10.7. अपना कर्तव्य सही ढंग से कैसे निभाएँ पर
404. मानवजाति के सदस्यों और धर्मनिष्ठ ईसाइयों के रूप में हम सबकी जिम्मेदारी और दायित्व है कि हम अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश की पूर्ति करने के लिए अर्पित करें, क्योंकि हमारा संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारा मन और शरीर परमेश्वर के आदेश और मानवजाति के न्यायसंगत कार्य को समर्पित नहीं है, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के सामने शर्मिंदा महसूस करेंगी जो परमेश्वर के आदेश के लिए शहीद हुए थे, और परमेश्वर के सामने तो और भी अधिक शर्मिंदा होंगी जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है
405. तुम्हें परमेश्वर के आदेशों से कैसे पेश आना चाहिए, यह अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक बहुत ही गंभीर मामला है। परमेश्वर ने जो तुम्हें सौंपा है, यदि तुम उसे पूरा नहीं कर सकते, तो तुम उसकी उपस्थिति में जीने के योग्य नहीं हो और तुम्हें अपना दंड स्वीकारना चाहिए। यह पूरी तरह से स्वाभाविक और उचित है कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा सौंपे जाने वाले आदेशों को पूरा करे। यह मनुष्य का सर्वोच्च दायित्व है और उतना ही महत्वपूर्ण है जितना उसका जीवन है। यदि तुम परमेश्वर के आदेशों के साथ हल्के में पेश आते हो, तो यह परमेश्वर के साथ सर्वाधिक भयंकर विश्वासघात है। ऐसा करने में तुम यहूदा से भी अधिक शोचनीय हो और तुम्हें शाप दिया जाना चाहिए। लोगों को इसकी पूरी समझ हासिल करनी चाहिए कि परमेश्वर के आदेशों के साथ कैसे पेश आएँ, और उन्हें कम से कम यह समझ होनी चाहिए : परमेश्वर द्वारा मनुष्य को आदेश सौंपना उसके द्वारा मनुष्य का उत्कर्ष है और एक प्रकार का विशेष अनुग्रह है जो वह मनुष्य को दिखाता है, और यह सबसे महिमापूर्ण बात है। अन्य सब कुछ छोड़ा जा सकता है, यहाँ तक कि अपना जीवन भी, लेकिन परमेश्वर के आदेशों को जरूर पूरा किया जाना चाहिए।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें
406. मनुष्य के कर्तव्य और उसे आशीष प्राप्त होने या उसके संताप का सामना करने के बीच कोई सह-संबंध नहीं है। कर्तव्य वह है, जो मनुष्य के लिए निभाना आवश्यक है; यह उसका स्वर्ग द्वारा प्रदत्त बुलावा है, उसे प्रतिफल खोजे बिना, और बिना शर्तों या बहानों के इसे करना चाहिए। केवल इसे अपना कर्तव्य निभाना कहा जा सकता है। आशीष प्राप्त होना उन आशीषों को संदर्भित करता है जिनका कोई व्यक्ति तब आनंद लेता है जब उसे न्याय का अनुभव करने के बाद पूर्ण बनाया जाता है। संताप का सामना करने का अभिप्राय उस दंड से है जो एक व्यक्ति को तब मिलता है जब ताड़ना और न्याय से गुजरने के बाद भी उसका स्वभाव नहीं बदलता—अर्थात् जब उसे पूर्ण नहीं बनाया जाता। लेकिन सृजित प्राणियों को चाहे आशीष प्राप्त हों या संताप का सामना करना पड़े, सृजित प्राणियों को अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए; वह करना जो उन्हें करना चाहिए और वह करते हुए, जिसे करने में वे सक्षम हैं। यह तो कम से कम व्यक्ति को, परमेश्वर का अनुसरण करने वाले व्यक्ति को करना ही चाहिए। तुम्हें अपना कर्तव्य आशीष प्राप्त करने की खातिर नहीं निभाना चाहिए और तुम्हें संताप का सामना करने के भय से अपना कर्तव्य निभाने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को यह बात बताता हूँ : मनुष्य द्वारा अपने कर्तव्य का निर्वाह ऐसी चीज है, जो उसे करनी ही चाहिए और यदि वह अपना कर्तव्य नहीं निभाता है, तो यह उसकी विद्रोहशीलता है। अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया के माध्यम से मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और इसी प्रक्रिया के माध्यम से वह अपनी वफ़ादारी प्रदर्शित करता है। इस प्रकार, जितना अधिक तुम अपना कर्तव्य निभाओगे, उतने ही अधिक सत्य प्राप्त करने में सक्षम होगे और उतनी ही अधिक तुम्हारी अभिव्यक्ति व्यावहारिक हो जाएगी। जो लोग अपना कर्तव्य निभाने में महज खानापूर्ति करते हैं और सत्य की खोज नहीं करते, वे अंत में निकाल दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपना कर्तव्य नहीं निभाते और अपना कर्तव्य निभाने में सत्य का अभ्यास नहीं करते। ये वे लोग हैं जो अपरिवर्तित रहते हैं और जिन्हें संताप का सामना करना पड़ेगा। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो कुछ भी व्यक्त करते हैं, वह दुष्टतापूर्ण होता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर
407. परमेश्वर मानवजाति का प्रबंधन करने और बचाने का कार्य करता है, इसलिए बेशक उसकी लोगों से अपेक्षाएँ होती हैं। ये अपेक्षाएँ ही उनका कर्तव्य हैं। यह स्पष्ट है कि लोगों का कर्तव्य परमेश्वर के कार्य और मानवजाति से उसकी अपेक्षाओं से उत्पन्न होता है। इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति क्या कर्तव्य निभाता है, यह सबसे उचित काम है, मानवजाति के बीच सबसे सुंदर और सबसे न्यायपूर्ण काम है। सृजित प्राणियों के रूप में लोगों को अपना कर्तव्य निभाना चाहिए, केवल तभी वे सृष्टिकर्ता की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं। सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता के प्रभुत्व में जीते हैं और वे वह सब जो परमेश्वर द्वारा प्रदान किया जाता है और हर वह चीज जो परमेश्वर से आती है, स्वीकार करते हैं, इसलिए उन्हें अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरे करने चाहिए। यह पूरी तरह से स्वाभाविक और न्यायोचित है और यह परमेश्वर द्वारा नियत है। इससे यह देखा जा सकता है कि लोगों के लिए एक सृजित प्राणी का अपना कर्तव्य निभाना इस मानव संसार में रहते हुए किए गए किसी भी अन्य काम से कहीं अधिक उचित, सुंदर और महान होता है। मानवजाति के बीच इससे अधिक सार्थक या मूल्यवान कुछ भी नहीं होता और सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने की तुलना में किसी सृजित व्यक्ति के जीवन के लिए अधिक अर्थपूर्ण और मूल्यवान अन्य कुछ भी नहीं है। पृथ्वी पर जो लोग सृजित प्राणी का कर्तव्य सचमुच और निष्ठापूर्वक निभाते हैं, वही सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पित होते हैं। यह समूह सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण नहीं करता; वे परमेश्वर की अगुआई और मार्गदर्शन के प्रति समर्पण करते हैं, केवल सृष्टिकर्ता के वचन सुनते हैं, सृष्टिकर्ता द्वारा व्यक्त किए गए सत्य स्वीकारते हैं और सृष्टिकर्ता के वचनों के अनुसार जीते हैं। यह सबसे सच्ची, सबसे प्रभावशाली गवाही होती है और यह परमेश्वर में विश्वास की सबसे अच्छी गवाही होती है। सृजित प्राणी के लिए एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा पाना, सृष्टिकर्ता को संतुष्ट कर पाना मानवजाति के बीच सबसे सुंदर बात होती है और यह कुछ ऐसा है जिसे उनके बीच प्रशंसा की कथा के रूप में फैलाया जाना चाहिए। सृजित प्राणियों को सृष्टिकर्ता जो कुछ भी सौंपता है उसे बिना शर्त स्वीकार कर लेना चाहिए; मानवजाति के लिए यह खुशी और सौभाग्य दोनों की बात है और उन सबके लिए जो एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाते हैं, कुछ भी इससे अधिक सुंदर या याद किए जाने लायक नहीं होता—यह एक सकारात्मक बात है। और जहाँ तक प्रश्न यह है कि सृष्टिकर्ता उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जो सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा सकते हैं और वह उनसे क्या वादा करता है, यह सृष्टिकर्ता का मामला है; सृजित मानवजाति का इससे कोई सरोकार नहीं है। इसे और सरल तरीके से कहूँ तो यह परमेश्वर पर निर्भर है और लोगों को इसमें हस्तक्षेप करने का कोई अधिकार नहीं है। तुम्हें वही मिलेगा जो परमेश्वर तुम्हें देता है, यदि वह तुम्हें कुछ भी नहीं देता है तो तुम इसके बारे में कुछ भी नहीं कह सकते। जब कोई सृजित प्राणी परमेश्वर के आदेश को स्वीकार करता है और अपना कर्तव्य निभाने और जो वह कर सकता है उसे करने में सृष्टिकर्ता के साथ सहयोग करता है तो यह कोई लेन-देन या व्यापार नहीं होता है; लोगों को परमेश्वर से किसी वादे या आशीष के लिए रवैयों की अभिव्यक्तियों या क्रियाकलापों और व्यवहारों का सौदा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। जब सृष्टिकर्ता तुम लोगों को यह कार्य सौंपता है तो यह सही और उचित है कि सृजित प्राणियों के रूप में, तुम ये कर्तव्य और आदेश स्वीकार करो। क्या इसमें कोई लेन-देन शामिल है? (नहीं।) सृष्टिकर्ता की ओर से, वह तुम लोगों में से हर एक को वह कर्तव्य सौंपने का इच्छुक है जो व्यक्ति को निभाना ही चाहिए; और सृजित मानवजाति की ओर से लोगों को ये कर्तव्य सहर्ष स्वीकार करने चाहिए, उन्हें अपने जीवन के दायित्व और उस मूल्य के रूप में मानना चाहिए, जिसे उन्हें इस जीवन में जीना है। यहाँ कोई लेन-देन नहीं है, न ही यह समान मूल्य का आदान-प्रदान है; इसमें ऐसा कोई भी प्रतिफल या अन्य कथन शामिल नहीं हैं जिनकी लोग कल्पना करते हैं। यह किसी भी तरह से एक व्यापार नहीं है; इसका मतलब लोगों के अपने कर्तव्य निभाते हुए चुकाई जाने वाली कीमत या की जाने वाली कड़ी मेहनत के बदले किसी चीज के आदान-प्रदान से नहीं है। परमेश्वर ने ऐसा कभी नहीं कहा है, और लोगों को इसे इस तरह से नहीं समझना चाहिए। सृष्टिकर्ता मानवजाति को आदेश सौंपता है, और सृजित प्राणी, सृष्टिकर्ता से परमेश्वर द्वारा दिए गए आदेश स्वीकार कर अपने कर्तव्यों को निभाने का बीड़ा उठाते हैं। इस मामले में, इस प्रक्रिया में कोई लेन-देन नहीं है; यह एक बहुत ही सरल और उचित बात है। यह ठीक वैसा ही है जैसा माता-पिता के मामले में होता है, जो अपने बच्चों को जन्म देकर बिना किसी शर्त या शिकायत के उनका पालन-पोषण करते हैं। जहाँ तक इस बात का सवाल है कि बच्चे बड़े होकर कर्तव्यनिष्ठ संतान बनेंगे या नहीं, उनके जन्म के दिन से ही, उनके माता-पिता की ऐसी कोई माँग नहीं होती है। एक भी माता-पिता ऐसा नहीं है जो एक बच्चे को जन्म देने के बाद कहता है, "मैं उन्हें केवल इसलिए पाल रहा हूँ ताकि वे भविष्य में मेरी सेवा और सम्मान करें। यदि वे मेरा सम्मान नहीं करेंगे, तो मैं अभी उनका गला घोंटकर मार डालूँगा।" एक