जीवन में प्रवेश V
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 520
यीशु का अनुसरण करने के दौरान पतरस ने उसके बारे में कई मत बनाए और हमेशा अपने दृष्टिकोण से उसका आकलन किया। यद्यपि पतरस को आत्मा की एक निश्चित मात्रा में समझ थी, किंतु उसकी समझ कुछ हद तक अस्पष्ट थी, इसीलिए उसने कहा : “मुझे उसका अनुसरण अवश्य करना चाहिए, जिसे स्वर्गिक पिता द्वारा भेजा जाता है। मुझे उसे अवश्य अभिस्वीकृत करना चाहिए, जो पवित्र आत्मा द्वारा चुना जाता है।” उसने यीशु द्वारा की गई चीज़ों को नहीं समझा और उसमें उनके बारे में स्पष्टता का अभाव था। कुछ समय तक उसका अनुसरण करने के बाद उसकी उसके द्वारा किए गए कामों और उसके द्वारा कही गई बातों में और स्वयं यीशु में रुचि बढ़ी। उसने महसूस किया कि यीशु ने स्नेह और सम्मान दोनों प्रेरित किए; उसे उसके साथ जुड़ना और रहना अच्छा लगा, और यीशु के वचन सुनने से उसे आपूर्ति और सहायता मिली। यीशु का अनुसरण करने के दौरान, पतरस ने उसके जीवन के बारे में हर चीज का अवलोकन किया और उन्हें हृदय से लगाया : उसके क्रियाकलाप, वचन, गतिविधियाँ, और अभिव्यक्तियाँ। उसने एक गहरी समझ प्राप्त की कि यीशु साधारण लोगों जैसा नहीं है। यद्यपि उसका मानवीय रंग-रूप अत्यधिक सामान्य था, वह मनुष्यों के लिए प्रेम, दया और सहिष्णुता से भरा हुआ था। उसने जो कुछ भी किया या कहा, वह दूसरों के लिए बहुत मददगार था, और पतरस ने यीशु से वे चीज़ें देखीं और उससे वे चीज़ें पाईं, जो उसने पहले कभी नहीं देखी या पाई थीं। उसने देखा कि यद्यपि यीशु की न तो कोई भव्य कद-काठी थी और न ही कोई असाधारण मानवता, किंतु उसका हाव-भाव सच में असाधारण और असामान्य था। यद्यपि पतरस इसे पूरी तरह से नहीं बता सका, लेकिन वह देख सकता था कि यीशु बाकी सबसे भिन्न तरीके से कार्य करता था, क्योंकि जो चीज़ें उसने कीं, वे सामान्य मनुष्य द्वारा की जाने वाली चीज़ों से बहुत भिन्न थीं। यीशु के साथ संपर्क होने के समय से पतरस ने यह भी देखा कि उसका व्यक्तित्व साधारण मनुष्य से भिन्न है। उसने हमेशा स्थिरता से कार्य किया और कभी भी जल्दबाजी नहीं की, किसी भी विषय को न तो बढ़ा-चढ़ाकर बताया, न ही उसे कम करके आँका, और अपने जीवन को इस तरह से संचालित किया, जिससे ऐसा व्यक्तित्व उजागर हुआ जो सामान्य और सराहनीय दोनों था। बातचीत में यीशु मुक्त रूप से और शिष्टता के साथ बोलता था, हमेशा प्रफुल्लित किंतु शांतिपूर्ण ढंग से संवाद करता था, और अपना कार्य करते हुए कभी अपनी गरिमा नहीं खोता था। पतरस ने देखा कि यीशु कभी बहुत कम बोलता था, तो कभी लगातार बोलता रहता था। कभी वह इतना प्रसन्न होता था कि फुर्तीले और जीवंत रूप से फुदकते हुए कबूतर की तरह दिखता था, तो कभी इतना दुःखी होता था कि बिल्कुल भी बात नहीं करता था, दुःख से लदा हुआ प्रतीत होता था, मानो कोई माँ हो जिसने अनगिनत कष्ट सहे हों। कई बार वह क्रोध से भरा होता था, जैसे कि कोई बहादुर सैनिक शत्रु को मारने के लिए हमलावर हो, और कई बार वह किसी गरजते सिंह जैसा दिखाई देता था। कभी वह हँसता था; तो कभी प्रार्थना करता और रोता था। यीशु ने अपने जीवन में चाहे कैसे भी काम किया, पतरस का उसके प्रति प्रेम और आदर असीमित रूप से बढ़ता गया। यीशु की हँसी उसे खुशी से भर देती थी, उसका दुःख उसे दुःख में डुबा देता था, उसका क्रोध उसे डरा देता था, जबकि उसकी करुणा, क्षमा और लोगों से की गई उसकी सख्त अपेक्षाओं ने उसे यीशु से सच्चा प्यार करवाया और इससे उसके प्रति सच्चा भय और लालसा विकसित हुई। निस्संदेह, पतरस को इस सबका एहसास धीरे-धीरे तब तक नहीं हुआ, जब तक वह कई वर्ष यीशु के साथ नहीं रह लिया।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 521
पतरस के अनुभवों में पराकाष्ठा तब आई, जब उसका शरीर काफी ढीला और कमजोर हो गया, किंतु यीशु ने फिर भी उसे भीतर से प्रोत्साहन दिया। और एक बार, यीशु पतरस के सामने प्रकट हुआ। जब पतरस अत्यधिक पीड़ा में था और महसूस करता था कि उसका हृदय टूट गया है, तो यीशु ने उसे निर्देश दिया : “तू पृथ्वी पर मेरे साथ था, और मैं यहाँ तेरे साथ था। यद्यपि पहले हम स्वर्ग में एक-साथ थे, पर यह अंततः आध्यात्मिक क्षेत्र में था। अब मैं आध्यात्मिक क्षेत्र में लौट आया हूँ और तू पृथ्वी पर है, क्योंकि मैं पृथ्वी का नहीं हूँ और यद्यपि तू भी पृथ्वी का नहीं है, किंतु तुझे पृथ्वी पर अपनी भूमिका पूरी करनी है। चूँकि तू एक सेवक है, इसलिए तुझे अपना कर्तव्य निभाना होगा।” पतरस को यह सुनकर सांत्वना मिली कि वह परमेश्वर की ओर लौट पाएगा। उस समय पतरस ऐसी पीड़ा में था कि वह लगभग बिस्तर पर पड़ा था; उसे इतना पछतावा हुआ कि वह कह उठा : “मैं इतना भ्रष्ट हूँ कि मैं परमेश्वर को संतुष्ट करने में असमर्थ हूँ।” यीशु उसके सामने प्रकट हुआ और बोला : “पतरस, कहीं ऐसा तो नहीं कि तू उस संकल्प को भूल गया है, जो तूने एक बार मेरे सामने लिया था? क्या तू वास्तव में वह भूल गया है, जो मैंने कहा था? क्या तू उस संकल्प को भूल गया है, जो तूने मुझसे किया था?” यह देखकर कि यह यीशु है, पतरस अपने बिस्तर से उठ गया, और यीशु ने उसे इस प्रकार सांत्वना दी : “मैं पृथ्वी का नहीं हूँ, मैं तुझे पहले ही कह चुका हूँ—यह तुझे समझ जाना चाहिए, किंतु क्या तू कोई और बात भी भूल गया है, जो मैंने तुझसे कही थी? ‘तू भी पृथ्वी का नहीं है, संसार का नहीं है।’ अभी कुछ कार्य है, जो तुझे करना है, तू इस तरह से दुःखी नहीं हो सकता। तू इस तरह से पीड़ित नहीं हो सकता। हालाँकि मनुष्य और परमेश्वर एक ही संसार में एक-साथ नहीं रह सकते, मेरे पास मेरा कार्य है और तेरे पास तेरा कार्य है, और एक दिन जब तेरा कार्य समाप्त हो जाएगा, तो हम दोनों निश्चित रूप से एक क्षेत्र में एक-साथ रहेंगे, और मैं हमेशा के लिए अपने साथ रहने में तेरी अगुआई करूँगा।” इन वचनों को सुनने के बाद पतरस को सांत्वना मिली और वह आश्वस्त हुआ। वह जानता था कि यह पीड़ा उसे सहन और अनुभव करनी ही है, और तब से वह प्रेरित हो गया। यीशु हर महत्वपूर्ण क्षण में उसके सामने प्रकट हुआ, उसे विशेष प्रबुद्धता और मार्गदर्शन दिया, और उसने उस पर बहुत कार्य किया। और पतरस को सबसे अधिक किस बात का पछतावा हुआ? पतरस के यह कहने के शीघ्र बाद कि “तू जीवित परमेश्वर का पुत्र है”, यीशु ने पतरस से एक और प्रश्न पूछा (यद्यपि यह बाइबल में इस प्रकार से दर्ज नहीं है)। यीशु ने उससे पूछा : “पतरस! क्या तूने कभी मुझसे प्रेम किया है?” पतरस उसका अभिप्राय समझ गया और बोला : “प्रभु! मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैं स्वीकार करता हूँ कि मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया।” तब यीशु ने कहा, “यदि लोग स्वर्गिक पिता से प्रेम नहीं करते, तो वे पृथ्वी पर पुत्र से कैसे प्रेम कर सकते हैं? और यदि लोग परमपिता परमेश्वर द्वारा भेजे गए पुत्र से प्रेम नहीं करते, तो वे स्वर्गिक पिता से कैसे प्रेम कर सकते हैं? यदि लोग वास्तव में पृथ्वी पर पुत्र से प्रेम करते हैं, तो वे स्वर्गिक पिता से भी वास्तव में प्रेम करते हैं।” जब पतरस ने इन वचनों को सुना, तो उसने महसूस किया कि उसमें क्या कमी है। उसे अपने इन शब्दों पर कि “मैंने एक बार स्वर्गिक पिता से प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझसे कभी प्रेम नहीं किया,” हमेशा पछतावा महसूस होता था और वह रोता था। यीशु के पुनर्जीवित होने और स्वर्गारोहण करने के बाद उसे अपने इन शब्दों पर और भी अधिक पछतावा और दुःख महसूस हुआ। अपने अतीत के कार्यों और अपने वर्तमान आध्यात्मिक कद को याद कर वह प्रायः प्रार्थना करने के लिए यीशु के सामने आता, परमेश्वर के इरादों को पूरा न कर पाने और परमेश्वर के मानकों पर खरा न उतर पाने के कारण हमेशा पछतावा और ऋणी महसूस करता। ये मामले उसका सबसे बड़ा बोझ बन गए। उसने कहा : “एक दिन मैं तुझे वह सब अर्पित कर दूँगा, जो मेरे पास है और जो मैं हूँ, मैं तुझे वह दूँगा जो सबसे अधिक मूल्यवान है।” उसने कहा : “परमेश्वर! मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे जीवन का कुछ भी मूल्य नहीं है, और मेरे शरीर का कुछ भी मूल्य नहीं है। मेरे पास केवल एक ही विश्वास और केवल एक ही प्रेम है। मेरे मन में तेरे लिए विश्वास है और हृदय में तेरे लिए प्रेम है; ये ही दो चीजें मेरे पास तुझे देने के लिए हैं, और कुछ नहीं।” पतरस यीशु के वचनों से बहुत प्रोत्साहित हुआ, क्योंकि यीशु को सलीब पर चढ़ाए जाने से पहले उसने पतरस से कहा था : “मैं इस संसार का नहीं हूँ, और तू भी इस संसार का नहीं है।” बाद में, जब पतरस एक अत्यधिक पीड़ादायक स्थिति में पहुँचा, तो यीशु ने उसे स्मरण दिलाया : “पतरस, क्या तू भूल गया है? मैं इस संसार का नहीं हूँ, और मैं सिर्फ अपने कार्य के लिए ही पहले चला गया। तू भी इस संसार का नहीं है, क्या तू सचमुच भूल गया है? मैंने तुझे दो बार बताया है, क्या तुझे याद नहीं है?” यह सुनकर पतरस ने कहा : “मैं नहीं भूला हूँ!” तब यीशु ने कहा : “तूने एक बार मेरे साथ स्वर्ग में एक खुशहाल समय और मेरी बगल में एक समयावधि बिताई थी। तू मुझे याद करता है और मैं तुझे याद करता हूँ। यद्यपि सृजित प्राणी मेरी दृष्टि में उल्लेखनीय नहीं हैं, फिर भी मैं किसी निष्कपट और प्यार करने योग्य प्राणी को कैसे प्रेम न करूँ? क्या तू मेरी प्रतिज्ञा भूल गया है? तुझे धरती पर मेरा आदेश स्वीकार करना चाहिए; तुझे वह कार्य पूरा करना चाहिए, जो मैंने तुझे सौंपा है। एक दिन मैं तुझे अपनी ओर आने के लिए निश्चित रूप से तेरी अगुआई करूँगा।” यह सुनने के बाद पतरस और भी अधिक उत्साहित हो गया तथा उसे और भी अधिक प्रेरणा मिली, इतनी कि जब वह सलीब पर था, तो यह कहने में समर्थ था : “परमेश्वर! मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता! यहाँ तक कि यदि तू मुझे मरने के लिए कहे, तब भी मैं तुझे पर्याप्त प्यार नहीं कर सकता। तू जहाँ कहीं भी मेरी आत्मा की अगुआई करे, चाहे तू अपनी पिछली प्रतिज्ञाएँ पूरी करे या न करे, इसके बाद तू चाहे जो कुछ भी करे, मैं तुझे प्यार करता हूँ और तुझ पर विश्वास करता हूँ।” जिसे उसने दृढ़ता से थामे रखा, वह उसकी आस्था और सच्चा प्रेम था।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 522
तुम्हें अब स्पष्ट रूप से यह देखना चाहिए कि वास्तव में वह कौन-सा मार्ग था जो पतरस ने पकड़ा था। यदि तुम पतरस के मार्ग को स्पष्ट रूप से देख सको, तो तुम उस कार्य के बारे में निश्चित होगे जो आज किया जा रहा है, इसलिए तुम शिकायत नहीं करोगे या नकारात्मक नहीं होगे, या किसी भी चीज की लालसा नहीं करोगे। तुम्हें उस समय की पतरस की मनोदशा का अनुभव करना चाहिए : वह दुख से व्याकुल था, वह अब भविष्य की कोई संभावना या कोई आशीष नहीं माँगता था और वह सांसारिक प्रसिद्धि, लाभ, खुशी, भाग्य या रुतबे का अनुसरण नहीं करता था; वह केवल सबसे सार्थक जीवन जीने का अनुसरण करता था, जिसमें परमेश्वर के प्रेम का प्रतिदान करना और जो कुछ उसके पास सबसे अधिक अनमोल था उसे परमेश्वर को अर्पण करना शामिल था। तब वह अपने हृदय में संतुष्ट होता। वह प्रायः इन शब्दों में यीशु से प्रार्थना करता था : “प्रभु यीशु मसीह, मैंने एक बार तुझे प्रेम किया था, किंतु मैंने तुझे वास्तव में प्रेम नहीं किया था। यद्यपि मैंने कहा था कि मुझे तुझ पर विश्वास है, किंतु मैंने तुझे कभी सच्चे हृदय से प्रेम नहीं किया। मैंने केवल तेरा आदर किया, तेरी भक्ति की और तुझे याद किया, किंतु मैंने कभी तुझे प्रेम नहीं किया, न ही तुझ पर वास्तव में विश्वास किया।” अपना संकल्प करने के लिए उसने लगातार प्रार्थना की, और वह यीशु के वचनों से हमेशा प्रोत्साहित होता और उनसे प्रेरणा प्राप्त करता। बाद में, एक अवधि तक अनुभव करने के बाद, यीशु ने अपने लिए उसमें और अधिक तड़प पैदा करते हुए उसका परीक्षण किया। उसने कहा, “प्रभु यीशु मसीह! मैं तुझे कितना याद करता हूँ, और तुझे देखने के लिए कितना लालायित रहता हूँ। मुझमें बहुत कमी है और मैं तेरे प्रेम का प्रतिदान नहीं कर सकता। मैं तुझसे प्रार्थना करता हूँ कि मुझे शीघ्र ले जा। तुझे मेरी कब आवश्यकता होगी? तू मुझे कब ले जाएगा? मैं कब एक बार फिर तेरा चेहरा देखूँगा? मैं भ्रष्ट होते रहकर इस देह में अब और नहीं जीना चाहता, न ही अब और विद्रोह करना चाहता हूँ। मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं यथाशीघ्र तुझे समर्पित करने के लिए तैयार हूँ, और अब मैं तुझे और दुखी नहीं करना चाहता।” उसने इसी तरह से प्रार्थना की, किंतु उस समय वह नहीं जानता था कि यीशु उसमें क्या पूर्ण बनाएगा। उसके परीक्षण की पीड़ा के दौरान यीशु पुनः उसके सामने प्रकट हुआ और बोला : “पतरस, मैं तुझे पूर्ण बनाना चाहता हूँ, इस तरह कि तू एक ऐसा फल बन जाए, जो मेरे द्वारा तेरी पूर्णता का ठोस रूप हो और जिसका मैं आनंद लूँगा। क्या तू वास्तव में मेरे लिए गवाही दे सकता है? क्या तूने वह किया, जो मैंने तुझे करने के लिए कहा था? क्या तूने मेरे कहे वचनों को जिया है? तूने एक बार मुझे प्रेम किया, किंतु यद्यपि तूने मुझे प्रेम किया, पर क्या तूने मुझे जिया है? तूने मेरे लिए क्या किया है? तू महसूस करता है कि तू मेरे प्रेम के अयोग्य है, पर तूने मेरे लिए क्या किया है?” पतरस ने देखा कि उसने यीशु के लिए कुछ नहीं किया था और उसने परमेश्वर के लिए अपने जीवन का बलिदान देने की पिछली शपथ याद की। और इसलिए उसने अब और शिकायत नहीं की और बाद में उसकी प्रार्थनाएँ और बेहतर हो गईं। वह यह कहते हुए प्रार्थना करता था : “प्रभु यीशु मसीह! एक बार मैंने तुझे छोड़ा था, और एक बार तूने भी मुझे छोड़ा था। हमने अलग होकर, और साहचर्य में एक-साथ, समय बिताया है। फिर भी तू मुझे अन्य सब से अधिक प्रेम करता है। मैंने बार-बार तेरे विरुद्ध विद्रोह किया है और तुझे बार-बार दुःखी किया है। ऐसी बातों को मैं कैसे भूल सकता हूँ? जो कार्य तूने मुझ पर किया है और जो कुछ तूने मुझे सौंपा है, मैं उसे हमेशा मन में रखता हूँ, और कभी नहीं भूलता। जो कार्य तूने मुझ पर किया है, उसके लिए मैंने वह सब किया है, जो मैं कर सकता हूँ। तू जानता है कि मैं क्या कर सकता हूँ, और तू यह भी जानता है कि मैं क्या भूमिका निभा सकता हूँ। मैं खुद को तेरे आयोजनों की दया पर रखना चाहता हूँ और मेरे पास जो कुछ भी है, वह सब मैं तुझे समर्पित कर दूँगा। केवल तू ही जानता है कि मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ। यद्यपि शैतान ने मुझे बहुत मूर्ख बनाया और मैंने तेरे विरुद्ध विद्रोह किया, किंतु मुझे विश्वास है कि इसके कारण तू मेरे अपराधों को स्मरण नहीं रखता, और कि तू इनके आधार पर मुझसे व्यवहार नहीं करता। मैं अपना संपूर्ण जीवन तुझे समर्पित करना चाहता हूँ। मैं कुछ नहीं माँगता, और न ही मेरी अन्य आशाएँ या योजनाएँ हैं; मैं केवल तेरे इरादों के अनुसार कार्य करना चाहता हूँ और तेरी इच्छा का अनुसरण करना चाहता हूँ। मैं तेरे कड़वे कटोरे में से पीऊँगा और मैं खुद को तेरे आयोजनों की दया पर छोड़ता हूँ।”
तुम लोगों को उस मार्ग के बारे में स्पष्ट होना चाहिए, जिस पर तुम लोग चलते हो; तुम लोगों को उस मार्ग के बारे में स्पष्ट होना चाहिए, जिस पर तुम भविष्य में चलोगे, और इस बारे में भी कि वह क्या है जिसे परमेश्वर पूर्ण बनाएगा, और तुम लोगों को क्या सौंपा गया है। किसी दिन शायद तुम लोगों का परीक्षण होगा और जब वह समय आएगा, तब यदि तुम लोग पतरस के अनुभवों से प्रेरणा प्राप्त करने में समर्थ होगे, तो यह इस बात को दर्शाएगा कि तुम लोग वास्तव में पतरस के मार्ग पर चल रहे हो। अपनी सच्ची आस्था और प्रेम के लिए और परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा के लिए पतरस को परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त हुआ था। और यह उसके हृदय में परमेश्वर के लिए ईमानदारी और ललक ही थी कि परमेश्वर ने उसे पूर्ण बनाया। यदि तुम में वास्तव में पतरस जैसा प्रेम और आस्था है, तो यीशु तुम्हें निश्चित रूप से पूर्ण बनाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस ने यीशु को कैसे जाना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 523
जब परमेश्वर पतरस को ताड़ना दे रहा था, तब पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर! मेरी देह विद्रोही है और तू मुझे ताड़ना देता है और मेरा न्याय करता है। मैं तेरी ताड़ना और न्याय में आनंदित होता हूँ और अगर तू मुझे न भी चाहे, तो भी मैं तेरे न्याय में तेरा पवित्र और धार्मिक स्वभाव देखता हूँ। जब तू मेरा न्याय करता है, तब अगर अन्य लोग तेरे न्याय में तेरा धार्मिक स्वभाव देख सकें, तब मैं संतुष्टि महसूस करता हूँ। अगर तेरा न्याय तेरे स्वभाव को अभिव्यक्त कर सकता है और सभी सृजित प्राणियों को तेरा धार्मिक स्वभाव देखने दे सकता है और अगर यह तुझसे प्रेम करने वाले मेरे हृदय को और शुद्ध बना सकता है ताकि मैं एक ऐसे व्यक्ति की छवि पा सकूँ जो धार्मिक है, तो यह पर्याप्त है। तेरा यह न्याय अच्छा है क्योंकि तेरा अच्छा इरादा ऐसा ही है। मैं जानता हूँ कि अभी भी मेरे भीतर बहुत कुछ ऐसा है जो विद्रोही है और मैं अभी भी तेरे सामने आने के योग्य नहीं हूँ। मैं चाहता हूँ कि तू मेरा और भी अधिक न्याय करे। चाहे तू मुझे प्रतिकूल परिवेशों से गुजारे या महाक्लेशों से, तू चाहे जो भी करे, मैं उसे अनमोल मानता हूँ। तेरा प्यार बहुत गहरा है और मैं बिना किसी शिकायत के तेरे आयोजन की दया पर रहने को तैयार हूँ।” यह परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के बाद का पतरस का ज्ञान है और यह परमेश्वर के प्रति उसके प्रेम की गवाही भी है। अब जबकि तुम लोगों को जीत लिया गया है, वह जीत तुम लोगों में किस प्रकार अभिव्यक्त होती है? कुछ लोग कहते हैं, “मेरी जीत परमेश्वर का असीम अनुग्रह और उत्कर्ष है। अब जाकर मुझे एहसास हुआ कि मनुष्य का जीवन खोखला और निरर्थक है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी मनुष्य भाग-दौड़ करने और बच्चे पैदा कर उन्हें पालने-पोसने में जीवन बिता देता है और अंत में उसके पास कुछ नहीं बचता। आज परमेश्वर द्वारा जीत लिए जाने के बाद ही मैंने देखा है कि इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है; यह सचमुच एक अर्थहीन जीवन है। बेहतर होगा कि मैं मर भी जाऊँ और सब कुछ खत्म हो!” क्या ऐसे लोगों को, जिन पर विजय पाई जा चुकी है, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है? क्या वे नमूने और मॉडल बन सकते हैं? ऐसे लोग नकारात्मकता की मिसाल हैं; उनकी कोई आकांक्षाएँ नहीं हैं, न ही वे अपने-आपको सुधारने के लिए कोई मेहनत करते हैं। हालाँकि वे ऐसा समझते हैं कि उन पर विजय पा ली गई है, फिर भी ऐसे नकारात्मक लोग पूर्ण बनाए जाने के अयोग्य होते हैं। पूर्ण बना दिए जाने के बाद, अपने जीवन का अंत निकट आने पर पतरस ने कहा, “परमेश्वर! अगर मैं कुछ वर्ष और जीवित रहता, तो मैं तेरा और ज्यादा शुद्ध और गहरा प्रेम हासिल करने की कामना करता।” जब वह क्रूस पर चढ़ाया जाने वाला था, तब उसने अपने दिल में प्रार्थना की, “परमेश्वर! अब तेरा समय आ गया है; तूने मेरे लिए जो समय तय किया था वह आ गया है। मुझे तेरे लिए क्रूस पर चढ़ना चाहिए, मुझे तेरे लिए यह गवाही देनी चाहिए और मुझे उम्मीद है कि मेरा प्रेम तेरी अपेक्षा पूरी करेगा और यह और ज्यादा शुद्ध बन सकेगा। आज तेरे लिए जान दे पाना और तेरे लिए क्रूस पर चढ़ाया जाना मुझे सुकून और शांति देता है, क्योंकि मैं तेरे लिए क्रूस पर चढ़ सकता हूँ और तेरी इच्छाएँ पूरी कर सकता हूँ। खुद को तुझे सौंपना और अपना जीवन तुझे अर्पित करना मुझे पूरी तरह से तृप्त कर रहा है। परमेश्वर! तू कितना प्यारा है! अगर तू मुझे जीने देता तो मैं तुझसे और भी अधिक प्रेम करना चाहता। जब तक मैं जीवित हूँ, मैं तुझसे प्रेम करता रहूँगा। मैं तुझसे और गहराई से प्रेम करना चाहता हूँ। तू इसलिए मेरा न्याय करता है, मुझे ताड़ना देता है और मेरा परीक्षण करता है क्योंकि मैं धार्मिक नहीं हूँ, क्योंकि मैंने पाप किया है। और तेरा धार्मिक स्वभाव मेरे लिए और अधिक स्पष्ट होता जाता है। यह मेरे लिए एक आशीष है, क्योंकि मैं तुझे और भी अधिक गहराई से प्रेम करने में सक्षम हूँ। अगर तू मुझसे प्रेम न भी करे तो भी मैं तुझसे इसी तरह से प्रेम करने को तैयार हूँ। मैं तेरा धार्मिक स्वभाव देखने का इच्छुक हूँ, क्योंकि यह मुझे अर्थपूर्ण जीवन जीने के और ज्यादा काबिल बनाता है। मुझे हमेशा लगता है कि अब मेरा जीवन और भी अधिक सार्थक है, क्योंकि मैं तेरी खातिर क्रूस पर चढ़ा हूँ और तेरे लिए मरना सार्थक है। लेकिन मैं अभी भी संतुष्टि महसूस नहीं करता, क्योंकि मैं तेरे बारे में बहुत थोड़ा जानता हूँ, मैं जानता हूँ कि मैं तेरी इच्छाएँ पूर्ण रूप से पूरी नहीं कर सकता और मैंने बदले में तुझे बहुत कम लौटाया है। अपने जीवन में मैं तुझे पूरी तरह से लौटाने में असमर्थ रहा हूँ; मैं उससे बहुत दूर हूँ। इस घड़ी पीछे मुड़कर देखता हूँ तो मैं तेरा बहुत ऋणी महसूस करता हूँ और अपनी सारी गलतियों की भरपाई करने और सारे बकाया प्रेम को चुकाने के लिए मेरे पास यही एक घड़ी है।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 524
सभी लोगों को अर्थपूर्ण जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए और उन्हें अपनी वर्तमान परिस्थितियों से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। उन्हें पतरस की छवि को जीने की स्थिति में आना चाहिए और उनमें पतरस का ज्ञान और उसके अनुभव होने चाहिए। लोगों को उन चीजों का अनुसरण करना चाहिए जो उच्चतर और अधिक गहन हैं। उन्हें परमेश्वर के प्रति एक अधिक गहरे एवं अधिक शुद्ध प्रेम का अनुसरण करना चाहिए और एक ऐसे जीवन का अनुसरण करना चाहिए जिसका कोई मूल्य और अर्थ हो। सिर्फ यही जीवन है; केवल तभी वे पतरस के समान होंगे। तुम्हें सक्रिय रूप से सकारात्मक पक्ष में प्रवेश करने पर ध्यान देना चाहिए और तुम्हें इस कारण नकारात्मक नहीं हो जाना चाहिए और खुद को पीछे नहीं हटने देना चाहिए कि तुम अस्थायी आराम से संतुष्ट हो; साथ ही, तुम्हें अधिक गहन, अधिक विस्तृत और अधिक व्यावहारिक सत्यों की उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। तुम्हारे पास व्यावहारिक प्रेम होना चाहिए और तुम्हें इस पतनशील और बेपरवाह जीवन से खुद को मुक्त करने के लिए हर संभव उपाय ढूँढ़ना चाहिए, जो जानवरों के जीवन से अलग नहीं है। तुम्हें एक सार्थक जीवन, एक मूल्यवान जीवन जीना चाहिए और तुम्हें अपने-आपको मूर्ख नहीं बनाना चाहिए या अपने जीवन को कोई खिलौना नहीं समझना चाहिए, जिसके साथ खेला जा सके। हर उस व्यक्ति के लिए, जिसमें संकल्प है और जो परमेश्वर से प्रेम करता है, कोई भी सत्य अप्राप्य नहीं है और कोई ऐसा न्याय नहीं है जिसके लिए वह मजबूती से खड़ा न हो सके। तुम्हें अपना जीवन कैसे जीना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से कैसे प्रेम करना चाहिए और कैसे इस प्रेम का उपयोग उसके इरादे पूरे करने के लिए करना चाहिए? तुम्हारे जीवन में इससे बड़ा कोई मामला नहीं है। सबसे बढ़कर, तुममें इस तरह का संकल्प और दृढ़ता होनी चाहिए और तुम्हें रीढ़विहीन निर्बल नहीं होना चाहिए। तुम्हें सीखना चाहिए कि एक अर्थपूर्ण जीवन का अनुभव कैसे किया जाए और अर्थपूर्ण सत्यों का अनुभव कैसे किया जाए और उस तरह से अपने साथ लापरवाही से पेश नहीं आना चाहिए। तुम्हें पता भी नहीं चलेगा और तुम्हारा जीवन गुजर जाएगा; उसके बाद भी क्या तुम्हारे पास परमेश्वर से प्रेम करने का ऐसा अवसर होगा? क्या मनुष्य मरने के बाद परमेश्वर से प्रेम कर सकता है? तुम्हारे अंदर वैसा ही संकल्प और जमीर होना चाहिए जैसा पतरस में था; तुम्हें एक अर्थपूर्ण जीवन जीना चाहिए और अपने साथ खिलवाड़ नहीं करना चाहिए। एक मनुष्य के रूप में और एक ऐसे व्यक्ति के रूप में जो परमेश्वर का अनुसरण करता है, तुम्हें सावधानीपूर्वक अपने जीवन पर विचार करना और उससे निपटना चाहिए—इस बात पर विचार करना चाहिए कि तुम्हें अपने-आपको परमेश्वर को कैसे अर्पित करना चाहिए, तुममें परमेश्वर के प्रति और अधिक अर्थपूर्ण आस्था कैसे होनी चाहिए और चूँकि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, इसलिए तुम्हें उससे कैसे उस तरीके से प्रेम करना चाहिए जो ज्यादा शुद्ध, ज्यादा सुंदर और ज्यादा अच्छा हो। आज तुम केवल इस बात से संतुष्ट नहीं हो सकते कि तुम्हें कैसे जीता जाना है, बल्कि तुम्हें यह विचार भी करना चाहिए कि तुम्हारे सामने जो मार्ग है उस पर तुम्हें कैसे चलना चाहिए। तुममें पूर्ण बनाए जाने का संकल्प और साहस होना चाहिए और तुम्हें हमेशा खुद को अक्षम नहीं समझना चाहिए। क्या सत्य लोगों के साथ पक्षपाती तरीके से पेश आ सकता है? क्या सत्य जानबूझकर लोगों का विरोध कर सकता है? अगर तुम सत्य का अनुसरण करते हो तो क्या वह तुम पर हावी हो सकता है? यदि तुम न्याय के लिए अडिग रहते हो तो क्या वह तुम्हें गिरा देगा? अगर जीवन का अनुसरण करना सच में तुम्हारा संकल्प है, तो क्या जीवन तुम्हें मिले बिना रह सकता है? अगर तुम सत्य से रहित हो तो इसका कारण यह नहीं है कि सत्य तुम्हें नजरअंदाज करता है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम सत्य से दूर रहते हो; अगर तुम न्याय के लिए मजबूती से खड़े नहीं हो सकते तो इसका कारण यह नहीं है कि न्याय के साथ कुछ गड़बड़ है, बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम यह मानते हो कि न्याय तथ्यों को तोड़-मरोड़ देता है; अगर बरसों के अनुसरण के बाद भी तुम्हें जीवन प्राप्त नहीं हुआ है तो इसका कारण यह नहीं है कि जीवन तुम्हें कोई जमीर नहीं दिखाता, बल्कि इसका कारण यह है कि तुम जीवन को कोई जमीर नहीं दिखाते और तुमने जीवन को दूर भगा दिया है; अगर तुम रोशनी में जीते हो और फिर भी रोशनी प्राप्त नहीं कर पाए हो तो इसका कारण यह नहीं है कि रोशनी तुम्हें रोशन करने में असमर्थ है, बल्कि यह है कि तुमने रोशनी के अस्तित्व पर कोई ध्यान नहीं दिया है, इसलिए रोशनी चुपचाप तुमसे दूर चली गई है। यदि तुम अनुसरण नहीं करते हो, तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि तुम बेकार का कूड़ा हो और तुममें जीने के साहस का अभाव है और अंधकार की शक्तियों का प्रतिरोध करने का जज्बा नहीं है। तुम बहुत ही कायर हो! तुम शैतान की शक्तियों की घेराबंदी से मुक्त होने में असमर्थ हो और केवल इस तरह की शांति और सुरक्षा में अपना जीवन बिताने और अज्ञानता में मरने के इच्छुक हो। जीत लिए जाने का अनुसरण ही वह चीज है जिसे तुम्हें हासिल करना चाहिए; यह तुम्हारा परम कर्तव्य है। अगर तुम सिर्फ जीत लिए जाने से संतुष्ट हो, तो तुम रोशनी के अस्तित्व को दूर भगा रहे हो। तुम्हें सत्य के लिए कष्ट उठाने चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए खुद को कुर्बान करना चाहिए, तुम्हें सत्य के लिए अपमान सहना चाहिए और तुम्हें और अधिक सत्य प्राप्त करने की खातिर और अधिक कष्ट सहना चाहिए। यही है जो तुम्हें करना चाहिए। पारिवारिक सामंजस्य का आनंद लेने की खातिर तुम्हें सत्य का त्याग नहीं करना चाहिए और तुम्हें अस्थायी आनंद के लिए जीवन भर की गरिमा और सत्यनिष्ठा नहीं गँवानी चाहिए। तुम्हें उस सबका अनुसरण करना चाहिए जो खूबसूरत और अच्छा है और तुम्हें जीवन में एक ऐसे मार्ग का अनुसरण करना चाहिए जो ज्यादा अर्थपूर्ण है। अगर तुम ऐसा साधारण और सांसारिक जीवन जीते हो और तुम्हारे पास अनुसरण करने के लिए कोई लक्ष्य नहीं है, तो क्या यह अपना जीवन बर्बाद करना नहीं है? ऐसे जीवन से तुम क्या पा सकते हो? तुम्हें एक सत्य के लिए देह के सभी सुख त्याग देने चाहिए और थोड़े-से सुख के लिए सारे सत्य नहीं छोड़ने चाहिए। ऐसे लोगों में कोई सत्यनिष्ठा या गरिमा नहीं होती; उनके होने का कोई अर्थ नहीं है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 525
