूछो : “क्या मैं यह परमेश्वर-प्रेमी हृदय के आधार पर कर रहा हूँ? क्या इसके पीछे मेरे कोई निजी इरादे हैं? इसे करने में मेरा वास्तविक लक्ष्य क्या है?” यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को देना चाहते हो, तो तुम्हें पहले अपने हृदय को वश में करना होगा, अपने सभी इरादे छोड़ देने होंगे, और पूरी तरह से परमेश्वर के लिए समर्पित होने की अवस्था हासिल करनी होगी। यह अपना हृदय परमेश्वर को देने के लिए अभ्यास का मार्ग है। अपने हृदय को वश में करने का क्या अभिप्राय है? यह अपनी देह की अतिशयी इच्छाओं को छोड़ देना, सुख-सुविधाओं या रुतबे के लाभों का लालच न करना है। यह सब-कुछ परमेश्वर की संतुष्टि के लिए करना है, और अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को समर्पित करना है, स्वयं के लिए नहीं। इतना काफी है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 494

परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम हृदय की गहराई से आता है; यह ऐसा प्रेम है, जिसका अस्तित्व केवल मानव के परमेश्वर के ज्ञान पर आधारित होता है। जब किसी का हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाता है, तब उसमें परमेश्वर के लिए प्रेम होता है, लेकिन वह प्रेम आवश्यक रूप से शुद्ध और आवश्यक रूप से पूरा नहीं होता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि व्यक्ति के हृदय के परमेश्वर की तरफ पूरी तरह से मुड़ जाने और उस व्यक्ति में परमेश्वर की वास्तविक समझ और उसके लिए वास्तविक श्रद्धा होने के बीच अब भी कुछ दूरी होती है। जिस तरीके से मनुष्य परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम हासिल करता है और परमेश्वर के स्वभाव को जान पाता है, वह तरीका अपने हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ना है। जब मनुष्य अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देता है, तब वह जीवन अनुभव में प्रवेश करना शुरू कर देता है। इस तरह से उसका स्वभाव बदलना शुरू हो जाता है, परमेश्वर के लिए उसका प्रेम धीरे-धीरे बढ़ने लगता है, और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान भी धीरे-धीरे बढ़ने लगता है। इसलिए जीवन-अनुभव के सही मार्ग पर आने के लिए अपना हृदय परमेश्वर की तरफ मोड़ना मात्र एक पूर्व-शर्त है। जब लोग अपना हृदय परमेश्वर के सामने रख देते हैं, तो उनके पास केवल उसके लिए लालायित हृदय ही होता है, परंतु उससे प्रेम करने वाला हृदय नहीं होता, क्योंकि उनके पास उसकी समझ नहीं होती। हालाँकि इस परिस्थिति में उनके पास उसके लिए कुछ प्रेम होता है, लेकिन वह स्वाभाविक और सच्चा नहीं होता। इसका कारण यह है कि मनुष्य की देह से उत्पन्न होने वाली हर चीज़ भावनाओं की पैदाइश होती है और वास्तविक समझ से नहीं आती। यह सिर्फ एक क्षणिक आवेग होता है और वह लंबे समय तक चलने वाली श्रद्धा नहीं बन सकता। जब लोगों में परमेश्वर की समझ नहीं होती, तो वे उससे केवल अपनी पसंद और व्यक्तिगत धारणाओं के आधार पर प्रेम कर सकते हैं; इस प्रकार के प्रेम को स्वाभाविक प्रेम नहीं कहा जा सकता, न ही इसे वास्तविक प्रेम कहा जा सकता है। व्यक्ति का हृदय सच में परमेश्वर की ओर मुड़ सकता है, और वह हर चीज़ में परमेश्वर के हितों के बारे में सोचने में सक्षम हो सकता है, लेकिन अगर उसे परमेश्वर की कोई समझ नहीं है, तो वह उसके प्रति सच्चा, स्वाभाविक प्रेम रखने में सक्षम नहीं होगा। वह बस कलीसिया के लिए कुछ कार्य पूरे करने और थोड़ा अपना कर्तव्य निभाने में सक्षम होता है, लेकिन वह यह बिना आधार के करेगा। इस तरह के व्यक्ति का स्वभाव बदलना मुश्किल है; ऐसे लोग या तो सत्य का अनुसरण नहीं करते, या उसे समझते नहीं। यहाँ तक कि अगर कोई व्यक्ति अपने हृदय को पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मोड़ भी लेता है, तो भी इसका यह मतलब नहीं कि उसका परमेश्वर प्रेमी हृदय पूरी तरह से शुद्ध है, क्योंकि जिन लोगों के हृदय में परमेश्वर है, उनके हृदय में परमेश्वर के लिए प्रेम होना आवश्यक नहीं है। इसका संबंध परमेश्वर की समझ प्राप्त करने के लिए प्रयास करने वालों और प्रयास न करने वालों के बीच के अंतर से है। एक बार जब व्यक्ति को उसके बारे में समझ हो जाती है, तो यह दर्शाता है कि उसका हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की तरफ मुड़ गया है, इससे पता चलता है कि उसके हृदय में परमेश्वर के लिए उसका सच्चा प्रेम स्वाभाविक प्रेम है। केवल इस तरह के लोगों के हृदय में ही परमेश्वर होता है। परमेश्वर की ओर अपना हृदय मोड़ना सही मार्ग पर जाने, परमेश्वर को समझने और परमेश्वर के प्रति प्रेम प्राप्त करने की एक पूर्व-शर्त है। यह परमेश्वर से प्रेम करने का अपना कर्तव्य पूरा करने का चिह्नक नहीं है, न ही यह उसके लिए वास्तविक प्रेम रखने का चिह्नक है। व्यक्ति के लिए परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम प्राप्त करने का एकमात्र तरीका है अपना हृदय उसकी तरफ मोड़ना, जो कि वह पहली चीज़ भी है, जो व्यक्ति को उसके सृजित प्राणियों में से एक होने के नाते करनी चाहिए। जो लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सभी वे लोग हैं जो जीवन की खोज करते हैं, अर्थात् वे लोग, जो सत्य का अनुसरण करते हैं और वास्तव में परमेश्वर को चाहते हैं; उन सभी में पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता होती है और वे उसके द्वारा प्रेरित किए गए होते हैं। वे सब परमेश्वर का मार्गदर्शन प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम स्वाभाविक है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 495

आज जब तुम लोग परमेश्वर को जानने और उससे प्रेम करने का प्रयास करते हो तो एक ओर तुम लोगों को कठिनाई और शोधन सहन करना चाहिए और दूसरी ओर तुम लोगों को एक क़ीमत चुकानी चाहिए। परमेश्वर से प्रेम करने के सबक से ज्यादा गहरा कोई सबक नहीं है, और यह कहा जा सकता है कि जीवन भर के विश्वास से लोग जो सबक सीखते हैं, वह है परमेश्वर से प्रेम करना। कहने का अर्थ यह है कि यदि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, तो तुम्हें उससे प्रेम अवश्य करना चाहिए। यदि तुम परमेश्वर पर केवल विश्वास करते हो परंतु उससे प्रेम नहीं करते, और तुमने परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त नहीं किया है, और कभी भी अपने हृदय के भीतर से आने वाले सच्चे प्रेम से परमेश्वर से प्रेम नहीं किया है, तो परमेश्वर पर तुम्हारा विश्वास करना व्यर्थ है; यदि परमेश्वर पर अपने विश्वास में तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम व्यर्थ ही जी रहे हो, और तुम्हारा संपूर्ण जीवन सबसे अधम है। यदि अपने संपूर्ण जीवन में तुमने कभी परमेश्वर से प्रेम नहीं किया या उसे संतुष्ट नहीं किया, तो तुम्हारे जीने का क्या अर्थ है? और परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का क्या अर्थ है? क्या यह प्रयासों की बरबादी नहीं है? कहने का अर्थ है कि, यदि लोगों को परमेश्वर पर विश्वास और उससे प्रेम करना है, तो उन्हें एक क़ीमत अवश्य चुकानी चाहिए। बाहरी तौर पर किसी खास तरीके से कार्य करने का प्रयास करने के बजाय उन्हें अपने हृदय की गहराइयों में असली अंतर्दृष्टि की खोज करनी चाहिए। यदि तुम ढेर सारी ऊर्जा के साथ गा और नाच सकते हो, परंतु सत्य को अभ्यास में लाने में अक्षम हो, तो क्या तुम्हारे बारे में यह कहा जा सकता है कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो? परमेश्वर से प्रेम करने के लिए आवश्यक है सभी चीजों में उसके इरादों को खोजना, और जब तुम्हारे साथ कुछ घटित हो जाए, तो तुम अपने भीतर गहराई में खोज करो, परमेश्वर के इरादे समझने की कोशिश करो और देखो कि इन मामलों में वे क्या हैं, परमेश्वर तुमसे क्या हासिल करने के लिए कहता है और कैसे तुम्हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। उदाहरण के लिए : कोई ऐसी चीज होती है जिसमें तुम्हें कष्ट उठाने की जरूरत पड़ती है, तो उस समय तुम्हें समझना चाहिए कि परमेश्वर का इरादा क्या है और कैसे तुम्हें उसके इरादों के प्रति विचारशील रहना चाहिए। तुम्हें स्वयं को संतुष्ट नहीं करना चाहिए : पहले अपने आप को छोड़ दो। देह से अधिक अधम कोई और चीज नहीं है। तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहिए और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। ऐसे विचारों के साथ इस मामले के संबंध में परमेश्वर तुम्हें खास तौर से प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारे हृदय को भी आराम मिलेगा। जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, चाहे वह बड़ा हो या छोटा, तब पहले तुम्हें खुद को छोड़ना होगा और देह को सभी चीजों में सबसे अधम समझना होगा। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करोगे, यह उतनी ही अधिक मनमानी करने लगेगी। यदि तुम इस समय इसे संतुष्ट करते हो तो अगली बार यह तुमसे और अधिक की माँग करेगी। जब यह जारी रहता है, तब तुम देह को और अधिक प्रेम करने लगते हो। देह की हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा चाहती है कि तुम इसे संतुष्ट और भीतर से प्रसन्न करो, चाहे यह उन चीजों में हो जिन्हें तुम खाते हो, जो तुम पहनते हो या अपना आपा खो देते हो या स्वयं की कमजोरी और आलस को बढ़ावा देते हो...। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उसकी कामनाएँ उतनी ही बड़ी हो जाती हैं और वह उतनी ही अधिक आसक्त बन जाती है, जब तक कि यह उस बिंदु तक नहीं पहुँच जाता जहाँ तुम्हारी देह और अधिक गहरी धारणाएँ पाल लेती है और परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह कर देती है और स्वयं को ऊँचा उठाती है और परमेश्वर के कार्य के बारे में शंकालु हो जाती है। जितना अधिक तुम देह को संतुष्ट करते हो, उतनी ही बड़ी देह की कमजोरियाँ होती हैं; तुम हमेशा महसूस करोगे कि कोई भी तुम्हारी कमजोरियों की परवाह नहीं करता, तुम हमेशा विश्वास करोगे कि परमेश्वर ने अति कर दी है और तुम कहोगे : “परमेश्वर इतना निष्ठुर कैसे हो सकता है? वह लोगों का पीछा क्यों नहीं छोड़ देता?” जब लोग देह को संतुष्ट करते हैं और उससे बहुत अधिक प्यार करते हैं, तो वे अपने आपको बरबाद कर बैठते हैं। यदि तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हो, और देह को संतुष्ट नहीं करते, तो तुम देखोगे कि परमेश्वर जो कुछ करता है, वह बहुत सही और बहुत अच्छा होता है, और यह कि तुम्हारे विद्रोह पर उसका शाप और तुम्हारी अधार्मिकता पर उसका न्याय, दोनों ही न्यायसंगत हैं। कई बार ऐसा होगा कि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना देगा, अनुशासित करेगा, और तुम्हें तराशने के लिए वातावरण तैयार करेगा—ताकि तुम उसके सामने आने के लिए बाध्य हो जाओ—और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि जो कुछ परमेश्वर कर रहा है, वह अद्भुत है। इस प्रकार तुम ऐसा महसूस करोगे, मानो कोई ज्यादा पीड़ा नहीं है और यह कि परमेश्वर बहुत प्यारा है। यदि तुम देह की कमजोरियों के आगे झुकते हो और कहते हो कि परमेश्वर अति कर देता है तो तुम हमेशा पीड़ा में रहोगे और हमेशा दुखित महसूस करोगे और तुम परमेश्वर के समस्त कार्य के बारे में अस्पष्ट रहोगे मानो परमेश्वर मनुष्य की कमजोरियों के प्रति बिल्कुल भी विचारशील न हो और वह मनुष्यों की कठिनाइयों से अनजान हो। और इस प्रकार तुम हमेशा बेसहारा और अकेला महसूस करोगे, मानो तुमने बड़ा अन्याय सहा है और उस समय तुम शिकायत करना आरंभ कर दोगे। जितना अधिक तुम इस प्रकार से देह की कमजोरियों के आगे झुकोगे, उतना ही अधिक तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर बहुत अति कर देता है, जब तक कि यह इतना बुरा नहीं हो जाता कि तुम परमेश्वर के कार्य को नकार देते हो और परमेश्वर का विरोध करने लगते हो और विद्रोहशीलता से भर जाते हो। इसलिए तुम्हें देह से विद्रोह करना चाहिए और इसके आगे झुकना नहीं चाहिए : “मेरा पति (मेरी पत्नी), बच्चे, भविष्य की संभावनाएँ, विवाह, परिवार—इनमें से कुछ भी मायने नहीं रखता! मेरे हृदय में केवल परमेश्वर है और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपनी पूरी कोशिश करनी चाहिए और देह को संतुष्ट नहीं करना चाहिए।” तुममें ऐसा संकल्प होना चाहिए। यदि तुममें हमेशा इस प्रकार का संकल्प रहेगा, तो जब तुम सत्य को अभ्यास में लाओगे और अपने आप को दरकिनार रखोगे, तो तुम ऐसा केवल थोड़ा-सा प्रयास करके कर सकोगे। ऐसा कहा जाता है कि एक बार एक किसान ने एक साँप देखा, जो सड़क पर बर्फ में जम कर कड़ा हो गया था। किसान ने उसे उठाया और अपने सीने से लगा लिया और साँप ने अपनी साँसें लौटने के बाद उसे डस लिया, जिससे उस किसान की मृत्यु हो गई। मनुष्य की देह साँप के समान है : इसका सार मनुष्य के जीवन को हानि पहुँचाना है। जब तुम्हारी देह पूरी तरह से मनमानी करने लगती है तो तुम अपने जीवन से हाथ धो बैठते हो। देह शैतान की है। इसके भीतर हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं; यह हमेशा अपने लिए सोचती है और यह हमेशा आराम की इच्छा रखती है, सुख में लिप्त रहना चाहती है, बिना किसी चिंता या तात्कालिकता की भावना के निष्क्रियता में लिप्त रहती है। अगर तुम इसे एक निश्चित बिंदु तक संतुष्ट करते हो तो यह अंततः तुम्हें निगल जाएगी। कहने का अर्थ है कि यदि तुम इसे इस बार संतुष्ट करोगे तो अगली बार यह फिर खुद को संतुष्ट करने की माँग करेगी। इसकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ और नई माँगें रहती हैं और यह तुम्हारे द्वारा देह को खुश करने के प्रयासों का लाभ उठाती है ताकि तुम इसे और अधिक संजोने और इसके आराम में रहने के लिए जुट जाओ—और यदि तुम इस पर कभी जीत नहीं हासिल करोगे, तो तुम अंततः स्वयं को बरबाद कर लोगे। तुम परमेश्वर के सामने जीवन हासिल कर सकते हो या नहीं और तुम्हारा अंतिम परिणाम क्या होगा, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम देह के खिलाफ विद्रोह करने का अभ्यास कैसे करते हो। परमेश्वर ने तुम्हें बचाया है और तुम्हें चुना और पूर्वनिर्धारित किया है, फिर भी यदि आज तुम उसे संतुष्ट करने के अनिच्छुक हो, सत्य को अभ्यास में लाने के अनिच्छुक हो और एक सच्चे परमेश्वर-प्रेमी हृदय के साथ अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने के अनिच्छुक हो तो तुम अंततः खुद को नष्ट कर दोगे और इस प्रकार अत्यंत पीड़ा सहोगे। यदि तुम सदा देह में लिप्त रहते हो, तो शैतान धीरे-धीरे तुम्हें निगल जाएगा और तुम्हें जीवन या आत्मा के स्पर्श से रहित छोड़ देगा, जब तक वह दिन नहीं आता है जब तुम भीतर से पूरी तरह अंधकारमय हो जाते हो। जब तुम अंधकार में जिओगे तो तुम्हें शैतान के द्वारा बंदी बना लिया जाएगा, तुम्हारे हृदय में परमेश्वर का कोई स्थान नहीं रहेगा और उस समय तुम परमेश्वर के अस्तित्व को नकार दोगे और उसे छोड़ दोगे। इस प्रकार यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं तो उन्हें पीड़ा और कष्ट सहने की कीमत चुकानी होगी। बाहरी जोश और कठिनाई की कोई जरूरत नहीं है, जैसे कि, अधिक पढ़ना तथा अधिक भाग-दौड़ करना; इसके बजाय उन्हें अपने भीतर की चीजें यानी असंयमित विचार, व्यक्तिगत हित और अपनी योजनाएँ, धारणाएँ और मंशाएँ एक तरफ रख देनी चाहिए। यह परमेश्वर का इरादा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 496

परमेश्वर द्वारा लोगों के बाहरी स्वभाव की काट-छाँट भी उसके कार्य का एक भाग है; उदाहरण के लिए, लोगों की बाहरी, असामान्य मानवता, या उनकी जीवनशैली और आदतों, उनके तौर-तरीकों और रीति-रिवाजों और साथ ही उनके बाहरी अभ्यासों और उनके जोश की काट-छाँट करना। किंतु जब वह कहता है कि लोग सत्य को अभ्यास में लाएँ और अपने स्वभावों को बदलें, तो प्राथमिक रूप से जिन चीज़ों की काट-छाँट की जा रही है, वे हैं उनके भीतर के इरादे और धारणाएँ। केवल तुम्हारे बाहरी स्वभाव की काट-छाँट करना कठिन नहीं है; यह तुम्हें उन चीज़ों को खाने से मना करने के समान है जो तुम्हें पसंद हैं, जो कि आसान है। लेकिन जब तुम्हारे भीतर की धारणाओं की बात आती है, तो उन्हें छोड़ना आसान नहीं है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग देह के खिलाफ़ विद्रोह करें, और एक क़ीमत चुकाएँ, और परमेश्वर के सामने कष्ट सहें। ऐसा विशेष रूप से लोगों के इरादों के साथ है। जबसे लोगों ने परमेश्वर पर विश्वास करना शुरू किया है, उन्होंने कई ग़लत इरादों को प्रश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारे सभी इरादे सही हैं, किंतु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत-से गलत इरादे हैं। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं, जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम पहचान लेते हो कि तुम्हारे इरादे ग़लत हैं, यदि तुम अपनी धारणाओं और इरादों के अनुसार अभ्यास करने से बच पाते हो और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो, और अपने साथ घटित होने वाली हर बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरुद्ध विद्रोह कर दिया है। जब तुम देह के विरुद्ध विद्रोह करते हो, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान तुमसे अपना अनुसरण करवाने की कोशिश करेगा, तुमसे देह की धारणाओं का अनुसरण करवाने और देह के हितों की रक्षा करवाने की कोशिश करेगा—किंतु परमेश्वर के वचन भीतर से तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करेंगे, और उस समय यह तुम पर निर्भर करेगा कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करते हो या शैतान का। जब परमेश्वर लोगों से सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है, तो वह मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों की काट-छाँट करने और उनके उन विचारों और धारणाओं की, जो परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं हैं, काट-छाँट करने के लिए होता है—पवित्र आत्मा लोगों के हृदयों को छूता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है, उस सबके पीछे एक संघर्ष होता है : हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर से प्रेम करने का अभ्यास करते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है और यद्यपि बाहरी रूप से उनकी देह में सब कुछ ठीक दिखाई दे सकता है, किंतु वास्तव में उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होता है—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद, अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार का निर्णय हो सकता है। कोई यह नहीं जानता कि रोया जाए या हँसा जाए। चूँकि मनुष्यों के भीतर के अनेक इरादे ग़लत हैं, या फिर चूँकि परमेश्वर का अधिकांश कार्य उनकी धारणाओं से मेल नहीं खाता, इसलिए जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो पर्दे के पीछे एक बड़ा संघर्ष छिड़ जाता है। इस सत्य को अभ्यास में लाकर, पर्दे के पीछे लोग अंततः परमेश्वर को संतुष्ट करने का मन बनाने से पहले उदासी के असंख्य आँसू बहा चुके होंगे। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शोधन सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य का अभ्यास करते हुए व्यक्ति का अपने अंदर पीड़ा सहना अपरिहार्य है; यदि, जब वे सत्य को अभ्यास में लाते हैं, उस समय उनके भीतर सब कुछ ठीक होता, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की आवश्यकता न होती, और कोई संघर्ष न होता और वे पीड़ित न होते। ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों के भीतर कई ऐसी चीजें हैं, जो परमेश्वर के द्वारा उपयोग में लाए जाने योग्य नहीं हैं, और चूँकि देह का स्वभाव बहुत विद्रोही है, इसलिए लोगों को देह के विरुद्ध विद्रोह करने के सबक को अधिक गहराई से सीखने की आवश्यकता है। इसी को परमेश्वर पीड़ा कहता है, जिसमें से उसने मनुष्य को अपने साथ गुजरने के लिए कहा है। जब कठिनाइयों से तुम्हारा सामना हो, तो जल्दी करो और परमेश्वर से प्रार्थना करो : “परमेश्वर! मैं तुझे संतुष्ट करना चाहता हूँ, मैं तेरे हृदय को संतुष्ट करने के लिए अंतिम कष्ट सहना चाहता हूँ, और चाहे मैं कितनी भी बड़ी असफलताओं का सामना करूँ, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए। यहाँ तक कि यदि मुझे अपना जीवन भी त्यागना पड़े, मुझे तब भी तुझे संतुष्ट करना चाहिए!” इस संकल्प के साथ, जब तुम इस प्रकार प्रार्थना करोगे, तो तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। हर बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, हर बार जब वे शोधन से गुजरते हैं, हर बार जब उनकी परीक्षा ली जाती है और हर बार जब परमेश्वर का कार्य उन पर आता है, तो उन्हें चरम पीड़ा सहनी पड़ती है। यह सब लोगों के लिए एक परीक्षा है और इसलिए उन सबके भीतर एक संघर्ष होता है। यही वह वास्तविक मूल्य है जो वे चुकाते हैं। परमेश्वर के वचनों को और अधिक पढ़ना और अधिक दौड़-भाग करना भी एक तरह की क़ीमत ही है। यही है जो लोगों को करना चाहिए, यही उनका कर्तव्य और उनकी जिम्मेदारी है, जो उन्हें पूरी करनी चाहिए, किंतु लोगों को अपने भीतर की उन बातों को त्याग देना चाहिए, जिन्हें त्याग दिए जाने की आवश्यकता है। यदि तुम ऐसा नहीं करते, तो चाहे तुम्हारी बाहरी पीड़ा कितनी भी बड़ी क्यों न हो, चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ करते हो, सब व्यर्थ रहेगा! कहने का अर्थ है कि केवल तुम्हारे भीतर के बदलाव ही निर्धारित कर सकते हैं कि तुम्हारी बाहरी पीड़ा का कोई मूल्य है या नहीं। जब तुम्हारा आंतरिक स्वभाव बदल जाता है और तुम सत्य को अभ्यास में ले आते हो, तब तुम्हारी समस्त बाहरी पीड़ाओं को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हो जाएगा; यदि तुम्हारे आंतरिक स्वभाव में कोई बदलाव नहीं हुआ है, तो चाहे तुम कितनी भी बड़ी पीड़ा क्यों न सह लो या तुम बाहर कितनी भी दौड़-भाग क्यों न कर लो, परमेश्वर की ओर से कोई अनुमति नहीं होगी—और ऐसी पीड़ा व्यर्थ है जो परमेश्वर द्वारा अनुमोदित नहीं है। इसलिए, तुम्हारे द्वारा जो क़ीमत चुकाई गई है, वह परमेश्वर द्वारा अनुमोदित की जाती है या नहीं, यह इस बात से निर्धारित होता है कि तुम्हारे भीतर कोई बदलाव आया है या नहीं; साथ ही यह कि परमेश्वर के इरादों की संतुष्टि, परमेश्वर का ज्ञान और परमेश्वर के प्रति वफादारी प्राप्त करने के लिए तुम सत्य को अभ्यास में लाते हो या नहीं और अपने इरादों और धारणाओं के खिलाफ विद्रोह करते हो या नहीं। चाहे तुम कितनी भी भाग-दौड़ क्यों न करो, यदि तुमने कभी अपने इरादों के खिलाफ विद्रोह करना नहीं जाना, बल्कि केवल बाहरी कर्मों और बाहरी उत्साह का ही अनुसरण करते रहे और कभी अपने जीवन पर ध्यान नहीं दिया, तो तुम्हारी पीड़ा व्यर्थ रही होगी। यदि किसी निश्चित परिवेश में, तुम्हारे पास कुछ है जो तुम कहना चाहते हो, किंतु अंदर से तुम महसूस करते हो कि यह कहना सही नहीं है, कि इसे कहने से तुम्हारे भाई-बहनों की आत्मिक उन्नति नहीं होती और यह उन्हें ठेस पहुँचा सकता है, तो तुम इसे नहीं कहोगे, भीतर ही भीतर कष्ट सहना पसंद करोगे, क्योंकि ये शब्द परमेश्वर के इरादों को पूरा करने में अक्षम हैं। उस समय तुम्हारे भीतर एक संघर्ष होगा, किंतु तुम पीड़ा सहने और उस चीज को छोड़ने की इच्छा करोगे जिससे तुम प्रेम करते हो, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए यह कष्ट सहने को तैयार होगे और भले ही तुम भीतर कष्ट सहोगे, फिर भी तुम देह को बढ़ावा नहीं दोगे, इससे परमेश्वर का हृदय संतुष्ट हो जाएगा और इसलिए तुम्हें भी अंदर सांत्वना मिलेगी। यही वास्तव में क़ीमत चुकाना है और यही परमेश्वर द्वारा वांछित क़ीमत है। यदि तुम इस तरीके से अभ्यास करोगे, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हें आशीष देगा; यदि तुम इसे प्राप्त नहीं कर सकते, तो चाहे तुम कितना ही अधिक क्यों न समझते हो या तुम कितना भी अच्छा क्यों न बोल सकते हो, यह सब किसी काम का नहीं होगा! यदि परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर तुम उस समय परमेश्वर की ओर खड़े होने में समर्थ हो जब वह शैतान के साथ संघर्ष करता है और तुम शैतान की ओर वापस नहीं मुड़ते हो, तब तुमने परमेश्वर के लिए प्रेम प्राप्त कर लिया होगा और तुम अपनी गवाही में दृढ़ खड़े रहे होगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 497

परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले कार्य का हर कदम बाहर से लोगों के बीच मेलजोल प्रतीत होता है, मानो यह मानवीय व्यवस्थाओं द्वारा या मानवीय विघ्न से उत्पन्न हुआ हो। किंतु, कार्य के प्रत्येक कदम, और घटित होने वाली हर चीज के पीछे शैतान द्वारा परमेश्वर के सामने चली गई शर्त है और इनमें अपेक्षित है कि लोग परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में अडिग बने रहें। उदाहरण के लिए, जब अय्यूब का परीक्षण हुआ : पर्दे के पीछे शैतान परमेश्वर के साथ शर्त लगा रहा था और अय्यूब को जिन चीजों का सामना करना पड़ा, वे लोगों के क्रियाकलाप और विघ्न थे। परमेश्वर द्वारा तुम लोगों पर किए गए कार्य के हर कदम के पीछे शैतान की परमेश्वर के साथ शर्त होती है—इसके पीछे एक लड़ाई होती है। उदाहरण के लिए, यदि तुम अपने भाइयों और बहनों के प्रति पूर्वाग्रह रखते हो, तो तुम्हारे पास ऐसे वचन होंगे जो तुम कहना चाहते हो—ऐसे वचन, जो तुम्हें परमेश्वर को अप्रसन्न करने वाले लगते हैं—किंतु अगर तुम उन्हें न कहो तो तुम्हें भीतर से बेचैनी महसूस होगी, और उस क्षण तुम्हारे भीतर एक संघर्ष शुरू हो जाएगा : “मैं बोलूँ या नहीं?” यही संघर्ष है। इस प्रकार तुम जिस भी चीज का सामना करते हो, उसमें एक लड़ाई होती है। जब तुम्हारे भीतर कोई लड़ाई होती है तो परमेश्वर तुम्हारे वास्तविक सहयोग और वास्तविक कष्ट के माध्यम से तुम पर कार्य करता है और तुम अंततः आंतरिक रूप से मामले को अलग रखने में सक्षम होगे और तुम्हारा क्रोध स्वाभाविक रूप से शांत हो जाएगा। यह परमेश्वर के साथ तुम्हारे सहयोग का परिणाम भी है। हर चीज जो लोग करते हैं, उसमें उनके हृदय के रक्त की निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है। बिना असली पीड़ा के वे परमेश्वर को संतुष्ट नहीं कर सकते; वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के करीब तक भी नहीं पहुँचते और केवल खोखले नारे लगा रहे होते हैं! क्या ये खोखले नारे परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं? जब परमेश्वर और शैतान आध्यात्मिक क्षेत्र में लड़ाई करते हैं, तो तुम्हें परमेश्वर को कैसे संतुष्ट करना चाहिए और किस प्रकार उसके लिए गवाही में अडिग रहना चाहिए? तुम्हें यह पता होना चाहिए कि जो कुछ भी तुम्हारे साथ होता है वह एक महान परीक्षण है और वह समय है जब परमेश्वर को गवाही के लिए तुम्हारी आवश्यकता है। हालाँकि ये बाहर से मामूली लग सकती हैं, किंतु जब ये चीजें होती हैं तो ये दर्शाती हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे और यदि तुमने परमेश्वर के प्रति प्रेम का अभ्यास नहीं किया है, तो यह दर्शाता है कि तुम वह व्यक्ति नहीं हो जो सत्य को अभ्यास में लाता है, तुम सत्य से रहित हो और जीवन से रहित हो, तुम भूसा हो! लोगों के साथ होने वाली हर बात में परमेश्वर चाहता है कि लोग उसके लिए अपनी गवाही में अडिग रहें। भले ही इस क्षण में तुम्हारे साथ कुछ बड़ा घटित न हो रहा हो, और तुम बड़ी गवाही नहीं देते, किंतु तुम्हारे जीवन का प्रत्येक विवरण परमेश्वर के लिए गवाही से जुड़ा है। यदि तुम अपने भाइयों और बहनों, अपने परिवार के सदस्यों और अपने आसपास के सभी लोगों की प्रशंसा प्राप्त कर सकते हो; यदि किसी दिन अविश्वासी आएँ और जो कुछ तुम करते हो उसकी तारीफ करें, और देखें कि जो कुछ परमेश्वर करता है वह अद्भुत है, तो यह तुम्हारी गवाही होगी। यद्यपि तुम्हारे पास कोई अंतर्दृष्टि नहीं है और तुम्हारी क्षमता कमज़ोर है, फिर भी परमेश्वर द्वारा तुम्हारी पूर्णता के माध्यम से तुम उसे संतुष्ट करने और उसके इरादों के प्रति विचारशील होने में समर्थ हो जाते हो और दूसरों को दर्शाते हो कि सबसे खराब क्षमता के लोगों पर उसने कितना महान कार्य किया है। जब लोग परमेश्वर को जान जाते हैं और शैतान के सामने विजेता और परमेश्वर के प्रति अत्यधिक वफादार बन जाते हैं, तब इस समूह के लोगों से अधिक दृढ़ता किसी में नहीं होती और यही सबसे बड़ी गवाही है। यद्यपि तुम महान कार्य करने में अक्षम हो, लेकिन तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम हो। अन्य लोग अपनी धारणाओं को एक ओर नहीं रख सकते, लेकिन तुम रख सकते हो; अन्य लोग अपने वास्तविक अनुभवों के दौरान परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते, लेकिन तुम परमेश्वर के प्रेम को चुकाने और उसके लिए ज़बर्दस्त गवाही देने के लिए अपने असल आध्यात्मिक कद और कार्यकलापों का उपयोग कर सकते हो। केवल इसी को परमेश्वर से वास्तव में प्रेम करना माना जाता है। यदि तुम इसमें अक्षम हो, तो तुम अपने परिवार के सदस्यों के बीच, अपने भाइयों और बहनों के बीच, या संसार के अन्य लोगों के सामने गवाही नहीं देते। यदि तुम शैतान के सामने गवाही नहीं दे सकते, तो शैतान तुम पर हँसेगा, वह तुम्हें एक मजाक के रूप में, एक खिलौने के रूप में लेगा, वह बार-बार तुम्हें मूर्ख बनाएगा और तुम्हारे मन को उलझन में डाल देगा। भविष्य में तुम पर बड़े परीक्षण आ सकते हैं—किंतु आज यदि तुम परमेश्वर को सच्चे हृदय से प्रेम करते हो, और चाहे आगे कितनी भी बड़ी परीक्षाएँ हों, चाहे तुम्हारे साथ कुछ भी होता जाए, तुम अपनी गवाही में अडिग रहते हो और परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम रहते हो, तब तुम्हारे हृदय को सांत्वना मिलेगी और भविष्य में चाहे कितने भी बड़े परीक्षण क्यों न आएँ, तुम निर्भय रहोगे। तुम लोग नहीं देख सकते कि भविष्य में क्या होगा; तुम लोग केवल आज की परिस्थितियों में ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। तुम लोग कोई भी महान कार्य करने में अक्षम हो—तुम्हें वास्तविक जीवन में परमेश्वर के वचन अनुभव करके उसे संतुष्ट करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और तुम्हें एक मजबूत और जबरदस्त गवाही देनी चाहिए और इस प्रकार शैतान के लिए शर्मिंदगी लानी चाहिए। यद्यपि तुम्हारी देह को संतुष्टि नहीं मिली होगी और उसने पीड़ा हुई होगी, लेकिन तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर दिया होगा और तुम शैतान के लिए शर्मिंदगी लाए होगे। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम्हारे सामने एक मार्ग खोल देगा। किसी दिन जब कोई बड़ा परीक्षण आएगा, तो अन्य लोग गिर जाएँगे, लेकिन तुम तब भी अडिग रहने में समर्थ होगे : तुमने जो क़ीमत चुकाई है, उसकी वजह से परमेश्वर तुम्हारी रक्षा करेगा, ताकि तुम अडिग रह सको और गिरो नहीं। यदि, साधारणतया, तुम सत्य को अभ्यास में लाने और एक सच्चे परमेश्वर-प्रेमी हृदय से परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो परमेश्वर भविष्य के परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से तुम्हारी सुरक्षा करेगा। यद्यपि तुम मूर्ख और छोटे आध्यात्मिक कद और खराब काबिलियत वाले हो, तब भी परमेश्वर तुम्हारे खिलाफ पूर्वाग्रहपूर्ण नहीं होगा। यह इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम्हारी मंशाएँ सही हैं। मान लो कि आज, तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो—जब छोटे, ब्योरेवार मामलों की बात आती है तब उनमें भी पूरी सावधानी बरतते हो और सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट करते हो—तुम्हारे पास सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय है, तुम अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को देते हो और यद्यपि कुछ ऐसी बातें हैं जिन्हें तुम साफ-साफ देख नहीं सकते, लेकिन तुम अपनी मंशाओं को सुधारने और परमेश्वर के इरादों को खोजने के लिए परमेश्वर के सामने आ सकते हो और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करते हो। और यूँ तो हो सकता है कि तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा परित्याग कर दें, किंतु तुम्हारा हृदय परमेश्वर को संतुष्ट कर रहा है, और तुम देह के सुखों के लिए ललचा नहीं रहे हो। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो जब तुम्हारे ऊपर बड़े परीक्षण आएँगे तुम्हारी रक्षा की जाएगी।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 498

लोगों की कौन-सी आंतरिक अवस्था परीक्षणों का लक्ष्य है? उनका लक्ष्य लोगों के भीतर के विद्रोही स्वभाव हैं, जो उन्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने से रोकते हैं। लोगों के भीतर बहुत सारी अशुद्धियाँ हैं, और बहुत-कुछ पाखंडपूर्ण है, और इसलिए परमेश्वर लोगों को शुद्ध बनाने के लिए उन्हें परीक्षणों का भागी बनाता है। किंतु यदि आज तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में समर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हारे लिए पूर्णता होंगे। यदि तुम आज परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हो, तो भविष्य के परीक्षण तुम्हें लुभाएँगे, और तुम अनजाने में नीचे गिर जाओगे, और उस समय तुम अपनी सहायता करने में सक्षम नहीं होगे, क्योंकि तुम परमेश्वर के कार्य के साथ नहीं चल पाओगे और तुममें वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं होगा और इसलिए, यदि तुम भविष्य में अडिग रहने में समर्थ होना चाहते हो, परमेश्वर को बेहतर ढंग से संतुष्ट करना, और अंत तक उसका अनुसरण करना चाहते हो, तो आज तुम्हें एक मजबूत बुनियाद का निर्माण करना चाहिए। तुम्हें सभी चीजों में सत्य को अभ्यास में लाकर और उसके इरादों के प्रति विचारशील रहकर परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए। यदि तुम हमेशा इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे भीतर एक बुनियाद बनेगी, और परमेश्वर तुम्हारे भीतर ऐसे हृदय को प्रेरित करेगा जो परमेश्वर से प्रेम करेगा, और वह तुम्हें विश्वास देगा। किसी दिन जब कोई परीक्षण वास्तव में तुम पर आता है, तो तुम्हें कुछ पीड़ा का अनुभव अवश्य हो सकता है, और तुम एक निश्चित बिंदु तक परेशान महसूस कर सकते हो और तीव्र व्यथा से पीड़ित हो सकते हो, मानो तुम मर चुके हो—किंतु तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं बदलेगा, बल्कि और अधिक गहरा हो जाएगा। परमेश्वर के आशीष ऐसे ही होते हैं। आज परमेश्वर जो कुछ भी कहता और करता है, यदि तुम उसे समर्पित हृदय से स्वीकारने में समर्थ हो, तो तुम्हें निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा आशीष दिया जाएगा और इसलिए तुम ऐसे व्यक्ति होगे, जो परमेश्वर के आशीष और वादे प्राप्त करता है। यदि आज तुम अभ्यास नहीं करते, तो एक दिन जब तुम पर परीक्षण आएँगे, तो तुम विश्वास या प्रेममय हृदय से रहित होगे, और उस समय परीक्षण प्रलोभन बन जाएँगे; तुम शैतान के प्रलोभनों के बीच डूब जाओगे और तुम्हारे पास बच निकलने का कोई उपाय नहीं होगा। आज तुम किसी छोटे परीक्षण का सामना करने पर अडिग रहने में सक्षम हो सकते हो लेकिन जरूरी नहीं कि एक दिन किसी बड़े परीक्षण का सामना करने पर तुम अडिग रहने में सक्षम होगे। कुछ लोग खुद से काफी खुश होते हैं और सोचते हैं कि वे जितने अच्छे हो सकते हैं, उतने अच्छे हैं। यदि तुम ऐसे समय में और अधिक गहराई तक नहीं जाओगे और आत्मसंतुष्ट बने रहोगे, तो तुम खतरे में पड़ जाओगे। आज जब परमेश्वर बड़े परीक्षणों का कार्य नहीं कर रहा, तब तुम हर तरह से ठीक-ठाक दिखाई देते हो, किंतु जब परमेश्वर तुम्हारा परीक्षण करेगा, तो तुम पाओगे कि तुममें बहुत कमियाँ हैं, क्योंकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुम बड़े परीक्षणों को सहने में अक्षम हो। यदि तुम वैसे ही बने रहते हो जैसे तुम हो और आगे बढ़ना बंद करके संतुष्ट महसूस करते हो, तो जब परीक्षण आएँगे, तुम गिर जाओगे। तुम लोगों को अक्सर देखना चाहिए कि तुम लोगों का आध्यात्मिक कद कितना छोटा है; केवल इसी तरह से तुम लोग प्रगति करोगे। यदि ऐसा केवल परीक्षण के दौरान होता है कि तुम देखते हो कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, कि तुम्हारी इच्छाशक्ति बहुत कमजोर है, कि तुम्हारे भीतर वास्तविक चीज बहुत कम है, और कि तुम परमेश्वर के इरादों के लिए अपर्याप्त हो—और यदि तुम केवल तभी इन बातों को महसूस करते हो, तो बहुत देर हो जाएगी।

यदि तुम परमेश्वर के स्वभाव को नहीं जानते हो, तो तुम परीक्षणों के दौरान निश्चित रूप से गिर जाओगे, क्योंकि तुम इस बात से अनजान हो कि परमेश्वर लोगों को पूर्ण कैसे बनाता है, वह किन साधनों से उन्हें पूर्ण बनाता है, और जब परमेश्वर के परीक्षण तुम्हारे ऊपर आएँगे और वे तुम्हारी धारणाओं से मेल नहीं खाएँगे तो तुम अडिग नहीं रह पाओगे। परमेश्वर का सच्चा प्रेम उसका संपूर्ण स्वभाव है और जब परमेश्वर का संपूर्ण स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो यह उनकी देह पर क्या लाता है? जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव लोगों को प्रकट होता है तो उनकी देह अपरिहार्य रूप से अत्यधिक पीड़ा भुगतेगी। यदि तुम इस पीड़ा को नहीं भुगतते हो तो तुम्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, न ही तुम परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम अर्पित कर पाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाता है तो उसे तुम्हारे सामने अपना संपूर्ण स्वभाव प्रकट करना होगा। सृष्टि की रचना के समय से आज तक परमेश्वर ने अपना संपूर्ण स्वभाव मनुष्य को कभी प्रकट नहीं किया है—किंतु अंत के दिनों के दौरान वह इसे लोगों के इस समूह के सामने प्रकट करता है जिसे उसने पूर्वनियत किया और चुना है और लोगों को पूर्ण करके वह अपना स्वभाव प्रकट करता है, जिसके माध्यम से वह लोगों के एक समूह को पूर्ण करता है। लोगों के लिए परमेश्वर का सच्चा प्रेम ऐसा है। परमेश्वर के सच्चे प्रेम को अनुभव करना यह माँग करता है कि लोग अत्यंत पीड़ा सहें और एक ऊँची कीमत चुकाएँ। केवल तभी लोग अंततः परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा सकते हैं और आखिरकार परमेश्वर को अपना सच्चा प्रेम वापस दे पाएँगे और केवल तभी परमेश्वर का हृदय संतुष्ट होगा। यदि लोग परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हैं और यदि वे उसकी इच्छा के अनुसार चलना चाहते हैं और यदि वे अपना सच्चा प्रेम पूरी तरह परमेश्वर को सौंपना चाहते हैं, तो उन्हें अपनी परिस्थितियों से बहुत अधिक पीड़ा और बहुत सारी यंत्रणाओं का अनुभव करना होगा, इस प्रकार उन्हें मृत्यु के कगार पर लाए जाने जैसी पीड़ा भोगनी होगी, जिससे अंततः वे अपना सच्चा हृदय परमेश्वर को लौटाने के लिए बाध्य होंगे। कोई व्यक्ति परमेश्वर से सचमुच प्रेम करता है कि नहीं यह पीड़ा भोगने और शोधन के दौरान प्रकट होता है। लोगों के प्रेम का परमेश्वर द्वारा शुद्धिकरण भी केवल पीड़ा भोगने और शोधन के जरिए संपन्न होता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 499

