सत्य का अनुसरण कैसे करें (21)
हाल ही में, हमने अंतरात्मा और विवेक से जुड़ी कुछ ऐसी अभिव्यक्तियों पर बात की है जो मानवता का अभाव दिखाती हैं, है ना? (हाँ।) कुछ नकारात्मक उदाहरण देकर, हमने कुछ ऐसे लोगों की अभिव्यक्तियों को उजागर किया जिनकी मानवता में अंतरात्मा और विवेक नहीं होता। तो इन नकारात्मक उदाहरणों पर संगति के जरिए क्या तुम लोगों ने सीखा है कि अंतरात्मा और विवेक वाले लोगों के जीवन में कौन-सी अभिव्यक्तियाँ होनी चाहिए? (अंतरात्मा और विवेक से रहित लोगों की कुछ अभिव्यक्तियों पर परमेश्वर की संगति के जरिए मुझे यह समझ आया है कि सामान्य मानवता वाले लोगों में शर्मिंदगी की भावना होनी चाहिए और जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तब उन्हें उसके बारे में तार्किक तरीके से सोचने और उससे निपटने में समर्थ होना चाहिए।) और किसी के पास कुछ कहने के लिए है? (परमेश्वर की संगति के जरिए, मुझे समझ आया है कि गैर-मानवों में जिद और अड़ियलपन की अभिव्यक्तियाँ दिखती हैं, जबकि सामान्य मानवता वाले लोग सही और गलत का भेद पहचान सकते हैं और जानते हैं कि क्या उचित है और क्या अनुचित; वे सकारात्मक चीजों को स्वीकार सकते हैं और वे लोगों, घटनाओं और चीजों को अपेक्षाकृत निष्पक्ष और तार्किक तरीके से देखते हैं। इसके अलावा, उनमें शर्मिंदगी की भावना होती है; जब वे कुछ गलत करते हैं, तब वे अपनी गलतियाँ स्वीकार कर सकते हैं, उन्हें तुरंत ठीक कर सकते हैं और पश्चात्ताप कर सकते हैं।) सरल शब्दों में कहें तो यह मूलतः इन बातों पर निर्भर करता है। एक लिहाज से, जिनके पास अंतरात्मा और विवेक होता है, वे लोगों, घटनाओं और चीजों के साथ सही व्यवहार कर पाते हैं और लोगों, घटनाओं और चीजों को निष्पक्ष तरीके से देख सकते हैं और उनका मूल्यांकन कर सकते हैं। दूसरे लिहाज से, उनमें शर्मिंदगी की भावना भी होती है और वे अपनी अंतरात्मा और विवेक के आधार पर काम करते हैं। चूँकि हम अंतरात्मा और विवेक के बारे में बात कर रहे हैं तो आओ, उस विशेष चरित्र के बारे में बात करें जो लोगों की अंतरात्मा में होना चाहिए और जो लोगों में अभिव्यक्त होना चाहिए। हमने पहले कहा है कि अंतरात्मा वाले लोगों में दो गुण होते हैं: एक है सत्यनिष्ठा और दूसरा है दयालुता। कहने का मतलब है, सही और गलत का भेद पहचानने और यह जानने के अलावा कि क्या उचित है और क्या अनुचित, जिस व्यक्ति में अंतरात्मा और विवेक का गुण और विशेषता होती है, वह कम से कम एक सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान होता है। इस सत्यनिष्ठा और दयालुता की कुछ बारीकियाँ होती हैं। इसका मतलब बाहर से बिल्कुल सीधा-सादा दिखने या ऐसा दिखने से नहीं है कि वह बुरा इंसान नहीं है, बुराई करने या बुरे काम करने जैसे किसी भी प्रत्यक्ष व्यवहार में शामिल नहीं है—इसका मतलब उन बाहरी अभिव्यक्तियों से नहीं है जिनके बारे में लोग अपनी धारणाओं में सोचते हैं। बल्कि इसका मतलब है कुछ ऐसी अभिव्यक्तियाँ होना जो विशेष परिस्थितियों में सत्यनिष्ठा और दयालुता के सार से मेल खाती हों।
सबसे पहले, सत्यनिष्ठा और दयालुता के बारे में बात करते हैं। अंतरात्मा में मौजूद मुख्य अभिव्यक्तियाँ सत्यनिष्ठा और दयालुता हैं। आओ, इसे पहले स्व-आचरण के संदर्भ में देखें। किसी व्यक्ति के आचरण को देखकर यह कैसे बताया जा सकता है कि वह सत्यनिष्ठ और दयालु है? आमतौर पर, अंतरात्मा वाले लोग स्व-आचरण के लिए एक सीमा तय करते हैं; इसका मतलब है कि उनके दिलों में इस बात के लिए एक मानक होता है कि आचरण कैसे करें। उदाहरण के लिए, दूसरों के साथ मेलजोल करते समय, वे उनका फायदा नहीं उठाते। क्या यह स्व-आचरण का एक मानक है? (हाँ।) दूसरों के साथ मेलजोल करते समय उनका फायदा नहीं उठाना स्व-आचरण का एक बुनियादी मानक है। अंतरात्मा और विवेक वाले लोगों के पास इस बात के लिए एक सीमा होती है कि स्व-आचरण कैसे करें, मामलों से कैसे निपटें और दूसरों के साथ मेलजोल कैसे करें, जिसका मतलब लोगों का फायदा नहीं उठाना है। चाहे वे किसी गरीब व्यक्ति के साथ मेलजोल कर रहे हों या अमीर व्यक्ति के साथ, वे उनका फायदा नहीं उठाते। वे सोचते हैं, “दूसरों का पैसा उनका पैसा है। मैं कितना भी गरीब क्यों न होऊँ, मैं उनका फायदा नहीं उठा सकता।” अगर उनके पास पैसे की कमी है या उन्हें मदद की जरूरत है, तो भले ही वे देखें कि कोई और अमीर है, वे उसका फायदा बिल्कुल नहीं उठाएँगे। अगर कोई उनकी मदद करता है, तो वे उसे चुकाने का कोई न कोई तरीका ढूँढ़ लेंगे और बस यहीं नहीं रुकेंगे। उदाहरण के लिए, अगर कोई उन्हें खाना खिलाता है, तो वे उसे भी बदले में कुछ देने का मौका ढूँढ़ेंगे या जब दूसरे व्यक्ति को जरूरत होगी, तब उसकी मदद करने की भरसक कोशिश करेंगे। उन्हें लगता है कि सिर्फ इसी तरह से आचरण करके वे अपने दिलों में सुकून महसूस कर सकते हैं। तुम देखो, क्या यह स्व-आचरण के लिए एक सीमा रखना नहीं है? (हाँ।) यह भी स्व-आचरण का एक मानक है। अंतरात्मा वाले लोग इसे हासिल कर सकते हैं। अगर उन पर किसी के पैसे या कोई एहसान बकाया है, तो उन्हें अपने दिल में हमेशा एक कसक महसूस होती है और वे उस व्यक्ति को पैसे या एहसान चुकाने के मौके लगातार ढूँढ़ते रहेंगे। वे उसे पैसे या भौतिक चीजों से कर्ज चुका सकते हैं या जब वह व्यक्ति किसी मुश्किल का सामना कर रहा हो, तब वे अपनी पूरी क्षमता से उसकी मदद कर सकते हैं। सिर्फ इसी तरह से वे अपने दिलों में सुकून और कर्ज-मुक्त महसूस कर सकते हैं। अगर उन्हें उस इंसान को मुआवजा देने का मौका नहीं मिलता या उनके पास उसका कर्ज चुकाने की क्षमता नहीं है, तो वे हमेशा उसके प्रति कर्जदार होने की भावना महसूस करेंगे। जब वे उस इंसान को देखेंगे, तो उन्हें हमेशा लगेगा कि वे उससे आँखें नहीं मिला सकते, और वे चैन से खा या सो भी नहीं पाएँगे। उनके कंधों से बोझ तभी उतरेगा और उनके दिल को चैन तभी मिलेगा, जब वे उस इंसान को पूरा मुआवजा दे देंगे। सिर्फ ऐसे लोगों में ही अंतरात्मा, विवेक और शर्मिंदगी की भावना होती है। अगर तुम इस तरह के लोगों से मेलजोल करते हो, तो वे कभी भी तुम्हारा कुछ नहीं उधार लेंगे और तुम हमेशा उनके कर्जदार नहीं रहोगे। क्या यह अंतरात्मा होने की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) दूसरों का फायदा नहीं उठाना इस तरह के लोगों के स्व-आचरण की एक सीमा होती है और इसे उनके स्व-आचरण का एक सिद्धांत भी कहा जा सकता है। उन्हें बस इसी तरह काम करना चाहिए; अगर वे ऐसा नहीं करते हैं, तो वे अपने दिलों में बेचैनी महसूस करेंगे और उनमें हमेशा खुद को दोषी ठहराने की भावना होगी। यह सत्यनिष्ठा की अभिव्यक्ति है या अंतरात्मा की दयालुता? (यह सत्यनिष्ठा है।) यहाँ सत्यनिष्ठा थोड़ी ज्यादा प्रमुख है। क्या इसमें दयालुता भी है? (इसमें दयालुता भी है—दूसरों का फायदा उठाने की इच्छा नहीं होना और दूसरों को नुकसान या हानि पहुँचाने की इच्छा नहीं होना।) दूसरों को नुकसान पहुँचाने की इच्छा नहीं होने में दयालुता का एक तत्व है। तो क्या उनके स्व-आचरण के इस सिद्धांत का उनके व्यक्तित्व से कोई लेना-देना है? (नहीं।) क्या इसका उनके परिवार या समाज द्वारा सिखाई गई बातों से कोई लेना-देना है? (नहीं।) क्या इसका उनके गरीब या अमीर होने से कोई लेना-देना है? (नहीं।) क्या इसका उनकी अंतर्दृष्टि से कोई लेना-देना है? (नहीं।) केवल एक ही चीज महत्वपूर्ण है, जो यह है कि इसका उनकी अंतरात्मा और विवेक से लेना-देना है और इसका उनके वर्गीकरण से लेना-देना है। यह केवल इसलिए है क्योंकि उनकी मानवता के भीतर सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं और उनमें मानवता की अंतरात्मा और विवेक है, वे इसी तरह से आचरण करते हैं। यह मानवीय शिक्षा का नतीजा नहीं है। अगर माता-पिता अपने बच्चों को सिखाते हैं, तो भी वे उन्हें सिर्फ स्व-आचरण के कुछ सिद्धांत ही सिखा सकते हैं—माता-पिता अपने बच्चों का प्रकृति सार नहीं बदल सकते और वे अपने बच्चों से अंतरात्मा और विवेक के आधार पर चीजें करवाने में बिल्कुल असक्षम हैं। तो स्व-आचरण का यह सिद्धांत मूलतः उनकी मानवता से आता है। उनके पास स्व-आचरण के लिए इस तरह का सिद्धांत और सीमा होना किसी दूसरे इंसान के प्रभाव का नतीजा नहीं है; यह पूरी तरह से उनके अपने प्रकृति सार से और उनकी अंतरात्मा और विवेक से आता है। इसलिए, अगर किसी इंसान में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं, तो अपने दैनिक जीवन में और अपने आचरण और मामलों से निपटने के दौरान, चाहे वह अमीर हो या गरीब, चाहे उसमें अंतर्दृष्टि हो या नहीं हो, चाहे उसका व्यक्तित्व तेज और कुशल हो या धीमा और इत्मीनान वाला हो, वह चिड़चिड़ा हो या सौम्य—इनमें से कोई भी चीज महत्वपूर्ण नहीं है। क्या महत्वपूर्ण है? यह कि उसके पास स्व-आचरण के लिए एक सीमा हो; उसके पास स्व-आचरण के लिए एक सीमा या एक बुनियादी सिद्धांत हो, जो दूसरों का फायदा नहीं उठाना है। इस “दूसरों का फायदा नहीं उठाने” का मतलब है दूसरों का फायदा नहीं उठाने की इच्छा होना और कभी भी दूसरों का फायदा नहीं उठाना। स्व-आचरण की यह सीमा और सिद्धांत उसकी मानवता से आते हैं; ये उसकी मानवता के गुणों की वजह से पैदा होते हैं। इसलिए, यह तथ्य कि उसके पास स्व-आचरण का ऐसा सिद्धांत है, उसकी अंतरात्मा से और उसकी मानवता की सत्यनिष्ठा और दयालुता से अटूट रूप से जुड़ा हुआ है। कहने का मतलब है, जब किसी इंसान की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होंगे, सिर्फ तभी उसके स्व-आचरण में दूसरों का फायदा नहीं उठाने का सिद्धांत होगा; यह सिद्धांत उसकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुणों से उत्पन्न होता है। मुझे बताओ, सत्यनिष्ठ और दयालु होने के अलावा, क्या मानवता के गुणों वाले लोगों में शर्म का एहसास और शर्मिंदगी की भावना होती है? (हाँ।) वे दूसरों का फायदा उठाने के बजाय खुद ही नुकसान उठाना पसंद करेंगे। अगर वे किसी का फायदा उठाते हैं, तो उन्हें हमेशा लगेगा कि उन पर उसका कुछ एहसान है। वे जब भी उस व्यक्ति को देखेंगे, उन्हें लगेगा कि वे एक कमतर इंसान हैं; वे बेचैन महसूस करेंगे और उनके दिलों में अस्थिरता होगी, वे हमेशा सुधार करने के अवसरों की तलाश में रहेंगे। अगर उन्होंने किसी और से पैसे उधार लिए हैं और उन्हें पूरी तरह से चुकाया नहीं है, तो वे अपने दिल में बेचैन महसूस करेंगे। अगर कोई अनजाने में भी इस मामले को उठाता है, तो वे अपना चेहरा लाल हुआ महसूस करेंगे, वे शर्मिंदा और बेचैन महसूस करेंगे। अगर कोई इस मामले के बारे में थोड़ा और कठोरता से बात करता है, तो वे चाहेंगे कि काश जमीन उन्हें निगल जाए, वास्तव में किसी का सामना करने में बहुत शर्मिंदा महसूस करेंगे। क्या ये शर्म का एहसास होने की अभिव्यक्तियाँ हैं? (हाँ।) ये सभी अभिव्यक्तियाँ हैं जो मानवता के गुणों वाले लोग प्रदर्शित करते हैं, जो उनकी अंतरात्मा से प्रेरित होती हैं। अगर इस प्रकार के व्यक्ति पर कोई कर्ज या एहसान होता है, तो वह अपने दिल में बेचैन महसूस करता है, जैसे कि उसने कोई शर्मनाक काम किया हो। वह अक्सर अपनी अंतरात्मा द्वारा दोषी ठहराया गया महसूस करता है और दूसरे पक्ष का कर्ज चुकाने के लिए हर संभव तरीका आजमाने की कोशिश करता है। कुछ लोग कई काम करते हैं; कुछ लोग अपनी सबसे प्रिय संपत्ति को बेच देते हैं; कुछ लोग अपने परिवार की संपत्तियाँ बेच देते हैं और कुछ तो बीमार भी पड़ जाते हैं, लेकिन डॉक्टर को दिखाने के लिए पैसे खर्च करने को तैयार नहीं होते—वे पैसे बचाने और जल्दी से अपना कर्ज चुकाने के लिए खुद गरीबी और थकान झेलना पसंद करेंगे। कुछ लोग यह बात नहीं समझते और कहते हैं, “अगर कोई और तुम्हारी तरह पैसे कमाता, तो वह बहुत पहले ही कार और घर खरीद लेता। तुम अपना सारा पैसा अपना कर्ज चुकाने में लगा देते हो और खुद मुश्किल जिंदगी जीते हो—क्या यह बहुत बड़ी बेवकूफी नहीं है? अगर तुममें पैसे चुकाने की क्षमता नहीं है, तो बस चुकाओ ही मत।” लेकिन वे सोचते हैं, “मैं ऐसा आचरण कैसे कर सकता हूँ? इस तरह का आचरण करना अंतरात्मा का नहीं होना है—क्या तब भी मैं इंसान कहलाऊँगा? अच्छा जीवन जीने के लिए दूसरों के पैसे खर्च करना—क्या यह बुरे कामों में पैसे खर्च करने से अलग है? क्या मेरी अंतरात्मा शांत रह सकती है? जो कुछ दूसरों का है उस पर दावा करना कितना घिनौना और गंदा है! उनके लिए पैसे कमाना आसान नहीं था। उन्होंने उस समय मुझे पैसे उधार देकर पहले ही मुझ पर बहुत बड़ा एहसान किया था और मैं इसके लिए उनका हमेशा आभारी रहूँगा; मुझे उन्हें जल्दी से जल्दी पैसे वापस करने होंगे। अपने आचरण में व्यक्ति को अंतरात्मा से काम लेना चाहिए और भरोसेमंद होना चाहिए; कोई व्यक्ति केवल अपने कमाए हुए पैसे खर्च करने में ही सहज महसूस कर सकता है। दूसरों का फायदा नहीं उठाना और लोगों का कर्जदार नहीं होना—यह व्यक्ति के स्व-आचरण की सबसे बुनियादी सीमा है।” तुम देखो, अंतरात्मा वाले लोगों के पास चीजें करने का सबसे बुनियादी, सही सिद्धांत होता है। भले ही उनके स्व-आचरण के लिए तय किए गए लक्ष्यों और सत्य सिद्धांतों के बीच अभी भी बहुत बड़ा अंतर है, फिर भी जहाँ तक स्व-आचरण की बात है, इस तरह के लोगों का दूसरों का फायदा नहीं उठाने का स्व-आचरण का सिद्धांत यह दिखाने के लिए काफी है कि उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं। जब दूसरों का फायदा उठाने या कर्ज लेने की बात आती है, तब ये लोग जिस स्व-आचरण के सिद्धांत की बात करते हैं उससे यह देखा जा सकता है कि वे अपेक्षाकृत सत्यनिष्ठ और दयालु हैं। वे टेढ़े-मेढ़े तर्क का इस्तेमाल नहीं करते या बिना सोचे-समझे काम नहीं करते। वे कहते हैं, “उस इंसान ने उस वक्त पैसे उधार देकर मेरी मदद की जब मैं मुश्किल समय से गुजर रहा था; यह पहले से ही बहुत बड़ा एहसान था। अगर मैं वह पैसा चुका सकता हूँ, तो मुझे तुरंत चुका देना चाहिए।” क्या यह सत्यनिष्ठा वाला आचरण करने की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) कम से कम, उनमें धार्मिकता की भावना तो है और उनकी मानवता बुरी नहीं है। वहीं बुरे लोग कैसे सोचते हैं? “तुम्हें किसने कहा था कि मुझे पैसे उधार दो? क्या यह ठीक नहीं होता कि तुम मुझे पैसे उधार ही नहीं देते? तुम उधार देने को तैयार थे। अगर मैं चुकाना नहीं चाहता, तो नहीं चुकाऊँगा। मैं तुम्हारे पैसे से कारोबार करूँगा और बड़ा मुनाफा कमाऊँगा; तुम्हारे पास तो वैसे भी खर्च करने के लिए पैसे हैं। इसके अलावा, एक बार जब पैसे मेरे हाथ में आ गए, तो वे मेरे हैं, मैं उन्हें जैसे चाहूँ खर्च कर सकता हूँ। जहाँ तक उन्हें चुकाने या नहीं चुकाने की बात है, यह मेरी मनोदशा पर निर्भर करता है। जब मेरे पास पैसे होंगे और मैं अच्छी मनोदशा में हुआ, तो मैं तुम्हें चुका दूँगा—तुम उसे एक अप्रत्याशित लाभ मान सकते हो। यदि मैं तुम्हारे पैसे नहीं लौटाता, तो तुम कुछ नहीं कर सकते; मैंने तुम्हारे लिए कोई ‘कर्जनामा’ नहीं लिखा है, तो मुकदमा करने पर भी तुम जीत नहीं पाओगे।” यह बुरे लोगों की मानसिकता है। क्या यह अनुचित नहीं है? (हाँ।) बुरे लोग जिस तरह से सोचते हैं वह सत्यनिष्ठ लोगों के सोचने के तरीके के ठीक उलट है। सत्यनिष्ठ लोगों की सोच बहुत ईमानदार होती है। अविश्वासियों के शब्दों में, वे समझदार और विवेकशील होते हैं, वे हर तरह से दूसरों के प्रति विचारशील होते हैं; वे स्नेह और धार्मिकता को महत्व देते हैं, उनमें सूझ-बूझ और मानवता होती है। वे विवेकहीन तरीके से व्यवहार नहीं करते और टेढ़े-मेढ़े तर्क इस्तेमाल नहीं करते। यही सत्यनिष्ठा है। और सत्यनिष्ठ लोग कैसे सोचते हैं? “उनके लिए पैसे कमाना आसान नहीं था। भले ही उनके पास बहुत पैसा हो, यह उनका अपना पैसा है; यह तुम्हारे इस्तेमाल के लिए नहीं है। उनका तुम्हें इसे उधार देना एक एहसान था; एक बार जब तुम किसी से कुछ लेते हो, तो तुमने एक कर्ज लिया है, फिर इसे चुकाना तुम्हारी जिम्मेदारी और दायित्व है।” तुम देखो, क्या उनके सोचने का तरीका ईमानदार नहीं है? क्या वे सूझ-बूझ वाले नहीं हैं? क्या वे समझदार और विवेकशील नहीं हैं? (वे हैं।) यह सत्यनिष्ठा की अभिव्यक्ति है। अगर किसी व्यक्ति की मानवता में सत्यनिष्ठा का गुण है, तो वह इसी तरह सोचेगा। वह समझदार और विवेकशील होगा, वह सूझ-बूझ वाला इंसान होगा—यह मानवता होने की अभिव्यक्ति है। मानवता नहीं होने की अभिव्यक्ति है एक बुरे इंसान की तरह व्यवहार करना : अनुचित तरीके से काम करना, कारण जानने से इनकार करना, मनमानी करना, रौब जमाना और हावी होना, हमेशा टेढ़े-मेढ़े तर्क का इस्तेमाल करना, मानवता की सूझ-बूझ को भी नहीं समझना, समझदार और विवेकशील होने में पूरी तरह नाकाम रहना और इस तरह सत्य का अभ्यास करने के स्तर तक उठने में और भी ज्यादा विफल रहना। जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, वे समझदार और विवेकशील होते हैं; वे जो बातें कहते हैं वे बहुत निष्पक्ष और सूझ-बूझ भरी होती हैं, उनमें मानवता का भाव होता है और वे जायज होती हैं। सिर्फ ऐसे लोगों में ही सत्य स्वीकार करने की स्थितियाँ होती हैं। परमेश्वर के वचनों को सुनकर, केवल मानवता के ऐसे गुणों वाले लोग ही महसूस करते हैं, “परमेश्वर के वचन बहुत सही हैं, यह वाकई सत्य है! लोगों को ऐसे ही आचरण करना चाहिए। लोगों के पास अपने स्व-आचरण के लिए एक सीमा होनी चाहिए। जिन लोगों के पास अंतरात्मा और विवेक है, उन्हें दूसरों के साथ ऐसा ही व्यवहार करना चाहिए; उन्हें इसी तरह का आचरण करना चाहिए और मामलों को इसी तरह से सँभालना चाहिए। परमेश्वर के वचन बहुत सही हैं!” तुम देखो, उनकी मानवता में मौजूद सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण उन्हें सत्य स्वीकार करने के लिए बुनियादी स्थितियाँ देते हैं, जिससे वे सत्य सुनने के बाद आमीन कह सकते हैं और उसे स्वीकार कर सकते हैं, वह भी बिना प्रतिरोधी महसूस किए, बिना उससे नफरत किए या बिना उसे अस्वीकार किए। उन्हें लगता है कि परमेश्वर के वचन सही हैं, पूरी तरह से सामान्य मानवता की जरूरतों के अनुरूप हैं, लोगों के दिलों की जरूरतों को पूरा कर सकते हैं और वह चीज हैं जो सामान्य मानवता वाले लोगों में होनी चाहिए; केवल सत्य ही उन्हें संतुष्ट कर सकता है और उनकी मानवता को बेहतर बना सकता है। इसलिए, जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं वे ही सत्य के प्यासे हो सकते हैं, परमेश्वर के वचन सुनकर यह जान सकते हैं कि वे सत्य हैं, फिर अपने दिलों में सत्य स्वीकार कर सकते हैं और एक बार सत्य समझ जाने के बाद उसका अभ्यास कर सकते हैं।