परमेश्वर मनुष्य का न्याय करता है और उसे ताड़ना देता है क्योंकि यह उसके कार्य की माँग है, और इससे भी बढ़कर, मनुष्य को इसकी आवश्यकता भी है। मनुष्य को ताड़ना दिए जाने और उसका न्याय किए जाने की आवश्यकता है, तभी वह परमेश्वर से प्रेम कर सकता है। आज, तुम लोग पूरी तरह से आश्वस्त हो चुके हो, लेकिन जैसे ही थोड़ी-सी मुश्किल आती है, तो तुम परेशान हो जाते हो; तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी बहुत छोटा है, और गहरा ज्ञान प्राप्त करने के लिए तुम लोगों को अभी भी ऐसी ताड़ना और न्याय का अधिक अनुभव करने की आवश्यकता है। आज, तुम लोगों के पास थोड़ा-बहुत परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय है, और तुम परमेश्वर से डरते हो, और जानते हो कि वह सच्चा परमेश्वर है, परंतु तुम लोगों में उसके लिए ज्यादा प्रेम नहीं है, और तुमने उससे शुद्ध प्रेम तो किया ही नहीं है; तुम लोगों का ज्ञान बहुत ही सतही है, और तुम्हारा आध्यात्मिक कद अभी भी कम है। जब तुम लोग सचमुच किसी माहौल का सामना करते हो, तो तुम अब तक गवाही नहीं दे सके हो, तुममें सकारात्मक प्रवेश बहुत कम है, और तुममें अभ्यास करने की कोई समझ नहीं है। अधिकतर लोग नकारात्मक और निष्क्रिय होते हैं; वे केवल गुप्त रूप से अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करते हैं, किंतु उनके पास अभ्यास का कोई तरीका नहीं होता, न ही वे अपने लक्ष्यों को लेकर स्पष्ट होते हैं। पूर्ण बनाए गए लोगों में न केवल सामान्य मानवता होती है, बल्कि उनमें ऐसे सत्य होते हैं जो अंतरात्मा के मापदंडों से बढ़कर होते हैं, और जो अंतरात्मा के मानकों से ऊँचे हैं। वे परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल देने के लिए न केवल अपनी अंतरात्मा का इस्तेमाल करते हैं, बल्कि, वे परमेश्वर को जान चुके होते हैं, यह देख चुके होते हैं कि परमेश्वर प्रिय है, कि वह मनुष्य के प्रेम के योग्य है और परमेश्वर में प्रेम करने योग्य बहुत कुछ है और मनुष्य उसे प्रेम किए बिना नहीं रह सकता। वे लोग जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है उनका परमेश्वर के लिए प्रेम उनके व्यक्तिगत संकल्प को पूरा करने के लिए है। उनका प्रेम स्वैच्छिक है, एक ऐसा प्रेम जो बदले में कुछ भी नहीं चाहता, और जो सौदेबाज़ी नहीं है। परमेश्वर से उनके प्रेम का कारण उसके बारे में उनके ज्ञान को छोड़कर और कुछ भी नहीं है। ऐसे लोग यह परवाह नहीं करते कि परमेश्वर उन पर अनुग्रह करेगा कि नहीं, और वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के सिवा और किसी भी चीज से तृप्त नहीं होते हैं। वे परमेश्वर से शर्तों पर मोल-भाव नहीं करते, न ही वे परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम को अंतरात्मा से मापते हैं : “तुमने मुझे दिया है, तो उसके बदले में मैं तुमसे प्रेम करता हूँ; यदि तुम मुझे कुछ नहीं देते, तो बदले में मेरे पास भी तुम्हें देने के लिए कुछ नहीं है।” जिन्हें पूर्ण बनाया गया है, वे हमेशा यह विश्वास करते हैं : “परमेश्वर सृष्टिकर्ता है, और वह हम पर यह कार्य करता है। चूँकि मेरे पास पूर्ण बनाए जाने का यह अवसर, परिस्थिति और योग्यता है, इसीलिए एक अर्थपूर्ण जीवन बिताना ही मेरा लक्ष्य होना चाहिए, और मुझे परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।” यह बिल्कुल वैसा ही है जैसा पतरस ने अनुभव किया था : जब वह सबसे कमजोर स्थिति में था, तब उसने प्रार्थना की और कहा, “परमेश्वर! तू जानता है कि समय और स्थान चाहे कोई भी हो, मुझे हमेशा तेरी याद आती है और चाहे कोई भी समय और स्थान हो, मैं तुझसे प्रेम करना चाहता हूँ, परंतु मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मैं बहुत कमजोर और शक्तिहीन हूँ, मेरा प्रेम बहुत-सीमित है, और तेरे प्रति मेरी सत्यनिष्ठा बहुत कम है। तेरे प्रेम की तुलना में, मैं जीने के योग्य भी नहीं हूँ। मैं केवल यही कामना करता हूँ कि मेरा जीवन व्यर्थ न हो, और मैं न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल दे सकूँ, बल्कि, इसके अतिरिक्त जो कुछ भी मेरे पास है वह सब तुझे समर्पित कर सकूँ। यदि मैं तुझे संतुष्ट कर सकूँ, तो एक सृजित प्राणी के नाते, मेरे मन में शांति होगी, और मैं कुछ और नहीं माँगूंगा। यद्यपि अभी मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तेरे निर्देश नहीं भूलूंगा, और मैं तेरे प्रेम को नहीं भूलूंगा। अभी तो मैं बस तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के सिवा कुछ और नहीं कर रहा हूँ। परमेश्वर, मुझे बहुत बुरा लग रहा है! मेरे हृदय में तेरे लिए जो प्रेम है उसे मैं तुझे वापस कैसे लौटा सकता हूँ, मेरी क्षमता में जो भी है उसे मैं कैसे कर सकता हूँ, मैं तेरी इच्छाओं को पूरा करने के योग्य कैसे बन सकता हूँ, और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब कुछ तुझे भेंट चढ़ाने के योग्य कैसे बन सकता हूँ? तू मनुष्य की कमजोरी को जानता है; मैं तेरे प्रेम के काबिल कैसे हो सकता हूँ? परमेश्वर! तू जानता है कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, मेरा प्रेम बहुत थोड़ा-सा है। इस प्रकार के परिवेश में मैं अपनी क्षमतानुसार सर्वोत्तम कैसे कर सकता हूँ? मैं जानता हूँ कि मुझे तेरे प्रेम का प्रतिफल देना चाहिए, मैं जानता हूँ कि मुझे वह सब कुछ देना चाहिए जो मेरे पास है, परंतु आज मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है। मैं तुझसे विनती करता हूँ कि तू मुझे सामर्थ्य और आस्था दे, ताकि मैं तुझे शुद्ध प्रेम समर्पित करने और जो कुछ भी मेरे पास है, वह सब तुझे अर्पित करने में और अधिक सक्षम हो जाऊँ और न केवल तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के योग्य हो जाऊँ, बल्कि इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं तेरी ताड़ना, न्याय, परीक्षणों और यहाँ तक कि अधिक गंभीर शापों का अनुभव करने में भी अधिक सक्षम हो जाऊँ। तूने मुझे अपना प्रेम दिखा दिया, और मैं ऐसा नहीं कर सकता कि तुझसे प्रेम न करूँ। आज भले ही मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ, फिर भी मैं तुझे कैसे भूल सकता हूँ? तेरे प्रेम, ताड़ना और न्याय से मैंने तुझे जाना है, फिर भी तेरे प्रेम की पूर्ति करने में मैं खुद को असमर्थ पा रहा हूँ, क्योंकि तू इतना महान है। जो कुछ मेरे पास है, वह सब कुछ मैं सृष्टिकर्ता को कैसे अर्पित कर सकता हूँ?” पतरस की विनती ऐसी थी, फिर भी उसमें आध्यात्मिक कद का अभाव था। उस क्षण, उसने ऐसा महसूस किया मानो एक कटार उसके हृदय के आर-पार हो गई हो। वह अत्यंत दुखी था; वह नहीं जानता था कि ऐसी स्थितियों में क्या करना चाहिए। फिर भी वह लगातार प्रार्थना करता रहा : “परमेश्वर! मनुष्य का आध्यात्मिक कद एक बच्चे जैसा है, उसकी अंतरात्मा बहुत कमजोर है, और एकमात्र ऐसी चीज जो मैं कर सकता हूँ वह है तेरे प्रेम का प्रतिफल देना। आज, मैं नहीं जानता कि तेरे इरादों को कैसे पूरा करूँ और मैं बस वह सब करना चाहता हूँ जो मैं कर सकता हूँ, वह सब तुझे देना चाहता हूँ जो मेरे पास है और अपना सब कुछ तुझे अर्पित कर देना चाहता हूँ। तेरे न्याय के बावजूद, तेरी ताड़ना के बावजूद, इसके बावजूद कि तू मुझे चीजें प्रदान करता है या मुझसे चीजें छीन लेता है, कृपया मुझे तेरे प्रति जरा-सी भी शिकायत से मुक्त कर दे। कई बार, जब तूने मुझे ताड़ना दी और मेरा न्याय किया, तो मेरे अंदर हमेशा से शिकायतें रहीं और मैं शुद्ध नहीं हो पाता था या तेरी इच्छाओं को संतुष्ट नहीं कर पाता था। मैंने मजबूरी में ही तेरे प्रेम का प्रतिफल दिया था, और इस क्षण मैं अपने-आपसे और भी अधिक नफरत कर रहा हूँ।” चूँकि पतरस परमेश्वर से अधिक शुद्ध प्रेम करने का प्रयास कर रहा था, इसलिए उसने ऐसी प्रार्थना की थी। वह खोज रहा था और विनती कर रहा था, इससे भी बढ़कर, वह खुद को दोष दे रहा था, परमेश्वर के सामने अपने पापों को स्वीकार कर रहा था। उसने महसूस किया कि वह परमेश्वर का ऋणी है, उसे अपने-आपसे नफरत होने लगी, लेकिन वह थोड़ा उदास और नकारात्मक भी था। उसे हमेशा ऐसा महसूस होता था, मानो वह परमेश्वर के इरादों पर खरा नहीं उतरता और वह अपना सर्वोत्तम देने में असमर्थ है। ऐसी स्थितियों में भी पतरस ने अय्यूब की आस्था का अनुसरण किया। उसने देखा था कि अय्यूब की आस्था कितनी बड़ी थी, क्योंकि अय्यूब ने जान लिया था कि उसका सब कुछ परमेश्वर का दिया हुआ है, और अगर परमेश्वर सब कुछ वापस ले लेता है तो यह स्वाभाविक ही है, परमेश्वर जिसको चाहेगा उसको देगा—ऐसा था परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव। अय्यूब ने कोई शिकायत नहीं की थी, और वह तब भी परमेश्वर की स्तुति कर रहा था। पतरस भी अपने-आपको जानता था, उसने मन ही मन प्रार्थना की, “आज अपनी अंतरात्मा का इस्तेमाल करके और तेरे प्रेम का बदला चुका कर मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, मैं तुझे चाहे जितना प्रेम वापस लौटाऊँ उससे भी मुझे संतुष्ट नहीं होना चाहिए, क्योंकि मेरे विचार बहुत ही भ्रष्ट हैं, और मैं तुझे सृष्टिकर्ता के रूप में देख पाने में असमर्थ हूँ। क्योंकि मैं अभी भी तुझसे प्रेम करने योग्य नहीं हूँ, मुझे वह सब कुछ तुझे समर्पित कर देना होगा जो मेरे पास है और वह भी खुशी से; मुझे वह सब कुछ जानना होगा जो तूने किया है, और मैं अपने कोई विकल्प नहीं चुनूँगा, मुझे तेरे प्रेम को देखना होगा, और तेरी स्तुति करने और तेरे पवित्र नाम का गुणगान करने में सक्षम होना होगा, ताकि तू मेरे जरिए महान महिमा प्राप्त कर सके। मैं तेरे लिए इस गवाही में अडिग रहने को तैयार हूँ। परमेश्वर! तेरा प्रेम कितना अनमोल और सुंदर है; मैं उस बुरे के हाथों में जीने को कैसे तैयार रह सकता हूँ? क्या मुझे तूने नहीं बनाया? मैं शैतान की सत्ता के अधीन कैसे रह सकता हूँ? मैं उस दुष्ट की सत्ता के अधीन रहने के बजाय अपने समूचे अस्तित्व के साथ तेरी ताड़नाओं के बीच रहना चाहूँगा। जब तक मुझे शुद्ध बनाया जा सके तो मैं अपना तन और हृदय तेरे न्याय और ताड़ना की भेंट चढ़ाने को तैयार हूँ, और मैं अपना सब कुछ तुझे अर्पित कर सकता हूँ क्योंकि मैं शैतान से घृणा करता हूँ, मैं उसकी सत्ता के अधीन जीने को तैयार नहीं हूँ। मेरा न्याय करके तू अपना धार्मिक स्वभाव अभिव्यक्त करता है; मैं पूरी तरह तैयार हूँ और मुझे जरा-सी भी शिकायत नहीं है। जब तक मैं एक सृजित प्राणी होने का कर्तव्य अच्छे से निभा सकूँ, तो मैं तैयार हूँ कि मेरे संपूर्ण जीवन में तेरे न्याय का साथ रहे, और उससे मैं तेरे धार्मिक स्वभाव को जान लूँ और उस दुष्ट के प्रभाव से अपने-आपको छुड़ा लूँ।” पतरस ने हमेशा इस प्रकार प्रार्थना की, हमेशा इस प्रकार ही खोज की और वह एक अपेक्षाकृत ऊँचे स्तर पर पहुँच गया। वह न केवल परमेश्वर के प्रेम का प्रतिफल दे पाया, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि उसने एक सृजित प्राणी के तौर पर भी अपना कर्तव्य निभाया। न केवल उसकी अंतरात्मा ने उसे दोषी नहीं ठहराया, बल्कि वह अंतरात्मा के मानकों से भी ऊँचा उठ सका। उसकी प्रार्थनाएँ लगातार परमेश्वर तक पहुँचती रहीं, कुछ इस तरह कि उसके संकल्प और भी बड़े हो गए, और उसका परमेश्वर-प्रेमी हृदय निरंतर बढ़ता गया। यद्यपि उसने भयानक पीड़ा सही, फिर भी वह परमेश्वर से प्रेम करना नहीं भूला, और फिर भी उसने परमेश्वर के इरादों को समझने की क्षमता प्राप्त करने का प्रयास किया। अपनी प्रार्थनाओं में उसने ये बातें कहीं : “तेरे प्रेम का प्रतिफल देने के अलावा मैंने और कुछ नहीं किया है। मैंने शैतान के सामने तेरे लिए गवाही नहीं दी है, मैंने अपने-आपको शैतान के प्रभाव से आजाद नहीं किया है, और मैं अब भी देह में ही जी रहा हूँ। मैं अपने प्रेम का इस्तेमाल करके शैतान को हराने की, उसे लज्जित करने की और इस प्रकार तेरे इरादे पूरे करने की कामना कर रहा हूँ। मैं तुझे अपना सर्वस्व अर्पित करना चाहता हूँ, मैं अपना थोड़ा-सा भी अंश शैतान को नहीं देना चाहता, क्योंकि शैतान तेरा शत्रु है।” उसने इस दिशा में जितना ज्यादा प्रयास किया, उतना ही ज्यादा वह भावनात्मक रूप से प्रभावित हुआ और उतना ही ज्यादा इन मामलों का उसका ज्ञान होता गया। इसका अहसास किए बिना ही, उसे यह ज्ञान हो गया कि उसे अपने-आपको शैतान के प्रभाव से मुक्त कर लेना चाहिए और खुद को पूरी तरह से परमेश्वर को दे देना चाहिए। वह ऐसे स्तर तक पहुँच गया था। वह शैतान के प्रभाव से ऊपर उठ रहा था और वह देह के आनंद और उसकी पसंद से अपने-आपको मुक्त कर रहा था, वह परमेश्वर की ताड़ना और न्याय दोनों को और अधिक गंभीरता से अनुभव करने को तैयार था। उसने कहा, “यद्यपि मैं तेरी ताड़ना और तेरे न्याय के बीच रहता हूँ, यह चाहे कितना ही कष्टदायक क्यों न हो, फिर भी मैं शैतान की सत्ता के अधीन जीने का इच्छुक नहीं हूँ, फिर भी मैं शैतान द्वारा मूर्ख बनाया जाने वाला जीवन जीने का इच्छुक नहीं हूँ। मैं तेरे अभिशाप के बीच जीने को खुशी मानता हूँ और शैतान के आशीषों के बीच जीने को पीड़ा मानता हूँ। तेरे न्याय के बीच जीते हुए मैं तुझसे प्रेम करता हूँ और यह मुझे अत्यंत आनंद से भर देता है। तेरी ताड़ना और न्याय धार्मिकता और पवित्रता हैं; ये मुझे शुद्ध करने और इससे भी बढ़कर मुझे बचाने के लिए हैं। मैं एक पल भी शैतान की सत्ता के अधीन रहने के बजाय अपना सारा जीवन तेरे न्याय में बिताना और तेरी देखरेख पाना पसंद करूँगा। मैं तेरे द्वारा शुद्ध होना चाहता हूँ; भले ही मुझे दुख भोगना पड़े, मैं शैतान से शोषित होने और मूर्ख बनने को तैयार नहीं हूँ। मुझ सृजित प्राणी को तेरे द्वारा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, तेरा हो जाना चाहिए; मेरा न्याय भी तेरे द्वारा किया जाना चाहिए, तेरे द्वारा मुझे ताड़ना दी जानी चाहिए, यहाँ तक कि तेरे द्वारा शापित भी किया जाना चाहिए। जब तू मुझे आशीष देने की इच्छा करता है तो मेरा हृदय प्रसन्न हो उठता है, क्योंकि मैं तेरे प्रेम को देख चुका हूँ। तू सृष्टिकर्ता है और मैं एक सृजित प्राणी हूँ : तुझसे विश्वासघात कर मुझे शैतान की सत्ता के अधीन नहीं रहना चाहिए, न ही मुझे शैतान के हाथों शोषित होना चाहिए। शैतान के लिए जीने के बजाय मुझे तेरा घोड़ा या बैल बन जाना चाहिए। मैं दैहिक सुख के बिना तेरी ताड़ना में रहकर जीना ज्यादा पसंद करूँगा, और इसमें मुझे सुख मिलेगा, फिर भले ही मैं तेरा अनुग्रह गँवा दूँ। हालाँकि तेरा अनुग्रह मेरे साथ नहीं होगा, फिर भी मैं अब भी तेरी ताड़ना और न्याय से आनन्द हासिल करूँगा। यह तेरा सर्वोत्तम आशीष है, तेरा सबसे बड़ा अनुग्रह है। हालाँकि तू हमेशा प्रतापी और मेरे प्रति रोषपूर्ण रहा है, फिर भी मैं तुझे छोड़ने में सक्षम नहीं हूँ, मैं तुझसे पर्याप्त प्रेम नहीं कर पा रहा हूँ। मैं तेरे घर में रहना पसंद करूँगा, मैं तेरे द्वारा शापित किया जाना और ताड़ना दिया जाना, और तेरे द्वारा प्रहार किया जाना पसंद करूँगा, बनिस्बत शैतान की सत्ता के अधीन रहकर जीने के या केवल देह के लिए भाग-दौड़ करने और व्यस्त रहने के, सिर्फ देह के लिए जीने की तो बात ही छोड़ दो।” पतरस का प्रेम पवित्र प्रेम था। यह पूर्ण बनाए जाने का अनुभव है, यह पूर्ण बनाए जाने का सर्वोच्च स्तर है; और इससे अधिक सार्थक जीवन नहीं हो सकता। उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार किया, उसने परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को सँजोया, और पतरस में इससे अधिक मूल्यवान और कुछ भी नहीं था। उसने कहा, “शैतान मुझे भौतिक सुख देता है, परंतु मैं इन सुखों को नहीं सँजोता। मुझ पर परमेश्वर की ताड़ना और न्याय आते हैं—मैं इसे अनुग्रह, आनंद का स्रोत और आशीष समझता हूँ। यदि परमेश्वर का न्याय न होता, तो मैं परमेश्वर से कभी प्रेम न कर पाता, मैं अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन ही जी रहा होता और अब भी शैतान के ही नियंत्रण में और उसी की गिरफ्त में होता। यदि ऐसा होता, तो मैं कभी भी एक सच्चा इंसान न बन पाता, क्योंकि मैं परमेश्वर को संतुष्ट न कर पाता और अपना सर्वस्व परमेश्वर को समर्पित करने में सक्षम न होता। भले ही परमेश्वर मुझे आशीष न दे, और मुझे बिना किसी भीतरी सुख के इसी तरह छोड़ दे, मानो एक आग मेरे भीतर जल रही हो, और बिना किसी शांति या आनंद के छोड़ दे, भले ही परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन कभी मुझसे दूर नहीं हुआ, फिर भी मैं परमेश्वर की ताड़ना और न्याय में उसके धार्मिक स्वभाव को देख पाता हूँ। मैं इसी में आनंदित हूँ; जीवन में इससे बढ़कर कोई मूल्यवान और अर्थपूर्ण बात नहीं है। यद्यपि उसकी सुरक्षा और देखभाल क्रूर ताड़ना, न्याय, शाप और प्रहार बन चुके हैं, फिर भी मैं इन चीजों में आनंदित होता हूँ, क्योंकि वे मुझे बेहतर ढंग से शुद्ध कर सकते हैं, बदल सकते हैं, मुझे परमेश्वर के नजदीक लाकर, परमेश्वर से और अधिक प्रेम करने योग्य बना सकते हैं, परमेश्वर के प्रति मेरे प्रेम को और अधिक शुद्ध कर सकते हैं। यह मुझे इस योग्य बनाता है कि मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभा सकूँ, यह मुझे परमेश्वर के सामने और शैतान के प्रभाव से दूर ले जाता है, और यह सुनिश्चित करता है कि मैं अब शैतान की सेवा न करूँ। जब मैं शैतान की सत्ता के अधीन जीवन नहीं बिताऊँगा, बिना कुछ अपने पास रखे, अपना सब कुछ जो मेरे पास है और वह सब कुछ जो मैं कर सकूँ, उसे परमेश्वर को अर्पित करने योग्य हो जाऊँगा—तभी मैं पूरी तरह से संतुष्ट होऊँगा। मुझे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ने ही बचाया है, मेरे जीवन को परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से अलग नहीं किया जा सकता। मेरे लिए पृथ्वी पर जीना बिल्कुल शैतान की सत्ता के अधीन जीने जैसा है, और यदि मुझे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय की देखभाल और सुरक्षा न मिली होती, तो मैं हमेशा शैतान की सत्ता के अधीन ही जीवन बिताता, और इससे भी बढ़कर, तब मेरे पास न तो सार्थक जीवन जीने का अवसर होता, न ही कोई साधन होता। जब परमेश्वर की ताड़ना और न्याय मुझे कभी नहीं छोड़ते और मुझे परमेश्वर द्वारा निरंतर शुद्ध करने में सक्षम बनाते हैं और परमेश्वर के कठोर वचन, धार्मिक स्वभाव और प्रतापी न्याय मेरे साथ होते हैं, तभी मैं सर्वोच्च सुरक्षा हासिल करता हूँ और रोशनी में रहने लगता हूँ और परमेश्वर का आशीष हासिल करता हूँ। परमेश्वर द्वारा शुद्ध हो पाना, अपने-आपको शैतान से मुक्त करा पाना और परमेश्वर के प्रभुत्व के अधीन जी पाना—यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा आशीष है।” यह वह महानतम ऊँचाई है जहाँ पतरस अपने अनुभवों में पहुँचा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 526
मनुष्य देह के बीच रहता है, जिसका मतलब है कि वह एक मानवीय नरक में रहता है और परमेश्वर के न्याय और ताड़ना के बगैर मनुष्य शैतान के समान ही गंदा है। मनुष्य पवित्र कैसे हो सकता है? पतरस मानता था : परमेश्वर द्वारा ताड़ना और न्याय मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ सुरक्षा और सबसे बड़ा अनुग्रह है। परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से ही मनुष्य जाग सकता है और देह से घृणा कर सकता है, शैतान से घृणा कर सकता है। परमेश्वर का कठोर अनुशासन मनुष्य को शैतान के प्रभाव से मुक्त करता है, उसे अपने खुद के छोटे-से संसार से मुक्त करता है और उसे परमेश्वर के मुखमंडल के प्रकाश में जीने देता है। ताड़ना और न्याय से बेहतर उद्धार कोई नहीं है! पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर! जब तक तू मुझे ताड़ना देता रहेगा और मेरा न्याय करता रहेगा, मुझे पता होगा कि तूने मुझे नहीं छोड़ा है। भले ही तू मुझे आनंद या शांति न दे, और मुझे कष्ट में रहने दे, और मुझे अनगिनत ताड़नाओं से अनुशासित करे, किंतु जब तक तू मुझे छोड़ेगा नहीं, तब तक मेरा हृदय सुकून में रहेगा। आज, तेरी ताड़ना और न्याय मेरी बेहतरीन सुरक्षा और महानतम आशीष बन गए हैं। जो अनुग्रह तू मुझे देता है वह मेरी सुरक्षा करता है। आज तू मुझ पर अनुग्रह बरसाता है और यह अनुग्रह तेरे धार्मिक स्वभाव का प्रकाशन है, और यह ताड़ना और न्याय है; और भी ज्यादा यह एक परीक्षण और एक कष्टों भरा जीवन है।” पतरस देह के सुख त्याग पाया और एक ज्यादा गहरा प्रेम और ज्यादा बड़ी सुरक्षा खोज पाया क्योंकि उसने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से बहुत सारा अनुग्रह हासिल कर लिया था। अगर मनुष्य अपने जीवन में शुद्ध किया जाना और अपने स्वभाव में बदलाव लाना चाहता है, यदि वह एक सार्थक जीवन जीना चाहता है और एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाना चाहता है तो उसे परमेश्वर की ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए, उसे परमेश्वर के अनुशासन और प्रहार को अपने से दूर नहीं होने देना चाहिए, ताकि वह खुद को शैतान की चालाकी और प्रभाव से मुक्त कर सके और परमेश्वर के प्रकाश में जी सके। यह जान लो कि परमेश्वर की ताड़ना और न्याय प्रकाश है, मनुष्य के उद्धार का प्रकाश है और मनुष्य के लिए इससे बेहतर कोई आशीष नहीं है, इससे और बड़ा अनुग्रह या बेहतर सुरक्षा नहीं है। मनुष्य शैतान के प्रभाव में जीता है और देह में अस्तित्वमान रहता है; यदि उसे शुद्ध न किया जाए और उसे परमेश्वर की सुरक्षा प्राप्त न हो, तो वह और भी ज्यादा भ्रष्ट हो जाएगा। यदि वह परमेश्वर से प्रेम करना चाहता है, तो उसे शुद्ध होना और उद्धार पाना होगा। पतरस ने प्रार्थना की, “परमेश्वर, जब तू मुझ पर दया दिखाता है तो मैं प्रसन्न हो जाता हूँ, और मुझे सुकून मिलता है; जब तू मुझे ताड़ना देता है, तब मुझे और भी ज्यादा सुकून और आनंद मिलता है। यद्यपि मैं कमजोर हूँ और मैंने अकथनीय कष्ट सहे हैं, यद्यपि मेरी आँखों में आँसू और मन में दुख है, लेकिन तू जानता है कि यह दुख मेरे विद्रोहीपन और मेरी कमजोरी के कारण है। मैं रोता हूँ क्योंकि मैं तेरा इरादा पूरा नहीं कर सकता हूँ, मैं दुख और पछतावा इसलिए महसूस करता हूँ क्योंकि मैं तेरी अपेक्षाओं के लिए अपर्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस स्तर तक पहुँचने का इच्छुक हूँ, मैं तुझे संतुष्ट करने के लिए सब कुछ करने का इच्छुक हूँ। तेरी ताड़ना ने मेरी सुरक्षा का काम किया है, और मेरे लिए श्रेष्ठतम उद्धार का काम किया है; तेरा न्याय तेरी सहनशीलता और धीरज से बढ़कर है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर, मैं तेरी दया और करुणा का आनंद नहीं ले पाऊँगा। आज, मैं और भी अधिक देख रहा हूँ कि तेरा प्रेम स्वर्ग से भी ऊँचा उठकर अन्य सभी चीजों पर छा गया है। तेरा प्रेम मात्र दया और करुणा नहीं है; बल्कि उससे भी बढ़कर, यह ताड़ना और न्याय है। तेरी ताड़ना और न्याय से मैंने इतना अधिक हासिल किया है। तेरी ताड़ना और न्याय के बगैर एक भी व्यक्ति शुद्ध नहीं होगा और एक भी व्यक्ति सृष्टिकर्ता के प्रेम को अनुभव नहीं कर पाएगा। यद्यपि मैंने सैकड़ों परीक्षण और क्लेश सहे हैं, यहाँ तक कि मैं मौत से भी बाल-बाल बचा हूँ, फिर भी इन्होंने मुझे वाकई तुझे जानने और असीम उद्धार प्राप्त करने दिया है। यदि तेरी ताड़ना, न्याय और अनुशासन मुझसे दूर हो गए होते, तो मैं अंधकार में शैतान की सत्ता के अधीन जी रहा होता। मनुष्य की देह का क्या लाभ है? यदि तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़कर चले जाएँ तो यह ऐसा होगा मानो तेरे आत्मा ने मुझे छोड़ दिया हो, मानो अब से तू मेरे साथ न हो। यदि ऐसा हो जाता तो मैं कैसे जीता रह पाता? तूने मुझे बीमारी दी और मेरी स्वतंत्रता छीन ली, मैं जीते रहने में सक्षम था, परंतु अगर तेरी ताड़ना और न्याय मुझे छोड़ दें तो मेरे पास जीने का कोई रास्ता न होगा। यदि मेरे पास तेरी ताड़ना और न्याय न होता तो मैं तेरे प्रेम को खो चुका होता, तेरा प्रेम जो इतना गहरा है कि मैं इसे शब्दों में बयाँ नहीं कर सकता। तेरे प्रेम के बिना, मैं शैतान की सत्ता के अधीन जी रहा होता, और तेरे महिमामय मुखड़े को न देख पाता। मैं कैसे जीवित रह पाता? मैं ऐसे अंधकार में, ऐसे जीवन में मुश्किल से ही जी पाता। मेरे साथ तेरे होने का अर्थ है कि मैं तुझे देख रहा हूँ, तो मैं तुझे कैसे छोड़ सकता हूँ? मैं तुझसे पूरी ईमानदारी से विनती करता हूँ, याचना करता हूँ, तू मेरी सबसे बड़ी सांत्वना मत छीन, भले ही ये तेरे सांत्वना देने वाले वचनों की बस एक फुहार ही हो। मैंने तेरे प्रेम का आनंद लिया है, और आज मैं तुझसे दूर नहीं रह सकता; मैं तुझसे कैसे प्रेम न करूँ? मैंने तेरे प्रेम के कारण दुख में बहुत आँसू बहाए हैं, फिर भी हमेशा यही लगा है कि इस तरह का जीवन अधिक अर्थपूर्ण है, मुझे समृद्ध बनाने में अधिक सक्षम है, मुझे बदलने में अधिक सक्षम है, और वह सत्य हासिल करने में अधिक सक्षम है जो सृजित प्राणियों के पास होना चाहिए।”
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 527
मनुष्य का सारा जीवन शैतान की सत्ता के अधीन बीतता है और एक भी ऐसा इंसान नहीं है जो अपने बलबूते खुद को शैतान के प्रभाव से आजाद कर सके। सब एक मलिन संसार में, भ्रष्टता और खोखलेपन में जीते हैं, जिसमें लेशमात्र भी अर्थ या मूल्य नहीं होता है; वे देह के लिए, वासना के लिए और शैतान के लिए ऐसा बेफिक्र जीवन जीते हैं। उनके अस्तित्व का कोई मूल्य नहीं है। मनुष्य उस सत्य को खोज पाने में असमर्थ है जो उसे शैतान के प्रभाव से मुक्त कर दे। भले ही मनुष्य परमेश्वर में विश्वास करता है और बाइबल पढ़ता है, फिर भी वह यह नहीं समझ पाता कि अपने आपको शैतान के प्रभाव के नियंत्रण से कैसे मुक्त करे। विभिन्न युगों के दौरान बहुत ही कम लोगों ने इस रहस्य को जाना है, बहुत ही कम लोगों ने इसे भली-भाँति समझा है। ऐसे में यद्यपि मनुष्य शैतान और देह से घृणा करता है, फिर भी वह नहीं जानता कि अपने आपको शैतान के हानिकारक प्रभाव से कैसे छुड़ाए। क्या आज भी तुम लोग शैतान की सत्ता के अधीन नहीं हो? तुम लोग अपने विद्रोही कार्यों पर पछताते नहीं हो, और यह तो बिल्कुल भी महसूस नहीं करते कि तुम अशुद्ध और विद्रोही हो। परमेश्वर का विरोध करके भी तुम लोगों को मन की शांति मिलती है और तुम्हें शांतचित्तता का एहसास होता है। क्या तुम्हारी यह शांतचित्तता इसलिए नहीं है क्योंकि तुम भ्रष्ट हो? क्या शांति का यह भाव तुम्हारे विद्रोहीपन से नहीं उपजता? मनुष्य एक मानवीय नरक में रहता है, वह शैतान के अंधेरे प्रभाव में रहता है; पूरी धरती पर, प्रेत मनुष्य के साथ-साथ जीते हैं, और मनुष्य की देह का क्षरण करते हैं। पृथ्वी पर तुम किसी सुंदर स्वर्गलोक में नहीं रहते। जहाँ तुम रहते हो वह दानवों का संसार है, एक मानवीय नरक है, अधोलोक है। यदि मनुष्य को शुद्ध न किया जाए तो वह मलिनता का है; यदि परमेश्वर द्वारा उसकी सुरक्षा और देखभाल न की जाए तो वह अभी भी शैतान का बंदी ही है; यदि उसका न्याय और उसकी ताड़ना नहीं की जाए तो वह शैतान के अंधकारमय प्रभाव के दमन से बचने में और भी कम सक्षम होगा। तुम जो भ्रष्ट स्वभाव दिखाते हो और जिस विद्रोही व्यवहार को जीते हो, वे यह साबित करने के लिए काफी हैं कि तुम अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जी रहे हो। यदि तुम्हारे मन और विचारों को शुद्ध नहीं किया गया है और यदि तुम्हारे स्वभाव का न्याय और ताड़ना नहीं हुए हैं तो तुम्हारा पूरा अस्तित्व अभी भी शैतान की सत्ता की पकड़ में है, तुम्हारा मन शैतान के द्वारा नियंत्रित किया जाता है, तुम्हारे विचार शैतान द्वारा बहकाए जाते हैं और तुम्हारा पूरा अस्तित्व शैतान के हाथों में है। क्या तुम जानते हो, तुम फिलहाल पतरस के स्तर से कितनी दूर हो? क्या तुममें वह योग्यता है? तुम आज के न्याय और ताड़ना के बारे में कितना जानते हो? जितना पतरस जान पाया उसमें से तुम कितना जान पाए हो? यदि तुम आज जानने में असमर्थ हो, तो क्या तुम इस ज्ञान को भविष्य में जानने योग्य हो पाओगे? तुम जैसा आलसी और डरपोक व्यक्ति न्याय और ताड़ना को जानने में समर्थ है ही नहीं। यदि तुम दैहिक शांति और दैहिक सुख की खोज करते हो, तो तुम्हारे पास शुद्ध होने का कोई उपाय नहीं होगा, और अंत में तुम शैतान को दे दिए जाओगे, क्योंकि जिस प्रकार का जीवन तुम जीते हो, वह शैतानी और दैहिक है। आज स्थिति यह है कि बहुत-से लोग जीवन का बिल्कुल भी अनुसरण नहीं करते, जिसका मतलब है कि वे शुद्ध होने या जीवन के अधिक गहरे अनुभव में प्रवेश करने की परवाह नहीं करते। इस प्रकार कैसे उन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है? जो लोग जीवन का अनुसरण नहीं करते, उनके पास पूर्ण किए जाने का कोई अवसर नहीं होता, और जो लोग परमेश्वर के ज्ञान की खोज नहीं करते, जो अपने स्वभावों में बदलावों का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के अंधकारमय प्रभाव से बच पाने में असमर्थ होते हैं। वे लोग परमेश्वर के विषय में अपने ज्ञान और अपने स्वभावों के बदलावों में प्रवेश के बारे में गंभीर नहीं होते, ठीक उनकी तरह जो सिर्फ धर्म में विश्वास करते हैं, जो केवल धार्मिक रीति-रिवाजों का पालन करते हैं और सेवाओं में हाजिरी देते हैं। क्या यह व्यर्थ नहीं है? परमेश्वर पर अपने विश्वास के सन्दर्भ में, यदि मनुष्य, जीवन के मामलों के प्रति गंभीर नहीं है, वह सत्य में प्रवेश करने की कोशिश नहीं करता, अपने स्वभाव में परिवर्तन की कोशिश नहीं करता परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण तो दूर की बात है, तो उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। यदि तुम पूर्ण बनाया जाना चाहते हो तो तुम्हें परमेश्वर के कार्य को समझना होगा। खासतौर से तुम्हें उसकी ताड़ना और उसके न्याय की सार्थकता को समझना होगा और यह समझना होगा कि इस कार्य को मनुष्य पर क्यों किया जाता है। क्या तुम यह कार्य स्वीकार कर पाते हो? इस प्रकार की ताड़ना के दौरान क्या तुम पतरस जैसे ही अनुभव और ज्ञान प्राप्त कर पाते हो? यदि तुम परमेश्वर के ज्ञान और पवित्र आत्मा के कार्य के ज्ञान के लिए प्रयास करोगे और अपने स्वभाव में बदलाव लाने के प्रयास करोगे तो तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 528
