सत्य का अनुसरण कैसे करें (11)
परिशिष्ट : जिस मार्ग पर लोग चलते हैं वही तय करता है कि अंततः उन्हें क्या हासिल होगा
परमेश्वर में विश्वास करने का क्या उद्देश्य है? क्या यह अनुग्रह और आशीष पाने के लिए है? क्या यह एक खोखला जीवन जीने से बचने और निम्नस्तरीय हितों से मुक्त होने के लिए है? (नहीं।) तो फिर यह क्या है? (सत्य पाने के लिए।) यह सत्य पाने के लिए है, जीवन पाने के लिए है। तो फिर, क्या लोग रोज जो कुछ भी करते हैं वह सब इसी लक्ष्य की ओर निर्देशित होता है? क्या तुम रोज अपना कर्तव्य निभाने में जो समय और ऊर्जा खर्च करते हो, वह सब इसी लक्ष्य की खातिर है? लोग सत्य पाने के स्पष्ट लक्ष्य के बिना ही परमेश्वर में विश्वास करते हैं। अपने दिलों में वे दर्शनों के इस पहलू को लेकर अस्पष्ट होते हैं और नहीं जानते कि परमेश्वर में विश्वास करने का क्या उद्देश्य है। ऐसा लगता है मानो वे अपने दिलों में बस इतना ही जानते हैं कि यह आशीष पाने के लिए है—लेकिन आशीष पाने के लिए व्यक्ति को क्या करना चाहिए? वे नहीं जानते कि आशीष पाने के लिए सत्य समझने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य का अनुसरण करने की आवश्यकता होती है। तो क्या वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण करते हैं? वे इस बारे में भी निश्चित नहीं होते। वे सोचते हैं, “यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। मैं सच्चे मन से परमेश्वर में विश्वास करता हूँ; परमेश्वर मुझे नहीं त्यागेगा। भले ही लोग कहें कि मैं सत्य का अनुसरण करने वाला व्यक्ति नहीं हूँ, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।” कभी-कभी, जब वे दूसरों को अपनी अनुभवजन्य गवाही साझा करते हुए देखते हैं जबकि वे स्वयं कोई गवाही साझा नहीं कर सकते, तब वे भी परेशान महसूस करते हैं, अपने दिलों में वे थोड़े बेचैन और चिड़चड़े हो जाते हैं। लेकिन ज्यादातर उन्हें लगता है कि यह कोई बड़ी समस्या नहीं है। बस इसी तरह पाँच साल पलक झपकते ही बीत जाते हैं, दस साल पलक झपकते ही बीत जाते हैं—कुछ लोग अब तीस या चालीस वर्ष से ज्यादा उम्र के हैं, कुछ पचास वर्ष से ऊपर के हैं; उन्होंने शादी नहीं की है और हमेशा अपना कर्तव्य करते रहते हैं। अब तक उन्होंने कितना सत्य पाया है? क्या उनके पास जीवन है? वे खुद इस बारे में निश्चित नहीं हैं। उन्हें लगता है : “ऐसा प्रतीत होता है कि मैंने काफी सत्य समझ लिया है और मैं कई धर्मोपदेश दे सकता हूँ; मेरे पास जीवन होना चाहिए, है ना?” चाहे सभाओं के दौरान हो या जब वे अपने कर्तव्यों में समस्याओं का सामना करते हों, वे विस्तार से बोल सकते हैं, मानो वे हर सत्य समझते हों, लेकिन वे कोई भी वास्तविक समस्या हल नहीं कर सकते। वे जो धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, वे चाहे कितने भी ऊँचे लगते हों, फिर भी अपने कर्तव्य निभाते समय वे सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर सकते, यहाँ तक कि सत्य सिद्धांतों को जरा भी न समझते हुए वे कई मामलों में अभी भी अपनी ही मर्जी चलाते हैं। और इसलिए, अपने दिलों में वे उलझे हुए महसूस करते हैं : “मैं सचमुच ऐसा व्यक्ति हूँ या नहीं जो सत्य समझता है?” वे नहीं जानते कि वे ऐसे व्यक्ति हैं या नहीं जो सत्य समझता है। तो फिर, क्या वे ऐसे लोग हैं जो सत्य का अनुसरण और अभ्यास करते हैं? वे खुद भी इस बारे में अनिश्चित होते हैं। तो क्या उन्होंने सचमुच सत्य प्राप्त किया है या नहीं? उन्हें अभी भी इस बारे में संदेह है। तो क्या उनके पास सचमुच जीवन है या नहीं? आखिर जीवन है क्या? किसी व्यक्ति के पास जीवन होने पर कैसा महसूस होता है? जब किसी व्यक्ति के पास जीवन होता है, तो उसके दैनिक जीवन में क्या बदलाव आते हैं? उसके विचार कैसे बदलेंगे? उसकी मानवता में क्या बदलाव आएँगे? उसे इनमें से किसी भी चीज के बारे में स्पष्ट नहीं होता। चाहे उसने कितने भी वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, सत्य के कुछ पहलुओं के बारे में बात करते हुए वह कुछ शब्दों और धर्म-सिद्धांतों का प्रचार कर सकता है; लेकिन जब सत्य का अभ्यास करने के सिद्धांतों की बात आती है, तो वह उन्हें स्पष्ट रूप से नहीं समझा पाता है। विशेष रूप से, कुछ लोग अपने क्रियाकलापों में सिद्धांतों के विरुद्ध जाने के कारण अपनी काट-छाँट किए जाने पर न सिर्फ नकारात्मक हो जाते हैं, बल्कि उलझन में भी पड़ जाते हैं और यह कहते हुए खुद पर ही संदेह करने लगते हैं : “मैंने सचमुच जीवन प्राप्त किया है या नहीं? क्या सत्य का मेरे हृदय में कोई स्थान है, क्या वह मेरा जीवन बन गया है? क्या मैं सचमुच अभी भी उद्धार प्राप्त कर सकता हूँ?” वे सत्य से जुड़े इन सभी मामलों के बारे में उलझन में रहते हैं, लेकिन जब उन बाहरी मामलों की बात आती है जिनमें सत्य शामिल नहीं होता, तो वे उन्हें बहुत स्पष्ट रूप से याद रखते हैं। उदाहरण के लिए, उन्होंने कितने साल, महीने और दिन परमेश्वर में विश्वास किया है, उन्होंने किस स्तर के अगुआ या कार्यकर्ता के रूप में सेवा की है, उन्होंने कौन-से कर्तव्य निभाए हैं, उन्होंने कलीसिया का कितना काम किया है, वे कितनी जगहों की यात्रा कर चुके हैं, सुसमाचार का प्रचार करके उन्होंने कितने लोगों को प्राप्त किया है, उन्होंने कितनी कलीसियाओं का सिंचन किया है, परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में उन्होंने कितना कष्ट सहा है, उन्होंने कितना धन अर्पित किया है, उन्होंने भाई-बहनों को कौन-सी चीजें दान की हैं, वे कितने समय के लिए गिरफ्तार हुए और कैद में रहे हैं, उन्होंने कितनी मार खाई है, उन्हें कितनी यातनाएँ दी गई हैं, वे परमेश्वर के लिए अपनी गवाही में कितनी बार अडिग रहे हैं, आदि-आदि—ये सभी बाहरी मामले वे अपनी याददाश्त में सँजोकर रखते हैं और अक्सर इन्हें याद करते रहते हैं। वे अपने मन में इन सबका हिसाब रखते हैं, हर एक प्रविष्टि स्पष्ट रूप से याद रखते हैं और उसे कभी नहीं भूलते। लेकिन जब बात यह आती है कि वे कितने सत्य समझते हैं और उनमें कितनी वास्तविकता है, तो इस बारे में उनका हिसाब हमेशा गड़बड़ रहता है। उनके मन में यह कभी स्पष्ट नहीं होता कि वे कौन-से सत्य समझते हैं, कौन-से सत्य उन्होंने अभ्यास में उतारे हैं और जब उनके साथ चीजें घटित होती हैं, तो क्या वे सत्य का पालन कर सकते हैं और सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकते हैं; इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। वे मन में इस बारे में भी स्पष्ट नहीं होते कि अपने किन भ्रष्ट स्वभावों की उन्हें सच्ची समझ है, क्या उन्होंने उन्हें त्याग दिया है और कौन-से भ्रष्ट स्वभाव वे अक्सर प्रकट करते रहते हैं लेकिन उन्हें त्यागा नहीं है; इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। परमेश्वर में इतने वर्षों तक विश्वास करने के बाद वे कौन-से सत्य अभ्यास में ला सकते हैं और कौन-से सत्य वे अभ्यास में नहीं लाए हैं, सत्य के किन पहलुओं में उन्होंने प्रगति की है और कितनी प्रगति की है—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। अपनी मानवता के संदर्भ में वे वास्तव में किसे जीते हैं—क्या उनमें जमीर और विवेक है और क्या उन्होंने सामान्य मानवता को जिया है—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। उन्होंने अपने कितने कर्तव्य सच्चे मन से और वफादारी से निभाए हैं, कितने कर्तव्य जानबूझकर लापरवाही से निभाए हैं, कितने कर्तव्य मानक के अनुरूप निभाए हैं और कितने अभी भी मानक के अनुरूप नहीं रहे हैं, किन कर्तव्यों में वे इस तरह सिद्धांतों के अनुसार काम कर पाए हैं कि उनके द्वारा इन कर्तव्यों का निर्वहन परमेश्वर को संतुष्ट करता है और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, किन कर्तव्यों में वे अभी तक सत्य सिद्धांतों को नहीं समझ पाए हैं और परमेश्वर को संतुष्ट करने में सफल नहीं हुए हैं—इन सबका हिसाब उनके पास गड़बड़ होता है। ठीक किन पहलुओं में वे परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने और परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में सक्षम हैं, किस हद तक उन्होंने परमेश्वर के प्रति समर्पण किया है, किन पहलुओं में वे अभी भी परमेश्वर के प्रति समर्पण नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति समर्पण करने में उनकी अक्षमता का क्या कारण है और आगे बढ़ते हुए उन्हें किस तरह से प्रवेश करना चाहिए—इन सब चीजों के संबंध में उनके पास कोई योजना नहीं होती, न ही कोई विचार होता है और बेशक उनके पास कोई स्पष्ट मार्ग तो बिल्कुल भी नहीं होता। इतने वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी वे नहीं जानते कि परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा के लिए उन्होंने कितनी चीजें की हैं या कितने अच्छे कर्म उन्होंने तैयार किए हैं; वे नहीं जानते कि उन्होंने कितनी बुराई की है या कितनी ऐसी चीजें की हैं जिनसे विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न हुई हैं—अपनी यादों में उन्हें ऐसा लगता है कि उन्होंने इनमें से कुछ चीजें की हैं, लेकिन वे नहीं जानते कि बुराई करने के बाद उन्होंने पश्चात्ताप किया है या नहीं। भले ही कभी-कभी उन्हें यह एहसास हो सकता है कि उन्होंने बुराई की है और वे परेशान महसूस करते हैं, उन्होंने परमेश्वर से प्रार्थना की होती है और अपने पाप कबूल किए होते हैं, तो क्या उन्हें परमेश्वर की क्षमा प्राप्त हो जाती है? क्या उनके दिलों में दोषी महसूस करने का भाव होता है? उन्हें इन चीजों का भी पता नहीं होता। वे मन ही मन सोचते हैं : “कौन परवाह करता है कि मैं दोषी महसूस करता हूँ या नहीं? जो भी हो, मैं अभी काफी आराम से जी रहा हूँ; मैं अभी भी अपना कर्तव्य कर रहा हूँ।” तो अपने कर्तव्य निर्वहन में उन्होंने कितने अच्छे कर्म किए हैं? वे यह भी ठीक से नहीं बता सकते, फिर भी उन्हें लगता है कि उन्होंने कुछ अच्छे कर्म किए हैं—हाल ही में उन्होंने सुसमाचार का प्रचार किया और दो लोगों को प्राप्त किया है। उनके पास अच्छे कर्मों की यह छोटी-सी संख्या तो है, लेकिन वे बिना किसी सिद्धांत के चीजें करते हैं, यहाँ तक कि अपनी मनमर्जी से और एक मनमाने और लापरवाही भरे ढंग से काम करते हैं—क्या इन्हें बुरे कर्म माना जाता है? वे इस बारे में भी अस्पष्ट है। उन्हें लगता है कि चूँकि कलीसिया ने उनका निपटारा नहीं किया है और अगुआओं ने उनकी काट-छाँट नहीं की है या इन चीजों के लिए उन्हें जवाबदेह नहीं ठहराया है, इसलिए ये बुरे कर्म नहीं हैं; अगर उन्हें जवाबदेह ठहराया जाता, तो शायद ये चीजें बुरे कर्म होतीं। वे नहीं जानते कि उन्होंने कितने अच्छे कर्म तैयार किए हैं। वे अभी जो चीजें कर रहे हैं, वे अच्छे कर्म हैं या बुरे, उनमें से कितने अच्छे कर्म हैं, उनमें से कितने बुरे कर्म हैं, कितने सत्य सिद्धांतों के अनुरूप हैं, कितने कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों के विरुद्ध जाते हैं—वे इनमें से किसी भी चीज के बारे में नहीं जानते। उन्होंने इन मामलों का कभी कोई हिसाब-किताब नहीं रखा है। बहरहाल, वे रोज समय पर खाते और सोते हैं, आध्यात्मिक भक्ति या कार्य के लिए तय समय पर उठते हैं और काम करते समय भी वैसी ही दशा बनाए रखते हैं और कार्य के उन चरणों का ही पालन करते हैं जैसा पिछले दिन किया था, वही चीजें करते हैं जो हमेशा से करते आए हैं। उन्होंने सत्य का अनुसरण करने और सत्य वास्तविकता में प्रवेश करने या भ्रष्ट स्वभावों को त्यागने और जीवन प्राप्त करने जैसे मामलों को कभी विशेष रूप से या व्यवस्थित ढंग से नहीं जाना है या उन्हें सारांशित नहीं किया है। इसलिए सत्य का अनुसरण करने या जीवन प्रवेश से जुड़ी कोई भी चीज उनके लिए एक उलझा हुआ हिसाब है। मुझे बताओ, अगर कोई व्यक्ति रोज इसी तरह जीता है, ऐसी ही दशा में अपना जीवन बिताता है, तो क्या वह भ्रमित नहीं है? (हाँ, है।) “भ्रमित” एक साहित्यिक अभिव्यक्ति है; बोलचाल की भाषा में इसका अर्थ है निरुद्देश्य तरीके से काम करते जाना। क्या जीने की यह दशा, अस्तित्व में रहने की यह दशा अच्छी है या नहीं? (यह अच्छी नहीं है।) ऊपरी तौर पर वे परमेश्वर का प्रतिरोध करने का कोई स्पष्ट व्यवहार या अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित नहीं करते, लेकिन जब बात सत्य और जीवन प्रवेश का अनुसरण करने से जुड़े मामलों की आती है, तो वे भ्रमित होते हैं और इस बारे में गंभीर नहीं होते। यह दशा ठीक वही है जिसका अर्थ है भ्रमित होना। यह व्यक्ति की समस्या स्पष्ट रूप से दर्शाती है और स्पष्ट रूप से उस मार्ग का खुलासा करती है जिस पर वे परमेश्वर में विश्वास करने में चलते हैं।
परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया में जब सत्य और जीवन प्रवेश का अनुसरण करने की बात आती है, तो व्यक्ति का रवैया, उसकी व्यक्तिपरक इच्छाएँ या अभिव्यक्तियाँ चाहे जैसी भी हों, परमेश्वर की नजरों में, व्यक्ति जिस दशा में होता है वह दर्शाती है कि वह किस मार्ग पर चल रहा है। कुछ लोग जिस पल से परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करते हैं, उसी पल से सत्य से प्रेम नहीं करते और सत्य पर चाहे कैसे भी संगति की जाए, वे उसे स्वीकार नहीं करते। जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह सीधे मृत्यु और नरक की ओर जाता है। कुछ लोग जब पहली बार परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो वे परमेश्वर की अपेक्षाएँ नहीं समझते और सिर्फ आशीष पाने तथा स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने का ही अनुसरण करते हैं। लेकिन परमेश्वर के वचनों को लगातार खाने-पीने से वे सत्य समझने लगते हैं और सत्य का अनुसरण करने में सक्षम हो जाते हैं और सत्य पाने की खातिर कठिनाई सह सकते हैं और कीमत चुका सकते हैं। अंत में यह देखा जा सकता है कि जिस मार्ग पर वे चलते हैं, वह प्रकाश और स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाता है। जीवन प्रवेश के मामलों के संबंध में ज्यादातर लोग अपने लक्ष्यों में इसी तरह अस्पष्ट रहते हैं और उलझन की दशा में बने रहते हैं। लेकिन इन लोगों की अभिव्यक्तियों से आँकें, तो कुछ लोग सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, अपने कर्तव्यों के निर्वहन में हमेशा लापरवाह रहते हैं और परमेश्वर में कई वर्षों तक विश्वास करने के बाद भी जरा भी नहीं बदलते—जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह विनाश और नरक की ओर ले जाता है। दूसरी ओर, कुछ लोग सत्य स्वीकार करने में सक्षम होते हैं, अपने कर्तव्यों का निर्वहन करते समय काट-छाँट स्वीकार कर सकते हैं, उनमें कुछ सच्चा समर्पण होता है और धीरे-धीरे वे अपने कर्तव्यों को इस तरह से करने लगते हैं जो मानक के अनुरूप होता है—जिस मार्ग पर वे चलते हैं वह उन्हें प्रकाश और स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाता है। जो लोग सत्य जरा भी स्वीकार नहीं करते—दूसरे शब्दों में, जो लोग सीधे विनाश के मार्ग पर बढ़ रहे हैं—वे अपने कर्तव्य के निर्वहन में लगातार बुराई करते हैं, कलीसियाई जीवन और कलीसिया के कार्य में बाधा डालते हुए अक्सर ऐसे काम करते हैं जो सत्य के विरुद्ध होते हैं और जिनसे परमेश्वर घृणा करता है। ये लोग कुछ “विशेष” अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित करते हैं। यानी जिस पल से उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया, तब से लेकर अब तक उन्होंने कभी पश्चात्ताप नहीं किया है और अपने कर्तव्य के निर्वहन में वे अक्सर लापरवाह रहते हैं, वे कपटी होते हैं और काम से जी चुराते हैं, आसान काम चुनते हैं और मुश्किल कामों से बचते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते; वे विशेष रूप से स्वार्थी और घृणित होते हैं और सिर्फ अपने आनंद की परवाह करते हैं। यह भी इन लोगों की एक विशेषता होती है। कुछ लोग और भी ज्यादा बुरे होते हैं—अपना कर्तव्य निभाने की प्रक्रिया में वे अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं; मनमाने ढंग से और लापरवाही से काम करते हैं, कभी भी कार्य-व्यवस्थाओं के अनुसार कार्य का अभ्यास नहीं करते या उसे कार्यान्वित नहीं करते। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो अपने कर्तव्य में अक्सर रुतबे के लिए होड़ करते हैं, खुद को ऊँचा उठाते हैं और अपनी ही गवाही देते हैं; वे लोगों को अपनी तरफ खींचकर अपना एक स्वतंत्र राज्य खड़ा कर लेते हैं। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपना कर्तव्य करते समय भेंटों की चोरी करते हैं, भेंटों का अपव्यय करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों के साथ विश्वासघात करते हैं। ये अभिव्यक्तियाँ सकारात्मक हैं या नकारात्मक? (नकारात्मक।) इन लोगों ने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने के पल से ही ऐसी अभिव्यक्तियाँ प्रदर्शित की होती हैं। परमेश्वर का घर उन्हें अवसर देता रहता है—जिन कुछ लोगों में थोड़ी-बहुत काबिलियत होती है, उन्हें पर्यवेक्षक का कर्तव्य करने के लिए व्यवस्थित किया जाता है, लेकिन कुछ समय तक खराब प्रदर्शन करने के बाद उन्हें कोई एकपक्षीय कर्तव्य सौंपा जाता है; लेकिन उस एकपक्षीय कर्तव्य में भी वे लापरवाह बने रहते हैं, अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं, मनमाने और लापरवाह ढंग से काम करते हैं, विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं और कुछ तो रुतबे और सत्ता के लिए होड़ भी करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते। मौका मिलने पर वे भेंटों की चोरी भी करते हैं और भेंटों का अपव्यय भी करते हैं। चाहे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए कितने भी साल हो गए हों, उनमें ये अभिव्यक्तियाँ रत्ती भर भी कम नहीं हुई हैं, न ही उनमें रत्ती भर भी बदलाव आया है। अंत में उनमें क्या देखने को मिलता है? यही कि अपने कर्तव्य के निर्वहन में ये लोग लगातार लापरवाही भरे ढंग से काम करते हैं, धूर्तता बरतते हैं और काम से जी चुराते हैं, आसान काम चुनते हैं और मुश्किल कामों से बचते हैं, यहाँ तक कि शारीरिक सुख-सुविधाओं में लिप्त रहते हैं और गैर-जिम्मेदाराना तरीके से काम करते हैं। उनकी अभिव्यक्तियाँ कभी-कभार या अस्थायी नहीं होतीं, बल्कि लगातार बनी रहती हैं—यह उनके लिए तकलीफदेह है। अपने कर्तव्य निर्वहन में वे लगातार लापरवाह ढंग से काम करते हैं, अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करते हैं और विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, चाहे उनसे कोई भी बात करे, वे बदलते नहीं हैं। वे कितने भी धर्मोपदेश क्यों न सुन लें, वे कभी पश्चात्ताप नहीं करते और न ही उनके दिलों में कभी पछतावा होता है। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो लगातार रुतबे के लिए होड़ करते हैं, परमेश्वर के घर के हितों के साथ लगातार विश्वासघात करते हैं और परमेश्वर के घर के हितों की कभी रक्षा नहीं करते। क्या “लगातार” शब्द को समझना आसान है? चाहे कोई भी हो, जो अपने कर्तव्य निर्वहन में लापरवाही भरे ढंग से काम करता है, मनमाना और निरंकुश रहता है या जिसमें कुछ बुरी अभिव्यक्तियाँ होती हैं, परमेश्वर का घर हमेशा उन्हें पश्चात्ताप करने के अनेक अवसर देता है। ऐसा कभी नहीं होता कि उनकी अस्थायी अभिव्यक्तियों की वजह से उन्हें दूर कर दिया जाता हो और उन्हें अपना कर्तव्य न करने दिया जाता हो। इसके बजाय, उन्हें बार-बार प्रोत्साहित किया जाता है, उनके साथ सत्य के बारे में संगति की जाती है, प्रेमपूर्वक उनकी सहायता की जाती है और सहारा दिया जाता है। इसके अलावा, पवित्र आत्मा उन्हें अतिरिक्त मात्रा में प्रेरित करता है, प्रबुद्ध करता है और फटकारता है। लोग कार्य करते हैं और पवित्र आत्मा भी कार्य करता है, फिर भी ऐसे लोग दिल से पूरी तरह अड़ियल और सत्य से विमुख होते हैं। वे कभी सत्य स्वीकार नहीं करते; वे कभी भाई-बहनों की सहायता, आलोचना, फॉलो-अप या पर्यवेक्षण स्वीकार नहीं करते और इससे भी बढ़कर, वे पवित्र आत्मा का प्रबोधन और ताड़ना स्वीकार नहीं करते। चाहे उन्हें परमेश्वर में विश्वास करते हुए तीन या पाँच वर्ष हुए हों या दस या बीस वर्ष हुए हों, वे ऐसे ही बने रहते हैं। भले ही अब वे उम्र में बड़े हो गए हैं, थोड़े-से ज्यादा परिपक्व और अनुभवी प्रतीत होते हैं, फिर भी वे अपने कर्तव्य उसी तरह करते हैं—वे लगातार लापरवाही भरे तरीके से काम करते हैं और बेलगाम होकर बुरी चीजें करते हैं। इन बीस वर्षों में वे ऐसे ही रहे हैं, बिल्कुल भी नहीं बदले हैं। जब वे बोलते हैं, तो उनके मुँह से झूठ की बाढ़ आ जाती है और वे कभी सच नहीं बोलते। वे अब भी वैसे ही हैं; चाहे वे कितने भी शब्द बोलें, कोई नहीं जानता कि उनमें से कौन-से सत्य हैं और कौन-से असत्य—उनमें एक भी ईमानदार शब्द नहीं होता। भले ही इन बीस वर्षों में अपने कर्तव्य करने में उन्होंने कुछ हद तक कष्ट उठाए हैं और सुसमाचार का प्रचार करके उन्होंने कुछ लोगों को प्राप्त किया है, फिर भी उनका जीवन स्वभाव रत्ती भर भी नहीं बदला है। वे आज भी विशेष रूप से चालाक और धोखेबाज हैं; वे बस पुराने साँप हैं, जो एक भी ईमानदार शब्द बोलने में असमर्थ हैं। यह इस बात को साबित करने के लिए पर्याप्त है कि वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य से प्रेम करते हों; अगर वे उसे थोड़ा-बहुत समझते भी हों, तो भी वे उसे अभ्यास में नहीं ला सकते। वे किस तरह के लोग हैं? ये ऐसे लोग हैं जो लगातार लापरवाही से काम करते हैं, लगातार बेलगाम होकर बुरी चीजें करते हैं, मनमाने और निरंकुश तरीके से काम करते हैं, लगातार विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करते हैं, सत्ता के लिए होड़ करते हैं और लगातार चालें चलते हैं, झूठ बोलते हैं और धोखा देते हैं। यह कहा जा सकता है कि वे पुरानी चालाक लोमड़ियाँ हैं—वे बस पुराने साँप, पुरानी चिकनी ईल मछलियाँ, पुराने दानव, पुराने शैतान हैं। उनके समस्त क्रियाकलापों से पहले “लगातार” विशेषण जोड़ा जाना चाहिए। एक बार “लगातार” जोड़ दिए जाने पर यह उनके खिलाफ व्यक्तिगत पूर्वाग्रह का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह उनके अपने क्रियाकलापों और व्यवहार के कारण उत्पन्न हुई चीज होगी। हर किसी की नजरों में इस व्यक्ति ने ये चीजें सिर्फ एक या दो बार नहीं की हैं—यह आदतन अपराधी है। विभिन्न देशों के पुलिस विभाग आदतन अपराधियों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं? आदतन अपराधियों के आपराधिक रिकॉर्ड अनिवार्य रूप से संग्रहित किए जाते हैं। जब कोई अपराध होता है, तो ये आदतन अपराधी मुख्य संदिग्ध होते हैं और मामले की जाँच-पड़ताल शुरू करने और पूछताछ आरंभ करने पर वे निश्चित रूप से इन्हीं चीजों से शुरुआत करेंगे। तो फिर उन लोगों के बारे में क्या कहा जाए जो परमेश्वर के घर में लगातार लापरवाही से अपना कर्तव्य निभाते हैं? लापरवाह होने और अनियंत्रित होकर बुरे कर्म करने की उनकी अभिव्यक्तियाँ सिर्फ एक या दो बार होने वाली चीजें नहीं हैं, न ही वे सिर्फ विशेष परिस्थितियों में होती हैं। ये दशाएँ और अभिव्यक्तियाँ वह सतत तरीका है जिससे वे अपने कर्तव्य के साथ पेश आते हैं। जिस सतत तरीके से वे अपने कर्तव्य के साथ पेश आते हैं उससे आँकें तो यह देखा जा सकता है कि सत्य के प्रति उनका क्या रवैया है। तो सत्य के प्रति उनका क्या रवैया है? (वे उससे विमुख हैं और उसके प्रति प्रतिरोध महसूस करते हैं।) इस तरह के लोग सत्य से विमुख होते हैं और उसके प्रति प्रतिरोध महसूस करते हैं। वे उसे कभी स्वीकार नहीं करते। अपने मन की गहराई में वे उसे तुच्छ समझते हैं और सकारात्मक चीजों से घृणा करते हैं। चाहे कोई भी उनके साथ सत्य पर संगति करे, वे नहीं सुनते। चाहे उन्हें पश्चात्ताप करने के कितने भी अवसर दिए जाएँ, वे उन्हें सँजोते नहीं या उन्हें गंभीरता से नहीं लेते। वे जैसा चाहते हैं वैसा ही करते हैं, उसी तरीके से करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। जब पवित्र आत्मा उन्हें प्रेरित करता है, तो उन्हें कोई अनुभूति नहीं होती और वे उसकी परवाह नहीं करते। वे लोगों के प्रोत्साहनों और मदद से विमुख रहते हैं और उनकी उपेक्षा करते हैं और अगर वे लोग तब उनकी काट-छाँट करते हैं, तो वे क्रोधित हो जाते हैं, आग-बबूला हो जाते हैं, उन पर भड़क उठते हैं और अपने दिलों में उनके प्रति घृणा महसूस करते हैं। कलीसिया हर चरण पर प्रत्येक व्यक्ति की अभिव्यक्तियों का मूल्यांकन करती है और व्यक्ति के परिणाम के लिए यह मूल्यांकन अत्यंत महत्वपूर्ण होता है। अगर व्यक्ति का चरित्र-चित्रण करते हुए उसके बुरे कर्मों की अभिव्यक्तियों में “लगातार” शब्द जोड़ दिया जाता है, तो यह उस व्यक्ति के लिए तकलीफदेह होता है। यह बिल्कुल स्पष्ट हो जाता है कि ऐसे लोग असल में किस तरह के मार्ग पर चल रहे हैं। तो आखिर वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? यह वह मार्ग है जो विनाश की ओर ले जाता है या वह मार्ग जो उद्धार की ओर ले जाता है? (वह मार्ग जो विनाश की ओर ले जाता है।) यह नतीजा क्यों निकलता है? क्या यह इन लोगों पर कोई फैसला सुनाना है? क्या यह वास्तविक स्थिति के विपरीत है? (नहीं।) क्या उन्हें अब भी पश्चात्ताप करने के मौके दिए जाने चाहिए? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “हमें उन्हें पूरी तरह से खारिज नहीं कर देना चाहिए—हो सकता है किसी दिन वे पश्चात्ताप कर लें!” नीनवे के लोगों ने बहुत सारे बुरे कर्म किए थे और उनके बुरे कर्मों की सूचना परमेश्वर के कानों तक पहुँच गई थी। जब परमेश्वर उन्हें नष्ट करने ही वाला था तब उसने योना को उन्हें एक संदेश देने के लिए आगे भेजा, जिसमें बताया गया था कि नीनवे को चालीस दिनों में नष्ट कर दिया जाएगा। यह सुनकर नीनवे के लोगों ने कैसा व्यवहार किया? चालीस दिनों के अंदर ही उन्होंने टाट और राख ओढ़ ली और परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप किया। लेकिन अब, जो लोग अपना कर्तव्य करते समय लगातार खराब प्रदर्शन करते हैं, उन्हें पश्चात्ताप करने के लिए चालीस दिनों के कितने सेट पहले ही दिए जा चुके हैं? क्या उन्होंने पश्चात्ताप किया है? क्या उनमें पश्चात्ताप करने की इच्छा है? क्या वे पश्चात्ताप की ओर कोई झुकाव दिखाते हैं? (नहीं।) पिछले दस या बीस सालों में उनकी अभिव्यक्तियाँ लगातार बुराई करने वाली ही रही हैं, तो क्या अगले दस या बीस सालों में वे बदल सकते हैं? क्या वे बुराई करना छोड़ सकते हैं? यह अज्ञात हो सकता है, लेकिन पिछले दस या बीस सालों में इन लोगों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ यह दिखाने के लिए पर्याप्त हैं कि उनके सभी व्यवहार और अभिव्यक्तियाँ सत्य के खिलाफ जाती हैं, परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं और परमेश्वर का विरोध करती हैं। यह साबित करता है कि उनके दिल सत्य से विमुख हैं, उनका प्रकृति सार दुष्ट है और उसमें सत्य से प्रेम करने का कोई तत्त्व नहीं है, उनमें सत्य से प्रेम करने और उसका अभ्यास करने की मानवता नहीं है। पिछले दस या बीस सालों की उनकी अभिव्यक्तियों से आँकें तो यही निष्कर्ष निकलता है। चूँकि इस बिंदु तक तक यही निष्कर्ष निकला है, इसलिए उनकी मानवता और उनके सार से आँकने पर क्या अगले दस, बीस या तीस सालों में उनमें से कोई भी सचमुच पश्चात्ताप कर पाएगा और बदल पाएगा? क्या तीस लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? क्या पचास लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? क्या सौ लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? यानी अगले दस या बीस सालों में क्या वे अचानक जमीर की जागरूकता प्राप्त कर पाएँगे, सत्य और सकारात्मक चीजों में दिलचस्पी ले पाएँगे, सत्य और सकारात्मक चीजों को स्वीकार कर पाएँगे, खुद को जान पाएँगे और सच्चा पश्चात्ताप कर पाएँगे और अतीत में किए गए बुरे कामों के लिए पछतावा और ऋणी महसूस कर पाएँगे? तुम लोगों की जाँच-परख के आधार पर इसका अनुपात क्या है? क्या हजार लोगों में से कोई एक ऐसा हो सकता है? (मुझे लगता है कि हजार लोगों में से भी कोई एक ऐसा नहीं है।) तुम्हें ऐसा किस आधार पर लगता है? (इस तथ्य पर कि दस या बीस सालों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बावजूद ऐसे लोगों का सत्य के प्रति रवैया लगातार नफरत भरा और प्रतिरोध महसूस करने का रहा है; वे सत्य जरा भी स्वीकार नहीं करते और उन्होंने पश्चात्ताप की थोड़ी-सी भी अभिव्यक्ति नहीं दिखाई है। इससे यह साबित होता है कि वे भविष्य में भी सच में पश्चात्ताप नहीं करेंगे।) क्या यह कथन सही है? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं, “हमें दूसरों के प्रति सहनशील और धैर्यवान होना चाहिए। अगर उन्होंने पिछले दस या बीस सालों में पश्चात्ताप नहीं किया है, तो इसकी वजह यह थी कि वे कम उम्र के और अपरिपक्व थे या उनकी पारिवारिक स्थितियाँ अच्छी थीं और उन्हें बहुत लाड़-प्यार मिला और वे बिगड़ गए या फिर उनके पास ऊँचा सामाजिक रुतबा और कुछ खूबियाँ थीं। क्या इन खास परिस्थितियों और परिवेशों के कारण ही वे ऐसे नहीं हो गए? हो सकता है कि अगले दस या बीस सालों में वे उन पारिवारिक परिवेशों और प्रतिकूल कारकों से मुक्त हो जाएँ और शायद बदल जाएँ।” यह कहना मुश्किल है। लेकिन, इन लोगों की पिछली अभिव्यक्तियों के आधार पर, जिन लोगों की अभिव्यक्तियों से पहले “लगातार” विशेषण जुड़ा है, वे सभी बहुत बड़े खतरे में हैं। यहाँ तक कि इन सौ या हजार लोगों में से भी कोई एक भी ऐसा नहीं हो सकता जो सच में पश्चात्ताप कर सके। अगर उनके किसी भी बुरे कर्म से पहले अभी तक “लगातार” विशेषण नहीं लगा है, तो शायद ऐसे लोगों के लिए अभी भी थोड़ी उम्मीद है। यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अगले तीन से पाँच सालों में उनकी अभिव्यक्तियाँ कैसी रहती हैं। अगर ऐसा इसलिए है कि वे कम उम्र के और अपरिपक्व हैं या परमेश्वर में उनके विश्वास की कोई नींव नहीं है या उनकी काबिलियत खराब है या फिर कुछ वस्तुगत परिवेशों ने उनके सत्य को स्वीकारने और समझने को प्रभावित किया है—अगर ऐसा इन वस्तुगत कारणों से हुआ है और बुरे कर्मों की उनकी अभिव्यक्तियाँ सिर्फ अस्थायी हैं, तो आगे और जाँच-परख करना जरूरी है। लेकिन अब तक, जो लोग लगातार बुरे कर्म करते हैं—जिनकी अभिव्यक्तियों से पहले “लगातार” शब्द जुड़ा है—उन्होंने अपनी मंजिल के लिए पर्याप्त अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं। इसके बजाय, परमेश्वर में विश्वास करने की अपनी प्रक्रिया में उन्होंने बहुत सारे बुरे कर्म जमा कर लिए हैं। बात बस इतनी है कि वे यह मानने से इनकार करते हैं कि वे बुरे लोग हैं और उन्होंने जो कठिनाइयाँ सही हैं, जो कीमत चुकाई है उनका और परमेश्वर के लंबे समय से विश्वासी होने के नाते अपनी वरिष्ठता का उपयोग करके वे खुद को सही ठहराने की कोशिश भी करते हैं। जिस मार्ग पर ये लोग चलते हैं, वह न सिर्फ उनके सामने प्रदर्शित किया गया है बल्कि हर किसी के सामने भी प्रकट किया गया है। उनकी अभिव्यक्तियाँ और प्रकाशन, उनके क्रियाकलाप और व्यवहार, अपना कर्तव्य करने के प्रति उनका रवैया, सत्य के प्रति उनका रवैया और सभी सकारात्मक चीजों के प्रति उनका रवैया उनका सार दिखाने के लिए पहले से ही पर्याप्त हैं। बेशक, अपने कर्तव्य के प्रति उनके रवैये और सत्य के प्रति उनके रवैये ने भी उस मार्ग को पहले ही प्रकट कर दिया है जिस पर वे चल रहे हैं।
जिस मार्ग पर लोग चलते हैं, वही तय करता है कि अंततः उन्हें क्या हासिल होगा। अगर लोग विनाश के मार्ग पर चलते हैं, तो अंततः उन्हें यही हासिल होता है कि उनके लिए नरक के दरवाजे खुल जाते हैं और वे नरक में उतर जाते हैं। इसका दूसरों से कोई लेना-देना नहीं है—यह दूसरे लोगों की वजह से नहीं होता, बल्कि यह अंततः उस मार्ग द्वारा लाया गया नतीजा है जिस पर तुम चलते हो। ऐसा हो सकता है कि तुमने कई सालों से परमेश्वर में विश्वास किया हो और कई अपराध किए हों, कुछ गलत मोड़ लिए हों और कुछ ऐसी चीजें की हों जो सही मार्ग से हटकर हों; कुछ लोग तो ऐसे भी हैं जिन्होंने परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने और उसका प्रतिरोध करने वाले कुछ काम किए हैं। भले ही ये अभिव्यक्तियाँ अच्छी नहीं हैं और परमेश्वर की नजरों में उन्हें दोषी ठहराया जाता है, फिर भी अगर—अपना भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करने, परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह और उसका प्रतिरोध करने के साथ ही—तुम आत्मचिंतन कर पाते हो और सचमुच बदल जाते हो, अपनी सच्चाई, कीमत चुकाने, सत्य का अभ्यास करने और सत्य के प्रति अपने सकारात्मक और सक्रिय रवैये का इस्तेमाल करके सक्रिय रूप से कई अच्छे कर्म तैयार कर लेते हो, तो तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया बदल जाएगा। उदाहरण के लिए, मान लो जब मसीह-विरोधी और दुष्ट लोग कलीसिया के कार्य में गड़बड़ करते और उसमें बाधा डालते हैं और भाई-बहनों को गुमराह करते हैं, तो तुम तुरंत उन मसीह-विरोधियों और बुरे लोगों के बुरे कर्मों को उजागर कर पाते हो, उनके द्वारा पैदा की जाने वाली विघ्न-बाधाओं को रोक पाते हो, भाई-बहनों की रक्षा कर पाते हो और परमेश्वर के घर के हितों की सुरक्षा कर पाते हो। इसके अलावा, अपना कर्तव्य करने की प्रक्रिया में कई अप्रत्याशित कठिनाइयाँ और बाधाएँ आई हों और तुमने अपना समय, ऊर्जा और शारीरिक शक्ति खर्च की हो, अपने शारीरिक आनंद के सुखद पलों का त्याग किया हो और इन कठिनाइयों और समस्याओं को हल करने के लिए अपना पूरा प्रयास किया हो। तुम्हारी प्रेरणा, निगरानी और फॉलो-अप के जरिए, तुम्हारे कष्ट सहने और कीमत चुकाने के जरिए कलीसिया का सुसमाचार कार्य सामान्य और सुचारु रूप से विकसित हो पाया हो और आगे बढ़ पाया हो। इसके अलावा, सुसमाचार का प्रचार करने की प्रक्रिया में, तुम कुछ ऐसे लोगों को साथ लाए हो जिनमें अच्छी काबिलियत और सत्य समझने की क्षमता है और तुमने उनके साथ विभिन्न सत्यों के बारे में स्पष्ट रूप से संगति की हो, जिससे वे सच्चे मार्ग पर नींव रख पाए हों, कलीसिया में अपना कर्तव्य कर पाए हों और कार्य की कुछ खास मदों में सक्षम सहायक बन पाए हों। या फिर तुमने परमेश्वर के घर में किसी खास, विशेषीकृत कार्य में अहम भूमिका निभाई हो, कार्य की प्रगति को आगे बढ़ाने और उसके नतीजे बेहतर बनाने के लिए कार्य के असरदार तरीके या चरण इस्तेमाल किए हों। या फिर कलीसियाई जीवन में तुमने उन कुछ भाई-बहनों की मदद की हो जो नकारात्मक और कमजोर थे या जो दिशाहीन महसूस करते थे और जिनके पास कोई मार्ग नहीं था, तुमने उन्हें आगे बढ़ने का मार्ग खोजने में, परमेश्वर के इरादे समझने और उसे गलत न समझने में और सत्य का अनुसरण करने का संकल्प करने में मदद की हो। इससे भी बढ़कर, तुम इन लोगों को प्रोत्साहित करने में सक्षम रहे हो जिससे वे कोई कर्तव्य करने और परमेश्वर के लिए खुद को खपाने के लिए तैयार हो गए हों। या फिर किसी विशेषीकृत कार्य में तुमने कोई अपरिहार्य भूमिका निभाई हो—यह भी हो सकता है कि तुम जो काम करते हो वह कठिन और थकाऊ हो और उस पर किसी की नजर भी न पड़ती हो, फिर भी तुम एक गुमनाम, परदे के पीछे काम करने वाले कार्यकर्ता बने रहने के लिए तैयार रहते हो, बिना कोई इनाम माँगे बस अपनी सच्चाई और वफादारी अर्पित करने की चाह रखते हुए परिश्रम करते हो। इस तरह की सभी सकारात्मक अभिव्यक्तियाँ परमेश्वर की नजरों में ऐसे अच्छे कर्म हैं जो याद रखे जाने लायक हैं। दूसरी ओर, ऐसा भी हो सकता है कि जब तुम इन चीजों का सामना करते हो, तो तुम न सिर्फ अपना कर्तव्य करने और अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी करने में विफल रहते हो, बल्कि पल्ला झाड़ने का नजरिया अपनाते हो और किनारे खड़े होकर तमाशा देखते हो और हँसते हो, तुम उन्हें पूरी तरह से नजरअंदाज कर देते हो, उनसे आँखें मूँद लेते हो और कान बंद कर लेते हो। तुम वह नहीं करते जो तुम कर सकते हो, यहाँ तक कि अपने थक जाने के डर से तुम कोई सुझाव देने की जहमत भी नहीं उठाते। जब भी मुमकिन होता है, तुम यह सोचते हुए चीजों को टाल देते हो कि तुम जितने ज्यादा खाली बैठोगे, उतना ही बेहतर होगा। तुम्हें हमेशा यही लगता है कि ज्यादा सावधान और जिम्मेदार होना बेकार है और कार्य के मामलों में सिर खपाना बहुत बड़ी मुसीबत है। भले ही ये अभिव्यक्तियाँ कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न करने जैसे बुरे कर्मों से अलग हैं और परमेश्वर तुम्हें कोई खराब रेटिंग नहीं देगा, लेकिन वह तुम्हें कोई अच्छी रेटिंग भी नहीं देगा। तुम्हें अच्छी रेटिंग न देने से मेरा क्या मतलब है? इसका मतलब यह है कि इन चीजों में तुमने अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं, न ही ऐसी चीजें की हैं जिन्हें परमेश्वर याद करे। जब तुमने इन चीजों का सामना किया, तब तुमने अच्छे कर्म तैयार करने का मौका गँवा दिया। तुम बहुत बेवकूफ हो; तुम भरोसे के लायक नहीं हो, बढ़ावा देने लायक नहीं हो, उन्नत करने लायक नहीं हो और परमेश्वर द्वारा मामले सौंपे जाने लायक नहीं हो। तुम नूह और अब्राहम से पूरी तरह अलग हो। मुझे बताओ, जिस व्यक्ति को परमेश्वर कुछ भी सौंपने की हिम्मत नहीं करता, हो सकता है वह अंत में नरक न जाए, लेकिन क्या वह स्वर्ग के राज्य में प्रवेश कर सकता है? सिर्फ यही कहा जा सकता है कि यह अनिश्चित है और इसके आगे ढेर सारे प्रश्नचिह्न लगते हैं; यह बहुत ज्यादा अनिश्चितता से भरा है। यह अनिश्चितता उसकी सतत अभिव्यक्तियों पर आधारित है। अगर तुम हर किसी से पूछो कि वह परमेश्वर में विश्वास क्यों करता है, वह स्वर्ग के राज्य में जाना चाहता है या नरक में—तो कुछ लोग तुम्हारा मजाक उड़ाएँगे, कहेंगे कि यह सवाल बेहद बेवकूफी भरा है : “कौन नरक में जाना और नष्ट होना चाहेगा? कौन स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करना और उद्धार पाना नहीं चाहेगा?” लेकिन यह सवाल सच में पूछा जाना चाहिए। यह बेवकूफी भरा नहीं है। कुछ लोगों ने कभी इस तरह से आत्म-चिंतन नहीं किया है। जब वे स्थितियों का सामना करते हैं, तो वे हमेशा मुसीबत से डरते हैं और विवादों को न्योता देने से घबराते हैं। खासकर जब वे देखते हैं कि बुरे लोग कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ उत्पन्न कर रहे हैं, परमेश्वर के चुने हुए लोगों को गुमराह किया जा रहा है और उनका शोषण हो रहा है और नतीजतन कलीसिया का कार्य आगे नहीं बढ़ पा रहा है, तो वे नहीं जानते कि परमेश्वर लोगों की पड़ताल कर रहा है, न ही वे यह जानते हैं कि असल में यह अच्छे कर्म तैयार करने का मौका है। इसके बजाय, वे खुशामदी इंसान होना चुनते हैं और सत्य सिद्धांतों को छोड़ देते हैं और जरा भी आत्म-चिंतन नहीं करते। तुम्हारी जिम्मेदारी क्या है? तुम्हारा दायित्व क्या है? तुम्हारे लिए परमेश्वर का क्या आदेश है? परमेश्वर ने बहुत सारे वचन कहे हैं और बहुत सारा कार्य किया है—परमेश्वर की तुम्हारे लिए क्या अपेक्षा है? क्या तुम परमेश्वर को कोई संतोषजनक जवाब दे सकते हो? क्या तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं? इन सभी मामलों में तुम्हें अक्सर आत्म-चिंतन करना चाहिए और अपने दिल में स्पष्टता रखनी चाहिए।
हर कोई आशीष पाना चाहता है। कोई भी नष्ट किया जाना और नरक भेजा जाना नहीं चाहता है, लेकिन न चाहते हुए भी बहुत-से लोग बार-बार बुराई करते हैं, उस मार्ग पर तेज रफ्तार से आगे बढ़ते हैं जो नरक की तरफ ले जाता है। कुछ लोग बार-बार परमेश्वर के घर द्वारा अपना कर्तव्य निभाने के दिए गए अवसरों को अनदेखा करते हैं, जब पवित्र आत्मा उन्हें प्रेरित करता है और धिक्कारता है, तो उसे अनदेखा करते हैं और परमेश्वर के घर की मदद और अपेक्षाओं को अनदेखा करते हैं। वे लापरवाही करने, अनियंत्रित होकर बुरे काम करने, मनमाने ढंग से और निरंकुश होकर काम करने और कलीसिया के काम में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने पर अड़े रहते हैं और जरा भी आत्म-चिंतन नहीं करते। क्या वे बस चिकने घड़े, बेशर्म लोग नहीं हैं? तुम लगातार इस तरह बुराई करते हो। ऐसा नहीं है कि दूसरे तुम्हें ऐसा करने के लिए मजबूर करते हैं—यह स्पष्ट रूप से तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद है, कुछ ऐसा जिसे तुम व्यक्तिगत रूप से पसंद करते हो और जिसे करने में खुश होते हो। अगर कोई कहता है कि तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला और नरक की ओर ले जाने वाला मार्ग है, तो तुम परेशान और नकारात्मक महसूस करते हो। तुम किस बात को लेकर नकारात्मक महसूस कर रहे हो? क्या तुमने खुद ही यह मुसीबत मोल नहीं ली और जो बोया वही नहीं काटा? क्या यह तुम्हारे किए का ही फल नहीं है? कुछ लोग कहते हैं, “मैं न चाहते हुए भी बुराई करता हूँ। हर बार, मैं चीजों को अच्छी तरह से करना चाहता हूँ, लेकिन मेरे करने के बाद, मैं पाता हूँ कि मेरे क्रियाकलापों के परिणाम बहुत अच्छे नहीं हैं।” तुमने बुराई की है, गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा की हैं और कलीसिया के काम को नुकसान पहुँचाया है। भले ही तुम्हारे अपराधों के लिए तुम्हें जवाबदेह न ठहराया जाए, लेकिन उन्होंने अपने पीछे छिपे हुए खतरे छोड़ दिए हैं और तुम भविष्य में उन्हें फिर से कर सकते हो। यह बहुत खतरनाक है। यह बिल्कुल उस रास्ते की तरह है जिस पर कोई व्यक्ति चला हो—वह जहाँ भी चला है, उसके निशान छूटना तय है। क्या तुम उन अपराधों को पहचानते हो जो तुमने किए हैं? क्या तुम उनके लिए पछतावा महसूस करते हो? क्या तुम शुक्रगुजार और दुखी महसूस करते हो? क्या तुम उनके कारण फूट-फूटकर रोते हो? क्या तुम बदल चुके हो? क्या तुम सचमुच अपने कुकर्मों से नफरत करते हो? क्या तुमने अपने हाथों की बुराई को छोड़ दिया है और परमेश्वर के सामने सचमुच पश्चात्ताप कर लिया है? कुछ लोग कहते हैं : “मुझे भी खुद से नफरत है। मैंने एकांत में अनगिनत बार अपने चेहरे पर थप्पड़ मारे हैं और मैं परमेश्वर के सामने घुटने टेककर, प्रार्थना में फूट-फूटकर रोया भी हूँ।” तुम शायद इन प्रक्रियाओं से गुजरे होगे, लेकिन परमेश्वर इन प्रक्रियाओं को नहीं देखता है। परमेश्वर तुम्हारी अभिव्यक्तियों को देखता है। जब वही स्थिति फिर से उत्पन्न होती है या वही कर्तव्य फिर से तुम्हारे हिस्से में आता है, तो तुम उसके साथ कैसा व्यवहार करते हो? क्या तुममें सच्चाई और वफादारी होती है? क्या तुम कीमत चुका सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर सकते हो? तुम्हारे बदलने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? क्या तुमने अपनी मौजूदा बुराई को छोड़ दिया है? क्या तुम अब भी वही बुरे काम कर रहे हो जो तुमने अतीत में किए थे? क्या तुम अब भी झूठ बोल रहे हो, अब भी मनमाने ढंग से और निरंकुश होकर काम कर रहे हो, अब भी कार्य-व्यवस्थाओं और सत्य सिद्धांतों के खिलाफ जा रहे हो, अब भी अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के अनुसार काम कर रहे हो और अब भी कलीसिया के काम में गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने के लिए बुरे लोगों के साथ साँठ-गाँठ कर रहे हो? अगर तुम अब भी ऐसा ही करते हो, तो तुम्हारा पश्चात्ताप और फूट-फूटकर रोना झूठा और लापरवाही भरा है। लापरवाही भरे, झूठे पश्चात्ताप को किस रूप में निरूपित किया जाता है? (पाखंड।) क्या इसे पाखंड के रूप में निरूपित किया जाता है? इसे धोखे के रूप में निरूपित किया जाता है। क्या यह कथन सटीक है? (हाँ।) परमेश्वर की नजर में, इस तरह फूट-फूटकर रोना और ऐसा पश्चात्ताप धोखा है। उदाहरण के लिए, परमेश्वर कहता है, “मुझे इस साल की फसल से दस पाउंड चावल भेंट करो।” कुछ लोग इसे भेंट करने के इच्छुक नहीं होते और इसे खाने के लिए अपने पास रखना चाहते हैं, इसलिए वे दस पाउंड चावल की भूसी लेते हैं और उसे वेदी पर रख देते हैं। जब पूछा जाता है कि यह क्या है, तो वे कहते हैं कि यह धान है। परमेश्वर कहता है, “क्या मैंने तुमसे चावल नहीं माँगा था?” वे कहते हैं, “धान ही चावल है।” क्या यह धोखा है? (हाँ।) यह बेशर्मी भरा धोखा है। बुराई करने के बाद, तुम अपना पाप कबूल करते हो, बार-बार कहते हो कि तुम परमेश्वर के ऋणी हो और यहाँ तक कि फूट-फूटकर रोते भी हो, लेकिन बाद में, तुम ऐसा व्यवहार करते हो जैसे कुछ हुआ ही न हो और पहले की तरह ही काम करना जारी रखते हो। परमेश्वर इस तरह के व्यवहार को धोखे के रूप में निरूपित करता है। परमेश्वर की नजर में, इस तरह का धोखेबाज व्यवहार कुकर्मों के बराबर है। अगर तुममें सचमुच बदलने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का दृढ़ संकल्प है, तो तुम्हें संकल्प लेने या फूट-फूटकर रोने की जरूरत नहीं है। पहले इसे करो—जब तुम इसे कर सको तब परमेश्वर से सौगंध खाओ। अगर तुम इसे नहीं कर सकते, तो तुम्हें बिल्कुल भी सौगंध नहीं खानी चाहिए। अगर तुम सौगंध खाते हो, तो परमेश्वर इसे गंभीरता से लेगा और तुमने जो सौगंध खाई है उसका नतीजा माँगेगा। अगर तुम इसे पूरा नहीं कर सकते, तो परमेश्वर की नजर में वह धोखा है—परमेश्वर को धोखा देना तुम्हारे खिलाफ दर्ज एक और कुकर्म बन जाता है। इसलिए, यदि तुम सचमुच पश्चात्ताप नहीं कर सकते और इसके बजाय अपनी सौगंधों से परमेश्वर को धोखा देते हो, तो जिस रास्ते पर तुम चल रहे हो वह विनाश की ओर ले जाता है। तुम्हारा हर कुकर्म नरक के फाटकों पर एक प्रहार है; शायद इन प्रहारों में से कोई एक अंत में उन्हें खोल देगा और तब तुम्हारी मृत्यु का समय आ चुका होगा। यह कहा जा सकता है कि कुछ लोगों के लिए, जब से उन्होंने परमेश्वर में विश्वास करना शुरू किया है तब से लेकर अब तक, उनके सभी क्रियाकलाप और व्यवहार लगातार कुकर्मों को जमा करने और नरक के फाटकों पर प्रहार करने वाले रहे हैं और साथ ही, परमेश्वर के क्रोध को संचित करने वाले भी रहे हैं; वे अपने ऊपर परमेश्वर के दण्ड के उतरने की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन, अन्य लोग परमेश्वर में विश्वास करने की प्रक्रिया में एक सकारात्मक और सही दिशा में प्रगति कर रहे हैं। वे जिस मार्ग पर चलते हैं वह स्वर्ग के राज्य का मार्ग है। इस अवधि के दौरान, यद्यपि वे विद्रोही होते हैं और भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं, बेशक परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और कल्पनाएँ भी होती हैं और अपना कर्तव्य करने में उनकी अपनी इच्छा होती है, इन अभिव्यक्तियों को प्रकट करते हुए या इन व्यवहारों में शामिल होते हुए भी वे लगातार सत्य को स्वीकार कर रहे होते हैं और लगातार अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ रहे होते हैं और उन्हें बदल रहे होते हैं; वे सचमुच बदल चुके होते हैं और उनमें सत्य को स्वीकार करने और उसके प्रति समर्पण करने की अभिव्यक्तियाँ और वास्तविकता होती है। यद्यपि ऐसे लोगों ने कभी कई अपराध किए थे और कुछ ऐसी चीजें की थीं जिनसे परमेश्वर घृणा करता है और जिनकी निंदा करता है, लेकिन सत्य को समझने और बदलने के बाद वे धीरे-धीरे अपने भ्रष्ट स्वभावों को छोड़ देते हैं और अब बुराई नहीं करते हैं। अपने बदलाव से और सत्य के लिए कष्ट सहने और कीमत चुकाने के अपने दृढ़ संकल्प और निश्चय से, वे परमेश्वर को द्रवित कर देते हैं। साथ ही, उनके प्रयास और क्रियाकलाप और उनके द्वारा तैयार किए गए अच्छे कर्म धीरे-धीरे परमेश्वर की स्वीकृति और अनुमोदन प्राप्त कर लेते हैं और इन चीजों को परमेश्वर द्वारा याद भी रखा जाता है। ऐसे लोगों की समग्र अभिव्यक्तियों को देखते हुए, वे—जैसा कि तुम लोग अक्सर कहते हो—मूलतः सही लोग हैं। ये सही लोग जिस मार्ग पर चलते हैं, वह स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाने वाला मार्ग है, वह मार्ग जो उद्धार की ओर ले जाता है। ऐसे लोग उद्धार के मार्ग पर चल रहे हैं। बेशक, इन लोगों की अभिव्यक्तियाँ बुनियादी रूप से दूसरों के दबाव, पर्यवेक्षण, प्रबंधन या काट-छाँट का नतीजा नहीं होती हैं और न ही कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों के विनियम का नतीजा होती हैं। इसके बजाय, वे सक्रिय रूप से बदलते हैं और अपने जीवन प्रवेश में, उनकी अपनी व्यक्तिगत योजनाएँ और रूपरेखाएँ होती हैं, साथ ही उनका अपना सक्रिय दृढ़ संकल्प होता है। ये लोग जिस मार्ग पर चलते हैं वह सही मार्ग है। वे इन सकारात्मक, सक्रिय अभिव्यक्तियों के साथ अपनी मंजिल के लिए अच्छे कर्म तैयार कर रहे हैं। यह उनका व्यक्तिगत, व्यक्तिपरक अनुसरण है जो उनके द्वारा अपनाए जाने वाले मार्ग को निर्धारित करता है और उनके प्रति परमेश्वर का रवैया निर्धारित करता है। अंततः, अपने व्यक्तिगत, व्यक्तिपरक अनुसरण के कारण, वे परमेश्वर से एक उपयुक्त फैसला और एक उपयुक्त मंजिल प्राप्त करने में सक्षम होते हैं।