दूसरों का फायदा नहीं उठाने के स्व-आचरण के सिद्धांत में, कोई इंसान मानवता के जो गुण स्पष्ट रूप से अभिव्यक्त करता है, वे हैं सत्यनिष्ठा, दयालुता, और शर्मिंदगी की भावना। बेशक, एहसान या पैसे का कर्ज नहीं रखने के अलावा, अंतरात्मा और विवेक वाले लोग दूसरों का फायदा नहीं उठाने की एक और अभिव्यक्ति दिखाते हैं, जो यह है कि जब दूसरे लोग उनका फायदा उठाते हैं और उन्हें नुकसान होता है, तो वे उनके खिलाफ नहीं जाते हैं और कभी-कभी तो वे बिना माँगे भी दूसरों को चीजें दे सकते हैं। अगर कोई बार-बार अपना कर्ज चुकाने की बात करता है, तो ये लोग शर्मिंदा महसूस करते हैं: “तुम इस बात को ऐसे उठाते हो जैसे मैं तुम पर अपना कर्ज चुकाने के लिए दबाव डाल रहा हूँ। असल में, मेरा ऐसा करने का कभी इरादा नहीं था। जब तुम्हारे पास पैसे हों, तुम इसे चुका सकते हो; अगर तुम्हारे पास पैसे नहीं हैं और तुम हमेशा के लिए मेरे कर्जदार बने रहते हो, तो भी ठीक है। अगर तुम मुझे पैसे वापस नहीं करने पर जोर देते हो, तो मैं तुमसे पैसे वापस नहीं माँगूँगा। अगर तुम चुका सकते हो, तो चुकाओ; अगर तुम नहीं चुका सकते, तो मैं इसे परोपकार में दिया दान समझूँगा।” तुम देखो, उनमें इस तरह की अभिव्यक्ति भी होती है और अपने स्व-आचरण के लिए यह सीमा भी होती है। मान लो कि कोई उनसे कोई ऐसी चीज उधार माँगता है जो उनके लिए बहुत महत्वपूर्ण है और जिसे वे बहुत संजोकर रखते हैं। भले ही वे बहुत अमीर न हों, जब दूसरा व्यक्ति कहता है कि वे उससे उधार लेना चाहते हैं, तब वे सोचते हैं, “वह जरूर किसी मुश्किल हालात में होगा जो मुझसे कुछ उधार माँग रहा है, तो मुझे उसे उधार दे देना चाहिए।” उदाहरण के लिए, मान लो कि खेती के व्यस्त मौसम में कोई व्यक्ति उनसे उनकी गाड़ी उधार माँगता है। उन्हें खुद गाड़ी की जरूरत है और अगर वे इसे उस व्यक्ति को उधार दे देते हैं, तो उनके अपने काम में देरी होगी। लेकिन, क्योंकि वे अपनी मानवता के मामले में दयालु हैं, तो वे फिर भी गाड़ी उधार दे देते हैं और उस व्यक्ति से बस इतना कहते हैं कि इस्तेमाल करने के बाद जल्दी से लौटा दे। कुछ दिनों बाद, वह व्यक्ति गाड़ी लौटा देता है, लेकिन वह क्षतिग्रस्त होती है और उसकी मरम्मत नहीं हुई होती है, तो उन्हें खुद ही उसकी मरम्मत करानी पड़ती है। उन्हें थोड़ी चिढ़ होती है, लेकिन वे ज्यादा गुस्सा नहीं होते और मन ही मन सोचते हैं, “चलो छोड़ो, हम पड़ोसी हैं और हम हर समय एक-दूसरे से मिलते रहते हैं; मैं उसके खिलाफ कुछ नहीं करूँगा।” वे लोगों के साथ व्यवहार में इतने उदार होते हैं; जब उन्हें कोई नुकसान होता है, तब भी वे इसकी कोई परवाह नहीं करते। भले ही हर कोई एक जैसा इंसान है, लेकिन लोगों के स्व-आचरण के सिद्धांत और सीमाएँ अलग-अलग होती हैं। कुछ लोग दान दे सकते हैं, जबकि दूसरे न केवल ऐसा नहीं कर सकते, बल्कि दूसरों का फायदा भी उठाना चाहते हैं। भले ही इस तरह के अपेक्षाकृत सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान नुकसान होने के बाद थोड़ा चिढ़ जाते हैं, लेकिन वे जाकर दूसरे पक्ष से बहस नहीं करते, न ही उनसे झगड़ा करते हैं या मुआवजा माँगते हैं; वे बस इसी तरह सब्र रखते हैं। अगर उन्हें किसी आयोजन में भाग लेने के लिए बाहर जाना पड़े और किसी की गाड़ी उधार लेनी पड़े, तो उसका इस्तेमाल करने के बाद वे उसे धोते हैं और टंकी में पेट्रोल भी भरवाते हैं। जब वे उसे उसके मालिक को लौटाते हैं, तो गाड़ी बिल्कुल भी क्षतिग्रस्त नहीं होती और वे इस तरह की गाड़ी के लिए सबसे ऊँची दैनिक किराये की दर से उसके मालिक को मुआवजा भी देते हैं। वे उस व्यक्ति को यह महसूस नहीं होने देते कि उसका फायदा उठाया गया है। उन्हें लगता है कि उन्हें यही करना चाहिए। कुछ लोग कहते हैं, “क्या इस तरह के इंसान को सिर्फ अपने स्वाभिमान की परवाह होती है?” भ्रष्ट इंसानों में से कितने लोग सिर्फ अपने स्वाभिमान के लिए इस स्तर तक पहुँच सकते हैं? अविश्वासी अक्सर कहते हैं, “किसी के स्वाभिमान की कितनी कीमत है?” और “अंतरात्मा की कितनी कीमत है?” कोई भी सिर्फ दिखावे के लिए या दूसरों को यह सोचने पर मजबूर करने के लिए कि उनमें अंतरात्मा और मानवता है, अपनी जेब ढीली नहीं करेगा। हर इंसान के लिए, भौतिक चीजें और पैसे जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण होते हैं। दिखावे के लिए कुछ अच्छी, सम्माननीय या झूठी और चापलूसी वाली बातें तो लोग कर ही लेते हैं, लेकिन दूसरों की मदद करने के लिए असल में अपने पैसे खर्च करना आसान नहीं है—बहुत कम लोग ऐसा कर पाते हैं। सिर्फ वही लोग ऐसा कर सकते हैं जिनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं। ऐसे लोग इस सिद्धांत पर काम करते हैं, “मैं तुम्हारा फायदा उठाने के बजाय थोड़ा नुकसान सहना पसंद करूँगा।” अगर वे ऐसा नहीं करते, तो उन्हें दिल में बुरा लगता है। अक्सर, जब इस तरह के लोग कुछ उधार लेते हैं, तब वे न सिर्फ उधार देने वाले का फायदा नहीं उठाते, बल्कि कभी-कभी अपनी जेब से ज्यादा पैसे भी चुकाते हैं। उदाहरण के लिए, जब वे किसी की गाड़ी उधार लेते हैं, तब उसमें पेट्रोल भरवाते हैं, उसे धोते हैं और आखिर में उस तरह की गाड़ी के लिए सबसे ऊँची दैनिक किराये की दर से मालिक को भुगतान भी करते हैं। इस तरह से हिसाब लगाने पर, क्या यह उससे ज्यादा महँगा नहीं पड़ता जितना कि अगर उन्होंने खुद गाड़ी किराए पर ली होती? (हाँ।) जब वे गाड़ी वापस करते हैं, अगर मालिक उसे ध्यान से देखता है और एक-दो बार जाँच करता है, तो उधार लेने वाले को अंदर से बेचैनी महसूस होती है, उसे चिंता होती है कि कहीं मालिक गाड़ी में किसी जगह पर कोई खराबी न देख ले और मुआवजा न माँग ले। आखिर में, जाँच करने के बाद मालिक कहता है कि कोई दिक्कत नहीं है, वह काफी संतुष्ट है और यह भी बताता है कि वे भविष्य में जब चाहें गाड़ी उधार ले सकते हैं। केवल तभी इन लोगों को अपने दिल में सुकून मिलता है और वे सोचते हैं, “आह, वे मुझ पर भरोसा करते हैं; मुझे बस यही सुनना था!” तुम देखो, वे अपने आचरण में क्या चाहते हैं? वे दूसरों का फायदा नहीं उठाना चाहते; वे सिर्फ विश्वसनीयता के साथ आचरण करना चाहते हैं और नहीं चाहते कि दूसरे उन्हें नीची नजर से देखें। मुझे बताओ, क्या कोई ऐसा इसलिए कर पाता है क्योंकि उसे अपने स्वाभिमान की परवाह है, क्योंकि वह डरपोक है, क्योंकि वह गरीब है और उसमें कोई महत्वाकांक्षा नहीं है या फिर इसलिए कि उसे नीची नजर से देखे जाने का डर है? ऐसा इनमें से किसी भी चीज की वजह से नहीं है। दूसरों के साथ मेलजोल का सबसे बुनियादी सिद्धांत, जो अंतरात्मा वाले लोगों के पास होता है, वह है दूसरे लोगों का फायदा नहीं उठाना। वे बस मन की शांति चाहते हैं। भले ही उन्हें खुद नुकसान हो जाए या इसकी वजह से उनका जीवन मुश्किल में पड़ जाए, वे दूसरों पर आरोप नहीं लगाते या उनसे हिसाब बराबर नहीं करना चाहते। वे सिर्फ अपनी अंतरात्मा के हिसाब से सही काम करना चाहते हैं और किसी से कुछ भी उधार नहीं लेना चाहते। वे जो भी करते हैं, उन्हें लगता है कि उन्हें ऐसा व्यवहार करना चाहिए जिससे उन्हें बुरा न लगे, उनकी अंतरात्मा उन्हें दोषी न ठहराए और वे किसी का फायदा न उठाएँ; वे ऐसा कुछ नहीं करते जिससे वे लोगों के कर्जदार बन जाएँ और जिसके कारण लोग उनके पीठ पीछे उनकी आलोचना करें। वे ऐसा व्यवहार इसलिए नहीं करते कि वे गरीब हैं या उनका व्यक्तित्व कमजोर है और न ही इसलिए कि वे घमंडी हैं; बल्कि, ये उनकी मानवता के गुण हैं—सत्यनिष्ठा और दयालुता—जो उन्हें ऐसी चीजें करने के लिए प्रेरित करते हैं। खासकर जब बात दूसरों से मेलजोल करते समय उनका फायदा नहीं उठाने की आती है, तब वे खास तौर पर दयालु और सत्यनिष्ठ तरीके से व्यवहार करते हैं।
मान लो कि कोई वित्तीय दबाव में है और जब वह किसी संपन्न व्यक्ति के संपर्क में आता है, तब वह व्यक्ति उसे दान के तौर पर कुछ ऐसी चीजें देता है जिनका वह अब घर पर इस्तेमाल नहीं करता। पाने वाला व्यक्ति मन ही मन सोचता है, “उसने मुझे ये चीजें इसलिए दीं क्योंकि वह मुझे नीची नजर से नहीं देखता; उसने मुझ पर एहसान किया है। तो मैं उसका एहसान कैसे चुकाऊँ? मैं महँगे उपहार नहीं दे सकता—मेरे पास बस खेत की ताजी सब्जियाँ और घर पर आजादी से घूमने वाली मुर्गियों के अंडे हैं। हो सकता है उसे इन चीजों की ज्यादा परवाह न हो, लेकिन ये हम गरीब लोगों के पास मौजूद सबसे अच्छी चीजें हैं, सबसे अच्छी चीजें जो हम उसे दे सकते हैं। मैं उसे उनमें से कुछ दे दूँगा ताकि वह कुछ ताजा स्वाद चख सके; यह मेरी सराहना का एक संकेत भी है।” वह संपन्न व्यक्ति असल में उसे ऐसी चीजें दे रहा था जिनका उसके अपने लिए कोई उपयोग नहीं है, लेकिन पाने वाला व्यक्ति इस बात को सही ढंग से समझने में समर्थ था। उसने यह नहीं कहा, “तुमने मुझे ऐसी चीजें दीं जिनका तुम इस्तेमाल ही नहीं करते और जिनकी तुम्हें परवाह नहीं है—क्या यह मुझे एक भिखारी की तरह किनारे करना नहीं है? अगर तुम उन चीजों का इस्तेमाल करते, तो भी क्या तुम मुझे वे चीजें देते? तुमने मुझे अपनी अच्छी चीजें क्यों नहीं दीं?” जिस इंसान में सच में अंतरात्मा और विवेक होता है, वह इस तरह नहीं सोचेगा। वह बस सोचेगा, “उसने मुझे ये चीजें दीं, इसका मतलब है कि वह मुझे नीची नजर से नहीं देखता।” भले ही दूसरे लोग कुछ अप्रिय टिप्पणियाँ करें और वह अंदर से थोड़ा परेशान महसूस करे, फिर भी वह मामले को सही तरीके से सँभाल सकता है और अपनी बात रखने के लिए बहस करने की कोशिश नहीं करता; इसके अलावा, वह अपने परिवार की स्थिति और वित्तीय हालात के आधार पर, अपने पास मौजूद सबसे अच्छी चीजें अपना भला करने वाले व्यक्ति को मुआवजे के तौर पर दे सकता है। तुम देखो, दूसरों के साथ मेलजोल करने और पेश आने का उसका सिद्धांत यह है कि उनका फायदा नहीं उठाया जाए। भले ही यह सिद्धांत कोई उल्लेखनीय बात नहीं लगती और यह एक आम बात है जिसके ज्यादातर लोग अभ्यस्त हो गए हैं, लेकिन हर कोई इसका पालन नहीं कर सकता और न ही हर कोई इसे स्व-आचरण का सबसे बुनियादी सिद्धांत मानता है—यह ऐसी चीज तो बिल्कुल भी नहीं है जिसे हर कोई महत्व देता हो। जो लोग सच में सत्यनिष्ठ और दयालु होते हैं, वे लोगों से जुड़ते और मेलजोल करते समय किसी का एहसान नहीं लेने या उनका फायदा नहीं उठाने को बहुत महत्व देते हैं। चाहे वे आरामदायक जिंदगी का आनंद ले रहे हों या गरीबी झेल रहे हों, वे अपने स्व-आचरण में और मामलों को सँभालने में मन की शांति खोजते हैं और अपनी अंतरात्मा के आरोपों से मुक्ति चाहते हैं। सिर्फ इस तरह के लोग ही ऐसा आचरण करना चाहते हैं। चाहे वे किसी भी जमाने या किसी भी तरह के सामाजिक परिवेश में हों या किसी भी समूह के लोगों के बीच हों, जो लोग इस तरह से आचरण कर पाते हैं, वे ऐसा इसलिए करते हैं क्योंकि उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा, दयालुता और शर्म को जानने जैसे गुण होते हैं। इसके उलट, अगर किसी व्यक्ति में ये गुण नहीं हैं, तो उसके स्व-आचरण की कोई सीमा नहीं होगी और अगर होगी भी, तो वे उसे बनाए रखने में असमर्थ होंगे। वे अपने स्व-आचरण के लिए कोई सीमा क्यों नहीं बनाए रख पाते? इसकी मुख्य वजह यह है कि उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा, दयालुता और शर्म की भावना जैसे गुण नहीं होते। कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसे लोग कुछ समय के लिए अपने स्व-आचरण के लिए कोई सीमा नहीं बनाए रख सकते?” वे विशेष परिस्थितियों में ऐसा कर सकते हैं। कभी-कभी ऐसा लगता है कि वे सीमा बनाए रख पाते हैं; वे विशेष परिस्थितियाँ होती हैं। कभी-कभी वे दूसरों का फायदा उठाने या उनका एहसान लेने से बच पाते हैं क्योंकि परिस्थितियाँ ठीक नहीं होती हैं या उन्हें कोई उपयुक्त मौका नहीं मिलता। उदाहरण के लिए, अगर वे चीजें या पैसे उधार लेते हैं और उन्हें वापस नहीं करते, तो इसके बुरे परिणाम होंगे : उन्हें जनमत की निंदा झेलनी पड़ेगी या कानूनी तौर पर जिम्मेदार ठहराया जाएगा, लोग उनके पीठ पीछे उनकी बुराई करेंगे या यह भी हो सकता है कि वे अपने गाँव, खेड़े या समुदाय में नहीं रह पाएँ। वे ऐसा करने से सिर्फ इसलिए परहेज करते हैं क्योंकि वे मजबूर हैं और उनके पास कोई रास्ता नहीं है; यह मजबूरी है कि वे बेमन से उनका भला करने वाले को पैसे चुका देते हैं या कुछ समय के लिए उनका फायदा उठाने से बचते हैं। लेकिन इस तरह का इंसान जो अपने स्व-आचरण के लिए कोई सीमा नहीं बनाए रख पाता है, वह कभी भी इस तरह से अग्रसक्रिय होकर काम नहीं करता, क्योंकि उसकी मानवता में सत्यनिष्ठा, दयालुता और शर्म की भावना जैसे गुण नहीं होते। इसके विपरीत, जो इंसान सच में दूसरों का फायदा उठाने से परहेज कर सकता है, वह ऐसा अग्रसक्रिय होकर करता है; यह कुछ ऐसा है जो वह स्वाभाविक रूप से प्रकट करता है या उसने खुद अपने स्व-आचरण के लिए इस तरह का सिद्धांत और सीमा निर्धारित की है। जाहिर तौर पर, यह तथ्य कि उसके पास अपने स्व-आचरण के लिए इस तरह का सिद्धांत है, यह एक स्वाभाविक खुलासा है जो उसकी अंतरात्मा और विवेक से आता है और यह स्वाभाविक खुलासा पूरी तरह से इस बात पर आधारित है कि उसमें सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं; वह दूसरों से प्रभावित नहीं होता है, न ही वह अपने परिवेश से मजबूर होता है। यह बस कुछ ऐसा है जो वह स्वाभाविक रूप से प्रकट करता है, जिसकी जरूरत उसकी मानवता को है और जिसकी जरूरत उसकी अंदरूनी दुनिया को है। यह इस बात को कहने के लिए एक पर्याप्त आधार है कि इस तरह के इंसान की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण जन्मजात होते हैं। अगर वह इस तरह से काम नहीं करता है, तो वह अपनी अंतरात्मा के साथ तालमेल नहीं बिठा पाएगा और उसे अंदर से बेचैनी महसूस होगी; उसे जीने में बहुत शर्म आएगी और वह किसी के सामने आने में बहुत लज्जा महसूस करेगा। नतीजतन, वह बहुत स्वाभाविक रूप से इस तरह का आचरण करता है। मुझे बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि दूसरों का फायदा नहीं उठाने का यह स्व-आचरण का सिद्धांत महत्वपूर्ण है? (हाँ।) दूसरों का फायदा नहीं उठाना स्व-आचरण का एक बुनियादी सिद्धांत प्रतीत होता है जो बहुत मामूली बात है, लेकिन यह एक महत्वपूर्ण संकेत है जो दिखाता है कि व्यक्ति की मानवता में किस तरह के गुण हैं। क्या ऐसा नहीं है? (हाँ।)
जो लोग दूसरों का फायदा नहीं उठाते, वे दूसरी तरह की अभिव्यक्ति प्रदर्शित करते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो कि कोई अपेक्षाकृत संपन्न इंसान उन्हें कोई ऐसी चीज देता है जिसका उसके लिए कोई उपयोग नहीं है या जो उसके पास बेकार पड़ी है। उन्हें लगता है कि वे दूसरों को बदले में कुछ दिए बिना उनका फायदा नहीं उठा सकते और वे किसी का एहसान नहीं लेना चाहते, इसलिए वे कहते हैं, “मुझे अभी इसकी जरूरत नहीं है, लेकिन आपकी दयालुता के लिए आपका धन्यवाद।” क्या तुम्हें लगता है कि लोग लालची होते हैं? जब लोग अच्छी चीजें देखते हैं, तब क्या उन्हें वे पसंद आती हैं और वे उनका आनंद लेना चाहते हैं? हर कोई उन्हें पसंद करता है और उनका आनंद लेना चाहता है, लेकिन लोगों के बीच फर्क होता है। उदाहरण के लिए, ज्यादातर लोग मशहूर ब्रांड के कंप्यूटर इस्तेमाल करना पसंद करते हैं जो अच्छी गुणवत्ता वाले और तेज हों और जिनकी तस्वीर एकदम साफ हो। कुछ लोगों के पास पैसे नहीं होते और वे इसे खरीद नहीं सकते, इसलिए वे हमेशा दूसरों का फायदा उठाना चाहते हैं। जब वे देखते हैं कि कोई मशहूर ब्रांड का कंप्यूटर इस्तेमाल करता है, तब वे अक्सर उसे उधार माँगते हैं और यहाँ तक कि उसके मालिक की अनुमति के बिना या मालिक के नहीं होने पर उसका इस्तेमाल करते हैं। जब मालिक को उसका इस्तेमाल करने की जरूरत होती है, तब वे बहाने बनाते हैं और मालिक से अपना कंप्यूटर इस्तेमाल करने को कहते हैं। यह देखकर कि वे इसे इस्तेमाल करते रहेंगे और वापस नहीं करेंगे, मालिक के पास दूसरा कंप्यूटर खरीदने के अलावा कोई चारा नहीं बचता। ठीक इसी तरह वे असली मालिक का कंप्यूटर अपने कब्जे में कर लेते हैं और उन्हें अपनी अंतरात्मा में जरा भी ग्लानि नहीं होती। क्या ऐसे इंसान में मानवता है? क्या उनके पास अंतरात्मा है? (नहीं।) क्या वे एक सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान हैं? (नहीं।) एक सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान इस तरह का काम बिल्कुल नहीं करेगा। मान लो कि कोई और व्यक्ति नया कंप्यूटर खरीदता है और यह देखकर कि यह सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान धीमा कंप्यूटर इस्तेमाल कर रहा है, उसे अपना पुराना कंप्यूटर दे देता है। सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान को लगता है कि इसे स्वीकार करने का मतलब फायदा उठाना होगा और वह मना कर देता है। दूसरा इंसान कहता है कि सत्यनिष्ठ इसके लिए उसे बस कुछ दर्जन युआन दे सकता है, लेकिन सत्यनिष्ठ इंसान जानता है कि यह साफ तौर पर दान देने का कृत्य है और उसे लगता है कि वह इसका फायदा नहीं उठा सकता। इसलिए वह पैसे जोड़ने के तरीके सोचता है; और सोचता है कि अगर वह कुछ सौ युआन जोड़कर इसे खरीद लेता है, तो भी इसे कम कीमत पर खरीदना माना जाएगा। अगर दूसरा इंसान पैसे लेने से मना कर देता है, तो वह उस पेशकश को स्वीकार नहीं करेगा; वह खैरात बिल्कुल भी नहीं लेगा। मुझे बताओ, क्या वह इंसान अड़ियल है? अविश्वासी कहते हैं कि इस तरह का इंसान अड़ियल और अपने सिद्धांतों पर अडिग होता है, लेकिन सिद्धांतों से डिगने की इस अनिच्छा में मानवता के गुणों के तौर पर एक खूबी झलकती है। कौन-सी खूबी? उसका मानना है कि परिस्थितियाँ कैसी भी हों, उसे अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों और सीमाओं को बनाए रखना चाहिए; केवल तभी उसे मन की शांति मिलेगी और वह सुकून महसूस करेगा। उसे लगता है कि अगर वह दूसरों का फायदा उठाएगा, तो यह अनुचित होगा और वह उनका सामना नहीं कर पाएगा; अगर वह दूसरों की चीजों का इस्तेमाल करेगा, तो उसे बेचैनी महसूस होगी, उसका चेहरा लाल हो जाएगा और वह अंदर से असहज महसूस करेगा। कुछ लोग कहते हैं, “लेकिन दूसरा इंसान उसे इसका इस्तेमाल करने देने का इच्छुक है।” क्या दूसरे इंसान के इच्छुक होने का मतलब है कि वह उसका फायदा नहीं उठा रहा होगा? भले ही दूसरा इंसान इच्छुक हो, फिर भी यह उसका फायदा उठाना होगा। फायदा उठाना हमेशा फायदा उठाना ही होता है; दूसरे व्यक्ति के इच्छुक होने से इसकी प्रकृति नहीं बदलती है—सार वही रहता है। वह सोचता है, “कुछ दर्जन युआन में इतना अच्छा कंप्यूटर खरीदना साफ तौर पर उसका फायदा उठाना होगा। मैं इसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं कर सकता। अगर मैं पर्याप्त पैसे जोड़ लूँगा, तो मैं इसे खरीद लूँगा। अगर मैं पैसे नहीं जोड़ सका, तो मैं केवल मन की शांति के लिए बस अपने पुराने कंप्यूटर का इस्तेमाल करता रहूँगा।” तुम देखो, क्या यह उसके स्व-आचरण की सीमा नहीं है? (हाँ।) वह किसी भी परिस्थिति में इस सीमा को बनाए रख सकता है। कोई व्यक्ति उसे इतनी अच्छी चीज देना चाहता है, उसके पास इतनी अच्छी चीज को पाने का मौका है—अविश्वासी इसे इस तरह से देखते हैं : “यदि तुम इसे नहीं लेते हो, तो तुम मूर्ख हो। फायदा नहीं उठाना बेकार होगा!” लेकिन वह ऐसा नहीं सोचता। उसका मानना है कि यह मूर्खता नहीं है और वह खुद को धोखा नहीं दे सकता—फायदा उठाना तो फायदा उठाना ही है। उसे लगता है कि अगर उसने फायदा उठाया, तो उसे अपने दिल में बेचैनी महसूस होगी, वह सुकून से नहीं जी पाएगा और उस कंप्यूटर का इस्तेमाल करने में असहज महसूस करेगा; इसलिए वह उस तरह से आचरण नहीं कर सकता। तुम देखो, वह अपने स्व-आचरण की इस सीमा को पार नहीं करेगा—क्या उसकी अंतरात्मा उसके अंदर काम नहीं कर रही है? (हाँ।) उसकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं और उसकी अंतरात्मा अपना काम करती है, इसलिए वह इस सीमा को बनाए रखने में समर्थ है। कहने का मतलब है, वह इस सीमा को इसलिए बनाए रख पाता है क्योंकि उसकी अंतरात्मा लगातार अपना काम करती रहता है, उसे जागरूक करती है और उसे महसूस कराती है, “ऐसा करना गलत है, ऐसा करना अनुचित है। मैं ऐसा नहीं कर सकता।” उसकी अंतरात्मा उसे लगातार सचेत करती है, उस पर अंकुश लगाती है और उसे नियंत्रित करती है, जिससे वह अपने स्व-आचरण के लिए एक सीमा बनाए रख पाता है। आखिर में, संभव है कि वह पेशकश की गई चीज को खरीदने में सक्षम हो जाए और फिर उसका इस्तेमाल करे, या संभव है कि वह उसे खरीदने में कभी सक्षम नहीं हो पाए और कोई दूसरा व्यक्ति उसका इस्तेमाल करे; ऐसी स्थिति में वह परेशान महसूस नहीं करता है। इस मामले में, कम से कम उसने अपने स्व-आचरण की इस सीमा और सिद्धांत को बनाए रखा है। मानवता के गुणों वाला इंसान अपने स्व-आचरण के लिए सिद्धांत और सीमाएँ तय करता है और उन्हें वह लगातार बनाए रखता है। भले ही वह ऐसी स्थिति का सामना करे जिसमें उसके हित शामिल हों और वह उस समय लालच महसूस करे, उसकी अंतरात्मा उसे लगातार सचेत करेगी और उन पर अंकुश लगाएगी। आखिर में, भले ही दूसरों को लगे कि इस व्यक्ति के हितों का नुकसान हुआ या किसी और ने फायदा उठाया, और हो सकता है यह व्यक्ति एक पल के लिए थोड़ा परेशान या असंतुष्ट महसूस करे, लेकिन उसकी अंतरात्मा के काम करने की वजह से उसका दिल जल्दी ही शांत हो जाएगा। वह सोचेगा, “दूसरों का फायदा नहीं उठाना हमेशा बेहतर होता है। कम से कम मेरे मन में शांति है और मैं अपनी अंतरात्मा द्वारा दोषी ठहराया गया महसूस नहीं करता।” वह यही चाहता है। लोगों में अंतरात्मा का यही काम होता है : यह लगातार उन्हें नियंत्रित करती है और उन पर अंकुश लगाती है, जिससे वे सही चुनाव कर पाते हैं। अपने हितों, नैतिकता या कुछ प्रलोभनों के सामने, व्यक्ति की अंतरात्मा लगातार उसके व्यवहार को संयमित रखेगी, नियंत्रित करेगी और दुरुस्त करेगी। आखिरकार, ज्यादातर मामलों में, मानवता के गुण वाले लोग अपनी अंतरात्मा की शांति और सुकून पाने के लिए अपने हितों का त्याग करना चुनते हैं। विशेष परिस्थितियों में, इनमें से कुछ लोग कई बार अपनी अंतरात्मा की सीमा पार भी कर जाते हैं, लेकिन इसके बाद उनकी अंतरात्मा उन्हें दोषी ठहराती है और उन्हें बेचैनी होती है; कुछ तो इस बेचैनी और दोषी महसूस करने की भावना को अपनी बाकी जिंदगी अपने साथ लेकर चलते हैं। यही अंतरात्मा का काम है। कहने का मतलब है, अपनी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण वाले लोग कभी-कभी गलतियाँ करेंगे और विशेष परिस्थितियों में, अपनी मानवता की सीमा पार करेंगे और अपने लिए बनाए गए स्व-आचरण के सिद्धांतों का उल्लंघन भी करेंगे। लेकिन इसका परिणाम यह होगा कि उन्हें अपनी अंतरात्मा की निंदा झेलनी पड़ेगी। अगर उन्हें इसके लिए सुधार करने का मौका नहीं मिलता या उनकी परिस्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देती हैं, तो वे अंदर ही अंदर दोष, बेचैनी, आत्मग्लानि और अपराध-बोध के साथ जिएँगे। ये सामान्य अभिव्यक्तियाँ हैं जो सभी परिस्थितियों में उस इंसान में होती हैं जिसके पास अंतरात्मा और विवेक होता है और जिसकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं।
