10.6. परमेश्वर के प्रति आज्ञाकारिता का अभ्यास कैसे करें पर
391. परमेश्वर ने मनुष्यों का सृजन किया और उसने उन्हें पृथ्वी पर रखा और तब से उनकी अगुआई की है और बाद में उसने उन्हें बचाया और मानवता के लिए पाप-बलि बना और अंत में, उसे अभी भी मानवता को जीतना होगा, मनुष्यों को पूरी तरह से बचाना होगा और उन्हें उनकी मूल समानता में वापस लौटाना होगा। यही वह कार्य है जिसमें वह आरंभ से अंत तक संलग्न रहा है—मनुष्य को उसकी मूल छवि और उसकी मूल समानता में वापस लौटाना। परमेश्वर अपना राज्य स्थापित करेगा और मनुष्य की मूल समानता बहाल करेगा, जिसका अर्थ है कि परमेश्वर पृथ्वी पर और समस्त सृजित प्राणियों के बीच अपने अधिकार को बहाल करेगा। मनुष्यों ने शैतान से भ्रष्ट होने के बाद सृजित प्राणियों की जो भूमिका होनी चाहिए थी उसे खोने के साथ-साथ परमेश्वर का भय मानने वाला अपना हृदय भी गँवा दिया। वे सब परमेश्वर के प्रति विद्रोही शत्रु बन गए, शैतान की सत्ता के अधीन जीते थे और शैतान की चालाकी के वश में थे; इस प्रकार, अपने सृजित प्राणियों के बीच कार्य करने का परमेश्वर के पास कोई तरीका नहीं था और वह उनका भय प्राप्त कर पाने में और भी असमर्थ हो गया। मनुष्यों को परमेश्वर ने बनाया था और उन्हें परमेश्वर की आराधना करनी चाहिए थी, पर उन्होंने वास्तव में परमेश्वर से मुँह मोड़ लिया और इसके बजाय शैतान की आराधना करने लगे। शैतान उनके दिलों में आदर्श बन गया। इस प्रकार परमेश्वर ने मनुष्य के हृदय में अपना स्थान खो दिया, जिसका मतलब है कि उसके द्वारा मानवजाति के सृजन के पीछे का अर्थ खो गया। इसलिए मानवजाति के सृजन के अपने अर्थ को बहाल करने के लिए उसे उनकी मूल समानता को बहाल करना होगा और मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभाव से मुक्ति दिलानी होगी। शैतान से मनुष्यों को वापस प्राप्त करने के लिए, उसे उन्हें पाप से बचाना होगा। केवल इसी तरह परमेश्वर धीरे-धीरे उनकी मूल समानता और भूमिका को बहाल कर सकता है और अंततः अपने राज्य को बहाल कर सकता है। विद्रोह करने वाले उन पुत्रों का अंत में पूर्णतया विनाश भी इसलिए होगा कि मनुष्य बेहतर ढंग से परमेश्वर की आराधना कर सकें और पृथ्वी पर बेहतर ढंग से रह सकें। चूँकि परमेश्वर ने मानवों का सृजन किया, इसलिए वह मनुष्य से अपनी आराधना करवाएगा; क्योंकि वह मानवता के मूल कार्य को बहाल करना चाहता है, वह उसे पूर्ण रूप से और बिना किसी मिलावट के बहाल करेगा। अपना अधिकार बहाल करने का अर्थ है, मनुष्यों से अपनी आराधना कराना और समर्पण कराना; इसका अर्थ है कि वह अपनी वजह से मनुष्यों को जीवित रखेगा और अपने अधिकार की वजह से अपने शत्रुओं का विनाश करेगा। इसका अर्थ है कि परमेश्वर किसी प्रतिरोध के बिना, मनुष्यों के बीच उस सब को बनाए रखेगा जो उसके बारे में है। जो राज्य परमेश्वर स्थापित करना चाहता है, वह उसका स्वयं का राज्य है। वह जिस मानवता की आकांक्षा रखता है वह ऐसी हो जो उसकी आराधना करे, जो उसके प्रति पूरी तरह समर्पण करे और जो उसकी महिमा से युक्त हो। यदि परमेश्वर ने भ्रष्ट मानवता को न बचाया तो उसके द्वारा मानवता के सृजन का अर्थ खत्म हो जाएगा; उसका मनुष्यों के बीच अब और अधिकार नहीं रहेगा और पृथ्वी पर उसके राज्य का अस्तित्व अब और नहीं रह पाएगा। यदि परमेश्वर ने उन शत्रुओं का नाश नहीं किया जो उसके प्रति विद्रोही हैं, तो वह अपनी संपूर्ण महिमा प्राप्त करने में असमर्थ रहेगा, न ही वह पृथ्वी पर अपने राज्य की स्थापना कर पाएगा। मानवता में से उन सबको पूरी तरह नष्ट करना, जो उसके प्रति विद्रोही हैं और जो पूर्ण किए जा चुके हैं, उन्हें विश्राम में लाना—ये उसका कार्य पूरा होने और उसकी महान उपलब्धि के चिह्न होंगे। जब मनुष्यों को उनकी मूल समानता में बहाल कर लिया जाएगा और जब वे अपने-अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकेंगे, अपने उचित स्थानों पर बने रह सकेंगे और परमेश्वर की सभी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण कर सकेंगे, तब परमेश्वर ने पृथ्वी पर उन लोगों का एक समूह प्राप्त कर लिया होगा जो उसकी आराधना करते हैं और उसने पृथ्वी पर एक राज्य भी स्थापित कर लिया होगा जो उसकी आराधना करता है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे
392. चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें उसके प्रति समर्पण करना चाहिए। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम विश्वास रखते हो या नहीं। यदि तुमने वर्षों परमेश्वर में विश्वास रखा है, फिर भी न तो कभी उसके प्रति समर्पण किया है, न ही उसके वचनों की समग्रता को स्वीकार किया है, बल्कि तुमने परमेश्वर को अपने आगे समर्पण करने और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार कार्य करने को कहा है, तो तुम सबसे अधिक विद्रोही व्यक्ति हो, और छद्म-विश्वासी हो। एक ऐसा व्यक्ति परमेश्वर के कार्य और वचनों के प्रति समर्पण कैसे कर सकता है जो मनुष्य की धारणाओं के अनुरूप नहीं है? सबसे अधिक विद्रोही वे हैं जो जानबूझकर परमेश्वर के आगे झुकने से इनकार करते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। वे परमेश्वर के शत्रु हैं, मसीह-विरोधी हैं। वे हमेशा परमेश्वर के नए कार्य के प्रति शत्रुतापूर्ण रवैया रखते हैं; उनमें कभी भी समर्पण करने की जरा-सी भी प्रवृत्ति नहीं होती, न ही उन्होंने कभी खुशी-खुशी समर्पण किया है या खुद को विनम्र