भी माता-पिता ऐसे नहीं होते हैं। तो, जिस तरह से माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण करते हैं उसे देखते हुए, यह एक दायित्व, एक जिम्मेदारी है, है ना? (हाँ।) माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण करते रहेंगे, चाहे वे कर्तव्यनिष्ठ संतान हों या न हों, और चाहे कितनी भी कठिनाइयाँ क्यों न हों, वे उन्हें वयस्क होने तक पालेंगे और उनके लिए सर्वश्रेष्ठ की आशा करेंगे। माता-पिता की अपने बच्चों के प्रति इस जिम्मेदारी और दायित्व में कुछ भी सशर्त या लेन-देन वाला नहीं है। संबंधित अनुभव वाले लोग इसे आसानी से समझ पाएँगे। अधिकतर माता-पिता के पास इस बात के लिए कोई अपेक्षित मानक नहीं होते कि उनके बच्चे कर्तव्यनिष्ठ संतान हैं या नहीं। यदि उनके बच्चे कर्तव्यनिष्ठ संतान होते हैं, तो वे थोड़े-से और खुश हो जाएँगे और वे अपनी वृद्धावस्था में थोड़े-से और सुखी रहेंगे। यदि उनके बच्चे कर्तव्यनिष्ठ संतान नहीं होते, तो वे बस उसे वैसा ही रहने देंगे। ज्यादातर माता-पिता जो अपेक्षाकृत खुले विचारों वाले होते हैं, इसी तरह सोचते हैं। कुल मिलाकर, चाहे माता-पिता अपने बच्चों का पालन-पोषण कर रहे हों या बच्चे अपने माता-पिता का भरण-पोषण और देखभाल कर रहे हों, मामला जिम्मेदारी पूरी करने का है, दायित्व पूरा करने का है और यह व्यक्ति की अपेक्षित भूमिका के दायरे में आता है। बेशक, ये सभी सृजित प्राणी द्वारा अपना कर्तव्य निभाने की तुलना में गौण मामले हैं, मगर इंसानी दुनिया के मामलों में, ये ज्यादा सुंदर और न्यायसंगत मामलों में से हैं। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सृजित प्राणी द्वारा अपना कर्तव्य निभाने पर और भी अधिक लागू होता है। एक सृजित प्राणी के रूप में व्यक्ति जब सृष्टिकर्ता के सामने आता है तो उसे अपना कर्तव्य निभाना ही चाहिए। यह करना बहुत उचित बात है और उसे यह जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। सृजित प्राणियों द्वारा अपने कर्तव्य निभाए जाने के आधार पर, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के बीच और भी बड़ा कार्य किया है, उसने लोगों पर कार्य का एक और आगे का चरण संपन्न किया है। और वह कौन-सा कार्य है? वह मानवजाति को सत्य प्रदान करता है, जिससे वे अपने कर्तव्य निभाते हुए परमेश्वर से सत्य हासिल कर सकें और इस प्रकार अपने भ्रष्ट स्वभाव त्यागकर शुद्ध हो जाएँ, परमेश्वर के इरादे पूरे करें और जीवन के सही मार्ग पर चलें और अंततः परमेश्वर का भय मानें और बुराई से दूर रहें, पूर्ण उद्धार प्राप्त करें और आगे शैतान की पीड़ाओं के अधीन न रहें। यही वह अंतिम प्रभाव है जिसे परमेश्वर मानवजाति से कर्तव्य निर्वहन के द्वारा प्राप्त करना चाहता है। इसलिए परमेश्वर तुम्हें अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया के दौरान केवल एक ही चीज स्पष्ट रूप से देखने और थोड़ा-सा सत्य समझने तक सीमित नहीं रखता, न ही वह तुम्हें केवल उस अनुग्रह और उन आशीषों का आनंद लेने देता है जो तुम एक सृजित प्राणी के रूप में अपना कर्तव्य निभाने से प्राप्त करते हो। बल्कि वह तुम्हें शुद्ध होने और बचाए जाने में सक्षम बनाता है और अंततः तुम्हें सृष्टिकर्ता के मुखमंडल के प्रकाश में रहने देता है।
—वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग सात)
408. जब कोई व्यक्ति परमेश्वर का आदेश स्वीकार करता है तो परमेश्वर के पास यह निर्णय लेने के लिए एक मापदंड होता है कि उस व्यक्ति के कार्य अच्छे हैं या बुरे, उसके पास समर्पण है या नहीं, उसने परमेश्वर के इरादे पूरे किए हैं या नहीं और क्या उसके कर्म और व्यवहार मानक स्तर के हैं या नहीं। परमेश्वर जिसको अहमियत देता है वह है व्यक्ति का हृदय, न कि उसके ऊपरी कार्यकलाप। ऐसी बात नहीं है कि यदि कोई व्यक्ति कुछ करता है, तो परमेश्वर को उसे आशीष देना ही चाहिए, फिर चाहे वह इसे कैसे भी करे। यह परमेश्वर के बारे में लोगों की ग़लतफ़हमी है। परमेश्वर सिर्फ अंतिम नतीजे ही नहीं देखता; बल्कि वह इस पर अधिक जोर देता है कि किसी व्यक्ति का हृदय कैसा है, चीजों के आगे बढ़ने के दौरान उस व्यक्ति का रवैया कैसा रहता है और वह यह देखता है कि उसके हृदय में समर्पण, लिहाज और परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा है या नहीं।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
