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XI सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करने पर उत्कृष्ट वचन

(IX) अपने कर्तव्य को सही ढंग से पूरा करने पर वचन

104. एक इंसान और सच्चे ईसाई होने के नाते, अपने मन और शरीर को परमेश्वर के आदेश को पूरा करने के लिए समर्पित करना हम सभी की ज़िम्मेदारी और दायित्व है, क्योंकि हमारा सम्पूर्ण अस्तित्व परमेश्वर से आया है, और यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण अस्तित्व में है। यदि हमारे मन और शरीर परमेश्वर के आदेश के लिए समर्पित नहीं हैं और मानवजाति के धार्मिक कार्य के लिए नहीं हैं, तो हमारी आत्माएँ उन लोगों के योग्य नहीं हैं जो परमेश्वर के आदेश के लिए अपना जीवन त्याग चुके हैं, परमेश्वर के लिए तो और भी अधिक अयोग्य हैं, जिसने हमें सब कुछ प्रदान किया है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर सम्पूर्ण मानवजाति के भाग्य का नियन्ता है" से उद्धृत

105. तुम परमेश्वर के आदेश के साथ कैसा व्यवहार करते हो, यह एक गंभीर विषय है। परमेश्वर जो तुम्हें सौंपता है, यदि तुम उसे पूरा नहीं कर सकते, तो तुम उसकी उपस्थिति में जीने के योग्य नहीं हो और तुम्हें दण्डित किया जाना चाहिए। यह स्वर्ग का नियम और पृथ्वी का सिद्धांत है कि मनुष्य परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को पूरा करे; यह उसका सर्वोच्च दायित्व है, उसके जीवन जितना ही महत्वपूर्ण है। यदि तुम परमेश्वर के आदेश को गंभीरता से नहीं लेते, तो तुम परमेश्वर के साथ सबसे कष्टदायक तरीक़े से विश्वासघात कर रहे हो, यह यहूदा से भी अधिक शोकजनक है और तुम्हें शाप का पात्र बनाता है। परमेश्वर के सौंपे हुए कार्य को कैसे लिया जाए, लोगों को इसकी एक पूरी समझ पानी चाहिए, और उन्हें कम से कम यह बोध होना चाहिए कि परमेश्वर मानवजाति को आदेश देता है: यह परमेश्वर से मिला एक उत्कर्ष और विशेष कृपा है, यह अत्यधिक गौरव की बात है। अन्य सब कुछ छोड़ा जा सकता है—यहाँ तक कि अगर जीवन का भी बलिदान करना पड़े, तो भी एक व्यक्ति को परमेश्वर के आदेश को पूरा करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "मनुष्य का स्वभाव कैसे जानें" से उद्धृत