किया है। दूसरों के सामने, वे सबसे अधिक अभिमानी होते हैं और वे कभी किसी के आगे समर्पण नहीं करते। परमेश्वर के सामने, वे खुद को 'धर्मोपदेशों' का प्रचार करने में सर्वश्रेष्ठ और दूसरों पर कार्य करने में सबसे कुशल मानते हैं। वे अपने पास मौजूद 'खजानों' को कभी नहीं छोड़ते; बल्कि वे उन्हें पारिवारिक विरासत मानते हैं जिनकी पूजा की जानी चाहिए और जिनके बारे में दूसरों को प्रचार किया जाना चाहिए; वे उनका उपयोग उन बुद्धुओं को व्याख्यान देने के लिए करते हैं जो उन्हें पूजते हैं। कलीसिया में वास्तव में ऐसे कुछ लोग हैं। यह कहा जा सकता है कि वे 'अदम्य नायकों का एक राजवंश' हैं, जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी परमेश्वर के घर में डेरा डाले रहते हैं। वे 'धर्मोपदेशों' (सिद्धांतों) का प्रचार करने को अपना सर्वोच्च कर्तव्य मानते हैं। साल-दर-साल, पीढ़ी-दर-पीढ़ी, वे अपने 'पावन और अलंघनीय' कर्तव्य को सख्ती से पूरा करते रहते हैं। कोई भी उन्हें छूने की हिम्मत नहीं करता; एक भी व्यक्ति खुले तौर पर उनकी निंदा करने की हिम्मत नहीं करता। वे परमेश्वर के घर में 'राजा' बन जाते हैं, युग-युग तक दूसरों पर अत्याचार करते हुए निरंकुश होकर कहर ढाते हैं। दुष्ट दानवों का यह झुंड मेरे कार्य को नष्ट करने के लिए हाथ मिलाना चाहता है; मैं इन जीते-जागते दानवों को अपनी आँखों के सामने कैसे रहने दे सकता हूँ? यहाँ तक कि आधा-अधूरा समर्पण करने वाले लोग भी अंत तक नहीं चल सकते, फिर इन आततायियों की तो बात ही क्या है जिनके हृदय में थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है! इंसान परमेश्वर के कार्य को आसानी से ग्रहण नहीं कर सकता। इंसान अपनी सारी ताक़त लगाकर भी इसका एक अंश ही पा सकता है जिससे वो आखिरकार पूर्ण बनाया जा सके। फिर प्रधानदूत की संतानों का क्या, जो परमेश्वर के कार्य को नष्ट करने की कोशिश में लगी रहती हैं? क्या परमेश्वर द्वारा उनके प्राप्त किए जाने की आशा और भी कम नहीं है? विजय-कार्य करने का मेरा उद्देश्य केवल विजय के वास्ते विजय प्राप्त करना नहीं है, बल्कि विजय का उद्देश्य धार्मिकता और अधार्मिकता को प्रकट करना, मनुष्य के दंड के लिए प्रमाण प्राप्त करना, बुरे लोगों को दंडित करना, और इससे भी अधिक उन लोगों को पूर्ण बनाने के लिए विजय पाना है जो इच्छापूर्वक समर्पण करते हैं। अंत में, सबको उनकी किस्म के अनुसार छाँटा जाएगा, और जिन्हें पूर्ण बनाया जाएगा उनके विचार और ख्याल समर्पण से परिपूर्ण होंगे। यही वह कार्य है जो अंततः संपन्न किया जाएगा। जबकि, जो लोग विद्रोहीपन के कृत्यों से परिपूर्ण होंगे उन्हें दंडित किया जाएगा और जलती आग में झोंक दिया जाएगा और वे अनंतकाल तक शाप के भागी होंगे। जब वह समय आएगा, तो युगों-युगों में विद्यमान रहा वह “महान और अदम्य नायकों का वंश” सबसे नीच और परित्यक्त “कमजोर और नपुंसक कायरों का वंश” बन जाएगा। केवल यही परमेश्वर की समस्त धार्मिकता और उसके उस स्वभाव को प्रकट कर सकता है जो मनुष्य से अपमान बर्दाश्त नहीं करता है, मात्र यही मेरे हृदय की घृणा को शांत कर सकता है। क्या तुम लोगों को यह पूरी तरह तर्कपूर्ण नहीं लगता?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे
393. हर युग में परमेश्वर द्वारा किया गया कार्य अलग होता है। यदि तुम परमेश्वर के कार्य के किसी एक चरण में अच्छी तरह समर्पण करते हो, मगर अगले ही चरण में उसके कार्य के प्रति तुम्हारा समर्पण कम हो जाता है या तुम समर्पण ही नहीं कर पाते, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। जब परमेश्वर यह कदम उठाता है, तब तुम उसके साथ कदम मिलाकर चलते हो और जब वह अगला कदम उठाए, तब भी तुम्हें उसके साथ कदम मिलाकर चलना चाहिए; तभी तुम पवित्र आत्मा के प्रति समर्पित बनोगे। चूँकि तुम परमेश्वर में विश्वास रखते हो, इसलिए तुम्हें अपने समर्पण में निरंतर बने रहना चाहिए। ऐसा नहीं हो सकता कि तुम जब चाहो समर्पण करो और जब न चाहो तब समर्पण करने से इनकार कर दो। परमेश्वर इस प्रकार के समर्पण की स्वीकृति नहीं देता। यदि तुम नए कार्य के बारे में मेरी संगति के साथ तालमेल नहीं बनाए रख सकते हो और पुरानी बातों से ही चिपके रहते हो, तो तुम्हारे जीवन में प्रगति कैसे हो सकती है? परमेश्वर का कार्य, अपने वचनों से तुम्हें पोषण देना है। यदि तुम उसके वचनों के प्रति समर्पण करोगे, उन्हें स्वीकारोगे, तो पवित्र आत्मा निश्चित रूप से तुम में कार्य करेगा। पवित्र आत्मा बिल्कुल उसी तरह कार्य करता है जिस तरह से मैं बता रहा हूँ; जैसा मैंने कहा है वैसा ही करो और पवित्र आत्मा शीघ्रता से तुम में कार्य करेगा। मैं तुम्हारे निहारने के लिए नया प्रकाश प्रकट करता हूँ और तुम लोगों को आज के प्रकाश में लाता हूँ, और जब तुम इस प्रकाश में चलोगे, तो पवित्र आत्मा तुरन्त ही तुममें कार्य करेगा। कुछ लोग हैं जो अवज्ञाकारी हो सकते हैं, कहेंगे, “तुम जो कहते हो मैं उसका अभ्यास बिल्कुल नहीं करूँगा।” ऐसी स्थिति में, मैं कहूँगा कि तुम मार्ग के अंत पर आ चुके हो; तुम पूरी तरह से सूख गए हो, और तुम जीवन से रहित हो। इसलिए, अपने स्वभाव के रूपांतरण का अनुभव करने में आज के प्रकाश के साथ तालमेल बिठाए रखना सबसे अहम है। पवित्र आत्मा न केवल उन खास लोगों में कार्य करता है जो परमेश्वर द्वारा प्रयुक्त किए जाते हैं, बल्कि कलीसिया में भी कार्य करता है। वह किसी में भी कार्य कर रहा हो सकता है। शायद वह