सत्य का अनुसरण कैसे करें (27)
“सत्य का अनुसरण कैसे करें” में “त्याग देना” विषय के संबंध में हमने “अपने और परमेश्वर के बीच की बाधाओं और परमेश्वर के प्रति अपनी शत्रुता को त्याग देना” विषय के अंतर्गत धारणाओं और कल्पनाओं से जुड़ी विषयवस्तु तक संगति की थी। पिछली कुछ बार हमने “देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं को त्याग देना” पर संगति की थी। आज हम इसी पर संगति जारी रखेंगे। देहधारी परमेश्वर के बारे में धारणाओं और कल्पनाओं के संबंध में हमने देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता से जुड़े कुछ विषयों पर संगति की थी, है ना? तो पिछली बार हमने किस पर संगति की थी? हमने देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता को जीने और उसके प्रकाशनों से जुड़ी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों पर और साथ ही देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के भीतर स्व-आचरण और कार्य करने के कुछ सिद्धांतों पर संगति की थी और फिर हमने इस पर संगति की थी कि देहधारी परमेश्वर अपनी मानवता के संदर्भ में कौन-सी चीजें नहीं करता। इन पहलुओं पर संगति करने से लोगों को परमेश्वर के देहधारी शरीर के स्वभाव सार और उसके स्व-आचरण और कार्य करने के सिद्धांतों को और साथ ही उसकी कुछ विशिष्ट अभिव्यक्तियों और प्रकाशनों को बेहतर ढंग से समझने में मदद मिलती है। जब हम देहधारी परमेश्वर की इन अभिव्यक्तियों के बारे में संगति करते हैं—चाहे वह तथ्यों व उदाहरणों के रूप में हो या कार्य करने के विशिष्ट सिद्धांतों के रूप में—तब उनमें जीवन के सभी प्रकार के छोटे-मोटे मामले शामिल होते हैं। उनमें लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं में मौजूद कोई महान, अग्रणी कारनामे या प्रशंसा के योग्य नेक कार्य शामिल नहीं लगते; देहधारी परमेश्वर की अभिव्यक्तियाँ बहुत ही आम और बहुत ही साधारण होती हैं। ठीक इसलिए कि देहधारी परमेश्वर इस साधारण, भ्रष्ट मानवजाति के बीच रहता है, उसकी ये सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ एक लिहाज से परमेश्वर के देहधारी शरीर की मानवता की अपरिहार्य अभिव्यक्तियाँ हैं और दूसरे लिहाज से मानवजाति के बीच रहने वाले देहधारी परमेश्वर की एक सामान्य आवश्यकता हैं। बेशक, ये सामान्य और व्यावहारिक अभिव्यक्तियाँ लोगों को परमेश्वर को जानने के संबंध में कुछ जानकारी या मार्ग भी प्रदान करती हैं। लोगों के बीच देहधारी परमेश्वर के व्यावहारिक जीवन यापन और स्व-आचरण के व्यावहारिक सिद्धांतों के माध्यम से, ये लोगों को परमेश्वर की व्यावहारिकता और सामान्यता को जानने में और स्वर्गिक परमेश्वर को भी जानने में समर्थ बनाते हैं, जिससे वे स्वर्गिक परमेश्वर को अधिक सटीकता से समझ पाते हैं और पृथ्वी पर एक सामान्य, साधारण व्यक्ति के रूप में उसके सार को सटीकता से समझ पाते हैं।
