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547 देहासक्ति का त्याग सत्य का अभ्यास है

1 परमेश्वर पर उनके विश्वास के समय से आज तक, लोगों ने कई ग़लत प्रेरणाओं को आश्रय दिया है। जब तुम सत्य को अभ्यास में नहीं ला रहे होते हो, तो तुम ऐसा महसूस करते हो कि तुम्हारी सभी प्रेरणाएँ उचित हैं, किन्तु जब तुम्हारे साथ कुछ घटित होगा, तो तुम देखोगे कि तुम्हारे भीतर बहुत सी गलत प्रेरणाएँ हैं। जब परमेश्वर लोगों को सिद्ध बनाता है, तो वह उन्हें महसूस करवाता है कि उनके भीतर कई ऐसी धारणाएँ हैं जो परमेश्वर के बारे में उनके ज्ञान को अवरुद्ध कर रही हैं। जब तुम्हारी समझ में आता है कि तुम्हारी प्रेरणाएँ ग़लत हैं, तब यदि तुम अपनी धारणाओं और प्रेरणाओं के अनुसार अभ्यास करना छोड़ पाते हो, और परमेश्वर के लिए गवाही दे पाते हो और तुम्हारे साथ घटित होने वाली प्रत्येक बात में अपनी स्थिति पर डटे रहते हो, तो यह साबित करता है कि तुमने देह के विरूद्ध विद्रोह किया है। जब तुम देह के विरूद्ध विद्रोह करोगे, तो तुम्हारे भीतर अपरिहार्य रूप से एक संघर्ष होगा। शैतान कोशिश करके लोगों से अपना अनुसरण करवाएगा, कोशिश करके उन्हें देह की धारणाओं का अनुसरण करवाएगा और देह के हितों को बनाए रखवाएगा—किन्तु परमेश्वर के वचन भीतर से लोगों को प्रबुद्ध करेंगे और रोशनी प्रदान करेंगे, और इस समय यह तुम पर निर्भर करता है कि तुम परमेश्वर का अनुसरण करो या शैतान का अनुसरण करो।

2 परमेश्वर लोगों से मुख्य रूप से उनके भीतर की चीज़ों से निपटने, उनके विचारों और धारणाओं से, जो परमेश्वर के मनोनुकूल नहीं हैं, निपटने के लिए सत्य को अभ्यास में लाने के लिए कहता है। पवित्र आत्मा लोगों के हृदय में स्पर्श करता है और उन्हें प्रबुद्ध और रोशन करता है। इसलिए जो कुछ होता है उन सब के पीछे एक संघर्ष होता है: प्रत्येक बार जब लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं या परमेश्वर के लिए प्रेम को अभ्यास में लाते हैं, तो एक बड़ा संघर्ष होता है, और यद्यपि देह के साथ सभी अच्छे दिखाई दे सकते हैं, किन्तु, वास्तव में, उनके हृदय की गहराई में जीवन और मृत्यु का संघर्ष चल रहा होगा—और केवल इस घमासान संघर्ष के बाद ही, एक अत्यधिक चिंतन के बाद ही, जीत या हार तय की जा सकती है। यह इसी संघर्ष के कारण है कि लोग दुःख और शुद्धिकरण को सहते हैं; यही असली कष्ट सहना है। जब संघर्ष तुम्हारे ऊपर पड़ता है, तब यदि तुम सचमुच परमेश्वर की ओर खड़े रहने में समर्थ होते हो, तो तुम परमेश्वर को संतुष्ट कर पाओगे। सत्य के अभ्यास के दौरान पीड़ा सहना अपरिहार्य है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "केवल परमेश्वर को प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है" से रूपांतरित

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