वर्तमान समय में, तुममें कार्य करे, और तुम इस कार्य का अनुभव करोगे। अगली अवधि के दौरान शायद वह किसी और में कार्य करे, और ऐसी स्थिति में तुम्हें तत्काल उसका अनुसरण करना चाहिए; तुम वर्तमान प्रकाश का अनुसरण जितना करीब से करोगे, तुम्हारा जीवन उतना ही अधिक विकसित होकर उन्नति कर सकता है। कोई व्यक्ति कैसा भी क्यों न हो, यदि पवित्र आत्मा उसमें कार्य करता है, तो तुम्हें अनुसरण करना चाहिए। जैसे-जैसे तुम खुद चीजों से होकर गुजरोगे, जिस चीज से वे गुजरे उसका वास्तविक अनुभव हासिल करोगे तो तुम्हें और भी उच्चतर चीजें प्राप्त होंगी। इस तरह से अभ्यास करने के माध्यम से तुम अधिक तेजी से प्रगति करोगे। यह मनुष्य की पूर्णता का मार्ग है और वह साधन है जिससे जीवन विकसित होता है। पवित्र आत्मा के कार्य के प्रति तुम्हारे समर्पण से पूर्ण बनाए जाने के मार्ग तक पहुँचा जाता है। तुम्हें पता नहीं होता कि तुम्हें पूर्ण बनाने के लिए परमेश्वर किस प्रकार के व्यक्ति के जरिए कार्य करेगा, न ही यह पता होता है कि किस व्यक्ति, घटना या चीज के जरिए वह तुम्हें चीजों को हासिल करने और देखने में सक्षम बनाएगा। यदि तुम सही पथ पर चल पाओ, तो इससे सिद्ध होता है कि परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूर्ण बनाए जाने की काफी आशा है। यदि तुम ऐसा नहीं कर पाते हो, तो इससे ज़ाहिर होता है कि तुम्हारा भविष्य धुँधला और प्रकाशहीन है। एक बार जब तुम सही पथ पर आ जाओगे, तो तुम्हें सभी चीजों में प्रकाशन प्राप्त होगा। पवित्र आत्मा दूसरों पर कुछ भी प्रकट करे, यदि तुम उनके ज्ञान के आधार पर अपने दम पर चीजों का अनुभव करते हो, तो यह तुम्हारे जीवन का हिस्सा बन जाएगा, और इस अनुभव से तुम दूसरों को भी पोषण दे पाओगे। तोते की तरह वचनों को रटकर दूसरों को पोषण देने वाले लोगों के पास अपना कोई अनुभव नहीं होता; तुम्हें अपने वास्तविक अनुभव और ज्ञान के बारे में बोलना शुरू करने से पहले, दूसरों की प्रबुद्धता और रोशनी के माध्यम से, अभ्यास करने का तरीका ढूँढ़ना सीखना होगा। यह तुम्हारे अपने जीवन के लिए अधिक लाभकारी होगा। जो कुछ भी परमेश्वर से आता है उसके प्रति समर्पण करते हुए, तुम्हें इस तरह से अनुभव करना चाहिए। तुम्हें सभी चीजों में परमेश्वर के इरादे खोजने चाहिए और हर चीज से सबक सीखने चाहिए, ताकि तुम्हारा जीवन वृद्धि कर सके। ऐसे अभ्यास से सबसे जल्दी प्रगति होती है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे
394. परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण में अवश्य ही वास्तविकता होनी चाहिए और इसे जीना चाहिए। सतही तौर पर समर्पण करके परमेश्वर की स्वीकृति नहीं पायी जा सकती है, अपने स्वभाव में बदलाव का प्रयास किए बिना परमेश्वर के वचन के मात्र सतही पहलुओं के प्रति समर्पण करना परमेश्वर के इरादों के अनुरूप नहीं है। परमेश्वर के प्रति समर्पण और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण एक ही बात है। जो लोग केवल परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं लेकिन उसके कार्य के प्रति समर्पित नहीं होते, उन्हें समर्पित नहीं माना जा सकता, और उन्हें तो बिल्कुल नहीं माना जा सकता जो सचमुच समर्पण न करके, सतही तौर पर चापलूस होते हैं। जो लोग सचमुच परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे सभी कार्य से लाभ प्राप्त करने और परमेश्वर के स्वभाव और कार्य की समझ प्राप्त करने में समर्थ होते हैं। ऐसे ही लोग वास्तव में परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। ऐसे लोग नए कार्य के माध्यम से नया ज्ञान प्राप्त करने और नए बदलावों से गुजरने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग ही परमेश्वर की स्वीकृति पाते हैं, ऐसे लोग ही पूर्ण बनाए जाते हैं, और ऐसे लोग ही हैं जिनके स्वभाव का रूपांतरण होता है। जो लोग खुशी से परमेश्वर के प्रति, उसके वचन और कार्य के प्रति समर्पित होते हैं, वही परमेश्वर की स्वीकृति पाते हैं। ऐसे लोग ही सही लोग हैं; ऐसे लोग ही ईमानदारी से परमेश्वर की कामना करते हैं और ईमानदारी से परमेश्वर को खोजते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सच्चे हृदय से परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं वे निश्चित रूप से परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाएँगे
395. जब तक परमेश्वर देह में है, जिस समर्पण की वह लोगों से अपेक्षा करता है, उसमें आलोचना या विरोध करने से बचना शामिल नहीं है, जैसा कि वे कल्पना करते हैं; इसके बजाय, वह अपेक्षा करता है कि लोग उसके वचनों का अपने जीने के सिद्धांत और अपने अस्तित्व की नींव के रूप में उपयोग करें, कि वे उसके वचनों के सार को पूरी तरह से अभ्यास में ले आएँ, और कि वे बिल्कुल उसके इरादे पूरे करें। लोगों से देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की अपेक्षा करने का एक पहलू उसके वचनों को अभ्यास में लाने का उल्लेख करता है, जबकि दूसरा पहलू उसकी सामान्यता और व्यावहारिकता के प्रति समर्पण करने के बारे में बताता है। ये दोनों बेशर्त होने चाहिए। जो लोग इन दोनों पहलुओं को प्राप्त कर सकते हैं, वे सब वे हैं जिनके पास सच्चा परमेश्वर-प्रेमी हृदय है। वे सब वे लोग हैं जो परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हैं, और वे सभी परमेश्वर से उतना ही प्रेम करते हैं, जितना वे अपने जीवन से करते हैं। ...