कुछ लोग कहते हैं, “देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता से जुड़ी जिन चीजों और उदाहरणों के बारे में तुम बात करते हो, वे सभी बहुत साधारण हैं; वे सभी दैनिक जीवन की बहुत ही नगण्य और मामूली चीजें हैं। क्या तुम कुछ ऐसे तथ्यों के बारे में बात कर सकते हो, जो रहस्यमय और अथाह महसूस होते हों या जो बहुत भव्य लगते हों?” इस पर मैं कहता हूँ, अब तक वास्तव में ऐसे कोई तथ्य नहीं हैं। देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता की वास्तविकता में और एक विशिष्ट जीवन परिवेश में रहता है और स्वयं परमेश्वर का कार्य करने के अलावा वह अपना बाकी समय अपनी सामान्य मानवता के जीवन के दायरे में भाई-बहनों के साथ मिलने-जुलने या कलीसिया में कुछ छोटी-मोटी समस्याएँ सँभालने में बिताता है। इसलिए, उन उदाहरणों के अलावा जिन पर हमने संगति की थी, जो उसके आचरण और कार्य करने के सिद्धांत और मत से जुड़े हैं, वह कोई ऐसा महान, अग्रणी कारनामा या असाधारण कार्य नहीं करता जिसकी तुम लोग कल्पना करते हो। यह लोगों के लिए अप्रत्याशित हो सकता है और शायद यह लोगों की धारणाओं और कल्पनाओं के अनुरूप न हो, लेकिन वास्तव में चीजें ऐसी ही हैं। देहधारी परमेश्वर के विषय पर हमारी संगति मुख्य रूप से देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में उसकी कुछ अभिव्यक्तियों, जीवन-यापन, और स्व-आचरण और कार्य करने के विशिष्ट सिद्धांतों से संबंधित रही है। यह दुनिया में महान हस्तियों और प्रसिद्ध लोगों के कर्मों का वर्णन करने के तरीके से अलग है। जब दुनिया में लोग किसी महान, प्रसिद्ध या असाधारण हस्ती के बारे में बात करते हैं, तब वे हमेशा इस बारे में बात करते हैं कि वह कितना अद्वितीय, असाधारण और महान है, और वे उसके करिश्मे के बारे में बात करते हैं, मुख्य रूप से इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि वे कितने उच्च और भव्य हैं। लेकिन देहधारी परमेश्वर के बारे में हम जो बात करते हैं, वह उसके बिल्कुल विपरीत होता है जो दुनिया उन असाधारण हस्तियों और महान लोगों के बारे में कहती है। हम मुख्य रूप से इस बारे में बात करते हैं कि देहधारी परमेश्वर कैसे सामान्य, व्यावहारिक, साधारण है, और असाधारण नहीं है। हम केवल ठोस उदाहरणों के बारे में बात करते हैं—वह भी दैनिक जीवन के छोटे-मोटे उदाहरणों के बारे में—इस बारे में बात करते हैं कि उसके आचरण और कार्य करने में शामिल सिद्धांत और दृष्टिकोण क्या हैं। आचरण और कार्य करने के ये विचार और दृष्टिकोण, सिद्धांत और तरीके सब सामान्य मानवता के जमीर और विवेक पर आधारित हैं। हम मुख्य रूप से इस बारे में बात करते हैं कि वह कैसे आचरण करता है और कैसे कार्य करता है। हालाँकि, दुनिया में बहुत कम लोग इस बारे में बात करते हैं कि आचरण कैसे किया जाए। अगर कुछ लोगों ने इस विषय पर बात की भी है तो वे कई विशिष्ट उदाहरण नहीं दे पाए हैं, आचरण के कोई सिद्धांत व्यक्त कर पाना तो दूर की बात है। वे इस बारे में बात नहीं करते कि प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों के पास आचरण और कार्य करने में कौन-से सकारात्मक सिद्धांत, सकारात्मक तरीके या सही विचार और दृष्टिकोण हैं। वे केवल उनकी उपलब्धियों, उनकी प्रतिभा और ज्ञान और उनके जोश के बारे में बात करते हैं और वे इस बारे में भी बात करते हैं कि इन