मुझे बताओ, लोगों को उचित कर्म कैसे करने चाहिए और उन्हें ये ऐसी किस दशा और स्थिति में करने चाहिए ताकि इसे अच्छे कर्म तैयार करना माना जाए? कम-से-कम, उन्हें सकारात्मक और सक्रिय रवैया रखना चाहिए और अपना कर्तव्य करते समय वफादार होना ही चाहिए, सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में समर्थ होना चाहिए और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा करनी चाहिए। सकारात्मक और सक्रिय होना सबसे महत्वपूर्ण है। अगर तुम हमेशा निष्क्रिय रहते हो तो यह समस्या वाली बात है। यह ऐसा है मानो तुम परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हो; तुम अपना कर्तव्य नहीं कर रहे हो, बल्कि तुम्हारे पास वेतन पाने के लिए अपने नियोक्ता के आदेश पर इसे करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है—तुम इसे स्वेच्छा से नहीं करते हो। अगर तुम इसे थोड़ा-बहुत करते भी हो, तो तुम इसे इसलिए कर रहे हो क्योंकि तुम्हें करना पड़ता है और तुम इसे निष्क्रिय रूप से कर रहे हो। अगर इसमें तुम्हारे हित शामिल नहीं होते, तो तुम इसे बिल्कुल नहीं करते या अगर कोई तुम्हारा पर्यवेक्षण नहीं करता, तो तुम इसे बिल्कुल नहीं करते। ऐसे नकारात्मक और निष्क्रिय कार्य अच्छे कर्म नहीं हैं। इसलिए, इस प्रकार का व्यक्ति बहुत मूर्ख है। वह सकारात्मक चीजें करने और जो उसे करना चाहिए उसे करने में बहुत निष्क्रिय होता है—वह वे चीजें नहीं करता जो वह सोच सकता है और न ही वह वे चीजें करता है जिन्हें करने में वह सक्षम है और जिनमें समय और ऊर्जा की आवश्यकता होती है, वह बस इंतजार करता है और किनारे खड़े होकर देखता है, यह सोचते हुए कि अगर दूसरे उन्हें करें, तो यह सबसे अच्छा है। यह परेशानी भरा है और उसके लिए अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना बहुत मुश्किल है। सबसे पहली बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारी काबिलियत अपर्याप्त है; दूसरी बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारा अनुभव अपर्याप्त है; तीसरी बात, ऐसा नहीं है कि तुम्हारे पास इसे करने की उचित स्थितियाँ नहीं हैं। तुम्हारे पास यह कार्य करने की काबिलियत है और अगर तुम समय और ऊर्जा लगाओ तो इसे करने में सक्षम होगे, लेकिन तुम ऐसा नहीं करते, तुम अच्छे कर्म तैयार करने में असफल रहते हो। यह बहुत अफसोसजनक है। मैं क्यों कहता हूँ कि यह अफसोसजनक है? ऐसा इसलिए कि अगर तुम कई वर्षों बाद वापस इस पर नजर डालो तो तुम्हें अफसोस होगा और तब अगर तुम उस वर्ष, उस महीने और उस दिन पर वापस जाकर उस कार्य को करना चाहो तो चीजें बदल चुकी होंगी और वह समय पहले ही गुजर चुका होगा। तुम्हें उस जैसा दूसरा मौका नहीं मिलेगा; जब वह मौका गुजर जाता है तो वह गुजर जाता है, जब वह खो जाता है तो वह खो जाता है। अगर तुम बढ़िया खाना खाने या बढ़िया कपड़े पहनने जैसे दैहिक सुखों से वंचित रह जाते हो तो इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता है क्योंकि ये चीजें खोखली हैं और इनका तुम्हारे जीवन प्रवेश या अच्छे कर्मों की तैयारी या तुम्हारे गंतव्य पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता है। लेकिन, अगर कोई चीज परमेश्वर के तुम्हारे प्रति रवैये और मूल्यांकन से जुड़ी है या यहाँ तक कि तुम जिस मार्ग पर चलते हो उससे और तुम्हारे गंतव्य से भी जुड़ी है तो इसे करने का अवसर खो देना बहुत ही अफसोसजनक है। वह इसलिए क्योंकि यह भविष्य में तुम्हारे अस्तित्व के मार्ग पर एक दाग छोड़ जाएगा और पछतावा उत्पन्न करेगा और तुम्हें अपने पूरे जीवन में इसकी भरपाई करने का कभी कोई दूसरा मौका नहीं मिलेगा। क्या यह अफसोसजनक नहीं है? अगर तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है और तुम यह कार्य नहीं कर सकते हो तो यह अफसोसजनक नहीं है—परमेश्वर का घर इसे करने के लिए किसी दूसरे की व्यवस्था कर सकता है। अगर तुम इसे अच्छी तरह से करने में सक्षम हो, लेकिन तुम इसे नहीं करते हो तो यह बहुत ही अफसोसजनक है। यह अवसर तुम्हें परमेश्वर ने दिया है, लेकिन तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते हो, तुम इस अवसर का फायदा नहीं उठाते हो और इसे हाथ से फिसलने देते हो—यह अत्यंत अफसोसजनक है! तुम्हारे लिए यह अफसोसजनक है; परमेश्वर के लिए यह निराशाजनक है। परमेश्वर ने तुम्हें पर्याप्त काबिलियत और श्रेष्ठतर स्थितियाँ दी हैं जो तुम्हें कुछ चीजें स्पष्टता से देखने देती हैं और इस कार्य के लिए योग्य बनने देती हैं। लेकिन तुम अपने कर्तव्य के प्रति सही रवैया नहीं रखते, तुममें कोई ईमानदारी नहीं है, लगन की तो बात ही दूर है और तुम इसे अच्छी तरह से करने के लिए अपना सर्वोत्तम प्रयास नहीं करना चाहते हो। यह परमेश्वर को बहुत ही निराश करता है। तो, यदि तुम आलसी हो और हमेशा यह महसूस करते हो कि तुम्हें सौंपा गया कार्य परेशानी भरा है और तुम उसे करना नहीं चाहते हो और मन ही मन बड़बड़ाते हो, “मुझसे यह करने के लिए क्यों कहा जा रहा है, किसी और से क्यों नहीं?” तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है। जब कोई कर्तव्य तुम्हारे हिस्से में आता है, तो यह कोई दुर्भाग्यपूर्ण घटना नहीं है, यह एक सम्मान है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हारा उत्कर्ष है। तुम्हें इसे खुशी-खुशी स्वीकार करना चाहिए और वह कर्तव्य करना चाहिए जो तुम्हें करने की जरूरत है; यह तुम्हें नहीं थकाएगा। बल्कि, अगर तुम अपना कर्तव्य अच्छे से निभाते हो, सत्य को समझते हो और समस्याओं का समाधान करते हो, तो तुम अपने मन में शांति और सुकून महसूस करोगे और तुमने परमेश्वर को निराश नहीं किया होगा। परमेश्वर के सामने, तुममें आस्था होगी और तुम सिर उठाकर आचरण कर सकोगे। अगर तुमने अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाया है और हमेशा अनमने रहते हो, तो यह एक अपराध है और भले ही तुम्हारे कारण कोई नुकसान न हुआ हो, इस अपराध के कारण तुम्हारे दिल में जीवन भर का पछतावा होगा। यह अपराध एक अथाह काले गड्ढे जैसा होगा; जब भी तुम इसके बारे में सोचोगे, तुम्हें दर्द और बेचैनी महसूस होगी, एक ऐसी वेदना जो दिल में चुभती है। तुम्हें न केवल जरा भी शांति या आनंद नहीं मिलेगा, बल्कि इसके विपरीत, पछतावे और यंत्रणा का यह दर्द तुम्हारे पूरे जीवन भर साथ रहेगा और इसे कभी मिटाया नहीं जा सकेगा। क्या यह अनंत पछतावा नहीं है? तो परमेश्वर की नज़र से क्या? परमेश्वर इस मामले को निरूपित करने के लिए सत्य सिद्धांतों का उपयोग करता है, इसलिए इसकी प्रकृति उससे कहीं ज़्यादा गंभीर है जो तुम महसूस करते हो। क्या तुम यह समझते हो? (हाँ।) तो, तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो उसे देखने के लिए परमेश्वर तुम्हारे सामान्य कार्य-प्रदर्शन पर और सत्य और तुम्हारे कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये पर समग्र सोच-विचार करेगा। मान लो कि सत्य और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारा रवैया हमेशा लापरवाह होता है और तुम सतही तौर पर वादे करते हो, लेकिन पर्दे के पीछे उन पर अमल नहीं करते, तुम टालमटोल करते हो, ढिलाई बरतते हो और तुममें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होने का सकारात्मक रवैया नहीं होता। भले ही बाहरी तौर पर तुम गड़बड़ी और बाधाएँ पैदा नहीं करते, बुरा काम नहीं करते हो, मनमानी और लापरवाही से काम नहीं करते हो या बुरे कर्म करते हुए निरंकुश नहीं दौड़ते हो और देखने में तुम एक नियम का पालन करने वाले काफी शिष्ट व्यक्ति लगते हो, लेकिन तुम परमेश्वर द्वारा तुमसे जो करने की माँग की जाती है उसे सकारात्मक और सक्रिय रूप से नहीं करते, बल्कि तुम धूर्त हो और कामचोरी करते हो और वास्तविक कार्य करने से बचते हो। ऐसे में आखिर तुम वाकई किस मार्ग पर चल रहे हो? अगर यह मसीह-विरोधी का मार्ग न भी हो, तो भी कम-से-कम यह नकली अगुआ का मार्ग तो है ही।
कुछ लोगों को देखकर लगता है कि अपना कर्तव्य करने में उनमें समर्पण है, ऊपरवाला जो भी व्यवस्था करता है वे उसे करते हुए लगते हैं। लेकिन जब उनसे पूछा जाता है, “क्या तुम अपना कर्तव्य लापरवाही से करते हो? क्या तुम इसे सिद्धांतों के अनुसार करते हो?” तो वे कोई निश्चित उत्तर नहीं दे पाते हैं, बस इतना कहते हैं, “मैं वैसा ही करता हूँ जैसा ऊपरवाला निर्देश देता है और बेतहाशा गलत कर्म करने की हिम्मत नहीं करता।” जब उनसे पूछा जाता है कि क्या उन्होंने अपनी जिम्मेदारी पूरी की है तो वे कहते हैं, “खैर, मैं वही कर रहा हूँ जो मुझे करना चाहिए।” अपना कर्तव्य निभाने में वह हमेशा इसी तरह का रवैया रखता है, बिना किसी जल्दबाजी के और उदासीन। यद्यपि कोई स्पष्ट समस्या उत्पन्न नहीं हुई है, लेकिन अगर सत्य सिद्धांतों के अनुसार मापा जाए, तो उसका कर्तव्य निर्वहन अकुशल है और यह मानक स्तर का नहीं है। लेकिन उसे कोई परवाह नहीं है। वह अब भी उसी लापरवाही भरे तरीके से काम करता है जैसे उसने अतीत में किया था और जिन चीजों को करने के लिए उसे पहल करनी चाहिए, उनके मामले में वह अब भी उतना ही निष्क्रिय है—वह बिल्कुल नहीं बदला है। क्या वे चिकने घड़े नहीं होते हैं? वे हमेशा यही रवैया बनाए रखते हैं : “तुम्हारे पास हजारों शानदार योजनाएँ हो सकती हैं, लेकिन मेरे अपने कुछ नियम हैं। मैं बस ऐसा ही हूँ! देखते हैं तुम मेरे साथ क्या कर सकते हो। मेरा यही रवैया है!” उन्होंने ऐसा कुछ नहीं किया है जो अत्यंत विश्वासघाती या बुरा हो, लेकिन उन्होंने शायद ही कोई अच्छे कर्म किए हैं। तुम क्या कहोगे कि वे किस मार्ग पर चल रहे हैं? क्या परमेश्वर में विश्वास और अपने कर्तव्य के प्रति इस तरह का रवैया अच्छा है? (नहीं।) बाइबल में प्रकाशितवाक्य की पुस्तक में परमेश्वर यह कहता है : “इसलिये कि तू गुनगुना है, और न ठंडा है और न गर्म, मैं तुझे अपने मुँह में से उगलने पर हूँ” (प्रकाशितवाक्य 3:16)। गुनगुना होना, यानी न ठंडा होना और न ही गर्म—क्या यह रवैया अच्छा है? (नहीं।) इस प्रकार का व्यक्ति अपने मन में अपना खुद का हिसाब-किताब भी रखता है : “जब तक मैं अपना कर्तव्य निभाने में कोई बुराई नहीं करता या कलीसिया के काम में गड़बड़ी पैदा नहीं करता, तब तक मुझे दोषी नहीं ठहराया जाएगा। अगर अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करना बहुत थका देने वाला है और इसमें बहुत अधिक कष्ट सहने की आवश्यकता है, तो मैं इसे नहीं करूँगा। मैं खुद को नहीं थकाऊँगा, लेकिन मैं कोई बड़ी गलती भी नहीं करूँगा। इस तरह, मुझे बाहर नहीं निकाला जाएगा या हटाया नहीं जाएगा और मैं अब भी उन लोगों से बहुत बेहतर हूँ जो कोई कर्तव्य नहीं करते हैं। इसलिए मैं गुनगुना रहता हूँ, न ठंडा और न ही गर्म। तुम मुझसे जो भी करने को कहोगे, मैं उसे करूँगा। लेकिन अगर तुम मुझे कुछ करने को नहीं कहोगे तो मैं दखल नहीं दूँगा। इस तरह से मुझे थकान नहीं होगी और इसके अलावा, लोग मुझमें कोई गलती नहीं ढूँढ़ पाएँगे। यह तरीका बढ़िया है!” क्या आचरण करने का यह तरीका अच्छा है? (नहीं।) तुम जानते हो कि यह अच्छा नहीं है, तो तुम्हारे अभ्यास में कैसा बदलाव आना चाहिए? यदि तुम सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलने का प्रयास कभी नहीं करते और फिर भी शैतान के फलसफों के अनुसार जीते रहते हो, तो तुम्हारे उद्धार पाने की कोई आशा न होना तय है। अगर तुम दुनिया में इस तरह से आचरण करते हो, तो तुम्हें वाकई फायदा होगा। सांसारिक आचरण का तुम्हारा फलसफा और रवैया तुम्हारी रक्षा करेगा और तुम लोगों को नाराज भी नहीं करोगे। इसके अलावा, प्रतिष्ठा और शोहरत वाले वे उच्च वर्ग के लोग यह महसूस नहीं करेंगे कि तुम उनके लिए कोई खतरा हो और वे सभी तुम्हारी बहुत सराहना करेंगे। बिना रुतबे वाले वे निम्न वर्ग के लोग भी तुम्हें नाराज करने की हिम्मत नहीं करेंगे। इसलिए, तुम काफी लोकप्रिय होगे—निम्न वर्ग के लोगों और उच्च वर्ग के लोगों, दोनों के लिए तुम ऐसे व्यक्ति होगे जिसे वे अपने पक्ष में करना चाहेंगे, तुम बहुत माँग में रहने वाले व्यक्ति होगे और तुम ऊँचे और नीचे, अच्छे और बुरे, सभी वर्गों में आसानी से ढल सकोगे। लेकिन, अगर तुम परमेश्वर के घर में और परमेश्वर के सामने सांसारिक आचरण के प्रति अब भी इसी तरह के रवैये का उपयोग करते हो, तो यह काम नहीं करेगा। सत्य से जुड़े सभी विभिन्न सिद्धांतों को तुमसे एक रवैये की आवश्यकता होती है और यह रवैया या तो सही होता है या गलत, यह या तो काला होता है या सफेद, सच होता है या झूठ—यह विशेष रूप से स्पष्ट है और विशेष रूप से सिद्धांतवादी है। उन्हें तुम्हारे रुख और तुम्हारे सटीक दृष्टिकोण की आवश्यकता होती है, न कि तुम्हारे बीच के रास्ते वाले दृष्टिकोण की। जो लोग बीच का रास्ता अपनाते हैं वे सत्य के सामने मजबूती से खड़े नहीं रह सकते। ऐसा मत सोचो, “देखो मेरे जीने का तरीका कितना चतुराई भरा है। मैंने बचपन से ही इस तरीके का उपयोग करके खुद की रक्षा करना सीखा है और अब तक के अपने जीवन पर पीछे मुड़कर देखने पर, मुझे लगता है कि यह तरीका बहुत व्यावहारिक है। परमेश्वर में विश्वास करने के बाद, मैं अब भी इसी तरीके से जीता हूँ। परमेश्वर में विश्वास करने के इन वर्षों में, मेरी काट-छाँट नहीं की गई है, मैं अपना कर्तव्य निभाने में काफी हद तक विफल नहीं हुआ हूँ, मुझे किसी बड़े शोधन या परीक्षण का सामना नहीं करना पड़ा है और परमेश्वर ने कभी मेरी निंदा नहीं की है या मेरा तिरस्कार नहीं किया है। देखो, मैं अपने आचरण में कितना सफल हूँ, मैं इसमें कितना कुशल हूँ!” तुम गलत हो! तुम नहीं जानते कि आचरण कैसे करना है—तुम हर मामले से निपटने और सत्य के साथ पेश आने के लिए एक धूर्त तरीके का उपयोग करते हो। यह तरीका पूरी तरह से गलत है और ऐसा करके तुम मजबूती से खड़े नहीं रह सकते। किस्मत पर भरोसा करने की मानसिकता मत रखो, यह सोचते हुए, “मैं ऐसा किया करता था और हमेशा सफल होता था। मैं कभी विफल नहीं हुआ और मैंने कभी अपना सम्मान नहीं खोया या अपनी अज्ञानता नहीं दिखाई। अब जबकि मैं परमेश्वर में विश्वास करता हूँ, मैं अब भी सांसारिक आचरण की इस सबसे परिष्कृत रणनीति पर कायम रहूँगा।” मैं कहता हूँ कि यह तुम्हारी मूर्खता है! परमेश्वर लोगों को बचाने के लिए इतने सारे वचन क्यों बोलता है? यह ठीक इसलिए है ताकि लोग इन वचनों के मार्गदर्शन में यह समझ सकें कि जीवन में सही मार्ग क्या है और लोगों को किस तरह के मार्ग पर चलना चाहिए; यह तुम्हें चुनने देने के लिए है—यह तुम्हें यहाँ अवसरवादी बनकर काम निकालने देने के लिए नहीं है। अगर यह तुम्हें अवसरवादी बनकर काम निकालने देने के लिए होता, तो परमेश्वर ये वचन नहीं बोलता या यह कार्य नहीं करता। ऐसा क्यों है कि विभिन्न मामलों के बारे बारे में हमारी संगति में, सत्य के खिलाफ जाने वाली सभी चीजों को बिल्कुल स्पष्ट कर दिया जाता है? यह ठीक तुम्हें यह बताने के लिए है कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, ताकि तुम उनके बीच स्पष्ट रूप से अंतर कर सको और उन्हें साफ-साफ देख सको। सकारात्मक चीजें और नकारात्मक चीजें परमेश्वर के सामने पूरी तरह से खुली, प्रकट और पारदर्शी हैं—वे अस्पष्ट नहीं हैं। इसलिए, परमेश्वर तुमसे कुछ भी करने और अपना मार्ग चुनने में स्पष्ट होने की अपेक्षा करता है—तुम्हारा रवैया स्पष्ट होना चाहिए और तुम्हारे विचार और दृष्टिकोण स्पष्ट होने चाहिए; कुछ भी अस्पष्ट नहीं होना चाहिए। जिसमें सत्य और सत्य सिद्धांत शामिल हैं उसमें कुछ भी अस्पष्ट नहीं है—काला काला है, सफेद सफेद है, हाँ का मतलब हाँ है, ना का मतलब ना है। एक झूठ, भले ही हजार बार बोला जाए, फिर भी झूठ ही रहता है और कभी सच नहीं बन सकता। सत्य, भले ही दुनिया में कम लोग इसे स्वीकार करें या भले ही कई राष्ट्र इसे अस्वीकार करें और इसकी निंदा करें, सत्य ही रहता है। सत्य हमेशा सत्य होता है और यह बिल्कुल भी कोई भ्रांति या पाखंड नहीं बनेगा। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कितने लोग शैतान की नकारात्मक चीजों का अनुसरण करते हैं या वे कितने वर्षों से एक सांसारिक प्रवृत्ति बन गई हैं, वे अब भी नकारात्मक चीजें हैं और अब भी शैतान की हैं—वे कभी सकारात्मक चीजों में नहीं बदलेंगी। इसके विपरीत, सकारात्मक चीजें, भले ही इस दुनिया में उन पर हमला किया जाए, उन्हें दबाया जाए और उनकी निंदा की जाए, सकारात्मक चीजें ही रहती हैं और कभी नकारात्मक चीजें नहीं बनेंगी। परमेश्वर हमेशा परमेश्वर है, हमेशा न्याय का प्रतिरूप है और हमेशा सभी सकारात्मक चीजों का प्रतिनिधि है। परमेश्वर का दर्जा अपरिवर्तनीय है और उसका सार अपरिवर्तनीय है। इस बीच, शैतान हमेशा शैतान है, हमेशा बुराई का प्रतिरूप है, हमेशा बुराई की धुरी का प्रतिनिधि है, हमेशा नकारात्मक है और यह कभी सकारात्मक चीज नहीं बनेगा।
कुछ लोग कहते हैं, “कलीसिया में रहते हुए तुम्हें लचीला होना चाहिए। किसी भी दिशा में बहुत अधिक मत झुको। सत्य को स्वीकार मत करो, लेकिन इससे विमुख भी मत हो; सकारात्मक या नकारात्मक लोगों को नाराज मत करो। बस तटस्थ रहना ही सबसे अच्छा है। मैं सकारात्मक चीजों का विरोध नहीं करता और मैं नकारात्मक चीजों की आलोचना नहीं करता। मैं सत्य का अनुसरण करने वाले लोगों की चापलूसी नहीं करता या उनका पक्ष लेने की कोशिश नहीं करता और न ही मैं उनके करीब जाता हूँ। मैं मसीह-विरोधियों से भी खुद को दूर नहीं करता। तुम मेरा क्या कर सकते हो? देखो मैं जीवन को कितनी स्पष्टता से समझता हूँ!” क्या यह स्पष्टता से समझना है? यह स्पष्टता से समझना नहीं है; यह मूर्खता है। यह भ्रमित होना और सही-गलत के बीच अंतर करने में असमर्थ होना है। ऐसा व्यक्ति एक भ्रमित व्यक्ति है। मैं तुम्हें बताता हूँ, इस तरह का दोगला व्यक्ति बिल्कुल भी अच्छा नहीं है। इस तरह से जीने का अंतिम नतीजा क्या होगा? (उसका कोई नतीजा और कोई गंतव्य नहीं होगा।) उसने अपना खुद का गंतव्य बर्बाद कर लिया होगा। यद्यपि वह सकारात्मक चीजों का विरोध नहीं करता है, लेकिन सार रूप में, उसने सकारात्मक चीजों को स्वीकार भी नहीं किया है। विरोध न करना स्वीकार करने के समान नहीं है और नकारात्मक चीजों की आलोचना न करना उन्हें जाने देने के समान नहीं है। क्या तुम्हें लगता है कि सकारात्मक चीजों को स्वीकार न करके और नकारात्मक चीजों की आलोचना न करके, तुमने नकारात्मक चीजों और नकारात्मक दृष्टिकोणों को छोड़ दिया है? तुम उन्हें नहीं छोड़ सकते। केवल सकारात्मक चीजों को स्वीकार करके और सत्य को स्वीकार करके ही लोगों के नकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को, साथ ही शैतान के दुष्ट विचारों और दृष्टिकोणों को, धीरे-धीरे छोड़ा और तोड़ा जा सकता है; केवल तभी लोग सत्य सिद्धांतों के अनुरूप अभ्यासों, अंतर्दृष्टि, समझ और कसौटियों के साथ-साथ सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार कर सकते हैं। दूसरे शब्दों में, अगर तुम सकारात्मक विचारों और दृष्टिकोणों को स्वीकार करना चाहते हो, अगर तुम सत्य को स्वीकार करना चाहते हो, अगर तुम चाहते हो कि सत्य तुम्हारे भीतर प्रवेश करे और तुम्हारा जीवन बन जाए, तो तुम्हें सबसे पहले अपने भीतर जो कुछ है उसे खाली करना होगा और फिर सत्य को स्वीकार करना होगा और सत्य को अपने भीतर प्रवेश करने और अपने दिल में सत्ता सँभालने की अनुमति देनी होगी। यह सत्य को जीवन के रूप में पाना है। सत्य का अनुसरण करने का अभ्यास इसी तरह किया जाता है। परमेश्वर में विश्वास करने का प्राथमिक उद्देश्य सत्य प्राप्त करना है। तुम्हें सत्य के खिलाफ जाने वाले विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों का भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए। विशेष रूप से अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जो शैतान के फलसफे का अनुसरण करता है, तो तुम्हें बीच का रास्ता अपनाने वाले दृष्टिकोण के धूर्त विचारों और दृष्टिकोणों को छोड़ देना चाहिए और सचेत रूप से उनके खिलाफ विद्रोह करना चाहिए। जब तुम्हारे सामने आने वाली स्थितियों में ऐसे विचार और दृष्टिकोण उत्पन्न होते हैं, तो तुम्हें यह एहसास करना चाहिए कि वे गलत हैं और तुम्हें सोचना चाहिए : “परमेश्वर के वचन क्या कहते हैं? परमेश्वर क्या अपेक्षा करता है? कार्य करने का जो भी तरीका सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होगा, मैं पहल करूँगा और उसी के अनुसार कार्य करने का प्रयास करूँगा, बीच का रास्ता अपनाने वाले नजरिए के विचारों और दृष्टिकोणों को खुद पर हावी नहीं होने दूँगा या सत्य का अभ्यास करने में बाधा नहीं बनने दूँगा। इसके बजाय, मुझे परमेश्वर के वचनों को, सत्य को अपने आचरण और क्रियाकलापों के लिए और अपना कर्तव्य निभाने के लिए कसौटी बनने देना होगा।” इस तरह से अभ्यास करने से एक अलग नतीजा सामने आएगा। भले ही यह बहुत छोटा मामला हो और परमेश्वर द्वारा याद रखे जाने के लायक न हो, कम-से-कम, परमेश्वर इसकी निंदा नहीं करेगा। जैसे-जैसे तुम्हारे क्रियाकलाप इस तरह थोड़ा-थोड़ा करके जमा होते हैं, तुम्हारे अच्छे कर्म धीरे-धीरे तैयार होते जाएँगे। अगर तुम्हारे क्रियाकलापों को परमेश्वर की नजर में अच्छे कर्म माना जा सकता है, तो तुम्हारे पास उम्मीद होगी। तुम्हारे पास एक सही और सकारात्मक दिशा और लक्ष्य होना शुरू हो जाएगा और तुम एक सकारात्मक व्यक्ति, एक सही व्यक्ति बनना शुरू कर दोगे। इस तरह, तुमने खुद को नरक की ओर ले जाने वाले विनाश के मार्ग से दूर कर लिया होगा और धीरे-धीरे स्वर्ग के राज्य की ओर ले जाने वाले मार्ग की ओर मुड़ गए होगे। यह किसी व्यक्ति के बदलने में सक्षम होने का एक अच्छा नतीजा है। क्या इसे हासिल करना आसान है? यह इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति सत्य से किस हद तक प्रेम करता है। अगर तुम कोई गलती करते हो और सिर्फ यही कहते हो : “मुझे वाकई खुद से नफरत है! मैं ऐसी नीच, घिनौनी चीज कैसे कर सकता हूँ? मुझे वाकई अपने गालों पर थप्पड़ मारने की बेचैनी हो रही है!” सिर्फ खुद से नफरत करना, इससे कोई फायदा नहीं होगा। मुख्य चीज यह है कि जब तुम कोई गलती करते हो तो तुम्हें यह भेद पहचानने में समर्थ होना चाहिए कि इसमें क्या गलत है, किस चीज ने तुम्हें ऐसा करने के लिए उकसाया है, तुम सत्य का अभ्यास करने में असमर्थ क्यों हो, इसका मूल कारण क्या है और तुम्हारे क्रियाकलापों का आधार और सिद्धांत क्या हैं। मुख्य चीज यह भी है कि किसी मामले का सामना करने पर क्या तुम सचेत रूप से परमेश्वर के वचनों के अनुसार कार्य कर रहे हो और सचेत रूप से अपने शैतानी विचारों और नजरियों, अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं और अपने इरादों और योजनाओं के खिलाफ विद्रोह कर रहे हो या नहीं। अगर तुमने सचेत रूप से ये सभी चीजें की हैं तो तुमने अच्छे कर्मों की तैयारी की है और यह एक बड़ी चीज है और तुमने कुछ प्राप्त किया है। क्या इस तरह का नतीजा अच्छा है? क्या तुम लोग यही नतीजा देखना चाहते हो? क्या तुम लोग इसी का अनुसरण करना चाहते हो? (हाँ।) अब अधिकांश लोगों का दृष्टिकोण कैसा है? वह यह है : “मैं बुराई नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता। जब तक मुझे पूर्णकालिक कर्तव्य वाली कलीसिया से बाहर नहीं निकाला जाता, तब तक सब ठीक है। यद्यपि मैंने बहुत-से अच्छे कर्म तैयार नहीं किए हैं और अपने कर्तव्य में मैं बहुत वफादार नहीं हूँ, मुझमें बहुत सच्चाई नहीं है और मैं सत्य सिद्धांतों के अनुसार गंभीरता से अभ्यास नहीं करता, लेकिन जब तक मैं बुराई नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता, क्या उतना पर्याप्त नहीं है?” यह दृष्टिकोण कैसा है? यह एक पतित विचार और दृष्टिकोण है—यह ऐसा दृष्टिकोण है जो प्रगति नहीं चाहता। तुम्हें बिल्कुल नहीं सोचना चाहिए कि जब तक तुम बुराई नहीं करते या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करते, तब तक तुम एक अच्छे व्यक्ति हो, एक कुलीन व्यक्ति हो, तुम अडिग रह सकते हो और तुम जो करते हो वह सत्य के अनुरूप है। मैं तुम्हें बताता हूँ, यह गलत है—यह सोचने का एक मूर्खतापूर्ण तरीका है! बुराई न करना अच्छे कर्मों की तैयारी करने के बराबर नहीं है। बुराई न करना और अच्छे कर्मों की तैयारी करना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। बुराई किए बिना कोई कर्तव्य निभाना वही है जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए; यह एक अभिव्यक्ति है जो उन लोगों में होनी चाहिए जिनमें सामान्य मानवता का जमीर और विवेक है। उदाहरण के लिए, कुछ लोग कहते हैं : “ऐसे भी लोग हैं जो हत्या कर देते हैं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया है; उस व्यक्ति ने दूसरों की चीजें चुराई हैं, लेकिन मैंने ऐसा नहीं किया है। इसका मतलब है कि मैं एक अच्छा व्यक्ति हूँ।” क्या यह डींग हाँकने लायक चीज है? क्या उनका जोर देकर यह कहना सही है? (नहीं है।) ये भ्रामक अवधारणाएँ हैं। चोर न होना, हत्या या आगजनी न करना और अवैध यौन संबंधों में लिप्त न होना एक अच्छा व्यक्ति होने के बराबर नहीं है। बुराई न करना या कानून न तोड़ना एक अच्छा व्यक्ति होने से भिन्न अवधारणा है। एक अच्छा व्यक्ति होने के अपने मानक होते हैं। बुराई न करना और अच्छे कर्मों की तैयारी करना भी दो अलग अवधारणाएँ हैं। बुराई किए बिना अपना कर्तव्य निभाना कुछ ऐसा है जिसे तुम्हें एक सामान्य व्यक्ति के रूप में प्राप्त करना चाहिए। लेकिन अच्छे कर्मों की तैयारी करने का मतलब है कि तुम्हें सक्रिय और सकारात्मक रूप से सत्य का अभ्यास करना चाहिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। तुममें निष्ठा होनी चाहिए, तुम्हें कष्ट सहने और कीमत चुकाने को तैयार रहना चाहिए, जिम्मेदारी लेने को तैयार रहना चाहिए और सकारात्मक और सक्रिय रूप से कार्य करने में समर्थ होना चाहिए। इन सिद्धांतों के अनुसार किए गए सभी क्रियाकलाप बुनियादी रूप से अच्छे कर्म हैं। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है कि वे बड़े मामले हैं या छोटे, वे लोगों द्वारा याद किए जाने लायक हैं या नहीं, उन्हें लोगों से बहुत सम्मान मिलता है या वे महत्वहीन माने जाते हैं या क्या लोग उन्हें ध्यान देने योग्य समझते हैं, परमेश्वर की नजर में वे सभी अच्छे कर्म हैं। अगर तुमने अच्छे कर्म तैयार किए हैं, तो अंत में यह तुम्हारे लिए आशीषें लेकर आएगा, विपत्तियाँ लेकर नहीं। कुछ लोग किसी अच्छे कर्म की तैयारी बिल्कुल भी नहीं करते और बस इस बात से संतुष्ट रहते हैं : “मुझे जो भी करने को कहा जाता है, मैं करता हूँ और मुझे जहाँ भी जाने को कहा जाता है, मैं चला जाता हूँ। मैं कभी भी मनमाने ढंग से कुछ नहीं बोलता या कोई कार्य नहीं करता और मैं कभी भी शरारत की भावना से परेशानी खड़ी नहीं करता या गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा नहीं करता। मैं वास्तव में आज्ञाकारी और शिष्ट हूँ।” वे हमेशा इसी तरह का रवैया रखते हैं। वे सक्रिय रूप से सत्य की खोज नहीं करते या अपना कर्तव्य निभाने में सिद्धांतों का पालन नहीं करते। जब उन्हें अपने विचलनों और गलतियों का पता चलता है, तो वे उन्हें तुरंत नहीं सुधारते या नहीं बदलते। जब उन्हें पता चलता है कि वे विद्रोही रहे हैं और उन्होंने भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए हैं, तो वे कभी आत्म-चिंतन नहीं करते और न ही वे समस्या को हल करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य की खोज करते हैं; इसके बजाय, वे बस वही करते हैं जो वे करना चाहते हैं। यद्यपि उन्होंने कोई ऐसी बड़ी बुराई नहीं की है जिससे परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचे, लेकिन फिर भी उन्होंने कलीसिया के काम की प्रगति को प्रभावित किया है। ज्यादा से ज्यादा, उनका कर्तव्य निर्वहन सिर्फ मजदूरी करना है और मजदूरी करना, अपनी प्रकृति से, एक अच्छा कर्म होने से कमतर है। तो आखिरकार अच्छे कर्मों को कैसे परिभाषित किया जाता है? इस तरह कि तुम जो करते हो वह कम-से-कम तुम्हारे और भाई-बहनों के जीवन प्रवेश के लिए उपयोगी होता है और परमेश्वर के घर के कार्य के लिए लाभदायक होता है। अगर यह तुम्हारे लिए, दूसरों के लिए और परमेश्वर के घर के लिए लाभदायक है तो तुम्हारा कर्तव्य निर्वहन परमेश्वर के सामने प्रभावी और परमेश्वर द्वारा अनुमोदित है। परमेश्वर तुम्हें अंक देगा। इसलिए इन चीजों का मूल्यांकन करो : तुमने बीते वर्षों में कितने अच्छे कर्म तैयार किए हैं? क्या ये अच्छे कर्म तुम्हारे अपराधों की भरपाई कर सकते हैं? उनकी भरपाई करने के बाद कितने अच्छे कर्म बचते हैं? तुम्हें खुद को अंक देने और इस पर मजबूत पकड़ बनाने की जरूरत है; तुम्हें इस मामले को लेकर मानसिक भ्रम की स्थिति में नहीं होना चाहिए।