जिन्हें पूर्ण बनाया जाना है, उनके लिए जीत लिए जाने के कार्य का यह कदम अति आवश्यक है; जब मनुष्य पर विजय पा ली जाती है, तो उसके बाद ही मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के कार्य का अनुभव कर सकता है। केवल जीत लिए जाने की भूमिका को निभाने का कोई बड़ा महत्व नहीं है, जो तुम्हें परमेश्वर के इस्तेमाल के योग्य नहीं बनाएगा। सुसमाचार फैलाने की अपनी भूमिका को निभाने के लिए तुम्हारे पास कोई साधन नहीं होगा, क्योंकि तुम जीवन का अनुसरण नहीं करते, अपने अंदर परिवर्तन लाने और नवीनीकरण का प्रयास नहीं करते, और इसलिए तुम्हारे पास व्यावहारिक जीवन अनुभव नहीं है। इस कदम दर कदम कार्य के दौरान, तुम जब एक बार एक सेवाकर्मी और एक विषम के तौर पर कार्य कर लेते हो, लेकिन अगर अंततः तुम पतरस बनने का अनुसरण नहीं करते, और यदि तुम्हारी खोज उस मार्ग के अनुसार नहीं है जिसके द्वारा पतरस को पूर्ण बनाया गया था, तो स्वाभाविक रूप से, तुम अपने स्वभाव में परिवर्तन का अनुभव नहीं कर पाओगे। यदि तुम पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हो, तो तुम गवाही दे चुके होगे, और तुम कहोगे : “परमेश्वर के इस कदम दर कदम कार्य में, मैंने परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के कार्य को स्वीकार कर लिया है, और हालाँकि मैंने बड़ा कष्ट सहा है, फिर भी मैं जान गया हूँ कि परमेश्वर मनुष्य को पूर्ण कैसे बनाता है, मैंने परमेश्वर द्वारा किए गए कार्य को प्राप्त कर लिया है, मैंने परमेश्वर की धार्मिकता का ज्ञान प्राप्त कर लिया है, और उसकी ताड़ना ने मुझे बचा लिया है। उसका धार्मिक स्वभाव मुझ पर आ गया है, और मेरे लिए आशीष और अनुग्रह लेकर आया है; यह उसका न्याय और ताड़ना ही है जिसने मेरी रक्षा की और शुद्ध किया है। यदि परमेश्वर ने मुझे ताड़ना न दी होती और मेरा न्याय न किया होता, और यदि परमेश्वर ने मुझे कठोर वचन न कहे होते, तो मैं परमेश्वर को नहीं जान पाता, और न ही मुझे बचाया जा सका होता। आज मैं देखता हूँ : एक सृजित प्राणी के रूप में, न केवल व्यक्ति सृष्टिकर्ता द्वारा बनाई गई सभी चीजों का आनंद उठाता है, बल्कि, महत्वपूर्ण यह है कि सभी सृजित प्राणी परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाएँ, और उसके धार्मिक न्याय का आनंद उठाएँ, क्योंकि परमेश्वर का स्वभाव मनुष्य के आनंद के योग्य है। एक ऐसे सृजित प्राणी के रूप में जिसे शैतान द्वारा भ्रष्ट कर दिया गया है, इंसान को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का आनंद उठाना चाहिए। उसके धार्मिक स्वभाव में उसकी ताड़ना और न्याय है, और इससे भी बढ़कर, उसमें महान प्रेम है। हालाँकि आज मैं परमेश्वर के प्रेम को पूरी तरह प्राप्त करने में असमर्थ हूँ, फिर भी मुझे उसे देखने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है और इससे मैं धन्य हो गया हूँ।” यह वह पथ है जिस पर वे लोग चले हैं जो पूर्ण बनाए जाने का अनुभव करते हैं और यह है वह ज्ञान जिसके बारे में वे बोलते हैं। ऐसे लोग पतरस के समान हैं; उनके अनुभव भी पतरस के समान ही होते हैं। ऐसे लोग वे लोग भी हैं जो जीवन प्राप्त कर चुके होते हैं, जिनके अंदर सत्य है। जब उनका अनुभव अंत तक बना रहता है, तो परमेश्वर के न्याय के बीच वे अपने-आपको पूरी तरह से शैतान के प्रभाव से छुड़ाने और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में सक्षम होंगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 529
परमेश्वर के बनाए हुए आदम और हव्वा शुरू में शुद्ध लोग थे, यानी जब वे अदन की वाटिका में थे तब वे शुद्ध थे और किसी भी तरह की गंदगी से अछूते थे। वे यहोवा के प्रति वफादार भी थे और यहोवा को धोखा देने के विषय में कुछ नहीं जानते थे। ऐसा इसलिए था क्योंकि शैतान के प्रभाव ने बाधा नहीं डाली थी और उनमें शैतान का जहर नहीं था। वे समस्त मानवजाति में सबसे शुद्ध थे। वे अदन की वाटिका में रहकर किसी मलिनता से दूषित नहीं थे, वे देह के कब्जे में नहीं थे, और यहोवा का भय मानते थे। लेकिन जब शैतान ने उन्हें प्रलोभन दिया, तो उनके अंदर साँप का जहर आ गया और उनमें यहोवा से विश्वासघात करने की इच्छा पैदा हुई, और वे शैतान के प्रभाव में जीने लगे। शुरू में, वे शुद्ध थे और यहोवा का भय मानते थे; सिर्फ इस अवस्था में वे मानव थे। बाद में, जब शैतान ने उन्हें प्रलोभन दिया, तो उन्होंने भले और बुरे के ज्ञान के वृक्ष का फल खा लिया, और शैतान के प्रभाव के अधीन जीने लगे। धीरे-धीरे शैतान ने उन्हें भ्रष्ट कर दिया, और उन्होंने मनुष्य की मूल छवि गँवा दी। शुरू में, मनुष्य के अंदर यहोवा की श्वास थी, वह थोड़ा भी विद्रोही नहीं था, उसके हृदय में कोई बुराई नहीं थी। उस समय, मनुष्य सचमुच मानवीय था। शैतान द्वारा भ्रष्ट किए जाने के बाद, मनुष्य पशु बन गया। उसके विचार बुराई और मलिनता से भर गए, और उसमें कोई अच्छाई और पवित्रता नहीं रही। क्या यह शैतान नहीं है? तुमने परमेश्वर के बहुत-से कार्यों का अनुभव किया है, फिर भी न तो तुम बदले हो, न ही तुम शुद्ध हुए हो। तुम अभी भी शैतान की सत्ता के अधीन जी रहे हो, और परमेश्वर को समर्पित नहीं हो। तुम ऐसे व्यक्ति हो जिस पर सिर्फ विजय पाई गई है लेकिन जिसे पूर्ण नहीं बनाया गया है। और ऐसा क्यों कहा जाता है कि ऐसे व्यक्ति को पूर्ण नहीं बनाया गया है? चूँकि ऐसा व्यक्ति जीवन या परमेश्वर के कार्य के ज्ञान का अनुसरण नहीं करता, और दैहिक आनंद और क्षणिक सुख से अधिक और कुछ नहीं चाहता। इसके परिणामस्वरूप, उसके जीवन स्वभाव में कोई परिवर्तन नहीं होता और उसने मनुष्य की उस मूल समानता को फिर से हासिल नहीं किया है जैसी परमेश्वर ने सृजित की थी। ऐसे लोग चलती-फिरती लाश होते हैं, वे मरे हुए लोग होते हैं जिनमें कोई आत्मा नहीं होती! जो लोग आत्मा के मामलों के ज्ञान का अनुसरण नहीं करते, जो पावनीकरण का अनुसरण नहीं करते, जो सत्य को जीने का प्रयास नहीं करते, जो केवल नकारात्मक पक्ष में स्वयं पर परमेश्वर द्वारा विजय पा लिए जाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार नहीं जी सकते और पवित्र मनुष्य नहीं बन सकते—वे ऐसे लोग हैं जिन्हें बचाया नहीं गया है। क्योंकि, अगर मनुष्य में सत्य नहीं है, तो वह परमेश्वर के परीक्षणों में टिक नहीं पाता; जो लोग परमेश्वर के परीक्षणों के दौरान टिक पाते हैं, केवल उन्हीं लोगों को बचाया गया है। मुझे पतरस जैसे लोग चाहिए, ऐसे लोग जो पूर्ण बनाए जाने का प्रयास करते हैं। आज का सत्य उन्हें प्रदान किया जाता है जो उसकी लालसा रखते हैं और उसे खोजते हैं। यह उद्धार उन्हें दिया जाता है जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाने की लालसा रखते हैं। यह उद्धार सिर्फ तुम लोगों द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए नहीं है; यह तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने भी देता है—तुम लोग परमेश्वर को प्राप्त करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें प्राप्त कर सके। आज मैंने ये वचन तुम लोगों से कहे हैं, और तुमने इन्हें सुना है, तुम्हें इन वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। अगर तुम लोग आखिरकार इन वचनों को अभ्यास में लाओगे तो मैं इन वचनों द्वारा तुम्हें हासिल कर चुका हूँगा; उसी समय, तुम भी इन वचनों को हासिल कर चुके होगे, यानी तुम यह असीम उद्धार प्राप्त कर चुके होगे। एक बार शुद्ध कर दिए जाने के बाद तुम लोग सच्चे मानव बन गए होगे। यदि तुम सत्य को जीने में असमर्थ हो, या उस व्यक्ति के समान जीवन बिताने में असमर्थ हो, जिसे पूर्ण बना दिया गया है, तो यह कहा जा सकता है कि तुम एक मानव नहीं, एक चलती-फिरती लाश हो, पशु हो, क्योंकि तुममें सत्य नहीं है, दूसरे शब्दों में, तुममें यहोवा की श्वास नहीं है, और इस प्रकार तुम एक मरे हुए इंसान हो जिसमें कोई आत्मा नहीं है! यद्यपि जीत लिए जाने के बाद गवाही देना संभव है, लेकिन इससे तुम्हें थोड़ा-सा ही उद्धार प्राप्त होता है, और तुम ऐसे जीवित प्राणी नहीं बन पाते जिसमें आत्मा है। हालाँकि तुमने ताड़ना और न्याय का अनुभव कर लिया होता है, फिर भी तुम्हारा स्वभाव नहीं बदलता या नवीनीकृत नहीं हुआ होता; तुम अभी भी पुराने बने रहते हो, तुम शैतान के होते हो, और तुम एक शुद्ध किए गए इंसान नहीं होते। केवल उन्हीं का मूल्य है जिन्हें पूर्ण बनाया जा चुका है, और केवल ऐसे ही लोगों ने एक सच्चा जीवन प्राप्त किया होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 530
आज, कुछ लोग प्रयास कर रहे हैं कि वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जाएँ, किंतु जब उन पर विजय पा ली जाती है तो उसके बाद सीधे तौर पर उनका इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। जहाँ तक आज कहे गए वचनों का प्रश्न है, यदि, जब परमेश्वर लोगों को इस्तेमाल करता है, तुम अभी भी उन्हें सम्पन्न नहीं कर पाते, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया गया है। दूसरे शब्दों में, मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की अवधि के अंत का आगमन यह निर्धारित करेगा कि परमेश्वर मनुष्य को हटा देगा या इस्तेमाल करेगा। वे लोग, जिन पर विजय पा ली गई है, निष्क्रिय और नकारात्मक पक्ष के उदाहरणों से अधिक कुछ नहीं हैं; वे नमूने और आदर्श हैं, किंतु वे एक विषमता से ज्यादा कुछ नहीं हैं। जब मनुष्य का जीवन स्वभाव बदल जाता है, और जब उसके अंदर और बाहर आमूलचूल परिवर्तन हो जाता है, तभी वह पूर्ण किया जाता है। आज, तुम क्या बनना चाहते हो : तुम पर विजय पाई जाए, या तुम्हें पूर्ण बना दिया जाए? तुम क्या पाना चाहते हो? क्या तुमने पूर्ण किए जाने की शर्तें पूरी कर ली हैं? तुममें अभी किन शर्तों की कमी है? तुम्हें स्वयं को किन बातों से युक्त करना चाहिए, और तुम्हें अपनी कमियों को कैसे दूर करना चाहिए? तुम्हें पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर कैसे अग्रसर होना चाहिए? तुम्हें पूरी तरह समर्पण कैसे करना चाहिए? तुम पूर्ण होना चाहते हो, तो क्या तुम पावनीकरण का अनुसरण करते हो? क्या तुम ऐसे इंसान हो जो ताड़ना और न्याय का अनुभव पाने का प्रयास करता है ताकि तुम्हें शुद्ध किया जा सके? तुम शुद्ध होने का प्रयास करते हो, तो क्या तुम ताड़ना और न्याय को स्वीकार करने के लिए तैयार हो? तुम परमेश्वर को जानना चाहते हो, किंतु क्या तुम्हें उसकी ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है? आज, अधिकतर कार्य जो वह तुम पर करता है, वो ताड़ना और न्याय है; इस कार्य के विषय में तुम्हारा ज्ञान क्या है, जो तुम पर किया गया है? क्या जिस ताड़ना और न्याय का तुमने अनुभव किया है उसने तुम्हें शुद्ध किया है? क्या इसने तुम्हें परिवर्तित किया है? क्या इसका तुम पर कोई प्रभाव पड़ा है? क्या तुम आज के इस ढेर सारे कार्य—शाप, न्याय और खुलासे—से थक गए हो, या क्या तुम्हें लगता है कि वे तुम्हारे लिए बहुत लाभदायक हैं? तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, लेकिन तुम उससे प्रेम क्यों करते हो? क्या तुम उससे इसलिए प्रेम करते हो क्योंकि तुमने उससे थोड़ा-सा अनुग्रह प्राप्त किया है? या शांति और आनंद प्राप्त करने के बाद तुम उससे प्रेम करने लगे हो? या उसकी ताड़ना और न्याय से शुद्ध होकर तुम उससे प्रेम करते हो? तुम किस चीज से प्रेरित होकर परमेश्वर से प्रेम करते हो? पतरस ने पूर्ण बनाए जाने के लिए किन शर्तों को पूरा किया था? पूर्ण बनाए जाने के बाद, इसे किस अहम तरीके से व्यक्त किया गया था? क्या उसने प्रभु यीशु से इसलिए प्रेम किया क्योंकि वह उसकी कामना करता था, या इसलिए क्योंकि वह उसे देख नहीं सकता था, या इसलिए क्योंकि उसे लगा कि उसे फटकारा गया है? या उसने प्रभु यीशु से और भी ज्यादा प्रेम इसलिए किया क्योंकि उसने क्लेशों के कष्ट को स्वीकार कर लिया था और इस तरह अपनी अशुद्धता और अपने विद्रोहीपन को और साथ ही प्रभु की पवित्रता को जान लिया था? क्या परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय के कारण उसका परमेश्वर-प्रेमी हृदय अधिक शुद्ध हो गया था, या किसी और कारण से? इसमें से कौन-सा कारण सही है? तुम परमेश्वर के अनुग्रह के कारण उससे प्रेम करते हो और इसलिए क्योंकि आज उसने तुम्हें थोड़ा-सा आशीष दिया है। क्या यह सच्चा प्रेम है? तुम्हें परमेश्वर से प्रेम कैसे करना चाहिए? क्या तुम्हें उसकी ताड़ना और न्याय को स्वीकार करना चाहिए और उसके धार्मिक स्वभाव को देखने के बाद, उसे सच में प्रेम करने में समर्थ होना चाहिए, कुछ इस तरह कि तुम पूरी तरह विश्वस्त हो जाओ, और तुम्हें उसका ज्ञान हो जाए? पतरस की तरह, क्या तुम कह सकते हो कि तुम परमेश्वर से पर्याप्त प्रेम नहीं कर सकते? क्या तुम ताड़ना और न्याय के बाद जीत लिए जाने का अनुसरण करते हो या ताड़ना और न्याय के बाद शुद्ध किए जाने, रक्षा किए जाने और देखभाल किए जाने का अनुसरण करते हो? तुम इनमें से वास्तव में किस चीज का अनुसरण करते हो? क्या तुम्हारा जीवन अर्थपूर्ण है या अर्थहीन और मूल्यहीन है? तुम्हें देह चाहिए या तुम्हें सत्य चाहिए? तुम न्याय चाहते हो या सुख? परमेश्वर के कार्य का इतना अनुभव कर लेने और परमेश्वर की पवित्रता और धार्मिकता को देख लेने के बाद तुम्हें किस प्रकार अनुसरण करना चाहिए? तुम्हें इस पथ पर वास्तव में किस प्रकार चलना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर से प्रेम करने का अभ्यास कैसे करना चाहिए? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय ने तुम पर कोई असर डाला है? तुम्हें परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय का ज्ञान है कि नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किस चीज को जी रहे हो और तुम किस सीमा तक परमेश्वर से प्रेम करते हो! तुम्हारे होंठ कहते हैं कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो, फिर भी तुम उसी पुराने और भ्रष्ट स्वभाव को जी रहे हो; तुममें परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है, और तुम्हारे अंदर जमीर के होने की तो बात ही छोड़ो। क्या ऐसे लोग परमेश्वर से प्रेम करते हैं? क्या ऐसे लोग परमेश्वर के प्रति वफादार होते हैं? क्या वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर की ताड़ना और उसके न्याय को स्वीकार करते हैं? तुम कहते हो कि तुम परमेश्वर से प्रेम करते हो और उसमें विश्वास करते हो, फिर भी तुम अपनी धारणाओं को नहीं छोड़ते। तुम्हारे कार्य में, तुम्हारे प्रवेश में, उन शब्दों में जो तुम बोलते हो और तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के प्रति तुम्हारे प्रेम की लेशमात्र भी अभिव्यक्ति नहीं है और परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं है। क्या यह एक ऐसा इंसान है जिसने ताड़ना और न्याय प्राप्त कर लिया है? क्या ऐसा कोई इंसान पतरस के समान हो सकता है? क्या जो लोग पतरस के समान हैं उनमें केवल ज्ञान होता है, वे उसे जीते नहीं हैं? आज, वह कौन-सी शर्त है जो मनुष्य से एक सच्चा जीवन जीने की अपेक्षा करती है? क्या पतरस के मुँह से निकलने वाली प्रार्थनाएँ शब्द-मात्र थीं? क्या वे उसके हृदय की गहराइयों से निकले हुए शब्द नहीं थे? क्या पतरस केवल प्रार्थना करता था, वह सत्य का अभ्यास नहीं करता था? तुम्हारा अनुसरण किसकी खातिर है? परमेश्वर की ताड़ना और न्याय के दौरान तुम्हें रक्षा और शुद्धिकरण कैसे ग्रहण करना चाहिए? क्या परमेश्वर की ताड़ना और न्याय से मनुष्य को कोई लाभ नहीं है? क्या सारा न्याय दंड है? क्या ऐसा हो सकता है कि केवल शांति एवं आनंद, और केवल भौतिक आशीष एवं क्षणिक सुख ही मनुष्य के जीवन के लिए लाभदायक हैं? यदि मनुष्य सुकून और आराम के परिवेश में रहता है, बिना न्याय का जीवन जीता है तो क्या उसे शुद्ध किया जा सकता है? यदि मनुष्य बदलना और शुद्ध होना चाहता है, तो उसे पूर्ण किए जाने को कैसे स्वीकार करना चाहिए? आज तुम्हें कौन-सा पथ चुनना चाहिए?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पतरस के अनुभव : ताड़ना और न्याय का उसका ज्ञान
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 531
पतरस का उल्लेख होने पर लोगों के पास उसके बारे में कहने के लिए अच्छी बातों का कोई अंत नहीं होता है। वे तुरंत याद करते हैं कि उसने तीन बार परमेश्वर को नकार दिया था, कैसे शैतान को अपनी सेवाएँ प्रदान करते हुए उसने परमेश्वर को प्रलोभन दिया और कैसे अंत में परमेश्वर की खातिर क्रूस पर उलटा लटकाया गया, इत्यादि। अब मैं तुम लोगों को यह बताने पर ध्यान केंद्रित करने जा रहा हूँ कि पतरस ने मुझे कैसे जाना और उसका अंतिम हश्र क्या रहा। पतरस अच्छी काबिलियत वाला था, लेकिन उसकी परिस्थितियाँ पौलुस की परिस्थितियों जैसी नहीं थीं : उसके माता-पिता ने मुझे सताया था, वे ऐसे दानव थे जो शैतान के कब्जे में थे, जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने पतरस को परमेश्वर के बारे में कुछ नहीं सिखाया। पतरस चतुर, प्रतिभाशाली और बचपन से ही अपने माता-पिता का दुलारा था। लेकिन बालिग होने पर वह मेरे बारे में ज्ञान की लगातार खोज करने से कभी नहीं रुका, इसलिए माता-पिता का शत्रु बन गया और बाद में उसने उनसे मुँह मोड़ लिया। ऐसा इसलिए था क्योंकि, सबसे पहले, उसे यह विश्वास था कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी वस्तुएँ सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं और सभी सकारात्मक चीजें परमेश्वर से आती हैं और शैतान द्वारा संसाधित किए बिना सीधे परमेश्वर से जारी होती हैं। पतरस के माता-पिता के विरोधाभास ने उसे मेरी प्रेममय दयालुता और करुणा का और गहरा ज्ञान दिया और इस प्रकार मुझे खोजने की उसकी इच्छा को और भी अधिक उभार दिया। उसने न केवल मेरे वचन खाने-पीने पर ध्यान दिया, बल्कि इससे भी बढ़कर, मेरे इरादों की थाह लेने पर भी ध्यान दिया और वह अपने हृदय में हमेशा सतर्क रहा। परिणामस्वरूप वह अपनी आत्मा में हमेशा संवेदनशील रहा और इसलिए वह अपने हर काम में मेरे इरादों के अनुसार रहा। वह आम तौर पर अतीत में विफल हुए लोगों से सबक लेने पर ध्यान देता था ताकि स्वयं को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित कर सके और स्वयं असफलता के जाल में फँस जाने से गहराई से भयभीत रहता था। उसी प्रकार वह उन सब लोगों की आस्था और प्रेम को आत्मसात करने को भी महत्व देता था, जिन्होंने युगों से परमेश्वर से प्रेम किया था। इस तरह—न केवल नकारात्मक पहलुओं में, बल्कि कहीं अधिक महत्वपूर्ण रूप से, सकारात्मक पहलुओं में—वह अधिक तेजी से विकसित हुआ, इस तरह कि मेरी उपस्थिति में उसका ज्ञान सबसे अधिक हो गया। तो यह कल्पना करना कठिन नहीं है कि किस प्रकार उसने अपना सब-कुछ मेरे हाथों में रख दिया, कि वह किस तरह भोजन, वस्त्र, सोने और रहने से जुड़ी बातों में भी अपनी इच्छा त्याग देता था और इसके बजाय, वह हर बात में मुझे प्रसन्न करके मेरी संपदाओं का आनंद लेता था। मैंने उसे अनगिनत परीक्षणों से गुजारा—और बेशक उसे मरते दम तक सताया गया—लेकिन इन सैकड़ों परीक्षणों के बीच उसने कभी भी मुझ पर अपनी आस्था नहीं खोई और न ही कभी मुझसे निराश हुआ। यहाँ तक कि जब मैंने कहा कि मैं उसे त्याग चुका हूँ तो वह तब भी हतोत्साहित या निराश नहीं हुआ और अभ्यास के पिछले सिद्धांतों के अनुसार मुझसे व्यावहारिक ढंग से प्रेम करता रहा। मैंने उससे कहा कि भले ही वह मुझसे प्रेम करता है तो भी मैं उसकी प्रशंसा नहीं करूँगा और अंत में उसे शैतान के हाथों में दे दूँगा। लेकिन ऐसे परीक्षणों के बीच भी, परीक्षण जो उसकी देह पर नहीं आए, बल्कि जो वचनों के परीक्षण थे, उसने मुझसे प्रार्थना की और कहा : “हे परमेश्वर! स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों के मध्य क्या ऐसा कोई व्यक्ति, कोई वस्तु या कोई घटना है, जो तुझ सर्वशक्तिमान के हाथों में न हो? जब तू मुझ पर दया करता है, तब मेरा हृदय तेरी दया से बहुत आनंदित होता है। जब तू मेरा न्याय करता है, तो भले ही मैं उसके अयोग्य होऊँ, फिर भी मैं तेरे कर्मों के अथाहपन की और अधिक समझ प्राप्त करता हूँ, क्योंकि तू अधिकार और बुद्धि से भरा है। हालाँकि मेरा शरीर कष्ट सहता है, लेकिन मेरी आत्मा को चैन मिलता है। मैं तेरी बुद्धि और कर्मों की प्रशंसा कैसे न करूँ? अगर तुझे जानने के बाद मुझे मरना भी पड़े, तो मैं ऐसा हर्ष और प्रसन्नता के साथ कैसे नहीं कर सकता? हे सर्वशक्तिमान! क्या तू सचमुच नहीं चाहता है कि मैं तुझे देखूँ? क्या मैं सच में तेरा न्याय प्राप्त करने के अयोग्य हूँ? कहीं मुझमें ऐसा कुछ तो नहीं, जो तू नहीं देखना चाहता?” इस प्रकार के परीक्षणों के दौरान, भले ही पतरस मेरे इरादों को सटीकता से समझने में समर्थ नहीं था, लेकिन यह स्पष्ट था कि वह मेरे द्वारा उपयोग किए जाने के कारण खुद को बहुत गौरवान्वित और सम्मानित महसूस करता था (भले ही उसने मेरा न्याय पाया, ताकि मनुष्य मेरा प्रताप और क्रोध देख सके), और वह इन परीक्षणों से व्यथित नहीं था। मेरे समक्ष अपनी वफादारी के कारण और अपने पर मेरे आशीष के कारण वह हजारों साल से मनुष्य के लिए एक उदाहरण और आदर्श रहा है। क्या ठीक यही वह चीज नहीं है जिसका तुम लोगों को अनुकरण करना चाहिए? जोर लगाकर लंबे समय तक सोचो कि क्यों मैंने तुम लोगों को पतरस का इतना लंबा वृत्तांत दिया है; तुम लोगों के कार्य करने के यही सिद्धांत होने चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 6
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 532
पतरस ने कई वर्षों तक यीशु का अनुगमन किया और उसमें कई बातें ऐसी देखीं, जो मनुष्यों में कभी नहीं देखी गई थीं। एक वर्ष तक अपना अनुगमन करने के पश्चात् यीशु ने उसे बारह शिष्यों में से एक चुना। (निस्संदेह यीशु ने इसे जोर से नहीं बोला और दूसरे इससे बिल्कुल अनजान थे।) जीवन में पतरस ने यीशु के हर काम को एक मिसाल समझा। सबसे बढ़कर, यीशु ने जिन संदेशों का प्रचार किया, वे उसके हृदय में अंकित हो गए। वह यीशु के प्रति अविश्वसनीय रूप से विचारशील और वफादार था, और उसने यीशु के खिलाफ कभी कोई शिकायत नहीं की। परिणामस्वरूप जहाँ कहीं यीशु गया, वह यीशु का विश्वसनीय साथी बन गया। पतरस ने यीशु की शिक्षाओं, उसके नम्र शब्दों, उसके भोजन, उसके कपड़ों, उसके आश्रय और उसकी यात्राओं पर ग़ौर किया। उसने हर मामले में यीशु का अनुकरण किया। वह कभी भी आत्मतुष्ट नहीं था, फिर भी उसने वह सब त्याग दिया, जो पुराना था और कथनी और करनी दोनों से यीशु के उदाहरण का अनुगमन किया। तभी पतरस को अनुभव हुआ कि स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ें सर्वशक्तिमान के हाथों में हैं। इस कारण पतरस की अपनी कोई व्यक्तिगत पसंद नहीं थी और उसने यीशु के पूरे व्यक्तित्व को आत्मसात कर लिया और उसे उदाहरण की तरह इस्तेमाल किया। यीशु के जीवन में पतरस ने देखा कि अपने किसी भी काम में वह आत्मतुष्ट नहीं था और उसने अपने बारे में कभी डींगें नहीं हाँकीं, बल्कि प्रेम से लोगों को सुधारा। विभिन्न चीजों के भीतर पतरस ने देखा कि यीशु क्या था, और इस कारण से यीशु की हर बात उसके लिए अनुकरण की वस्तु बन गई। पतरस के अनुभवों ने उसे यीशु की मनोरमता का अधिकाधिक बोध कराया और उसने इस तरह की बातें कहीं : “मैंने सर्वशक्तिमान को खोजा है जो आकाश में है और मैंने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीज़ों के आश्चर्यों को देखा है और केवल इसी तरह मैंने सर्वशक्तिमान की मनोहरता का गहरा बोध प्राप्त किया है। परंतु इस पर भी मेरे हृदय में वास्तविक प्रेम कदापि नहीं था और मैंने अपनी आँखों से सर्वशक्तिमान की मनोरमता को कभी नहीं देखा था। आज सर्वशक्तिमान की दृष्टि में मुझे उसके द्वारा कृपापूर्वक देखा गया है, और मैंने अंततः परमेश्वर की मनोरमता का अनुभव कर लिया है। मैंने अंततः जान लिया है कि मानव-जाति सिर्फ इसलिए परमेश्वर से प्रेम नहीं करती, क्योंकि उसने सब चीजें बनाई हैं, बल्कि अपने दैनिक जीवन में मैंने उसकी असीम मनोरमता पाई है। यह भला उस चीज तक सीमित कैसे हो सकती है, जो अभी खोजी जा सकती है?” जैसे-जैसे समय बीता, पतरस में भी बहुत-सी मनोहर बातें आती गईं। वह यीशु के प्रति बहुत समर्पित हो गया, और निस्संदेह उसे अनेक विघ्नों का भी सामना करना पड़ा। जब यीशु उसे विभिन्न स्थानों पर प्रचार करने के लिए ले गया, तो उसने सदैव विनम्र होकर यीशु के उपदेशों को सुना। वर्षों से यीशु का अनुगमन करने के कारण वह कभी अहंकारी नहीं हुआ। यीशु द्वारा यह बताए जाने के बाद कि उसके आने का कारण क्रूस पर चढ़ाया जाना और अपना कार्य पूरा करना है, पतरस अक्सर अपने दिल में पीड़ा अनुभव करता और एकांत में छुपकर रोया करता। फिर भी, आखिरकार वह “दुर्भाग्यपूर्ण” दिन आ ही गया। यीशु के पकड़े जाने के बाद पतरस अपनी मछली पकड़ने की नाव में अकेले रोता रहा और उसने उसके लिए बहुत प्रार्थनाएँ कीं। परंतु अपने हृदय में वह जानता था कि यह पिता परमेश्वर की इच्छा है और इसे कोई नहीं बदल सकता। यीशु के प्रति अपने प्रेम के कारण ही वह दुखी होकर रोता रहा था। निस्संदेह यह मानवीय दुर्बलता है। अतः जब उसे ज्ञात हुआ कि यीशु को क्रूस पर चढ़ा दिया जाएगा, उसने यीशु से पूछा : “अपने जाने के बाद क्या तू हमारे बीच लौटेगा और हमारी देखभाल करेगा? क्या हम फिर भी तुझे देख पाएँगे?” हालाँकि ये शब्द बहुत सीधे-सादे और मानवीय धारणाओं से भरे थे, पर यीशु पतरस की पीड़ा की कड़वाहट के बारे में जानता था, अतः अपने प्रेम के द्वारा उसने उसकी दुर्बलता को ध्यान में रखा : “पतरस, मैंने तुझसे प्रेम किया है। क्या तू यह जानता है? हालाँकि तेरी बात में कोई तर्क नहीं है, फिर भी पिता ने वादा किया है कि मेरे पुनरुत्थान के बाद मैं 40 दिनों तक लोगों को दिखाई दूँगा। क्या तुझे विश्वास नहीं है कि मेरा आत्मा तुम लोगों पर निरंतर अनुग्रह करता रहेगा?” हालाँकि इससे पतरस को कुछ सुकून मिला, फिर भी उसने महसूस किया कि किसी चीज की कमी है, और इसलिए, पुनरुत्थान के बाद, यीशु पहली बार खुले तौर पर उसके सामने आया। किंतु पतरस को अपनी धारणाओं से चिपके रहने से रोकने के लिए यीशु ने उस भव्य भोजन को अस्वीकार कर दिया, जो पतरस ने उसके लिए तैयार किया था, और पलक झपकते ही गायब हो गया। उस क्षण से पतरस को प्रभु यीशु की गहन समझ प्राप्त हुई, और वह उससे और अधिक प्रेम करने लगा। पुनरुत्थान के बाद यीशु अक्सर पतरस के सामने आया। चालीस दिन पूरे होने पर स्वर्गारोहण करने के बाद वह पतरस को तीन बार और दिखाई दिया। हर बार जब वह दिखाई दिया, तब पवित्र आत्मा का कार्य पूर्ण होने वाला और नया कार्य आरंभ होने वाला था।
अपने पूरे जीवन में पतरस ने मछलियाँ पकड़कर अपना जीवनयापन किया, परंतु इससे भी अधिक वह सुसमाचार के प्रचार के लिए जीया। अपने बाद के वर्षों में उसने पतरस की पहली और दूसरी पत्री लिखी, साथ ही उसने उस समय के फिलाडेल्फिया की कलीसिया को कई पत्र भी लिखे। उस समय के लोग उससे बहुत प्रभावित थे। लोगों को अपनी खुद की साख का इस्तेमाल करके उपदेश देने के बजाय उसने उन्हें जीवन की उपयुक्त आपूर्ति उपलब्ध करवाई। वह यीशु के जाने से पहले दी गई उनकी शिक्षाओं को कभी नहीं भूला और जीवनभर उनसे प्रेरित रहा। यीशु का अनुगमन करते हुए उसने प्रभु के प्रेम का बदला अपनी मृत्यु से चुकाने और सभी चीजों में उसके उदाहरण का अनुसरण करने का संकल्प लिया था। यीशु ने इसे स्वीकार कर लिया, इसलिए जब पतरस 53 वर्ष का था (यीशु के जाने के 20 से अधिक वर्षों के बाद), तो यीशु उसके संकल्प की पूर्ति में मदद करने के लिए उसके सामने प्रकट हुआ। उसके बाद के सात वर्षों में पतरस ने अपना जीवन स्वयं को जानने में व्यतीत किया। इन सात वर्षों के पश्चात एक दिन उसे उलटा क्रूस पर चढ़ा दिया गया और इस तरह उसके असाधारण जीवन का अंत हो गया।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, पतरस के जीवन पर
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 533
अंधकार का प्रभाव क्या है? यह तथाकथित “अंधकार का प्रभाव”, शैतान द्वारा लोगों को गुमराह करने, भ्रष्ट करने, बाँधने और नियंत्रित करने का प्रभाव है; शैतान का प्रभाव एक ऐसा प्रभाव है जिसमें मृत्यु का साया है। शैतान की सत्ता में रहने वाले सभी लोग नष्ट हो जाने के लिए अभिशप्त हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद, तुम अंधकार के प्रभाव से कैसे बच सकते हो? जब तुम सच्चे मन से परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, तुम्हारा हृदय पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मुड़ जाएगा और उस समय तुम्हारा हृदय परमेश्वर के आत्मा द्वारा प्रेरित होगा और तुम पूरी तरह से स्वयं को उसे सौंप देने को तैयार हो जाओगे, उस समय, तुम अंधकार के प्रभाव से निकल चुके होगे। यदि किसी व्यक्ति के सारे काम परमेश्वर को प्रसन्न करें और उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप हों, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो परमेश्वर के वचनों में और उसकी देखभाल एवं सुरक्षा में जीता है। यदि लोग परमेश्वर के वचनों का अभ्यास नहीं कर पाते हैं, अगर वे हमेशा परमेश्वर के प्रति लापरवाह तरीके से काम करते हैं और उसके अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं, तो ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जिन लोगों को परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं गया है, वे सभी शैतान की सत्ता में जी रहे हैं; अर्थात्, वे सभी अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते, वे शैतान की सत्ता में रह रहे हैं। यहाँ तक कि जो लोग परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के प्रकाश में रह रहे हों, क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखते हैं, जरूरी नहीं कि वे परमेश्वर के वचनों में जी रहे हों या उसके प्रति समर्पण करने में समर्थ हों। मनुष्य केवल परमेश्वर में विश्वास रखने तक सीमित है, और चूँकि उसे परमेश्वर का ज्ञान नहीं है, इसलिए वह अभी भी पुराने विनियमों में जी रहा है, निर्जीव वचनों के बीच जी रहा है और वह एक ऐसा जीवन जी रहा है जो अंधकारमय और अज्ञात है, जिसे न तो परमेश्वर द्वारा पूरी तरह से शुद्ध किया गया है, न ही पूरी तरह से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया गया है। इसलिए, कहने की आवश्यकता नहीं कि जो लोग परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते, वे अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; यहाँ तक कि जो लोग यह मानते हैं कि परमेश्वर का अस्तित्व है, वे भी पवित्र आत्मा का काम नहीं होने के कारण अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह या दया के बिना हैं, वे पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति को नहीं देख सकते। जो लोग यह महसूस करने में असमर्थ हैं कि पवित्र आत्मा उनमें काम कर रहा है या नहीं, वे सभी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं; और ज्यादातर समय वे लोग भी अंधकार के प्रभाव में जी रहे होते हैं, जो महज परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेते हैं फिर भी परमेश्वर को नहीं जानते हैं। यदि कोई व्यक्ति परमेश्वर पर विश्वास करता है, फिर भी अपना अधिकांश जीवन अंधकार के प्रभाव में जीते हुए बिताता है, तो उस व्यक्ति का अस्तित्व अपना अर्थ खो चुका होता है—और उन लोगों का उल्लेख करने की क्या आवश्यकता है जो परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास ही नहीं रखते?
