अंत के दिनों में परमेश्वर को फिर से देह धारण करके प्रकट होना और कार्य करना क्यों चाहिए

02 अप्रैल, 2026

बहुत से लोग सोचते हैं कि प्रभु यीशु के क्रूस पर चढ़ाए जाने और मरे हुओं में से जी उठने के बाद, वह पहले ही एक महिमामय आध्यात्मिक शरीर बन गया था और स्वर्ग में चला गया था; इसलिए जब प्रभु लौटेगा, तो उसे अपने पुनर्जीवित आध्यात्मिक शरीर में प्रकट होना और कार्य करना चाहिए। तो वे पूछते हैं : अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर को फिर से मनुष्य के पुत्र के रूप में देह धारण क्यों करना चाहिए? हम सभी जानते हैं कि अनुग्रह के युग में प्रभु यीशु मनुष्य के पुत्र के रूप में देह धारण करके प्रकट हुआ और कार्य किया, ताकि लोगों से मेलजोल कर सके, उनके साथ रह सके और उनकी अगुआई करने के लिए सत्य व्यक्त कर सके। अंत में मानवजाति के पापों को अपने ऊपर लेने की खातिर उसे मनुष्य के लिए पाप-बलि के रूप में क्रूस पर चढ़ा दिया गया। परमेश्वर के प्रकट होने, छुटकारे का कार्य करने और पाप-बलि के रूप में काम करने का सबसे अच्छा तरीका देह धारण करना था; इससे न केवल शैतान शर्मिंदा हुआ बल्कि परमेश्वर ने महिमा भी पाई। यह स्पष्ट है कि देहधारण करके कार्य करने का परमेश्वर का चुनाव पूरी तरह से कार्य की जरूरतों पर आधारित था; उसने अपने प्रकटन का तरीका मनुष्य की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार तय नहीं किया। तो फिर अंत के दिनों में न्याय का कार्य करने के लिए परमेश्वर को फिर से देह धारण क्यों करना चाहिए? यह भी भ्रष्ट मानवजाति की जरूरतों पर आधारित है; भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि इसके लिए बस उसे पूरी तरह से सत्य व्यक्त करना है और फिर लोग बस खुद परमेश्वर के वचन पढ़ लेंगे, संगति करने के लिए इकट्ठा हो जाएँगे और उनका अभ्यास और अनुभव कर लेंगे। उससे कोई नतीजा हासिल नहीं होगा। परमेश्वर के कार्य के हर चरण के लिए एक व्यावहारिक प्रक्रिया होती है, जिसमें कई बारीकियाँ शामिल होती हैं। खासकर अंत के दिनों में लोगों को शुद्ध करने के परमेश्वर के न्याय के कार्य में लोगों के साथ लंबे समय तक मेलजोल करने की जरूरत होती है; इसमें वह लोगों की विभिन्न भ्रष्ट दशाओं और उनके द्वारा प्रकट की जाने वाली विद्रोहशीलता और प्रतिरोध के अनुसार, उनका न्याय करने और उन्हें उजागर करने के लिए लक्षित तरीके से सत्य व्यक्त करता है। इसके लिए लोगों को विभिन्न परीक्षणों और शोधनों का अनुभव करने की भी जरूरत होती है, जो उन्हें बेनकाब करते हैं। इसके लिए परमेश्वर को देह धारण करने और अपना कार्य करने के लिए लोगों के बीच रहने की जरूरत होती है। इसलिए देहधारी परमेश्वर में सामान्य मानवता होनी चाहिए। इससे उसके लिए लोगों से मेलजोल करना सुविधाजनक हो जाता है और लोग परमेश्वर के सामने स्वतंत्रता और मुक्ति में जी सकते हैं, बिना किसी बंदिश के, स्वतंत्र रूप से बोल सकते हैं और स्वाभाविक रूप से काम कर सकते हैं, ठीक वैसे ही जैसे वे अन्य लोगों से मेलजोल करते समय करते हैं। इससे परमेश्वर के लिए लोगों को शुद्ध करने और बचाने के लिए सत्य व्यक्त करना सुविधाजनक हो जाता है। अगर वह एक आध्यात्मिक शरीर के रूप में प्रकट होता, तो लोगों से मेलजोल करना आसान नहीं होता। जरा सोचो : अगर परमेश्वर का आध्यात्मिक शरीर अचानक लोगों के सामने आ जाए, तो वे कैसा महसूस करेंगे? वे डर जाएँगे और घबरा जाएँगे। परमेश्वर के आत्मा के साथ एक या दो बार मेलजोल करने से ही लोग लगातार डर में रहेंगे—वे इस बात से डरे रहेंगे कि पता नहीं परमेश्वर कब आ जाए और वे यह भी नहीं जान पाएँगे कि परमेश्वर का सामना कैसे करें। मुझे बताओ, अगर