106. मनुष्य के कर्तव्य और क्या वह धन्य या श्रापित है के बीच कोई सह सम्बंध-नहीं है। कर्तव्य वह है जो मनुष्य को पूरा करना चाहिए; यह उसका आवश्यक कर्तव्य है और प्रतिफल, परिस्थितियों या कारणों पर निर्भर नहीं होना चाहिए। केवल तभी कहा जा सकता है कि वह कर्तव्य कर रहा है। ऐसा मनुष्य जिसे धन्य किया जाता है वह न्याय के बाद सिद्ध बनाए जाने पर भलाई का आनन्द लेता है। ऐसा मनुष्य जिसे श्रापित किया जाता है तब दण्ड प्राप्त करता है जब ताड़ना और न्याय के बाद उसका स्वभाव अपरिवर्तित रहता है, अर्थात्, उसे सिद्ध नहीं बनाया गया है। एक सृजन किए गए प्राणी के रूप में, मनुष्य को, इस बात की परवाह किए बिना कि क्या उसे धन्य या श्रापित किया जाएगा, अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, वह करना चाहिए जो उसे करना चाहिए, और वह करना चाहिए जो वह करने के योग्य है। यही किसी ऐसे मनुष्य के लिए सबसे आधारभूत शर्त है, जो परमेश्वर की तलाश करता है। तुम्हें केवल धन्य होने के लिए अपने कर्तव्य को नहीं करना चाहिए, और श्रापित होने के भय से अपना कृत्य करने से इनकार नहीं करना चाहिए। मैं तुम लोगों को एक बात बता दूँ: करने में समर्थ है यदि मनुष्य अपना कार्य, तो इसका अर्थ है कि वह उसे करता है जो उसे करना चाहिए। यदि मनुष्य अपना कर्तव्य करने में असमर्थ है, तो यह मनुष्य की विद्रोहशीलता को दर्शाता है। यह सदैव उसके कर्तव्य को करने की प्रक्रिया के माध्यम से है कि मनुष्य धीरे-धीरे बदलता है, और यह इसी प्रक्रिया के माध्यम से है कि वह अपनी वफादारी प्रदर्शित करता है। वैसे तो, तुम जितना अधिक अपना कार्य करने में समर्थ होगे, तुम उतने ही अधिक सत्य प्राप्त करोगे, और तुम्हारी अभिव्यक्ति भी उतनी ही अधिक वास्तविक हो जाएगी। जो लोग अपने कर्तव्य को बिना रुचि के करते हैं और सत्य की तलाश नहीं करते हैं वे अन्त में हटा दिए जाएँगे, क्योंकि ऐसे लोग सत्य के अभ्यास में अपने कर्तव्य को नहीं करते हैं, और अपने कर्तव्य को पूरा करने में सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं। ऐसे लोग वे हैं जो अपरिवर्तित रहते हैं और श्रापित किए जाएँगे। उनकी न केवल अभिव्यक्तियाँ अशुद्ध हैं, बल्कि वे जो व्यक्त करते हैं वह भी कुछ नहीं बल्कि दुष्टता ही होती है।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "देहधारी परमेश्वर की सेवकाई और मनुष्य के कर्तव्य के बीच अंतर" से उद्धृत

107. परमेश्वर में आस्था रखने वाले हर व्यक्ति को परमेश्वर की इच्छा को समझना चाहिये। अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने वाले लोग ही परमेश्वर को संतुष्ट कर सकते हैं, परमेश्वर उन्हें जो काम सौंपता है, उसे पूरा करने से ही उनके कर्तव्यों का निर्वहन अपेक्षित मानक के बराबर होगा। कोई काम पूरा करते हुए, अगर लोग सत्य को अभ्यास में नहीं लाते या उसे नहीं खोजते, जब वे सत्य को अपना दिल समर्पित नहीं करते, अर्थात, जब वे अपना दिमाग बस रटने में लगाते हैं, हाथों से केवल काम करते हैं, पैरों से बस भागते हैं, तो उन्होंने परमेश्वर के आदेश को वास्तव में पूरा नहीं किया है। परमेश्वर के आदेश की पूर्णता के मानक हैं। मानक क्या हैं? प्रभु यीशु ने कहा: "तू प्रभु अपने परमेश्‍वर से अपने सारे मन से, और अपने सारे प्राण से, और अपनी सारी बुद्धि से, और अपनी सारी शक्‍ति से प्रेम रखना।" परमेश्वर से प्रेम करना उसका एक पहलू है जिसकी परमेश्वर लोगों से अपेक्षा करते है। वास्तव में, जब परमेश्वर लोगों को एक आदेश देता है, जब वे अपने विश्वास से अपना कर्तव्य निभाते हैं, तो जिन मानकों की वह उनसे अपेक्षा करता है वे हैं: अपने पूर्ण हृदय से, अपने पूर्ण प्राण से, अपने पूरे दिमाग से, और अपनी पूरी ताक़त के साथ। यदि तू मौज़ूद तो है, लेकिन तेरा हृदय मौज़ूद नहीं है, यदि तू कार्यों के बारे में अपने दिमाग से सोचता है और उन्हें स्मृति में रख देता है, लेकिन तू अपना हृदय उन में नहीं लगाता है, और यदि तू अपनी क्षमताओं का उपयोग करके चीज़ों को पूरा करता है, तो क्या यह परमेश्वर के आदेश को पूरा करना है? तो अपने कर्तव्य को सही तरीके से करने और परमेश्वर ने तुझे जो कुछ भी सौंपा है, उसे पूरा करने के लिए और अपने कर्तव्य को निष्ठापूर्वक निभाने के लिए किस तरह का मानक प्राप्त करना ही चाहिए? यह अपने कर्तव्य को पूरे हृदय से, अपने पूरे प्राण से, अपने पूरे मन से, अपनी पूरी ताक़त से करना है। अगर आपके अंदर परमेश्वर से प्रेम करने वाला दिल नहीं है, तो फिर अपने कर्तव्य को सही ढंग से निभाने की कोशिश करने से बात नहीं बनेगी। अगर परमेश्वर के लिये आपका प्रेम मज़बूत और अधिक सच्चा होता चला जाता है, तो स्वाभाविक रूप से आप पूरे दिल से, पूरी आत्मा से, पूरे मन से, और पूरी शक्ति से अपने कर्तव्य का निर्वाह कर पायेंगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "बस लोग किसके अनुसार जी रहे हैं" से उद्धृत