मानवता के परिप्रेक्ष्य से, सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुणों वाले लोगों की ये अभिव्यक्तियाँ अपेक्षाकृत सामान्य और आम हैं; ये बहुत ऊँची या अलौकिक नहीं हैं, न ही एकदम उत्कृष्ट हैं; इंसान की नजर में, इसका मतलब बस यह है कि व्यक्ति में थोड़ी सत्यनिष्ठा है और वह थोड़ी गरिमा के साथ जीता है। लेकिन परमेश्वर की नजर में, ऐसे लोग अपनी मानवता के अंदर सत्यनिष्ठा और दयालुता के जिन गुणों को जीते हैं वे कीमती हैं। क्योंकि यह मानवजाति दुष्टता को मानती है और कोई भी अंतरात्मा या विवेक की परवाह नहीं करता, इसलिए जो लोग सत्यनिष्ठ और दयालु होते हैं, उन्हें समाज से अलग-थलग कर दिया जाता है। वे स्व-आचरण के जिन बुनियादी सिद्धांतों का पालन करते और जिनके अनुसार वे जीते हैं, उनका समाज के लोग मजाक उड़ाते हैं, उनसे नफरत करते हैं और उनकी निंदा करते हैं। लोग उनका मजाक कैसे उड़ाते हैं? (लोग कहते हैं कि वे मूर्ख, अड़ियल और मंदबुद्धि हैं।) यह बिल्कुल ऐसा ही है। इस समाज में, सामान्य मानवता वाले लोगों का दूसरे लोग मजाक उड़ाते हैं, उनका उपहास करते हैं, उनसे नफरत करते हैं और उनकी निंदा करते हैं; वे दूसरों की मान्यता या उनकी स्वीकृति नहीं पा सकते। अगर तुम लोगों के समूह में हमेशा अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों पर टिके रहते हो, तो तुम बहुत थकाऊ जिंदगी जीते हो। चाहे तुम्हारा सामना किसी से भी हो, तुम हर दिन घुटन और गुस्सा महसूस करते हैं; तुम सोचते हो, “मेरे इस तरह से आचरण करने में क्या गलत है? दूसरे मेरा मजाक क्यों उड़ाते हैं? लोग हमेशा कहते हैं, ‘अंतरात्मा की क्या कीमत है?’ अंतरात्मा सबसे कीमती चीज है। अगर किसी व्यक्ति के पास अंतरात्मा नहीं है, तो क्या वह इंसान भी है?” तुम जैसे लोग अविश्वासियों के किसी भी समूह में मजाक उड़ाए जाने और अलग-थलग किए जाने के पात्र होते हैं; कोई भी तुम्हें स्वीकृति नहीं देता और कोई भी तुम्हारा पक्ष नहीं लेता। तुम सत्यनिष्ठ इंसान हो और अपने स्व-आचरण में सिद्धांतों पर टिके रहते हो, और लोग कहते हैं, “क्या सिद्धांतों पर टिके रहने से तुम्हारे खर्चे पूरे हो जाएँगे? क्या सिद्धांतों पर टिके रहने से तुम्हें ऊँचे पद पर बैठे लोगों से सराहना मिलेगी? अगर तुम सिद्धांतों पर टिके रहते हो, तो क्या हर कोई तुम्हें स्वीकृति देगा? अगर तुम इस समाज में सिद्धांतों पर टिके रहते हो, तो तुम सबसे बड़े मूर्ख हो; तुम्हें दबाकर रखा जाएगा और आखिर में तुम्हारे पास गुजारा करने का कोई तरीका नहीं बचेगा!” तो तुम पूछते हो : “मेरे सिद्धांतों पर टिके रहने में क्या गलत है? ऐसा क्यों है कि एक सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान होने पर भी मेरा मजाक उड़ाया जाता है, मुझे अलग-थलग किया जाता है और दबाकर रखा जाता है?” आखिर में, तुम यह निष्कर्ष निकालते हो कि इंसान अंदर से सड़े हुए हैं, उनमें एक भी अच्छा इंसान नहीं है, वे सब दानव और शैतान हैं! तुम कहते हो कि तुम साफ अंतरात्मा के साथ आचरण करते हो, तुम गरिमामय और सत्यनिष्ठ तरीके से आचरण करना चाहते हो, सब कुछ नियमों के हिसाब से करना चाहते हो और बिना किसी चालबाजी का सहारा लिए अपनी आजीविका चलाने के लिए अपने कौशलों पर भरोसा करते हो, लेकिन इस तरह से आचरण करने की वजह से समाज में तुम्हें दबाया जा सकता है; लोग थोड़ी-सी चालबाजी से तुम्हारा काम खराब कर सकते हैं। तुम्हारे पास चाहे कोई भी कौशल हों, तुम्हें अलग-थलग किया जाता है और दबाया जाता है। तुम्हें लगता है कि इस इंसानी दुनिया में अपनी बात रखने के लिए कोई जगह नहीं है और इस तरह जीना बहुत घुटन भरा है। इन लोगों के बीच रहना किसी विशाल रंगाई के बर्तन में रहने जैसा नहीं है, बल्कि माँस पीसने वाली चक्की में रहने जैसा है—तुम्हें जिंदा ही पीसकर मार दिया जाएगा। अगर तुम्हें पीसकर नहीं मारा जाता है, तब भी तुम थकान से मर जाओगे, शारीरिक और मानसिक थकान की दशा में अपनी जिंदगी के हर दिन अपनी इच्छा के खिलाफ जाओगे, तुम्हारा हर एक शब्द और तुम्हारा हर काम तुम्हारी अपनी इच्छा के साथ विश्वासघात होगा। इस तरह लगातार मुश्किल में फँसे रहने की वजह से भी तुम्हारा मजाक उड़ाया जाता है कि तुम मूर्ख हो और ऐसे इंसान हो जो अपनी बात पर अड़ा रहता है, जो अपने से ऊँचे पद पर बैठे लोगों को उपहार देना नहीं जानता या अपने सहकर्मियों के साथ रिश्ते नहीं बनाता। तुम दूसरों का फायदा नहीं उठाने के सिद्धांत के अनुसार आचरण करते हो, फिर भी दूसरे लोग तुम्हारा फायदा उठाने की हर मुमकिन कोशिश करते हैं और तुम इससे बच भी नहीं पाते। तुम बहुत सारा काम करते हो, लेकिन ऊँचे पद पर बैठे लोग तुम पर ध्यान ही नहीं देते और सारा श्रेय दूसरे लोग ले जाते हैं। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद तुम देखते हो कि परमेश्वर के घर में निष्पक्षता है, परमेश्वर धार्मिक है और भले ही कुछ लोग अनुचित तरीके से काम करें, परमेश्वर के वचनों में सत्य है, परमेश्वर के वचनों में धार्मिकता है, परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव है और यह सत्य और धार्मिकता ही है जिसकी परमेश्वर के घर में सत्ता है। तुम कहते हैं : “तो, अच्छे लोग परमेश्वर के घर में उन्नति कर सकते हैं। मैं अपना दिल खोलकर रख सकता हूँ और वे सारी बातें बोल सकता हूँ जो मैंने अंदर दबा रखी हैं। मेरे में जो भी क्षमता और प्रतिभा है उसका मैं इस्तेमाल कर सकता हूँ। परमेश्वर के घर में रहना सच में शांति और आनंद देता है; मैं फिर कभी दूसरे लोगों से दबा हुआ और अलग-थलग नहीं रहूँगा। परमेश्वर में विश्वास करना और परमेश्वर के घर आना बहुत शानदार है! अगर मैं परमेश्वर पर विश्वास नहीं करता, तो मैं एक चलती-फिरती लाश की तरह जी रहा होता और जितना ज्यादा मैं जीता, उतना ही ज्यादा थका हुआ और संतप्त महसूस करता; मुझे जिंदगी में कोई दिशा नहीं मिलती, मेरा दिल धुंधला हो जाता और मैं प्रकाश या भविष्य नहीं देख पाता। यह सच में बहुत दर्दनाक होता!” इस तरह के लोग परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य प्राप्त करने से पहले यह महसूस करते हैं कि जिंदगी में उनके पास कोई रास्ता नहीं है और उनका भविष्य अंधकारमय और प्रकाश से रहित है। कुछ नाकामियों और असफलताओं को झेलने और कई कठिनाइयों का सामना करने के बाद, उन्हें न सिर्फ अपनी जिंदगी पर संदेह होता है, बल्कि इससे भी बढ़कर यह महसूस होता है कि जीने का कोई अर्थ ही नहीं है। उन्हें लगता है कि ऐसे लोगों के बीच रहने और ऐसी दुनिया में जीने से तो मौत भी बेहतर होगी! लोग आसमान के पक्षियों की तरह खुशी से नहीं जीते, न ही समुद्र की मछलियों की तरह आजादी से जीते हैं—कम से कम, पक्षियाँ जब चाहें चहचहा सकती हैं, बिना किसी रुकावट के आसमान में उड़ सकती है और उनके पास अपनी साफ-सुथरी जमीन का एक टुकड़ा है। इस दुनिया में रहने वाले लोगों को सच बोलने का भी अधिकार या आजादी नहीं है; वे हर दिन मुखौटा पहनकर जीते हैं और सिर्फ वही बातें कह सकते हैं जो वे कहना नहीं चाहते, जो वे अंदर से महसूस करते हैं उसके खिलाफ जाकर बातें करते हैं—उनके पास ऐसी बातें कहने के अलावा कोई चारा नहीं होता, लेकिन ऐसा करने के बाद उन्हें घृणा महसूस होती है। जीना इतना मुश्किल क्यों है? इस तरह के लोग अपने आस-पास के लोगों के चेहरे देखकर घृणा महसूस करते हैं, उनके दिलों में जुगुप्सा और बेहद घृणा की भावना होती है, लेकिन वे उनसे बच नहीं सकते या उनसे दूर नहीं रह सकते और फिर भी उन्हें उनके साथ घुलना-मिलना पड़ता है। कभी-कभी वे खुद का जीवनयापन करने और अपने परिवार का गुजारा करने के लिए बस जैसे-तैसे काम चलाने का विचार करते हैं, लेकिन फिर भी ऐसा करने के लिए खुद को तैयार नहीं कर पाते। उन्हें लगता है कि लोगों को जिंदगी में किसी सार्थक चीज का अनुसरण करना चाहिए, उन्हें मानव के समान जीना चाहिए, सच बोलना चाहिए और अपने स्व-आचरण के लिए एक सीमा बनाए रखनी चाहिए, और लोगों को कम से कम इतना तो हासिल करना ही चाहिए। उन्हें लगता है कि अगर कोई इंसान यह भी हासिल नहीं कर सकता, तो वह इंसान नहीं है। लेकिन चलने के लिए कोई रास्ता नहीं होने की वजह से वे लाचार होते हैं और उलझन और घबराहट में बस जैसे-तैसे जिंदगी जी सकते हैं, बस मुश्किल से गुजारा कर सकते हैं। खासकर जब वे कुछ मुश्किलों का सामना करते हैं और उनकी उम्मीदें खत्म हो जाती हैं, तो वे अंदर से बहुत पीड़ित महसूस करते हैं : “हम क्यों जीते हैं? क्या यह बस हर दिन झूठ बोलने के लिए और इन लोगों के साथ घुलने-मिलने के लिए है जो इंसानों जैसे भी नहीं लगते और बस मौत का इंतजार करते हुए जैसे-तैसे जीने के लिए है? चूँकि मैं तो देर-सबेर मर ही जाऊँगा, तो मौत का इंतजार करते हुए जैसे-तैसे जीने के बजाय, बेहतर तो यही होगा कि मैं अभी मर जाऊँ और जल्दी ही इन सबसे आजाद हो जाऊँ।” भले ही लोग इन सबसे आजाद होना चाहते हैं, लेकिन शायद ही कोई ऐसा करने की हिम्मत करता है; उन्हें चिंता होती है कि अगर वे ऐसे मर गए, तो उनके पास अपने माता-पिता और प्रियजनों को जवाब देने का कोई तरीका नहीं होगा और उनके दिलों में आशंकाएँ भी रहती हैं : “क्या इस तरह मर जाने से मैं वाकई आजाद हो जाऊँगा? अगर इससे मैं सच में आजाद हो जाता हूँ, तो यह अच्छा होगा, लेकिन अगर ऐसा नहीं होता है, तो यह और भी बुरा होगा।” इस तरह, लोग ऐसे ही दर्द में संघर्ष करते हैं। यही उन लोगों की दयनीय स्थिति है जिन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया है। लोगों को लगता है कि जीने में हमेशा आशा और कुछ न कुछ पाने की उम्मीद होती है, लेकिन अपने दिल की गहराइयों में, उन्हें लगता है कि ये चीजें अधिक से अधिक धुंधली और दूर होती जा रही हैं। लोगों को ये चीजें जितनी अधिक धुंधली और दूर लगती हैं, वे अपने दिलों में उतना ही अधिक संघर्ष करते हैं और कष्ट उठाते हैं। ऐसे सभी लोग अपनी अंतरात्मा और अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों की सीमा बनाए रखने और अपनी मर्जी के खिलाफ नहीं जीने की आशा करते हैं। वे खुद से सख्त अपेक्षाएँ नहीं रखते, न ही वे अपनी जिंदगी के लिए बहुत ऊँचे लक्ष्य निर्धारित करते हैं—वे बड़ी दौलत और ऊँचे पद की तलाश नहीं करते, बल्कि सिर्फ मन की शांति के साथ जीना चाहते हैं। फिर भी वे इतने सरल सिद्धांतों और अपने स्व-आचरण की इतनी आसान सीमा का भी पालन नहीं कर पाते; इसलिए, वे हर दिन चलती-फिरती लाशों की तरह जीते हैं, बहुत थका हुआ महसूस करते हैं। यह थकावट शारीरिक थकान नहीं है, न ही यह बीमारी से होने वाली पीड़ा है, बल्कि यह शरीर और मन दोनों की थकावट है। यह थकावट उनके दिलों के डूबने से होने वाले भारीपन का एहसास है; यह उनके दिलों पर एक पत्थर की तरह भारीपन महसूस कराती है, जिससे उन्हें अंदर से दबा हुआ और पीड़ित महसूस होता है। लेकिन फिर, अब भी उन्हें जिंदगी और हर तरह के लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करना पड़ता है; इसलिए, वे बस खुद को सँभालते हैं और दिन-ब-दिन चलते रहते हैं, कठिनाई में अपने दिन बिताते हैं, बेहद दर्दनाक जिंदगी जीते हैं। कुछ लोग पेकिंग ओपेरा देखने जाना चाहते हैं। वे देखते हैं कि पेकिंग ओपेरा के सारे कथानक नायक की जिंदगी के कठिन होने, उतार-चढ़ाव और नाकामियों से भरी होने के बारे में हैं, जिनमें कलाकार आखिर में रोता है, “कितना दुख है...” और जिनके दिलों में दर्द है, वे इससे जुड़ पाते हैं। वे इससे क्यों जुड़ पाते हैं? क्योंकि उनके दिल में जो भी है, कलाकार उसे आवाज दे रहा है। अगर तुम अपनी अंतरात्मा के अनुसार जीते हो, तो इस दुनिया में जीना आसान नहीं है और यह तुम्हें कहीं नहीं ले जाएगा; तुम दीवारों से टकराओगे, नाकामियों का सामना करोगे और हर मोड़ पर दुखी होगे। अगर तुम एक नकारा इंसान, बुरे इंसान, दुष्ट इंसान बनने की कोशिश करते हो, तो तुम जहाँ भी जाओगे, वहाँ अच्छे से रहोगे; तुम्हें कोई दिक्कत नहीं होगी। अगर तुम सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान हो, तुम्हारी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं, तो भले ही समाज में अलग-अलग चीजों का अनुभव करने के बाद तुम्हारी सत्यनिष्ठा और दयालुता दूषित हो जाए या उसमें कुछ मिलावट हो जाए, तुम्हारी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण कभी नहीं बदलेंगे और कोई भी उन्हें बदल नहीं पाएगा। भले ही तुम अब सच बोलने या अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों और सीमाओं को बनाए रखने की हिम्मत न करो, फिर भी अपने दिल की गहराइयों में तुम सच बोलना चाहोगे, अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों को कायम रखना चाहोगे, अपनी अंतरात्मा की सीमा बनाए रखना चाहोगे और आंतरिक शांति और सुकून का एहसास पाना चाहोगे।
जब इस तरह का सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान परमेश्वर में विश्वास करने लगता है, तब परमेश्वर का घर यानी कलीसिया उसके लिए शुद्धता और स्थिरता की जगह बन जाती है; साथ ही, यह एक ऐसी जगह भी बन जाती है जहाँ उसके दिल को शांति और मुक्ति मिल सकती है। बेशक, यह भी कहा जा सकता है कि यह एक ऐसी जगह है जहाँ वह अपने जीवन की आकांक्षाओं को पूरा करने का प्रयास कर सकता है; यह एक ऐसी जगह है जो उसे अपने जीवन में प्रकाश देखने में समर्थ बनाती है और उसे इस बात को लेकर दिशाहीन महसूस नहीं होने देती कि उसे अपने स्व-आचरण को किस ओर उन्मुख करना चाहिए। इसलिए, अंतरात्मा और विवेक वाले किसी व्यक्ति के लिए परमेश्वर का घर उसका सच्चा घर है। यह घर दैहिक या भौतिक अर्थों में घर नहीं है, बल्कि यह एक सुरक्षित जगह है जहाँ वह परमेश्वर में विश्वास रख सकता है और एक सरल, सच्चे और खुले दिल के साथ परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकता है। इसे एक सुरक्षित आश्रय भी कहा जा सकता है। वह कहावत कौन-सी है? परमेश्वर का घर एक बंदरगाह है जहाँ सत्यनिष्ठ और दयालु लोग, जिनमें मानवता के गुण होते हैं, खुद लंगर डाल सकते हैं। अर्थात्, यही वह जगह है जहाँ वे अपना ठिकाना तलाश सकते हैं; उन्हें अब भागदौड़ करने की जरूरत नहीं है; वे सत्य स्वीकार करने और जीवन में अपनी दिशा और मार्ग खोजने में समर्थ हैं, ताकि उनके दिल संतुष्ट हों। इस प्रकार, एक सच्चा इंसान अपने दिल में सचमुच केवल तभी संतुष्ट महसूस करता है जब वह परमेश्वर के घर में आता है; अंतरात्मा और विवेक वाला इंसान जब वह परमेश्वर के घर में लौटता है और सृष्टिकर्ता के सामने लौटता है, केवल तभी यह महसूस करता है कि उसे अपना सच्चा घर मिल गया है; यह वह जगह है जो उसके दिल को शांति और सुकून पाने देती है। भले ही उसके स्व-आचरण की आकांक्षाएँ और वे सिद्धांत जिनके अनुसार वह आचरण करता है, सत्य का अभ्यास करने से बहुत दूर हैं; कम से कम उसे यही लगता है कि परमेश्वर के घर और कलीसिया में उसके दिल को शांति और सांत्वना मिली है। यही वह अंतर है जो इस प्रकार का इंसान परमेश्वर के घर में और दुनिया में होने के बीच महसूस करता है; यह उनके दिलों का अंतर है। इसलिए, जब इस प्रकार का व्यक्ति परमेश्वर के घर में आता है, तब उसके दिल को सांत्वना और शांति मिलती है; उसे लगता है कि सिर्फ परमेश्वर का घर ही वह जगह है जहाँ वह जिंदगी में अपनी दिशा पा सकता है और यही वह परिवेश भी है जिसकी उसे सबसे ज्यादा जरूरत है; बेशक, यही वह जगह है जिसके लिए वह तरसता है। उसे यहाँ रहना अच्छा लगता है और वह इस तरह के परिवेश में रहने और इस तरह का आचरण करने का इच्छुक है; बेशक, ऐसा करना उसकी निजी इच्छा है। उसकी इस निजी इच्छा के हिसाब से, परमेश्वर के घर का परिवेश, परमेश्वर का काम करने का तरीका, लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ और अन्य सभी पहलू उसकी मानवता की जरूरतों को पूरा करने के लिए पहले से ही पर्याप्त है; इस प्रकार, वह मन की शांति के साथ सत्य का अनुसरण करता है और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अभ्यास करता है। इसलिए, कोई व्यक्ति सत्य का अनुसरण कर सकता है या नहीं, यह पूरी तरह से उसकी मानवता पर निर्भर करता है। जब उसकी मानवता में दयालुता और सत्यनिष्ठा के गुण हों, अगर उसे निष्पक्षता और धार्मिकता पसंद हो, अगर उसे परमेश्वर के घर आकर मन की शांति और सुकून पाना पसंद हो या अगर परमेश्वर के घर में आकर और परमेश्वर के सामने आकर उसके दिल को पूरी सांत्वना मिल गई हो, सिर्फ तभी वह परमेश्वर के वचनों को सुनने, उन्हें स्वीकार करने और उनके प्रति समर्पण करने के लिए तैयार हो सकता है; सिर्फ तभी वह सत्य का अनुसरण करने और एक उचित सृजित प्राणी बनने के लिए तैयार हो सकता है। कहने का मतलब है, जब कोई इंसान परमेश्वर के घर के परिवेश में आता है और उसके दिल को सुकून मिलता है, सत्य समझने से उसका दिल संतुष्ट महसूस करता है और वह जीवन में जिन आकांक्षाओं और लक्ष्यों का अनुसरण करता है वे पूरे होते हैं—सिर्फ इन बुनियादी स्थितियों में ही उसे सत्य का अनुसरण करने का अवसर मिलता है। यह उन लोगों की विशेष अभिव्यक्ति है जिनमें मानवता के गुण होते हैं। बेशक, जब सत्य का अनुसरण करने की बात आती है, तो यह बहुत महत्वपूर्ण है कि व्यक्ति में मानवता के गुण हैं या नहीं। अगर व्यक्ति में मानवता के गुण नहीं हैं, तो वह मूलतः सत्य का अनुसरण करने की शर्तों को पूरा नहीं करता है।