जिन लोगों के समूह को आज देहधारी परमेश्वर प्राप्त करना चाहता है, वे वो लोग हैं जो उसके इरादों के हिसाब से हैं। लोगों को केवल उसके कार्य के प्रति समर्पण करने की, और स्वर्ग के परमेश्वर की इच्छाओं के बारे में लगातार चिंता करना, कल्पनाशीलता में जीना, और देहधारी परमेश्वर के लिए चीजें मुश्किल बनाना बंद करने की आवश्यकता है। जो लोग उसके प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं, वे वो लोग हैं जो पूर्णतः उसके वचनों को सुनते हैं और उसकी व्यवस्थाओं को मानते हैं। ऐसे लोग इस बात पर बिल्कुल भी ध्यान नहीं देते कि स्वर्ग का परमेश्वर वास्तव में कैसा हो सकता है या स्वर्ग का परमेश्वर वर्तमान में मनुष्य पर किस प्रकार का कार्य कर रहा होगा; वे पृथ्वी के परमेश्वर को पूरी तरह से अपना हृदय अर्पित करते हैं और वे उसके सामने अपना समस्त अस्तित्व रख देते हैं। वे अपनी सुरक्षा का कभी विचार नहीं करते, न ही वे देहधारी परमेश्वर की सामान्यता और व्यावहारिकता की कभी अधिक शिकायत करते हैं। जो लोग देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं, वे उसके द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं। जो लोग स्वर्ग के परमेश्वर पर विश्वास करते हैं, उन्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा। ऐसा इसलिए है, क्योंकि वह स्वर्ग का परमेश्वर नहीं, बल्कि पृथ्वी का परमेश्वर है, जो लोगों को वादे और आशीष प्रदान करता है। लोगों को हमेशा स्वर्ग के परमेश्वर को महान मानकर उसका आदर नहीं करना चाहिए, और पृथ्वी के परमेश्वर को केवल एक साधारण व्यक्ति नहीं समझना चाहिए; यह अन्यायपूर्ण है। स्वर्ग में उनका परमेश्वर असाधारण बुद्धि के साथ महान और अद्भुत है, किंतु उसका अस्तित्व बिल्कुल नहीं है। पृथ्वी का परमेश्वर बहुत ही साधारण और मामूली है, और बहुत सामान्य भी है। उसके पास असाधारण दिमाग नहीं है और न ही वह दुनिया बदल देने वाला कार्य करता है, वह तो बस बहुत ही सामान्य और व्यावहारिक तरीके से बोलता और कार्य करता है, और वह गड़गड़ाहट के माध्यम से बात नहीं करता और न ही हवा और बारिश बुलाता है। लेकिन वह वास्तव में स्वर्ग के परमेश्वर का देहधारण है, और वह वास्तव में मनुष्यों के बीच रहने वाला परमेश्वर है। लोगों को उसे परमेश्वर नहीं मानना चाहिए जिसे वे समझ सकते हैं और जो उनकी कल्पनाओं से मेल खाता है, या उसे महान मानकर आदर नहीं करना चाहिए, जबकि जिसे वे स्वीकार नहीं कर सकते और जिसकी वे बिल्कुल भी कल्पना नहीं कर सकते उसे तुच्छ नहीं मानना चाहिए। यह सब लोगों की विद्रोहशीलता से आता है; यह सब परमेश्वर के प्रति मानव-जाति के विरोध का स्रोत है।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं
396. परमेश्वर के प्रति समर्पण करने की कुंजी नवीनतम प्रकाश को स्वीकार करने और इसे स्वीकार कर पाने और अभ्यास में ला पाने में है। सिर्फ यही सच्चा समर्पण है। जिनमें परमेश्वर के प्रति लालायित रहने का संकल्प नहीं होता है वे उसके प्रति स्वेच्छा से समर्पण करने में अक्षम हैं और यथास्थिति से संतुष्ट होने के फलस्वरूप परमेश्वर का विरोध ही कर सकते हैं। इंसान परमेश्वर के प्रति समर्पण इसलिए नहीं कर सकता क्योंकि वह अभी भी उस चीज के वश में है जो पहले आ चुकी है। पहले आई हुई चीजों ने मनुष्य में परमेश्वर के बारे में तमाम तरह की धारणाएँ और कल्पनाएँ पैदा कीं और ये उसके दिमाग में परमेश्वर की छवि बन गई हैं। इस प्रकार वह जिस चीज में विश्वास करता है वह स्वयं उसी की धारणाएँ और उसकी अपनी ही कल्पनाओं के मापदण्ड हैं। यदि तुम अपनी कल्पना के परमेश्वर के सामने उस परमेश्वर को मापते हो जो आज व्यावहारिक कार्य करता है, तो तुम्हारी आस्था शैतान से आती है और तुम्हारी अपनी ही पसंदगियों पर आधारित है—परमेश्वर इस तरह की आस्था नहीं चाहता है। इस बात की परवाह किए बिना कि लोगों की साख कितनी ऊँची है और उनकी खपाई की परवाह किए बिना—भले ही उन्होंने उसके लिए कार्य करते हुए जीवनभर का प्रयास खपाया हो और वे अपनी जान कुर्बान करने की हद तक गए हों—परमेश्वर इस तरह की आस्था वाले किसी भी व्यक्ति को स्वीकृति नहीं देता है। वह उनके ऊपर मात्र थोड़ा-सा अनुग्रह करता है और थोड़े समय के लिए उन्हें उसका आनन्द उठाने देता है। इस तरह के लोग सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ होते हैं, पवित्र आत्मा उनके भीतर काम नहीं करता, परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से प्रत्येक को निकाल देगा। चाहे कोई युवा हो या बुजुर्ग, ऐसे सभी लोग जो अपने विश्वास में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते और जिनकी मंशाएँ ग़लत हैं, जो विरोध करते हैं और गड़बड़ी करते हैं, ऐसे लोगों को परमेश्वर यकीनन निकाल देगा। वे लोग जिनमें परमेश्वर के प्रति थोड़ा-सा भी समर्पण नहीं है, जो केवल उसका नाम स्वीकारते हैं, जिन्हें परमेश्वर की सुलभता और मनोहरता का कुछ-कुछ आभास है, फिर भी वे पवित्र आत्मा के कदमों के साथ तालमेल बनाकर नहीं चलते और पवित्र आत्मा के वर्तमान कार्य एवं वचनों के प्रति समर्पण नहीं करते—ऐसे लोग परमेश्वर के अनुग्रह में रहते हैं और उसके द्वारा प्राप्त नहीं किए जा सकते हैं या पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं। परमेश्वर लोगों को उनके समर्पण, परमेश्वर के वचनों को उनके खाने-पीने, उनका आनन्द उठाने और उनके जीवन में कष्ट एवं शोधन के माध्यम से पूर्ण बनाता है। ऐसे विश्वास से ही लोगों का स्वभाव परिवर्तित हो सकता है और तभी उन्हें परमेश्वर का सच्चा ज्ञान हो सकता है। परमेश्वर के अनुग्रह के बीच रहकर सन्तुष्ट न हो जाना, सत्य के लिए सक्रियता से लालायित होना और इसे खोजना और परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जाने का अनुसरण करना—यही सचेत होकर परमेश्वर के प्रति समर्पण करने का अर्थ है और ठीक इसी प्रकार की आस्था वह चाहता है। जो लोग परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द उठाने के अलावा कुछ नहीं करते, वे पूर्ण नहीं बनाए जा सकते हैं या परिवर्तित नहीं किए जा सकते हैं; उनके पास केवल सतही समर्पण, धर्मनिष्ठा, प्रेम तथा धैर्य होता है। जो लोग केवल परमेश्वर के अनुग्रह का आनन्द लेते हैं वे परमेश्वर को सच्चे अर्थ में नहीं जान सकते, यहाँ तक कि जब वे परमेश्वर को जान भी जाते हैं, तब भी उनका ज्ञान उथला ही होता है और वे ऐसी बातें करते हैं, जैसे, “परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है,” या “परमेश्वर मनुष्य के प्रति दया रखता है”। यह मनुष्य के जीवन का द्योतक नहीं है, न ही इसका यह अर्थ है कि लोग सचमुच परमेश्वर को जानते हैं। यदि जब परमेश्वर के वचन उनका शोधन करते हैं या जब उनके सामने परमेश्वर के परीक्षण आते हैं, तब लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर पाते—बल्कि संदेह में पड़ जाते हैं और यहाँ तक कि ठोकर खा जाते हैं—तो वे रत्ती भर भी समर्पणशील नहीं होते। उनके अंदर परमेश्वर में आस्था को लेकर बहुत-से नियम और प्रतिबंध होते हैं, यहाँ तक कि दीर्घकालिक अनुभव होता है जो उन्होंने वर्षों की आस्था से अर्जित किया है या विभिन्न विनियम होते हैं जो बाइबल को अपना सिद्धांत मानते हैं। क्या इस प्रकार के लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं? ये लोग मानवीय चीजों से भरे हुए हैं—वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे कर सकते हैं? उनका “समर्पण” उनकी व्यक्तिगत पसंदगियों पर आधारित होता है—क्या परमेश्वर ऐसा समर्पण चाहेगा? यह विनियमों से चिपके रहना है, न कि परमेश्वर के प्रति समर्पण; यह स्वयं को तसल्ली देने और दिलासा देने भर की बात है। यदि तुम कहते हो कि यह परमेश्वर के प्रति समर्पण है, तो क्या तुम ईशनिंदा नहीं कर रहे हो?