जो लोग परमेश्वर के काम को स्वीकार नहीं कर सकते हैं या जो परमेश्वर के कार्य को स्वीकार तो करते हैं लेकिन उसकी अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर पाते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो लोग सत्य का अनुसरण करते हैं और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हैं, केवल वे ही परमेश्वर का आशीष प्राप्त करते हैं और केवल वे ही अंधकार के प्रभाव से बच पाए हैं। जो लोग कोई मुक्ति महसूस नहीं करते हैं, जो हमेशा कुछ चीजों से बाधित होते हैं और जो अपना हृदय परमेश्वर को नहीं दे पाते, वे लोग शैतान के बंधन में हैं और वे मौत के साये में जी रहे हैं। जो लोग उन कर्तव्यों के प्रति समर्पित नहीं हैं जो उन्हें अवश्य करने चाहिए, जो परमेश्वर के आदेश के प्रति समर्पित नहीं हैं और जो कलीसिया में अपना कार्य नहीं कर रहे हैं, वे ऐसे लोग हैं जो अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। जो जानबूझकर कलीसियाई जीवन में बाधा डालते हैं, जो जानबूझकर अपने भाई-बहनों के बीच फूट डालते हैं या अपने गुट बनाते हैं, वे और भी अधिक अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, शैतान के बंधन में रहते हैं। जिनका परमेश्वर के साथ एक असामान्य रिश्ता है, जिनकी हमेशा असंयमित इच्छाएँ होती हैं, जो हमेशा लाभ लेना चाहते हैं और जो बिल्कुल भी स्वभावगत परिवर्तन का अनुसरण नहीं करना चाहते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं। जो लोग हमेशा लापरवाह होते हैं, सत्य के अपने अभ्यास में गंभीर नहीं होते, परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का प्रयास नहीं करते, जो केवल अपनी देह को संतुष्ट करने में लगे रहते हैं, ऐसे लोग भी अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं, और मृत्यु से घिरे हुए हैं। जो लोग परमेश्वर के लिए काम करते समय चालबाजी और धूर्तता करते हैं, परमेश्वर के साथ लापरवाही से व्यवहार करते हैं, जो परमेश्वर को धोखा देते हैं, हमेशा स्वयं के लिए सोचते रहते हैं, ऐसे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं। जो लोग ईमानदार हृदय के साथ परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकते हैं, जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, और जो अपने स्वभाव को बदलने पर ध्यान नहीं देते, वे लोग अंधकार के प्रभाव में रह रहे हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 534
यदि तुम परमेश्वर की स्वीकृति पाना चाहते हो, तो सबसे पहले तुम्हें शैतान के अंधकारमय प्रभाव से निकलना चाहिए, अपना हृदय परमेश्वर के लिए खोलना चाहिए, और इसे पूरी तरह से परमेश्वर की ओर मोड़ देना चाहिए। जिन कामों को तुम अब कर रहे हो, क्या परमेश्वर उन्हें स्वीकृति देता है? क्या तुम्हारा हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ गया है? तुम जो काम कर रहे हो, क्या वे वही हैं जिनकी परमेश्वर तुमसे अपेक्षा करता है? क्या वे सत्य के अनुरूप हैं? तुम्हें हमेशा अपनी जाँच करनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने पर ध्यान देना चाहिए; अपना हृदय परमेश्वर के सामने खोलकर रख देना चाहिए, सच्चे मन से परमेश्वर से प्रेम करना चाहिए और लगन से परमेश्वर के लिए खुद को खपाना चाहिए। ऐसे लोगों को निश्चित रूप से परमेश्वर की स्वीकृति मिलेगी। जो लोग परमेश्वर में विश्वास करते हैं लेकिन फिर भी सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे शैतान के प्रभाव से किसी भी तरह नहीं बच सकते। जो लोग निष्कपट ढंग से आचरण नहीं करते, जो लोगों के सामने एक तरह से और उनकी पीठ पीछे दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं, जो नम्रता, धैर्य और प्रेम का दिखावा करते हैं, जबकि वे अपने सार में कपटी और धूर्त हैं और परमेश्वर के प्रति उनकी कोई निष्ठा नहीं होती, ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में रहने वाले लोगों के विशिष्ट नमूने हैं; वे सर्प की किस्म के लोग हैं। जो लोग परमेश्वर में अपने विश्वास में हमेशा अपनी खातिर साजिश रचते हैं, जो आत्मतुष्ट और खुदगर्ज हैं, जो दिखावा करते हैं और जो अपने रुतबे की रक्षा करते हैं, वे ऐसे लोग होते हैं जो शैतान से प्यार करते हैं और सत्य का विरोध करते हैं। वे लोग परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और पूरी तरह से शैतान के होते हैं। जो लोग परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं हैं, जो पूरे दिल से परमेश्वर की सेवा नहीं करते, जो हमेशा अपने और अपने परिवार के हितों के लिए चिंतित रहते हैं, जो खुद को परमेश्वर की खातिर खपाने के लिए हर चीज का त्याग करने में सक्षम नहीं हैं और जो परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपनी जिंदगी नहीं जीते, वे परमेश्वर के वचनों के बाहर जी रहे हैं। ऐसे लोगों को परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं हो सकती।
जब परमेश्वर ने लोगों को बनाया, तो उसका उद्देश्य था कि वे परमेश्वर की समृद्धि का आनंद लें और वास्तव में उससे प्यार करें; इस तरह, वे उसके प्रकाश में रहेंगे। आज, जो लोग परमेश्वर से प्रेम नहीं कर सकते, परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं हो सकते, अपना हृदय पूरी तरह से परमेश्वर को नहीं सौंप सकते, परमेश्वर के हृदय को अपना हृदय नहीं मान सकते और परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ मानकर उसे अपने ऊपर नहीं ले सकते, ऐसे सभी लोगों पर परमेश्वर का प्रकाश नहीं चमकता है और इसलिए ऐसे सभी लोग अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। ये लोग पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के विपरीत जाते हैं और उनके किसी भी काम में लेशमात्र भी सत्य नहीं होता। वे शैतान के साथ दलदल में लोट रहे हैं और अंधकार के प्रभाव में जी रहे हैं। यदि तुम अक्सर परमेश्वर के वचनों को खा और पी सको, साथ ही परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रह सको और परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सको, तो तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए हो, तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के वचनों में जी रहा है। क्या तुम शैतान की सत्ता से निकलने और परमेश्वर के प्रकाश में रहने के लिए तैयार हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों में रहते हो, तो पवित्र आत्मा को अपना काम करने का अवसर मिलेगा। यदि तुम शैतान के प्रभाव में रहते हो, तो पवित्र आत्मा के पास ऐसा कोई अवसर नहीं होगा। पवित्र आत्मा लोगों पर जो काम करता है, वह जो प्रकाश उन पर डालता है और वह जो आस्था उन्हें देता है, वह केवल एक ही पल तक रहता है; यदि लोग सचेत न रहें और ध्यान न दें, तो पवित्र आत्मा का कार्य उनके पास से निकल जाएगा। यदि लोग परमेश्वर के वचनों में जीते हैं, तो पवित्र आत्मा उनके साथ रहेगा और उन पर काम करेगा; अगर वे परमेश्वर के वचनों में नहीं जीते हैं, तो वे शैतान के बंधन में जीते हैं। यदि वे भ्रष्ट स्वभावों में जीते हैं, तो उनमें पवित्र आत्मा की उपस्थिति और पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होता। यदि तुम परमेश्वर के वचनों की सीमाओं में जी रहे हो और तुम परमेश्वर द्वारा अपेक्षित दशा में जी रहे हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए हो और उसका काम तुम पर किया जाएगा। अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं के दायरे में नहीं जी रहे हो, बल्कि शैतान की सत्ता के अधीन जी रहे हो, तो निश्चित रूप से तुम शैतान की भ्रष्टता के अधीन जी रहे हो। केवल परमेश्वर के वचनों में जीकर और अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित करके ही तुम परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा कर सकते हो। तुम्हें वैसा ही करना चाहिए जैसा परमेश्वर कहता है, तुम्हें परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की बुनियाद और अपने दैनिक जीवन की वास्तविकता बनाना चाहिए; केवल तभी तुम परमेश्वर द्वारा चुने गए व्यक्ति हो। यदि तुम वास्तव में परमेश्वर के इरादों के अनुसार अभ्यास करते हो, तो परमेश्वर तुम पर काम करेगा, और फिर तुम उसके आशीष में रहोगे, उसके मुखमंडल की रोशनी में रहोगे; तुम पवित्र आत्मा के कार्य को समझोगे और परमेश्वर की उपस्थिति का आनंद महसूस करोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 535
अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए, पहले तुम्हें परमेश्वर के प्रति वफादार होना चाहिए और तुम्हारे पास सत्य का अनुसरण करने वाला हृदय होना चाहिए, तभी तुम्हारी दशा सही हो सकती है। अंधकार के प्रभाव से बचने के लिए सही दशा में रहना इसकी पूर्व-शर्त है। सही दशा न होने का मतलब है कि तुम परमेश्वर के प्रति वफादार नहीं हो और तुम्हारे पास सत्य की खोज करने वाला हृदय नहीं है, जिस स्थिति में अंधकार के प्रभाव से बचने का तो प्रश्न ही नहीं उठता। मेरे वचन इंसान के अंधकार के प्रभावों से बचने का आधार हैं और जो लोग मेरे वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं कर सकते, वे अंधकार के प्रभाव के बंधन से बचने में समर्थ नहीं होंगे। सही अवस्था में जीने का अर्थ है परमेश्वर के वचनों के मार्गदर्शन में जीना, परमेश्वर के प्रति वफादार होने की दशा में जीना, सत्य खोजने की दशा में जीना, सच्चे मन से परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की वास्तविकता में जीना और वास्तव में परमेश्वर से प्रेम करने की दशा में जीना। जो लोग इन दशाओं में और इन वास्तविकताओं में जीते हैं, वे जैसे-जैसे सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करेंगे और जैसे-जैसे काम गहन होता जाएगा, वैसे-वैसे वे धीरे-धीरे परिवर्तित होते जाएँगे; और अंत में, वे निश्चित रूप से ऐसे लोग बन जाएँगे जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए गए हैं और सचमुच उससे प्रेम करते हैं। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकले हैं, वे धीरे-धीरे परमेश्वर के इरादों को ग्रहण कर सकते हैं, धीरे-धीरे इसे समझ सकते हैं, और अंततः परमेश्वर के विश्वासपात्र बन जाते हैं। उनके अंदर न केवल परमेश्वर के बारे में कोई धारणा नहीं होती, वे लोग परमेश्वर के खिलाफ कोई विद्रोह भी नहीं करते, बल्कि वे लोग अपनी पिछली धारणाओं और विद्रोह से और भी अधिक घृणा करने लगते हैं और उनके हृदय में परमेश्वर के लिए सच्चा प्यार पैदा हो जाता है। जो लोग अंधकार के प्रभाव से बच निकलने में असमर्थ हैं, वे अपनी देह में लिप्त रहते हैं, और विद्रोह से भरे होते हैं; उनके हृदय मानवीय धारणाओं और सांसारिक आचरण के फलसफों से और साथ ही अपने इरादों और योजनाओं से भरे रहते हैं। परमेश्वर मनुष्य से एकनिष्ठ प्रेम चाहता है; परमेश्वर चाहता है कि मनुष्य उसके वचनों से भरा रहे और उसके प्रति प्यार भरे हृदय से परिपूर्ण रहे। परमेश्वर के वचनों में जीना, उसके वचनों में वह ढूँढ़ना जिसका उसे अनुसरण करना चाहिए, परमेश्वर को उसके वचनों के कारण प्यार करना, उसके वचनों के कारण भागना, उसके वचनों के कारण जीना—मनुष्य को यही सब हासिल करना चाहिए। सब कुछ परमेश्वर के वचनों पर निर्मित किया जाना चाहिए; इंसान तभी परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने में सक्षम हो पाएगा। यदि मनुष्य में परमेश्वर के वचन नहीं होंगे, तो इंसान शैतान के चंगुल में फँसे भुनगे से ज़्यादा कुछ नहीं है! इसका आकलन करो : परमेश्वर के कितने वचनों ने तुम्हारे अंदर जड़ें जमाई हैं? किन चीजों में तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीवन जी रहे हो? किन चीजों में तुम उसके वचनों के अनुसार नहीं जी रहे हो? यदि परमेश्वर के वचन पूरी तरह से तुम्हारे दिल में नहीं बसे हैं, तो तुम्हारे दिल पर आखिर किस चीज ने कब्जा कर रखा है? अपने रोजमर्रा के जीवन में, क्या तुम शैतान द्वारा नियंत्रित किए जा रहे हो, या परमेश्वर के वचनों ने तुम पर अधिकार कर रखा है? क्या तुम्हारी प्रार्थनाएँ परमेश्वर के वचनों की बुनियाद पर आधारित हैं? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के प्रबोधन से अपनी नकारात्मक अवस्था से बाहर आ गए हो? परमेश्वर के वचनों को अपने अस्तित्व की नींव की तरह लेना—यही वो है जिसमें सबको प्रवेश करना चाहिए। यदि तुम्हारे जीवन में परमेश्वर के वचन विद्यमान नहीं हैं, तो तुम अंधकार के प्रभाव में जी रहे हो, तुम परमेश्वर से विद्रोह कर रहे हो, तुम उसका विरोध कर रहे हो, और तुम परमेश्वर के नाम का अपमान कर रहे हो। इस तरह के लोगों का परमेश्वर में विश्वास पूरी तरह से तमाशा और विघ्न है! तुम अपना कितना समय परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीते हो? तुम अपना कितना समय उसके वचनों के अनुसार नहीं जीते हो? परमेश्वर के वचन को तुमसे जो अपेक्षाएँ थीं, उनमें से कितनी तुममें पूरी हुई हैं? कितनी तुममें विफल हो गई हैं? क्या तुमने ऐसी चीज़ों को बारीकी से देखा है?
अंधकार के प्रभाव से बच निकलने के लिए, पवित्र आत्मा के कार्य और इंसान के अधिकतम संभव सहयोग, दोनों की आवश्यकता होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि इंसान सही रास्ते पर नहीं है? जो लोग सही रास्ते पर हैं, वे सबसे पहले, अपना हृदय परमेश्वर को समर्पित कर सकते हैं। इस सबक में प्रवेश करने में लंबा समय लगता है, क्योंकि मानवजाति हमेशा से अंधकार के प्रभाव में जीती आई है, हजारों सालों से शैतान के बंधन में जी रही है। इसलिए यह प्रवेश एक या दो दिन में प्राप्त नहीं किया जा सकता। आज मैंने यह मुद्दा इसलिए उठाया है ताकि लोग अपनी दशाओं की समझ प्राप्त कर सकें; एक बार जब लोग इस बात का भेद पहचान सकेंगे कि अंधकार का प्रभाव क्या होता है और प्रकाश में रहना क्या होता है, तो प्रवेश आसान हो जाता है। क्योंकि इससे पहले कि तुम शैतान के प्रभाव से निकलो, तुम्हें पता होना चाहिए कि यह क्या होता है; तभी तुम्हारे पास धीरे-धीरे इससे मुक्त होने का मार्ग होगा। जहाँ तक यह बात है कि उसके बाद क्या करना है, यह तो इंसान का खुद का मामला है। हर चीज में एक सकारात्मक पहलू से प्रवेश करो, और कभी निष्क्रिय होकर इंतजार मत करो। मात्र यही तरीका है जिससे तुम्हें परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जा सकता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, अंधकार के प्रभाव से बच निकलो और तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाओगे
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 536
परमेश्वर का प्रत्येक वचन हमारे मर्मस्थलों पर चोट करता है; यह हमें आहत करता है और हमारे अंदर गहरा भय पैदा करता है। वह हमारी धारणाओं, कल्पनाओं और हमारे भ्रष्ट स्वभावों को उजागर करता है। हमारे प्रत्येक शब्द, क्रियाकलाप और हमारी प्रत्येक गतिविधि से लेकर हमारे सभी विचारों और दृष्टिकोणों तक हमारा प्रकृति सार उसके वचनों में प्रकट होता है, जो हमें भय और सिहरन की स्थिति में डाल देता है और हम कहीं मुँह छिपाने लायक नहीं रहते। वह एक-एक करके हमें हमारे समस्त क्रियाकलापों, लक्ष्यों और इरादों, यहाँ तक कि हमारे उन भ्रष्ट स्वभावों के बारे में भी बताता है जिन्हें हम खुद भी कभी नहीं जान पाए थे; वह हमें हमारी संपूर्ण अधम अपूर्णता में उजागर होने, यहाँ तक कि पूर्णतः जीत लिए जाने का एहसास कराता है। वह हमारा न्याय करता है क्योंकि हमने उसका विरोध किया, वह हमें ताड़ना देता है क्योंकि हमने उसकी ईशनिंदा की और उसकी निंदा की, वह हमें यह एहसास कराता है कि उसकी नज़र में हमारे अंदर कोई भी सराहनीय गुण नहीं है और हम जीते-जागते शैतान हैं। हमारी आशाएँ चूर-चूर हो जाती हैं; हम उससे अब कोई अतिवादी माँग करने या कोई आकांक्षा रखने का साहस नहीं करते, यहाँ तक कि हमारे स्वप्न भी रातोंरात नष्ट हो जाते हैं। यह वह तथ्य है जिसकी हममें से कोई कल्पना नहीं कर सकता और जिसे हममें से कोई स्वीकार नहीं कर सकता। पल भर के अंतराल में, हम अपना मानसिक संतुलन खो देते हैं और समझ नहीं पाते कि आगे के मार्ग पर कैसे बढ़ें या अपने विश्वास को कैसे जारी रखें। ऐसा लगता है कि हमारी आस्था वापस प्रारंभिक बिंदु पर पहुँच गई है और मानो हम कभी प्रभु यीशु से मिले ही नहीं या उसे जानते ही नहीं। हमारी आँखों के सामने हर चीज हमें पेचीदगी से भर देती है और अनिर्णय से डगमगा देती है। हम हताश हो जाते हैं, हम निराश हो जाते हैं और हमारे दिलों की गहराई में अदम्य क्रोध और अपमान भर जाता है। हम अपने मन की भड़ास निकालने का प्रयास करते हैं, कोई रास्ता खोजने की कोशिश करते हैं और इतना ही नहीं, अपने उद्धारकर्ता यीशु की प्रतीक्षा करते रहते हैं, ताकि उसके सामने अपने दिलों को उड़ेल सकें। यद्यपि कई बार हम बाहर से न तो घमंडी, न ही विनम्र दिखाई देते हैं, फिर भी अपने दिलों में हमें खोने का एहसास होता है, जिसका अनुभव हमने पहले कभी नहीं किया। यद्यपि कभी-कभी हम बाहरी तौर पर असामान्य रूप से शांत दिखाई दे सकते हैं, किंतु हमारा मन किसी तूफानी समुद्र की तरह पीड़ा से क्षुब्ध होता है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें हमारी सभी आशाओं और स्वप्नों से वंचित कर दिया है, और हमारी अनावश्यक इच्छाओं का अंत कर दिया है और हम यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि वह हमारा उद्धारकर्ता है और हमें बचाने में सक्षम है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे और उसके बीच एक खाई पैदा कर दी है, जो इतनी गहरी है कि कोई भी उसे पार करने को तैयार नहीं है। उसके न्याय और ताड़ना के कारण हमने अपने जीवन में पहली बार इतना बड़ा आघात, इतना बड़ा अपमान झेला है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें परमेश्वर के आदर को और मनुष्य के अपराध के प्रति उसकी असहिष्णुता को वास्तव में महसूस कराया है, जिसकी तुलना में हम अत्यधिक नीच, अत्यधिक गंदे हैं। उसके न्याय और ताड़ना ने पहली बार हमें हमारे अभिमान और दंभ से अवगत कराया है और यह भी कि कैसे मनुष्य कभी परमेश्वर की बराबरी नहीं करेगा या कैसे उसकी तुलना परमेश्वर से नहीं हो सकती। उसके न्याय और ताड़ना ने हमारे भीतर छटपटाहट भरी है कि हम अब और ऐसे भ्रष्ट स्वभावों में न जिएँ, जल्द से जल्द इस प्रकृति सार से पीछा छुड़ाएँ, उसकी बेइंतहा नफरत और घृणा का पात्र बनना बंद करें। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें उसके वचनों के प्रति समर्पण करने और उनका पालन करने, उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के खिलाफ अब और विद्रोह न करने का इच्छुक बनाया है। उसके न्याय और ताड़ना ने हमें एक बार फिर जीवित रहने की इच्छा दी है और उसे अपना उद्धारकर्ता सहर्ष स्वीकार करने की भावना दी है...। हम विजय के कार्य से, नरक से, मृत्यु की छाया की घाटी से बाहर आ गए हैं...। सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने हमें, लोगों के इस समूह को प्राप्त कर लिया है! उसने शैतान पर विजय पाई है और अपने असंख्य शत्रुओं को पराजित कर दिया है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 4 : परमेश्वर के प्रकटन को उसके न्याय और ताड़ना में देखना
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 537
जब तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ोगे और सामान्य मानवता का जीवन यापन हासिल करोगे, तभी तुम पूर्ण बनाए जाओगे। यूँ तो तुम भविष्यवाणी नहीं कर पाओगे, न ही कोई रहस्य बता पाओगे, फिर भी तुम एक मनुष्य की छवि को जिओगे और प्रकट करोगे। परमेश्वर ने मनुष्य की रचना की, लेकिन फिर शैतान ने मनुष्य को इस तरह भ्रष्ट कर दिया कि लोग “मृत व्यक्ति” बन गए। इसलिए जब तुम बदल चुके होगे तो उसके बाद इन “मृत व्यक्तियों” जैसे नहीं रह जाओगे। ये परमेश्वर के वचन ही हैं जो लोगों की आत्मा में नई जान डाल देते हैं और उन्हें पुनर्जीवित करा देते हैं, और जब लोगों की आत्माएँ पुनर्जीवित होती हैं, तो वे जीवित हो उठेंगे। जब मैं “मृत व्यक्तियों” की बात करता हूँ तो मैं उन शवों की बात करता हूँ जिनमें आत्मा नहीं होती है, उन लोगों की बात करता हूँ जिनकी आत्मा उनके अंदर मर चुकी होती है। जब लोगों की आत्मा जागती है, तो वे जीवित हो उठते हैं। जिन पवित्र व्यक्तियों की बात पहले की गई थी वे ऐसे लोग हैं जो जीवित हो उठे हैं, जो शैतान के प्रभाव में थे परंतु उन्होंने शैतान को हरा दिया है। चीन के चुने हुए लोगों ने बड़े लाल अजगर का ऐसा क्रूर और अमानवीय उत्पीड़न और छल सहा है, जिसने उन्हें मानसिक रूप से तोड़कर और जीने के लेशमात्र भी साहस के बिना रख छोड़ा है। अतः उनकी आत्मा को जगाने का आरंभ उनके सार से होना चाहिए : उनकी आत्मा को मूलतः थोड़ा-थोड़ा करके जगाया जाना चाहिए। जिस दिन वे जीवित हो उठेंगे, तब कोई रुकावट न रहेगी और सब-कुछ सहजता से आगे बढ़ेगा। फिलहाल यह संभव नहीं है। अधिकतर लोग इस ढंग से जीते हैं जो बहुत-सी प्राणघातक धाराएँ लेकर आता है; वे मृत्यु के माहौल में लिपटे होते हैं और बहुत अधिक ऐसा है जिसका उनमें अभाव होता है। कुछ लोगों के शब्दों में मृत्यु समायी होती है, उनके कार्यों में मृत्यु समायी होती है, और जो कुछ भी वे जीते हैं प्रायः उस सबमें मृत्यु समायी होती है। अगर आज लोग सार्वजनिक रूप से परमेश्वर की गवाही दें तो वे इस काम में असफल हो जाएंगे क्योंकि उनका अभी भी पूर्णतः जीवित हो उठना शेष है और तुम लोगों के मध्य बहुत से मृतक हैं। आज कुछ लोग पूछते हैं कि परमेश्वर कुछ संकेत और चमत्कार क्यों नहीं दिखाता ताकि वह अन्यजाति राष्ट्रों में अपना कार्य शीघ्र फैला सके। मृत लोग परमेश्वर की गवाही नहीं दे सकते; केवल जीवित ही दे सकते हैं; परंतु अधिकांश लोग आज “मृत” हैं, बहुत ही ज्यादा लोग मृत्यु के आवरण में जी रहे हैं, शैतान के प्रभाव में जी रहे हैं और इस पर विजय पाने में असमर्थ हैं। जब बात ऐसी है तो वे परमेश्वर के लिए गवाही कैसे दे सकते हैं? वे सुसमाचार कार्य को कैसे फैला सकते हैं?