आओ अब लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता की अन्य अभिव्यक्तियों के बारे में बात करते हैं। मैंने अभी-अभी इस बारे में बात की कि कैसे जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, वे दूसरों के साथ अपने जुड़ाव और मेलजोल के लिए, अपने आचरण और मामलों से निपटने के तरीके के लिए एक बुनियादी सिद्धांत बनाते हैं—दूसरे लोगों का लाभ न उठाना। बेशक यह उनके स्व-आचरण के लिए सीमा भी है। दूसरों का फायदा नहीं उठाने के अलावा, इस तरह के लोगों की एक और अभिव्यक्ति होती है : वे दूसरे लोगों के साथ सहानुभूति रखने और उनकी मदद करने के इच्छुक रहते हैं और वे उन्हें कुछ देने के भी इच्छुक रहते हैं। दूसरों की नज़र में, ऐसे लोग थोड़े बेवकूफ होते हैं—वे बहुत उदारहृदय होते हैं, वे आसानी से दूसरों पर भरोसा कर लेते हैं और उन पर तरस खाते हैं; खुद अमीर नहीं होने के बावजूद उन्हें दूसरों को देना पसंद होता है। उन्हें अन्याय के खिलाफ खड़ा होना पसंद होता है; जब वे किसी को मुश्किलों का सामना करते हुए देखते हैं तो वे चुपचाप खड़े नहीं रहते या न देखने का नाटक नहीं करते, बल्कि अग्रसक्रियता से मदद करने की कोशिश करते हैं। भले ही उनमें मदद करने की क्षमता न हो, फिर भी उनके इरादे अच्छे होते हैं। जब वे किसी को मुश्किलों का सामना करते हुए देखते हैं तब उन्हें लगता है कि अगर वे मदद के लिए हाथ नहीं बढ़ाएँगे तो वे अपनी अंतरात्मा का सामना नहीं कर पाएँगे। भले ही दूसरा व्यक्ति मदद न माँगे, फिर भी उन्हें लगता है कि उसकी मदद करनी चाहिए। जब दूसरा व्यक्ति उनकी मदद ले लेता है तो वह बस धन्यवाद कहता है और बात खत्म कर देता है, लेकिन सत्यनिष्ठ और दयालु व्यक्तियों को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता; बाद में जब कोई अन्य व्यक्ति सच में मुश्किलों का सामना कर रहा होता है, तब भी वे उसकी उसी तरह मदद करते हैं। यह लोगों को थोड़ा नासमझी या बेवकूफी भरा लगता है; दूसरे लोग उन्हें दयालुता वाले काम करना बंद करने की सलाह देते हैं, कहते हैं कि जब वे लोगों की मदद करते हैं तब उन्हें कम से कम एहसान तो कमाना ही चाहिए। यह सुनकर वे सोचते हैं : “क्या हमें लोगों की मदद करके एहसान कमाना चाहिए? किसी की मदद करने में कितनी मेहनत लगती है? चीज़ों को इतना पेचीदा क्यों बनाना?” वे बस इतने सीधे-सरल हैं; वे बस दूसरों की मदद करने के इच्छुक हैं। मुझे बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि दूसरों की मदद करने के इच्छुक होने का किसी व्यक्ति की मानवता से कोई लेना-देना है? (हाँ।) वे सच में किसी भी तरह का इनाम नहीं पाना चाहते। इस दुनिया में क्या कोई ऐसा है जो इच्छाओं और चाहतों से आजाद हो? (नहीं।) तो फिर इस तरह का इंसान बदले में कुछ चाहे बिना दूसरों की मदद कैसे कर सकता है? ज़्यादातर लोगों के किसी व्यक्ति की मदद करने के लिए कौन-सी विशेष परिस्थितियाँ होनी चाहिए या किसी व्यक्ति के साथ उनका रिश्ता कैसा होना चाहिए? एक है सबसे करीबी रिश्ता—खून का रिश्ता। इसके अलावा, जिस इंसान की वे मदद करते हैं, वह एक काबिल इंसान होना चाहिए या उसकी मदद करने से कुछ फायदा होना चाहिए, जहाँ सिर्फ फायदे हों और खुद को कोई नुकसान न हो। बस यही वे परिस्थितियाँ हैं। इन परिस्थितियों के अलावा भला कौन बिना वजह दूसरों की मदद करेगा? सटीक रूप से, वे बिना किसी वजह के दूसरों की मदद नहीं करते; कुछ न कुछ फायदा तो मिलना ही चाहिए। भले ही तुरंत कोई फायदा न हो फिर भी कुछ दीर्घकालिक फायदा तो होना ही चाहिए। किसी भी स्थिति में, वे तभी मदद करते हैं जब उन्हें इससे कुछ फायदा हो सकता है। अब, जो लोग दूसरों की मदद करने के इच्छुक हैं, अगर इस बात को अलग रखा जाए कि वे कितनी मदद करते हैं या जिस चीज़ से मदद करते हैं उसका कोई मूल्य है या नहीं—चाहे वह कोई बड़ी चीज़ हो या कोई मामूली चीज़—दूसरों की मदद करने की उनकी इच्छा कहाँ से आती है? क्या इसका उनकी मानवता से कोई लेना-देना है? (हाँ।) यह मानवता के किस पहलू से संबंधित है? (दयालुता।) इसका संबंध दयालुता से है; जब लोगों की मानवता में दयालुता का गुण होता है तब वे दूसरों की मदद करने के इच्छुक रहते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो कि वे किसी भाई या बहन को नकारात्मक और कमजोर होते देखते हैं। असल में वे खुद कलीसिया के अगुआ नहीं हैं और इस भाई या बहन के साथ उनका केवल एक साधारण रिश्ता है, लेकिन जब वे उन्हें नकारात्मक और कमजोर होते देखते हैं, तब वे परेशान महसूस करते हैं और उनके दिल में एक बोझ होता है। अगर वे मदद नहीं करते हैं तो यह उन्हें ठीक नहीं लगेगा; वे सोचते हैं, “भले ही मेरा अपना आध्यात्मिक कद बड़ा नहीं है और मैं कई सत्य नहीं समझता, फिर भी मेरे लिए अपने दायित्वों को पूरा करने की कोशिश करना एक अच्छी चीज़ है। शायद मेरी बातें सुनने के बाद वे आत्मचिंतन कर सकें और नकारात्मक होना बंद कर सकें—क्या यह अच्छा नहीं होगा?” इसलिए, अगर कोई व्यक्ति नकारात्मक और कमजोर होता है—इस पर उनका ध्यान न जाए तो अलग बात है—जैसे ही इस पर उनका ध्यान जाता है, वे उस व्यक्ति के साथ संगति करने का अवसर ढूँढ़ते हैं। अगर वे खुद स्पष्ट रूप से संगति नहीं कर सकते तो वे उनके साथ संगति करने के लिए परमेश्वर के वचनों का एक अंश ढूँढ़ते हैं। संक्षेप में, व्यक्ति को प्रोत्साहन देने, मार्गदर्शन देने और परमेश्वर के वचन पढ़कर सुनाने के मेल के द्वारा, वह आखिरकार परमेश्वर के इरादों को समझ जाता है, अब वह नकारात्मक नहीं रहता और अपना कर्तव्य सामान्य तरीके से कर सकता है, जिससे दयालु व्यक्ति को संतुष्टि का एहसास होता है। वे बस लोगों को नकारात्मक होते और ढीले पड़ते हुए या पीड़ा और तकलीफ में नहीं देख सकते; वे बस उन्हें दिलासा और सहारा देना चाहते हैं। अगर दूसरा व्यक्ति नकारात्मक बना रहता है तो उन्हें लगता है कि उन्हें अपनी जिम्मेदारी पूरी करनी चाहिए। जब उनकी सलाह और मार्गदर्शन की वजह से वह व्यक्ति नकारात्मक नहीं रह जाता तो उन्हें अंदर से बहुत खुशी महसूस होती है और उन्हें लगता है कि इस तरह से आचरण करना बहुत अच्छा है। वे कोई फायदा नहीं चाहते; बात बस इतनी है कि जब वे किसी की मदद करने में समर्थ होते हैं, तब ऐसा नहीं करने पर उन्हें बेचैनी महसूस होती है और यह बात उनकी अंतरात्मा को चुभती है। मुझे बताओ, क्या तुम लोगों को लगता है कि उनकी अंतरात्मा को होने वाली यह चुभन और बेचैनी का यह एहसास मानवता के गुणों की अभिव्यक्तियाँ और खुलासे हैं? (हाँ।)
कुछ लोग दूसरों से सहानुभूति रखते हैं। बेशक अगर मानवता के एक निश्चित परिप्रेक्ष्य से देखा जाए तो यह एक इंसानी कमजोरी भी हो सकती है, क्योंकि वे कभी-कभी बुरे लोगों से भी सहानुभूति रख सकते हैं और उनकी मदद कर सकते हैं, लेकिन वे इस कमजोरी को बदल नहीं सकते। जब वे किसी बुरे इंसान की मदद करते हैं, तब वह बुरा इंसान संभल जाता है और प्रगति करता है, लेकिन फिर भी वह उन्हें नीची नज़र से देखता है और नज़रअंदाज करता है। वे अंदर ही अंदर परेशान महसूस करते हैं और कहते हैं, “वह इंसान ऐसा क्यों है? जब वह निराश और परेशान था और उसने मेरी मदद लेने के लिए संपर्क किया था, तब मैंने उसके प्रति सहानुभूति दिखाई और उसकी मदद की—लेकिन अब जब वह प्रगति कर रहा है और अच्छी जिंदगी जी रहा है तो वह मुझे नज़रअंदाज करता है।” अपने दिल में वे इसे समझ नहीं पाते; वे बुरे लोगों के सार की असलियत नहीं जान पाते। कुछ समय बाद अगर कोई दूसरा बुरा इंसान उनसे मदद माँगता है तो वे शायद अभी भी उसके प्रति सहानुभूति रखें, लेकिन वे पहले यह देखेंगे कि यह इंसान बुरा है या नहीं। अगर वह इंसान इतना घृणास्पद नहीं है और काफी दयनीय है तो अब भी वे उसके प्रति सहानुभूति महसूस करेंगे। जब वे कुछ भाई-बहनों को देखते हैं जो अपना काम पूरे समय करते हैं, लेकिन जिनके परिवार गरीब हैं और जीवन में मुश्किलों का सामना कर रहे हैं तब वे सोचते हैं, “वे इतने गरीब होने के बावजूद अपना कर्तव्य कर सकते हैं—यह है एक अच्छा इंसान! मैं खुद संपन्नता की ज़िंदगी जीता हूँ; अगर मैं उनकी मदद नहीं करूँगा तो मुझे लगेगा कि मैंने उनके साथ सही नहीं किया। मुझे उन्हें कुछ देना ही चाहिए और उनकी मदद करनी चाहिए, ताकि वे कुछ कपड़े या रोज़मर्रा की ज़रूरत की चीज़ें खरीद सकें।” देखा तुमने, वे उदारहृदय हैं; जब वे लोगों को मुश्किलों का सामना करते हुए देखते हैं, तब वे उनके प्रति सहानुभूति महसूस किए बिना नहीं रह पाते और उनकी मदद करते हैं। किसी भी समूह में अच्छे लोग, बुरे लोग और नासमझ लोग भी होते हैं। अच्छे लोग दूसरों को देने और उनकी मदद करने में समर्थ होते हैं, बुरे लोग हर तरह के बुरे काम करने में सक्षम होते हैं और विभिन्न नासमझ लोगों को हमेशा दूसरे लोग इस्तेमाल करते हैं और आदेश देते रहते हैं, वे हर तरह की बेवकूफी भरी चीज़ें कर सकते हैं; वे भिन्न-भिन्न हद तक नासमझ होते हैं। संक्षेप में, हर तरह के लोग होते हैं। जिन लोगों में मानवता के गुण होते हैं, वे दूसरों के प्रति सहानुभूति रखते हैं। उनकी नज़र में दूसरे हमेशा दयनीय होते हैं, वे हमेशा देख सकते हैं कि लोगों में क्या दयनीय है और वे हमेशा देख सकते हैं कि लोग कहाँ सहानुभूति के लायक हैं; उनकी अंतरात्मा में कोमलता का एक तत्व होता है। यानी जब वे किसी को मुश्किलों का सामना करते हुए, दर्दनाक स्थितियों का सामना करते हुए या बुरे लोगों द्वारा नियंत्रित होते हुए या उसके साथ अन्याय होते हुए देखते हैं तो वे अंदर से गुस्सा हो जाते हैं और ऐसे लोगों के प्रति सहानुभूति महसूस करते हैं; उनके पास हमेशा सहानुभूतिपूर्ण हृदय होता है। वास्तव में, भले ही उनकी अपनी परिस्थितियाँ दूसरों से ज़्यादा अच्छी न रही हों और न ही खुद उन्हें दूसरों ने कम नियंत्रित किया हो, लेकिन क्योंकि उनकी मानवता में दयालुता होती है, इसलिए वे दूसरों के साथ सहानुभूति रखे बिना कभी नहीं रह सकते। जब लोग मुश्किलों का सामना करते हैं या दर्द झेलते हैं, तब वे चुपचाप खड़े नहीं रहते या उन्हें नज़रअंदाज नहीं करते। कभी-कभी, सामाजिक परिवेश से प्रभावित होकर—यह देखकर कि लोग सिर्फ अपनी परवाह करते हैं और अपने साथी इंसान को नज़रअंदाज करते हैं—वे लोगों की मदद करने से परहेज करना चाहेंगे, लेकिन वे हमेशा नाकाम रहते हैं; जब वे किसी गरीब इंसान को देखते हैं जिसे खाना नहीं मिल पा रहा है, तब मन में बहुत सोच-विचार करने के बाद भी वे आखिर में उसकी मदद कर ही देते हैं। उदाहरण के लिए, मान लो किसी को बहुत ज़्यादा सर्दी-जुकाम—खांसी, छींक और तेज बुखार हो जाता है। कुछ लोगों को इसके संक्रमण से डर लगता है, इसलिए वे दूर ही रहते हैं। दूसरी ओर, उदारहृदय लोग उनके प्रति चिंता दिखाए बिना नहीं रह सकते : “तुम्हें सर्दी-जुकाम हो गया है; क्या तुमने कोई दवा ली है?” अगर उस व्यक्ति के पास दवा खरीदने के लिए पैसे नहीं हैं तो वे अपने पैसे खर्च करके उसके लिए दवा खरीदेंगे। देखा तुमने, जब कोई उदारहृदय व्यक्ति देखता है कि कोई बीमार और तकलीफ में है, तब वह चुपचाप खड़ा नहीं रहता। यानी जब लोग मुश्किलों का सामना कर रहे होते हैं, जब वे कष्टों या मुश्किल हालात का सामना कर रहे होते हैं तो मानवता के गुणों वाले लोग हमेशा इसे महसूस कर सकते हैं और हमेशा यह एहसास कर सकते हैं कि उन्हें मदद की ज़रूरत है। वे भी उसी परिवेश में रहते हैं जिसमें बाकी लोग रहते हैं, लेकिन वे उन चीज़ों के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं जिन्हें दूसरे लोग महसूस नहीं कर सकते। ऐसा क्यों है? बात बस इतनी है कि लोगों के दिल एक जैसे नहीं होते। जिन लोगों में मानवीय भावना की कमी होती है, वे पूछते तक नहीं चाहे दूसरे कितना भी दर्द झेलें, मानो वे इसे महसूस ही नहीं कर सकते। जिन लोगों में मानवीय भावना होती है, क्योंकि उनकी मानवता के गुणों में दयालुता का एक तत्व होता है, वे हमेशा अपने आस-पास दर्द और मुश्किलों का अनुभव कर रहे लोगों के प्रति सहानुभूति महसूस किए बिना नहीं रह पाते और फिर, अपनी अंतरात्मा के अधीन मदद का हाथ बढ़ाते हैं—तुम कोशिश करो तो भी उन्हें रोक नहीं सकते। वे ऐसा इस उम्मीद से नहीं करते कि दूसरे उनकी दयालुता को याद रखेंगे, न ही इस आशा से करते हैं कि वे उनकी मानवता और उनके चरित्र की बहुत प्रशंसा करेंगे; उनमें बस ऐसा करने की इच्छा होती है और ऐसा करने से उन्हें अंदरूनी मज़बूती का एहसास होता है। ये ऐसे विचार और व्यवहार हैं जो मानवता के गुणों से पैदा होते हैं; कोई उन्हें बदल नहीं सकता और कोई उन्हें रोक नहीं सकता। वे जो चीज़ें करते हैं या जिस तरह से आचरण करते हैं और जिन सिद्धांतों के अनुसार वे ऐसा करते हैं, वे शुद्ध रूप से सामान्य मानवता के स्वाभाविक खुलासे हैं। मानवता के ये स्वाभाविक खुलासे पूरी तरह से उनके दिलों से आते हैं। वे अपनी मर्ज़ी से ऐसा करते हैं; कोई उन्हें ऐसा करने के लिए निर्देश नहीं देता और वे किसी फायदे के पीछे नहीं भाग रहे होते। वे बस ऐसा करने के इच्छुक होते हैं और सिर्फ ऐसी चीज़ें करने से ही उन्हें मन में शांति मिलती है; अगर वे ऐसा नहीं करते तो उन्हें अंदर से बेचैनी महसूस होती है। यहाँ तक कि जब उनका सामना मुश्किलों का सामना कर रहे किसी बुरे इंसान से होता है, तब वे जानते हैं कि उन्हें बुरे लोगों की मदद नहीं करनी चाहिए, लेकिन वे यह भी सोचते हैं, “क्या मैं क्रूर बन रहा हूँ?” भले ही वे इस बुरे इंसान की मदद न करें, उनकी सहानुभूति वैसी ही रहती है, जो उपयुक्त परिवेश में और सही लोगों के साथ स्वाभाविक रूप से फिर से प्रकट हो जाएगी। यह मानवता का एक गुण है। मानवता के गुण जन्मजात होते हैं और बेशक वे कभी भी और कहीं भी प्रकट हो सकते हैं; वे बहुत स्वाभाविक, बहुत पवित्र और बहुत सरल होते हैं। इसलिए, जब किसी व्यक्ति की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, तब ये उससे नहीं आते हैं जो उसके माता-पिता या समाज ने उसे सिखाया है, न ही यह किसी परिवेश से प्रभावित होते हैं; ये व्यक्ति की मानवता के अंतर्निहित गुण हैं।
कुछ लोगों को देना पसंद होता है। क्या तुम्हें लगता है कि जो लोग देना पसंद करते हैं वे अवश्य ही अमीर भी होंगे? क्या वे अवश्य ही ऐसे लोग होंगे जिन्होंने जिंदगी के कई तूफानों का सामना किया है और इस नश्वर दुनिया से जिनका मोहभंग हो गया है? क्या वे अवश्य ही ऐसे लोग होंगे जो दुनिया की सारी दौलत और शानो-शौकत का आनंद ले चुके हैं—और सब कुछ की असलियत देख चुके हैं—और जो सांसारिक चीजों के आनंद के प्रति उदासीन होने लगे हैं? क्या वे अवश्य ही अपेक्षाकृत बेफिक्र और उदार व्यक्तित्व वाले लोग हैं? नहीं, यह जरूरी नहीं है कि वे ऐसे लोग ही हों। जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, उनमें एक तरह का ऐसा इंसान भी होता है जो खास तौर पर कम खर्चीली जिंदगी जीता है। अगर खाते समय उससे चावल का एक दाना भी गिर जाए, तो वह उसे उठाकर खा लेता है, उसे बर्बाद करने का ख्याल भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। वह अपने दाँतों को ब्रश करते समय और चेहरा धोते समय बस थोड़ा-सा पानी इस्तेमाल करता है। जब उसके कपड़े पुराने हो जाते हैं, तो वह उन्हें फेंकना बर्दाश्त नहीं कर पाता; वह उन्हें धोकर पहनता रहता है। चीजें खरीदते समय, वह ध्यान से योजना और बजट बनाता है, सस्ती चीजें खरीदता है, बशर्ते उसकी गुणवत्ता स्वीकार्य हो। चूँकि इस प्रकार के व्यक्ति इतने मितव्ययी होते हैं, तो क्या इसका मतलब यह है कि वे कंजूस हैं? (नहीं।) इस प्रकार के व्यक्ति अपने मामले में विशेष रूप से मितव्ययी होते हैं, लेकिन जब दूसरों की बात आती है तब वे कंजूस नहीं होते हैं। उदाहरण के लिए, जब वे किसी को कठिन जिंदगी जीते हुए देखते हैं, तब वे उन्हें अपनी कुछ चीजें दे देते हैं, जैसे कि कपड़े या उपकरण। कुछ लोग कहते हैं, “क्या वे किसी प्रकार के परोपकारी कंगाल हैं?” ऐसा नहीं है—उन्हें बस यही लगता है कि दूसरे लोग काफी दयनीय हैं, इसलिए वे हमेशा उनकी मदद करना चाहते हैं। वास्तव में, वे स्वयं संपन्न या धनी नहीं हैं और जब वे दूसरों को राहत देते हैं तो वे किसी चीज के पीछे नहीं भाग रहे होते हैं। उनके पास बस इस प्रकार की मानवता होती है; वे दूसरों की मदद करना पसंद करते हैं और यह उनके आचरण का सिद्धांत भी है। क्या यह भी मानवता का एक गुण है? (हाँ।) दूसरों के साथ पेश आने के लिए इस प्रकार के व्यक्ति का बुनियादी सिद्धांत यह है कि जब मदद करनी चाहिए तब मदद करो और जब सहानुभूति रखनी चाहिए तब सहानुभूति रखो। जब अन्य लोग कठिनाइयों का सामना कर रहे होते हैं, तब वे उन्हें अपना प्यार देंगे और उनकी मदद करने के लिए व्यावहारिक क्रियाकलापों का उपयोग करेंगे; जब दूसरों के पास चीजों की कमी होती है, तब वे अपनी चीजें उन्हें दे देते हैं। उनकी मानवता के गुणों में हमेशा ऐसी इच्छा होती है; ये विचार हमेशा उनके मन में आ सकते हैं या वे हमेशा अपने आस-पास के उन लोगों का दर्द महसूस कर सकते हैं जिन्हें मदद और सहानुभूति की जरूरत होती है। क्या अंतरात्मा उनके अंदर काम कर रही है? (हाँ।) मानवता का ऐसा गुण व्यक्तित्व से तय नहीं होता, बल्कि अंतरात्मा के काम की वजह से होता है। इस तरह, उनमें यह मानसिकता होती है—या मानवता का यह गुण होता है—कि वे दूसरों की मदद करने के इच्छुक रहते हैं। जब लोगों को मदद की जरूरत होती है और वे उनसे मदद माँगते हैं, तब उन्हें न सिर्फ सहानुभूति महसूस होती है, बल्कि वे सच्चे मन से मदद भी करते हैं; भले ही इसमें उनका कुछ समय लगे और उन्हें कुछ चीजें देनी पड़ें, वे इच्छुक रहते हैं। यह इच्छा, कम से कम, व्यक्ति की मानवता में मौजूद दयालुता पर आधारित होती है। अगर किसी व्यक्ति की मानवता में दयालुता नहीं है, तो एक बात तो यह है कि उसमें दूसरों की मदद करने की व्यक्तिपरक इच्छा नहीं होगी और दूसरी बात, मदद माँगने पर उन्हें सहानुभूति महसूस नहीं होगी और न ही वे सच्चे मन से लोगों की मदद करेंगे। अगर किसी व्यक्ति में यह सच्चाई नहीं है, तो वह बस जैसे-तैसे काम चलाएगा और तुम्हारे साथ लापरवाही करेगा। शायद वह बस इज्जत की खातिर या विनम्रता की वजह से या अपने स्वार्थ के चलते, अनिच्छा से तुम्हारे लिए थोड़ा-बहुत काम करेगा; इस सोच के साथ कि कहीं भविष्य में कभी उसे तुम्हारे अधीन काम करना पड़ जाए या तुम्हारी जरूरत पड़ जाए—वह कई वजहों से तुम्हारी मदद करने के लिए तैयार हो सकता है। हालाँकि, जिस व्यक्ति में सचमुच दयालुता का गुण होता है, वह लोगों की मदद करने में निष्क्रिय नहीं होता; बेशक, चाहे वह इसके लिए इच्छुक हो या अनिच्छुक; बल्कि, यह इच्छा उसकी मानवता के गुणों में अंतर्निहित होती है। वह अपनी इच्छा से, सच्चे मन से और अग्रसक्रियता से दूसरों की मदद करता है। उदाहरण के लिए, मान लो तुम्हें किसी चीज में उसकी मदद चाहिए। जब तुम उससे मदद माँगोगे, तो उसे तुम्हारे प्रति बहुत सहानुभूति होगी और वह बड़े उत्साह से, सच्चे मन से और अपनी मर्जी से तुम्हारी मदद करेगा। ऐसा हो सकता है कि तुम उसे अपने लिए कुछ सँभालने या अपने लिए कोई संदेश भेजने का काम सौंपो या यह भी हो सकता है कि तुम्हें किसी चीज की जरूरत हो—चाहे तुम्हें उससे किसी भी तरह की मदद चाहिए, संक्षेप में, वह इस मामले के साथ सच्चाई, ईमानदारी, गंभीरता और जिम्मेदारी से पेश आएगा।
जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, वे तब बहुत गंभीर और जिम्मेदार होते हैं, जब दूसरे लोग उन्हें चीजें सँभालने का काम सौंपते हैं। उदाहरण के लिए, अगर ऐसा कोई व्यक्ति किसी काम से शहर जाता है और कोई दूसरा व्यक्ति उससे कोई दवा खरीदकर लाने के लिए कहता है, तो दवा खरीदते समय वह सोचता है : “मुझे पश्चिमी दवा लेनी चाहिए या चीनी दवा? पश्चिमी दवा तेजी से काम करती है, लेकिन इससे पेट में जलन होती है। क्या इसे लेने के दुष्प्रभाव हो सकते हैं? ऐसे में, मैं पूछूँगा कि क्या कोई चीनी दवा है जो अपेक्षाकृत असरदार हो और पेट में जलन न करे।” तुम देखो, वह चीजों पर बहुत ध्यान से सोचता है। जब कोई जिम्मेदार और दयालुता के गुण वाला व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति की किसी काम में मदद करने के लिए राजी होता है, तब वह उसकी जरूरत की चीजें चुनने में सच्चाई, गंभीरता और जिम्मेदारी से मदद करेगा। हो सकता है कि वह अपने मामलों को सँभालते समय उतना गंभीर न हो और अपने लिए चीजें खरीदते समय बस वही चीजें खरीद लेता हो जो उसे ठीक लगती हैं, लेकिन दूसरों के मामलों को सँभालते समय, वह विशेष रूप से ध्यान देने वाला और विशेष रूप से जिम्मेदार होता है। वह मन ही मन सोचता है : “क्योंकि उसने यह काम मुझे सौंपा है, इसका मतलब है कि वह मेरे बारे में ऊँचा सोचता है; मुझे उसके लिए चीजों का ठीक से ध्यान रखना होगा। इसके अलावा, यह कुछ मुश्किल भी नहीं है। यह बस एक उंगली ऊपर करने जितना आसान है। मुझे यह पक्का करना है कि मैं जो कर रहा हूँ उससे वह संतुष्ट हो। लेकिन मुझे नहीं पता कि उसके लिए किस तरह की दवा सही है, और वह अपनी बीमारी के इलाज के लिए दवा खरीदने की जल्दी में है; इसलिए, मैं उसके लिए थोड़ी चीनी और थोड़ी पश्चिमी, दोनों दवाएँ खरीद लूँगा।” जब वह दवा खरीदकर वापस लौटता है, तब दूसरा व्यक्ति वही दवा चुनता है जो इत्तेफाक से उसकी जरूरत के हिसाब से सही होती है। तुम देखो, वह जो करता है उसमें अपना पूरा दिल लगाता है और उसे गंभीरता से करता है, इसलिए मामला काफी अच्छे से निपट जाता है। लेकिन किसी ऐसे व्यक्ति को, जो गैर-जिम्मेदार है और जिसमें दयालुता का गुण नहीं है, अगर तुम दवा खरीदने में मदद करने के लिए कहते हो, तो वह भी राजी हो जाएगा, लेकिन फार्मेसी जाने के बाद, वह बस बीमारी से मेल खाती कोई दवा खरीद लेगा और फिर वापस आ जाएगा। जब तुम उससे पूछते हो कि हर दिन कितनी दवा लेनी है और क्या कोई निषेध भी हैं, तो वह कहता है, “मुझे नहीं पता। निर्देश खुद ही पढ़ लो। वैसे भी, मैं फार्मेसी जाकर तुम्हारे लिए दवा ले आया।” आखिर में, जो पश्चिमी दवा उसने खरीदी थी, उसे एलर्जी वाले लोग नहीं ले सकते, और संयोग से तुम्हें एलर्जी है। तो दवा बेकार ही खरीदी गई और तुम्हें अभी भी दूसरी दवा खरीदने के लिए खुद जाना पड़ेगा। उसने यह काम पूरा नहीं किया और अब तुम पर उसका एहसान भी है। क्या तुम अंदर से खुश हो? (नहीं।) इस मामले को कैसे सँभाला गया? इसे ठीक से नहीं सँभाला गया। तुमने गलत इंसान पर भरोसा किया; तुम्हें सही इंसान नहीं मिला। तुम्हें कोई ऐसा इंसान ढूँढ़ना होगा जिसमें मानवता के गुण हों। अगर ऐसा इंसान मिलना मुश्किल है, तो जब तुम दवा खरीदने में मदद के लिए किसी पर भरोसा करते हो, तब तुम्हें उसे कुछ और निर्देश देने होंगे और चीजें साफ-साफ समझानी होंगी। अगर तुमने उसे निर्देश नहीं दिए और जिस इंसान को तुमने दवा खरीदने को कहा है उसमें कोई मानवता नहीं है, तो यह मामला निश्चित रूप से ठीक से सँभाला नहीं जाएगा; पैसे बर्बाद होने की बात तो छोड़ ही दो, तुम पर उसका एक एहसान भी होगा। अगर तुम्हें कोई ऐसा व्यक्ति मिलता है जिसमें मानवता है, तो वह तुम्हारे लिए यह काम पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा देगा। क्योंकि उसका दिल सच्चा है, वह जिम्मेदारी ले सकता है और उसकी मानवता में दयालुता का गुण है, इसलिए जब वह तुम्हारे लिए मामले सँभालता है, तब वह तुम्हारा ध्यान रख सकता है और तुम्हारे लिए चीजों पर विचार कर सकता है, तुम्हारी जरूरत की चीजें सही कीमत पर खरीद सकता है। इसके उलट, जिस व्यक्ति में मानवता के गुण नहीं हैं, वह बस जैसे-तैसे काम करेगा और तुम्हारे लिए कोई काम सँभालते समय तुम्हारे साथ लापरवाही बरतेगा। वह अच्छी-अच्छी बातें करेगा, लेकिन मामले को सँभालते समय, वह कीमत के बारे में बिल्कुल नहीं पूछेगा, न ही बाजार में अलग-अलग दुकानों पर मोल-तोल करेगा; वह बस यूँ ही, बिना सोचे-समझे तुम्हारे लिए कुछ खरीद लेगा। अगर तुम इन दोनों तरह के लोगों की तुलना न करो, तो ऐसा लगता है कि वे दोनों ही चीजों का ध्यान रख सकते हैं। हालाँकि, मानवता के गुणों वाले लोग जब तुम्हारे लिए कुछ सँभालते हैं, तो वे तुम्हें संतुष्ट कर सकते हैं। उनमें मानवता की अभिव्यक्तियाँ होती हैं; वे तुम्हारी जरूरतें पूरी कर सकते हैं और तुम्हारे लिए चीजों पर विचार कर सकते हैं। उनमें इस तरह की सच्चाई होती है। इससे साबित होता है कि वे दयालु हैं, सच्चे इंसान हैं और तुम्हारे भरोसे के लायक हैं। दूसरी ओर, जब तुम किसी ऐसे व्यक्ति को कुछ सँभालने के लिए सौंपते हो जिसमें मानवता के गुण नहीं हैं, तो वह इसे अच्छी तरह से नहीं सँभालेगा। भले ही वह कभी-कभी चीजों का ठीक से ध्यान रखता हो, वह इसे सच्चे मन से नहीं करता—यह बस एक तुक्का है। तुम कहते हो : “वह दवा अच्छी थी। इसे लेने के कुछ ही देर बाद मैं ठीक हो गया।” अगर तुमने यह नहीं कहा होता, तो ठीक होता, लेकिन अब जब तुमने उसे यह बता दिया है, तो उसका तुम्हारे ऊपर एहसान और बढ़ जाता है। यह साफ है कि वह अपने किसी काम से गया था, फिर भी वह तुम्हें बताएगा, “देखा? मैं खास तौर पर सिर्फ तुम्हारे लिए ही गया था।” वह तुमसे कोई मदद माँगेगा और तुम जिंदगी भर उसका यह छोटा-सा एहसान नहीं चुका पाओगे; तुम असल में एक बुरे दानव के जाल में फँस गए हो। हालाँकि, मानवता वाला व्यक्ति तुमसे कोई मदद नहीं माँगेगा, चाहे उसने तुम्हारा कोई काम कितनी भी अच्छी तरह से क्यों न सँभाला हो। जब तुम उसे धन्यवाद देते हो, तब वह कहता है, “यह कुछ खास नहीं था। यह तो मेरे रास्ते में था।” तुम देखो, वह सिर्फ सच बोलता है। वास्तव में, उसने पहले ही बहुत अच्छा काम किया है और तुम्हारी काफी मदद की है। तुम्हारे सबसे करीबी लोग भी शायद तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार न करें, लेकिन मानवता के गुणों वाला इंसान वह कर सकता है जो तुम्हारे प्रियजन भी नहीं कर सकते। वह मामले को काफी अच्छे से सँभालता है और बदले में कुछ नहीं माँगता। तुम्हें हमेशा लगता है कि उसने तुम पर एहसान किया है, इसलिए तुम उसे समय-समय पर कोई फल या कुछ और देते हो, जब कुछ अच्छा होता है, तब तुम हमेशा उसे याद रखते हो। लेकिन वह इसे अपने दिमाग में कोई बड़ी बात नहीं मानता, उसे लगता है कि तुम्हारी मदद करने के लिए उसे व्यावहारिक तौर पर कोई प्रयास नहीं करना पड़ा और यह एक बहुत सामान्य बात थी। वह तुम्हें यह भी बताता है कि अगर भविष्य में तुम्हें किसी चीज में मदद की जरूरत पड़ती है, तो तब भी वह तुम्हारी मदद करेगा। तुम देखो, क्या लोगों में फर्क नहीं होता? (हाँ, होता है।) मैं तुम्हें बता दूँ, मानवता वाले लोगों में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं और चाहे कोई भी समय हो, इस तरह के लोग सबसे ज्यादा भरोसेमंद होते हैं। सिर्फ ऐसे लोग ही भरोसेमंद होते हैं, क्योंकि उनके क्रियाकलापों की एक सीमा होती है। उनके क्रियाकलापों की एक सीमा इसलिए होती है क्योंकि उनमें सत्यनिष्ठा और दयालुता जैसे मानवता के गुण होते हैं।
जब ऐसे लोगों की बात आती है जिनमें मानवता के गुण नहीं होते हैं, भले ही वह कोई ऐसा व्यक्ति हो जिसे तुमने कभी नाराज न किया हो, अगर तुम कुछ ऐसा करते हो जिसमें उनके हित शामिल हैं, तो वह तुमसे बदला लेने का मौका ढूँढ़ता रहेगा। इसके उलट, जब कोई ऐसा व्यक्ति होता है जिसमें मानवता के गुण होते हैं, भले ही तुमने उसे पहले दुख पहुँचाया हो या यहाँ तक कि उसके हितों को नुकसान पहुँचाया हो, तो भी वह तुमसे बिल्कुल भी नफरत नहीं करेगा, न ही तुमसे बदला लेगा। भले ही तुमसे बात करते समय उसका रवैया थोड़ा खराब हो या उसकी बातें थोड़ी कड़वी लगें या वह तुम्हें थोड़ा भाषण दे, ये मानवता से आने वाली सामान्य अभिव्यक्तियाँ हैं—वह बिल्कुल भी लगातार बदला लेने की कोशिश नहीं करेगा, न ही किसी बुरे इंसान की तरह तुमसे हमेशा नफरत करता रहेगा। यह किस सिद्धांत पर आधारित है? यह उसके स्व-आचरण की सीमा पर आधारित है। ठीक इसलिए क्योंकि उसके पास अंतरात्मा और विवेक है, उसकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं, वह कभी भी अपने स्व-आचरण की अपनी सीमा पार नहीं करेगा। अगर कोई उसे नाराज करता है, तो भले ही वह बदला लेना चाहे, उसकी अंतरात्मा उसे बिल्कुल भी ऐसा नहीं करने देगी। अगर उसे गुस्सा आता है, तो वह बस थोड़ी भड़ास निकालने के लिए कुछ गुस्से वाले शब्द कहेगा और बस इतना ही—वह बदला लेने के लिए बिल्कुल भी कुछ नहीं करेगा। यह मानवता वाले इंसान का गुण है। तुम देखो, जब कुछ लोगों को नाराजगी नहीं भी हुई होती है, तब भी वे दूसरों को तकलीफ देना चाहते हैं; वे उनके साथ होड़ करना और लड़ना चाहते हैं, हमेशा सोचते रहते हैं कि उनके पीठ पीछे उनके खिलाफ कैसे साजिश रची जाए। यह भी मानवता का एक गुण है—यही वह गुण है जो बुरे दानवों और बुरे राक्षसों की मानवता में होता है। इसके उलट, जिस इंसान की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं, वह दूसरों को तकलीफ नहीं दे सकता। अगर वह ऐसी चीजें करता है, तो उसकी अंतरात्मा उसे फटकारेगी और अनुशासित करेगी। भले ही परमेश्वर उसे अनुशासित न करे, पवित्र आत्मा उसे न फटकारे और भाई-बहन उसे न डाँटें, उसकी अंतरात्मा उसे काबू में रखती है। जब कोई इंसान अपनी अंतरात्मा के नियंत्रण में रहता है, तब वह अपने क्रियाकलापों में हद से ज्यादा कुछ नहीं करता और वह जो कुछ भी करता है उसकी एक सीमा होती है। भले ही तुम उसे नाराज करो, उसे दुख पहुँचाओ या यहाँ तक कि कुछ ऐसा करो जो बहुत ज्यादा हो जाए, वह तुमसे इस बात को लेकर झगड़ा नहीं करना चाहेगा। सबसे बुरी स्थिति में, वह बस तुमसे दूर रहेगा और तुम्हें नजरअंदाज करेगा, तुम्हारे साथ नहीं जुड़ेगा, तुमसे मेलजोल नहीं करेगा या तुम्हारे साथ काम नहीं करेगा। लेकिन वह तुम्हें बिल्कुल भी नुकसान नहीं पहुँचाएगा या तुम्हें चोट पहुँचाने की कोशिश नहीं करेगा; वह तुम्हारे पीठ पीछे तुम्हारे खिलाफ साजिश नहीं रचेगा या तुम्हें फँसाने के लिए कोई चाल नहीं चलेगा—वह ऐसी चीजें बिल्कुल नहीं करेगा। देखो और समझो कि तुम लोगों के आस-पास इस तरह के कौन-से लोग हैं—ये सबसे अच्छी गुणवत्ता वाले अच्छे लोग हैं। तुम उनके साथ मेलजोल करते हुए एकदम सुकून महसूस कर सकते हो। भले ही तुम उन्हें इस सीमा तक चोट पहुँचाओ कि वे पूरी तरह से तबाह हो जाएँ, ज्यादा से ज्यादा वे अंदर से तुमसे नफरत करेंगे, तुम पर ध्यान नहीं देना चाहेंगे और कभी तुम्हारे दोस्त नहीं बनेंगे, लेकिन वे तुम्हारे खिलाफ साजिश नहीं करेंगे, न ही वे तुमसे बदला लेने का कोई अवसर ढूँढ़ेंगे; यह तो बिल्कुल नहीं कहेंगे, “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या।” यही असली सत्यनिष्ठा और दयालुता है। इसे हासिल करने में समर्थ होना बिल्कुल भी दिखावा नहीं हो सकता; यह मानवता का एक सच्चा गुण है। जिस व्यक्ति के पास मानवता के गुण हैं, केवल उसी के पास स्व-आचरण के लिए सही सिद्धांत और सीमाएँ होंगी। जब तुम उसके साथ मेलजोल करोगे और जुड़ोगे, तो तुम उसमें इन व्यवहारों और अभिव्यक्तियों को और साथ ही उसकी मानवता के इन स्वाभाविक खुलासों को देख पाओगे।
चूँकि लोगों की श्रेणियाँ अलग-अलग होती हैं, इसलिए विभिन्न चीजों पर उनकी प्रतिक्रियाएँ भी अलग-अलग होती हैं। तुम देखो, जब दानवों से पुनर्जन्म लेने वाले बुरे लोग दूसरों का फायदा उठाते हैं, तब अगर कोई उन्हें उजागर करता है, तो उनकी क्या प्रतिक्रिया होती है? वे कहेंगे, “दूसरों का फायदा कौन नहीं उठाता? क्या फायदे उठाने के लिए नहीं होते? थोड़ा-सा फायदा उठाने में क्या गलत है? अगर कोई फायदा उठाया जा सकता है और तुम उसे नहीं उठाते, तो क्या तुम मूर्ख और गधे नहीं हो?” यह एक डाकू का तर्क है। उसके दिल में अंतरात्मा की कोई जागरूकता नहीं होती, शर्म की कोई भावना नहीं होती और शर्मिंदगी का कोई एहसास नहीं होता। क्योंकि उसके पास अंतरात्मा नहीं होती, इसलिए उसके पास दूसरों का फायदा उठाने की समस्या का मूल्यांकन करने का कोई मानक नहीं होता। उसका सिद्धांत है कि फायदे उठाने के लिए होते हैं और एक बार जब तुम किसी चीज का फायदा उठा लेते हो, तो फिर वह चीज तुम्हारी हो जाती है। उसका फायदा नहीं उठाना बेकार होगा और यह तुम्हें मूर्ख बना देगा। क्या यह एक डाकू का तर्क नहीं है? और जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोग दूसरों का फायदा उठाने की समस्या को कैसे देखते हैं? अगर तुम उनसे कहते हो, “तुम जो भी कर रहे हो वह फायदा उठाना है—दूसरे लोगों का फायदा उठाना अच्छा नहीं है और उनका किसी तरह का एहसान लेना भी अच्छा नहीं है,” तो वे क्या सोचते हैं? “यह फायदा मेरा है। अगर मैं उनका फायदा उठाता हूँ, तो उनका मुझ पर कोई एहसान नहीं है। फायदा उठाने में क्या गलत है? फायदा उठाने में समर्थ होना एक कौशल है; अगर तुम्हारे पास यह कौशल नहीं है, तो तुम पिछड़ जाओगे।” यह एक बदमाश का तर्क है। उसके पास कोई सीमा नहीं होती, कोई शर्म की भावना नहीं होती, कोई शर्मिंदगी का एहसास नहीं होता, अंतरात्मा होने की तो बात ही छोड़ दो। उसके पास किसी भी चीज का आकलन करने का कोई मानक नहीं होता। भले ही तुम उसे बता दो कि सही मानक क्या है, वह इसे मानक नहीं मानता और यह नहीं जानता कि यह मानक सही है। उसमें एक सामान्य इंसान की तर्क-शक्ति नहीं होती और वह यह नहीं बता सकता कि क्या सही है और क्या गलत। वह पूरा दिन उलझन में बिताता है; तुम उसे जो कुछ भी कहते हो, उससे उसे कोई स्पष्टता नहीं मिलती, न ही वह उसे समझ पाता है। वे बस भ्रमित लोग होते हैं। हालाँकि, अंतरात्मा और विवेक वाले लोगों में मानवता के गुण होते हैं। अगर वे अनजाने में किसी का फायदा उठाते हैं और तुम उन्हें इसके बारे में बताते हो, तो वे अंदर से घबरा जाएँगे और शर्म से लाल हो जाएँगे : “क्या मैंने उसका फायदा उठाया? मुझे इसका एहसास कैसे नहीं हुआ? किसी और के द्वारा इसके बारे में बताया जाना—कितनी शर्म की बात है!” वे कहेंगे, “मैंने उसका जितना भी फायदा उठाया है, मुझे उसका पूरा हिसाब चुकाना होगा—मैं कुछ ब्याज भी जोड़ सकता हूँ।” उन्हें स्थिति को सँभालने का कोई रास्ता खोजना होगा। वे दूसरों का फायदा उठाना पसंद करने वाले इंसान के रूप में अपनी छवि नहीं बनाना चाहते। अगर ऐसा किया, तो उन्हें बहुत बेइज्जती महसूस होगी। इसलिए, जब कोई वास्तव में उनकी समस्या बताता है, तब वे खुद को सही ठहराने की कोशिश नहीं करेंगे—वे यह नहीं कहेंगे, “मैंने उसका फायदा नहीं उठाया, न ही मैं उसका फायदा उठाना चाहता था।” वे बहस करने और खुद को सही ठहराने के लिए इस तरह के बदमाश लोगों के तर्क का इस्तेमाल नहीं करेंगे। चूँकि उनमें सत्यनिष्ठा का एक तत्व है, इसलिए जब कोई इस बारे में बात करेगा, तब वे इसका सही तरीके से सामना करेंगे, इसकी भरपाई करने और दूसरे पक्ष को मुआवजा देने की हर संभव कोशिश करेंगे और फिर कभी ऐसा नहीं करेंगे; अगर वे ऐसा करते हैं, तो वे खुद ही अपने चेहरे पर तमाचा मारेंगे। उन्हें लगता है कि उन्होंने जो किया उसका किसी और के द्वारा उजागर किया जाना, और अब लोगों का उनके पीठ पीछे उनकी आलोचना करना और उनके मुँह पर ही उन्हें बुरा-भला कहना, बेहद शर्मनाक है। उनके पास अपनी शर्म छिपाने की कोई जगह नहीं है, वे सोचते हैं कि काश उन्हें जमीन में कोई गड्ढा मिल जाए और वे रेंगकर उसमें समा जाएँ; वे चाहेंगे कि उनकी पूरी जिंदगी इस तरह की चीजें घटित हुए बिना ही गुजर जाए तो बेहतर है। क्योंकि उनके पास अंतरात्मा है, इसलिए दूसरों का फायदा उठाने के बाद उन्हें अपने दिल में शर्मिंदगी महसूस होती है। वे खुद को सही ठहराने में बहुत शर्मिंदा होते हैं, उन्हें लगता है कि उन्होंने जो किया वह बहुत शर्मनाक है, इसलिए उनके पास बोलने के लिए कुछ नहीं होता, उनके पास अपने बचाव में कहने के लिए कुछ नहीं होता; वे केवल दूसरे पक्ष को मुआवजा देना चाहते हैं। ऐसे लोग बुरे लोगों और दानवों से अलग होते हैं। दानव चाहे कैसे भी शर्मनाक काम क्यों न करें, उन्हें कोई शर्म नहीं आती। जब मानवता के गुणों वाले लोग ऐसी बातें सुनते हैं, तब वे तुरंत शर्म से लाल हो जाते हैं : “इतने सारे लोग इसके बारे में जानते हैं; कितने अपमान की बात है!” वे शर्मिंदा और पूरी तरह से अपमानित महसूस करते हैं, अपने दिलों में खास तौर पर परेशान और बेचैन होते हैं। तुम देखो, एक ही मुद्दे को लेकर अलग-अलग श्रेणी के लोगों के दिलों की गहराइयों में अलग-अलग दृष्टिकोण और नजरिए होते हैं। अलग-अलग तरह के लोगों की मानवता के गुणों में अंतर होने की वजह से, उनका एक ही मुद्दे पर अलग-अलग नजरिया होता है। अगर किसी में शर्मिंदगी का एहसास होता है, तो यह साबित करता है कि उसमें शर्म की भावना भी है, जो फिर यह साबित करता है कि उसमें मानवता के गुण हैं। इसके उलट, अगर किसी में शर्म की भावना नहीं है, बुरे काम और शर्मनाक चीजें करने के बाद वह अपने बचाव में बहस करने की कोशिश करता है या यहाँ तक कि यह मानने से भी इनकार करता है कि उसने क्या किया है और अनजान बना रहता है, तो वह मानवता के गुणों से रहित व्यक्ति है। जिन लोगों में मानवता के गुण नहीं होते, वे, कम से कम, सत्यनिष्ठ और दयालु लोग नहीं होते; उनमें कोई मानवता या विवेक नहीं होता और वे इंसान कहलाने के लायक नहीं होते। जब बुरे लोग और दानव बुरी चीजें और बुरे काम करते हैं, उनके दुश्मन उन पर उंगलियाँ उठाते हैं और उन्हें अपमानित करते हैं, तब वे भी पलटकर उन्हें अपमानित करते हैं और ऐसा करने में खुद को पूरी तरह सही समझते हैं। यहाँ तक कि वे खुद को सही ठहराने और अपना बचाव करने के लिए हर मुमकिन कोशिश करते हैं, ऐसे टेढ़े-मेढ़े तर्क देते हैं मानो वे सच में सही तर्क हों; वे बेशर्मी से मुँह चलाते रहते हैं और लगातार बातें करते हैं—उनमें तर्क की कोई समझ नहीं होती और वे पूरी तरह से बेशर्म होते हैं! जहाँ तक जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों की बात है, जब वे दूसरे लोगों का फायदा उठाते हैं और इसके लिए उनकी आलोचना की जाती है, तब उन्हें अंदर से अन्याय महसूस होता है; वे बहाने और कारण ढूँढ़ने की भी हर मुमकिन कोशिश करते हैं। खुद को सही ठहराते समय, वे चिकनी-चुपड़ी बातें भी करते हैं और लगातार बोलते रहते हैं, बुरे लोगों की तरह, उनमें भी शर्मिंदगी का कोई एहसास नहीं होता। क्योंकि वे जानवर हैं, जिनमें अंतरात्मा की कोई जागरूकता नहीं है, वे सारा दिन उलझन में रहते हैं, किसी भी मामले में सही और गलत का फर्क नहीं कर पाते, इसलिए जब इस तरह की बात आती है, तब उन्हें कोई जागरूकता नहीं होती; वे अपनी करनी पर पर्दा डालने के लिए कुछ सत्याभासी बहाने बनाते हैं और फिर उन्हें लगता है कि सब ठीक हो गया। उन्हें नहीं लगता कि यह उनके अपने स्व-आचरण की कोई समस्या है; उन्हें लगता है कि जब तक वे पर्याप्त बहाने बनाते रहेंगे और कारण गिनाते रहेंगे, वे जिम्मेदारी से बच सकते हैं और उन्होंने जो किया उसके बारे में किसी को पता नहीं चलेगा। वे खुद को धोखा देंगे, यह सोचते हुए, “यह सब तो खत्म हो चुका है। मैंने कभी ऐसा कुछ नहीं किया, मैंने कभी वह गलती नहीं की। मुझे बुरा इंसान मत समझो। मैं ऐसा इंसान नहीं हूँ जो दूसरों का फायदा उठाता हो। देखो मैं कितना नेकदिल और दयालु इंसान हूँ और दूसरों का कितना ख्याल रखता हूँ!” तुम देखो, यह ऐसा इंसान है जो भ्रमित है। सिर्फ वही लोग जिनमें मानवता के गुण होते हैं, ऐसे मामलों के प्रति खास तौर पर संवेदनशील होते हैं जिनमें गरिमा शामिल होती है। भले ही किसी को पता न हो कि उन्होंने क्या किया है, अगर उन्हें खुद इसका एहसास हो जाए, तो वे अंदर से असहज और दोषी महसूस करेंगे; यहाँ तक कि उन्हें ऐसा लगेगा जैसे कि लोग उन्हें देख रहे हैं। अगर कुछ लोग जो उन्हें अच्छी तरह जानते हैं, उन्हें उन्होंने जो किया उसके बारे में पता चल जाए, तो वे और भी अधिक असहज महसूस करेंगे और खुद को सही ठहराने की कोशिश करने में बहुत शर्मिंदा होंगे। वे जल्दी से इसकी भरपाई करने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे और इस तरह का काम दोबारा कभी नहीं करेंगे, क्योंकि उन्हें यह बहुत शर्मनाक लगेगा! ये एक ही मामले में तीन श्रेणियों के लोगों की अलग-अलग अभिव्यक्तियाँ हैं।
हमने अभी बताया कि मानवता के गुणों वाले लोगों के आमतौर पर दूसरों के साथ बर्ताव करने के सिद्धांत होते हैं। जब वे किसी व्यक्ति की स्थिति के बारे में रिपोर्ट करते हैं या जानकारी देते हैं या जब वे किसी का हालचाल जानते हैं, तब वे उसकी सत्यनिष्ठ और दयालु मानवता के आधार पर उसे देख सकते हैं और उसके साथ पेश आ सकते हैं। भले ही वे सत्य न समझें, फिर भी उनकी कुछ बुनियादी सीमाएँ होती हैं। उदाहरण के लिए, वे एक आम इंसान का इस तरह से मूल्यांकन करेंगे : “उसने कुछ भी बुरा नहीं किया है। वह एक अच्छी जिंदगी जीता है। वह दुनिया में एक साधारण इंसान है और उसे एक निष्कपट इंसान माना जा सकता है।” तुम देखो, वे अपनी अंतरात्मा के आधार पर आम इंसान का सही तरीके से मूल्यांकन करेंगे। वे उन लोगों के साथ भी सही तरीके से व्यवहार और उनका सही तरीके से मूल्यांकन कर सकते हैं जिन्होंने उन्हें नाराज किया है, उन्हें चोट पहुँचाई है या अतीत में उनके हितों को नुकसान पहुँचाया है। इससे इन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुणों का और भी अधिक पता चलता है। कहने का मतलब है, वे आम इंसान का सही तरीके से मूल्यांकन कर सकते हैं—अगर वे अच्छे हैं तो अच्छे हैं और अगर वे अच्छे नहीं हैं, तो वे उसे वैसा ही कहते हैं। अगर उनसे झूठ बोलने के लिए कहा जाए, तो वे ऐसा नहीं कर सकते; उन्हें लगता है कि ऐसा करना उनकी मर्जी के खिलाफ होगा। वे बस असलियत बताते हैं और सच को सच कहते हैं। वे इस सिद्धांत के अनुसार उन लोगों के साथ भी पेश आ सकते हैं जिन्होंने उन्हें नाराज किया है। भले ही कोई ऐसा हो जिसे वे नापसंद करते हों या जिससे उन्हें नफरत हो, अगर उन्हें उस व्यक्ति की रिपोर्ट करने या उसका मूल्यांकन करने के लिए कहा जाता है, तो वे कोई रुख नहीं अपनाना चाहेंगे, और कहेंगे, “मुझे डर है कि इस व्यक्ति के बारे में मेरा मूल्यांकन निष्पक्ष नहीं होगा क्योंकि मुझे उससे निजी शिकायतें और नाराजगी है, इसलिए मैं इससे दूर ही रहता हूँ। तुम लोग उनका मूल्यांकन दूसरों के मूल्यांकन के आधार पर कर सकते हो।” मानवता के गुणों वाले लोग मूलतः यही हासिल कर पाते हैं। खासकर, जब कोई रुतबे वाला व्यक्ति दूसरों के साथ निष्पक्ष तरीके से व्यवहार कर सकता है, तब इससे उसकी मानवता के गुण और भी ज्यादा प्रकट होते हैं। जब उनके पास रुतबा होता है, तब वे लोगों के साथ जैसा व्यवहार करते हैं, इससे दूसरों को यह साफ तौर पर देखने में मदद मिल सकती है कि उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं या नहीं। जब किसी व्यक्ति के पास रुतबा नहीं होता है, तब वह लोगों के साथ निष्पक्ष तरीके से व्यवहार करने में समर्थ प्रतीत होता है और उसका मूल्यांकन अपेक्षाकृत निष्पक्ष होता है। इससे शायद अपने आप में कुछ भी पता नहीं चलता है—जब उसके पास रुतबा होता है, तब देखो कि वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जिन्होंने उसे नाराज किया है या उसे चोट पहुँचाई है और वह उन लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता है जिन्होंने पहले उसे अलग-थलग किया है या जानबूझकर उसे दबाया है। क्योंकि जिन लोगों में सचमुच मानवता के गुण होते हैं, उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता होती है; जब उनके पास रुतबा होता है, तब वे उन लोगों के साथ सही तरीके से व्यवहार कर सकते हैं जिन्होंने उन्हें नाराज किया है, उन्हें चोट पहुँचाई है या अतीत में जानबूझकर उन्हें दबाया है। ऐसा हो सकता है कि जब वे सत्य नहीं समझते हैं, तब वे लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार पूरी सटीकता से व्यवहार नहीं कर पाते हैं, लेकिन लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके को लेकर उनकी अपनी सीमाएँ और सिद्धांत भी होते हैं। उदाहरण के लिए, कलीसिया में, अगर दूसरे भाई-बहन किसी खास व्यक्ति को उम्मीदवार या अगुआ चुनते हैं और यह व्यक्ति ऐसा होता है जिसने उन्हें पहले नाराज किया है, तो वे यह देखकर कि सभी भाई-बहन कहते हैं कि यह व्यक्ति बुरा नहीं है और बदल गया है, वे उसके चुनाव में जानबूझकर दखल नहीं देंगे या रुकावट नहीं डालेंगे। ऐसा हो सकता है कि वे इस इंसान को व्यक्तिगत तौर पर बहुत पसंद न करें, लेकिन अगर परमेश्वर का घर इस इंसान का इस्तेमाल करता है और भाई-बहन उसे चुनते हैं, तो वे मामलों को नियम के हिसाब से सँभालेंगे और सिद्धांतों के अनुसार काम करेंगे, उन परिस्थितियों में जहाँ वे इस इंसान की असलियत को पूरी तरह से नहीं जान पाए हैं। वे इस वजह से कि उन्हें इस इंसान से व्यक्तिगत शिकायतें हैं, उसके साथ गलत तरीके से बिल्कुल भी पेश नहीं आएँगे, न ही वे जानबूझकर उसे परेशान करेंगे या सताएँगे। कभी-कभी, अपने भ्रष्ट स्वभावों या मानवता की कमजोरी के कारण—विशेष परिस्थितियों में—वे उनसे ऐसी बातें कह सकते हैं जो नहीं कहनी चाहिए, क्योंकि हर किसी में भ्रष्ट स्वभाव होते हैं और कोई भी बिल्कुल दोषरहित नहीं होता। हालाँकि, वे बुनियादी सिद्धांतों को कायम रख सकते हैं; यानी, वे सिर्फ इसलिए कि उनका अपना रुतबा है, उन लोगों के पीछे नहीं पड़ेंगे, उन्हें नहीं दबाएँगे या उनसे बदला नहीं लेंगे जिनसे उनकी दुश्मनी है। अगर ऐसा कभी-कभार होता है, तो बाद में उनकी अंतरात्मा उन्हें दोषी ठहराएगी और कहेगी, “तुम्हारा ऐसा करना गलत था। अब जबकि तुम्हारे पास रुतबा है, तो तुमने अपनी ताकत का इस्तेमाल उन लोगों से बदला लेने के लिए किया—यह गलत है!” वे आत्म-चिंतन करेंगे, उनकी अंतरात्मा उन्हें दोषी ठहराएगी और इन सबसे बढ़कर उनका विवेक उनके दूसरे लोगों को दबाने और उनसे बदला लेने पर अंकुश लगाएगा, उनके व्यवहार को नियंत्रित करेगा, उन्हें लगातार याद दिलाएगा, “यह गलत है।” इस तरह, वे बोलते समय माप-तौलकर बोलेंगे और जो भी चीजें करेंगे उनमें हद से ज्यादा आगे नहीं बढ़ेंगे। ये जिन लोगों में सामान्य मानवता की अंतरात्मा और विवेक होता है, उनकी इस बात की कुछ मौलिक अभिव्यक्तियाँ हैं कि वे दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। भले ही वे कुछ समय के लिए अपनी मनोदशा के हिसाब से उन लोगों को निशाना बनाना चाहें जिनसे उनकी कोई दुश्मनी है या जिन्होंने उन्हें पहले नुकसान पहुँचाया है और भले ही दूसरे लोगों को अभी उनका बदला लेना पूरी तरह से सही लगे, फिर भी वे जो भी करते हैं माप-तौलकर करते हैं और उनकी एक सीमा होती है, जिसे वे बिल्कुल भी पार नहीं करेंगे। अगर वे अपनी सीमा पार कर सकते हैं और पागलों की तरह बदला ले सकते हैं, तो वे ऐसे इंसान नहीं होंगे जिनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं। ठीक इसलिए क्योंकि उनमें मानवता की कमजोरियाँ होती हैं और वे सामान्य मानवता में जीते हैं, इसलिए वे उन लोगों के प्रति नफरत और गुस्सा भी महसूस करते हैं जिन्होंने उन्हें दुख पहुँचाया है और वे बदला भी लेना चाहते हैं। लेकिन, क्योंकि उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण होते हैं और वे अपनी अंतरात्मा और विवेक से संयमित और नियंत्रित होते हैं, इसलिए जब वे किसी से बदला लेना चाहेंगे, तब उनकी अंतरात्मा उन्हें फटकारेगी और उनका विवेक उन्हें नियंत्रित करेगा; वे मन ही मन सोचेंगे, “चलो छोड़ो। यह ठीक नहीं होगा। उसने पहले जो किया उससे वाकई मुझे दुख नहीं हुआ और अगर मैं अब उससे बदला भी ले लूँ, तो इससे कोई समस्या हल नहीं होगी।” वे खुद को नियंत्रित करने और काबू में रखने के लिए तार्किक तरीकों का इस्तेमाल करेंगे, साथ ही खुद को मनाएँगे और अपने आपको सँभालेंगे। इसके अलावा, अगर वे कुछ सत्य भी समझते हैं, तो इस मामले में उनका व्यवहार और भी बेहतर होगा और सत्य सिद्धांतों के अधिक अनुरूप होगा। संक्षेप में, जब दूसरों के साथ उनके व्यवहार की बात आती है, तब वे समय-समय पर अपनी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण दिखाएँगे, अक्सर कुछ ऐसे विचार और व्यवहार दिखाएँगे जो मानवता के गुणों से निर्देशित होते हैं। तुम उन्हें अक्सर यह कहते हुए सुनोगे : “छोड़ो भी। अगर मैं उसके स्तर तक गिर जाऊँ, तो क्या मैं भी उसके जैसा नहीं बन जाऊँगा? इसके अलावा, जो हुआ वह बीते समय की बात है। हम सब वयस्क हैं—क्या इस तरह से जैसे को तैसा वाली बदले की होड़ में पड़ने का कोई मतलब है?” उनके पास मानवता के गुणों से निकले कुछ विचार और दृष्टिकोण होंगे जो उन पर अंकुश लगाएँगे। बेशक, बात यह भी है कि उनकी अंतरात्मा और विवेक के मार्गदर्शन में उत्पन्न होने वाले उनके विचार और दृष्टिकोण लगातार उनकी कथनी और करनी को विनियमित, संयमित, नियंत्रित कर रहे होंगे और रोक रहे होंगे। इसके बाद, दूसरों से बदला लेने के वे विचार जो विवेक की सीमाएँ पार कर जाते हैं, उनके दिलों में अधिक से अधिक कमजोर होते जाएँगे। अंतरात्मा और विवेक द्वारा लगातार सुधार किए जाने के साथ-साथ, सत्य का अनुसरण करने और उम्र के साथ अधिक परिपक्व बनने पर, जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता जैसे गुण होते हैं, उनके विचार और क्रियाकलाप—जैसे-जैसे ये लोग सत्य का अनुसरण करेंगे—अधिक से अधिक सकारात्मक होते जाएँगे, सत्य सिद्धांतों के अनुरूप होते जाएँगे और अधिक से अधिक विनियमित होते जाएँगे। यानी, इस प्रक्रिया से गुजरते हुए लोग धीरे-धीरे नफरत करना छोड़ देंगे, शिकायतें करना छोड़ देंगे और अपनी संकीर्ण मानसिकता वाली सोच से पैदा हुई विभिन्न व्यक्तिगत समस्याओं को छोड़ देंगे। अगर कोई व्यक्ति सिर्फ अंतरात्मा और विवेक से नियंत्रित और संयमित होता है, तो वह सिर्फ इतना कर सकता है कि नफरत और शिकायतों को बस त्याग दे, और एक आसान-सा जवाब दे सकता है, “चलो छोड़ो, जो बीत गई वो बात गई।” लेकिन अगर कोई सच का अनुसरण कर सकता है और सत्य समझ सकता है, तो वह सिर्फ त्याग देने, चीजों को गुजर जाने देने और बात खत्म करने तक ही सीमित नहीं रहेगा; बल्कि वह सत्य सिद्धांतों को लागू कर पाएगा, अंतरात्मा और विवेक के अनुसार चलकर अधिक सही तरीके से जी पाएगा, इन मामलों को सँभाल पाएगा और जिन लोगों के साथ उसकी अलग-अलग शिकायतें थीं, उनके साथ ठीक उसी तरह से पेश आएगा जैसा परमेश्वर सिखाता है। इसलिए, अगर किसी व्यक्ति के पास दूसरों के साथ व्यवहार करने के लिए बुनियादी सिद्धांत हैं और इस आधार पर वह सत्य भी समझता है, तो ही वह धीरे-धीरे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकता है और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकता है।
अंतरात्मा और विवेक वाले लोग जिन सिद्धांतों के अनुसार दूसरों से पेश आते हैं, वे उनकी मानवता में मौजूद सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुणों से नियंत्रित होते हैं। इसलिए, जिन लोगों की मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता के ये गुण नहीं होते, उनके पास दूसरों के साथ पेश आने का कोई सिद्धांत नहीं होता। तुम देखो, जब कुछ लोगों के पास कोई रुतबा नहीं होता है, तब अगर कोई उन्हें चोट पहुँचाता है या उन्हें नीची नजर से देखता है और बदला लेना उनकी क्षमता से बाहर की बात होती है, तो वे बहुत-सीधे-सादे लगते हैं, मानो कि उनका आचरण काफी अच्छा है, तुम्हें लग सकता है कि वे काफी अच्छे हैं और तुमने उन्हें कभी किसी ऐसे व्यक्ति से बदला लेते नहीं देखा होगा जिसने उन्हें ठेस पहुँचाई हो, लेकिन इससे यह तय नहीं हो सकता कि वास्तव में उनकी मानवता में क्या गुण हैं। तुम्हें यह देखना चाहिए कि जब उनके पास रुतबा, भाषण पर नियंत्रण और निर्णय लेने की शक्ति हो, तब वे लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हैं—क्या वे लोगों के साथ निष्पक्ष तरीके से व्यवहार कर सकते हैं, क्या वे उन लोगों के साथ अंतरात्मा और विवेक के आधार पर व्यवहार कर सकते हैं जिन्होंने अतीत में उन्हें नाराज किया है और क्या लोगों के साथ पेश आने में उनके सिद्धांत हो सकते हैं। इससे तुम्हें पता चलता है कि किसी व्यक्ति की असल में क्या श्रेणी है। जिन लोगों में मानवता के गुण नहीं होते, वे तब बहुत अच्छे व्यवहार का दिखावा करते हैं जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता। जब दूसरों से बदला लेना उनकी क्षमता से बाहर की बात होती है, तब वे ऐसा करने की हिम्मत नहीं करते, लेकिन अपने दिल में वे हर छोटी-सी बात को याद रखते हैं। उनके मन में नफरत, बदले की भावना और लोगों को सताने और उनके खिलाफ साजिश रचने के तरीके भरे होते हैं। वे सही समय का इंतजार करेंगे और बदला लेने के मौके ढूँढ़ेंगे, जिन लोगों ने पहले उन्हें नाराज किया था, उनका पतन होते देखने का इंतजार करेंगे। एक बार जब उनके पास रुतबा आ जाता है और जब वे इस रुतबे को मजबूत कर लेते हैं, तब जिन लोगों ने पहले उन्हें नाराज किया होता है या जो उनके खिलाफ हैं, उनके प्रति उनका रवैया उन लोगों के रवैये से बिल्कुल अलग होता है जिनके पास अंतरात्मा और विवेक होता है। उन्हें बस बदला लेना होता है और वे ऐसा करने के तरीके खोजने में अपना दिमाग खपाएँगे। वे अपनी नफरत को बिल्कुल नहीं छोड़ेंगे, न ही वे किसी शिकायत को छोड़ेंगे। वे मानवता के गुणों वाले लोगों की तरह बिल्कुल नहीं होंगे, जो कहेंगे, “छोड़ो भी। इतने साल बीत गए। मैं अच्छी जिंदगी जी रहा हूँ और उन्होंने जो किया उससे मुझे वास्तव में कोई नुकसान नहीं हुआ। इसके अलावा, बदला लेने से क्या हासिल होगा?” वे यह बिल्कुल नहीं कहेंगे “चलो छोड़ो;” अपने दिल में वे सारा हिसाब रखते रहेंगे। जब उनके पास रुतबा होता है, तब वे कहते हैं, “क्या तुम्हें लगता है कि मैं अपनी नफरत भूल गया हूँ? तुमने पहले मुझे नाराज किया, मुझे चोट पहुँचाई और मुझे दबाया—क्या तुम्हें लगता है कि अब यह बस भूली-बिसरी बात हो गई है? यह नामुमकिन है! अब मेरे पास रुतबा है; चीजें पहले से अलग हैं—मैं तुमसे बदला कैसे न लूँ? मैं अपनी ताकत का इस्तेमाल करके तुम्हें दिखाऊँगा कि मैं क्या कर सकता हूँ, मैं तुम्हें बताऊँगा कि मैं कोई साधारण इंसान नहीं हूँ!” उनकी अंदर की दुनिया नफरत से भरी है, उनके मन बदला लेने और हार को जीत में बदलने के तरीकों से भरे हैं, वे ऐसा करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि कोई यह न भूले कि वे कितने ताकतवर हैं, इसलिए लोग अब उन्हें पहले की तरह परेशान न करें, बल्कि उनसे डरें। तुम देखो, क्या इस तरह का इंसान मानवता के गुणों वाले इंसान से अलग नहीं है? (हाँ।) वह लगातार अपने दिमाग में क्या सोच रहा होता है? “मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि मैं कितना ताकतवर हूँ। मैं तुम्हें दिखाऊँगा कि मैं कोई ऐसा इंसान नहीं हूँ जिसके साथ खिलवाड़ किया जा सके। मैं कुछ ऐसा करूँगा कि जब भी तुम मुझे देखोगे तो डर जाओगे, कुछ ऐसा करूँगा कि तुम मुझे फिर कभी परेशान करने की हिम्मत नहीं करोगे!” मुझे बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि वे इन विचारों पर काम कर सकते हैं? (हाँ।) वे बिल्कुल ऐसा कर सकते हैं। उनका दिल नफरत से भरा है; यही नहीं, उनकी श्रेणी दानव की है और उनके पास यह मापने का कोई मानक नहीं है कि इस तरह सोचना सही है या गलत। जब वे इस तरह सोचते हैं, तब उनके पास खुद को रोकने के लिए अंतरात्मा और विवेक नहीं होता—कोई भी चीज उन्हें रोक या नियंत्रित नहीं कर सकती। जहाँ ये दुष्ट, क्रूर चीजें लगातार उनके अंदर बढ़ती और प्रवाहित होती रहती हैं, वे लगातार साजिश भी रचते रहते हैं और उन चीजों को करने के मौके ढूँढ़ते रहते हैं जो वे करना चाहते हैं। अब उनके पास रुतबा है—आखिरकार उनका मौका आ गया है। मुझे बताओ, क्या तुम्हें लगता है कि वे नरमी दिखाएँगे? वे बिल्कुल भी नरमी नहीं दिखाएँगे। वे इस मौके का फायदा उठाएँगे और अपनी ताकत का इस्तेमाल करके अपने सभी विचारों को वास्तविकता में बदल देंगे, जिससे जिन लोगों ने पहले उन्हें नुकसान पहुँचाया है वे और उनके दुश्मन उनसे डरेंगे; वे उन्हें दिखाएँगे कि वे कितने सक्षम और काबिल हैं, जिससे ये सभी लोग अपने दिलों में उनकी सराहना करेंगे और कुछ ऐसा करेंगे जिससे कि उनके दिलों में उनका रुतबा कायम हो। अगला काम जो वे करेंगे वह इन लोगों को शर्मिंदा करना होगा, वे अपनी कथनी और करनी के जरिए उन्हें दबाएँगे और उनके पीछे पड़ जाएँगे। वे देखेंगे कि पहले किसने उन्हें नाराज किया था और सोचेंगे, “मुझे उसे सबसे मुश्किल, खतरनाक जगह पर सुसमाचार का प्रचार करने के लिए भेजना होगा। अगर वह नहीं जाना चाहेगा, तो मैं उसकी काट-छाँट करूँगा। अगर वह उसके बाद भी नहीं जाता है, तो मैं उसे बदनाम कर दूँगा और निष्कासित कर दूँगा! और जो कोई भी उसके लिए बोलेगा, उसका भी यही अंजाम होगा!” किसी व्यक्ति ने पहले उन्हें नाराज किया था और अब उसे अगुआ चुना गया है, लेकिन वह अभी भी उनके अधीनस्थ है। वे सोचते हैं, “मैं उसकी प्रतिष्ठा पूरी तरह से खत्म करने के लिए कौन-सा धर्मोपदेश दे सकता हूँ? अगर वह अच्छा व्यवहार करता है और हर मामले में मेरी बात सुनता है, तो मैं उसके लिए एक नई शुरुआत करूँगा। लेकिन अगर वह मेरी बात नहीं मानता है, मुझे नापसंद करता है, मुझसे संतुष्ट नहीं है और यहाँ तक कि मेरी समस्याओं की रिपोर्ट करना चाहता है, तो मुझे उसे सबक सिखाना होगा! मैं भाई-बहनों से उसे हटवाने और बर्खास्त करवाने की हर संभव कोशिश करूँगा और कुछ ऐसा करूँगा कि वह कभी भी चीजों को बदल न सके! मैं उसे खेत में काम करने या सूअर पालने के लिए भेज दूँगा। अगर वह फिर भी नहीं सुनता है, तो मैं उसके लिए सबसे खतरनाक जगह ढूँढूँगा जहाँ जाकर वह अपना कर्तव्य करे, जहाँ पुलिस उसे किसी भी समय गिरफ्तार कर सकती है!” ऐसे दिलचस्प विचार पहले से ही बहुत गंभीर हैं; यह पहले से ही सीमाएँ पार करना है। वे इस तरह सोच सकते हैं, यह पहले ही साबित करता है कि उनके पास वास्तव में कोई अंतरात्मा या विवेक नहीं है। और अगर वे वास्तव में ये चीजें कर सकते हैं, तो अंतरात्मा और विवेक नहीं होने के अलावा, उनके अंदर दानवी प्रकृति का तत्व भी है। उनका दिल न सिर्फ मानवता से रहित है, बल्कि उसमें दानवी प्रकृति भी है। क्या वे दानव नहीं हैं? जब इस तरह के लोगों के पास कोई रुतबा नहीं होता है, तब वे खुद को छिपाने और चीजों को झेलने में काफी अच्छे होते हैं। उन्होंने “अपमान के जख्म हरे रखने के लिए सूखी लकड़ी पर सोना और पित्त चाटना” सीख लिया है। उन्होंने “सज्जन के बदला लेने में देर क्या और सबेर क्या,” और “जब तक तुम जिंदा हो, तुम्हारे पास एक मौका है” और साथ ही “प्रधानमंत्री का दिल इतना बड़ा होता है कि उसमें एक नाव चल जाए” जैसी कहावतों से सीखा है। उन्होंने अब तक खुद को छिपाए रखा है और आखिरकार, उनका असली रंग सामने आ गया है। वे किस तरह के घटिया लोग हैं? वे इंसान नहीं, दानव हैं। जरा आगे बढ़कर देखो कि कौन-से लोग तब अच्छा व्यवहार करते हैं जब उनके पास कोई रुतबा नहीं होता, लेकिन जैसे ही उन्हें रुतबा मिलता है, वे तुरंत अलग इंसान प्रतीत होने लगते हैं। वे तुरंत उन लोगों के पते-ठिकानों और स्थितियों के बारे में पूछने लगते हैं जिन्होंने उन्हें नाराज किया है और जानना चाहते हैं कि वे अभी क्या कर्तव्य कर रहे हैं। फिर वे इन लोगों के लिए मुसीबत खड़ी करने और उनकी बातों को बढ़ा-चढ़ाकर बताने के मौके ढूँढ़ते हैं, वे इन लोगों के पीछे इस हद तक पड़ जाते हैं कि वे शांत हो जाते हैं और उनके सामने आत्मसमर्पण कर देते हैं, तब जाकर उन्हें लगता है कि कलीसिया का काम अच्छे से हुआ है। इस तरह के लोग बुरे दानव होते हैं और उन्हें तुरंत बर्खास्त किया जाना चाहिए। अगर उन्हें बर्खास्त नहीं किया गया, तो दूसरों के साथ तुम्हें भी तकलीफ उठानी होगी—देर-सवेर वे तुम्हारे पीछे भी पड़ जाएँगे।