चीजों के कारण वे मानवजाति के बीच किस तरह का प्रमुख स्थान रखते हैं। वे जिस बारे में बात करते हैं, वह देहधारी परमेश्वर द्वारा धारण और वहन की गई उस सामान्य मानवता के बिल्कुल विपरीत है, जिस पर हम आज संगति कर रहे हैं। परमेश्वर का देहधारी शरीर तुम लोगों को जो जानने और समझने देता है, वे आचरण और कार्य करने के वे सिद्धांत और मत हैं जो उसकी सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर जिए जाते हैं और जो उसमें मौजूद हैं। आचरण और कार्य करने के ये सिद्धांत और मत उस मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं के पूरी तरह अनुरूप हैं, जिसे वह बचाना चाहता है। परमेश्वर का देहधारी शरीर इस सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर ऐसी मानवता रखता है और—आचरण और कार्य करने के अपने सिद्धांतों और मतों के साथ—वह विभिन्न विचार और दृष्टिकोण भी रखता है। चूँकि वह स्वयं परमेश्वर का कार्य करने में परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है और वह कार्य और सेवकाई पूरी कर सकता है जिसे देहधारी परमेश्वर को इस युग में, ऐसी मानवता के भीतर अच्छी तरह से करना चाहिए, केवल इसी कारण से वह मानवजाति को उस प्रतिनिधि स्वभाव से पूरी तरह अवगत करा सकता है जिसे परमेश्वर इस युग में व्यक्त करना चाहता है, और—बेशक—सत्य व्यक्त करने के उस कार्य के लिए पूरी तरह से सक्षम हो सकता है जिसे परमेश्वर कार्य के इस चरण में करना चाहता है। यदि परमेश्वर के देहधारी शरीर द्वारा जिया गया, प्रकट किया गया और उसमें मौजूद मानवता सार यह सामान्यता, व्यावहारिकता और साधारणता न होता जिस पर हम संगति करते रहे हैं या यदि उसके पास आचरण के ये सिद्धांत और मत न होते जिन पर हम संगति करते रहे हैं, बल्कि इसके बजाय उसके पास उन प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों का मानवता सार होता जिनके बारे में गैर-विश्वासी बात करते हैं और जिनका वे आदर करते हैं, तो इसका क्या परिणाम होता? (वह परमेश्वर का भय मानने और बुराई से दूर रहने के मार्ग पर चलने के लिए हमारी अगुआई न कर पाता।) इसके परिणामस्वरूप एक बिल्कुल अलग स्थिति उत्पन्न हो जाती। मान लो परमेश्वर के देहधारी शरीर में किसी गैर-विश्वासी महान हस्ती या प्रसिद्ध व्यक्ति का मानवता सार होता—एक ऐसे व्यक्ति का, जो बहुत ऊँचा, असाधारण, अद्वितीय, रहस्यमय और अथाह है। ऐसे व्यक्ति के पास आचरण और कार्य करने की कोई सीमा नहीं होती, वह लगातार झूठ बोलता है और नियमों का पालन करने वाले या शिष्ट तरीके से आचरण या कार्य नहीं करता और अपना स्थान नहीं जानता या कर्तव्यनिष्ठा से कार्य नहीं करता और उसके अनुसरण, विचार और दृष्टिकोण अविश्वासियों के समान ही होते हैं—बस उच्च और भव्य चीजों का अनुसरण करना और खूबियों, ज्ञान और अलौकिक क्षमताओं पर ध्यान केंद्रित करता है। ऐसा व्यक्ति तुम लोगों को किस तरह के मार्ग पर ले जाएगा? (वह हमें उद्धार के मार्ग पर नहीं ले जा पाएगा। इसके विपरीत, जो लोग उसका अनुसरण करेंगे, वे केवल अधिकाधिक भ्रष्ट और दुष्ट होते जाएँगे।) ऐसे व्यक्ति में स्व-आचरण के सकारात्मक सिद्धांत नहीं