409. तुम चाहे जो भी कर्तव्य निभा रहे हो, तुम्हें सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए, परमेश्वर के इरादे समझने चाहिए, यह जानना चाहिए कि उस कर्तव्य के संबंध में उसकी क्या अपेक्षाएँ हैं, और यह समझना चाहिए कि उस कर्तव्य निर्वहन के माध्यम से तुम्हें क्या नतीजे हासिल करने चाहिए। केवल ऐसा करके ही तुम सिद्धांतबद्ध ढंग से अपने कार्य-कलाप कर सकते हो। अपना कर्तव्य निभाने में तुम अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं चल सकते, तुम जो चाहे वो नहीं कर सकते, जिसे भी करने में तुम खुश होते हो और जो तुम्हें अच्छा दिखाए वह नहीं कर सकते। यह अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना है। अगर तुम अपने कर्तव्य के निर्वहन में यह सोचते हुए अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं पर भरोसा करते हो कि परमेश्वर यही अपेक्षा करता है और यही है जो परमेश्वर को खुश करेगा और यदि तुम परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करते हो—अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं का अभ्यास ऐसे करते हो मानो कि वे सत्य हों और उनका ऐसे पालन करते हो मानो वे सत्य सिद्धांत हों—तो क्या यह गलती नहीं है? यह कर्तव्य निभाना नहीं है और इस तरह से तुम्हारा कर्तव्य निभाना परमेश्वर द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि उन्होंने अपना प्रयास किया और अपना दिल इसमें लगाया है, अपनी देह के विरुद्ध विद्रोह किया है और कष्ट उठाया है, लेकिन फिर वे अपने कर्तव्य कभी भी मानक स्तर से पूरे क्यों नहीं कर पाते हैं? परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट क्यों रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने सत्य सिद्धांतों की खोज नहीं की थी और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य नहीं किया था बल्कि पूरी तरह से अपने ही विचारों के अनुसार काम किया था—यही कारण है। उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, प्राथमिकताओं और स्वार्थी उद्देश्यों को सिद्धांतों और मानकों के रूप में लिया और परमेश्वर की अपेक्षाओं के स्थान पर इन चीजों का उपयोग किया। जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुंदर मानते थे उन्हें वे सत्य के रूप में देखते थे; यह एक गंभीर गलती है। वास्तव में, भले ही लोगों को कभी कोई बात सही लगे, लगे कि यह सत्य के अनुरूप है, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि यह आवश्यक रूप से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है। लोग जितना अधिक यह सोचते हैं कि कोई बात सही है, उन्हें उतना ही अधिक सावधान होना चाहिए और उतना ही अधिक सत्य को खोजना चाहिए और यह देखना चाहिए कि यह परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह ठीक उसकी अपेक्षाओं और उसके वचनों के विरुद्ध है तो भले ही तुम इसे सही मानो यह स्वीकार्य नहीं है, और यह बस एक मानवीय विचार है और तुम इसे चाहे कितना ही सही मानो यह सत्य के अनुरूप नहीं होगा। कोई चीज सही है या गलत, यह निर्णय परमेश्वर के वचनों पर आधारित होना चाहिए। तुम्हें कोई बात चाहे जितनी भी सही लगे, जब तक इसका आधार परमेश्वर के वचनों में न हो, यह गलत है और तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। यह तभी स्वीकार्य है जब यह सत्य के अनुसार हो, और इस तरीके से सत्य सिद्धांतों का मान रखकर ही तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन मानक पर खरा उतर सकता है। कर्तव्य आखिर है क्या? यह परमेश्वर द्वारा लोगों को सौंपा गया आदेश होता है, यह परमेश्वर के घर के कार्य का हिस्सा होता है, यह एक जिम्मेदारी और दायित्व है जिसे परमेश्वर के चुने हुए प्रत्येक व्यक्ति को वहन करना चाहिए। क्या कर्तव्य तुम्हारा पेशा है? क्या यह तुम्हारा व्यक्तिगत पारिवारिक मामला है? क्या यह कहना उचित है कि जब तुम्हें कोई कर्तव्य दे दिया जाता है, तो वह कर्तव्य तुम्हारा व्यक्तिगत व्यवसाय बन जाता है? ऐसा बिल्कुल नहीं है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे निभाना चाहिए? तुम्हें परमेश्वर के वचनों, अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार कार्य अवश्य करना चाहिए और अपने व्यवहार को मानवीय व्यक्तिपरक इच्छाओं के बजाय सत्य सिद्धांतों पर आधारित करना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “जब मुझे कोई कर्तव्य दे दिया गया है तो क्या वह मेरी जिम्मेदारी के दायरे में नहीं आता? जो मेरी जिम्मेदारी के दायरे में आता है क्या वह मेरा निजी मामला नहीं है? यदि मैं अपने कर्तव्य को अपने व्यवसाय की तरह करता हूँ, तो क्या इसका अर्थ यह नहीं है कि मैं उसे ठीक से करूँगा? अगर मैं उसे अपना व्यवसाय न समझूँ, तो क्या मैं उसे अच्छी तरह से करूँगा?” ये बातें सही हैं या गलत? ये गलत हैं; ये सत्य के अनुसार नहीं हैं। कर्तव्य तुम्हारा निजी मामला नहीं है, वह परमेश्वर का मामला है, और यह परमेश्वर के कार्य का हिस्सा है। तुम्हें परमेश्वर जो कहता है वह अवश्य करना चाहिए और परमेश्वर की आज्ञा मानने वाले हृदय के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए। इस तरह से ही तुम्हारा निर्वहन मानक स्तर का हो सकता है। यदि तुम हमेशा अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार और अपनी इच्छाओं के अनुसार कर्तव्य का निर्वहन करते हो, तो तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन कभी भी मानक स्तर का नहीं होगा। हमेशा अपनी इच्छा के अनुसार कार्य करना कर्तव्य-निर्वहन नहीं कहलाता, क्योंकि तुम जो कर रहे हो वह परमेश्वर के प्रबंधन के दायरे में नहीं आता, यह परमेश्वर के घर का कार्य नहीं हुआ; बल्कि तुम अपना उद्यम चला रहे हो, अपने काम कर रहे हो और परमेश्वर इन्हें याद नहीं रखता।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य सिद्धांत खोजकर ही कोई अपना कर्तव्य अच्छी तरह निभा सकता है
