एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास
ईमानदार व्यक्ति होने का तुम लोगों का निजी अनुभव कैसा है? (ईमानदार व्यक्ति होना सचमुच बहुत मुश्किल लगता है।) मुश्किल क्यों लगता है? (मैं सच में ईमानदार बनना चाहता हूँ। लेकिन जब मैं हर दिन खुद को जाँचता हूँ, तो पाता हूँ कि मैं कपटी हूँ और मेरी कथनी में ढेरों मिलावटें हैं। कभी-कभी मैं अपनी बातों में भावनाएँ डाल देता हूँ, या बोलते समय मेरी कुछ मंशाएँ होती हैं। कभी-कभी मैं छोटे-मोटे खेल खेलता हूँ, घुमा-फिरा कर बोलता हूँ, या ऐसी बातें कहता हूँ जो वास्तविकता के विरुद्ध होती हैं—छल-कपट वाली चीजें, आधा-सच और दूसरी तरह की झूठी बातें, सब अपना लक्ष्य साधने के लिए।) ये तमाम व्यवहार लोगों के भ्रष्ट स्वभावों से उपजते हैं; ये लोगों के उस अंश से जुड़े होते हैं जो कुटिल और धोखेबाज होता है। मनुष्य धोखेबाजी का सहारा क्यों लेता है? यह उसके अपने उद्देश्य पूरे करने के लिए होता है, अपने लक्ष्य हासिल करने के लिए होता है और इसलिए वह कुछ छलपूर्ण तरीके इस्तेमाल करता है। इन तरीकों का इस्तेमाल करते हुए वह खुला और निष्कपट नहीं होता है और वह ईमानदार व्यक्ति नहीं होता है। ऐसे ही समय में मनुष्य अपनी धूर्तता और मक्कारी या अपनी दुर्भावना और घिनौनापन दिखाता है। अपने दिल में ऐसे भ्रष्ट स्वभावों के रहते उसे लगता है कि ईमानदार व्यक्ति बनना खास तौर पर मुश्किल है। यहीं पर एक ईमानदार व्यक्ति होने में कठिनाई निहित होती है। अगर तुम सत्य से प्रेम करने वाले व्यक्ति हो और सत्य को स्वीकार करने में समर्थ हो, तो ईमानदार व्यक्ति बनना बहुत मुश्किल नहीं होगा। तुम्हें लगेगा कि यह तो अपेक्षाकृत काफी आसान है। अनुभव वाले लोग बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि ईमानदार व्यक्ति होने की राह में आने वाली सबसे बड़ी बाधाएँ हैं लोगों की धूर्तता, उनकी धोखेबाजी, उनकी दुर्भावना और उनकी घिनौनी मंशाएँ। जब तक उनके ये भ्रष्ट स्वभाव मौजूद रहेंगे, ईमानदार व्यक्ति होना बहुत मुश्किल होगा। तुम सभी ईमानदार लोग बनने का प्रशिक्षण ले रहे हो; तुम्हें इसमें कुछ अनुभव है। तुम लोग इसका अनुभव कैसे करते हो? (हर दिन मैं अपनी कही गई सभी फालतू बातें और बोले गए झूठ लिखता हूँ और फिर उनकी जाँच और उनका गहन-विश्लेषण करता हूँ। मैंने पाया है कि उनमें से ज्यादातर के पीछे मंशा होती है—यह सब मिथ्याभिमान और घमंड की खातिर होता है। भले ही मुझे पता है कि मैं जो कहता हूँ वह सत्य के अनुरूप नहीं है, फिर भी मैं झूठ बोलने और दिखावा करने से खुद को रोक नहीं पाता।) एक ईमानदार व्यक्ति होने की कठिनाई बिल्कुल यहीं पर निहित है। लोगों को इसका पता है या नहीं, यह महत्वपूर्ण नहीं है; मुख्य बात यह है कि अपने मिथ्याभिमान और घमंड और अपने हितों की रक्षा करने के लिए लोग हठपूर्वक झूठ बोलने पर अड़े रहते हैं—वे सभी जानबूझकर गलत कर रहे हैं। यदि कोई झूठ बोलता है और इसके बारे में पता न होने का दावा करता है, तो वह झूठ बोल रहा है। एक ईमानदार व्यक्ति होने की कुंजी अपनी मंशाओं, उद्देश्यों और भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना है। केवल इसी तरह से झूठ बोलने की समस्या का जड़ से समाधान किया जा सकता है। मनुष्य अपने व्यक्तिगत लक्ष्य हासिल करने के लिए झूठ बोलता है, यानी व्यक्तिगत रूप से लाभ उठाने, फायदा पाने, अपनी अच्छी छवि बनाने के लिए या दूसरों की स्वीकृति पाने के लिए—झूठ बोलते समय मनुष्य की ये मंशाएँ और लक्ष्य होते हैं। जब मनुष्य झूठ बोलता है, तो वह जो प्रकट करता है वह एक भ्रष्ट स्वभाव होता है और इसी तरह तुम्हें झूठ बोलने का भेद पहचानना चाहिए। तो इस भ्रष्ट स्वभाव का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम सत्य से प्रेम करते हो या नहीं। यदि तुम सत्य को स्वीकार कर सकते हो, बोलते समय अपनी मंशाओं और लक्ष्यों से प्रेरित नहीं होते हो और केवल परमेश्वर के चुने हुए लोगों के हितों, कलीसिया के कार्य और परमेश्वर के इरादों पर विचार करते हो, तो तुम झूठ नहीं बोलोगे और तुम सच्चाई से बोलने में सक्षम होगे। यदि तुम अभी भी सच्चाई से बोलने में सक्षम नहीं हो, तो यह साबित करता है कि तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है और तुम अभी भी सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ हो। इसलिए एक ईमानदार व्यक्ति होने के लिए सत्य की समझ और आध्यात्मिक कद में बढ़ने की प्रक्रिया की जरूरत होती है। जब हम इसे इस रूप में देखते हैं, तो आठ-दस साल के अनुभव के बिना ईमानदार व्यक्ति होना असंभव है। यह अवधि किसी के जीवन में बढ़ने की प्रक्रिया है, सत्य को समझने और उसे प्राप्त करने की प्रक्रिया है। शायद कुछ लोग यह पूछें, “झूठ बोलने की समस्या का हल और ईमानदार व्यक्ति बनना क्या सचमुच इतना कठिन हो सकता है?” दरअसल, यह इस बात पर निर्भर करता है कि तुम किसके बारे में बात कर रहे हो। यदि यह कोई ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो वह अपनी गलत मंशाओं और अपनी देह के हितों को छोड़ने में सक्षम होगा और उसके लिए झूठ बोलना छोड़ना आसान होगा। जहाँ तक उन लोगों की बात है जो सत्य से प्रेम नहीं करते—वे केवल प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे और मिथ्याभिमान और घमंड से प्रेम करते हैं, वे सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, इसलिए उनके लिए झूठ बोलना छोड़ना बेहद मुश्किल होगा।
एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करना मुख्य रूप से झूठ बोलने की समस्या को हल करने और साथ ही अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने का मामला है। यहाँ एक मुख्य अभ्यास यह है कि जब तुम्हें एहसास हो जाए कि तुमने किसी से झूठ बोला है और उसे धोखा दिया है, तो तुम्हें उसके सामने खुलकर बात करनी चाहिए, खुद को खोलकर रख देना चाहिए और माफी माँगनी चाहिए। यह अभ्यास झूठ बोलने की समस्या को हल करने में बहुत फायदेमंद है। उदाहरण के लिए, यदि तुमने किसी को धोखा दिया है या यदि उससे कही गई तुम्हारी बातों में कोई मिलावट या व्यक्तिगत मंशा थी, तो तुम्हें उसके पास जाकर उसके सामने खुलकर बात करनी चाहिए, खुद को खोलकर रख देना चाहिए और अपना गहन-विश्लेषण करना चाहिए। तुम्हें उसे बताना चाहिए, “मैंने तुम्हें जो बताया वह झूठ था, अपने गौरव की रक्षा के लिए था। यह कहने के बाद मैंने असहज महसूस किया था, इसलिए मैं अब तुमसे क्षमा माँग रहा हूँ। कृपया मुझे माफ कर दो।” उस व्यक्ति को लगेगा कि यह बात बहुत नई है। वह सोचेगा कि ऐसा कोई कैसे हो सकता है जो झूठ बोलने के बाद उसके लिए माफी माँगे। ऐसे साहस की वे सचमुच सराहना करते हैं। और इस तरह से अभ्यास करने से व्यक्ति को क्या फायदा मिलता है? ऐसा करने का उद्देश्य दूसरों की प्रशंसा पाना नहीं है, बल्कि अपने झूठ बोलने पर अधिक प्रभावी ढंग से अंकुश लगाना और उसका समाधान करना है। इसलिए, झूठ बोलने के बाद, तुम्हें ऐसा करने के लिए माफी माँगने का अभ्यास करना चाहिए। तुम इस तरह से अपना गहन-विश्लेषण करने और खुद को खोलकर रखने और लोगों से माफी माँगने का अभ्यास करने के लिए जितना अधिक प्रशिक्षण लोगे, नतीजे उतने ही बेहतर होंगे—और तुम उतना ही कम झूठ बोलोगे। एक ईमानदार व्यक्ति बनने और अपने झूठ बोलने पर अंकुश लगाने के लिए अपना गहन-विश्लेषण करने और खुद को खोलकर रखने का अभ्यास करने के लिए साहस की आवश्यकता होती है; माफी माँगने के लिए इसकी और भी अधिक आवश्यकता होती है। यदि तुम लोग एक या दो साल—या शायद तीन से पाँच साल—तक इस तरह का प्रशिक्षण लेते हो, तो तुम्हें स्पष्ट नतीजे देखने की गारंटी है और तब खुद को झूठ बोलने से छुटकारा दिलाना मुश्किल नहीं होगा। खुद को झूठ बोलने से छुटकारा दिलाना ईमानदार व्यक्ति बनने की ओर पहला कदम है और यह तीन से पाँच साल के प्रयास के बिना नहीं किया जा सकता। झूठ बोलने की समस्या हल होने के बाद, दूसरा कदम धोखेबाजी और चालबाजी की समस्या को हल करना है। कभी-कभी चालबाजी और धोखेबाजी के लिए व्यक्ति का झूठ बोलना जरूरी नहीं होता—ये चीजें सिर्फ कार्यकलापों से भी हासिल की जा सकती हैं। हो सकता है कि कोई व्यक्ति बाहर से शायद झूठ न बोले, मगर फिर भी उसके दिल में धोखेबाजी और चालबाजी छिपी हुई हो। लोग अपने दिलों में इसके बारे में सबसे अधिक स्पष्ट होते हैं, क्योंकि उन्होंने इस पर गहराई से और सावधानीपूर्वक विचार किया होगा, इसलिए बाद में आत्म-चिंतन करने पर उनके लिए इसे पहचानना आसान होगा। एक बार झूठ बोलने की समस्या का समाधान हो जाने के बाद, धोखेबाजी और चालबाजी की समस्याओं का समाधान करना अपेक्षाकृत आसान हो जाएगा, लेकिन परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होना आवश्यक है। क्योंकि जब लोग धोखेबाजी और चालबाजी में लिप्त होते हैं, तो वे एक निश्चित मंशा से नियंत्रित होते हैं और क्योंकि दूसरे लोग बाहर से इसे समझ नहीं सकते या इसका भेद नहीं पहचान सकते हैं और केवल परमेश्वर ही ऐसी चीजों की पड़ताल करता है और उन्हें जानता है, इसलिए व्यक्ति केवल परमेश्वर से प्रार्थना करने और उसकी जाँच-पड़ताल स्वीकार करने पर निर्भर रहकर ही धोखेबाजी और चालबाजी की समस्याओं का समाधान कर सकता है। यदि तुम दिल से सत्य से प्रेम नहीं करते हो या तुम्हारे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है, तो तुम्हारी धोखेबाजी और चालबाजी का समाधान नहीं किया जा सकता। तुम शायद परमेश्वर के सामने प्रार्थना कर सकते हो, अपनी गलतियों को मान सकते हो, पाप कबूल कर सकते हो और पश्चात्ताप कर सकते हो या अपने भ्रष्ट स्वभावों का गहन-विश्लेषण कर सकते हो—सच्चाई से यह बता सकते हो कि तुम उस समय क्या सोच रहे थे, तुमने क्या कहा, तुम्हारी मंशा क्या थी और तुम धोखेबाजी में कैसे लिप्त हुए—ये सब चीजें करना अपेक्षाकृत आसान है। लेकिन यदि तुमसे किसी अन्य व्यक्ति के सामने खुद को खोलकर रखने के लिए कहा जाए, तो शायद तुममें साहस या संकल्प न हो, क्योंकि तुम अपना मिथ्याभिमान नहीं छोड़ सकते। तब तुम्हारे लिए खुलकर बात करने और खुद को खोलकर रखने का अभ्यास करना बहुत मुश्किल होगा। शायद तुम सामान्य तरीके से यह स्वीकार कर पाओगे कि कभी-कभी तुम जो कहते और करते हो, उसके पीछे तुम्हारी कुछ मंशाएँ और लक्ष्य होते हैं, उनमें मिलावट और धोखेबाजी, झूठ और चालबाजी होती है। लेकिन फिर, जब कुछ होता है और तुमसे अपना गहन-विश्लेषण करने के लिए कहा जाता है, यह बताने के लिए कहा जाता है कि शुरू से अंत तक चीजें कैसे हुईं, तुम्हारे द्वारा बोले गए कौन-से शब्द धोखे से भरे थे, तुम्हारी मंशा क्या थी, तुम अंदर क्या सोच रहे थे और तुम दुर्भावनापूर्ण या धूर्त थे या नहीं, तो तुम इतनी विशिष्टता के साथ चीजों का खुलासा करने या इतने विस्तार से बोलने के लिए तैयार नहीं होगे। यहाँ तक कि कुछ लोग यह कहते हुए चीजों को सतही तौर पर निपटाएँगे, “बस इतनी सी बात है। मैं बस काफी धोखेबाज, धूर्त और गैर-भरोसेमंद व्यक्ति हूँ।” यह दर्शाता है कि वे अपने भ्रष्ट सार का या वे कितने धोखेबाज और धूर्त हैं इसका सही ढंग से सामना नहीं कर सकते; वे हमेशा एक टालमटोल वाली स्थिति, एक टालमटोल वाली दशा में रहते हैं, हमेशा खुद को माफ करते हैं और खुद को छूट देते हैं, एक ईमानदार व्यक्ति होने के सत्य का अभ्यास करने में कष्ट सहने या कीमत चुकाने में असमर्थ होते हैं। कई लोग हमेशा यह कहते हुए वर्षों से शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करते रहे हैं, “मैं अत्यंत धोखेबाज और धूर्त हूँ, मेरे कृत्यों में अक्सर चालबाजी होती है, मैं लोगों से बिल्कुल ईमानदारी से पेश नहीं आता।” लेकिन वर्षों तक यूँ चिल्लाने के बाद भी वे पहले जितने ही धोखेबाज बने रहते हैं क्योंकि जब वे अपनी धोखेबाजी की दशा दिखाते हैं, तब कोई कभी उनसे सच्चा गहन-विश्लेषण या पछतावा नहीं सुनता। उन्होंने कभी दूसरों के सामने खुद को खोलकर नहीं रखा है या झूठ बोलने या चालबाजी में लिप्त होने के बाद कभी माफी नहीं माँगी है, सभाओं के दौरान अपना गहन-विश्लेषण करने और खुद को जानने के बारे में किसी अनुभवजन्य गवाही पर संगति करने की बात तो दूर है; उन्होंने यह भी कभी नहीं बताया है कि उन्होंने इन मामलों में कैसे पश्चात्ताप किया और बदलाव किया। उन्होंने ऐसे किसी अभ्यास में हिस्सा नहीं लिया है जो यह साबित करता है कि वे खुद को नहीं जानते हैं और उन्होंने सच में पश्चात्ताप नहीं किया है और जब वे कहते हैं कि वे धोखेबाज हैं और एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहते हैं, तो वे केवल नारे लगा रहे हैं और सिद्धांतों का प्रचार कर रहे हैं और इससे ज्यादा कुछ नहीं। हो सकता है कि वे ये चीजें इसलिए करते हैं क्योंकि वे बस दूसरों की देखा-देखी करने और भीड़ का अनुसरण करने की कोशिश कर रहे हैं। या यह इसलिए हो सकता है क्योंकि वे कलीसियाई जीवन के परिवेश में औपचारिकता पूरी करने और दिखावा करने के लिए खुद को मजबूर कर रहे हैं। जो भी हो, नारे लगाने वाले और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करने वाले ऐसे लोग कभी सच में पश्चात्ताप नहीं करेंगे, उनका जीवन स्वभाव कभी नहीं बदलेगा और वे निश्चित रूप से परमेश्वर का उद्धार प्राप्त नहीं कर पाएँगे।
परमेश्वर लोगों से जिस भी सत्य के अभ्यास की अपेक्षा रखता है उसके लिए उन्हें कीमत चुकाने और अपने असली जीवन में उसका व्यावहारिक रूप में अभ्यास और अनुभव करने की जरूरत होती है। परमेश्वर लोगों से नहीं कहता कि महज शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का पाठ करो, आत्मज्ञान की बातें करो, मान लो कि तुम कपटी, झूठे, कुटिल, धोखेबाज और चालबाज हो या ये चीजें दो-चार बार जोर-जोर से बोलकर अपनी बात खत्म कर दो। अगर कोई ये तमाम चीजें मान ले, मगर इस सच्चाई के बाद जरा भी न बदले; अगर वह झूठ बोलना, छलना और धोखेबाजी करना जारी रखे; किसी चीज का सामना होने पर वह वही शैतानी चालबाजियाँ, वही शैतानी तरीके चलाता रहे; अगर उसके उपाय और तरीके कभी न बदलें, तो क्या यह व्यक्ति सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने के योग्य है? क्या वह कभी भी अपना स्वभाव बदल पाएगा? नहीं—कभी नहीं! तुम्हें चिंतन कर खुद को जानने में समर्थ होना चाहिए। तुम्हें भाई-बहनों की मौजूदगी में खुद को उजागर करने और अपनी सच्ची दशा के बारे में संगति करने की हिम्मत दिखानी चाहिए। अगर तुममें उजागर करने की हिम्मत नहीं है या अपने भ्रष्ट स्वभाव का गहन-विश्लेषण नहीं कर सकते; अगर तुम अपनी गलतियाँ मानने की हिम्मत नहीं रखते, तो तुम सत्य का अनुसरण नहीं कर रहे हो, खुद को जानने वाला व्यक्ति होना तो दूर की बात है। अगर सभी लोग उन धार्मिक लोगों जैसे हों जो दूसरों की सराहना पाने के लिए दिखावा करते हैं, जो गवाही देते हैं कि वे परमेश्वर से कितना प्रेम करते हैं, उसके प्रति कितने समर्पित हैं, उसके प्रति कितने वफादार हैं, और परमेश्वर उनसे कितना प्रेम करता है, तो यह सब वे दूसरों का आदर और सराहना पाने के लिए करते हैं; अगर हरेक अपनी निजी योजनाएँ छिपाए रखे और अपने दिलों में निजी स्थान बनाए रखे, तो कोई भी सच्चे अनुभवों की बात कैसे कर सकता है? किसी के पास एक-दूसरे को बताने के लिए सच्चे अनुभव कैसे होंगे? तुम्हारे अनुभवों को साझा करने और उनके बारे में संगति करने का अर्थ है तुम्हारा अपने अनुभवों और परमेश्वर के वचनों के ज्ञान पर संगति करना। यह तुम्हारे दिल के हर विचार, तुम्हारी हर दशा और तुममें प्रकट भ्रष्ट स्वभाव को वाणी देना है। यह दूसरों को इन चीजों का भेद पहचानने और फिर सत्य पर संगति करके समस्या को सुलझाने के बारे में है। अनुभवों पर इस प्रकार संगति करके ही सभी लोग लाभ और फल पाते हैं। केवल यही सच्चा कलीसिया जीवन है। अगर ये परमेश्वर के वचनों या किसी भजन पर तुम्हारी अंतर्दृष्टि के बारे में महज थोथी बातें हों, और फिर तुम इस पर आगे बोले बिना मनचाहे ढंग से संगति करो, अपनी वास्तविक दशाओं या समस्याओं का खुलासा न करो, तो ऐसी संगति से कोई लाभ नहीं मिलने वाला। अगर हरेक सैद्धांतिक या मीमांसात्मक ज्ञान के बारे में बताए, मगर वास्तविक अनुभवों