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए
397. वे सब जो अपनी आस्था में परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं खोजते हैं, ऐसे लोग हैं जो परमेश्वर का विरोध करते हैं। परमेश्वर अपेक्षा करता है कि लोग सत्य की खोज करें, उसके वचनों के प्यासे बनें, उसके वचनों को खाएँ-पिएँ और उन्हें अभ्यास में लाएँ ताकि वे परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकें। यदि यही तुम्हारा सच्चा इरादा है, तो परमेश्वर निश्चित रूप से तुम्हारा उत्कर्ष करेगा और निश्चित रूप से तुम्हारे प्रति अनुग्रही होगा। यह निर्विवाद और अपरिवर्तनीय है। यदि तुम्हारा इरादा परमेश्वर के प्रति समर्पण का नहीं है और तुम्हारे अन्य लक्ष्य हैं, तो जो कुछ भी तुम कहते और करते हो—यहाँ तक कि परमेश्वर के सामने तुम्हारी प्रार्थनाएँ और इससे भी बढ़कर तुम्हारा प्रत्येक कदम भी—उसके विरोध में होगा। भले ही तुम्हारे बोल कोमल हों और तुम स्वभाव से सौम्य हो, भले ही तुम्हारा हर कदम और हर हाव-भाव दूसरों को उचित दिखाई दे, मानो तुम कोई समर्पणशील व्यक्ति हो, किन्तु जब परमेश्वर में आस्था को लेकर तुम्हारे इरादों और दृष्टिकोणों की बात आती है, तो तुम्हारा हरेक क्रियाकलाप परमेश्वर के विरोध में होता है, यह बुराई करना होता है। जो लोग भेड़ों जैसे आज्ञाकारी प्रतीत होते हैं, परंतु जिनके हृदय में बुरे इरादे छिपे होते हैं, वे भेड़ की खाल में भेड़िए हैं और सीधे परमेश्वर का अपमान करते हैं। परमेश्वर उनमें से किसी एक को भी नहीं छोड़ेगा, और पवित्र आत्मा उनमें से एक-एक को बेनकाब कर देगा। हर कोई देख लेगा कि जो भी पाखंडी हैं वे सब पवित्र आत्मा द्वारा निश्चित रूप से ठुकरा दिए जाएंगे। अधीर मत बनो : परमेश्वर बारी-बारी से उनमें से एक-एक का हिसाब और निपटान करेगा।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर में अपनी आस्था में तुम्हें परमेश्वर के प्रति समर्पण करना चाहिए
398. लोग परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं या नहीं, यह आकलन करने में मुख्य बात यह है कि क्या उनमें उसके प्रति असंयत इच्छाएँ या गुप्त अभिप्राय हैं। अगर लोग हमेशा परमेश्वर से माँगें करते हैं, तो यह साबित करता है कि वे उसके प्रति समर्पित नहीं हैं। तुम्हारे साथ चाहे जो भी हो, यदि तुम इसे परमेश्वर से आया मानकर स्वीकार नहीं करते, तुम सत्य की तलाश नहीं करते, हमेशा अपने लिए तर्क-वितर्क करते हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि सिर्फ तुम सही हो, और यहाँ तक कि तुम अभी भी यह संदेह करने में सक्षम हो कि परमेश्वर सत्य और धार्मिकता है, तो तुम संकट में पड़ जाओगे। ऐसे लोग सबसे अहंकारी और परमेश्वर के प्रति सबसे अधिक विद्रोही होते हैं। जो लोग हमेशा परमेश्वर से माँगते रहते हैं, वे कभी सच्चे रूप से उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते। अगर तुम परमेश्वर से माँग करते हो, तो यह साबित करता है कि तुम उससे सौदा कर रहे हो, तुम अपनी ही इच्छा चुन रहे हो, और इसी के अनुसार कार्य कर रहे हो। यह परमेश्वर से विश्वासघात करना है और समर्पण का अभाव है। परमेश्वर से माँग करना अपने आप में ही विवेक का अभाव होना है; अगर तुम्हें सचमुच विश्वास है कि वह परमेश्वर है, तो तुम उससे माँगने की हिम्मत नहीं करोगे—जिसके तुम वैसे भी योग्य नहीं हो—फिर चाहे वे उचित हों या नहीं। अगर तुममें परमेश्वर के प्रति सच्चा विश्वास है, और विश्वास करते हो कि वह परमेश्वर है, तो फिर तुम सिर्फ उसकी आराधना और उसके प्रति समर्पण करोगे—इसके सिवाय कोई विकल्प नहीं है। आज, लोग न सिर्फ अपनी पसंद-नापसंद खुद चुनते हैं, बल्कि वे यह भी माँग करते हैं कि परमेश्वर उनकी इच्छा के अनुसार कार्य करे। वे न केवल परमेश्वर के प्रति समर्पण न मानने का फैसला करते हैं, बल्कि वे परमेश्वर से भी कहते हैं कि वह उनके प्रति समर्पण करे। क्या यह इतना विवेकशून्य नहीं है? इसलिए, अगर मनुष्य में कोई सच्ची आस्था नहीं है, कोई सारभूत विश्वास नहीं है, तो वह कभी भी परमेश्वर से स्वीकृति नहीं पा सकता। जब लोग परमेश्वर से कम माँगें करने में सक्षम होते हैं, तो उनमें सच्ची आस्था और समर्पण अधिक होता है और उनका विवेक अपेक्षाकृत सामान्य होता है। अक्सर ऐसा होता है कि लोग बहस करने के जितने अधिक इच्छुक होते हैं, उतना ही अधिक कठिन उन्हें सँभालना होता है। उनकी बहुत-सी माँगें तो होती ही हैं, उन्हें उँगली पकड़ाओ तो वे सिर पर चढ़ जाते हैं। एक मामले में संतुष्ट होने पर वे दूसरे मामले में माँग करने लगते हैं। उन्हें सभी मामलों में संतुष्ट करना होता है, वरना वे शिकायत करने लगते हैं, और हार मान लेते हैं और हर चीज खंड-खंड होने देते हैं। ऐसा करने के बाद वे ऋणी और पछतावा महसूस करते हैं, फूट-फूटकर रोते हैं और मरना चाहते हैं। इसका क्या फायदा? क्या यह अविवेकी और निरंतर परेशानी पैदा करने वाला होना नहीं है? उनके भ्रष्ट स्वभाव से समस्याओं की यह कड़ी हल करनी होगी, जो इन सबकी जड़ है। यदि तुम्हारा स्वभाव भ्रष्ट है और तुम इसे दूर नहीं करते, यदि तुम इसे दूर करने के लिए तब तक प्रतीक्षा करते हो, जब तक कि तुम मुसीबत में न पड़ जाओ या कोई बड़ी विपत्ति न खड़ी कर बैठो, तो उस हानि की भरपाई तुम कैसे