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135 इंसान शायद समझ ले उसे, उम्मीद है परमेश्वर को

I

मानवजाति से परमेश्वर के पहले संपर्क से लेकर,

करता आ रहा है वो प्रकट निरंतर, बिना रुके

अपने सार को, वो क्या है और उसके पास है क्या।

चाहे अनेक युगों के लोग देख और समझ पाएं या नहीं,

पर अपने स्वभाव और सार को दिखाने के लिए

परमेश्वर बोलता और करता है काम।

परमेश्वर नहीं छिपाता, नहीं रखता उसे गुप्त, पूरी तरह करता है प्रकट,

अपना सार और स्वभाव, अपना अस्तित्व और स्वरूप,

करता है उसे प्रकट मानवजाति के साथ अपने काम और मेलजोल में।

II

परमेश्वर को है उम्मीद कि इंसान समझेगा उसे

जानेगा उसके सार और स्वभाव को,

वो चाहता नहीं कि ये बन कर रह जाए अनंतकाल तक एक रहस्य।

वो चाहता नहीं कि बन कर रह जाए

वो एक अनसुलझी पहेली की तरह।

परमेश्वर नहीं छिपाता, नहीं रखता उसे गुप्त, पूरी तरह करता है प्रकट।

III

जब मानवजाति जान जाएगी परमेश्वर को, परमेश्वर को,

केवल तब ही उन्हें होगा पता आगे की राह का, आगे की राह का,

होंगे वो लायक परमेश्वर की अगुवाई के, अगुवाई के।

वे रहेंगे उसके प्रभुत्व के अधीन,

वे जिएंगे उसकी रोशनी और आशीष में।

"वचन देह में प्रकट होता है" से

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