410. कुछ लोग अपने कर्तव्य निभाते समय चाहे किसी भी मसले का सामना कर रहे हों, वे सत्य नहीं खोजते और हमेशा अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, विचारों और इच्छाओं के अनुसार कार्य करते हैं। शुरू से अंत तक वे अपनी इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण के अधीन कार्य करते हैं। हो सकता है वे हमेशा अपने कर्तव्य निभाते प्रतीत हों, पर क्योंकि उन्होंने सत्य को कभी स्वीकार नहीं किया है और वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार चीजें करने में विफल रहे हैं, इसलिए वे आखिरकार सत्य और जीवन हासिल नहीं करते और वे सेवाकर्मियों के नाम के ही लायक बन जाते हैं। तो ऐसे लोग अपने कर्तव्यों को करते समय किस पर निर्भर करते हैं? ऐसे व्यक्ति न तो सत्य पर निर्भर करते हैं, न ही परमेश्वर पर। जिस थोड़े से सत्य को वे समझते हैं, वह उनके हृदयों में राज नहीं करता; वे अपने कर्तव्यों को निभाने के लिए अपनी खुद की खूबियों और प्रतिभाओं पर, उस ज्ञान पर जो उन्होंने प्राप्त किया है, और साथ ही अपनी इच्छाशक्ति या नेक इरादों पर भरोसा कर रहे हैं। अगर बात ऐसी है, तो क्या वे अपने कर्तव्यों को मानक स्तर तक निभाने में सक्षम होंगे? जब लोग अपने कर्तव्य निभाने के लिए अपनी धारणाओं, कल्पनाओं, ज्ञान और शिक्षा पर निर्भर करते हैं तो भले ही वे बाहरी तौर पर अपने कर्तव्य निभा रहे हों और ऐसा न लगे कि उन्होंने कोई बुराई की है, उन्होंने सत्य का अभ्यास नहीं किया है। ऐसे में क्या उनका किया गया हर काम परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण है? क्या यह परमेश्वर को संतुष्ट कर सकता है? एक और समस्या भी है जिसे अनदेखा नहीं किया जा सकता : अपने कर्तव्य को निभाने की प्रक्रिया के दौरान यदि तुम्हारी धारणाएँ, कल्पनाएँ और तुम्हारी अपनी इच्छा कभी नहीं बदलती है तो यह साबित करता है कि तुमने कभी सत्य को स्वीकार नहीं किया है और ऐसे में तुम जो कुछ भी करते हो वह अपनी इच्छा से कार्य करना है और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना नहीं है। तो फिर अंतिम नतीजा क्या होगा? तुम्हें जीवन प्रवेश नहीं मिलेगा, तुम एक सेवाकर्मी बन जाओगे और इस प्रकार प्रभु यीशु के ये वचन पूरे करोगे : “उस दिन बहुत-से लोग मुझ से कहेंगे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हम ने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत-से आश्चर्यकर्म नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैं ने तुम को कभी नहीं जाना। हे कुकर्म करनेवालो, मेरे पास से चले जाओ’” (मत्ती 7:22-23)। परमेश्वर कोशिश करने वालों और सेवा करने वाले इन लोगों को कुकर्मी क्यों कहता है? एक बात को लेकर हम निश्चित हो सकते हैं और वह यह कि ये लोग चाहे कोई भी कर्तव्य निभाएँ या कोई भी काम करें, इन लोगों की अभिप्रेरणाएँ, प्रेरक शक्तियाँ, इरादे और विचार पूरी तरह से उनकी अपनी इच्छाओं से पैदा होते हैं। ये पूरी तरह से उनके अपने हितों और संभावनाओं की रक्षा की खातिर होते हैं, अपने अभिमान और रुतबे की सुरक्षा और अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने की खातिर हैं। उनकी विचारशीलता और हिसाब-किताब इन्हीं चीजों के आसपास केंद्रित होता है, उनके दिलों में कोई सत्य नहीं होता और उनके पास ऐसे दिल नहीं होते जो परमेश्वर का भय मानते हों और उसके प्रति समर्पण करते हों। समस्या की जड़ यही है। आज, तुम लोगों के लिए किस तरह अनुसरण करना बहुत जरूरी है? सभी मामलों में, तुम्हें सत्य की खोज करनी चाहिए, और तुम्हें परमेश्वर के इरादों और उसकी माँग के अनुसार अपना कर्तव्य ठीक से निभाना चाहिए। अगर तुम ऐसा करोगे तो तुम परमेश्वर की स्वीकृति पाओगे। तो परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार अपना कर्तव्य निभाने में खासतौर से क्या शामिल है? तुम जो कुछ भी करो, उसमें परमेश्वर से प्रार्थना करना सीखो, तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि तुम्हारी मंशाएँ क्या हैं, तुम्हारे विचार क्या हैं, कि क्या ये मंशाएँ और विचार सत्य के अनुसार हैं; अगर नहीं हैं तो उन्हें त्याग देना चाहिए, जिसके बाद तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार चलना चाहिए, और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकार करना चाहिए। इससे यह सुनिश्चित होगा कि तुम सत्य को अभ्यास में लाओ। यदि तुम अच्छी तरह से जानते हो कि तुम्हारी कथनी और करनी के पीछे के इरादे और लक्ष्य सत्य का उल्लंघन करते हैं और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं हैं, फिर भी तुम परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते, आत्म-चिंतन नहीं करते और उन्हें हल करने के लिए सत्य नहीं खोजते हो तो यह खतरनाक है और तुम्हारे लिए बुराई करना और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले काम करना आसान हो जाता है। यदि तुम एक या दो बार बुराई करते हो और पश्चात्ताप करते हो तो तुम्हारे पास अभी भी उद्धार की आशा है। यदि तुम बुराई करते रहते हो और इस बिंदु पर भी पश्चात्ताप करना नहीं जानते हो तो तुम संकट में हो : परमेश्वर तुम्हें एक तरफ कर देगा या तुम्हें त्याग देगा, जिसका अर्थ है कि तुम्हें हटा दिए जाने का खतरा है; जो लोग हर तरह के बुरे कर्म करते हैं उन्हें निश्चित रूप से दंडित किया जाएगा और हटा दिया जाएगा।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन
411. तुम जो भी कर्तव्य निभाते हो उसमें जीवन प्रवेश शामिल होता है। तुम्हारा कर्तव्य काफी नियमित हो या अनियमित, नीरस हो या जीवंत, तुम्हें हमेशा जीवन प्रवेश हासिल करना ही चाहिए। कुछ लोगों द्वारा किए गए कर्तव्य एकरसता वाले होते हैं; वे हर दिन वही चीज करते रहते हैं। मगर, इनको निभाते समय, ये लोग अपनी जो दशाएँ प्रकट करते हैं वे सब एक-समान नहीं होतीं। कभी-कभार अच्छी मनःस्थिति में होने पर लोग थोड़े ज्यादा लगनशील होते हैं और बेहतर काम करते हैं। अन्य समय में, किसी अज्ञात प्रभाव के कारण, उनके शैतानी भ्रष्ट स्वभाव उनमें शरारत पैदा कर देते हैं जिससे उनके विचार अनुचित हो जाते हैं; वे बुरी दशाओं और बुरी मनःस्थितियों में पड़ जाते हैं और अंततः अपने कर्तव्य लापरवाह तरीके से निभाते हैं। लोगों की आंतरिक दशाएँ उनके परिवेश के अनुसार बदलेंगी, लेकिन वे चाहे कैसे भी बदलें, यदि कोई व्यक्ति सत्य समझता है तो वह सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकता है। अपनी मनःस्थिति के आधार पर काम करना गलत है; यह अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर काम करना है। जब तुम अच्छी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें थोड़ा दिल लगा सकते हो और जब तुम बुरी मनःस्थिति में होते हो, तो तुम जो करते हो उसमें अपना दिल नहीं लगाते और लापरवाही से काम करते हो—क्या यह काम करने का सैद्धांतिक तरीका है? क्या यह तरीका तुम्हें अपने कर्तव्य को एक मानक स्तरीय ढंग से निभाने देगा? मनःस्थिति चाहे जैसी हो, लोगों को परमेश्वर के सामने प्रार्थना करना और सत्य की खोज करना आना चाहिए, सिर्फ इसी तरीके से वे अपनी मनःस्थिति द्वारा बाधित होने, और उसके द्वारा इधर-उधर भटकाए जाने से बच सकते हैं। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हें हमेशा खुद को जाँच कर देखना चाहिए कि क्या तुम सिद्धांत के अनुसार काम कर रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य निर्वाह मानक स्तर का है या नहीं, कहीं तुम इसे लापरवाह ढंग से तो नहीं कर रहे हो, कहीं तुम बहानेबाज और सुस्त तो नहीं रहे हो, कहीं तुम्हारे रवैये और तुम्हारे सोचने के तरीके में कोई खोट तो नहीं। एक बार तुम्हारे आत्मचिंतन कर लेने और तुम्हारे सामने इन चीजों के स्पष्ट हो जाने से, अपना कर्तव्य निभाने में तुम्हें आसानी होगी। अपना कर्तव्य निभाते समय तुम्हारा किसी भी चीज से सामना हो—नकारात्मकता और कमजोरी या काट-छाँट के बाद बुरी मनःस्थिति में हो—तुम्हें इससे ठीक से पेश आना चाहिए, और तुम्हें साथ ही सत्य को खोजना और परमेश्वर के इरादों को समझना चाहिए। ये काम करने से तुम्हारे पास अभ्यास का एक मार्ग होगा। अगर तुम अपना कर्तव्य निर्वाह बहुत अच्छे ढंग से करना चाहते हो, तो तुम्हें अपनी मनःस्थिति से बिल्कुल प्रभावित नहीं होना चाहिए। तुम चाहे कितने भी नकारात्मक या कमजोर महसूस कर रहे हो, तुम्हें सत्य का अभ्यास करना चाहिए, अपने दायित्व और जिम्मेदारियाँ पूरी करनी चाहिए और अपने हर काम में सिद्धांतों पर कायम रहना चाहिए। यदि तुम ऐसा करते हो, तो न केवल अन्य लोग तुम्हें स्वीकार करेंगे, बल्कि परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। इस प्रकार, तुम एक ऐसे व्यक्ति होगे जो जिम्मेदार है, जो जिम्मेदारी ले सकता है, जो वास्तव में अच्छा है और जो वास्तव में अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाता है और तुम पूरी तरह से एक सच्चे इंसान के समान जिओगे। ऐसे लोगों का शुद्धिकरण किया जाता है और वे अपने कर्तव्य निभाते समय वास्तविक बदलाव हासिल करते हैं, वे परमेश्वर की दृष्टि में ईमानदार लोग कहे जा सकते हैं। केवल ईमानदार लोग ही सत्य का अभ्यास करने में डटे रह सकते हैं ताकि वे सिद्धांत के साथ क्रियाकलाप करना हासिल कर सकें और अपने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाने में सक्षम हो सकें। सिद्धांत पर चलकर कर्म करने वाले लोग अच्छी मनोदशा में होने पर अपना कर्तव्य ध्यान से निभाते हैं; वे लापरवाह ढंग से कार्य नहीं करते, वे ढीठ नहीं होते और दूसरे उनके बारे में ऊँचा सोचें इसके लिए दिखावा नहीं करते। बुरी मनःस्थिति में होने पर भी वे अपने रोजमर्रा के काम को उतनी ही ईमानदारी और जिम्मेदारी से पूरा करते हैं और यदि वे किसी कष्टदायक चीज का सामना भी करते हैं जो अपने कर्तव्य निभाते समय उन पर दबाव डालती है या बाधा पहुँचाती है तो भी वे परमेश्वर के सामने अपने दिल को शांत रख पाते हैं और यह कहते हुए प्रार्थना करते हैं, “मेरे सामने चाहे जितनी बड़ी समस्या खड़ी हो जाए—भले ही आसमान फट कर गिर