से हासिल ज्ञान के बारे में कुछ न बोले; और अगर सत्य पर संगति करते समय वे अपने निजी जीवन, असली जीवन की समस्याओं और अपने भीतरी संसार के बारे में बोलने से बचें, तो फिर सच्चा संचार कैसे हो पाएगा? कोई वास्तविक भरोसा कैसे होगा? हो ही नहीं सकेगा! अगर कोई पत्नी अपने मन की बात पति से कभी न कहे, तो क्या इसे अंतरंगता कहा जाएगा? क्या वे जान पाएँगे कि एक-दूसरे के मन में क्या है? (नहीं, वे नहीं जान सकते।) फिर मान लो कि वे निरंतर कहते रहते हैं, “मैं तुमसे प्यार करता हूँ।” वे सिर्फ यही कहते हैं, मगर कभी खुद को उजागर नहीं करते या एक-दूसरे को नहीं बताते कि वे वास्तव में भीतर गहरे क्या सोच रहे हैं, उन्हें अपने साथी से क्या अपेक्षा है, या वे किन समस्याओं से जूझ रहे हैं। वे कभी भी एक-दूसरे को अपने मन की बात नहीं बताते, और साथ होने पर उनके बीच एक-दूसरे के लिए सतही मीठी बातों के अलावा कुछ नहीं होता। तो क्या वे सचमुच पति-पत्नी हैं? यकीनन नहीं! इसी तरह, अगर भाई-बहनों को एक-दूसरे से अपने मन की बात कहने लायक होना हो, एक-दूसरे की मदद करनी हो, और एक-दूसरे की जरूरत पूरी करनी हो, तो प्रत्येक व्यक्ति को अपने सच्चे अनुभवों के बारे में बताना चाहिए। अगर तुम अपने सच्चे अनुभवों के बारे में कुछ नहीं कहते—अगर तुम सिर्फ मनुष्य को समझ आने वाले शब्द और धर्म-सिद्धांत का प्रचार करते हो, अगर तुम सिर्फ परमेश्वर में विश्वास को लेकर थोड़ा धर्म-सिद्धांत का प्रचार करते हो, सिर्फ बकबक करते रहते हो और अपने दिल की बात खुल कर नहीं कहते—तो तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो और ईमानदार व्यक्ति बनने में असमर्थ हो। अगर इसी मिसाल का इस्तेमाल करें : कई वर्षों तक साथ जीते हुए पति-पत्नी, कभी-कभी आपस में लड़ते हुए, एक-दूसरे का आदी होने की कोशिश करते हैं। लेकिन अगर तुम दोनों सामान्य मानवता वाले हो, और हमेशा जीवन और काम की अपनी समस्याओं, अपनी गहरी सोच, चीजें ठीक करने की अपनी योजना, या अपने बच्चों के भविष्य के बारे में अपने विचारों और योजनाओं के बारे में तुम उससे और वह तुमसे दिल खोलकर बातें करते हो, और अपने साथी को ये सब बताते हो, तो फिर क्या तुम दोनों लोग विशेष रूप से एक-दूसरे के साथ अंतरंग महसूस नहीं करोगे? लेकिन अगर वह तुम्हें कभी अपने अंतर्मन की बातें न बताए, बस सिर्फ वेतन घर ले आए; अगर तुम अपने विचार कभी उसे न बताओ और तुम दोनों एक-दूसरे को दिल की बातें न बताओ, तो क्या तुम दोनों लोगों के बीच भावनात्मक दूरी नहीं होगी? जरूर होगी, क्योंकि तुम एक-दूसरे के विचारों और योजनाओं को नहीं समझते। आखिरकार, तुम यह नहीं बता सकोगे कि तुम्हारा जीवनसाथी किस किस्म का व्यक्ति है, न ही वह यह बता सकेगा कि तुम किस किस्म के व्यक्ति हो। तुम उसकी जरूरतें नहीं समझोगे, न ही वह तुम्हारी जरूरतें समझेगा। अगर लोगों के बीच कोई बोलचाल या आध्यात्मिक संचार न हो, तो उनके बीच अंतरंगता की कोई संभावना नहीं होती, और वे एक-दूसरे की जरूरतें पूरी नहीं कर सकते या एक-दूसरे की मदद नहीं कर सकते। तुम लोगों को ऐसा अनुभव हुआ होगा, हुआ है न? अगर तुम्हारा मित्र तुमसे अपने दिल की सारी बातें कहे, वह जो भी सोच रहा है, उसे जो भी तकलीफ या खुशी है, उनके बारे में तुम्हें खुलकर बताए, तो क्या तुम खुद को विशेष रूप से उसके करीब महसूस नहीं करोगे? वे तुम्हें ये सब बताने को इसलिए तैयार होते हैं क्योंकि तुमने भी अपने अंतरंग विचार उन्हें बताए हैं। तुम लोग खास तौर पर करीब हो, और इसी वजह से तुम लोगों की आपस में बहुत बनती है और तुम एक-दूसरे की मदद कर पाते हो। कलीसिया के भाई-बहन आपस में इस प्रकार के संचार और बातचीत के बिना एक-दूसरे के साथ मिल-जुल कर नहीं रह सकेंगे और उनके लिए अपने कर्तव्य निभाते समय सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना नामुमकिन हो जाएगा। इसीलिए सत्य पर संगति करने के लिए आध्यात्मिक संचार और दिल से बात करने की सामर्थ्य जरूरी होती है। यह उन सिद्धांतों में से एक है जो ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए किसी में होना चाहिए।
जब कुछ लोग यह सुनते हैं कि ईमानदार बनने के लिए सत्य बोलना चाहिए और दिल की बात कहनी चाहिए और अगर वे झूठ बोलें या धोखा दें तो उन्हें खुलकर बताना चाहिए, खुद को उजागर करना चाहिए और अपनी गलती मान लेनी चाहिए, तो वे कहते हैं : “एक ईमानदार व्यक्ति होना कठिन है। क्या मुझे हर वह चीज दूसरों को बता देनी चाहिए जो मैं सोचता हूँ? क्या सिर्फ सकारात्मक चीजों पर संगति करना काफी नहीं है? मुझे दूसरों को अपने काले या भ्रष्ट हिस्से के बारे में बताने की जरूरत नहीं है, है न?” अगर तुम खुद को दूसरों के सामने खोलकर पेश नहीं करते, और अपना विश्लेषण नहीं करते, तो तुम कभी खुद को नहीं जान पाओगे। तुम कभी नहीं पहचानोगे कि तुम किस किस्म की चीज हो, और दूसरे तुम पर कभी भरोसा नहीं कर पाएँगे। यह एक तथ्य है। अगर तुम चाहते हो कि दूसरे तुम पर भरोसा करें, तो पहले तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए। ईमानदार व्यक्ति होने के लिए तुम्हें पहले अपना दिल खोलकर रखना चाहिए ताकि सभी उसके भीतर झाँक सकें, तुम्हारी सोच और तुम्हारा असली चेहरा देख सकें। तुम्हें भेस बदलने की कोशिश नहीं करनी चाहिए, या खुद को छिपाना नहीं चाहिए। तभी दूसरे तुम पर भरोसा करेंगे, और तुम्हें ईमानदार व्यक्ति मानेंगे। यह सबसे बुनियादी अभ्यास है और ईमानदार व्यक्ति बनने की पहली शर्त है। यदि तुम हमेशा ढोंग करते हो, हमेशा पवित्रता, श्रेष्ठता, महानता और ऊँचे चरित्र का दिखावा करते हो, दूसरों से अपनी भ्रष्टता और खामियों को छिपाते हो, उनके सामने एक झूठी छवि पेश करते हो और उन्हें यह विश्वास दिलाते हो कि तुम ईमानदार, महान, आत्म-त्यागी, न्यायसंगत और निस्वार्थी हो—तो क्या इसमें कपट और छल नहीं है? समय बीतने के साथ, क्या लोग तुम्हारी असलियत नहीं जान पाएँगे? इसलिए, पाखंडी मत बनो या दिखावा मत करो। बल्कि सरल और निष्कपट बनो, और खुद को खोलकर रख देना सीखो—अपना दिल खोलकर दूसरों को देखने दो। यदि तुम अपने सभी विचारों और उन सभी चीजों को जो तुम करना चाहते हो—चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक—दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख सकते हो तो क्या तुम ईमानदार नहीं हो रहे हो? जब तुम खुद को दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख देते हो तो परमेश्वर तुम्हें देख रहा होता है। वह कहेगा, “चूँकि तुमने खुद को दूसरों के देखने के लिए खोलकर रख दिया है, तो तुम निश्चित रूप से मेरे सामने भी ईमानदार हो।” लेकिन अगर तुम केवल गुप्त रूप से परमेश्वर के सामने खुद को खोलकर रखते हो, फिर भी दूसरों के सामने हमेशा महान, श्रेष्ठ और स्वार्थहीन होने का ढोंग करते हो तो परमेश्वर तुम्हारे बारे में क्या सोचेगा? वह क्या कहेगा? वह कहेगा, “तुम पूरी तरह से एक धोखेबाज व्यक्ति हो। तुम एक नंबर के पाखंडी और बदमाश हो और तुम एक ईमानदार व्यक्ति नहीं हो।” परमेश्वर तुम्हें इस तरह से दोषी ठहराएगा। एक ईमानदार व्यक्ति होने का अर्थ यह है कि चाहे तुम परमेश्वर के सामने हो या दूसरे लोगों के सामने, तुम अपनी आंतरिक दशा और अपने दिल की बातों को लेकर शुद्ध और सरल तरीके से खुल सकते हो। क्या यह करना आसान है? इसके लिए कुछ समय तक प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है, साथ ही बार-बार प्रार्थना करने और परमेश्वर पर निर्भर रहने की भी। तुम्हें सभी मामलों में अपने दिल की बातों को सरल और खुले तौर पर बोलने के लिए खुद को अभ्यस्त अवश्य करना चाहिए। इस तरह के प्रशिक्षण से तुम प्रगति कर सकते हो। यदि तुम्हें कोई बड़ी कठिनाई आती है तो तुम्हें अवश्य परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए; तुम्हें तब तक अपने दिल में संघर्ष करना होगा और देह पर विजय पानी होगी, जब तक कि तुम सत्य को अभ्यास में लाने में समर्थ नहीं हो जाते। इस तरह से धीरे-धीरे खुद को प्रशिक्षित करके, तुम्हारा दिल धीरे-धीरे खुल जाएगा। तुम अधिकाधिक शुद्ध और सरल होते जाओगे और तुम्हारे शब्दों और क्रियाकलापों का पहले की तुलना में एक अलग प्रभाव होगा। तुम उत्तरोत्तर कम झूठ बोलोगे और धोखा दोगे और तुम परमेश्वर के सामने जीने में सक्षम होगे। तब तुम मूलतः एक ईमानदार व्यक्ति बन चुके होगे।
शैतान द्वारा भ्रष्ट होकर पूरी मानवजाति शैतान के स्वभावों में जीती है। शैतान की तरह वे हर तरीके से दिखावा करते हैं और अपनी एक छवि बनाते हैं, और हर मामले में धोखाधड़ी और चालबाजी करते हैं। ऐसा कुछ भी नहीं है जिसके लिए वे धोखाधड़ी और चालबाजी का सहारा नहीं लेते। कुछ लोग खरीदारी जैसी आम गतिविधियों में भी धोखाधड़ी के खेल खेलते हैं। मिसाल के तौर पर हो सकता है उन्होंने सबसे फैशनेबल पोशाक खरीदी हो, मगर—बहुत पसंद होने पर भी—वे उसे कलीसिया में पहनने की हिम्मत नहीं करते, इस डर से कि भाई-बहन उनके बारे में बातें बनाएँगे और उन्हें उथला कहेंगे। इसलिए वे इसे दूसरों की पीठ पीछे पहनते हैं। यह कैसा बर्ताव है? यह धोखेबाज और छल करने के स्वभाव का खुलासा है। कोई फैशनेबल पोशाक खरीदकर भी भाई-बहनों के सामने पहनने की हिम्मत क्यों नहीं करेगा? फैशनेबल चीजें उनकी दिली पसंद हैं और वे गैर-विश्वासियों की ही तरह दुनिया के चलन के पीछे भागते हैं। वे डरते हैं कि भाई-बहन उनकी असलियत न जान लें, यह न देख लें कि वे कितने उथले हैं, और वे एक गरिमावान और सुसभ्य व्यक्ति नहीं हैं, लेकिन दिल से वे फैशनेबल चीजों के पीछे भागते हैं, और उन्हें जाने देना उनके लिए मुश्किल होता है। नतीजतन, वे उस कपड़े को सिर्फ घर पर ही पहन सकते हैं और डरते हैं कि भाई-बहन उसे देख न लें। अगर उनकी पसंदीदा चीजें लोगों के सामने नहीं आ सकतीं, तो फिर वे उन्हें छोड़ क्यों नहीं सकते? क्या कोई शैतानी स्वभाव उनका नियंत्रण नहीं कर रहा है? वे निरंतर शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, सत्य को समझते हुए-से लगते हैं, फिर भी वे सत्य को अभ्यास में नहीं ला पाते। यह वह व्यक्ति है जो शैतानी स्वभाव के साथ जीता है। अगर कोई व्यक्ति कथनी और करनी दोनों में हमेशा धोखेबाज बना रहता है, दूसरों को अपना असली रूप नहीं देखने देता है और दूसरों के सामने हमेशा एक धर्मनिष्ठ व्यक्ति होने की छवि पेश करता है, तो फिर उसमें और किसी फरीसी में क्या फर्क है? ऐसे लोग एक वेश्या का जीवन जीना चाहते हैं, मगर साथ ही अपनी शुचिता का एक स्मारक भी बनवाना चाहते हैं। उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि अपनी अजीब पोशाक को जनता के बीच पहनना अच्छा नहीं होगा, तो फिर उन्होंने उसे खरीदा क्यों? क्या यह पैसे की बर्बादी नहीं थी? सिर्फ इसलिए कि उन्हें ऐसी चीज पसंद है और उनका पोशाक पर दिल आ गया था, उन्हें लगा कि यह खरीद लेनी चाहिए। लेकिन एक बार जब वे इसे खरीद लेते हैं, तो वे इसे पहनकर बाहर जाने की हिम्मत नहीं करते। कुछ साल बीत जाने और थोड़ा सत्य समझ लेने के बाद उन्हें पछतावा होता है और वे सोचते हैं कि वे इतने मूर्ख, इतने घिनौने कैसे हो सकते हैं कि उन्होंने ऐसा किया। लेकिन जब वे ऐसा कर रहे थे, तो वे खुद पर नियंत्रण नहीं रख सके, क्योंकि वे उन चीजों को छोड़ने में असमर्थ थे जिन्हें वे पसंद करते थे और जिनका वे अनुसरण करते थे; इसलिए उन्होंने खुद को संतुष्ट करने के लिए दोहरे हथकंडे और चालबाजी अपनाई। अगर वे ऐसे तुच्छ मामले में धोखेबाजी वाला स्वभाव दिखाते हैं, तो कोई बड़ा मामला आने पर क्या वे सत्य पर अमल कर पाएँगे? यह नामुमकिन होगा। स्पष्ट है कि धोखेबाज होना उनकी प्रकृति है, और धोखेबाजी उनका घातक दोष है। एक छह-सात साल का बच्चा था जिसने एक बार अपने परिवार के साथ कुछ बढ़िया खा लिया। जब दूसरे बच्चों ने उससे पूछा कि उसने क्या खाया, तो बच्चे ने आँखें झपका कर कहा, “मैं भूल गया,” जबकि दरअसल वह बस उन्हें बताना नहीं चाहता था। क्या अभी-अभी खाई हुई चीज वह भूल चुका होगा? यह छह-सात साल का बच्चा झूठ बोलने में सक्षम था। क्या यह कोई ऐसी चीज थी जो बड़ों ने उसे सिखाई? क्या यह उसके घर के माहौल का असर था? नहीं—यह मनुष्य की प्रकृति है, उसकी विरासत; मनुष्य धोखेबाज स्वभाव के साथ पैदा होता है। दरअसल बच्चे ने जो भी बढ़िया चीज खाई हो, ऐसा करना सामान्य बात थी। उसके माता-पिता ने उसके लिए यह बनाया था; उसने किसी और का खाना नहीं चुराया था। अगर ऐसे हालात में यह बच्चा झूठ बोल सका, जबकि ऐसा करना बिल्कुल भी जरूरी नहीं था, तो क्या उसका दूसरे मामलों में झूठ बोलना और ज्यादा मुमकिन नहीं है? यह कौन-सी समस्या दर्शाता है? क्या यह उसकी प्रकृति की समस्या नहीं है? वह बच्चा अब बड़ा हो चुका है, और झूठ बोलना उसकी प्रकृति बन चुकी है। वह सचमुच एक धोखेबाज व्यक्ति है; बिल्कुल बचपन से ही उसमें यह देखा जा सकता था। धोखेबाज लोग दूसरों से झूठ बोलने और चालबाजी करने से बच नहीं सकते, और उनकी झूठी बातें और चालबाजी किसी भी जगह और वक्त दिखाई दे सकती हैं। उन्हें यह सीखने की जरूरत नहीं कि ये चीजें कैसे करें, या ये करने के लिए उन्हें उकसाए जाने की जरूरत नहीं है—वे ऐसा करने की क्षमता के साथ ही पैदा होते हैं। अगर वह बच्चा उतनी कच्ची उम्र में झूठ बोलकर लोगों से चाल चल सकता था, तो क्या झूठ बोलना सचमुच उसका एकबारगी का अपराध हो सकता था? यकीनन नहीं। यह दिखाता है कि वह प्रकृति सार से एक धोखेबाज व्यक्ति है। क्या ऐसी सरल चीज का भेद पहचानना आसान नहीं है? अगर कोई बचपन से ही झूठ बोलता रहा हो, अक्सर झूठ बोलता हो, जरूरत न होने पर भी सरल मामलों में लोगों से झूठ बोलकर उनसे चालबाजी करता हो, और झूठ बोलना उसकी प्रकृति बन गई हो, तो उसके लिए बदलना आसान नहीं होगा। वह प्रामाणिक रूप से धोखेबाज व्यक्ति है। ऐसा क्यों कहते हैं कि धोखेबाज लोग बचाए नहीं जा सकते? चूँकि उनके द्वारा सत्य स्वीकारने की संभावना नहीं होती, इसलिए उन्हें शुद्ध और परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। परमेश्वर का उद्धार पा सकने वाले लोग अलग होते हैं। शुरुआत से ही वे अपेक्षाकृत निष्कपट होते हैं, और अगर वे छोटा-सा झूठ बोल भी दें, तो मुमकिन है वे झेंप कर परेशान हो जाएँगे। ऐसे किसी व्यक्ति के लिए ईमानदार बनना आसान है : अगर तुम उससे झूठ बोलने या धोखा देने को कहोगे, तो उसे मुश्किल होगी। झूठ बोले तो भी सारे शब्द नहीं बोल पाएगा, और सबको तुरंत पता चल जाएगा। ये अपेक्षाकृत सरल लोग होते हैं और अगर वे सत्य को स्वीकार कर सकें तो उनके उद्धार प्राप्त करने की अधिक संभावना होती है। इस किस्म का व्यक्ति सिर्फ खास हालात में ही झूठ बोलता है, जब वह मुसीबत में फँस गया हो। आम तौर पर, ऐसे लोग हमेशा सत्य बोलने में सक्षम होते हैं। अगर वे सत्य का अनुसरण करते हैं, तो भ्रष्टता के इस पहलू को कुछ वर्ष के प्रयास से त्याग सकेंगे, और फिर उनके लिए ईमानदार बनना मुश्किल नहीं होगा।