वे सब जो अंधकार के प्रभाव में रहते हैं, वे ऐसे लोग हैं जो मृत्यु के बीच जीते हैं, जो शैतान के वश में होते हैं। परमेश्वर द्वारा बचाए जाने और परमेश्वर द्वारा न्याय किए जाने और ताड़ना दिए जाने के बगैर लोग मृत्यु के प्रभाव से नहीं बच सकते; वे जीवित नहीं बन सकते। इस तरह के मृत व्यक्ति परमेश्वर के लिए गवाही नहीं दे सकते, न ही वे परमेश्वर द्वारा इस्तेमाल किए जा सकते हैं, उनका परमेश्वर के राज्य में प्रवेश करना तो दूर की बात है। परमेश्वर को जीवितों की गवाही चाहिए, मृतकों की नहीं, वह यह माँग करता है कि उसके लिए जीवित लोग कार्य करें, मृत नहीं। “मृत” वे हैं जो परमेश्वर का विरोध और उससे विद्रोह करते हैं; ये वे लोग हैं जो आत्मा में संवेदन-शून्य हैं और परमेश्वर के वचनों को नहीं समझते; ये वे लोग हैं जो सत्य को अभ्यास में नहीं लाते और परमेश्वर के प्रति जरा सी भी निष्ठा नहीं रखते, ये वे लोग हैं जो शैतान की शक्ति के अधीन रहते हैं और शैतान द्वारा उपयोग किए जाते हैं। मृत व्यक्तियों के लक्षण हैं सत्य के विरुद्ध खड़े होना, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करना और नीच, घिनौना, नृशंस, दबंग, चालबाज और कपटी होना। भले ही ऐसे लोग परमेश्वर का वचन खाते और पीते हों, तो भी वे परमेश्वर के वचनों को जीने में समर्थ नहीं होते; वे जीवित तो हैं, परंतु वे बस चलती-फिरती लाशें हैं, सांस लेते मृतक हैं। मृत लोग परमेश्वर को संतुष्ट करने में पूर्णतः असमर्थ हैं, उसके प्रति नितांत समर्पणशील होने की तो बात ही दूर है। वे केवल उसे धोखा दे सकते हैं, उसकी ईशनिंदा कर सकते हैं, उससे विश्वासघात कर सकते हैं और वे जिस चीज को जीते हैं वह पूरी तरह शैतान की प्रकृति के खुलासे हैं। यदि लोग जीवित प्राणी बनना, परमेश्वर की गवाही देना और परमेश्वर द्वारा योग्य समझा जाना चाहते हैं तो उन्हें परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करना चाहिए; उन्हें सहर्ष उसके न्याय व ताड़ना के प्रति समर्पण करना चाहिए और परमेश्वर द्वारा काट-छाँट को सहर्ष स्वीकार करना चाहिए। तभी वे परमेश्वर द्वारा अपेक्षित तमाम सत्यों को अभ्यास में ला सकेंगे, तभी वे परमेश्वर का उद्धारकारी अनुग्रह प्राप्त करेंगे और सचमुच जीवित प्राणी बनेंगे। जीवित वे होते हैं जो परमेश्वर द्वारा बचाए जाते हैं; उनका परमेश्वर द्वारा न्याय किया गया है और उनकी परमेश्वर द्वारा ताड़ना की गई है, वे परमेश्वर के लिए खुद को समर्पित करने के इच्छुक होते हैं और खुशी से अपने प्राण न्योछावर करते हैं और वे सहर्ष अपना संपूर्ण जीवन परमेश्वर के लिए खपाते हैं। जब जीवित लोग परमेश्वर की गवाही देते हैं, केवल तभी शैतान को लज्जित किया जा सकता है; केवल जीवित ही परमेश्वर के सुसमाचार कार्य को फैला सकते हैं, केवल जीवित ही परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते हैं और केवल जीवित ही वास्तविक लोग होते हैं। मूलतः परमेश्वर द्वारा बनाया गया मनुष्य जीवित था, परंतु शैतान की भ्रष्टता के कारण मनुष्य मृत्यु में जीता है, शैतान के प्रभाव में जीता है और लिहाजा, इस तरीके से लोग आत्माविहीन मृत हो चुके हैं, वे ऐसे शत्रु बन गए हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, वे शैतान के औजार बन गए हैं और वे शैतान के कैदी बन गए हैं। परमेश्वर ने जिन जीवित लोगों की रचना की थी वे मृत बन गए हैं और इसलिए परमेश्वर ने अपनी गवाही खो दी है और उसने उस मानवजाति को भी खो दिया है जिसे उसने रचा है और जो एकमात्र ऐसी चीज है जिसमें उसकी साँस है। अगर परमेश्वर को अपनी गवाही वापस लेनी है और उन लोगों को वापस लेना है जिसे उसने अपने हाथों से बनाया, लेकिन जो शैतान द्वारा कैद कर लिए गए हैं, तो उसे उन्हें पुनर्जीवित करना होगा जिससे वे जीवित प्राणी बन जाएँ, उसे उन सबको वापस लाना होगा ताकि वे उसकी रोशनी में जी सकें। मृत वे लोग हैं जिनमें आत्मा नहीं होती, जो चरम सीमा तक सुन्न हैं, जो परमेश्वर का विरोध करते हैं, और इससे भी बढ़कर जो परमेश्वर को नहीं जानते हैं। इन लोगों का परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का जरा-सा भी इरादा नहीं होता है; वे बस उसके विरुद्ध विद्रोह करते हैं और उसका विरोध करते हैं और इनमें थोड़ी-सी भी निष्ठा नहीं होती है। जीवित वे हैं जिनकी आत्मा पुनर्जीवित हो चुकी है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण करना जानते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और जिनमें सत्य और गवाही होती है—सिर्फ यही लोग परमेश्वर को अपने घर में पसंद हैं। परमेश्वर उन्हें बचाता है जो जीवित हो सकते हैं, जो परमेश्वर का उद्धार देख सकते हैं, जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान हो सकते हैं, जो परमेश्वर को खोजने के इच्छुक हैं, जो परमेश्वर के देहधारण में विश्वास करते हैं और उसके प्रकटन में विश्वास करते हैं। कुछ लोग जीवित हो सकते हैं और कुछ नहीं; यह इस बात पर निर्भर करता है कि उनकी प्रकृति को बचाया जा सकता है या नहीं। बहुत से लोगों ने परमेश्वर के अनेक वचन सुने हैं परंतु वे उसके इरादों को नहीं समझते हैं और वे अब भी खुद को अभ्यास में लाने में असमर्थ होते हैं। ऐसे लोग किसी भी सत्य को जीने में अक्षम होते हैं और जानबूझकर परमेश्वर के कार्य में बाधा डालते हैं। वे परमेश्वर के लिए कोई भी कार्य करने में अक्षम हैं और वे उसके लिए खुद को खपा नहीं सकते हैं—इसके उलट, वे कलीसिया के पैसे गुप्त रूप से खर्च करते हैं और परमेश्वर के घर में मुफ्तखोरी करते हैं। ये मरे हुए लोग हैं जो बचाए नहीं जा सकते हैं। परमेश्वर उन सारे लोगों को बचाता है जो उसके कार्य के मध्य में हैं, लेकिन लोगों का एक हिस्सा ऐसा भी है जो उसके उद्धार को ग्रहण नहीं कर सकता है; कुछ ही लोग उसके उद्धार को ग्रहण कर सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्यादातर लोग बहुत गहराई तक भ्रष्ट कर दिए गए हैं और मृत हो चुके हैं और वे उद्धार से परे हैं; वे पूर्णतः शैतान द्वारा शोषित हो चुके हैं और वे अपनी प्रकृति में बहुत ही दुर्भावनापूर्ण हैं। लोगों का वह छोटा-सा समूह भी परमेश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पण करने में असमर्थ है। ये वो लोग नहीं हैं जो आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति पूर्णतः निष्ठावान रहे हैं, या जिनमें आरंभ से ही परमेश्वर के प्रति अत्यंत प्रेम रहा है; बल्कि ये लोग परमेश्वर के प्रति उसके विजय के कार्य के कारण समर्पणशील हैं, ये लोग परमेश्वर को उसके सर्वोच्च प्रेम के कारण देखते हैं, वे परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के कारण स्वभावगत बदलाव हासिल करते हैं, और वे परमेश्वर को उसके कार्यों के कारण जानते हैं, उसका वह कार्य जो व्यावहारिक भी है और सामान्य भी। परमेश्वर के इस कार्य के बिना, चाहे ये लोग कितने ही अच्छे क्यों न हों, ये शैतान के ही रहेंगे, ये मृत्यु के ही होंगे, ये मृतक ही रहेंगे। आज यदि ये लोग परमेश्वर का उद्धार प्राप्त कर सकते हैं तो केवल इसलिये कि ये परमेश्वर से सहयोग करने की इच्छा रखते हैं।
परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा के कारण जीवित लोग परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएंगे और उसके वादों में रहेंगे, और मृत व्यक्ति परमेश्वर के प्रति अपने विरोध के कारण परमेश्वर द्वारा तिरस्कृत किए जाएंगे और उसके दंड और शाप के बीच रहेंगे। ऐसा है परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव जिसे कोई भी मनुष्य बदल नहीं सकता है। अपनी खोज के कारण लोग परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करते हैं और रोशनी में जीते हैं; अपनी कुटिल साजिशों के कारण लोगों को परमेश्वर शाप देता है और वे दंड भोगते हैं; अपने बुरे कर्मों के कारण लोग परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाते हैं और अपनी लालसा और निष्ठा के कारण लोग परमेश्वर का आशीष प्राप्त करते हैं। परमेश्वर धार्मिक है : वह जीवितों को आशीष और मृतकों को शाप देता है ताकि वे हमेशा मृत्यु में रहें और कभी भी परमेश्वर के प्रकाश में न रहें। परमेश्वर सदा के लिए अपने साथ-साथ विद्यमान रहने के लिए जीवितों को अपने राज्य में और अपने आशीष में ले लेगा। लेकिन जहाँ तक मृतकों की बात है, वह उन्हें अनंत मृत्यु के हवाले कर देगा। वे उसके विनाश की वस्तु हैं और वे हमेशा शैतान के रहेंगे। परमेश्वर किसी के साथ अनुचित रूप से बिल्कुल भी पेश नहीं आएगा। जो परमेश्वर को वाकई खोजेंगे, वे सब अवश्य ही परमेश्वर के घर में रहेंगे और जो परमेश्वर के खिलाफ विद्रोही होंगे और उसके अनुरूप नहीं होंगे, वे सब निश्चित रूप से उसके दंड में जिएंगे। संभवतः तुम परमेश्वर की देहधारी देह द्वारा किए गए कार्य को लेकर अनिश्चित हो—लेकिन एक दिन परमेश्वर की देह सीधे तौर पर इंसान के परिणाम की व्यवस्था नहीं करेगी; बल्कि उसका आत्मा मनुष्य का गंतव्य निश्चित करेगा। उस समय लोग यह जानेंगे कि परमेश्वर की देह और उसका आत्मा एक ही हैं, उसकी देह गलती नहीं करती है और उसका आत्मा तो बिल्कुल भी गलती नहीं कर सकता है। अंततः वह निश्चित ही अपने राज्य में उन लोगों को ले लेगा जो जीवित हो उठे हैं; न एक अधिक, न एक कम। जो मृत हैं, जो जीवित नहीं हुए हैं, उन्हें निश्चित रूप से शैतान की माँद में फेंक दिया जाएगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या तुम ऐसे व्यक्ति हो जो जीवित हो उठा है?
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 538
मनुष्य में पवित्र आत्मा के मार्ग का पहला चरण है, सबसे पहले, मनुष्य के हृदय को सभी लोगों, घटनाओं और चीज़ों से अलग करते हुए परमेश्वर के वचनों में खींच लाना, जिससे मनुष्य का हृदय यह विश्वास करने लगे कि परमेश्वर के वचन संदेह से परे हैं और पूर्णतया सत्य हैं। अगर तू परमेश्वर पर विश्वास करता है, तो तुझे उसके वचनों पर विश्वास करना होगा; यदि, बरसों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद, तू पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग से अवगत नहीं है, तो क्या तू सच में एक विश्वासी है? एक सामान्य इंसानी जीवन—एक सामान्य इंसानी जीवन जिसका परमेश्वर के साथ सामान्य संबंध है—पाने के लिए तुझे पहले उसके वचनों पर विश्वास करना होगा। अगर तूने लोगों पर पवित्र आत्मा के कार्य के पहले चरण को हासिल नहीं किया है, तो तुम्हारे पास कोई आधार नहीं है। अगर सबसे बुनियादी सिद्धांत भी तेरी पहुँच से परे है तो तू आगे का सफर कैसे तय करेगा? परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण किए जाने के सही मार्ग में कदम रखने का अर्थ है पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य के सही मार्ग में प्रवेश करना; इसका अर्थ है पवित्र आत्मा द्वारा अपनाए गए मार्ग पर कदम रखना। इस वक्त पवित्र आत्मा जिस मार्ग को अपनाता है वह परमेश्वर के मौजूदा वचन हैं। अतः अगर लोग पवित्र आत्मा के मार्ग पर चलने के इच्छुक हैं, तो उन्हें देहधारी परमेश्वर के मौजूदा वचनों के प्रति समर्पण करना चाहिए, और उन्हें खाना तथा पीना चाहिए। जो कार्य वह करता है वो वचनों का कार्य है, सब कुछ उसके वचनों से शुरू होता है, और सब कुछ उसके वचनों, उसके मौजूदा वचनों, पर स्थापित होता है। चाहे बात परमेश्वर के देहधारण के बारे में निश्चित होने की हो या देहधारी परमेश्वर को जानने की, हर एक के लिए उसके वचनों पर अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। अन्यथा लोग कुछ प्राप्त नहीं कर पाएंगे और उनके पास कुछ शेष नहीं रहेगा। सिर्फ परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के आधार पर और इस प्रकार परमेश्वर को जानने और उसे संतुष्ट करने से ही लोग धीरे-धीरे उसके साथ एक सामान्य संबंध स्थापित कर सकते हैं। लोगों के लिए, परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना तथा उन्हें अभ्यास में लाना ही परमेश्वर के साथ श्रेष्ठ सहयोग है। यही वह अभ्यास है जिसके माध्यम से वे सबसे अच्छी तरह परमेश्वर के जन होने की गवाही में अडिग रह पाते हैं। जब लोग परमेश्वर के मौजूदा वचनों को समझते हैं और उनके सार के प्रति समर्पण करने में सक्षम होते हैं, तो वे पवित्र आत्मा की अगुआई वाले पथ पर जीते हैं और वे परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने के सही मार्ग में प्रवेश कर चुके हैं। पहले लोग बस परमेश्वर के अनुग्रह की खोज करने या शांति और आनंद की खोज करने से परमेश्वर के कार्य को प्राप्त कर सकते थे, लेकिन अब बात अलग है। देहधारी परमेश्वर के वचनों के बगैर, उसके वचनों की वास्तविकता के बगैर, लोग परमेश्वर का अनुमोदन प्राप्त नहीं कर सकते हैं और वे सभी परमेश्वर द्वारा निकाल दिए जाएँगे। एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त करने के लिए, लोगों को पहले परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और उनका अभ्यास करना चाहिए; और फिर इस आधार पर परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध स्थापित करना चाहिए। तू कैसे सहयोग करता है? तू परमेश्वर के जन की गवाही में मजबूती से कैसे खड़ा रहता है? तू परमेश्वर के साथ एक सामान्य संबंध कैसे स्थापित करता है?
रोजमर्रा की जिंदगी में परमेश्वर के साथ तुम्हारे सामान्य संबंध हैं या नहीं, इसे कैसे जानें :
1. क्या तू परमेश्वर की स्वयं की गवाही पर विश्वास करता है?
2. क्या तू अपने मन में विश्वास करता है कि परमेश्वर के वचन पूरी तरह सत्य और अचूक हैं?
3. क्या तू वह है जो परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाता है?
4. क्या तू उसके आदेश के प्रति समर्पित है? उसके आदेश के प्रति समर्पित होने के लिए तू क्या करता है?
5. क्या तू अपना हर कार्य परमेश्वर को संतुष्ट करने और उसके प्रति समर्पित रहने के लिए करता है?
ऊपर बताई गई बातों से तू यह मूल्यांकन कर सकता है कि वर्तमान चरण में परमेश्वर के साथ तेरा संबंध सामान्य है या नहीं।
अगर तू परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करने, उसके वादे को स्वीकार करने में सक्षम है और पवित्र आत्मा के मार्ग का अनुसरण कर पाता है, तो तू परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चल रहा है। क्या तू भीतर से पवित्र आत्मा के मार्ग के बारे में स्पष्ट है? इस वक्त, क्या तू पवित्र आत्मा के मार्ग के अनुरूप आचरण करता है? क्या तेरा हृदय परमेश्वर के समीप जा रहा है? क्या तू पवित्र आत्मा के नवीनतम प्रकाश के साथ तालमेल बनाकर चलना चाहता है? क्या तू परमेश्वर द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू पृथ्वी पर परमेश्वर की महिमा की अभिव्यक्ति बनना चाहता है? क्या तुझमें परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करने का संकल्प है? जब परमेश्वर के वचन बोले जाते हैं तब यदि तेरे भीतर सहयोग करने का संकल्प होता है, परमेश्वर को संतुष्ट करने का संकल्प होता है—यदि यही तेरी मानसिक गतिविधि है—तो इसका अर्थ है कि परमेश्वर के वचन तेरे हृदय में प्रभाव पैदा कर चुके हैं। यदि तुझमें ऐसा संकल्प नहीं है और तू किन्हीं भी लक्ष्यों को पाने की कोशिश नहीं करता, तो इसका यह अर्थ है कि तेरा हृदय अभी तक परमेश्वर द्वारा द्रवित नहीं हुआ है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 539
अपने जीवन स्वभाव में परिवर्तन का प्रयास करने में, अभ्यास का मार्ग बहुत ही सरल है। यदि, अपने असल अनुभव में, तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों का पालन और परमेश्वर के कार्य का अनुभव कर सकता है, तो तेरा स्वभाव परिवर्तित हो सकता है। यदि तू पवित्र आत्मा की हर बात का पालन करता है, पवित्र आत्मा की कही हर बात के अनुसार अनुसरण करता है, तो तू उसके प्रति समर्पण करने वाला व्यक्ति है, और तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा। पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों से लोगों का स्वभाव परिवर्तित होता है; यदि तू हमेशा अपने अनुभवों और अतीत के विनियमों से चिपका रहता है, तो तेरे स्वभाव में परिवर्तन नहीं हो सकता। यदि पवित्र आत्मा के आज के कथन सभी लोगों को सामान्य मानवता के जीवन में प्रवेश करने को कहें, लेकिन तेरा ध्यान सतही स्तर की चीज़ों पर ही अटका रहता है और तू वास्तविकता के बारे में अनिश्चित है और इसे गंभीरता से नहीं लेता है, तो तू पवित्र आत्मा के कार्य के साथ कदम से कदम मिलाने में असफल हो गया है, तू कोई ऐसा है जिसने पवित्र आत्मा की अगुआई वाले मार्ग में प्रवेश नहीं किया है। तेरे स्वभाव में परिवर्तन होगा या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तू पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों के साथ चलता है या नहीं और सच्ची समझ तुझमें है या नहीं। यह तुम लोगों की पूर्व की समझ से अलग है। स्वभाव परिवर्तन के विषय में पहले जो तेरी समझ थी वह ये थी कि तू, जो आलोचना करने को इतना तत्पर है, परमेश्वर द्वारा अनुशासित किये जाने के कारण अब मनमाने ढंग से नहीं बोलता है। पर यह परिवर्तन का सिर्फ एक पहलू है। अभी सबसे महत्वपूर्ण बात है पवित्र आत्मा के दिशा निर्देश में रहना : परमेश्वर की हर बात का अनुसरण करना और उसकी हर बात के प्रति समर्पण करना। लोगों के स्वभाव स्वयं लोगों के द्वारा नहीं बदले जा सकते; उन्हें परमेश्वर के वचनों के न्याय, ताड़ना, परीक्षण और शोधन से गुजरना होगा या उसके वचनों द्वारा काट-छाँट का सामना करना और अनुशासित होना होगा। इन सब के बाद ही वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और वफादारी प्राप्त कर सकते हैं और उसके प्रति बेपरवाह होना बंद कर सकते हैं। परमेश्वर के वचनों के शोधन के द्वारा ही मनुष्य के स्वभाव में परिवर्तन आ सकता है। केवल परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन, उनके न्याय, अनुशासन और काट-छाँट से ही वे जल्दबाजी में काम करने की हिम्मत नहीं करेंगे, बल्कि शांत और संयमित बनेंगे। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे परमेश्वर के मौजूदा वचनों और उसके कार्य के प्रति समर्पण करने में सक्षम हो पाएँगे। भले ही यह मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप न हो, वे इन धारणाओं को जाने देने और दिल से समर्पण करने में सक्षम होंगे। पहले स्वभाव में बदलाव की बात मुख्यतः स्वयं के खिलाफ विद्रोह करने, अपने शरीर को कष्ट सहने, अपने शरीर को अनुशासित करने, और अपने आपको शारीरिक प्राथमिकताओं से दूर करने देने के बारे में होती थी—जो एक तरह का स्वभाव परिवर्तन है। आज, सभी जानते हैं कि स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति परमेश्वर के मौजूदा वचनों के प्रति समर्पण करने में है, और साथ ही साथ उसके नए कार्य को सच में समझने में है। इस प्रकार, परमेश्वर के बारे में लोगों का पहले का धारणात्मक ज्ञान मिटाया जा सकता है और वे परमेश्वर का सच्चा ज्ञान और समर्पण प्राप्त कर सकते हैं—केवल यही है स्वभाव में बदलाव की वास्तविक अभिव्यक्ति।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 540
लोगों द्वारा जीवन प्रवेश का अनुसरण परमेश्वर के वचनों पर आधारित है। पहले, यह कहा गया था कि सब कुछ उसके वचनों के कारण ही पूरा होता है, मगर किसी ने भी इस तथ्य को नहीं देखा। अगर तू वर्तमान चरण में प्रवेश करेगा और उसका अनुभव करेगा, तो तुझे सारी बातें स्पष्ट हो जाएँगी और तू भविष्य के परीक्षणों के लिए एक अच्छी नींव खड़ी करेगा। परमेश्वर चाहे जो कहे, केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान दो। जब परमेश्वर कहता है कि वह लोगों को ताड़ना देना शुरू करेगा, तो उसकी ताड़ना को स्वीकार कर। जब परमेश्वर लोगों से मर जाने को कहे, तो यह परीक्षण स्वीकार कर। यदि तू सदा उसके नए कथनों के भीतर जीवन बिताता है, तो अंत में परमेश्वर के वचन तुझे पूर्ण कर देंगे। जितना अधिक तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, उतनी ही शीघ्रता से तुझे पूर्ण किया जाएगा। क्यों मैं हर संगति में तुम सबसे परमेश्वर के वचनों को जानने और उनमें प्रवेश करने को कहता हूँ? केवल जब तू परमेश्वर के वचनों में अनुसरण करता है और उसका अनुभव करता है, और उसके वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करता है, तभी पवित्र आत्मा को तुझ पर कार्य करने का अवसर मिलेगा। इसलिए परमेश्वर के कार्य की हर पद्धति में तुम सब प्रतिभागी हो, और इससे फ़र्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी पीड़ा कितनी अधिक है, अंत में तुम सबको “स्मारिका” मिलेगी। तुम लोगों को अंततः पूर्ण बनाया जा सके, इसके लिए, तुम लोगों को परमेश्वर के सारे वचनों में प्रवेश करना होगा। पवित्र आत्मा द्वारा लोगों की पूर्णता एकतरफा नहीं है; वह लोगों का सहयोग चाहता है। वह चाहता है कि हर कोई स्वेच्छा से उसके साथ सहयोग करे। परमेश्वर चाहे जो भी कहे, केवल उसके वचनों में प्रवेश करने पर ध्यान दो, यह तुम्हारे जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। सारी बातें तुम्हारे स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने के लिए ही हैं। जब तू परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करेगा, तब तेरा हृदय परमेश्वर द्वारा द्रवित किया जाएगा और तू वे सारी बातें समझ पाएगा जो परमेश्वर अपने कार्य के इस चरण में प्राप्त करना चाहता है और तुझमें उसे प्राप्त करने का संकल्प होगा। ताड़ना के समय के दौरान, कुछ लोग थे जिनका मानना था कि यह कार्य करने का एक तरीका है और उन्होंने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया। नतीजतन, वे शोधन से नहीं गुजरे और बिना कुछ पाए या समझे वे ताड़ना की अवधि से बाहर आ गए। कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने बिना किसी संदेह के इन वचनों में प्रवेश किया; जिन्होंने कहा कि परमेश्वर के वचन सच्चे और अचूक हैं और मनुष्यों को ताड़ना मिलनी चाहिए। उन्होंने कुछ समय तक उसमें संघर्ष किया, फिर अपने भविष्य और अपनी नियति को त्याग दिया। और जब वे इससे बाहर निकले, तो उनका स्वभाव थोड़ा-बहुत बदल गया था और उन्होंने परमेश्वर की गहरी समझ पा ली थी। जो लोग ताड़ना से निकल आये, उन सब ने परमेश्वर की मनोहरता का अनुभव किया, और वे जानते थे कि परमेश्वर के कार्य का यह चरण उनमें परमेश्वर के महान प्रेम के अवतरित होने को मूर्त रूप देता है, यह चरण परमेश्वर के प्रेम की विजय और उद्धार है। उन्होंने यह भी कहा कि परमेश्वर के विचार सदैव अच्छे होते हैं, और जो कुछ परमेश्वर मनुष्य पर करता है, वह प्रेम है, घृणा नहीं। जिन लोगों ने परमेश्वर के वचनों पर विश्वास नहीं किया, उसके वचनों पर ध्यान नहीं दिया, ताड़ना के समय शोधन से नहीं गुजरे परिणामस्वरूप उनके साथ पवित्र आत्मा नहीं था, और उन्होंने कुछ भी नहीं पाया। जिन लोगों ने ताड़ना के समय में प्रवेश किया, वे भले ही शोधन से होकर गुजरे, लेकिन पवित्र आत्मा उनके अंदर गुप्त तरीके से कार्य कर रहा था और उसके फलस्वरूप उनके स्वभाव में बदलाव हुआ। कुछ लोग बाहर से हर तरह से, बहुत सकारात्मक दिखते थे, वे सदा आनंदित रहते थे, लेकिन उन्होंने परमेश्वर के वचनों के शोधन की अवस्था में प्रवेश नहीं किया और इसलिए वे बिल्कुल नहीं बदले, जो कि परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं करने का परिणाम था। यदि तू परमेश्वर के वचनों में विश्वास नहीं रखता है तो पवित्र आत्मा तुझ पर कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उन सबके सामने प्रकट होता है जो उसके वचनों पर विश्वास करते हैं। जो लोग उसके वचनों पर विश्वास रखते हैं और उन्हें स्वीकारते हैं, वे उसका प्रेम प्राप्त कर सकेंगे!
परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश करने के लिए, तुझे अभ्यास का मार्ग ढूँढ़ना चाहिए। तुम्हारा जीवन स्वभाव केवल तभी बदल सकता है जब तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने में सक्षम हो। केवल इस मार्ग से ही तू परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जा सकता है और केवल वे ही जो परमेश्वर द्वारा इस तरह से पूर्ण बनाए गए हैं, उसके इरादों के अनुरूप हो सकते हैं। नयी रोशनी पाने के लिए, तुझे उसके वचनों में जीना होगा। केवल एक बार पवित्र आत्मा के द्वारा द्रवित किया जाना काफी नहीं है, तुझे और गहराई में जाना होगा। जो केवल एक बार पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किए गए हैं, उनमें महज उनका आंतरिक उत्साह जाग जाता है और वे अनुसरण करना चाहते हैं, परंतु यह स्थिति लंबे समय तक टिक नहीं सकती; उन्हें लगातार पवित्र आत्मा द्वारा द्रवित किया जाना चाहिए। पहले कई बार मैंने अपनी आशा को व्यक्त किया कि परमेश्वर का आत्मा लोगों की आत्माओं को द्रवित करे, ताकि वे अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने का प्रयास करें, और परमेश्वर द्वारा द्रवित किए जाने का प्रयास करते हुए वे अपनी कमियों को समझ पाएँ, और उसके वचनों को अनुभव करने की प्रक्रिया में, वे अपने अंदर की अशुद्ध चीजों को निकाल फेंकें (आत्मतुष्टता, घमंड, धारणाएँ इत्यादि)। यह न मान बैठ कि बस नई ज्योति को प्राप्त करने में सक्रिय होने से काम चल जाएगा—तुझे सभी नकारात्मक बातों को भी उतार फेंकना होगा। एक ओर, तुम लोगों को सकारात्मक पहलू से प्रवेश करने की जरूरत है, और दूसरी ओर, तुम लोगों को नकारात्मक पहलू से सभी अशुद्ध चीजों से भी छुटकारा पाने की जरूरत है। तुझे लगातार स्वयं की जाँच यह देखने के लिए करनी चाहिए कि अभी भी तेरे भीतर कौन-सी अशुद्ध चीज़ें मौजूद हैं। इंसानों की धार्मिक धारणाएँ, इरादे, आशाएँ, आत्मतुष्टता और घमंड, ये सारी अशुद्ध चीजें हैं। अपने भीतर झाँक और परमेश्वर के प्रकाशन के सभी वचनों से खुद की तुलना कर और देख कि तुझमें कौन-सी धार्मिक धारणाएँ हैं। उन्हें सही तरह से पहचान पाने के बाद ही तू उन्हें निकाल फेंक सकता है। कुछ लोग कहते हैं : “अब बस पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य की ज्योति का अनुसरण करना पर्याप्त है। और किसी भी दूसरी चीज पर ध्यान देने की आवश्यकता नहीं है।” लेकिन जब, तेरी धार्मिक धारणाएँ जागेंगी, तो तू उन्हें कैसे उतार फेंकेगा? क्या तू सोचता है कि परमेश्वर के मौजूदा वचनों का अनुसरण करना एक सरल बात है? अगर तुम धर्म के कोई व्यक्ति हो तो धर्म से जुड़ी तुम्हारी धारणाओं और दिल में बसे पारंपरिक धार्मिक ज्ञान संबंधी सिद्धांतों से गड़बड़ियाँ उत्पन्न हो सकती हैं, ये बातें तुम्हारे द्वारा नई चीजों की स्वीकृति में विघ्न डालती हैं। ये सारी वास्तविक समस्याएँ हैं। यदि तू केवल पवित्र आत्मा के मौजूदा वचनों का ही अनुसरण करता है, तो तू परमेश्वर के इरादों को पूरा नहीं कर सकता। जब तू पवित्र आत्मा की वर्तमान ज्योति का अनुसरण करता है, तो इसके साथ ही तुझे यह पहचानना चाहिए कि तेरे भीतर कौन सी धारणाएँ और इरादे हैं, तुझमें कौन-से मानवीय अहंकार हैं, और कौन से व्यवहार परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं। और इन सारी चीजों को पहचान लेने के बाद, तुझे उन्हें निकाल फेंकना चाहिए। तुझसे तेरे पिछले क्रियाकलापों और व्यवहारों के खिलाफ विद्रोह करवाना, सब तुझे पवित्र आत्मा के आज बोले गए वचनों का अनुसरण करने देने के लिए है। स्वभाव में बदलाव, एक ओर परमेश्वर के वचनों द्वारा हासिल होता है और दूसरी ओर इसके लिए इंसान के सहयोग की आवश्यकता है। एक तो परमेश्वर का कार्य है और दूसरा लोगों का अभ्यास, दोनों ही अपरिहार्य हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 541
अपनी सेवा के भविष्य के पथ में, तू परमेश्वर के इरादों को कैसे पूरा कर सकता है? एक अहम बात है जीवन प्रवेश का अनुसरण करना, अपने स्वभाव में बदलाव का अनुसरण करना और सत्य में अधिक गहराई से प्रवेश करने का अनुसरण करना—यह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और प्राप्त किए जाने का मार्ग है। तुम सभी लोग परमेश्वर के आदेश के प्राप्तकर्ता हो, लेकिन आदेश क्या है? यह कार्य के अगले क़दम से जुड़ा है; अगले चरण का कार्य एक अधिक बड़ा कार्य होगा जो पूरे ब्रह्मांड में किया जाता है, इसलिए आज, तुम लोगों को अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने की चेष्टा करनी चाहिए ताकि भविष्य में तुम सब वास्तव में परमेश्वर द्वारा अपने कार्य के माध्यम से महिमा पाने का एक प्रमाण बन जाओ और तुम लोग उसके भविष्य के कार्य के लिए एक मिसाल बनाए जा सकते हो। आज का अनुसरण पूरी तरह से भविष्य के कार्य के लिए एक नींव बनाने की खातिर है, ताकि तू परमेश्वर द्वारा उपयोग किया जा सके और उसकी गवाही देने में सक्षम बन सके। अगर तू इसे अपने प्रयासों का लक्ष्य बना ले, तो तू पवित्र आत्मा की उपस्थिति को प्राप्त कर पायेगा। तू अपने अनुसरण का लक्ष्य जितना ऊँचा रखेगा, उतना ही अधिक तू पूर्ण बनाया जा सकेगा। जितना अधिक तू सत्य का अनुसरण करेगा, उतना ही अधिक पवित्र आत्मा कार्य करेगा। अनुसरण के लिए तेरा प्रयास जितना अधिक होगा, उतना ही अधिक तू प्राप्त करेगा। पवित्र आत्मा लोगों को उनकी आंतरिक अवस्था के आधार पर पूर्ण करता है। कुछ लोग कहते हैं कि वे परमेश्वर द्वारा उपयोग होने या उसके द्वारा पूर्ण किए जाने के इच्छुक नहीं हैं, वे बस चाहते हैं कि उनकी देह सुरक्षित हो और उन्हें कोई दुर्भाग्य न झेलना पड़े। कुछ लोग राज्य में प्रवेश करना नहीं चाहते लेकिन अथाह कुंड में उतरना चाहते हैं। अगर ऐसा है तो परमेश्वर भी तेरी इच्छा को पूरा करेगा। तू जो भी प्रयास करेगा परमेश्वर उसे पूरा करेगा। तो इस समय तेरा प्रयास क्या है? क्या यह पूर्ण किया जाना है? क्या तेरे वर्तमान कार्यकलाप और व्यवहार परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाने की खातिर हैं, उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के लिए हैं? तुझे अपने रोजमर्रा के जीवन में इस तरह से स्वयं का आकलन निरंतर करना होगा। यदि तू पूरे दिल से एक लक्ष्य का अनुसरण करने में लग जाता है, तो निस्संदेह परमेश्वर तुझे पूर्ण बनाएगा। यह पवित्र आत्मा का मार्ग है। पवित्र आत्मा की अगुआई वाला मार्ग लोगों के अनुसरण के माध्यम से प्राप्त किया जाता है। जितनी अधिक तेरे भीतर परमेश्वर के द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाने की प्यास होगी, पवित्र आत्मा तेरे अंदर उतना ही अधिक काम करेगा। जितना अधिक तू अनुसरण करने में असफल होता है, जितना अधिक तू नकारात्मक और पीछे हटने वाला होता है, पवित्र आत्मा से कार्य करने के अवसर उतने ही कम होते हैं; जैसे-जैसे समय बीतता जाएगा पवित्र आत्मा तुझे त्याग देगा। क्या तू परमेश्वर के द्वारा पूर्ण किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा प्राप्त किया जाना चाहता है? क्या तू परमेश्वर के द्वारा उपयोग किया जाना चाहता है? तुम लोगों को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, प्राप्त किए जाने और उपयोग किए जाने के लिए सब कुछ करने का अनुसरण करना चाहिए, ताकि ब्रह्मांड और उसमें मौजूद सभी चीज़ें तुम लोगों में परमेश्वर के क्रियाकलापों को अभिव्यक्त होते देख सकें। तुम सभी चीजों के बीच स्वामी हो, और जो सभी चीज़ें हैं उन सबके बीच, तुम्हें ऐसा करना चाहिए ताकि परमेश्वर को तुम लोगों के माध्यम से गवाही और महिमा का आनंद मिल सके। केवल इसी से यह साबित होता है कि तुम सभी पीढ़ियों में सबसे सौभाग्यशाली हो!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जिनके स्वभाव परिवर्तित हो चुके हैं, वे वही लोग हैं जो परमेश्वर के वचनों की वास्तविकता में प्रवेश कर चुके हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 542
परमेश्वर के इरादों के प्रति तुम जितने अधिक विचारशील रहोगे, तुम उतना ही अधिक बोझ वहन करोगे और तुम जितना ज्यादा बोझ वहन करोगे, तुम्हारा अनुभव भी उतना ही ज्यादा समृद्ध होगा। जब तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहोगे, तो परमेश्वर तुम पर एक बोझ डाल देगा, और उसने तुम्हें जो काम सौंपे हैं, उनके बारे में वह तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। जब परमेश्वर द्वारा तुम्हें यह बोझ दिया जाएगा, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय संबंधित सत्यों पर विशेष ध्यान दोगे। यदि तुम्हारे ऊपर भाई-बहनों के जीवन की दशाओं से जुड़ा कोई बोझ है, तो यह वही बोझ है जो परमेश्वर द्वारा तुम्हें सौंपा गया है और तुम प्रतिदिन की प्रार्थना में इस बोझ को हमेशा अपने साथ रखोगे। परमेश्वर जो करता है वही तुम पर डाल दिया गया है और तुम वह करने के लिए तैयार हो जिसे परमेश्वर करना चाहता है; परमेश्वर के बोझ को अपना बोझ समझने का यही अर्थ है। इस बिंदु पर, तुम परमेश्वर के वचन को खाने और पीने को इस प्रकार की समस्याओं के इर्द-गिर्द केंद्रित करोगे और तुम सोचोगे, “मैं इन समस्याओं को कैसे हल करूँ? मैं अपने भाई-बहनों को मुक्त होने और उनकी आत्माओं में आनंद पाने में कैसे मदद कर सकता हूँ?” तुम संगति करते समय इन समस्याओं को हल करने पर भी ध्यान केंद्रित करोगे और परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय, तुम उन वचनों को खाने और पीने पर ध्यान केंद्रित करोगे जो इन समस्याओं से संबंधित हैं। बोझ के एहसास के साथ परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, तुम उसकी अपेक्षाओं को समझने लगते हो और फिर तुम्हारे लिए आगे का मार्ग अधिक स्पष्ट हो जाएगा। यह पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी है जो तब होती है जब तुम पर कोई बोझ होता है और यह तुम्हारे लिए परमेश्वर का मार्गदर्शन भी है। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? यदि तुम पर कोई बोझ नहीं है, तो तुम परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय चौकस नहीं रहोगे; जब तुम अपने हृदय में बोझ के साथ परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम उनके सार को समझ पाओगे, अपना मार्ग खोज पाओगे और परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील हो पाओगे। इसलिए, तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह तुम पर और अधिक बोझ डाले और तुम्हें और भी बड़े आदेश सौंपे, ताकि तुम्हारे भविष्य के अभ्यास के लिए तुम्हारे पास एक अधिक स्पष्ट मार्ग हो सके; ताकि तुम्हारे परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से अधिक नतीजे मिलें; ताकि तुम उसके वचनों के सार को समझने में सक्षम हो सको; और ताकि तुम पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित होने में अधिक सक्षम हो सको।
परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना, प्रार्थना में प्रशिक्षण लेना, परमेश्वर के बोझ को स्वीकार करना और उस आदेश को स्वीकार करना जो उसने तुम्हें सौंपा है—यह सब इसलिए है ताकि तुम्हारे पास आगे बढ़ने का एक मार्ग हो। परमेश्वर के आदेश के प्रति तुम्हारा बोझ जितना अधिक होगा, तुम्हारे लिए उसके द्वारा पूर्ण बनाया जाना उतना ही आसान होगा। कुछ लोग तो परमेश्वर की सेवा में दूसरों के साथ सहयोग करने के इच्छुक ही नहीं होते, जबकि वे बुलाए जाते हैं; ये आलसी लोग हैं जो केवल आराम की लालसा रखते हैं। तुमसे जितना अधिक दूसरों के साथ सेवा में सहयोग करने का आग्रह किया जाएगा, तुम उतने ही अधिक अनुभव प्राप्त करोगे। अधिक बोझ और अधिक अनुभव होने के कारण, तुम्हारे पास पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। इसलिए, यदि तुम सच्चे मन से परमेश्वर की सेवा कर सको, तो तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील रहोगे; और इस तरह तुम्हारे पास परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अधिक अवसर होंगे। ऐसे ही लोगों के एक समूह को इस समय पूर्ण बनाया जा रहा है। पवित्र आत्मा जितनी अधिक तीव्रता से तुम्हारे दिल को छूएगा, तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होओगे, तुम्हें परमेश्वर द्वारा उतना अधिक पूर्ण बनाया जाएगा, तुम्हें उसके द्वारा उतना अधिक प्राप्त किया जाएगा, और अंत में, तुम ऐसे व्यक्ति बन जाओगे जिसे परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किया जाता है। वर्तमान में, कुछ ऐसे लोग हैं जो कलीसिया के लिए कोई बोझ नहीं उठाते। ये लोग सुस्त और ढीले-ढाले हैं, वे केवल अपने शरीर की चिंता करते हैं। ऐसे लोग बहुत स्वार्थी होते हैं और अंधे भी होते हैं। यदि तुम इस मामले को स्पष्ट रूप से नहीं देखते, तो तुम कोई बोझ नहीं उठाओगे। तुम जितना अधिक परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहोगे, तुम्हें परमेश्वर उतना ही बड़ा बोझ देगा। स्वार्थी लोग ऐसी चीज़ें सहना नहीं चाहते; वे कीमत नहीं चुकाना चाहते, परिणामस्वरूप, वे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर से चूक जाएँगे। क्या वे अपना नुकसान नहीं कर रहे हैं? यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है, तो तुम कलीसिया के लिए एक सच्चा बोझ विकसित करोगे। असल में इसे कलीसिया के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहने के बजाय इसे अपने जीवन के लिए तुम्हारे द्वारा उठाया गया बोझ कहना बेहतर होगा, क्योंकि तुम कलीसिया के लिए एक बोझ विकसित करते हो ताकि परमेश्वर तुम्हें ऐसे अनुभवों के माध्यम से पूर्ण कर सके। इसलिए, जो कोई भी कलीसिया के लिए सबसे बड़ा बोझ उठाता है, जो कोई भी जीवन प्रवेश के लिए बोझ उठाता है—वे ही वे लोग हैं जिन्हें परमेश्वर पूर्ण करता है। क्या तुमने इसे स्पष्ट रूप से देखा है? यदि तुम जिस कलीसिया में हो वह रेत की तरह बिखरी हुई है, लेकिन तुम चिंतित नहीं हो और परेशान नहीं हो और तुम तब भी आँखें फेर लेते हो जब तुम्हारे भाई-बहन सामान्य रूप से परमेश्वर के वचन खा और पी नहीं सकते, तो यह कोई बोझ न होने की एक अभिव्यक्ति है। ऐसे लोग वे नहीं हैं, जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है। जिन्हें परमेश्वर प्रेम करता है वे धार्मिकता के भूखे और प्यासे होते हैं और वे परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होते हैं। इसलिए, तुम लोगों को परमेश्वर के बोझ के प्रति अभी तुरंत विचारशील हो जाना चाहिए; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होने से पहले तुम्हें तब तक इंतजार नहीं करना चाहिए जब तक कि परमेश्वर असंख्य लोगों के सामने अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट करे। क्या तब तक बहुत देर नहीं हो जाएगी? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए अभी अच्छा अवसर है। यदि तुम अपने हाथ से इस अवसर को निकल जाने दोगे, तो तुम जीवन भर पछताओगे, जैसे मूसा कनान की अच्छी भूमि में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन भर पछताता रहा, पछतावे के साथ ही मरा। जब परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव असंख्य लोगों पर प्रकट होगा, तो तुम पछतावे से भर जाओगे। यदि परमेश्वर तुम्हें ताड़ना नहीं भी देता है, तो भी तुम स्वयं ही अपने आपको अपने पछतावे के कारण ताड़ना दोगे। कुछ लोग इस बात से आश्वस्त नहीं हैं, लेकिन यदि तुम्हें इस पर विश्वास नहीं है, तो इंतजार करो और देखो। कुछ लोग सटीक तौर पर वही लोग हैं जो इन वचनों को स्वयं में साकार होते देखेंगे। क्या तुम इन वचनों के लिए अपनी जान गँवाने को तैयार हो?