परमेश्वर में अधिकांश लोगों के विश्वास का सार धर्म से जुड़ा दृढ़ विश्वास है : वे परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ हैं और केवल एक रोबोट की तरह परमेश्वर का अनुसरण करते हैं; वे परमेश्वर के लिए सचमुच तड़पने या उसे बहुत ज्यादा चाहने में असमर्थ हैं। वे बस उसका मूक अनुसरण करते हैं। बहुत-से लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं, परंतु बहुत कम लोग हैं जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं; वे केवल परमेश्वर का “भय” मानते हैं क्योंकि वे आपदा से डरते हैं या फिर वे परमेश्वर की इसलिए “प्रशंसा” करते हैं क्योंकि वह ऊँचा और शक्तिमान है—परंतु उनके भय और प्रशंसा में प्रेम या सच्ची तड़प नहीं होती। अपने अनुभवों में लोग सत्य की बारीकियाँ या फिर कुछ महत्वहीन रहस्य खोजते हैं। अधिकतर लोग सिर्फ अनुसरण करते हैं, वे आशीष प्राप्त करने के लिए अशांत सागर में मछली पकड़ने की खातिर ऐसा करते हैं; वे सत्य की खोज करने या परमेश्वर के आशीष प्राप्त करने के लिए सच्चे अर्थ में परमेश्वर के प्रति समर्पण करने के लिए ऐसा नहीं करते हैं। परमेश्वर में सभी लोगों के विश्वास का जीवन अर्थहीन है, वह मूल्यविहीन है, और इसमें उनके व्यक्तिगत सोच-विचार और लक्ष्य शामिल रहते हैं; वे परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर से प्रेम करने के उद्देश्य से नहीं, अपितु धन्य होने के लिए करते हैं। कई लोग वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है; वे जो चाहते हैं वही करते हैं और कभी परमेश्वर के हितों का या इस बात का ध्यान नहीं रखते कि वे जो करते हैं वह परमेश्वर के इरादों के अनुसार है या नहीं। ऐसे लोग सच्चा विश्वास तक प्राप्त नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति प्रेम होना तो दूर की बात है। परमेश्वर का सार सिर्फ यह नहीं कहता है कि मनुष्य उसमें विश्वास करे, इससे अधिक यह कहता है कि मनुष्य उससे प्रेम करे। परंतु परमेश्वर में विश्वास करने वालों में से बहुत-से लोग यह “रहस्य” खोज पाने में अक्षम हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करने का साहस नहीं करते, न ही वे उसे प्रेम करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कभी खोजा ही नहीं कि परमेश्वर के विषय में प्रेम करने लायक कितना कुछ है; वे कभी यह पता ही नहीं लगा पाए कि परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य से प्रेम करता है, और परमेश्वर वह परमेश्वर है जो मनुष्य द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है। परमेश्वर की सुंदरता उसके कार्य में अभिव्यक्त होती है : लोग उसकी सुंदरता को तभी खोज सकते हैं जब वे उसके कार्य का अनुभव करते हैं; केवल वास्तविकता में ही वे परमेश्वर की सुंदरता का अनुभव कर सकते हैं; और वास्तविक जीवन में इसका अनुभव और अवलोकन किए बिना कोई परमेश्वर की सुंदरता को नहीं खोज सकता। परमेश्वर के बारे में प्रेम करने के लिए इतना कुछ है, परंतु लोग उसके साथ वास्तव में जुड़े बिना इसे खोज पाने में अक्षम हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि परमेश्वर देहधारी नहीं हुआ होता, तो लोग वास्तव में उसके साथ जुड़ने में असमर्थ होते, और यदि वे उसके साथ वास्तव में नहीं जुड़ पाते, तो वे उसके कार्य को अनुभव भी नहीं कर पाते—और इसलिए परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम अनेक झूठों और कल्पनाओं से दूषित होता। स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति लोगों का प्रेम उतना व्यावहारिक नहीं है जितना कि पृथ्वी के परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम है, क्योंकि स्वर्ग के परमेश्वर के विषय में लोगों का ज्ञान उनकी कल्पनाओं पर आधारित है, बजाय उस पर आधारित होने के, जो उन्होंने अपनी आँखों से देखा है और जो उन्होंने व्यक्तिगत रूप से अनुभव किया है। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है, तब लोग उसके व्यावहारिक कर्मों और उसकी सुंदरता को देख पाते हैं, और वे उसके व्यावहारिक और सामान्य स्वभाव का सब कुछ देख सकते हैं, जो पूरा का पूरा स्वर्ग के परमेश्वर के प्रति उनके ज्ञान की तुलना में हजारों गुना अधिक व्यावहारिक है। स्वर्ग के परमेश्वर से लोग चाहे जितना भी प्रेम करते हों, इस प्रेम के विषय में कुछ भी व्यावहारिक नहीं है, और यह पूरी तरह मानवीय विचारों से भरा हुआ है। पृथ्वी पर परमेश्वर के प्रति उनका प्रेम चाहे जितना भी कम क्यों न हो, यह प्रेम व्यावहारिक है; अगर यह बहुत थोड़ा-सा भी है, तो भी यह व्यावहारिक है। परमेश्वर व्यावहारिक कार्य के माध्यम से लोगों को स्वयं को जानने में सक्षम बनाता है, और इस ज्ञान के माध्यम से वह उनका प्रेम प्राप्त करता है। यह पतरस के समान है : यदि वह यीशु के साथ नहीं रहा होता, तो उसके लिए यीशु को चाह पाना असंभव होता। इसी तरह, यीशु के प्रति उसकी वफादारी भी यीशु से उसके जुड़ाव पर ही आधारित थी। चूँकि परमेश्वर मनुष्य से कहता है कि वह उससे प्रेम करे, इसीलिए वह स्वयं मनुष्यों के बीच आया है और मनुष्य के साथ रहता है, और वह मनुष्य को जो भी दिखाता और अनुभव कराता है, वही परमेश्वर की व्यावहारिकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 500

परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाने के लिए व्यावहारिकता और तथ्यों के सामने आने का उपयोग करता है; परमेश्वर के वचन उसके द्वारा लोगों को पूर्ण बनाए जाने के एक हिस्से को पूरा करते हैं, और यह मार्गदर्शन तथा राह खोलने का कार्य है। कहने का तात्पर्य यह है कि परमेश्वर के वचनों में मनुष्य अभ्यास का मार्ग और दर्शनों का ज्ञान प्राप्त कर सकता है। इन बातों को समझने से मनुष्य के पास अपने वास्तविक अभ्यास में एक मार्ग होगा, और दर्शन होंगे, और वह परमेश्वर के वचनों के माध्यम से प्रबुद्धता प्राप्त कर पाएगा; वह समझ पाएगा कि मामला परमेश्वर से आया है और वह बहुत सारा भेद पहचान पाएगा। यह समझ लेने के बाद मनुष्य को तुरंत इस वास्तविकता में प्रवेश करना चाहिए, और अपने वास्तविक जीवन में परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए उसके वचनों का उपयोग करना चाहिए। परमेश्वर सारी बातों में तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, और तुम्हें अभ्यास का मार्ग देगा, और तुम्हें महसूस करवाएगा कि वह विशेष रूप से सुंदर है, और तुम्हें यह देखने देगा कि तुम पर परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण का अभीष्ट तुम्हें पूर्ण बनाना है। यदि तुम परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हो, यदि तुम उसका प्रेम सच में अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविकता की गहराई में जाना चाहिए, तुम्हें वास्तविक जीवन की गहराई में जाना चाहिए और देखना चाहिए कि परमेश्वर जो भी करता है वह सब प्रेम और उद्धार है, वह सब कुछ इसलिए करता है ताकि जो कुछ भी अशुद्ध है लोग उसे उतार फेंकें और मनुष्य के भीतर उन चीजों को शोधन के जरिए हटा दें जो परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकती हैं। परमेश्वर वचनों का उपयोग करके मनुष्य को पोषण प्रदान करता है; साथ ही, वह लोगों के अनुभव के लिए वास्तविक जीवन की परिस्थितियों का इंतजाम करता है, और यदि लोग परमेश्वर के अनेक वचनों को खाते और पीते हैं, तो फिर अपने वास्तविक अभ्यास में, वे परमेश्वर के अनेक वचनों का उपयोग करके अपने जीवन की सभी कठिनाइयाँ हल कर सकते हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि वास्तविकता की गहराई में जाने के लिए तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन होने चाहिए; यदि तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हो और परमेश्वर के कार्य से वंचित हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास कोई मार्ग नहीं होगा। यदि तुम परमेश्वर के वचनों को कभी भी खाओगे और पीओगे नहीं, तो जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा तब तुम भौंचक्के रह जाओगे। तुम बस इतना जानोगे कि तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए, लेकिन तुम कोई भेद पहचान पाने में असमर्थ होगे और तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होगा; तुम भ्रमित और उलझन में होगे, और कभी-कभी तुम यह तक मान लोगे कि देह को संतुष्ट करके तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर रहे हो। यह सब परमेश्वर के वचनों को न खाने और पीने का ही परिणाम है। कहने का तात्पर्य यह है कि यदि तुम परमेश्वर के वचनों की मदद के बिना हो, और वास्तविकता के भीतर बस टटोलते भर हो, तो तुम अभ्यास का मार्ग खोजने में मूलतः असमर्थ हो। ऐसे लोग समझते ही नहीं कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या अर्थ है, परमेश्वर से प्रेम करने का अर्थ तो वे और भी नहीं समझते। यदि परमेश्वर के वचनों की प्रबुद्धता और मार्गदर्शन का उपयोग करके तुम प्रायः प्रार्थना करते हो, टटोलते हो, तलाश करते हो और पता लगाते हो कि तुम्हें किस चीज का अभ्यास करना चाहिए, पवित्र आत्मा के कार्य के लिए अवसरों को ढूँढ़ पाते हो, परमेश्वर के साथ सचमुच सहयोग करते हो, तुम भ्रमित और उलझन में नहीं हो, तो वास्तविक जीवन में तुम्हारे पास एक मार्ग होगा और तुम परमेश्वर को सच में संतुष्ट कर पाओगे। जब तुमने परमेश्वर को संतुष्ट कर लिया होगा, तब तुम्हारे भीतर परमेश्वर का मार्गदर्शन होगा और तुम परमेश्वर द्वारा विशेष रूप से धन्य किए जाओगे, जो तुम्हें आनंद की अनुभूति देगा : तुम विशेष रूप से सम्मानित महसूस करोगे कि तुमने परमेश्वर को संतुष्ट किया है, तुम अपने भीतर विशेष रूप से उज्ज्वल महसूस करोगे, और अपने दिल में तुम स्पष्ट और शांत महसूस करोगे। तुम्हारी अंतरात्मा को सुकून मिलेगा और वह दोषारोपणों से मुक्त होगी, और जब तुम अपने भाइयों और बहनों को देखोगे तो मन में प्रसन्नता महसूस करोगे। परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने का यही अर्थ है, और केवल यही परमेश्वर का सचमुच आनंद लेना है। लोगों द्वारा परमेश्वर के प्रेम का आनंद अनुभव के माध्यम से प्राप्त किया जाता है : कष्ट का अनुभव करके और सत्य को अभ्यास में लाने का अनुभव करके, वे परमेश्वर के आशीष प्राप्त करते हैं। यदि तुम केवल कहते हो कि परमेश्वर तुमसे वास्तव में प्रेम करता है, कि परमेश्वर ने लोगों की ख़ातिर सचमुच भारी मूल्य चुकाया है, उसने धैर्यपूर्वक और गंभीरता से इतने सारे वचन कहे हैं और वह हमेशा लोगों को बचाता है, तो तुम्हारे द्वारा इन शब्दों को कहा जाना परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेने का बस एक पक्ष है। तथापि इससे भी अधिक बड़ा आनंद—वास्तविक आनंद—तब है जब लोग अपने वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाते हैं, जिसके बाद वे अपने हृदय में सुकून और स्पष्टता महसूस करते हैं। वे अपने भीतर बहुत ही द्रवित महसूस करते हैं, और यह महसूस करते हैं कि परमेश्वर विशेष रूप से प्रेम करने योग्य है। तुम महसूस करोगे कि जो कीमत तुमने चुकाई है, वह सर्वथा उपयुक्त है। अपने हृदय का रक्त खपाने के बाद तुम अपने भीतर विशेष रूप से उज्ज्वल महसूस करोगे : तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले रहे हो और तुम यह समझ जाओगे कि परमेश्वर ने लोगों पर उद्धार का कार्य किया है, उसके द्वारा लोगों के शोधन का उद्देश्य उन्हें शुद्ध करना है, और परमेश्वर यह परखने के लिए कि लोग उसे सचमुच प्रेम करते हैं या नहीं, उनकी परीक्षा लेता है। यदि तुम हमेशा सत्य को इस तरह अभ्यास में लाते हो, तो तुम धीरे-धीरे परमेश्वर के बहुत-से कार्य का स्पष्ट ज्ञान विकसित कर लोगे, और उस समय तुम हमेशा महसूस करोगे कि परमेश्वर के वचन तुम्हारे सामने शीशे की तरह साफ हैं। जब तुम कई सत्य स्पष्ट रूप से समझ लेते हो, तो तुम महसूस करोगे कि इस और उस बात को अभ्यास में लाना आसान है, तुम किसी भी समस्या पर विजय पा सकते हो और किसी भी प्रलोभन पर विजय पा सकते हो, और तुम देखोगे कि तुम्हारे लिए कुछ भी कठिन नहीं है, जो तुम्हें अत्यधिक मुक्त कर देगा और स्वतंत्र कर देगा। इस क्षण तुम परमेश्वर के प्रेम का आनंद ले रहे होगे और परमेश्वर का सच्चा प्रेम तुम तक पहुँच गया होगा। परमेश्वर उन्हें धन्य करता है जिनके पास दर्शन होते हैं, जिनके पास सत्य होता है, जिनके पास ज्ञान होता है, और जो उससे सचमुच प्रेम करते हैं। यदि लोग परमेश्वर का प्रेम देखना चाहते हैं, तो उन्हें वास्तविक जीवन में सत्य को अभ्यास में लाना होगा, उन्हें पीड़ा सहने और जिससे वे प्यार करते हैं उसे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए त्याग देने के लिए तैयार रहना होगा, और आँखों में आँसू होने के बावजूद उन्हें परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने में सक्षम होना होगा। इस तरह, परमेश्वर तुम्हें निश्चित रूप से धन्य करेगा, और यदि तुम ऐसे कष्ट सहोगे, तो इसके बाद पवित्र आत्मा का कार्य शुरू होगा। वास्तविक जीवन के माध्यम से और परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने के माध्यम से लोग परमेश्वर की सुंदरता को देख पाने में सक्षम होते हैं, और यदि उन्होंने परमेश्वर के प्रेम का स्वाद चखा है, तभी वे सचमुच उससे प्रेम कर सकते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 501

जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे सत्य से प्रेम करते हैं, और सत्य से प्रेम करने वाले इसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक सत्य उनके पास होता है; वे उसे जितना अधिक अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर का प्रेम उनके पास होता है; और वे जितना अधिक उसे अभ्यास में लाते हैं, उतना ही अधिक परमेश्वर उन्हें आशीष देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का प्रेम तुम्हें ठीक वैसे ही उत्तरोत्तर उसे देखने में सक्षम बनाएगा, जैसे पतरस परमेश्वर को जानने लगा था : पतरस ने कहा कि परमेश्वर के पास न केवल स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करने की बुद्धि है, बल्कि इससे भी बढ़कर, उसके पास लोगों पर व्यावहारिक कार्य करने की बुद्धि है। पतरस ने कहा कि परमेश्वर लोगों का प्रेम पाने के योग्य है तो केवल इसलिए नहीं कि उसने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें बनाई हैं, बल्कि इससे भी बढ़कर इसलिए कि वह मनुष्य को सृजित करने, मनुष्य को बचाने, मनुष्य को पूर्ण बनाने और मनुष्य को अपना प्रेम प्रदान करने में सक्षम है। इसलिए, पतरस ने यह भी कहा कि परमेश्वर में बहुत कुछ है जो मनुष्य के प्रेम के योग्य है। पतरस ने यीशु से कहा : “क्या स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों का सृजन करना ही एकमात्र कारण है कि तुम लोगों के प्रेम के अधिकारी हो? तुममें और भी बहुत कुछ है, जो प्रेम करने के योग्य है। तुम वास्तविक जीवन में कार्य करते हो और कदम उठाते हो, तुम्हारा आत्मा मुझे भीतर तक स्पर्श करता है, तुम मुझे अनुशासित करते हो, तुम मुझे डाँट-फटकार लगाते हो—ये चीजें प्रेम पाने के और भी अधिक योग्य हैं।” यदि तुम परमेश्वर के प्रेम को देखना और अनुभव करना चाहते हो, तो तुम्हें वास्तविक जीवन में टटोलना और तलाशना होगा और अपनी देह को एक तरफ रखने के लिए तैयार होना होगा। तुम्हें यह संकल्प अवश्य लेना चाहिए। तुम्हें एक ऐसा संकल्पबद्ध व्यक्ति होना चाहिए जो आलसी हुए बिना या देह के आनंदों की अभिलाषा किए बिना सभी चीजों में परमेश्वर को संतुष्ट कर पाए, जो देह के लिए न जिए बल्कि परमेश्वर के लिए जिए। शायद तुम परमेश्वर को इस बार संतुष्ट न करो, क्योंकि तुम परमेश्वर के इरादों को नहीं समझते हो; अगली बार, भले ही तुम्हें थोड़ा प्रयास करना पड़े, तुम्हें उसे अवश्य संतुष्ट करना चाहिए, न कि तुम्हें देह को संतुष्ट करना चाहिए। जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तब तुम परमेश्वर को जानने लगे होगे। तुम देखोगे कि परमेश्वर स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजें बना सकता है, उसने देह धारण किया है ताकि लोग उसे वास्तविक और मूर्त तरीके से देख सकें और वह उनके साथ वास्तविक और मूर्त तरीके से जुड़ता है; तुम देखोगे कि वह मनुष्य के बीच चलने में सक्षम है और उसका आत्मा वास्तविक जीवन में लोगों को पूर्ण बना सकता है; तुम देखोगे कि यह सब लोगों को उसकी मनोहरता देखने और उसके अनुशासन, उसकी ताड़ना और उसके आशीषों का अनुभव करने की अनुमति देता है। यदि तुम हमेशा इसी तरह अनुभव करते रहते हो, तो तुम वास्तविक जीवन में परमेश्वर से अविभाज्य रहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य नहीं रह जाता है, तो तुम धिक्कार और पश्चात्ताप महसूस कर पाओगे। जब परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य होगा, तो तुम परमेश्वर को कभी छोड़ना नहीं चाहोगे, और यदि किसी दिन परमेश्वर कहे कि वह तुम्हें त्याग देगा, तो तुम भयभीत हो जाओगे, और कहोगे कि परमेश्वर द्वारा त्यागे जाने के बजाय तुम मर जाना पसंद करोगे। जैसे ही तुम्हें इसका बोध होता है, तुम महसूस करोगे कि तुम परमेश्वर को छोड़ पाने में असमर्थ हो, और इस तरह तुम्हारे पास एक नींव होगी, और तुम परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद लोगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 502

लोग प्रायः परमेश्वर को अपना जीवन बनने देने की बात करते हैं, परंतु उनका अनुभव अभी उस बिंदु तक नहीं पहुँचा है। तुम बस कह भर रहे हो कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, वह प्रतिदिन तुम्हारा मार्गदर्शन करता है, तुम प्रतिदिन उसके वचन खाते और पीते हो, तुम प्रतिदिन उससे प्रार्थना करते हो और इसलिए वह तुम्हारा जीवन बन गया है। जो ऐसा कहते हैं, उनका ज्ञान बहुत उथला है। कई लोगों में कोई नींव ही नहीं होती; परमेश्वर के वचन उनमें बोए तो गए हैं, किंतु उन्हें अभी अंकुरित होना है, उन पर फल लगना तो और भी दूर की बात है। आज, तुमने किस सीमा तक अनुभव किया है? परमेश्वर द्वारा तुम्हें यहाँ तक आने के लिए बाध्य करने के बाद ही, अब तुम्हें लगता है कि तुम परमेश्वर को नहीं छोड़ सकते। एक दिन, जब तुम्हारा अनुभव एक निश्चित बिंदु तक पहुँच गया होगा, तब यदि परमेश्वर तुम्हें उससे दूर जाने के लिए कहे, तो तुम नहीं जा पाओगे। तुम हमेशा महसूस करोगे कि तुम अपने भीतर परमेश्वर के बिना हो ही नहीं सकते; तुम पति, पत्नी या बच्चों के बिना, परिवार के बिना, माता या पिता के बिना, देह के आनंदों के बिना हो सकते हो, परंतु तुम परमेश्वर के बिना नहीं हो सकते। परमेश्वर के बिना होना अपना जीवन खो देने जैसा होगा; तुम परमेश्वर के बिना नहीं जी पाओगे। जब तुम इस बिंदु तक अनुभव कर लोगे, तो तुमने परमेश्वर में अपनी आस्था का लक्ष्य पा लिया होगा, और फिर परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन गया होगा, वह तुम्हारे अस्तित्व का आधार बन गया होगा। तुम फिर कभी भी परमेश्वर को नहीं छोड़ पाओगे। जब तुम इस सीमा तक अनुभव कर लोगे, तब तुमने परमेश्वर के प्रेम का सचमुच आनंद ले लिया होगा, परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध इस हद तक करीब हो गया होगा कि वह तुम्हारा जीवन, तुम्हारा प्रेम बन जाएगा, और उस समय तुम परमेश्वर से प्रार्थना करोगे और कहोगे, “परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता, तू मेरा जीवन है, मैं अन्य हर चीज के बिना रह सकता हूँ—पर तेरे बिना मैं नहीं जी सकता।” यही लोगों का सच्चा आध्यात्मिक कद है; यही वास्तविक जीवन है। कुछ लोग आज जितनी दूर आए हैं, वहाँ तक आने के लिए उन्हें बाध्य किया गया है : वे चाहें या न चाहें उन्हें चलते जाना है, और उन्होंने हमेशा महसूस किया है कि वे दो पाटों के बीच फँस गए हैं। तुम्हें ऐसा अनुभव करना चाहिए कि परमेश्वर तुम्हारा जीवन है, कि यदि परमेश्वर को तुम्हारे हृदय से दूर ले जाया जाए, तो यह जीवन खो देने जैसा होगा; परमेश्वर अवश्य ही तुम्हारा जीवन होना चाहिए, और तुम्हें उसे छोड़ने में अवश्य ही असमर्थ होना चाहिए। तब, तुमने वास्तव में परमेश्वर का व्यावहारिक अनुभव प्राप्त कर लिया होगा और इस समय, जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, तो तुम वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करोगे और यह एकनिष्ठ, शुद्ध प्रेम होगा। तुम्हारे अनुभवों में एक दिन ऐसा आ सकता है जब तुम्हारा जीवन एक ऐसे बिंदु पर पहुँच गया होगा जहाँ तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, भीतर से परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ होते हो और चाहकर भी उसे भूल नहीं पाते हो। परमेश्वर तुम्हारा जीवन बन चुका होगा; तुम संसार को भूल जाने में सक्षम होगे, तुम अपनी पत्नी, पति या बच्चों को भूल जाने में सक्षम होगे, किंतु परमेश्वर को भूलने में तुम्हें कष्ट होगा—ऐसा करना असंभव होगा। यही तुम्हारा सच्चा जीवन और परमेश्वर के प्रति तुम्हारा सच्चा प्रेम होगा। जब परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम एक ऐसे बिंदु पर पहुँच जाता है जहाँ यह किसी भी अन्य चीज के लिए तुम्हारे प्रेम से पीछे नहीं रह सकता और यह सबसे पहले आता है, तब तुम बाकी सब कुछ छोड़ने में सक्षम होगे और परमेश्वर की ओर से सभी काट-छाँट स्वीकार करने के लिए तैयार होगे। जब तुमने परमेश्वर के प्रति ऐसा प्रेम प्राप्त कर लिया जो अन्य सबसे बढ़कर हो, तब तुम वास्तविकता में और परमेश्वर के प्रेम में जिओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 503