108. चाहे तुम कुछ भी करो, तुम्हें सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि तुम इसे क्यों कर रहे हो, वह कौन सी मंशा है जो तुम्हें ऐसा करने के लिए निर्देशित करती है, तुम्हारे ऐसा करने का क्या महत्व है, मामले की प्रकृति क्या है, और क्या तुम जो कर रहे हो वह कोई सकारात्मक चीज़ है या कोई नकारात्मक चीज़ है। तुम्हें इन सभी मामलों की एक स्पष्ट समझ अवश्य होनी चाहि; सिद्धान्त के साथ कार्य करने में समर्थ होने के लिए यह बहुत आवश्यक है। यदि तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए कुछ कर रहे हो, तो तुम्हें यह विचार करना चाहिए: मुझे यह किस तरह करना चाहिए? मुझे किस तरह अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से करना चाहिए ताकि मैं इसे बस लापरवाही से न कर रहा हूँ? इस मामले में तुम्हें परमेश्वर के करीब आना चाहिए। परमेश्वर के करीब आने का मतलब है इस बात में सच्चाई को खोजना, अभ्यास करने के तरीके को खोजना, परमेश्वर की इच्छा को खोजना, और इस बात को खोजना है कि परमेश्वर को संतुष्ट कैसे करना है। इसी तरह तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर के करीब आया जाता है। इसमें कोई धार्मिक अनुष्ठान या बाहरी क्रिया-कलाप करना शामिल नहीं है; यह परमेश्वर की इच्छा को खोजने के बाद सत्य के अनुसार अभ्यास करने के उद्देश्य से किया जाता है। अगर तुम हमेशा ऐसा कहते हो कि 'परमेश्वर का धन्यवाद,' परमेश्वर का धन्यवाद’जबकि तुमने कुछ भी नहीं किया होता है, लेकिन तब जब तुम कुछ कर रहे होते हो, तो तुम जिस तरीके से चाहते हो वैसा करते रहते हो, तब इस तरह धन्यवाद देना केवल एक बाहरी कृत्य है। अपना कर्तव्य करते समय या किसी चीज़ पर कार्य करते समय, तुम्हें हमेशा सोचना चाहिए: मुझे यह कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? परमेश्वर की मंशा क्या है? जो तुम कहते हो उसके माध्यम से परमेश्वर के करीब हों; ऐसा करने में, तुम अपने कृत्यों और साथ ही परमेश्वर की मंशा के पीछे के सिद्धान्तों और सत्य की खोज करते हो, और तुम जो कुछ भी करते हो उसमें परमेश्वर से नहीं भटकोगे। केवल ऐसा व्यक्ति ही सचमुच परमेश्वर में विश्वास करता है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "परमेश्वर की इच्छा को खोजना सत्य के अभ्यास के लिए है" से उद्धृत