परमेश्वर लोगों को बचाने का कार्य करने के लिए एक आध्यात्मिक शरीर के रूप में आए, तो क्या यह नतीजे हासिल कर सकता है? बिल्कुल नहीं। अगर लोगों के दिल डर से काँप रहे हों और वे खौफ, बचाव और छिपाव से भरे हों, तो वे परमेश्वर से अपने दिल की बात नहीं बोल पाएँगे। तो फिर परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए सत्य कैसे व्यक्त कर सकता है? इसके अलावा, उसके आध्यात्मिक शरीर के सामने लोगों की कोई धारणाएँ नहीं होंगी; वे केवल डर से काँपेंगे और जरा-सी भी विद्रोहशीलता या प्रतिरोध दिखाने की हिम्मत नहीं करेंगे। अपनी मर्जी के अनुसार काम करने की तो वे हिम्मत ही नहीं कर पाएँगे। ऐसे में लोगों के भ्रष्ट स्वभाव छिपे रहेंगे और उन्हें शुद्ध नहीं किया जा सकेगा। यह साबित करता है कि एक आध्यात्मिक शरीर के रूप में कार्य करना परमेश्वर के लिए लोगों को बचाने के अनुकूल नहीं है। लेकिन जब परमेश्वर एक साधारण व्यक्ति के रूप में देह धारण करता है, तो उसके लिए अपना कार्य करना आसान हो जाता है। जब लोग देखते हैं कि मसीह एक साधारण व्यक्ति है, तो उनके लिए परमेश्वर के करीब आना और उसके सामने अपने दिल की बात कहना आसान हो जाता है। और जब परमेश्वर लोगों को उजागर करने के लिए वचन व्यक्त करता है, तो उनके लिए उसे स्वीकार करना भी आसान होता है। अगर परमेश्वर किसी असाधारण शख्सियत या किसी मशहूर व्यक्ति के रूप में देह धारण करता, तो क्या यह नतीजा हासिल किया जा सकता था? लोगों को लगता कि परमेश्वर उनकी पहुँच से बाहर है और उनके और परमेश्वर के बीच दूरियाँ आ जातीं। लेकिन अगर परमेश्वर एक साधारण व्यक्ति के रूप में देह धारण करता है, तो लोग परमेश्वर के करीब आ सकते हैं, अपने दिल की बात कह सकते हैं और उनके जो भी भ्रष्ट स्वभाव हैं वे प्रकट हो सकते हैं। इससे उनकी जो भी धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं उनका उजागर होना भी आसान हो जाता है। इस तरह परमेश्वर के लिए लोगों को उजागर करना और उनका न्याय करना सुविधाजनक और आसान हो जाता है। इसलिए अपने अंत के दिनों के कार्य में परमेश्वर को एक साधारण व्यक्ति के रूप में देह धारण करना ही चाहिए। इस देह की छवि बहुत असाधारण नहीं हो सकती। केवल इसी तरह लोग परमेश्वर से मेलजोल करने के इच्छुक होंगे, ठीक वैसे ही जैसे वे किसी साधारण व्यक्ति से मेलजोल करते हैं। वे अपनी कथनी और करनी में स्वतंत्र और मुक्त होंगे, वे परमेश्वर से सरलता और खुलेपन से अपने दिल की बात कह सकेंगे। इसके अलावा, देहधारी परमेश्वर के सामने लोगों की विद्रोहशीलता और भ्रष्टता भी स्वाभाविक रूप से प्रकट हो सकती है। परमेश्वर के न्याय, प्रकाशन और काट-छाँट के माध्यम से, लोग परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने, उसके सामने अपना संकल्प व्यक्त करने और व्यावहारिक परमेश्वर को अपने दिल देने के इच्छुक होंगे। एक बार जब लोग सत्य को पूरी तरह समझ लेंगे, तो वे अपने दिलों में व्यावहारिक परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकेंगे और व्यावहारिक परमेश्वर की आराधना कर सकेंगे। जो लोग सत्य पाते हैं वे व्यावहारिक परमेश्वर के साथ एकमन हो सकेंगे, परमेश्वर से अत्यधिक प्रेम कर सकेंगे और मृत्यु तक समर्पण कर सकेंगे। इस तरह देहधारी परमेश्वर लोगों के एक समूह को पूर्ण कर सकता है और उन्हें प्राप्त कर सकता है। ठीक जैसा कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब परमेश्वर देह में कार्य कर रहा होता है, तो वह वास्तव में देह में शैतान से युद्ध कर रहा होता है। जब वह देह में कार्य करता है, तो वह आध्यात्मिक क्षेत्र का अपना कार्य कर रहा होता है, वह आध्यात्मिक क्षेत्र