यदि तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर नहीं ढूँढ़ते हो और यदि तुम पूर्णता के अपने अनुसरण में बाकियों से आगे रहने का प्रयास नहीं करते हो, तो तुम अंततः पछताओगे। यह समय ही लोगों को पूर्ण बनाए जाने का सबसे अच्छा अवसर है; यह बहुत ही अच्छा समय है। यदि तुम गंभीरतापूर्वक परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण नहीं करते हो, तो उसका काम पूरा हो जाने पर, तुम अवसर से चूक जाओगे—तब बहुत देर हो जाएगी। तुम्हारा संकल्प कितना भी बड़ा हो, यदि परमेश्वर ने काम करना बंद कर दिया है, तो तुम कभी भी पूर्णता हासिल नहीं कर पाओगे, चाहे तुम खुद को कितना भी थका दो। जब पवित्र आत्मा अपना महान कार्य कर रहा हो, तो तुम्हें इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए और सहयोग करना चाहिए। यदि तुम इस अवसर को गँवा दोगे, तो फिर चाहे कितने भी प्रयास कर लो, तुम्हें दूसरा अवसर नहीं दिया जाएगा। तुम में से कुछ लोग चिल्लाते हैं, “परमेश्वर, मैं तुम्हारे बोझ के प्रति विचारशील होने का इच्छुक हूँ, और मैं तुम्हारे इरादों को पूरा करने का इच्छुक हूँ!” लेकिन तुम्हारे पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं है, इसलिए तुम्हारा बोझ टिकेगा नहीं। यदि तुम्हारे सामने एक मार्ग है, तो तुम धीरे-धीरे अनुभव प्राप्त करोगे और तुम्हारा अनुभव अनुक्रमिक और व्यवस्थित होगा। एक बोझ पूरा हो जाने के बाद, तुम्हें दूसरा दिया जाएगा। जैसे-जैसे तुम्हारा जीवन अनुभव गहरा होगा, तुम्हारा बोझ भी गहन होता जाएगा। कुछ लोग तभी बोझ उठाते हैं जब पवित्र आत्मा उनके दिलों को छूता है; कुछ समय के बाद, जब उनके पास अभ्यास का कोई मार्ग नहीं होता, तो वे कोई भी बोझ उठाना बंद कर देते हैं। तुम केवल परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से पूरी तरह से बोझ विकसित नहीं कर सकते। तुम केवल कई सत्यों को समझने, भेद पहचानने की क्षमता प्राप्त करने और सत्य का उपयोग करके समस्याओं को हल करने में सक्षम होने और इस प्रकार परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के इरादों की अधिक सटीक समझ प्राप्त करने से ही बोझ विकसित करोगे। जब तुम्हारे पास बोझ होगा केवल तभी तुम ठीक से कार्य कर पाओगे। यदि तुम्हारे पास बोझ है, लेकिन तुम्हारे पास सत्य की स्पष्ट समझ नहीं है, तो यह भी काम नहीं करेगा; तुम्हें व्यक्तिगत रूप से परमेश्वर के वचनों का अनुभव करना चाहिए, और तुम्हें यह पता होना चाहिए कि उनका अभ्यास कैसे करना है। जब तुम वास्तविकता में प्रवेश कर लोगे, तभी तुम दूसरों को पोषण दे सकोगे, उनकी अगुवाई कर सकोगे, और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जा सकोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 543
वर्तमान में, परमेश्वर का काम हर व्यक्ति को सही पथ पर प्रवेश कराने का है, ताकि हर एक को सामान्य आध्यात्मिक जीवन प्राप्त हो और वह सच्चा अनुभव प्राप्त कर सके, पवित्र आत्मा द्वारा प्रेरित हो जाए और इस नींव के आधार पर, परमेश्वर के आदेशों को स्वीकार करे। राज्य के प्रशिक्षण में प्रवेश करने का उद्देश्य तुम लोगों के प्रत्येक शब्द, प्रत्येक कर्म, प्रत्येक गतिविधि, सोच और विचार को परमेश्वर के वचनों में प्रवेश करने देना है; ताकि परमेश्वर तुम्हारे दिल को और अधिक छुए और इस तरह तुममें परमेश्वर-प्रेमी दिल विकसित हो; और ताकि तुम परमेश्वर के इरादों के लिए और अधिक बोझ उठाओ, ताकि हर व्यक्ति परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर हो, ताकि हर मनुष्य सही मार्ग पर हो। एक बार जब तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर होते हो, तब तुम सही मार्ग पर होते हो। एक बार जब तुम्हारी सोच और विचार, साथ ही तुम्हारे गलत इरादे ठीक किए जा सकते हैं और जब तुम शरीर के लिए विचारशील होने से हटकर परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने में सक्षम होते हो, और जब कभी गलत इरादे उत्पन्न होते हैं, तो उनके विघ्न का प्रतिरोध करने में सक्षम होते हो और परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करते हो—यदि तुम इस प्रकार के बदलाव को प्राप्त करने में सक्षम होते हो, तब तुम जीवन के अनुभव के सही मार्ग पर होते हो। जब प्रार्थना में तुम्हारा प्रशिक्षण सही मार्ग पर होता है, तो तुम्हारी प्रार्थनाओं में पवित्र आत्मा तुम्हारे दिल को छूएगा। जब भी तुम प्रार्थना करोगे, पवित्र आत्मा तुम्हारे दिल को छूएगा; जब भी तुम प्रार्थना करोगे तो तुम परमेश्वर के सामने अपने हृदय को शांत रखने में सक्षम हो जाओगे। जब भी तुम परमेश्वर के वचन के अंश को खाते और पीते हो, यदि तुम उसके द्वारा वर्तमान में किए जा रहे कार्य को समझ पाओ और यह जान जाओ कि प्रार्थना कैसे करें, कैसे सहयोग करें और उनमें कैसे प्रवेश करें, तभी तुम्हारा परमेश्वर के वचनों को खाना और पीना नतीजे दे सकता है। जब परमेश्वर के वचनों में तुम्हें प्रवेश का मार्ग मिल पाएगा और तुम परमेश्वर के वर्तमान कार्य की गतिशीलता और पवित्र आत्मा के कार्य की प्रवृत्ति को समझ जाओगे, तो तुम सही पथ में प्रवेश कर लोगे। यदि तुमने परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते समय मुख्य बिंदुओं को नहीं समझा और उसके बाद भी अभ्यास का मार्ग नहीं ढूँढ़ पाए, तो यह दिखाएगा कि तुम अभी तक नहीं जानते कि परमेश्वर के वचनों को कैसे खाना और पीना है और तुम ऐसा करने का तरीका या सिद्धांत नहीं खोज पाए हो। यदि तुमने उस कार्य को नहीं समझा है जो परमेश्वर वर्तमान में कर रहा है, तो तुम उस दायित्व को स्वीकार नहीं कर पाओगे जो परमेश्वर तुम्हें सौंपेगा। परमेश्वर द्वारा वर्तमान में किया जाने वाला कार्य सटीक रूप से वही है जिसमें मनुष्य को वर्तमान में प्रवेश करना चाहिए और जिसे समझना चाहिए। क्या तुम सब इन बातों को समझते हो?
यदि तुम प्रभावी ढंग से परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते हो, तो तुम्हारा आध्यात्मिक जीवन सामान्य हो जाता है, तो भले ही तुम कैसी भी परीक्षाओं का और परिस्थितियों का सामना करो, कैसे भी शारीरिक रोग झेलो, या भाइयों और बहनों से कैसा भी मनमुटाव हो, या पारिवारिक कठिनाइयों का अनुभव करो, तुम परमेश्वर के वचनों को सामान्य ढंग से खाने-पीने योग्य हो जाते हो, सामान्य ढंग से प्रार्थना कर पाते हो, सामान्य ढंग से कलीसियाई जीवन जी पाते हो; यदि तुम यह सब हासिल कर सको, तो यह दिखाएगा कि तुम सही मार्ग पर प्रवेश कर चुके हो। कुछ लोग बहुत नाजुक होते हैं और उनमें दृढ़ता की कमी होती है। किसी छोटी-सी समस्या का सामना करने पर वे रोने लगते हैं और नकारात्मक हो जाते हैं। सत्य का अनुसरण दृढ़ता और संकल्प की माँग करता है। यदि इस बार तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा करने में नाकाम हुए, तो तुम्हें अपने आप से घृणा हो जानी चाहिए, चुपचाप अपने दिल में दृढ़ निश्चय कर लेना चाहिए कि अगली बार तुम परमेश्वर के इरादों को पूरा करोगे। यदि इस बार तुम परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील नहीं रहे, तो तुम्हें भविष्य में उसी समस्या का सामना करने पर शरीर के खिलाफ विद्रोह के लिए संकल्पित होना चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का संकल्प लेना चाहिए। इस प्रकार तुम प्रशंसा को पाने योग्य बनोगे। कुछ लोग तो यह भी नहीं जानते कि उनकी सोच और विचार सही हैं या नहीं; ऐसे लोग भ्रमित मूर्ख होते हैं! यदि तुम अपने दिल को वश में करना और शरीर के खिलाफ विद्रोह करना चाहते हो, तो पहले तुम्हें यह जानना होगा कि क्या तुम्हारे इरादे सही हैं; तभी तुम अपने दिल को वश में कर सकते हो। यदि तुम्हें यही नहीं पता कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं, तो क्या तुम अपने दिल को वश में और शरीर से विद्रोह कर सकते हो? यदि तुम विद्रोह कर भी दो, तो भी तुम ऐसा भ्रमित स्थिति में करोगे। तुम्हें अपने गलत इरादों के खिलाफ विद्रोह करना आना चाहिए; इसी को देह से विद्रोह करना कहते हैं। एक बार जब तुम जान लेते हो कि तुम्हारे इरादे, सोच और ख्याल गलत हैं, तो तुम्हें तत्काल मुड़ जाना चाहिए और सही पथ पर चलना चाहिए। सबसे पहले इस समस्या की बाधा को पार करो और इसमें प्रवेश पाने के लिए इस संबंध में स्वयं को प्रशिक्षित करो, क्योंकि तुम ही बेहतर जानते हो कि तुम्हारे इरादे सही हैं या नहीं। एक बार जब तुम्हारे गलत इरादे सही हो जाएँगे, ताकि तुम्हारे इरादे परमेश्वर के लिए हों, तब तुम अपने दिल को वश में करने के लक्ष्य को प्राप्त कर चुके होगे।
अब तुम लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण काम यह है कि तुम परमेश्वर और उसके कार्य का ज्ञान प्राप्त करो; तुम्हारे लिए यह जानना भी ज़रूरी है कि पवित्र आत्मा लोगों पर कैसे काम करता है। सही पथ में प्रवेश करने के लिए यह आवश्यक है। एक बार यदि तुमने महत्वपूर्ण बिंदु को समझ लिया तो तुम्हारे लिए ऐसा करना आसान होगा। तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो और परमेश्वर को जानते हो, जो दिखाता है कि परमेश्वर में तुम्हारी आस्था अपने नाम के योग्य है। यदि तुम अनुभव प्राप्त करना जारी रखो, फिर भी अंत में परमेश्वर को न जान पाओ, तो तुम यकीनन ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर का विरोध करता है। जो लोग केवल यीशु मसीह में विश्वास करते हैं, लेकिन आज के देहधारी परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे सभी निंदित किए जाते हैं। वे सभी आधुनिक जमाने के फरीसी हैं, क्योंकि वे आज के परमेश्वर को स्वीकार नहीं करते और वे सब परमेश्वर के विरोधी हैं। भले ही वे यीशु में कितने भी उचित तरीके से विश्वास क्यों न करें, यह सब व्यर्थ होगा; परमेश्वर उन्हें स्वीकृति नहीं देगा। जो लोग परमेश्वर में विश्वास रखने का दावा करते हैं, फिर भी उनके हृदय में परमेश्वर का सच्चा ज्ञान नहीं है, वे सब पाखंडी हैं!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 544
परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने के लिए, व्यक्ति को पहले यह समझना होगा कि परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अर्थ क्या होता है, साथ ही, परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए किन शर्तों को पूरा करना होता है। एक बार जब इंसान ऐसे मामलों को समझ लेता है, तब उसे अभ्यास का मार्ग खोजना ही चाहिए। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए व्यक्ति में एक विशिष्ट स्तर की काबिलियत होनी चाहिए। बहुत-से लोग स्वाभाविक रूप से उच्च काबिलियत वाले नहीं होते, ऐसी स्थिति में तुम्हें कीमत चुकानी चाहिए और स्वयं कड़ी मेहनत करनी चाहिए। तुम्हारी काबिलियत जितनी कम होगी, तुम्हें स्वयं उतना ही अधिक प्रयास करना पड़ेगा। परमेश्वर के वचनों की तुम्हारी समझ जितनी अधिक होगी और जितना अधिक तुम उन्हें अभ्यास में लाओगे, उतनी ही जल्दी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रख सकते हो। प्रार्थना करने से, तुम प्रार्थना के दौरान पूर्ण बनाए जा सकते हो; परमेश्वर के वचनों को खाने एवं पीने से, उनके सार को समझने और उनकी वास्तविकता को जीने से भी तुम्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। दैनिक आधार पर परमेश्वर के वचनों का अनुभव करके, तुम्हें यह जान लेना चाहिए कि तुममें किस बात की कमी है, इससे भी बढ़कर, तुम्हें अपने घातक दोष एवं कमजोरियों को पहचान लेना चाहिए और परमेश्वर से प्रार्थना और विनती करनी चाहिए। ऐसा करके, तुम्हें धीरे-धीरे पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने का रास्ता है : प्रार्थना करना, परमेश्वर के वचनों को खाना एवं पीना, परमेश्वर के वचनों के सार को समझना; परमेश्वर के वचनों के अनुभव में प्रवेश करना; तुममें जिस बात की कमी है उसे जानना; परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पित होना; परमेश्वर के बोझ के प्रति विचारशील होना और अपने परमेश्वर-प्रेमी हृदय द्वारा देह के खिलाफ विद्रोह करना; और अपने भाई-बहनों के साथ निरंतर संगति में शामिल होना, जो तुम्हारे अनुभवों को समृद्ध करता है। चाहे तुम्हारा सामुदायिक जीवन हो या व्यक्तिगत जीवन, और चाहे बड़ी सभाएँ हों या छोटी हों, वे सभी तुम्हें अनुभव प्राप्त करने, प्रशिक्षण प्राप्त करने दे सकते हैं और तुम्हारे दिल को परमेश्वर के सामने शांत रहने और उसकी ओर मुड़ने में सक्षम बना सकते हैं। यह सब कुछ पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया का हिस्सा है। परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने का अर्थ, जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, वास्तव में व्यक्तिगत रूप से उनका अनुभव करने में सक्षम होना और स्वयं को उन्हें जीने देना है—ताकि तुम परमेश्वर के लिए अधिक आस्था और प्रेम प्राप्त कर सको—और ऐसा करके धीरे-धीरे अपने शैतानी भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंक सको, अपने अनुचित इरादों को त्याग सको और एक सामान्य व्यक्ति के समान जीवन जी सको। तुम्हारे भीतर परमेश्वर के लिए अधिकाधिक प्रेम होगा—कहने का तात्पर्य यह है कि तुम्हारे ऐसे हिस्से अधिकाधिक होंगे जिन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया गया है और फिर तुम्हारे वे हिस्से जो शैतान द्वारा भ्रष्ट किए गए हैं, कम से कम होते जाएँगे। अपने व्यावहारिक अनुभवों के जरिए, तुम धीरे-धीरे पूर्ण बनाए जाने के पथ पर कदम रखोगे। इसलिए, यदि तुम पूर्ण बनाए जाना चाहते हो, तो परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना और उसके वचनों का अनुभव करना विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्णता प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील रहो
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 545
परमेश्वर अब लोगों के किसी समूह को प्राप्त करना चाहता है, ऐसे लोगों का समूह जो उसके साथ सहयोग करने के लिए भरसक प्रयास करते हैं, जो उसके कार्य के प्रति समर्पण कर सकते हैं, जो विश्वास करते हैं कि परमेश्वर द्वारा बोले हुए वचन सत्य हैं, जो परमेश्वर की माँगों को अपने अभ्यास में ला सकते हैं; ये वे लोग हैं जिनके हृदयों में सच्ची समझ है, ये वे लोग हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है, और वे निःसंदेह पूर्णता के पथ पर चलने में समर्थ होंगे। जिन्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता है वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर के कार्य की स्पष्ट समझ से रहित हैं, जो परमेश्वर के वचनों को खाते और पीते नहीं हैं, जो उसके वचनों पर कोई ध्यान नहीं देते हैं और जिनके पास कोई परमेश्वर-प्रेमी हृदय नहीं है। जो देहधारी परमेश्वर पर संदेह करते हैं, जो उसके बारे में हमेशा अनिश्चित रहते हैं, जो उसके वचनों को कभी भी गंभीरता से नहीं लेते हैं और हमेशा उसे धोखा देने का प्रयास करते हैं वे ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और शैतान के हैं; ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का कोई तरीका नहीं है।
यदि तू पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो पहले तुझे परमेश्वर की नजरों का कृपापात्र बनना चाहिए, क्योंकि वह उन्हें पूर्ण बनाता है जिन पर वह कृपादृष्टि डालता है और जो उसके इरादों के अनुरूप होते हैं। यदि तू परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होना चाहता है, तो तेरे पास ऐसा हृदय अवश्य होना चाहिए जो उसके कार्य के प्रति समर्पण करता हो, तुझे सत्य का अनुसरण करने के लिए भरसक प्रयास अवश्य करना चाहिए, और तुझे सभी बातों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को अवश्य स्वीकार करना चाहिए। तू जो कुछ भी करता है, क्या वह परमेश्वर की जाँच-पड़ताल से गुजरता है? क्या तेरा इरादा सही है? यदि तेरा इरादा सही है तो परमेश्वर तेरा अनुमोदन करेगा; यदि तेरा इरादा गलत है, तो यह दिखाता है कि तेरा दिल जिससे प्रेम करता है वह परमेश्वर नहीं है, बल्कि देह और शैतान है। इसलिए तुझे सभी मामलों में परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करने के लिए प्रार्थना को एक माध्यम के रूप में इस्तेमाल करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है, तब भले ही मैं व्यक्तिगत रूप से तेरे सामने खड़ा नहीं होता हूँ, लेकिन पवित्र आत्मा तेरे साथ होता है और तू जिससे प्रार्थना करता है वह मैं और परमेश्वर का आत्मा दोनों ही हैं। तू इस देह में विश्वास क्यों करता है? तू इसलिए विश्वास करता है क्योंकि उसमें परमेश्वर का आत्मा है। यदि यह व्यक्ति परमेश्वर के आत्मा के बिना होता तो क्या तू उसमें विश्वास करता? जब तू इस व्यक्ति पर विश्वास करता है, तो तू परमेश्वर के आत्मा पर विश्वास कर रहा होता है। तुम्हारा इस व्यक्ति का भय मानना परमेश्वर के आत्मा का भय मानना है। परमेश्वर के आत्मा पर आस्था इस व्यक्ति पर आस्था है, और इस व्यक्ति पर आस्था परमेश्वर के आत्मा पर भी आस्था है। जब तू प्रार्थना करता है, तो तू महसूस करता है कि परमेश्वर का आत्मा तेरे साथ है और परमेश्वर तेरे सामने है; इसलिए तू उसके आत्मा से प्रार्थना करता है। आज, अधिकांश लोग अपने कृत्यों को परमेश्वर के सम्मुख लाने से डरते हैं; तू परमेश्वर की देह को तो धोखा दे सकता है, परन्तु उसके आत्मा को धोखा नहीं दे सकता है। जो भी मामला परमेश्वर की जाँच-पड़ताल का सामना नहीं कर सकता है वह सत्य के अनुरूप नहीं है और उसे दरकिनार कर देना चाहिए; ऐसा न करना परमेश्वर को नाराज करना है। इसलिए तू चाहे अपने भाई-बहनों के साथ प्रार्थना, बातचीत और संगति कर रहा है या अपना कर्तव्य निभा रहा है और चीजों को कर रहा है, तुझे अपना हृदय परमेश्वर के सम्मुख खोलकर अवश्य रख देना चाहिए। जब तू अपना कार्य पूरा करता है, तो परमेश्वर तेरे साथ होता है, और जब तक तेरा इरादा सही है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए है, तब तक जो कुछ भी तू करेगा, परमेश्वर उसे स्वीकार करेगा; तुझे अपने कार्य को दिल से पूरा करना चाहिए। जब तू प्रार्थना करता है तो तेरे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय होना चाहिए और तुझे परमेश्वर की देखरेख, सुरक्षा और जाँच-पड़ताल खोजनी चाहिए। अगर तेरे ये इरादे हैं, तो तेरी प्रार्थनाएँ फलेंगी। उदाहरण के लिए, जब तू सभाओं में प्रार्थना करता है, यदि तू अपना हृदय खोलता है और परमेश्वर से प्रार्थना करता है और झूठ बोले बिना परमेश्वर को बताता है कि तेरे हृदय में क्या है, तब तेरी प्रार्थनाएँ निश्चित रूप से प्रभावी होंगी। यदि तेरे पास एक सच्चा परमेश्वर-प्रेमी दिल है, तो परमेश्वर से प्रतिज्ञा कर : “परमेश्वर, जो कि स्वर्ग में और पृथ्वी पर और सब वस्तुओं में है, मैं तुझसे प्रतिज्ञा करता हूँ : तेरा आत्मा, जो कुछ मैं करता हूँ, उसकी पड़ताल करे और हर समय मेरी सुरक्षा और देखरेख करे, ताकि जो कुछ भी मैं करूँ वह तुम्हारी उपस्थिति में अडिग रह सके। यदि मेरा हृदय तुझसे प्रेम न करे या यह कभी भी तुझसे विश्वासघात करे, तो तू मुझे कठोरता से ताड़ना और श्राप दे। मुझे न तो इस जीवन में और न आने वाले संसार में क्षमा करना!” क्या तू ऐसी शपथ खाने की हिम्मत करता है? यदि तू नहीं करता है, तो यह दर्शाता है कि तू कायर है, और तू अभी भी खुद से ही प्रेम करता है। क्या तुम लोगों के पास यह संकल्प है? यदि वास्तव में यही तेरा संकल्प है, तो तुझे यह प्रतिज्ञा लेनी चाहिए। यदि तेरे पास संकल्प है और तू ऐसी प्रतिज्ञा लेता है, तो परमेश्वर तेरे संकल्प को पूरा करेगा। जब तू परमेश्वर से प्रतिज्ञा करता है, तो वह सुनता है। परमेश्वर तेरी प्रार्थना और तेरे अभ्यास के आधार पर यह निर्धारित करता है कि तू पापी है या धार्मिक। अभी तुम लोग पूर्ण बनाए जाने की प्रक्रिया में हो और यदि तुझे पूर्ण बनाए जाने में वाकई आस्था है, तो तू जो कुछ भी करता है, वह सब परमेश्वर के सम्मुख लाएगा और उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करेगा। यदि तू कुछ ऐसा करता है जो उग्र रूप से विद्रोहपूर्ण है या यदि तू परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा; उस समय तू चाहे विनाश का सामना करता है या ताड़ना का, यह तेरी अपनी करनी होगी। तूने प्रतिज्ञा ली थी, इसलिए तुझे ही इसका पालन करना चाहिए। यदि तूने कोई प्रतिज्ञा की, लेकिन उसका पालन नहीं किया, तो तुझे विनाश भुगतना होगा। चूँकि प्रतिज्ञा तेरी थी, परमेश्वर तेरी प्रतिज्ञा को साकार करेगा। कुछ लोग प्रार्थना के बाद डरते हैं और कहते हैं, “सब खत्म हो गया! मेरे असंयमी होने का मौका चला गया; बुरी चीजें करने का मेरा मौका चला गया; सांसारिक लालचों में लिप्त होने का मेरा मौका चला गया!” ऐसे लोग अभी भी संसार और पाप को प्यार करते हैं, और उन्हें निश्चित ही विनाश भुगतना पड़ेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके इरादों के अनुरूप हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 546
परमेश्वर के विश्वासी होने के नाते तुम्हें अपने सारे कर्म और क्रियाकलाप उसके सामने लाने और उसकी जाँच-पड़ताल स्वीकार करने में सक्षम होना चाहिए। यदि तुम जो कुछ भी करते हो वह परमेश्वर के आत्मा के सम्मुख लाया जा सकता है, लेकिन परमेश्वर की देह के सम्मुख नहीं लाया जा सकता है तो यह दर्शाता है कि तुमने उसके आत्मा की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं की है। परमेश्वर का आत्मा कौन है? वह व्यक्ति कौन है जिसकी गवाही परमेश्वर देता है? क्या वे एक और एक ही समान नहीं हैं? अधिकतर उन्हें दो अलग अस्तित्वों के रूप में देखते हैं, विश्वास करते हैं कि परमेश्वर का आत्मा तो परमेश्वर का आत्मा है और परमेश्वर जिसकी गवाही देता है वह मात्र एक मानव है। लेकिन क्या तुम गलत नहीं हो? किसकी ओर से यह व्यक्ति काम करता है? जो लोग देहधारी परमेश्वर को नहीं जानते, उनके पास आध्यात्मिक समझ नहीं होती है। परमेश्वर का आत्मा और उसका देहधारी देह एक ही हैं, क्योंकि परमेश्वर का आत्मा देह रूप में प्रकट हुआ है। यदि यह व्यक्ति तुम्हारे प्रति निर्दयी है, तो क्या परमेश्वर का आत्मा दयालु होगा? क्या तुम भ्रमित नहीं हो? आज, जो कोई भी परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार नहीं कर सकता है, वह परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पा सकता है, और जो देहधारी परमेश्वर को न जानता हो, उसे पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। तुम जो कुछ भी करते हो उसे देखो और यह देखो कि क्या यह परमेश्वर के सम्मुख लाया जा सकता है कि नहीं। यदि तुम जो कुछ भी करते हो उसे परमेश्वर के सम्मुख नहीं ला सकते हो तो यह दर्शाता है कि तुम एक कुकर्मी हो। क्या कुकर्मियों को पूर्ण बनाया जा सकता है? तुम जो कुछ भी करते हो, हर क्रियाकलाप, हर इरादा और हर प्रतिक्रिया, अवश्य ही परमेश्वर के सम्मुख लाई जानी चाहिए। इसका मतलब है कि तुम्हारे दैनिक आध्यात्मिक जीवन की हर चीज—प्रार्थना करना, परमेश्वर के करीब आना, परमेश्वर के वचन खाना और पीना, अपने भाइयों और बहनों के साथ संगति करना और कलीसियाई जीवन जीना—से लेकर दूसरों के साथ सहयोग में की जाने वाली तुम्हारी सेवा तक, सब कुछ परमेश्वर के सामने उसकी जाँच-पड़ताल के लिए लाया जाना चाहिए। यह ऐसा अभ्यास है, जो तुम्हें जीवन में संवृद्धि हासिल करने में मदद करेगा। परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करने की प्रक्रिया शुद्धिकरण की प्रक्रिया है। तुम परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को जितना अधिक स्वीकार करते हो, तुम उतने ही अधिक शुद्ध होते जाते हो और तुम उतने ही अधिक परमेश्वर के इरादों के अनुरूप होते जाते हो, ताकि तुम असंयमता में न गिरो और तुम्हारा हृदय उसकी उपस्थिति में जी पाए। जितना तुम उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करते हो, शैतान उतना ही लज्जित होता है और उतना ही अधिक तुम देह के खिलाफ विद्रोह करने में सक्षम होते हो। इसलिए, परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना अभ्यास का वह मार्ग है जिसका सभी को अनुसरण करना चाहिए। चाहे तुम जो भी करो, यहाँ तक कि अपने भाई-बहनों के साथ संगति करते हुए भी, तुम्हें अपने कर्म परमेश्वर के सम्मुख लाने चाहिए और उसकी जाँच-पड़ताल खोजनी चाहिए और तुम्हें उद्देश्यपूर्ण ढंग से स्वयं परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए; यह तुम्हारे अभ्यास को और अधिक सटीक बना देगा। केवल जब तुम जो कुछ भी करते हो वह सब कुछ परमेश्वर के सम्मुख लाते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करते हो, तभी तुम ऐसे व्यक्ति हो सकते हो जो परमेश्वर की उपस्थिति में जीता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके इरादों के अनुरूप हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 547