109. भले ही तू किसी भी कर्तव्य को पूरा करे, तुझे हमेशा परमेश्वर की इच्छा को समझने की और यह समझने की कोशिश करनी चाहिए कि तेरे कर्तव्य को लेकर उसकी क्या अपेक्षा है; केवल तभी तू सैद्धान्तिक तरीके से मामलों को सँभाल पाएगा। अपने कर्तव्य को निभाने में, तू अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के अनुसार बिल्कुल नहीं जा सकता है या तू जो चाहे मात्र वह नहीं कर सकता है, जिसे भी करने में तू खुश और सहज हो, वह नहीं कर सकता है, या ऐसा काम नहीं कर सकता जो तुझे अच्छे व्यक्ति के रूप में दिखाये। यदि तू परमेश्वर पर अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं को बलपूर्वक लागू करता है या उन का अभ्यास ऐसे करता है मानो कि वे सत्य हों, उनका ऐसे पालन करता है मानो कि वे सत्य के सिद्धांत हों, तो यह कर्तव्य पूरा करना नहीं है, और इस तरह से तेरा कर्तव्य निभाना परमेश्वर के द्वारा याद नहीं रखा जाएगा। कुछ लोग सत्य को नहीं समझते हैं, और वे नहीं जानते कि अपने कर्तव्यों को पूरा करने का क्या अर्थ है। उन्हें लगता है कि चूँकि उन्होंने अपना दिल और अपना प्रयास इसमें लगाया है, और देहासक्ति का त्याग करने के कारण कष्ट उठाया है, उनके कर्तव्य की पूर्ति अपेक्षा पर खरी उतरेगी—पर फिर क्यों परमेश्वर हमेशा असंतुष्ट रहता है? इन लोगों ने कहाँ भूल की है? उनकी भूल यह थी कि उन्होंने परमेश्वर की अपेक्षाओं की तलाश नहीं की थी, बल्कि अपने ही इरादों के अनुसार काम किया था; उन्होंने अपनी ही इच्छाओं, पसंदों और स्वार्थी उद्देश्यों को सत्य मान लिया था और उन्होंने इनको परमेश्वर की पसंद मान लिया, मानो कि वे परमेश्वर के मानकों और अपेक्षाओं के अनुरूप हों।जिन बातों को वे सही, अच्छी और सुन्दर मानते थे, उन्हें सत्य के रूप में देखते थे; यह एक भूल है। भले ही तुम्हें कोई बात सही लगे, तुम्हें फिर भी सिद्धांतों की तलाश करनी चाहिये और यह देखना चाहिए कि तुम्हारी सोच परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुरूप है या नहीं। यदि यह उसकी अपेक्षाओं के विरुद्ध है, तो यह सोचना भी गलत है कि तुम्हारी सोच सही है, क्योंकि यह एक मानवीय विचार है और तुम्हें इसे हटा देना चाहिए। कर्तव्य क्या है? यह परमेश्वर द्वारा सौंपा गया एक आदेश है। तो तुम्हें अपना कर्तव्य कैसे पूरा करना चाहिए? व्यक्तिपरक मानवीय इच्छाओं के आधार पर नहीं बल्कि परमेश्वर की अपेक्षाओं और मानकों के अनुसार काम कर तथा सत्य के सिद्धांतों पर अपना व्यवहार आधारित कर। इस तरह तुम्हारा अपने कर्तव्य को करना मानकों के स्तर का होगा।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "केवल सत्य के सिद्धांतों की खोज करके ही तू अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से निभा सकता है" से उद्धृत