ईमानदार लोगों के लिए परमेश्वर द्वारा अपेक्षित मानक क्या है? परमेश्वर की अपेक्षाएँ परमेश्वर के वचनों के इस अध्याय “तीन चेतावनियाँ” में किस तरह दी गई हैं? (“ईमानदारी का अर्थ है अपना हृदय परमेश्वर को अर्पित करना; किसी भी बात में परमेश्वर के प्रति झूठा न होना; हर बात में उसके साथ खुलापन रखना, कभी तथ्यों को न छुपाना; अपने से ऊपर और नीचे वालों को कभी भी धोखा न देना और ऐसी चीजें न करना जो मात्र परमेश्वर की चापलूसी करने की कोशिशें हों। संक्षेप में, ईमानदार होने का अर्थ है अपने क्रियाकलापों और शब्दों में शुद्ध होना, न तो परमेश्वर को और न ही इंसान को धोखा देना। ... यदि तुम्हारी बातें बहानों और बेकार तर्कों से भरी हैं, तो मैं कहता हूँ कि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने से घृणा करता है। यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य)।) यहाँ एक विशेष रूप से महत्वपूर्ण वाक्य है। क्या तुम लोग देख सकते हो कि वह क्या है? (परमेश्वर कहता है : “यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, और यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी।”) सही, इतना ही। परमेश्वर कहता है : “यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है।” इसका मतलब है कि लोगों ने ऐसे बहुत-से काम किए हैं जिनके बारे में वे बात करने की हिम्मत नहीं रखते, और उनके बहुत-से काले हिस्से होते हैं। उनके कोई दैनिक कार्य परमेश्वर के वचन के अनुरूप नहीं होते, और वे दैहिक इच्छाओं से विद्रोह नहीं करते। वे बस अपने मन की करते हैं, और अनेक वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद भी उन्होंने सत्य वास्तविकता में प्रवेश नहीं किया है। “यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी।” यहाँ परमेश्वर ने इंसानों को अभ्यास का मार्ग दिखाया है। अगर तुम इस प्रकार अभ्यास नहीं करते, सिर्फ नारे और धर्म-सिद्धांत चिल्लाते हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसे आसानी से उद्धार नहीं मिलेगा। यह सचमुच उद्धार से जुड़ा हुआ है। प्रत्येक व्यक्ति के लिए बचाया जाना बहुत महत्वपूर्ण है। क्या परमेश्वर ने कहीं और “आसानी से उद्धार प्राप्त न होने” का जिक्र किया है? कहीं और वह विरले ही इस बात का संदर्भ देता है कि बचाया जाना कितना मुश्किल है, लेकिन वह इसकी बात ईमानदार होने के बारे में बताते समय जरूर करता है। अगर तुम ईमानदार नहीं हो, तो तुम ऐसे व्यक्ति हो, जिसे बचाना बहुत मुश्किल है। “आसानी से उद्धार प्राप्त न होना” का अर्थ है कि अगर तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम्हारा बचाया जाना मुश्किल होगा। तुम उद्धार का सही मार्ग पकड़ने के लायक नहीं रहोगे, और इसलिए तुम्हारा बचाया जाना नामुमकिन होगा। परमेश्वर इस वाक्यांश का प्रयोग लोगों को थोड़ी छूट देने के लिए करता है। जिसका भावार्थ है : तुम्हें बचाना आसान नहीं है, लेकिन अगर तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में लाते हो तो तुम्हारे पास उद्धार पाने की आशा होती है। यह इसका दूसरा पहलू है। यदि तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास नहीं करते और तुम दूसरों के सामने अपने रहस्यों और कठिनाइयों के बारे में कभी भी खुलकर नहीं बोलते और संगति नहीं करते, न तो उनके साथ अपनी भ्रष्टता और घातक कमजोरियों पर संगति करते हो, न उनका गहन-विश्लेषण करते हो और न ही उन्हें प्रकाश में लाते हो, तो तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने या उद्धार पाने में सक्षम नहीं होगे। ऐसा क्यों है? अगर तुम इस तरह खुद को पूरी तरह प्रकट नहीं करते या अपना गहन-विश्लेषण नहीं करते, तो तुम अपने ही भ्रष्ट स्वभाव से घृणा नहीं करोगे, और इसलिए तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव कभी नहीं बदलेगा। और अगर तुम बदल ही नहीं सकते, तो बचाए जाने के बारे में सोच भी कैसे सकते हो? परमेश्वर के वचन यह साफ तौर पर दिखाते हैं, और ये वचन परमेश्वर का इरादा दर्शाते हैं। परमेश्वर हमेशा इस बात पर जोर क्यों देता है कि लोगों को ईमानदार होना चाहिए? चूँकि ईमानदार इंसान होना बहुत महत्वपूर्ण है—इसका सीधा संबंध इस बात से है कि कोई व्यक्ति परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है या नहीं और वह उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं। कुछ लोग कहते हैं : “मैं अहंकारी और आत्मतुष्ट हूँ, और मैं अक्सर क्रोधित होकर भ्रष्टता का खुलासा करता हूँ।” दूसरे कहते हैं : “मैं बहुत उथला हूँ, घमंडी हूँ, और जब लोग मेरी चापलूसी करते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है।” ये तमाम चीजें हैं जो लोगों को बाहर से दिखाई देती हैं, और ये बड़ी समस्याएँ नहीं हैं। तुम्हें इनके बारे में बोलते नहीं रहना चाहिए। तुम्हारा स्वभाव या व्यक्तित्व चाहे जैसा हो, अगर तुम परमेश्वर की अपेक्षा के अनुसार ईमानदार बन पाते हो, तो तुम्हें बचाया जा सकेगा। तो तुम सब क्या कहते हो? क्या ईमानदार इंसान होना महत्वपूर्ण है? यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है, इसीलिए परमेश्वर अपने वचनों के अध्याय “तीन चेतावनियाँ” में ईमानदार इंसान होने के बारे में बात करता है। अन्य अध्यायों में, वह अक्सर जिक्र करता है कि विश्वासियों के पास एक सामान्य आध्यात्मिक जीवन होना चाहिए या उनके पास एक उचित कलीसियाई जीवन होना चाहिए या वह वर्णन करता है कि उन्हें सामान्य मानवता के साथ कैसे जीना चाहिए। इन विषयों पर उसके वचन सामान्य हैं; उन पर विशिष्ट रूप से या बहुत विस्तार से चर्चा नहीं की गई है। लेकिन जब परमेश्वर ईमानदार इंसान होने के बारे में बोलता है, तो वह लोगों को चलने का मार्ग दिखाता है। वह लोगों को बताता है कि अभ्यास कैसे करें, और वह काफी विस्तार से और स्पष्टता से बोलता है। परमेश्वर कहता है : “यदि तुम्हारे पास ऐसे बहुत-से निजी मामले हैं जिनके बारे में बात करना मुश्किल है, यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज़ यानी अपनी कठिनाइयों के बारे में खुलकर बताना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी।” ईमानदार व्यक्ति होने का संबंध उद्धार प्राप्त करने से है। तो तुम सब क्या कहते हो, परमेश्वर लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा क्यों करता है? यह व्यक्ति को कैसा आचरण करना चाहिए इसके सत्य को छूता है। परमेश्वर ईमानदार लोगों को बचाता है, और जिन्हें वह अपने राज्य के लिए चाहता है, वे ईमानदार लोग होते हैं। अगर तुम झूठ और चालबाजी में सक्षम हो, तो तुम धोखेबाज, कुटिल और धूर्त व्यक्ति हो; तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो। अगर तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो, तो इसकी कोई संभावना नहीं है कि परमेश्वर तुम्हें बचाएगा, न ही संभवतः तुम्हें बचाया जा सकेगा। तुम कहते हो कि अब तुम बहुत धर्मनिष्ठ हो, अहंकारी या आत्मतुष्ट नहीं हो, अपना कर्तव्य करते समय कीमत चुका सकने में समर्थ हो या सुसमाचार का प्रचार कर अनेक लोगों को परिवर्तित कर सकते हो। लेकिन अगर तुम ईमानदार नहीं हो, अभी भी धोखेबाज हो, बिल्कुल नहीं बदले हो, तो क्या तुम्हें बचाया जा सकेगा? बिल्कुल नहीं। इसलिए परमेश्वर के ये वचन सभी को याद दिलाते हैं कि बचाए जाने के लिए उन्हें पहले परमेश्वर के वचनों और अपेक्षाओं के अनुसार ईमानदार व्यक्ति बनना पड़ेगा। प्रकाश का मार्ग खोजने के लिए, उन्हें खुद को खोलकर अपने भ्रष्ट स्वभावों, अपनी मंशाओं और निजी मामलों के बारे में खुलकर बताना होगा। “प्रकाश के मार्ग को खोजने” का अर्थ क्या है? इसका अर्थ है अपने भ्रष्ट स्वभाव को हल करने के लिए सत्य को खोजना। जब तुम अपने कार्यों के पीछे की अपनी भ्रष्टता, अपने लक्ष्य और इरादे खुल कर दिखा देते हो, अपना विश्लेषण भी करते हो, जिसके बाद तुम खोजते हो : “मैंने वह काम क्यों किया? क्या इसमें परमेश्वर के वचनों का कोई आधार है? क्या यह सत्य के अनुरूप है? ऐसा करके क्या मैं जानबूझकर कुछ गलत कर रहा हूँ? क्या मैं परमेश्वर को धोखा दे रहा हूँ? अगर मैं परमेश्वर को धोखा दे रहा हूँ, तो मुझे यह नहीं करना चाहिए; मुझे गौर करना चाहिए कि परमेश्वर क्या अपेक्षा रखता है, और वह क्या कहता है, और पता लगाना चाहिए कि सत्य सिद्धांत क्या हैं।” यही है सत्य को खोजने का अर्थ; प्रकाश में चलने के यही मायने हैं। जब लोग इसका नियमित रूप से अभ्यास कर पाते हैं, तभी वे सच में बदल पाते हैं, और तब वे उद्धार प्राप्त कर पाते हैं।
परमेश्वर का लोगों से ईमानदार बनने की अपेक्षा करना यह साबित करता है कि वह धोखेबाज लोगों से सचमुच अत्यधिक घृणा करता है और उन्हें नापसंद करता है। धोखेबाज लोगों के प्रति परमेश्वर की नापसंदगी उनके काम करने के तरीके, उनके स्वभावों और साथ ही उनकी मंशाओं और उनकी धोखेबाजी के साधनों के प्रति नापसंदगी है; परमेश्वर को ये सब चीजें नापसंद हैं। यदि धोखेबाज लोग सत्य स्वीकार कर पाते हैं, अपने धोखेबाज स्वभाव को मान पाते हैं और ईमानदार लोग बनने के लिए परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने को तैयार होते हैं तो उनके पास भी बचाए जाने की उम्मीद होती है, क्योंकि परमेश्वर किसी के प्रति पक्षपात नहीं करता है और न ही सत्य ऐसा करता है। और इसलिए, यदि हम परमेश्वर को प्रसन्न रखने वाले लोग बनना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों को बदलना होगा, शैतान के फलसफों के अनुसार जीना बंद करना होगा, अपना जीवन जीने के लिए झूठ बोलने और धोखा देने पर निर्भर रहना बंद करना होगा और हमें अपने सारे झूठ छोड़ने होंगे और ईमानदार लोग बनने की कोशिश करनी होगी। तब हमारे प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण बदलेगा। पहले लोग दूसरों के बीच रहते हुए हमेशा झूठ, धोखेबाजी और ढोंग पर निर्भर रहते थे और शैतान के फलसफों को अपने अस्तित्व का आधार, अपना जीवन और अपनी नींव मानकर आचरण करते थे। इससे परमेश्वर को घृणा थी। गैर-विश्वासियों के बीच यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश करते हो और सच बोलते हो, तो तुम्हें बदनाम किया जाएगा, तुम्हारी आलोचना की जाएगी और तुम्हें ठुकरा दिया जाएगा। इसलिए तुम सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हो और शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हो; तुम झूठ बोलने में अधिकाधिक कुशल होते जाते हो और अधिक से अधिक धोखेबाज होते जाते हो। तुम अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए धूर्त साधनों का उपयोग भी करते हो और इस प्रकार अपनी सुरक्षा करते हो। तुम शैतान की दुनिया में अधिकाधिक समृद्ध होते चले जाते हो और परिणामस्वरूप तुम पाप में अधिक से अधिक गहरे गिरते जाते हो और उसमें से खुद को निकाल नहीं सकते हो। परमेश्वर के घर में चीजें ठीक इसके विपरीत होती हैं। तुम झूठ बोलने और धोखेबाज होने में जितना अधिक कुशल होते हो, परमेश्वर के चुने हुए लोग तुमसे उतने ही अधिक विमुख होंगे और तुम्हें ठुकरा देंगे। यदि तुम पश्चात्ताप करने से इनकार कर देते हो, अब भी शैतान के फलसफों और तर्क से चिपके रहते हो, छद्मवेश धारण करने और मुखौटे पहनने के लिए साजिशों, चालों और परिष्कृत तरकीबों का भी इस्तेमाल करते हो तो बहुत संभव है कि तुम बेनकाब कर दिए जाओगे और हटा दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर धोखेबाज लोगों से अत्यधिक घृणा करता है। परमेश्वर के घर में केवल ईमानदार लोग फल-फूल सकते हैं और सभी धोखेबाज लोगों को अंततः ठुकरा और हटा दिया जाएगा। यह सब परमेश्वर ने बहुत पहले पूर्वनियत कर दिया है। केवल ईमानदार लोग स्वर्ग के राज्य में शामिल हो सकते हैं। यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश नहीं करोगे, सत्य का अनुसरण करने की दिशा में अनुभव प्राप्त नहीं करोगे और अभ्यास नहीं करोगे, यदि अपनी कुरूपता उजागर नहीं करोगे और यदि खुद को खोलकर पेश नहीं करोगे, तो तुम कभी भी पवित्र आत्मा का कार्य और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त नहीं कर पाओगे। चाहे तुम कुछ भी करो, या कोई भी कर्तव्य निभाओ, तुम्हारा रवैया ईमानदार होना चाहिए। ईमानदार रवैये के बिना तुम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से नहीं कर सकते। अगर तुम अपना कर्तव्य हमेशा लापरवाही से निभाते हो, तुम कुछ चीजें अच्छी तरह नहीं कर पाते और कलीसिया के काम पर इसका असर पड़ता है, तो तुम्हें आत्मचिंतन करना चाहिए, खुद को जानना चाहिए, खुलकर बोलना चाहिए, खुद को उजागर करना चाहिए और अपना गहन-विश्लेषण करना चाहिए। फिर तुम्हें सत्य सिद्धांत खोजने चाहिए और अगली बार लापरवाह होने के बजाय अच्छा काम करने की कोशिश करनी चाहिए। अगर तुम कोशिश नहीं करते, और ईमानदार हृदय से परमेश्वर को संतुष्ट नहीं करते और हमेशा अपनी देह या अपने अभिमान को संतुष्ट करने पर ध्यान देते हो, तो क्या तुम कोई अच्छा काम कर पाओगे? क्या तुम अपना कर्तव्य ठीक से कर पाओगे? यकीनन नहीं। धोखेबाज लोग अपना कर्तव्य करते समय हमेशा लापरवाह होते हैं; वे कोई भी कर्तव्य अच्छे ढंग से नहीं कर सकते और ऐसे लोगों के लिए उद्धार पाना बहुत कठिन होता है। मुझे बताओ—जब धोखेबाज लोग सत्य को अभ्यास में लाते हैं, तो क्या वे धोखा देते हैं? सत्य को अभ्यास में लाने के लिए उन्हें कीमत चुकानी होती है, अपने हितों को छोड़ना पड़ता है और दूसरों के सामने खुलकर बोलना और खुद को खोलकर रखना होता है। लेकिन वे कुछ चीजें रोक लेते हैं; बोलते समय वे आधा ही बताते हैं, और बाकी रोक लेते हैं। दूसरों को हमेशा अंदाजा लगाना होता है कि उनका अर्थ क्या है, उनकी बातों का अर्थ समझने के लिए उन्हें तार जोड़ने पड़ते हैं। वे हमेशा पैंतरेबाजी के लिए स्थान और गुंजाइश रखते हैं। जब दूसरों का ध्यान जाता है कि वे धोखेबाज हैं, तो वे उनसे कोई सरोकार नहीं रखना चाहते, और वे जो कुछ भी करते हैं, उसमें उनसे सावधान रहते हैं। वे झूठ बोलते और छल करते हैं, और दूसरे लोग उनकी बातों में सच क्या है, झूठ क्या है या वे बातें कितनी मिलावटी हैं, यह न जानने के कारण उन पर भरोसा नहीं कर सकते। वे दूसरों से किए गए अपने वायदों से अक्सर मुकर जाते हैं, और उनकी उनके दिलों में कोई जगह नहीं होती। फिर परमेश्वर के हृदय में क्या होता है? परमेश्वर उन्हें किस तरह से देखता है? परमेश्वर उनसे और भी ज्यादा घृणा करता है, क्योंकि परमेश्वर लोगों के दिलों की गहराई की पड़ताल करता है। मनुष्य सिर्फ वही देख सकते हैं जो सतह पर है, मगर परमेश्वर ज्यादा सही ढंग से, ज्यादा गहराई से और ज्यादा वास्तविकता से देखता है।
चाहे तुम जितने भी समय से विश्वासी रहे हो, तुम्हारा कर्तव्य जो भी हो या तुम जो भी काम करते हो, तुम्हारी काबिलियत ऊँची हो या नीची, तुम्हारा चरित्र अच्छा हो या बुरा, अगर तुम सत्य को स्वीकार सकते हो, और ईमानदार बनने की कोशिश करते हो, तो यकीनन तुम्हें फल मिलेगा। कुछ लोग जो ईमानदार बनने की कोशिश नहीं करते, वे सोचते हैं कि अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभा लेना ही काफी है। उनसे मैं कहता हूँ, “तुम कभी भी अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने में सक्षम नहीं होगे।” कुछ और लोग सोचते हैं कि ईमानदार व्यक्ति होना कोई बड़ी बात नहीं है, परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा करने का प्रयास करना उससे बड़ा कार्य है, और यही परमेश्वर को संतुष्ट करने का एकमात्र तरीका है। तो आगे बढ़ो और आजमा लो—देखो कि क्या ईमानदार व्यक्ति हुए बिना तुम परमेश्वर के इरादों के अनुसार सेवा कर सकते हो। दूसरे लोग ईमानदार बनने की कोशिश नहीं करते, बल्कि हर दिन प्रार्थना कर, सभाओं में समय पर जाकर परमेश्वर के वचनों को खा-पीकर और गैर-विश्वासियों की तरह न रहकर संतुष्ट हो जाते हैं। जब तक वे कानून नहीं तोड़ते या कोई बुरा काम नहीं करते, यह ठीक है। लेकिन क्या परमेश्वर को इस तरह संतुष्ट किया जा सकता है? अगर तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो तो परमेश्वर को कैसे संतुष्ट कर सकते हो? अगर तुम ईमानदार व्यक्ति नहीं हो तो सही इंसान नहीं हो। अगर तुम ईमानदार नहीं हो, तो कुटिल और धोखेबाज हो। तुम लापरवाही से काम करते हो, भ्रष्टता का खुलासा करते हो, और चाह कर भी तुम सत्य पर अमल नहीं कर पाते। ईमानदार व्यक्ति न होने पर हर चीज ठीक से नहीं होती—तुम परमेश्वर को समर्पित नहीं हो पाओगे और उसे संतुष्ट भी नहीं कर पाओगे। ईमानदारी के रवैये के बिना किए गए अपने किसी भी काम से तुम परमेश्वर को कैसे संतुष्ट कर सकते हो? अगर तुम ईमानदार रवैये के बिना अपना कर्तव्य करते हो, तो परमेश्वर को संतुष्ट कैसे कर सकते हो? क्या तुम इसे उचित ढंग से कर सकते हो? तुम हमेशा अपनी देह और अपनी संभावनाओं के बारे में सोचते रहते हो, तुम हमेशा कम दैहिक कष्ट सहना चाहते हो, कम अर्पित करना चाहते हो, और कम कीमत चुकाना चाहते हो। तुम हमेशा कुछ रोककर रखते हो। यह धोखेबाजी का रवैया है। परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के मामले में भी कुछ लोग अपने लिए जोड़ते-घटाते हैं। वे कहते हैं : “मुझे भविष्य में आराम से रहना है। अगर परमेश्वर का कार्य कभी खत्म न हुआ तो क्या होगा? मैं नहीं जानता कि परमेश्वर का दिन कब आएगा। इससे पहले कि मैं अपना कर्तव्य करूँ, मुझे अपने पारिवारिक जीवन के लिए और अपना रास्ता निकालने की खातिर व्यवस्थाएँ करने के लिए जोड़-तोड़ करना होगा।” क्या ऐसा सोचने वाले बहुत-से लोग हैं? जब कोई अपने लिए जोड़ता-घटाता और आकस्मिकता की योजनाएँ बनाता है, तो यह कैसा स्वभाव होता है? क्या ये लोग परमेश्वर के लिए वफादार हैं? क्या ये लोग ईमानदार हैं? अपने लिए जोड़-तोड़ करना और आकस्मिकता की योजनाएँ बनाना परमेश्वर के साथ एकदिल होना नहीं है, यह एक धोखेबाज स्वभाव है। ऐसा करने वाले लोग धोखेबाज स्वभाव के आधार पर काम करते हैं और जिस रवैये से वे परमेश्वर के साथ पेश आते हैं वह यकीनन ईमानदार रवैया नहीं है। कुछ लोग डरते हैं कि उनसे बातचीत या मिलने-जुलने के दौरान भाई-बहन उनकी असलियत जान लेंगे और कहेंगे कि उनका आध्यात्मिक कद छोटा है और वे उन्हें नीची नजर से देखेंगे। इसलिए बोलते समय वे हमेशा यह छाप छोड़ने की कोशिश करते हैं कि वे बहुत जोशीले हैं, कि वे परमेश्वर के लिए लालायित हैं, और सत्य का अभ्यास करने की उनकी तीव्र इच्छा है। लेकिन भीतर से वे वास्तव में बेहद कमजोर और निराश होते हैं। वे शक्तिशाली होने का ढोंग करते हैं ताकि कोई उनकी असलियत न जान सके। यह भी धोखेबाजी है। संक्षेप में, जीवन में या किसी कर्तव्य के निर्वहन में तुम जो भी करते हो, अगर तुम चीजों के बारे में झूठ बोलते हो और दिखावा करते हो या दूसरों को गुमराह करने या धोखा देने के लिए मुखौटा लगाते हो और इस प्रकार दूसरे लोगों से अपना आदर और आराधना करवाते हो या ऐसा करते हो कि वे तुम्हें हेय दृष्टि से न देखें, तो यह सब धोखेबाजी ही है। कुछ महिलाएँ अपने पतियों से बहुत प्यार करती हैं, जबकि असल में उनके पति राक्षस और छद्म-विश्वासी हैं। भाई-बहनों के यह कहने के डर से कि उसकी भावनाएँ बहुत गहरी हैं, ऐसी महिला खुद सबसे पहले कह देती है : “मेरा पति दानव है।” लेकिन उसके दिल में यह बात होती है : “मेरा पति नेक इंसान है।” पहले वाले बोल उसके होंठों से जरूर निकले थे, मगर वे सिर्फ दूसरों के सुनने के लिए थे, ताकि वे समझें कि वह अपने पति का भेद पहचानती है। दरअसल उसकी बात का अर्थ है : “रुको, मुझे उजागर मत करो। मैं पहले ही यह विचार व्यक्त कर दूँगी ताकि तुम लोगों को इसका जिक्र न करना पड़े। मैंने पहले ही अपने पति का दानव रूप उजागर कर दिया है, तो इसका अर्थ है कि मैंने अपनी भावनाओं को त्याग दिया है और तुम लोगों के पास इस बारे में कहने को कुछ नहीं बचेगा।” क्या यह कपटी होना नहीं है? क्या यह एक मुखौटा नहीं है? यह मुखौटा लगाकर लोगों को धोखा देना और गुमराह करना है। तुम हर मोड़ पर खेल खेल रहे हो, चालें चल रहे हो, ताकि दूसरे जो देखें वह तुम्हारा मुखौटा हो, असली चेहरा नहीं। यह धूर्तता है; यह इंसान की धोखेबाजी है। चूँकि तुमने मान लिया है कि तुम्हारा पति एक दानव है तो फिर तुम उससे तलाक क्यों नहीं ले लेती हो? उस दानव, उस शैतान को ठुकरा क्यों नहीं देती हो? यह कह कर भी कि तुम्हारा पति दानव है, तुम अपना जीवन उसके साथ बिताए जा रही हो—यह दर्शाता है कि तुम्हें दानव पसंद हैं। तुम अपने मुँह से कहती हो कि वह दानव है, मगर दिल से यह स्वीकार नहीं करती हो। इसका अर्थ है कि तुम दूसरों को धोखा दे रही हो, उनकी आँखों में धूल झोंक रही हो। इससे यह भी पता चलता है कि दानवों के साथ तुम्हारी साँठ-गाँठ है, तुम उन्हें बचा रही हो। अगर तुम सत्य का अभ्यास कर सकने वाली होतीं तो यह मानते ही कि तुम्हारा पति राक्षस है तुम उसे तलाक दे देती। तब तुम गवाही दे पाती, और इससे यह जाहिर होता कि तुम अपने और राक्षस के बीच साफ सीमा रेखा खींच रही थी। लेकिन दुर्भाग्य से तुम न केवल वह सीमा रेखा खींचने में असफल रही हो, बल्कि एक दानव के साथ अपने दिन गुजार रही हो, और भाई-बहनों को झूठ और चालबाजी से गुमराह कर रही हो। इससे साबित होता है कि तुम राक्षस की ही श्रेणी में आती हो, एक और झूठ बोलने वाली दानव हो। कहते हैं कि महिला जिस पुरुष से शादी करे उसके पीछे चले, चाहे वह मुर्गा हो या कुत्ता। चूँकि तुमने एक राक्षस से शादी की और कभी उससे मुँह नहीं मोड़ा, तो इससे साबित होता है कि तुम भी एक दानव हो। तुम राक्षस की हो, मगर यह साबित करने के लिए कि तुम परमेश्वर की हो, तुम अपने पति को राक्षस बताती हो—क्या यह झूठ बोलने और धोखा देने की चाल नहीं है? तुम्हें सत्य अच्छी तरह मालूम है, लेकिन फिर भी दूसरों की आँखों में धूल झोंकने के लिए ऐसे उपाय इस्तेमाल करती हो। यह धूर्तता है; धोखेबाजी है। तमाम धूर्त और धोखेबाज लोग पूरी तरह से दानव होते हैं।
सब में भ्रष्ट स्वभाव होता है। अगर तुम आत्मचिंतन करो तो तुम्हें कुछ ऐसी दशाएँ और अभ्यास साफ दिखेंगे जिनमें तुम दूसरों पर नकली छाप छोड़ते हो या धोखेबाजी से पेश आते हो; तुम सभी के ऐसे दौर होते हैं जब तुम दिखावा करते हो या पाखंडी हो जाते हो। कुछ लोग कहते हैं : “फिर मेरा ध्यान क्यों नहीं गया? मैं एक निष्कपट व्यक्ति हूँ। मुझे इस दुनिया में बहुत डराया-धमकाया गया है, ठगा गया है, और मैंने एक बार भी धोखा नहीं किया। मैं बस अपने दिल की बात कहता हूँ।” इससे अभी भी यह साबित नहीं होता कि तुम ईमानदार हो। संभव है तुम बस नासमझ हो, ज्यादा शिक्षित नहीं हो, या हो सकता है समूहों में तुम आसानी से धकियाए जाते हो, या संभव है तुम अपने कार्यों में विवेकहीन, अक्षम और कायर हो, जिसके पास कम कौशल है, और तुम समाज के निचले तबके से हो—फिर भी इसका यह अर्थ नहीं है कि तुम ईमानदार हो। एक ईमानदार व्यक्ति वह है जो सत्य को स्वीकार कर सकता है, जिसमें न्याय की भावना है, जिसमें सामान्य मानवता है। एक ईमानदार व्यक्ति कोई दयनीय व्यक्ति या निकम्मा नहीं है, बेवकूफ तो बिल्कुल भी नहीं है और न ही यह किसी निष्कपट व्यक्ति को संदर्भित करता है। तुम लोगों को इसकी असलियत देखने में सक्षम होना चाहिए। मैं अक्सर कुछ लोगों को यह कहते हुए सुनता हूँ, “मैं कभी झूठ नहीं बोलता—हमेशा मुझे ही छला जाता है। बाहर की दुनिया में हमेशा लोग मुझ पर धौंस जमाते हैं। परमेश्वर ने कहा था कि वह जरूरतमंदों को घूरे से उठाता है और मैं उन्हीं लोगों में से एक हूँ। यह परमेश्वर का अनुग्रह है। परमेश्वर हम जैसे लोगों पर तरस खाता है, ऐसे निष्कपट लोग जिनका समाज में स्वागत नहीं किया जाता। यह सचमुच परमेश्वर की दया है!” तुम्हारा यह पहचानना सही है कि परमेश्वर जरूरतमंदों को घूरे से उठाता है, लेकिन यह साबित नहीं करता कि तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो। तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश करनी चाहिए। वास्तव में, कुछ लोग बस मूर्ख, बेवकूफ होते हैं—वे बस जड़बुद्धि होते हैं। उनमें बिल्कुल भी कोई कौशल नहीं होता, उनकी काबिलियत खराब होती है और वे सत्य को बिल्कुल नहीं समझते। उस तरह के व्यक्ति का उन ईमानदार लोगों से बिल्कुल भी कोई संबंध नहीं है जिनके बारे में परमेश्वर बात करता है। यह सच है कि परमेश्वर जरूरतमंदों को घूरे से उठाता है, लेकिन मूर्खों और बेवकूफों को नहीं उठाया जाता। तुम्हारी काबिलियत सहज ही बहुत कम है, और तुम बेवकूफ हो, नाकारा हो, और हालाँकि तुम एक गरीब परिवार में पैदा हुए थे, और समाज के निचले तबके के सदस्य हो, फिर भी तुम परमेश्वर के उद्धार का लक्ष्य नहीं हो। सिर्फ इसलिए कि तुमने बहुत कष्ट सहे हैं और समाज में भेदभाव झेले हैं, सिर्फ इसलिए कि सभी लोगों ने तुम पर धौंस जमाई है और तुम्हें छला है, यह मत सोचो कि इससे तुम ईमानदार व्यक्ति बन जाते हो। अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो बड़ी गलतफहमी में हो। क्या लोगों में इस बारे में कुछ गलतफहमियाँ या विकृत समझ है कि ईमानदार व्यक्ति कौन होता है? क्या इस संगति से तुम लोगों को थोड़ी स्पष्टता मिली है? ईमानदार व्यक्ति होने का मतलब सीधी बात करने वाला नहीं होता, जो गोल-मोल बातें करने से दूर रहता है, जैसा कि लोग सोचते हैं कि ऐसा होता है। हो सकता है कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से स्पष्टवादी हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वह चालबाजी या धोखा नहीं करता। सभी भ्रष्ट लोगों का स्वभाव भ्रष्ट होता है, जो कपटी और धोखेबाज होता है। जब लोग इस दुनिया में शैतान के प्रभाव में जीते हैं, उसकी शक्ति से शासित और नियंत्रित होते हैं, तो उनके लिए ईमानदार होना नामुमकिन हो जाता है। वे सिर्फ और ज्यादा धोखेबाज बन सकते हैं। इस भ्रष्ट मानवजाति के बीच जीते हुए एक ईमानदार व्यक्ति होने में वास्तव में बहुत-सी मुश्किलें होती हैं, साथ ही अविश्वासियों, दानव राजाओं और जीते-जागते राक्षसों द्वारा मजाक उड़ाया जाता है, बदनाम किया जाता है, आलोचना की जाती है और बहिष्कृत किया और खदेड़ा तक जाता है। तो क्या इस दुनिया में ईमानदार व्यक्ति बनकर जीवित रहना संभव है? क्या इस दुनिया में हमारे लिए जीवित रहने की कोई गुंजाइश है? हाँ, है। हम यकीनन जीवित रह सकते हैं। परमेश्वर ने हमें पूर्वनियत किया और चुना है और वह निश्चित रूप से हमारे लिए एक रास्ता खोल देता है। हम पूरी तरह परमेश्वर के मार्गदर्शन के तहत उसमें विश्वास और उसका अनुसरण करते हैं और हम पूरी तरह से उसकी दी हुई साँस और जीवन के द्वारा जीते हैं। चूँकि हमने परमेश्वर के वचनों का सत्य स्वीकार कर लिया है, इसलिए हमारे पास इस बात के नए नियम हैं कि हम कैसे जिएँ और हमारे पास अपने जीवन के लिए नए लक्ष्य हैं। हमारे जीवन की बुनियादें बदल चुकी हैं। सिर्फ सत्य हासिल करने और बचाए जाने की खातिर हमने जीने का नया तरीका और आचरण का नया तरीका अपना लिया है। यानी, हमने जीने का एक नया तरीका अपना लिया है : हम अपने कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए जीते हैं। इसका इन बातों से बिल्कुल भी लेना-देना नहीं है कि हम क्या खाते हैं, क्या पहनते हैं और कहाँ रहते हैं; यही वह चीज है जिसकी जरूरत हमारे दिलों को है। बहुत-से लोगों को लगता है कि ईमानदार होना बेहद मुश्किल है। इसका एक भाग यह है कि भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकना बहुत कठिन होता है। इसके ऊपर अगर तुम गैर-विश्वासियों के बीच जी रहे हो—खासतौर से अगर तुम उनके साथ काम कर रहे हो—तो ईमानदार होने और सत्य बोलने से तुम्हारी हँसी उड़ाई जा सकती है, बदनामी हो सकती है, अनुचित मूल्यांकन किया जा सकता है, यहाँ तक कि तुम्हें बहिष्कृत कर खदेड़ा जा सकता है। यह हमारे जीवित रहने के लिए चुनौतियाँ खड़ी करता है। बहुत-से लोग कहते हैं : “ईमानदार होना व्यवहार्य नहीं है। अगर मैंने दो-टूक बातें कीं, तो घाटे में रहूँगा, और झूठ बोले बिना मेरा कोई भी काम नहीं हो पाएगा।” यह कैसा नजरिया है? धोखेबाज व्यक्ति का यही नजरिया और तार्किकता है। वे अपनी हैसियत और हितों को बचाने के लिए पूरी तरह झूठी और धूर्त बातें करते हैं। वे उन चीजों को खो देने के डर से ईमानदार बनने और सत्य बोलने को तैयार नहीं होते। पूरी भ्रष्ट मानवजाति ऐसी ही है। वे चाहे जितने ज्ञानी हों, उनकी हैसियत चाहे जितनी ऊँची या नीची हो, वे सरकारी अधिकारी हों या आम नागरिक, वे सेलेब्रिटी हों या औसत आदमी, सबके-सब निरंतर झूठ बोलते और धोखा देते हैं, और कोई भी भरोसेमंद नहीं है। अगर लोग इन भ्रष्ट स्वभावों का समाधान नहीं करते हैं, हर समय झूठ बोलना और धोखा देना जारी रखते हैं और कपटी स्वभाव से भरे हैं तो क्या वे इस तरह परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हासिल कर सकते हैं? क्या वे परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं।
क्या तुम लोगों को लगता है कि ईमानदार होना बहुत कठिन है? क्या तुम लोगों ने कभी इसको अभ्यास में लाने की कोशिश की है? किन मामलों में तुम लोगों ने ईमानदार बनने का अभ्यास और अनुभव किया है? तुम लोगों के अभ्यास किन सिद्धांतों पर आधारित थे? फिलहाल तुम लोगों को इसका किस स्तर का अनुभव है? क्या तुम उस मुकाम पर पहुँच गए हो जहाँ तुम बुनियादी रूप से ईमानदार व्यक्ति हो? अगर तुमने यह हासिल कर लिया है, तो बहुत बढ़िया! परमेश्वर के वचनों से हम देख पाएँगे कि हमें बचाने और परिवर्तित करने के लिए वह सिर्फ आने वाले दिनों की बानगी दिखाने के लिए थोड़ा कार्य नहीं करता, या भविष्य की संभावना दिखाने के लिए कार्य नहीं करता है, जिसके बाद उसका कार्य समाप्त हो जाता है। न ही वह लोगों के बाहरी व्यवहार को बदलता है। इसके बजाय वह प्रत्येक व्यक्ति को उसके अंतरतम की गहराई, उसके स्वभावों और उसके सार से शुरू करके स्रोत पर ही परिवर्तित कर बदलना चाहता है। यह देखते हुए कि परमेश्वर इस तरह कार्य करता है, हमें खुद से कैसे पेश आना चाहिए? हम जिसका अनुसरण करते हैं, अपने स्वभाव में जो परिवर्तन चाहते हैं और जो कर्तव्य हमें निभाने चाहिए, उनकी जिम्मेदारी हमें लेनी चाहिए। हमें अपने हर काम और व्यवहार को गंभीरता से करना चाहिए, चीजों को फिसलने नहीं देना चाहिए, और हर बात को गहन-विश्लेषण के लिए प्रस्तुत करना चाहिए। जब भी तुम कोई काम पूरा करो, भले ही तुम यह सोचो कि इसे सही ढंग से किया गया है, यह जरूरी नहीं कि वह सत्य के अनुरूप हो। परमेश्वर के वचनों के अनुसार इसका गहन-विश्लेषण, तुलना और पुष्टि होनी चाहिए, और इसका भेद पहचानना भी आवश्यक है। इस तरह यह स्पष्ट हो जाएगा कि यह सही था या गलत। इसके अलावा जो काम तुम्हारे अनुसार तुमने गलत किए थे, उनका भी गहन-विश्लेषण होना चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि भाई-बहन साथ में संगति करते हुए, खोजते हुए, और एक-दूसरे की मदद करते हुए ज्यादा वक्त बिताएँ। तुम जितनी संगति करोगे, तुम्हारा दिल उतना ही उजला होगा, और तुम सत्य सिद्धांतों को उतना ही ज्यादा समझोगे। यह परमेश्वर का आशीष है। दूसरों पर अच्छी छाप छोड़ने की आशा और इस चाह से कि वे तुम्हारे बारे में ऊँची राय रखें और तुम्हारी हँसी न उड़ाएँ, तुममें से कोई भी अपना दिल न खोले और तुम सब खुद को छिपाए रखो, तो तुम सच्चे विकास का अनुभव नहीं करोगे। अगर तुम हमेशा भेस बदले रहोगे और संगति में खुल कर पेश नहीं होगे, तो तुम्हें पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता नहीं मिलेगी, तुम सत्य को नहीं समझ पाओगे। फिर नतीजा क्या होगा? तुम सदा के लिए अँधेरे में जिओगे, और तुम्हें बचाया नहीं जाएगा। अगर तुम सत्य प्राप्त करना चाहते हो, और अपना स्वभाव बदलना चाहते हो, तो तुम्हें सत्य हासिल कर उसका अभ्यास करने की कीमत चुकानी होगी, तुम्हें दिल खोलकर दूसरों के साथ संगति करनी होगी। यह तुम्हारे जीवन प्रवेश और स्वभाव परिवर्तन, दोनों के लिए लाभकारी है। सभाओं में अपनी अनुभवजन्य समझ की चर्चा करने से तुम्हें और दूसरों को लाभ होता है। अगर तुममें से कोई भी अपने आत्मज्ञान या अपनी अनुभवजन्य समझ के बारे में बात न करे; अगर तुममें से कोई भी अपना गहन-विश्लेषण न करे या खुले नहीं; अगर तुम सब शब्द और धर्म-सिद्धांत शानदार ढंग से बोलते हो, पर तुममें से कोई भी अपने बारे में अपनी समझ साझा न करे, और तुममें से कोई भी तुम्हें प्राप्त हुए थोड़े-से आत्मज्ञान को सामने लाने का साहस न करे, तो इसका क्या नतीजा होगा? तुम सब इकट्ठा होकर कुछ विनम्र और हल्की-फुल्की बातें करोगे, एक-दूसरे की चापलूसी और तारीफ करोगे, नकली बातें कहोगे। “वाह, कुछ वक्त से तुम बहुत अच्छे हो गए हो। तुमने कुछ बदलाव किए हैं!” “तुमने हाल में बड़ी अच्छी आस्था दिखाई है!” “तुममें बड़ा जुनून है!” “तुमने खुद को मुझसे बहुत ज्यादा खपाया है।” “तुम्हारे चढ़ावे मुझसे ज्यादा हैं!” ऐसी ही स्थिति बनती है। सभी लोग एक-दूसरे की तारीफ और चापलूसी करते हैं और कोई भी अपना असली चेहरा गहन-विश्लेषण के लिए पेश नहीं करता, ताकि सभी लोग उसका भेद पहचान सकें और समझ सकें। क्या ऐसे माहौल में कोई सच्चा कलीसियाई जीवन हो सकता है? नहीं, नहीं हो सकता। कुछ लोग कहते हैं : “मैंने कई वर्षों तक कलीसियाई जीवन जिया है। मैं हमेशा तृप्त रहा, और मुझे मजा आया। सभाओं में सभी भाई-बहन परमेश्वर से प्रार्थना करना और उसके गुणगान में भजन गाना पसंद करते हैं। प्रार्थनाओं और भजनों से सबकी आँखों में आँसू आ जाते हैं। कभी-कभी चीजें बहुत ज्यादा भावुक हो जाती हैं, और हम सब तप कर पसीना-पसीना हो जाते हैं। भाई-बहन नाचते-गाते हैं; यह बहुत समृद्ध, रंगारंग कलीसियाई जीवन है, और बहुत मजा आता है। यह सचमुच पवित्र आत्मा के कार्य का मूर्त रूप है! इसके बाद हम परमेश्वर के वचन खाते-पीते हैं, और हमें लगता है कि परमेश्वर के वचन सीधे हमारे दिल को छू रहे हैं। हम जब भी संगति करते हैं, सभी सचमुच जोश में होते हैं।” कुछ वर्षों का इस प्रकार का कलीसियाई जीवन सभी के लिए सचमुच आनंद देने वाला होता है, मगर इससे मिलता क्या है? शायद ही कोई वास्तव में सत्य वास्तविकता में प्रवेश करता है, और शायद ही कोई परमेश्वर की गवाही के अपने अनुभव बयान कर पाता है। उनमें परमेश्वर के वचन पढ़ने, नाचने-गाने के लिए बड़ी ऊर्जा होती है, लेकिन जब सत्य पर संगति करने का वक्त आता है, तो कुछ लोग दिलचस्पी खो देते हैं। कोई भी ईमानदार व्यक्ति बनने के अपने अनुभव की चर्चा नहीं करता; कोई भी अपना गहन-विश्लेषण नहीं करता और कोई भी दूसरों के जानने देने, भेद पहचानने देने, उनके लाभ और उन्नति के लिए अपने भ्रष्ट स्वभाव को खोलकर नहीं रखता है। कोई भी परमेश्वर का गुणगान करने के लिए अपनी वास्तविक अनुभवजन्य गवाही पर संगति नहीं करता। कलीसियाई जीवन के अनेक वर्ष ऐसे ही नाचते-गाते, खुश होते, मजे करते व्यर्थ हो जाते हैं। तुम लोग मुझे बताओ : यह खुशी और मजा कहाँ से आता है? मैं कहूँगा कि यह वह नहीं है जो परमेश्वर देखना चाहता है या जिससे उसे संतोष मिलता है, क्योंकि वह लोगों के जीवन स्वभावों में बदलाव और लोगों को सत्य वास्तविकता जीते हुए देखना चाहता है। परमेश्वर इसे वास्तविकता में देखना चाहता है। वह नहीं चाहता कि सभाओं में होने पर या भावुक महसूस करने पर तुम अपनी भजन संहिता पकड़े उसके गुणगान में नाचो-गाओ—वह यह नहीं देखना चाहता। इसके विपरीत परमेश्वर यह देखकर दुखी, पीड़ित और बेचैन हो जाता है, क्योंकि उसने हजारों-लाखों वचन बोले हैं, लेकिन एक भी व्यक्ति ने उसे सचमुच आगे नहीं बढ़ाया है, नहीं जिया है। यही चीज है जिससे परमेश्वर चिंतित है। तुम लोग अपने कलीसियाई जीवन से मिली थोड़ी शांति और खुशी से अक्सर आत्मतुष्ट और संतुष्ट हो जाते हो। तुम परमेश्वर का गुणगान करते हो, थोड़ी खुशी, आराम का झोंका या आध्यात्मिक तृप्ति पा लेते हो, और यकीन कर लेते हो कि तुमने अपनी आस्था पर अच्छा अमल किया है। तुम इन्हें पूँजी के रूप में लेकर, परमेश्वर में आस्था का सबसे बड़ा लाभ मानकर, इन भ्रमों से चिपके रहते हो और अपने जीवन स्वभाव में बदलाव और उद्धार के मार्ग में प्रवेश के स्थान पर इन्हें स्वीकार लेते हो। इस तरह तुम सोचते हो कि तुम्हें सत्य का अनुसरण करने और एक ईमानदार व्यक्ति बनने का प्रयास करने की जरूरत नहीं है। आत्मचिंतन करने या अपनी समस्याओं का गहन-विश्लेषण करने या परमेश्वर के वचनों पर अभ्यास कर उनका अनुभव करने की कोई जरूरत नहीं है। अब यह बात खतरनाक होती जा रही है। अगर लोग इसी तरह चलते रहे; अगर परमेश्वर का कार्य समाप्त होने के करीब पहुँचने तक भी वे ईमानदार लोग नहीं बने हैं या अपना कर्तव्य इस तरह नहीं निभा पाए हैं जो मानक-स्तरीय हो; अगर उन्होंने परमेश्वर के प्रति सच्चा समर्पण हासिल नहीं किया है और वे अभी भी मसीह-विरोधियों से गुमराह और नियंत्रित हो सकते हैं; अगर वे शैतान के प्रभाव से नहीं बचे हैं; अगर उन्होंने परमेश्वर द्वारा उनसे की गई इन माँगों को पूरा नहीं किया है तो वे ऐसे लोग नहीं हैं जिन्हें परमेश्वर बचाएगा। इसीलिए परमेश्वर चिंतित है।
नई-नई आस्था रखने पर लोग हमेशा उत्साहित रहते हैं। सत्य पर परमेश्वर की संगति सुनते समय वे खास तौर पर सोचते हैं : “अब मुझे सत्य की समझ है। मुझे सच्चा मार्ग मिल गया है। मैं सचमुच खुश हूँ!” प्रत्येक दिन नव वर्ष या शादी का उत्सव मनाने जितना उल्लासमय लगता है; वे हर दिन किसी के सभा आयोजित करने या संगति करने की बाट जोहते हैं। लेकिन कुछ वर्ष बाद कुछ लोग कलीसिया के जीवन में अपना उत्साह खो देते हैं, परमेश्वर में विश्वास रखने में भी उत्साह खो देते हैं। ऐसा क्यों होता है? ऐसा इसलिए होता है क्योंकि उन्हें परमेश्वर के वचनों और सत्य की सिर्फ सतही, सैद्धांतिक समझ होती है। उन्होंने सच में परमेश्वर के वचनों में प्रवेश नहीं किया होता है, या व्यक्तिगत रूप से उनकी वास्तविकता का अनुभव नहीं किया होता है। जैसे परमेश्वर कहता है, बहुत-से लोग दावत में शानदार भोजन को देखते हैं, मगर उनमें से ज्यादातर लोग नजर मारने ही आते हैं। वे परमेश्वर द्वारा दिया गया स्वादिष्ट भोजन उठाकर खाते नहीं, स्वाद नहीं लेते और अपने शरीरों को फिर से पोषित नहीं करते। परमेश्वर इसी बात से घृणा करता है, उसे इसी से चिंता होती है। क्या तुम लोग फिलहाल इसी दशा में नहीं हो? (हाँ।) मैं तुम सब लोगों की मदद करने के लिए तुम्हारे साथ अक्सर संगति करता हूँ। मुझे सबसे ज्यादा चिंता इस बात से होती है कि धर्मोपदेश सुनने और अपनी आध्यात्मिक जरूरतें पूरी होने के बाद तुम उन्हें अभ्यास में लाने के लिए कुछ नहीं करोगे और उनके बारे में और कुछ नहीं सोचोगे। ऐसी स्थिति में मेरा कहा सब कुछ बेकार चला जाएगा। किसी में चाहे जैसी भी काबिलियत हो, तुम दो या तीन वर्ष की आस्था के बाद यह बताने में सक्षम होगे कि क्या वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है। अगर वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है, तो देर-सवेर वह उसका अनुसरण करेगा; अगर वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम नहीं करता, तो वह ज्यादा समय नहीं टिकेगा, और उसका खुलासा कर हटा दिया जाएगा। क्या तुम लोग वास्तव में सत्य के प्रेमी हो? क्या तुम लोग ईमानदार बनने को तैयार हो? क्या तुम लोग भविष्य में बदलाव कर पाओगे? इस संगति के बाद इसका कितना अंश तुम लोग व्यक्तिगत रूप से लागू करोगे? वास्तव में इनमें से कितनों के नतीजे तुम लोगों को मिलेंगे? यह सब अज्ञात है; इसका खुलासा अंत में होगा। इसका इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि आस्था में नया होने पर कोई कितना उत्साहित है, या वह कितने कष्ट सह सकता है। अहम यह है कि वह सत्य से प्रेम करता है या नहीं, वह सत्य को स्वीकार कर सकता है या नहीं। सिर्फ सत्य के प्रेमी ही कोई धर्मोपदेश सुनने के बाद उस पर मनन करेंगे। सिर्फ वे ही चिंतन करेंगे कि परमेश्वर को सचमुच समर्पित होने के लिए परमेश्वर के वचनों को कैसे अभ्यास में लाएँ, उनका अनुभव कैसे करें, अपने वास्तविक जीवन में उन्हें कैसे लागू करें और परमेश्वर के वचनों की सत्य वास्तविकता को कैसे जिएँ। इसीलिए जो सत्य से प्रेम करते हैं, वे अंततः सत्य को प्राप्त करेंगे। जो सत्य से प्रेम नहीं करते वे शायद सच्चे मार्ग को स्वीकार कर लेंगे; हर दिन इकट्ठे होकर धर्मोपदेश सुन लेंगे और कुछ सिद्धांत सीख लेंगे, लेकिन तकलीफ या परीक्षणों का सामना होते ही वे नकारात्मक और कमजोर हो जाएँगे और शायद अपनी आस्था भी छोड़ देंगे। विश्वासियों के तौर पर तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर पाओगे या नहीं, यह सत्य के प्रति तुम्हारे रवैये और तुम्हारे अनुसरण के लक्ष्य पर निर्भर करता है : क्या वास्तव में यह सत्य को तुम्हारे जीवन के रूप में प्राप्त करना है या नहीं। कुछ लोग दूसरों की मदद करने, परमेश्वर की सेवा करने या कलीसिया की अच्छे ढंग से अगुआई करने के लिए खुद को सत्य से लैस करते हैं। यह बुरा नहीं है और इसका अर्थ यह है कि वो लोग कुछ बोझ उठाते हैं। लेकिन अगर वे अपने जीवन प्रवेश या सत्य के अभ्यास पर ध्यान केंद्रित नहीं करते, और वे समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य नहीं खोजते, तो क्या वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? यह असंभव होगा। अगर उनके पास सत्य वास्तविकता नहीं है तो वे दूसरों की मदद कैसे करेंगे? वे परमेश्वर की सेवा कैसे करेंगे? क्या वे कलीसिया का कार्य अच्छे ढंग से कर पाएँगे? यह भी नामुमकिन होगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कितने धर्मोपदेश सुने हैं, या तुमने कौन-सा पथ चुना है। मैं तुम लोगों के साथ सही नजरिया साझा करूँगा : तुम चाहे जो भी कर्तव्य निभाओ, तुम अगुआ हो या नियमित अनुयायी, तुम्हें मुख्य रूप से परमेश्वर के वचनों पर मेहनत करनी चाहिए। तुम्हें उन्हें पढ़ना चाहिए, और सच्चाई से उन पर विचार करना चाहिए। तुम्हें सबसे पहले उन सभी सत्यों की समझ हासिल करनी होगी जो तुम्हें जानने और जिनका अभ्यास करने की जरूरत है; खुद को उनकी कसौटी पर कसो और अपने लिए उन्हें लागू करो। तुमने तब तक कोई सत्य प्राप्त नहीं किया होता जब तक तुम उसे पहले समझ कर वास्तविकता में प्रवेश नहीं कर लेते। अगर तुम दूसरों को हमेशा वह सिद्धांत समझाते हो जिसे तुम समझते हो, मगर तुम उसे अभ्यास में नहीं ला पाते या उसका अनुभव नहीं कर पाते, तो यह एक भटकाव है—यह बेवकूफी और अज्ञानता है। तुम्हें परमेश्वर के वचनों पर सत्य के रूप में अभ्यास और अनुभव करना चाहिए, धीरे-धीरे बहुत सारे सत्य समझ आने लगेंगे। तब तुम्हें अपने कर्तव्य में बेहतर से बेहतर नतीजे मिलने लगेंगे, और तुम्हारे पास साझा करने के लिए अनेक अनुभवजन्य गवाहियाँ होंगी। इस तरह परमेश्वर के वचन तुम्हारा जीवन बन जाएँगे। तुम निश्चित रूप से अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाओगे, और तुम परमेश्वर का दिया हुआ आदेश पूरा कर सकोगे। अगर तुम हमेशा इन वचनों की कसौटी पर दूसरों को कसने की कोशिश करोगे, दूसरों पर लागू करोगे, या अपने काम में पूँजी की तरह इस्तेमाल करोगे, तो तुम मुसीबत में फँस जाओगे। ऐसा करके तुम ठीक पौलुस वाला रास्ता ही अपना रहे हो—पूरी तरह से। चूँकि यह तुम्हारा नजरिया है, इसलिए तुम यकीनन इन वचनों को धर्म-सिद्धांत के रूप में, सिद्धांत के रूप में ले रहे हो, और तुम भाषण देने और काम करवाने के लिए इन सिद्धांतों का इस्तेमाल करना चाहते हो। यह बहुत खतरनाक है—यह वही चीज है जो नकली अगुआ और मसीह-विरोधी करते हैं। अगर तुम अपनी दशा को परमेश्वर के वचनों के अनुसार देखते हो, पहले विचार कर खुद की समझ हासिल करते हो और फिर सत्य को अभ्यास में लाते हो, तो तुम्हें फल मिलेगा और तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश करोगे। तभी तुम अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने के योग्य होगे और तुम्हारे पास आध्यात्मिक कद होगा। अगर तुम्हारे पास परमेश्वर के कार्य और उसके वचनों का वास्तविक अनुभव नहीं है; अगर तुम्हारे पास कोई भी जीवन प्रवेश नहीं है, और तुम सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का पाठ ही कर सकते हो, तो तुम काम करोगे भी तो आँखें बंद करके करोगे, और तुम्हें कुछ भी ठोस हासिल नहीं होगा। आखिरकार तुम एक नकली अगुआ और मसीह-विरोधी बन जाओगे, और तुम्हें हटा दिया जाएगा। अगर तुम सत्य का कोई पहलू समझते हो, तो तुम्हें पहले तुलना के लिए खुद को उसकी कसौटी में कस कर अपने जीवन में उसे लागू करना चाहिए, ताकि वह तुम्हारी वास्तविकता बन जाए। तब तुम यकीनन कुछ हासिल करोगे और बदल पाओगे। अगर तुम्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन अच्छे हैं, सत्य हैं और उनमें वास्तविकता है, मगर तुम अपने दिल में सत्य पर चिंतन नहीं करते या उसे समझने की कोशिश नहीं करते, न ही अपने व्यावहारिक जीवन में अभ्यास कर उसका अनुभव करते हो, और इसके बजाय बस उसे एक नोटबुक में लिख कर छोड़ देते हो, तो तुम कभी भी न तो सत्य को समझ पाओगे न ही हासिल कर पाओगे। परमेश्वर के वचन पढ़ने या धर्मोपदेश और संगति सुनने पर तुम्हें उन पर चिंतन कर खुद को उनकी कसौटी पर कसना चाहिए, उन्हें अपनी दशा से जोड़ना चाहिए, और अपनी समस्याओं को सुलझाने के लिए उनका इस्तेमाल करना चाहिए। वचनों को सिर्फ इस तरह लागू करके ही तुम सचमुच में उनसे कुछ प्राप्त कर सकते हो। क्या किसी धर्मोपदेश को सुनने के बाद तुम लोग इसी तरह अभ्यास करते हो? अगर नहीं करते, तो न परमेश्वर और न ही उसके वचन तुम लोगों के जीवन में हैं, और अपने विश्वास में तुम लोगों के पास कोई वास्तविकता नहीं है। गैर-विश्वासियों की तरह तुम परमेश्वर के वचनों से बाहर जी रहे हो। कोई भी व्यक्ति जो परमेश्वर में विश्वास रखता है मगर उन वचनों को अभ्यास और अनुभव करने के लिए वास्तविक जीवन में लागू नहीं कर सकता, वह वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं रखता—वह छद्म-विश्वासी है। जो लोग सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, वे परमेश्वर को समर्पण करने वाले लोग नहीं हैं, वे उसके खिलाफ विद्रोह करने वाले और उसका प्रतिरोध करने वाले लोग हैं। परमेश्वर के वचनों को अपने असल जीवन में लाए बिना उनके पास परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने का कोई तरीका नहीं होता। और अगर कोई अपने असल जीवन में परमेश्वर के कार्य या उसके वचनों के न्याय और ताड़ना का अनुभव नहीं करता, तो उसके पास सत्य प्राप्त करने का कोई तरीका नहीं है। क्या तुम लोग यह समझते हो? अगर तुम लोग इन वचनों को समझ सकते हो, तो यह सबसे बढ़िया है—लेकिन तुम चाहे जैसे भी समझो, जितना भी समझो, सबसे अहम चीज यह है कि परमेश्वर के जिन वचनों और सत्यों को तुम समझते हो, उन्हें अपने जीवन में लागू करो, और वहाँ उन पर अभ्यास करो। तुम्हारे पास अपना आध्यात्मिक कद बढ़ाने और अपना स्वभाव बदलने का यही एकमात्र तरीका है।
जब परमेश्वर सत्य व्यक्त करता है या लोगों से अपनी अपेक्षाएँ सामने रखता है, तो वह हमेशा उनका अभ्यास करने के सिद्धांत और पथ बताता है। मिसाल के तौर पर एक ईमानदार व्यक्ति होने को ही ले लें, जिस पर हम अभी बात कर रहे थे : परमेश्वर ने लोगों को एक पथ दिया है, उन्हें बताया है कि ईमानदार लोग कैसे बनें, ईमानदार लोग होने के सिद्धांतों का अभ्यास कैसे करें, ताकि वे सही रास्ते पर चल सकें। परमेश्वर ने कहा था : “यदि तुम प्रकाश के मार्ग की खोज करने के लिए दूसरों के सामने अपने राज यानी अपनी कठिनाइयाँ उजागर करना नहीं चाहते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम्हें उद्धार प्राप्त करने में बड़ी मुश्किल आएगी और तुम्हें अंधकार से बाहर निकलने में कठिनाई होगी।” इसका निहितार्थ यह है कि परमेश्वर अपेक्षा रखता है कि हम जिसे राज और निजी समझते हैं, उसे खोलकर रखें, उसे गहन-विश्लेषण के लिए पेश करें। तुम लोगों ने इस बारे में नहीं सोचा है : तुम लोगों ने यह समझा या जाना नहीं है कि परमेश्वर ने यह बात इसलिए कही है ताकि तुम इस तरह से अभ्यास करो। कभी-कभी तुम धोखे और कपट के इरादे से कार्य करते हो, इसलिए तुम्हारे कार्य-कलाप और मंशाएँ बदली जानी चाहिए। शायद कोई भी तुम्हारी बातों की धोखेबाजी या कपट की प्रकृति को बूझ नहीं पाता—मगर अपनी पीठ मत थपथपाओ। तुम्हें परमेश्वर के समक्ष आकर अपनी जाँच करनी चाहिए—तुम लोगों को बेवकूफ बना सकते हो, मगर परमेश्वर को मूर्ख नहीं बना सकते। तुम्हें प्रार्थना करनी चाहिए, खुद को खोलकर अपनी मंशाओं और तरीकों का गहन-विश्लेषण करना चाहिए, विचार करना चाहिए कि क्या तुम्हारी ये मंशाएँ परमेश्वर को पसंद आएँगी या उसे घृणित लगेंगी, क्या तुम उन्हें खोलकर पेश कर सकते हो, क्या उनके बारे में चर्चा करना कठिन है और क्या वे सत्य के अनुरूप हैं। इस प्रकार के गहन-विश्लेषण और छानबीन से तुम पाओगे कि दरअसल यह मामला सत्य के अनुरूप नहीं है; ऐसे व्यवहार को बाहर प्रकाश में लाना कठिन है, और इससे परमेश्वर घृणा करता है। फिर तुम इस व्यवहार को बदलते हो। मेरी इस संगति से तुम लोगों को कैसा लग रहा है? तुममें से कुछ लोग शायद चिंतित हो रहे होंगे। तुम सोचते हो : “परमेश्वर में विश्वास रखना सचमुच पेचीदा है। यहाँ तक पहुँचना काफी मुश्किल भरा रहा है—अब क्या मुझे फिर से शुरू करना है?” वास्तविकता में, अब जबकि परमेश्वर आ गया है, और उसने लोगों को सत्य वास्तविकता में प्रवेश कराने के लिए अगुआई शुरू कर दी है, तो यह लोगों के परमेश्वर में विश्वास और उनके स्व-आचरण की शुरुआत है। अगर तुम अच्छी शुरुआत करोगे, तो तुम्हें अपनी आस्था में ठोस बुनियाद बनानी होगी, पहले दर्शन के सत्य और परमेश्वर का अनुसरण करने के महत्व को सीखना होगा, और फिर सत्य का अभ्यास करने और अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से निभाने पर ध्यान केंद्रित करना होगा। इस तरह तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकोगे। अगर तुम सिर्फ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बोलने पर ध्यान केंद्रित करते हो, और इन चीजों के आधार पर नींव रखते हो, तो यह एक समस्या बन जाती है। यह रेत पर घर की नींव बनाने जैसा है : चाहे तुम जितनी भी ऊँची इमारत बना लो, हमेशा इसके गिरने का खतरा बना रहेगा, और यह नहीं टिकेगी। लेकिन इस मुकाम पर तुम लोगों के बारे में एक सराहनीय बात यह है कि तुम लोग उस बात को समझ पाते हो जिस पर मैं संगति करता हूँ और उसे सुनने को तैयार हो। यह अच्छी बात है। सबसे महत्वपूर्ण बात है सत्य का अनुसरण करना और वास्तविकता में प्रवेश करना, बाकी सब गौण है। अगर तुम यह जानते हो, तो तुम्हें अपनी आस्था में सही रास्ता पकड़ने में मुश्किल नहीं होगी। सत्य का अनुसरण करने के पथ पर चलने के लिए तुम्हें सबसे पहले खुद को जानना होगा—तुम्हें साफ पता होना चाहिए कि तुममें कौन-से भ्रष्ट स्वभाव हैं, और तुम्हारी खामियाँ क्या हैं। तब तुम खुद को सत्य से लैस करने की अहमियत समझोगे, और समस्याओं को सुलझाने के लिए तेजी से सत्य को खोज पाओगे। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता! एक बार जब तुम जीवन प्रवेश को लेकर अपनी समस्याओं का समाधान कर लेते हो और तुम्हें सत्य वास्तविकता प्राप्त हो जाती है, तो तुम्हें अंदरूनी सुकून का ज्यादा एहसास होगा। चाहे जितनी बड़ी विपत्तियाँ आएँ, तुम डरोगे नहीं। अगर तुम ये थोड़े-से आखिरी वर्ष सत्य का अनुसरण किए बिना गँवा देते हो, और जब चीजें घटित होती हैं तब भी तुम हैरत में पड़ जाते हो, तुम प्रतीक्षा की निष्क्रिय दशा में पड़े रहते हो, न ही तुम अपनी समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य का प्रयोग कर पाते हो, बल्कि अभी भी सांसारिक आचरण के फलसफों और भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार जीते रहते हो, तो यह कितना दयनीय होगा! महाविपत्तियों का दिन आने पर तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता की एक किरण भी न हो, तब तुम सत्य का अनुसरण न करने, अपना कर्तव्य अच्छे ढंग से न निभाने और जरा भी सत्य हासिल न करने को लेकर पछताओगे। तुम निरंतर व्याकुलता की दशा में जियोगे। अभी फिलहाल, पवित्र आत्मा का कार्य किसी इंसान के लिए प्रतीक्षा नहीं करता। अपनी आस्था के पहले कुछ वर्षों में परमेश्वर लोगों को थोड़ा अनुग्रह देता है, थोड़ी दया देता है; वह उन्हें सहायता और सहारा देता है। अगर लोग कभी नहीं बदलते और कभी वास्तविकता में प्रवेश नहीं करते, बल्कि अपने जाने-पहचाने शब्दों और धर्म-सिद्धांतों से ही संतुष्ट रहते हैं, तो वे खतरे में हैं। वे पहले ही पवित्र आत्मा के कार्य से चूक गए हैं, और परमेश्वर द्वारा मानवजाति के उद्धार और पूर्णता का आखिरी मौका खो चुके हैं। वे रोते और दांत पीसते हुए सिर्फ विनाशों में ही गिर सकते हैं।
जब तुम पहले-पहल अपनी आस्था की नींव रखना शुरू करते हो, तो तुम लोगों को सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर दृढ़ता से कदम रखने चाहिए। तुम्हें सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने की प्रारंभरेखा पर होना चाहिए, न कि शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का पाठ करने की प्रारंभरेखा पर। तुम्हारा ध्यान सत्य वास्तविकता में प्रवेश, सभी चीजों में सत्य को खोजने और अभ्यास में लाने, सभी चीजों में सत्य का अभ्यास करने और प्रत्येक चीज की इससे तुलना करने पर केंद्रित होना चाहिए। तुम्हें चिंतन करना चाहिए कि सत्य का अभ्यास कैसे करें, अभ्यास के सिद्धांत क्या हैं, और सत्य का कैसा अभ्यास परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी कर उसे संतुष्ट करेगा। लेकिन लोगों में आध्यात्मिक कद का बड़ा अभाव होता है। वे हमेशा उन चीजों के बारे में पूछते हैं जो सत्य के अभ्यास से संबंधित नहीं हैं, जो आत्मज्ञान या एक ईमानदार व्यक्ति होने से संबंधित नहीं हैं। क्या यह दुखद नहीं है? क्या यह छोटा आध्यात्मिक कद नहीं दिखाता? कुछ लोगों ने परमेश्वर के कार्य का यह कदम उसके शुरू होते ही स्वीकार कर लिया, और वे आज तक विश्वासी बने हुए हैं। लेकिन अभी भी वे यह नहीं समझते कि सत्य वास्तविकता क्या है, या सत्य का अभ्यास करना क्या होता है। कुछ लोग कहते हैं, “मैंने अपनी आस्था के लिए अपना परिवार और करियर छोड़ दिया है और बहुत कुछ सहा है। तुम कैसे कह सकते हो कि मुझमें कोई सत्य वास्तविकता नहीं है? मैंने अपना परिवार पीछे छोड़ दिया—क्या यह वास्तविकता नहीं है? मैंने अपनी शादी छोड़ दी—क्या यह वास्तविकता नहीं है? क्या यह सब सत्य का अभ्यास करने की अभिव्यक्ति नहीं हैं?” बाहरी तौर से तो तुमने परमेश्वर में विश्वास के लिए लौकिक चीजें छोड़ दी हैं, अपना परिवार छोड़ दिया है। लेकिन क्या इसका अर्थ यह है कि तुमने सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है? क्या इसके मायने ये हैं कि तुम परमेश्वर को समर्पित होने वाले ईमानदार व्यक्ति हो? क्या इसका अर्थ है कि तुम्हारा स्वभाव बदल गया है, या तुम ऐसे व्यक्ति हो जिसके पास सत्य है, मानवता है? निश्चित रूप से नहीं। तुम्हारे ये बाहरी कर्म दूसरे लोगों को अच्छे लग सकते हैं—लेकिन इनका यह अर्थ नहीं है कि तुम सत्य का अभ्यास कर रहे हो या परमेश्वर को समर्पित हो, और इनका निश्चित रूप से यह अर्थ नहीं है कि तुम सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर रहे हो। लोगों का चीजों का त्याग और उनका खपना बहुत ज्यादा मिलावटी हैं, सारे लोग आशीष पाने की मंशा से नियंत्रित होते हैं और वे परीक्षणों और शोधन के जरिए शुद्ध नहीं हुए हैं। इसीलिए बहुत-से लोग अभी भी अक्सर अपने कर्तव्यों में अनमने होते हैं और कोई व्यावहारिक नतीजे हासिल नहीं करते हैं और यहाँ तक कि वे कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हैं, गड़बड़ी करते हैं और इसे कमजोर करते हैं। वे पश्चात्ताप के बारे में कोई विचार किए बिना कलीसिया के कार्य में बहुत अधिक मुसीबत पैदा करते हैं। जब कलीसिया उन्हें हटा देती है उसके बाद भी वे नकारात्मकता फैलाते फिरते हैं और अपनी पैरवी के लिए झूठ बोलकर तथ्यों को तोड़ते-मरोड़ते रहते हैं। कुछ लोग एक-दो दशक तक विश्वास रखने के बाद भी बेलगाम होकर तमाम तरह की बुराई करते हैं। फिर उन्हें कलीसिया द्वारा या तो हटा दिया जाता है या निष्कासित कर दिया जाता है। यह तथ्य कि वे इतनी भयानक चीजें कर पाते हैं पर्याप्त सबूत है कि उनका चरित्र बहुत भयंकर होता है, वे बहुत कुटिल और कपटी होते हैं और वे जरा भी निष्कपट, आज्ञाकारी या समर्पणशील नहीं होते। ऐसा इसलिए कि उन्होंने कभी भी सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार व्यक्ति बनने की ज्यादा परवाह नहीं की। वे परमेश्वर में आस्था को ऐसा मामला मानते हैं : “अगर मैं अपना परिवार छोड़े रखता हूँ, परमेश्वर के लिए खुद को खपाता हूँ, कष्ट सहता हूँ, और कीमत चुकाता हूँ, तो परमेश्वर को मेरे कर्मों को याद रखना चाहिए और मुझे उसका उद्धार प्राप्त होना चाहिए।” यह बस सनक और खयाली पुलाव है। अगर तुम उद्धार प्राप्त करना चाहते हो, और सचमुच परमेश्वर के समक्ष आना चाहते हो, तो पहले तुम्हें परमेश्वर के पास यह खोजते हुए आना चाहिए : “हे परमेश्वर, मुझे किस चीज का अभ्यास करना चाहिए? लोगों को बचाने के लिए तुम्हारा मानक क्या है? तुम किस प्रकार के लोगों को बचाते हो?” हमें सबसे बढ़कर इन्हीं चीजों को खोजना और जानना चाहिए। सत्य पर अपनी बुनियाद स्थापित करो, सभी चीजों में सत्य और वास्तविकता के लिए मेहनत करो, और फिर तुम वह व्यक्ति बनोगे जिसकी बुनियाद होगी, जिसके पास जीवन है। अगर तुम अपनी बुनियाद शब्दों और धर्म-सिद्धांतों पर स्थापित करते हो, कभी किसी सत्य का अभ्यास नहीं करते, या किसी भी सत्य में मेहनत नहीं करते, तो तुम ऐसे व्यक्ति बनोगे जिसके पास कभी जीवन नहीं होगा। जब हम ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करते हैं, तो हममें जीवन, वास्तविकता और एक ईमानदार व्यक्ति का सार होता है। तब हम एक ईमानदार व्यक्ति जैसा अभ्यास और व्यवहार करते हैं, और कम-से-कम हमारा वह ईमानदार अंश परमेश्वर को खुशी देगा और वह उसे अपनी स्वीकृति देगा। लेकिन हम अभी भी अक्सर झूठ, चालबाजी और धोखेबाजी का प्रदर्शन करते हैं, जिसे शुद्ध करना जरूरी है। इसीलिए हमें सत्य का अनुसरण जारी रखना चाहिए और ढर्रे में नहीं फँसना चाहिए। परमेश्वर हमारी प्रतीक्षा में है, हमें मौका दे रहा है। अगर तुम कभी ईमानदार व्यक्ति बनने की योजना नहीं बनाते, यदि तुम कभी नहीं खोजते कि कैसे ईमानदारी से और दिल से बोलें, बनावटीपन या धोखे की मिलावट के बिना कैसे काम करें और एक ईमानदार व्यक्ति की तरह कैसे बर्ताव करें, तो ऐसा कोई तरीका नहीं है जिससे तुम ईमानदार मानव के समान जी सको या ईमानदार व्यक्ति की सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सको। अगर तुमने सत्य के किसी एक पहलू की वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है, तो तुमने सत्य के उस पहलू को प्राप्त कर लिया है; अगर तुम्हारे पास वह वास्तविकता नहीं है, तो तुम्हारे पास वह जीवन या आध्यात्मिक कद नहीं है। परीक्षणों और प्रलोभनों का सामना होने पर या तुम्हें कोई आदेश मिलने पर अगर तुम में बिल्कुल कोई वास्तविकता नहीं होती, तो तुम आसानी से लड़खड़ा कर गलतियाँ करोगे; परमेश्वर का अपमान और उसके खिलाफ विद्रोह में प्रवृत्त हो जाओगे। तुम अपनी मदद नहीं कर पाओगे। बहुत-से लोग अपने कर्तव्यों में बेलगाम होकर व्यवहार करते हैं, सलाह लेने से इनकार कर देते हैं, सुधर नहीं पाते, कलीसिया के कार्य में गंभीर रूप से गड़बड़ी करते और बाधा डालते हैं और परमेश्वर के घर के हितों को गंभीर हानि पहुँचाते हैं। अंत में ऐसे लोग या तो हटा दिए जाते हैं या निष्कासित कर दिए जाते हैं—यही अनिवार्य नतीजा होता है। लेकिन अगर तुम फिलहाल ईमानदार व्यक्ति होने के लिए सत्य का अभ्यास कर रहे हो, तो ईमानदार व्यक्ति के रूप में तुम्हारी अनुभवजन्य गवाही को परमेश्वर की स्वीकृति मिलेगी। कोई भी यह तुमसे नहीं ले सकता, कोई भी तुमसे यह वास्तविकता, यह जीवन नहीं छीन सकता। कुछ लोग पूछते हैं, “मैं लंबे समय से ईमानदार व्यक्ति रहा हूँ। क्या मैं फिर से धोखेबाज व्यक्ति बन सकता हूँ?” अगर तुमने अपना भ्रष्ट स्वभाव त्याग दिया है; अगर तुम्हें एक ईमानदार व्यक्ति बनने की सत्य वास्तविकता प्राप्त है; अगर तुम मानवीयता के समान जी रहे हो और तुम्हें बनावटीपन, धोखेबाजी और गैर-विश्वासी संसार से दिल से घृणा है, तो तुम शैतान की सत्ता के अधीन वापस नहीं जा सकते। ऐसा इसलिए कि तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने में सक्षम हो; तुम पहले से ही प्रकाश में जी रहे हो। धोखेबाज व्यक्ति से ईमानदार इंसान में बदलना आसान नहीं है। परमेश्वर को सचमुच आनंदित करने वाले ईमानदार व्यक्ति से धोखेबाज व्यक्ति में वापस बदलना नामुमकिन होगा, और भी ज्यादा मुश्किल होगा। कुछ लोग कहते हैं : “मुझे ईमानदार व्यक्ति होने का कई वर्षों का अनुभव है। मैं अधिकतर समय सत्य बोलता हूँ और मैं काफी ईमानदार हूँ। लेकिन कभी-कभार मैं ऐसी बातें कह देता हूँ जो असत्य, अप्रत्यक्ष और धोखेबाजी की होती हैं।” इस समस्या को ठीक करना ज्यादा आसान है। जब तक तुम सत्य खोजने और सत्य के लिए प्रयास करने पर ध्यान देते हो, तो तुम्हें भविष्य में बदल न पाने को लेकर चिंतित होने की जरूरत नहीं है। तुम निश्चित रूप से सुधरते रहोगे। मिट्टी में बोए गए अंकुर की तरह अगर तुम उसमें समय पर पानी डालोगे, रोज धूप में रखोगे, तो तुम्हें फिक्र करने की जरूरत नहीं कि बाद में इसमें फल लगेंगे या नहीं, और शरद ऋतु में यकीनन फसल होगी। अभी तुम लोगों को सबसे ज्यादा चिंता इस बारे में होनी चाहिए : क्या तुम लोगों ने ईमानदार व्यक्ति होने में प्रवेश किया है? क्या तुम कम और कम झूठ बोलते जा रहे हो? क्या तुम कह सकते हो कि कुल मिलाकर अब तुम ईमानदार व्यक्ति हो? यही अहम सवाल हैं। अगर कोई कहता है : “मैं जानता हूँ कि मैं धोखेबाज व्यक्ति हूँ, लेकिन मैंने कभी भी ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास नहीं किया है,” तब तुममें ईमानदार व्यक्ति होने की कोई भी वास्तविकता नहीं है। तुम्हें कड़ी मेहनत करने की जरूरत है, अपने जीवन के हर छोटे पहलू, हर तरह के बर्तावों, धोखेबाजी के सभी पैंतरों, और दूसरों से पेश आने के तरीकों को गहन-विश्लेषण के लिए सामने रखना चाहिए। इन चीजों का गहन-विश्लेषण करने से पहले तुम अपने-आपसे बहुत खुश हो सकते हो, तुमने जो कुछ किया है उससे बहुत आत्म-संतुष्ट हो सकते हो। लेकिन एक बार परमेश्वर के वचनों से उनका तुलनात्मक गहन-विश्लेषण करने के बाद तुम्हें झटका लगेगा, “मुझे एहसास नहीं था कि मैं इतना घिनौना हूँ, इतना दुर्भावनापूर्ण और धूर्त हूँ!” तुम अपना सही रूप देखोगे और सचमुच अपनी मुश्किलों, खामियों और धोखेबाजी को पहचानोगे। अगर तुम कोई गहन-विश्लेषण नहीं करते, और हमेशा के लिए खुद को ईमानदार व्यक्ति और धोखेबाजी से मुक्त इंसान मानते हो, फिर भी खुद को धोखेबाज कहते हो, तो तुम कभी नहीं बदलोगे। अगर तुम अपने दिल में पैठी उन घिनौनी, दुष्ट मंशाओं को खोद कर नहीं निकालते, तो तुम अपनी कुरूपता और भ्रष्टता को कैसे देखोगे? अगर तुम अपनी भ्रष्ट दशाओं पर आत्मचिंतन कर उनका गहन-विश्लेषण नहीं करते, तो क्या तुम उस सत्य को देख पाओगे कि तुम कितनी गहराई से भ्रष्ट हो? अपने भ्रष्ट स्वभाव की समझ के बिना तुम यह नहीं जान पाओगे कि समस्याएँ सुलझाने के लिए सत्य को कैसे खोजें, तुम नहीं जानोगे कि परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार सत्य का अनुसरण कैसे करें और वास्तविकता में प्रवेश कैसे करें। इस वाक्यांश का सच्चा अर्थ यही है : “अगर तुम सत्य का अभ्यास नहीं करते तो तुम्हें कभी भी वास्तविकता प्राप्त नहीं होगी।”
परमेश्वर जो भी कहता है वह सत्य है। उसके प्रत्येक अंतिम वचन में सत्य वास्तविकता होती है, और यह सभी सकारात्मक चीजों की वास्तविकता है। इसलिए लोगों को अभ्यास और प्रवेश करने के लिए परमेश्वर के वचनों को अपने दैनिक जीवन में लाना चाहिए। परमेश्वर का प्रत्येक वचन मानवजाति की जरूरत को लक्ष्य करके होता है और प्रत्येक वचन लोगों के उससे अपनी तुलना करने के लिए है। ये यूँ ही सरसरी नजर डालने के लिए नहीं हैं, न ही तुम्हारी कुछ आध्यात्मिक जरूरतें पूरी करने के लिए हैं, न ही वे बनावटी बातें करने के लिए या शब्दों और धर्म-सिद्धांतों के बारे में बात करने की तुम्हारी जरूरत पूरी करने के लिए हैं। परमेश्वर के प्रत्येक वचन में सत्य की वास्तविकता है। अगर तुम परमेश्वर के वचनों को अभ्यास में नहीं लाते, तो तुम्हारे पास सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने का कोई रास्ता नहीं होगा—तुम हमेशा ऐसे इंसान रहोगे जिसका वास्तविकता से कोई रिश्ता नहीं है। अगर तुम ईमानदार व्यक्ति होने का अभ्यास करते हो, तो तुम्हारे पास ईमानदार होने की वास्तविकता होगी, और तुम झूठे ढोंग करने के बजाय एक ईमानदार व्यक्ति होने की सच्ची दशा में जी सकोगे। तुम यह भी समझ पाओगे कि कैसा व्यक्ति ईमानदार होता है और कैसा व्यक्ति नहीं, और परमेश्वर धोखेबाज लोगों से घृणा क्यों करता है। तुम ईमानदार व्यक्ति होने के महत्त्व को सचमुच समझ जाओगे; तुम अनुभव करोगे कि लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा रखकर परमेश्वर कैसा महसूस करता है, और वह लोगों से यह अपेक्षा क्यों रखता है। यह पता लगने पर कि तुम अत्यंत धोखेबाज हो, तुम अपनी धोखेबाजी और कुटिलता से घृणा करोगे। तुम्हें इस बात से घृणा होगी कि अपने धोखेबाज और कुटिल स्वभाव के साथ तुम बेशर्मी से कैसे जीते रहे हो। इस तरह तुम बदलाव के लिए उत्सुक हो जाओगे। इस तरह तुम्हें यह और ज्यादा महसूस होगा कि ईमानदार व्यक्ति होना ही सामान्य मानवता वाला और सार्थक जीवन जीने का एकमात्र रास्ता है। तुम महसूस करोगे कि परमेश्वर का लोगों से ईमानदार होने की अपेक्षा रखना अत्यंत अर्थपूर्ण है। तुम्हें लगेगा कि ऐसा करके ही तुम परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो पाओगे, कि सिर्फ ईमानदार लोगों को ही उद्धार मिलेगा, और यह कि परमेश्वर ने जो कुछ भी कहा वह पूरी तरह से सही है! तुम लोग मुझे बताओ : क्या लोगों से ईमानदार होने की परमेश्वर की अपेक्षा अर्थपूर्ण है? (हाँ, जरूर है।) फिर तुम लोगों को अपने धोखेबाज और कुटिल अंशों का गहन-विश्लेषण अभी से शुरू कर देना चाहिए। उनका गहन-विश्लेषण करने के बाद तुम पाओगे कि धोखेबाजी के हर काम के पीछे एक इरादा है, एक खास लक्ष्य, एक इंसानी कुरूपता है। तुम पाओगे कि यह धोखा लोगों की मूर्खता, स्वार्थ और घिनौनापन दर्शाता है। जब तुम्हें यह पता चलेगा, तब तुम अपना असली चेहरा देखोगे, और जब तुम अपना असली चेहरा देखोगे, तुम खुद से घृणा करोगे। खुद से घृणा करना शुरू करने और सचमुच यह जान लेने के बाद कि तुम किस किस्म के इंसान हो, क्या तुम शान बघारते रहोगे? क्या हर मोड़ पर तुम डींग हाँकते रहोगे? क्या तुम्हें हमेशा दूसरों से अभिनंदन और प्रशंसा की चाह रहेगी? क्या तुम अब भी कहोगे कि परमेश्वर की माँगें बहुत ऊँची हैं, कि ये जरूरी नहीं हैं? तुम उस तरह कार्य नहीं करोगे, वैसी बातें नहीं कहोगे। तुम परमेश्वर की बातों से सहमत हो जाओगे और “आमीन” कहोगे। तुम्हें दिलो-दिमाग और अपनी आँखों से यकीन हो जाएगा। जब ऐसा होता है तो इसका अर्थ है कि तुमने परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करना शुरू कर दिया है, तुमने वास्तविकता में प्रवेश कर लिया है और तुम्हें नतीजे दिखाई देने लगे हैं। जितना ही तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करोगे, तुम्हें उतना ही महसूस होगा कि वे कितने सही और जरूरी हैं। मान लो कि तुम उनका अभ्यास नहीं करते। इसके बजाय तुम हमेशा बड़बड़ाते रहते हो, “अरे, मैं बेईमान हूँ, धोखेबाज हूँ,” और फिर भी किसी हालात का सामना होने पर तुम धोखेबाजी से काम लेते हो, इस दौरान यह सोचते रहते हो कि यह धोखेबाजी नहीं है, खुद को अभी भी ईमानदार मानते हो, और मामले को यूँ ही गुजर जाने देते हो। और अगली बार कोई मामला आने पर तुम फिर से चालबाजी करते हो, कुटिलता और धोखेबाजी में लग जाते हो, और मुँह खोलते ही झूठ बोलने लगते हो। बाद में तुम्हें ताज्जुब होता है “क्या मैं फिर से कुटिल और धोखेबाज बन गया था? क्या मैं दोबारा झूठ बोल रहा था? मुझे नहीं लगता इसकी कोई अहमियत है,” और तुम परमेश्वर से प्रार्थना करते हो, “हे परमेश्वर, तुम देख रहे हो मैं किस तरह साजिशों का सहारा लेता हूँ, हमेशा कुटिल और धोखेबाज रहता हूँ। मुझे माफ कर दो। अगली बार मैं वैसा नहीं रहूँगा; अगर मैं वैसा रहा तो मुझे अनुशासित करना,” इन मामलों को हल्के में लेकर तुम उन्हें दबा देते हो। यह कैसा व्यक्ति है? यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम नहीं करता और सत्य का अभ्यास करने को तैयार नहीं होता। हो सकता है तुमने अपना कर्तव्य निभाने, परमेश्वर की सेवा करने या धर्मोपदेश सुनने में थोड़ी कीमत चुकाई हो, थोड़ा वक्त लगाया हो। हो सकता है तुमने अपने थोड़े कामकाजी समय का भी त्याग किया हो और थोड़ा कम पैसा कमाया हो। लेकिन असल में तुमने सत्य का जरा भी अभ्यास नहीं किया है, और तुमने सत्य का अभ्यास करने के विषय को गंभीरता से नहीं लिया है। तुम सतही और लापरवाह रहे हो, इसे कभी अहमियत नहीं दी। अगर तुम सत्य का अभ्यास सिर्फ बिना रुचि के करते हो, तो इससे साबित होता है कि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया प्रेम का नहीं है। तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अभ्यास करने को तैयार नहीं है; तुम सत्य से बहुत दूर हो और सत्य से विमुख हो। तुमने आशीष प्राप्त करने के लिए आस्था रखी है, और तुम परमेश्वर से सिर्फ इसलिए दूर नहीं गए क्योंकि तुम्हें दंडित होने का डर है। इसलिए तुम अपनी आस्था किसी तरह निभा लेते हो, खुद को अच्छा दिखाने के लिए शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार करने की कोशिश करते हो, थोड़ी आध्यात्मिक शब्दावली और कुछ लोकप्रिय भजन सीख लेते हो, सत्य पर संगति करने के लिए कुछ सूत्रवाक्य और अपनी आस्था से जुड़े प्रचलित बोल सीख लेते हो। तुम खुद को आध्यात्मिक व्यक्ति की तरह अलंकृत करते हो, यह सोचकर कि तुम वह व्यक्ति हो जो परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है और परमेश्वर के उपयोग के लायक है। तुम बेपरवाह होकर खुद को भूल जाते हो। तुम इस सतही छवि, इस पाखंडी व्यवहार के फेर में आकर बेवकूफ बन जाते हो। तुम अपनी मृत्यु तक इनसे बेवकूफ बनते रहते हो, और हालाँकि तुम्हें लगता है कि तुम स्वर्ग में आरोहण करोगे, सच पूछो तो तुम नरक में उतरोगे। वैसी आस्था रखने का भला क्या अर्थ है? तुम्हारी इस तथाकथित “आस्था” में कुछ भी वास्तविक नहीं है। ज्यादा-से-ज्यादा तुमने मान लिया है कि एक परमेश्वर है, मगर तुमने सत्य वास्तविकता में जरा भी प्रवेश नहीं किया है। तो अंत में तुम्हारा नतीजा भी वही होगा जो गैर-विश्वासियों का होता है—तुम नरक में जाओगे, बिना किसी अच्छे अंतिम नतीजे के। परमेश्वर कहता है : “मैं जो माँगता हूँ वे केवल उजले, रंग-बिरंगे फूल ही नहीं, बल्कि भरपूर फल हैं।” तुम्हारे पास चाहे जितने फूल हों या वे चाहे जितने भी सुंदर हों, वे परमेश्वर को नहीं चाहिए। इसका अर्थ यह है कि तुम चाहे जितना भी मीठा बोलो या चाहे तुम जितने भी खपते, चढ़ावा देते, त्याग करते नजर आओ, यह वह नहीं है जिससे परमेश्वर को आनंद मिलता है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि तुम्हें वास्तव में सत्य की कितनी समझ है और तुमने कितना अभ्यास किया है, परमेश्वर के वचनों की कितनी सत्य वास्तविकता तुमने जी है, क्या तुम्हारे जीवन स्वभाव में सच्चा बदलाव हुआ है, तुम्हारे पास कितनी सच्ची अनुभवजन्य गवाही है, तुमने कितने नेक कर्म किए हैं, तुमने परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए कितना कार्य किया है, और क्या तुमने अपना कर्तव्य मानक स्तरीय ढंग से निभाया है। परमेश्वर यही चीजें देखता है। जब लोग परमेश्वर को नहीं समझते और उसके इरादों को नहीं जानते, तो वे हमेशा इसका गलत अर्थ निकालते हैं और उसके साथ हिसाब चुकाने के तरीके के रूप में उसे कुछ सतही चीजें पेश करते हैं। वे कहते हैं, “हे परमेश्वर, मैं कई वर्षों से विश्वासी रहा हूँ। मैंने सब जगहों की यात्रा की है, सुसमाचार का प्रचार किया है, और बहुत-से लोगों का धर्म-परिवर्तन किया है। मैं तुम्हारे वचनों के अनेक अंशों का पाठ कर सकता हूँ, और बहुत-से भजन गा सकता हूँ। किसी बड़ी या मुश्किल चीज के आने पर मैं हमेशा उपवास और प्रार्थना करता हूँ, और मैं पूरे समय तुम्हारे वचन पढ़ता रहता हूँ। मैं तुम्हारे इरादों के अनुरूप कैसे नहीं हूँ?” फिर परमेश्वर उनसे कहता है : “क्या तुम अब ईमानदार व्यक्ति हो? क्या तुम्हारी धोखेबाजी बदल गई है? क्या तुमने ईमानदार व्यक्ति बनने के लिए कभी कोई कीमत चुकाई है? क्या तुम कभी भी अपने द्वारा किए गए धोखेबाजी के तमाम कामों, धोखेबाजी के सभी खुलासों को मेरे पास लाए हो, और उन्हें रोशन किया है? क्या तुम मेरे साथ कम बेईमान हो? मुझसे झूठी शपथ या खोखले वादे करते समय या मुझे मूर्ख बनाने के लिए बढ़िया बातें करते समय क्या तुम उन्हें पहचानते हो? क्या तुमने इन चीजों को जाने दिया है?” जब तुम उस बारे में सोचते हो और पाते हो कि तुमने इन्हें बिल्कुल जाने नहीं दिया है, तो तुम हक्के-बक्के रह जाओगे। तुम इस तथ्य के प्रति आगाह होगे कि तुम परमेश्वर से किसी भी तरह हिसाब नहीं चुका सकते। तुम लोग खुद को जान सको इसके लिए मैं तुम लोगों की भ्रष्ट दशा को उजागर करता हूँ; मैं इतना इसलिए बोलता हूँ ताकि तुम लोग सत्य का अभ्यास करके वास्तविकता में प्रवेश कर सको। कोई भी वचन, कोई भी संगति या सत्य लोगों के हर जगह पाठ करने के लिए नहीं हैं; वे अभ्यास में लाने के लिए हैं। तुम लोगों को हमेशा सत्य को स्वीकार करने और अभ्यास में लाने को क्यों कहा जा रहा है? इसलिए कि केवल सत्य ही तुम लोगों की भ्रष्टता को शुद्ध कर सकता है और जीवन और तुम्हारे मूल्यों के प्रति नजरिए को बदल सकता है और केवल सत्य ही किसी का जीवन बन सकता है। जब तुम सत्य स्वीकारते हो, तो इसे अपना जीवन बनाने के लिए तुम्हें इसका अभ्यास भी करना चाहिए। अगर तुम्हें विश्वास है कि तुम्हें सत्य की समझ है मगर तुमने इसका अभ्यास नहीं किया है और यह तुम्हारा जीवन नहीं बन पाया है, तो संभवतः तुम नहीं बदल सकते। चूँकि तुमने सत्य को स्वीकार नहीं किया है, इसलिए तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव के शुद्ध होने का कोई रास्ता नहीं है। अगर तुम सत्य का अभ्यास नहीं कर सकते, तो तुम नहीं बदलोगे। अंततः अगर सत्य ने तुम्हारे दिल में जड़ें नहीं जमाई हैं और यह तुम्हारा जीवन नहीं बन पाया है, तो जब एक विश्वासी के रूप में तुम्हारा समय समाप्त होने को होगा, तो तुम्हारी नियति और परिणाम का फैसला हो जाएगा। इस संगति के प्रकाश में क्या तुम सभी लोगों को लग रहा है कि शीघ्रता से सत्य का अभ्यास करना चाहिए? तीन साल, पाँच साल या और भी ज्यादा प्रतीक्षा करने के बाद ही इसका अभ्यास शुरू न करो। सत्य पर अभ्यास करने को लेकर कोई भी समय बहुत जल्द या बहुत देर का नहीं होता; अगर तुम इसका शीघ्र अभ्यास करोगे, तो शीघ्र बदलोगे, अगर तुम इसका बाद में अभ्यास करोगे, तो बाद में बदलोगे। अगर तुम पवित्र आत्मा के कार्य और परमेश्वर द्वारा मानवजाति की पूर्णता का मौका चूक गए तो विनाशों के आने पर तुम खतरे में पड़ जाओगे। फिर जब मानवजाति को बचाने का परमेश्वर का कार्य समाप्त होगा, तो कोई भी मौके नहीं बचेंगे। अगर मौके चूक जाने के बाद तुम कहोगे : “तब मैंने उसके लिए कोई मेहनत नहीं की, मगर अब मैं इस पर अमल करूँगा,” तो बहुत देर हो जाएगी, और परमेश्वर द्वारा तुम्हें पूरा किए जाने की संभावना नहीं रहेगी। ऐसा इसलिए कि अब पवित्र आत्मा कार्य नहीं करेगा, और सभी चीजों, सभी सत्य के बारे में तुम्हारी समझ बहुत उथली होगी। अब तमाम हालात पैदा हो रहे हैं, और सत्य पर संगति के जरिए तुम लोगों की आस्था बढ़ रही है और तुममें परमेश्वर का अनुसरण करने का जोश ज्यादा है। अगर कुछ समय तक हालात न बने होते, तो तुम लोग यकीनन नकारात्मक और अनुशासनहीन हो जाते, परमेश्वर से दूर और दूर हो जाते। तुम ठीक धार्मिक संसार के लोगों की तरह ही हो जाते, बिल्कुल सत्य वास्तविकता के बिना सभाओं और धार्मिक अनुष्ठानों के खाकों का निरीक्षण करने वाले। फिर रोने-धोने से तुम लोगों का क्या भला होता?
मुझे बताओ, क्या धोखेबाज लोगों के साथ-साथ जीना थकाऊ होता है? (जरूर होता है।) क्या वे भी थके हुए नहीं हैं? दरअसल वे भी थके हुए हैं मगर उन्हें अपनी थकान महसूस नहीं होती। ऐसा इसलिए कि धोखेबाज और ईमानदार लोग अलग-अलग होते हैं : ईमानदार लोग ज्यादा सरल होते हैं। उनके विचार उतने पेचीदा नहीं होते, वे वही बोलते हैं जो सोचते हैं। दूसरी ओर धोखेबाज लोगों को हमेशा घुमा-फिरा कर बोलना पड़ता है। वे कोई भी बात सीधे तौर पर नहीं करते—बल्कि हमेशा धोखेबाजी के खेल खेलते हैं, अपने झूठ छिपाते हैं। वे हमेशा अपने दिमाग चलाते रहते हैं, हमेशा सोचते रहते हैं, डरते हैं कि जरा भी लापरवाह हुए तो वे कोई चूक कर बैठेंगे। कुछ लोग किस हद तक धोखेबाजी के खेल खेलते हैं? वे चाहे जिससे भी बातचीत कर रहे हों, हमेशा समझने की कोशिश में रहते हैं कि कौन ज्यादा मतलबी है, कौन ज्यादा होशियार है, कौन सबसे ऊपर है, और आखिरकार प्रतिस्पर्धा की उनकी भावना मानसिक विकार बन जाती है। वे रात में सो नहीं पाते, फिर भी उन्हें दर्द महसूस नहीं होता और यहाँ तक कि यह सामान्य लगता है। फिर क्या वे जीवित दानव नहीं बन चुके हैं? जब परमेश्वर लोगों को बचाता है, तो वह उन्हें शैतान के प्रभाव से मुक्त होने, अपने भ्रष्ट स्वभावों को उतार फेंकने, ईमानदार लोग बनने और उसके वचनों के अनुसार जीने देता है। एक ईमानदार व्यक्ति की तरह जीना स्वतंत्रता और मुक्ति देने वाला और काफी कम दर्दनाक होता है। यह सबसे खुशहाल जीवन होता है। ईमानदार लोग अपेक्षाकृत शुद्ध और सरल होते हैं। वे अपने दिल की बात करते हैं, वही बोलते हैं जो वे सोचते हैं। अपने कथनों और कृत्यों में वे अपने जमीर और विवेक का अनुसरण करते हैं। वे सत्य के लिए मेहनत करने को तैयार रहते हैं और उसे समझ लेने के बाद वे उसका अभ्यास करते हैं। जब वे किसी बात की असलियत नहीं जान पाते, तो सत्य खोजने को तैयार रहते हैं, और फिर वे वही करते हैं जो सत्य के अनुरूप होता है। वे हर जगह और हर चीज में परमेश्वर की इच्छाएँ खोजते हैं, और फिर अपने कार्यों में उनका पालन करते हैं। ऐसे कुछ क्षेत्र हो सकते हैं जिनमें वे अज्ञानी होते हैं, जिसके लिए उन्हें सत्य सिद्धांतों से लैस होने और निरंतर विकास करने की जरूरत होती है। इस तरह अनुभव करने का अर्थ है कि वे ईमानदार और बुद्धिमान हो सकते हैं, और पूरी तरह से परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हो सकते हैं। लेकिन धोखेबाज लोग ऐसे नहीं होते। वे शैतानी स्वभावों के अनुसार जीते हैं और जब वे अपनी भ्रष्टता प्रकट करते हैं, तो उन्हें डर होता है कि कहीं दूसरे लोग उनके खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ पता न लगा लें। परिणामस्वरूप, वे जवाब में कुटिल, धोखेबाज चालें चलते हैं। वे उस समय से डरते हैं जब तमाम चीजों का खुलासा होगा, इसलिए वे झूठ बनाने और उन्हें छिपाने के सभी साधन इस्तेमाल करते हैं जो उनके वश में हैं, और जब कुछ अंतराल नजर आता है तो उसे भरने के लिए वे और झूठ बोलते हैं। हमेशा झूठ बोलना और अपना झूठ छिपाना—क्या यह जीने का एक थकाऊ तरीका नहीं है? वे हमेशा झूठ और उन्हें दबाने के तरीके सोचने के लिए अपने दिमाग लगाते रहते हैं। यह बहुत ज्यादा थकाऊ होता है। इसीलिए झूठ गढ़ने और उन्हें छिपाने के तरीके सोचने में दिन बिताने वाले धोखेबाज लोगों का जीवन हमेशा इतना थकाऊ और दर्दनाक होता है! लेकिन ईमानदार लोगों के साथ बात अलग है। जब कोई ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करता है, तो उसे बोलते और कार्य करते समय बहुत अधिक विचार नहीं करना पड़ता। ज्यादातर मामलों में, वह बस सच्चाई से बोल सकता है। केवल कुछ मामलों में ही वह थोड़ा दिमाग लगाता है और अपने हितों, अपने मिथ्याभिमान और घमंड की रक्षा करने के लिए थोड़ा झूठ बोलता है। वह केवल इसी तरह के झूठ बोलता है, इसलिए वह बहुत कम झूठ बोलता है, उसके झूठ की एक सीमा होती है और वह धीरे-धीरे एक ईमानदार व्यक्ति होने के मानकों के करीब पहुँच जाता है। इसलिए, ईमानदार लोगों के लिए बोलना और कार्य करना इतना थकाऊ नहीं होता। धोखेबाज लोगों की मंशाएँ ईमानदार लोगों की तुलना में काफी जटिल होती हैं। वे जो कहते और करते हैं, उसमें बहुत अधिक सोच-विचार होता है। उन्हें प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के साथ-साथ अपनी प्रतिष्ठा और मान-सम्मान पर भी विचार करना होता है और अपने हितों का ध्यान रखना होता है और वे कुछ भी जाहिर नहीं होने दे सकते हैं और दूसरों को अपनी असलियत नहीं जानने दे सकते हैं, इसलिए उन्हें झूठ गढ़ने के लिए अपना सिर खपाना पड़ता है। उनके झूठ बढ़ते जाते हैं, वे जो कुछ भी कहते हैं वह झूठ होता है और वे एक भी ईमानदार शब्द नहीं बोलते हैं। यही नहीं, धोखेबाज लोगों की अत्यधिक असंयमित इच्छाएँ और बहुत-सी अनुचित माँगें होती हैं। जब वे बोलते हैं तो उनकी हमेशा अपनी मंशाएँ होती हैं और अपने लक्ष्य होते हैं। अपने उद्देश्यों को हासिल करने के लिए उन्हें दूसरे लोगों से झूठ बोलने और उन्हें धोखा देने के लिए हर संभव तरीका सोचना पड़ता है और वे जितने अधिक झूठ बोलते हैं, उन्हें छिपाने के लिए उतने ही अधिक झूठों की आवश्यकता होती है, परिणामस्वरूप उनके झूठ बोलने का कोई अंत नहीं होता है। इस प्रकार, एक ईमानदार व्यक्ति की तुलना में एक धोखेबाज व्यक्ति का जीवन थकाऊ भी होता है और दुखपूर्ण भी। कुछ लोग अपेक्षाकृत ईमानदार होते हैं। यदि वे सत्य का