जिनके पास परमेश्वर की समझ नहीं होती वे कभी भी पूरी तरह परमेश्वर के प्रति समर्पित नहीं हो सकते। ऐसे लोग विद्रोह के पुत्र हैं। वे बहुत महत्वाकांक्षी हैं, और उनमें बहुत अधिक विद्रोहीपन है, इसलिए वे खुद को परमेश्वर से दूर कर लेते हैं और उसकी जाँच-पड़ताल को स्वीकार करने के लिए इच्छुक नहीं हैं। ऐसे लोग आसानी से पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। कुछ लोग परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने के अपने ढंग के मामले में, और उनके प्रति अपनी स्वीकृति में चयनशील होते हैं। वे परमेश्वर के वचन के उन भागों को ग्रहण करते हैं जो उनकी धारणाओं के अनुसार होते हैं जबकि उन्हें अस्वीकार कर देते हैं जो उनकी धारणाओं के अनुसार नहीं हैं। क्या यह परमेश्वर के खिलाफ सबसे स्पष्ट विद्रोह और प्रतिरोध नहीं है? यदि कोई परमेश्वर के बारे में थोड़ी-सी भी समझ हासिल किए बगैर वर्षों से उस पर विश्वास कर रहा हो, तो वह एक छद्म-विश्वासी है। जो लोग परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करने के इच्छुक हैं वे परमेश्वर की समझ पाने का प्रयास करते हैं, वे उसके वचनों को स्वीकार करना चाहते हैं। ये वे हैं जो परमेश्वर की विरासत और आशीषें प्राप्त करेंगे, और वे सबसे धन्य हैं। परमेश्वर उन्हें श्राप देता है जिनके दिलों में उसके लिए कोई स्थान नहीं है। वह ऐसे लोगों को ताड़ना देता है और उन्हें त्याग देता है। यदि तू परमेश्वर से प्यार नहीं करता, तो वो तुझे त्याग देगा और यदि मैं जो कहता हूँ तू उसे नहीं सुनता है, तो मैं वादा करता हूँ कि परमेश्वर का आत्मा तुझे त्याग देगा। यदि तुझे भरोसा नहीं है, तो कोशिश करके देख ले! आज, मैं तुझे अभ्यास के लिए एक रास्ता स्पष्ट रूप से बताता हूँ, लेकिन तू इसे अभ्यास में लाता है या नहीं, यह तेरे ऊपर निर्भर करता है। यदि तू इसमें विश्वास नहीं करता है, यदि तू इसे अभ्यास में नहीं लाता है, तो तू स्वयं देखेगा कि पवित्र आत्मा तुझमें कार्य करता है या नहीं! यदि तू परमेश्वर की समझ पाने का प्रयास नहीं करता है, तो पवित्र आत्मा तुझमें कार्य नहीं करेगा। परमेश्वर उसमें कार्य करता है जो उसके वचनों को सँजोता है और उनका अनुसरण करता है। जितना तू परमेश्वर के वचनों को सँजोयेगा, उतना ही उसका आत्मा तुझमें कार्य करेगा। कोई व्यक्ति परमेश्वर के वचनों को जितना ज्यादा सँजोता है, वह परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने के उतने ही अधिक अवसर प्राप्त करेगा। परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है जो वास्तव में उससे प्रेम करते हैं और वह उन्हें पूर्ण बनाता है, जिनके हृदय उसके सम्मुख शांत रहते हैं। तुझे परमेश्वर के समस्त कार्य को सँजोना चाहिए, उसकी प्रबुद्धता को सँजोना चाहिए, परमेश्वर की उपस्थिति को सँजोना चाहिए, परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा को सँजोना चाहिए और इस बात को सँजोना चाहिए कि कैसे परमेश्वर के वचन तेरे जीवन की वास्तविकता बन जाते हैं और तेरे जीवन की आपूर्ति करते हैं—यह परमेश्वर के इरादों के सबसे अनुरूप है। यदि तू परमेश्वर के कार्य को सँजोता है, यानी उसने तुझ पर जो कार्य किया है अगर तू उस सबको सँजोता है, तो वह तुझे आशीष देगा और जो कुछ तेरा है उसे बहुगुणित करेगा। यदि तू परमेश्वर के वचनों को नहीं सँजोता है, तो वह तुझ पर कार्य नहीं करेगा; वह तेरे विश्वास के लिए केवल थोड़ा-सा अनुग्रह देगा, तुझे कुछ भौतिक आशीष लेने देगा या तेरे परिवार को थोड़ी-सी सुरक्षा देगा। तुझे परमेश्वर के वचनों को अपनी वास्तविकता बनाने, उसे संतुष्ट कर पाने और उसके इरादों के अनुरूप होने का प्रयास करना चाहिए; तुझे केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने का प्रयास नहीं करना चाहिए। विश्वासियों के लिए परमेश्वर के कार्य को प्राप्त करने, पूर्णता पाने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने वाला बनने की अपेक्षा कुछ भी अधिक महत्वपूर्ण नहीं है। यह वह लक्ष्य है जिसका तुझे अनुसरण करना चाहिए।
अनुग्रह के युग में मनुष्य ने जिस चीज का अनुसरण किया था, वह सब अब अप्रचलित हो चुका है क्योंकि वर्तमान में अनुसरण का एक उच्चतर मानक है; जिसका अनुसरण किया जाता है वह अधिक उत्कृष्ट भी है और अधिक व्यावहारिक भी, जिसका अनुसरण किया जाता है वह मनुष्य की भीतरी आवश्यकता को बेहतर ढंग से संतुष्ट कर सकता है। पिछले युगों में, परमेश्वर लोगों पर उस तरह कार्य नहीं करता था जैसे वह आज करता है; वह उनसे उतनी बातें नहीं करता था जितनी आज करता है, न ही उसे उनसे उतनी अपेक्षाएँ थीं जितनी कि आज के लोगों से हैं। आज परमेश्वर की तुम लोगों से ये अपेक्षाएँ हैं, यह दिखाता है कि परमेश्वर का अंतिम इरादा तुम लोगों पर, यानि लोगों के इस समूह पर केन्द्रित है। यदि तू वास्तव में परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहता है, तो सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य के रूप में इसका अनुसरण कर। चाहे तू भाग-दौड़ कर रहा है, खुद को खपा रहा है, कोई कर्तव्य निभा रहा है या परमेश्वर का आदेश स्वीकार कर रहा है, इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हमेशा पूर्ण बनाए जाने और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने का लक्ष्य रख। यदि कोई कहता है कि वह परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने या जीवन प्रवेश का अनुसरण नहीं करता है, बल्कि केवल दैहिक सुकून और आनंद का अनुसरण करता है, तो वह लोगों में सबसे अंधा है। जो जीवन वास्तविकता का अनुसरण नहीं करते हैं, बल्कि केवल आने वाले संसार में अनन्त जीवन और इस संसार में सुरक्षा का अनुसरण करते हैं, वे सबसे अधिक अंधे लोग हैं। इसलिए तू जो भी करता है, वह सब परमेश्वर के द्वारा पूर्ण बनाए जाने और उसके द्वारा प्राप्त किए जाने के उद्देश्य से किया जाना चाहिए।
परमेश्वर लोगों पर जो कार्य करता है, वह उनकी विभिन्न प्रकार की आवश्यकताओं के आधार पर उनकी आपूर्ति करने के लिए है। व्यक्ति का जीवन जितना बड़ा होता है, उतना ही अधिक उसे जरूरत है और उतना ही अधिक वह अनुसरण करता है। यदि इस चरण में तेरे पास कोई लक्ष्य नहीं है, तो यह साबित करता है कि पवित्र आत्मा ने तुझे छोड़ दिया है। जो जीवन का अनुसरण करते हैं, वे सब कभी भी पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं त्यागे जाएंगे; ऐसे लोगों के पास अनुसरण करने के लिए हमेशा कुछ होता है, उनके दिल में हमेशा ललक होती है। इस प्रकार के लोग अपनी वर्तमान स्थिति से कभी भी संतुष्ट नहीं होते हैं। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रत्येक चरण का उद्देश्य तुम में एक प्रभाव उत्पन्न करना है, लेकिन यदि तुम अपनी वर्तमान स्थिति के बारे में आत्मसंतुष्ट हो जाते हो, यदि तुम्हारी अब आवश्यकताएँ नहीं रह जाती हैं, यदि तुम पवित्र आत्मा के कार्य को स्वीकार नहीं करते हो, तो वह तुम्हें त्याग देगा। लोगों को हर दिन परमेश्वर की जाँच-पड़ताल की आवश्यकता होती है; उन्हें परमेश्वर से हर दिन प्रचुर आपूर्ति की आवश्यकता होती है। क्या लोग प्रतिदिन परमेश्वर के वचन खाए और पिए बिना रह सकते हैं? यदि कोई ऐसा हमेशा महसूस करता है कि वह परमेश्वर के वचनों को जितना भी खा-पी ले, यह कम ही रहेगा, यदि वह हमेशा खोजता है और हमेशा धार्मिकता के लिए भूखा-प्यासा होता है, तो पवित्र आत्मा हमेशा उसमें कार्य करेगा। जितना ज्यादा कोई धार्मिकता के लिए भूखा-प्यासा होता है, उतना ही ज्यादा वह व्यावहारिक चीजों पर सहभागिता करने में सक्षम होता है। कोई व्यक्ति सत्य खोजने पर जितना अधिक ध्यान देता है, उतनी ही तेजी से वह अपने जीवन में वृद्धि हासिल करता है, जिससे वह परमेश्वर के घर में विशद अनुभवी और समृद्ध हो जाता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर उन्हें पूर्ण बनाता है, जो उसके इरादों के अनुरूप हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 548
पवित्र आत्मा के पास प्रत्येक व्यक्ति में चलने के लिए एक मार्ग है, और वह प्रत्येक व्यक्ति को पूर्ण बनाए जाने का अवसर प्रदान करता है। तुम्हारी नकारात्मकता के माध्यम से तुम्हें तुम्हारी भ्रष्टता ज्ञात करवाई जाती है, और फिर नकारात्मकता को फेंककर तुम्हें अभ्यास करने का मार्ग मिल जाएगा; इन्हीं सब तरीकों से तुम पूर्ण बनाए जाते हो। इसके अतिरिक्त, अपने भीतर कुछ सकारात्मक चीज़ों के निरंतर मार्गदर्शन और रोशनी के द्वारा तुम अपना कार्य अग्रसक्रियता से पूरा करोगे, तुम्हारी अंतर्दृष्टि विकसित होगी और तुम विवेक प्राप्त करोगे। जब तुम्हारी स्थितियाँ अच्छी होती हैं, तुम परमेश्वर के वचनों को पढ़ने के विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और परमेश्वर से प्रार्थना करने के भी विशेष रूप से इच्छुक होते हो, और जो उपदेश तुम सुनते हो, उसे अपनी अवस्था के साथ जोड़ सकते हो। ऐसे समय परमेश्वर तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध और रोशन करता है, और तुम्हें सकारात्मक पहलू वाली कुछ चीज़ों का एहसास कराता है। इसी तरह से तुम सकारात्मक पहलू में पूर्ण बनाए जाते हो। नकारात्मक अवस्थाओं में तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो; तुम्हें महसूस होता है कि तुम्हारे दिल में परमेश्वर नहीं है, फिर भी परमेश्वर तुम्हें रोशन करता है और अभ्यास करने का मार्ग खोजने में तुम्हारी सहायता करता है। इससे बाहर आना नकारात्मक पहलू में पूर्णता प्राप्त करना है। परमेश्वर मनुष्य को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों पहलुओं में पूर्ण बना सकता है। यह इस पर निर्भर करता है कि तुम अनुभव करने में सक्षम हो या नहीं, और तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए प्रयास करते हो या नहीं। यदि तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करते हो, तो नकारात्मक पहलू तुम्हारी हानि नहीं कर सकता, बल्कि तुम्हारे लिए अधिक वास्तविक चीजें ला सकता है, तुम्हें यह जानने में और अधिक सक्षम कर सकता है कि तुम्हारे भीतर क्या कमी है, अपनी वास्तविक दशा को समझने में अधिक सक्षम बना सकता है और यह देखने में भी कि मनुष्य के पास कुछ नहीं है और मनुष्य कुछ नहीं है; यदि तुम परीक्षण अनुभव नहीं करते, तो तुम नहीं जानते, और तुम हमेशा यह महसूस करोगे कि तुम दूसरों से ऊपर हो और प्रत्येक व्यक्ति से बेहतर हो। इस सबके द्वारा तुम देखोगे कि जो कुछ पहले घटित हुआ था, वह सब परमेश्वर द्वारा किया गया था और सुरक्षित रखा गया था। परीक्षणों में प्रवेश तुम्हें प्रेम या आस्था से रहित बना देता है, तुममें प्रार्थना की कमी होती है और तुम भजन गाने में असमर्थ होते हो और इसे जाने बिना ही तुम इसके मध्य स्वयं को जान लेते हो। परमेश्वर के पास मनुष्य को पूर्ण बनाने के अनेक साधन हैं। मनुष्य के भ्रष्ट स्वभावों की काट-छाँट करने के लिए परमेश्वर समस्त प्रकार के परिवेशों का उपयोग करता है और मनुष्य को बेनकाब करने के लिए विभिन्न चीजों का उपयोग करता है; एक ओर वह मनुष्य की काट-छाँट करता है, दूसरी ओर वह मनुष्य को बेनकाब करता है और तीसरी ओर वह मनुष्य को उजागर करता है, उसके हृदय की गहराइयों में स्थित “रहस्यों” को खोदकर निकालता है, उजागर करता है और मनुष्य की अनेक दशाओं को उजागर करके उसकी प्रकृति दिखाता है। परमेश्वर मनुष्य को अनेक विधियों से पूर्ण बनाता है—प्रकाशन द्वारा, मनुष्य की काट-छाँट करके, मनुष्य के शोधन द्वारा और ताड़ना द्वारा—जिससे मनुष्य जान सके कि परमेश्वर व्यावहारिक है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 549
तुम लोग अभी किसका अनुसरण करते हो? परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का, परमेश्वर को जानने का, परमेश्वर को प्राप्त करने का—या शायद नब्बे के दशक के किसी पतरस के व्यवहार का, या अय्यूब से भी अधिक आस्था का, या शायद परमेश्वर द्वारा धार्मिक कहलाए जाने का और परमेश्वर के सिंहासन के समक्ष आने का, या पृथ्वी पर परमेश्वर को अभिव्यक्त कर पाने का और परमेश्वर के लिए सशक्त और ज़बरदस्त गवाही देने में सक्षम होने का। तुम लोग चाहे जिसका भी अनुसरण करो, कुल मिलाकर, यह सब कुछ परमेश्वर द्वारा बचाए जाने के लिए ही है। भले ही तुम धार्मिक बनने का अनुसरण करते हो, पतरस के जैसे व्यवहार या अय्यूब की आस्था का अनुसरण करते हो या परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करते हो, यह सब वह कार्य है जो परमेश्वर मनुष्य पर करता है। दूसरे शब्दों में, चाहे जिसका भी तुम अनुसरण करो, वह सब परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए है, परमेश्वर के वचन को अनुभव करने के लिए है, परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए है; तुम चाहे जिस चीज़ का अनुसरण करो, वह सब परमेश्वर की मनोहरता की खोज करने के लिए है, अपने विद्रोही स्वभाव को त्याग पाने, अपने भीतर एक सामान्य अवस्था प्राप्त करने, परमेश्वर के इरादों के बिल्कुल अनुरूप होने, एक सही व्यक्ति बनने और अपने हर कार्य में सही प्रेरणा रखने के उद्देश्य के साथ वास्तविक अनुभव में अभ्यास का पथ खोजने के लिए है। तुम्हारे द्वारा इन सब चीज़ों को अनुभव करने का कारण परमेश्वर को जानना और जीवन के विकास को प्राप्त करना है। यद्यपि जो तुम अनुभव करते हो, वह परमेश्वर के वचन और वास्तविक घटनाएँ, और साथ ही आसपास के लोग, घटनाएँ और चीजें हैं, लेकिन अंततः तुम परमेश्वर को जानने और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने में समर्थ हो जाते हो। धार्मिक व्यक्ति के मार्ग पर चलने का अनुसरण करना या परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाने का अनुसरण करना : ये दौड़ने के मार्ग हैं, जबकि परमेश्वर को जानना और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना मंज़िल है। चाहे अभी तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने का अनुसरण करो या परमेश्वर की गवाही देने का अनुसरण करो, यह सब अंततः परमेश्वर को जानने के लिए है; यह इसलिए है कि जो कार्य वह तुम्हारे ऊपर करता है, वह व्यर्थ न जाए, जिससे अंततः तुम परमेश्वर की व्यावहारिकता, उसकी महानता, और इससे भी अधिक, परमेश्वर की विनम्रता और अप्रत्यक्षता जान जाओ, और उस कार्य को जान जाओ, जिसे वह तुम्हारे ऊपर बड़ी मात्रा में करता है। परमेश्वर ने स्वयं को इस स्तर तक विनम्र किया है कि वह अपना कार्य इन अशुद्ध और भ्रष्ट लोगों पर करता है, और लोगों के इस समूह को पूर्ण बनाता है। परमेश्वर न केवल लोगों के बीच रहने और खाने-पीने, लोगों की चरवाही करने और जो उनकी जरूरतें हैं, उन्हें प्रदान करने के लिए देहधारी हुआ है। बल्कि इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह उद्धार और विजय का अपना विशाल कार्य इन अत्यधिक भ्रष्ट लोगों पर करता है। वह इन सबसे अधिक भ्रष्ट लोगों को बचाने के लिए बड़े लाल अजगर के केंद्र में आया, जिससे सभी लोग परिवर्तित हो सकें और नए बनाए जा सकें। वह अत्यधिक कष्ट, जो परमेश्वर सहन करता है, मात्र वह कष्ट नहीं है जो वह देहधारी बनने में सहन करता है, अपितु सबसे बढ़कर वह परम निरादर है, जो परमेश्वर का आत्मा सहन करता है—वह स्वयं को इतना अधिक विनम्र बनाता है और इतना अधिक छिपाए रखता है कि वह एक साधारण व्यक्ति बन जाता है। परमेश्वर ने देहधारण किया और देह का रूप लिया, ताकि लोग देखें कि उसके पास सामान्य मानवीय जीवन है और सामान्य मानवीय जरूरतें भी हैं। यह इस बात को प्रमाणित करने के लिए पर्याप्त है कि परमेश्वर ने स्वयं को बेहद विनम्र बनाया है। परमेश्वर का आत्मा देह में साकार होता है। उसका आत्मा इतना सर्वोच्च और महान है, लेकिन फिर भी वह अपने आत्मा का कार्य करने के लिए एक साधारण मानव, एक मामूली मानव का रूप धारण करता है। तुममें से हरेक व्यक्ति की काबिलियत, अंतर्दृष्टि, विवेक, मानवता और जीवन के लिहाज से तुम सब वास्तव में परमेश्वर के इस प्रकार के कार्य को ग्रहण करने के अयोग्य हो और तुम लोग वास्तव में इस योग्य नहीं हो कि परमेश्वर तुम्हारे लिए यह कष्ट उठाए। परमेश्वर इतना ऊँचा है। वह इस हद तक सर्वोच्च है और लोग इस स्तर तक नीच हैं, फिर भी वह उन पर कार्य करता है। उसने लोगों का भरण-पोषण करने, उनसे बात करने के लिए न केवल देहधारण किया, वह उनके साथ रहता भी है। परमेश्वर इतना विनम्र, इतना प्यारा है। यदि परमेश्वर के प्रेम का उल्लेख किए जाते ही, उसके अनुग्रह का उल्लेख किए जाते ही तुम उसकी अत्यधिक प्रशंसा करते हुए आँसू बहाने लगते हो, यदि तुम इस स्थिति तक पहुँच जाते हो, तो तुम्हें परमेश्वर का वास्तविक ज्ञान है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 550
आजकल लोगों के अनुसरणों में एक भटकाव है : वे मात्र परमेश्वर से प्रेम करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने का अनुसरण करते हैं, परंतु उन्हें परमेश्वर का कोई ज्ञान नहीं है, और उन्होंने अपने भीतर पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता और रोशनी की उपेक्षा कर दी है। उनके पास परमेश्वर के सच्चे ज्ञान की नींव नहीं है। इस तरह से वे, जैसे-जैसे उनका अनुभव बढ़ता है, अपना उत्साह खोते जाते हैं। वे सभी लोग, जो परमेश्वर के बारे में वास्तविक ज्ञान का अनुसरण करते हैं, भले ही वे अतीत में अच्छी स्थितियों में न रहे हों, और उनका झुकाव नकारात्मकता और दुर्बलता की ओर रहा करता हो, और वे प्रायः आँसू बहाते हों, हतोत्साहित और हताश हो जाते हों—अब वे जैसे-जैसे अधिक अनुभव प्राप्त करते हैं, उनकी स्थितियाँ सुधरती जाती हैं। काट-छाँट किए जाने और तोड़े जाने के अनुभव के बाद, और परीक्षण लिए जाने और शोधन किए जाने के एक अनुभव के बाद उन्होंने बहुत अधिक उन्नति की है। उनकी नकारात्मक अवस्थाएँ कम हो गई हैं, और उनके जीवन स्वभाव में कुछ परिवर्तन हुआ है। जैसे-जैसे वे अधिक परीक्षणों से गुज़रते हैं, उनका हृदय परमेश्वर से प्रेम करने लगता है। परमेश्वर द्वारा लोगों को पूर्ण बनाए जाने का एक नियम है, जो यह है कि वह तुम्हारे किसी वांछनीय भाग का प्रयोग करके तुम्हें प्रबुद्ध करता है, जिससे तुम्हारे पास अभ्यास करने का एक मार्ग हो और तुम समस्त नकारात्मक अवस्थाओं से खुद को अलग कर सको, तुम्हारी आत्मा को मुक्ति पाने में मदद करता है और तुम्हें उससे अधिक प्रेम कर पाने में सक्षम बनाता है। इस तरह से तुम भ्रष्ट शैतानी स्वभावों को उतार फेंकने में सक्षम हो जाते हो। अगर तुम सरल और कुछ न छिपाने वाले हो, और स्वयं को जानने और सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक हो, तो परमेश्वर स्वाभाविक रूप से तुम्हें आशीष देगा, और जब तुम दुर्बल और नकारात्मक होते हो, तो वह तुम्हें दोगुना प्रबुद्ध करेगा, स्वयं को और अधिक जानने में तुम्हारी सहायता करेगा, अपने दिल में पश्चात्ताप महसूस करने के लिए और अधिक इच्छुक होने और उन चीज़ों का अभ्यास करने में मदद करेगा, जिनका तुम्हें अभ्यास करना चाहिए। केवल इसी तरह से तुम्हारा हृदय शांत और सहज हो सकता है। जो व्यक्ति साधारणतः परमेश्वर को जानने पर ध्यान देता है, स्वयं को जानने पर ध्यान देता है, अपने अभ्यास पर ध्यान देता है, वह निरंतर परमेश्वर का कार्य, और साथ ही परमेश्वर का मार्गदर्शन और प्रबुद्धता प्राप्त करने में भी समर्थ होगा। एक नकारात्मक अवस्था में होने पर भी ऐसा व्यक्ति चीज़ों को फौरन उलट देने में सक्षम हो जाता है, चाहे वह ऐसा अंतःकरण की कार्रवाई के कारण करे या परमेश्वर के वचनों से प्राप्त प्रबुद्धता के कारण। व्यक्ति के स्वभाव में परिवर्तन हमेशा तभी प्राप्त होता है, जब वह अपनी वास्तविक अवस्था और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य को जानता है। जो व्यक्ति स्वयं को जानने और खोलने का इच्छुक होता है, वही सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होगा। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है। एक व्यक्ति जो परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होता है, उसमें परमेश्वर के बारे में समझ होती है, भले ही वह समझ गहरी हो या उथली, अल्प हो या प्रचुर। यह परमेश्वर की धार्मिकता है, और इसे ही लोग प्राप्त करते हैं; यह उनका अपना लाभ है। जिस व्यक्ति के पास परमेश्वर का ज्ञान है, वह ऐसा व्यक्ति है जिसके पास एक आधार है, जिसके पास दर्शन है। इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के देह के बारे में निश्चित होता है, और परमेश्वर के वचनों और उसके कार्य के बारे में भी निश्चित होता है। परमेश्वर चाहे कैसे भी कार्य करे या बोले, या अन्य लोग कैसे भी बाधा उत्पन्न करें, वह अपनी बात पर अडिग रह सकता है, और परमेश्वर के प्रति अपनी गवाही में अडिग रह सकता है। व्यक्ति जितना अधिक इस प्रकार का होता है, वह उस सत्य का उतना ही अधिक अभ्यास कर सकता है, जिसे वह समझता है। चूँकि वह हमेशा परमेश्वर के वचनों का इस तरह अभ्यास करता है, इसलिए वह परमेश्वर के बारे में और अधिक समझ प्राप्त कर लेता है और उसके पास परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में हमेशा दृढ़ बने रहने का निश्चय होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 551
विवेक होने, समर्पण होने और आत्मा से प्रखर होने के लिए चीज़ों को समझने की योग्यता रखने का अर्थ है कि जैसे ही तुम्हारा सामना किसी चीज़ से होता है, तुम्हारे पास परमेश्वर के वचन होते हैं जो तुम्हें भीतर से रोशन और प्रबुद्ध करते हैं। यही आत्मा से प्रखर होना है। परमेश्वर जो कुछ भी करता है, वह लोगों की आत्मा को पुनर्जीवित करने में उनकी सहायता करने के लिए होता है। परमेश्वर हमेशा क्यों कहता रहता है कि लोग सुन्न और मंदबुद्धि हैं? ऐसा इसलिए है, क्योंकि लोगों की आत्मा मर चुकी है, और वे इतने सुन्न हो चुके हैं कि वे आत्मा की चीज़ों के संबंध में पूर्णतः अचेत हो गए हैं। परमेश्वर का कार्य लोगों के जीवन को उन्नत करना और लोगों की आत्मा को जीवित करने में सहायता करना है, जिससे वे आत्मा की चीज़ों को समझ सकें और हमेशा अपने हृदय में परमेश्वर से प्रेम करने और उसे संतुष्ट करने में सक्षम हों। इस चरण पर पहुँचना यह दर्शाता है कि उस व्यक्ति की आत्मा पुनर्जीवित कर दी गई है, और अगली बार जब वह किसी चीज़ का सामना करता है, तो वह तुरंत प्रतिक्रिया कर सकता है। वह धर्मोपदेशों के प्रति प्रतिक्रियाशील होता है और परिस्थितियों के प्रति तेजी से प्रतिक्रिया करता है। यही आत्मा की प्रखरता हासिल करना है। ऐसे अनेक लोग हैं, जो किसी बाहरी घटना के प्रति त्वरित प्रतिक्रिया देते हैं, परंतु जैसे ही वास्तविकता में प्रवेश या आत्मा की विस्तृत चीज़ों का उल्लेख किया जाता है, वे सुन्न और मंदबुद्धि बन जाते हैं। वे तभी कुछ समझते हैं, जब वह उन्हें साफ-साफ समझाया जाता है। ये सभी आत्मिक रूप से सुन्न और मंदबुद्धि होने, आत्मा की चीज़ों का कम अनुभव रखने की अभिव्यक्तियाँ हैं। कुछ लोग आत्मा में प्रखर होते हैं और विवेक रखते हैं। जैसे ही वे ऐसे वचन सुनते हैं जो उनकी अवस्थाओं को खोलकर रख देते हैं, वे उन्हें लिखने में कोई समय नहीं गँवाते। जब वे अभ्यास के सिद्धांतों के बारे में सुन लेते हैं, तो वे उन्हें स्वीकार करने और अपने अनुवर्ती अनुभव में लागू करने में सक्षम होते हैं और उसके द्वारा स्वयं को परिवर्तित करते हैं। यह एक ऐसा व्यक्ति है जो आत्मा से प्रखर है। ऐसे लोग इतनी तेजी से प्रतिक्रिया करने में सक्षम क्यों होते हैं? क्योंकि वे दैनिक जीवन में इन चीज़ों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। जब वे परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हैं, तो वे उनकी तुलना में अपनी अवस्थाओं की जाँच करने में और आत्मचिंतन करने और स्वयं को जानने में सक्षम होते हैं। जब वे संगति, धर्मोपदेश और ऐसे वचन सुनते हैं, जो उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करते हैं, वे उन्हें तुरंत ग्रहण करने में सक्षम होते हैं। यह किसी भूखे व्यक्ति को भोजन प्रदान करने के समान है, जो उसे तुरंत खाने में सक्षम होता है। यदि तुम किसी ऐसे व्यक्ति को भोजन दो, जो भूखा नहीं है, तो वह इतनी तेजी से प्रतिक्रिया नहीं करेगा। तुम प्रायः परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, और फिर जब तुम्हारा सामना किसी चीज़ से होता है, तब तुम तुरंत प्रतिक्रिया करने में सक्षम होते हो, सोचते हो कि परमेश्वर इस मामले में क्या चाहता है, तुम्हें कैसे कार्य करना चाहिए, और परमेश्वर ने पिछली बार इस मामले में तुम्हारा मार्गदर्शन कैसे किया था। जब आज तुम उसी तरह की चीज़ का सामना करते हो, तो स्वाभाविक रूप से तुम जान जाओगे कि परमेश्वर के हृदय को संतुष्ट करने के लिए तुम्हें किस तरह से अभ्यास करना है। यदि तुम हमेशा इसी तरह से अभ्यास करते हो और इसी तरह से अनुभव करते हो, तो किसी बिंदु पर यह तुम्हारे लिए आसान हो जाएगा। परमेश्वर के वचनों को पढ़ते हुए तुम जान जाओगे कि परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति को संदर्भित कर रहा है, तुम जान जाओगे कि वह आत्मा की किस प्रकार की अवस्थाओं की बात कर रहा है, और तुम मुख्य बात समझ पाओगे और उसे अभ्यास में लाने में सक्षम होगे; इस तरह तुम अनुभव करने में सक्षम होगे। कुछ लोगों में इस संबंध में कमी क्यों होती है? ऐसा इसलिए है, क्योंकि वे अभ्यास करने के पहलू पर अधिक श्रम नहीं करते। यद्यपि वे सत्य का अभ्यास करने के इच्छुक होते हैं, किंतु उनमें सेवा के विवरण की, अपने जीवन में सत्य के विवरण की सच्ची अंतर्दृष्टि नहीं होती। जब कुछ घटित हो जाता है, तो वे भ्रमित हो जाते हैं। इस तरह, जब कोई झूठा नबी या कोई झूठा प्रेरित सामने आता है, तो तुम्हें फँसाकर भटकाया जा सकता है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों और कार्य पर अकसर संगति करनी चाहिए—केवल इसी तरह से तुम सत्य को समझने और विवेक विकसित करने में सक्षम होगे। यदि तुम सत्य को नहीं समझते, तो तुममें कोई विवेक नहीं होगा। उदाहरण के लिए, परमेश्वर क्या बोलता है, परमेश्वर कैसे कार्य करता है, लोगों से उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, तुम्हें किस प्रकार के लोगों के संपर्क में आना चाहिए और किस प्रकार के लोगों को अस्वीकार करना चाहिए—तुम्हें अकसर इन चीज़ों पर संगति करनी चाहिए। यदि तुम हमेशा परमेश्वर के वचनों का इसी तरह अनुभव करो, तो तुम सत्य को समझोगे और अनेक चीज़ों को पूरी तरह से समझ जाओगे, और तुममें विवेक भी आ जाएगा। पवित्र आत्मा का अनुशासन क्या है, मनुष्य की इच्छा से जन्मा आरोप क्या है, पवित्र आत्मा का मार्गदर्शन क्या है, किसी परिवेश का आयोजन क्या है, परमेश्वर के वचनों का भीतर से प्रबुद्ध करना क्या है—यदि तुम इन चीज़ों के बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो तुम्हारे पास कोई विवेक नहीं होगा। तुम्हें जानना चाहिए कि पवित्र आत्मा से क्या आता है, विद्रोही स्वभाव क्या है, परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण कैसे करें, और अपनी विद्रोहशीलता को कैसे उतार फेंकें; यदि तुम अपने अनुभवों से इन चीजों की समझ हासिल कर लोगे, तो तुम्हारे पास एक नींव होगी; जब कुछ घटित होगा, तो तुम्हारे पास एक उपयुक्त सत्य होगा जिससे तुलना कर तुम उसे माप सकते हो, और नींव के रूप में तुम्हारे पास उपयुक्त दर्शन होंगे। तुम्हारे हर कार्य में सिद्धांत होंगे और तुम सत्य के अनुसार कार्य करने में सक्षम होगे। तब तुम्हारा जीवन परमेश्वर की प्रबुद्धता से परिपूर्ण होगा, परमेश्वर के आशीषों से परिपूर्ण होगा। परमेश्वर ऐसे किसी भी व्यक्ति से अनुचित व्यवहार नहीं करेगा, जो निष्ठा से उसका अनुसरण करता है, या जो उसे जीता और उसकी गवाही देता है, और वह ऐसे किसी भी व्यक्ति को शाप नहीं देगा जो ईमानदारी से सत्य का प्यासा होने में सक्षम है। यदि परमेश्वर के वचनों को खाते-पीते समय तुम अपनी वास्तविक अवस्था जानने पर ध्यान दे सकते हो, अपने अभ्यास पर ध्यान दे सकते हो, और अपनी समझ पर ध्यान दे सकते हो, तब किसी समस्या से सामना होने पर तुम्हें प्रबुद्धता और व्यावहारिक समझ प्राप्त होगी। तब सभी चीज़ों में तुम्हारे पास अभ्यास और विवेक का मार्ग होगा। जिस व्यक्ति के पास सत्य होता है, उसे गुमराह नहीं किया जाएगा, और वह गड़बड़ी करने वाला व्यवहार या अतिवादी तरीके से कार्य नहीं करेगा। सत्य के कारण वह सुरक्षित है, और साथ ही, सत्य के कारण ही वह अधिक समझ प्राप्त करता है। सत्य के कारण उसके पास अभ्यास के अधिक मार्ग होते हैं, उसे अधिक अवसर प्राप्त होते हैं कि पवित्र आत्मा उसके भीतर कार्य करे, और पूर्ण बनाए जाने के भी अधिक अवसर प्राप्त होते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल उन्हें ही पूर्ण बनाया जा सकता है जो अभ्यास पर ध्यान देते हैं