पड़े—जब तक मैं जीवित हूँ, मुझे अपना कर्तव्य पूरा करना होगा। मेरे जीवन का प्रत्येक दिन वह दिन है जब मुझे अच्छी तरह से अपना कर्तव्य निभाना होगा, ताकि मैं परमेश्वर द्वारा मुझे दिए गए इस कर्तव्य और उसके द्वारा मेरे शरीर में प्रवाहित इस साँस के योग्य बना रहूँ। चाहे जितनी भी मुश्किलों में रहूँ, मैं उन सबको परे रख दूँगा क्योंकि अपना कर्तव्य पूरा करना मेरे लिए सबसे अधिक महत्वपूर्ण है!” जो लोग किसी व्यक्ति, घटना, चीज या माहौल से प्रभावित नहीं होते, जो किसी मनःस्थिति या बाहरी स्थिति से बेबस नहीं होते, और जो परमेश्वर द्वारा उन्हें सौंपे गये कर्तव्यों और आदेशों को सबसे आगे रखते हैं—वही परमेश्वर के प्रति निष्ठावान होते हैं और सच्चाई के साथ उसके सामने समर्पण करते हैं। ऐसे लोगों ने जीवन प्रवेश हासिल किया है और सत्य वास्तविकता में प्रवेश किया है। यह सत्य को जीने की सबसे सच्ची और व्यावहारिक अभिव्यक्तियों में से एक है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है
412. परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी माँगे, तुम्हें बस अपनी पूरी ताकत इसमें लगाने की जरूरत है, और मुझे आशा है कि इन अंतिम दिनों में तुम परमेश्वर के समक्ष उसके प्रति अपना लगन दिखाओगे। अगर तुम सिंहासन पर बैठे परमेश्वर की संतुष्ट मुस्कराहट देख सकते हो, तो भले ही यह तुम्हारी मृत्यु का समय क्यों न हो, आँखें बंद करते समय भी तुम्हें हँसना और मुस्कराना चाहिए। जब तक तुम जीवित हो, तुम्हें परमेश्वर के लिए अपना अंतिम कर्तव्य निभाना चाहिए। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उलटा लटका दिया गया था; परंतु तुम्हें इन अंतिम दिनों में परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और उसके लिए अपनी सारी ऊर्जा खर्च कर देनी चाहिए। कोई सृजित प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इसलिए तुम्हें अपने आपको पहले ही परमेश्वर को सौंप देना चाहिए, ताकि वह अपनी इच्छा के अनुसार तुम्हारी योजना बना सके। जब तक इससे परमेश्वर खुश और प्रसन्न होता हो, तो उसे तुम्हारे साथ जो चाहे करने दो। मनुष्य को शिकायत के शब्द बोलने का क्या अधिकार है?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों का अनावरण, अध्याय 41
413. आज तुम लोगों से जो कुछ हासिल करने की अपेक्षा की जाती है, वे अतिरिक्त माँगें नहीं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, जिसे सभी लोगों द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपना कर्तव्य तक निभाने में या उसे अच्छी तरह से निभाने में भी असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु को आमंत्रित नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग अभी भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मानवजाति के लिए किया जाता है, और मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के लिए दिया जाता है। जब परमेश्वर वह सब कर लेता है जो उसे करना चाहिए, तो मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में कोई कसर न छोड़े और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपना समर्पण प्रदान करना चाहिए और अनगिनत धारणाओं में संलग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठकर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर को अपना समर्पण प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा-सा सहयोग प्रदान नहीं कर सकता? परमेश्वर मानवजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के लिए अपना कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, पर तुम लोग अभी भी देखते ही हो किंतु करते नहीं, सुनते ही हो किंतु हिलते नहीं। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर चुका है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से कुछ कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए उसका कार्य उसकी पहली प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास
414. मनुष्य द्वारा अपना कर्तव्य निभाना वास्तव में उस सबकी सिद्धि है, जो मनुष्य के भीतर अंतर्निहित है, अर्थात् जो सहज रूप से मनुष्य के लिए संभव है। इसके बाद उसका कर्तव्य पूरा हो जाता है। जहाँ तक मनुष्य की सेवा में कमियों की बात है, इनमें उसके क्रमिक अनुभव और न्याय से गुजरने की प्रक्रिया के माध्यम से धीरे-धीरे कमी आती जाती है; वे मनुष्य के कर्तव्य में बाधा या विपरीत प्रभाव नहीं डालते। वे लोग, जो इस डर से सेवा करना बंद कर देते हैं या हार मानकर पीछे हट जाते हैं कि उनकी सेवा में कमियाँ हो सकती हैं, वे सबसे ज्यादा कायर होते हैं। यदि लोग वह व्यक्त नहीं कर सकते, जो उन्हें सेवा के दौरान व्यक्त करना चाहिए या वह हासिल नहीं कर सकते, जो उनके लिए सहज रूप से संभव है, और इसके बजाय वे लापरवाही से काम करते हैं, तो उन्होंने अपना वह प्रयोजन खो दिया है, जो एक सृजित प्राणी में होना चाहिए। ऐसे लोग “औसत दर्जे के” माने जाते हैं; वे बेकार का कचरा हैं। इस तरह के लोग सही मायनों में सृजित प्राणी कैसे कहे जा