करोगे? क्या यह कुछ-कुछ अब पछताए होत क्या जब चिड़ियाँ चुग गईं खेत जैसा नहीं है? अपने भ्रष्ट स्वभाव की समस्या पूरी तरह से हल करने के लिए तुम्हें तभी सत्य खोज लेना होगा जब भ्रष्ट स्वभाव पहली बार सामने आता है। तुम्हें भ्रष्ट स्वभाव पनपते ही इसका समाधान कर लेना चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि तुमसे कोई गलती न हो और भविष्य में परेशानियाँ खड़ी न हों। यदि भ्रष्ट स्वभाव जड़ें जमा ले और वह व्यक्ति के विचार या उसका दृष्टिकोण बन जाए, तो वह इंसान को बुरा व्यवहार करने के लिए निर्देशित करने में सक्षम होगा। इसलिए, आत्म-चिंतन और आत्म-ज्ञान का मुख्य उद्देश्य अपने भ्रष्ट स्वभाव का पता लगाना और उसे हल करने के लिए शीघ्रता से सत्य की खोज करना है। तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारी प्रकृति में क्या चीजें हैं, तुम्हें क्या पसंद है, तुम किसका अनुसरण करते हो और तुम क्या हासिल करना चाहते हो। तुम्हें परमेश्वर के वचनों के अनुसार इन चीजों का गहन-विश्लेषण करना चाहिए ताकि यह जान सको कि क्या वे परमेश्वर के इरादों के अनुसार हैं, और ये किस लिहाज से भ्रामक हैं। जब तुम इन चीजों को समझ लो, तो तुम्हें अपने असामान्य विवेक की समस्या अर्थात् अपनी विवेकहीनता और निरंतर परेशानी खड़ी करने की प्रवृत्ति की समस्या, हल करनी चाहिए। यह केवल तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की समस्या नहीं है, बल्कि यह इस बात से भी संबंधित है कि तुम विवेकशील व्यक्ति हो या नहीं। विशेष रूप से उन मामलों में, जहाँ प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का संबंध है, जब लोग प्रसिद्धि और लाभ से उन्मत्त हो जाते हैं, उनका विवेक असामान्य हो जाता है; ऐसा लगता है जैसे उनकी नसों में कुछ खराबी आ गई है। यह भी लोगों की घातक कमजोरी है। कुछ लोगों को लगता है कि उनमें कोई खास काबिलियत और कुछ गुण हैं, और अलग दिखने के लिए वे हमेशा अगुआ बनना चाहते हैं, इसलिए वे परमेश्वर से उनका उपयोग करने की माँग करते हैं। यदि परमेश्वर उनका उपयोग नहीं करता, तो वे कहते हैं, “परमेश्वर मुझ पर कृपादृष्टि क्यों नहीं डाल सकता? परमेश्वर, अगर कुछ महत्वपूर्ण करने के लिए तुम मेरा इस्तेमाल करोगे, तो मैं तुम्हारे लिए खुद को खपाने का वादा करता हूँ!” क्या इस तरह का इरादा सही है? परमेश्वर के लिए खुद को खपाना अच्छी बात है, लेकिन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने की इच्छा के पीछे उनकी अपनी मंशाएँ हैं। वे अपने रुतबे से प्यार करते हैं और इसी पर उनका ध्यान केंद्रित होता है। जब लोग सच्चा समर्पण करने लायक हो सकें, परमेश्वर चाहे उनका उपयोग करे या न करे, वे पूरे मन से उसका अनुसरण कर सकें, चाहे उनके पास रुतबा हो या न हो, वे परमेश्वर के लिए खुद को खपा सकें, तो ऐसे लोगों को ही विवेकशील और परमेश्वर के प्रति समर्पित माना जा सकता है।
—वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, लोग परमेश्वर से बहुत अधिक माँगें करते हैं
399. वास्तविक जीवन में समस्याओं का सामना करते समय तुम्हें किस प्रकार परमेश्वर के अधिकार और उसकी संप्रभुता को समझना और गहराई से अनुभव करना चाहिए? जब तुम्हारे सामने ये समस्याएँ आती हैं और तुम्हें इन समस्याओं को समझने, इनसे निपटने और इनका अनुभव करने का तरीका नहीं आता, तो तुम्हें यह दिखाने के लिए क्या रवैया अपनाना चाहिए कि तुममें परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने का इरादा और इच्छा है और इस समर्पण की वास्तविकता है? पहले तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना होगा; फिर तुम्हें खोजना सीखना होगा; फिर तुम्हें समर्पण करना सीखना होगा। “प्रतीक्षा” का अर्थ है परमेश्वर के समय की प्रतीक्षा करना, उन लोगों, घटनाओं एवं चीजों की प्रतीक्षा करना जो उसने तुम्हारे लिए व्यवस्थित की हैं, और इस बात की प्रतीक्षा करना कि उसके इरादे धीरे-धीरे तुम्हारे सामने प्रकट किए जाएँ। “खोजने” का अर्थ है, परमेश्वर द्वारा आयोजित लोगों, घटनाओं और चीजों के माध्यम से उसके श्रमसाध्य इरादों की जाँच करना और उन्हें समझना, उनमें सत्यों को समझना, यह समझना कि मनुष्यों को क्या करना चाहिए, उन मार्गों को समझना जिनका उन्हें पालन अवश्य करना चाहिए, यह समझना कि परमेश्वर मनुष्यों में किन नतीजों को प्राप्त करने का अभिप्राय रखता है और उनमें किन उपलब्धियों को पाना चाहता है। बेशक, “समर्पण करने” का अर्थ उन लोगों, घटनाओं और चीजों को स्वीकार करना है जो परमेश्वर ने आयोजित की हैं; इसका अर्थ उसकी संप्रभुता को स्वीकार करना और उसके माध्यम से यह अनुभव करना है कि सृष्टिकर्ता किस तरह से मनुष्य की नियति पर संप्रभु है, वह किस प्रकार अपना जीवन मनुष्य को प्रदान करता है और वह किस प्रकार मनुष्यों के भीतर सत्य को डालता है। परमेश्वर की व्यवस्थाओं और संप्रभुता के अधीन सभी चीजें प्राकृतिक नियमों का पालन करती हैं, और यदि तुम उन सभी चीजों की व्यवस्था परमेश्वर को करने देने और उन पर उसे संप्रभु होने देने का संकल्प लेते हो, तो तुम्हें प्रतीक्षा करना सीखना चाहिए, तुम्हें खोज करना सीखना चाहिए, और तुम्हें समर्पण करना सीखना चाहिए। हर उस व्यक्ति को जो परमेश्वर के अधिकार के प्रति समर्पण करने के लिए इच्छुक है, यह रवैया अपनाना चाहिए और हर वह व्यक्ति जो परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं को स्वीकार करने का इच्छुक है, उसमें यही वह सबसे मूलभूत गुण होना चाहिए। इस प्रकार का रवैया रखने के लिए, इस प्रकार का गुण धारण करने के लिए, तुम लोगों को और अधिक कठिन परिश्रम करना होगा। केवल तभी तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हो।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III
400. जब नूह ने वैसा किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था, तो वह नहीं जानता था कि परमेश्वर के इरादे क्या थे। वह नहीं जानता था कि परमेश्वर क्या पूरा करना चाहता था। परमेश्वर ने उसे केवल एक आज्ञा दी थी और बिना कोई खास स्पष्टीकरण दिए उसे यह निर्देश दिया था कि उसे क्या करना है और नूह ने जाकर वैसा ही किया। उसने गुप्त रूप से यह अनुमान लगाने की कोशिश नहीं की कि परमेश्वर की इच्छाएँ क्या थीं, उसने परमेश्वर का प्रतिरोध नहीं किया और उसका समर्पण पूर्ण था। उसने बस एक शुद्ध और सरल हृदय से वैसा ही किया। परमेश्वर ने उसे जो कुछ भी करने को कहा, उसने किया, परमेश्वर के वचन के प्रति समर्पण करना और उसे सुनना ही उसके क्रियाकलापों का आधार था। उसने परमेश्वर के आदेश के साथ इसी तरह सीधे और सरल तरीके से व्यवहार किया। उसका सार—उसके क्रियाकलापों का सार समर्पण, कोई संदेह न करना, प्रतिरोध न करना और इसके अलावा, अपने हितों या अपने लाभ-हानि के बारे में न सोचना था। इसके अलावा, जब परमेश्वर ने कहा कि वह दुनिया को जलप्रलय से नष्ट कर देगा, तो नूह ने यह नहीं पूछा कि ऐसा कब होगा या आगे छानबीन करने की कोशिश नहीं की, उसने परमेश्वर से यह तो बिल्कुल भी नहीं पूछा कि आखिर वह दुनिया को कैसे नष्ट करने जा रहा है। उसने बस वैसा ही किया जैसा परमेश्वर ने निर्देश दिया था। परमेश्वर ने उसे जिस भी तरह से—और जिन भी सामग्रियों से—जहाज बनाने का निर्देश दिया, उसने वैसा ही किया, जैसे ही परमेश्वर ने आदेश दिया, उसने तुरंत कार्रवाई की। उसने परमेश्वर को संतुष्ट करने की इच्छा के रवैये के साथ परमेश्वर के निर्देशों के अनुसार काम किया। क्या वह आपदा से खुद को बचाने में सहायता करने के लिए यह कर रहा था? नहीं। क्या उसने परमेश्वर से पूछा कि संसार को नष्ट होने में कितना समय बाकी है? उसने नहीं पूछा। क्या उसने परमेश्वर से पूछा या क्या वह जानता था कि जहाज़ बनाने में कितना समय लगेगा? वह यह भी नहीं जानता था। उसने बस समर्पण किया, सुना और तदनुसार कार्य किया।
—वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, परमेश्वर का कार्य, परमेश्वर का स्वभाव और स्वयं परमेश्वर I
401. परमेश्वर में अपने विश्वास में, पतरस ने प्रत्येक चीज में परमेश्वर को संतुष्ट करने का प्रयास किया और उस सबके प्रति समर्पण करने का प्रयास किया जो परमेश्वर से आया था। वह ताड़ना और न्याय के साथ ही शोधन, क्लेश और अपने जीवन में भौतिक वस्तुओं का अभाव स्वीकार कर पाया और उसने एक भी शिकायत नहीं की। इसमें से कुछ भी उसके परमेश्वर-प्रेमी हृदय को नहीं बदल सका। क्या यह परमेश्वर के प्रति परम प्रेम नहीं था? क्या यह सृजित प्राणी के कर्तव्य का अच्छे से निर्वहन नहीं था? चाहे यह ताड़ना में हो, न्याय में हो, या क्लेश में हो, तुम मृत्युपर्यंत समर्पण प्राप्त करने में सक्षम हो, और यह वह है जो सृजित प्राणी को प्राप्त करना चाहिए, यह परमेश्वर के प्रति प्रेम की शुद्धता है। यदि मनुष्य इस हद तक प्राप्त कर सकता है, तो वह मानक स्तर का सृजित प्राणी है, और सृष्टिकर्ता के इरादों को पूरा करने के लिए इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता है। कल्पना करो कि तुम परमेश्वर के लिए कार्य कर पाते हो, किंतु तुम परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं करते हो और तुम परमेश्वर से सचमुच प्रेम नहीं कर सकते हो। इस ढंग से, तुमने न केवल सृजित प्राणी के अपने कर्तव्य का निर्वहन नहीं किया होगा, बल्कि तुम परमेश्वर द्वारा दोषी भी ठहराए जाओगे, क्योंकि तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य नहीं है, जो परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकता है और जो परमेश्वर से विद्रोह करता है। तुम परमेश्वर के लिए कार्य करने की ही परवाह करते हो, सत्य को अभ्यास में लाने या स्वयं को जानने की नहीं; तुम सृष्टिकर्ता को समझते या जानते नहीं हो, तुम सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण या उससे प्रेम नहीं करते हो और तुम ऐसे व्यक्ति हो जो परमेश्वर के प्रति स्वाभाविक रूप से विद्रोही है। इन्हीं कारणों से ऐसे लोग सृष्टिकर्ता द्वारा पसंद नहीं किए जाते हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सफलता या विफलता उस पथ पर निर्भर होती है जिस पर व्यक्ति चलता है