किस तरह के व्यक्तियों को कलीसिया के अगुआ के तौर पर चुना जाना चाहिए? एक बात तो यह है कि उन पर अपना कर्तव्य करने का बोझ होना चाहिए और उनमें पर्याप्त काबिलियत होनी चाहिए। दूसरी बात, उनकी मानवता में सत्यनिष्ठा और दयालुता होनी चाहिए और उन्हें लोगों के साथ निष्पक्ष तरीके से पेश आने में सक्षम होना चाहिए। जब उनके पास कोई रुतबा नहीं था, तब असल में कुछ भाई-बहनों ने उन्हें नाराज किया था या उनकी उनसे अनबन थी, लेकिन अगुआ बनने के बाद, वे इन लोगों के साथ सही तरीके से व्यवहार कर सकते हैं, जब उन्हें बढ़ावा दिया जाना चाहिए तब उन्हें बढ़ावा दे सकते हैं और जब उनका इस्तेमाल करना चाहिए तब उनका इस्तेमाल कर सकते हैं। कुछ लोग उनसे कहते हैं, “उस इंसान ने पहले तुम्हारे बारे में भला-बुरा कहा था,” लेकिन वे इसे जाने दे सकते हैं। वे परमेश्वर के घर के काम को प्राथमिकता देते हैं, और कहते हैं, “परमेश्वर के घर को अभी लोगों की जरूरत है। अगर वह इस कर्तव्य को करने के लिए उपयुक्त है, तो हमें उसका इस्तेमाल करना चाहिए।” चाहे कोई भी मतभेद पैदा करने की कोशिश करे, वे उससे प्रभावित नहीं होते। भले ही उस इंसान ने उनके साथ सबसे बुरा बर्ताव किया हो, अगर यह इंसान लोगों का इस्तेमाल करने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों के अनुरूप है, तो अगुआ जरूरत के हिसाब से उसका इस्तेमाल करेगा। इस बात को थोड़ी देर के लिए एक तरफ रख दें कि ऐसा इंसान परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील है या नहीं या उसकी काबिलियत कैसी है या वह काम अच्छे से कर सकता है या नहीं, बस लोगों की श्रेणियों के हिसाब से देखें, तो वह बिल्कुल एक सच्चा इंसान है। वह लोगों के साथ निष्पक्ष तरीके से व्यवहार कर सकता है, खासकर उन लोगों के साथ जिनसे उनकी अनबन रही है या जिन्होंने पहले उसे दबाया है, चोट पहुँचाई है या उसका अपमान किया है या उसे परेशान किया है—वह उन सभी के साथ सही और निष्पक्ष तरीके से व्यवहार कर सकता है। हमारे लिए इतना कहना काफी है कि यह इंसान पर्याप्त रूप से सत्यनिष्ठ और दयालु है; वह सिद्धांतों के अनुरूप है और परमेश्वर द्वारा पूर्ण बनाए जाने की शर्तों को पूरा करता है। कुछ लोग कहते हैं, “तो क्या यह सत्य का अनुसरण करने वाला इंसान है? अगर वह सत्य अनुसरण नहीं करता है, तो क्या वह लोगों के साथ इस तरह से व्यवहार करने में असमर्थ नहीं होगा?” क्या यह सही है? मुझे बताओ, अगर कोई सत्य का अनुसरण नहीं भी करता है, लेकिन अगर उसकी मानवता में स्वाभाविक रूप से सत्यनिष्ठा और दयालुता के गुण हैं, तो क्या वह लोगों के साथ पेश आने में कोई बुनियादी सिद्धांत रख पाएगा? (हाँ।) जब उसके पास रुतबा होगा, तब क्या वह निजी शिकायतें भूल पाएगा, लोगों के खिलाफ उनकी पिछली गलतियों को याद नहीं रखेगा और लोगों के साथ अपनी निजी शिकायतों के आधार पर व्यवहार नहीं करेगा? वह यह सब हासिल कर पाएगा। अगर तुम यह भी हासिल नहीं कर सकते, तो तुम सत्य का अभ्यास करने और परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने की उम्मीद भी कैसे कर सकते हो? अगर यह भी तुम्हारी पहुँच से बाहर है, तो तुम एक सत्यनिष्ठ और दयालु इंसान नहीं हो; यह भी कहा जा सकता है कि तुम ऐसे इंसान नहीं हो जिसमें मानवता के गुण हों—तुम इंसान नहीं हो। अगर तुम इंसान नहीं हो और तुम्हारे पास अंतरात्मा या विवेक नहीं है, तो तुम सत्य का अनुसरण करने की कोशिश कहाँ से करोगे? अगर तुम परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने और सत्य का अनुसरण करने की बुनियादी शर्तों को पूरा नहीं करते, तो तुम सत्य हासिल नहीं कर सकते और तुम इंसान कहलाने के लायक नहीं हो। अगर तुम लोगों के साथ निष्पक्ष तरीके से व्यवहार नहीं कर सकते, तो क्या तुम सत्य से प्रेम कर सकते हो? क्या तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास कर सकते हो? अगर तुम छोटी-मोटी निजी शिकायतें भी नहीं छोड़ सकते और तुम किसी ऐसे व्यक्ति से बदला ले सकते हो जो तुम्हें नुकसान पहुँचा सकता है या जिसने तुम्हें पहले नाराज किया है और तुम्हारे पास अंतरात्मा और विवेक का कोई मानक भी नहीं है, तो क्या तुम परमेश्वर के वचनों का अभ्यास करने में समर्थ होगे? बिल्कुल नहीं! इसलिए, किसी अगुआ को चुनते समय, तुम्हें सबसे पहले यह देखना चाहिए कि वह व्यक्ति दूसरों के साथ कैसा व्यवहार करता है; यह इस बात को मापने का एक मानक है कि व्यक्ति में मानवता के गुण हैं या नहीं। यानी, चाहे अतीत में किसी ने भी उसे नाराज क्यों न किया हो, वह मन में कोई द्वेष नहीं रखता है, उसने कभी किसी से बदला नहीं लिया है और रुतबा पाने के बाद भी वह वैसे ही बना रहता है। ऐसा हो सकता है कि वह खुद को बेहतर समझे, थोड़ी रुतबे की चाहत रखे या रुतबे के लाभों का आनंद ले, लेकिन वह जरूरत के अनुसार उन लोगों का इस्तेमाल करता है जिन्होंने अतीत में उसे नाराज किया है और उनके साथ वैसा ही व्यवहार करता है जैसा उसे करना चाहिए—शायद अपने दिल में वह उन द्वेषों को याद रखता हो, लेकिन वह बदला लेने के लिए कुछ नहीं करता। यह कुछ ऐसा है जिसे मानवता के गुणों से रहित कोई व्यक्ति हासिल नहीं कर सकता; जानवर इसे हासिल नहीं कर सकते और दानव तो बिल्कुल भी हासिल नहीं कर सकते। सिर्फ वही लोग इसे हासिल कर सकते हैं जिनके पास अंतरात्मा है। जब अंतरात्मा वाले लोग कुछ करते हैं, तो उनकी अंतरात्मा उन्हें अंदर से प्रेरित करती है और उनके व्यवहार को नियंत्रित करती है, उनका विवेक उनके आवेगों और उतावलेपन पर अंकुश लगाता है; इससे भी बढ़कर, यह उनके अतार्किक विचारों और व्यवहारों को संयमित और नियंत्रित करता है। भले ही उनके पास रुतबा हो, वे दूसरों से बदला लेने के लिए कुछ नहीं करेंगे। यह इस बात का साफ संकेत है कि व्यक्ति में मानवता के गुण हैं। अपने आस-पास के लोगों को देखो—जो भी ऐसा व्यक्ति है वह सच्चा इंसान है। ऐसा हो सकता है कि उसकी काबिलियत औसत दर्जे की हो, वह उच्च शिक्षा प्राप्त न हो और वह अभी भी काफी युवा हो; यह भी हो सकता है कि बाहर से वह उतना उत्साही न दिखे, न ही वह ज्यादा कुछ प्रयास करता दिखे और हो सकता है कि वह भविष्य में सत्य का अनुसरण न करे—लेकिन ऐसा व्यक्ति कम से कम तुम्हारे लिए भरोसेमंद तो है, है ना? (हाँ।)
अब जब हमने नेक और दयालु लोगों की अभिव्यक्तियों के बारे में संगति इस संदर्भ में पूरी कर ली है कि वे दूसरों के साथ कैसे पेश आते हैं, आओ अब बात करते हैं कि जब वे कुछ गलत करते हैं और अपराध करते हैं, तब इस तरह के लोगों में क्या विशेष अभिव्यक्तियाँ और विशेषताएँ होती हैं। भ्रष्ट इंसान होकर, अगर उनकी मानवता में नेकी और दयालुता के गुण हैं तो जब वे कुछ गलत करते हैं, चाहे उन्हें इसके बारे में पता हो या न हो, वे अपनी कथनी और करनी पर विचार करेंगे और उनकी जाँच करेंगे। अगर उन्होंने किसी को नुकसान पहुँचाया है या अगर कोई उनके बारे में नकारात्मक प्रतिक्रिया देता है या उनका नकारात्मक आकलन करता है तो वे खुद की जाँच करेंगे : “मेरे कौन-से शब्द गलत थे? मैंने क्या गलत किया? क्या उस समय बोलते हुए मेरा कोई इरादा था? क्या मैं उस व्यक्ति को निशाना बना रहा था? क्या यह सच में मेरी गलती है कि मेरी वजह से उसे बुरे परिणाम भुगतने पड़े? क्या वह बहुत ज़्यादा संवेदनशील हो रहा है या मैंने अपने विचार में पर्याप्त सावधानी नहीं बरती और उस समय मेरे शब्दों का चयन गलत था?” वे अक्सर खुद की जाँच करेंगे और उनका रवैया विनम्रता से आचरण करने वाला होगा। यह रवैया उनकी नेकी और दयालुता से आता है और बेशक यह उनकी तर्क-शक्ति से भी आता है। यह एक पहलू है। इसके अलावा, अगर आत्म-चिंतन करने से उन्हें पता चलता है कि उनमें कुछ समस्याएँ हैं या अगर दूसरे लोग उनकी समस्याएँ बताते हैं तो वे व्यथित महसूस करेंगे और उनका दिल एक पल को रुक-सा जाएगा : “क्या मैंने इसे करने का जो तरीका अपनाया, वह गलती था? क्या मुझे इसे ऐसे नहीं करना चाहिए था? मैंने उस समय जानबूझकर ऐसा नहीं किया था और मेरा कोई इरादा नहीं था।” भ्रष्ट इंसान होने के नाते, कुछ विशेष परिस्थितियों में या कुछ विशेष मामलों को लेकर, अपना आत्म-सम्मान बचाने के लिए शायद वे कहें, “मैंने यह जानबूझकर या किसी इरादे से नहीं किया था,” लेकिन वे अंदर ही अंदर दोषी महसूस करेंगे। लगातार खुद को जाँचने और आत्म-चिंतन करने की प्रक्रिया के दौरान, अगर उन्हें पता चलता है कि उन्होंने जो किया वह सच में गलत था तो वे एक बार फिर असहज महसूस करेंगे, उन्हें ऐसा लगेगा कि उन्हें इसे ऐसे नहीं करना चाहिए था; उन्हें पछतावा और तकलीफ महसूस होगी, वे अपने किए की भरपाई करने के तरीके या उसे ठीक करने के मौके ढूँढ़ने की कोशिश करेंगे, यहाँ तक कि वे आगे बढ़कर माफी भी माँगेंगे और अपनी गलती मान लेंगे। जब मानवता के गुणों वाले लोगों को पता चलता है कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो उन्हें अपने दिल में सबसे पहले तकलीफ महसूस होगी, वे लाल हो जाएँगे और उनका सिर दुखने लगेगा; ये अंतरात्मा से आने वाली सामान्य प्रतिक्रियाएँ हैं। ये सामान्य प्रतिक्रियाएँ किस पर आधारित होती हैं? ये किसी इंसान की मानवता के अंदर नेकी, दयालुता और तार्किकता के गुण होने पर आधारित है। उनमें ये अभिव्यक्तियाँ इसलिए नहीं होती हैं क्योंकि वे अपना आत्म-सम्मान बचाना चाहते हैं, न ही इसलिए होती हैं कि उन्होंने खुद को शर्मिंदा किया है या दूसरों ने उन्हें नीचा दिखाया है, बल्कि इसलिए होती हैं क्योंकि वे कुछ गलत करने पर दोषी महसूस करते हैं और खुद को धिक्कारते हैं; यह महसूस करते हैं कि उन्हें इसे ऐसे नहीं करना चाहिए था। यह अपनी गलतियाँ मानने का रवैया है, यह उनकी अंतरात्मा द्वारा निंदा किए जाने से और उनकी तर्क-शक्ति के काम करने से पैदा होने वाली एक प्रतिक्रिया भी है। उनकी एक प्रतिक्रिया होगी; वे बिल्कुल भी पूरी तरह से सुन्न नहीं होंगे, न ही बेशर्मी से बहस करने और खुद को सही ठहराने की कोशिश करेंगे और न ही जिम्मेदारी से बचने के तरीके खोजने की कोशिश करेंगे, बल्कि उनका रवैया आगे बढ़कर गलती मान लेने, उसे स्वीकार करने और जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार होने का होगा। क्योंकि इस तरह के इंसान की मानवता में नेकी और दयालुता के गुण होते हैं, इसलिए उनमें शर्मिंदगी का एहसास बहुत स्पष्ट होता है। अगर वे कोई छोटी-मोटी गलती करते हैं तो जैसे ही कोई उन्हें इसके बारे में बताता है, वे अपनी शर्मिंदगी छिपा नहीं पाते। अगर वे थोड़ी और बहस करें तो उन्हें लगेगा, “यह साफ तौर पर मेरी गलती है, उन्होंने पहले ही इसे साफ-साफ समझा दिया है, मैं अब भी किसलिए बहस कर रहा हूँ?” वे सीधे अपनी गलती मान लेंगे, महसूस करेंगे कि उन्होंने अपनी इज्ज़त पूरी तरह खो दी है और चाहेंगे कि यह धरती उन्हें निगल जाए। क्या ये अंतरात्मा और विवेक के प्रभाव हैं? (हाँ।) अगर बहुत-से लोगों को पता चल जाए कि उन्होंने क्या किया है तो वे अपना चेहरा दिखाने में और भी ज़्यादा शर्मिंदगी महसूस करेंगे, वे इसकी भरपाई करने और जो उन्होंने किया उसे ठीक करने के तरीके खोजने की कोशिश करेंगे। यानी जब अंतरात्मा और विवेक वाले इंसान कुछ गलत करते हैं तो उनमें अपनी गलती मानने का एक मौलिक रवैया होता है; वे इस तथ्य को स्वीकार कर पाते हैं और उनमें शर्मिंदगी का एहसास होता है। इसके अलावा, ऐसा नहीं है कि वे सिर्फ अपनी गलती मान लेते हैं और बात को वहीं छोड़ देते हैं; वे इसकी भरपाई करने के तरीके भी खोजने की कोशिश करते हैं। क्योंकि उनमें अंतरात्मा होती है इसलिए वे जो भी करते हैं उसमें अपना दिल लगाते हैं; जब किसी परिस्थिति का सामना होता है तो वे उसे दिल पर लेते हैं, उस परिस्थिति के साथ गंभीरता और जिम्मेदारी से पेश आते हैं, उस समस्या पर गहराई से विचार करने और उसे गंभीरता से लेने में अपना दिमाग लगाते हैं, न कि लापरवाह होते हैं और यंत्रवत ढंग से काम करते हैं, जिम्मेदारी से भागने का तो सवाल ही नहीं उठता। वे जिम्मेदारी उठा सकते हैं, अपनी गलती को गंभीरता से और पूरे दिल से स्वीकार कर सकते हैं और फिर जिम्मेदारी से बोल और काम कर सकते हैं, नुकसान को कम से कम करने की कोशिश कर सकते हैं। वे बिल्कुल भी दानवों की किस्म के लोग नहीं होते, जो तब गुस्से से आगबबूला हो जाते हैं जिस पल गलत काम करने के लिए कोई उनकी आलोचना करता है, जो जिम्मेदारी से बचने और भागने के हर संभव तरीके सोचते हैं, जो हर तरह से दूसरों पर आरोप मढ़ने की कोशिश करते हैं और जो ऐसे संत होने का दिखावा करते हैं जो कभी कोई गलत काम नहीं करता। जानवरों से पुनर्जन्म लेने वालों के लिए यह और भी ज़्यादा सच है कि उन्हें नहीं पता कि वे जो कुछ भी करते हैं उसमें क्या सही है और क्या गलत। अगर तुम बताते हो कि उन्होंने कुछ गलत किया है तो वे मान लेते हैं, लेकिन अगर तुम उनसे पूछते हो कि उन्होंने कहाँ गलती की तो वे कहते हैं, “मुझे नहीं पता, लेकिन क्योंकि तुम कहते हो कि मैं गलत हूँ तो मैं गलत हूँ।” फिर भी जब वे इस तरह की चीज़ का दोबारा सामना करते हैं तो वे इसे उसी तरीके से करते हैं। चाहे वे कितने भी गलत या बुरे काम करें या कितने भी भ्रष्ट स्वभाव दिखाएँ, वे आखिर में हमेशा उन्हीं कुछ बातों पर वापस आ जाते हैं : “मैंने क्या गलत किया है? क्या मेरा इतने सालों तक कष्ट सहना और कीमत चुकाना गलत था? अगर मैंने परमेश्वर में विश्वास नहीं किया होता और मेरे पास अंतरात्मा और विवेक नहीं होता तो क्या मैं इतना कष्ट झेल पाता?” जानवरों से पुनर्जन्म लेने वाले लोगों की समझ सीमित होती है और हमेशा वे उन्हीं कुछ बातों पर आ जाते हैं। लेकिन दानवों की किस्म के लोग जानवरों से पुनर्जन्म लेने वालों की तुलना में कहीं अधिक चालाक होते हैं; वे बुराई करने और लोगों को गुमराह करने के लिए अलग-अलग साधन और तरीके अपनाएँगे, जिन कुछ लोगों का आध्यात्मिक कद छोटा होता है और जिनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं होती है, वे सच में धोखा खा सकते हैं। संक्षेप में, दानव कुछ गलत करने पर उसे बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते। वे यह नहीं मानते कि वे भ्रष्ट स्वभाव वाले लोग हैं, बल्कि वे तो यह भी चाहते हैं कि लोग सोचें कि वे पवित्र हैं और उनका उल्लंघन नहीं किया जा सकता और यह कि वे ऐसे दोषरहित लोग हैं जो कभी गलती नहीं करते। वे चाहे कोई भी गलत काम करें, वे हमेशा वजह बताते हैं कि उन्होंने ऐसा क्यों किया और हमेशा खुद को सही ठहराने की कोशिश करते हैं। आखिर में, वे यह दावा करते हैं कि वे कोई गलत काम कर ही नहीं सकते, अगर वे कुछ गलत करते भी हैं तो उनके पास इसकी कोई वजह होती है, वे भ्रष्ट स्वभाव वाले लोग नहीं हैं, वे कभी भी कुछ गलत नहीं करेंगे, वे तो बस संत और दोषरहित लोग हैं। लेकिन, जिन लोगों की मानवता के अंदर अंतरात्मा और विवेक के गुण होते हैं, वे अलग होते हैं। क्योंकि वे नेक लोग हैं जो कुटिल या धोखेबाज़ नहीं होते, इसलिए अगर तुम कहते हो कि उन्होंने कुछ गलत किया है, भले ही उन्होंने ऐसा न किया हो या इसका उनसे कोई लेना-देना न हो, वे पहले तो इसे मानने को तैयार रहते हैं। जब दूसरे उनसे कहते हैं, “क्या तुम मूर्ख हो? अगर तुम इसे स्वीकार कर लेते हो तो तुम्हें जिम्मेदारी लेनी होगी,” तब वे कहते हैं, “जो कुछ हुआ उसमें मेरा भी हाथ था; मैं भी उसमें शामिल था।” वे इसे स्वीकार करने में सक्षम होते हैं; उनका रवैया ईमानदार और नेक होता है। कभी-कभी वे भी जिम्मेदारी से बचना चाहेंगे, लेकिन फिर वे सोचते हैं : “किसी ऐसी चीज़ की जिम्मेदारी लेने से क्यों बचना जिसे कोई भी आँखों वाला इंसान देख सकता है? इसके अलावा, परमेश्वर लोगों के दिलों के अंतरतम की पड़ताल करता है। अगर जो कुछ हुआ तुम उसमें शामिल हो तो परमेश्वर तुम्हें नहीं छोड़ेगा। परमेश्वर के सामने, सभी लोग खोलकर रख दिए जाते हैं, उनके सभी क्रियाकलाप और कर्म खुले में हैं। क्या तुम परमेश्वर के सामने से बच सकते हो? इसलिए, इस मामले से नियम के अनुसार निपटना चाहिए; जिम्मेदारी जिसकी है उसी पर आनी चाहिए। अगर इस मामले में मेरी कोई गलती है तो इसकी जिम्मेदारी मैं लूँगा। मैं दंड स्वीकार करने के लिए तैयार हूँ और मैं काट-छाँट को स्वीकार करने के लिए भी तैयार हूँ। परमेश्वर का घर जैसे भी मुझसे निपटेगा, मैं उसे स्वीकार करूँगा; आखिरकार, मैंने ही तो गलत काम करना चुना था।” देखा तुमने, जब वे कुछ गलत करते हैं और काट-छाँट का सामना करते हैं तो एक तरह से उनका रवैया स्वीकार करने का होता है; दूसरी तरह से, वे इसे सही ढंग से समझ पाते हैं। एक और तरह से, क्योंकि इस तरह के लोग कुछ गलत करने के बाद स्थिति पर विचार करने और आत्म-चिंतन करने में अपना दिमाग लगाते हैं, जब वे फिर से वैसी ही चीज़ का सामना करते हैं तो वे गलतियाँ करने से बचने के बारे में सोचेंगे। क्योंकि उनमें शर्मिंदगी का एहसास होता है और वे अपने आत्म-सम्मान की परवाह करते हैं, इसलिए वे कोई गलत काम करने पर पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं।
अविश्वासी लोग अक्सर कहते हैं, “वे बदबू की परवाह किए बिना कूड़ेदान में भी रह सकते हैं।” जिन लोगों में अंतरात्मा और विवेक नहीं होता है, वे भले ही एक ही काम को सौ बार गलत करें, उन्हें न तो शर्मिंदगी का एहसास होता है और न ही कोई अपराध-बोध होता है। वे इंसान नहीं हैं! अगर कोई इंसान है, तो एक या दो बार वही गलत काम करने के बाद उसे लगेगा, “मैंने गलती कर दी है। मैं आखिर कब बदलूँगा?” वह दुखी और बेचैन हो जाएगा, प्रार्थना और अपने पाप कबूल करने परमेश्वर के सामने आएगा। उसे यह भी लगेगा कि क्या अब उसकी मदद नहीं की जा सकती—उसे यह गलतफहमी होगी। क्योंकि उसे अपने आत्म-सम्मान की परवाह होती है और शर्मिंदगी का एहसास होता है, उसे लगता है, “मैंने अब तक कई बार इस तरह की गलती की है; क्या परमेश्वर का घर मुझसे निपटेगा? क्या परमेश्वर ने मुझसे उम्मीद छोड़ दी है? मैं इतना शर्मनाक हूँ कि परमेश्वर द्वारा बचाया नहीं सकता!” संक्षेप में, परमेश्वर के बारे में उसकी चाहे जो भी गलतफहमियाँ हों, कुछ गलत करने के बाद, इस तरह का इंसान निश्चित रूप से कुछ अनुभव पाएगा और सबक सीखेगा, वह अपनी गलतियों की भरपाई करने और उन्हें सुधारने का हर संभव तरीका ढूँढ़ने की कोशिश करेगा और उन्हें दोबारा न करने का प्रयास करेगा। वह मन ही मन सोचेगा, “मैं दूसरों को संतुष्ट नहीं करना चाहता, लेकिन कम से कम मेरे पास मन की शांति तो होनी ही चाहिए। जब मेरा मन शांत होता है, तभी मैं परमेश्वर की उपस्थिति में उसे जवाब दे सकता हूँ। अगर मेरा मन ही शांत नहीं है तो मैं परमेश्वर का सामना करने का दुस्साहस कैसे कर सकता हूँ?” अगर किसी व्यक्ति के मन में ऐसे विचार आते हैं तो वह पूरी तरह से अपनी मानवता में अंतरात्मा और विवेक के गुणों से संचालित होता है। अगर तुम्हारे मन में ऐसे विचार नहीं आते हैं तो तुम बार-बार वही गलतियाँ करोगे, यही नहीं, तुम किसी की बात सुनना या स्वीकार करना भी नहीं चाहोगे; यह भी हो सकता है कि तुममें कभी पश्चात्ताप का रवैया ही न हो, न ही तुम कभी तथ्यों को स्वीकार करना चाहो या अपनी गलतियाँ मानना चाहो, जिम्मेदारी लेना तो दूर की बात है। कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो हर उस व्यक्ति से नफरत करते हैं जो उनकी गलतियाँ बताता है; वे उससे लड़ते हैं, उसे परेशान करते हैं, यहाँ तक कि उस पर पलटकर हमला भी करते हैं और बदला भी लेते हैं। ऐसे लोगों की कोई मदद नहीं की जा सकती; ये ऐसे लोग हैं जिनमें मानवता के गुण नहीं होते। लेकिन जिन लोगों में मानवता के गुण होते हैं, वे बिल्कुल भी ऐसा व्यवहार नहीं करेंगे। एक या दो बार वही गलती करने के बाद, वे गहराई से विचार करेंगे, “मैं अब भी यह गलती क्यों कर रहा हूँ?” वे इसका समाधान करने के लिए सत्य की खोज कर सकते हैं। क्या तुम कहोगे कि यह पूरी तरह बदलाव लाने का रवैया है? (हाँ।) कुछ गलत करते समय आत्म-चिंतन कर पाना और अपनी गलतियों को सुधारने के लिए तैयार रहना—यह पूरी तरह बदलाव लाने का रवैया है। तो फिर किस तरह के लोगों में पूरी तरह बदलाव लाने का रवैया होता है? क्या यह वह रवैया नहीं है जो सिर्फ उन लोगों में हो सकता है जिनकी मानवता में अंतरात्मा और विवेक के गुण होते हैं? (हाँ।) अगर लोगों में मानवता की अंतरात्मा और विवेक नहीं है, तो क्या वे पूरी तरह बदलाव लाएँगे? (नहीं।) क्या उन्हें पछतावा होगा और वे खुद से नफरत करेंगे? (नहीं।) क्या वे अपने द्वारा किए गलत कामों और अपराधों पर दिल से विचार करेंगे? वे यकीनन ऐसा नहीं करेंगे, है ना? सच कहूँ तो बिना अंतरात्मा वाले लोगों के पास दिल नहीं होता, इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं उसमें अपना दिल नहीं लगाएँगे और न ही जब वे कुछ गलत करेंगे तो उस पर दिल से विचार करेंगे। क्योंकि उनके पास दिल नहीं होता, इसलिए वे आत्म-चिंतन नहीं करेंगे, न ही वे सत्य को स्वीकार करेंगे; उनमें यह क्षमता ही नहीं होती। सिर्फ अंतरात्मा वाले लोग ही, जब दूसरों को यह कहते हुए सुनते हैं कि उन्होंने कुछ गलत किया है, उस मामले को गंभीरता से और पूरे दिल से लेते हैं, मामले पर दिल से विचार करते हैं और फिर अपराध-बोध और पछतावा महसूस करते हैं। सिर्फ अपराध-बोध होने और पछतावा महसूस करने के आधार पर ही वे पूरी तरह बदलाव ला सकते हैं और जब वे बदलाव लाते हैं, सिर्फ तभी उनके पास परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करने और परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास और आचरण करने का अवसर होता है। लेकिन, बिना अंतरात्मा वाले लोग कभी अपराध-बोध या पछतावा महसूस नहीं करते; वे चाहे कोई भी गलत काम करें, वे कभी भी उसे दिल पर नहीं लेते। चाहे दूसरे उनकी समस्याएँ कैसे भी उजागर करें, वे उसे गंभीरता से नहीं लेते और अनसुना कर देते हैं। क्योंकि उनके पास अंतरात्मा नहीं होती, इसलिए वे मामले को गंभीरता से और पूरे दिल से नहीं लेंगे, न ही वे पूरे दिल से उस पर विचार करेंगे और चिंतन करेंगे। आत्म-चिंतन करने में दिल लगाए बिना, उन्हें पछतावा या अपराध-बोध नहीं होगा और पछतावे और अपराध-बोध के बिना वे पूरी तरह बदलाव नहीं ला पाएँगे। ऐसी स्थिति में, इस तरह के इंसान के लिए सत्य को स्वीकार करना और परमेश्वर के वचनों के प्रति समर्पण करना बिल्कुल असंभव है; वे बस ऐसे लोग हैं जिन्हें उद्धार पाने की बिल्कुल भी उम्मीद नहीं है। इसलिए, मानवीय परिप्रेक्ष्य से, ऐसा नहीं है कि परमेश्वर उन लोगों को नहीं बचाता जिनमें मानवता के गुण नहीं होते; बल्कि ऐसा इसलिए है क्योंकि व्यक्ति में मानवता के गुण नहीं हैं—जो उद्धार पाने की बुनियादी शर्त है—जिस कारण वे सत्य को स्वीकार नहीं कर सकते या उसके प्रति समर्पण नहीं कर सकते, जिससे उद्धार पाने की उनकी उम्मीद लगभग शून्य हो जाती है। इसे ध्यान में रखते हुए, मानवता के गुण होने और उद्धार पाने के बीच एक सीधा संबंध है; यह बिल्कुल ऐसा ही है। अगर तुममें मानवता के गुण नहीं हैं तो कुछ गलत करने पर तुम उसे स्वीकार नहीं करोगे, न ही तुम उस पर दिल से विचार करोगे, न सोच-समझकर उससे पेश आओगे, उस पर गंभीरता से चिंतन नहीं करोगे, अपराध-बोध और पछतावा महसूस नहीं करोगे और फिर तुम उसे नहीं सुधारोगे और नहीं बदलोगे। अगर तुम गलती करने जैसी छोटी-सी बात पर भी पूरी तरह बदलाव नहीं ला सकते तो तुम भ्रष्ट स्वभाव दिखाने के मामले में पूरी तरह बदलाव लाने में और भी कम सक्षम होगे। चूँकि भ्रष्ट स्वभाव सीधे परमेश्वर के विरोध में होते हैं, इसलिए अपनी प्रकृति और सार के मामले में भ्रष्ट स्वभाव कोई गलती कर देने की तुलना में कहीं ज़्यादा गंभीर होते हैं। अगर तुम अपने भ्रष्ट स्वभावों को जानने में विफल रहते हो और उनका समाधान करने के लिए सत्य की खोज नहीं करते हो तो तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करना बहुत मुश्किल होगा। क्योंकि भ्रष्ट स्वभाव की जड़ें स्वाभाविक रूप से गहरी होती हैं, अगर तुम सत्य का अनुसरण करने वाले इंसान नहीं हो तो तुम्हारे पास अपने भ्रष्ट स्वभावों का समाधान करने का कोई तरीका नहीं होगा, नतीजतन, तुम्हारे पास अपने जीवन स्वभाव में बदलाव लाने का कोई तरीका नहीं होगा। उस स्थिति में, तुम्हारे लिए उद्धार पाना मुश्किल की बात नहीं होगी—यह असंभव होगा। इसलिए, कोई गलत काम करने या अपराध करने के बाद व्यक्ति का रवैया और प्रतिक्रिया सीधे तौर पर इस बात पर निर्भर करती है कि उसमें मानवता के गुण हैं या नहीं। इसे साफ तौर पर देखना बहुत महत्वपूर्ण है।
अपने आस-पास के लोगों को देखो, तुम समझ सकते हो कि कुछ गलत करने के बाद वे सक्रियता से उसे स्वीकार करते हैं या नहीं, क्या वे पछतावा महसूस करते और परेशान होते हैं और क्या वे कुछ समय बाद खुद को बदल लेते हैं—यानी, क्या वे अपने विचारों, रवैये और व्यवहारों के मामले में कोई पूरी तरह बदलाव लाते हैं। अगर वे खुद को पूरी तरह नहीं बदलते हैं तो सौ प्रतिशत वे इंसान नहीं हैं। परमेश्वर के वचनों को खाने और पीने से, पवित्र आत्मा की प्रबुद्धता से, अपने परिवेश के प्रभाव से या भाई-बहनों की मदद से—इससे फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति किसी तरीके से खुद को पूरी तरह बदलता है—अगर उसके दिल में सत्य को स्वीकार करने का ईमानदार रवैया होता है, वह खुद को सही ठहराने का काम कम से कम करता है—यहाँ तक कि पूरी तरह से ऐसा करना छोड़ देता है—और उसकी कथनी और करनी को देखा जाए तो वह अपनी पिछली गलती के लिए पछतावा महसूस करता है और परेशान होता है और उसकी भरपाई करने का अवसर ढूँढ़ना चाहता है तो इस इंसान को उद्धार पाने की उम्मीद है; यह ऐसा इंसान है जिसमें मानवता के गुण हैं। लेकिन कुछ लोग गलती करने के बाद उसे दिल पर नहीं लेते। वे कभी अपनी गलती के बारे में बात नहीं करते, न ही अपनी गलती मानते हैं, न खुद का गहन-विश्लेषण करते हैं, न परेशान महसूस करते हैं। ऐसा लगता है कि उनका खुद को पूरी तरह बदलने का कोई इरादा नहीं है; वे सुन्न और मंदबुद्धि हैं, वे पूरा दिन खुशी-खुशी बिताते हैं और उन्हें बिल्कुल भी नहीं लगता कि उन्होंने कोई गलती की है। यहाँ तक कि अगर वे अपनी गलती मान भी लेते हैं तो बस बात को हल्के में टाल देते हैं और उसे वहीं छोड़ देते हैं। ठीक बेशर्म बदमाशों की तरह, वे एक पल अपनी गलती मानते हैं और अगले ही पल गलती कर बैठते हैं और गलती करते ही उसे स्वीकार करते रहते हैं। ऐसा लगता है जैसे वे मज़ाक या खिलवाड़ कर रहे हों; वे मामले को गंभीरता से नहीं लेते। वे इसे बच्चों का खेल, एक प्रक्रिया और एक औपचारिकता समझते हैं, बजाय इसके कि जो हुआ उसे स्वीकार करें और अपने दिल की गहराई से खुद को बदलें। यह कैसा इंसान है? यह कोई इंसान नहीं है। वह नहीं जानता कि कैसे आचरण करना है, न ही यह जानता है कि स्व-आचरण के लिए किस तरह का मार्ग चुनना है। वह इन बातों को नहीं समझता; वह इन्हें बहुत सरल और सतही बातों के तौर पर देखता है। कुछ गलत करने के बाद, भले ही वह उस समय कुछ न कहे, वह हमेशा खुद को सही ठहराने और बाद में अपना नाम बेदाग करने के तरीके सोचता है। सभाओं से मिलने वाले अवसर या सभी लोगों द्वारा मामलों को उठाने के समय का उपयोग करके वह हमेशा सबको बताना और समझाना चाहता है कि उसे अपने बचाव में क्या कहना है—वह उस समय क्या सोच रहा था और कैसे काम कर रहा था, उसके इरादे अच्छे थे, उसके लक्ष्य सही थे और उसने कुछ भी गलत नहीं किया। उसे न सिर्फ अपनी गलतियों और अपराधों के लिए कोई पछतावा महसूस नहीं होता, बल्कि वह उन्हें स्वीकार करना भी नहीं चाहता है, यहाँ तक कि वह जिम्मेदारी से बचना और छूट पाना चाहता है, ताकि सबकी नजरों में अपनी छवि बचा सके। भले ही ऐसे लोग जब बोलते हैं तो अच्छे लगते हैं, लेकिन सभी क्षेत्रों में उनकी अभिव्यक्तियों से आकलन किया जाए तो वे इस तथ्य को नहीं मानते या स्वीकार नहीं करते हैं कि उन्होंने गलती की है। तो क्या तुम कहोगे कि वे खुद को पूरी तरह बदल लेंगे? वे नहीं बदलेंगे। वे समय-समय पर इस मामले को उठाते हैं, यहाँ तक कि उन्हें उन सभी को भी बताना पड़ता है जिन्हें इसके बारे में पता नहीं है। इसे बताने के बाद, वे दूसरे काम करते समय अच्छा प्रदर्शन करने के हर संभव तरीके के बारे में सोचते हैं ताकि पिछले मामले में खराब हुई अपनी छवि को ठीक किया जा सके और लोगों का दिल जीता जा सके। एक बार जब वे कुछ समय तक अच्छा व्यवहार कर लेते हैं और सब लोग भूल जाते हैं कि उन्होंने पहले क्या किया था तो वे एक बार फिर खुद की बड़ाई करने और खुद की गवाही देने के बारे में सोचने लगते हैं। वे लगातार हिसाब लगाते रहते हैं कि उन्होंने परमेश्वर के घर में कितने योगदान दिए हैं, उन्होंने परमेश्वर के घर के लिए कितने अच्छे काम किए हैं और उन्होंने परमेश्वर के घर को कितने नुकसानों से बचाया है। उनका खुद को पूरी तरह बदलने का कोई इरादा होता ही नहीं है; उनमें शर्म की कोई भावना नहीं होती। जिन लोगों में शर्म की भावना नहीं होती है, जब वे गलतियाँ और अपराध करते हैं तो वे न सिर्फ खुद को पूरी तरह नहीं बदलते, बल्कि बदतर हो जाते हैं। वे मन ही मन सोचते हैं : “किसने गलतियाँ नहीं की हैं? मैंने जो गलती पहले की थी, वह असल में कुछ भी नहीं थी। और वैसे भी मैं अकेला इसमें शामिल नहीं था। लेकिन मैं ऐसा नहीं कह सकता। मुझे सबको दिखाना होगा कि मेरा प्रदर्शन स्वीकार्य है और मुझमें पश्चात्ताप करने का रवैया है, फिर मैं सबका ध्यान खींचने और उन्हें जीतने के लिए कुछ अच्छी चीज़ें करूँगा—क्या इससे काम नहीं चलेगा?” अपने दिलों में, वे यह नहीं मानते कि परमेश्वर हर चीज़ की पड़ताल करता है। वे ये चीज़ें दूसरों के सामने करना चाहते हैं; उन्हें लगता है कि परमेश्वर यह नहीं देख सकता कि वे अपने दिल में क्या सोच रहे हैं—उनके लिए, परमेश्वर का लोगों के दिलों के अंतरतम की पड़ताल करना बस एक धर्म-सिद्धांत है। वे नहीं जानते कि परमेश्वर पड़ताल कर रहा है और वे यह नहीं स्वीकार करते या नहीं मानते कि परमेश्वर लोगों के दिलों के अंतरतम की पड़ताल कर सकता है, इसलिए वे जो कुछ भी करते हैं वह दूसरों को दिखाने के लिए होता है। अंदर ही अंदर, वे अड़ियल और प्रतिरोधी होते हैं। वे सत्य का प्रतिरोध करते हैं, तथ्यों को स्वीकार करने का प्रतिरोध करते हैं, अपनी गलतियाँ मानने का प्रतिरोध करते हैं और खुद को पूरी तरह बदलने का और भी ज़्यादा प्रतिरोध करते हैं। वे खुद को पूरी तरह नहीं बदलते—क्या यह किसी समस्या का संकेत नहीं है? चाहे वे कितनी भी बड़ी गलतियाँ करें या कितने भी बड़े अपराध करें, वे खुद को पूरी तरह नहीं बदलते। वे ठीक पौलुस की तरह हैं, जिसने परमेश्वर का विरोध किया और जिस पर परमेश्वर ने सीधे प्रहार किया, फिर भी उसने सोचा कि वह बहुत अच्छा है। इस प्रकार का व्यक्ति सोचता है : “यदि मैं इधर-उधर भागता हूँ और खुद को खपाता हूँ, बहुत-से लोगों को प्राप्त करता हूँ और सुसमाचार का प्रचार करने में बहुत सारे नतीजे देता हूँ, अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए योगदान देता हूँ तो परमेश्वर को मुझे एक मुकुट देना चाहिए। मुकुट मेरे जैसे लोगों के लिए ही है। अगर मुझे मुकुट नहीं मिलेगा तो किसे मिलेगा? गलती करने में क्या बड़ी बात है? जब तक परमेश्वर का विरोध करने के बाद, मैं इसे सुधारने के लिए तैयार हूँ, तब तक सब ठीक है। अगर मैं बस भविष्य में सुसमाचार का और अधिक प्रचार करता हूँ तो परमेश्वर मेरे अपराधों को याद नहीं रखेगा।” तुमने देखा, परमेश्वर के प्रति उसका रवैया क्या है? सत्य के प्रति उसका रवैया क्या है? यह एक ऐसा रवैया है जिसमें मानवता नहीं है; यह एक दानव का रवैया है। वे कभी भी परमेश्वर के वचनों, सत्य या जीवन के सही मार्ग को ऐसी चीज़ों के रूप में नहीं देखते जिन्हें उन्हें चुनना चाहिए और जिनका अनुसरण करना चाहिए। उनका कभी भी खुद को पूरी तरह बदलने का कोई इरादा नहीं रहा और वे बिल्कुल भी अपना सिर झुकाकर अपने पापों को कबूल नहीं करेंगे, न ही वे कभी अपनी गलतियों को स्वीकार करेंगे और हार मानेंगे। “नाकामी” और “गलती” शब्द उनके शब्दकोष में नहीं हैं, “अपराध” शब्द की तो बात ही छोड़ दो; इसलिए इस तरह का व्यक्ति पश्चात्ताप नहीं करेगा। तो क्या तुम कहोगे कि इस तरह के व्यक्ति में अंतरात्मा और विवेक है? क्या उसकी मानवता में नेकी, दयालुता और शर्मिंदगी के भाव जैसे गुण हैं? (नहीं।) उसमें ये गुण बिल्कुल नहीं हैं। चाहे उसने कितना भी बड़ा अपराध किया हो, भले ही तथ्य उसकी आँखों के सामने हों, उसके दिल में कोई अपराध-बोध नहीं होता है। यह डरावना है! यदि तुम वो हो जिसमें अंतरात्मा है तो जब तुम कुछ गलत करोगे और कोई अपराध करोगे, तुम्हें निश्चित रूप से अपराध-बोध होगा। अगर तुम सच में कोई बड़ी गलती करते हो और परमेश्वर के घर को नुकसान पहुँचाते हो तो तुम्हें इतना दुख होगा कि तुम चाहोगे कि तुम मर ही जाओ, तुम खुद को कोसोगे और तुम्हें लगेगा कि तुम परमेश्वर के सामने जीने के लायक नहीं हो; लेकिन पौलुस जैसे लोगों में इस तरह का पछतावा नहीं होता। परमेश्वर के घर में, हम अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग एक झूठ बोलने या सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला एक भी काम करने के बाद अपने दिल में लगातार धिक्कार महसूस करते हैं और जब वे दूसरों के सामने अपनी गलती मान लेते हैं, तभी उन्हें लगता है कि उनके ऊपर से एक भारी बोझ उतर गया है। ऐसे बहुत-से लोग हैं। चाहे वे कोई भी गलती करें, वे आत्म-चिंतन कर सकते हैं और साथ ही, वे इसे एक चेतावनी के तौर पर ले सकते हैं और खुद को धिक्कार सकते हैं कि वे दोबारा वही गलती न करें। अगर कोई इंसान अपने आत्म-सम्मान की परवाह करता है, उसमें शर्म की भावना है और इसके अलावा उसके पास विवेक है तो जब वह कुछ गलत करता है, उसे खुद को सही ठहराने या जिम्मेदारी से बचने और दूसरों पर दोष मढ़ने में बहुत शर्म महसूस होती है। इसके बजाय, वह जिम्मेदारी लेने को तैयार रहता है, समय-समय पर दोषी और परेशान महसूस करता है और फिर वह खुद को पूरी तरह बदल लेता है। कुछ लोग जब कुछ गलत करते हैं और अपराध करते हैं तो उन्हें लगता है कि उनकी इज्ज़त चली गई, परमेश्वर और भाई-बहनों का सामना करने में बहुत शर्म महसूस करते हैं, जबकि जिन लोगों में मानवता के गुण नहीं होते, उनमें ऐसी भावनाएँ नहीं होती हैं। तुमने देखा, भले ही दोनों तरह के लोग इंसान हैं, कुछ लोगों के लिए, अगर उनकी पीठ पीछे यह अफवाह फैलाई जाती है कि उनका किसी के साथ अनौपचारिक रूमानी संबंध है—और यह कुछ ऐसा हो सकता है जो उन्होंने बस थोड़ी देर के लिए अपने दिमाग में सोचा हो—एक बार जब वे कुछ लोगों को इसके बारे में बात करते हुए सुनते हैं तो उन्हें लगता है उनकी पूरी इज्ज़त मिट्टी में मिल गई है और किसी का सामना करने में बहुत शर्मिंदा महसूस करते हैं। शर्म की भावना रखने वाले लोगों में ऐसी अभिव्यक्तियाँ होंगी। फिर भी कुछ लोग किसी के साथ बिस्तर में पकड़े जाने पर भी परवाह नहीं करते हैं : “मैंने क्या गलत किया है? क्या मैं बस मज़े नहीं कर रहा था? इसमें क्या बड़ी बात है? क्या यह आजकल आम बात नहीं है?” तुमने देखा, यह साफ तौर पर अलग है, है ना? अगर मानवता के गुणों वाले लोग दूसरों को सिर्फ उनके बारे में चर्चा करते हुए सुनते हैं तो उन्हें इतनी शर्म आती है और इतना दुख होता है कि वे खाना भी नहीं खा पाते, अपना चेहरा दिखाने में भी शर्म महसूस करते हैं और उन्हें लगता है कि वे अब जी नहीं सकते, जबकि कुछ लोगों को तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता जब वे किसी दूसरे इंसान के साथ बिस्तर में पकड़े जाते हैं। लोग बस एक-दूसरे से अलग होते हैं; अगर किसी इंसान में शर्म की कोई भावना नहीं है तो वह इंसान नहीं है। क्या बिना शर्म की भावना वाले लोग सत्य प्राप्त कर सकते हैं? बिना अंतरात्मा और विवेक वाले लोग सत्य से प्रेम नहीं करते। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे पाप, दुष्ट चीज़ों या नकारात्मक चीज़ों से नफरत नहीं करते। इसके अलावा, जब वे कुछ गलत करते हैं तो उन्हें कोई शर्म की भावना महसूस नहीं होती है और वे बेशर्मी से जिम्मेदारी से बचने की कोशिश करते हैं। नतीजतन, इस तरह का इंसान कभी भी सक्रियता से परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने, अपनी भ्रष्टता को स्वीकार करने या अपनी इच्छा से सत्य के प्रति समर्पण करने के लिए परमेश्वर के सामने नहीं आएगा; उसे ऐसी कोई ज़रूरत नहीं है, उसे लगता है कि यह अनावश्यक है और उसे इसकी ज़रूरत नहीं है। लेकिन, जिन लोगों में सचमुच अंतरात्मा और विवेक होता है, क्योंकि सभी पहलुओं में उनके स्व-आचरण के लिए उनके सिद्धांत और सीमाएँ उन्हें यह महसूस कराती हैं कि परमेश्वर के वचन और लोगों से परमेश्वर की अपेक्षाएँ ही वो चीज़ें है जिनकी उन्हें ज़रूरत है, वे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करने को तैयार रहते हैं; अगर वे ऐसा नहीं करते हैं तो उन्हें अंदर से असहज लगता है। अगर वे परमेश्वर की अपेक्षाओं के बारे में सुनते और समझते हैं, लेकिन उनके अनुसार काम नहीं करते हैं, एक ओर तो उन्हें लगता है कि भाई-बहनों की नज़र उन पर है और दूसरी ज़्यादा महत्वपूर्ण बात यह है कि उन्हें लगता है कि परमेश्वर उन्हें गुप्त रूप से देख रहा है और वे चाहे कहीं भी जाएँ, उसकी जाँच-पड़ताल से बच नहीं सकते। वे सोचते हैं, “तुम जो भी कहते हो परमेश्वर उसे जानता है। अगर तुम कुछ गलत करते हो लेकिन उसे स्वीकार नहीं करते, पछतावा महसूस नहीं करते, उसे दिल पर नहीं लेते, उसे ठीक नहीं करते, और खुद को पूरी तरह बिल्कुल नहीं बदलते हो तो परमेश्वर इसे कैसे देखेगा?” यह सवाल—“परमेश्वर इसे कैसे देखेगा?”—एक ओर, परमेश्वर में उनके विश्वास और उन्हें स्वीकार करने से आता है, और दूसरी ओर, यह मुख्य रूप से उनकी अंतरात्मा और विवेक के प्रकार्य से आता है। तो कुल मिलाकर, इंसान की अंतरात्मा और विवेक उसकी मानवता की ज़रूरतें, उसके द्वारा चुने गए मार्ग और उससे भी बढ़कर, सभी तरह की चीज़ों के प्रति उसके सिद्धांत और रवैये तय करते हैं। बेशक वे यह भी तय करते हैं कि कोई इंसान सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चल सकता है या नहीं और इससे भी अधिक हद तक वे यह तय करते हैं कि कोई इंसान आखिर में उद्धार प्राप्त कर सकता है या नहीं।
आज की संगति की विषयवस्तु जीवन की उन विभिन्न छोटी-छोटी बातों के बारे में थी जिनमें मानवता शामिल होती है, इसमें इन बातों पर चर्चा की गई कि क्या कोई इंसान अपने आचरण में और चीज़ों के साथ निपटने के मामले में दूसरों का फायदा उठाना पसंद करता है, क्या कोई इंसान गर्मजोशी वाला है और दूसरों की मदद करने और सहानुभूति रखने के लिए इच्छुक रहता है, क्या वह देने को तैयार रहता है और दूसरों के साथ पेश आने को लेकर उसके सिद्धांत क्या हैं और जब कोई इंसान कुछ गलत करता है तो उसका रवैया और दृष्टिकोण क्या होता है। भले ही ये चीज़ें जीवन की छोटी-छोटी बातें हैं, लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में मानवता की कुछ बहुत ही मामूली अभिव्यक्तियाँ हैं, पर्दे के पीछे वे जो भी विचार करते हैं वे सभी इंसान की मानवता के गुण हैं। अंतरात्मा और विवेक से संचालित, मानवता के गुणों वाले लोग बुनियादी नैतिक सीमाओं का पालन करेंगे, जबकि मानवता के गुणों से रहित लोग यह समझते ही नहीं कि मानवता की सीमा और स्व-आचरण के सिद्धांत क्या हैं। तो किसी इंसान में अंतरात्मा और विवेक है या नहीं, यह तय करता है कि वह किस रास्ते पर चलेगा। यह भी कहा जा सकता है कि यह किसी इंसान का भविष्य और मंज़िल तय करता है—यह ऐसा ही है। ठीक है, चलो आज के लिए हमारी संगति यहीं समाप्त करते हैं। फिर मिलेंगे!
18 मई 2024