सकते हैं? क्या वे सड़ी हुई चीजें नहीं हैं जो बाहर से तो चमकती हैं, परंतु भीतर से सड़ी हुई होती हैं? यदि कोई व्यक्ति अपने आपको परमेश्वर कहता है, मगर अपनी दिव्यता व्यक्त करने, स्वयं परमेश्वर का कार्य करने या परमेश्वर का प्रतिनिधित्व करने में अक्षम है, तो वह निःसंदेह परमेश्वर नहीं है, क्योंकि उसमें परमेश्वर का सार नहीं है और परमेश्वर जो सहज रूप से हासिल कर सकता है, वह उसके भीतर विद्यमान नहीं है। यदि मनुष्य वह खो देता है, जो उसके द्वारा सहज रूप से प्राप्य है, तो वह अब और मनुष्य नहीं समझा जा सकता, और वह सृजित प्राणी के रूप में खड़े होने या परमेश्वर के सामने आकर उसकी सेवा करने के योग्य नहीं है, और वह परमेश्वर का अनुग्रह प्राप्त करने या परमेश्वर द्वारा ध्यान रखे जाने, सुरक्षा किए जाने और पूर्ण बनाए जाने के योग्य तो बिल्कुल भी नहीं है। कई लोग जो परमेश्वर का भरोसा खो चुके हैं, परमेश्वर का अनुग्रह भी खोते चले जाते हैं। वे न केवल अपने बुरे कर्मों से घृणा नहीं करते, बल्कि ढिठाई से इस बात का प्रचार भी करते हैं कि परमेश्वर का मार्ग गलत है, और वे विद्रोही परमेश्वर के अस्तित्व तक से इनकार कर देते हैं। इस प्रकार की विद्रोहशीलता रखने वाले लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनंद लेने के पात्र कैसे हो सकते हैं? जो लोग अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे परमेश्वर के खिलाफ बहुत विद्रोही और उसके बहुत ऋणी होते हैं, फिर भी वे पलट जाते हैं और हमलावर होकर कहते हैं कि परमेश्वर गलत है। इस तरह का व्यक्ति पूर्ण बनाए जाने के लिए उपयुक्त कैसे हो सकता है? क्या यह हटा दिए जाने और दंडित किए जाने का संकेत नहीं है? जो लोग परमेश्वर के सामने अपना कर्तव्य नहीं निभाते, वे पहले से ही सर्वाधिक जघन्य अपराधों के दोषी हैं, जिसके लिए मृत्यु भी अपर्याप्त सज़ा है, फिर भी वे परमेश्वर के साथ बहस करने और उसके साथ होड़ करने की धृष्टता करते हैं। ऐसे लोगों को पूर्ण बनाने का क्या मूल्य है? जब लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में विफल होते हैं, तो उन्हें दोषी और ऋणी महसूस करना चाहिए; उन्हें अपनी कमजोरी और अनुपयोगिता, अपनी विद्रोहशीलता और भ्रष्टता से घृणा करनी चाहिए; इससे भी बढ़कर, उन्हें परमेश्वर को सब कुछ अर्पित कर देना चाहिए, यहाँ तक कि अपना जीवन भी। केवल तभी वे सृजित प्राणी होते हैं, जो परमेश्वर से सच्चा प्रेम करते हैं और केवल ऐसे लोग ही परमेश्वर के आशीषों और वादों का आनंद लेने और उसके द्वारा पूर्ण बनाए जाने के लिए उपयुक्त हैं। और तुम लोगों में से अधिकतर क्या हैं? तुम लोग उस परमेश्वर के साथ कैसा व्यवहार करते हो, जो तुम लोगों के मध्य रहता है? तुम लोगों ने उसके सामने अपना कर्तव्य किस तरह निभाया है? क्या तुमने, अपने जीवन की कीमत पर भी, वह सब कर लिया है, जिसे तुम संभवतः कर सकते हो? तुम लोगों ने क्या बलिदान किया है? क्या तुम लोगों को मुझसे बहुत कुछ नहीं मिला है? क्या तुम लोग विवेक से परख सकते हो? तुम लोग मेरे प्रति कितने वफादार हो? तुम लोगों ने मेरी किस प्रकार से सेवा की है? और मैंने जो कुछ तुम लोगों को दिया है और तुम्हारे लिए किया है, उसका क्या? क्या तुम लोगों ने यह सब माप लिया है? क्या तुम सभी लोगों ने इसका आकलन और तुलना उस जरा-सी अंतरात्मा के साथ कर ली है, जो तुम लोगों के भीतर है? तुम्हारे शब्द और कार्य किसके योग्य हो सकते हैं? क्या तुम लोगों का इतना छोटा-सा बलिदान उस सबके बराबर है, जो मैंने तुम लोगों को दिया है? मैं पूरे हृदय से, बिना किसी हिचकिचाहट के, तुम लोगों के प्रति समर्पित रहा हूँ, फिर भी तुम लोग मेरे बारे में दुष्ट इरादे रखते हो और मेरे प्रति अनमने रहते हो। तुम लोगों ने यही कर्तव्य निभाया है, तुम लोगों ने यही छटाँक भर भूमिका निभाई है। क्या ऐसा नहीं है? क्या तुम लोग नहीं जानते कि तुम एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाने में बिल्कुल असफल हो गए हो? तुम लोग सृजित प्राणी कैसे माने जा सकते हो? क्या तुम लोगों को यह स्पष्ट नहीं है कि तुम क्या व्यक्त कर रहे हो और क्या जी रहे हो? तुम लोग अपना कर्तव्य पूरा करने में असफल रहे हो, पर तुम परमेश्वर की सहनशीलता और भरपूर अनुग्रह प्राप्त करना चाहते हो। इस प्रकार का अनुग्रह तुम जैसे बेकार और अधम लोगों के लिए नहीं, बल्कि उन लोगों के लिए तैयार किया गया है, जो कुछ नहीं माँगते और खुशी से बलिदान करते हैं। तुम जैसे मामूली लोग स्वर्ग के अनुग्रह का आनंद लेने के बिल्कुल भी योग्य नहीं हैं। केवल कठिनाई और अनंत सज़ा ही तुम लोगों को अपने जीवन में मिलेगी! यदि तुम लोग मेरे प्रति समर्पित नहीं हो सकते, तो तुम लोगों के भाग्य में पीड़ा ही होगी। यदि तुम लोग मेरे वचनों और कार्यों के प्रति जवाबदेह नहीं हो सकते, तो तुम्हारा परिणाम दंड होगा। राज्य के समस्त अनुग्रह, आशीषों और अद्भुत जीवन का तुम लोगों के साथ कोई लेना-देना नहीं होगा। यही वह अंत है, जिसके तुम काबिल हो और जो तुम लोगों की अपनी करतूतों का परिणाम है!
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर