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स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है V

परमेश्वर की पवित्रता (II)

आज, भाइयो और बहनो, आइए हम एक भजन गाएँ। जो आप को पसंद हो और जिसे आप लोगों ने पहले नियमित रूप से गाया हो उसका पता लगाएँ। (हम परमेश्वर के वचन "दोष रहित शुद्ध प्रेम" का गीत गाना चाहेंगे।)

1. "प्रेम" एक दोष रहित शुद्ध भावना को दर्शाता है जहाँ आप प्रेम करने, महसूस करने, और विचारवान होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं। प्रेम में कोई शर्तें, कोई बाधाएँ और कोई दूरी नहीं होती हैं। प्रेम में कोई संदेह नहीं होता है, कोई धोखा नहीं होता है, कोई चालाकी नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं होती है और कुछ भी अशुद्धता नहीं होती है। यदि आप प्रेम करते हैं, तो आप किसी चीज़ को प्राप्त करने या एक निश्चित धनराशि की माँग करने के लिए धोखा, शिकायत, विश्वासघात, विद्रोह, तक़ाज़ा या माँग नहीं करेंगे।

2. "प्रेम" एक दोष रहित शुद्ध भावना को दर्शाता है जहाँ आप प्रेम करने, महसूस करने, और विचारवान होने के लिए अपने हृदय का उपयोग करते हैं। प्रेम में कोई शर्तें, कोई बाधाएँ और कोई दूरी नहीं होती हैं। प्रेम में कोई संदेह नहीं होता है, कोई धोखा नहीं होता है, कोई चालाकी नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं होती है और कुछ भी अशुद्धता नहीं होती। यदि आप प्रेम करते हैं, तो आप खुशी से बलिदान करेंगे और कठिनाई को सहन करेंगे, और आप परमेश्वर के साथ अनुकूल हो जाएँगे। आप अपना सर्वस्व परमेश्वर के लिए त्याग देंगे: अपना परिवार, अपना (भविष्य), अपनी जवानी, और अपना विवाह। अन्यथा आपका प्रेम बिल्कुल भी प्रेम नहीं होगा, बल्कि धोखाधड़ी और विश्वासघात होगा!

चुनने के लिए यह अच्छा गीत था। क्या आप लोग इस गीत को गाना पसंद करेंगे? (हाँ)। इस गीत को गाने के पश्चात् आप लोग क्या महसूस करते हैं? क्या आप इस तरह के प्रेम को अपने भीतर महसूस करने में समर्थ हैं? (अभी तक पूरी तरह से नहीं)। गीत के कौन से शब्दों ने आपको बहुत गहराई तक झकझोर दिया? ("प्रेम में और कोई शर्त नहीं, कोई बाधा नहीं, कोई दूरी नहीं होती है। प्रेम में कोई संदेह नहीं, धोखा नहीं, और कोई चालाकी नहीं होती है। प्रेम में कोई दूरी नहीं और कुछ भी अशुद्धता नहीं होती है।" परन्तु अपने अंदर मैं अभी भी अशुद्धता को देखता हूँ और मैं यह भी देखता हूँ कि कहाँ मैं परमेश्वर के साथ समझौता करने का प्रयास करता हूँ, किन क्षेत्रों में मैं कम पड़ता हूँ, इसलिए जब मैं आज अपने बारे में सोचता हूँ तो पाता हूँ कि मैंने उस प्रकार का प्रेम अब तक प्राप्त नहीं किया जो शुद्ध और दोष रहित हो)। यदि आपने उस प्रकार का प्रेम प्राप्त नहीं किया जो शुद्ध और दोष रहित हो तो आपके पास किस प्रकार का प्रेम है? आपके भीतर प्रेम का स्तर क्या है? (मैं मात्र उस चरण पर हूँ जहाँ मैं खोजने की अभिलाषा रखता हूँ और तरस रहा हूँ।) अपनी स्वयं की कद-काठी के आधार पर और अपने स्वयं के अनुभवों से अपने वचनों का उपयोग करके आपने कौन सा स्तर प्राप्त किया है? क्या आपके पास धोखा है, क्या आपके पास शिकायतें हैं? (हाँ, हैं)। क्या आपके हृदय में माँगे हैं, क्या ऐसी चीज़ें हैं जिन्हें आप परमेश्वर से चाहते और अभिलाषा करते हैं? (हाँ, ये मिलावटी चीज़ें हैं)। किन परिस्थितियों में वे बाहर आती हैं? (जब परमेश्वर द्वारा मेरे लिए व्यवस्थित की गई परिस्थिति मेरे विचारों से मेल नहीं खाती है कि कैसी होनी चाहिए, या जब मेरी इच्छाएँ पूरी नहीं होती है, तो मैं इस प्रकार का भ्रष्ट स्वभाव दिखाऊँगा)। क्या आप लोग अक्सर इस गीत को गाते हैं? क्या आप चर्चा कर सकते हैं कि आप लोग "दोष रहित शुद्ध प्रेम" को किस तरह समझते हैं? और क्यों परमेश्वर प्रेम को इस तरह के परिभाषित करता है? (यह गीत मुझे सचमुच पसंद है क्योंकि मैं वास्तव में देख सकता हूँ कि यह प्रेम एक पूर्ण प्रेम है। हालाँकि मैं उस मानक से खुद को बहुत दूर महसूस करता हूँ। अभी मैं सत्य की खोज में मात्र उस स्तर पर हूँ जहाँ मैं कुछ चीज़ों का बलिदान करता हूँ और सत्य की खोज में कुछ व्यय सहता हूँ, किन्तु जैसे ही कोई चीज़ मेरे अपने भविष्य और नियति को प्रभावित करती है, तो मैं अंदर से द्वन्द्व महसूस करता हूँ। मैं देखता हूँ कि मुझे परमेश्वर पर कम विश्वास है)। (अब मैं महसूस करता हूँ कि मैं सच्चा प्रेम प्राप्त करने से अभी भी बहुत दूर हूँ, कुछ चीज़ें हैं जहाँ पर मैं उन तक प्रगति करने में समर्थ रहा हूँ, एक तरीका जिससे मैं इन्हें करता हूँ वह है उस सामर्थ के माध्यम से जो परमेश्वर के वचन मुझे देते हैं और दूसरा तरीका यह है कि इन परिस्थितियों में, मैं प्रार्थना के द्वारा परमेश्वर के साथ सहयोग करता हूँ। हालाँकि, जब यह अस्तित्व पर मेरे विचारों को शामिल करता है, तो कभी-कभी मैं उन पर क़ाबू नहीं पा सकता हूँ।) क्या आपने कभी उन चीज़ों के बारे में सोचा है जो आपको तब रोक रही होती थी जब आप उन पर क़ाबू नहीं कर पा सकते थे? क्या आपने इन विषयों पर आत्मविश्लेषण किया है? (हाँ, मैं आत्मविश्लेषण करता आया हूँ और अधिकांश समय मेरे स्वयं का गर्व और मिथ्याभिमान और साथ ही भविष्य और नियति की अपेक्षाएँ हैं जो एक बड़ा व्यवधान हैं)। जब आपका भविष्य और नियति आपके बड़े व्यवधान बन जाते हैं, तब क्या आपने कभी सोचा है कि ऐसा क्यों हो सकता है? आप अपने भविष्य और नियति से क्या चाहते हैं? (मैं इस मुद्दे पर पूर्णतः स्पष्ट नहीं हूँ, कभी-कभी मैं ऐसी परिस्थितियों का सामना करता हूँ जहाँ मुझे महसूस होता है कि मेरा कोई भविष्य या मेरी कोई नियति नहीं है, या कभी-कभी मैं यहाँ तक भी सोचता हूँ कि मेरा कोई ठिकाना नहीं है जब मुझे परमेश्वर द्वारा उजागर किया जाता है। ऐसे समयों में मैं बहुत कमज़ोर महसूस करता हूँ और महसूस करता हूँ कि यह मेरी स्वयं की बड़ी रूकावट बन गई है। कुछ अवधि के अनुभव के बाद और प्रार्थना के माध्यम से मेरी यह अवस्था एक नए मोड़ तक पहुँच सकती है, परन्तु मैं तब भी इस मुद्दे से प्रायः व्याकुल महसूस करता हूँ)। जब आप "भविष्य और नियति" कहते हैं, तब आप वास्तव में किसकी ओर इशारा कर रहे हैं? क्या ऐसा कुछ है जिसकी ओर आप इशारा कर सकते हैं? क्या यह कोई तस्वीर है या कोई ऐसी चीज़ है जिसकी आपने कल्पना की है या कोई ऐसी चीज़ है जिसे आप वास्तव में देख सकते हैं? क्या यह कोई वास्तविक चीज़ है? आप लोगों में से प्रत्येक को अपने मन में यह सोचना चाहिए कि आपके भविष्य और नियति को लेकर आपके हृदय में जो चिंताएँ हैं, वे किसकी ओर इशारा करती हैं? (ये बचाए जाने और जीवित रहने के लिए, और धीरे-धीरे परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने के योग्य बनने और अपने कर्तव्य को पूरा करने की प्रक्रिया के माध्यम से अपने कर्तव्य को मानक तक पूरा करने की आशा हैं। हालाँकि, मैं इन क्षेत्रों में प्रायः परमेश्वर द्वारा उजागर किया जाता हूँ और मैं यह महसूस करता हूँ कि मुझमें कमी रहती है, मानो कि मेरा कोई भविष्य नहीं हो)। अन्य भाई-बहनों को विचार-विमर्श करना चाहिए कि आप "दोष रहित शुद्ध प्रेम" को कैसे समझें? (अकेले व्यक्ति से कुछ भी अशुद्ध नहीं और वे अपने भविष्य और भाग्य द्वारा नियंत्रित नहीं होते हैं। इस बात की परवाह किए बिना कि, परमेश्वर उनके साथ कैसा बर्ताव करता है, वे परमेश्वर के कार्यों को पूर्णतः मानने में समर्थ होते हैं, और साथ ही परमेश्वर के आयोजनों का पालन करते हैं और अंत तक उसका अनुसरण करते हैं। परमेश्वर के लिए केवल इस प्रकार का प्रेम ही दोष रहित शुद्ध प्रेम है। केवल जब मैं अपने आप की तुलना उससे करता हूँ तो यह पाता हूँ कि इन कुछ वर्षों में मैंने परमेश्वर पर जो विश्वास किया है, सतही तौर पर, हो सकता है कि मैंने कुछ चीज़ों को बलिदान किया हो या और कुछ व्यय सहन किया हो, किन्तु मैं परमेश्वर को अपना हृदय वास्तव में देने में समर्थ नहीं रहा हूँ। जब परमेश्वर मुझे प्रकट करता है, तो मुझे ऐसा महसूस होता है मानो कि मेरा किसी ऐसे के रूप में चरित्र-चित्रण किया गया है जिसे बचाया नहीं जा सकता है, और मैं इसी नकारात्मक अवस्था में रहता हूँ। मैं स्वयं को अपना कर्तव्य करते हुए, किन्तु साथ ही परमेश्वर के साथ सौदेबाज़ी करने का प्रयत्न करते हुए भी देखता हूँ, और सम्पूर्ण हृदय से परमेश्वर से प्रेम करने में असमर्थ रहता हूँ और यह कि मेरी मंज़िल, मेरा भविष्य और मेरी नियति हमेशा मेरे मन में रहते हैं)।

ऐसा लगता है कि आप लोगों ने इस गीत को अक्सर गाया है और आप लोगों को इसकी कुछ समझ है और आपके वास्तविक अनुभवों के साथ इसके कुछ संबंध है। हालाँकि इस "दोष रहित शुद्ध प्रेम" गीत के प्रत्येक पद की स्वीकृति का हर एक का भिन्न-भिन्न स्तर है। कुछ लोग इच्छुक हैं, कुछ लोग अपने भविष्य को एक ओर रखने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ लोग अपने परिवार को एक ओर रखने की कोशिश कर रहे हैं, कुछ लोग कुछ भी पाने की तलाश नहीं कर रहे हैं। फिर भी कुछ अन्य लोग परमेश्वर को धोखा नहीं देना, कोई शिकायत न करना और परमेश्वर के विरुद्ध विद्रोह नहीं करना स्वयं के लिए आवश्यक बना रहे हैं। क्यों परमेश्वर इस प्रकार का प्रेम करने की सलाह देना चाहेगा और यह चाहेगा कि लोग उसे इस तरह से प्रेम करें? क्या यह ऐसे प्रकार का प्रेम है जिसे लोग इसे प्राप्त कर सकते हैं? अर्थात्, क्या लोग इस प्रकार का प्रेम करने में समर्थ हैं? हो सकता है कि लोग यह देखें कि वे ऐसा प्रेम नहीं कर सकते हैं, क्योंकि उनके पास इस प्रकार का प्रेम बिल्कुल भी नहीं है। जब उनके पास यह है ही नहीं, और वे प्रेम के बारे में बुनियादी रूप से जानते ही नहीं हैं, तो परमेश्वर इन वचनों को कहता है, जो उनके लिए अनजान हैं। क्योंकि लोग इस दुनिया में रहते हैं, अपने भ्रष्ट स्वभाव में जीते हैं, इसलिए यदि लोगों के पास इस प्रकार का प्रेम होता और यदि कोई इस प्रकार का प्रेम रख सकता है, कि कोई अनुरोध नहीं करना, कोई माँग नहीं करना, अपने आप को समर्पित करने का इच्छुक होना, और कष्ट सहने को तैयार रहना और जो कुछ उनका अपना है उसे त्यागने को तैयार रहना, तो इस प्रकार का प्रेम रखने वाले कोई व्यक्ति, वह अन्य लोगों की नज़रों में कैसा देखा जाएगा? क्या वह सिद्ध व्यक्ति नहीं होगा? (हाँ, होगा)। क्या उस तरह का कोई सिद्ध व्यक्ति इस जगत में विद्यमान है? वह विद्यमान नहीं है, वह है क्या? इस प्रकार का कोई व्यक्ति दुनिया में बिल्कुल विद्यमान नहीं है, जब तक कि वह शून्यता में न जीता हो, ठीक है न? इसलिए, कुछ लोग—अपने अनुभवों के द्वारा—जैसा इन वचनों में विवरण दिया गया है वैसा बनने के लिए बहुत प्रयास व्यय करते हैं। वे स्वयं से निपटते हैं, स्वयं को संयमित करते हैं और यहाँ तक कि स्वयं को भी लगातार त्याग देते हैं: वे कष्ट सहते और उन गलत-धारणाओं का त्याग कर देते हैं जो उन्होंने रखी हुई थीं। वे उन तरीकों का त्याग कर देते हैं जिनके द्वारा वे परमेश्वर के प्रति विद्रोहशील थे, अपनी स्वयं की इच्छाओं और अभिलाषाओं का त्याग कर देते हैं। किन्तु अंत में वे अभी भी उन आवश्यकताओं को पूरा नहीं कर सकते हैं। ऐसा क्यों होता है? परमेश्वर लोगों द्वारा पालन किए जाने के लिए एक मानक प्रदान करने हेतु इन बातों को कहता है, ताकि लोग परमेश्वर द्वारा उनसे माँगे गए मानक को जानेंगे। पर क्या परमेश्वर कभी कहता है कि लोगों को इसे तुरंत प्राप्त करना चाहिए? क्या कभी परमेश्वर कहता है कि कितने समय में लोगों को इसे प्राप्त करना होगा? (नहीं)। क्या कभी परमेश्वर कहता है कि लोगों को उसे इस तरह से प्रेम करना होगा? क्या इस अंश में ऐसा कहा गया है? नहीं, इसमें ऐसा नहीं कहा गया है। परमेश्वर लोगों को बस उस "प्रेम" के बारे में बता रहा है जिसका वह उल्लेख कर रहा था। जहाँ तक लोगों द्वारा परमेश्वर को इस तरह से प्रेम करने और परमेश्वर से इस तरह से व्यवहार करने में समर्थ होने की बात है, तो परमेश्वर की अपेक्षाएँ क्या हैं? उन तक तत्क्षण या तुरंत पहुँचना आवश्यक नहीं है क्योंकि लोग ऐसा नहीं कर सकते हैं। क्या आप लोगों ने कभी इस बारे में सोचा है कि इस प्रकार से प्रेम करने के लिए लोगों को किन शर्तों को पूरा करने की आवश्यकता है। यदि लोग बार-बार इन वचनों को पढ़ेंगे तो क्या वे धीरे-धीरे इस प्रेम को पा लेंगे? (नहीं)। तब क्या शर्तें हैं? सबसे पहले, लोग परमेश्वर के प्रति संशय से कैसे मुक्त हो सकते हैं? (केवल ईमानदार लोग ही इसे प्राप्त कर सकते हैं)। धोखे से मुक्त होने के बारे में क्या कहेंगे? (इन्हें भी ईमानदार लोग होना चाहिए)। ऐसा व्यक्ति होना जो परमेश्वर से सौदेबाज़ी नहीं करना चाहता है? उसे भी एक ईमानदार व्यक्ति होना चाहिए। चालाकी न रखने वाले के बारे में क्या कहेंगे? प्रेम में कोई चुनाव नहीं होता है ऐसा कहना किस बात का इशारा करता है? क्या ये सब एक ईमानदार व्यक्ति होने का इशारा कर रहे हैं। यहाँ पर कई विस्तृत व्याख्याएँ हैं; इस प्रकार के प्रेम को लाने की परमेश्वर की क्षमता या इस प्रकार के प्रेम को परिभाषित करने की परमेश्वर की क्षमता, इसे इस प्रकार से कहना, किस बात की पुष्टि करता है? क्या हम कह सकते हैं कि परमेश्वर इस प्रकार का प्रेम रखता है? (हाँ)। आप लोग इसे कहाँ देखते हैं? (मनुष्यों के लिए परमेश्वर के प्रेम में)। क्या मनुष्यों के लिए परमेश्वर का प्रेम सशर्त है? (नहीं)। क्या परमेश्वर और मनुष्य के बीच में बाधाएँ या दूरी हैं? (नहीं)। क्या परमेश्वर को मनुष्यों पर संशय हैं? (नहीं)। परमेश्वर मनुष्यों को देखता है, सचमुच मनुष्यों को समझता है। क्या परमेश्वर मनुष्येम के प्रति धोखेबाज़ है? (नहीं)। चूँकि परमेश्वर इस प्रेम के बारे में इतनी पूर्णता से कहता है, तो क्या उसका हृदय या उसका सार भी इतना ही पूर्ण होगा? (हाँ)। क्या लोगों ने प्रेम को कभी इस तरह से परिभाषित किया है? (नहीं)। मनुष्य ने किन परिस्थितियों में प्रेम को परिभाषित किया है? मनुष्य प्रेम के बारे में कैसे बात करता है? क्या यह देना या अर्पण करना नहीं है? (हाँ)। प्रेम की यह परिभाषा सरल है, और इसमें सार का अभाव है।

परमेश्वर के प्रेम की परिभाषा और जिस तरह से परमेश्वर प्रेम के बारे में बोलता है, वे उसके सार के एक पहलू से सम्बन्धित हैं, किन्तु उसके सार के किस पहलू से? पिछली बार हमने एक महत्वपूर्ण विषय के बारे में संगति की, यह ऐसा विषय है जिस पर लोगों ने अक्सर चर्चा की है और जिसे पहले उठाया गया है, और यह एक शब्द है जो प्रायः परमेश्वर पर विश्वास करने के दौरान आता है, फिर भी यह एक ऐसा शब्द है जो लोगों को परिचित और अनोखा दोनों प्रतीत होता है, किन्तु ऐसा क्यों है? यह एक ऐसा शब्द है जो मनुष्यों की भाषा से आता है, लोगों के बीच इसकी परिभाषा विशिष्ट और अस्पष्ट है। यह शब्द है क्या? ("पवित्रता")। पवित्रता: यह वह विषय है जिस पर हमने पिछली बार संगति की थी। हमने इस विषय के बारे में थोड़ी सी संगति की थी, किन्तु हमारी संगति अधूरी थी। पिछली बार हमने जिस हिस्से के बारे में चर्चा की थी उसके आधार पर, क्या हर किसी ने परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में कोई नई समझ प्राप्त की? (हाँ)। अर्थात्, वह नई समझ क्या थी अथवा उन वचनों में ऐसा क्या है जिससे आप लोगों को महसूस हुआ कि परमेश्वर की पवित्रता की आप लोगों की समझ परमेश्वर की पवित्रता के बारे में मैंने जो संगति की उससे भिन्न थी? क्या इसने कुछ प्रभाव डाला? (परमेश्वर उस बात को कहता है जो वह अपने हृदय में महसूस करता है; यह शुद्ध है। यह पवित्रता का एक पहलू है)। यह उसका एक अंश है, क्या जोड़ने के लिए और कुछ भी है? (जब परमेश्वर मनुष्य के प्रति कुपित होता है तो उसमें पवित्रता होती है, और यह दोष रहित होता है)। (मैं परमेश्वर के अधिकार में उसकी सिद्धता, उसकी विश्वसनीयता, उसकी बुद्धि और सभी चीज़ों पर उसके प्रभुत्व को देखता हूँ। मैं इन चीज़ों को समझता हूँ।) "सभी चीज़ों पर प्रभुत्व" यह परमेश्वर के अधिकार के बारे में है, अब हम परमेश्वर की पवित्रता के बारे में बात कर रहे हैं। (जहाँ तक परमेश्वर की पवित्रता की बात है, मैं समझता हूँ कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव में उसका कोप और दया है, इसने मुझ पर बड़ा गहरा प्रभाव डाला है। परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव अनोखा है जिसकी अतीत में मुझे ऐसी समझ नहीं थी या मैं इसकी ऐसी परिभाषा नहीं जानता था। किन्तु आपकी संगति में आपने चर्चा की थी कि परमेश्वर का कोप मनुष्य के गुस्से से भिन्न है। यह कुछ ऐसा है जो किसी भी सृजन में नहीं है। परमेश्वर का कोप एक सकारात्मक चीज़ है और यह सिद्धांत पर आधारित है; यह परमेश्वर के अंतर्निहित सार के कारण भेजा जाता है। यह इसलिए है क्योंकि उसे कुछ नकारात्मक दिखाई देता है और इसलिए परमेश्वर अपना कोप जारी करता है। परमेश्वर की दया भी कुछ ऐसी चीज़ है जिसे कोई सृजन धारण नहीं करता है। भले ही मनुष्य के अच्छे कर्म हों या धार्मिक कार्य हों जो दया के समान माने जाते हों, किन्तु वे अशुद्ध होते हैं और उनके पीछे एक मंशा होती है। कुछ प्रकार की तथाकथित दया नक़ली और खोखली भी होती है। परन्तु मैंने परमेश्वर के उद्धार को देखा है जब वह लोगों पर अपनी दया दिखाता है, और यह दया मनुष्य को सीधे उद्धार की राह में ले आती है। यह लोगों को परमेश्वर पर विश्वास करने के सही पथ पर ले आती है जिसकी वजह से वे अपनी सुन्दर मंज़िल को प्राप्त करते हैं। इसलिए परमेश्वर की दया उसके सार में बसती है। भले ही परमेश्वर अपने कोप के कारण किसी शहर को नष्ट कर देता है, क्योंकि उसका दयावान सार है, तब भी वह उस शहर के लोगों को बचाने और सुरक्षित रखने में किसी भी समय या किसी भी स्थान पर अपनी दया दिखा सकता था। यह मेरी समझ है।) आपके पास परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की कुछ समझ है।

आज का हमारा विषय परमेश्वर की पवित्रता है। लोग प्रायः परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को उसकी पवित्रता के साथ जोड़ते हैं और उन सब ने उसके धार्मिक स्वभाव के बारे में कुछ सुना और जाना है। इसके अलावा, कई लोग, यह कहते हुए कि परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव पवित्र है, प्रायः परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव के साथ-साथ परमेश्वर की पवित्रता के बारे में बात करते हैं। हर कोई "पवित्र" शब्द से परिचित है और यह आमतौर पर उपयोग किया जाने वाला एक शब्द है, किन्तु उस शब्द के संकेतार्थों के सम्बन्ध में, लोग परमेश्वर की पवित्रता की किन अभिव्यक्तियों को देखने में समर्थ हैं? परमेश्वर ने ऐसा क्या प्रकट किया है जिसे लोग मान सकें? मुझे चिंता है कि यह कुछ ऐसा है जिसे कोई नहीं जानता है। हम कहते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, किन्तु यदि आप परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव को लें और कहें कि यह पवित्र है, तो यह थोड़ा अस्पष्ट, थोड़ा भ्रमित करने वाला प्रतीत होता है, ऐसा क्यों है? आप कहते हैं कि परमेश्वर का स्वभाव धार्मिक है, या आप कहते हैं कि उनका धार्मिक स्वभाव पवित्र है, तो अपने हृदयों में आप लोग परमेश्वर की पवित्रता का कैसे चरित्र-चित्रण करते हैं, आप लोग उसे कैसे समझते हैं? अर्थात्, परमेश्वर ने क्या प्रकट किया या परमेश्वर के स्वरूप के बारे में ऐसा सब क्या है जिसे लोग पवित्र मानेंगे? क्या आपने इस बारे में पहले सोचा है? मैंने जो देखा है वह है कि लोग प्रायः सामान्य तौर पर उपयोग में लाए जाने वाले शब्द कहते या उन मुहावरों को बोलते हैं जो बार-बार कहे गए हैं, मगर वे यह भी नहीं जानते कि वे क्या कह रहे हैं? यह ठीक ऐसे ही है जैसे सब इसे कहते हैं, और वे इसे आदतन कहते हैं, इसलिए यह एक मुहावरा बन जाता है। हालाँकि, यदि वे इस बात को खोजते और वास्तव में विवरणों का अध्ययन करते, तो वे यह पाते कि उन्हें नहीं पता कि उसका वास्तविक अर्थ क्या है या यह किसकी ओर इशारा करता है। ठीक "पवित्र" शब्द की ही तरह, वास्तव में कोई नहीं जानता कि परमेश्वर की पवित्रता, जिसके बारे में लोग बात करते हैं, के संबंध में परमेश्वर के किस पहलू की ओर इशारा किया जा रहा है। जहाँ तक परमेश्वर के साथ "पवित्र" शब्द का सामंजस्य स्थापित करने की बात है, कोई नहीं जानता है और लोगों के हृदय भ्रमित हैं और वे इस बारे में उदार हैं कि वे कैसे मानते हैं कि परमेश्वर पवित्र है। किन्तु परमेश्वर कैसे पवित्र है? क्या कोई जानता है? इस मुद्दे पर कोई पूरी तरह से स्पष्ट नहीं है। आज हम परमेश्वर के साथ "पवित्र" शब्द का सामंजस्य स्थापित करने के विषय पर संगति करेंगे ताकि लोग परमेश्वर की पवित्रता के सार की वास्तविक विषयवस्तु को देख सकें, इससे कुछ लोग आदतन लापरवाही से इस शब्द का उपयोग करने और बातों को बेतरतीब ढंग से कहने से रुकेंगे जब वे नहीं जानते हैं कि उनके कहने का क्या अर्थ है, और भले ही कि वे सही और परिशुद्ध हों या नहीं। लोगों ने इसे हमेशा इसी तरह से कहा है, आपने इसे कहा है, मैंने इसे कहा है, और यह कहने का एक तरीका बन गया है और लोगों ने इस तरह "पवित्र" शब्द को अनजाने में दूषित कर दिया है।

जहाँ तक "पवित्र" शब्द की बात है, सतही तौर पर यह समझने में बहुत आसान प्रतीत होता है, है न? कम से कम, लोग "पवित्र" शब्द का अर्थ साफ, मैलरहित, पावन और शुद्ध के रूप में मानते हैं, या कुछ लोग हैं जो हमारे द्वारा अभी-अभी गाए गए भजन "दोष रहित शुद्ध प्रेम" में "पवित्रता" और "प्रेम" को सम्बद्ध करते हैं, जो कि सही है; यह इसका ही भाग है, परमेश्वर का प्रेम उसके सार का भाग है, किन्तु यह इसकी संमग्रता नहीं है। हालाँकि लोगों के दृष्टिकोण में, वे शब्द को देखते हैं और इसे उन चीज़ों के साथ जिन्हें वे स्वयं शुद्ध और साफ देखते हैं या उन चीज़ों के साथ जिन्हें वे व्यक्तिगत रूप से सोचते हैं कि वे मैली नहीं हैं और निष्कलंक हैं, संबद्ध करने की ओर प्रवृत होते हैं। उदाहरण के लिए, कुछ लोगों ने कहा है कि कमल का फूल साफ़ है, लोगों ने कमल के फूल को इस तरह कैसे परिभाषित किया? (कमल का फूल कीचड़ में उगता है फिर भी निष्कलंक खिलता है।") यह गंदे पानी में से निष्कलंक खिलता है, इसलिए लोग कमल के फूल के लिए "पवित्र" शब्द का प्रयोग करने लगे। कुछ लोगों ने दूसरों के द्वारा बनाई गई प्रेम कथाओं को पवित्र के रूप में देखा, या वे कुछ कल्पित योग्य नायकों को पवित्र के रूप में देखेंगे। इसके अलावा, कुछ लोगों ने बाइबिल या अन्य आध्यात्मिक पुस्तकों में लिखे गए लोगों को—जैसे कि संत या देवदूत, या अन्य लोग जिन्होंने परमेश्वर द्वारा किये जा रहे कार्य के दौरान उसका अनुसरण किया था—आध्यात्मिक अनुभव लिए हुए लोग मान लिया जो पवित्र थे। ये सब वे बातें हैं जो लोगों ने धारण कर ली थीं और ये सब वे धारणाएँ हैं जो लोगों की थीं। लोग इस तरही की धारणाएँ क्यों रखते हैं? इसका एक कारण है और वह बहुत सरल हैः ऐसा इसलिए है क्योंकि लोग भ्रष्ट स्वभाव के बीच जीते हैं और एक दुष्ट और गंदी दुनिया में रहते हैं। वे जो कुछ भी देखते हैं, वे जो कुछ भी छूते हैं, वे जो कुछ भी अनुभव करते हैं, वह शैतान की दुष्टता और शैतान की भ्रष्टता है और साथ ही कुचक्र, अंतर्कलह और युद्ध हैं, जो शैतान के प्रभाव में लोगों के बीच होते हैं। इसलिए, यहाँ तक कि जब परमेश्वर लोगों में अपना कार्य करता है, या यहाँ तक कि जब वह उन से बात करता है और अपना स्वभाव और सार प्रकट करता है, तब भी वे यह देखने या जानने में समर्थ नहीं होते हैं कि परमेश्वर की पवित्रता और सार क्या हैं। लोग प्रायः कहते हैं कि परमेश्वर पवित्र है किन्तु उन्हें कोई सच्ची समझ नहीं है; वे बस खोखले शब्द कह रहे हैं। क्योंकि लोग गंदगी, भ्रष्टता में रहते हैं और शैतान के अधिकार क्षेत्र में हैं, इसलिए वे प्रकाश को नहीं देखते हैं, सकारात्मक मामलों के बारे में कुछ नहीं जानते हैं, और इसके अलावा, सत्य को नहीं जानते हैं। इसलिए, कोई भी वास्तव में नहीं जानता कि पवित्र क्या है। यह कहने के बाद, क्या इस भ्रष्ट मानवजाति के बीच कोई पवित्र वस्तुएँ या पवित्र लोग हैं? (नहीं)। हम निश्चित रूप से कह सकते हैं कि, नहीं, कोई नहीं हैं, क्योंकि केवल परमेश्वर का सार ही पवित्र है।

परमेश्वर के सार की पवित्रता के बारे में, पिछली बार हमने इसके बारे में थोड़ी संगति की थी और इसने परमेश्वर की पवित्रता के लोगों के ज्ञान के लिए प्रेरणा के रूप में काम किया था, परन्तु यह पर्याप्त नहीं है। यह परमेश्वर की पवित्रता को पूरी तरह से जानने में लोगों की सहायता नहीं कर सकता है, और न ही यह समझने में उनकी मदद कर सकता कि परमेश्वर की पवित्रता अनोखी है। इसके अलावा, यह पवित्रता के सच्चे अर्थ के पहलू को लोगों को पर्याप्त रूप से नहीं समझने दे सकता है क्योंकि यह पूर्णतः परमेश्वर में सम्मिलित है। इसलिए यह आवश्यक है कि हम इस विषय में अपनी संगति को जारी रखें। पिछली बार हमारी संगति ने तीन विषयों पर विचार-विमर्श किया था, इसलिए अब हमें चौथे विषय पर विचार-विमर्श करना चाहिए, और हम धर्मग्रंथों को पढ़ना आरम्भ करेंगे।

शैतान का प्रलोभन

(मत्ती 4:1-4) तब आत्मा यीशु को जंगल में ले गया ताकि इब्लीस से उसकी परीक्षा हो। वह चालीस दिन, और चालीस रात निराहार रहा, तब उसे भूख लगी। तब परखने वाले ने पास आकर उससे कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे, कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ।" यीशु ने उत्तर दिया, "लिखा है, 'मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा'।"

ये वे वचन हैं जिनसे शैतान ने प्रभु यीशु को प्रलोभित करने का प्रयास किया था। इब्लीस ने जो कहा था उसकी विषयवस्तु क्या है? ("यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ")। इब्लीस ने ये वचन कहे, जो कि बिल्कुल साधारण हैं, किन्तु क्या इन वचनों की आवश्यक विषयवस्तु के साथ कोई समस्या है? (हाँ)। क्या समस्या है? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है," लेकिन अपने मन में क्या वह जानता था कि प्रभु यीशु परमेश्वर का पुत्र है? क्या वह जानता था कि वह मसीह है? (हाँ)। तो उसने क्यों कहा "यदि तू है"? (वह प्रभु को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था)। निस्संदेह, वह परमेश्वर को प्रलोभित करने का प्रयास कर रहा था, किन्तु ऐसा करने का उसका उद्देश्य क्या था? उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है।" अपने मन में वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र है, यह उसके मन में बिल्कुल स्पष्ट था, किन्तु इसके बावजूद, क्या उसने अपने आप का समर्पण किया या उसने उसकी आराधना की? (नहीं)। वह क्या करना चाहता था? वह प्रभु यीशु मसीह को क्रोधित करने और अपने प्रलोभन में फँसाने, और यीशु मसीह से इसके सोचे हुए तरीके के अनुसार काम करवाकर प्रभु यीशु को मूर्ख बनाने के लिए ऐसा करना और इन वचनों को कहना चाहता था। क्या इसका यही मतलब नहीं था? अपने मन में शैतान स्पष्ट रूप से जानता था कि यह प्रभु यीशु मसीह है, किन्तु उसने फिर भी इस तरह से कहा। क्या यह शैतान की प्रकृति नहीं है? शैतान की प्रकृति क्या है? (धूर्त, दुष्ट होना और परमेश्वर के प्रति श्रद्धा न रखना)। परमेश्वर के प्रति उसे कोई सम्मान नहीं है। यहाँ वह किस नकारात्मक चीज़ को कर रहा था? क्या वह परमेश्वर पर हमला करना नहीं चाहता था? वह परमेश्वर पर हमला करने के लिए इस विधि का उपयोग करना चाहता था, उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो कह दे कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ"; क्या यह शैतान की बुरी नीयत नहीं है? (हाँ, है)। वह वास्तव में क्या करने का प्रयास कर रहा था? उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट है: वह प्रभु यीशु मसीह के पद और पहचान को झूठा ठहराने के लिए इस विधि का उपयोग करने की कोशिश कर रहा था। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है तो इन पत्थरों को रोटियों में बदल दे। यदि तू ऐसा नहीं करता है, तो परमेश्वर का पुत्र नहीं है और बस यह काम तू मत कर"। क्या यहाँ उसका यही मतलब था? वह परमेश्वर पर हमला करने के लिए इस विधि का उपयोग करना चाहता था, और वह परमेश्वर के काम को तहस-नहस करके खत्म करना चाहता था; यह शैतान का दुराशय है। उसका दुराशय उसकी प्रकृति की स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। यद्यपि वह जानता था कि प्रभु यीशु मसीह परमेश्वर का पुत्र, स्वयं परमेश्वर का ही देहधारण है, फिर भी, परमेश्वर का पीछा करते हुए और उस पर लगातार आक्रमण करते हुए और परमेश्वर के कार्य को अस्तव्यस्त और नष्ट करने के लिए बड़े कष्ट उठाते हुए, वह इस प्रकार के काम करने से स्वयं को नहीं रोक सका।

अब, आइए हम इस वाक्यांश की व्याख्या करें जिसका उपयोग शैतान ने कियाः "कह दे कि ये पत्थर रोटियाँ बन जाएँ"। पत्थर को रोटी में बदलना—क्या इसका कुछ अर्थ है? यदि यहाँ भोजन है, तो क्यों ना इसे खाएँ? क्यों पत्थर को भोजन में बदलने की आवश्यकता है? क्या इसका यहाँ कुछ अर्थ है? (नहीं)। यद्यपि वह उस समय उपवास कर रहा था, तो निश्चित रूप से प्रभु यीशु के पास खाने को भोजन था? क्या उसने खाना खाया? (उसने खाया)। तो यहाँ हम इस कथन के शैतान के उपयोग की निरर्थकता को देखते हैं। शैतान कई चीज़ें करता है; आप उसके घातक और विद्वेषी स्वभाव को देखते हैं और देखते हैं कि वह परमेश्वर के कार्य को नष्ट करता है, वह घृणित और नागवार है। किन्तु दूसरी ओर, क्या आप उसके वचनों और कार्य के पीछे एक बचकानी और बेतुकी प्रकृति को पाते हैं? (हाँ)। यह शैतान के स्वभाव के बारे में एक प्रकाशन है; उसकी प्रकृति इसी प्रकार की है और वह इसी प्रकार का कार्य करेगा। लोगों के लिए आज, यह वाक्यांश निरर्थक और हास्यास्पद है। किन्तु ऐसे वचन निस्संदेह शैतान के द्वारा ही कहे जा सकते हैं। क्या हम कह सकते हैं कि वह अज्ञानी है? बेतुका है? शैतान की दुष्टता हर जगह है और लगातार प्रकट की जा रही है। और कैसे प्रभु यीशु उसे उत्तर देते हैं? ("मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं, परन्तु हर एक वचन से जो परमेश्वर के मुख से निकलता है, जीवित रहेगा")। क्या इन वचनों में कोई सामर्थ्य है? (सामर्थ्य है)। हम क्यों कहते हैं कि उनमें सामर्थ्य है? (वे सत्य हैं)। सही है। ये वचन सत्य हैं। अब, क्या मनुष्य केवल रोटी ही से जीवित रहता है? प्रभु यीशु ने चालीस दिन और रात उपवास किया। क्या वह भूख से मर गया? (नहीं)। वह भूख से नहीं मरा, इसलिए उसे इस तरह की बातों को कहते हुए पत्थर को खाने में बदलने के लिए उकसाते हुए शैतान उसके पास पहुँचा: "यदि तू पत्थर को खाने में बदल देगा तो क्या तेरे पास खाने की चीज़ें नहीं होगी? तब तुझे उपवास नहीं करना पड़ेगा, भूखा नहीं रहना पड़ेगा?" किन्तु प्रभु यीशु ने कहा, "मनुष्य केवल रोटी ही से नहीं जीवित रहेगा," इसका अर्थ यह है कि, यद्यपि मनुष्य भौतिक शरीर में रहता है, किन्तु जो उसे जीवन देता है, उसके भौतिक शरीर को जीवित रहने और साँस लेने देता है, वह भोजन नहीं, बल्कि परमेश्वर के मुख से कहे गए समस्त वचन हैं। एक ओर तो, मनुष्य इन वचनों को सच मानता है। ये वचन उसे विश्वास देते हैं, उसे यह महसूस कराते हैं कि वह परमेश्वर पर निर्भर रह सकता है, कि परमेश्वर सत्य है। दूसरी ओर क्या इन वचनों का कोई व्यवहारिक पहलू है? (हाँ, है)। क्यों? क्योंकि प्रभु यीशु ने चालीस दिन और रात तक उपवास किया और वह अभी भी वहाँ खड़ा है; अभी भी जीवित है। क्या यह एक दृष्टांत नहीं है? उसने चालीस दिन और रात तक कुछ नहीं खाया, कोई भोजन नहीं किया। और वह अभी भी ज़िंदा है। उसके वाक्यांश के पीछे यही शक्तिशाली गवाही है। वाक्यांश सरल है, किन्तु जहाँ तक प्रभु यीशु का सम्बन्ध है, क्या उसके हृदय का यह वाक्यांश उसे किसी और के द्वारा सिखाया गया था, या क्योंकि शैतान ने ऐसा कहा था केवल इसलिए उसने इसके बारे में सोचा था। इसके बारे में विचार करें। इसे दूसरी तरह से कहें तो, परमेश्वर सत्य है, परमेश्वर जीवन है। क्या परमेश्वर का सत्य और जीवन बाद में जोड़े गए थे। क्या यह अनुभव से उत्पन्न हुआ था? (नहीं)। नहीं, यह परमेश्वर में सहज है, मतलब यह कि सत्य और जीवन परमेश्वर का सार है। जो कुछ भी उससे घटित होता है, जो कुछ वह प्रकट करता है, वह सत्य है। यह सत्य, यह वाक्यांश—चाहे इसकी विषय-वस्तु लम्बी हो या छोटी—यह मनुष्य को जीने दे सकता है, उसे जीवन दे सकता है; यह मनुष्य को, स्वयं के भीतर, सत्य, मानव जीवन के मार्ग के बारे में स्पष्टता का पता लगाने में सक्षम बना सकता है, और उसे परमेश्वर पर विश्वास करने में सक्षम बना सकता है। दूसरे शब्दों में, इस वाक्यांश के उपयोग का परमेश्वर का स्रोत सकारात्मक है। तो क्या हम कह सकते हैं कि यह सकारात्मक वस्तु पवित्र है? (हाँ)। शैतान का वाक्यांश शैतान की प्रकृति से आता है। शैतान अपनी बुरी प्रकृति, दुर्भावनापूर्ण प्रकृति, हर जगह लगातार प्रकट करता है। अब, ये प्रकाशन, क्या शैतान उन्हें स्वभाविक रूप से करता है? (हाँ)। क्या कोई उसे उकसाता है? क्या कोई उसकी सहायता करता है? क्या कोई इसे विवश करता है? (नहीं)। यह इन सब को अपनी स्वयं की इच्छा जारी करता है। यह शैतान की दुष्ट प्रकृतदि है। जो कुछ भी परमेश्वर करता है और जैसे भी करता है, शैतान उसके पदचिन्हों का अनुसरण करता है। शैतान जो भी कहता और करता है उन चीज़ों का सार और उनकी सच्ची विशिष्टताएँ शैतान का सार—दुष्ट सार, दुर्भावनापूर्ण सार हैं। अब आगे पढ़ें, शैतान और क्या कहता है? आइए, हम नीचे पढ़ना जारी रखें।

(मत्ती 4:5-7) "तब इब्लीस उसे पवित्र नगर में ले गया और मंदिर के कंगूरे पर खड़ा किया, और उससे कहा, यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आपको नीचे गिरा दे; क्योंकि लिखा है: 'वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा, और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँव में पत्थर से ठेस लगे।'" यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्‍वर की परीक्षा न कर।'"

आइए, सबसे पहले हम शैतान के इस वाक्यांश पर विचार-विमर्श करें। उसने कहा, "यदि तू परमेश्वर का पुत्र है, तो अपने आप को नीचे गिरा दे," और तब उसने धर्मग्रंथों का उल्लेख किया, "वह तेरे विषय में अपने स्वर्गदूतों को आज्ञा देगा: और वे तुझे हाथों-हाथ उठा लेंगे; कहीं ऐसा न हो कि तेरे पाँव में पत्थर से ठेस लगे।" जब आप शैतान के वचनों को सुनते हैं तब आप कैसा महसूस करते हैं? क्या वे बहुत बचकाने नहीं हैं? वे बचकाने, निरर्थक और अरुचिकर हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? शैतान हमेशा कुछ मूर्खतापूर्ण कार्य करता रहता है, वह स्वयं को बहुत चतुर मानता है, और प्रायः धर्मग्रंथों—यहाँ तक कि परमेश्वर के ही वचन—का भी उल्लेख करता है, वह परमेश्वर पर आक्रमण करने और उसे प्रलोभित करने के लिए इन वचनों का उपयोग करने का प्रयास करता है। ऐसा करने में उसका उद्देश्य परमेश्वर के कार्य की योजना को नष्ट करना है। फिर भी, शैतान जो कहता है क्या उसमें आप किसी चीज़ पर ध्यान देते हैं? (उसमें दुष्ट इरादे होते हैं।) शैतान हमेशा से प्रलोभन देने वाला रहा है; वह सीधे तौर पर नहीं बोलता है, वह प्रलोभन, छल, और फरेब का उपयोग करते हुए गोल-मोल तरीके से बोलता है। शैतान परमेश्वर और मनुष्य दोनों को एक समान प्रलोभन देता है: वह सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य दोनों ही बहुत अज्ञानी, मूर्ख और चीजों में स्पष्टता से भेद करने में असमर्थ हैं। शैतान सोचता है कि परमेश्वर और मनुष्य एक समान रूप से उसके सार की वास्तविक प्रकृति को नहीं देख सकेंगे और यह कि परमेश्वर और मनुष्य एक समान रूप से उसकी चालाकी और पापमय नीयत की वास्तविक प्रकृति को नहीं देख सकेंगे। क्या यहीं से शैतान को उसकी मूर्खता नहीं मिलती है? इसके अलावा, शैतान खुल्लम-खुल्ला धर्मग्रंथों को उद्धृत करता है; वह सोचता है कि ऐसा करने से उसे विश्वसनीयता प्राप्त होगी, और आप इसमें गलती को नहीं पकड़ पाएँगे और इस तरह मूर्ख बनाए जाने से नहीं बच पाएँगे। क्या यहीं शैतान बेतुका और बचकाना नहीं हो रहा है? (हाँ)। यह ठीक वैसा ही है जैसा जब कुछ लोग सुसमाचार को फैलाते हैं और परमेश्वर की गवाही देते हैं, तो क्या नास्तिक कुछ उसी तरह का नहीं कहते हैं जैसा शैतान ने कहा था? क्या आप लोगों ने लोगों को वैसा ही कुछ कहते हुए सुना है? (हाँ)। जब आप अरुचि महसूस करते हैं तो क्या आप नफ़रत और विद्रोह भी महसूस करते हैं? (हाँ)। जब आपको ऐसी भावनाएँ होती हैं तो क्या आप यह पहचान पाते हैं कि शैतान और शैतान द्वारा मनुष्यों भ्रष्ट किया गया स्वभाव दुष्टता हैं। क्या आपने अपने मन में कभी ऐसा महसूस किया है कि, "परमेश्वर कभी इस तरह से नहीं बोलता है। शैतान के वचन हमले और प्रलोभन लाते हैं, उसके वचन बेतुके, हास्यप्रद, बचकाने और घृणास्पद होते हैं। हालाँकि, परमेश्वर के भाषण में और परमेश्वर के कार्यकलापों में, वह बोलने या अपने कार्य को करने के लिए कभी भी ऐसी विधि का उपयोग नहीं करेगा, और उसने कभी भी ऐसा नहीं किया है?" निस्संदेह, इस परिस्थिति में लोगों में किंचित-मात्रा में आगे बढ़ने की भावना रहती है और उन्हें परमेश्वर की पवित्रता का अहसास नहीं होता, है न? अपनी वर्तमान कद-काठी के साथ, आप लोग मात्र यही महसूस कर रहे हैं: "हर बात जो परमेश्वर कहता है वह सच है, यह हमारे लिए लाभकारी है, और हमें उसे अवश्य स्वीकार करना चाहिए"; इस बात की परवाह किए बिना कि क्या आप उसे स्वीकार करने में समर्थ हैं या नहीं, बिना अपवाद के आप कहते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है और यह कि परमेश्वर सत्य है, किन्तु आप यह नहीं जानते कि सत्य स्वयं में पवित्र है और यह कि परमेश्वर पवित्र है।

इसलिए, शैतान के वचनों का यीशु मसीह का उत्तर क्या था? (यीशु ने उससे कहा, "यह भी लिखा है: 'तू प्रभु अपने परमेश्‍वर की परीक्षा न कर'")। क्या यीशु ने जो वाक्यांश कहा उसमें सत्य है? (हाँ)। उसमें सत्य है। ऊपरी तौर पर यह लोगों द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए एक जैसा लगता है, यह बहुत सरल वाक्यांश हैं, परन्तु यही एक है जिसका मनुष्य और शैतान दोनों ने प्रायः उल्लंघन किया है। इसलिए, प्रभु यीशु ने उससे कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर," क्योंकि शैतान ने प्रायः यही किया है और उसने ऐसा करने के लिए पूरा प्रयास किया है, आप यहाँ तक कह सकते हैं कि शैतान ने बेशर्मी से ऐसा किया था। परमेश्वर से न डरना और अपने हृदय में परमेश्वर के प्रति सम्मान नहीं रखना यह शैतान का आवश्यक स्वभाव है। इसलिए यहाँ तक कि जब शैतान परमेश्वर के बगल में था और उसे देख सकता था, तब भी शैतान परमेश्वर को प्रलोभन देने से अपने आप को नहीं रोक सका। इसलिए, प्रभु यीशु ने शैतान से कहा, "तू प्रभु अपने परमेश्वर की परीक्षा न कर"। यह एक ऐसा वाक्यांश है जो परमेश्वर ने शैतान से प्रायः कहा है। क्या आज भी इस वाक्यांश का उपयोग करना उपयुक्त नहीं है? (है)। क्यों? (क्योंकि हम भी अक्सर परमेश्वर को प्रलोभन देते हैं)। लोग प्रायः परमेश्वर को प्रलोभित करते हैं, परन्तु लोग प्रायः ऐसा क्यों करते हैं? क्या ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि लोग शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से भरे हुए हैं? (हाँ)। इसलिए क्या शैतान ने ऊपर जो कहा है वह कुछ ऐसा है जो लोग प्रायः कहते हैं? (हाँ)। किन परिस्थितियों में? कोई यह कह सकता है कि समय और स्थान की परवाह किए बिना लोग ऐसा कहते आ रहे हैं। यह सिद्ध करता है कि लोगों का स्वभाव ठीक वैसा ही है जैसा शैतान का भ्रष्ट स्वभाव। प्रभु यीशु ने एक सरल वाक्यांश कहा, एक ऐसा जो सत्य का प्रतिनिधित्व करता है और जिसकी लोगों को आवश्यकता है। हालाँकि इस परिस्थिति में क्या प्रभु यीशु शैतान से बहस कर रहा था? क्या जो बात उसने शैतान से कही उसमें टकराव संबंधी कुछ था? (नहीं)। प्रभु यीशु ने शैतान के प्रलोभन को अपने मन में किस तरह देखा? क्या उसे अरुचि और नफ़रत महसूस हुई? (हाँ)। प्रभु यीशु को नफ़रत और अरुचि महसूस हुई, किन्तु उसने शैतान से वाद-विवाद नहीं किया, उसने किसी महान सिद्धांत के विषय में तो बिल्कुल बात नहीं की, क्या यह सही नहीं है? (हाँ, है)। ऐसा क्यों है? (प्रभु यीशु शैतान को मान्यता नहीं देना चाहता था)। वह शैतान को मान्यता क्यों नहीं देना चाहता था? (क्योंकि शैतान हमेशा से ऐसा ही है, वह कभी नहीं बदल सकता है)। क्या हम कह सकते हैं कि शैतान अविवेकी है? (हाँ, हम कह सकते हैं)। क्या शैतान मान सकता है कि परमेश्वर सत्य है? शैतान कभी नहीं मानेगा कि परमेश्वर सत्य है और कभी स्वीकार नहीं करेगा कि परमेश्वर सत्य है; यह उसकी प्रकृति है। इसके अलावा, शैतान के स्वभाव के बारे में कुछ और भी जो लोगों के लिए अरुचिकर है, वह क्या है? प्रभु यीशु को प्रलोभित करने के अपने प्रयास में, शैतान सोचता था कि भले ही उसने परमेश्वर को प्रलोभित करने का प्रयास किया और वह इसमें सफल नहीं हुआ, फिर भी शैतान ने प्रयास तो किया ही। यद्यपि उसे दण्डित किया जाएगा, फिर भी वह किसी भी तरह से ऐसा करेगा। यद्यपि ऐसा करने से उसका कुछ भला नहीं होगा, फिर भी वह ऐसा करेगा, और अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध डटा और खड़ा रहेगा। यह किस तरह की प्रकृति है? क्या यह दुष्टता नहीं है? (हाँ, है)। जो लोग भी परमेश्वर के नाम का उल्लेख किए जाने पर क्रोध से भर जाते हैं, क्या उन्होंने परमेश्वर को देखा है? जो लोग परमेश्वर के नाम का उल्लेख कि जाने पर गुस्से में आ जाता है, क्या वह परमेश्वर को जानता है? वह नहीं जानता है कि परमेश्वर कौन है, उस पर विश्वास नहीं करता है और परमेश्वर ने उनसे बात नहीं की है। परमेश्वर ने उसे कभी परेशान नहीं किया है तो फिर वह गुस्सा क्यों होता है? क्या हम कह सकते हैं कि यह व्यक्ति दुष्ट है? क्या यह कोई दुष्ट प्रकृति वाला व्यक्ति होगा? संसार में चाहे जो भी प्रवृत्तियाँ चल रही हों, चाहे वह मनोरंजन, भोजन, प्रसिद्ध लोग, सुन्दर लोग हों, इनमें से कोई भी चीज़ उन्हें परेशान नहीं करेगी, लेकिन "परमेश्वर" शब्द का एक उल्लेख उन्हें परेशान कर देता है; क्या यह दुष्ट प्रकृति का एक उदाहरण नहीं होगा? यह मनुष्य की दुष्ट प्रकृति के संतोषजनक सबूत का काम करता है? अब, आपके स्वयं की बात करें तो, क्या कभी ऐसे समय आए हैं कि सत्य का उल्लेख किया जाता है, या जब मनुष्य जाति के लिए परमेश्वर के परीक्षणों की चर्चा चलती है, या जब मनुष्य के विरुद्ध परमेश्वर के न्याय का उल्लेख किया जाता है, और आप नाराज़, अरुचि महसूस करते हैं और आप इस बारे में सुनना नहीं चाहते हैं? आप मन में सोचते है: यह कैसा सत्य है? क्या सभी लोगों ने नहीं कहा कि परमेश्वर सत्य है? यह सत्य नहीं है, यह स्पष्ट रूप से मनुष्य के लिए परमेश्वर की डाँट-फटकार का वचन है! कुछ लोग अपने मन में अरुचि भी महसूस कर सकते हैं: यह हर दिन लाया जाता है, उसके न्याय की ही तरह हर दिन हमारे लिए उसकी परीक्षा का उल्लेख हमेशा किया जाता है; इन सब का अंत कब होगा? हम अच्छी मंज़िल कब पाएँगे? यह ज्ञात नहीं है कि यह अनुचित क्रोध कहाँ से आता है। यह किस प्रकार की प्रकृति है? (दुष्ट प्रकृति)। यह शैतान की दुष्ट प्रकृति से प्रेरित होती है। जहाँ तक वह शैतान की दुष्ट प्रकृति और मनुष्य के भ्रष्ट स्वभाव के संबंध में परमेश्वर की बात है, वह कभी भी मनुष्य से वाद-विवाद या झगड़ा नहीं करता है, और जब मनुष्य अज्ञानता से कार्यकलाप करते हैं तो वह कभी उपद्रव नहीं करता है। आप चीज़ों पर परमेश्वर का दृष्टिकोण वैसा नहीं देखेंगे जैसा मनुष्य का होता है, और इसके अलावा, आप चीज़ों को सँभालने के लिए उसे मनुष्य के दृष्टिकोण, उनके ज्ञान, उनके विज्ञान या उनके दर्शनशास्त्र या मनुष्य की कल्पना का उपयोग करते हुए नहीं देखेंगे। इसके बजाय, परमेश्वर जो कुछ भी करता है और जो कुछ भी वह प्रकट करता है वह सत्य से जुड़ा होता है। अर्थात्, उसका कहा हर वचन और उसका किया हर कार्य सच से संबंधित है। यह सत्य और ये वचन कोई आधारहीन कल्पना नहीं है, बल्कि ये परमेश्वर के सार और उसके जीवन के कारण परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए हैं। क्योंकि ये वचन और परमेश्वर द्वारा की गई हर चीज़ का सार, सत्य हैं, इसलिए हम कह सकते हैं कि परमेश्वर का सार पवित्र है। दूसरे शब्दों में, प्रत्येक बात जो परमेश्वर कहता और करता है वह लोगों के लिए जीवन शक्ति और प्रकाश लाती है; यह लोगों को सकारात्मक चीज़ों को और उन सकारात्मक चीज़ों की वास्तविकता को देखने देती है और उन्हें सही राह पर चलने देती है। ये चीज़ें परमेश्वर के सार की वजह से निर्धारित की जाती हैं और ये परमेश्वर के सार की पवित्रता के कारण निर्धारित की जाती हैं। आप लोगों ने यह देखा है, है न? हम धर्मग्रंथ को पढ़ना जारी रखेंगे।

(मत्ती 4:8-11) फिर इब्लीस उसे एक बहुत ऊँचे पहाड़ पर ले गया और सारे जगत के राज्य और उसका वैभव दिखाकर उससे कहा, "यदि तू गिरकर मुझे प्रणाम करे, तो मैं यह सब कुछ तुझे दे दूँगा।" तब यीशु ने उससे कहा, "हे शैतान दूर हो जा, क्योंकि लिखा हैः तू प्रभु अपने परमेश्वर को प्रणाम कर, और केवल उसी की उपासना कर।" तब शैतान उसके पास से चला गया, और देखो, स्वर्गदूत आकर उसकी सेवा करने लगे।

शैतान इब्लीस ने, अपनी पिछली दो चालों में असफल होने के बाद, एक और कोशिश की: उसने प्रभु यीशु को सारे जगत के राज्य और उनका वैभव दिखाया और उससे शैतान की आराधना करने को कहा। इस स्थिति से आप शैतान की सच्ची विशिष्टताओं के बारे में क्या देखते हैं? क्या इब्लीस शैतान पूरी तरह से बेशर्म नहीं है? (हाँ, है)। वह कितना बेशर्म हो सकता है? हर चीज़ परमेश्वर द्वारा रची गई थी। फिर भी शैतान इसे पलटता है और परमेश्वर को दिखाते हुए कहता है कि "इन सभी राज्यों की सम्पत्ति और महिमा को देख। यदि तू मेरी उपासना करे तो मैं यह सब तुझे दे दूँगा"। क्या यह भूमिका को उलटना नहीं है? क्या शैतान बेशर्म नहीं है? परमेश्वर ने सब कुछ बनाया, किन्तु क्या यह उसके आनन्द के लिए था? परमेश्वर ने सब कुछ मनुष्य जाति को दे दिया, परन्तु शैतान उन सब को अपने कब्ज़े में करना चाहता था और बाद में उसने कहा, "मेरी आराधना कर। मेरी आराधना कर और मैं यह सब तुझे दे दूँगा।" यह शैतान का बदसूरत चेहरा है, वह पूर्णतः बेशर्म है, है न? शैतान "शर्म" शब्द का मतलब भी नहीं जानता है, और यह उसकी दुष्टता का एक और उदाहरण है। वह यह भी नहीं जानता कि "शर्म" क्या होती है। शैतान स्पष्ट रूप से जानता है कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और यह कि वह उसे प्रबंधित करता है और उस पर उसकी प्रभुता है। सब कुछ परमेश्वर का है, मनुष्य का नहीं, और शैतान का तो बिल्कुल नहीं, फिर भी इब्लीस शैतान ने निर्लज्जतापूर्वक कहा कि वह सब कुछ परमेश्वर को दे देगा। क्या शैतान फिर से कुछ घृणास्पद और शर्मनाक नहीं कर रहा है? परमेश्वर अब शैतान से और भी अधिक नफरत करता है, है न? मगर शैतान ने चाहे कुछ भी करने की कोशिश क्यों न की, लेकिन क्या प्रभु यीशु उसके झाँसे में आए? (नहीं)। प्रभु यीशु ने क्या कहा? (तू प्रभु अपने परमेश्वर ही की उपासना कर)। क्या इस वाक्यांश का कोई व्यवहारिक अर्थ है? (हाँ, है)। किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? हम शैतान के भाषण में उसकी दुष्टता और बेशर्मी को देखते हैं। अतः यदि मनुष्य ने शैतान की उपासना की होती, तो निष्कर्ष क्या होता? क्या वे सभी राज्यों का धन और महिमा प्राप्त करेंगे? (नहीं)। वे क्या प्राप्त करेंगे? क्या मनुष्य जाति शैतान के ही समान बेशर्म और हास्यपद बन जाएगी? (हाँ)। तब वे शैतान से भिन्न नहीं होंगे। इसलिए, प्रभु यीशु ने यह वाक्यांश कहा जो हर एक इंसान के लिए महत्वपूर्ण है: "तू प्रभु अपने परमेश्वर ही की उपासना कर, और उसी की सेवा कर", जो कहता है कि प्रभु के अलावा, स्वयं परमेश्वर के अलावा, यदि आप दूसरे की उपासना करते हैं, यदि आप इब्लीस शैतान की उपासना करते हैं, तब आप उसी गंदगी में मज़ा लेते हैं जिसमें शैतान है। तब आप शैतान की बेशर्मी और उसकी दुष्टता को साझा करते हैं, ठीक शैतान की तरह ही आप परमेश्वर को प्रलोभित करते हैं और उस पर हमला करते हैं। तब आपका अंत क्या होगा? आप परमेश्वर द्वारा घृणा किए जाएँगे, परमेश्वर द्वारा नीचे मार गिराए जाएँगे, और परमेश्वर द्वारा नष्ट कर दिए जाएँगे। क्या यह सही नहीं है? जब शैतान ने सफल हुए बिना कई बार प्रभु यीशु की परीक्षा ली थी उसके बाद, क्या उसने फिर प्रयास किया? शैतान ने प्रयास नहीं किया और फिर उसने छोड़ दिया। इससे क्या साबित होता है? इससे साबित होता है कि शैतान का दुष्ट स्वभाव, उसकी दुर्भावना, उसकी बेहूदगी, और उसकी निरर्थकता परमेश्वर के सामने उल्लेख करने योग्य नहीं है। प्रभु यीशु ने केवल तीन वाक्यों में शैतान को परास्त कर दिया था, उसके बाद वह अपनी दुम दबा कर खिसक गया, फिर से अपना चेहरा दिखाने में भी अत्यधिक शर्मिंदा हुआ, और उसने फिर कभी प्रभु को प्रलोभित नहीं किया। चूँकि प्रभु यीशु ने शैतान के इस प्रलोभन को परास्त दिया था, इसलिए अब वह आसानी से अपने उस कार्य को जारी रख सकता था जो उसे करना था और उन कार्यों को धारण कर सकता था जो उसके सामने पड़े थे। क्या इस परिस्थिति में जो कुछ भी प्रभु यीशु ने कहा और किया था, यदि उसे अब प्रयोग में लाया लाता है तो उसका सभी के लिए कोई व्यवहारिक अर्थ है? (हाँ, है)। किस प्रकार का व्यवहारिक अर्थ? क्या शैतान को हराना आसान कार्य है? (नहीं)। तब यह क्या होगा? क्या लोगों को शैतान की दुष्ट प्रकृति की समझ अवश्य होनी चाहिए? क्या लोगों को शैतान के प्रलोभनों की सही समझ अवश्य होनी चाहिए? (हाँ)। यदि आप अपने जीवन में कभी शैतान के प्रलोभनों का अनुभव करते हैं और आप शैतान की दुष्ट प्रकृति की असलियत का पता लगाने में समर्थ हैं, तो क्या आप उसे हराने में समर्थ होंगे? यदि आप शैतान की बेहूदगी और निरर्थकता के बारे में जानते हैं, तो क्या फिर भी आप शैतान के साथ खड़े हो कर परमेश्वर पर हमला करेंगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे)। यदि आप समझते हैं कि कैसे शैतान की दुर्भावना और बेशर्मी आपके माध्यम से प्रकट होती हैं—यदि आप स्पष्ट रूप से इन चीज़ों को पहचानते और जानते हैं—तो क्या आप फिर भी परमेश्वर पर इस प्रकार हमला करेंगे और उसे प्रलोभित करेंगे? (नहीं, हम नहीं करेंगे)। आप क्या करेंगे? (हम शैतान के विरुद्ध विद्रोह करेंगे और उसका परित्याग कर देंगे।) क्या यह आसान कार्य है? (नहीं)। यह आसान नहीं है, ऐसा करने के लिए, लोगों को अवश्य लगातार प्रार्थना करनी चाहिए, उन्हें अवश्य स्वयं को बार-बार परमेश्वर के सामने रखना चाहिए, और उन्हें अवश्य हमेशा स्वयं को जाँचते रहना चाहिए। उन्हें अवश्य परमेश्वर के अनुशासन, और उसके न्याय और ताड़ना के प्रति समर्पण करना चाहिए और केवल इसी तरह से लोग अपने आप को शैतान के धोखे और नियंत्रण से धीरे-धीरे मुक्त करेंगे।

हम उसकी कही इन बातों से उन बातों का सार प्रस्तुत कर सकते है जो शैतान के सार का निर्माण करती हैं। सबसे पहले, शैतान के सार को सामान्यतया दुष्टता कहा जा सकता है, जो परमेश्वर की पवित्रता के विपरीत खड़ी होती है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान का सार दुष्टता है? इसे देखने के लिए किसी को भी जो शैतान लोगों के साथ करता है उसके परिणामों को अवश्य देखना चाहिए। शैतान मनुष्य को भ्रष्ट और नियंत्रित करता है और मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के अधीन कार्य करता है, और ऐसी दुनिया में निवास करता है जो शैतान के द्वारा भ्रष्ट कर ही गई है और भ्रष्ट लोगों के बीच रहता है। आम लोग शैतान द्वारा अनजाने में कब्जा कर लिए जाते हैं और शैतान के सदृश बना लिए जाते हैं; और इसलिए मनुष्य में शैतान का दुष्ट स्वभाव है, जो कि शैतान की प्रकृति है। शैतान द्वारा कही और की गई हर चीज़ से, क्या आपने उसके अंहकार को देखा है? क्या आपने उसके छल और उसकी दुर्भावना को देखा है। शैतान का अंहकार प्राथमिक रूप से कैसे प्रदर्शित होता है? क्या शैतान सदैव परमेश्वर का स्थान लेना चाहता है? शैतान हमेशा से परमेश्वर के कार्य और परमेश्वर के पद को तबाह करने और इसे अपने स्वयं के लिए लेने की चाह रखता आया है ताकि लोग शैतान का अनुसरण, समर्थन और उसकी आराधना करें; यह शैतान का अंहकारी स्वभाव है। जब शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, तो क्या वह उनसे सीधे कहता है कि उन्हें क्या करना चाहिए? जब शैतान परमेश्वर को प्रलोभित करता है तो क्या वह सामने आ कर कहता है कि, "मैं तुझे प्रलोभित कर रहा हूँ, मैं तुझ पर हमला करने जा रहा हूँ"? वह ऐसा बिल्कुल नहीं करता है। शैतान कौन से तरीके का उपयोग करता है? वह बहकाता है, प्रलोभित करता है, हमला करता है, और अपना जाल बिछाता है, और यहाँ तक कि धर्मग्रंथों को भी उद्धृत करता है। अपने कुटिल उद्देश्य को पूरा करने के लिए शैतान कई तरीकों से बोलता और कार्य करता है। शैतान के ऐसा कर लेने के बाद, मनुष्य में जो अभिव्यक्त होता है उससे क्या देखा जा सकता है? क्या लोग अंहकारी़ नहीं हैं? हजारों सालों से मनुष्य शैतान की भ्रष्टता से पीड़ित रहा है और इसलिए मनुष्य अहंकारी, धूर्त, दुर्भावनाग्रस्त और अनुचित हो गया है? ये सभी बातें शैतान की प्रकृति के कारण उत्पन्न हुई हैं। चूँकि शैतान की प्रकृति दुष्ट है, इसलिए इसने मनुष्य को यह दुष्ट प्रकृति दी है और यह मनुष्य के लिए इस भ्रष्ट स्वभाव को लाया है। इसलिए मनुष्य भ्रष्ट शैतानी स्वभाव के अधीन जीता है और शैतान की तरह, मनुष्य परमेश्वर के विरोध में जाता है, परमेश्वर पर हमला करता है और उसे इस हद तक प्रलोभित करता है कि मनुष्य परमेश्वर की आराधना नहीं करता है और अपने हृदय में उसका सम्मान नहीं करता है?

परमेश्वर की पवित्रता के बारे में, भले ही यह एक परिचित विषय हो, किन्तु विचार-विमर्श में कुछ लोगों के लिए यह थोड़ा भावात्मक हो सकता है, और विषयवस्तु कुछ गहन हो सकती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अतीत में लोग इस विषय के व्यावहारिक पहलू से शायद ही कभी निपटते थे। किन्तु चिंता न करें, हम इसे धीरे-धीरे लेंगे और यह समझने में मैं तुम्हारी सहायता करूँगा कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है? आइए सबसे पहले हम यह कहें: यदि आप किसी को जानना चाहते हैं, तो केवल यह देखें कि वह क्या करता या करती है और उसके कार्यकलापों के परिणामों को देखें, और आप उस व्यक्ति के सार को देखने में समर्थ हो जाएँगे—आइए, सबसे पहले हम इस परिप्रेक्ष्य से परमेश्वर की पवित्रता को देखें। दूसरे शब्दों में, शैतान का सार दुष्टता है, और इसलिए मनुष्यों के प्रति शैतान के कार्यकलाप उन्हें अनवरत रूप से भ्रष्ट करना रहे हैं। शैतान दुष्ट है इसलिए वे लोग जिन्हें इसने भ्रष्ट कर दिया है निश्चित रूप से दुष्ट हैं, है न? क्या कोई कहेगा, "शैतान दुष्ट है, लेकिन शायद कोई जो इससे भ्रष्ट हुआ है वह पवित्र है?" क्या मज़ाक है, है न? क्या यह सम्भव भी है? (नहीं)। इसलिए इसके बारे में इस प्रकार न सोचें, आइए हम इस बारे में इस पहलू से बात करें। शैतान दुष्ट है, इसका एक आवश्यक और व्यावहारिक पक्ष है, और यह मात्र खोखली बात नहीं है। हम शैतान को बदनाम करने का प्रयत्न नहीं कर रहे हैं, हम सत्य और वास्तविकता के बारे में मात्र संगति कर रहे हैं। इससे कुछ लोगों को या किसी खास वर्ग के लोगों को ठेस पहुँच सकती है, परन्तु इसमें कोई दुर्भावनापूर्ण इरादा नहीं है; शायद आप लोग इसे आज सुनेंगे और थोड़ा असहज अनुभव करेंगे, किन्तु शीघ्र ही किसी दिन, जब आप उसे पहचानने में समर्थ हो जाएँगे, तो आप लोग अपने आप से घृणा करेंगे, और महसूस करेंगे कि आज हमने जिस बारे में बात की वह आप लोगों के लिए बहुत उपयोगी और बहुत मूल्यवान है। शैतान का सार दुष्टता है, इसलिए शैतान के कार्यकलापों के परिणाम भी अपरिहार्य रूप से दुष्ट ही हैं, या कम से कम, इसकी दुष्टता से सम्बन्धित है, क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हाँ)। तो कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है? सबसे पहले हमें दुनिया में और लोगों के बीच शैतान द्वारा गढ़ी गई दुष्टता, और जो कि दिखाई देती है, जिसे लोग महसूस कर सकते हैं, को अवश्य विशेष रूप से देखना चाहिए; क्या आप लोगों ने पहले कभी इस पर विचार किया है? हो सकता है कि आप लोगों ने इस पर ज्यादा विचार नहीं किया हो, इसलिए मुझे अनेक मुख्य बिन्दुओं को उठाने दीजिए। शैतान द्वारा प्रस्तावित क्रमिक-विकास के सिद्धांत को सब जानते हैं, है न? क्या यह मनुष्य द्वारा अध्ययन किया गया ज्ञान का एक क्षेत्र नहीं है? (हाँ, है)। इसलिए शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सबसे पहले ज्ञान का उपयोग करता है, और उन्हें अपने तरीकों से ज्ञान सिखाता है। फिर यह उन्हें भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान, विज्ञान, और रहस्यमयी चीज़ों या उन चीज़ों में जिन्हें मनुष्य खोजना चाहते हैं, उनकी रूचि को उभारते हुए, विज्ञान का उपयोग करता है। मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए अगली चीज़ें जिन्हें शैतान उपयोग में लाता है वे हैं पारम्परिक संस्कृति और अंधविश्वास, और उसके बाद, वह सामाजिक प्रवृत्तियों का उपयोग करता है। ये वे चीज़ें हैं जिनके संपर्क में लोग अपने दैनिक जीवन में आते हैं और ये सभी उन चीज़ों से जुड़ी हैं जो लोगों के करीब हैं, जो वे देखते हैं, जो वे सुनते हैं, जो वे स्पर्श करते हैं और जो वे अनुभव करते हैं। कोई कह सकता है कि वे प्रत्येक को घेरे रहती हैं, इंसान उन्हीं में उलझा रहता है और उनसे पार नहीं पा सकता है। मनुष्य जाति के पास इन चीज़ों से प्रभावित, संक्रमित, नियंत्रित, और बाध्य होने से बचने का कोई रास्ता नहीं है; वे उन्हें हटाने में सामर्थ्यहीन हैं।

1. कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है

सबसे पहले हम ज्ञान के बारे में बात करेंगे। क्या हर कोई ज्ञान को सकारात्मक चीज़ नहीं मानता है? या लोग, कम से कम यह तो सोचते ही हैं कि 'ज्ञान' शब्द का संकेतार्थ नकारात्मक की अपेक्षा सकारात्मक है। तो हम यहाँ क्यों उल्लेख कर रहे हैं कि शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? क्या क्रमिक-विकास का सिद्धांत ज्ञान का एक पहलू नहीं है? क्या न्यूटन के वैज्ञानिक नियम ज्ञान का भाग नहीं हैं? पृथ्वी का गुरूत्वाकर्षी आकर्षण का नियम ज्ञान का भाग है, है न? (हाँ)। तो फिर ज्ञान को उस विषयवस्तु में क्यो सूचीबद्ध किया जाता है जिसे मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए शैतान उपयोग में लाता है? आप लोगों का इसमें क्या विचार है? क्या ज्ञान में लेश मात्र भी सत्य का अंशमात्र होता है? (नहीं)। तब ज्ञान का सार क्या है? (यह सत्य के विरूद्ध जाता है)। मनुष्य जिस ज्ञान का अध्ययन करता है वह किस आधार पर सीखा जाता है? क्या यह क्रमिक विकास के सिद्धांत पर आधारित है? क्या, नास्तिकता के आधार पर, मनुष्य ने जिस ज्ञान की खोज की है, वह इसका परिणाम नहीं है? (हाँ)। इसलिए, क्या इसमें से किसी भी ज्ञान का परमेश्वर के साथ कोई सम्बन्ध है? क्या यह परमेश्वर की उपासना करने के साथ जुड़ा हुआ है? क्या यह सत्य के साथ जुड़ा हुआ है? (नहीं)। तो कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है? मैंने अभी-अभी कहा है कि इसमें से कोई भी ज्ञान परमेश्वर की उपासना करने या सत्य के साथ जुड़ा हुआ नहीं है। कुछ लोग इस बारे में इस तरह सोचते हैं: "हो सकता है कि इसका सत्य से कोई लेना-देना न हो, किन्तु यह लोगों को भ्रष्ट नहीं करता है।" आप लोग इस बारे में क्या सोचते हैं? क्या आपको ज्ञान के द्वारा यह सिखाया गया है कि लोगों की खुशी इस बात पर निर्भर करती है कि उन्होंने स्वयं अपने हाथों से क्या बनाया है? क्या ज्ञान ने कभी आपको यह सिखाया कि मनुष्य का भाग्य उसके अपने हाथ में है? (हाँ)। यह किस प्रकार का वार्तालाप है? (यह बकवास है)। बिल्कुल सही! यह बकवास है! विचार-विमर्श के लिए ज्ञान एक जटिल विषय है। आप सरल शब्दों में यह कह सकते हैं कि ज्ञान का एक क्षेत्र ज्ञान से अधिक कुछ नहीं है। यह ज्ञान का ऐसा क्षेत्र है जिसे परमेश्वर की उपासना नहीं करने और इस समझ के अभाव कि परमेश्वर ने ही सब कुछ रचा है, के आधार पर सीखा जाता है। जब लोग इस प्रकार के ज्ञान का अध्ययन करते हैं, तो वे परमेश्वर को सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखने वाले के रूप में नहीं समझते हैं, वे परमेश्वर को सभी चीज़ों के प्रभारी होने या सभी चीज़ों का प्रबंधन करने वाले के रूप में नहीं समझते हैं। इसके बजाय, वे जो कुछ भी करते हैं वह है कि वे ज्ञान के उस क्षेत्र की अनवरत शोध और खोज करते हैं, और ज्ञान के आधार पर उसके उत्तर पाते हैं। हालाँकि, यदि लोग ईश्वर पर विश्वास नहीं करें और इसके बजाय केवल शोध करें, तो वे कभी भी सही उत्तर नहीं पाएँगे, ठीक है न? ज्ञान आपको केवल जीवकोपार्जन ही देता है, यह केवल नौकरी देता है, वह केवल आमदनी प्रदान करता है ताकि आप भूखे न रहें, किन्तु वह आपको कभी भी परमेश्वर की आराधना नहीं करने देगा, और कभी भी आप को बुराई से दूर नहीं रखेगा। जितना अधिक आप ज्ञान का अध्ययन करेंगे, उतना ही आप परमेश्वर का विरोध करने, परमेश्वर की शोध करने, परमेश्वर को प्रलोभित करने, और परमेश्वर के विरूद्ध जाने की इच्छा करेंगे। अतः अब हम क्या देखते हैं कि ज्ञान लोगों को क्या सिखा रहा है? यह सब शैतान का फ़लसफ़ा है। क्या भ्रष्ट मनुष्यों में पाए जाने वाले शैतान के फ़लसफ़ों और जीवित रहने के नियमों का सत्य से कोई सम्बन्ध है? (नहीं)। उनका सत्य से कोई लेना-देना नहीं है, और वास्तव में, वे सत्य के विपरीत हैं। लोग प्रायः कहते हैं, "जीवन गति है"; यह कैसी बात है? (बकवास)। लोग यह भी कहते हैं "मनुष्य लोहा है, चावल इस्पात है, यदि मनुष्य एक बार का भोजन छोड़ता है, तो वह भूखा महसूस करता है"; यह क्या है? यह तो और भी बद्तर भुलावा है और यह सुनने में अरुचिकर है। तो ज्ञान एक ऐसी चीज़ है जिसके बारे में शायद हर कोई जानता है। मनुष्य के तथाकथित ज्ञान में, शैतान ने काफी कुछ अपने जीवन के फ़लसफ़े और अपनी सोच को भर दिया है, और जब शैतान ऐसा करता है, तो शैतान मनुष्य को शैतान की सोच, फ़लसफ़े, और दृष्टिकोण को अपनाने देता है ताकि मनुष्य परमेश्वर के अस्तित्व को नकार सके, सब चीज़ों पर परमेश्वर के प्रभुत्व और मनुष्य के भाग्य पर प्रभुत्व को नकार सके। तो जब मनुष्य का अध्ययन प्रगति करता है, जब वह अधिक ज्ञान प्राप्त कर लेता है, तो वह महसूस करता है कि परमेश्वर का अस्तित्व धुँधला होता जाता है, और मनुष्य यह भी महसूस कर सकता कि परमेश्वर का अस्तित्व ही नहीं है। क्योंकि शैतान ने अपने दृष्टिकोणों, अवधारणाओं, और विचारों को मनुष्य के मन में भर दिया है, तो जब शैतान ये विचार मनुष्य के दिमाग में भरता है, तो क्या मनुष्य इसके द्वारा भ्रष्ट नहीं हो जाता है? (हाँ)। अब मनुष्य अपना जीवन किस पर आधारित करता है? क्या वह सचमुच इस ज्ञान पर आश्रित हो रहा है? नहीं; मनुष्य अपने जीवन को शैतान के उन विचारों, दृष्टिकोण और फ़लसफ़ों पर आधारित कर रहा है जो कि इस ज्ञान में छिपे हुए हैं। यहीं पर शैतान की मनुष्य की भ्रष्टता का मर्म घटित होता है, यही शैतान का लक्ष्य और मनुष्य को भ्रष्ट करने की विधि है।

सबसे पहले हम इस विषय के सबसे सतही पहलू पर बात करेंगे। क्या भाषा सबकों के व्याकरण और शब्द लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं? क्या शब्द लोगों को भ्रष्ट कर सकते हैं? (नहीं)। शब्द लोगों को भ्रष्ट नहीं करते हैं; वे एक औज़ार हैं जो लोगों को बोलने देते हैं और ऐसे औज़ार हैं जिनसे लोग परमेश्वर के साथ संवाद करते हैं। इसके अलावा, भाषा ही और शब्द ही हैं जिनसे अब परमेश्वर लोगों के साथ संवाद करता है, वे औज़ार हैं, वे एक आवश्यकता हैं। एक और एक दो होते हैं, यह ज्ञान है, सही है? दो गुणा दो चार होते हैं, यह ज्ञान है, सही है? पर क्या यह आपको भ्रष्ट कर सकता है? यह सामान्यबोध और एक नियम है इसलिए यह लोगों को भ्रष्ट नहीं कर सकता है। तो कैसा ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है? वह ऐसा ज्ञान होता है जिसमें शैतान के दृष्टिकोणों और विचारों का मिश्रण होता है। शैतान इन दृष्टिकोणों और विचारों को ज्ञान के माध्यम से मानवजाति में भरने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए, किसी निबंध में, क्या लिखे गए शब्दों में कुछ ग़लत होता है? (नहीं)। समस्या कहाँ होगी? जब लेखक ने निबंध लिखा उस समय उसका दृष्टिकोण और अभिप्राय और साथ ही उसके विचारों की विषयवस्तु—ये आध्यात्मिक बातें हैं—लोगों को भ्रष्ट करने में समर्थ हैं। उदाहरण के लिए, यदि आप टेलीविज़न पर कोई कार्यक्रम देख रहे हों, तो इसमें किस प्रकार की बातें आपके दृष्टिकोण को बदल सकती हैं? क्या वह जो अभिनेता ने कहा, स्वयं शब्द, मनुष्य को भ्रष्ट करने में समर्थ हो सकते हैं? (नहीं)। किस प्रकार की बातें लोगों को भ्रष्ट करेंगी? ये कार्यक्रम के मूल विचार और विषय-वस्तु होंगे, जो निर्देशक के दृष्टिकोण का प्रतिनिधित्व करेंगे, इन दृष्टिकोणों में वहन की गई सूचनाएँ लोगों के मन और मस्तिष्क को प्रभावित कर सकती हैं। क्या यह सही है? (हाँ)। लोगों को भ्रष्ट करने के लिए शैतान द्वारा ज्ञान का उपयोग करने के अपने विचार-विमर्श में मैं जो संदर्भित कर रहा हूँ क्या आप लोग वह जानते हैं? (हाँ, हम जानते हैं)। आप ग़लत नहीं समझेंगे, है न? तो जब आप एक उपन्यास या निबंध को दोबारा पढ़ते हैं, तो क्या आप मूल्यांकन कर सकते हैं कि निबंध में व्यक्त किए गए विचार मनुष्य को भ्रष्ट अथवा मानवजाति की सहायता करते हैं या नहीं? (हम ऐसा थोड़ा सा ही कर सकते हैं)। यह कुछ ऐसा है जिसे एक धीमी गति से अध्ययन और अनुभव अवश्य किया जाना चाहिए, यह कुछ ऐसा नहीं है जो तुरंत आसानी से समझ में आता है। उदाहरण के लिए, ज्ञान के किसी क्षेत्र में शोध और अध्ययन करते समय, उस ज्ञान के कुछ सकारात्मक पहलू उस क्षेत्र के बारे में कुछ सामान्य बोध को, और लोगों को क्या नकारना चाहिए उसे समझने में आपकी सहायता कर सकते हैं। उदाहरण के लिए "बिजली" को लीजिए, यह ज्ञान का एक क्षेत्र है, है न? यदि आपको यह पता नहीं होता कि बिजली लोगों को झटका दे सकती है तो आप अनभिज्ञ रहते, है न? किन्तु यदि एक बार आप ज्ञान के इस क्षेत्र को समझ जाते हैं, तब आप बिजली की किसी चीज़ को छूने में असावधानी नहीं बरतेंगे और आप जान जाएँगे कि बिजली का उपयोग कैसे करें। ये दोनों सकारात्मक बातें हैं। कैसे ज्ञान लोगों को भ्रष्ट करता है इस बारे में हम जो विचार-विमर्श कर रहे हैं क्या आपको उस पर स्पष्ट हो गया है? (हाँ, हमें स्पष्ट हो गया है)। यदि आप समझ गए हैं तो फिर हम इस के बारे में आगे बात करना जारी नहीं रखेंगे क्योंकि दुनिया में अध्ययन किए जाने वाले कई प्रकार के ज्ञान हैं और आप लोगों को स्वयं उनमें अंतर करने के लिए अपना समय देना चाहिए।

2. कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने में विज्ञान का उपयोग करता है

विज्ञान क्या है? क्या विज्ञान लगभग प्रत्येक व्यक्ति के मन में बड़ी प्रतिष्ठा नहीं रखता है और अगाध नहीं माना जाता है? (हाँ, ऐसा है)। जब विज्ञान का उल्लेख किया जाता है, तो क्या लोग ऐसा महसूस नहीं करते कि, "यह कुछ ऐसी बात है जिसे सामान्य लोग नहीं समझ सकते हैं, यह एक ऐसा विषय है जिसकी केवल कुछ वैज्ञानिक शोधकर्ता या विशेषज्ञ ही चर्चा कर सकते हैं। इसका हम जैसे सामान्य लोगों से कोई सम्बन्ध नहीं है"? क्या इसका कोई सम्बन्ध है भी? (हाँ, है)। कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करता है? हम उन चीज़ों के अलावा जिनका लोग अपने जीवन में बार-बार सामना करते हैं अन्य चीज़ों के बारे में बात नहीं करेंगे। क्या आपने वंशाणुओं के बारे में सुना है? (हाँ)। आप सब इस शब्द से परिचित हैं, है न? क्या वंशाणु विज्ञान के माध्यम से खोजे गए थे? (हाँ)। वास्तव में वंशाणु लोगों के लिए क्या मायने रखते हैं? क्या ये लोगों को यह महसूस नहीं कराते हैं कि शरीर एक रहस्यमयी चीज़ है? जब लोगों को इस विषय से परिचित कराया जाता है, तो क्या ऐसे लोग नहीं होंगे—विशेषकर जिज्ञासु—जो और अधिक जानना चाहेंगे या और अधिक विवरण चाहेंगे? ये जिज्ञासु लोग अपनी ऊर्जा को इस विषय पर केन्द्रित करेंगे और जब वे व्यस्त नहीं होंगे, तो वे इसके बारे में और अधिक विवरण के लिये पुस्तकों में और इंटरनेट पर खोजेंगे। विज्ञान क्या है? स्पष्ट रूप से कहें तो, विज्ञान उन चीज़ों के बारे में विचार और सिद्धांत हैं जिनके बारे में मनुष्य जिज्ञासु है, जो बातें अज्ञात हैं, और जो उन्हें परमेश्वर द्वारा नहीं बताई गईं हैं; विज्ञान उन रहस्यों के बारे में विचार और सिद्धांत है जिन्हें मनुष्य खोजना चाहता है। विज्ञान का दायरा क्या है? आप कह सकते हैं कि यह सब चीज़ों को संपुटित करता है, किन्तु कैसे मनुष्य विज्ञान का कार्य करता है? क्या यह शोध के माध्यम से होता है? इसमें उन चीज़ों के विवरण और नियमों की शोध करना और फिर संदिग्ध सिद्धांतों को उत्पन्न करना शामिल है जिनके बारे में हर कोई सोचता है कि, "ये वैज्ञानिक सचमुच ज़बर्दस्त हैं। वे बहुत अधिक जानते हैं और इन चीज़ों को समझने के लिए उनमें बहुत ज्ञान है!" उनके पास उन लोगों के लिए काफी सराहना होती है, है न? जो लोग विज्ञान की शोध करते हैं, वे किस प्रकार का दृष्टिकोण रखते हैं? क्या वे ब्रह्माण्ड पर शोध, अपनी रूचि के क्षेत्र में रहस्यमयी चीज़ों पर शोध नहीं करना चाहते हैं? (हाँ)। इसका अंतिम परिणाम क्या है? कुछ विज्ञानों में अनुमानों के आधार पर अपने निष्कर्ष निकालने वाले लोग हैं, अन्य विज्ञानों में अपने निष्कर्षों के लिए लोगों के अनुभवों पर भरोसा करने वाले लोग हैं और विज्ञान के दूसरे क्षेत्रों में अनुभव और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के अवलोकनों के आधार पर अपने निष्कर्षों पर पहुँचने वाले लोग हैं। क्या यह सही है? (हाँ)। तो विज्ञान लोगों के लिए क्या करता है? विज्ञान जो करता है वह है कि यह लोगों को इस भौतिक जगत की वस्तुओं को देखने देता है और मनुष्य की जिज्ञासा मात्र को सन्तुष्ट करता है; यह मनुष्य को उन नियमों को नहीं देखने देता है जिनके द्वारा परमेश्वर सब चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। मनुष्य विज्ञान के द्वारा उत्तर पाता हुआ प्रतीत होता है, किन्तु वे उत्तर उलझन में डालने वाले होते हैं और केवल अस्थायी संतुष्टि लाते हैं, ऐसी संतुष्टि जो मनुष्य के मन को केवल इस भौतिक संसार तक सीमित रखने का काम करती है। मनुष्यों को महसूस होता है कि उन्हें विज्ञान से हर चीज़ का उत्तर पहले ही मिल गया है, इसलिए जो कुछ भी मामला उठ खड़ा होता है, वे अपने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के आधार पर उसे साबित या स्वीकृत करने का प्रयास करते हैं। मनुष्य का हृदय विज्ञान से ग्रस्त हो जाता है और उसके द्वारा इस हद तक बहक जाता है जहाँ मनुष्य के पास परमेश्वर को जानने, परमेश्वर की उपासना करने, और यह विश्वास करने का अब और मन नहीं होता है कि सभी चीज़ें परमेश्वर से ही आती हैं, और उत्तरों को पाने के लिए मनुष्य को उसकी ओर ही देखना चाहिए। क्या यह सच नहीं है? कोई व्यक्ति विज्ञान में जितना अधिक विश्वास करता है, वह यह मानते हुए कि हर चीज़ का एक वैज्ञानिक समाधान होता है, कि शोध किसी भी चीज़ का समाधान कर सकता है, उतना ही अधिक बेहूदा हो जाता है। वे परमेश्वर को नहीं खोजते हैं और यह विश्वास नहीं करते हैं कि उसका अस्तित्व है, यहाँ तक कि कुछ लोग जिन्होंने कई सालों तक परमेश्वर का अनुसरण किया है, सनक में आकर बैक्टीरिया की खोज करने चले जाएँगे या किसी मुद्दे के उत्तर के लिए जानकारी की खोज करेंगे। ऐसे व्यक्ति मुद्दों को सत्य के परिप्रेक्ष्य से नहीं देखते हैं और अधिकांश मामलों में ये वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञान पर या समस्या के समाधान करने के लिए वैज्ञानिक उत्तरों पर भरोसा करते हैं; किन्तु वे परमेश्वर पर भरोसा नहीं करते हैं, और वे परमेश्वर की खोज नहीं करते हैं। क्या इस तरह के लोगों के हृदय में परमेश्वर होता है? (नहीं)। कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो परमेश्वर की खोज भी उसी तरह से करना चाहते हैं जैसे वे विज्ञान का अध्ययन करते हैं। उदाहरण के लिए, कई धर्म विशेषज्ञ हैं जो उस स्थान पर गए हैं जहाँ महान जल प्रलय के बाद जहाज़ रुका था। उन्होंने जहाज़ को तो देख लिया है, किन्तु जहाज के प्रकटन में उन्होंने परमेश्वर के अस्तित्व को नहीं देखा। वे केवल कहानियों और इतिहास पर विश्वास करते हैं। यह उनके वैज्ञानिक शोध और भौतिक संसार के अध्ययन का परिणाम है। यदि आप भौतिक चीजों पर ही शोध करेंगे, चाहे यह सूक्ष्म जीव विज्ञान हो, खगोलशास्त्र या भूगोल हो, आप कभी भी ऐसा परिणाम नहीं पाएँगे जो कहता हो कि परमेश्वर का अस्तित्व है या यह कि वह सभी चीज़ों पर प्रभुत्व रखता है। क्या यह सही है? (हाँ, है)। तो विज्ञान मनुष्य के लिए क्या करता है? क्या वह मनुष्य को परमेश्वर से दूर नहीं करता है? क्या यह लोगों को परमेश्वर का अध्ययन करने की अनुमति नहीं दे रहा है? क्या यह लोगों को परमेश्वर के अस्तित्व के बारे अधिक संशयात्मक नहीं बनाता है? (हाँ)। तो किस प्रकार शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए विज्ञान का उपयोग करना चाहता है? क्या शैतान लोगों को धोखा देने और संज्ञाहीन करने के लिये वैज्ञानिक निष्कर्षों का उपयोग नहीं करना चाहता है, और शैतान लोगों के हृदयों को पकड़े रखने के लिये अस्पष्ट उत्तरों का उपयोग करता है ताकि वे परमेश्वर के अस्तित्व की खोज या उस पर विश्वास न करें। (हाँ)। इसलिए हम कहते हैं कि यह उन तरीकों में से एक है जिससे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है।

3. कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए पारम्परिक संस्कृति का उपयोग करता है।

क्या ऐसी कई बातें हैं जो पारम्परिक संस्कृति का एक अंग मानी जाती हैं? (हाँ)। इस पारम्परिक संस्कृति का अर्थ क्या है? (यह पूर्वजों से चली आती है।) यह पूर्वजों से चली आती है, यह एक पहलू है। आरंभ से ही, परिवारों, जातीय समूहों, यहाँ तक कि मानवजाति ने भी अपनी जीवन पद्धति, या अपने रीति-रिवाजों, कहावतों और नियमों को आगे बढ़ाया है, जो लोगों के विचारों में बैठ गए हैं। लोगों को इन चीज़ों से क्या मिलता है? लोग इन्हें अपने जीवन से अवियोज्य मानते हैं। वे इन चीज़ों को अपनाते हैं और इन्हें पालन किए जाने वाले नियम तथा जीवन मानते हैं, ओर वे कभी भी इन चीज़ों को बदलना या इनका परित्याग करना नहीं भी नहीं चाहते हैं क्योंकि ये उनके पूर्वजों से आयीं थीं। पारम्परिक संस्कृति के अन्य पहलू हैं, जैसे कि वे जो कन्फ्यूशियस या मेंशियस से आई थीं, या वे चीज़ें जो चीनी ताओवाद और कन्फ्यूशीवाद द्वारा लोगों को सिखाई गई थीं जो प्रत्येक व्यक्ति का अंतर्तम भाग बन गई हैं। क्या यह सही नहीं हैं? (हाँ, है)। पारम्परिक संस्कृति में क्या शामिल है? क्या इसमें वे त्यौहार शामिल हैं जो लोग मनाते हैं? उदाहरण के लिए, वसंत महोत्सव, दीप महोत्सव, चिंग मिंग दिवस, ड्रैगन बोट महोत्सव, और साथ ही भूत महोत्सव और मध्य-हेमंत महोत्सव। कुछ परिवार तब भी उत्सव मनाते हैं जब वरिष्ठ लोग एक निश्चित उम्र तक पहुँच जाते हैं, या जब बच्चे एक माह की उम्र के हो जाते हैं और जब वे 100 दिन की उम्र के हो जाते हैं। ये सब पारम्परिक त्यौहार हैं। क्या इन त्यौहारों की पृष्ठभूमियों में पारम्परिक संस्कृति नहीं है? पारम्परिक संस्कृति का मूल क्या है? क्या इनका परमेश्वर की उपासना से कुछ लेना-देना है? क्या इनका लोगों को सत्य का अभ्यास करने के लिए कहने से कुछ लेना-देना है? (नहीं)। क्या परमेश्वर के लिए बलिदान अर्पण करने, परमेश्वर की वेदी तक जाने और उसकी शिक्षाएँ प्राप्त करने के लिए लोगों के कोई त्यौहार हैं? क्या इस तरह के कोई त्यौहार हैं? (नहीं)। इन सभी त्यौहारों में लोग क्या करते हैं? (शैतान की उपासना करते हैं। खाते हैं, पीते हैं और फ़ुरसत की गतिविधियाँ करते हैं)। आधुनिक युग में इन्हें खाने, पीने और मज़े करने के अवसरों के रूप में देखा जाता है। पारम्परिक संस्कृति के पीछे क्या स्रोत है? पारम्परिक संस्कृति किस से है? (शैतान से)। यह शैतान से है। इन पारम्परिक त्यौहारों की पृष्ठभूमि में, शैतान मनुष्यों में चीज़ों को भर देता है, ये चीज़ें क्या हैं? यह सुनिश्चित करना कि लोग अपने पूर्वजों को याद रखें, क्या यह उनमें से एक है? उदाहरण के लिए, चिंग मिंग महोत्सव के दौरान लोग कब्रों की सफ़ाई करते हैं और अपने पूर्वर्जों को भेंट चढ़ाते हैं, ताकि लोग अपने पूर्वजों को भूलें नहीं। साथ ही, शैतान सुनिश्चित करता है कि लोग देशभक्त होना याद रखें, जैसे कि ड्रैगन बोट उत्सव के साथ। मध्य-हेमंत उत्सव के बारे में क्या कहेंगे? (पारिवारिक पुनर्मिलन)। पारिवारिक पुनर्मिलनों की पृष्ठभूमि क्या है? इसका कारण क्या है? (भावनाएँ)। भावनात्मक रूप से संवाद करना और जुड़ना। निस्संदेह, चाहे यह चंद्र नववर्ष की पूर्व संध्या मनाना हो या दीप-उत्सव, उन्हें मनाने के पीछे के कारण बताने के कई तरीके हैं। उन्हें मनाने के पीछे के कारण कोई कैसे भी बताए, किन्तु इनमें से प्रत्येक शैतान का अपना फ़लसफ़ा और सोच भरने का तरीका है, ताकि वे परमेश्वर से भटक जाएँ और यह न जानें कि परमेश्वर है, और यह कि वे या तो अपने पूर्वजों को या शैतान को बलिदान अर्पित करें, या कि यह देह-सुख के वास्ते मात्र खाने, पीने और मज़ा लेने का बहाना मात्र है। जब इनमें से हर एक उत्सव को मनाया जाता है, तो शैतान के विचार और दृष्टिकोण लोगों के मन में गहरे जम जाते हैं और उन्हें इसका पता भी नहीं चलता है। जब व्यक्ति अधेड़ या वृद्ध हो जाते हैं, तो शैतान के ये विचार और दृष्टिकोण पहले से ही उनके मन में गहरे जम चुके होते हैं। इसके अलावा, चाहे सही हों या गलत, विवेकहीनता से इन विचार को, बिना छिपाव के, अपनी अगली पीढ़ी के लिए संचारित करने का अपना पूरा प्रयास करते हैं। क्या यह सही है? (हाँ)। पारम्परिक संस्कृति और ये त्यौहार लोगों को कैसे भ्रष्ट करते हैं? क्या आप जानते हैं? (लोग इन परम्पराओं के नियमों से इतना विवश और बाध्य हो जाते हैं कि परमेश्वर को खोजने के लिए उनके पास समय और ऊर्जा नहीं बचती है)। यह एक पहलू है। उदाहरण के लिए, चंद्र नव वर्ष के दौरान हर कोई उत्सव मनाता है, यदि आपने नहीं मनाया, तो क्या आप दुःखी महसूस नहीं करेंगे? क्या कोई वर्जनाएँ हैं जिनका आप अनुसरण करते हैं? क्या आपको ऐसा महसूस नहीं होगा कि, "ओह, मैंने तो नववर्ष का उत्सव मनाया ही नहीं, चन्द्र नव वर्ष का यह दिन बहुत खराब था; क्या यह पूरा वर्ष खराब जाएगा?" क्या आप बेचैन और थोड़ा डरा हुआ महसूस नहीं करेंगे? कुछ लोग ऐसे भी हैं जिन्होंने वर्षों से अपने पुरखों के लिए बलि नहीं दी है और वे अचानक स्वप्न देखते हैं जिसमें कोई मृत व्यक्ति उनसे पैसा माँगता है, वे कैसा महसूस करेंगे? "कितने दुःख की बात है कि इस मृत व्यक्ति को खर्च करने के लिए पैसा चाहिए! मैं उनके लिए कुछ कागज की मुद्रा जला दूँगा, यदि मैं ऐसा नहीं करता हूँ तो यह बिल्कुल भी सही नहीं होगा। यदि मैं कुछ कागज की मुद्राएँ नहीं जलाता हूँ तो हम जीवित लोग किसी मुसीबत में पड़ सकते हैं, कौन कह सकता है कि त्रासदी कब आएगी?" उनके मन में डर और चिंता का यह छोटा सा बादल हमेशा मँडराता रहेगा। उन्हें यह चिंता कौन देता है? (शैतान)। इसे शैतान लाता है। क्या यह एक तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है? वह आपको इस हद तक नियंत्रित करने, आपको डराने, और आपको बाध्य करने के लिए भिन्न-भिन्न तरीकों और बहानों का उपयोग करता कि आप स्तब्ध रह जाते हैं और उससे हार मान लेते हैं और उसके सामने समर्पण कर देते हैं; इसी तरीके से शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। प्रायः जब लोग कमज़ोर होते हैं या वे परिस्थितियों से पूर्णतः अवगत नहीं होते हैं, तब वे असावधानी में, भ्रमित तरीके से कुछ कर सकते हैं, अर्थात्, वे अनजाने में शैतान के चंगुल में फँस जाते हैं और वे अनजाने में कुछ कर सकते हैं और वे नहीं जानते कि वे क्या कर रहे हैं। यही वह तरीका है जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है। अभी बहुत से लोग ऐसे हैं जो गहरी जड़ जमायी हुई सांस्कृतिक परम्पराओं से अलग नहीं होना चाहते और वे उन्हें बिल्कुल नहीं छोड़ सकते हैं। ऐसा विशेषरूप से तब होता है जब वे कमज़ोर और निष्क्रिय होते हैं कि वे इस प्रकार त्यौहार मनाने की इच्छा रखते हैं और वे फिर से शैतान से मिलना और उसे संतुष्ट करना चाहते हैं, जिसके माध्यम से वे अपने आप को अंदर से सहज भी बना सकते हैं। इन सांस्कृतिक परम्पराओं की पृष्ठभूमि क्या है? क्या पर्दे के पीछे से शैतान का काला हाथ डोर को खींच रहा है? क्या शैतान की दुष्ट प्रकृति चीज़ों को तोड़-मरोड़ कर नियंत्रित कर रही है? क्या शैतान इन सभी चीज़ों को नियंत्रित कर रहा है? (हाँ)। जब लोग इस पारम्परिक संस्कृति में जीते हैं और इस प्रकार के पारम्परिक त्यौहारों को मनाते हैं, तो क्या हम कह सकते हैं कि यह एक ऐसा परिवेश है जिसमें वे शैतान के द्वारा मूर्ख बनाए और भ्रष्ट किए जा रहे हैं, और इसके अलावा वे शैतान के द्वारा भ्रष्ट किए जाने से खुश हैं? (हाँ)। यह कुछ ऐसी चीज़ है जिसे आप सब लोग स्वीकार करते हो, जिसके बारे में आप लोग जानते हो।

4. कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग करता है।

आप "अंधविश्वास" शब्द से परिचित हैं, है न? अंधविश्वास और पारम्परिक संस्कृति में परस्पर-व्याप्त समानताएँ हैं, किन्तु आज हम उनके बारे में बात नहीं करेंगे, इसके बजाय मैं उन पर चर्चा करूँगा जिनसे सबसे ज़्यादा सामना होता है: भविष्य कथन, ज्योतिष, धूप जलाना, और बुद्ध की आराधना करना। कुछ लोग भविष्य कथन करते हैं, अन्य बुद्ध की आराधना करते हैं और धूप जलाते हैं, जबकि अन्य लोग अपना भाग्य पढ़वाते हैं या किसी को अपना चेहरादिखाकर अपना भाग्य ज्ञात करवाते हैं। आप लोगों में से कितनों ने अपना भाग्य ज्ञात करवाया या चेहरे को पढ़वाया है? यह चीज़ ऐसी है जिसमें अधिकांश लोग रुचि रखते हैं। है न? (हाँ)। ऐसा क्यों है? भविष्य कथन और ज्योतिष से लोगों को किस प्रकार का फायदा मिलता है? इससे उन्हें किस प्रकार की संतुष्टि मिलती है? (जिज्ञासा)। क्या यह मात्र जिज्ञासा है? मात्र ऐसा तो नहीं हो सकता है। भविष्य कथन का लक्ष्य क्या है? यह क्यों किया गया है? क्या यह भविष्य जानने के लिए नहीं है? कुछ लोग भविष्य का पूर्वानुमान लगाने के लिए अपना चेहरा पढ़वाते हैं, अन्य लोग ऐसा यह देखने के लिए करते हैं कि उनका भाग्य अच्छा होगा या नहीं। कुछ लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि उनकी शादी कैसी रहेगी, और फिर अन्य लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि आने वाला वर्ष कैसा भाग्य लाएगा? कुछ लोग यह देखने के लिए कि उनका और उनके पुत्रों या पुत्रियों का भविष्य कैसा रहेगा, और इन चीज़ों के सभी पहलुओं को देखने के लिए अपना चेहरा पढ़वाते हैं, और कुछ व्यापारी लोग यह देखने के लिए ऐसा करते हैं कि वे कितना पैसा कमाएँगे और कुछ मार्गदर्शन पा सकें कि उन्हें क्या करना चाहिए? क्या यह सिर्फ जिज्ञासा शांत करने के लिए है? (नहीं)। जब लोग अपना चेहरा पढ़वाते हैं या इस प्रकार की चीज़ें करते हैं, तो यह केवल उनके अपने भविष्य के व्यक्तिगत लाभ के लिए होता है और वे विश्वास करते है कि यह सब उनके स्वयं के भाग्य के साथ निकटता से जुड़ा है। क्या इनमें से कोई भी बात उपयोगी है? (नहीं)। यह उपयोगी क्यों नहीं हैं? क्या इस बारे में थोड़ा जानना अच्छी बात नहीं है? इससे आपको यह जानने में सहायता मिलती है कि कोई मुसीबत कब आ सकती है, ताकि आप उससे बच सकें, यदि आप उसके बारे में पहले से जानते हैं, है न? अपना भविष्य जान लेने से आपको उसके आधार पर मार्गदर्शन मिल जाता है, ताकि आने वाला वर्ष अच्छा हो सके और आप व्यापार करके धनी बन सकें। क्या यह उपयोगी नहीं है? (नहीं)। यह उपयोगी है या नहीं इसका हमसे कोई सम्बन्ध नहीं है, हम आज इस के बारे में संगति नहीं करेंगे; हमारे विचार-विमर्श में यह विषयवस्तु और विषय शामिल नहीं है। कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए अंधविश्वास का उपयोग करता है? लोग भविष्य कथन, चेहरा पढ़ना और ज्योतिष आदि जैसी चीज़ों के बारे में जो जानते हैं वह इसलिए है ताकि वे जान सकें कि भविष्य में उनका भाग्य कैसा रहेगा या और आगे का मार्ग कैसा दिखाई देता है, किन्तु अंत में, किस के हाथ पहले से ही इन चीज़ों को नियंत्रित कर रहे हैं? (परमेश्वर के हाथ)। वे परमेश्वर के हाथों में हैं। इन विधियों का उपयोग करने में, शैतान लोगों को क्या ज्ञात करवाना चाहता है? शैतान लोगों को यह बताने के लिए चेहरा पढ़ना और भविष्य कथन का उपयोग करना चाहता है कि वह उनका आगे का भविष्य जानता है, और शैतान लोगों को बताना चाहता है कि वह इन चीज़ों को जानता है, ये उसके नियंत्रण में हैं। शैतान इस तरह से इस अवसर का लाभ उठाना और लोगों को नियंत्रित करने में इन विधियों का उपयोग करना चाहता है कि लोग उस पर अंध विश्वास करें और उसके हर वचन को मानें। उदाहरण के लिए, यदि आपने अपना चेहरा पढ़वाया है, यदि भाग्य बताने वाला व्यक्ति अपनी आँखों को बंद करके आपके साथ पिछले कुछ दशकों में जो कुछ भी घटित हुआ है, उसे बड़ी स्पष्टता से आपको बताता है, तो आप कैसा महसूस करेंगे? आप अचानक महसूस करेंगे कि, "मैं वास्तव में इस भाग्य वक्ता की सराहना करता हूँ, वह कितना सटीक है! मैंने अपना अतीत पहले कभी किसी को नहीं बताया है, उसे इसके बारे में कैसे पता चला?" शैतान के लिए आपके अतीत को जानना बहुत कठिन नहीं होगा, है न? परमेश्वर ने आज तक आपकी अगुआई की है, और शैतान ने भी लोगों को शुरू से ही भ्रष्ट किया है और आपका पीछा किया है। आपके लिए दशाब्दियों का मार्ग शैतान के लिए कुछ भी नहीं है और इन चीज़ों को जानना उसके लिए कठिन नहीं है। जब आप जानते हैं कि जो शैतान ने कहा वह सटीक है, तो क्या आप अपना हृदय उसे नहीं दे रहे हैं? अपने भविष्य और भाग्य को, क्या आप उसके नियंत्रण पर नहीं छोड़ रहे हैं? पलक झपकते ही आपका हृदय उसके लिए कुछ आदर या सम्मान महसूस करेगा, और कुछ लोगों की आत्माओं को तो उसने पहले ही छीन लिया होगा। और आप तुरंत भाग्य वक्ता से पूछेंगे, "मैं आगे क्या करूँ? आने वाले साल में मुझे किस से बचना चाहिए? मुझे क्या नहीं करना चाहिए और फिर वह कहेगा कि "आपको वहाँ अवश्य नहीं जाना चाहिए, आपको यह अवश्य नहीं करना चाहिए, फ़लाँ रंग के कपड़े मत पहनो, आपको अमुक-अमुक स्थानों पर नहीं जाना चाहिए, और आपको फ़लाँ काम अधिक करना चाहिए।..." क्या आप उसकी हर बात को तुरंत नहीं मान ले लेंगे? आप उसे परमेश्वर के वचन की तुलना में अधिक तेजी से याद कर लेंगे। आप उसे इतनी शीघ्रता से क्यों याद कर लेते हैं? क्योंकि आप अच्छे भाग्य के लिए शैतान पर भरोसा करना चाहेंगे। क्या यही वह समय नहीं होता है जब वह आपके हृदय पर अपनी पकड़ बनाता है? जब आप वैसा ही करते हैं जैसा वह कहता है और परिणामस्वरूप उसके कहे हुए वचन वैसे ही सच हो जाते हैं जैसा पूर्वानुमान लगाया गया था, तब क्या आप यह जानने के लिए कि अगला साल कैसा भाग्य लाएगा, फिर से ठीक उसके पीछे नहीं जाना चाहेंगे? (हाँ)। आप वही करेंगे जो शैतान आपसे करने के लिए कहेगा और आप उन चीज़ों से बचेंगे जिनसे वह बचने के लिए कहता है, क्या आप उसकी कही हर बात का पालन नहीं कर रहे हैं? आपको शीघ्रता से उसके संरक्षण में लाया जाएगा, भटका दिया जाएगा और उसके नियंत्रण में रख दिया जाएगा। ऐसा इसलिए है क्योंकि जो वह कहता है आप विश्वास कर लेते हैं कि वह सत्य है और क्योंकि आप मानते हैं कि वह आपकी अतीत की ज़िन्दगियों के बारे, आपके वर्तमान जीवन के बारे में और भविष्य में क्या होगा यह भी जानता है; यही वह विधि है जिससे शैतान लोगों को नियंत्रित करता है। किन्तु वास्तविकता में कौन है जो नियंत्रण करता है? स्वयं परमेश्वर नियंत्रण करता है, शैतान नहीं। इस मामले में शैतान अज्ञानी लोगों को चकमा देने, उन लोगों को चकमा देने के लिए जो मानने और भरोसा करने में केवल भौतिक जगत को देखते हैं, अपनी चालाकियों का उपयोग कर रहा है। तब वे शैतान के चंगुल में पड़ जाएँगे और उसके हर वचन को मानेंगे। किन्तु क्या जब लोग परमेश्वर पर विश्वास करना और उसका अनुसरण करना चाहते हैं तब शैतान कभी छोड़ता है? शैतान नहीं छोड़ता है। इस परिस्थिति में क्या लोग वास्तव में शैतान के चंगुल में पड़ रहे हैं? (हाँ)। क्या हम कह सकते हैं कि इस संदर्भ में शैतान का व्यवहार सचमुच शर्मनाक है? (हाँ)। हम ऐसा क्यों कहेंगे? (शैतान चालबाजी का उपयोग करता है) क्योंकि शैतान की चालाकियाँ धोखा देने वाली और छल से भरी हुई हैं। शैतान बेशर्म है और शैतान लोगों को गुमराह करता है कि वह उनकी सभी चीज़ों को नियंत्रित करता है और लोगों को धोखा देता है कि वह उनके भाग्य को नियंत्रित करता है। वह अज्ञानी लोगों से पूरी तरह से अपनी बात मनवा लेता है और उन्हें केवल एक या दो वाक्य से ठग लेता है और हतप्रभ होकर, लोग उसके आगे झुक जाते हैं। तो शैतान किस प्रकार की विधियों का उपयोग करता है, वह आपसे उस पर विश्वास करने के लिए क्या कहता है? उदाहरण के लिए, आपने शैतान को नहीं बताया होगा कि आपके परिवार में कितने सदस्य हैं, किन्तु शायद वह बता दे कि एक सात साल की बेटी सहित आपके परिवार में तीन सदस्य हैं, और साथ ही आपके माता-पिता की उम्र बता दे। यदि आरम्भ में आपको कुछ शक या संदेह था भी तो क्या यह सुनने के बाद आप थोड़ा अधिक विश्वास नहीं करने लगेंगे? तब शैतान कह सकता है, "आज आपके लिए कार्य करना कठिन रहा है, आपके वरिष्ठ आपको उतना महत्व नहीं देते जितना आपको मिलना चाहिए और हमेशा आपके विरुद्ध कार्य करते हैं।" यह सुनने के बाद, आप सोचेंगे, "यह बिल्कुल सही है। काम पर सब चीज़ें सहज रूप से नहीं चल रही हैं।" तो आप शैतान पर थोड़ा और विश्वास करेंगे। फिर वह आपको धोखा देने के लिये कुछ और कहेगा, आपसे और भी अधिक विश्वास करवाएगा। धीरे-धीरे आप उसका और प्रतिरोध करने या उस पर सन्देह करने में अपने आप को असमर्थ पाएँगे। शैतान आपको सम्मोहित करने के लिए कुछ मामूली चालाकियों का, यहाँ तक कि तुच्छ छोटी-छोटी चालाकियों, का उपयोग करता है। जैसे ही आप सम्मोहित हो जाते हैं, आप अपने आपे में नहीं रहते हैं, आपकी समझ में नहीं आएगा कि क्या करें, और आप वही करना आरम्भ कर देंगे जो शैतान कहता है। यही वह "ओह, बहुत शानदार!" विधि है जो शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए उपयोग करता है, और जहाँ आप अनजाने में इसके जाल में फँस जाते हैं और इसके द्वारा बहकाए जाते हैं। शैतान आपसे कुछ बातें कहता है जिन्हें लोग अच्छी बातें मानते हैं, और तब वह आपसे कहता है कि क्या करना है और किससे बचना है और इस तरह से आप अनजाने में उस पथ पर चल पड़ते हैं। एक बार जब आप उस पथ पर चल पड़ते हैं, तो फिर आपको परेशानी के अलावा और कुछ नहीं मिलेगा; आप लगातार इसी बारे में सोचते रहेंगे कि शैतान ने क्या कहा और उसने आपसे क्या करने को कहा, और आप अनजाने में उसके कब्ज़े में हो जाएँगे। ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्यों में सत्य का अभाव है और इसलिए वे शैतान के प्रलोभन और बहकावे के विरुद्ध टिकने में असमर्थ हैं। शैतान की दुष्टता और उसकी धोखेबाजी, बेईमानी और दुर्भावना का सामना करने में मानवजाति बहुत अज्ञानी, अपरिपक्व और कमज़ोर है, है न? क्या यह उन तरीकों में से एक नहीं है जिनसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करता है? (हाँ, है)। मनुष्य अनजाने में, धीरे-धीरे, शैतान की विभिन्न विधियों द्वारा धोखा खाते और छले जाते हैं, क्योंकि उनमें सकारात्मक और नकारात्मक के बीच विभेद करने की योग्यता का अभाव है। उनमें इस कद-काठी का, और शैतान पर विजय पाने की क्षमता का अभाव है।

5. कैसे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए सामाजिक चलनों का उपयोग करता है।

सामाजिक चलन कब आरम्भ हुए? क्या ये एक एक नई घटना हैं? (नहीं)। तो क्या कोई ऐसा कह सकता है कि जब से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट करना आरंभ किया तभी से सामाजिक चलन अस्तित्व में आए? (हाँ)। सामाजिक चलनों में क्या शामिल हैं? (कपड़ों की शैली और श्रृंगार)। यह कुछ ऐसी चीज़ हैं जिनसे लोगों का अक्सर संपर्क होता है। कपड़ों की शैली, फैशन, चलन, यह एक छोटा सा पहलू है। क्या और भी कुछ है? क्या वे लोकप्रिय कहावतें भी कुछ महत्व रखती है जिसकी लोग प्रायः चर्चा करते हैं? क्या वह जीवनशैली महत्व रखती है जिसकी लोग कामना करते हैं? क्या संगीत के सितारे, विख्यात लोग, पत्रिकाएँ और उपन्यास जिन्हें लोग पसंद करते हैं महत्व रखते हैं? (हाँ)। आप लोगों के विचार में, इन चलनों का कौन सा पहलू मनुष्यों को भ्रष्ट करने में सक्षम है? इनमें से कौन सा चलन आप लोगों के लिए अत्यधिक मोहक है? कुछ लोग कहते हैं: "हम एक खास उम्र में पहुँच गए हैं, हम अपनी उम्र के चालीस, पचास, साठ, सत्तर या अस्सी के दशक में हैं जहाँ हम इस चलन के अनुकूल नहीं हो सकते हैं और अब इन चीज़ों पर हमारा ध्यान नहीं जाता है।" क्या यह सही है? दूसरे कहते हैं: "हम विख्यात लोगों का अनुसरण नहीं करते हैं, यह कुछ ऐसा है जो युवा किशोरों और बीस के दशक के युवाओं के लिए है; हम फैशनवाले कपड़े भी नहीं पहनते हैं, यह कुछ ऐसा है जो अपनी छवि के बारे में सतर्क लोग करते हैं।" तो इन में से कौन मनुष्य को भ्रष्ट करने में समर्थ है? (लोकप्रिय कहावतें)। क्या ये कहावतें लोगों को भ्रष्ट कर सकती हैं? यहाँ एक दी गई है, और आप लोग देख सकते हैं कि यह लोगों को भ्रष्ट करती है या नहीं, "दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है"; क्या यह एक चलन है? क्या यह आप लोगों के द्वारा उल्लेख किए गए फैशन और स्वादिष्ट भोजन के चलनों की तुलना में अधिक खराब नहीं है? (हाँ, है।) "दुनिया पैसों के इशारों पर नाचती है" यह शैतान का फ़लसफ़ा है और यह संपूर्ण मानवजाति में, हर मानव समाज में प्रचलन में है। आप कह सकते हैं कि यह एक चलन है क्योंकि यह हर एक को बताया गया है और अब उनके हृदय में पैठ कर गया है। लोग इस कहावत को स्वीकार नहीं करने से ले कर इसके बढ़ते हुए उपयोग तक जिसकी वजह से जब उनका वास्तविक जीवन से सम्पर्क हुआ, तो उन्होंने धीरे-धीरे इसे मौन सहमति दे दी, इसके अस्तित्व को मान लिया और अंततः, उन्होंने इस पर अपने अनुमोदन की मुहर लगा दी। क्या यही वह तरीका नहीं है जिससे शैतान मनुष्य को भ्रष्ट कर रहा है? शायद लोग इस कहावत को समान स्तर तक नहीं समझते हैं, बल्कि हर एक के, उन चीजों के आधार पर जो उनके आस पास घटित हुई हैं और अपने स्वयं के व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर, इस कहावत की व्याख्या और स्वीकृति के भिन्न-भिन्न स्तर हैं, है न? इस बात की परवाह किए बिना कि इस कहावत के साथ किसी का कितना अनुभव रहा है, इसका किसी के हृदय पर कितना नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है? (लोग पैसे का सम्मान करेंगे)। मानवीय स्वभाव के माध्यम से इस संसार में, आप लोगों में से प्रत्येक के सहित, लोगों की कोई चीज़ प्रकट होती हैं। इसकी व्याख्या कैसे की जाती है? यह पैसे की उपासना है। क्या इसे किसी के हृदय में से निकालना कठिन है? यह बहुत कठिन है! ऐसा प्रतीत होता है कि शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना सचमुच पूर्ण है! इसलिए जब शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए इस चलन का उपयोग कर लेता है उसके बाद, यह उनमें कैसे अभिव्यक्त होता है? क्या आप लोगों को नहीं लगता है कि बिना पैसे के आप लोग इस दुनिया में जीवित नहीं रह सकते थे, कि एक दिन जीना भी बिल्कुल असम्भव होता? (हाँ)। लोगों की हैसियत इस बात पर निर्भर करती है कि उनके पास जितना पैसा है उतना ही उनका सम्मान है। गरीबों की कमर शर्म से झुकी हुई हैं, जबकि धनी अपनी ऊँची हैसियत का मज़ा लेते हैं। वे ऊँचा और गर्व से खड़े होते हैं, ज़ोर से बोलते हैं और अंहकार से जीते हैं। यह कहावत और चलन लोगों के लिए क्या लाते हैं? क्या बहुत से लोग पैसा पाने को ही सबकुछ नहीं समझते हैं? क्या बहुत से लोग और अधिक पैसा कमाने की खोज में अपनी प्रतिष्ठा और ईमानदारी का बलिदान नहीं कर देते हैं? क्या और बहुत से लोग पैसा कमाने के वास्ते अपने कर्तव्य को करने और परमेश्वर को खोजने के अवसर को गँवा नहीं देते हैं? क्या यह लोगों का नुकसान नहीं है? (हाँ, है)। क्या लोगों को ऐसे स्तर तक भ्रष्ट करने के लिए इस विधि और इस कहावत का उपयोग करने में शैतान कुटिल नहीं है? क्या यह दुर्भावनापूर्ण चाल नहीं है? जैसे-जैसे आप इस लोकप्रिय कहावत का विरोध करने से लेकर अंततः इसे सत्य के रूप में स्वीकार करने तक प्रगति करते हैं, आपका हृदय पूरी तरह से शैतान के चंगुल में आता जाता है, और इस तरह आप अनजाने में उसी के अनुसार जीने लगते हैं। इस कहावत ने आपको किस हद तक प्रभावित किया है? हो सकता है कि आप सच्चे मार्ग को जानते हों, हो सकता है कि आप सत्य को जानते हों, किन्तु उसकी खोज करने में आप सामर्थ्यहीन हैं। हो सकता है कि आप परमेश्वर के वचन को स्पष्ट रूप से जानते हों, किन्तु आप कीमत चुकाने को तैयार नहीं हैं, कीमत चुकाने के लिये दुःख उठाने को तैयार नहीं हैं। इसके बजाय, बल्कि बिल्कुल अंत तक परमेश्वर के विरुद्ध जाने के लिए आप अपने भविष्य और नियति को त्याग देंगे। परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न कहे, परमेश्वर चाहे कुछ भी क्यों न करे, चाहे आपको इस बात का कितना ही अहसास क्यों न हो कि आपके लिए परमेश्वर का प्रेम गहरा और महान है, आप फिर भी अड़ियल ढंग से अपने रास्ते पर ही बने रहेंगे और इस कहावत की कीमत चुकाएँगे। अर्थात्, यह कहावत पहले से ही आपके व्यवहार और आपके विचारों को नियंत्रित करती है, और बजाय इस सब को त्यागने के बल्कि आप अपने भाग्य को इसी कहावत से नियंत्रित करवाते हैं। लोग ऐसा करते हैं, वे इस कहावत द्वारा नियंत्रित होते हैं और इस के द्वारा हेरफेर किए जाते हैं। क्या यह शैतान का मनुष्यों को भ्रष्ट करने का प्रभाव नहीं है? क्या यह शैतान के फ़लसफ़े और भ्रष्ट स्वभाव का आपके हृदय में जड़ जमाना नहीं हैं? यदि आप इसे करते हैं, तो क्या शैतान ने अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर लिया है? (हाँ)। क्या आप देखते हैं कि कैसे इस तरह से शैतान ने मनुष्य को भ्रष्ट कर दिया है? (नहीं)। आपने यह नहीं देखा। क्या आप इसे महसूस कर सकते हैं? (नहीं)। आपने इसे महसूस नहीं किया। क्या आप यहाँ शैतान की दुष्टता को देखते हैं? (हाँ)। शैतान हर समय और हर जगह मनुष्यों पर मनुष्य को भ्रष्ट करता है। शैतान मनुष्य के लिए इस भ्रष्टता से बचना असम्भव बना देता है और इसके लिए मनुष्य को असहाय बना देता है। शैतान अपने विचारों, अपने दृष्टिकोणों, और उससे आने वाली दुष्ट चीज़ों को आपसे ऐसी परिस्थितियों में स्वीकार करवाता है जहाँ आप अज्ञानता में होते हैं, और जब आपको यह मालूम नहीं होता है कि आपके साथ क्या हो रहा है। लोग इन चीज़ों को पूरी तरह स्वीकार करते हैं और उन पर कोई आपत्ति नहीं करते हैं। वे इन चीज़ों को प्यार करते हैं और एक खजाने की तरह सँभाले रखते हैं, वे इन चीज़ों को उनके साथ हेरफेर करने देते हैं, और इस तरह से शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करना और अधिक गहरा हो जाता है।

शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए नाना प्रकार की विधियों का उपयोग करता है। मनुष्य के पास ज्ञान और कुछ वैज्ञानिक सिद्धांत हैं, मनुष्य पारम्परिक संस्कृति के प्रभाव में जीता है, और प्रत्येक व्यक्ति पारम्परिक संस्कृति का उत्तराधिकारी है। मनुष्य शैतान के द्वारा उसे दी गई पारम्परिक संस्कृति को आगे बढ़ाने और साथ ही उन सामाजिक चलनों के साथ सामंजस्य में कार्य करने के लिये बाध्य है जो शैतान मनुष्यों को प्रदान करता है। जो कुछ शैतान करता है उसमें हर समय सहयोग देते हुए, उसके धोख़े, अहंकार, दुर्भावना और दुष्टता को स्वीकार करते हुए, मनुष्य शैतान से अभिन्न है। शैतान के इन स्वभावों को धारण कर लेने पर, क्या वह इस मनुष्यजाति के बीच और संसार में रहते हुए खुश रहा है या दुःखी? (दुःखी)। आप ऐसा क्यों कहेंगे? (वह इन चीज़ों से बँधा है और उसका जीवन एक कड़वा संघर्ष है)। हम्म? कोई व्यक्ति चश्मा लगाए हुए हो और दिखने में बहुत बुद्धिमान दिखाई देता हो; हो सकता है वह कभी न चिल्लाता हो, हमेशा बोलने में निपुण, तर्कसंगत हो, और इसके अलावा, अपनी अधिक आयु की वजह से, वह कई तरह की परिस्थितियों से होकर गुज़रा हो और बहुत अनुभवी हो; हो सकता है कि वह छोटे-बड़े मामलों में, विस्तार से बोलने में समर्थ हो; और जो वह कहता हो उसके पास उस बात का मज़बूत आधार हो, हो सकता है कि उसके पास चीज़ों की प्रमाणिकता और तर्क के लिए सिद्धांतों का संग्रह भी हो; हो सकता है कि लोग उसके व्यवहार, रूप-रंग को देखते हों, और देखते हों कि वह कैसे आचरण करता है, और उसकी निष्ठा और उसके चरित्र को देखते हों और उन्हें उसमें कोई दोष नहीं मिलता हो। ऐसे व्यक्ति मौजूदा सामाजिक रीतियों की आवश्यकताओं को विशेष रूप से पूरा करते हैं और कभी भी पुराने ढंग का नहीं समझे जाते हैं। भले ही हो सकता है कि ऐसा व्यक्ति वृद्ध हो, किन्तु वक्त के साथ कदम मिलाकर चलता है और वह सीखने के लिए कभी बहुत वृद्ध नहीं होता है। देखने में, कोई भी उसमें दोष नहीं निकाल सकता है, मगर अंदर से उसे शैतान के द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया जाता है। देखने में कुछ भी ग़लत नहीं होता है, वह विनम्र, सुसंस्कृत, ज्ञानवान और एक खास नैतिकता वाला होता है; उसमें ईमानदारी होती है और उसके पास चीज़ों का ज्ञान उस ज्ञान के तुलनात्मक होता है जो युवा लोगों के पास होता है। हालाँकि, उसके स्वभाव और उसके सार के सम्बन्ध में, यह व्यक्ति शैतान का पूर्ण और जीवित प्रतिमान है। वह शैतान की निकटतम सदृशता है। यह शैतान का मनुष्य को भ्रष्ट करने का "परिणाम" है। मैंने जो कहा है हो सकता है कि वह आपको ठेस पहुँचाए, किन्तु यह सब सत्य है। जिस ज्ञान का मनुष्य अध्ययन करता है, जिस विज्ञान को वह समझता है और सामाजिक चलन में तालमेल बिठाने के लिए जिन उपायों का वह चयन करता, वे, बिना अपवाद के, शैतान के द्वारा भ्रष्ट करने के औजार हैं। यह बिल्कुल सत्य है। इसलिए मनुष्य एक ऐसे स्वभाव के भीतर जीता है जिसे शैतान द्वारा पूरी तरह से भ्रष्ट कर दिया जाता है और मनुष्य के पास यह जानने का कोई तरीका नहीं है कि परमेश्वर की पवित्रता क्या है या परमेश्वर का सार क्या है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान जिस तरह से मनुष्यों को भ्रष्ट करता है, उसमें सतही तौर कोई दोष नहीं ढूँढ सकता है; किसी के व्यवहार से कोई यह नहीं कह सकता कि कुछ अनुचित है। प्रत्येक व्यक्ति अपना कार्य सामान्य रूप से करता है और सामान्य जीवन जीता है; वह सामान्य रूप से पुस्तकों और समाचार पत्रों को पढता है, वह सामान्य रूप से अध्ययन करता और बोलता है; कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कि नैतिकता का मुखौटा लगाना भी सीख लिया है ताकि अभिवादन कर सकें, नम्र हो सकें, शिष्ट बन सकें, दूसरों को समझने वाले बन सकें, मित्रतापूर्ण बन सकें, दूसरों के मददगार बन सकें, दानशील बन सकें, और दूसरों के साथ ऊधमी होने से बचेंगे और दूसरों का फायदा उठाने से बचेंगे। हालाँकि, उनका भ्रष्ट शैतानी स्वभाव उनमें गहरी जड़ जमाए होता है; बाहरी प्रयासों पर भरोसा करके इस सार को परिवर्तित नहीं किया जा सकता है। इस सार की वजह से मनुष्य परमेश्वर की पवित्रता को समझने में समर्थ नहीं है, और परमेश्वर की पवित्रता के सार को मनुष्य के लिए सार्वजनिक कर दिए जाने के बावज़ूद, मनुष्य इसे गम्भीरता से नहीं लेता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि शैतान ने पहले से ही मनुष्य की भावनाओं, मतों, दृष्टिकोणों और विचारों को विभिन्न उपायों से अपने कब्जे में कर लिया है। यह कब्ज़ा और भ्रष्टता अस्थायी या आकस्मिक नहीं है; यह हर जगह और हर समय विद्यमान है। इसलिए, बहुत से लोग जो तीन या चार साल से—यहाँ तक कि पाँच या छह साल से भी—परमेश्वर पर विश्वास करते आ रहे हैं, वे अभी भी उन विचारों और दृष्टिकोणों को, जो शैतान ने उनमें भर दिए हैं, ऐसे पकड़े हुए हैं मानो कि उन्होंने कोई खज़ाना पकड़ा हुआ हो। क्योंकि मनुष्य ने शैतान की प्रकृति से दुष्ट, अहंकारी और दुर्भावनापूर्ण चीज़ों को स्वीकार किया है, इसलिए मनुष्य के अंतर्वैयक्तिक संबंधों में अपरिहार्य रूप से प्रायः द्वंद्व, प्रायः वाद-विवाद और और असामंजस्य रहता है, जो कि शैतान की अहंकारी प्रकृति के कारण बनता है। यदि शैतान ने मानवजाति को सकारात्मक चीज़ें दी होतीं—उदाहरण के लिए यदि मनुष्य द्वारा स्वीकृत पारम्परिक संस्कृति के कन्फ्यूशीवाद और ताओवाद को अच्छी चीज़ माना जाता—तो उन चीज़ों को स्वीकार करने के बाद समान मानसिकता वाले व्यक्तियों को आपस में मिलजुलकर रहने में समर्थ होना चाहिए था, है न। तो फिर जिन लोगों ने एक समान चीज़ों को स्वीकार कर लिया है उनके बीच इस तरह का अत्यधिक विभाजन क्यों है? ऐसा क्यों है? ऐसा इसलिए है क्योंकि ये चीज़ें शैतान से आती हैं और शैतान लोगों में विभाजन उत्पन्न करता है। शैतान जो चीज़ें देता है, सतही तौर पर चाहे वे कितनी ही प्रतिष्ठित और महत्वपूर्ण क्यों न दिखाई पड़ें, वे मनुष्यों के लिए और मनुष्य के जीवन में केवल अहंकार, और शैतान की दुष्ट प्रकृति की धूर्तता के अलावा और कुछ प्रकट नहीं करती हैं। क्या यह सही नहीं है? कोई ऐसा व्यक्ति जो अपने आप को छद्मरूप दे सकता हो, ज्ञान का भंडार रखता हो, जिसकी अच्छी परवरिश हुई हो, उसे अपने भ्रष्ट शैतानी स्वभाव को छिपाने में कठिनाई होगी। अर्थात्, ऐसा व्यक्ति अपने आप पर चाहे कितनी तरह से आवरण भी क्यों न डाले, यदि आप उसे संत समझते थे, या यदि आप सोचते थे कि वह सिद्ध है, या यदि आप सोचते थे कि वह एक फ़रिश्ता है, तो चाहे आपके विचार में वे कितने ही शुद्ध क्यों न हों, पर्दे के पीछे उनका जीवन किस तरह का होगा? उनके स्वभाव के प्रकाशन में आप किस सार को देखेंगे? बिना किसी संदेह के आप शैतान की दुष्ट प्रकृति को देखेंगे। क्या कोई ऐसा कह सकता है? (हाँ)। उदाहरण के लिए, कहिए कि आप लोगों के करीबी किसी को जानते हैं जिसे आप सोचते थे कि वह अच्छा व्यक्ति है, शायद कोई ऐसा व्यक्ति जिसे आप एक आदर्श मानते हैं। अपनी वर्तमान कद-काठी के साथ, आप उसके बारे में क्या सोचते हैं? सबसे पहले, आपको यह देखना चाहिए कि इस प्रकार के व्यक्तियों में मानवता है या नहीं, क्या वे ईमानदार हैं, क्या उनमें लोगों के लिए सच्चा प्रेम है, क्या उनके वचन और कार्यकलाप दूसरों को लाभ और सहायता पहुँचाते हैं। (नहीं)। यहाँ प्रकट की जा रही तथा-कथित दयालुता, प्रेम या अच्छाई, यह वास्तव में क्या है? यह सब कुछ झूठ है, यह सब एक दिखावा है। यह परदे के पीछे के मुखौटे का एक गुप्त बुरा उद्देश्य है: उस व्यक्ति को इष्ट और पूजित बनाना है। क्या आप लोग इसे स्पष्ट रूप से देखते हैं? (हाँ)।

शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए जिन विधियों का उपयोग करता है वे मानवजाति के लिए क्या लाती हैं? क्या इसके बारे में कुछ सकारात्मक है? (नहीं)। सबसे पहले, क्या मनुष्य अच्छे और बुरे के बीच अंतर कर सकता है? (नहीं)। आप देखते हैं कि, इस संसार में, चाहे यह कोई बड़ा व्यक्ति हो, या कोई पत्रिका हो, वे सब यही कहते हैं कि यह या वह अच्छा या बुरा है, क्या यह ठीक है? क्या यह सही है? (नहीं)। क्या घटनाओं और लोगों के बारे में उनके आँकलन निष्पक्ष हैं? क्या इनमें कोई सच्चाई है? (नहीं)। क्या यह संसार या मानवजाति, सत्य के मानक के आधार पर सकारात्मक और नकारात्मक चीजों का आँकलन करती है? (नहीं)। लोगों में वह क्षमता क्यों नहीं है? लोगों ने ज्ञान का इतना अधिक अध्ययन किया है और विज्ञान के विषय में बहुत अधिक जानते हैं, तो क्या उनकी क्षमताएँ पर्याप्त रूप से बड़ी नहीं हैं? वे सकारात्मक और नकारात्मक चीज़ों के बीच अंतर क्यों नहीं कर सकते हैं? ऐसा क्यों है? (क्योंकि लोगों में सच्चाई नहीं है, विज्ञान और ज्ञान सत्य नहीं हैं)। शैतान द्वारा मानवजाति के लिए लायी जाने वाली हर चीज़ दुष्टता और भ्रष्टता होती है, और उसमें सत्य, जीवन और मार्ग का अभाव होता है। शैतान द्वारा मनुष्य के लिए लायी जाने वाली दुष्टता और भ्रष्टता के साथ, क्या आप कह सकते हैं कि शैतान के पास प्रेम है? कुछ लोग कह सकते हैं कि: "आप ग़लत हैं, दुनिया में बहुत से लोग हैं जो गरीबों और बेघर लोगों की सहायता करते हैं। क्या वे अच्छे लोग नहीं हैं? धर्मार्थ संगठन भी हैं जो अच्छे कार्य करते हैं, क्या उनके द्वारा किए जाने वाले सभी कार्य भलाई के लिए नहीं हैं?" तो फिर इसके बारे में हम क्या कहें? शैतान मनुष्य को भ्रष्ट करने के लिए कई अलग-अलग विधियों और सिद्धांतों का उपयोग करता है; क्या मनुष्य की यह भ्रष्टता अस्पष्ट धारणा है? नहीं यह अस्पष्ट नहीं है। शैतान कुछ व्यवहारिक चीज़ें भी करता है, और यह इस दुनिया और समाज में एक दृष्टिकोण या एक सिद्धान्त को भी बढ़ावा देता है। प्रत्येक राजवंश में और प्रत्येक कालखंड में यह एक सिद्धान्त को बढ़ावा देता है और मनुष्यों में कुछ विचारों को भरता है। ये विचार और सिद्धान्त धीरे-धीरे लोगों के हृदयों में जड़ जमा लेते हैं, और तब लोग उन विचारों और सिद्धांतों के अनुसार जीना आरम्भ कर देते हैं; क्या वे अनजाने में शैतान नहीं बन जाते हैं? क्या लोग शैतान के साथ एक नहीं हो गए हैं? जब लोग शैतान के साथ एक हो जाते हैं, तो अंत में परमेश्वर के प्रति उनकी क्या प्रवृत्ति होती है? क्या यह वही प्रवृत्ति नहीं होती है जो शैतान परमेश्वर के प्रति रखता है? कोई भी इसे मानने का साहस नहीं करता, है न? यह बहुत भयानक है। मैं क्यों कहता हूँ कि शैतान की प्रकृति दुष्टता है? इसका निर्धारण और विश्लेषण इस आधार पर किया जाता है कि शैतान ने क्या किया है और शैतान ने किन चीज़ों को प्रकट किया है; यह कहना अनुचित नहीं है कि शैतान दुष्ट है। यदि मैंने केवल यह कहा होता कि शैतान दुष्ट है, तो आप लोग क्या सोचते? आप लोग सोचते, "स्पष्टतः शैतान दुष्ट है।" इसलिए मैं आपसे पूछूँगाः "शैतान का कौन सा पहलू दुष्टता है?" यदि आप कहते हैं: "शैतान का परमेश्वर का विरोध करना दुष्टता है", तो आप अभी भी स्पष्टता के साथ नहीं बोल रहे होंगे। अब हमने विशिष्ट चीज़ों को इस प्रकार से कहा है; क्या आपको शैतान की दुष्टता के सार की विशिष्ट सामग्री की कोई समझ है? (हाँ)। अब जबकि आप को शैतान के दुष्ट स्वभाव की यह समझ आ गई है, तो अपने स्वयं के बारे में आप लोग कितना समझते हैं? क्या ये चीज़ें जुड़ी हुई हैं? (हाँ)। क्या इस जुड़ने से आप लोगों को ठेस पहुँचती है? (नहीं)। क्या यह आपके लिए सहायक है? (हाँ)। यह कितना सहायक है? (बहुत बड़ी सहायता)! आइए विशिष्ट चीज़ों पर बात करें, मैं अस्पष्ट वचनों को नहीं सुनूँगा। यह "बहुत बड़ी" किसी अधिक को संदर्भित करता है? (हम उन चीज़ों को जानते हैं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है, कौन सी चीज़ें परमेश्वर के विरोध में जाती हैं; इन चीज़ों के बारे में हमारे हृदय थोड़ा स्पष्ट हैं)। क्या जोड़ने के लिए और कुछ भी है? जब मैं परमेश्वर की पवित्रता के सार के बारे में संगति करता हूँ, तो क्या यह आवश्यक है कि मैं शैतान की दुष्टता के सार के बारे में भी संगति करूँ, आपकी क्या राय है? (हाँ यह आवश्यक है)। क्यों? (शैतान की दुष्टता परमेश्वर की पवित्रता को उच्चता से उभारती है)। क्या यह ऐसा ही है? यह आंशिक रूप से सही है कि शैतान की दुष्टता के बिना, लोग परमेश्वर की पवित्रता को नहीं जानेंगे; यह सही है। हालाँकि, यदि आप कहते हैं कि केवल शैतान के साथ विरोधाभास के कारण ही परमेश्वर की पवित्रता विद्यमान है, तो क्या यह सही है? यह तर्क ग़लत है। परमेश्वर की पवित्रता परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यद्यपि परमेश्वर इसे कर्मों के माध्यम से प्रकट करता है, तब भी यह परमेश्वर के सार की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है यह परमेश्वर का अंतर्निहित सार है; यह हमेशा विद्यमान रहा है और स्वयं परमेश्वर में मूलभूत रूप से है, किन्तु मनुष्य उसे नहीं देख सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि मनुष्य शैतान के भ्रष्ट स्वभाव के बीच और शैतान के प्रभाव के अधीन रहता है, और वह पवित्रता के बारे में नहीं जानता है, परमेश्वर की पवित्रता की विशिष्ट विषयवस्तु के बारे में तो बिल्कुल नहीं जानता है। तो क्या यह आवश्यक है कि हम पहले शैतान के दुष्ट सार के बारे में संगति करें? (हाँ, यह आवश्यक है)। आप देखते हैं कि, हमने परमेश्वर की विशिष्टताओं के विभिन्न पहलुओं के बारे में संगति की है और हमने शैतान के सारा का उल्लेख नहीं किया, है न? कुछ लोग कुछ संदेह व्यक्त कर सकते हैं जैसे कि, "आप स्वयं परमेश्वर के बारे में संगति कर रहे हैं, आप हर समय इस बारे में क्यों बात करते रहते है कि कैसे शैतान लोगों को भ्रष्ट करता है, और कैसे शैतान की प्रकृति दुष्ट?" क्या आपने इस संदेहों का समाधान कर लिया है? (हाँ)। कैसे आपने उनका समाधान किया? (परमेश्वर की संगति के माध्यम से, हमने विभेद किया है कि दुष्टता क्या है)। जब लोगों को दुष्टता का बोध हो जाता है और जब उनके पास उसकी एक सही परिभाषा होती है, जब लोग दुष्टता की विशिष्ट विषयवस्तु और अभिव्यक्ति को, दुष्टता के स्रोत और सार को स्पष्ट रूप से देख लेंगे—जब परमेश्वर की पवित्रता की अभी चर्चा की जाती है—तब लोग इसे परमेश्वर की पवित्रता, एक सच्ची पवित्रता, के रूप में स्पष्ट रूप से जान जाएँगे, या पहचान जाएँगे। यदि मैं शैतान की दुष्टता की चर्चा नहीं करूँगा, तो कुछ लोग ग़लती से यह विश्वास कर लेंगे कि कोई चीज़ जिसे लोग समाज में या लोगों के बीच करते हैं—या कोई चीज़ जो इस संसार में करते हैं—वह पवित्रता से सम्बन्धित हो सकती है। क्या यह दृष्टिकोण ग़लत नहीं है? (हाँ, है)।

इसीलिए मैंने शैतान के सार पर चर्चा की है। हाल ही के वर्षों में आप लोगों के अपने अनुभवों के माध्यम से आप लोगों ने परमेश्वर की पवित्रता की किस प्रकार की समझ प्राप्त की है? आगे बढ़ें और इस बारे में बोलें। आपको कानों को अच्छे लगने वाले वचनों का उपयोग नहीं करना है, केवल अपने स्वयं के अनुभव से बोलें, क्या परमेश्वर की पवित्रता केवल उसका प्रेम है? क्या यह परमेश्वर का प्रेम मात्र है जिसका हम पवित्रता के रूप में वर्णन करते हैं? यह कुछ ज़्यादा ही एक तरफा होगा, है न? क्या यह एक तरफा नहीं होगा? (हाँ)। परमेश्वर के प्रेम के अलावा, क्या परमेश्वर के सार के अन्य पहलू भी हैं जो आपने देखे हैं? (हाँ)। आपने क्या देखा है? (परमेश्वर त्यौहारों और अवकाशों, प्रथाओं, और अंधविश्वासों से घृणा करता है; परमेश्वर की पवित्रता यह है)। आपने मात्र इतना ही कहा है कि परमेश्वर कुछ चीज़ों से घृणा करता है; परमेश्वर पवित्र है इसलिए वह चीज़ों से घृणा करता है, क्या इसका यही अर्थ है? (हाँ।) इसके मूल में, परमेश्वर की पवित्रता क्या है? परमेश्वर की पवित्रता में कोई तात्विक विषयवस्तु नहीं है, केवल इतना ही कि वह चीज़ों से घृणा करता है? अपने मन में क्या आप यह सोच रहे हैं कि, "क्योंकि परमेश्वर इन दुष्ट चीज़ों से घृणा करता है, इसलिए कोई कह सकता है कि परमेश्वर पवित्र है?" क्या यह यहाँ अटकलबाज़ी मात्र नहीं है? क्या यह अनुमान और निर्धारण का एक प्रकार नहीं है? जब परमेश्वर के सार को समझने की बात आती है तब सबसे बड़ी वर्जना क्या है? (वास्तविकता को पीछे छोड़ देना)। जब हम सिद्धांत की बात करने के लिए वास्तविकता को पीछे छोड़ देते हैं, तो यह सर्वाधिक वर्जना की बात है। और कुछ? (अटकलबाज़ी और कल्पना)। अटकलबाज़ी और कल्पना, ये भी बहुत मजबूत वर्जनाएँ हैं। क्यों अटकलबाज़ी और कल्पना उपयोगी नहीं हैं? क्या जिन चीजों के बारे में आप अटकलबाजी और कल्पना करते हैं उन्हें आप वास्तव में देख सकते हैं? (नहीं)। क्या वे परमेश्वर का सच्चा सार हैं? (नहीं)। तो फिर वर्जना क्या है? क्या परमेश्वर के सार का वर्णन करने के लिए अच्छे लगने वाले वचनों के समूह को गिनाना वर्जना है? (हाँ)। क्या यह अहंकारपूर्ण या बकवास नहीं है? अच्छे लगने वाले वचनों का चयन की तरह ही निर्धारण और अटकलबाजी बकवास हैं। खोखली स्तुति भी बकवास है, है न? (हाँ)। क्या परमेश्वर लोगों को ऐसी बकवास की बातें कहते हुए सुनने का मज़ा लेता है? (नहीं, वह नहीं लेता है)। किसी चीज़ का "मज़ा नहीं लेने" का पर्यायवाची क्या है? (असहज महसूस करना)। इसे सुनकर वह असहज महसूस करता है! परमेश्वर लोगों के एक समूह की अगुवाई करता है और उसे बचाता है, और लोगों का यह समूह जब उसका वचन सुनता है तो उसके बाद उनकी कभी समझ में नहीं आता है कि उसका क्या अर्थ है? कोई पूछ सकता हैः "क्या परमेश्वर अच्छा है?" और वे उत्तर देंगे "अच्छा है!" "कितना अच्छा?" "बहुत, बहुत अच्छा"! "क्या परमेश्वर मनुष्य से प्रेम करता है?" "हाँ!" "कितना?" "बहुत, बहुत अधिक"। "क्या आप परमेश्वर के प्रेम का वर्णन कर सकते हैं"? "यह सागर से भी ज्यादा गहरा है, आसामान से भी ऊँचा है!" क्या यह बकवास नहीं है? क्या यह उसी के समान बकवास नहीं है जैसा कि अभी-अभी इस बारे में आप लोगों ने कहा कि, "परमेश्वर शैतान के भ्रष्ट स्वभाव से घृणा करता है, इसलिए परमेश्वर पवित्र है?" (हाँ)। क्या अभी-अभी आप लोगों ने जो कहा है वह बकवास नहीं है? ज्यादातर बकवास बातें जो कही जाती हैं कहाँ से आती हैं? (शैतान से)। वे शैतान से आती हैं। जो बकवास बातें कही जाती है, वे प्राथमिक रूप से परमेश्वर के प्रति लोगों के अनुत्तरदायित्व और अश्रद्धा के कारण आती है। क्या हम ऐसा कह सकते हैं? (हाँ)। अभी तक आपने कोई समझ प्राप्त नहीं की तब भी बकवास बातें की, क्या यह अनुत्तरदायी होना नहीं है? क्या यह परमेश्वर के प्रति अशिष्ट होना नहीं है? आपने ज्ञान का कुछ अध्ययन कर लिया है, थोड़ा तर्कसंगतता को और थोड़ा तर्कों को समझ लिया है, जिनका आपने यहाँ उपयोग किया है और, इसके अलावा, परमेश्वर को जानने में ऐसा कर लिया है। क्या आपको लगता है कि यह सुनकर परमेश्वर असहज महसूस करता है? कैसे इन विधियों का उपयोग कर आप लोग परमेश्वर को जानने का प्रयास कर सकते हैं? क्या यह विचित्र नहीं लगता है? इसलिए, जब परमेश्वर के ज्ञान की बात आती है, व्यक्ति को अवश्य बहुत अधिक सावधान रहना चाहिए; जहाँ आप परमेश्वर को जानते हैं, केवल उतने के बारे में ही बोलें। ईमानदारी से और व्यवहारिकता से बोलें और अपने वचनों को रोज़मर्रा की सराहनाओं से न सजाएँ और चापलूसी का उपयोग नहीं करें; परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं है और इस तरह की चीज़ें शैतान से आती हैं। शैतान का स्वभाव अंहकार है और शैतान चापलूसी किए जाना और अच्छे वचनों को सुनना पसंद करता है। यदि लोग सभी अच्छे लगने वाले वचनों की सूची बनाएँ जो उन्होंने सीखे हैं और इन वचनों को शैतान के लिए उपयोग करें तो शैतान खुश और आनन्दित होगा। किन्तु परमेश्वर को इसकी आवश्यकता नहीं; परमेश्वर को चाटुकारिता या चापलूसी की आवश्यकता नहीं है। और वह नहीं चाहता है कि लोग बकवास बात करें और आँख बंद करके उसकी स्तुति करें। परमेश्वर ऐसी स्तुति और चाटुकारिता से घृणा करता है और उसे यहाँ तक कि सुनेगा भी नहीं जो वास्तविकता की लीक से हटकर हो। इसलिए, जब कुछ लोग आँख बंद करके परमेश्वर की स्तुति करते हैं और जो वे कहते हैं वह उससे मेल नहीं खाता है जो उनके हृदय में है, और जब वे आँख बंद करके परमेश्वर की शपथ लेते हैं और लापरवाही से उससे प्रार्थना करते हैं, तो परमेश्वर बिल्कुल नहीं सुनता है। आप जो कहते हैं आपको उसका उत्तरदायित्व अवश्य लेना चाहिए। यदि आप किसी चीज़ को नहीं जानते हैं, तो ऐसा कहिए; यदि आप किसी चीज़ को जानते हैं तो उसे व्यवहारिक तरीके से प्रकट कीजिए। अब, जहाँ तक परमेश्वर की पवित्रता की यथार्थ विषयवस्तु की बात है, क्या आपको इसकी विशिष्ट समझ है? (जब मैंने विद्रोहशीलता प्रकट की, जब मैंने आज्ञालंघन किए, तो मुझे परमेश्वर से न्याय और ताड़ना मिली, और उसमें मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा। और जब मैंने उन परिवेशों का सामन किया जो मेरी अपेक्षाओं के अनुरूप नहीं थे, तब मैंने इन चीज़ों के बारे में प्रार्थना की और मैंने परमेश्वर के इरादों की माँग की और जब परमेश्वर ने अपने वचन के साथ मुझे प्रबुद्ध किया और मेरी अगुवाई की, तो मैंने परमेश्वर की पवित्रता को देखा)। यह आपके स्वयं के अनुभव से है, है न? (जो परमेश्वर ने बोला था उससे मैंने देखा है कि मनुष्य को शैतान के द्वारा इस तरह से भ्रष्ट किया जाता और क्षति पहुँचाई जाती है। तब भी, परमेश्वर ने हमें बचाने के लिए सब कुछ दिया है, और इसमें मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूँ)। यह बोलने का यथार्थवादी ढंग है और यह सच्चा ज्ञान है। क्या इस पर कोई अलग ख़याल हैं? (मैं नहीं जानता कि मेरी समझ सही है या नहीं। शैतान ने हव्वा को पाप करने के लिए बहकाने के लिए जो वचन कहे उससे और प्रभु यीशु को इसके प्रलोभन से मैं शैतान की दुष्टता को देखता हूँ। परमेश्वर ने जिन वचनों से आदम और हव्वा को कहा था कि वे क्या खा सकते हैं और क्या नहीं खा सकते हैं, उनसे मैं देखता हूँ कि परमेश्वर के वचन के सीधे और साफ़-सुथरे होते हैं; और यह कि वे विश्वासयोग्य हैं; इससे मैं परमेश्वर की पवित्रता को देखता हूँ)। आप लोगों ने इन लोगों को जो कहते सुना है, उनमें किसके वचनों के लिए आप अधिकांशतः आमीन कहेंगे? किसका भाषण, किसकी संगति आज हमारी संगति के विषय के सबसे निकट थी, और किसकी सर्वाधिक यथार्थवादी थी? पिछली बहन की संगति कैसी थी? (अच्छी थी)। जो उसने कहा उस पर आपने आमीन कहा, क्या उसने जो कहा था वह सीधे लक्ष्य पर था? आप सीधे कह सकते हैं, आपको जो कहना है उसे कहें और ग़लत होने के बारे में चिंता न करें। (उस बहन के अभी-अभी कहे गए वचनों में, मैंने सुना कि परमेश्वर का वचन सीधा और बहुत स्पष्ट है, यह शैतान के गोलमोल वचनों की तरह नहीं है। मैंने इसमें परमेश्वर की पवित्रता को देखा)। यह इसका भाग है। क्या आप सब लोगों ने वह सुना जो अभी-अभी कहा गया था? (हाँ) क्या यह सही था? (हाँ)। आइए हम ताली बजाकर एक बार बहन की सराहना करें। बहुत अच्छा। मैं देखता हूँ कि आप लोगों ने हाल ही की इन दो संगतियों में कुछ प्राप्त किया है, परन्तु आपको लगातार कठिन परिश्रम अवश्य करते रहना चाहिए। आपके कठिन परिश्रम करने का कारण यह है क्योंकि परमेश्वर के सार को समझना एक बहुत ही गंभीर सबक है; यह कोई ऐसी चीज़ नहीं है जो एक ही रात में किसी की समझ में आ जाए या कोई केवल कुछ ही शब्दों में स्पष्ट रूप से बोल सकता है।

लोगों के भ्रष्ट शैतानी स्वभाव, ज्ञान, फ़लसफ़े का प्रत्येक पहलू, लोगों के विचार और दृष्टिकोण और व्यक्तिगत पहलू, उन्हें परमेश्वर के सार को जानने में सबसे अधिक रुकावट डालते हैं; तो जब आप लोग इन विषयों को सुनते हैं, तो कुछ विषय आप की पहुँच से बाहर हो सकते हैं, कुछ विषय आप लोगों की समझ में नहीं आ सकते हो, जबकि कुछ विषयों को आप हो सकता है कि मूलभूत रूप से वास्तविकता के साथ नहीं जोड़ पाएँ। इसके बावजूद, मैंने आप लोगों की परमेश्वर की पवित्रता की समझ के बारे में सुना है और मैं जानता हूँ कि अपने हृदयों में आप लोग वह स्वीकार करना आरंभ कर रहे हैं जो परमेश्वर की पवित्रता के बारे में मैंने कहा और संगति की है। मैं जानता हूँ कि अपने हृदयों में परमेश्वर की पवित्रता के सार को समझने की आप लोगों की इच्छा अंकुरित होना शुरू कर रही है। पर मुझे और भी अधिक आनन्दित क्या करता है? वह यह कि आप में से कुछ लोग परमेश्वर की पवित्रता के अपने ज्ञान को साधारण शब्दों में वर्णन करने में पहले से ही समर्थ हैं। यद्यपि कहने के लिए यह एक साधारण सी बात है और मैंने इसे पहले भी कहा है, फिर भी आप में से अधिकांश के हृदयों में इसे अभी भी स्वीकृति मिलनी या इसका प्रभाव पड़ना बाकी है। तब भी, आप में से कुछ ने इन वचनों को अपने हृदय में ले लिया है और यह बहुत अच्छा है और यह एक अच्छी शुरूआत है। मैं आशा करता हूँ कि जो विषय आप लोगों को गम्भीर लगते हैं उन पर—या जो विषय आपकी पहुँच से बाहर हैं उन पर—आप मनन करते रहेंगे, और ज्यादा से ज्यादा संगति करेंगे। जो विषय आपकी पहुँच से बाहर हैं उनके लिए, कोई न कोई आप लोगों का और अधिक मार्गदर्शन करने के लिए रहेगा। यदि आप उन क्षेत्रों के बारे में और अधिक संगति करने में संलग्न रहते हैं जो अभी आप लोगों की पहुँच में हैं, तो पवित्रात्मा आप में अपना कार्य करेगा और आपको अधिक समझ आ जाएगी। परमेश्वर के सार को समझना और परमेश्वर के सार को जानना लोगों के जीवन प्रवेश में असीमित सहायता प्रदान करता है। मैं आशा करता हूँ कि आप लोग इसकी उपेक्षा नहीं करेंगे या इसे एक खेल की तरह नहीं लेंगे; क्योंकि परमेश्वर को जानना, परमेश्वर में मनुष्य के विश्वास का आधार और मनुष्य की सत्य और उद्धार की खोज का अत्यंत आवश्यक आधार और बुनियाद है और कोई ऐसी चीज़ है जिसे अवश्य छोड़ा नहीं जाना चाहिए। यदि मनुष्य परमेश्वर पर विश्वास करता है मगर परमेश्वर को नहीं जानता है, और यदि मनुष्य कुछ पत्रों और सिद्धांतों के बीच जीता रहता है, तो आप कभी भी उद्धार को प्राप्त नहीं करेंगे भले ही आप सत्य के सतही अर्थ के अनुसार कार्य करते और जीते हैं। अर्थात्, यदि परमेश्वर पर आपका विश्वास उसे जानने के आधार पर नहीं है, तो आपके विश्वास का कोई अर्थ नहीं है। आप समझे, है न? (हाँ, हम समझ गए)। आज की हमारी संगति यहाँ समाप्त होती है। (धन्यवाद परमेश्वर!)

4 जनवरी, 2014

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