ज्यों ही परमेश्वर लोगों के भीतर जीवन बन जाता है, लोग परमेश्वर को छोड़ने में असमर्थ हो जाते हैं। क्या यह परमेश्वर का कर्म नहीं है? इससे बड़ी कोई गवाही नहीं है! परमेश्वर ने एक निश्चित बिंदु तक कार्य किया है; उसने लोगों के लिए कहा है कि सेवा करें, ताड़ित हों या मर जाएँ, और लोग पीछे नहीं हटे हैं, जो यह दिखाता है कि वे परमेश्वर द्वारा जीत लिए गए हैं। जिन लोगों के पास सत्य है, वे वही हैं जो अपने वास्तविक अनुभवों में, कभी पीछे हटे बिना, अपनी गवाही पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, अपने दृष्टिकोण पर दृढ़ता से डटे रह सकते हैं, परमेश्वर के पक्ष में खड़े हो सकते हैं, और जो परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोगों के साथ सामान्य संबंध रख सकते हैं, जो अपने ऊपर कुछ बीतने पर पूर्णतः परमेश्वर के प्रति समर्पण कर पाते हैं, और मृत्युपर्यंत परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं। वास्तविक जीवन में तुम्हारा अभ्यास और तुम्हारे प्रकाशन परमेश्वर की गवाही हैं, वे मनुष्य का जीवन यापन और परमेश्वर की गवाही हैं, और यही वास्तव में परमेश्वर के प्रेम का आनंद लेना है; जब तुमने इस बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तब तुम्हें यथोचित प्रभाव की प्राप्ति हो चुकी होगी। तुम्हारे पास वास्तविक जीवन यापन होता है और तुम्हारा प्रत्येक कार्यकलाप अन्य लोगों द्वारा प्रशंसा से देखा जाता है। तुम्हारे कपड़े और तुम्हारा बाह्य रूप साधारण है, किंतु तुम अत्यंत धर्मनिष्ठता का जीवन जीते हो, और जब तुम परमेश्वर के वचन के बारे में संगति करते हो, तब तुम उसके द्वारा मार्गदर्शित और प्रबुद्ध किए जाते हो। तुम अपने शब्दों के माध्यम से परमेश्वर के इरादे कह पाते हो, वास्तविकताओं पर संगति कर पाते हो, और तुम आत्मा से सेवा करने के बारे में बहुत-कुछ समझते हो। तुम गरिमापूर्ण तरीके से बोलते हो, तुम शालीन और सत्यनिष्ठ हो, तुम उपद्रवी या स्वच्छंद नहीं हो, जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होता है तब तुम परमेश्वर की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर पाते हो और अपनी गवाही में अडिग रहते हो, और तुम चाहे जिससे निपट रहे हो, हमेशा शांत और संयमित रहते हो। इस तरह के व्यक्ति ने सच में परमेश्वर का प्रेम देखा है। कुछ लोग अब भी युवा हैं, परंतु वे मध्यम आयु के व्यक्ति के समान व्यवहार करते हैं; वे परिपक्व, सत्य से युक्त होते हैं, और दूसरों से प्रशंसित होते हैं—और ये वे लोग हैं जिनके पास गवाही है और वे परमेश्वर की अभिव्यक्ति हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि जब लोगों ने एक निश्चित बिंदु तक अनुभव कर लिया होगा, तो उनमें परमेश्वर के लिए एक अंतर्दृष्टि होगी, और उनका बाहरी स्वभाव भी स्थिर हो जाएगा। बहुत-से लोग सत्य को अभ्यास में नहीं लाते और अपनी गवाही में अडिग नहीं रहते। ऐसे लोगों में परमेश्वर का प्रेम, या परमेश्वर की गवाही नहीं होती, और यही वे लोग हैं जिनसे परमेश्वर सर्वाधिक घृणा करता है। वे सभाओं में परमेश्वर के वचन पढ़ते हैं, परंतु वे जिसे जीते हैं वह शैतान है, और यह परमेश्वर का अनादर करना, परमेश्वर को गलत तरीके से पेश करना और परमेश्वर की ईशनिंदा करना है। ऐसे लोगों में परमेश्वर के प्रेम का कोई चिन्ह नहीं होता, और उनमें पवित्र आत्मा का बिल्कुल भी कोई कार्य नहीं होता। इसलिए उनके शब्द और क्रियाकलाप शैतान का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि परमेश्वर के सामने तुम्हारा हृदय सदैव शांत रहता है और तुम हमेशा अपने आसपास के लोगों, घटनाओं और चीजों पर ध्यान देते हो, यदि तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील हो और तुम्हारे पास हमेशा एक परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है, तो परमेश्वर अक्सर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करेगा। कलीसिया में ऐसे लोग हैं जो “पर्यवेक्षक” हैं : वे दूसरों की विफलताओं पर नजर रखते हैं, और फिर उनकी नकल और उनका अनुकरण करते हैं। वे भेद पहचान पाने में अक्षम होते हैं, वे पाप से घृणा नहीं करते और शैतान की चीजों के प्रति घृणा या जुगुप्सा महसूस नहीं करते। ऐसे लोग शैतान की चीजों से भरे होते हैं, और वे अंततः परमेश्वर द्वारा पूरी तरह त्याग दिए जाएँगे। परमेश्वर के सामने तुम्हारे पास हमेशा परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना चाहिए, तुम्हें अपने शब्दों और कार्यों में संयत होना चाहिए और कभी परमेश्वर का विरोध करने या उसे परेशान करने की इच्छा नहीं करनी चाहिए। तुम्हें कभी भी खुद पर परमेश्वर के कार्य को व्यर्थ जाने देने के लिए इच्छुक नहीं होना चाहिए या तुमने जो कष्ट झेले हैं और जो कुछ अपने अभ्यास में लाया है, उन सबको व्यर्थ नहीं जाने देना चाहिए। तुम्हें आगे के मार्ग पर अधिक परिश्रम करने और परमेश्वर से अधिक प्रेम करने के लिए तैयार रहना चाहिए। ये वे लोग हैं जिनके पास अपनी नींव के रूप में एक दर्शन है। ये वे लोग हैं जो प्रगति की खोज करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 504

यदि लोग परमेश्वर का भय मानने वाले दिल के साथ परमेश्वर में विश्वास करते हैं और उसके वचनों को अनुभव करते हैं, तो ऐसे लोगों में परमेश्वर का उद्धार और परमेश्वर का प्रेम देखा जा सकता है। ये लोग परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं; वे सत्य को जीते हैं और जिसकी वे गवाही देते हैं वह भी सत्य, परमेश्वर का स्वरूप और परमेश्वर का स्वभाव ही होता है। वे परमेश्वर के प्रेम के मध्य में रहते हैं और वे परमेश्वर का प्रेम देख चुके हैं। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करना चाहते हैं, तो उन्हें परमेश्वर की सुंदरता का अनुभव करना चाहिए और परमेश्वर की सुंदरता को देखना चाहिए; केवल तभी उनमें एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय और ऐसा हृदय जागृत हो सकता है जिससे वे स्वयं को लगन से परमेश्वर के लिए खपाने को प्रेरित हों। परमेश्वर लोगों को वचनों के माध्यम से या उनकी कल्पनाओं के माध्यम से अपने से प्रेम नहीं कराता, और न ही वह अपने से प्रेम करने के लिए उन्हें बाध्य करता है। इसकी बजाय वह उन्हें उनकी इच्छा से अपने से प्रेम करने देता है, और वह अपने कार्य और वचनों में उन्हें अपनी सुंदरता को देखने देता है, जिसके बाद उनमें परमेश्वर के प्रति प्रेम जन्म लेता है। केवल इसी तरह लोग सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं। लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं तो इसलिए नहीं कि दूसरों ने उनसे ऐसा करने का आग्रह किया है, न ही यह कोई क्षणिक भावनात्मक आवेग होता है। वे परमेश्वर से इसलिए प्रेम करते हैं, क्योंकि उन्होंने उसकी सुंदरता देखी है, उन्होंने देखा है कि उसमें कितना कुछ है जो लोगों के प्रेम के योग्य है, क्योंकि उन्होंने परमेश्वर का उद्धार, बुद्धि और आश्चर्यजनक कर्म देखे हैं—और परिणामस्वरूप, वे सचमुच परमेश्वर का गुणगान करते हैं, और सचमुच उसके लिए तड़पते हैं, और उनमें ऐसा जुनून उत्पन्न हो जाता है कि वे परमेश्वर को प्राप्त किए बिना जीवित नहीं रह सकते। जो सच्चे अर्थों में परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे जबरदस्त तरीके से ऐसा इसलिए कर पाते हैं क्योंकि उनकी गवाही परमेश्वर के सच्चे ज्ञान और उसके लिए सच्ची तड़प की नींव पर टिकी होती है। ऐसी गवाही किसी भावनात्मक आवेग के अनुसार उत्पन्न नहीं होती, बल्कि परमेश्वर और उसके स्वभाव के उनके ज्ञान के अनुसार दी जाती है। चूँकि वे परमेश्वर को जानने लगे हैं, इसलिए उन्हें लगता है कि उन्हें परमेश्वर की गवाही निश्चित रूप से देनी चाहिए, और उन सबको जो परमेश्वर के लिए तड़पते हैं, परमेश्वर को जानने, और परमेश्वर की सुंदरता एवं उसकी व्यावहारिकता से अवगत होने का अवसर मिलना चाहिए। परमेश्वर के प्रति लोगों के प्रेम की तरह उनकी गवाही भी स्वतः स्फूर्त होती है, उसमें वास्तविकता होती है और उसका वास्तविक महत्व एवं मूल्य होता है। वह निष्क्रिय या खोखली और अर्थहीन नहीं होती। जो परमेश्वर से सचमुच प्रेम करते हैं केवल उन्हीं के जीवन में सर्वाधिक मूल्य और अर्थ होता है और केवल वही लोग परमेश्वर में सचमुच विश्वास करते हैं, ऐसा इसलिए कहा जाता है क्योंकि ये लोग परमेश्वर के प्रकाश में रह पाते हैं और परमेश्वर के कार्य और प्रबंधन के लिए जी पाते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे अंधकार में नहीं जीते, बल्कि प्रकाश में जीते हैं; वे अर्थहीन जीवन नहीं जीते, बल्कि परमेश्वर द्वारा धन्य किया गया जीवन जीते हैं। केवल वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं, केवल वे ही परमेश्वर के गवाह हैं, केवल वे ही परमेश्वर द्वारा धन्य किए जाते हैं और केवल वे ही परमेश्वर के वादे विरासत में प्राप्त कर पाते हैं। वे जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के अंतरंग हैं; वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं और वे परमेश्वर के साथ आशीषों का आनंद ले सकते हैं। केवल ऐसे लोग ही अनंत काल के लिए जीवित रहेंगे और केवल वे ही हमेशा के लिए परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा में रहेंगे। परमेश्वर लोगों द्वारा प्रेम किए जाने के लिए है और वह सभी लोगों द्वारा प्रेम किए जाने योग्य है, परंतु सभी लोग परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम नहीं हैं, न सभी लोग परमेश्वर की गवाही दे सकते हैं और न ही परमेश्वर के साथ राज कर सकते हैं। चूँकि परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग परमेश्वर की गवाही दे पाते हैं और परमेश्वर के कार्य के लिए अपने सभी प्रयास समर्पित कर पाते हैं, इसलिए वे स्वर्ग के नीचे कहीं भी घूम सकते हैं और कोई उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं कर सकता, वे पृथ्वी पर राज कर सकते हैं और परमेश्वर के सभी लोगों पर शासन कर सकते हैं। ये लोग दुनिया भर से एक साथ आए हैं। वे दुनिया भर से आए लोग हैं जो अलग-अलग भाषाएँ बोलते हैं और उनकी त्वचा के रंग भिन्न-भिन्न हैं, परंतु उनके अस्तित्व का अर्थ एक ही है; उन सबके पास एक परमेश्वर-प्रेमी हृदय है, वे सब एक ही गवाही देते हैं और उनका एक ही संकल्प और एक ही इच्छा है। जो परमेश्वर से प्रेम करते हैं, वे पूरे संसार में निर्बाध घूम सकते हैं और जो परमेश्वर की गवाही देते हैं, वे संपूर्ण ब्रह्मांड में यात्रा कर सकते हैं। वे परमेश्वर के प्रिय लोग हैं, वे परमेश्वर द्वारा धन्य किए गए लोग हैं और वे सदैव उसके प्रकाश में रहेंगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से प्रेम करने वाले लोग सदैव उसके प्रकाश के भीतर रहेंगे

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 505

आखिर आज तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? और जो कुछ भी परमेश्वर ने तुम पर किया है, उस सबके बारे में तुम आखिर कितना जानते हो? ये वे सबक हैं जो तुम्हें सीखने चाहिए। जब परमेश्वर पृथ्वी पर आता है तो जो कुछ वह मनुष्य पर कर चुका है और मनुष्य को देखने दे चुका है वह सब इसलिए होता है ताकि मनुष्य उससे प्रेम करे और वास्तव में उसे जाने। मनुष्य परमेश्वर के लिए कष्ट सह पाता है और यहाँ तक आ पाया है तो यह एक ओर परमेश्वर के प्रेम के कारण है और दूसरी ओर परमेश्वर के उद्धार के कारण है; इससे भी अधिक, यह उस न्याय के कारण और ताड़ना के कार्य के कारण है जो परमेश्वर ने मनुष्य पर कार्यान्वित किया है। यदि तुम लोग परमेश्वर के न्याय, ताड़ना और परीक्षणों से रहित हो और यदि परमेश्वर ने तुम लोगों को कष्ट सहन नहीं कराया है तो तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं करोगे। मनुष्य पर परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतनी ही बड़ी मनुष्य की पीड़ा होती है, उतना ही अधिक यह दिखाता है कि परमेश्वर का कार्य कितना अर्थपूर्ण है और उतना ही अधिक मनुष्य का हृदय परमेश्वर से सचमुच प्रेम कर पाता है। परमेश्वर से प्रेम करने का सबक कैसे हासिल होता है? कठिनाई और शोधन के बिना, पीड़ादायक परीक्षणों के बिना—और इसके अलावा, यदि परमेश्वर ने मनुष्य को बस अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और दया ही प्रदान की होती—तो क्या तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने के मुकाम तक पहुँच पाते? एक ओर, परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान मनुष्य अपनी कमियाँ जान पाता है और देख पाता है कि वह तुच्छ, घृणित और निकृष्ट है, कि उसके पास कुछ नहीं है और वह कुछ नहीं है; तो दूसरी ओर, परीक्षणों के दौरान परमेश्वर मनुष्य के लिए कुछ परिवेशों का इंतजाम करता है ताकि उनमें मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता का बेहतर अनुभव कर सके। यद्यपि पीड़ा अधिक होती है और कभी-कभी तो इससे उबरना असंभव हो जाता है—यहाँ तक कि यह हृदय-विदारक दुख तक पहुँच जाती है—परंतु इसका अनुभव करने के बाद मनुष्य देखता है कि उस पर परमेश्वर का कार्य कितना मनोहर है, और केवल इसी नींव पर मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चे प्रेम का जन्म होता है। आज मनुष्य देखता है कि परमेश्वर के अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया मात्र से वह स्वयं को सही मायने में जान सकने में असमर्थ है, मनुष्य के सार को जानने में सक्षम तो वह बिल्कुल भी नहीं है, और केवल परमेश्वर के न्याय और शोधन दोनों के माध्यम से, और शोधन की प्रक्रिया के दौरान ही व्यक्ति अपनी कमियाँ जान सकता है, और यह जान सकता है कि उसके पास कुछ नहीं है। इस प्रकार, परमेश्वर के प्रति मनुष्य का प्रेम परमेश्वर द्वारा किए जाने वाले शोधन और न्याय की नींव पर निर्मित होता है। यदि तुम शांतिमय पारिवारिक जीवन या भौतिक आशीषों के साथ केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, तो इसका मतलब यह नहीं कि तुमने परमेश्वर को प्राप्त कर लिया है, न ही इसका मतलब यह है कि परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम सफल रहे हो। परमेश्वर ने अनुग्रह के कार्य का एक चरण देह में पहले ही पूरा कर लिया है, और बेशक मनुष्य को भौतिक आशीष पहले ही प्रदान कर दिए हैं, परंतु मनुष्य को केवल अनुग्रह, प्रेमपूर्ण दयालुता और दया से पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। अपने अनुभवों में मनुष्य परमेश्वर के कुछ प्रेम का स्वाद लेता है और परमेश्वर की प्रेमपूर्ण दयालुता और उसकी दया को देखता है, फिर भी कुछ समय तक इसका अनुभव करने के बाद वह देखता है कि परमेश्वर का अनुग्रह और उसकी प्रेमपूर्ण दयालुता और दया मनुष्य को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं, वे मनुष्य के भीतर जो कुछ भ्रष्ट है उसे उजागर करने में असमर्थ हैं, और वे मनुष्य को उसके भ्रष्ट स्वभाव से छुड़ाने या उसके प्रेम और विश्वास को पूर्ण बनाने में असमर्थ हैं। परमेश्वर का अनुग्रह का कार्य एक अवधि का कार्य था, और परमेश्वर को जानने के लिए मनुष्य उसके अनुग्रह का आनंद उठाने पर निर्भर नहीं रह सकता।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 506

आज अधिकतर लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि कष्ट सहने का कोई मूल्य नहीं है और दुनिया उन्हें ठुकरा देती है, उनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है, परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता और उनका भविष्य अंधकारमय है। कुछ लोग तो एक निश्चित सीमा तक कष्ट सहते हुए मर ही जाना चाहते हैं। यह परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें दृढ़ता नहीं होती है, वे रीढ़विहीन और अक्षम होते हैं! परमेश्वर उत्सुक है कि मनुष्य उससे प्रेम करे, परंतु मनुष्य जितना अधिक उससे प्रेम करता है, उसके कष्ट उतने अधिक बढ़ते हैं और जितना अधिक मनुष्य उससे प्रेम करता है, उसके परीक्षण उतने अधिक बढ़ते हैं। यदि तुम उससे प्रेम करते हो तो तुम्हारे ऊपर हर प्रकार के कष्ट आ पड़ेंगे—और यदि तुम उससे प्रेम नहीं करते, तब शायद सब कुछ तुम्हारे लिए सुचारु रूप से चलता रहेगा और तुम्हारे चारों ओर सब कुछ शांतिपूर्ण होगा। जब तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो तो तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम्हारे चारों ओर बहुत-कुछ अजेय है। और चूँकि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, इसलिए तुम्हारा शोधन किया जाएगा और तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ रहोगे—तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि परमेश्वर के इरादे बहुत ही ऊँचे हैं और वे मनुष्य की पहुँच से बाहर हैं। इन सबकी वजह से तुम्हारा शोधन किया जाएगा—क्योंकि तुममें बहुत कमजोरी है और तुम कई मायनों में परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ हो, इसलिए तुम्हारा भीतर से शोधन किया जाएगा। फिर भी तुम लोगों को यह स्पष्ट देखना चाहिए कि शुद्धिकरण केवल शोधन के द्वारा ही प्राप्त किया जाता है। इस प्रकार, इन अंत के दिनों में तुम लोगों को परमेश्वर के लिए गवाही देनी चाहिए। चाहे तुम्हारे कष्ट कितने भी बड़े क्यों न हों, तुम्हें बिल्कुल अंत तक चलना चाहिए, यहाँ तक कि अपनी अंतिम साँस तक तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और खुद को परमेश्वर के आयोजन की दया पर छोड़ देना चाहिए; केवल यही वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करना है और केवल यही सशक्त और गुंजायमान गवाही है। जब शैतान तुम्हें लुभाए, तो तुम्हें कहना चाहिए : “मेरा हृदय परमेश्वर का है, और परमेश्वर ने मुझे पहले ही प्राप्त कर लिया है। मैं तुम्हें संतुष्ट नहीं कर सकता—मुझे परमेश्वर को सही ढंग से संतुष्ट करना चाहिए।” तुम जितना अधिक परमेश्वर को संतुष्ट करोगे, परमेश्वर तुम्हें उतना ही अधिक आशीष देगा और परमेश्वर से प्रेम करने की तुम्हारी प्रेरणा उतनी ही अधिक हो जाएगी; तुम्हारे पास आस्था और संकल्प भी होंगे और तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर से प्रेम करने में बिताया गया जीवन सबसे मूल्यवान और सार्थक जीवन है। यह कहा जा सकता है कि जैसे ही तुम परमेश्वर से प्रेम करोगे, तुम दुख से मुक्त हो जाओगे। यद्यपि ऐसे समय होते हैं जब तुम्हारी देह कमजोर होती है और तुम्हें कई वास्तविक कठिनाइयाँ होती हैं, फिर भी यदि इन समयों के दौरान तुम वास्तव में परमेश्वर पर भरोसा करते हो तो तुम्हें सांत्वना मिलेगी और तुम अपनी आत्मा के भीतर सहज और समर्थित महसूस करोगे। इस तरह तुम कई स्थितियों से पार पाने में सक्षम होगे और तुम अपने द्वारा सहे जाने वाले कष्ट के कारण परमेश्वर के बारे में शिकायत नहीं करोगे। इसके बजाय तुम भजन गाना, नाचना और प्रार्थना करना, इकट्ठे होकर संगति करना और परमेश्वर को याद करना चाहोगे और तुम महसूस करोगे कि तुम्हारे आस-पास के सभी लोग, घटनाएँ और चीजें, जिनकी परमेश्वर ने व्यवस्था की है, उपयुक्त हैं। यदि तुम परमेश्वर से प्रेम नहीं करते, तो तुम जो कुछ भी देखोगे वह तुम्हारी पसंद का नहीं होगा और कुछ भी तुम्हारी आँखों को नहीं भाएगा; तुम्हें कोई रिहाई नहीं मिलेगी और तुम अपनी आत्मा के भीतर दबा हुआ महसूस करोगे और तुम हमेशा परमेश्वर के बारे में शिकायतें पालोगे और हमेशा महसूस करोगे कि तुम जो कष्ट सहते हो वह बहुत बड़ा है और तुम्हारे साथ बहुत बड़ा अन्याय हुआ है। यदि तुम खुशी की खातिर अनुसरण नहीं करते बल्कि परमेश्वर को संतुष्ट करने और शैतान द्वारा दोषी न ठहराए जाने के लिए अनुसरण करते हो, तो ऐसा अनुसरण तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने की एक बड़ी प्रेरणा देगा। जब तुम उस सबका अभ्यास करने में सक्षम होते हो जो परमेश्वर द्वारा बोला जाता है, और तुम जो कुछ भी करते हो वह परमेश्वर को संतुष्ट करने में सक्षम होता है, तो इसे वास्तविकता से युक्त होना कहा जाता है। परमेश्वर की संतुष्टि का अनुसरण करना अपने परमेश्वर-प्रेमी दिल का उसके वचनों को अभ्यास में लाने के लिए उपयोग करना है। चाहे जो भी समय हो, यहाँ तक कि जब दूसरे शक्तिहीन होते हैं तब भी तुम्हारे पास हमेशा एक परमेश्वर-प्रेमी दिल होता है और तुम अपने दिल की गहराई में परमेश्वर के लिए तरसते हो और उसे याद करते हो। यह वास्तविक आध्यात्मिक कद है। तुम्हारा आध्यात्मिक कद असल में कितना बड़ा है, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम्हारे पास कितनी मात्रा में परमेश्वर-प्रेमी हृदय है, जब तुम्हारी परीक्षा ली जाती है तब तुम अडिग रह पाते हो या नहीं, अपने सामने कोई खास परिवेश आने पर तुम कमजोर तो नहीं पड़ जाते, और अपने भाई-बहनों द्वारा ठुकराए जाने पर तुम अडिग रह पाते हो या नहीं; तथ्यों के सामने आने से पता चलेगा कि तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय कैसा है। परमेश्वर के बहुत-से कार्य से यह देखा जा सकता है कि परमेश्वर सचमुच मनुष्य से प्रेम करता है। बात बस यह है कि मनुष्य की आध्यात्मिक आँखें पूरी तरह से खुलनी अभी बाकी हैं, और वह परमेश्वर के बहुत सारे कार्य और उसके इरादों को और उससे संबंधित बहुत-सी प्यारी चीजें साफ देखने में असमर्थ है; मनुष्य में परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम बहुत कम है। तुमने इस पूरे समय के दौरान परमेश्वर पर विश्वास किया है, और आज परमेश्वर ने बच निकलने के सारे मार्ग बंद कर दिए हैं। सच कहूँ तो, तुम्हारे पास सही मार्ग अपनाने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं है, और यह परमेश्वर का कठोर न्याय और अपार उद्धार ही है जो तुम्हें इस सही मार्ग पर ले जाता है। कठिनाई और शोधन का अनुभव करने के बाद ही मनुष्य जान पाता है कि परमेश्वर प्यारा है। आज तक इसका अनुभव करने के बाद कहा जा सकता है कि मनुष्य परमेश्वर की मनोहरता का एक अंश जान गया है, परंतु यह अभी भी अपर्याप्त है, क्योंकि मनुष्य में बहुत सारी कमियाँ हैं। मनुष्य को परमेश्वर के अद्भुत कार्य का और उस कठिन शोधन का और अधिक अनुभव करना चाहिए, जिसका इंतजाम परमेश्वर उसके लिए करता है। तभी मनुष्य का जीवन स्वभाव बदल सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 507

तुम सभी परीक्षण और शोधन के बीच हो। शोधन के दौरान तुम्हें परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? शोधन का अनुभव करने के बाद लोग परमेश्वर को सच्ची स्तुति अर्पित कर पाते हैं, और शोधन के दौरान वे यह देख सकते हैं कि उनमें बहुत कमी है। जितना अधिक तुम्हारा शोधन किया जाता है, उतना ही अधिक तुम देह के खिलाफ विद्रोह कर सकते हो; जितना अधिक लोगों का शोधन किया जाता है, उतना ही अधिक वे परमेश्वर को प्रेम देते हैं। तुम लोगों को यह बात समझनी चाहिए। लोगों का शोधन क्यों किया जाना चाहिए? इसका लक्ष्य क्या परिणाम प्राप्त करना है? मनुष्य पर परमेश्वर के शोधन के कार्य का क्या अर्थ है? यदि तुम सच में परमेश्वर को खोजते हो, तो एक ख़ास बिंदु तक उसके शोधन का अनुभव कर लेने पर तुम महसूस करोगे कि यह बहुत अच्छा और अत्यंत आवश्यक है। शोधन के दौरान मनुष्य को परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? उसके शोधन को स्वीकार करने के लिए उससे प्रेम करने के संकल्प का प्रयोग करके : शोधन के दौरान तुम्हें भीतर से यातना दी जाती है, जैसे कोई चाकू तुम्हारे हृदय में घुमाया जा रहा हो, फिर भी तुम अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय का प्रयोग करके परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए तैयार हो, और तुम देह की चिंता करने को तैयार नहीं हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। तुम भीतर से आहत हो, और तुम्हारी पीड़ा एक ख़ास बिंदु तक पहुँच गई है, फिर भी तुम यह कहते हुए परमेश्वर के समक्ष आने और प्रार्थना करने को तैयार हो, “परमेश्वर! मैं तुझे नहीं छोड़ सकता। यद्यपि मेरे भीतर अंधकार है, फिर भी मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए तैयार हूँ; तू मेरे हृदय को जानता है और तू मुझमें अपना और अधिक प्रेम गढ़।” यह शोधन के समय का अभ्यास है। यदि तुम परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नींव की तरह इस्तेमाल करोगे, तो शोधन तुम्हें परमेश्वर के और निकट लाकर परमेश्वर के साथ तुम्हारी घनिष्ठता बढ़ा सकता है। चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें अपने हृदय को परमेश्वर के समक्ष सौंप देना चाहिए। यदि तुम अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित कर दो और उसे उसके सामने रख दो, तो शोधन के दौरान तुम निश्चित रूप से परमेश्वर को नहीं नकारोगे या छोड़ोगे। इस तरह परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध ज्यादा से ज्यादा घनिष्ठ और सामान्य हो जाएगा, और परमेश्वर के साथ तुम्हारी संगति ज्यादा बार-बार हो जाएगी। यदि तुम सदैव ऐसे ही अभ्यास करोगे तो तुम परमेश्वर की रोशनी में अधिक समय बिताओगे, और उसके वचनों के मार्गदर्शन में और अधिक समय व्यतीत करोगे, तुम्हारे स्वभाव में भी अधिक से अधिक बदलाव आएँगे, और तुम्हारा ज्ञान दिन-प्रतिदिन बढ़ता जाएगा। जब वह दिन आएगा, जब परमेश्वर के परीक्षण अचानक तुम्हारे ऊपर आ जाएँगे, तो तुम न केवल परमेश्वर की ओर खड़े रह पाओगे, बल्कि परमेश्वर के लिए गवाही भी दे पाओगे। उस समय तुम अय्यूब और पतरस के समान होगे। जब तुमने परमेश्वर के लिए गवाही दी होगी, तो इसका अर्थ यह होगा कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो वास्तव में उससे प्रेम करता है, ऐसा व्यक्ति जो खुशी-खुशी उसके लिए अपना जीवन दे देगा और कि तुम परमेश्वर के गवाह हो और ऐसे व्यक्ति हो जिससे परमेश्वर प्रेम करता है। जिस प्रेम ने शोधन का अनुभव किया है वह मजबूत होता है, नाज़ुक नहीं। इस बात की परवाह किए बिना कि परमेश्वर तुम्हें कब या कैसे अपने परीक्षणों के अधीन करता है, तुम अपने जीवन का अनादर करने में सक्षम होते हो, परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी सब कुछ त्याग देते हो और परमेश्वर के लिए खुशी-खुशी कुछ भी सह लेते हो, इस प्रकार तुम्हारा प्रेम शुद्ध होगा और तुम्हारी आस्था में वास्तविकता होगी। केवल तभी तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे, जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा प्रेम किया जाता है, और जिसे सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 508

यदि लोग शैतान के प्रभाव में आ जाते हैं, तो उनके भीतर परमेश्वर के लिए कोई प्रेम नहीं रहता, और उनके पिछले दर्शन, प्रेम और संकल्प लुप्त हो जाते हैं। लोग महसूस किया करते थे कि उनसे परमेश्वर के लिए दुःख उठाना अपेक्षित है, परंतु आज वे ऐसा करना निंदनीय समझते हैं, और उनके पास शिकायतों की कोई कमी नहीं होती। यह शैतान का कार्य है, इस बात का संकेत कि वे शैतान की शक्ति के अधीन आ गए हैं। यदि तुम्हारे सामने यह स्थिति आ जाए, तो तुम्हें तुरंत प्रार्थना करनी होगी और जितनी जल्दी हो सके, उसे उलट देना चाहिए—यह शैतान के हमला करने पर तुम्हारी रक्षा करेगा। कड़वे शोधन के दौरान मनुष्य सबसे ज्यादा आसानी से शैतान के प्रभाव में आ सकता है, इसलिए ऐसे शोधन के दौरान तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए? तुम्हें अपना हृदय परमेश्वर के समक्ष रखते हुए और अपना अंतिम समय परमेश्वर को समर्पित करते हुए अपना संकल्प जगाना चाहिए। परमेश्वर चाहे कैसे भी तुम्हारा शोधन करे, तुम्हें परमेश्वर के इरादों को पूरा करने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने योग्य बनना चाहिए, और परमेश्वर को खोजने और संगति की कोशिश करने की जिम्मेदारी खुद उठानी चाहिए। ऐसे समय में जितने अधिक निष्क्रिय तुम होओगे, उतना ही आसान तुम्हारे लिए नकारात्मक बनना होगा और तुम्हारे लिए पीछे हटना उतना ही अधिक आसान हो जाएगा। जब तुम्हें अपनी भूमिका निभाने की जरूरत होती है, चाहे तुम उसे अच्छी तरह से न निभाओ, पर तुम वह सब करते हो जो तुम कर सकते हो, और तुम उसे पूरा करने के लिए अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय के अलावा और किसी चीज का प्रयोग नहीं करते; भले ही दूसरे कुछ भी कहें—चाहे वे यह कहें कि तुमने अच्छा किया है या यह कि तुमने खराब किया है—कुल मिलाकर, तुम्हारे इरादे सही हैं, और तुम आत्मतुष्ट नहीं हो, क्योंकि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर रहे हो। जब दूसरे तुम्हें गलत समझते हैं, तो तुम परमेश्वर से प्रार्थना करने और यह कहने में सक्षम होते हो, “परमेश्वर! मैं यह नहीं कहता कि दूसरे मुझे माफ कर दें या मुझसे अच्छा व्यवहार करें, न ही यह कि वे मुझे समझें और स्वीकार करें। मैं केवल यह माँगता हूँ कि मैं अपने हृदय से तुझसे प्रेम कर सकूँ, कि मैं अपने हृदय में शांत हो सकूँ, और कि मेरा जमीर शांत हो। मैं यह नहीं माँगता कि दूसरे मेरी प्रशंसा करें, या मेरा बहुत आदर करें; मैं केवल तुझे अपने हृदय से संतुष्ट करने का प्रयास करना चाहता हूँ। मैं वह सब करके, जो मैं कर सकता हूँ, अपनी भूमिका निभाता हूँ। यद्यपि मैं मूर्ख हूँ, और मुझमें काबिलियत की कमी है और मैं अंधा हूँ, फिर भी मैं जानता हूँ कि तू प्यारा है, और मैं वह सब कुछ तुझे अर्पित करने के लिए तैयार हूँ जो मेरे पास है।” जैसे ही तुम इस तरह से प्रार्थना करते हो, तुम्हारे परमेश्वर-प्रेमी हृदय का उदय होता है, और तुम अपने हृदय में कहीं अधिक सहज महसूस करते हो। परमेश्वर से प्रेम का अभ्यास करने का यही अर्थ है। जब तुम इसका अनुभव करोगे, तो तुम दो बार असफल होगे और एक बार सफल होगे, या पाँच बार असफल होगे और दो बार सफल होगे, और जब तुम इस तरह अनुभव करोगे, तो केवल असफलता के बीच ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को देख पाओगे और खोज पाओगे कि तुममें क्या कमी है। जब तुम अगली बार ऐसी ही स्थिति का सामना करो, तो तुम्हें सावधानी बरतनी चाहिए, अपनी गति नियंत्रित करनी चाहिए और अपनी प्रार्थनाएँ बढ़ा देनी चाहिए और तुम धीरे-धीरे ऐसी स्थिति में विजयी होने में सक्षम हो जाओगे। तुम्हारी प्रार्थनाओं के परिणाम देने का यही अर्थ है। केवल जब तुम देखो कि तुम इस बार सफल हुए हो, कि तुम्हें अंदर से संतुष्टि मिली है और कि जैसे ही तुम प्रार्थना करते हो वैसे ही तुम परमेश्वर को महसूस कर सकते हो और कि पवित्र आत्मा की उपस्थिति ने तुम्हें नहीं छोड़ा है, तभी तुम जान पाओगे कि परमेश्वर तुम पर कैसे कार्य करता है। यदि तुम इस तरह से अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे अनुभव में एक मार्ग होगा। यदि तुम सत्य को अभ्यास में नहीं लाओगे, तो तुम अपने भीतर पवित्र आत्मा की उपस्थिति से वंचित रहोगे। परंतु यदि तुम चीज़ों का सामना करते हुए सत्य को अभ्यास में लाते हो, तो भले ही तुम भीतर से आहत हो, लेकिन पवित्र आत्मा बाद में तुम्हारे साथ रहेगा, जब तुम प्रार्थना करोगे तो परमेश्वर की उपस्थिति महसूस कर पाओगे, तुममें परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का सामर्थ्य होगा, और अपने भाई-बहनों के साथ संगति के दौरान तुम्हारे अंतःकरण पर कोई बोझ नहीं होगा, और तुम शांति महसूस करोगे, और इस तरह से तुम वह प्रकाश में ला पाओगे, जो तुमने किया है। चाहे दूसरे कुछ भी कहें, यदि परमेश्वर के साथ तुम्हारा संबंध सामान्य रहता है, तुम दूसरों द्वारा बाधित नहीं होते और हर चीज से ऊपर उठने में सक्षम हो, तो यह दर्शाता है कि तुम्हारा परमेश्वर के वचनों का अभ्यास प्रभावी रहा है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 509

जितना अधिक परमेश्वर लोगों का शोधन करता है, लोगों के हृदय उतने ही अधिक परमेश्वर से प्रेम करने में सक्षम हो जाते हैं। उनके हृदय की पीड़ा उनके जीवन के लिए लाभदायक होती है; यह उन्हें परमेश्वर के समक्ष शांत रहने में अधिक सक्षम बनाती है, परमेश्वर के साथ उनका अधिक निकटता का संबंध हो जाता है और वे परमेश्वर के अथाह प्रेम और उसके अद्भुत उद्धार को बेहतर तरीके से देख पाते हैं। पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया, और अय्यूब कई परीक्षणों से गुजरा। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो तुम लोगों को भी सैकड़ों बार शोधन से होकर गुजरना होगा—तुम लोगों को इस प्रक्रिया से गुजरना होगा और इस चरण पर निर्भर रहना होगा—केवल तभी तुम लोग परमेश्वर के इरादों को पूरा कर पाओगे और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाओगे। शोधन वह सर्वोत्तम साधन है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, केवल शोधन और कड़वे परीक्षणों के माध्यम से ही लोगों के हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम विकसित हो सकता है। कष्टों के बिना लोगों में परमेश्वर के लिए कोई सच्चा प्रेम नहीं रहता है; यदि भीतर से उनका परीक्षण नहीं किया जाता, और यदि वे सच्चे शोधन के भागी नहीं बनाए जाते, तो उनके हृदय हमेशा बाहर ही भटकते रहेंगे। एक निश्चित बिंदु तक शोधन किए जाने के बाद तुम अपनी स्वयं की निर्बलताएँ और कठिनाइयाँ देखोगे, तुम देखोगे कि तुममें कितनी कमी है और तुम उन अनेक कठिनाइयों पर काबू पाने में असमर्थ हो जिनका तुम सामना करते हो और तुम देखोगे कि तुमने बहुत अधिक विद्रोह किया है। केवल परीक्षणों के दौरान ही लोग अपनी वास्तविक दशाओं को सचमुच जान पाते हैं; परीक्षण लोगों को पूर्ण बनाने में अधिक सक्षम होते हैं।

अपने जीवनकाल में पतरस ने सैकड़ों बार शोधन का अनुभव किया और वह बहुत-सी कष्टदायक तपन से होकर गुजरा। यह शोधन परमेश्वर के लिए उसके सर्वोच्च प्रेम की नींव बन गया और उसके संपूर्ण जीवन का सबसे अर्थपूर्ण अनुभव हो गया। वह परमेश्वर के प्रति सर्वोच्च प्रेम रखने में समर्थ हो पाया, एक अर्थ में यह परमेश्वर से प्रेम करने के उसके संकल्प के कारण था परंतु इससे भी अधिक महत्वपूर्ण बात यह थी कि यह उस शोधन और पीड़ा के कारण था, जिससे होकर वह गुजरा। यह पीड़ा परमेश्वर से प्रेम करने के मार्ग पर उसकी मार्गदर्शक बन गई और ऐसी चीज बन गई जो उसके लिए सबसे अधिक यादगार थी। यदि लोग परमेश्वर से प्रेम करते हुए शोधन की पीड़ा से नहीं गुजरते तो उनका प्रेम अशुद्धियों और अपनी स्वयं की पसंद से भरा होता है; ऐसा प्रेम शैतान के विचारों से भरा होता है और मूलतः परमेश्वर के इरादे पूरे करने में असमर्थ होता है। परमेश्वर से प्रेम करने का संकल्प रखना परमेश्वर से सच में प्रेम करने के समान नहीं है। भले ही वे अपने दिलों में जो सोचते हैं, वह सब परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने की खातिर ही होता हो—वह किसी मानवीय विचार से रहित प्रतीत होता है, ऐसा प्रतीत होता है कि सब परमेश्वर की खातिर है—फिर भी जब परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अभ्यास उसके सामने लाया जाता है तो वह उसे स्वीकृति या आशीष नहीं देता। भले ही लोग समस्त सत्यों को पूरी तरह से समझ लें और जान जाएँ तो भी इसे परमेश्वर से प्रेम करने की निशानी नहीं कहा जा सकता, यह नहीं कहा जा सकता कि इन लोगों में परमेश्वर से प्रेम करने की वास्तविकता है। शोधन से गुजरे बिना अनेक सत्यों को समझ लेने के बावजूद लोग इन सत्यों को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं; केवल शोधन के दौरान ही लोग इन सत्यों का वास्तविक अर्थ समझ सकते हैं, केवल तभी लोग वास्तव में उनके आंतरिक अर्थ का अनुभव कर सकते हैं। उस समय जब वे इन सत्यों का अभ्यास करते हैं, तब वे ऐसा सटीकता से और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप कर पाने में समर्थ होते हैं; उस समय उनके अभ्यास में उनके अपने विचार कम हो जाते हैं, उनकी भ्रष्टता घट जाती है और उनकी मानवीय भावनाएँ कम हो जाती हैं। केवल उसी समय उनका अभ्यास परमेश्वर के प्रति प्रेम की सच्ची अभिव्यक्ति होता है। परमेश्वर के प्रति प्रेम के सत्य का प्रभाव मौखिक ज्ञान या मानसिक इच्छा से हासिल नहीं होता है और न ही इसे केवल उस सत्य को समझने से हासिल किया जा सकता है। इसके लिए आवश्यक है कि लोग एक मूल्य चुकाएँ, वे शोधन के दौरान बहुत पीड़ा से होकर गुजरें, केवल तभी उनका प्रेम शुद्ध और परमेश्वर के इरादों के अनुसार बनेगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 510

मनुष्य की दशा और अपने प्रति मनुष्य का रवैया देखकर परमेश्वर ने नया कार्य किया है, जिससे मनुष्य उसके विषय में ज्ञान और उसके प्रति समर्पण दोनों से युक्त हो सकता है, और प्रेम और गवाही दोनों रख सकता है। इसलिए मनुष्य को परमेश्वर के शोधन, और साथ ही उसके न्याय और काट-छाँट का अनुभव अवश्य करना चाहिए, जिसके बिना मनुष्य कभी परमेश्वर को नहीं जानेगा, और कभी वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर द्वारा मनुष्य का शोधन केवल एकतरफा प्रभाव के लिए नहीं होता, बल्कि बहुआयामी प्रभाव की खातिर होता है। इसलिए परमेश्वर उन लोगों पर शोधन का कार्य करता है, जो सत्य खोजने के लिए तैयार हैं, ताकि उनका संकल्प और प्रेम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाए। जो लोग सत्य को खोजने के लिए तैयार रहते हैं और जो परमेश्वर की लालसा करते हैं, उनके लिए ऐसे शोधन से अधिक अर्थपूर्ण या अधिक सहायक कुछ नहीं है। परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य द्वारा सरलता से समझा-बूझा नहीं जाता। चूँकि परमेश्वर आखिरकार परमेश्वर है और अंततः परमेश्वर के लिए मनुष्य जैसा स्वभाव रखना असंभव है, इसलिए मनुष्य के लिए परमेश्वर के स्वभाव को समझना सरल नहीं है। सत्य मनुष्य द्वारा अंतर्निहित रूप में धारण नहीं किया जाता, और वह उनके द्वारा सरलता से नहीं समझा जाता, जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं; मनुष्य सत्य से और सत्य को अभ्यास में लाने के संकल्प से रहित है, और यदि वह पीड़ित नहीं होता और उसका शोधन या न्याय नहीं किया जाता, तो उसका संकल्प कभी सफल नहीं किया जाएगा। सभी लोगों के लिए शोधन बेहद कष्टदायी होता है, और उसे स्वीकार करना बहुत कठिन होता है—परंतु शोधन के दौरान ही परमेश्वर मनुष्य के समक्ष अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करता है, मनुष्य से अपनी अपेक्षाएँ स्पष्ट करता है, अधिक प्रबुद्धता प्रदान करता है और अधिक व्यावहारिक काट-छाँट करता है। तथ्यों और सत्य के बीच की तुलना के माध्यम से मनुष्य अपने और सत्य के बारे में बृहत्तर ज्ञान प्राप्त करता है, और उसे परमेश्वर के इरादों की और अधिक समझ प्राप्त होती है, और इस प्रकार उसे परमेश्वर के लिए अधिक सच्चा और अधिक शुद्ध प्रेम प्राप्त होता है। शोधन का कार्य क्रियान्वित करने में परमेश्वर के लक्ष्य ऐसे होते हैं। परमेश्वर द्वारा मनुष्य पर किए जाने वाले समस्त कार्य के अपने लक्ष्य और महत्व होते हैं; परमेश्वर निरर्थक कार्य नहीं करता और न ही वह ऐसा कार्य करता है जो मनुष्य के लिए लाभदायक न हो। शोधन का अर्थ लोगों को परमेश्वर के सामने से हटा देना नहीं है, और न ही इसका अर्थ उन्हें नरक में नष्ट कर देना होता है। बल्कि इसका अर्थ है शोधन के दौरान मनुष्य के स्वभाव को बदलना, उसके इरादों को बदलना, उसके पुराने विचारों को बदलना, परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम को बदलना और उसके जीने के संपूर्ण तरीके को बदलना। शोधन मनुष्य की व्यावहारिक परीक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण का एक रूप है; केवल शोधन के दौरान ही उसका प्रेम अपनी अंतर्निहित भूमिका निभा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल शोधन का अनुभव करके ही मनुष्य सच्चे प्रेम से युक्त हो सकता है

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 511

परमेश्वर में अपने विश्वास में तुम्हें अवश्य ही परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए, सत्य को अभ्यास में लाना चाहिए और अपने सारे कर्तव्य अच्छे से निभाने चाहिए। इसके अतिरिक्त, तुम्हें उन चीजों को समझना होगा जिनका तुम्हें अनुभव करना चाहिए। यदि तुम केवल काट-छाँट किए जाने, अनुशासित किए जाने और न्याय किए जाने का अनुभव करते हो, यदि तुम केवल परमेश्वर का आनंद लेते हो लेकिन यह महसूस करने में असमर्थ हो कि परमेश्वर तुम्हें कब अनुशासित कर रहा है या तुम्हारी काट-छाँट कर रहा है—यह अस्वीकार्य है। शायद शोधन के इस प्रसंग में तुम अडिग रहे हो, लेकिन यह अभी भी पर्याप्त नहीं है; तुम्हें अभी भी आगे बढ़ते रहना होगा। परमेश्वर से प्रेम करने का सबक अंतहीन है; यह कभी भी किसी समय पर समाप्त नहीं होगा। लोग परमेश्वर में विश्वास करने को कुछ ऐसा देखते हैं जो अत्यंत सरल है, लेकिन एक बार जब वे वास्तव में इसका अनुभव करते हैं, तो उन्हें एहसास होता है कि परमेश्वर में विश्वास करना उतना सरल नहीं है जितना लोग कल्पना करते हैं। जब परमेश्वर मनुष्य का शोधन करने के लिए काम करता है, तो मनुष्य कष्ट सहता है। किसी व्यक्ति का शोधन जितना अधिक होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही बड़ा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही अधिक प्रकट होगा। इसके विपरीत, किसी व्यक्ति का शोधन जितना कम होता है, उसका परमेश्वर-प्रेमी दिल उतना ही छोटा होगा और उसमें परमेश्वर का महान सामर्थ्य उतना ही कम प्रकट होगा। किसी व्यक्ति का शोधन और दर्द जितना अधिक होता है और वह जितनी अधिक पीड़ा का अनुभव करता है, परमेश्वर के प्रति उसका प्रेम उतना ही गहरा होता जाएगा, परमेश्वर में उसकी आस्था उतनी ही अधिक सच्ची होती जाएगी और परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता जाएगा। अपने अनुभवों में, तुम देखोगे कि जो लोग अत्यंत शोधन और कष्ट से गुजरते हैं, जिनकी बहुत अधिक काट-छाँट की जाती है और जिन्हें बहुत अधिक अनुशासित किया जाता है, उनमें परमेश्वर के लिए एक गहरा प्रेम और परमेश्वर का एक अधिक गहरा और संपूर्ण ज्ञान होता है। जिन लोगों ने काट-छाँट किए जाने का अनुभव नहीं किया है, उनके पास केवल सतही ज्ञान होता है। वे केवल यह कह सकते हैं, “परमेश्वर बहुत अच्छा है, वह लोगों को अनुग्रह देता है ताकि वे उसका आनंद ले सकें।” यदि उन्होंने काट-छाँट किए जाने और अनुशासित किए जाने का अनुभव किया है, तो वे परमेश्वर के सच्चे ज्ञान के बारे में बात करने में सक्षम होते हैं। इसलिए परमेश्वर का कार्य मनुष्य पर जितना अधिक अद्भुत होता है, वह उतना ही अधिक मूल्यवान और महत्वपूर्ण होता है। यह तुम्हारे लिए जितना अधिक अबूझ होता है और तुम्हारी धारणाओं के साथ जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य तुम्हें उतना ही अधिक जीतने, तुम्हें प्राप्त करने और तुम्हें पूर्ण बनाने में सक्षम होता है। परमेश्वर के कार्य का महत्व कितना अधिक है! यदि परमेश्वर मनुष्य का इस तरह शोधन न करे, यदि वह इस पद्धति के अनुसार कार्य न करे, तो उसका कार्य निष्प्रभावी और महत्वहीन होगा। अतीत में जिसका उल्लेख किया गया था, उसका असाधारण महत्व इसी में निहित है—परमेश्वर द्वारा इस समूह को चुनना और प्राप्त करना और अंत के दिनों में उसे पूर्ण करना। वह तुम लोगों पर जितना बड़ा कार्य करता है, परमेश्वर के प्रति तुम लोगों का प्रेम उतना ही ज्यादा गहरा एवं शुद्ध होता है। परमेश्वर का कार्य जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसकी बुद्धि के बारे में कुछ समझ पाता है और उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान उतना ही अधिक गहरा होता है। अंत के दिनों के दौरान परमेश्वर की छह हजार वर्षीय प्रबंधन-योजना का अंत हो जाएगा। क्या यह इतनी आसानी से समाप्त हो सकती है? जब वह मानवजाति पर विजय प्राप्त कर लेगा, तो क्या उसका कार्य पूरा हो जाएगा? क्या यह इतना आसान हो सकता है? लोग कल्पना करते हैं कि यह बहुत ही आसान है, परंतु परमेश्वर जो करता है, वह इतना आसान नहीं है। परमेश्वर जो भी कार्य करता है उसका हर भाग मनुष्य के लिए अथाह है। यदि तुम उसकी थाह पा सकते, तो परमेश्वर के कार्य का कोई महत्व या मूल्य न रह जाता। परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अथाह है; यह तुम्हारी धारणाओं से बहुत असंगत है और यह तुम्हारी धारणाओं से जितना अधिक असंगत होता है, परमेश्वर का कार्य उतना ही अधिक अर्थपूर्ण दिखाई देता है; यदि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो यह अर्थहीन होता। आज तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत अद्भुत है, और तुम्हें यह जितना अधिक अद्भुत महसूस होता है, उतना ही अधिक तुम महसूस करते हो कि परमेश्वर अथाह है, और तुम देखते हो कि परमेश्वर के कर्म कितने महान हैं। अगर उसने मनुष्य को जीतने के लिए केवल सतही और उथले कार्य किए होते और उसके बाद कुछ न किया होता, तो मनुष्य परमेश्वर के कार्य का महत्व समझने में असमर्थ होता। यद्यपि आज तुम थोड़े-से शोधन से गुजर रहे हो, किंतु यह तुम्हारे जीवन की प्रगति के लिए बहुत लाभदायक है; और इसलिए ऐसे कष्ट का अनुभव करना तुम लोगों के लिए अत्यंत आवश्यक है। आज तुम थोड़ा शोधन से गुजर रहे हो, किंतु बाद में तुम सच में परमेश्वर के कर्मों को देखने में सक्षम होगे और अंततः तुम कहोगे : “परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!” तुम्हारे हृदय में ये ही वचन होंगे। कुछ समय के लिए परमेश्वर द्वारा शोधन (सेवा करने वालों का परीक्षण और ताड़ना का समय) का अनुभव करने के बाद, अंततः कुछ लोगों ने कहा : “परमेश्वर में विश्वास करना वास्तव में कठिन है!” यह तथ्य कि उन्होंने “वास्तव में कठिन” शब्दों का प्रयोग किया, यह दर्शाता है कि परमेश्वर के कर्म अथाह हैं, परमेश्वर के कार्य का अत्यधिक महत्व और मूल्य है, और वह मनुष्य द्वारा सँजोकर रखे जाने के अत्यधिक योग्य है। अगर मेरे इतना अधिक कार्य करने के बाद भी तुम्हें थोड़ा-सा भी ज्ञान प्राप्त नहीं हुआ, तो क्या तब भी मेरे कार्य का कोई मूल्य हो सकता है? इस कारण तुम कहोगे : “परमेश्वर की सेवा करना वास्तव में कठिन है, परमेश्वर के कर्म बहुत अद्भुत हैं, परमेश्वर सच में बुद्धिमान है! परमेश्वर बहुत प्यारा है!” अगर अनुभव की एक अवधि से गुजरने के बाद तुम ऐसे शब्द कह पाते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने अपने ऊपर परमेश्वर का कार्य प्राप्त कर लिया है। एक दिन, जब तुम सुसमाचार का प्रचार करने के लिए विदेश में होगे और कोई तुमसे पूछेगा : “परमेश्वर पर तुम्हारी आस्था कैसी चल रही है?” तो तुम यह कहने में सक्षम होगे : “परमेश्वर के कर्म बहुत ही अद्भुत हैं!” वे महसूस करेंगे कि तुम्हारे वचन व्यावहारिक अनुभवों की बात करते हैं। यही सच्ची गवाही है। तुम कहोगे कि परमेश्वर का कार्य बुद्धिमत्ता से भरा है, कि तुम पर उसके कार्य ने तुम्हें सचमुच आश्वस्त कर दिया है और तुम्हारे हृदय को जीत लिया है और कि तुम हमेशा उससे प्रेम करोगे, क्योंकि वह मानवजाति के प्रेम के अत्यधिक योग्य है! अगर तुम इन चीजों के बारे में बात कर सकते हो, तो तुम मनुष्यों के हृदयों को द्रवित कर सकते हो। यह सब गवाही है। यदि तुम जोरदार ढंग से यह गवाही देने में सक्षम हो, जिससे लोगों की आँखों में आँसू आ जाएँ, तो यह दर्शाता है कि तुम वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो क्योंकि तुम परमेश्वर से प्रेम करने की गवाही देने में सक्षम हो और तुम्हारे माध्यम से परमेश्वर के कर्मों की गवाही दी जा सकती है। यदि तुम्हारी गवाही दूसरों को परमेश्वर के कार्य को खोजने, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने और उनके द्वारा अनुभव किए जाने वाले किसी भी परिवेश में अडिग रहने में सक्षम बनाती है, तो इस और केवल इसी प्रकार की गवाही सच्ची गवाही है और ठीक यही अब तुमसे अपेक्षित है। तुम्हें देखना चाहिए कि परमेश्वर का कार्य अत्यंत मूल्यवान और लोगों द्वारा सँजोकर रखे जाने योग्य है, कि परमेश्वर बहुत मूल्यवान है और बहुत प्रचुर है; वह न केवल वचन बोल सकता है, बल्कि लोगों का न्याय भी कर सकता है, उनके हृदयों का शोधन कर सकता है, उनके लिए आनंद ला सकता है, उन्हें प्राप्त कर सकता है, उन्हें जीत सकता है और उन्हें पूर्ण बना सकता है। अपने अनुभव से तुम देखोगे कि परमेश्वर बहुत ही प्यारा है। तो अब तुम परमेश्वर से कितना प्रेम करते हो? क्या तुम वास्तव में अपने हृदय से ये बातें कह सकते हो? जब तुम अपने हृदय की गहराइयों से ये शब्द कहने में सक्षम होगे, तो तुम्हारे पास गवाही होगी। जब तुम्हारा अनुभव इस स्तर तक पहुँच जाएगा, तो तुम परमेश्वर की गवाही देने में समर्थ और ऐसा करने के काबिल हो जाओगे। अगर तुम अपने अनुभव में इस स्तर तक नहीं पहुँचते, तो तुम अभी भी बहुत दूर होगे। शोधन के दौरान लोगों द्वारा कमजोरियों का प्रदर्शन सामान्य बात है, परंतु शोधन के पश्चात् तुम्हें यह कहने में समर्थ होना चाहिए : “परमेश्वर अपने कार्य में बहुत बुद्धिमान है!” अगर तुम वास्तव में इन शब्दों की व्यावहारिक समझ प्राप्त करने में सक्षम हो, तो यह कीमती होगा और तुम्हारे अनुभव का मूल्य होगा।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 512

अब तुम्हें किस चीज का अनुसरण करना चाहिए? तुम परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो या नहीं, तुम परमेश्वर की गवाही और उसकी एक अभिव्यक्ति बनने में सक्षम हो या नहीं, और तुम उसके द्वारा उपयोग किए जाने के योग्य हो या नहीं—ये वे बातें हैं, जिनका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर ने तुम पर वास्तव में कितना कार्य किया है? तुमने कितना देखा है, कितना समझा है? तुमने कितना अनुभव किया और चखा है? चाहे परमेश्वर ने तुम्हारा परीक्षण किया हो, तुम्हारी काट-छाँट की हो या तुम्हें अनुशासित किया हो, उसके कर्म और उसका कार्य तुम पर किए गए हैं। परंतु परमेश्वर के एक विश्वासी के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जो परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करने को उत्सुक है, क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के आधार पर परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ हो? क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से परमेश्वर के वचन को जी सकते हो? क्या तुम अपने व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से दूसरों को पोषण प्रदान करने और परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए अपना पूरा जीवन खपाने में सक्षम हो? परमेश्वर के कार्य की गवाही देने के लिए तुम्हें अपने अनुभव, ज्ञान और स्वयं द्वारा चुकाई गई कीमत पर निर्भर करना चाहिए। केवल इसी तरह तुम उसके इरादे पूरे कर सकते हो। क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो, जो परमेश्वर के कार्य की गवाही देता है? क्या तुम्हारा यह संकल्प है? अगर तुम उसके नाम, और इससे भी बढ़कर, उसके कार्य की गवाही देने में समर्थ हो, और अगर तुम उसके लोगों की छवि को जीने में सक्षम हो जिसकी वह अपेक्षा करता है, तो तुम परमेश्वर के गवाह हो! तुम परमेश्वर की गवाही आखिर कैसे देते हो? अगर तुम परमेश्वर के वचन को जीने और अपने मुँह से उसकी गवाही देने का प्रयास और उसकी लालसा करते हो, इस तरह कि लोग परमेश्वर के कार्य को जान जाएँ और उसके कर्मों को देख लें—अगर तुम वास्तव में इन सबका अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बना देगा। अगर तुम बस परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने और अंत में धन्य किए जाने का अनुसरण करते हो, तो परमेश्वर पर तुम्हारे विश्वास का परिप्रेक्ष्य शुद्ध नहीं है। तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए कि वास्तविक जीवन में परमेश्वर के कर्मों को कैसे देखें, जब वह अपने इरादे तुम पर प्रकट करे तो उसे कैसे संतुष्ट करें, और तुम्हें इसका अनुसरण करना चाहिए कि उसकी अद्भुतता और बुद्धि की गवाही तुम्हें कैसे देनी चाहिए, और इसकी गवाही कैसे देनी चाहिए कि वह तुम्हें कैसे अनुशासित करता है और कैसे तुम्हारी काट-छाँट करता है। ये सभी वे चीजें हैं, जिन पर अब तुम्हें विचार करना चाहिए। अगर तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय सिर्फ इसलिए है कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बाद तुम उसके साथ महिमा प्राप्त कर सको, तो यह अभी भी अपर्याप्त है और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी नहीं कर सकता। तुम्हें परमेश्वर के कार्य की गवाही देने में समर्थ होने, उसकी अपेक्षाएँ पूरी करने और उसके द्वारा लोगों पर किए जाने वाले कार्य का व्यावहारिक तरीके से अनुभव करने की आवश्यकता है। चाहे यह पीड़ा हो, आँसू हों या दुख, तुम्हें ये सभी चीजें व्यावहारिक ढंग से अनुभव अवश्य करनी चाहिए। ये तुम्हें परमेश्वर के गवाह के रूप में पूर्ण करने के लिए हैं। वास्तव में अभी वह क्या है, जो तुम्हें कष्ट सहने और पूर्णता पाने का अनुसरण करने के लिए मजबूर करता है? क्या तुम्हारा वर्तमान कष्ट सच में परमेश्वर से प्रेम करने और उसकी गवाही देने के लिए है? या यह देह के आशीषों के लिए, तुम्हारे भविष्य की संभावनाओं और नियति के लिए है? अपने जिन इरादों, प्रेरणाओं और लक्ष्यों का तुम अनुसरण करते हो, वे सब सही किए जाने चाहिए, वे तुम्हारी अपनी इच्छा से निर्देशित नहीं होने चाहिए। अगर एक व्यक्ति आशीष प्राप्त करने और राजा की तरह सत्ता पाने के लिए पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करता है और दूसरा परमेश्वर को संतुष्ट करने, परमेश्वर के कार्य की व्यावहारिक गवाही देने के लिए पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करता है, तो अनुसरण के इन दो साधनों में से तुम किसे चुनोगे? अगर तुम पहले वाले को चुनते हो, तो तुम अभी भी परमेश्वर के मानकों से बहुत दूर होगे। मैंने एक बार कहा था कि मेरे कर्म ब्रह्मांड भर में सार्वजनिक किए जाएँगे और मैं ब्रह्मांड में राजा के रूप में सत्ता का प्रयोग करूँगा। दूसरी ओर, जो तुम लोगों को सौंपा गया है, वह है परमेश्वर के कार्य का गवाह बनना, न कि राजा बनना और संपूर्ण ब्रह्मांड को दिखाई देना। परमेश्वर के कर्मों को समस्त ब्रह्मांड और आकाश को भरने देना, हर एक को उन्हें देखने और स्वीकार करने देना—ये वचन स्वयं परमेश्वर के संबंध में कहे जाते हैं और मनुष्यों को जो करना चाहिए, वह है परमेश्वर के लिए गवाही देना। तुम परमेश्वर को कितना जानते हो? तुम परमेश्वर की कितनी गवाही दे सकते हो? परमेश्वर का मनुष्य को पूर्ण बनाने का क्या उद्देश्य है? जब तुम परमेश्वर के इरादे समझ जाते हो, तो तुम्हें उसके इरादों के प्रति विचारशीलता कैसे दिखानी चाहिए? अगर तुम पूर्ण बनाए जाने की इच्छा रखते हो, और जो तुम जीते हो उसके माध्यम से परमेश्वर के कार्य की गवाही देने को तैयार हो, अगर तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो कुछ भी बहुत कठिन नहीं है। लोगों को अब आस्था की आवश्यकता है। अगर तुम्हारे पास यह प्रेरक शक्ति है, तो किसी भी नकारात्मकता, निश्चेष्टा, आलस्य और देह की धारणाओं, सांसारिक आचरण के फलसफों, विद्रोही स्वभाव, भावनाओं इत्यादि को त्याग देना आसान है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 513

परीक्षणों से गुजरते समय लोगों का कमजोर होना, भीतर से नकारात्मक होना, परमेश्वर के इरादों को न समझना या अभ्यास के मार्ग के बारे में स्पष्टता का अभाव होना सामान्य बात है। लेकिन किसी भी स्थिति में तुम्हें परमेश्वर के कार्य में आस्था होनी चाहिए और अय्यूब की तरह तुम्हें भी परमेश्वर को नकारना नहीं चाहिए। यद्यपि अय्यूब कमजोर था और अपने जन्म के दिन को कोसता था, फिर भी उसने इस बात से इनकार नहीं किया कि जन्म के बाद लोगों के पास जो भी चीजें होती हैं वे सब यहोवा द्वारा दी जाती हैं और यहोवा ही उन्हें ले भी लेता है। उसे चाहे जिन परीक्षणों से गुजारा गया हो, उसने यह विश्वास बनाए रखा। अपने अनुभवों में तुम परमेश्वर के वचनों के चाहे जिस भी शोधन से गुजरो, परमेश्वर कुल मिलाकर जो चाहता है वह है तुम्हारी आस्था और परमेश्वर-प्रेमी हृदय। इस तरह से कार्य करके वह जिस चीज को पूर्ण बनाता है, वह है लोगों की आस्था, प्रेम और दृढ़ निश्चय। परमेश्वर लोगों पर पूर्णता का कार्य करता है और वे इसे देख नहीं सकते, छू नहीं सकते; ऐसी परिस्थितियों में आस्था आवश्यक होती है। जब कोई चीज नग्न आँखों से न देखी जा सकती हो, तब आस्था आवश्यक होती है। जब तुम अपनी धारणाएँ नहीं छोड़ पाते, तब आस्था आवश्यक होती है। जब तुम परमेश्वर के कार्य के बारे में स्पष्ट नहीं होते तो यही अपेक्षा की जाती है कि तुम आस्था रखो, ठोस रुख अपनाए रखो और अपनी गवाही में अडिग रहो। जब अय्यूब इस मुकाम पर पहुँच गया तो परमेश्वर उसके सामने प्रकट हुआ और उससे बोला। यानी जब तुममें आस्था होगी, तभी तुम परमेश्वर को देखने में समर्थ हो पाओगे। जब तुममें आस्था होगी, परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा और अगर तुममें आस्था नहीं है तो वह ऐसा नहीं कर सकता। परमेश्वर तुम्हें वह सब प्रदान करेगा, जिसे पाने की तुम आशा करते हो। अगर तुम्हारे पास विश्वास नहीं है तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता और तुम परमेश्वर के कर्मों को देखने में असमर्थ होगे, उसकी सर्वशक्तिमत्ता को तो बिल्कुल भी नहीं देख पाओगे। जब तुम्हारे वास्तविक अनुभवों में यह आस्था होती है कि तुम परमेश्वर के कर्म देख सको, तब परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा और भीतर से तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा। इस आस्था के बिना परमेश्वर ऐसा करने में असमर्थ होगा। अगर तुमने परमेश्वर से अपनी आशा खो दी है, तो तुम कैसे उसके कार्य का अनुभव कर पाओगे? इसलिए, केवल जब तुम्हारे भीतर आस्था हो और तुम परमेश्वर पर संदेह न करो और जब तुम्हारा उसमें सच्चा विश्वास हो जो उसके कुछ भी करने से न डगमगाए, तभी वह तुम्हारे अनुभवों के माध्यम से तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन करेगा और केवल तभी तुम उसके कर्मों को देख सकोगे। ये सभी चीजें आस्था के माध्यम से ही हासिल की जाती हैं। आस्था केवल शोधन के माध्यम से ही आती है और शोधन की अनुपस्थिति में आस्था विकसित नहीं हो सकती। आस्था का संदर्भ किस चीज से है? आस्था वह सच्चा विश्वास और निष्कपट हृदय है जो मनुष्यों में तब होना चाहिए जब वे किसी चीज को देख या छू न सकते हों, जब परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप न हो और वह मनुष्यों की पहुँच से बाहर हो। यही वह आस्था है, जिसकी मैं बात करता हूँ। लोगों में कष्ट सहने के समय और शोधन के समय आस्था होनी जरूरी है और जब उनमें आस्था होती है तो वे शोधन का सामना करते हैं—शोधन और आस्था को अलग नहीं किया जा सकता। परमेश्वर चाहे जिस तरह कार्य करे और तुम्हारा परिवेश चाहे जैसा भी हो, अगर तुम जीवन का अनुसरण कर पाते हो और सत्य खोज पाते हो, परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण करते और उसके कर्मों को जानने का प्रयास करते हो और सत्य के अनुसार कार्य करने में समर्थ हो, तो तुममें सच्ची आस्था है, इससे साबित होता है कि तुमने परमेश्वर में आस्था नहीं खोई है। अगर शोधन के दौरान तुम सत्य का अनुसरण करने और परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने में डटे रहने में समर्थ होते हो, उसके बारे में संदेह नहीं पालते हो और अगर परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, फिर भी तुम उसे संतुष्ट करने के लिए सत्य का अभ्यास करते हो, गहराई से उसके इरादे खोजने और उसके इरादों के प्रति विचारशील होने में समर्थ हो, तो परमेश्वर में सच्ची आस्था होने का अर्थ यही है। अतीत में जब परमेश्वर ने कहा कि तुम एक राजा की तरह सत्ता हासिल करोगे, तो तुमने उससे प्रेम किया और जब उसने स्वयं को खुले तौर पर तुम्हें दिखाया तो तुमने उसका अनुसरण किया। परंतु अब परमेश्वर छिपा हुआ है, तुम उसे देख नहीं सकते और तुम पर मुसीबत आ गई है—इस समय क्या तुम परमेश्वर में आशा खो देते हो? इसलिए तुम्हें हर समय जीवन का अनुसरण करना चाहिए और परमेश्वर के इरादे पूरे करने का प्रयास करना चाहिए। यही सच्ची आस्था कहलाती है और यही सबसे सच्चा और सबसे सुंदर प्रकार का प्रेम है।

अतीत में सभी लोग परमेश्वर के सामने संकल्प करने के लिए आते थे और कहते थे : “अगर कोई अन्य परमेश्वर से प्रेम न भी करे, तो भी मुझे परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए।” परंतु अब तुम पर शोधन आता है, और चूँकि यह तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं है, इसलिए तुम परमेश्वर में विश्वास खो देते हो। क्या यह सच्चा प्रेम है? तुमने अय्यूब के कर्मों के बारे में कई बार पढ़ा है—क्या तुम उनके बारे में भूल गए हो? सच्चा प्रेम केवल विश्वास के भीतर ही आकार ले सकता है। तुम जिन शोधनों से गुजरते हो, उनके माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तविक प्रेम विकसित करना और अपने असली अनुभवों में आस्था के साथ परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना और अपनी ही देह के खिलाफ विद्रोह करना और आस्था के साथ जीवन का अनुसरण करना—यही वह चीज है, जो लोगों को करनी चाहिए। अगर तुम ऐसा करते हो तो तुम परमेश्वर के कर्म देखने में समर्थ हो सकोगे, परंतु अगर तुममें आस्था का अभाव है, तो तुम परमेश्वर के कर्म देखने में या उसके कार्य का अनुभव करने में समर्थ नहीं होगे। अगर तुम परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाया जाना और पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो तुम्हारे पास सत्य का हर पहलू होना चाहिए : पीड़ा सहने का संकल्प, आस्था, सहनशीलता, समर्पण, सत्य खोजने और परमेश्वर के इरादे समझने की योग्यता, उसके दुःख और श्रमसाध्य इरादों के प्रति विचारशील होने की योग्यता, आदि। व्यक्ति को पूर्ण बनाना आसान नहीं है और तुम्हारे द्वारा अनुभव किए जाने वाले प्रत्येक शोधन को तुम्हारी आस्था और तुम्हारे प्रेम की जरूरत पड़ती है। अगर तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो महज दौड़-भाग करना पर्याप्त नहीं है, न खुद को परमेश्वर के लिए खपाना ही पर्याप्त है। ऐसा व्यक्ति बनने के लिए जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाता है, तुम्हारे पास कई चीजें होनी चाहिए। जब तुम कष्ट का सामना करते हो तो तुम्हें देह की परवाह न करने और परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें न करने में समर्थ होना चाहिए। जब परमेश्वर स्वयं को तुमसे छिपाता है तो तुम्हें यह आस्था रखने में सक्षम होना चाहिए कि तुम उसका अनुसरण कर सको, अपने पिछले प्रेम को बदले या मिटने दिए बिना इसे कायम रख सको। परमेश्वर चाहे कुछ भी करे, तुम्हें उसकी इच्छा के अनुसार उसे आयोजन करने देना चाहिए और उसके विरुद्ध शिकायत करने के बजाय अपनी देह को कोसना पसंद करना चाहिए। जब तुम्हारा सामना परीक्षणों से हो, तो तुम्हें परमेश्वर को संतुष्ट करने में असफल होने की अपेक्षा उन चीज़ों को त्यागने की पीड़ा सहना और फूट-फूटकर रोना अधिक स्वीकार होना चाहिए। केवल यही सच्चा प्रेम और सच्ची आस्था है। तुम्हारा असली आध्यात्मिक कद चाहे जो भी हो, तुममें सबसे पहले पीड़ा सहने का यह संकल्प और सच्ची आस्था दोनों ही होने चाहिए। तुममें देह के खिलाफ विद्रोह करने का संकल्प भी होना चाहिए; तुम्हें परमेश्वर के इरादे पूरे करने में विफल होने की अपेक्षा कष्ट सहना और अपने निजी हितों का नुकसान उठाना अधिक पसंद होना चाहिए। तुम्हें अपने हृदय में पछतावा महसूस करने में भी सक्षम होना चाहिए : अतीत में तुम परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ थे और अब तुम पछतावा कर सकते हो। तुममें इनमें से किसी भी मामले में कमी नहीं होनी चाहिए—इन्हीं चीजों के जरिए परमेश्वर तुम्हें पूर्ण बनाएगा। अगर तुम इन शर्तों को पूरा नहीं करते, तो फिर तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 514

जो कोई परमेश्वर की सेवा करता है उसे परमेश्वर के लिए केवल कष्ट सहना नहीं जानना चाहिए; इससे भी बढ़कर, उसे यह समझना चाहिए कि परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन परमेश्वर से प्रेम का अनुसरण करना है। परमेश्वर तुम्हारा उपयोग सिर्फ तुम्हारा शोधन करने या तुम्हें पीड़ित करने के लिए नहीं करता, बल्कि वह तुम्हारा उपयोग इसलिए करता है ताकि तुम उसके कर्मों को जानो, मानव-जीवन की सच्ची सार्थकता को जानो और उससे भी अधिक यह जानो कि परमेश्वर की सेवा करना कोई आसान काम नहीं है। परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना अनुग्रह का आनंद लेना नहीं है; बल्कि उससे अधिक इसका मतलब परमेश्वर के प्रति प्रेम के लिए कष्ट सहना है। चूँकि तुम परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हो, इसलिए तुम्हें उसकी ताड़ना का भी आनंद लेना चाहिए; तुम्हें इस सबका अनुभव करना चाहिए। अगर तुम परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध किए जाने का अनुभव कर सकते हो और तुम उसके द्वारा तुम्हारी काट-छाँट और तुम्हारा न्याय किए जाने का भी अनुभव कर सकते हो, तो तुम्हारा अनुभव व्यापक होगा। परमेश्वर ने तुम पर अपना न्याय का कार्य किया है और उसने तुम पर अपनी ताड़ना का कार्य भी किया है। परमेश्वर के वचन ने तुम्हारी काट-छाँट की है, लेकिन इसने तुम्हें प्रबुद्ध और रोशन भी किया है। जब तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो, परमेश्वर फिर भी तुम्हारी चिंता करता है। यह सब कार्य तुम्हें यह सिखाता है कि मनुष्य से संबंधित सब कुछ परमेश्वर के आयोजनों के अंतर्गत है। तुम्हें लग सकता है कि परमेश्वर पर विश्वास करना बस कष्ट सहने या उसके लिए बहुत सारी चीजें करने या अपनी देह की शांति या अपने लिए सब कुछ सहज रूप से होने देने या सभी चीजों में खुद आराम और सहजता से रहने के बारे में है। इनमें से कोई भी प्रयोजन ऐसा नहीं है जो लोगों का परमेश्वर पर अपने विश्वास में होना चाहिए। अगर तुम इन प्रयोजनों के लिए विश्वास करते हो, तो तुम्हारा दृष्टिकोण गलत है और तुम्हें पूर्ण बनाया जाना बिल्कुल भी संभव नहीं है। परमेश्वर के कर्म, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव, उसकी बुद्धि, उसके वचन, उसकी अद्भुतता और उसका अथाहपन, वे सब चीजें हैं जिन्हें लोगों को समझना चाहिए। इस समझ के जरिए तुम्हें अपनी व्यक्तिगत माँगों, आशाओं और धारणाओं को अपने हृदय से निकाल देना चाहिए। केवल इन चीजों को हटा करके ही तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित शर्तें पूरी कर सकते हो। केवल इसके माध्यम से ही तुम जीवन प्राप्त कर सकते हो और परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हो। परमेश्वर पर विश्वास करने का प्रयोजन उसे संतुष्ट करना और उसके द्वारा अपेक्षित स्वभाव को जीना है, ताकि अयोग्य लोगों के इस समूह के माध्यम से उसके कर्म और उसकी महिमा अभिव्यक्त हो सके। परमेश्वर में विश्वास करने का यही सही दृष्टिकोण है और यही वह लक्ष्य भी है जिसका तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। परमेश्वर पर विश्वास करने के बारे में तुम्हारा दृष्टिकोण सही होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के वचनों को प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने की आवश्यकता है और तुम्हें सत्य को जीने, और विशेष रूप से उसके व्यावहारिक कर्मों और संपूर्ण ब्रह्मांड में उसके अद्भुत कर्मों को देखने और साथ ही देह में उसके द्वारा किए जाने वाले व्यावहारिक कार्य को देखने में सक्षम होना चाहिए। अपने वास्तविक अनुभवों के माध्यम से लोगों को यह बात समझनी चाहिए कि कैसे परमेश्वर उन पर अपना कार्य करता है और उनके प्रति परमेश्वर के इरादे क्या हैं। इस सबका उद्देश्य यह है कि वे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को उतारकर फेंक सकें। अपने भीतर की सारी अशुद्धता और अधार्मिकता को उतारकर फेंकने और अपने गलत इरादों को उतारकर फेंकने से तुम परमेश्वर में सच्चा विश्वास विकसित करोगे। केवल सच्चे विश्वास के साथ ही तुम असल में परमेश्वर से प्रेम कर सकते हो। तुम केवल परमेश्वर पर विश्वास करने की नींव पर ही उससे सच्चा प्रेम कर सकते हो। क्या तुम परमेश्वर पर विश्वास किए बिना उसके प्रति प्रेम प्राप्त कर सकते हो? चूँकि तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो, इसलिए तुम्हें इसके बारे में भ्रमित नहीं होना चाहिए। कुछ लोग जैसे ही यह देखते हैं कि परमेश्वर पर आस्था उनके लिए आशीष लाएगी, वे प्रेरित हो जाते हैं, परंतु जैसे ही वे देखते हैं कि उन्हें शोधन सहने पड़ेंगे, उनकी सारी प्रेरणा हवा हो जाती है। क्या यह परमेश्वर पर विश्वास करना है? अंततः, अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के सामने पूर्ण और चरम समर्पण हासिल करना होगा। तुम परमेश्वर पर विश्वास करते हो परंतु यदि उससे माँगें भी करते हो, तुम्हारी कई धार्मिक धारणाएँ हैं जिन्हें तुम छोड़ नहीं सकते, तुम्हारे व्यक्तिगत हित हैं जिन्हें तुम त्याग नहीं सकते, और फिर भी देह के आशीष खोजते हो और चाहते हो कि परमेश्वर तुम्हारी देह को बचाए, तुम्हारी आत्मा को बचाए, तो तुम गलत दृष्टिकोण वाले लोगों का व्यवहार प्रदर्शित कर रहे हो। यद्यपि धार्मिक विश्वास वाले लोगों की परमेश्वर पर आस्था होती है, फिर भी वे अपना स्वभाव बदलने का प्रयास नहीं करते और परमेश्वर संबंधी ज्ञान की खोज नहीं करते, बल्कि केवल अपनी देह के हितों की ही तलाश करते हैं। तुम लोगों में से कइयों की आस्थाएँ ऐसी हैं, जो धार्मिक आस्थाओं की श्रेणी में आती हैं; यह परमेश्वर पर सच्ची आस्था नहीं है। परमेश्वर पर विश्वास करने के लिए लोगों के पास उसके लिए पीड़ा सहने वाला हृदय और स्वयं को त्याग देने का संकल्प होना चाहिए। जब तक वे ये दो शर्तें पूरी नहीं करते, तब तक परमेश्वर पर उनकी आस्था मान्य नहीं है और वे स्वभावों में बदलाव हासिल करने में सक्षम नहीं होंगे। जो लोग वास्तव में सत्य, परमेश्वर के ज्ञान और जीवन का अनुसरण करते हैं, केवल वे ही सचमुच परमेश्वर पर विश्वास करते हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 515

शोधन के कार्य का प्रयोजन मुख्य रूप से लोगों के विश्वास को पूर्ण बनाना है। अंततः जो हासिल होता है वह यह है कि तुम छोड़ना चाहते हो लेकिन छोड़ नहीं सकते, कि कुछ लोग आशा की छोटी-सी किरण से वंचित होने पर भी आस्था रखने में सक्षम होते हैं और कि लोगों को अब अपनी संभावनाओं के बारे में कोई आशा नहीं रहती है। केवल इसी समय परमेश्वर द्वारा शोधन समाप्त होगा। अगर लोग अभी भी जीवन और मृत्यु के बीच मँडराने के चरण तक नहीं पहुँचे हैं और उन्होंने मृत्यु का स्वाद नहीं चखा है तो फिर उनका शोधन खत्म नहीं होगा। यहाँ तक कि जो लोग सेवा करने वालों के चरण पर थे, उनका भी पूरी तरह शोधन नहीं हुआ था। अय्यूब पूरी तरह शोधन से गुजरा था और उसके पास सहारा लेने के लिए कुछ भी नहीं था। लोगों को भी उसी मुकाम तक शोधनों से गुजरना चाहिए—जहाँ उनके पास कोई उम्मीद न हो और सहारा लेने के लिए कुछ न हो। केवल यही सच्चा शोधन है। सेवा करने वालों के समय के दौरान, अगर तुम्हारा दिल हमेशा परमेश्वर के सामने शांत रहा, और परमेश्वर ने चाहे कुछ भी किया हो और तुम्हारे लिए उसके इरादे कुछ भी रहे हों, तुमने हमेशा उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण किया, तो मार्ग के अंत में तुम परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज समझ जाओगे। जब तुम अय्यूब के परीक्षणों से गुजरते हो तो ठीक उसी समय तुम पतरस के परीक्षणों से भी गुजर रहे होते हो। जब अय्यूब का परीक्षण किया गया था तो वह अपनी गवाही में अडिग रहा और अंत में यहोवा उसके सामने प्रकट हुआ। गवाही में अडिग रहने के बाद ही वह परमेश्वर का चेहरा देखने योग्य हुआ था। यह क्यों कहा जाता है, “मैं गंदगी की भूमि से खुद को छिपाता हूँ लेकिन पवित्र राज्य में प्रकट होता हूँ”? इसका मतलब यह है कि जब तुम पावनीकृत होते हो और अपनी गवाही में अडिग रहते हो, तभी तुम परमेश्वर का चेहरा देखने के योग्य होते हो। अगर तुम अपनी गवाही में अडिग नहीं रह पाते, तो तुम उसका चेहरा देखने के योग्य नहीं हो। अगर तुम शोधनों का सामना होने पर पीछे हट जाते हो या परमेश्वर के विरुद्ध शिकायतें करते हो और इस प्रकार अपनी गवाही में अडिग रहने में विफल रहते हो तथा शैतान की हँसी का पात्र बन जाते हो, तो फिर तुम परमेश्वर का प्रकटन हासिल नहीं कर सकते। अगर तुम अय्यूब की तरह हो, जिसने परीक्षणों के बीच अपनी ही देह को धिक्कारा लेकिन परमेश्वर के विरुद्ध शिकायत नहीं की, और अपने शब्दों से शिकायत या पाप किए बिना अपनी ही देह से घृणा कर सका तो तुम अपनी गवाही में अडिग रहोगे। जब तुम एक निश्चित मात्रा तक शोधनों से गुजरते हो और अय्यूब की तरह हो सकते हो, परमेश्वर के सामने सर्वथा समर्पणशील हो सकते हो और उससे कोई अन्य अपेक्षा नहीं रखते या अपनी धारणाएँ नहीं रखते, तब परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट होगा। अभी परमेश्वर तुम्हारे सामने प्रकट नहीं होता क्योंकि तुम्हारी बहुत सारी धारणाएँ, व्यक्तिगत पूर्वाग्रह, स्वार्थी विचार, व्यक्तिगत अपेक्षाएँ और दैहिक हित हैं और तुम उसका चेहरा देखने योग्य नहीं हो। अगर तुम परमेश्वर को देखते, तो तुम उसे अपनी धारणाओं से मापते, और ऐसा करते हुए उसे सलीब पर चढ़ा देते। अगर तुम पर ऐसी कई चीजें आ पड़ती हैं, जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होतीं, परंतु फिर भी तुम उन्हें एक तरफ रखने और इन चीजों से परमेश्वर के कर्मों का ज्ञान प्राप्त करने में समर्थ होते हो और अगर शोधनों के बीच तुम अपना परमेश्वर-प्रेमी हृदय प्रकट करते हो, तो यह अपनी गवाही में अडिग रहना है। अगर तुम्हारे घर में शांति है, तुम देह-सुख का आनंद लेते हो, कोई तुम्हारा उत्पीड़न नहीं करता, और कलीसिया में तुम्हारे भाई-बहन तुम्हारा आज्ञापालन करते हैं, तो क्या तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय प्रकट हो सकता है? क्या यह स्थिति तुम्हारा शोधन कर सकती है? केवल शोधन के माध्यम से ही तुम्हारा परमेश्वर-प्रेमी हृदय दर्शाया जा सकता है, और केवल अपनी धारणाओं के विपरीत घटित होने वाली चीजों के माध्यम से ही तुम पूर्ण बनाए जा सकते हो। कई नकारात्मक चीजों की सेवा और शैतान की तमाम तरह की अभिव्यक्तियों—उसके कामों, उसके आरोपों, उसकी बाधाओं और गुमराह करने के माध्यम से—परमेश्वर तुम्हें शैतान का भयानक चेहरा स्पष्ट रूप से दिखाता है और इस प्रकार शैतान की असलियत पहचानने की तुम्हें क्षमता देता है, ताकि तुम शैतान से नफरत करो और उसके खिलाफ विद्रोह करो।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 516

असफलता और कमजोरी के तुम्हारे अनेक अनुभव तथा नकारात्मकता के तुम्हारे अनेक कालखंड, इन सबको परमेश्वर द्वारा तुम्हारे परीक्षण कहा जा सकता है। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हर चीज परमेश्वर से आती है, और सभी चीजें और घटनाएँ उसके हाथों में हैं। तुम असफल होते हो या कमजोर होते और ठोकर खा जाते हो, यह सब परमेश्वर पर निर्भर करता है और उसकी मुट्ठी में है। परमेश्वर के परिप्रेक्ष्य से, यह तुम्हारा परीक्षण है, और अगर तुम इसे नहीं पहचान सकते, तो यह प्रलोभन बन जाएगा। दो प्रकार की अवस्थाएँ हैं, जिन्हें लोगों को पहचानना चाहिए : एक पवित्र आत्मा से आती है, और दूसरी का संभावित स्रोत शैतान है। एक अवस्था वह है, जिसमें पवित्र आत्मा तुम्हें रोशन करता है और तुम्हें स्वयं को जानने, खुद से घृणा करने, खुद पर पछताने और परमेश्वर के लिए सच्चा प्रेम रखने में समर्थ होने और उसे संतुष्ट करने का संकल्प लेने देता है। दूसरी अवस्था वह है, जिसमें तुम स्वयं को जानते हो, लेकिन तुम नकारात्मक और कमजोर होते हो। कहा जा सकता है कि यह परमेश्वर द्वारा शोधन है, और यह भी कि यह शैतान का प्रलोभन है। अगर तुम यह जानते हो कि यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उद्धार है और अनुभव करते हो कि अब तुम गहराई से उसके ऋणी हो—और कि अब से तुम्हें उसका ऋण चुकाने का प्रयास करना चाहिए, इस तरह की भ्रष्टता में जीना बंद करना चाहिए और परमेश्वर के वचनों को उचित तरीके से खाना-पीना चाहिए और अगर तुम हमेशा यह महसूस करते हो कि तुम अच्छे नहीं हो, और लालसा भरा हृदय रखते हो, तो यह परमेश्वर द्वारा परीक्षण है। जब कष्ट समाप्त हो जाता है और तुम एक बार फिर से आगे बढ़ने लगते हो, तो परमेश्वर तब भी तुम्हारी अगुआई करेगा, तुम्हें रोशन करेगा, तुम्हें प्रबुद्ध करेगा और तुम्हारा पोषण करेगा। लेकिन अगर तुम इसे नहीं पहचान पाते और नकारात्मक हो जाते हो, स्वयं को निराशा में छोड़ देते हो, अगर तुम इस तरह से सोचते हो, तो इसका मतलब होगा कि शैतान का प्रलोभन तुम्हारे ऊपर आ चुका है। जब अय्यूब परीक्षणों से गुजरा, तो परमेश्वर और शैतान एक-दूसरे के साथ शर्त लगा रहे थे, और परमेश्वर ने शैतान को अय्यूब को पीड़ित करने दिया। यद्यपि अय्यूब की परीक्षा परमेश्वर ले रहा था, फिर भी वास्तव में शैतान ही था जो उस पर आ पड़ा था। शैतान की नजर में यह अय्यूब को प्रलोभित करना था, लेकिन अय्यूब परमेश्वर के पक्ष में खड़ा था। अगर ऐसा नहीं होता, तो अय्यूब प्रलोभन में पड़ जाता। एक बार जब लोग प्रलोभन में पड़ते हैं, तो वे खतरे में पड़ जाते हैं। शोधन से गुजरना परमेश्वर की ओर से एक परीक्षण कहा जा सकता है, लेकिन अगर तुम अच्छी मनोदशा में नहीं हो, तो इसे शैतान का प्रलोभन कहा जा सकता है। अगर तुम दर्शनों के बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो शैतान तुम पर दोष लगाएगा और दर्शनों के बारे में तुम्हारी समझ को धुँधला कर देगा। इससे पहले कि तुम जान पाओ, तुम प्रलोभन में पड़ जाओगे।

अगर तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करते, तो तुम कभी पूर्ण नहीं बनाए जा सकोगे। अपने अनुभव में तुम्हें विवरणों में भी जाना चाहिए। उदाहरण के लिए, कौन-सी चीजें तुम्हारे अंदर धारणाओं और बहुत-से प्रयोजनों को जन्म देती हैं, और ये समस्याएँ हल करने के लिए तुम्हारे पास किस तरह के उपयुक्त अभ्यास हैं? अगर तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद है। अगर तुममें केवल बाहर से जोश दिखाई देता है, तो यह वास्तविक आध्यात्मिक कद नहीं है और तुम बिल्कुल भी दृढ़ नहीं रह पाओगे। जब तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर पाते हो, और तुम उसे किसी भी समय और किसी भी स्थान पर अनुभव करने और उस पर विचार करने में सक्षम होते हो, जब तुम लोग चरवाहों को छोड़ने और परमेश्वर पर भरोसा कर स्वतंत्र रूप से जीने में समर्थ हो जाते हो, और परमेश्वर के व्यावहारिक कर्मों को देखने में सक्षम हो जाते हो—केवल तभी परमेश्वर के इरादे पूरे होंगे। अभी ज्यादातर लोग नहीं जानते कि अनुभव कैसे करें, और जब उनके सामने कोई समस्या आती है, तो उन्हें पता नहीं होता कि उससे कैसे निपटें; वे परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में असमर्थ होते हैं, और वे आध्यात्मिक जीवन नहीं जी सकते। तुम्हें परमेश्वर के वचनों और कार्य को अपने वास्तविक जीवन में अपनाना चाहिए।

कभी-कभी परमेश्वर तुम्हें एक खास तरह की अनुभूति देता है, एक एहसास, जिसके कारण तुम्हारा आंतरिक आनंद और परमेश्वर की उपस्थिति खो जाती है, और तुम अंधकार में डूब जाते हो। यह एक प्रकार का शोधन है। जब कभी तुम कुछ करते हो तो गड़बड़ हो जाती है या तुम्हारे सामने कोई अवरोध आ जाता है। यह परमेश्वर का अनुशासन है। कभी-कभी जब तुम कुछ ऐसा करते हो, जो परमेश्वर के प्रति विद्रोहात्मक और प्रतिरोधी होता है, तो हो सकता है कि दूसरों को इसका पता न चले, लेकिन परमेश्वर को पता चल जाता है। वह तुम्हें छोड़ेगा नहीं, और तुम्हें अनुशासित करेगा। पवित्र आत्मा का कार्य बहुत ही विस्तृत है। वह लोगों के हर शब्द और कार्यकलाप, उनकी हर क्रिया और गतिविधि और उनके हर विचार और भाव की बहुत स्पष्टता से पड़ताल करता है, जिससे उन्हें भीतर से जागरूकता मिलती है। तुम एक बार कुछ करते हो और वह गड़बड़ हो जाता है, तुम फिर कुछ करते हो और वह फिर गड़बड़ हो जाता है, और धीरे-धीरे तुम पवित्र आत्मा के कार्य को समझ जाते हो। कई बार अनुशासित किए जाने से तुम्हें पता चल जाएगा कि परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होने के लिए क्या किया जाए और क्या उसके इरादों के अनुरूप नहीं है। अंत में, तुम अपने भीतर से मिलने वाले पवित्र आत्मा के मार्गदर्शन के प्रति सही प्रतिक्रिया दे पाओगे। कभी-कभी तुम विद्रोही हो जाओगे और तुम्हें भीतर से परमेश्वर द्वारा डाँटा जाएगा। यह सब परमेश्वर के अनुशासन से आता है। अगर तुम परमेश्वर के वचन को सँजोकर नहीं रखते, अगर तुम उसके कार्य का तिरस्कार करते हो, तो वह तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। तुम परमेश्वर के वचनों को जितनी अधिक गंभीरता से लेते हो, उतना ही अधिक वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। अभी कलीसिया में कुछ ऐसे लोग हैं, जो परमेश्वर पर अपने विश्वास में स्पष्ट समझ नहीं रखते और भ्रमित हैं। वे अनुशासित हुए बिना ऐसी बहुत-सी चीजें करते हैं जो सीमा पार कर जाती हैं, और इसलिए उनमें पवित्र आत्मा का कार्य स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं देता। पैसे कमाने के लिए कुछ लोग अपना आदेश छोड़ देते हैं और व्यवसाय चलाने के लिए बाहर जाते हैं और उन्हें इसके लिए अनुशासित नहीं किया जाता है; उस तरह का व्यक्ति और भी अधिक खतरे में है। न केवल वर्तमान में उनमें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, बल्कि भविष्य में उन्हें पूर्ण बनाना भी मुश्किल होगा। ऐसे कई लोग हैं, जिनमें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं देखा जा सकता और जिनमें परमेश्वर का अनुशासन नहीं देखा जा सकता। ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर के इरादों के बारे में स्पष्ट नहीं हैं और जो उसके कार्य को नहीं जानते। यदि शोधनों के बीच लोग स्थिर रह सकते हैं, परमेश्वर का अनुसरण कर सकते हैं चाहे वह कुछ भी करे, कम से कम छोड़कर नहीं जाते और पतरस ने जो हासिल किया था, उसका 0.1% भी हासिल कर लेते हैं, तो यह पर्याप्त है। हालाँकि परमेश्वर द्वारा उनका उपयोग किए जाने के संदर्भ में ऐसे लोगों का कोई मूल्य नहीं है। बहुत-से लोग चीजों को जल्दी से समझ जाते हैं, परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम रखते हैं, और पतरस का स्तर पार कर सकते हैं, और परमेश्वर उन पर पूर्णता का कार्य करता है। अनुशासन और प्रबुद्धता ऐसे लोगों को प्राप्त होती है और अगर उनमें कुछ ऐसा होता है जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं होता, तो वे उसे तुरंत त्याग सकते हैं। इस तरह के लोग सोना-चाँदी हैं, मूल्यवान पत्थर हैं—उनका मूल्य बहुत अधिक है! अगर परमेश्वर ने बहुत कार्य किया है, लेकिन तुम फिर भी रेत या पत्थर की तरह हो, तो तुम मूल्यहीन हो!

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 517

बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर का कार्य अद्भुत और अथाह है। वह एक समूह के लोगों को पूर्ण बनाएगा और कुछ अन्य को निकाल देगा, क्योंकि कलीसिया में सभी प्रकार के लोग हैं—ऐसे लोग हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और ऐसे लोग भी हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते; ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव करते हैं और ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के कार्य का अनुभव नहीं करते; ऐसे लोग हैं जो अपना कर्तव्य निभाते हैं और ऐसे लोग भी हैं जो अपना कर्तव्य नहीं निभाते; ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के लिए गवाही देते हैं और ऐसे लोग भी हैं जो परमेश्वर के लिए गवाही नहीं देते—और उनका एक हिस्सा छद्म-विश्वासियों और बुरे लोगों का है, जिन्हें निश्चित रूप से निकाल दिया जाएगा। अगर तुम स्पष्ट रूप से परमेश्वर के कार्य को नहीं जानते, तो तुम नकारात्मक होगे; ऐसा इसलिए है, क्योंकि परमेश्वर का कार्य केवल अल्प संख्या में ही लोगों में देखा जा सकता है। इस समय यह खुलासा हो जाएगा कि कौन सचमुच परमेश्वर से प्रेम करता है और कौन नहीं। जो लोग सचमुच परमेश्वर से प्रेम करते हैं, उनके पास पवित्र आत्मा का कार्य है, और जो सचमुच उससे प्रेम नहीं करते, वे उसके कार्य के प्रत्येक चरण के माध्यम से प्रकट किए जाएँगे। वे हटाए गए लोग बन जाएँगे। ये लोग जीतने के कार्य के दौरान प्रकट किए जाएँगे, और ये वे लोग हैं जिनमें पूर्ण बनाए जाने के लिए कोई मूल्य नहीं है। जो लोग पूर्ण बनाए गए हैं, वे पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए गए हैं, और वे परमेश्वर से पतरस की तरह प्रेम करने में सक्षम हैं। जिन लोगों को जीता गया है, उनमें सहज प्रेम नहीं है, बल्कि केवल निष्क्रिय प्रेम है, और वे परमेश्वर से प्रेम करने के लिए बाध्य हैं। सहज प्रेम व्यावहारिक अनुभव से प्राप्त समझ के माध्यम से विकसित होता है। यह प्रेम किसी व्यक्ति के हृदय पर कब्जा कर लेता है, जो उन्हें स्वेच्छा से परमेश्वर के प्रति वफादार होने, परमेश्वर के वचनों को अपनी नींव बनाने और परमेश्वर के लिए कष्ट सहने में सक्षम बनाता है। निस्संदेह, ये चीजें उसके पास होती हैं, जिसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जा चुका है। अगर तुम केवल जीता जाना चाहते हो, तो तुम परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते; अगर परमेश्वर केवल लोगों को जीतने के माध्यम से ही उद्धार का लक्ष्य प्राप्त करता, तो सेवा करने वालों के चरण से ही कार्य खत्म हो जाता। लेकिन परमेश्वर का अंतिम लक्ष्य लोगों को जीतना नहीं, पूर्ण बनाना है। इसलिए यह कहने के बजाय कि यह जीतने के कार्य का चरण है, यह कहो कि यह पूर्ण बनाने और निकाले जाने का कार्य है। कुछ लोगों को पूरी तरह से नहीं जीता गया है, और उन्हें जीतने के दौरान लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया जाएगा। ये दोनों कार्य एक-साथ किए जाते हैं। कार्य की इतनी लंबी अवधि में भी लोग छोड़कर नहीं गए, जो यह दर्शाता है कि जीतने का लक्ष्य प्राप्त कर लिया गया है—यह जीते जाने का तथ्य है। शोधन जीते जाने के वास्ते नहीं हैं, बल्कि पूर्ण बनाए जाने के वास्ते हैं। शोधनों के बिना लोगों को पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। इसलिए शोधन वास्तव में मूल्यवान हैं! आज लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जा रहा है। पहले उल्लिखित सभी दस आशीषों का लक्ष्य वे लोग हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया गया है। धरती पर उनकी छवि बदलने से संबंधित मामला उन पर लक्षित है, जिन्हें पूर्ण बनाया गया है। जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया गया है, वे परमेश्वर के वादे विरासत में पाने के योग्य नहीं हैं।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है उन्हें शोधन से गुजरना होगा

परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 518

परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर को जानना पूरी तरह स्वाभाविक और न्यायोचित है और आज—ऐसे युग के दौरान जब देहधारी परमेश्वर व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य कर रहा है—ख़ासतौर पर परमेश्वर को जानने का अच्छा समय है। परमेश्वर को संतुष्ट करना कुछ ऐसा है, जो परमेश्वर के इरादों की समझ की नींव पर बनाया जाता है और परमेश्वर के इरादों को समझने के लिए परमेश्वर का ज्ञान होना आवश्यक है। परमेश्वर का यह ज्ञान वह दर्शन है, जो परमेश्वर में विश्वास रखने वाले के पास अवश्य होना चाहिए; यह परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार है। इस ज्ञान के अभाव में, परमेश्वर में मनुष्य का विश्वास खोखले धर्म-सिद्धांतों के बीच, एक अज्ञात स्थिति में मौजूद होगा। भले ही इस तरह के लोगों के पास परमेश्वर का अनुसरण करने का संकल्प हो, फिर भी उन्हें कुछ प्राप्त नहीं होगा। वो सभी जो इस धारा में कुछ भी प्राप्त नहीं करते, वो हैं जिन्हें निकाल दिया जाएगा—वो सभी मुफ़्तखोर हैं। तुम्हें परमेश्वर के कार्य के जिस भी चरण का अनुभव है, तुम्हारे साथ एक महान दर्शन होना चाहिए। अन्यथा, तुम्हारे लिए नए कार्य के हर चरण को स्वीकार करना कठिन होगा क्योंकि परमेश्वर का नया कार्य मनुष्य की कल्पना करने की क्षमता से परे है और उसकी सोच की सीमाओं से बाहर है। इसलिए मनुष्य की रखवाली के लिए एक चरवाहे के बिना, दर्शनों के बारे में संगति करने के लिए एक चरवाहे के बिना, मनुष्य इस नए कार्य को स्वीकार करने में असमर्थ है। यदि मनुष्य दर्शन को समझ नहीं सकता, तो वह परमेश्वर के नए कार्य को भी समझ नहीं सकता और यदि मनुष्य परमेश्वर के नए कार्य के प्रति समर्पण नहीं कर सकता, तो मनुष्य परमेश्वर के इरादों को समझने में असमर्थ होगा और इसलिए परमेश्वर के बारे में उसका ज्ञान कुछ नहीं रह जाएगा। इससे पहले कि मनुष्य परमेश्वर के वचन का अभ्यास करे, उसे परमेश्वर के वचन को अवश्य जानना चाहिए; यानी उसे परमेश्वर के इरादे अवश्य समझने चाहिए। केवल इसी तरह से परमेश्वर के वचन का सही तरीके से और परमेश्वर के इरादों के अनुसार अभ्यास किया जा सकता है। यह ऐसी चीज है जो सच्चाई की तलाश करने वाले हर व्यक्ति के पास अवश्य होनी चाहिए और यही वह प्रक्रिया भी है जिससे परमेश्वर को जानने की कोशिश करने वाले हर व्यक्ति को अवश्य गुजरना चाहिए। परमेश्वर के वचन को जानने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जानने की प्रक्रिया है। यह परमेश्वर के कार्य को जानने की प्रक्रिया भी है। और इसलिए, दर्शनों को जानने का अर्थ केवल देहधारी परमेश्वर की मानवता को जानना ही नहीं है, बल्कि इसमें परमेश्वर के वचन और कार्य को जानना भी शामिल है। परमेश्वर के वचन से लोग परमेश्वर के इरादे जान लेते हैं और परमेश्वर के कार्य से वो जान लेते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव क्या है और परमेश्वर स्वरूप क्या है। परमेश्वर में विश्वास परमेश्वर को जानने का पहला कदम है। परमेश्वर में इस आरंभिक विश्वास से उसमें अत्यधिक गहन विश्वास की ओर जाने की प्रक्रिया ही परमेश्वर को जान लेने की प्रक्रिया है, परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने की प्रक्रिया है। यदि तुम केवल परमेश्वर में विश्वास रखने के वास्ते परमेश्वर में विश्वास रखते हो, न कि उसे जानने के वास्ते, तो तुम्हारे विश्वास की कोई वास्तविकता नहीं है और तुम्हारा विश्वास शुद्ध नहीं हो सकता—इस बारे में कोई संदेह नहीं है। यदि परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में, मनुष्य धीरे-धीरे परमेश्वर को जान लेता है, तो उसका स्वभाव धीरे-धीरे बदल जाएगा और उसका विश्वास उत्तरोत्तर सच्चा होता जाएगा। इस तरह, जब मनुष्य परमेश्वर में अपने विश्वास में सफलता पा लेता है, तो उसने पूरी तरह परमेश्वर को पा लिया होगा। परमेश्वर द्वारा अपना इतना सारा हृदय का रक्त लगाकर दूसरी बार देह धारण करने और स्वयं अपना कार्य करने का कारण यह है कि मनुष्य उसे जान सके और उसे देख सके। परमेश्वर को जानना[क] परमेश्वर के कार्य के समापन पर प्राप्त किया जाने वाला अंतिम प्रभाव है; यह वह अंतिम अपेक्षा है, जो परमेश्वर मनुष्यजाति से करता है। उसके ऐसा करने का कारण अपनी अंतिम गवाही के वास्ते है; परमेश्वर यह कार्य इसलिए करता है ताकि मनुष्य अंततः और पूरी तरह उसकी ओर फिरे। मनुष्य केवल परमेश्वर को जानकर ही परमेश्वर से प्रेम कर सकता है और परमेश्वर से प्रेम करने के लिए उसे परमेश्वर को जानना चाहिए। इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि वह कैसे अनुसरण करता है या अपने अनुसरण के माध्यम से क्या प्राप्त करने की आशा करता है, उसे परमेश्वर का ज्ञान प्राप्त करने में अवश्य सक्षम होना चाहिए। केवल इसी तरह से मनुष्य परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट कर सकता है। केवल परमेश्वर को जानकर ही मनुष्य परमेश्वर में सच्चा विश्वास रख सकता है और केवल परमेश्वर को जानकर ही वह वास्तव में परमेश्वर का भय मान सकता है और उसके प्रति समर्पण कर सकता है। जो लोग परमेश्वर को नहीं जानते, वो कभी भी परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण नहीं कर सकते और उसका भय नहीं मान सकते। परमेश्वर को जानने में उसके स्वभाव को जानना, उसके इरादों को समझना और यह जानना शामिल है कि उसका स्वरूप क्या है। फिर भी इंसान किसी भी पहलू को क्यों न जाने, उसे प्रत्येक के लिए क़ीमत चुकाने की आवश्यकता होती है और समर्पण करने के संकल्प की आवश्यकता होती है, जिसके बिना कोई भी अंत तक अनुसरण करते रहने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर का कार्य मनुष्य की धारणाओं से अत्यधिक असंगत है। परमेश्वर के स्वभाव और परमेश्वर के स्वरूप को जानना मनुष्य के लिए बहुत मुश्किल है और परमेश्वर का हर एक वचन और कर्म, उसका हर कदम मनुष्य की समझ से परे है। यदि मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करना चाहता है और फिर भी उसके प्रति समर्पण करने का अनिच्छुक है, तो मनुष्य को कुछ प्राप्त नहीं होगा। संसार के सृजन से लेकर आज तक परमेश्वर ने बहुत सा कार्य किया है, जो मनुष्य की समझ से परे है, जिसे मनुष्य के लिये स्वीकार करना कठिन रहा है और परमेश्वर ने बहुत कुछ कहा है, जिससे मनुष्य की धारणाएँ फिर पहले जैसी नहीं हो पातीं। मगर मनुष्य की तमाम कठिनाइयों के कारण उसने अपना कार्य कभी बंद नहीं किया है; बल्कि, उसने कार्य करना और बोलना जारी रखा है। भले ही बड़ी संख्या में “योद्धा” रास्ते में ही गिर पड़े हैं, वह तब भी अपना कार्य कर रहा है और बिना रुकावट एक के बाद एक ऐसे लोगों के समूह चुनना जारी रखता है, जो उसके नए कार्य के प्रति समर्पित होने के इच्छुक हैं। उसे उन गिर पड़े “नायकों” का कोई खेद नहीं है; बल्कि वह उन लोगों को सँजोकर रखता है, जो उसके नए कार्य और वचनों को स्वीकार करते हैं। लेकिन इस तरह कदम-दर-कदम कार्य करने में उसका उद्देश्य क्या है? क्यों वह हमेशा कुछ लोगों को निकाल रहा है और दूसरों को चुन रहा है? ऐसा क्यों है कि वह हमेशा ऐसी विधि का उपयोग करता है? उसके कार्य का उद्देश्य मनुष्य को उसे जानने की अनुमति देना और इस प्रकार उसके द्वारा प्राप्त किया जाना है। उसके कार्य का सिद्धांत है उन लोगों पर कार्य करना, जो आज उसके द्वारा किए जा रहे कार्य के प्रति समर्पण करने में समर्थ हैं, न कि उन लोगों पर कार्य करना, जो उसके द्वारा अतीत में किए गए कार्य के प्रति समर्पण करते हैं और आज उसके द्वारा किए जा रहे कार्य का विरोध करते हैं। इसमें वह कारण निहित है कि क्यों वह इतने सारे लोगों को निकालता रहा है।

परमेश्वर को जानने का सबक एक या दो दिन में नहीं सीखा जा सकता है : मनुष्य को अनुभवों से गुजरना होगा, कष्ट सहना होगा और वास्तव में समर्पण करना होगा। सबसे पहले परमेश्वर के कार्य और वचनों से शुरू करें। यह आवश्यक है कि तुम समझो कि परमेश्वर के ज्ञान में क्या शामिल है, इस ज्ञान को कैसे प्राप्त किया जाए और अपने अनुभवों में परमेश्वर को कैसे देखा जाए। यह हर किसी को तब करना चाहिए जब उन्हें परमेश्वर को जानना बाक़ी हो। कोई भी परमेश्वर के कार्य और वचनों को एक ही बार में नहीं समझ सकता और कोई भी अल्प समय के भीतर परमेश्वर की समग्रता का ज्ञान प्राप्त नहीं कर सकता। अनुभव की एक आवश्यक प्रक्रिया है, जिसके बिना कोई भी परमेश्वर को जानने या ईमानदारी से उसका अनुसरण करने में समर्थ नहीं होगा। परमेश्वर जितना अधिक कार्य करता है, उतना ही अधिक मनुष्य उसे जानता है। परमेश्वर का कार्य जितना अधिक मनुष्य की धारणाओं से अलग होता है, उतना ही अधिक उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान नवीकृत और गहरा होता है। यदि परमेश्वर का कार्य हमेशा स्थिर और अपरिवर्तित रहता, तो उसके बारे में मनुष्य का ज्ञान अधिक नहीं होता। सृजन और वर्तमान समय के बीच, परमेश्वर ने व्यवस्था के युग के दौरान क्या किया, उसने अनुग्रह के युग के दौरान क्या किया और राज्य के युग के दौरान वह क्या करता है—तुमको इन दर्शनों के बारे में पूर्णतया स्पष्ट होना चाहिए। तुमको परमेश्वर के कार्य को अवश्य जानना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं

फुटनोट :

क. मूल पाठ में “परमेश्वर को जानने का कार्य” लिखा है।


परमेश्वर के दैनिक वचन  अंश 519

मनुष्य परमेश्वर के कार्य का अनुभव करता है, स्वयं को जान लेता है, अपने भ्रष्ट स्वभाव को उतार फेंकता है और जीवन में विकास का अनुसरण करता है, यह सब परमेश्वर को जानने के वास्ते करता है। यदि तुम केवल अपने आप को जानने और अपने भ्रष्ट स्वभाव की काट-छाँट करने का प्रयास करते हो, मगर तुम्हें इसका कोई ज्ञान नहीं है कि परमेश्वर मनुष्य पर क्या कार्य करता है, उसका उद्धार कितना महान है या इसका कोई ज्ञान नहीं है कि तुम परमेश्वर के कार्य का अनुभव कैसे करते हो और उसके कर्मों की गवाही कैसे देते हो, तो तुम्हारा यह अनुभव मूर्खतापूर्ण है। यदि तुम सोचते हो कि किसी के जीवन में केवल इसलिए परिपक्वता आई है क्योंकि वह सत्य को अभ्यास में लाने और धैर्य दिखाने में समर्थ है, तो इसका मतलब है कि तुमने अभी भी जीवन का सच्चा अर्थ या मनुष्य को पूर्ण करने का परमेश्वर का उद्देश्य नहीं समझा है। एक दिन, जब तुम रिपेंटेंस चर्च या लाइफ़ चर्च के सदस्यों के बीच, धार्मिक कलीसियाओं में होगे, तो तुम कई धर्मपरायण लोगों से मिलोगे, जिनकी प्रार्थनाएं “दर्शनों” से युक्त होती हैं और जो जीवन की अपनी खोज में, स्पर्श किए गए और वचनों द्वारा मार्गदर्शित महसूस करते हैं। इसके अलावा, कई मामलों में वे धैर्य रखने, स्वयं को त्यागने और देह द्वारा निर्देशित न होने में सक्षम होते हैं। उस समय, तुम उनका भेद नहीं पहचान पाओगे : तुम मानोगे कि वे जो कुछ भी करते हैं वह सही है, जीवन का स्वाभाविक प्रकाशन है और यह खेद की बात है कि वे जिस नाम में विश्वास करते हैं वह गलत है। क्या ऐसे विचार मूर्खतापूर्ण नहीं हैं? ऐसा क्यों कहा जाता है कि कई लोगों का कोई जीवन नहीं है? क्योंकि वो परमेश्वर को नहीं जानते और इसीलिए ऐसा कहा जाता है कि उनके हृदय में कोई परमेश्वर नहीं है और उनका कोई जीवन नहीं है। यदि परमेश्वर में तुम्हारा विश्वास एक स्थिति तक पहुँच गया है, जहाँ तुम परमेश्वर के कर्मों, परमेश्वर की व्यावहारिकता और परमेश्वर के कार्य के प्रत्येक चरण को पूरी तरह जानने में सक्षम हो, तो तुम्हारे पास सत्य है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य और स्वभाव को नहीं जानते, तो तुम्हारा अनुभव अभी भी पर्याप्त नहीं है। यीशु ने कैसे अपने कार्य के उस चरण को कार्यान्वित किया, कैसे इस चरण को कार्यान्वित किया जा रहा है, कैसे अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने अपना कार्य किया और क्या कार्य किया, कौन सा कार्य इस चरण में किया जा रहा है—यदि तुम्हें इन बातों का पूरी तरह ज्ञान नहीं है, तो तुम कभी भी आश्वस्त महसूस नहीं करोगे और तुम हमेशा अस्थिर महसूस करोगे। यदि एक अवधि के अनुभव के बाद तुम परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य और उसके हर चरण को जानने में समर्थ हो और परमेश्वर के वचनों को बोलने में उसके लक्ष्यों तथा इस बात का भी पूरी तरह ज्ञान प्राप्त कर लिया है कि उसके द्वारा बोले गए इतने सारे वचन क्यों पूरे नहीं हुए हैं, तो तुम साहस के साथ और बिना हिचकिचाए, चिंता और शोधन से मुक्त होकर, आगे के मार्ग पर चल सकते हो। तुम लोगों को देखना चाहिए कि परमेश्वर किन तरीक़ों से अपना इतना अधिक कार्य कर पाता है। वह अपने बोले हुए वचनों का उपयोग करता है और अनेक प्रकार के वचनों के माध्यम से मनुष्य का शोधन करता है तथा उसकी धारणाओं को रूपांतरित करता है। समस्त पीड़ाएँ जो तुम लोगों ने सहन की हैं, सभी शोधन जिनसे तुम लोग गुजरे हो, जिस काट-छाँट को तुम लोगों ने अपने भीतर स्वीकारा है और जो प्रबुद्धता तुम लोगों ने अनुभव की है—ये सभी उन वचनों के जरिए प्राप्त किए गए हैं, जो परमेश्वर ने बोले हैं। मनुष्य किस कारण परमेश्वर का अनुसरण करता है? वह परमेश्वर के वचनों की वजह से अनुसरण करता है! परमेश्वर के वचन गहन रूप से रहस्यमय हैं और इसके अलावा वे मनुष्य के हृदय को प्रेरित कर सकते हैं, उसके भीतर दबी चीजों को उजागर कर सकते हैं, उसे अतीत में हुई चीजें ज्ञात करवा सकते हैं और उसे भविष्य की अंतर्दृष्टि दे सकते हैं। इसलिए मनुष्य परमेश्वर के वचनों की वजह से पीड़ाएं सहता है और उसे परमेश्वर के वचनों की वजह से ही पूर्ण भी बनाया जाता है : केवल इसी समय से मनुष्य परमेश्वर का अनुसरण करता है। इस चरण में मनुष्य परमेश्वर के वचनों को स्वीकार करता है और इसकी परवाह किए बिना कि उसे पूर्ण बनाया जाता है या शोधन किया जाता है, जो महत्वपूर्ण है, वह है परमेश्वर के वचन। यह परमेश्वर का कार्य है और यही वह दर्शन भी है, जिसे आज मनुष्य को जानना चाहिए।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर को जानने वाले ही परमेश्वर के लिए गवाही दे सकते हैं

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परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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