कोई भी सृजित और गैर-सृजित प्राणी सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान नहीं ले सकता है

25 अप्रैल, 2020

जब से उसने सब वस्तुओं की सृष्टि की शुरूआत की, परमेश्वर की सामर्थ्‍य प्रकट और प्रकाशित होने लगी थी, क्योंकि सब वस्तुओं को बनाने के लिए परमेश्वर ने अपने वचनों का इस्तेमाल किया था। चाहे उसने जिस भी रीति से उनका सृजन किया, जिस कारण से भी उनका सृजन किया, परमेश्वर के वचनों के कारण ही सभी चीज़ें अस्तित्व में आईं थीं और मजबूत बनी रहीं; यह सृष्टिकर्ता का अद्वितीय अधिकार है। इस संसार में मानवजाति के प्रकट होने के समय से पहले, सृष्टिकर्ता ने मानवजाति के वास्ते सब वस्तुओं को बनाने के लिए अपने अधिकार और सामर्थ्‍य का इस्तेमाल किया और मानवजाति के लिए जीने का उपयुक्त वातावरण तैयार करने के लिए अपनी अद्वितीय विधियों का उपयोग किया था। जो कुछ भी उसने किया वह मानवजाति की तैयारी के लिए था, जो जल्द ही उसका श्वास प्राप्त करने वाली थी। अर्थात, मानवजाति की सृष्टि से पहले के समय में, मानवजाति से भिन्न सभी जीवधारियों में परमेश्वर का अधिकार प्रकट हुआ, ऐसी वस्तुओं में प्रकट हुआ जो स्वर्ग, ज्योतियों, समुद्रों, और भूमि के समान ही विशाल थीं और छोटे से छोटे पशु-पक्षियों में, हर प्रकार के कीड़े-मकौड़ों और सूक्ष्म जीवों में प्रकट हुआ, जिनमें विभिन्न प्रकार के जीवाणु भी शामिल थे, जो नंगी आँखों से देखे नहीं जा सकते थे। प्रत्येक को सृष्टिकर्ता के वचनों के द्वारा जीवन दिया गया था, हर एक की वंशवृद्धि सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण हुई और प्रत्येक सृष्टिकर्ता के वचनों के कारण सृष्टिकर्ता की संप्रभुता के अधीन जीवन बिताता था। यद्यपि उन्होंने सृष्टिकर्ता की श्वास को प्राप्त नहीं किया था, फिर भी वे अपने अलग-अलग रूपों और संरचना के द्वारा उस जीवन व चेतना को दर्शाते थे जो सृष्टिकर्ता द्वारा उन्हें दिया गया था; भले ही उन्हें बोलने की काबिलियत नहीं दी गई थी जैसा सृष्टिकर्ता के द्वारा मनुष्यों को दी गयी थी, फिर भी उन में से प्रत्येक ने अपने उस जीवन की अभिव्यक्ति का एक अन्दाज़ प्राप्त किया जिसे सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिया गया था और वो मनुष्यों की भाषा से अलग था। सृष्टिकर्ता के अधिकार ने न केवल अचल पदार्थ प्रतीत होने वाली वस्तुओं को जीवन की चेतना दी, जिससे वे कभी भी विलुप्त न हों, बल्कि इसके अतिरिक्त, प्रजनन करने और बहुगुणित होने के लिए हर जीवित प्राणियों को अंतःज्ञान भी दिया, ताकि वे कभी भी विलुप्त न हों और वे पीढ़ी-दर-पीढ़ी जीवित रहने के नियमों और सिद्धांतों को आगे बढ़ाते जाएँ जो सृष्टिकर्ता के द्वारा उन्हें दिये गए हैं। जिस रीति से सृष्टिकर्ता अपने अधिकार का इस्तेमाल करता है, वह अतिसूक्ष्म और अतिविशाल दृष्टिकोण से कड़ाई से चिपका नहीं रहता है और किसी आकार में सीमित नहीं होता; वह विश्व के परिचालन को नियंत्रित करने और सभी चीज़ों के जीवन और मृत्यु के ऊपर प्रभुता रखने में समर्थ है और इसके अतिरिक्त सब वस्तुओं को भली-भाँति सँभाल सकता है जिससे वे उसकी सेवा करें; वह पर्वतों, नदियों, और झीलों के सब कार्यों का प्रबन्ध कर सकता है, और उनके भीतर की सब वस्तुओं पर शासन कर सकता है और इसके अलावा, वह सब वस्तुओं के लिए जो आवश्यक है उसे प्रदान कर सकता है। यह मानवजाति के अलावा सब वस्तुओं के मध्य सृष्टिकर्ता के अद्वितीय अधिकार का प्रकटीकरण है। ऐसा प्रकटीकरण मात्र एक जीवनकाल के लिए नहीं है; यह कभी नहीं रूकेगा, न थमेगा और किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा बदला या बिगाड़ानहीं जा सकता है और न ही उसमें किसी व्यक्ति या चीज़ के द्वारा कुछ जोड़ा या घटाया जा सकता है—क्योंकि कोई भी सृष्टिकर्ता की पहचान की जगह नहीं ले सकता और इसलिए सृष्टिकर्ता के अधिकार को किसी सृजित किए गए प्राणी के द्वारा प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता है; यह किसी गैर-सृजित प्राणी के द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर के सन्देशवाहकों और स्वर्गदूतों को लो। उनके पास परमेश्वर की सामर्थ्‍य नहीं है और सृष्टिकर्ता का अधिकार तो उनके पास बिलकुल भी नहीं है और उनके पास परमेश्वर का अधिकार और सामर्थ्‍य क्यों नहीं है उसका कारण यह है कि उनमें सृष्टिकर्ता का सार नहीं है। गैर-सृजित प्राणी, जैसे परमेश्वर के सन्देशवाहक और स्वर्गदूत, भले ही हालाँकिपरमेश्वर की तरफ से कुछ कर सकते हैं, परन्तु वे परमेश्वर का प्रतिनिधित्व नहीं कर सकते। यद्यपि वे कुछ सामर्थ्‍य धारण किए हुए हैं जो मनुष्य के पास नहीं है, फिर भी उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है, सब वस्तुओं को बनाने, सब वस्तुओं को आज्ञा देने और सब वस्तुओं के ऊपर संप्रभुता रखने के लिए उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं है। इस प्रकार परमेश्वर की अद्वितीयता की जगह कोई गैर-सृजित प्राणी नहीं ले सकता है और उसी प्रकार कोई गैर-सृजित प्राणी परमेश्वर के अधिकार और सामर्थ्‍य का स्थान नहीं ले सकता। क्या तुमने बाइबल में, परमेश्वर के किसी सन्देशवाहक के बारे में पढ़ा है जिसने सभी चीज़ों की सृष्टि की हो? परमेश्वर ने सभी चीज़ों के सृजन के लिए किसी संदेशवाहक या स्वर्गदूत को क्यों नहीं भेजा? क्योंकि उनके पास परमेश्वर का अधिकार नहीं था और इसलिए उनके पास परमेश्वर के अधिकार का इस्तेमाल करने की योग्यता भी नहीं थी। सभी जीवधारियों के समान, वे सभी सृष्टिकर्ता की प्रभुता के अधीन हैं और सृष्टिकर्ता के अधिकार के अधीन हैं और इसी रीति से, सृष्टिकर्ता उनका परमेश्वर भी है और उनका सम्राट भी। उन में से हर एक के बीच—चाहे वे उच्च श्रेणी के हों या निम्न, बड़ी सामर्थ्‍य के हों या छोटी—ऐसा कोई भी नहीं है जो परमेश्वर के अधिकार से बढ़कर हो सके और इस प्रकार उनके बीच में, ऐसा कोई भी नहीं है जो सृष्टिकर्ता की पहचान का स्थान ले सके। उन्‍हें कभी भी परमेश्वर नहीं कहा जाएगा और वे कभी भी सृष्टिकर्ता नहीं बन पाएँगे। ये न बदलने वाले सत्‍य और तथ्य हैं!

उपरोक्त सहभागिता के जरिए, क्या हम दृढ़तापूर्वक निम्नलिखित बातों को कह सकते हैं : केवल सब वस्तुओं के सृष्टिकर्ता और शासक, वह जिसके पास अद्वितीय अधिकार और अद्वितीय सामर्थ्‍य है, क्या उसे स्वयं अद्वितीय परमेश्वर कहा जा सकता है? इस समय, शायद तुम लोग महसूस करो कि ऐसा प्रश्न बहुत ही गंभीर है। तुम लोग, कुछ पल के लिए, उसे समझने में असमर्थ हो और उसके भीतर के सार-तत्व को नहीं समझ सकते और इसलिए इस पल तुम लोगों को लगेगा कि उसका उत्तर देना कठिन है। ऐसी स्थिति में, मैं अपनी सहभागिता को जारी रखूँगा। आगे, मैं चाहूँगा कि तुम लोग उस सामर्थ्‍य और अधिकार के बहुत-से पहलुओं के वास्तविक कर्मों को देखो जो केवल परमेश्वर के पास है और इस प्रकार मैं तुम लोगों को सचमुच परमेश्वर की अद्वितीयता को समझने, प्रशंसा करने और परमेश्वर के अद्वितीय अधिकार के अर्थ को जानने दूँगा।

— “वचन देह में प्रकट होता है” में “स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है I” से उद्धृत

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