होते; उसके स्व-आचरण के तरीके और सिद्धांत सकारात्मक नहीं, बल्कि शैतानी होते हैं। इस प्रकार, शैतान के इस व्यक्ति के स्व-आचरण के सिद्धांत और मत उसके मानवता सार का अत्यधिक प्रतिनिधित्व करते हैं। ऐसे मानवता सार वाले व्यक्ति के अनुसरण क्या होते हैं और उसके द्वारा चला गया मार्ग क्या है? वे बिल्कुल शैतान के समान होते हैं। उसके अनुसरण और वह जिस मार्ग पर चलता है, वे सभी शैतान से आते हैं और शैतान के अनुरूप हैं। तो क्या उसके पीछे चलने वाले लोग उसकी अगुआई का पालन नहीं करेंगे, उनके उस जैसे ही अनुसरण नहीं होंगे और वे उसी मार्ग पर नहीं चलेंगे? (हाँ।) वे लोग उसकी अगुआई का अनुसरण करेंगे, उसके स्व-आचरण के सिद्धांतों की नकल करेंगे और उसकी तरह अनुसरण करेंगे, ज्ञान, रुतबे, अलौकिकता और उच्च और भव्य चीजों का, हर उस चीज का अनुसरण करेंगे जो असाधारण है और हर उस चीज का जो लोगों को रहस्यमय और अथाह लगती है। ऐसे व्यक्ति का अनुसरण करके कोई भी उद्धार प्राप्त नहीं कर सकता; इसके बजाय, वे अधिकाधिक पतित होते जाएँगे। ऐसे समूह को कलीसिया नहीं कहा जा सकता, मुख्य रूप से इसलिए क्योंकि वे सभी परमेश्वर के कार्य से अलग हो चुके होंगे और उनमें पवित्र आत्मा का कार्य नहीं होगा। जिस अगुआ का वे अनुसरण करते हैं, वह परमेश्वर द्वारा स्थापित नहीं होगा, परमेश्वर द्वारा भेजा गया तो बिल्कुल भी नहीं होगा। भले ही वे सभी खुद को कलीसिया कहें, इसका कोई फायदा नहीं होगा; परमेश्वर उन्हें अनदेखा कर देगा। चाहे वे सभी खुद को कितना भी कलीसिया कहें, परमेश्वर उन्हें स्वीकार नहीं करेगा और पवित्र आत्मा उन पर कार्य नहीं करेगा। वह अगुआ लोगों को वही करना सिखाएगा जो उसे पसंद है; वह लोगों को वही प्रदान करेगा जो उसके भीतर मौजूद है, और लोग उससे वही प्राप्त करेंगे। उसके पास सत्य नहीं होता और वह लोगों को कोई सकारात्मक चीजें प्रदान नहीं कर सकता या उन्हें सही दिशा में मार्गदर्शन नहीं दे सकता, इसलिए लोगों के लिए उससे सत्य प्राप्त करना असंभव होगा। अधिक से अधिक, लोग केवल थोड़ा-सा ज्ञान प्राप्त कर पाएँगे और गैर-विश्वासियों की दुनिया से कुछ पेशेवर कौशल या किसी विशेष क्षेत्र में कुछ क्षमताएँ ही उससे सीख पाएँगे। संक्षेप में, ऐसा कोई व्यक्ति, जिसमें सामान्यता और व्यावहारिकता नहीं है या दिव्य सार जिसका जीवन नहीं है, उसे देहधारी परमेश्वर नहीं कहा जा सकता; वह लोगों को परमेश्वर के सामने नहीं ला सकता, न ही वह लोगों को उद्धार के मार्ग पर ले जा सकता है। इन तथ्यों को देखते हुए, मानवजाति के बीच, क्या परमेश्वर के देहधारी शरीर के अलावा कोई ऐसा है, जो परमेश्वर का कार्य करने के लिए उसका प्रतिनिधित्व कर सके? (नहीं।) क्या कोई ऐसा है, जो मानवजाति को उसके भ्रष्ट स्वभावों से बचाने के लिए परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सके? (नहीं।) साधारण मानवजाति के किसी भी सदस्य में जो जीवन और मानवता सार है, वह लगभग एकसमान ही है—ऐसे जीवन और मानवता सार को शैतान द्वारा पूरी तरह भ्रष्ट कर दिया गया है; लोगों के लिए उनके भ्रष्ट स्वभाव उनका जीवन हैं। इस प्रकार, चाहे लोगों की मानवता के परिप्रेक्ष्य से देखा जाए या लोगों के जीवन सार के परिप्रेक्ष्य से, पूरी मानवजाति में से एक भी व्यक्ति देहधारी परमेश्वर के इस कार्य के लिए सक्षम नहीं है, न ही भ्रष्ट मानवजाति को भ्रष्टता से बचाने के लिए कोई भ्रष्ट मनुष्य परमेश्वर का प्रतिनिधित्व कर सकता है। स्वाभाविक रूप से, ये तथ्य लोगों को यह भी बताते हैं : कोई भी भ्रष्ट मनुष्य मानवजाति को यह नहीं बता सकता कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, और कोई भी भ्रष्ट मनुष्य लोगों को यह नहीं बता सकता कि सत्य क्या है या परमेश्वर के इरादे वास्तव में क्या हैं। भ्रष्ट मनुष्य अन्य लोगों को जो प्रदान करते हैं वह केवल ज्ञान है, साथ ही भ्रष्ट मानवजाति द्वारा अनुसरण किए जाने वाले विभिन्न कौशल, क्षमताएँ या खूबियाँ, और स्व-आचरण और कार्य करने के विभिन्न हथकंडे, सांसारिक आचरण के फलसफे और शैतान से आने वाले विभिन्न विचार और दृष्टिकोण हैं। सभी जातियों के मनुष्यों में एक समान विशेषता होती है। यह समान विशेषता क्या है? वे सभी अपने बीच की अपेक्षाकृत सकारात्मक या अपेक्षाकृत नेकनीयत, रूढ़िवादी और पारंपरिक चीजों को सकारात्मक चीजें मानते हैं और सत्य तथा परमेश्वर के इरादों को उनसे बदलने का प्रयास करते हैं। लोग मानते हैं कि इन चीजों को पकड़े रहने से उन्होंने सच्चा मार्ग प्राप्त कर लिया है और वे उद्धार प्राप्त कर सकते हैं। वास्तव में, इन चीजों का मानवजाति के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है। देखो, मानवजाति के बीच, लोग चाहे कितने भी चतुर हों, उनकी खूबियाँ चाहे कितनी भी महान हों या वे कितने भी प्रतिभाशाली और ज्ञानी हों या बाहर से उनकी मानवता कितनी भी दयालु और परोपकारी लगे, एक भी व्यक्ति सत्य नहीं समझ सकता और एक भी व्यक्ति यह भेद नहीं पहचान सकता कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं। परमेश्वर द्वारा अपना कार्य करने से पहले और परमेश्वर द्वारा अपने वचन व्यक्त करने से पहले लगभग हर कोई परंपरागत संस्कृति को एक सकारात्मक चीज मानता था और कुछ लोग तो परंपरागत संस्कृति को सत्य के रूप में पूजते भी थे। इसलिए, चाहे तुम इसे कैसे भी देखो, यदि देहधारी परमेश्वर सामान्य मानवता के भीतर इन सत्यों को व्यक्त न कर रहा होता और यह कार्य न कर रहा होता, बल्कि इसके बजाय मानवजाति का कोई सदस्य यह कार्य कर रहा होता, तो वह केवल लोगों को एक ऐसे मार्ग पर ले जाता जो परमेश्वर के वचनों और इरादों से भटक जाता है।
आओ, एक सरल उदाहरण देखें। यदि लोगों से किसी नृत्य कार्यक्रम के लिए पोशाकें चुनने के लिए कहा जाए, तो वे कैसे चुनेंगे? सिद्धांत रूप में, हर कोई जानता है कि जब परमेश्वर में विश्वास करने वाले कोई नृत्य कार्यक्रम प्रस्तुत करते हैं, विशेष रूप से ऐसे वीडियो के लिए जिसे ऑनलाइन प्रकाशित किया जाएगा, तब उनके द्वारा पहने जाने वाले कपड़े और उनका व्यवहार परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए, चुनी गई पोशाकें अजीबोगरीब नहीं बल्कि गरिमापूर्ण और शालीन होनी चाहिए। जब गरिमापूर्ण और शालीन होने की बात आती है तो इसमें बहुत कुछ शामिल होता है। लोगों की धारणाओं के अनुसार किस तरह के कपड़े गरिमापूर्ण और शालीन माने जाते हैं? ये वे कपड़े हैं जिन्हें विभिन्न जातीय समूह सबसे आम तौर पर पहनते हैं, ऐसे कपड़े जो अपेक्षाकृत परंपरागत और रूढ़िवादी हैं और सभी को उचित लगते हैं। ये अजीबोगरीब या अत्यधिक फैशनेबल नहीं होते। अपनी धारणाओं के अनुसार लोग इन्हें ही गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े मानते हैं। कार्यक्रमों के लिए पोशाकें चुनने के संबंध में कलीसिया में अधिकांश भाई-बहनों के क्या विचार हैं? देखो, कोई फिल्म बनाते समय, पोशाकों के प्रभारी व्यक्ति के विचार वास्तव में अधिकांश लोगों के विचारों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वे जो कपड़ों की शैलियाँ चुनते हैं, वे सब अस्सी और नब्बे के दशक में अधिकांश लोगों द्वारा आम तौर पर पहनी जाने वाली शैलियाँ होती हैं। रंग ज्यादातर नीला, खाकी या भूरा होता है, जिनमें केवल इस बात की भिन्नता होती है कि वे कितने गहरे या हलके हैं। कुल मिलाकर, ये बस वही दो-तीन साधारण रंग होते हैं। वे कुछ चमकीले रंग क्यों नहीं चुनते? लोगों की धारणाओं के अनुसार, परमेश्वर के सभी विश्वासी गरिमापूर्ण और शालीन अच्छे लोग होते हैं, इसलिए उन्हें अपने कपड़ों के लिए ये कुछ सबसे आम, सबसे साधारण रंग ही चुनने चाहिए। देखो, पोशाकों की शैली और रंग चुनने जैसा इतना साधारण मामला लोगों के दिलों में परमेश्वर में विश्वास करने के बारे में धारणाओं और भ्रामक विचारों और दृष्टिकोणों को पूरी तरह से उजागर कर देता है। यानी, लोग अपने भीतर एक बहुत ही गंभीर धारणा रखते हैं; कई लोग मानते हैं कि परमेश्वर में विश्वास करने के लिए पुराने तौर-तरीकों पर चिपके रहने और परंपरा बहाल करने की आवश्यकता होती है। उनकी धारणाओं के अनुसार, केवल परंपरागत, पुरानी, पिछड़ी और बासी चीजें ही सकारात्मक चीजें हैं और केवल यही चीजें परमेश्वर को प्रसन्न करती हैं। क्या अधिकांश लोग ऐसा ही सोचते हैं? (हाँ।) लोगों के दिमाग में यही होता है। सभी लोग उन परंपरागत, पिछड़ी, पुरानी और अप्रचलित चीजों को सकारात्मक चीजों के रूप में परिभाषित करते हैं। इसलिए, कार्यक्रम निर्माण में लोग पोशाकों के रंगों और शैलियों के संबंध में सटीक चुनाव तक नहीं कर पाते, जो कि सबसे सरल और सबसे बुनियादी मामलों में से एक है। वे सभी अपनी धारणाओं का उपयोग करके इस मुद्दे को मापते हैं और बहुत रूढ़िवादी होने के साथ-साथ बहुत मूर्ख और जिद्दी होते हैं। मुझे बताओ, लोगों के मन में परमेश्वर के बारे में कितनी धारणाएँ होंगी! लोगों द्वारा परिभाषित सकारात्मक चीजें और वे चीजें जिन्हें लोग सोचते हैं कि परमेश्वर पसंद करता है, वे सभी लोगों की धारणाओं में कल्पित परंपरागत संस्कृति हैं, या मानवजाति के बीच वे चीजें हैं जिन्हें सांसारिक लोगों द्वारा स्वीकार किया जाता है और मान्यता दी जाती है; उनका सत्य से बिल्कुल भी कोई लेना-देना नहीं है। तो मुझे बताओ, मैं परंपरावादी हूँ या आधुनिकतावादी? (परमेश्वर न तो परंपरावादी है और न ही आधुनिकतावादी।) कुछ लोग कहते हैं, “तुमने जो संगति की है, उसके माध्यम से हम जानते हैं कि तुम्हें