मुझे बताओ, क्या इन मामलों पर मेरी संगति आवश्यक है? (हाँ।) मुझे तुम लोगों से ये वचन कहने चाहिए और तुम लोगों को कुछ निर्देश देने चाहिए। तुम लोगों को निर्देश देने का उद्देश्य तुम लोगों का उत्साह कम करना नहीं है, न ही तुम लोगों पर हँसना है, तुम लोगों की निंदा करना तो बिल्कुल नहीं है, बल्कि तुम लोगों को याद दिलाना है, खतरे की घंटी बजाना है, ताकि तुम लोग जान सको—ठीक अभी, वर्तमान में, इस समय—कि तुम लोग किस स्थिति में हो, तुम लोगों की दशा क्या है और संभावित खतरे क्या हैं। तुम्हें अपने दिलों में इन चीजों के बारे में स्पष्ट होना चाहिए। परमेश्वर में अपने विश्वास में, लोगों को लगातार और बार-बार जाँच करनी चाहिए कि परमेश्वर के सामने उनकी दशा क्या है। उन्हें लगातार और स्पष्ट रूप से जानना चाहिए कि परमेश्वर के साथ उनका रिश्ता कैसा है, क्या उनके और परमेश्वर के बीच टकराव और बाधाएँ मौजूद हैं, क्या परमेश्वर के बारे में उनकी धारणाएँ और गलतफहमियाँ हैं, क्या परमेश्वर से उनकी अनुचित माँगें हैं और परमेश्वर उनकी समग्र अभिव्यक्तियों को कैसे देखता है। लोगों को इन चीजों को समझना और जानना चाहिए; यह उनके जीवन प्रवेश के लिए बहुत लाभदायक है। इस तरह से अभ्यास करने का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि लोग परमेश्वर के इरादों के अनुसार सटीक रूप से कार्य कर सकें। कोई गलत कदम मत उठाओ, आत्म-संतुष्ट महसूस मत करो और खुद को और दूसरों को धोखा मत दो। कोई गलत कदम न उठाने का मतलब है अपने खुद के भटके हुए मार्ग पर न चलना। तुम सोचते हो कि परमेश्वर में विश्वास करने में तुम्हारा यह प्रदर्शन काफी अच्छा है, इसलिए तुम इस मार्ग पर चलना जारी रखते हो। लेकिन, पता चलता है कि तुम सही मार्ग से भटक गए हो; परमेश्वर ने तुम्हें बहुत पहले ही छोड़ दिया है और पवित्र आत्मा ने तुममें काम करना बंद कर दिया है। परमेश्वर तुमसे घृणा करता है, फिर भी तुम सोचते हो कि तुम अपने विश्वास में अच्छा कर रहे हो : “मैंने परमेश्वर में विश्वास करने से चीजें प्राप्त की हैं। मैं अब कष्ट सह सकता हूँ, मैं अब बुराई नहीं करता, मैं जानता हूँ कि गड़बड़ियाँ पैदा करने से कैसे बचा जाए और अब मैं जानता हूँ कि गड़बड़ियाँ और बाधाएँ पैदा करने वालों को बाहर क्यों निकाल दिया जाता है या अलग-थलग क्यों कर दिया जाता है और उन्हें कोई कर्तव्य क्यों नहीं करने दिया जाता है।” इन चीजों को जानना पर्याप्त नहीं है। तुम्हें जानना चाहिए कि परमेश्वर के मार्ग पर चलने के लिए कैसे कार्य करना है, सही मार्ग पर चलने के लिए कैसे अभ्यास करना है और उद्धार पाने में सक्षम होने के लिए कैसे कार्य करना है। ये सभी बहुत महत्वपूर्ण हैं; तुम्हें नियमित अंतराल पर समीक्षाएँ करनी चाहिए और निष्कर्ष निकालने चाहिए। इस विषय के लिए बस इतना ही। आओ हम उस विषय पर संगति करना जारी रखें जिस पर हम इस अवधि के दौरान संगति करते रहे हैं।
सत्य का अनुसरण करने का पहला अभ्यास : त्याग देना
अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना
I. परमेश्वर के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना : परमेश्वर के कार्य के बारे में अपनी धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना
च. परमेश्वर का कार्य लोगों की जन्मजात स्थितियों को नहीं बदलता, बल्कि इसका लक्ष्य उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलना है
6. जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ
इस अवधि के दौरान हमारी संगति सत्य का अनुसरण करने के तरीके में “त्याग देने” के अभ्यास के सिद्धांत से जुड़े एक विशिष्ट विषय—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—के बारे में रही है। इस विषय पर कई बार संगति करने के बाद, क्या तुम लोगों को अब इन तीन पहलुओं—जन्मजात स्थितियाँ, मानवता और भ्रष्ट स्वभाव—से जुड़ी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों और खुलासों के बारे में भेद की थोड़ी पहचान है? (इन चीजों के बारे में भेद की मेरी पहचान पहले से कुछ बेहतर है। पहले मैं अक्सर चरित्र और भ्रष्ट स्वभावों को एक समझ लेता था, लेकिन परमेश्वर की पिछली कुछ संगतियों के माध्यम से अब मैं कुछ हद तक उनके बीच अंतर कर सकता हूँ।) इन चीजों के बीच अंतर करना क्यों आवश्यक है? (यह इसलिए है ताकि हम जान सकें कि हमारे भीतर की किन समस्याओं को हल किया जाना चाहिए और किन समस्याओं से हमें बस सही तरीके से निपटने की आवश्यकता है।) सही कहा। इतने विस्तार से संगति करने से जन्मजात स्थितियों, मानवता और भ्रष्ट स्वभावों के बीच के अंतर अधिक स्पष्ट हो जाते हैं और लोगों को भ्रष्ट स्वभावों और अत्यंत खराब चरित्र की अभिव्यक्तियों की अधिक स्पष्ट समझ प्राप्त होती है, जो कि दो अलग-अलग चीजें हैं। विशेष रूप से लोग खराब चरित्र, भ्रष्ट स्वभावों और जन्मजात स्थितियों के बीच अंतर करने में सक्षम होते हैं। वे मानवता के कुछ दोषों को भ्रष्ट स्वभाव नहीं मानेंगे और बेशक वे जन्मजात स्थितियों के भीतर की कुछ कमियों और दोषों को भी भ्रष्ट स्वभाव नहीं मानेंगे। जब लोगों में इस भेद की पहचान आ जाती है, तो वे भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के बारे में अधिकाधिक स्पष्ट हो जाते हैं और वे उन समस्याओं का राई का पहाड़ नहीं बनाते जिनमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल नहीं होते हैं। साथ ही उन्हें इस बात की भी अधिक स्पष्ट समझ हो जाती है कि भ्रष्ट स्वभाव वास्तव में क्या हैं। तो क्या तुम लोग स्पष्ट रूप से समझा सकते हो कि भ्रष्ट स्वभाव वास्तव में क्या हैं? क्या भ्रष्ट स्वभावों का जन्मजात स्थितियों से कोई संबंध है? क्या वे जन्मजात स्थितियों से प्रभावित होते हैं? (नहीं।) मान लो कि कोई व्यक्ति सुंदर है, गोरे रंग का है और उसके नैन-नक्श सुडौल हैं—तो क्या यह कहा जा सकता है कि चूँकि उसका रूप-रंग अच्छा है, इसलिए उसमें कोई भ्रष्ट स्वभाव नहीं है, उसकी मानवता उसके रूप-रंग की तरह ही पूर्ण और शुद्ध है, वह बिल्कुल भी घमंडी या दुष्ट नहीं बल्कि असाधारण रूप से पवित्र है? क्या ऐसा कहा जा सकता है? (नहीं।) इस तरह संगति करने के बाद, इन तीन पहलुओं—भ्रष्ट स्वभाव, जन्मजात स्थितियाँ और मानवता—के बीच के अंतर अब मूल रूप से स्पष्ट हैं, है ना? (हाँ।) उनका भेद पहचानना आसान है।
व्यापार करने में कुशल होना
पिछली बार हमने व्यापार से प्रेम करने के बारे में संगति की थी। व्यापार से प्रेम करने और उसे पसंद करने की इस अभिव्यक्ति को किस पहलू के अंतर्गत रखा जाना चाहिए? (जन्मजात स्थितियों के अंतर्गत।) इसे जन्मजात स्थिति क्यों माना जाता है? (यह एक रुचि और शौक है, इसलिए इसे जन्मजात स्थिति माना जाता है।) एक बात तो यह है कि यह एक रुचि और शौक है; दूसरी बात यह है कि यदि किसी व्यक्ति को व्यापार से प्रेम करता है और उसका मन व्यापार में रमा है—वह पेशेवर अध्ययन किए बिना ही स्वाभाविक रूप से इसमें कुशल है और दूसरों के मार्गदर्शन के बिना इसे समझने और पैसा कमाने, मुनाफा कमाने, व्यापार के अवसरों का लाभ उठाने आदि के तरीके जानता है—तो इस व्यक्ति के पास अपनी जन्मजात स्थितियों के भीतर व्यापार करने की खूबी है। यदि किसी व्यक्ति में जन्मजात रूप से यह खूबी है, तो यह निश्चित रूप से एक जन्मजात स्थिति है और जन्मजात स्थितियों का जन्म के बाद पड़ने वाले प्रभावों से कोई लेना-देना नहीं होता है। तुम देखो, कुछ लोग 15 या 16 साल की उम्र में स्कूल में रहते हुए ही व्यापार करने का कौशल सीखना शुरू कर देते हैं। जब भी उन्हें कोई अच्छी चीज मिलती है, तो वे उसे बेचने के तरीके सोचते हैं। वे अपने माता-पिता द्वारा दिए गए जन्मदिन के उपहार भी बेच देते हैं। वे अपनी जेबखर्च के पैसे खर्च नहीं करते हैं, बल्कि व्यापार करने के लिए वे सब बचा लेते हैं। 18 या 19 साल के होने तक वे पहले से ही छोटे व्यापारिक उद्यम चलाने में सक्षम हो जाते हैं। स्कूल में उनके ग्रेड बस औसत होते हैं, लेकिन उनके पास व्यापार करने का दिमाग होता है, वे हिसाब-किताब में तेज होते हैं और उनमें व्यापार करने की एक विशेष कुशलता होती है—यह एक खूबी है। व्यापार से प्रेम करना जन्मजात स्थितियों के भीतर खूबियों या रुचियों और शौक की श्रेणियों में आता है। खैर यह जन्मजात स्थितियों का एक पहलू है और व्यापार से प्रेम करने की अभिव्यक्ति को इसी श्रेणी में रखा गया है। कुछ लोगों में जरूरी नहीं कि व्यापार से संबंधित कोई शौक या खूबी हो। वे व्यापार करते समय मुख्य रूप से लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने पर निर्भर करते हैं। वे अपनी कड़ी मेहनत और प्रयास के माध्यम से या वैध व्यापारिक साधनों और तरीकों का उपयोग करके पैसा नहीं कमाते हैं, बल्कि मुनाफा कमाने और पैसा बनाने के अपने लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए हर तरह की धोखाधड़ी, छल-कपट और कानूनी खामियों का फायदा उठाने का सहारा लेते हैं। यह किस तरह की समस्या है? ऐसे लोग लगातार इसी तरह से व्यापार करते हैं—क्या इसमें उनकी मानवता का सार शामिल है? (हाँ।) ऐसी मानवता अच्छी है या खराब? (यह खराब है।) यह कैसे खराब है? जब ऐसे लोगों की मानवता की बात आती है, तो आम तौर पर उनका चरित्र खराब होता है। व्यापार करने में लोगों का लक्ष्य हमेशा पैसा कमाना होता है। यदि तुम व्यापार करने के वैध साधनों के माध्यम से पैसा कमाते हो, तो यह एक क्षमता है जो तुम्हारे पास है और यह परमेश्वर द्वारा तुम्हें दी गई खूबी से मिलने वाला लाभ है। लेकिन यदि कोई व्यक्ति व्यापार करने के वैध साधनों के माध्यम से पैसा और मुनाफा नहीं कमाता है, बल्कि हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट के माध्यम से पैसा कमाता है, तो ऐसे लोग सत्यनिष्ठा से रहित होते हैं और उनका चरित्र नीच होता है। क्या ऐसे लोगों में अंतरात्मा होती है? (नहीं।) बोलचाल की भाषा में उनकी अंतरात्मा पूरी तरह से सड़ चुकी होती है—उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है। हम ऐसा क्यों कहते हैं कि उनमें कोई अंतरात्मा नहीं है? (आम तौर पर जिन लोगों में अंतरात्मा होती है वे दूसरे लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने के बाद अपनी अंतरात्मा से धिक्कार महसूस करते हैं और वे फिर कभी ऐसे काम नहीं करते हैं। लेकिन जिन लोगों में अंतरात्मा नहीं होती है वे केवल मुनाफा कमाने की परवाह करते हैं। उनकी अंतरात्मा में बिल्कुल भी जागरूकता नहीं होती है, इसलिए वे बस वैसे ही काम करते रहते हैं।) उनमें अंतरात्मा का कार्य नहीं होता है; यह भी कहा जा सकता है कि उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है। यदि उनमें अंतरात्मा होगी, तो उनकी अंतरात्मा काम करेगी और फिर एक बार किसी को धोखा देने के बाद वे अपनी अंतरात्मा से आत्म-ग्लानि महसूस करेंगे। भले ही उन्होंने मुनाफा कमाया हो, लेकिन वे अंदर से बहुत बुरा महसूस करेंगे। जब वे पैसे खर्च करेंगे, तो उनका चेहरा शर्म से लाल हो जाएगा और वे अंदर से बेचैन महसूस करेंगे, यह महसूस करते हुए कि उन्होंने जो किया वह गंदा और नीच काम था। इस प्रकार, उसके बाद से वे फिर कभी किसी से धोखाधड़ी नहीं करेंगे; चाहे संभावित मुनाफा कितना भी बड़ा क्यों न हो, वे ऐसा कभी नहीं करेंगे—यह अंतरात्मा का कार्य है। लेकिन जो लोग दूसरों को धोखा देने, बेवकूफ बनाने और धोखा देने में कुशल होते हैं, वे जब भी चाहेंगे ऐसा करेंगे। सफल होने के बाद जब वे पैसे खर्च करते हैं, तो उन्हें अपने दिलों में बुरा नहीं लगता है। एक बार जब पैसा उनके हाथ में आ जाता है, तो वे सोचते हैं कि वे चतुर और बुद्धिमान हैं; वे अपनी धोखाधड़ी की रणनीतियों की सफलता से प्रसन्न होते हैं और विशेष रूप से गर्व महसूस करते हैं। वे कम वजन का सामान बेचते हैं, वे नकली दवा, नकली जिनसेंग, पानी का इंजेक्शन लगा मांस बेचते हैं—वे जो कुछ भी बेचते हैं वह मिलावटी और भ्रामक होता है। वे जिस भी व्यापारिक उद्यम में शामिल होते हैं उसमें धोखाधड़ी के हथकंडे और जाल में फँसाना शामिल होते हैं और वे जो भी पैसा कमाते हैं वह धोखाधड़ी के साधनों से प्राप्त किया जाता है। वे चाहे जो भी व्यापार करें, वे कभी भी उचित कीमत वसूलकर नियमबद्ध तरीके से इसे नहीं करते हैं। तुम देखो, कुछ लोग व्यापार करते समय विशेष रूप से नियमित ग्राहकों से धोखाधड़ी करते हैं। उदाहरण के लिए, यदि तुम अक्सर उनसे सामान खरीदते हो और वे जानते हैं कि तुम्हारे पास पैसा है, तो वे उस चीज के लिए तुमसे 100 युआन लेंगे जिसे वे दूसरों को 10 युआन में बेचते हैं। वे यहाँ तक कहेंगे, “मैं इसे किसी और को नहीं बेचता—मैं इसे सिर्फ तुम्हारे लिए रखता हूँ। देखो हमारा रिश्ता कितना मजबूत है? तुम्हें अच्छा सौदा मिल रहा है, है ना?” वे लोगों को धोखा देते हैं और यहाँ तक कि उन्हें आभारी भी महसूस कराते हैं—वे कितने कुशल धोखेबाज हैं! जिन लोगों की अंतरात्मा में आत्म-ग्लानि की कोई भावना नहीं होती है, वे चाहे जो भी करें, अपनी अंतरात्मा में कोई धिक्कार या जागरूकता महसूस नहीं करते हैं, इसलिए यह कहा जा सकता है कि ऐसे लोगों में कोई अंतरात्मा नहीं होती है। उनकी समझ चाहे जैसी भी हो, केवल उनकी अंतरात्मा के आधार पर ही देखा जाए तो ये लोग मानवता से रहित हैं और इनका चरित्र नीच है। यह किस हद तक नीच है? उनमें कोई अंतरात्मा और कोई मानवता नहीं है। यानी उनमें अंतरात्मा की उस जागरूकता, कार्य और संयम की कमी होती है जो सामान्य लोगों में होती है। इस संयम के बिना वे कुछ भी कर सकते हैं। व्यापार करने में वे धोखाधड़ी और फरेब कर सकते हैं; किसी भी व्यापारिक संचालन में वे चीजों में हेराफेरी कर सकते हैं और नियम तोड़ सकते हैं। वे कोई भी अनैतिक काम कर सकते हैं। यहाँ तक कि जब वे घर बनाते हैं, तो वे घटिया सामग्री का उपयोग करते हैं। तुम देखो—मुख्यभूमि चीन में उन झुकी हुई इमारतों और इमारतों के ढहने का कारण क्या है? ऐसा इसलिए है क्योंकि अत्यधिक मुनाफा कमाने के लिए बिल्डरों ने कंक्रीट मिश्रण के अवमानक अनुपात और स्टील रीबार उपयोग की घटिया तकनीकों को अपनाया, जिससे इमारतों की स्थिति पहले ही प्रभावित हो गई थी। नतीजतन, लोगों के रहने आने के कुछ ही समय बाद कुछ इमारतें ढह गईं। यदि पाँच या छह तीव्रता का भूकंप आ जाए, तो अधिकांश इमारतें ढह जाएँगी और परिणाम अकल्पनीय होंगे। उन बेईमान ठेकेदारों में बिल्कुल भी अंतरात्मा नहीं होती है—लोगों को मरते हुए देखकर वे तुरंत अपने आकाओं की तलाश करते हैं, ताकि स्थिति से निपटने के प्रतिकारी उपाय किए जा सकें। यदि उनके आका काफी मजबूत हैं और उनके पास स्थिति से निपटने के प्रतिकारी उपाय हैं, तो मामले पर सफलतापूर्वक पर्दा डाला जा सकता है। उन कुछ मौतों को अंतिम संस्कार के कुछ खर्चे देकर रफा-दफा कर दिया जाएगा और कोई भी उन्हें बिल्कुल भी जवाबदेह नहीं ठहरा पाएगा। उनकी अंतरात्मा में कोई जागरूकता नहीं होती है; कुछ मौतों की तो बात ही छोड़ दो—भले ही दर्जनों, सैकड़ों या दसियों हजार लोग मर जाएँ, उनके लिए इसका कोई मतलब नहीं होगा। उनकी नजर में मानव जीवन चींटियों के जीवन से अलग नहीं है—उनका कोई मोल नहीं है। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों में अंतरात्मा होती है? जिन लोगों में अंतरात्मा नहीं होती है उनके बारे में कहा जा सकता है कि उनमें कोई मानवता नहीं है। तो क्या व्यापार करते समय दूसरों से धोखाधड़ी और फरेब करने के उनके क्रियाकलाप भ्रष्ट स्वभावों के खुलासे हैं? (हाँ।) इसके भीतर विशिष्ट भ्रष्ट स्वभाव हैं। कौन-से भ्रष्ट स्वभाव? (क्रूरता और धूर्तता।) उनके विशिष्ट और प्रतिनिधि भ्रष्ट स्वभाव धूर्तता और दुष्टता हैं। जो लोग हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट कर सकते हैं वे विशेष रूप से धूर्त होते हैं। कभी-कभी लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने के लिए वे जिन हथकंडों का उपयोग करते हैं वे ऐसे होते हैं जिनकी तुम कभी उम्मीद भी नहीं करोगे और तुम उनके द्वारा ठगे जाते समय काफी खुश भी महसूस कर सकते हो, यह सोचकर कि वे तुम्हारे साथ काफी अच्छा व्यवहार कर रहे हैं। लंबे समय के बाद ही तुम्हारी आँखें खुलती हैं और अचानक तुम्हें एहसास होता है कि तुम्हें बेवकूफ बनाया गया है। और जब तुम उन्हें खोजने जाते हो, तो वे पहले ही बिना कोई सुराग छोड़े गायब हो चुके होते हैं। लोगों को धोखा देने के उनके हथकंडे कितने शातिर हैं! 1980 और 1990 के दशक में चीन के ग्वांगडोंग में उद्योग और वाणिज्य अपेक्षाकृत विकसित थे। कुछ अपेक्षाकृत उन्नत घरेलू उपकरण अभी तक भीतरी इलाकों में नहीं पहुँचे थे, इसलिए कुछ भीतरी इलाकों के लोग नए चलन के साथ बने रहने के लिए उन्हें खरीदने ग्वांगडोंग जाते थे। जब व्यापारियों को एहसास हुआ कि ये ग्राहक भीतरी इलाकों से हैं, तो वे सोचने लगे कि यह उनके लिए धोखाधड़ी करने का मौका है। भीतरी इलाकों के लोगों ने टेप रिकॉर्डर, टेलीविजन और अन्य उपकरण खरीदे। भुगतान किए जाने के बाद विक्रेताओं ने उन्हें यह भी बताया कि वारंटी अवधि कितनी लंबी है और कहा कि यदि उपकरणों में कोई समस्या आती है, तो वे उन्हें बदलने के लिए वापस आ सकते हैं, जिससे ग्राहकों को लगा कि बिक्री के बाद की सेवा काफी अच्छी है। जब वे जाने वाले थे, तो विक्रेताओं ने कहा कि उन्हें उपकरणों को पैक करने की आवश्यकता है और फिर वे उन्हें पैक करने के लिए पीछे ले गए। लेकिन जब ग्राहक घर पहुँचे और पैकेजिंग खोली, तो उन्हें उपकरणों के बजाय अंदर ईंटों और पत्थरों के अलावा कुछ नहीं मिला—तभी उन्हें एहसास हुआ कि व्यापारियों ने सामान बदल दिया था और उन्हें ठगा गया था। उन्हें खोजने के लिए वापस जाने का सफर बहुत लंबा था और इसमें उनके यात्रा खर्च में बहुत पैसा भी लगता, इसलिए उन्हें चुपचाप नुकसान सहना पड़ा और उन्होंने इस अनुभव से सबक सीखा—जब तुम कुछ खरीदते हो, तो तुम्हें एक हाथ से पैसे देने चाहिए और दूसरे हाथ से सामान लेना चाहिए; यह सुनिश्चित करने के लिए कि तुम्हें वही मिल रहा है जिसके लिए तुमने पैसे दिए हैं, हर चीज की खुद जाँच करनी चाहिए। इस तरह की बात अक्सर उन लोगों के साथ होती है जो बार-बार व्यापारिक यात्राओं पर जाते हैं। अब ऐसी घटनाएँ किसी एक शहर में केवल कभी-कभार होने वाली बात नहीं रह गई हैं, बल्कि आम बात हो गई हैं। हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट की घटनाएँ बढ़ रही हैं और व्यापार करने वाले अधिकाधिक लोग धोखाधड़ी कर रहे हैं। पहले ऐसा इतना ज्यादा क्यों नहीं था? यह केवल इसलिए था क्योंकि उस समय कुछ लोगों ने अभी तक धोखाधड़ी के इन हथकंडों का पता नहीं लगाया था। एक बार जब समाज में धोखाधड़ी के ये हथकंडे प्रचलित हो गए, तो व्यापारियों ने एक के बाद एक उनकी नकल करना और अनुकरण करना शुरू कर दिया; उन सभी ने ऐसा करना शुरू कर दिया। उन सभी ने ऐसा करना शुरू कर दिया—क्या इसका मतलब यह हो सकता है कि बाद में उनकी अंतरात्मा भ्रष्ट हो गई थी? नहीं, इन लोगों में स्वाभाविक रूप से ज्यादा अंतरात्मा नहीं होती है। बात सिर्फ इतनी है कि पहले अपने अनुभव या ज्ञान के स्तर के कारण उन्हें अभी भी यह समझ नहीं आया था कि दूसरों से इस तरह कैसे धोखा और फरेब किया जाए। बाद में सामाजिक परिवेश के भ्रष्ट होने के साथ वे ऐसे काम करने में अधिकाधिक बेरहम और निर्दयी हो गए हैं और उनके क्रियाकलापों की प्रकृति अधिकाधिक नीच हो गई है।
इस तरह के लोग व्यापार करते समय धोखाधड़ी और फरेब के हथकंडों का उपयोग करते हैं, तो क्या वे अन्य काम करते समय भी लोगों को धोखा देंगे और उनसे फरेब करेंगे? (हाँ।) व्यापार करने के उनके साधन और तरीके और धोखाधड़ी और फरेब जैसी चीजों के प्रति उनका रवैया उनकी मानवता को दर्शाता है। उनमें इसी तरह की मानवता होती है, इसलिए वे चाहे जो भी करें—भले ही वह दूसरों को धोखा देना और फरेब करना न हो—वह उससे कुछ बेहतर नहीं होगा। चूँकि इस तरह की मानवता ही वह आधार है जिस पर वे ये काम करते हैं, इसलिए वे चाहे जो भी करें, उसकी प्रकृति मूल रूप से एक ही होती है—वे बस अंतरात्मा की जागरूकता से रहित होते हैं। जब ये लोग अधिकारी बन जाते हैं, तो उनके बोलने और काम करने के तरीके वैसे ही होते हैं जैसे व्यापार करते समय होते हैं—उनमें अंतरात्मा की भूमिका नहीं होती है, वे धोखा देते और फरेब करते हैं, लोगों को नुकसान पहुँचाते हैं, मारते हैं और कानून तोड़ते हैं; वे ऐसा कुछ भी कर सकते हैं जो मानवता, नैतिकता और नैतिक न्याय के खिलाफ जाता है। वे व्यापार के साथ-साथ राजनीति में भी ऐसा ही व्यवहार करते हैं। यदि वे वैज्ञानिक अनुसंधान में शामिल होते हैं, तो क्या उनका क्षेत्र अलग होने से उनकी मानवता बदल सकती है? नहीं। मुझे बताओ, जब कलीसिया में सामान्य मामलों का काम करने की बात आती है, तो क्या ऐसे लोगों को कोई फायदा होता है? कुछ लोग कहते हैं, “फलां व्यक्ति कभी सांसारिक दुनिया में एक बड़ा बॉस या सीईओ था। व्यापार करने के उसके तरीके विशेष रूप से चतुराईपूर्ण हैं, लेकिन बस थोड़े अशोभनीय हैं—कभी-कभी वह लोगों को धोखा देता है और फरेब करता है। मुझे नहीं पता कि कलीसिया में सामान्य मामलों का काम करने के लिए इस तरह के व्यक्ति को पदोन्नत करना उचित है या नहीं।” मुझे बताओ, क्या इस तरह का व्यक्ति एक अच्छा इंसान है? क्या वह वास्तव में प्रतिभाशाली व्यक्ति है? (नहीं।) कुछ लोग हमेशा इन व्यक्तियों को प्रतिभाशाली लोगों के रूप में देखते हैं और समाज में थोड़ी प्रतिष्ठा रखने वाले लोग इन सभी लोगों की सिफारिश करते हैं, यह कहते हुए कि फलां व्यक्ति सीईओ या वरिष्ठ कार्यकारी था, कोई अन्य व्यक्ति समाज के शीर्ष दस उत्कृष्ट युवाओं में से एक या अनुकरणीय कार्यकर्ता था और यह कि अन्य लोगों के पास मास्टर या डॉक्टरेट की डिग्री है या उन्होंने वकील, पत्रकार, सिविल सेवक या अधिकारियों के रूप में काम किया है। इन व्यक्तियों की सिफारिश करने वाले लोगों में वास्तव में आध्यात्मिक समझ नहीं होती है और वे सत्य को नहीं समझते हैं। उन्हें बस ऐसा लगता है कि परमेश्वर के घर में विभिन्न कार्य की मदों को समाज में जीवन के सभी क्षेत्रों के इन प्रतिभाशाली लोगों और अभिजात वर्ग द्वारा किया जाना चाहिए, इसलिए वे कार्य की इन मदों के लिए इन लोगों की पर्यवेक्षकों की भूमिका निभाने की सिफारिश करते हैं। पर्यवेक्षक बनने के बाद वे लोग न केवल काम को अच्छी तरह से सँभालने में विफल रहे, बल्कि उन्होंने इसे पूरी तरह से अस्त-व्यस्त भी कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप कलीसिया के कार्य में हर जगह अराजकता फैल गई—यह बिल्कुल बकवास थी! ये लोग बस इतना कर पाए कि इन्होंने अनुचित जल्दबाजी के साथ काम करने का दुस्साहस किया, कुकर्म करते हुए बेकाबू हो गए, लापरवाह और ढीठ बने रहे और बेशर्मी से कुछ खास काम किया—इसके अलावा कार्य की एक भी मद ऐसी नहीं थी जिसे वे वास्तव में सत्य सिद्धांतों के अनुसार कर सकें। इन लोगों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे जो कुछ भी करते हैं उसमें कभी सत्य की खोज नहीं करते और उनमें परमेश्वर का भय मानने वाले दिल की कमी होती है। वे पर्यवेक्षक बनने में क्यों सक्षम होते हैं? एक कारण यह है कि उनका मानना है कि वे समाज में जीवन के सभी क्षेत्रों के अभिजात वर्ग, प्रतिभाशाली व्यक्ति और स्तंभ हैं, इसलिए वे सोचते हैं कि परमेश्वर के घर में आने के बाद उन्हें प्रमुख पदों को ग्रहण करना चाहिए, बड़ी जिम्मेदारियाँ उठानी चाहिए और महत्वपूर्ण भूमिकाएँ निभानी चाहिए, उनके पास प्रतिष्ठा होनी चाहिए और उन्हें आदर दिया जाना चाहिए और परमेश्वर का घर उनके बिना नहीं चल सकता। इसलिए वे पर्यवेक्षक बनने और काम की जिम्मेदारी लेने की कोशिश करते हुए खुद को सुर्खियों में लाते हैं। दूसरा कारण यह है कि परमेश्वर का घर भी उन्हें अवसर देता है। चूँकि वे काम करने के इच्छुक होते हैं, इसलिए उन्हें इसे आजमाने की अनुमति दी जाती है—भले ही वे सक्षम हों या नहीं, उनकी जाँच-परख करनी पड़ती है। लेकिन इन लोगों में कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है। सत्य को समझना और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर पाना तो दूर की बात है—केवल उनकी अपनी काबिलियत, प्रतिभाओं, अंतर्दृष्टि, विभिन्न मामलों को समझने की उनकी क्षमता, चीजों को देखने की उनकी क्षमता और मामलों को सँभालने की उनकी क्षमता के संदर्भ में, उनमें से अधिकांश के पास कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है। उनमें कोई असली प्रतिभा या वास्तविक ज्ञान नहीं होता है, तो फिर वे बड़ी जिम्मेदारियाँ लेने और काम का बोझ उठाने के लिए इतने उत्सुक और तत्पर क्यों होते हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी महत्वाकांक्षा और घमंड हावी होते हैं और इसके अलावा वे बेशर्म होते हैं—वे अपनी असल हैसियत नहीं जानते, लेकिन हमेशा दिखावा करना चाहते हैं। परिणामस्वरूप वे काम को अच्छी तरह से करने में विफल रहते हैं और केवल अपना मजाक उड़वाते हैं। मैं ऐसा क्यों कहता हूँ? क्योंकि इन लोगों द्वारा ये भूमिकाएँ निभाने के बाद उन्होंने जो भी काम किया वह हर जगह बिखरा हुआ और पूरी तरह से अस्त-व्यस्त था। इसे एक शब्द में कहें तो यह “अराजकता” थी। लोगों का उपयोग करने में उनके कोई सिद्धांत नहीं थे, मामलों को सँभालने में कोई सिद्धांत नहीं थे, उन्होंने चढ़ावे को अनुचित तरीके से खर्च किया और विभिन्न कार्य की मदों पर तुरंत अनुवर्ती कार्रवाई नहीं की या उन्हें नहीं सँभाला। यहाँ तक कि सबसे बुनियादी सामान्य मामलों का काम भी उनमें से अधिकांश की क्षमता से बाहर था; उन्होंने हर चीज को पूरी तरह से अव्यवस्थित छोड़ दिया। खेती करना, मुर्गियाँ पालना, भेड़ें पालना—इन कार्यों के लिए इनमें से कोई भी सक्षम नहीं था। उन्हें यह स्पष्ट नहीं था कि किस मौसम में क्या रोपना है, कब खेत जोतना है, कब खाद डालनी है और निराई करनी है या कब फसल काटनी है। उन्होंने अपने सारे काम में अराजकता फैला दी। यदि शुरुआत में परमेश्वर के घर ने इन लोगों का उपयोग नहीं किया होता, तो उन्हें लगता कि परमेश्वर का घर उन्हें अवसर नहीं दे रहा है और उन्हें तुच्छ समझ रहा है। इसलिए उन्हें अवसर दिए गए—और उनका उपयोग किए जाने का क्या नतीजा हुआ? उन्होंने अपने काम को पूरी तरह से अस्त-व्यस्त छोड़ दिया और अंततः परमेश्वर के घर को ही उनकी फैलाई गई अव्यवस्था को ठीक करना पड़ा। उनके द्वारा किए गए कार्य की हर एक मद के लिए ऊपरवाले को निर्देश देने और जाँच-परख करने की आवश्यकता होती थी—यहाँ तक कि घर के अंदर और बाहर की साफ-सफाई बनाए रखने जैसे छोटे मामलों के लिए भी ऊपरवाले को निर्देश देना पड़ता था। अंततः ऊपरवाले द्वारा सख्त पर्यवेक्षण, नियोजन और समन्वय करने, हर चीज को शुरू से थोड़ा-थोड़ा करके निर्देशित और संचालित करने के माध्यम से ही अब काम को मूल रूप से सही रास्ते पर आया हुआ माना जा सकता है। किसी और बात का जिक्र किए बिना—केवल फार्मों से जुड़े मुद्दों की ही बात करें, तो साफ-सफाई का प्रबंधन करने के लिए कम से कम उपयुक्त लोग तो होने ही चाहिए थे। अधिकांश लोग जंगली जानवरों की तरह थे, हर जगह कचरा फेंकते थे, परिवेश पर पड़ने वाले प्रभाव पर विचार किए बिना बोलते थे, चीखते-चिल्लाते थे—वे बिल्कुल अविश्वासियों के समान थे। इन तथाकथित प्रतिभाशाली लोगों में से एक भी व्यक्ति इन विशिष्ट सामान्य मामलों का सामना करते समय चीजों को व्यवस्थित रूप से अच्छी तरह से प्रबंधित नहीं कर सका। वे साफ-सफाई और परिवेश के प्रबंधन जैसे छोटे मामलों को भी अच्छी तरह से नहीं सँभाल सके। इन बाहरी मामलों में सत्य शामिल नहीं होता है और थोड़ी-सी काबिलियत और थोड़ी-सी अंतरात्मा वाले किसी भी व्यक्ति को इन्हें अच्छी तरह से सँभालने में सक्षम होना चाहिए—यदि कोई व्यक्ति इन बाहरी मामलों को भी अच्छी तरह से नहीं सँभाल सकता है, तो वह बिल्कुल बेकार है। अंतरात्मा और विवेक या काबिलियत और प्रतिभा न होने के बावजूद वो लोग अधिकारी बनना और फैसले लेना चाहते थे। जब उन्हें अधिकारी नहीं बनने दिया गया, तो वे विद्रोही हो गए, बहस करने लगे और किसी के आगे नहीं झुके। क्या वे दानव नहीं हैं? परमेश्वर के घर द्वारा इन दानवों को उजागर करने और हटा देने के बाद फार्म का प्रबंधन करने के लिए उपयुक्त लोगों को चुना गया। ऊपरवाले के मार्गदर्शन और नियोजन की बदौलत फार्म अब बहुत अच्छी तरह से बन गया है और हर कोई इसे पसंद करता है। स्थानीय लोग भी इसकी बहुत प्रशंसा करते हैं और इसका बहुत अनुमोदन करते हैं। उनमें से कुछ ने कहा, “मैंने कभी किसी फार्म को इतना साफ और सुंदर प्रबंधित होते नहीं देखा। हम दस साल में भी इसे इस हद तक नहीं बदल सकते थे। तुम लोग इसे इतनी जल्दी, इतनी अच्छी तरह से कैसे प्रबंधित कर सके? तुम लोगों को इसे ऐसा बनाने में कितने साल लगे?” वास्तव में, इतना बड़ा बदलाव आने में केवल एक वर्ष लगा, जिसने एक बंजर भूमि को ऐसे रूप में बदल दिया जिसे भाई-बहन एक पार्क या बगीचे के रूप में देखते हैं। कुछ लोगों ने तो यहाँ तक कहा कि यह जगह किसी परियों के देश जैसी, किसी चित्रकारी जैसी दिखती है। उचित नियोजन और निर्माण वास्तव में बड़ा अंतर पैदा करते हैं। यह जगह मूल रूप से धूल और मिट्टी से ढकी हुई थी और हर जगह कचरा और गंदगी थी। बाद में साफ-सफाई और विनियम के माध्यम से इसमें धीरे-धीरे सुधार हुआ। समय के साथ हर कोई इस तरह के रहने के परिवेश का आदी हो गया है, इस हद तक कि अगर यह थोड़ा गंदा या अव्यवस्थित हो जाता है, तो कुछ लोगों को इसकी बिल्कुल आदत नहीं रही। तुम देखो, इस तरह के प्रबंधन के माध्यम से अधिकांश लोगों को लाभ होता है और वे रहन-सहन की अच्छी आदतें विकसित करते हैं। ऊपरवाले के व्यक्तिगत निर्देश के तहत ही इस तरह का निर्माण संभव हो सका। इसके विपरीत, वास्तव में इन तथाकथित प्रतिभाशाली लोगों में से कोई भी कोई वास्तविक काम नहीं कर सकता है। वे बुनियादी साफ-सफाई का काम भी अच्छी तरह से प्रबंधित नहीं कर सकते। वे नहीं जानते कि किसी कमरे को इस तरह से कैसे व्यवस्थित किया जाए कि वह उपयुक्त दिखे और वे इसकी असलियत नहीं देख पाते कि किस तरह का व्यक्ति कौन-सा कर्तव्य करने के लिए उपयुक्त है। ये लोग किस तरह के काम का बोझ उठा सकते हैं? वे बिल्कुल कोई काम नहीं कर सकते। वे अपने रहन-सहन के परिवेश को भी प्रबंधित नहीं कर सकते—उन्हें प्रतिभाशाली लोग कैसे माना जा सकता है? इन लोगों में इतनी-सी भी बुद्धि नहीं होती, वे स्पष्ट रूप से बात नहीं कर सकते, वे चीजों को गलत नजरिए से देखते हैं और उनमें स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती। इससे पता चलता है कि वे केवल कहने के लिए “प्रतिभाशाली लोग” हैं, न कि असली प्रतिभा और वास्तविक ज्ञान वाले लोग। प्रतिभाशाली लोगों की मानवता में सबसे पहले कुछ गुण होने चाहिए, जैसे चीजों की कद्र करने की क्षमता, चीजों का मूल्यांकन और उनकी कद्र करने की क्षमता और अंतर्दृष्टि। यदि उनमें ये गुण नहीं हैं, तो वे विशिष्ट मामलों को सँभालते समय केवल खुद को शर्मिंदा करते हैं और वे एक बगीचे या एक-दो एकड़ जमीन का प्रबंधन भी नहीं कर सकते और न ही योजना बना सकते हैं—और न ही इसका प्रभावी उपयोग कर सकते हैं—तो ऐसे लोगों में प्रतिभा जैसी कोई बात नहीं होती। तुमसे पूरी पृथ्वी का प्रबंधन करने की अपेक्षा नहीं की जाती है, तुम्हें बस एक-दो एकड़ जमीन को अच्छी तरह से प्रबंधित करने के लिए दिया गया है, यानी उसे इस तरह सँवारना कि वह सुंदर और साफ हो जाए और एक आकर्षक परिवेश में बदल जाए—लोगों के लिए वहाँ रहना कितना अद्भुत होगा, यहाँ तक कि पक्षी भी एक बार आने के बाद वहाँ से जाना नहीं चाहेंगे। ये तथाकथित प्रतिभाशाली लोग बिल्कुल भी कुछ नहीं हैं। वे कोई ठोस काम नहीं कर सकते। उनमें प्रतिभा जैसी कोई बात बिल्कुल नहीं है—उनकी मानवता में कमियाँ हैं। वे कोई भी काम अच्छी तरह से नहीं कर सकते, फिर भी वे अपना दिखावा करना चाहते हैं, अगुआ और कार्यकर्ता बनना चाहते हैं और अभी भी प्रमुख पद ग्रहण करना और पर्यवेक्षक बनना चाहते हैं। यह किस तरह का स्वभाव है? यह एक घमंडी स्वभाव है।
आओ, व्यापार करते समय लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करने का शौक होने के विषय पर वापस लौटें। लोगों से धोखाधड़ी और फरेब करना किस तरह की समस्या है? समस्या का एक पहलू यह है कि ऐसे लोगों की मानवता खराब होती है; उनमें अंतरात्मा या विवेक नहीं होता है। उनके व्यवहार के आधार पर देखा जाए, तो वे कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं? सबसे पहले, ऐसे लोगों का स्वभाव धूर्त और दुष्ट होता है; दूसरा, वे सत्य से विमुख होते हैं और अड़ियल होते हैं। जब वे दूसरों को धोखा देते हैं, तो वे जो निर्दयता दिखाते हैं वह क्रूरता है—चाहे उनका शिकार अमीर हो या गरीब, चाहे शिकार के पास पैसा हो या नहीं, वे उन सभी को एक समान रूप से धोखा देते हैं, कोई दया नहीं दिखाते। ऐसे लोगों के भ्रष्ट स्वभाव हर पहलू में काफी गंभीर होते हैं। मुझे बताओ, क्या ऐसे लोगों के लिए उद्धार पाना आसान है? (नहीं।) उनके भ्रष्ट स्वभावों के आधार पर देखा जाए, तो उनके लिए उद्धार पाना आसान नहीं है। फिर, उनकी मानवता के संदर्भ में, कौन-सा पहलू उनके लिए उद्धार पाना कठिन बनाता है? क्या इसका कोई मूल कारण है? (उनमें कोई अंतरात्मा नहीं होती है।) सही कहा, जिन लोगों में कोई अंतरात्मा नहीं होती है, उनके लिए उद्धार पाना आसान नहीं है। उनमें अंतरात्मा की क्षमता पहले ही खत्म हो चुकी है, यह अब मौजूद नहीं है। अंतरात्मा के कार्य के बिना, व्यक्ति के पास सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने की मूलभूत शर्त नहीं होती है। इस प्रकार, उनके लिए उद्धार पाना बहुत कठिन है; यह भी कहा जा सकता है कि वे उद्धार नहीं पा सकते हैं। यह भी संभव है कि इस प्रकार का व्यक्ति श्रम करने का इच्छुक हो और कुछ हद तक ऐसा कर सके और अंततः, क्योंकि उनका श्रम मानक स्तर का है और परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा करता है, वे वफादार श्रमिक बन जाएँगे और जीवित बचेंगे। यह भी परमेश्वर का अनुग्रह है। यद्यपि वफादार श्रमिक जीवित बच सकते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्होंने उद्धार पा लिया है। जीवित बचना और उद्धार पाना दो अलग-अलग अवधारणाएँ हैं। उनके बीच एक अंतर और भेद है। किसी व्यक्ति के क्रियाकलापों के सिद्धांत, सीमाएँ, दिशा और लक्ष्य काफी हद तक इस बात से संबंधित होते हैं कि उनकी मानवता अच्छी है या खराब। यदि कोई व्यक्ति सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है या उसमें न्याय की कुछ भावना है, तो यह दर्शाता है कि उसकी अंतरात्मा में जागरूकता है—यह दर्शाता है कि इस व्यक्ति में थोड़ी अंतरात्मा है। अपने आचरण में, कुछ लोगों में न्याय की कोई भावना नहीं होती है, न ही वे कोई सकारात्मक चुनाव करते हैं। वे बस दुष्ट चीजें करना पसंद करते हैं और सकारात्मक चीजों से बहुत घृणा करते हैं। विशेष रूप से जब कोई कार्य करने के सकारात्मक तरीकों के बारे में थोड़ी बात करता है, इस बारे में कि कैसे किसी को अपने आचरण में मानवता, अंतरात्मा और नैतिक सीमाएँ रखनी चाहिए और नियमों का पालन करना चाहिए, तो वे इसे उपदेश देना मानते हैं। इसे “उपदेश देना” कहना तो बहुत अच्छे से कहना हुआ; वास्तव में, वे तुम्हारा तिरस्कार करते हैं और तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं। उनका मानना है कि इस तरह से आचरण करना एक विफलता है : “देखो तुम्हारा जीवन कितना दयनीय है। तुम्हें हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करना नहीं आता, न ही तुम चालाकी से फायदा उठाना जानते हो। अपने आचरण में, तुम हमेशा इतने नियमबद्ध, इतने डरपोक रहते हो। आज के इस युग में, निडर लोग छक कर खाते हैं जबकि डरपोक भूखे मरते हैं। अगर तुम डरपोक हो, तो तुम सफल नहीं होगे!” उनका मानना है कि अंतरात्मा और सिद्धांतों के साथ आचरण करके तुम बस डरपोक बन रहे हो और हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने का साहस करके वे निडर बन रहे हैं। लेकिन क्या यह वास्तव में इसलिए है क्योंकि वे निडर हैं? बड़े लाल अजगर के देश में परमेश्वर में विश्वास करने वाले कुछ लोग उत्पीड़न सहने और गिरफ्तार होने से नहीं डरते हैं और फिर भी परमेश्वर में विश्वास करने में दृढ़ रहते हैं। क्या इसका निडर या डरपोक होने से कोई लेना-देना है? (नहीं।) यह उनके अनुसरण से संबंधित है—उनकी मानवता में, परमेश्वर में विश्वास करने की आवश्यकता और लालसा है। यह निडर या डरपोक होने का मामला नहीं है। कुछ लोग व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं। कई बार उन्हें पीछा किए जाने और गिरफ्तार होने, अपनी संपत्ति जब्त होने या दिवालिया होने और काम बंद होने के जोखिम का सामना करना पड़ता है, लेकिन वे फिर भी लोगों को धोखा देना जारी रखते हैं। भले ही उनकी धोखाधड़ी के कारण जान का नुकसान होने वाला हो, वे कोई परवाह नहीं करते हैं। कुछ लोग व्यापार करते समय एक फर्जी कंपनी बनाकर दूसरों को धोखा देते हैं—वास्तव में, यह कंपनी बिल्कुल मौजूद नहीं होती है और इसका कोई वास्तविक व्यापार नहीं होता है, न ही यह कोई उत्पाद बनाती है। वे हर जगह लोगों को अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों में फँसाकर उनसे ऑर्डर ऐंठते हैं। एक बार जब दूसरे लोग उन्हें अग्रिम राशि दे देते हैं, तो वे तुरंत बिना कोई सुराग छोड़े भाग जाते हैं। वे लोगों को इस तरह धोखा देते हैं, एक के बाद एक लेन-देन करते हैं और पैसे ऐंठने के बाद, उनका पूरा परिवार विलासिता में रहता है, बेहतरीन खाने-पीने का आनंद लेता है। कुछ लोग किस हद तक धोखाधड़ी करते हैं? वे उच्च-स्तरीय संस्थानों और एजेंसियों से भी धोखाधड़ी करते हैं। कभी-कभी वे खतरे की कगार पर होते हैं और यह संभव है कि कोई उनकी चालों की असलियत देख ले और उन्हें उजागर कर दे। वे वास्तव में अपने दिलों में जानते हैं कि उनके क्रियाकलाप उन्हें जोखिम में डाल देंगे, लेकिन वे परवाह नहीं करते। यदि किसी संयोग से वे बच निकलते हैं, तो वे अगले अवसर पर लोगों को धोखा देना जारी रखेंगे। अगर वे अपनी धोखाधड़ी के माध्यम से पैसा कमा लेते हैं, तो वे सोचते हैं कि वे जीत गए हैं, उन्होंने “प्रसिद्धि और सफलता प्राप्त कर ली है।” लेकिन अगर तुम उनसे परमेश्वर में विश्वास करने के लिए कहो, तो वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते। वे कहते हैं, “परमेश्वर में विश्वास करने से सरकार मुझे दोषी ठहराएगी और गिरफ्तार कर लेगी। मैं विश्वास करने की हिम्मत नहीं करता!” फिर भी जब हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने की बात आती है, तो उन्हें गिरफ्तार होने का कोई डर नहीं होता। यदि तुम सभाओं में जाते हो, तो वे यहाँ तक कहते हैं, “तुम सच में बहुत निडर हो। सरकार अभी विश्वासियों को अंधाधुंध गिरफ्तार कर रही है और सता रही है; तुम अभी भी सभाओं में जाने की हिम्मत कैसे कर सकते हो?” तुम कहते हो, “हम जो परमेश्वर में विश्वास करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं, गिरफ्तार होने से नहीं डरते। तुम लोगों के लिए फर्जी कंपनियाँ चलाना और धोखाधड़ी करना बेहद खतरनाक है—तुम क्यों नहीं डरते?” वे कहते हैं, “हम व्यापारी जोखिम उठाने से नहीं डरते। लेकिन तुम लोग बहुत निडर हो जो ऐसे समय में भी सभाओं में जाने की हिम्मत करते हो जब सरकार विश्वासियों को गिरफ्तार करने की हर संभव कोशिश कर रही है!” जब वे देखते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने वालों को गिरफ्तार किया जा रहा है, तो वे विश्वास करने की हिम्मत नहीं करते, लेकिन वे व्यापार करते समय धोखाधड़ी करने के लिए गिरफ्तार होने से नहीं डरते। वे किस तरह के नीच इंसान हैं? क्या यह लोगों की मानवता में अंतर नहीं दिखाता है? लोगों के बीच ठीक यही अंतर होता है। लोगों के भ्रष्ट स्वभाव एक जैसे होते हैं—उन सभी में वही भ्रष्ट स्वभाव होते हैं—लेकिन उनकी मानवता में अंतर के आधार पर देखा जाए, तो कुछ लोग कभी भी परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे; वे कभी परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं बन सकते। भले ही ऐसे लोग परमेश्वर में विश्वास कर लें, वे कभी उद्धार नहीं पा सकते। इसे किस पहलू से देखा जा सकता है? इसे उनकी मानवता से देखा जा सकता है। कुछ लोग अपनी पत्नियों के परमेश्वर में विश्वास करने का समर्थन करते हैं, लेकिन जब उनकी पत्नियाँ उनसे विश्वास करने का आग्रह करती हैं, तो वे कहते हैं कि यह बहुत खतरनाक है और वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते। फिर भी व्यापार करते समय वे हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं और चाहे उन्हें कितने भी खतरे का सामना क्यों न करना पड़े, उन्हें कोई परवाह नहीं होती। वे कोई भी कानून तोड़ सकते हैं और किसी भी हथकंडे का उपयोग करने की हिम्मत कर सकते हैं। सरकार चाहे कितनी भी कड़ी निगरानी क्यों न रखे या कानून के तहत कैसी भी दोषसिद्धि और सजा क्यों न दी जाए, उन्हें कोई परवाह नहीं होती। उनके आचरण की कोई सीमाएँ नहीं होतीं, काम करते समय उन्हें परिणामों की कोई परवाह नहीं होती और वे सोचते हैं कि जब तक मुनाफा हो रहा है, तब तक सब कुछ ठीक है। यदि ऐसा व्यक्ति परमेश्वर में विश्वास करता है, तो वह सत्य प्राप्त नहीं कर सकता और वह उद्धार नहीं पा सकता—ऐसा इसलिए है क्योंकि वह सत्य से नहीं, बल्कि केवल पैसे से प्रेम करता है। जब तक वह व्यापार करता है, वह दूसरों को ठगेगा और धोखा देगा और चीजों में हेराफेरी करेगा—उसका काला दिल खुद को अभिव्यक्त कर देता है। इस तरह के चरित्र वाला व्यक्ति पूरी तरह से बर्बाद है; परमेश्वर इस तरह के व्यक्ति को नहीं बचाता है। कुछ लोग कहते हैं, “यदि इस तरह का व्यक्ति बहुत पैसा कमाता है और उसे परमेश्वर के घर को भेंट कर देता है, तो क्या होगा?” परमेश्वर का घर ऐसे पैसे को स्वीकार नहीं करता; परमेश्वर का घर वह पैसा स्वीकार नहीं करता जो वैध साधनों से न कमाया गया हो। उस तरह का व्यक्ति व्यापार करते ही हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करेगा—उसकी मानवता बहुत खराब होती है। यह कितनी खराब होती है? यदि तुम उससे अपनी अंतरात्मा को टटोलने के लिए कहते हो, तो वह कहता है, “मुझे कुछ भी महसूस नहीं होता। मुझे नहीं पता कि मेरी अंतरात्मा कहाँ है। मुझे यह भी नहीं पता कि अंतरात्मा क्या होती है या यह किस भाव में बिकती है।” उस क्षण तुम समझ जाते हो : “तभी तो वह उसी व्यापार में लगे अन्य लोगों की तुलना में ज्यादा तेजी से पैसा कमाता है। तभी तो सभी ग्राहक उसी से सामान खरीदने जाते हैं। यह व्यक्ति कुटिल हथकंडों का उपयोग करता है—व्यापार करते समय वह धूर्त तरीके आजमाता है और उसका धोखाधड़ी वाला व्यवहार वाकई बहुत गंभीर है!” लेकिन वह न केवल इसे शर्मनाक नहीं मानता, बल्कि वह डींगें मारते और शेखी बघारते हुए कहता है, “तुम लोगों को देखो, जो पूरी गंभीरता से और सही तरीके से व्यापार करते हो। तुम एक बार किसी को धोखा देते हो और इतने डर जाते हो कि तुम्हारा दिल धक-धक करने लगता है। मुझे देखो—मैं नहीं डरता! जब तक उद्योग और वाणिज्य ब्यूरो और पुलिस को कोई सबूत नहीं मिलता, तब तक सब ठीक है। मुझ पर मुकदमा करना चाहते हो? तुम्हारे पास कोई सबूत नहीं है! देखो मैं कितनी चतुराई से लोगों को धोखा देता हूँ! क्या तुम ऐसा कर सकते हो? तुम नहीं कर सकते! जैसे ही तुम किसी को धोखा देते हो, तुम अपनी पोल खोल देते हो। तुम्हारे पास मेरे जैसे हथकंडे नहीं हैं। तुम्हारी काबिलियत खराब है!” यह किस तरह का व्यक्ति है? वह एक दुष्ट व्यक्ति है। क्या उसके छुटकारे की कोई उम्मीद है? उसके छुटकारे की कोई गुंजाइश नहीं है। ऐसा इसलिए नहीं है कि ऐसे लोगों में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं, तो उन्हें बचाया नहीं जा सकता, बल्कि इसलिए है क्योंकि उनकी मानवता बहुत खराब होती है। किस तरह से खराब होती है? इस तरह से खराब कि उनमें कोई मानवता और कोई अंतरात्मा नहीं होती; उन्होंने अपनी अंतरात्मा खो दी है। अपनी अंतरात्मा खो देने का क्या अर्थ है? इसका अर्थ है अंतरात्मा की सीमाओं के बिना काम करना। ये सीमाएँ अंतरात्मा की नींव पर बनी होती हैं—अंतरात्मा ही सीमाएँ तय करती है। व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करके तुम चाहे जिसे भी ठगो, चाहे वह बुरा व्यक्ति हो या अच्छा व्यक्ति, किसी भी स्थिति में, यह काम अपने आप में नैतिकता, अंतरात्मा और मानवता के खिलाफ जाता है। एक बार ऐसा काम हो जाने पर, तुम हमेशा के लिए अपनी अंतरात्मा में आत्म-ग्लानि महसूस करोगे। यह जीवन भर का कलंक बन जाएगा। यदि तुम वास्तव में इंसान हो, तो तुम्हें ऐसा काम कभी नहीं करना चाहिए। तुम्हारी धोखाधड़ी का शिकार चाहे जो भी हो और तुम चाहे कितने भी पैसे की धोखाधड़ी करो—भले ही तुम दुष्ट लोगों और बुरे लोगों से धोखाधड़ी करो—यह फिर भी धोखाधड़ी ही है। इसलिए परिस्थितियाँ चाहे जैसी भी हों या तुम चाहे जिससे भी व्यवहार कर रहे हो, तुम्हें कभी लोगों को धोखा नहीं देना चाहिए। यह अपने आचरण में अंतरात्मा की सीमाएँ रखना है और यह वह संयम रखने वाली शक्ति है जो अंतरात्मा के कार्य से आती है। यदि तुममें अंतरात्मा का कार्य है, तो तुम जो भी करते हो उसमें तुम्हारी सीमाएँ होंगी। यदि तुममें अंतरात्मा का कार्य नहीं है, तो तुम उन सीमाओं को पार कर जाओगे और कुछ भी करने में सक्षम होगे। यह कहा जा सकता है कि इस तरह के व्यक्तियों में रत्ती भर भी अंतरात्मा और विवेक नहीं होता है और वे जानवरों से भी बदतर होते हैं। यदि कुछ लोगों को लगता है कि यह कथन बहुत अतिवादी है, तो आओ इसे दूसरे तरीके से कहें : रत्ती भर भी विवेक न रखने वाला व्यक्ति जानवर के समान है। क्या मानवता से रहित लोग जानवर नहीं हैं? यदि कोई इंसान है फिर भी उसमें कोई मानवता नहीं है, तो उसका सार क्या है? क्या यह किसी जानवर का सार नहीं है? उनके और जानवर के बीच का अंतर यह है कि वे सीधे चल सकते हैं और उनकी एक भाषा है, जबकि जानवरों में मानवीय भाषा की क्षमता नहीं होती है। मुनाफा कमाने के लिए तुम हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने के वास्ते सभी प्रकार के साधनों और तरीकों का उपयोग करने में सक्षम हो, जबकि जानवरों के पास ऐसा कोई साधन नहीं होता है। इसलिए यह कहना कि इस तरह के लोग जानवरों के बराबर हैं, वास्तव में उनके साथ नरमी बरतना है—असल में ऐसे लोग वाकई जानवरों से भी बदतर होते हैं। क्या जानवरों से भी बदतर लोग उद्धार पा सकते हैं? वे रत्ती भर भी सत्य को स्वीकार नहीं करते हैं—वे केवल पैसे से प्रेम करते हैं। यह उनकी प्रकृति की समस्या है और कोई इसे बदल नहीं सकता। ऐसे लोगों से सत्य को स्वीकार करने की उम्मीद करना मुर्गे से अंडे देने की उम्मीद करने जैसा है—ऐसा कभी नहीं होगा। इसलिए भ्रष्ट मानवजाति के बीच, उन लोगों को छोड़कर जो मुनाफे के लिए हत्या करते हैं या आपराधिक कृत्य करते हैं और कानून तोड़ते हैं, हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने वाले इन लोगों की मानवता सबसे खराब मानी जा सकती है—वे मानवजाति का कचरा हैं, मानवजाति के पतित लोग हैं। महान आर्थिक समृद्धि के इस वर्तमान युग में, व्यापार करते समय हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करने वाले ऐसे लोगों की संख्या असाधारण रूप से अधिक है। लेकिन ऐसे लोगों की संख्या चाहे कितनी भी क्यों न हो, किसी भी स्थिति में, ऐसी अभिव्यक्तियाँ मानवता की समस्या को दर्शाने के लिए पर्याप्त हैं। किसी व्यक्ति की अंतरात्मा कैसी है, साथ ही क्या उसमें अंतरात्मा की सीमाएँ हैं—यह उसकी मानवता को मापने का एक पैमाना है। जिस व्यक्ति में मानवता ही नहीं है, उसे भला कैसे बचाया जा सकता है? कम से कम, किसी व्यक्ति की मानवता में सत्य को स्वीकार करने की स्थितियाँ होनी चाहिए। जो लोग हर तरह की धोखाधड़ी और छल-कपट करते हैं, उनकी मानवता में मूल रूप से सत्य को स्वीकार करने की स्थितियाँ नहीं होती हैं। इसलिए यदि तुम उनसे अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागने के लिए सत्य को स्वीकार करने को कहते हो, तो उनके लिए ऐसा कर पाना असंभव होगा। केवल अंतरात्मा और विवेक वाले लोग ही सत्य को स्वीकार कर सकते हैं और अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्याग सकते हैं और इस प्रकार उद्धार पा सकते हैं, क्योंकि उनकी अंतरात्मा में एक निश्चित स्तर की जागरूकता होती है और जब वे आचरण और कार्य करते हैं, तो उनकी अंतरात्मा एक निश्चित कार्य कर सकती है। जब तुम ऐसे लोगों के साथ सत्य पर संगति करते हो और इस बारे में बात करते हो कि सत्य में प्रवेश कैसे करें, भ्रष्ट स्वभावों को कैसे त्यागें, कौन-सी चीजें परमेश्वर के इरादों के अनुरूप हैं और कौन-सी नहीं और लोगों को कैसे कार्य करना चाहिए, तो वे स्वीकार और समर्पण कर सकते हैं। ऐसे लोगों के साथ सत्य पर संगति करना उचित है—वे सही प्राप्तकर्ता हैं। यदि तुम उन लोगों के साथ सत्य पर संगति करते हो जिनका व्यापार करने का प्राथमिक साधन दूसरों से धोखाधड़ी और फरेब करना है, तो यह दीवार से बात करने के समान है। इसलिए जब व्यापार करने वाले ऐसे लोगों की बात आती है, तो बस यह देखो कि क्या वे व्यापार करने में और लोगों के साथ अपने लेन-देन और व्यवहार में वैध साधनों का उपयोग करते हैं, क्या उनमें अंतरात्मा का संयम और सीमाएँ हैं और क्या लोगों के साथ उनके लेन-देन और व्यवहार में उनकी अंतरात्मा कार्य कर सकती है। यदि किसी व्यक्ति की अंतरात्मा कार्य कर सकती है और उस पर संयम रख सकती है, तो वह स्वीकार्य है और उसके साथ मेल-जोल रखना सार्थक है। ऐसे लोगों को सुसमाचार का उपदेश दिया जा सकता है और सत्य पर संगति की जा सकती है। यदि वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं, तो उनके लिए उद्धार पाने की उम्मीद है। व्यापार करने का शौक होने के विषय पर हमारी चर्चा के लिए बस इतना ही।
कलाओं से प्रेम करना
चलो अब कलाओं से प्रेम करने पर एक नजर डालते हैं। जो लोग कलाओं से प्रेम करते हैं, उन्हें गाने, नाचने और वाद्य-यंत्र बजाने का जन्मजात शौक होता है और उन्हें उनका प्रदर्शन करने में भी आनंद आता है। जितने ज्यादा लोग होते हैं, वे उतने ही ज्यादा उत्साहित हो जाते हैं; वे हर व्यक्ति को खुश करने और सुकून पहुँचाने के लिए मसखरेपन से भरी बातें करना, प्रहसन करना, गीत गाना, नाचना या वाद्ययंत्र बजाना जैसी चीजें करते हुए थोड़ा-बहुत दिखावा करना चाहते हैं। कलाओं से प्रेम करना किस प्रकार की अभिव्यक्ति है? पहले, हमें यह देखना चाहिए कि कलाओं में सकारात्मक चीजें शामिल हैं या नकारात्मक। अगर तुम लोग इस बारे में स्पष्ट नहीं हो, तो मैं तुम लोगों से पूछता हूँ : क्या तुम लोगों को लगता है कि गाना और नाचना मानवता की वैध आवश्यकताएँ हैं? (हाँ।) वे मानवता की वैध आवश्यकताएँ हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि लोग अपने गायन, भाव-भंगिमा या किसी तरह के कलात्मक तरीके का उपयोग जीवन को मजेदार बनाने, जीवन का आनंद बढ़ाने या अपनी कोई मनोदशा व्यक्त करने के लिए करते हैं। क्या इसे वैध माना जा सकता है? (हाँ।) अब, चलो अपने मूल विषय पर लौटते हैं—कलाओं से प्रेम करना, गाना और नाचना पसंद करना, वाद्य-यंत्र बजाना और इनकी प्रस्तुति करना—इस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ किस श्रेणी के अंतर्गत आती हैं? (रुचियाँ और शौक के अंतर्गत।) चूँकि ये रुचियाँ और शौक हैं, तो ये किसके अंतर्गत आती हैं? (जन्मजात प्रवृत्तियों के अंतर्गत।) कुछ बच्चे पाँच-छह साल की उम्र से ही संगीत सुनना और नृत्य देखना पसंद करते हैं और जब वे संगीत की ताल सुनते हैं, तो उनके हाथ-पैर थिरकने लगते हैं और उन्हें नाचने की तीव्र इच्छा महसूस होती है। यह जन्मजात है। कुछ लोग गायन और नृत्य-संगीत सुनकर उसे सीखना चाहते हैं, लेकिन असमर्थ रहते हैं, यहाँ तक कि बीस-तीस साल की उम्र में भी नहीं सीख पाते। उनके लिए नृत्य सीखने का प्रयास करना बहुत ही कठिन होता है और इसमें वे विशेष रूप से अनाड़ी होते हैं। यह भी जन्मजात है। इसके विपरीत, जो लोग जन्मजात रूप से गाना और नाचना पसंद करते हैं, वे संगीत का बजना सुनते ही खुशी-खुशी नाचना शुरू कर सकते हैं। जब वे किसी को गाना गाते हुए सुनते हैं, तब वे उसके साथ-साथ गा सकते हैं और उससे सीख सकते हैं और बस कुछ ही बार अभ्यास करने के बाद वे उस गाने को खुद ही गा सकते हैं। यह साबित करता है कि इस तरह के लोगों के लिए ये चीजें जन्मजात होती हैं और ये उनके खून में होती हैं; वे दिल से इन चीजों को पसंद करते हैं और इनमें निपुण भी होते हैं। बिना किसी के सिखाए वे जानते हैं कि इन्हें कैसे करना है। कुछ ऐसे भी विशेष रूप से असाधारण लोग होते हैं जो महज सात-आठ साल की उम्र में ही किसी क्षेत्रीय ऑपेरा की कुछ पंक्तियाँ गा सकते हैं और उनके गाने में असली होने का वह एहसास होता है; वह एकदम सही सुर और सही लय में होता है—यह सचमुच दुर्लभ है! कुछ बच्चे तो कुछ पॉप गीत भी गा सकते हैं और कुछ बच्चे भारतीय नृत्य, शिनजियांग नृत्य या आधुनिक नृत्य जैसी शैलियों में नाच सकते हैं। जब वे नृत्य-गीत या संगीत सुनते हैं, तो उन्हें सहज रूप से पसंद करते हैं और उनके शरीर तुरंत ही संगीत की धुन पर थिरकना शुरू कर देते हैं। अगर तुम उन्हें गाने नहीं देते, तो वे छिप-छिपाकर मन ही मन गाते हैं या फिर कोई ऐसी जगह ढूँढ़ लेते हैं जहाँ वे ऊँची आवाज में गा सकें। वे बस गाना चाहते हैं और उन्हें गाना पसंद होता है और उन्हें कोई भी रोक नहीं सकता। न तो उनके माता-पिता का उन पर कोई प्रभाव पड़ा होता है, न ही किसी ने उन्हें सिखाया होता है। बचपन से ही उनमें ये खूबियाँ या शौक मौजूद होते हैं। यह स्पष्ट है कि यह एक जन्मजात स्थिति है—कलाओं में उनकी जन्मजात रुचि होती है। अगर उन बच्चों की कलाओं में रुचि है तो क्या उन्हें इस काम में लग जाना चाहिए—क्या उन्हें जीवन भर इसी उद्योग में काम करना चाहिए? यह जरूरी नहीं है। यह परमेश्वर के विधान पर निर्भर करता है, इस बात पर निर्भर करता है कि परमेश्वर कैसे अपनी संप्रभुता का इस्तेमाल और चीजों की व्यवस्था करता है। अगर परमेश्वर उनके लिए कलाओं में काम करने की व्यवस्था करता है तो वे अपनी पूरी जिंदगी इसी उद्योग से बँधे रहेंगे। लेकिन अगर परमेश्वर ने उनके लिए इस उद्योग में काम करने की व्यवस्था या विधान तय नहीं किया है तो उनके पास केवल यह रुचि और शौक होगा; और भले ही उन्हें इस काम में आनंद आता हो, उनके लिए इस काम में संलग्न होना संभव नहीं होगा। कुछ लोग बचपन से ही कलाओं को पसंद करते हैं। अपने बच्चे में यह रुचि और शौक देखकर उनके माता-पिता सोचते हैं, “चलो इसे विकसित करते हैं। मुमकिन है हमारे परिवार में कोई कलात्मक प्रतिभा पैदा हो जाए। शायद हमारा बच्चा मशहूर भी हो जाए और एक स्टार भी बन जाए!” इसलिए वे अपने बच्चे को नाचने-गाने की पढाई में विकसित करने लगते हैं और आखिरकार बच्चे का दाखिला एक कला अकादमी में हो जाता है। हालाँकि स्नातक होने के बाद भी कलाओं में बच्चे की रुचि और शौक मजबूत बना रहता है, फिर भी वह इस उद्योग में काम कर सकता है या नहीं, यह अनिश्चित रहता है। संभव है कि जब वह इस काम में संलग्न होने वाला हो तब उसका मन बदल जाए और फिर इस कार्य के प्रति उसका रवैया और दृष्टिकोण बदल जाए और यह भी संभव है कि वस्तुगत परिस्थितियों के भीतर विभिन्न कारणों से वह इस उद्योग का हिस्सा बनने से चूक जाए। ये सभी चीजें संभव हैं; यह परमेश्वर के पूर्व-निर्धारण पर निर्भर करता है। लेकिन अगर इसे इसकी मूल वजह से देखें, तो बच्चे की रुचि और शौक उसकी जन्मजात स्थिति होती है—उसके पैदा होने से भी पहले परमेश्वर ने उसके लिए यह खूबी व्यवस्थित कर दी थी और उसकी मानवता में कुछ खास गुण जोड़ दिए थे, जिससे वह जन्मजात रूप से संगीत, नृत्य और कला के दूसरे पहलुओं के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील और उनमें निपुण बन जाता है। इस तरह वह अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में गाने और नाचने के प्रति एक खास लगाव प्रकट करता है। चाहे उसका व्यक्तित्व जिंदादिल हो या शर्मीला, चाहे उसे बात करना पसंद हो या बात करना पसंद न हो, हर हाल में, उसकी रग-रग में कुछ ऐसा गहरा बसा होता है जिसे मिटाया नहीं जा सकता—उसे गाना पसंद होता है, नाचना पसंद होता है और इसकी प्रस्तुति देना पसंद होता है। कुछ लोग भले ही गाते समय बेहद ऊर्जावान हो जाते हों और अपनी आत्मा में मुक्ति की भावना महसूस करते हों, फिर भी जब तुम उनसे बात करते हो तब वे बहुत शर्मीले होते हैं और वे खुद को व्यक्त करने या लोगों से घुलने-मिलने में माहिर नहीं होते। दूसरों के साथ मेल-जोल रखते समय वे विशेष रूप से अकड़े हुए और तनावग्रस्त रहते हैं, यहाँ तक कि घबराए और डरे हुए भी होते हैं, वे नहीं जानते कि इन स्थितियों से कैसे निपटें। लेकिन जब वे प्रस्तुति देने के लिए मंच पर कदम रखते हैं, तो वे ऐसा बड़ी आसानी से कर लेते हैं; ऐसा लगता है मानो वे कोई अलग इंसान बन गए हों। गैर-विश्वासी कहते हैं कि यह उनके क्षेत्र का “संरक्षक देवता” है जो उन्हें रोजी-रोटी कमाने की यह क्षमता देता है—क्या यह सही है? असल में, यह परमेश्वर का विधान है। किसी व्यक्ति में कौन-सी खूबियाँ, रुचियाँ और शौक जन्मजात होते हैं, यह परमेश्वर की पूर्वनियति से जुड़ा होता है। व्यक्ति में जो भी खूबियाँ और शौक होते हैं, वे सभी परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत होते हैं। अगर परमेश्वर तुम्हें कोई रुचि और शौक देता है, तो तुम उसे अपने दिल की गहराइयों से पसंद करते हो और उसकी सराहना करते हो और उसके प्रति विशेष रूप से जुनूनी महसूस करते हो। जब तुम इस काम में लगते हो या इस काम से जुड़ा हुआ कुछ करते हो, तब तुम अंदर से विशेष रूप से शांति और सुकून महसूस करते हो और तुम्हें उसमें खास दिलचस्पी भी होती है। इसलिए, अगर तुममें किसी तरह की कोई खूबी है, तो जब परमेश्वर के घर के कार्य को उसकी जरूरत होती है, तब तुम्हें वह संबंधित कर्तव्य करना चाहिए। तुम्हारे लिए यह अपनी खूबी का इस्तेमाल करने का सबसे अच्छा मौका है। इसी तरह, चूँकि यह खूबी तुम्हें परमेश्वर ने दी है, इसलिए यह तुम्हारी निजी संपत्ति नहीं है; तुम इसका अपनी मर्जी से गलत इस्तेमाल नहीं कर सकते। जब परमेश्वर के घर के कार्य को इसकी जरूरत हो, तब तुम्हें इसे इस्तेमाल में लाना चाहिए और परमेश्वर को अर्पित करना चाहिए, अपने कर्तव्य में इसका उपयोग करना चाहिए। यह तुम्हारे लिए उद्धार पाने की एक अनुकूल स्थिति है और यह एक बेहतरीन अवसर भी है जो परमेश्वर ने तुम्हें दिया है—तुम्हें बिना किसी हिचकिचाहट के इसे अच्छी तरह से इस्तेमाल में लाना चाहिए और इसे अच्छे से लागू करना चाहिए। इस तरह, एक ओर तो तुम अपनी खूबी का इस्तेमाल कर पाओगे और दूसरी ओर, तुम परमेश्वर के प्रेम का आभार चुकाने का अपना कर्तव्य भी पूरा कर पाओगे। क्या यह बढ़िया नहीं है? (हाँ, है।)
परमेश्वर ने लोगों को कुछ खास तरह की खूबियाँ दी हैं और चाहे प्राचीन काल हो या आधुनिक काल, इनमें से एक—कला—को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया और इसे हमेशा निम्न वर्गों की चीजों में सूचीबद्ध किया गया है। विशेष रूप से, कुछ अपेक्षाकृत परंपरागत और सामंती सामाजिक परिवेशों में तमाम लोग कलाओं को हमेशा गलत परिप्रेक्ष्य से देखते हैं और कुछ लोग कलाओं के साथ हमेशा भेदभाव करते हैं। लोगों के बीच कलाओं को इसी तरह से निरूपित किया जाता है और उनका यह दर्जा, रुतबा या परिभाषा लोगों की धारणाओं, उनके सामंती विचारों या उन विकृत और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों के कारण है जिन्हें शैतान लोगों के मन में डालता है। एक और कारक भी है, वह यह कि बुरे समाज और बुरी प्रवृत्तियों के प्रभाव के कारण इस उद्योग में एक बुरा माहौल बन गया है, इसलिए लोग कला-उद्योग का खराब आकलन करते हैं। इस उद्योग से जुड़े कुछ लोगों ने कलाओं में अपनी रुचियों और खूबियों का उपयोग कई नकारात्मक और दुष्टतापूर्ण चीजें करने के लिए किया है, जिन्होंने कलाओं को बदनाम किया है और कलाओं की प्रकृति को विकृत कर दिया है। नतीजतन, लोगों ने कला-जगत के बारे में कई नकारात्मक राय विकसित कर ली हैं और वे उन लोगों को, जो कलाओं के क्षेत्र में काम करते हैं या जिनकी इस क्षेत्र में रुचि और शौक हैं, नकारात्मक व्यक्ति समझते हैं। लेकिन, समाज और मानवजाति इस प्रकार की खूबी को चाहे जिस भी नजर से देखें, संक्षेप में, अगर कोई व्यक्ति—चाहे वह परमेश्वर के घर का सदस्य हो या परमेश्वर के घर के बाहर का व्यक्ति—इस क्षेत्र में कोई खूबी या रुचि और शौक रखता है, तो इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यह खूबी और शौक जन्मजात स्थितियाँ हैं। ठीक इसी कारण से कि चूँकि ये जन्मजात स्थितियाँ हैं, इसलिए ये न तो नकारात्मक हैं और न ही दुष्टतापूर्ण। केवल कुछ विशेष युगों में कुछ गलत विचारों और सिद्धांतों के निर्देशन के कारण ही कलाओं और उनसे जुड़े लोगों को दुष्ट और नकारात्मक चीजों के रूप में निरूपित किया गया है। यह ऐसी चीज है जो पूरे इतिहास में बार-बार घटित हुई है। यह ठीक वैसा ही है जैसे सोयाबीन से सुगंधित टोफू बनाया जा सकता है जिसे लोग चाव से खाते हैं, लेकिन उसे फफूँद जैसे सूक्ष्मजीवों के साथ किण्वित करके बदबूदार टोफू भी बनाया जा सकता है। सिर्फ इसलिए कि तुम बदबूदार टोफू खाना पसंद नहीं करते, तुम यह नहीं कह सकते कि सोयाबीन खराब है। क्या यह तार्किक विचार सही है? (नहीं।) यह स्पष्ट रूप से गलत है; यह विकृत है। इसलिए, भले ही समाज में कला-समूहों के भीतर कुछ गंदी और कुरूप चीजें हैं, फिर भी तुम यह नहीं कह सकते कि कलाएँ अपने आप में गंदी, कुरूप और नकारात्मक हैं और यह तो तुम बिल्कुल भी नहीं कह सकते कि जो लोग कलाओं को पसंद करते हैं और उनमें कुशल हैं, वे सभी दुष्ट और कुरूप नकारात्मक व्यक्ति हैं। यह गलत तर्क है; यह सही समझ नहीं है। चूँकि उनमें से कुछ लोग दुष्ट हैं, अगर तुम यह कहते हो कि जिन कलाओं में वे निपुण हैं, वे भी दुष्टतापूर्ण हैं, तो यह एक बहुत बड़ी गलती है। परमेश्वर लोगों को जो विभिन्न खूबियाँ प्रदान करता है, उनका उद्देश्य मानव जगत की सेवा करना है। अगर मानवजाति का कोई सांस्कृतिक जीवन न होता, तो वह अत्यंत नीरस होता। परमेश्वर द्वारा लोगों के लिए सांस्कृतिक जीवन की व्यवस्था करना कोई गलत बात नहीं है। वे सभी दुष्टतापूर्ण चीजें दानवों और शैतान के कारण उत्पन्न होती हैं, जो अवसर का लाभ उठाकर गड़बड़ियाँ पैदा करते हैं। हालाँकि, पूर्ण मानवजाति की तुलना में—वह मानवजाति जिसे अंततः पूर्ण बनाया जाएगा—परमेश्वर द्वारा रचित यह वर्तमान मानवजाति अभी पूर्ण नहीं है और इसमें कुछ कमियाँ हैं, फिर भी इसका यह अर्थ नहीं कि परमेश्वर द्वारा रचित यह मानवजाति दुष्ट या नकारात्मक है—ये दोनों भिन्न संकल्पनाएँ हैं। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) चाहे यह दुष्ट युग और दुष्ट संसार कलाओं को और गायन और नृत्य में रुचियों, शौकों या खूबियों को किसी भी स्थान पर क्यों न रखे, फिर भी किसी भी सूरत में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि ये मानवजाति की आवश्यकताएँ हैं और ये कुछ विशेष लोगों की निजी रुचियाँ और शौक भी हैं। चूँकि ये रुचियाँ और शौक हैं, इसलिए ये लोगों में जन्मजात होते हैं और ये ऐसी चीजें हैं जिनके साथ लोग जन्म लेते हैं, जिसका अर्थ है कि ये परमेश्वर से आते हैं और परमेश्वर द्वारा दिए जाते हैं। लोगों के जन्म लेने से भी पूर्व ही परमेश्वर वह व्यवसाय पहले ही निर्धारित कर चुका होता है जिसमें उनमें से प्रत्येक व्यक्ति संलग्न होगा : कुछ लोग व्यवसाय करने के लिए वाणिज्य की श्रेणी में रखे जाते हैं, कुछ श्रमिक बनने के लिए कारखानों में रखे जाते हैं, कुछ खेती करने के लिए कृषि में रखे जाते हैं, कुछ शिक्षक बनने के लिए शिक्षा में रखे जाते हैं और कुछ कलाकार बनने के लिए कलाओं में रखे जाते हैं। परमेश्वर ने लोगों के जन्म से पहले ही उनमें विभिन्न प्रकार की खूबियाँ डाल दी होती हैं। यानी हर व्यक्ति के दैहिक जीवन में उसकी रुचियाँ, शौक और खूबियाँ अलग होती हैं। तुम्हारे जन्म लेने से पहले ही परमेश्वर ने तुममें कुछ खास और अलग चीजें जोड़ दी थीं। अगर तुममें रुचियाँ, शौक या खूबियाँ नहीं हैं, तो तुम्हें यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि परमेश्वर ने तुममें ये चीजें नहीं जोड़ीं। इनके बिना भी तुम जी सकते हो और अपना कर्तव्य कर सकते हो। दूसरों के मुकाबले तुममें किसी चीज की कमी नहीं है, क्योंकि कर्तव्य करने का जो मौका दूसरों को मिलता है, वही मौका तुम्हें भी मिलता है। तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव भी वैसे ही हैं जैसे दूसरों के होते हैं; बस लोगों की जन्मजात स्थितियाँ अलग-अलग होती हैं—हर व्यक्ति की अपनी खूबियाँ और कमजोरियाँ होती हैं। तो मुख्य बात क्या है? मुख्य बात मानवता में अंतर की है। जिस व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों के भीतर कुछ खास रुचियाँ, शौक और खूबियाँ होती हैं, वह कोई खास प्रतिभाशाली व्यक्ति नहीं होता और जिस व्यक्ति की जन्मजात स्थितियों के भीतर कोई रुचि, शौक या खूबी नहीं होती, वह किसी तरह का औसत व्यक्ति नहीं होता। हर कोई कमोबेश एक जैसा ही होता है। बात बस इतनी है कि परमेश्वर तुम्हें जो कुछ भी देता है, वह तुमसे उसी की अपेक्षा करता है और तुम्हें अपने कर्तव्य में उसका इस्तेमाल करना चाहिए, जो कुछ वह तुम्हें नहीं देता, उसकी अतिरिक्त अपेक्षा वह तुमसे नहीं करता। भले ही परमेश्वर ने तुम्हें रुचियाँ और शौक या खूबियाँ न दी हों, फिर भी तुम्हारी मानवता के भीतर मौजूद विभिन्न चीजें या स्थितियाँ तुम्हारे लिए कोई काम करने या कोई कर्तव्य करने के लिए काफी हैं। अगर तुम उसे नहीं कर पाते, तो हो सकता है कि तुम उन लोगों की श्रेणियों से बाहर हो जो कर्तव्य करते हैं और यह पूरी तरह से दूसरा मामला होगा।
कलाओं से प्रेम करने के विषय पर हमारी चर्चा यहीं समाप्त होती है। इस प्रकार की खूबी का निरूपण अब तुम्हें स्पष्ट हो जाना चाहिए। ऐसा मत सोचो कि जो लोग कलाओं से प्रेम करते हैं, वे अजीब या दुष्ट होते हैं। अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो तुम्हारी समझ बहुत ही विकृत है। तुम्हें ऐसे लोगों के साथ सही तरीके से व्यवहार करना चाहिए, उनके साथ सही ढंग से मेलजोल करनी चाहिए और उन्हें उन पेशेवर तकनीकों का उपयोग अपने कर्तव्यों में करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए जिनमें वे कुशल हैं और जिन्हें वे समझते हैं। अगर तुम एक अगुआ या कार्यकर्ता हो, तो तुम्हें ऐसे लोगों द्वारा अपनी खूबियों का उपयोग करने में मदद करने, मार्गदर्शन देने और दिशानिर्देश देने के लिए सही तरीके का इस्तेमाल करना सीखना होगा, ताकि वे सही राह पर आ सकें और अपनी रुचियों और शौकों से संबंधित कोई कर्तव्य निभा सकें और इस तरह मानक के अनुरूप सृजित प्राणी बन सकें और परमेश्वर द्वारा दी गई विभिन्न रुचियों, शौकों और खूबियों के योग्य बन सकें। अगर वे अपनी रुचियों और शौकों से संबंधित कोई कर्तव्य नहीं निभा पाते हैं, तो उनका कोई अन्य कर्तव्य निभाना भी ठीक है। हालाँकि, उन्हें अपनी निजी रुचियाँ और शौक रखने से रोका नहीं जाना चाहिए, क्योंकि यह मानवता का एक भाग है।
इसी पर मुझे एक बात याद आ रही है—अभी-अभी परमेश्वर के घर में कुछ नए गायकों ने गाने रिकॉर्ड किए हैं। पूरी लगन से पेशेवर ज्ञान हासिल करने और गाने का अभ्यास करने के बाद ये नए गायक आखिरकार मुकम्मल गाने रिकॉर्ड करने में सक्षम रहे हैं, जहाँ वे अब तक परदे के पीछे काम कर रहे थे, वहीं अब मुख्य मंच पर आकर प्रस्तुति दे रहे हैं। भले ही उनका गायन पेशेवर मानक से थोड़ा कम हो और अभी तक पेशेवर गायकों के स्तर तक न पहुँचा हो और उसमें सुधार की गुंजाइश हो—उनमें से कुछ बिना ज्यादा अनुभवजन्य कौशल के गाते हैं, कुछ गायकों की आवाज उतनी सुरीली नहीं है और उनकी प्रस्तुति आँखों को उतनी सुखद नहीं लगती है—फिर भी, अपना कर्तव्य निभाने के प्रति उनका रवैया प्रोत्साहन के योग्य है। एक शौकिया गायक से आगे बढ़कर एक नौसिखिया गायक, एक अनुभवहीन गायक के तौर पर परदे पर आना एक ऐसी चीज है जो प्रोत्साहन के योग्य है। तो इस मामले में मैं तुम लोगों से क्या कहना चाहता हूँ? यही कि जब इन नए गायकों द्वारा रिकॉर्ड किए गए भजन के वीडियो इंटरनेट पर अपलोड किए जाएँ, तो तुम लोगों को उन्हें थोड़ा प्रोत्साहन देना चाहिए। तुम कुछ अच्छे सुझाव भी दे सकते हो जिनसे उन्हें फायदा हो सके, लेकिन उनमें नुक्स मत निकालो, उन्हें अपमानजनक तरीके से नीचा मत दिखाओ और उनकी हद से ज्यादा आलोचना मत करो। यह रवैया ठीक नहीं है; कम से कम, इसमें प्रेम और सहनशीलता की कमी है और यह वह रवैया नहीं है जो किसी को अपने भाई-बहनों के प्रति रखना चाहिए। तो फिर उनके साथ व्यवहार करने का सही तरीका क्या है? तुम्हें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए और उनका हौसला थोड़ा बढ़ाना चाहिए और फिर उन्हें कुछ सही सुझाव देने चाहिए; केवल यही उनके लिए फायदेमंद है। कम से कम उनमें मंच पर खड़े होने और परमेश्वर की स्तुति में भजन गाने का साहस तो है, जो परमेश्वर के चुने हुए लोगों के लिए फायदेमंद है। इसलिए, हर किसी को उनका अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने में मदद करनी चाहिए और हर किसी को बिल्कुल भी गैर-जिम्मेदाराना टिप्पणियाँ नहीं करनी चाहिए और न ही उनसे ईर्ष्या करनी चाहिए। हमें खुश और प्रसन्न होना चाहिए कि परमेश्वर के घर में ऐसे और भी लोग हैं जिनमें गाने की प्रतिभा है—यह एक अच्छी बात है। जिन लोगों में इस क्षेत्र में खूबियाँ हैं, उन सभी को उनका इस्तेमाल करने दिया जाना चाहिए; उन सभी को अवसर दिए जाने चाहिए। उनमें खुद ज्यादा आत्मविश्वास नहीं होता और उनकी जो थोड़ी-बहुत रुचियाँ और शौक होते हैं, उन्हें पूरा करने का उनके पास कोई जरिया नहीं होता। अगर उनमें इस कर्तव्य को अच्छी तरह से करने की इच्छा है और उन्होंने भजन के वीडियो रिकॉर्ड किए हैं, तो उन्हें देखकर तुम्हें कम से कम दो-तीन बार उन्हें सुनना चाहिए—ध्यान से और गौर से सुनो—और उन्हें कुछ प्रोत्साहन दो। उनकी पीठ पीछे उन्हें कमजोर मत करो। तुम्हें दूसरे भाई-बहनों से कहना चाहिए कि वे उनके गाए हुए गीत ज्यादा सुनें और उन्हें ज्यादा लाइक दें। उनमें से कुछ लोग सच्ची भावना के साथ बहुत अच्छा गाते हैं, हर पंक्ति बहुत स्पष्ट रूप से बोलते हैं; उनका पहनावा और चाल-ढाल गरिमापूर्ण और उचित होता है, जिससे वे दूसरों को सही लगते हैं। हालाँकि, दूसरों की आवाज और तकनीकी परिपक्वता में थोड़ी कमी हो सकती है। अगर तुम्हें संगीत के बारे में थोड़ी जानकारी है और तुम कमियाँ पकड़ सकते हो, तब भी उनका मजाक मत उड़ाओ; उनके साथ सही तरीके से पेश आओ, उन्हें प्रोत्साहित करो और समर्थन दो। परिवार के सदस्य के तौर पर, एक भाई या बहन के तौर पर तुम्हारा यही रवैया होना चाहिए। बुरे लोगों की नकल करके ऐसी चीजें मत करो जो दूसरों को छोटा दिखाती हों या दूसरों को नीचा दिखाती हों। अगर तुम खुद मंच पर नहीं जा सकते, लेकिन जब कोई और जाता है, तो तुम ईर्ष्यालु हो जाते हो, उसे कमजोर करते हो और उसकी पीठ पीछे क्षुद्र टिप्पणियाँ करते हो, तो यह मानवता की कमी है। इस तरह आचरण करना अच्छा नहीं है—यह घिनौना है। अगर तुम उसकी कमियाँ पकड़ सकते हो, तब भी तुम्हें उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। तुम्हें ऐसा इसलिए करना चाहिए क्योंकि वे भाई-बहन हैं—वे पेशेवर नहीं हैं, न ही उन्होंने पेशेवर प्रशिक्षण लिया है—और जिस तरह से वे अभी गा पा रहे हैं, वह विशुद्ध