के अपने समस्त कार्य को पृथ्वी पर साकार करता है। जिस पर विजय पाई जाती है वो इंसान है, वह इंसान जो उसके प्रति विद्रोही है, जिसे पराजित किया जाता है वो शैतान का मूर्त रूप है (बेशक, यह भी इंसान ही है), जो उससे शत्रुता रखता है, और अंततः जिसे बचाया जाता है वह भी इंसान ही है। इसलिए, यह परमेश्वर के लिए और भी अधिक आवश्यक हो जाता है कि वह ऐसा इंसान बने जिसका बाहरी आवरण एक सृजित प्राणी का हो, ताकि वह शैतान से असल युद्ध कर सके, उस इंसान पर विजय पाने के लिए जो उसके प्रति विद्रोही है, उसके समान बाहरी आवरण धारण किए हुए है और उस इंसान को बचाने के लिए जिसका बाहरी आवरण उसी के समान है और जिसे शैतान द्वारा नुकसान पहुँचाया गया है। उसका शत्रु मनुष्य है, उसकी विजय का लक्ष्य मनुष्य है, और उसके उद्धार का लक्ष्य भी मनुष्य ही है, जिसे उसने बनाया है। इसलिए उसे मनुष्य बनना ही होगा, और इस तरह, उसका कार्य बहुत आसान हो जाता है—वह शैतान को हराने और मनुष्य को जीतने में समर्थ है, और भी अधिक यह मानवजाति को बचाने में सक्षम है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की बहुत अधिक आवश्यकता है)। “भ्रष्ट मनुष्यों के लिए, केवल वही कार्य जो अनुसरण के लिए सटीक वचन और स्पष्ट लक्ष्य प्रदान करे, जो दृश्यमान और मूर्त हो, वही सबसे मूल्यवान प्रकार का काम है। केवल यथार्थवादी कार्य और समयोचित मार्गदर्शन ही मनुष्य की अभिरुचियों के लिए उपयुक्त होता है, और केवल व्यावहारिक कार्य ही मनुष्य को उसके भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। इसे केवल देहधारी परमेश्वर हासिल कर सकता है; केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य को उसके पुराने भ्रष्ट और पतित स्वभाव से बचा सकता है। यद्यपि आत्मा परमेश्वर का अंतर्निहित सार है, फिर भी इस तरह का कार्य केवल उसकी देह के द्वारा ही किया जा सकता है। यदि आत्मा अकेले ही कार्य करता, तब उसके कार्य का प्रभावी होना संभव नहीं होता—यह एक स्पष्ट सत्‍य है। अधिकांश लोग इस देह के कारण परमेश्वर के शत्रु बन गए हैं, लेकिन जब यह देह अपना कार्य पूरा करेगी, तो जो लोग उसके खिलाफ हैं वे न केवल उसके शत्रु नहीं रहेंगे, बल्कि उसके गवाह बन जाएँगे। वे ऐसे गवाह बन जाएँगे जिन्हें उसके द्वारा जीत लिया गया है, ऐसे गवाह जो उसके अनुरूप हैं और उससे अभिन्न हैं। देह में उसने जो कार्य किया है, उसका महत्व वह मनुष्य को ज्ञात करवाएगा और मनुष्य के अस्तित्व के अर्थ के लिए इस देह के महत्व को मनुष्य जानेगा, मनुष्य के जीवन के विकास के संबंध में उसके व्यावहारिक मूल्य को जानेगा, और इससे भी अधिक, यह जानेगा कि यह देह अप्रत्याशित रूप से जीवन का एक जीवंत स्रोत बन जाएगी जिससे अलग होने की बात मानव सहन नहीं कर सकता(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की बहुत अधिक आवश्यकता है)। “इसलिए, भ्रष्ट मनुष्यजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार और प्रत्यक्ष कार्य की कहीं अधिक आवश्यकता है। मनुष्य को इस बात की आवश्यकता है कि देहधारी परमेश्वर उसकी चरवाही करे, उसे समर्थन दे, उसका सिंचन और पोषण करे, उसका न्याय करे, उसे ताड़ना दे। उसे देहधारी परमेश्वर से और अधिक अनुग्रह तथा बड़े छुटकारे की आवश्यकता है। केवल देहधारी परमेश्वर ही मनुष्य का विश्वासपात्र, उसका चरवाहा, उसकी हर वक्त मौजूद सहायता बन सकता है, और यह सब वर्तमान और अतीत दोनों के ही देहधारण की आवश्यकताएँ हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, भ्रष्ट मानवजाति को देहधारी परमेश्वर के उद्धार की बहुत अधिक आवश्यकता है)

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