110. अपने कर्तव्य को निभाने वालों, चाहे तुम सत्य को कितनी भी गहराई से क्यों न समझो, यदि तुम सत्य की वास्तविकता में प्रवेश करना चाहते हो, तो अभ्यास का सबसे सरल तरीक़ा यह होगा कि तुम जो भी काम करो, उसमें परमेश्वर के घर के हित के बारे में सोचो, अपनी स्वार्थी इच्छाओं को और व्यक्तिगत अभिलाषाओं, इरादों, सम्मान और हैसियत को त्याग दो। परमेश्वर के घर के हितों को सबसे पहले रखो— तुम्हें कम से कम यह तो करना ही चाहिए। अपने कर्तव्य को करने वाला कोई व्यक्ति अगर इतना भी नहीं कर सकता, तो उस व्यक्ति को कर्तव्य करने वाला कैसे कहा जा सकता है? यह अपने कर्तव्य को पूरा करना नहीं है। तुम्हें पहले परमेश्वर के घर के हितों का, परमेश्वर के अपने हितों का, उसके कार्य का ध्यान रखना चाहिए, और इन बातों को सर्वप्रथम स्थान देना चाहिए; केवल उसके बाद ही तुम्हें अपने क़द की स्थिरता या दूसरे लोग तुम्हारे बारे में क्या सोचते हैं, इसकी चिंता करनी चाहिए। क्या तुम लोगों को नहीं लगता कि जब तुम लोग इसे इन चरणों में बाँट देते हो और कुछ समझौता करते हो तो यह कुछ आसान हो जाता है? यदि तुम इसे कुछ समय के लिए कर लेते हो, तो तुम यह अनुभव करने लगोगे कि परमेश्वर को संतुष्ट करना मुश्किल नहीं है। इसके साथ ही, यदि तुम अपनी ज़िम्मेदारियों को निभा सकते हो, अपने दायित्वों और कर्तव्यों को पूरा कर सकते हो, अपनी स्वार्थी इच्छाओं, व्यक्तिगत अभिलाषाओं और इरादों को त्याग सकते हो, परमेश्वर की इच्छा का ध्यान रख सकते हो, और परमेश्वर तथा उसके घर के हितों को सर्वोपरि रख सकते हो, तो इस तरह के कुछ अनुभव के बाद, तुम पाओगे कि यह जीने का एक अच्छा तरीक़ा है: एक अधम या निकम्मा व्यक्ति बने बिना, यह सरलता और नेकी से जीना है, और यह न्यायसंगत और सम्मानित ढंग से जीना है, एक संकुचित मन वाले या ओछे व्यक्ति की तरह नहीं। तुम पाओगे की किसी व्यक्ति को ऐसे ही जीना और काम करना चाहिए।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "तू अपने सच्चे हृदय को परमेश्वर की ओर मोड़ने के बाद सच्चाई को प्राप्त कर सकता है" से उद्धृत