रूप से उनके अपने अन्वेषण, अभ्यास और कड़ी मेहनत का नतीजा है। तो फिर उन्हें प्रोत्साहित क्यों न करें? अगर तुम प्रोत्साहित करना और सहनशील होना सीख जाते हो और उनके गाने में कुछ कमियाँ देखने के बाद भी उनके साथ प्यार और सहनशीलता के साथ सही तरीके से पेश आते हो, तो यह दर्शाता है कि तुममें मानवता है। कुछ लोग हमेशा परमेश्वर के घर के गायकों की तुलना गैर-विश्वासी दुनिया के पेशेवर गायकों से करते हैं और इसलिए परमेश्वर के घर के गायकों को नीची निगाह से देखते हैं और यहाँ-वहाँ नुक्स निकालते हैं। यह मानवता की कमी है। अगर तुम हमेशा दूसरों की कमियाँ निकालते हो और हमेशा सोचते हो कि तुम दूसरों से बेहतर और श्रेष्ठ हो, तो फिर तुम ऐसा गीत क्यों नहीं गा सकते जो लोगों को भावविभोर कर दे? दूसरों में नुक्स मत निकालो। कलीसिया में गाने वाले गायक पेशेवर पृष्ठभूमियों से नहीं आते, लेकिन एक चीज है जो उनके बारे में खास है : यह काम करते समय वे कोई करियर नहीं बना रहे होते—वे अपना कर्तव्य कर रहे होते हैं। उनका कर्तव्य अपनी आवाज का इस्तेमाल करके परमेश्वर के वचनों को गाना और परमेश्वर के वचनों की गवाही देना और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना है। इसलिए तुम्हें उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। क्या ऐसा करना अच्छी बात नहीं है? (हाँ, है।) यही मानवता का होना है। जब तुम किसी नए गायक को गाते हुए सुनो, तो यह कहते हुए उसमें नुक्स मत निकालो, “इस व्यक्ति की आवाज अच्छी नहीं है। यह परिष्कृत नहीं है। यह ताल से भटक रहा है और इसका सुर भी सही नहीं लग रहा है—मैं तो नहीं सुनूँगा! किसी को भी इसे नहीं सुनना चाहिए और किसी को भी इसे लाइक नहीं देना चाहिए!” इस मामले में तुम इतने नुकताचीन क्यों हो रहे हो? थोड़ा-बहुत बेसुरा गाना, बिना किसी मँजे हुए हुनर के गाना या गैर-पेशेवर ढंग से गाना—क्या यह सत्य सिद्धांतों के खिलाफ है? यह सत्य सिद्धांतों के खिलाफ नहीं है। वे अपना कर्तव्य निभा रहे हैं, इसलिए तुम्हें उनके गायन को कर्तव्य करने के सिद्धांतों के अनुसार मापना चाहिए, न कि अपनी रुचियों और परिप्रेक्ष्यों के आधार पर। साफ-साफ कहूँ तो—तुम जानते ही क्या हो? अगर तुम गायन के बारे में इतना ही जानते हो, तो तुमने एक भी गाना अनुकरणीय मानक के अनुरूप क्यों नहीं गाया है? चूँकि तुमने अनुकरणीय मानक के अनुरूप नहीं गाया है, इसलिए तुम्हें दूसरों की आलोचना करने का कोई अधिकार नहीं है। बेशक, अगर तुम अनुकरणीय मानक के अनुरूप भी गा सको, तब भी तुम्हें दूसरों की आलोचना नहीं करनी चाहिए। उनके द्वारा इस कार्य का निष्पादन अपने आप में कला-उद्योग में संलग्न होना या कलाओं में काम करना नहीं है—यह एक कर्तव्य करना और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना है, जिसकी प्रकृति भिन्न है। चाहे वे अच्छा गाते हों या नहीं, वे जो कुछ भी कर रहे हैं उसे पूरे दिल से कर रहे हैं—वे अपना कर्तव्य कर रहे हैं। जहाँ तक उनके पेशेवर स्तर की बात है, तो वह अलग मामला है। पेशेवर मानक पर तो सीखने और लंबे समय तक अभ्यास करने के माध्यम से धीरे-धीरे ही पहुँचा जा सकता है। परमेश्वर के घर में जो नए गायक हैं, वे अभी उसी स्तर पर हैं। लोगों को उनके साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए—हर किसी को उन्हें प्रोत्साहन और सहयोग देना चाहिए। उनमें नुक्स मत निकालो और न ही खुद पर इतराओ। अगर तुम खुद पर इतराओगे, तो तुम लोगों को घिनौने लगोगे। अगर तुम खुद पर इतराते नहीं हो और कुछ और बार सुनते हो, तो लोग तुम्हें बहुत अच्छा इंसान समझेंगे, ऐसा इंसान जिसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल है, जिसका दिल परमेश्वर के घर के साथ है और जिसमें सहनशीलता है, तब यह तुम्हारी मानवता का एक मजबूत बिंदु, एक गुण होगा। अगर तुम ऐसा करते हो, तो लोग तुम्हें पसंद करेंगे और परमेश्वर भी तुम्हें पसंद करेगा। अगर तुम दिखावा करते हो, हमेशा दूसरों की गलतियाँ निकालकर यह दिखाते हो कि तुम मेधावी और विशेषज्ञ हो, तो तुम परमेश्वर के घर के कार्य को कमजोर करते हो और उसमें गड़बड़ी पैदा करते हो। अगर तुम कार्य को कमजोर करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें पसंद करेगा? (नहीं।) परमेश्वर तुम्हें पसंद नहीं करेगा और भाई-बहन भी तुम्हें पसंद नहीं करेंगे। गायकों ने तुम्हें कैसे नाराज किया है? तुम्हें इस तरह दिखावा करने और उन्हें नीचा दिखाने की क्या जरूरत है? क्या तुम सिर्फ एक इंसान को कमजोर कर रहे हो? नहीं, तुम परमेश्वर के घर के कार्य को कमजोर कर रहे हो, तुम परमेश्वर को कमजोर कर रहे हो। अगर तुम ऐसा करते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें पसंद करेगा? अगर तुम्हें उनके गाए गानों में कुछ कमियाँ नजर आती भी हैं, तब भी तुम्हें उनकी आलोचना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि किसी भी विशेषीकृत काम में पेशेवर मानक तक पहुँचना कोई एक रात में होने वाली चीज नहीं है। यह आसान नहीं है—इसके लिए हुनर को सान पर चढ़ाने और अभ्यास करने और विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेने की जरूरत होती है; इसके अलावा, हर किसी के अपने अलग रुझान होते हैं। यहाँ तक कि परमेश्वर भी उनसे पेशेवर मानक के आधार पर अपेक्षाएँ नहीं करता, तो फिर तुममें ऐसी क्या योग्यता है जो तुम उनसे ऐसी अपेक्षा करते हो? हमेशा दूसरों से यह माँग करना कि वे एक खास स्तर तक पहुँचें, तर्कसंगत नहीं है; यह अहंकार है और दिखावा करना है। जब दूसरे लोग आगे बढ़ते हैं, तो तुम दिल में परेशान हो जाते हो और बेहद ईर्ष्यालु हो जाते हो, अपने मिथ्याभिमान को संतुष्ट करने के लिए हमेशा कुछ ताने मारना या कड़वे बोल बोलना चाहते हो। ऐसा करना कितना नीच काम है! यह घिनौना और नीच काम है और ऐसे व्यक्ति के पास जमीर और विवेक नहीं होता। तुम्हें ऐसी चीजें करनी चाहिए, जो दूसरों के लिए लाभदायक हों, ऐसी चीजें जो दूसरों की सराहना के योग्य हों और जिन्हें परमेश्वर भी याद रखे। ऐसी चीजें मत करो, जो दूसरों को कमजोर करें। क्या तुम इसे याद रखोगे? (हाँ।) अगर तुम सहनशील, मददगार और उत्साहवर्धक नहीं हो सकते और कलीसिया के कार्य की रक्षा और सुरक्षा के लिए आगे नहीं आ सकते, अगर तुममें इस मानवता की कमी है, तो कम से कम ऐसी चीजें मत करो और मत कहो जो दूसरों को कमजोर करें। यह वह न्यूनतम चीज है जो की जानी चाहिए—यह सीमा है।
सितारों को आदर्श मानने को पसंद करना
हमने कलाओं से प्रेम करने पर चर्चा पूरी कर ली है। अब, आओ मशहूर हस्तियों के निजी मामलों में दिलचस्पी लेना पसंद करने के बारे में बात करते हैं। कुछ लोग मशहूर हस्तियों, सितारों के निजी मामलों में दिलचस्पी लेना बहुत पसंद करते हैं—जैसे कि मशहूर हस्तियाँ क्या खाती हैं, क्या पहनती हैं, मौज-मस्ती के लिए कहाँ जाती हैं, क्या उन्होंने कॉस्मेटिक सर्जरी करवाई है, वे रूमानी तौर पर किसके साथ जुड़ी हैं, विपरीत लिंग के उनके कौन-से दोस्त हैं, उनके यौन साथी कौन हैं, यहाँ तक कि उनके कितने नाजायज बच्चे हैं और किन बड़े अधिकारियों या अमीर लोगों के साथ उनके करीबी संबंध हैं। ऐसे लोग मशहूर हस्तियों के इन निजी मामलों में बहुत ज्यादा दिलचस्पी रखते हैं। वे न केवल मशहूर हस्तियों के निजी मामलों में दिलचस्पी लेते हैं, बल्कि उनकी रोजमर्रा की जीवनशैली संबंधी पसंद, बोलचाल और व्यवहार और जिंदगी के प्रति उनके रवैये की नकल करना भी विशेष रूप से पसंद करते हैं। साथ ही, वे उनके ठौर-ठिकाने और उनके विभिन्न विचारों और दृष्टिकोणों का अनुसरण करना भी पसंद करते हैं। उदाहरण के लिए, अगर किसी मशहूर हस्ती को किसी खास तरह का पालतू कुत्ता पालना पसंद है, तो वे भी वैसा ही कुत्ता पालते हैं। अगर कोई मशहूर हस्ती बाजार में खास तौर से मशहूर किसी खास ब्रांड के कपड़े पहनती है, तो वे भी वही कपड़े खरीदेंगे। अगर वे उन्हें खरीद नहीं सकते, तो वे इसके बजाय उनकी सस्ती नकल खरीद लेते हैं। अगर कोई मशहूर हस्ती किसी खास कॉस्मेटिक उत्पाद का इस्तेमाल करती है, तो वे भी खुद को सुंदर दिखाने के लिए उसे खरीदेंगे, भले ही वे कड़के हों और उसे खरीदने के लिए उन्हें अपनी किडनी या खून तक बेचना पड़े। वे मशहूर हस्तियों का पीछा करते हुए वहाँ भी पहुँच जाते हैं जहाँ वे परफॉर्म करते हैं, प्रेस कॉन्फ्रेंस करते हैं या फिल्म और टीवी रिलीज कार्यक्रमों में शामिल होते हैं। वे जिस मशहूर हस्ती को फॉलो करते हैं, उसकी हर बात, हर क्रियाकलाप, हर कदम और हर गतिविधि पर ध्यान देंगे और उसकी खोज-खबर रखेंगे और दीवानगी की उस हद तक पहुँच जाएँगे जहाँ उनकी अपनी कोई जिंदगी नहीं रह जाती या उनके अपने सही विचार, दृष्टिकोण और जीवनशैली नहीं रह जाती, जहाँ वे पूरी तरह से उस मशहूर हस्ती के विचारों, दृष्टिकोणों और जीवनशैली से गुमराह और नियंत्रित होने लगते हैं। यह किस तरह की समस्या है? क्या यह जन्मजात स्थिति है? (नहीं।) क्या इसका उस सामाजिक परिवेश से कोई लेना-देना है जिसमें आज लोग रहते हैं? (हाँ।) इसका थोड़ा-बहुत संबंध है। तो इस तथ्य के बावजूद कि सभी लोग एकसमान परिवेश में रहते हैं, ऐसा क्यों है कि हमेशा लोगों का एक खास समूह ही सितारों को आदर्श मानता है, हर व्यक्ति नहीं? इसका संबंध किस चीज से है? क्या तुम कहोगे कि जो लोग सितारों को आदर्श मानते हैं, वे कलाओं से प्रेम करते हैं? यह जरूरी नहीं है। क्या वे कलाओं में माहिर होते हैं? यह भी जरूरी नहीं कि सच हो। लेकिन वे जो चीजें करते हैं, वे कला-जगत के लोगों और कलात्मक प्रवृत्तियों से जुड़ी होती हैं। यह किस तरह की समस्या है? क्या यह भ्रष्ट स्वभावों की समस्या है? यह असल में भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा ही है। ऐसे लोग बुराई को पूजते हैं और बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हैं। तो क्या ऐसे लोगों की मानवता में कोई समस्या होती है? (हाँ।) जब जिंदगी में चुनने के लिए इतने सारे मार्ग हैं, तो वे ऐसा मार्ग क्यों चुनते हैं? क्या इसमें चरित्र का मामला शामिल है? (हाँ।) कुछ लोग कहते हैं : “यह मानवता का दोष है। यह जन्मजात भोला और मूर्ख होना और आसानी से दूसरों के बहकावे में आ जाना है।” क्या यही कारण है? (नहीं।) दूसरे लोग कहते हैं : “क्या ऐसा इसलिए है कि सितारों को आदर्श मानने वाले ज्यादातर लोग युवा, अपरिपक्व और सतही होते हैं, जो इन सामाजिक प्रवृत्तियों के प्रलोभन से बच नहीं पाते?” क्या ऐसा इसलिए है कि वे युवा हैं? (नहीं।) सितारों को आदर्श मानने वाले कुछ लोग अधेड़ उम्र के या बुजुर्ग भी होते हैं—इस समूह में हर उम्र के लोग शामिल होते हैं। इसे देखते हुए, सितारों को आदर्श मानने वाले ये लोग इन सामाजिक प्रवृत्तियों से इसलिए गुमराह नहीं होते कि वे युवा और अपरिपक्व हैं और अभी जिंदगी के मामले नहीं समझते। इसलिए, यह दावा कि “सितारों को आदर्श मानने वाले सभी लोग युवा और अपरिपक्व होते हैं,” सही नहीं है। चूँकि यह युवा और अपरिपक्व होने की वजह से नहीं है, इसलिए यह मानवता की समस्या है। तो यह मानवता की क्या समस्या है? क्या यह सही कामों में न लगना है? (हाँ।) एक ओर यह सही कामों में न लगना है; दूसरी ओर यह थोड़ा छिछोरा होना और उचित दायरों के भीतर न रहना है। यह और क्या है? (सही मार्ग पर न चलना।) यह सही है—यह सही मार्ग पर न चलना है। इसमें उस मार्ग का मुद्दा शामिल है जिसे कोई व्यक्ति अपनाता है। वयस्क होने के बाद व्यक्ति किस कारोबार में लगता है और इस समाज में और लोगों के बीच अनुसरण के लिए किस तरह का मार्ग चुनता है, यह एक जरूरी सबक है जो हर व्यक्ति के सामने होता है। क्या वे अपने स्थान पर बने रहते हैं और सही तरीके से अपना जीवन जीते हैं, क्या वे सही कारोबार करते हैं और क्या वे सही काम करते हैं और सही मार्ग पर चलते हैं—यह सब इस बात पर निर्भर करता है कि वे अपनी मानवता के भीतर किसे पसंद करते हैं और किसका अनुसरण करते हैं। सभी क्षेत्रों के लोगों को देखो—कुछ लोग मार्शल आर्ट्स का अभ्यास करते हैं, कुछ स्वस्थ जीवन जीने के बारे में सीखते हैं, कुछ प्रौद्योगिकी उद्योग में काम करते हैं, कुछ फैशन उद्योग में लगे हैं, कुछ फिल्म और टेलीविजन उद्योग में संलग्न हैं, कुछ व्यवसाय करते हैं और कुछ राजनीति में शामिल हो जाते हैं; वहीं कुछ बौद्ध धर्म में विश्वास करते हैं, कुछ ताओवादी धर्म अपनाते हैं और कुछ लोग परमेश्वर में विश्वास करना चुनते हैं। कुछ लोगों के पास कोई सही पेशा नहीं होता, न ही वे जीवन में अपने लक्ष्य तलाशते हैं—वे हर रोज बस सितारों को आदर्श मानने पर ध्यान केंद्रित करते रहते हैं। वे किस हद तक ऐसा करते हैं? इस हद तक कि उन्हें खाने-पीने की भी सुध नहीं रहती। जिस सितारे को वे आदर्श मानते हैं, अगर वह उनके सपनों का प्रेमी या प्रेमिका हो, तो वे किसी भी समय अपने जीवनसाथी को भी छोड़ सकते हैं। अगर ये लोग सितारों को दीवानगी की हद तक आदर्श मानते हों, इस हद तक कि यह उनके जीवन और उनके मार्ग के चुनाव को तय करने लगे और उनके जीवन का एक अटूट हिस्सा बन जाए, तो उनके जीवन अभी किस दशा में हैं? वे अपना जीवन जीते हुए अपने स्थान पर बने नहीं रहते। अगर सितारों को आदर्श मानने वाला व्यक्ति कोई महिला है, तो क्या वह अपने पति का साथ देने वाली और बच्चों की परवरिश करने वाली एक कर्तव्यपरायण गृहिणी, एक सच्चरित्र पत्नी और प्यारी माँ बन सकती है? (नहीं।) जो व्यक्ति दीवानगी की हद तक सितारों को आदर्श मानता है, वह बस पागल होता है। जहाँ भी उसके सपनों का प्रेमी या प्रेमिका कॉन्सर्ट या प्रेस कॉन्फ्रेंस करता या करती है, वह ऑटोग्राफ लेने के लिए वहाँ जाने को बाध्य महसूस करता है। वह उसका पीछा करने के लिए हवाई जहाज से लंबी यात्राएँ करता है और दूसरे देशों में चला जाता है और उसका परिवार उसे रोक नहीं पाता। ऐसे लोग लगातार मशहूर हस्ती के यात्राक्रम पर ऑनलाइन नजर रखते हैं और उन जगहों पर डेरा डाले रहते हैं जहाँ मशहूर हस्ती आने वाली होती है। अगर वे उनसे नहीं मिल पाते, तो वे कई दिनों और रातों तक बिना खाए-सोए रहते हैं और लगातार रोते रहते हैं। आम तौर पर, इंटरनेट और टीवी पर वे जिन चीजों में दिलचस्पी लेते हैं, वे सब मशहूर हस्तियों के बारे में होती हैं। बेशक, कुछ लोग सिर्फ एक मशहूर हस्ती पर नहीं, बल्कि कई मशहूर हस्तियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं—पुरुष और महिला हस्तियाँ, युवा, अधेड़ और बुजुर्ग हस्तियाँ। वे इन मशहूर हस्तियों के रंग-रूप, उनकी शादी की स्थिति, उनके रिश्तों की स्थिति और उनकी निजी जिंदगी में दिलचस्पी लेते हैं और उनके बारे में जानकारी खोजने में बहुत ज्यादा मानसिक ऊर्जा लगाते हैं। वे सितारों को आदर्श मानने को जिंदगी में खुशी और दिलचस्पी का स्रोत मानते हैं और उसमें ऐसे संलग्न होते हैं जैसे यह कोई बहुत गंभीर मामला हो। ऐसे व्यक्तियों की जिंदगी किस दशा में होती है? वे चलती-फिरती लाश की तरह होते हैं—उनके विचार, उनकी जिंदगी की दशा, साथ ही उनका रोजमर्रा का व्यवहार और उनका मिजाज अच्छा है या बुरा, ये सब पूरी तरह से उस मशहूर हस्ती से प्रभावित होते हैं जिसके पीछे वे भागते हैं और जिसकी नकल करते हैं। जिस मशहूर हस्ती का वे पीछा करते हैं, अगर वह किसी रिश्ते में आ जाता है, तो उन्हें इतना दुख होता है कि कई दिनों और रातों तक उन्हें खाने-पीने की सुध नहीं रहती। अगर मशहूर हस्ती का अपने पार्टनर से ब्रेकअप हो जाता है, तो वे बहुत खुश होते हैं, दावत देते हैं, शैंपेन खोलते हैं और जश्न मनाने के लिए वीबो पर पोस्ट करते हैं। हर रात वे उस मशहूर हस्ती के साथ होने का सपना देखते हैं जिसका वे पीछा करते हैं और सिर्फ सुनहरे सपने ही देखते रहते हैं! जिस मशहूर हस्ती का वे पीछा करते हैं, वह उनका सपनों का प्रेमी होता है और उन्हें कोई और व्यक्ति उस मशहूर हस्ती जितना अच्छा नहीं लगता। क्या उनकी जिंदगी की दशा असामान्य नहीं होती? (हाँ।) वे दीवानगी के इस स्तर तक पहुँच चुके होते हैं—क्या वे किसी बुरी आत्मा द्वारा नियंत्रित होते हैं? (हाँ।) तो क्या ऐसे लोगों की मानवता में कोई दोष होता है या कोई खामी या समस्या होती है? (समस्या होती है।) उनकी मानसिक स्थिति थोड़ी असामान्य होती है। सामान्य लोग कभी-कभी कला की दुनिया के लोगों के बारे में कुछ खबरें सुनते हैं और जब वे गपशप कर रहे होते हैं, तो वे यूँ ही इसके बारे में भी कुछ शब्द कह सकते हैं, लेकिन जब वे असल जिंदगी में लौटते हैं, तो वे सामान्य रूप से जीना जारी रखते हैं। अगर वे माँ हैं, तो वे माँ के तौर पर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाती हैं; अगर वे पिता हैं, तो वे पिता के तौर पर अपनी जिम्मेदारियाँ निभाते हैं। वे जो काम करते हैं, उस पर जरा भी असर नहीं पड़ता या उसमें कोई रुकावट नहीं आती। जिस सितारे को वे पसंद करते हैं, अगर वह कहीं कॉन्सर्ट आयोजित करता है, तो उन्हें लगता है कि इसका उनसे कोई लेना-देना नहीं है और वे बिना प्रभावित हुए सामान्य तौर पर अपना जीवन जीना जारी रखते हैं। भले ही उनके मन में उस सितारे के लिए कुछ प्रशंसा और उसके प्रति कुछ ईर्ष्या होती है और थोड़ा लगाव होता है, लेकिन जब वे असल जीवन में लौटते हैं, तो उनके पास स्वतंत्र विचार होते हैं; उनके अपने जीवन और करियर पर, उनकी आस्था पर और जिन चीजों का उन्हें अनुसरण करना चाहिए और जिस मार्ग पर उन्हें चलना चाहिए उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। यह मानवता की सामान्य सोच और सामान्य मानसिक स्थिति होना है। लेकिन जो लोग सितारों को आदर्श मानना पसंद करते हैं, वे पहले ही इस प्रक्रिया में खुद को और अपने आपको नियंत्रित करने की क्षमता खो चुके होते हैं; उन्हें पूरी तरह से ये तथाकथित सितारे संचालित करते हैं—वे उनकी हर एक बात मानते हैं। उनके विचार और उनके जीवन की स्थिति पूरी तरह से सितारों के शब्दों, क्रियाकलापों और भावनाओं से नियंत्रित और निर्देशित होती है। यह अब केवल मानवता की समस्या नहीं रहती—उनकी मानसिक स्थिति कुछ हद तक समस्याग्रस्त हो जाती है। उनकी भावनाएँ असामान्य हो जाती हैं, उनके दैनिक जीवन की स्थिति अस्त-व्यस्त हो जाती है और वे पूरी तरह से अपनी दिशा खो चुके होते हैं। उनके पूरे जीवन में केवल सितारों को आदर्श मानना ही शामिल होता है; सितारों को आदर्श मानना उनके अस्तित्व के पथ पर एकमात्र अपरिहार्य चीज होती है। जब तक वे जीवित रहते और साँस लेते हैं, तब तक वे सितारों को आदर्श मानने का आनंद लेते हैं और हर दिन समय गुजारने के लिए इस पर निर्भर रहते हैं। अगर वे सितारों को आदर्श नहीं मानते, तो उन्हें लगता है कि जीवन खोखला और अर्थहीन है और वे बिना किसी लक्ष्य या दिशा के जीते हैं, अपने दिल में खोए हुए महसूस करते हैं। इसलिए, समय-समय पर उन्हें लगता है कि उन्हें अपनी पसंदीदा मशहूर हस्ती के बारे में ताजा जानकारी खोजने के लिए ऑनलाइन जाना चाहिए—वे क्या खा-पी रहे हैं, उनका जीवन वर्तमान में किस स्थिति में है, वे कब कॉन्सर्ट आयोजित करेंगे, उनकी सबसे हालिया फिल्म का प्रदर्शन कैसा था, उनकी शादी की स्थिति क्या है, उनकी पारिवारिक स्थिति क्या है—कभी-कभी वे समय बिताने और अपने खोखले, दिशाहीन, भ्रमित जीवन को भरने के लिए ऐसी जानकारी खोजते हैं। क्या वे इन मशहूर हस्तियों द्वारा पूरी तरह से नियंत्रित नहीं हो गए हैं? क्या वे सितारों को आदर्श मानने की इस मानसिकता या प्रवृत्ति से नियंत्रित नहीं हो गए हैं? (हाँ।) तो फिर, क्या ऐसे लोगों के पास अभी भी जमीर और विवेक है? वे अपने दिमाग से पैदल हो गए हैं, उनकी मानसिक स्थिति असामान्य हो गई है। ऐसी बाहरी प्रवृत्ति या घटना से गुमराह और परेशान होने के बाद उन्होंने अपनी दिशा खो दी है और अब नहीं जानते कि वे जो कर रहे हैं वह सही है या गलत—वे नहीं जानते कि उनके लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा। अगर लोग उन्हें मना करने की कोशिश करते हैं, तो वे बस इसे स्वीकार नहीं कर पाते या समझ नहीं पाते। जिस सितारे की वे पूजा करते हैं, उसके कॉन्सर्ट में भाग लेने के लिए वे तीन से पाँच महीने की पगार खर्च करने के लिए तैयार रहते हैं, यहाँ तक कि वे कुछ मूल्यवान वस्तुएँ गिरवी भी रख देते हैं या पैसे उधार भी ले लेते हैं और लौटने के बाद उन्हें अपने कर्ज चुकाने पड़ते हैं। वे सिर्फ सितारों को आदर्श मानने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए ऐसी कीमत चुकाते हैं। क्या ऐसे लोग सामान्य होते हैं? (नहीं।) उनकी दीवानगी और आत्म-नियंत्रण की कमी के स्तर से आँकें, तो ऐसे लोग पहले ही पूरा जमीर और विवेक खो चुके होते हैं और अब खुद को नियंत्रित नहीं कर सकते; वे इस बात की बिल्कुल भी परवाह नहीं करते कि सितारों को आदर्श मानने की खातिर वे कितना पैसा खर्च करते हैं और कितनी दूर तक यात्रा करते हैं। इस प्रकार, इन अभिव्यक्तियों से आँकें, तो उन्हें सामान्य लोगों की श्रेणी में रखना बहुत कठिन है। यह कहा जाना चाहिए कि उनकी मानवता में समस्या है—उन्होंने अपनी तर्क-शक्ति खो दी है। तो क्या उनका जमीर अब भी काम करता है? क्या उनमें अब भी जमीर है? (नहीं है।) तो फिर वे किस तरह के लोग हैं? उनके पास न तो जमीर है और न ही विवेक; उनकी मानवता एक खोखले खोल के सिवाय कुछ नहीं रह गई है। सामान्य मानवता का वास्तविक जीवन उनसे उत्तरोत्तर दूर होता गया है। उनके लिए वास्तविक जीवन में एकीकृत होना बहुत कठिन है और उनके लिए अपने मन को व्यवस्थित करना और वास्तविक जीवन के सामान्य मामलों में संलग्न होना बहुत कठिन है। उनके जीवन में सितारों को आदर्श मानने का ही एकमात्र मामला होता है। तो क्या उनकी आध्यात्मिक दुनिया सितारों को आदर्श मानने के मामले से नियंत्रित नहीं रही है? (हाँ।) ऐसा व्यक्ति बाहर से एक व्यक्ति प्रतीत होता है, लेकिन सार में, क्या वह पहले ही एक खोखले खोल से ज्यादा कुछ नहीं बन गया है? (हाँ।) वे कैसे लोग हैं, जो खोखले खोल बनकर रह गए हैं? (चलती-फिरती लाशें।) यह सही है—चलती-फिरती लाशें। क्या उनमें आस्था है? (नहीं।) क्या उनके कोई सकारात्मक अनुसरण हैं? (नहीं।) क्या वे समझते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, उचित क्या है और दुष्टतापूर्ण क्या है? (नहीं।) इसे कैसे देखा जा सकता है कि वे नहीं समझते? वर्तमान में, मंच पर प्रसिद्ध गायक अधिक से अधिक बदन-दिखाऊ और कामोत्तेजक पोशाकें पहन रहे हैं और अधिक से अधिक दुष्टतापूर्ण गतिविधियाँ कर रहे हैं। इन सितारों को आदर्श मानने वाले दर्शक इसे देखकर अधिकाधिक उत्साहित, संतुष्ट और मदमस्त महसूस करते हैं। खास तौर पर, जब कोई पॉप स्टार थोड़ा उत्तेजित हो जाता है और अपने कपड़े उतारकर दर्शकों पर उछाल देता है, तो भीड़ में मौजूद लोग पूरी तरह से पागल हो जाते हैं। कुछ लोग इतने उत्तेजित हो जाते हैं कि उनकी हृदय-गति रुक जाती है और फिर वे बेहोश हो जाते हैं। सितारों को आदर्श मानने के चश्मे वास्तव में इतने प्रचंड होते हैं! कभी-कभी तो भगदड़ तक मच जाती है और बचाव की कोशिशें नाकाम होने पर कुछ लोग घायल हो जाते हैं और अपनी जान गँवा बैठते हैं। ये सभी त्रासदियाँ सितारों को आदर्श मानने की वजह से होती हैं। किसी सितारे को आदर्श मानने के परिणामस्वरूप घायल होना या जान गँवा देना—मुझे बताओ, क्या ऐसी जिंदगी बेकार नहीं है? क्या इसकी कोई अहमियत है? उनकी भावनाओं, उनकी पसंद की चीजों और उन दृश्यों से आँकें, जो उन्हें इतने जोश से भर देते हैं कि वे चीखने-चिल्लाने लगते हैं, तो क्या ये लोग शर्म-लिहाज जानते हैं? क्या वे जानते हैं कि सकारात्मक और सही चीजें क्या हैं, और दुष्टतापूर्ण चीजें क्या हैं? (नहीं।) वे नहीं जानते। सामान्य लोग जब ऐसे दृश्य देखते हैं, तो उन्हें घिन आती है : “दुनिया इतनी बुरी कैसे हो गई है? यह बहुत बुरी है!” लेकिन सितारों को आदर्श मानने वाले ये लोग ऐसे दृश्य देखकर खुश, गर्वित, तृप्त और संतुष्ट महसूस करते हैं, वे मानते हैं कि अब उनकी जिंदगी में कोई मलाल नहीं रहा, और वे इन दृश्यों पर चीखते-चिल्लाते और शोर मचाते हैं। यह दिखाता है कि अपनी आत्मा की गहराई में वे नहीं जानते कि दुष्टतापूर्ण चीजें क्या हैं, सही चीजें क्या हैं, सकारात्मक चीजें क्या हैं या नकारात्मक चीजें क्या हैं। गायकों या अभिनेताओं की कुछ महिला प्रशंसक तो अपने पसंदीदा पुरुष सितारे का पीछा करते हुए उसके घर तक पहुँच जाती हैं और खुद को उन्हें सौंपने को तैयार रहती हैं। जब सितारा मना कर देता है, तो वे नाराज हो जाती हैं और उसे कायर कहती हैं। क्या ऐसे लोगों में जरा भी शर्म-लिहाज होता है? क्या वे “शर्म की भावना” शब्दों का मतलब समझते हैं? क्या वे समझते हैं कि सकारात्मक चीजें क्या हैं या नकारात्मक चीजें क्या हैं? (वे नहीं समझते।) यहाँ तक कि वे “शर्म की भावना” शब्दों को भी नहीं समझते। जब सितारा मना कर देता है, तो वे उसका अपमान तक करते हैं। क्या वे इंसान भी हैं? ऐसा नहीं है कि उनकी मानवता में किसी चीज की कमी है—वे मानसिक रूप से विक्षिप्त हैं; वे अशुद्ध आत्माएँ और बुरी आत्माएँ हैं!
लोगों के विभिन्न समूहों में हमेशा एक हिस्सा ऐसे लोगों का होता है जिनमें सितारों को आदर्श मानने की दीवानगी होती है। सटीक रूप से कहें तो ऐसे लोग चलती-फिरती लाशें हैं, और विशिष्ट रूप से कहें तो वे अमानव हैं। वे मंच पर और परदे पर अक्सर दिखने वाले सितारों को पीछा करने की चीज मानते हैं और ऐसा करने को एक वैध करियर तक समझते हैं। वे अपनी जिंदगी इसी तरह बर्बाद कर देते हैं। यह कहना होगा कि पूरे समाज में ऐसे लोगों का एक खास समूह होता है, जो कमोबेश समाज के उन निचले तबके के लोगों जैसे ही होते हैं जो सही कामों में संलग्न नहीं होते—वे सब तलछट और बेकार लोग होते हैं! उनमें कोई आस्था नहीं होती, कोई सकारात्मक अनुसरण नहीं होता और उनकी मानवता में कोई सकारात्मक जरूरत, सकारात्मक चाहत या सकारात्मक चीज नहीं होती। कला-जगत कितना भी दुष्ट या कितना भी काला हो, वे इसकी परवाह नहीं करते और न ही उन्हें यह घिनौना लगता है, वे इसे स्वीकार करते हैं और इसका अनुमोदन करते हैं; इसके अलावा, पूरे जोश के साथ इसका अनुसरण करते हैं। ये व्यक्ति किस तरह के लोग होते हैं? कहा जा सकता है कि वे तलछट होते हैं। आध्यात्मिक क्षेत्र के परिप्रेक्ष्य से देखें तो ऐसे लोग अशुद्ध आत्माएँ और दुष्ट आत्माएँ हैं। जब अशुद्ध आत्माएँ और दुष्ट आत्माएँ इंसान के रूप में जन्म लेती हैं, तो उन्हें भी सामान्य लोगों की तरह खाना और कामकाज करना पड़ता है, लेकिन वे सही कामों में संलग्न नहीं होतीं और न ही जरा भी सत्य स्वीकार करती हैं; वे बस मजे की तलाश में अपने जैसे लोगों को ढूँढ़ना पसंद करती हैं और मौत का इंतजार करते हुए निरुद्देश्य भटकती रहती हैं। अगर वे कला उद्योग में संलग्न नहीं हो पातीं, तो वे उसके अंदर के लोगों का अनुसरण करती हैं और अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए उसके भीतर की तमाम तरह की बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करती हैं। इसलिए, चाहे ये लोग किसी भी चीज में माहिर हों, सिर्फ यह तथ्य कि उनके ऐसे अनुसरण हैं और उन्होंने समाज में ऐसा मार्ग और ऐसी जीवनशैली चुनी है, यह दिखाता है कि वे अच्छे लोग नहीं हैं या ऐसे लोग नहीं हैं जो उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। मेरे यह कहने का कारण कि ऐसे लोग उद्धार प्राप्त नहीं कर सकते, असल में यह है कि उनकी मानवता के भीतर एक “खालीपन” होता है। इस “खालीपन” को उद्धरण-चिह्नों में रखना जरूरी है। क्यों? क्योंकि उनकी मानवता में सकारात्मक चीजें नहीं होतीं, बल्कि उसमें वे सभी चीजें होती हैं जो अशुद्ध आत्माओं और दुष्ट आत्माओं में होती हैं : बुराई का अनुसरण करना, बुराई की पूजा करना, अँधेरे का अनुसरण करना और अँधेरे की पूजा करना। वे इस पूरे बुरे समाज में बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण करने में सबसे आगे रहने वाले और साथ ही इन प्रवृत्तियों को संचारित करने वाले होते हैं। कला-जगत से निकली विभिन्न दुष्ट भ्रांतियाँ और विभिन्न विकृत विचार और दृष्टिकोण जब कंप्यूटर, टीवी, पत्रिकाओं, अखबारों, फिल्म और टीवी शो जैसे माध्यमों से जनता तक संचारित किए जाते हैं, तो वे धीरे-धीरे लोगों के बीच परिचालित होते हैं और फिर व्यापक रूप से फैल जाते हैं। इन लोगों में असल में ये सितारों को आदर्श मानने वाले ही होते हैं जो दुष्ट विचारों और बुरी प्रवृत्तियों तथा विभिन्न फिल्मों, टीवी शो और कलात्मक रचनाओं में पाए जाने वाले, चीजें करने के बुरे तरीके फैलाने में सबसे आगे रहते हैं। वे पहली पंक्ति के प्रसारक होते हैं जो विभिन्न दुष्टतापूर्ण विचार और विभिन्न विकृत विचार और दृष्टिकोण संचारित करते हैं। अपनी बातों के जरिये, अपने ठोस क्रियाकलापों और अभिव्यक्तियों के जरिये आम जनता धीरे-धीरे विभिन्न दुष्टतापूर्ण विचारों और बुरी प्रवृत्तियों को स्वीकृत और अनुमोदित करने लगती है। फिर, लोग धीरे-धीरे उनसे अनुकूलित और ओतप्रोत हो जाते हैं। अंत में, इससे विभिन्न बुरी प्रवृत्तियाँ, दुष्टतापूर्ण विचार और विकृत विचार और दृष्टिकोण धीरे-धीरे विभिन्न सामाजिक व्यवस्थाओं के अंतर्गत और लोगों के विभिन्न समूहों के बीच अपनी पकड़ बना लेते हैं और आकार ग्रहण कर लेते हैं। अतीत पर नजर डालें तो शादी के मामले में, जब लोग शादी की उम्र तक पहुँचते थे, तब एक बिचौलिया उन्हें लोगों से मिलवाता था और रिश्ता तय करवाता था। शादी के लिए दोनों पक्षों के माता-पिता की सहमति भी जरूरी होती थी, जिसके बाद तारीख तय होती थी और जोड़ा शादी के बंधन में बँध जाता था। अतीत के सामाजिक संदर्भ में, ज्यादातर लोग स्त्री-पुरुष के बीच शादी की बात आने पर सम्मान और समझदारी दिखाते थे। वे शादी को एक बहुत बड़ी घटना मानते थे और इसे गंभीरता और ईमानदारी से लेते थे। खासकर अपने बच्चों के मामले में, वे चाहते थे कि बच्चे ऐयाश न बनें, परिवार के सदस्यों के साथ यौन संबंध न बनाएँ और नाजायज यौन संबंधों में लिप्त न हों—इन अपेक्षाओं का पालन करना जरूरी था। कम से कम, ज्यादातर लोगों के दिलों में यह संकल्पना जरूर थी। इस तरह, अपनी मानवता के जमीर के नियंत्रण में, बहुत-से लोग नाजायज यौन संबंधों और स्वच्छंद संभोग जैसे बुरे कर्मों में लिप्त होने से बचते थे, जिससे कुछ हद तक स्त्री-पुरुष दोनों की सुरक्षा होती थी। बेशक, इसका सामाजिक परिवेश पर कुछ सकारात्मक असर और प्रभाव भी पड़ा। लेकिन समय के साथ और विभिन्न कलात्मक रचनाओं के सामने आने के साथ, यौन आजादी, शादी की आजादी वगैरह की वकालत करने वाले तमाम तरह के विचार और दृष्टिकोण लगातार सामने आए हैं। एक ओर, कुछ लोग इनकी वकालत करते हैं; इसके अलावा, विभिन्न कलात्मक रूपों में प्रस्तुतियों और प्रदर्शनों के जरिये समाज इन्हें एक कदम और आगे बढ़ाता है और बड़े पैमाने पर फैलाता है। इन विचारों को सबसे पहले सितारों को आदर्श मानने वाले लोगों का एक हिस्सा मानता और स्वीकार करता है—यानी, इनके लिए पहला दर्शक वर्ग ये सितारों को आदर्श मानने वाले ही होते हैं। चूँकि ये लोग सितारों को आदर्श मानते हैं, इसलिए वे मंच पर, परदे पर या कुछ कलात्मक रूपों में सितारों द्वारा वकालत किए गए इन विचारों को जल्दी से स्वीकृत और अनुमोदित कर लेते हैं। इनका मजबूती से अनुमोदन करने के बाद वे अपने बच्चों को और रोजमर्रा की जिंदगी में अपने आस-पास के लोगों को भी प्रभावित करते हैं। इस तरह, एक व्यक्ति इन विचारों को दस लोगों तक पहुँचाता है, दस लोग उन्हें सौ लोगों तक पहुँचाते हैं, सौ लोग उन्हें हजार लोगों तक पहुँचाते हैं, हजार लोग उन्हें दस हजार लोगों तक पहुँचाते हैं—और इस तरह ये विचार छोटे दायरे से निकलकर बहुत बड़े दायरे में फैल जाते हैं। अगले एक-दो सालों में लोग इन विचारों को आवाज देते हैं और पाँच-दस साल बाद भी वे उन्हें आवाज देते हैं। बीस-तीस साल बाद ऐसे दुष्टतापूर्ण विचार लोगों के बीच उत्तरोत्तर आकार लेते हैं, समाज के हर कोने में अधिकाधिक व्यापक रूप से फैलते हैं और हर व्यक्ति के दिल में गहराई तक बैठ जाते हैं। फिर धीरे-धीरे लोग इन दुष्टतापूर्ण विचारों और बुरी प्रवृत्तियों का अनुमोदन करने लगते हैं और धीरे-धीरे आम जनता इन्हें स्वीकार करने लगती है और लोग शादी तथा स्त्री-पुरुष के बीच के मामलों में ज्यादा से ज्यादा भोगासक्त, ऐयाश और बेलगाम हो जाते हैं। लोगों को लगता है कि यह खुले विचारों वाला होना और व्यापक सोच रखना है और यह परिपक्व मानवता की निशानी है, वे नकारात्मक चीजों के बारे में ऐसे बात करते हैं जैसे वे सकारात्मक और सही चीजें हों। इस बिंदु तक बुरी प्रवृत्तियों ने पूरे समाज में उभार का अनुभव किया है, बढ़त हासिल कर ली है और मुख्यधारा बन गई है। ज्यादातर लोग अब स्त्री-पुरुष की शादी और स्त्री-पुरुष संबंधों को लेकर सही विचार और दृष्टिकोण नहीं रखते; उन्हें लगता है कि ये चीजें कोई बड़ी बात नहीं हैं। खासकर, समलैंगिकता अधिकाधिक आम हो गई है; इसके अलावा, विवाहेतर संबंध भी अधिकाधिक आम आम हो गए हैं और इस वजह से तलाक की दर भी उत्तरोत्तर बढ़ी है। बहुत-से बच्चों को भी माता-पिता का प्रेम नहीं मिल पाता, क्योंकि वे या तो माता-पिता में से किसी एक के साथ वाले परिवार में रहते हैं या ऐसे परिवार में रहते हैं जहाँ सौतेला पिता या सौतेली माँ होती है। बहुत से लोग शादी से पहले ही विपरीत लिंग का साथी बना लेते हैं और इसे शर्मनाक नहीं मानते, वे यहाँ तक सोचते हैं कि यह सामान्य है, समाज ऐसा ही है और यह कोई बड़ी बात नहीं है। दुष्टता हमेशा दुष्टता ही होती है और सकारात्मक चीजें हमेशा सकारात्मक ही होती हैं। भले ही तुम्हें लगता हो कि यह कोई बड़ी बात नहीं है, तब भी ऐसा इस बुरी प्रवृत्ति और इस समाज के पतन की वजह से है—ऐसा इसलिए होता है क्योंकि शैतान ने इंसानों को भ्रष्ट कर दिया है और वे दुष्टतापूर्ण विचारों और बुरी प्रवृत्तियों से ओतप्रोत हो गए हैं और भर गए हैं। ऐसा नहीं है कि सकारात्मक चीजों को नकारात्मक कहा जा सकता है, न ही ऐसा है कि आजकल नकारात्मक चीजें सकारात्मक चीजों में बदली जा सकती हैं। अगर तुम ऐसा सोचते हो, तो वह इसलिए कि तुम सत्य नहीं समझते या यह नहीं समझते कि सकारात्मक चीजें क्या होती हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन परिस्थितियों में तुम बुरी प्रवृत्तियों और दुष्टतापूर्ण विचारों को अपने आचरण के सिद्धांत और नींव मानने के लिए मजबूर हो जाते हो। यह समाज और यह मानवजाति धीरे-धीरे इसी तरह गहराई तक भ्रष्ट हो गई है। इसलिए बुरी प्रवृत्तियों के व्यापक रूप से फैलने और लोगों के दिलों में गहराई तक बैठ जाने के मामले में, ये सितारों को आदर्श मानने वाले लोग बुरी प्रवृत्तियों, दुष्टतापूर्ण विचारों और दृष्टिकोणों को फैलाने में अग्र-दल की भूमिका निभाते हैं। वे ही इन चीजों को सीधे फैलाने वाले होते हैं। अगर हम कहें कि शैतान लोगों को भ्रष्ट कर रहा है, तो यह बात थोड़ी अस्पष्ट या अमूर्त लगती है। लेकिन अगर हम कहें कि ये सितारों को आदर्श मानने वाले लोग शैतान के विचारों और शैतान की बुरी प्रवृत्तियों को फैलाने वाले असली समर्थक हैं, तो यह बात बिल्कुल सटीक है। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे लोगों का वह समूह है जो कला-जगत या विभिन्न दुष्टतापूर्ण विचारों और बुरी प्रवृत्तियों के सबसे करीब होते हैं और वे उन लोगों का हिस्सा हैं जो इन फिल्मी सितारों और मशहूर गायकों के निकट संपर्क में आते हैं। अगर ये लोग उनके पीछे न भागते, उनका इतना दीवानगी भरा समर्थन न करते, तो इन तथाकथित मशहूर गायकों और फिल्मी सितारों का इतना ज्यादा आकर्षण, इतनी ज्यादा शोहरत, इतना ज्यादा प्रभाव और गुमराह करने की इतनी ताकत न होती। यह ठीक सितारों को आदर्श मानने वाले लोगों द्वारा उनकी चापलूसी और अत्यधिक अनुकरण की वजह से ही है कि विभिन्न बुरी प्रवृत्तियाँ और दुष्टतापूर्ण विचार लोगों के बीच इतनी असाधारण गति से फैले हैं। अपने ठोस क्रियाकलापों से वे जनता को बताते हैं कि कला-जगत में दिखने वाली विभिन्न दुष्टतापूर्ण चीजें और विभिन्न विकृत, दुष्टतापूर्ण विचार और दृष्टिकोण ऐसी चीजें हैं जिन्हें लोगों को स्वीकार करना चाहिए और यह कि ये चीजें बहुत सामान्य और जायज हैं। अंत में, ज्यादातर लोग धीरे-धीरे चीजें करने के ये दुष्टतापूर्ण तरीके और दुष्टतापूर्ण विचार और दृष्टिकोण स्वीकार कर लेते हैं। नतीजतन, इन तथाकथित मशहूर हस्तियों, मशहूर गायकों और फिल्मी सितारों के विवाहेतर संबंध, स्वच्छंद संभोग या किसी भी तरह के दुष्टतापूर्ण विचार, दृष्टिकोण और चीजें करने के तरीके कम बुरे बताए जाते हैं और कोई भी इन चीजों के बारे में सही राय व्यक्त नहीं करता या सही फैसला नहीं देता। इस तरह, चाहे ये मशहूर हस्तियाँ, मशहूर गायक और फिल्मी सितारे कितने भी कामुक क्यों न हों, उन्हें हटाया नहीं जाता या दोषी नहीं ठहराया जाता, बल्कि वे मंच पर इतराना जारी रखते हैं। यह समाज की एक लोकप्रिय कहावत से पूरी तरह मेल खाता है : “गरीबों का मजाक उड़ाओ, वेश्याओं का नहीं।” यह मानवजाति के पतन का सच्चा चित्रण है और उसका सबूत भी। देखो, जब तुम परमेश्वर में विश्वास करते हो और गिरफ्तार होकर जेल जाते हो, तो लोग तुम्हारा मजाक उड़ाते हैं और तुम्हें तुच्छ समझते हैं। असल में, वे यह भी जानते हैं कि तुमने कुछ भी गलत नहीं किया है—परमेश्वर में विश्वास करने का मतलब है आस्था रखना, अच्छा इंसान बनने की इच्छा रखना और स्वर्ग जाने की चाहत रखना; महिला विश्वासी अपना शरीर नहीं बेचतीं और वेश्या का काम नहीं करतीं, और पुरुष विश्वासी डकैती नहीं करते बल्कि नियमों का पालन करते वाला आचरण करते हैं। फिर भी लोग तुम्हें नापसंद करते हैं। अगर कोई महिला बहुत खूबसूरत है और उसके ऊँचे ओहदे वाले अधिकारियों और अमीर लोगों के साथ अनैतिक संबंध हैं और वह रोज महँगी कारों में घूमती है, तो दूसरे लोग उससे जलते हैं और उसकी तारीफ करते हुए कहते हैं : “तुममें सचमुच कुछ खास बात है, तुम बहुत आकर्षक हो। तुम अपने माता-पिता के लिए पैसे कमाने में सक्षम हो ताकि वे अच्छा खाना खा सकें और अच्छे कपड़े पहन सकें। तुम्हारा रूप-रंग सच में बहुत कीमती है!” लेकिन अगर तुम खूबसूरत हो और किसी ऐसे व्यक्ति से शादी करती हो जो परमेश्वर में विश्वास करता है, तो वे तुम पर हँसेंगे। वे न सिर्फ तुम पर हँसेंगे, बल्कि जब वे तुम्हें सताया जाता देखेंगे, तो वे तुम पर धौंस भी जमाएँगे। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।)
इस समूह—सितारों को आदर्श मानने वाले इन लोगों—द्वारा की गई किसी भी चीज का कोई मतलब नहीं है। इसके विपरीत, इन क्रियाकलापों ने शैतान द्वारा दुष्टतापूर्ण विचारों और बुरी प्रवृत्तियों के प्रसार को बढ़ावा दिया है। सितारों को आदर्श मानने वाले आज के लोगों को देखो—कुछ औरतें स्टेज पर जाकर बेझिझक गाती-नाचती हैं और जब वे किसी मशहूर गायक को देखती हैं, तो उसकी हद से ज्यादा पूजा करती हैं। यह 40 और 50 से अधिक उम्र की औरतों से बिल्कुल भिन्न है। गैर-विश्वासियों के शब्दों में कहें तो वे स्वतंत्र हो गई हैं—विचार में स्वतंत्र और काम-वासना में स्वतंत्र, वे इन दोनों ही क्षेत्रों में आजाद हैं। कुछ लोग कहते हैं : “यह कौन-सा जमाना है? कौन अपने तमाम दिन सिर्फ एक पति के साथ बिताता है? कौन अपनी जिंदगी हमेशा अपने बच्चों के इर्द-गिर्द रखता है? जब भी संभव हो, कोई नया साथी ढूँढ़ो और जब भी मौका मिले, जिंदगी का मजा लो!” जरा देखो, इन लोगों के कैसे विचार हैं—वे कितने भयानक हैं! अगर परमेश्वर का कोई विश्वासी भी इसी तरह सोचे, तो क्या यह अच्छा संकेत है? अगर किसी विश्वासी के ऐसे विचार और दृष्टिकोण हों, वह ऐसे लोगों से ईर्ष्या करे और उन्हें पूजे, और ऐसा व्यक्ति ही बनना चाहे, तो क्या यह उनके लिए बहुत भयानक और बहुत खतरनाक नहीं है? (हाँ।) अभी हम इस बात पर चर्चा नहीं करते कि यह कितना भयानक या खतरनाक है। बस इन लोगों के सार की बात करें तो अपनी आत्मा की गहराइयों में वे इन सितारों से खास तौर पर ईर्ष्या करते हैं, उनकी सराहना करते हैं और उनसे प्रेम करते हैं। वे सितारों से हर तरह के व्यवहार और हर तरह के विचार और दृष्टिकोण स्वीकार कर सकते हैं। विचार कितने भी दुष्टतापूर्ण हों, वे उन्हें स्वीकार कर सकते हैं। वे मानते हैं, “लोगों को ऐसा ही आचरण करना चाहिए—सिर्फ यही आजाद होना है। सभी विचारों और दृष्टिकोणों को मौजूद रहने देना चाहिए। आखिरकार, दुनिया तमाम तरह के लोगों से बनती है।” उनके विचारों में सकारात्मक और नकारात्मक के बीच कोई फर्क नहीं है, सही और गलत के बीच कोई फर्क नहीं है। क्या यह मानसिक रूप से असामान्य नहीं है? अगर यह कम काबिलियत के कारण है कि किसी व्यक्ति में सही-गलत का भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, लेकिन फिर भी उसमें शर्म-लिहाज है, और अगर उसे पता हो कि कोई चीज सही है तो वह उसका पालन कर सकता है, और अगर उसे पता हो कि कोई चीज गलत है, तो वह उसे बिल्कुल नहीं करेगा और अगर उसे पता हो कि कोई चीज दुष्टतापूर्ण है, तो वह अपने दिल में उससे बेइंतहा नफरत कर सकता है, तो वह अभी भी सामान्य व्यक्ति है। लेकिन अगर उसे साफ पता हो कि कोई चीज गलत है, यह दुष्टतापूर्ण है और फिर भी वह न सिर्फ उसका प्रतिरोध नहीं करता है, बल्कि उसे बेहिचक स्वीकार भी कर सकता है, यहाँ तक कि उससे जलता भी है और उसका अनुसरण भी करता है, उसमें गहरे और गहरे धँसता चला जाता है हैं, तो वह कोई व्यक्ति नहीं बल्कि चलती-फिरती लाश है। वह बर्बाद हो गया है और उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता। इसलिए, यह नहीं कहा जा सकता कि ऐसे लोगों की मानवता खराब है, उनमें निष्ठा कम है, उनका चरित्र नीच है या उनमें जमीर और विवेक अनुपस्थित है—समस्या यह नहीं है। सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनमें मानवता ही नहीं है। तो ये लोग क्या हैं? अशुद्ध आत्माएँ, बुरी आत्माएँ और चलती-फिरती लाशें। वे विभिन्न बुरी प्रवृत्तियों और विभिन्न दुष्टतापूर्ण, विकृत विचारों और दृष्टिकोणों के समर्थक, प्रसारक और उन्हें फैलाने वाले हैं। यह बिल्कुल महामारी की तरह है—एक व्यक्ति जिसमें वायरस है, जहाँ भी जाता है उसे फैलाता है और जितनी ज्यादा जगहों पर वह जाता है, वायरस उतनी ही व्यापकता से फैलता है। सितारों को आदर्श मानने वाले ये लोग वायरस के वाहकों और उसे फैलाने वालों के बराबर हैं, इसलिए वे मानवजाति के सदस्य बिल्कुल नहीं हैं—वे अमानव हैं। तथाकथित अमानवों की परिभाषा क्या है? वह यह है कि ये लोग बुरी प्रवृत्तियों और दुष्टतापूर्ण विचारों और दृष्टिकोणों के समर्थक और उन्हें फैलाने वाले होते हैं। क्या अब तुम समझते हो? अगर तुम अभी भी अपने दिल में इन सितारों से जलते हो या तुम कभी ऐसा व्यक्ति बनना चाहते थे, तो मैं तुम्हें बता रहा हूँ, यह एक ऐसा मार्ग है जहाँ से वापसी मुमकिन नहीं है। कभी ऐसा व्यक्ति बनने की कोशिश मत करना! अगर तुमने कभी किसी फिल्म या टेलीविजन शो में कोई भूमिका निभाई है, अगर तुम कभी फिल्म स्टार या मशहूर हस्ती बनना चाहते थे और तुमने इस मार्ग पर चलने की योजना बनाई थी, तो मैं तुमसे कह रहा हूँ—तुरंत ब्रेक लगाओ और रुक जाओ। यह दंडित किए जाने या पुरस्कृत किए जाने का मामला नहीं है। यह अनंत नरकवास की ओर ले जाने वाला मार्ग है—इस पर कभी मत चलना! अगर तुम ऐसे व्यक्ति का इसलिए अनुसरण करना चाहते हो क्योंकि तुम अस्थायी रूप से गुमराह हो गए थे या कमजोर पड़ गए थे या फिर किसी अस्थायी जलन और चाहत की वजह से ऐसा करना चाहते हो, तो मेरी चेतावनी सुनो, मेरा प्रोत्साहन सुनो—तुरंत रुक जाओ। उस उद्योग में कभी कदम मत रखो, उन श्रेणियों में कभी कदम मत रखो; कभी उनमें से एक मत बनो। अगर तुम सही मार्ग पर चलने या सार्थक चीजें करने में दृढ़ नहीं रह सकते, तो भी तुम्हें बुरी प्रवृत्तियों और दुष्टतापूर्ण विचारों और दृष्टिकोणों को फैलाने वाला नहीं बनना चाहिए—वह परमेश्वर द्वारा शापित मार्ग है। तो चाहे तुमने कभी किसी फिल्म या टेलीविजन शो में कोई भी भूमिका निभाई हो, चाहे तुमने खुद को एक महत्वपूर्ण हस्ती माना हो, एक जानी-मानी हस्ती या कोई ऊँचे दर्जे की हस्ती—चाहे तुमने खुद को किसी भी जगह रखा हो—वह सब अतीत बन चुका है, वह सब गलत था। अगर तुमने अब पहले ही ब्रेक लगा दिया है, तो सिर्फ यही कहा जा सकता है कि उस समय तुम्हारा आध्यात्मिक कद अपरिपक्व था और तुम सत्य नहीं समझते थे। भविष्य में कभी उस तरह मत सोचना और न ही कभी उस मार्ग पर चलना। अगर तुम एक महत्वपूर्ण हस्ती या जानी-मानी हस्ती बनना चाहते हो, अगर तुम चाहते हो कि दूसरे तुम्हारी पूजा करें और तुम्हारा अनुसरण करें, तो तुरंत उन बातों के बारे में सोचना जो मैंने आज बोले हैं। किसी भी व्यक्ति के लिए, अनंत नरकवास की खबर पाना दुर्भाग्यपूर्ण है—यह सबसे बुरी संभावित खबर है। वह परमेश्वर द्वारा शापित मार्ग है। इस मार्ग पर कभी मत चलना, इस गंदगी से कभी मैले मत होना। इस मार्ग पर कदम रखने का मतलब है अनंत नरकवास! तुम्हें नियमों का पालन करने वाला आचरण करना चाहिए क्योंकि तुम एक सृजित प्राणी हो, सृजित मानवजाति के एक सदस्य हो। चाहे तुमने कोई भी भूमिका निभाई हो, कोई भी काम किया हो या परमेश्वर के घर में कोई भी योगदान दिया हो, अंत में, तुम्हें अपनी सही जगह तय करनी होगी। कौन-सी जगह? तुम एक सृजित प्राणी हो, सृजित मानवजाति के एक सदस्य हो। तुम्हें एक सृजित प्राणी का कर्तव्य पूरा करना होगा। तुम्हारा कर्तव्य-निर्वहन मानक स्तर का होना चाहिए, उसे परमेश्वर की संतुष्टि के लिए किया जाना चाहिए। तुम्हें परमेश्वर के लिए गवाही देनी चाहिए, परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना चाहिए, परमेश्वर के लिए गवाह बनना चाहिए और उद्धार प्राप्त करना चाहिए। यह जीवन भर की जिम्मेदारी और दायित्व है जिसे पूरा करने के लिए तुम कर्तव्यबद्ध हो, साथ ही यह वह मार्ग भी है जिसे तुम्हें चुनना चाहिए। तुम्हें शैतान की बुरी प्रवृत्तियों का अनुसरण नहीं करना चाहिए और दुष्टतापूर्ण विचारों और दृष्टिकोणों को फैलाने वाला और उनका प्रसारक नहीं बनना चाहिए। वे लोग मानवजाति के पतित लोग हैं, वे बुरी आत्माएँ और अशुद्ध आत्माएँ हैं। वे शापित हैं और अनंत नरकवास के लिए भेज दिए गए हैं! अगर कोई व्यक्ति उस रास्ते पर चल पड़ता है और दस जंगली घोड़े भी उसे वापस नहीं खींच सकते, तो उसे उसके किए का फल जरूर मिलेगा—उसका अंत अच्छा नहीं होगा। इसलिए, तुम्हें हमेशा यह पता होना चाहिए कि तुम सृजित मनुष्य हो, तुम्हें पता होना चाहिए कि तुम्हारी जगह क्या है, तुम्हें क्या करना चाहिए और तुम्हें किस तरह का मार्ग चुनना चाहिए। यह सबसे महत्वपूर्ण चीज है। क्या इन चीजों के बारे में संगति करना जरूरी है? (हाँ।) लोगों के जीवन के मार्गों से जुड़े विषय बहुत महत्वपूर्ण हैं। तुम्हें समय-समय पर उन्हें सुनना और उन पर गहराई से विचार करना चाहिए। ऐसा करना तुम लोगों के जीवन प्रवेश के लिए और तुम लोगों के जीवन में सही मार्ग पर चलने के लिए फायदेमंद और मददगार है—इसका इन चीजों पर अच्छा, सकारात्मक और रचनात्मक प्रभाव पड़ता है। इन बातों को भूलना मत।
आज की संगति के लिए बस इतना ही। अलविदा!
30 दिसंबर 2023