परंपरागत संस्कृति पसंद नहीं है, क्योंकि तुम वर्तमान में रहते हो। कम से कम, तुम परंपरागत नहीं हो और तुम पुराने तौर-तरीकों पर चिपके नहीं रहते।” तुम लोग कहते हो कि मैं परंपरागत नहीं हूँ, तो क्या मैं आधुनिकतावादी हूँ? (नहीं।) तुम कैसे बता सकते हो कि मैं आधुनिकतावादी नहीं हूँ? (आज दुनिया में लोग चलनों के काफी शौकीन हैं, लेकिन परमेश्वर हमें गरिमापूर्ण और शालीन होना सिखाता है, जो चलनों के विपरीत है।) ऐसा नहीं है कि केवल आज के लोग ही चलनों को पसंद करते हैं; प्राचीन काल के लोग भी चलनों को पसंद करते थे। सभी गैर-विश्वासी चलन पसंद करते हैं। चलनों को पसंद करने का मतलब यह नहीं है कि व्यक्ति आधुनिकतावादी है। तो इस प्रश्न का उत्तर कैसे दिया जाना चाहिए? इस पर थोड़ा विचार करो। क्या तुमने कभी मुझे प्राचीन कपड़े पहने देखा है? क्या मैं परंपरागत कपड़े पहनता हूँ? मैं आधुनिक कपड़े पहनता हूँ। इसमें देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता शामिल है। देहधारी परमेश्वर चाहे जिस भी युग में रहता हो और बुनियादी जरूरतें पूरी करने के मामले में उस युग के लोग विकास के जिस भी स्तर तक पहुँच गए हों, उसकी सामान्य मानवता स्वाभाविक रूप से इसके लिए वही तरीका अपनाती है जो वे अपनाते हैं; वह पीछे की ओर नहीं जाएगा। क्या यह सामान्य मानवता की अभिव्यक्ति नहीं है? (हाँ।) उसकी सामान्य मानवता में तर्कसंगतता है, इसलिए जब बुनियादी जरूरतों की बात आती है, तब वह स्वाभाविक रूप से जानता है कि क्या चुनना उचित है। यह एक लिहाज है। दूसरे लिहाज से, चाहे परंपरा हो या आधुनिकता, यह कोई रूप नहीं है, बल्कि यह एक विचारधारा और एक दृष्टिकोण के चलन का प्रतिनिधित्व करता है। तो क्या परंपरा सकारात्मक है या आधुनिकता सकारात्मक है? मेरे नजरिये से, दोनों में से कोई भी सकारात्मक नहीं है। दोनों का सत्य से कोई लेना-देना नहीं है; दोनों शैतान के प्रभाव में भ्रष्ट मानवजाति द्वारा उत्पन्न किए जाते हैं। चाहे परंपरागत विचार और दृष्टिकोण हों या आधुनिक विचार और दृष्टिकोण, जो कुछ भी परमेश्वर से नहीं आता, वह एक नकारात्मक चीज है, सकारात्मक चीज नहीं। चाहे परंपरागत बुनियादी जरूरतें हों या आधुनिक बुनियादी जरूरतें, उनका उद्देश्य हमेशा सामान्य मानवता की जरूरतें पूरी करना होता है। देहधारी परमेश्वर चाहे जिस भी युग में जन्म ले, वह सामान्य और व्यावहारिक मानवता के भीतर रहता है और उसके स्व-आचरण और कार्य करने के सिद्धांत नहीं बदलते। वह जो कुछ भी करता है उसमें और हर चीज के प्रति अपने व्यवहार में वह परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों और अपने आंतरिक जीवन स्वभाव से उत्पन्न होने वाले सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता है; वह परंपरा को संरक्षित या उसका पालन नहीं करता, न ही वह आधुनिकता का पालन करता है या चलनों के पीछे भागता है। इसलिए, अपने अनुयायियों से देहधारी परमेश्वर की अपेक्षाएँ न तो परंपरा पर आधारित हैं और न ही आधुनिकता से प्रभावित हैं। उसके पास जो विभिन्न विचार और दृष्टिकोण या सत्य हैं और जिनकी वह संगति करता है, वे सब परमेश्वर से, परमेश्वर के दिव्य सार और परमेश्वर के जीवन से उत्पन्न होते हैं; उनका परंपरागत संस्कृति या आधुनिक ज्ञान से कोई लेना-देना नहीं है।