अनुसरण कर सकते हैं, चाहे उन्होंने कोई भी झूठ बोला हो खुद पर चिंतन कर सकते हैं, चाहे वे किसी भी धोखेबाजी में लिप्त हों वे परमेश्वर के वचनों से तुलनाएँ करके अपना गहन-विश्लेषण कर सकते हैं और खुद को समझ सकते हैं, और बदलने की कोशिश कर सकते हैं तो वे कुछ वर्षों के अनुभव से अपने काफी सारे झूठ बोलने और धोखा देने से छुटकारा पाने में सक्षम होंगे। तब वे ऐसे व्यक्ति बन चुके होंगे जो अधिकांशतः ईमानदार हैं। यदि कोई इस तरह से जीता है तो न केवल उसका दुख काफी कम हो जाता है और वह इतना थका हुआ महसूस नहीं करता; बल्कि यह उसके लिए शांति और खुशी लेकर भी आता है। बहुत-से मामलों में वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे, और मिथ्याभिमान व घमंड की बाधाओं से मुक्त हो जाएँगे और स्वाभाविक रूप से एक स्वतंत्र और मुक्त जीवन जिएँगे। लेकिन धोखेबाज लोगों की कथनी-करनी के पीछे हमेशा छिपे हुए मंसूबे होते हैं। वे दूसरों को गुमराह करने और धोखा देने के लिए हर तरह के झूठ गढ़ते हैं और जैसे ही वे उजागर होते हैं, वे अपने झूठ को छिपाने के तरीकों के लिए अपना सिर खपाते हैं। वे हमेशा व्यग्रता की दशा में रहते हैं और इस तरह झूलते रहने से उन्हें लगता है कि उनका जीवन अत्यंत थकाऊ है। उनके सामने आने वाली हर स्थिति में इतने सारे झूठ बोलना उनके लिए काफी थकाऊ होता है और फिर उन झूठों को छिपाना तो और भी अधिक थकाऊ होता है। वे जो कुछ भी कहते हैं उस सबकी मंशा एक उद्देश्य हासिल करने की होती है, इसलिए वे जो कुछ भी कहते हैं उसकी योजना बनाने में बहुत अधिक प्रयास करते हैं। और चूँकि उन्हें डर है कि तुम उनकी असलियत जान लोगे, इसलिए उन्हें अपने झूठ को छिपाने के लिए भी अपना सिर खपाना पड़ता है और तुम्हें बातें समझाते रहना पड़ता है, तुम्हें यह विश्वास दिलाने की कोशिश करनी पड़ती है कि वे झूठ नहीं बोल रहे हैं या तुम्हें धोखा नहीं दे रहे हैं, कि वे अच्छे व्यक्ति हैं। धोखेबाज लोग ऐसी चीजें करने के आदी होते हैं। अगर दो धोखेबाज लोग साथ हों, तो साजिश, संघर्ष और षड्यंत्र का होना लाजिमी है। यह तकरार कभी खत्म नहीं होती, जिससे और गहरी नफरत पैदा होती है और वे कट्टर दुश्मन बन जाते हैं। अगर किसी धोखेबाज व्यक्ति के साथ तुम एक ईमानदार व्यक्ति हो, तो ये बर्ताव तुम्हें यकीनन परेशान कर देंगे। अगर वे बस यहाँ-वहाँ वैसे कर्म करते रहे, तो तुम कहोगे कि हरेक का स्वभाव भ्रष्ट है, और ऐसी चीजों से बचना मुश्किल है। लेकिन अगर वे सारा समय यूँ ही करते रहे, तो तुम्हें इन तरीकों से खास तौर पर घृणा होगी, नफरत होगी; तुम्हें उनके इस पहलू और उनके इन इरादों से नफरत हो जाएगी। जब तुम इस हद तक नफरत करोगे, तो उनसे घृणा कर उन्हें ठुकरा सकोगे। यह बहुत सामान्य बात है। जब तक वे प्रायश्चित्त नहीं करते और थोड़ा बदलाव नहीं दिखाते, उनसे बातचीत नहीं की जा सकती।
तुम लोग क्या कहते हो—क्या धोखेबाज लोगों का जीवन थकाऊ नहीं है? वे अपना पूरा समय झूठ बोलने और फिर उन्हें छिपाने के लिए और ज्यादा झूठ बोलने और चालबाजी करने में लगा देते हैं। वे ही खुद को इतना थकाते हैं। वे जानते हैं कि इस तरह जीना थकाऊ है—फिर भी वे क्यों धोखेबाज बने रहना चाहते हैं, एक ईमानदार व्यक्ति क्यों नहीं बनना चाहते? क्या तुम लोगों ने कभी इस सवाल पर विचार किया है? यह लोगों के अपनी शैतानी प्रकृति द्वारा ठगे जाने का नतीजा है; यह उन्हें ऐसे जीवन और इस धोखेबाज स्वभाव से छुटकारा पाने से रोकता है। लोग इस भ्रष्ट स्वभाव में जीते हैं और शैतान द्वारा ठगे जाने और इसके भीतर जीने को तैयार रहते हैं; वे सत्य का अभ्यास नहीं करना चाहते, प्रकाश के मार्ग पर नहीं चलना चाहते। तुम्हें लगता है कि इस तरह जीना थकाऊ है और इस तरह कार्य करना जरूरी नहीं है—लेकिन धोखेबाज लोग सोचते हैं कि यह पूरी तरह से जरूरी है। वे सोचते हैं कि झूठ न बोलने और चालबाजी में लिप्त न होने से उनका मिथ्याभिमान और प्रतिष्ठा छिन जाएगी, उनका अपमान होगा और उनके हितों को भी नुकसान पहुँचेगा और वे बहुत कुछ खो देंगे। वे अपने मिथ्याभिमान, अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को संजोते हैं। यह उन लोगों का असली चेहरा है जो सत्य से प्रेम नहीं करते। संक्षेप में, जब लोग ईमानदार नहीं बनना चाहते और सत्य का अभ्यास नहीं करते, तब इसका कारण यह होता है कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। अपने दिल में वे हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे जैसी चीजों को सँजोते हैं, वे सांसारिक प्रवृत्तियों के पीछे भागना और शैतान की सत्ता के अधीन रहकर जीना पसंद करते हैं। यह उनकी प्रकृति की समस्या है। अभी ऐसे लोग हैं जिन्होंने वर्षों से परमेश्वर में विश्वास रखा है, अनेक धर्मोपदेश सुने हैं और जानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास रखना क्या होता है। लेकिन फिर भी वे सत्य का अभ्यास नहीं करते और जरा भी नहीं बदले हैं—ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए कि वे सत्य से प्रेम नहीं करते। भले ही वे थोड़ा-बहुत सत्य समझते हों, फिर भी वे उसका अभ्यास नहीं कर पाते। ऐसे लोग परमेश्वर में चाहे जितने वर्ष विश्वास रख लें, वह कुछ भी नहीं होगा। क्या सत्य से प्रेम न करने वालों को बचाया जा सकेगा? यह बिल्कुल नामुमकिन है। सत्य से प्रेम न करना किसी व्यक्ति के दिल, उसकी प्रकृति की समस्या है। इसे दूर नहीं किया जा सकता। परमेश्वर में अपने विश्वास में कोई बचाया जा सकता है या नहीं, यह मुख्य रूप से इस बात पर निर्भर करता है कि वह सत्य से प्रेम करता है या नहीं। सिर्फ सत्य का प्रेमी ही सत्य को स्वीकार सकता है; सिर्फ वही मुश्किलें झेल सकता है और सत्य की खातिर कीमत चुका सकता है, सिर्फ वही परमेश्वर से प्रार्थना कर उस पर भरोसा कर सकता है। सिर्फ वही सत्य को खोज सकता है और अपने अनुभवों के जरिए आत्मचिंतन कर खुद को जान सकता है, देह के खिलाफ विद्रोह करने, सत्य का अभ्यास प्राप्त करने और परमेश्वर को समर्पित होने का साहस रख सकता है। सिर्फ सत्य के प्रेमी ही उसका इस तरह अनुसरण कर सकते हैं, उद्धार के पथ पर चल सकते हैं और परमेश्वर की स्वीकृति पा सकते हैं। इसके सिवाय दूसरा कोई रास्ता नहीं है। सत्य से प्रेम न करने वालों के लिए इसे स्वीकार करना बहुत मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए कि अपनी प्रकृति से ही वे सत्य से विमुख होते हैं और उससे घृणा करते हैं। इसलिए अगर वे परमेश्वर का प्रतिरोध करना बंद कर देना चाहें या बुरे कर्म न करना चाहें, तो भी ऐसा करना उनके लिए बहुत मुश्किल होगा। वे शैतान के हैं और वे पहले ही दानव और परमेश्वर के शत्रु बन चुके हैं। परमेश्वर मानवजाति को बचाता है, वह दानवों या शैतानों को नहीं बचाता। कुछ लोग ऐसे सवाल पूछते हैं : “मैं वास्तव में सत्य को समझता हूँ। मैं सिर्फ उसका अभ्यास नहीं कर सकता। मैं क्या करूँ?” यह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम नहीं करता। अगर कोई सत्य से प्रेम नहीं करता, तो उसे समझकर भी वह उसका अभ्यास नहीं कर सकता क्योंकि दिल से वह ऐसा करने को तैयार नहीं है और उसे ऐसा करना पसंद नहीं है। ऐसा व्यक्ति उद्धार से परे है। कुछ लोग कहते हैं : “मुझे लगता है कि ईमानदार व्यक्ति बनकर तुम बहुत-सी चीजें खो देते हो, इसलिए मैं ऐसा व्यक्ति नहीं होना चाहता हूँ। धोखेबाज लोग कभी खोते नहीं—यहाँ तक कि वे फायदा उठाकर लाभान्वित होते हैं। तो मैं धोखेबाज बनना पसंद करूँगा। मैं दूसरों को अपना निजी काम जानने देने, मुझे समझने या बूझने देने को तैयार नहीं हूँ। मेरा भाग्य मेरे अपने हाथों में होना चाहिए।” फिर ठीक है, हर तरह से आजमाकर देख लो। देखो तुम्हें कैसा नतीजा मिलता है; देखो अंत में कौन नरक में जाता है और दंडित होता है।
क्या तुम सब ईमानदार लोग बनने को तैयार हो? इस संगति को सुनने के बाद तुम लोग क्या करना चाहते हो? तुम पहले किस बात से शुरू करोगे? (मैं झूठ न बोलकर शुरू करूँगा।) अभ्यास करने का यह सही तरीका है, मगर झूठ न बोलना आसान नहीं होता। लोगों के झूठ के पीछे अक्सर मंशाएँ होती हैं, लेकिन कुछ झूठों के पीछे कोई मंशा नहीं होती, न ही उनकी जानबूझकर योजना बनाई जाती है, बल्कि वे बस स्वाभाविक रूप से निकल जाते हैं। ऐसे झूठों का समाधान करना आसान होता है। यदि झूठ के पीछे मंशाएँ होती हैं, तो लोग जानबूझकर ये झूठ बोल रहे होते हैं और ऐसे झूठ का समाधान करना मुश्किल होता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि ये मंशाएँ व्यक्ति की प्रकृति से आती हैं और शैतान की चालों का प्रतिनिधित्व करती हैं और ये झूठ जानबूझकर बोले जाते हैं। यदि कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य से प्रेम करता है, तो वह देह के खिलाफ विद्रोह करने और अपने व्यक्तिगत इरादों को छोड़ने में असमर्थ होगा, इसलिए उसे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उस पर निर्भर रहना चाहिए और समस्या का समाधान करने के लिए सत्य खोजना चाहिए। हालाँकि, झूठ बोलने की समस्या का एक ही बार में पूरी तरह से समाधान नहीं किया जा सकता और यह बार-बार उभरेगी, शायद कई वर्षों तक, जो कि सामान्य है। ऐसा इसलिए है क्योंकि झूठ बोलना एक भ्रष्ट स्वभाव द्वारा शासित होता है और शैतान की प्रकृति से उत्पन्न होता है। जब तक किसी व्यक्ति में यह भ्रष्ट स्वभाव अनसुलझा रह जाता है, तब तक झूठ बोलने की समस्या का पूरी तरह से समाधान नहीं हो सकता। जब तक लोग सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं, तब तक वे अपने झूठ बोलने की समस्या का समाधान करने के लिए लगातार सत्य खोज सकते हैं। केवल जब उनके जीवन स्वभावों में बदलाव आता है, तभी झूठ बोलने की समस्या का कमोबेश समाधान हुआ माना जा सकता है। लेकिन अभी, झूठ बोलने की समस्या का समाधान करने के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने की आवश्यकता है : जब यह एक बार सामने आए, तो एक बार इसका समाधान करो; जब यह दो बार सामने आए, तो दो बार इसका समाधान करो। इसमें लगे रहो और एक बार जब तुम्हारा जीवन स्वभाव बदल जाएगा, तब झूठ बोलने की समस्या का पूरी तरह से समाधान हो जाएगा। झूठ बोलने की समस्या का समाधान करने के लिए, तुम्हें एक लंबी लड़ाई लड़नी होगी, तुम्हें इसका समाधान करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना करने और सत्य खोजने पर निर्भर रहना चाहिए। हर बार जब तुम इसे प्रकट करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और सत्य खोजना चाहिए। तुम परमेश्वर से जितनी ज्यादा प्रार्थना करोगे, अपने भ्रष्ट स्वभाव से उतनी ही घृणा करोगे, और उतने ही सत्य का अभ्यास करने और उसे जीने को लालायित होगे। इस तरह तुम्हें झूठ का परित्याग करने की शक्ति मिलेगी। ऐसे अनुभव और अभ्यास के थोड़े समय के बाद तुम देख पाओगे कि तुम्हारे झूठ बहुत कम हो गए हैं, तुम ज्यादा आसानी से जी रहे हो, और अब तुम्हें झूठ बोलने या अपने झूठ छिपाने की जरूरत नहीं है। हालाँकि तुम शायद हर दिन ज्यादा न बोलो, मगर तुम्हारा हर वाक्य तुम्हारे दिल से आएगा और सच्चा होगा, जिसमें झूठ बहुत कम होंगे। इस तरह जीना कैसा लगेगा? क्या यह स्वतंत्र और मुक्त करने वाला नहीं होगा? तुम्हारा भ्रष्ट स्वभाव तुम्हें बाधित नहीं करेगा, तुम उसके बंधन में नहीं रहोगे, और कम-से-कम तुम ईमानदार व्यक्ति बनने के परिणाम देखना शुरू कर दोगे। बेशक विशेष हालात का सामना होने पर कभी-कभी शायद कुछ झूठ निकल आएँ। उदाहरण के लिए, जब तुम्हारा सामना किसी खतरे या किसी तरह की मुसीबत से हो, या तुम अपनी सुरक्षा बनाए रखना चाहो, तब तुम्हारे पास झूठ बोलने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता। फिर भी तुम्हें उस पर आत्मचिंतन कर उसे समझना चाहिए और झूठ बोलने की समस्या का समाधान करना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना कर कहना चाहिए : “मुझमें अभी भी झूठ और चालबाजी हैं। परमेश्वर मुझे पूरी तरह से मेरे भ्रष्ट स्वभाव से बचाए।” जब कोई जानबूझकर बुद्धि का प्रयोग करता है, तो यह भ्रष्टता का खुलासा नहीं माना जाता। इसी तरह से व्यक्ति को ईमानदार व्यक्ति बनने का अनुभव करना पड़ता है। इस तरह तुम्हारे झूठ और भी कम हो जाएँगे। आज तुम दस झूठ बोलते हो, कल शायद नौ बोलो, और परसों आठ। बाद में तुम सिर्फ दो-तीन ही बोलोगे। तुम ज्यादा-से-ज्यादा सत्य बोलोगे, और ईमानदार व्यक्ति बनने का तुम्हारा अभ्यास परमेश्वर के इरादों, उसके अपेक्षित मानकों के और ज्यादा करीब पहुँच जाएगा—और यह कितना अच्छा होगा! एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास करने के लिए तुम्हारे पास एक पथ और एक लक्ष्य होना चाहिए। सबसे पहले झूठ बोलने के मूल कारण का समाधान करो। तुम्हें अपने ये झूठ बोलने के पीछे के सार को जानना चाहिए। तुम्हें यह भी गहन-विश्लेषण करना चाहिए कि कौन-से इरादे और मंशाएँ तुम्हें ये झूठ बोलने को प्रेरित करती हैं, तुम्हारे भीतर ऐसी मंशाएँ क्यों हैं और उनकी प्रकृति क्या है। जब तुम इन सभी मसलों का स्पष्टीकरण कर लोगे, तो तुम झूठ बोलने की समस्या की असलियत जान चुके होगे, और एक बार जब तुम सत्य को समझ चुके होगे, तो कुछ घटित होने पर तुम्हारे पास अभ्यास के सिद्धांत होंगे। अगर तुम इस तरह से अभ्यास और अनुभव करते हो, तो यकीनन तुम्हें नतीजे दिखेंगे। एक दिन तुम कहोगे : “ईमानदार व्यक्ति होना आसान है। धोखेबाज होना बहुत थकाऊ है! मैं अब और धोखेबाज इंसान नहीं रहना चाहता, मुझे हमेशा सोचना पड़ता है कि कौन-सा झूठ बोलूँ और अपने झूठ कैसे छिपाऊँ। यह एक मानसिक रोगी होने की तरह है, जो विरोधाभासी बातें करता है—ऐसा जो ‘इंसान’ कहने लायक नहीं है! ऐसा जीवन बहुत थकाऊ है, अब मैं और उस तरह नहीं जीना चाहता!” इस समय तुम्हें सचमुच एक ईमानदार व्यक्ति होने की आशा होगी और इससे साबित होगा कि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की ओर आगे बढ़ रहे हो। यह एक कामयाबी है। बेशक, जब तुममें से कुछ लोग सच बोलने का अभ्यास करना शुरू करेंगे, तो तुम्हारा चेहरा लाल हो जाएगा, तुम शर्मिंदा महसूस करोगे और दूसरों के द्वारा हँसी उड़ाए जाने से डरोगे। तब तुम्हें क्या करना चाहिए? तब भी तुम्हें परमेश्वर से प्रार्थना कर उससे शक्ति देने की विनती करनी चाहिए। तुम कहो : “परमेश्वर! मैं ईमानदार व्यक्ति बनना चाहता हूँ, लेकिन मुझे डर है कि मेरे सत्य बोलने पर लोग मुझ पर हँसेंगे। मैं तुमसे विनती करता हूँ कि मुझे मेरे शैतानी स्वभाव के बंधन से बचा लो; मुझे स्वतंत्र और मुक्त होकर तुम्हारे वचनों के अनुसार जीने दो।” जब तुम इस तरह प्रार्थना करोगे, तो तुम्हारे दिल में और ज्यादा उजाला हो जाएगा, और तुम खुद से कहोगे : “इसे अभ्यास में लाना अच्छा है। आज मैंने सत्य का अभ्यास किया है। आखिरकार अब मैं एक बार ईमानदार व्यक्ति बन गया हूँ।” जब तुम इस तरह प्रार्थना करोगे, तो परमेश्वर तुम्हें प्रबुद्ध करेगा। वह तुम्हारे हृदय में कार्य करेगा, वह तुम्हें प्रेरित करेगा, तुम्हें इस बात का अनुभव करने देगा कि ईमानदार बनकर कैसा महसूस होता है। सत्य को इसी तरह अभ्यास में लाना चाहिए। बिल्कुल शुरुआत में तुम्हारे सामने कोई पथ नहीं होगा, लेकिन सत्य को खोजने से तुम्हें पथ मिल जाएगा। जब लोग सत्य को खोजना शुरू करते हैं, तो जरूरी नहीं कि उनमें आस्था हो। पथ न होना लोगों के लिए पीड़ादायक होता है, लेकिन जब एक बार वे सत्य को समझ लेते हैं, और उनके सामने अभ्यास का पथ होता है, तो उनके दिलों को आनंद मिलने लगता है। अगर वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाते हैं, तो उनके दिलों को आराम मिलेगा, उन्हें स्वतंत्रता और मुक्ति हासिल होगी। अगर तुम्हें परमेश्वर का थोड़ा सच्चा ज्ञान है, तो तुम इस संसार की तमाम चीजें स्पष्ट देख पाओगे; तुम्हारा हृदय प्रकाशित होगा, और तुम्हारे सामने एक पथ होगा। फिर तुम संपूर्ण मुक्ति और स्वतंत्रता प्राप्त करोगे। उस समय तुम समझ जाओगे कि सत्य का अभ्यास करने, परमेश्वर को संतुष्ट करने और एक सच्चा व्यक्ति बनने का क्या अर्थ होता है—और इसमें तुम परमेश्वर में अपने विश्वास के सही रास्ते पर चलोगे।
शरद ऋतु 2007