111. यदि तुम अपने हर काम में परमेश्वर की इच्छा पर खरे उतरने के प्रति समर्पित रहना चाहते हो, तो केवल एक ही कर्तव्य करना काफी नहीं है; तुम्हें परमेश्वर द्वारा दिये गए हर आदेश को स्वीकार करना चाहिए। चाहे यह तुम्हारी पसंदों के अनुसार हो या न हो, चाहे यह तुम्हारी रूचियों में से एक हो या न हो, चाहे यह कुछ ऐसा काम हो जो तुम्हें करना अच्छा नहीं लगता हो या तुमने पहले कभी न किया हो, या कुछ मुश्किल काम हो, तुम्हें इसे फिर भी स्वीकार कर इसके प्रति समर्पित होना होगा। न तुम्हें केवल इसे स्वीकार करना होगा, बल्कि अग्रसक्रिय रूप से अपना सहयोग देना होगा, इसे सीखना होगा, और प्रवेश पाना होगा। यदि तुम कष्ट उठाते हो, यदि तुम इसके लिए वाहवाही तक नहीं पा सके हो, तुम्हें फिर भी समर्पण के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। तुम्हें इसे अपना व्यक्तिगत कामकाज नहीं बल्कि कर्तव्य मानना चाहिए; कर्तव्य जिसे पूरा करना ही है। लोगों को अपने कर्तव्यों को कैसे समझना चाहिए। जब सृष्टिकर्ता—परमेश्वर—किसी को कोई कार्य सौंपता है, तब उस समय, वह उस व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है। जिन कार्यों और आदेशों को परमेश्वर तुम्हें देता है—वे तुम्हारे कर्तव्य हैं। जब तुम उन्हें अपने लक्ष्य बनाकर उनके पीछे जाते हो, और जब तुम्हारा दिल वास्तव में परमेश्वर-प्रेमी होता है, तब क्या तुम परमेश्वर के आदेश से इनकार करोगे? (नहीं।) तुम इंकार कर सकते हो या नहीं, इसके कोई मायने नहीं हैं; बात ये है कि तुम्हें इंकार नहीं करना चाहिए। तुम्हें इसे स्वीकार करना चाहिए, है न? यही अभ्यास का पथ है। अभ्यास का पथ क्या है? (हर बात में पूरी तरह समर्पित होना।) सभी बातों में परमेश्वर की इच्छा पर खरे उतरने के प्रति समर्पित बने रहो। यहाँ मुख्य बिन्दु क्या है? यह है "सभी बातों में"। यहाँ "सभी बातों" का अर्थ आवश्यक रूप से वे चीज़ें नहीं हैं जो तुम्हें पसंद हों या जिन्हें तुम बखूबी कर सकते हो, इसका सम्बन्ध और भी कम उन चीज़ों के साथ है जिनसे तुम परिचित हो। कभी तुम्हें सीखना पड़ेगा, कभी तुम्हें कठिनाइयों का सामना करना होगा, और कभी कष्ट उठाने पड़ेंगे। कुछ भी हो, चाहे जो भी काम हो, अगर यह परमेश्वर का आदेश है, तो तुम्हें इसे स्वीकार करना होगा, इसे अपना कर्तव्य मानना होगा, इसे पूरा करने के प्रति समर्पित रहना होगा, और परमेश्वर की इच्छा पर खरा उतरना होगा: यही अभ्यास का मार्ग है।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "एक ईमानदार इंसान होकर ही कोई व्यक्ति सच में खुश हो सकता है" से उद्धृत

112. तुम्हें अपना दायित्व पूरी क्षमता से और खुले तथा निर्मल हृदय से पूरा करना चाहिये, एवं हर स्थिति में पूर्ण करना चाहिये। जैसा कि तुम सबने कहा है, जब दिन आयेगा, तो जिसने भी परमेश्वर के लिये कष्ट उठाए हैं, परमेश्वर उसके साथ दुर्व्यवहार नहीं करेगा। इस प्रकार का दृढ़-निश्चय बनाये रखना चाहिये और इसे कभी भूलना नहीं चाहिये। केवल इसी प्रकार से मैं तुम लोगों के बारे में निश्चिंत हो सकता हूं। वरना मैं कभी भी तुम लोगों के विषय में बेफिक्र नहीं हो पाऊंगा, और तुम सदैव मेरी घृणा के पात्र रहोगे। यदि तुम सभी अपनी अंतरात्मा की आवाज़ सुन सको और अपना सर्वस्व मुझे अर्पित कर सको, मेरे कार्य के लिये कोई कोर-कसर न छोड़ो, और मेरे सुसमाचार के कार्य के लिये अपने आजीवन किये गये प्रयास अर्पित कर सको, तो क्या फिर मेरा हृदय तुम्हारे लिये हर्षित नहीं होगा? क्या तुम्हारी ओर से मैं पूर्णत: अपने मन को निश्चिंत नहीं कर लूँगा?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "गंतव्य पर" से उद्धृत

113. अब मैं तुम्हें अभ्यास के एक सिद्धांत के बारे में बताऊँगा: चाहे तुम जिसका भी सामना करो, चाहे यह कुछ ऐसा हो जो तुम्हारी परख या तुम्हारा परीक्षण करता है, या कोई ऐसी परिस्थिति जिसमें तुम्हारे साथ निपटा जा रहा हो, और चाहे दूसरे लोग तुम्हारे साथ जैसा भी व्यवहार करें, तुम्हें पहले उस बात को किनारे रखकर परमेश्वर के सामने प्रार्थना करनी चाहिए। तुम्हें अपनी आत्मा में लौट आना होगा, अपनी आत्मा में फिर से तालमेल लाना होगा और अपनी स्थिति का समायोजन करना होगा। यह पहली बात है जिसका समाधान करना होगा: "चाहे यह काम कितना भी बड़ा हो, चाहे आसमान टूट पड़े या छुरियाँ बरसें, मुझे अपने कर्तव्य को ठीक से करना ही होगा; जब तक मेरी साँस चल रही है, मैं अपने कर्तव्य को नहीं त्याग सकता हूँ।" तो अब, तुम अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे करोगे? यह केवल ऊपरी तौर पर बेमन से करने से नहीं होगा, न ही यह इस तरह होगा कि शरीर तो यहाँ हो पर मन कहीं और हो। तुम्हें अपने कर्तव्य को पूरा करने में अपना दिल लगाना होगा। तुम जिस समस्या का सामना कर रहे हो, चाहे वह कितनी भी बड़ी हो, तुम्हें उसे किनारे रखकर परमेश्वर के पास लौटना होगा, और इसकी तलाश करनी होगी कि तुम कैसे अपने कर्तव्य को अच्छी तरह पूरा करके परमेश्वर को संतुष्ट करोगे। तुम्हें सोचना चाहिए, "आज इस मुद्दे का सामना करते हुए, मुझे अपने कर्तव्य को पूरा करने के लिए क्या करना चाहिए? इसके पहले, मैंने अपने कामों को बेमन से ही किया था, लेकिन आज मुझे अपना रवैया बदलना होगा और इसे बेहतर करने के लिए प्रयत्न करना होगा ताकि यह पूरी तरह से दोषरहित हो सके। इसकी कुंजी यह है कि मुझे परमेश्वर को निराश नहीं करना है; मुझे उसे आश्वस्त करना होगा और दिखाना होगा कि जब मैं अपने कर्तव्य को करता हूँ, तो न केवल मैं अच्छा व्यवहार करता हूँ और आज्ञाकारी रहता हूँ, बल्कि समर्पित भी रहता हूँ।" यदि तुम इस तरह से अभ्यास करोगे, और यदि तुम इसमें अपना प्रयास लगाओगे, तो तुम्हारा कर्तव्य प्रभावित न होगा और तुम इसे भली-भांति कर सकोगे। और जैसे-जैसे तुम प्रार्थना करना और समायोजन करना जारी रखोगे, तुम्हारी स्थिति अधिक से अधिक सामान्य होती जाएगी, जिसके बाद तुम अपने कर्तव्य को पूरा करने में अधिक से अधिक सक्षम होते जाओगे।

— "मसीह की बातचीतों के अभिलेख" में "जीवन में प्रवेश दायित्‍वों के निर्वाह से प्रारंभ होना चाहिए" से उद्धृत

114. परमेश्वर तुमसे चाहे कुछ भी अपेक्षा करे, तुम्हें तो अपना सब कुछ दे देना होगा। आशा है कि अंत में तुम परमेश्वर के प्रति अपनी निष्ठा दिखा पाओगे, और जब तक तुम्हें परमेश्वर के सिंहासन पर उसकी संतुष्ट मुस्कुराहट दिखाई देती है, भले ही वह तुम्हारी मृत्यु का समय क्यों न हो, आँखें बंद होते समय भी तुम्हारे चेहरे पर हंसी और मुस्कराहट होनी चाहिये। पृथ्वी पर अपने समय के दौरान, तुम्हें परमेश्वर के लिए अपना अंतिम कर्तव्य निभाना होगा। अतीत में, पतरस को परमेश्वर के लिए क्रूस पर उल्टा लटका दिया गया था; परंतु, तुम्हें अंतत: परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए, और अपनी सारी ऊर्जा परमेश्वर के लिए खर्च करनी चाहिए। एक प्राणी परमेश्वर के लिए क्या कर सकता है? इसलिए तुम्हें जल्दी से जल्दी अपने आपको परमेश्वर की दया पर छोड़ देना चाहिए। जब तक परमेश्वर खुश और प्रसन्न है, तब तक वह जो चाहे उसे करने दो। मनुष्यों को शिकायत करने का क्या अधिकार है?

— "वचन देह में प्रकट होता है" में संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों के रहस्य की व्याख्या के "अध्याय 41" से उद्धृत

115. आज, तुम लोगों से जो कुछ प्राप्त करने की अपेक्षा की जाती है वे अतिरिक्त माँगे नहीं हैं, बल्कि मनुष्य का कर्तव्य है, और जिसे सभी लोगों के द्वारा किया जाना चाहिए। यदि तुम लोग अपने कर्तव्य को निभाने में, या इसे भली-भाँति करने में भी असमर्थ हो, तो क्या तुम लोग अपने ऊपर मुसीबतें नहीं ला रहे हो? क्या तुम लोग मृत्यु की याचना नहीं कर रहे हो? कैसे तुम लोग तब भी भविष्य और संभावनाओं की आशा कर सकते हो? परमेश्वर का कार्य मनुष्यजाति के वास्ते है, तथा मनुष्य का सहयोग परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते है। जब परमेश्वर ने वह सब कुछ कर लिया जिसे करने की उससे अपेक्षा की जाती है, उसके पश्चात्, मनुष्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अपने अभ्यास में उदार हो, और परमेश्वर के साथ सहयोग करे। परमेश्वर के कार्य में, मनुष्य को कोई कसर बाकी नहीं रखनी चाहिए, उसे अपनी वफादारी अर्पित करनी चाहिए, और अनगिनत अवधारणाओं में सलंग्न नहीं होना चाहिए, या निष्क्रिय बैठ कर मृत्यु की प्रतीक्षा नहीं करनी चाहिए। परमेश्वर मनुष्य के लिए स्वयं को बलिदान कर सकता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रति अपनी वफादारी अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्य के प्रति एक हृदय और मन वाला है, तो क्यों मनुष्य थोड़ा सा भी सहयोग अर्पित नहीं कर सकता है? परमेश्वर मनुष्यजाति के लिए कार्य करता है, तो क्यों मनुष्य परमेश्वर के प्रबंधन के वास्ते अपने कुछ कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता है? परमेश्वर का कार्य इतनी दूर तक आ गया है, फिर भी तुम लोग तब भी देखते हो किन्तु कार्य नहीं करते हो, तुम लोग सुनते तो हो किन्तु हिलते नहीं हो। क्या ऐसे लोग तबाही के लक्ष्य नहीं हैं? परमेश्वर ने पहले ही अपना सर्वस्व मनुष्य को अर्पित कर दिया है, तो क्यों आज मनुष्य ईमानदारी से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ है? परमेश्वर के लिए, उसका कार्य उसकी प्राथमिकता है, और उसके प्रबंधन का कार्य अत्यंत महत्वपूर्ण है। मनुष्य के लिए, परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाना और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करना उसकी पहली प्राथमिकता है। इसे तुम सभी लोगों को समझ लेना चाहिए।

— "वचन देह में प्रकट होता है" में "परमेश्वर का कार्य और मनुष्य का अभ्यास" से उद्धृत

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