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 552
यदि तुम्हें पूर्ण बनाया जाना है, तो कुछ मानदंड पूरे करने होंगे। जब जीवन की बात आती है तो तुम्हारे पास अपने संकल्प, अपनी दृढ़ता और अपने अंतःकरण और अपने अनुसरण के माध्यम से अनुभव अवश्य होना चाहिए और तुम्हें परमेश्वर के इरादे पूरे करना चाहिए। यह तुम्हारा प्रवेश है और यही वह है जो पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर आवश्यक है। पूर्णता का कार्य सभी लोगों पर किया जा सकता है। जो कोई भी परमेश्वर को खोजता है, उसे पूर्ण बनाया जा सकता है और उसके पास पूर्ण बनाए जाने का अवसर और योग्यताएँ हैं। यह कोई पूर्वनियत चीज नहीं है। कोई व्यक्ति पूर्ण बनाया जा सकता है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वह क्या खोजता है। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य को जीने में सक्षम हैं, वे निश्चित रूप से पूर्ण बनाए जाने में सक्षम हैं। जो लोग सत्य से प्रेम नहीं करते, परमेश्वर उन्हें नहीं स्वीकारता; वे ऐसा जीवन धारण नहीं करते, जिसकी परमेश्वर माँग करता है और वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। पूर्णता का कार्य केवल लोगों को प्राप्त करने के वास्ते है। यह शैतान से युद्ध करने के कार्य का अंग नहीं है; विजय का कार्य केवल शैतान से युद्ध करने के वास्ते है, जिसका अर्थ है मनुष्य पर विजय का उपयोग शैतान को हराने के लिए करना। विजय का कार्य ही मुख्य कार्य है, नवीनतम कार्य है जो सभी युगों में कभी नहीं किया गया है। कहा जा सकता है कि इस चरण के कार्य का लक्ष्य मुख्य रूप से सभी लोगों को जीतना है, ताकि शैतान को हराया जा सके। लोगों को पूर्ण बनाने का कार्य—यह नया कार्य नहीं है। देह में रहकर कार्य करते हुए परमेश्वर जो समस्त कार्य करता है उसका लक्ष्य मुख्य रूप से लोगों को जीतना है। यह अनुग्रह के युग के समान है, जब सलीब पर चढ़ने के माध्यम से संपूर्ण मानवजाति का छुटकारा मुख्य कार्य था। “लोगों को प्राप्त करना” देह में किए गए कार्य से अतिरिक्त था और केवल सलीब पर चढ़ने के बाद किया गया था। जब यीशु ने आकर अपना कार्य किया, तो उसका लक्ष्य मुख्य रूप से मृत्यु और रसातल के बंधन पर विजय प्राप्त करने के लिए, शैतान के प्रभाव पर विजय प्राप्त करने के लिए, अर्थात् शैतान को हराने के लिए अपने सलीब पर चढ़ने का उपयोग करना था। यीशु के सलीब पर चढ़ने के बाद ही पतरस एक-एक कदम उठाकर पूर्णता के मार्ग पर चला। बेशक, पतरस उन लोगों में से था, जिन्होंने तब यीशु का अनुसरण किया, जब यीशु कार्य कर रहा था, परंतु उस दौरान वह पूर्ण नहीं बना था। बल्कि, यीशु के अपना कार्य समाप्त करने के बाद उसने धीरे-धीरे सत्य को समझा और तब पूर्ण बना। देहधारी परमेश्वर पृथ्वी पर थोड़े-से समय में केवल कार्य के एक मुख्य, महत्वपूर्ण चरण को पूरा करने आता है, पृथ्वी पर लोगों को पूर्ण बनाने के इरादे से उनके बीच लंबे समय तक रहने के लिए नहीं। वह उस कार्य को नहीं करता। वह अपना कार्य पूरा करने के लिए उस समय तक प्रतीक्षा नहीं करता, जब तक कि मनुष्य को पूरी तरह से पूर्ण नहीं बना दिया जाता। यह उसके देहधारण का लक्ष्य और मायने नहीं है। वह केवल मानवजाति को बचाने का अल्पकालिक कार्य करने आता है, न कि मानवजाति को पूर्ण बनाने का अति दीर्घकालिक कार्य करने। मानवजाति को बचाने का कार्य प्रातिनिधिक है, जो एक नया युग आरंभ करने में सक्षम है। इसे एक अल्प समय में समाप्त किया जा सकता है। परंतु मानवजाति को पूर्ण बनाने के लिए मनुष्य को एक निश्चित स्तर तक आकार देने की आवश्यकता है; ऐसे कार्य में लंबा समय लगता है। यह वह कार्य है, जिसे परमेश्वर के आत्मा द्वारा किया जाना चाहिए, परंतु यह उस सत्य की उस बुनियाद पर किया जाता है, जिसके बारे में देह में परमेश्वर के कार्य के दौरान बोला गया था या अन्यथा इसे चरवाही का दीर्घकालिक कार्य करने हेतु प्रेरितों को नियुक्त करने के उसके कार्य के माध्यम से भी किया जाता है—इस तरह मानवता को पूर्ण बनाने का उसका लक्ष्य प्राप्त किया जाता है। देहधारी परमेश्वर इस कार्य को नहीं करता। वह केवल जीवन के मार्ग के बारे में बोलता है, ताकि लोग समझ जाएँ, और वह मानवजाति को केवल सत्य प्रदान करता है, सत्य का अभ्यास करने में लगातार मनुष्य के साथ नहीं रहता, क्योंकि यह उसकी सेवकाई के अंतर्गत नहीं है। इसलिए वह मनुष्य के साथ उस दिन तक नहीं रहेगा, जब तक कि मनुष्य सत्य को पूरी तरह से न समझ ले और सत्य को पूरी तरह से प्राप्त न कर ले। देह में उसका कार्य तभी समाप्त हो जाता है, जब मनुष्य परमेश्वर में विश्वास के सही मार्ग पर औपचारिक रूप से प्रवेश कर लेता है, जब मनुष्य पूर्ण बनाए जाने के सही मार्ग पर कदम रख लेता है। यह भी वास्तव में तब होगा, जब देहधारी परमेश्वर ने शैतान को पूरी तरह से हरा दिया होगा और संसार पर विजय प्राप्त कर ली होगी। वह इस बात की परवाह नहीं करता कि मनुष्य ने अंततः उस समय सत्य में प्रवेश कर लिया होगा या नहीं, न ही वह इस बात की परवाह करता है कि मनुष्य का जीवन बड़ा है या छोटा। इसमें से कुछ भी ऐसा नहीं है, जिससे उसे देह में सरोकार रखना चाहिए; इसमें से कुछ भी देहधारी परमेश्वर की सेवकाई के अंदर नहीं है। एक बार जब वह अपना वह कार्य पूरा कर लेगा जो उसे करना चाहिए, तो वह देह में अपने कार्य का समापन कर देगा। इसलिए, जो कार्य देहधारी परमेश्वर करता है, वह केवल वही कार्य है, जिसे परमेश्वर का आत्मा सीधे तौर पर नहीं कर सकता। इतना ही नहीं, यह उद्धार का अल्पकालिक कार्य है, ऐसा कार्य नहीं है जिसे वह पृथ्वी पर दीर्घकालिक आधार पर करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 553
तुम लोगों के बीच किया जा रहा यह कार्य तुम लोगों पर उस कार्य की आवश्यकता के अनुसार किया जा रहा है। इन व्यक्तियों पर विजय के बाद लोगों के एक समूह को पूर्ण बनाया जाएगा। इसलिए वर्तमान में बहुत-सा कार्य तुम लोगों को पूर्ण बनाने के लक्ष्य की तैयारी के लिए भी है, क्योंकि कई लोग सत्य के लिए भूखे हैं, जिन्हें पूर्ण बनाया जा सकता है। यदि विजय का कार्य तुम लोगों पर किया जाने वाला एकमात्र चरण होता और इसके बाद कोई और कार्य न किया जाता, तो क्या यह ऐसा मामला न होता कि जो व्यक्ति सत्य की अभिलाषा रखता है, वह इसे प्राप्त नहीं करेगा? वर्तमान कार्य का लक्ष्य बाद में लोगों को पूर्ण बनाने के लिए मार्ग खोलना है। यद्यपि मेरा कार्य सिर्फ विजय का कार्य है, फिर भी मेरे द्वारा बोला गया जीवन का मार्ग बाद में लोगों को पूर्ण बनाने की तैयारी के लिए है। जो कार्य विजय के बाद आता है, वह लोगों को पूर्ण बनाने पर केंद्रित है, और विजय पूर्णता के कार्य की नींव डालने के लिए की जाती है। मनुष्य को केवल जीते जाने के बाद ही पूर्ण बनाया जा सकता है। अभी मुख्य कार्य जीतना है; बाद में, सत्य की खोज और कामना करने वालों को पूर्ण बनाया जाएगा। पूर्ण बनाए जाने में लोगों के प्रवेश के सकारात्मक पहलू शामिल हैं : क्या तुम्हारे पास परमेश्वर से प्रेम करने वाला हृदय है, इस मार्ग पर चलते हुए तुमने कितना अनुभव प्राप्त किया है, और परमेश्वर के लिए तुम्हारा प्रेम कितना शुद्ध है और सत्य का तुम्हारा अभ्यास कितना सटीक है। पूर्ण बनने के लिए व्यक्ति को सभी पहलुओं में मानवता की आधारभूत जानकारी होनी चाहिए। यह एक मूलभूत आवश्यकता है। जीते जाने के बाद जो लोग पूर्ण नहीं बनाए जा सकते, वे सेवा करने वाली वस्तुएँ बन जाते हैं और फिर भी अंततः वे आग और गंधक की झील में डाल दिए जाएँगे और फिर भी वे अथाह कुंड में गिर जाएँगे, क्योंकि तुम्हारा स्वभाव नहीं बदला है और तुम अभी भी शैतान के हो। यदि व्यक्ति में पूर्णता के लिए आवश्यक स्थितियों का अभाव है तो वह बेकार है—वह रद्दी है, उपकरण है, और ऐसी चीज है जो अग्निपरीक्षा में ठहर नहीं सकती! अभी तुम्हारे पास परमेश्वर-प्रेमी हृदय कितना है? स्वयं के प्रति घृणा वाला हृदय कितना है? तुम शैतान को कितनी गहराई से जानते हो? क्या तुम लोगों ने अपना संकल्प मजबूत कर लिया है? अपनी मानवता के भीतर जिस तरह से तुम जीते हो क्या उसमें कोई अनुक्रम है? क्या तुम्हारा जीवन बदल गया है? क्या तुम एक नया जीवन जी रहे हो? क्या तुम लोगों का जीवन-दृष्टिकोण बदल गया है? यदि ये चीजें नहीं बदली हैं, तो तुम्हें पूर्ण नहीं बनाया जा सकता, भले ही तुम पीछे नहीं हटते; बल्कि, तुम्हें केवल जीता गया है। तुम्हारी परीक्षा का समय आने पर तुम्हारे पास सत्य नहीं होगा, तुम्हारी मानवता असामान्य होगी और तुम एक जानवर जितने निम्न होगे। तुमने बस यह पाया होगा कि तुम्हें जीता गया है—तुम सिर्फ मेरे द्वारा जीती गई एक वस्तु होगे। बस एक गधे की तरह, जिसे एक बार मालिक के कोड़े की मार का अनुभव हो जाए, तो वह भयभीत हो जाता है और हर बार जब भी वह अपने मालिक को देखता है, तो घबरा जाता है और दुर्व्यवहार करने से डरता है, तुम भी केवल एक जीते गए गधे होगे। यदि किसी व्यक्ति में उन सकारात्मक पहलुओं का अभाव है और इसके बजाय वह सभी बातों में नकारात्मक और भयभीत, डरपोक और संकोची है, किसी भी चीज को स्पष्टता से देखने में असमर्थ है, सत्य को समझने में असमर्थ है, अभी भी उसके पास अभ्यास का मार्ग नहीं है, और इससे भी परे, परमेश्वर को प्रेम करने वाला हृदय नहीं है—यदि किसी व्यक्ति को इस बात की समझ नहीं है कि परमेश्वर से कैसे प्रेम किया जाए, एक अर्थपूर्ण जीवन कैसे जीया जाए, या एक असली व्यक्ति कैसे बना जाए—ऐसा व्यक्ति परमेश्वर की गवाही कैसे दे सकता है? यह दर्शाएगा कि तुम्हारे जीवन का बहुत कम मूल्य है और तुम सिर्फ एक जीते गए गधे हो। तुम्हें जीता जाएगा, परंतु इसका सिर्फ यह अर्थ होगा कि तुमने बड़े लाल अजगर से विद्रोह किया है और उसकी सत्ता के सामने समर्पण करने से इनकार कर दिया है; इसका अर्थ होगा कि तुम मानते हो कि परमेश्वर है, तुम परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहते हो, और तुम्हें कोई शिकायत नहीं है। परंतु जहाँ तक सकारात्मक पहलुओं की बात है, क्या तुम परमेश्वर के वचन को जीने और अपने जीवन से परमेश्वर की गवाही देने में सक्षम हो? अगर तुम्हारे पास इनमें से कोई भी पहलू नहीं है, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर के द्वारा प्राप्त नहीं किए गए हो, और तुम सिर्फ एक जीते गए गधे हो। तुममें कुछ भी वांछनीय नहीं है, और पवित्र आत्मा तुममें कार्य नहीं कर रहा है। तुम्हारी मानवता में बहुत कमी है, परमेश्वर के लिए तुम्हारा उपयोग करना असंभव है। तुम्हें परमेश्वर द्वारा योग्य पाया जाना है और अविश्वासी जानवरों और चलते-फिरते मृतकों से सौ गुना बेहतर होना है—केवल इस स्तर तक पहुँचने वाले ही पूर्ण किए जाने के योग्य होते हैं। केवल यदि किसी में मानवता और अंतःकरण हैं, तो ही वह परमेश्वर के उपयोग के लायक है। केवल पूर्ण बनाए जाने पर ही तुम मानव समझे जा सकते हो। केवल पूर्ण बनाए गए लोग ही अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं। केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के लिए अधिक जबर्दस्त गवाही दे सकते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल पूर्ण बनाया गया मनुष्य ही सार्थक जीवन जी सकता है
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 554
वह कौन-सा मार्ग है, जिसके द्वारा परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है? कौन-कौन से पहलू उसमें शामिल हैं? क्या तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो? क्या तुम परमेश्वर का न्याय और उसकी ताड़ना स्वीकार करना चाहते हो? तुम इन प्रश्नों से क्या समझते हो? यदि तुम ऐसे ज्ञान के बारे में बात नहीं कर सकते, तो यह इस बात का प्रमाण है कि तुम अभी तक परमेश्वर के कार्य को नहीं जान पाए हो और तुम पवित्र आत्मा द्वारा बिलकुल भी प्रबुद्ध नहीं बनाए गए हो। ऐसे व्यक्ति को पूर्ण बनाया जाना असंभव है। उन्हें कुछ समय के लिए केवल थोड़ी मात्रा में ही अनुग्रह का आनंद दिया जाता है, और यह लंबे समय तक नहीं रहेगा। यदि लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का ही आनंद उठाते हैं, तो उन्हें परमेश्वर द्वारा पूर्ण नहीं बनाया जा सकता। कुछ लोग संतुष्ट हो जाते हैं, जब उन्हें शारीरिक शांति और आनंद मिलता है, जब उनका जीवन आसानी से चलता है और उसमें कोई विपत्ति या दुर्भाग्य नहीं होता, जब उनका पूरा परिवार मेल-मिलाप से रहता है और उसमें कोई कलह या विवाद नहीं होता—और वे यह भी विश्वास कर सकते हैं कि केवल यही परमेश्वर का आशीष है। पर सच्चाई यह है कि यह केवल परमेश्वर का अनुग्रह है। तुम लोगों को सिर्फ परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद उठाने से ही संतुष्ट नहीं हो जाना चाहिए। ऐसी सोच कितनी भद्दी है। भले ही तुम प्रतिदिन परमेश्वर के वचन पढ़ो, प्रतिदिन प्रार्थना करो, और तुम्हारी आत्मा अत्यधिक आनंद और खास तौर से शांति का अनुभव करे, लेकिन यदि अंततः तुम्हारे पास परमेश्वर और उसके कार्य के अपने ज्ञान के बारे में कहने के लिए कुछ नहीं है, और तुमने कुछ अनुभव नहीं किया है, और चाहे तुमने परमेश्वर का वचन कितना भी क्यों न खाया और पीया हो, यदि तुम केवल आध्यात्मिक शांति और आनंद का अनुभव करते हो और यह भी कि परमेश्वर के वचन अतुलित रूप से मीठे हैं, मानो तुम उसका पर्याप्त आनंद नहीं उठा सकते, पर तुम्हें परमेश्वर के वचन का कोई वास्तविक अनुभव नहीं हुआ है और तुम उसके वचनों की वास्तविकता से पूर्णतः वंचित हो, तो परमेश्वर में ऐसे विश्वास से तुम क्या हासिल कर सकते हो? यदि तुम परमेश्वर के वचनों के सार को जीवन में उतार नहीं सकते, तो इन वचनों को खाना-पीना और तुम्हारी प्रार्थनाएँ धार्मिक विश्वास के सिवा कुछ नहीं हैं। ऐसे लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त नहीं किए जा सकते। परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने वाले लोग वे होते हैं, जो सत्य का अनुसरण करते हैं। परमेश्वर मनुष्य की देह प्राप्त नहीं करता, न उससे संबंधित चीजें ही प्राप्त करता है, बल्कि उसके भीतर का वह भाग प्राप्त करता है, जो परमेश्वर का है। इसलिए, जब परमेश्वर लोगों को पूर्ण बनाता है, तो वह उनकी देह को नहीं, बल्कि उनके हृदय को पूर्ण बनाता है, और उनके हृदय को परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने में समर्थ बनाता है। दूसरे शब्दों में, परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाया जाना सार रूप में परमेश्वर द्वारा मनुष्य के हृदय को पूर्ण बनाया जाना है, ताकि वह हृदय परमेश्वर की ओर मुड़ जाए और उससे प्रेम करने लगे।
मनुष्य का शरीर देह और रक्त का है। मनुष्य की देह प्राप्त करने से परमेश्वर का कोई प्रयोजन पूरा नहीं होता, क्योंकि वह ऐसी चीज है, जो अनिवार्य रूप से नष्ट हो जाती है और उसकी विरासत या आशीष प्राप्त नहीं कर सकती। यदि मनुष्य की देह प्राप्त की जाती, और यदि केवल मनुष्य की देह ही इस धारा में होती, तो मनुष्य हालाँकि इस धारा में नाममात्र के लिए होगा, पर उसका हृदय शैतान का होगा। ऐसा होने पर न केवल लोग परमेश्वर की अभिव्यक्ति बनने में असमर्थ होंगे, बल्कि वे उसके लिए बोझ बन जाएँगे, और इसलिए परमेश्वर का मनुष्य को चुनना निरर्थक होगा। जिन लोगों को परमेश्वर पूर्ण बनाने का इरादा रखता है, वे सब उसके आशीष और उसकी विरासत प्राप्त करेंगे। अर्थात्, वे वह स्वीकार करते हैं जो परमेश्वर के पास है और जो वह स्वयं है, ताकि यह वह बन जाए जो उनके भीतर है; उनमें परमेश्वर के सारे वचन गढ़े हुए हैं; और परमेश्वर जो कुछ है, वे उस सबको ठीक जैसा है वैसा स्वीकार करने में सक्षम हैं। इस तरह वे सत्य को जीते हैं। ऐसे ही व्यक्ति को परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जाता है। केवल इसी प्रकार का मनुष्य परमेश्वर द्वारा दिए जाने वाले आशीष का उत्तराधिकार पाने योग्य है :
1. परमेश्वर के संपूर्ण प्रेम को पाना।
2. सभी बातों में परमेश्वर के इरादों के अनुसार चलना।
3. परमेश्वर के मार्गदर्शन को पाना, परमेश्वर की रोशनी में जीवन व्यतीत करना और परमेश्वर का प्रबोधन प्राप्त करना।
4. पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय लगने वाली छवि जीना; पतरस के समान होना, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करता था, जिसे परमेश्वर के लिए सलीब पर चढ़ा दिया गया था और जो परमेश्वर के प्रेम को वापस चुकाने के लिए प्राण देने योग्य था; पतरस के समान महिमा प्राप्त करना।
5. पृथ्वी पर सभी का प्रिय, अति सम्मानित और प्रशंसित बनना।
6. मृत्यु और रसातल के सारे बंधनों पर काबू पाना, शैतान को कार्य करने का कोई अवसर न देना, परमेश्वर का होना, एक ताज़ा और जीवंत आत्मा के भीतर रहना, और ऊब न जाना।
7. जीवन भर हर समय उत्साह और उमंग की एक अवर्णनीय भावना रखना, मानो परमेश्वर की महिमा के दिन का आगमन देख लिया हो।
8. परमेश्वर के साथ महिमा को पाना और परमेश्वर के प्रिय पवित्र जनों जैसा चेहरा रखना।
9. वह बनना जो पृथ्वी पर परमेश्वर को प्रिय है, अर्थात्, परमेश्वर का प्रिय पुत्र।
10. स्वरूप बदलना और परमेश्वर के साथ तीसरे स्वर्ग में आरोहण करना तथा देह के पार जाना।
केवल परमेश्वर के आशीषों को विरासत में प्राप्त कर सकने वाले लोग ही परमेश्वर द्वारा पूर्ण और प्राप्त किए जाते हैं। क्या तुमने वर्तमान में कुछ प्राप्त किया है? किस सीमा तक परमेश्वर ने तुम्हें पूर्ण बनाया है? परमेश्वर मनुष्य को बिना किसी उद्देश के पूर्ण नहीं बनाता; उसका मनुष्य को पूर्ण बनाना सशर्त है, और उसके स्पष्ट, गोचर परिणाम हैं। ऐसा नहीं है, जैसा कि मनुष्य कल्पना करता है, कि जब तक परमेश्वर में उसका विश्वास है, उसे परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया और प्राप्त किया जा सकता है, और वह पृथ्वी पर परमेश्वर के आशीष और विरासत प्राप्त कर सकता है। ऐसी बातें बहुत ही कठिन हैं—लोगों के स्वरूप बदलने के बारे में तो कहना ही क्या! वर्तमान में, तुम लोगों को जिसका मुख्य रूप से अनुसरण करना चाहिए, वह है सब बातों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, और उन सब लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना, जिनसे तुम लोगों का सामना होता है, ताकि उसके द्वारा परमेश्वर जो है, वह और अधिक तुम्हारे अंदर गढ़ा जाए। तुम्हें पहले पृथ्वी पर परमेश्वर की विरासत को पाना है; केवल तभी तुम और अधिक विरासत और अधिक बड़ी आशीष पाने के पात्र बनोगे। ये सब ही वे चीज़ें हैं, जिनका तुम लोगों को अनुसरण करना चाहिए और अन्य सब चीजों से पहले समझना चाहिए। जितना अधिक तुम परमेश्वर द्वारा हर चीज़ में पूर्ण किए जाने का अनुसरण करोगे, उतना अधिक तुम सभी चीज़ों में परमेश्वर का हाथ देख पाओगे, जिसके परिणामस्वरूप तुम, विभिन्न परिप्रेक्ष्यों और विभिन्न मामलों के माध्यम से, परमेश्वर के वचन के स्वरूप में प्रवेश का सक्रियता से अनुसरण और उसके वचन की वास्तविकता में प्रवेश करने का अनुसरण करोगे। तुम ऐसी नकारात्मक दशाओं से संतुष्ट नहीं हो सकते, जैसे कि मात्र पाप नहीं करना, या कोई धारणा, सांसारिक आचरण के लिए कोई फलसफा नहीं रखना, या कोई मानवीय इच्छा नहीं होना। परमेश्वर मनुष्य को कई तरीकों से पूर्ण बनाता है; तुम्हारे लिए सभी मामलों में पूर्ण बनाए जाने की संभावना है, और वह तुम्हें न केवल सकारात्मक रूप में पूर्ण बना सकता है, बल्कि नकारात्मक रूप में भी बना सकता है, ताकि जो तुम प्राप्त करो, वह अधिक प्रचुर मात्रा में हो। हर एक दिन परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के अवसर और प्राप्त किए जाने के मौके होते हैं। कुछ समय तक ऐसा अनुभव करने के बाद तुम बहुत बदल जाओगे और स्वाभाविक रूप से ऐसी कई चीज़ें स्पष्ट रूप से देखोगे, जिन्हें तुम पहले नहीं समझते थे। तुम्हें दूसरों से निर्देश पाने की कोई आवश्यकता नहीं होगी; तुम्हारे जाने बिना परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध बनाएगा, ताकि तुम सभी चीज़ों में प्रबोधन प्राप्त कर सको और अपने अनुभवों की सभी बारीकियों में प्रवेश कर सको। परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा मार्गदर्शन करेगा, ताकि तुम दाएँ-बाएँ न भटक जाओ, और इस तरह तुम उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के मार्ग पर पैर रख दोगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्ण बनाए जा चुके लोगों से प्रतिज्ञाएँ
परमेश्वर के दैनिक वचन अंश 555
परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने के द्वारा पूर्णता तक सीमित नहीं किया जा सकता। चीजों का इस तरह अनुभव करना बहुत एकतरफा होगा, इसमें बहुत कम चीज शामिल होगी और यह लोगों को केवल बहुत छोटे दायरे में सीमित कर देगा। ऐसा होने से लोगों को उस आध्यात्मिक पोषण की बहुत कमी होगी, जिसकी उन्हें आवश्यकता है। यदि तुम लोग परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, तो तुम्हें यह सीखना आवश्यक है कि सभी मामलों में कैसे अनुभव किया जाए, और कैसे अपने साथ घटित होने वाली हर चीज में प्रबोधन प्राप्त करने के योग्य बना जाए। वह चीज अच्छी हो या बुरी, तुम्हें वह लाभ ही पहुँचाए और तुम्हें नकारात्मक न बनाए। चाहे जो हो, तुम्हें परमेश्वर के पक्ष में खड़े होकर चीजों को देखने में सक्षम होना चाहिए और मानवीय दृष्टिकोण से उनका विश्लेषण या अध्ययन नहीं करना चाहिए (यह तुम्हारे अनुभव में भटकना होगा)। यदि तुम चीजों का इस तरह अनुभव करते हो, तो तुम्हारा हृदय तुम्हारे जीवन के बोझ से भर जाएगा; तुम निरंतर परमेश्वर के मुखमंडल की रोशनी में जियोगे, और तुम्हारे अभ्यास में विचलन की संभावना नहीं होगी। ऐसे लोगों का भविष्य उज्ज्वल होता है। परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के बहुत सारे अवसर हैं। यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि क्या तुम लोग सच में परमेश्वर से प्यार करते हो और क्या तुम लोगों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने, परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने, और उसके आशीष और विरासत प्राप्त करने का संकल्प है। केवल संकल्प ही काफी नहीं है। तुम लोगों के पास बहुत ज्ञान होना चाहिए, अन्यथा तुम लोगों के अभ्यास में हमेशा विचलन होंगे। परमेश्वर तुम लोगों में से प्रत्येक को पूर्ण बनाने का इच्छुक है। वर्तमान में, लंबे समय से अधिकांश लोगों ने पहले ही परमेश्वर के कार्य को स्वीकार कर लिया है, लेकिन उन्होंने अपने आपको मात्र परमेश्वर के अनुग्रह में आनंद लेने तक सीमित कर लिया है, और वे केवल उससे देह के कुछ सुख पाने के लिए लालायित हैं, उससे अधिक और उच्चतर खुलासे प्राप्त करने के इच्छुक नहीं हैं। इससे पता चलता है कि मनुष्य का हृदय अभी भी हमेशा बाहरी बातों में लगा रहता है। भले ही मनुष्य के कार्य, उसकी सेवा और परमेश्वर-प्रेमी हृदय में कुछ अशुद्धताएँ कम हों, पर जहाँ तक उसके भीतरी सार और उसकी पिछड़ी सोच का संबंध है, मनुष्य अभी भी निरंतर देह की शांति और आनंद की खोज में लगा है और परमेश्वर द्वारा मनुष्य को पूर्ण बनाए जाने की शर्तों और प्रयोजनों की जरा भी परवाह नहीं करता। और इसलिए, ज्यादातर लोगों का जीवन अभी भी असभ्य और पतनशील है। उनका जीवन जरा भी नहीं बदला है; वे स्पष्टतः परमेश्वर में आस्था को कोई महत्वपूर्ण मामला नहीं मानते, बल्कि ऐसा लगता है जैसे वे बस दूसरों की खातिर परमेश्वर में आस्था रखते हैं, खानापूर्ति करते हैं, और लापरवाही से काम करते और एक अधम अस्तित्व को ढो रहे हैं। बहुत कम लोग ऐसे हैं जो हर बात में परमेश्वर के वचन में प्रवेश करने का प्रयास करते हैं, जिससे वे और अधिक तथा अधिक समृद्ध प्राप्तियाँ हासिल कर सकें, परमेश्वर के घर में और अधिक समृद्ध व्यक्ति बन सकें, और परमेश्वर के और अधिक आशीष प्राप्त कर सकें। यदि तुम सब चीजों में परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाया जाना चाहते हो, और पृथ्वी पर परमेश्वर ने जो देने का वादा किया है, उसे प्राप्त करने में समर्थ हो; यदि तुम सब चीजों में परमेश्वर द्वारा प्रबुद्ध होना चाहते हो और वर्षों को बेकार गुजरने नहीं देते, तो सक्रियता से प्रवेश करने का यह सर्वोत्तम मार्ग है। केवल इसी तरह से तुम परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लायक और पात्र बनोगे। क्या तुम सचमुच परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की कोशिश करने वाले व्यक्ति हो? क्या तुम सचमुच सभी चीजों में गंभीरता से खोजने वाले व्यक्ति हो? क्या तुममें परमेश्वर के लिए प्रेम की वही भावना है, जो पतरस में थी? क्या तुममें परमेश्वर से प्रेम करने का वैसा ही संकल्प है, जैसा यीशु में था? तुमने अनेक वर्षों से यीशु पर विश्वास रखा है; क्या तुमने देखा है कि यीशु परमेश्वर को कैसे प्यार करता था? क्या तुम सच में यीशु में ही विश्वास रखते हो? तुम आज के व्यावहारिक परमेश्वर में विश्वास करते हो; क्या तुमने देखा है कि देहधारी व्यावहारिक परमेश्वर स्वर्ग के परमेश्वर से किस तरह प्यार करता है? तुम्हें प्रभु यीशु मसीह में विश्वास है; और वह इसलिए क्योंकि मनुष्य को छुड़ाने के लिए यीशु का सलीब पर चढ़ाया जाना और उसके द्वारा किए गए चमत्कार सामान्यतः स्वीकृत सत्य हैं। फिर भी मनुष्य का विश्वास यीशु मसीह के ज्ञान और सच्ची समझ से नहीं आता। तुम केवल यीशु मसीह के नाम में विश्वास करते हो, उसके आत्मा में विश्वास नहीं करते, क्योंकि तुम इस बात पर ध्यान नहीं देते कि यीशु ने परमेश्वर से किस तरह प्यार किया था। परमेश्वर में तुम्हारी आस्था हद से ज्यादा भोली है। यीशु पर कई वर्षों तक विश्वास करने के बावजूद तुम नहीं जानते कि परमेश्वर को कैसे प्यार करना है। क्या यह तुम्हें संसार का सबसे बड़ा मूर्ख नहीं बनाता? यह इस बात का प्रमाण है कि वर्षों से तुम “प्रभु यीशु मसीह का भोजन” बेकार में ही खाते आ रहे हो। न सिर्फ मैं ऐसे लोगों को नापसंद करता हूँ, बल्कि यह भी मानता हूँ कि प्रभु यीशु मसीह—जिसकी तुम आराधना करते हो—भी उन्हें नापसंद करेगा। ऐसे लोगों को पूर्ण कैसे बनाया जा सकता है? क्या तुम शर्मिंदगी से लाल नहीं होते? क्या तुम्हें लज्जा नहीं आती? क्या तुममें अभी भी अपने प्रभु यीशु मसीह का सामना करने की धृष्टता है? क्या तुम लोग उसका मतलब समझते हो, जो मैंने कहा?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पूर्ण बनाए जा चुके लोगों से प्रतिज्ञाएँ