402. परमेश्वर के लिए एक जबरदस्त गवाही देना मुख्यतः इस बात से संबंधित है कि तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की समझ है या नहीं, और तुम इस व्यक्ति के सामने समर्पण करने में सक्षम हो या नहीं, जो न केवल साधारण है बल्कि सामान्य भी है, और मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो या नहीं। अगर तुम इस समर्पण के माध्यम से परमेश्वर के लिए वास्तव में गवाही देते हो, तो इसका अर्थ है कि तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त किए जा चुके हो। अगर तुम मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो, और उसके सामने शिकायतें नहीं करते, आलोचनाएँ नहीं करते, बदनामी नहीं करते, धारणाएँ नहीं रखते, और कोई गुप्त मंशा नहीं रखते, तो इस तरह परमेश्वर महिमा प्राप्त करेगा। किसी सामान्य व्यक्ति, जिसे मनुष्य द्वारा तुच्छ समझा जाता है, के सम्मुख समर्पण करने और किसी भी धारणा के बिना मृत्युपर्यंत समर्पण करने में सक्षम होना—यह सच्ची गवाही है। परमेश्वर जिस वास्तविकता में प्रवेश करने की लोगों से अपेक्षा करता है, वह यह है कि तुम उसके वचनों के प्रति समर्पण करने, उन्हें अभ्यास में लाने, व्यावहारिक परमेश्वर के सामने झुकने और अपनी भ्रष्टता जानने, उसके सामने अपना हृदय खोलने, और अंततः उसके इन वचनों के माध्यम से उसके द्वारा प्राप्त कर लिए जाने में सक्षम हो जाओ। जब ये वचन तुम्हें जीत लेते हैं और तुम्हें उसके सामने पूर्णतः समर्पित बना देते हैं, तो परमेश्वर महिमा प्राप्त करता है; इसके माध्यम से वह शैतान को लज्जित करता है और अपना कार्य पूरा करता है। जब तुम्हारी देहधारी परमेश्वर की व्यावहारिकता के बारे में कोई धारणा नहीं होती—अर्थात्, जब तुम इस परीक्षण में अडिग रहते हो—तो तुम एक अच्छी गवाही देते हो। अगर ऐसा दिन आता है, जब तुम्हें व्यावहारिक परमेश्वर की पूरी समझ हो जाती है और तुम पतरस की तरह मृत्युपर्यंत समर्पण कर सकते हो, तो तुम परमेश्वर द्वारा प्राप्त कर लिए जाओगे और पूर्ण बना दिए जाओगे। परमेश्वर द्वारा की जाने वाली हर वह चीज, जो तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप नहीं होती, तुम्हारे लिए एक परीक्षण होती है। अगर परमेश्वर का कार्य तुम्हारी धारणाओं के अनुरूप होता, तो तुम्हें कष्ट सहने या शोधन किए जाने की आवश्यकता न होती। चूँकि उसका कार्य इतना व्यावहारिक है और तुम्हारी धारणाओं के अनुसार नहीं है कि यह तुम्हारे लिए अपनी धारणाओं को छोड़ देना आवश्यक बनाता है। यही कारण है कि यह तुम्हारे लिए एक परीक्षण है। यह परमेश्वर की व्यावहारिकता के कारण ही है कि सभी लोग परीक्षणों के बीच में हैं; उसका कार्य व्यावहारिक है, अलौकिक नहीं। उसके व्यावहारिक वचनों और उसके व्यावहारिक कथनों को बिना किसी धारणा के पूरी तरह से समझकर, और उसका कार्य जितना अधिक व्यावहारिक हो तुम उतना ही उसे वास्तव में प्रेम करने में सक्षम होकर उसके द्वारा प्राप्त किए जाओगे। लोगों के जिस समूह को परमेश्वर प्राप्त करेगा, उसमें वे लोग हैं जो परमेश्वर को जानते हैं, अर्थात्, जो उसकी व्यावहारिकता को जानते हैं। इससे भी अधिक ये वे लोग हैं, जो परमेश्वर के व्यावहारिक कार्य के प्रति समर्पित होने में सक्षम हैं।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर से सचमुच प्रेम करने वाले लोग वे होते हैं जो परमेश्वर की व्यावहारिकता के प्रति पूर्णतः समर्पित हो सकते हैं
403. मानवता के विश्राम में प्रवेश करने से पहले, हर किस्म के व्यक्ति का दंडित होना या पुरस्कृत होना इस आधार पर निर्धारित होगा कि क्या वह सत्य खोजता है, क्या वह परमेश्वर को जानता है और क्या वह प्रत्यक्ष परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है। जिन्होंने मेहनत की है, लेकिन प्रत्यक्ष परमेश्वर को न तो जानते हैं न ही उसके प्रति समर्पण करते हैं, उनमें सत्य नहीं है। ऐसे लोग कुकर्मी होते हैं और कुकर्मी निःसंदेह दंड के भागी होंगे; इसके अलावा, वे अपने बुरे कर्मों के अनुसार दंडित होंगे। परमेश्वर मनुष्यों के विश्वास करने के लिए है और वह उनके समर्पण के योग्य भी है। वे जो केवल कल्पित और अदृश्य परमेश्वर में आस्था रखते हैं, वे लोग हैं जो परमेश्वर पर विश्वास नहीं करते और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में असमर्थ हैं। यदि ये लोग तब भी प्रत्यक्ष परमेश्वर पर विश्वास नहीं कर पाते, जब उसका विजय का कार्य समाप्त होता है और देहधारी प्रत्यक्ष परमेश्वर से विद्रोह करना और उसका प्रतिरोध करना जारी रखते हैं तो ये “कल्पनाजीवी” निस्संदेह विनाश के पात्र बन जाएँगे। यह तुम लोगों में एक जैसा है—सभी जो मौखिक रूप से देहधारी परमेश्वर को स्वीकार करते हैं, फिर भी देहधारी परमेश्वर के प्रति समर्पण के सत्य का अभ्यास नहीं कर पाते, उन सबको अंततः हटाया और नष्ट किया जाना है। और सभी जो दृश्यमान परमेश्वर को मौखिक रूप से स्वीकारते हैं और उसके द्वारा व्यक्त सत्य को खाते और पीते हैं, फिर भी अज्ञात और अदृश्य परमेश्वर का अनुसरण करते हैं, वे विनाश के और भी अधिक पात्र होंगे। इन लोगों में से कोई भी, परमेश्वर का कार्य पूरा होने के बाद आने वाले विश्राम के समय तक नहीं बचेगा, न ही इस तरह का एक भी व्यक्ति विश्राम के उस समय तक बच सकता है। जो लोग राक्षसों के हैं वे सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं; उनका सार परमेश्वर की ओर प्रतिरोध और विद्रोहीपन का है और उनमें परमेश्वर के प्रति समर्पण का लेशमात्र भी इरादा नहीं होता है। ऐसे सभी लोग नष्ट किए जाएँगे।
—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे