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सूचीपत्र

मैंने 20 साल से भी ज़्यादा बाइबल का अध्ययन किया है। मैंने पाया कि बाइबल अलग-अलग वक्त में 40 अलग-अलग लेखकों द्वारा लिखी गयी थी, लेकिन उनकी लिखी विषयवस्तु में एक भी गलती नहीं थी। इससे पता चलता है कि परमेश्वर ही बाइबल के सच्चे लेखक हैं और बाइबल पवित्र आत्मा से उपजी है।

उत्तर: बाइबल को 40 से भी ज्यादा लेखकों ने लिखा था और यह कि इसमें एक भी गलती नहीं है। क्या वाकई कोई गलती नहीं है? तो फिर आइए, ख़ास तौर से इस मसले पर संवाद करें। दरअसल, अंत के दिनों के मसीह—सर्वशक्तिमान परमेश्वर—ने हमारे लिए इन रहस्यों का पहले ही खुलासा कर दिया है। आइए, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के एक अंश को पढ़ें! सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "नए नियम में मत्ती का सुसमाचार यीशु की वंशावली को दर्ज करता है। प्रारम्भ में यह कहता है कि यीशु, दाऊद की सन्तान इब्राहीम का वंशज, और यूसुफ का पुत्र था; आगे यह कहता है कि वह पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, और कुंवारी से जन्मा था-जिसका अर्थ है कि वह यूसुफ का पुत्र या इब्राहीम का वंशज नहीं था, और वह दाऊद की सन्तान नहीं था। यद्यपि वंशावली यूसुफ के साथ यीशु के संबंध पर जोर देती है। आगे, वंशावली उस प्रक्रिया को दर्ज करना प्रारम्भ करती है जिसके तहत यीशु का जन्म हुआ था। यह कहती है कि यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था, उसका जन्म कुंवारी से हुआ था, और वह यूसुफ का पुत्र नहीं था। फिर भी वंशावली में यह साफ साफ लिखा हुआ है कि यीशु यूसुफ का पुत्र था, और क्योंकि वंशावली यीशु के लिए लिखी गई थी, यह बयालीस पीढ़ियों को दर्ज करती है। जब यह यूसुफ की वंशावली की बात करती है, तो यह शीघ्रता से कहता है कि यूसुफ मरियम का पति था, ये शब्द यह साबित करने के लिए हैं कि यीशु इब्राहीम का वंशज था। क्या यह विरोधाभास नहीं है? वंशावली साफ साफ यूसुफ के पूर्वजों के लेखे को दर्ज करता है, यह स्पष्ट रूप से यूसुफ की वंशावली है, किन्तु मत्ती जोर देता है कि यह यीशु की वंशावली है। क्या यह उस तथ्य को नकारता नहीं है कि यीशु पवित्र आत्मा के द्वारा गर्भ में आया था? इस प्रकार, क्या मत्ती के द्वारा दी गई वंशावली मानवीय युक्ति नहीं है? यह हास्यास्पद है! इस रीति से, तुम जान गए हो कि यह पुस्तक पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा नहीं आई थी" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (3)")। परमेश्वर के वचन के जरिये हम समझते हैं कि मत्ती की बनायी वंशावली परमेश्वर का विचार नहीं था। क्या परमेश्वर की कोई वंशावली हो सकती है? मत्ती जानते थे कि प्रभु यीशु की संकल्पना पवित्र आत्मा ने की थी, फिर भी उन्होंने यह कहकर उन्हें एक वंशावली दी कि प्रभु यीशु दाऊद के पुत्र थे और यूसुफ़ के पुत्र थे| क्या यह इस बात को नकारना नहीं है कि प्रभु यीशु की संकल्पना पवित्र आत्मा ने की थी| प्रभु यीशु और यूसुफ़ का कोई रिश्ता नहीं है| मत्ती के वचनों में विरोधाभास है। स्पष्ट है कि यह वंशावली पवित्र आत्मा से नहीं उपजी और मनुष्य का विचार थी। तो फिर आप यूहन्ना 8:58 की इस बात को कैसे समझा सकते हैं: "यीशु ने उनसे कहा, 'मैं तुम से सच सच कहता हूँ, कि पहले इसके कि अब्राहम उत्पन्न हुआ, मैं हूँ।'" यहाँ हम समझ पाये हैं कि प्रभु यीशु की वंशावली मनुष्य का विचार है। इसे मत्ती ने 50 ईसवी के आसपास लिखा था, और इसे पवित्र आत्मा के सीधे निर्देश पर नहीं लिखा गया था।

परमेश्वर के वचन में इस बारे में एक और अंश है। मुझे सबके लिए पढ़ने की इजाज़त दें! सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहते हैं, "यदि चारों सुसमाचार पवित्र आत्मा से आये थे, तो ऐसा क्यों था कि मत्ती, मरकुस, लूका और यूहन्ना प्रत्येक ने यीशु के कार्य के बारे कुछ अलग कहा था? यदि आप लोग यह नहीं मानते हैं, तो फिर आप बाईबिल के लेखों में देखिये कि किस प्रकार पतरस ने यीशु का तीन बार इन्कार किया था: वे सब भिन्न हैं, और उनमें से प्रत्येक के पास उनकी अपनी विशेषताएं हैं। …चारों सुसमाचारों को ध्यानपूर्वक पढ़ें; पढ़िए कि उन्होंने उन कार्यों के विषय में क्या दर्ज किया है जिन्हें यीशु ने किया था, और उन वचनों को पढ़िए जिन्हें उसने कहा था। प्रत्येक विवरण, एकदम सरल रूप में, अलग था, और प्रत्येक का अपना ही यथार्थ दृष्टिकोण था। यदि इन पुस्तकों के लेखकों के द्वारा जो कुछ लिखा गया था वह सब पवित्र आत्मा से आया होता, तो यह सब एक समान एवं सुसंगत होता। तो फिर क्यों इसमें भिन्नताएं हैं? क्या मनुष्य अत्यंत मूर्ख नहीं है, एवं इसे देखने में असमर्थ नहीं है? …लूका और मत्ती ने यीशु के वचनों को सुना, और यीशु के कार्यों को देखा उसके पश्चात्, उन्होंने यीशु के द्वारा किये गए कुछ तथ्यों के संस्मरणों का विवरण देने की रीति से अपने स्वयं के ज्ञान के विषय में कहा था। क्या आप कह सकते हैं कि उनके ज्ञान को पूरी तरह से पवित्र आत्मा के द्वारा प्रगट किया गया था?" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "पद नामों एवं पहचान के सम्बन्ध में")। आइए देखें कि चार सुसमाचारों में तीन बार किस तरह से पतरस ने प्रभु को मानने से इनकार किया। मत्ती 26:75 में कहा गया है: "मुर्ग़ के बाँग देने से पहले तू तीन बार मेरा इन्कार करेगा।" लेकिन मरकुस 14:72 में कहा गया है: "मुर्ग़ के दो बार बाँग देने से पहले तू तीन बार मेरा इन्कार करेगा।" उनके द्वारा दर्ज घटना एक ही है, लेकिन समय में फर्क है। अगर यह पवित्र आत्मा की प्रेरणा से आयी होती, तो इनमें कोई फर्क नहीं होता। ये तथ्य साबित करते हैं कि ये मनुष्य के दस्तावेज थे और पवित्र आत्मा की प्रेरणा से नहीं रचे गये थे।

सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन के जरिये हम समझते हैं कि चारों सुसमाचार मनुष्य के दस्तावेज़ हैं और पवित्र आत्मा की प्रेरणा से नहीं रचे गये हैं। इसी वजह से इनमें फर्क है। अगर वे परमेश्वर से उपजे होते तो वे पूरी तरह से सही होते। जैसे कि लूका ने कहा था: "बहुतों ने उन बातों का जो हमारे बीच में बीती हैं, इतिहास लिखने में हाथ लगाया है, जैसा कि उन्होंने जो पहले ही से इन बातों के देखनेवाले और वचन के सेवक थे, हम तक पहुँचाया" (लूका 1:1-2)। इससे पता चलता है कि चारों सुसमाचार लेखकों की देखी-सुनी बातों से तैयार हुए थे। इसमें से कुछ को प्रचारकों के प्रवचनों और उनकी निजी जांच-पड़ताल की बुनियाद पर लिखा गया था। यह उन्हें सीधे परमेश्वर की प्रेरणा से नहीं मिला था। ठीक इसलिए चूंकि इतिहास की किताबें याददाश्त और दूसरों से सुनी बातों के आधार पर लिखी जाती हैं, उनमें ज़रूर गलतियां और इंसानी ख्याल घुल-मिल जाते हैं। चूंकि बाइबल पूरी तरह से परमेश्वर की प्रेरणा से नहीं रची गयी है और पूरी तरह से परमेश्वर का वचन नहीं है, तो फिर बाइबल का सच्चा लेखक कौन है? आइए, देखें कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन में क्या कहा गया है। "वास्तव में, यह मात्र एक मानवीय अभिलेख है। यहोवा द्वारा व्यक्तिगतरूप से इसका नाम नहीं रखा गया था, और न ही यहोवा ने व्यक्तिगत रूप से इसकी रचना कामार्गदर्शन किया था। दूसरे शब्दों में, इस पुस्तक का ग्रन्थकार परमेश्वर नहीं था, बल्कि मनुष्य था। 'पवित्र' बाइबल ही केवल वह सम्मानजनक शीर्षक है जो इसे मनुष्य के द्वारा दिया गया है। इस शीर्षक का निर्णय यहोवा और यीशु के द्वारा आपस में विचार विमर्श करने के बाद नहीं लिया गया था; यह मानव विचार से अधिक कुछ नहीं है। क्योंकि इस पुस्तक को यहोवा के द्वारा नहीं लिखा गया था, और यीशु के द्वारा तो कदापि नहीं। इसके बजाए, यह अनेक प्राचीन नबीयों, प्रेरितों और पैगंबरों का लेखा-जोखा है, जिन्हें बाद की पीढ़ियों के द्वारा प्राचीन लेखों की एक ऐसी पुस्तक के रूप में संकलित किया गया था जो, लोगों को, विशेष रूप से पवित्र दिखाई देती है, एक ऐसी पुस्तक जिसमें वे मानते हैं कि अनेक अथाह और गम्भीर रहस्य हैं जो भविष्य की पीढ़ियों के द्वारा प्रकट किए जाने का इन्तज़ार कर रहे हैं" ("वचन देह में प्रकट होता है" से "बाइबल के विषय में (4)")। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन हमें साफ़ तौर पर बताते हैं कि बाइबल के लेखक मनुष्य हैं, परमेश्वर नहीं। इंसानी दस्तावेज़ में ज़रूर इंसानी ख्याल और गलतियां घुली-मिली होंगी। अगर सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने आज बाइबल के इन रहस्यों का खुलासा न किया होता, तो हम कभी न समझ पाये होते।

"बाइबल के बारे में रहस्य का खुलासा" फ़िल्म की स्क्रिप्ट से लिया गया अंश

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