परमेश्वर के घर द्वारा तैयार किए गए नृत्य कार्यक्रमों के लिए चुनी गई पोशाकें देखते हुए क्या तुम लोग किन्हीं सिद्धांतों का भेद पहचान पाए हो? वे शैलियाँ और वे रंग क्यों चुने गए? यदि तुम लोग यहाँ उपयुक्त सिद्धांतों को समझ सकते हो, तो तुम लोग सचमुच थोड़ा सत्य समझते हो और तुममें आध्यात्मिक समझ है; यदि तुम इतने सरल मामले में भी सिद्धांतों को नहीं समझ सकते, तो तुम एक भ्रमित व्यक्ति हो जिसकी काबिलियत बहुत खराब है और इतने वर्षों तक उपदेश सुनने के बावजूद तुम सत्य नहीं समझे हो। पहले तो, जब हम नृत्य कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब कलाकारों द्वारा पहने जाने वाले कपड़े परंपरागत होते हैं या आधुनिक? (वे आधुनिक होते हैं।) वे सभी आधुनिक कपड़े होते हैं—वह भी साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें। कुछ लोग नहीं समझते और कहते हैं, “हमारे नृत्य कार्यक्रम कलात्मक कार्यक्रम होते हैं, तो कलाकार मंच की पोशाकों के बजाय केवल साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें क्यों पहनते हैं? सलमा-सितारे जड़ी पोशाकें खासकर शानदार होती हैं। उन राष्ट्रीय स्तर की नृत्य मंडलियों द्वारा मंच पर पहनी जाने वाली पोशाकें देखो—वे शानदार, उत्कृष्ट और शाही होती हैं और जब उन पर रोशनी पड़ती है तो वे चौंधियाने वाली लगती हैं। जब हम कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब यदि हमारे कलाकार भी ऐसी ही पोशाकें पहनें, तो क्या इससे वे बेहतर नहीं दिखेंगे और परमेश्वर को अधिक महिमामंडित नहीं करेंगे? क्या यह परमेश्वर के घर की शक्ति बेहतर ढंग से प्रकट नहीं करेगा और गैर-विश्वासियों या धार्मिक लोगों को परमेश्वर के घर की ताकत बेहतर ढंग से देखने नहीं देगा?” क्या यह दृष्टिकोण सही है? (नहीं।) सबसे पहले मुझे यह बताओ—जब हम नृत्य कार्यक्रम तैयार करते हैं, तब कलाकार शानदार पोशाकों के बजाय साधारण, रोजमर्रा की पोशाकें क्यों पहनते हैं? (यदि नाचते समय सभी भाई-बहन बहुत शानदार पोशाकें पहनते हैं, तो दर्शक कपड़ों पर और इस बात पर ध्यान केंद्रित करेंगे कि कलाकार कैसे दिखते हैं। लेकिन यदि वे साधारण कपड़े पहनते हैं और गरिमापूर्ण और शालीन लोगों की तरह दिखते हैं, तो दर्शक इन बाहरी चीजों से आकर्षित नहीं होंगे और अपना मन परमेश्वर के वचनों पर केंद्रित करेंगे।) तुम एक चीज के बारे में सही हो—शानदार पोशाकें न पहनना लोगों को रूप और बाहरी दिखावे पर ध्यान केंद्रित करने से रोकने के लिए है। एक बात और भी है, जो सबसे महत्वपूर्ण है : चाहे नाचना हो या गाना, जब हम कार्यक्रम तैयार करते हैं, तो उसका क्या उद्देश्य होता है? (परमेश्वर की गवाही देना।) यही एकमात्र लक्ष्य है। चाहे नाचना हो या गाना, यह सब परमेश्वर की गवाही देने के लिए होता है। यह किसी व्यक्ति को विशिष्ट रूप से दर्शाने के लिए नहीं होता, न ही यह किसी को प्रसन्न करने के लिए होता है; यह केवल परमेश्वर की गवाही देने के लिए होता है। इसलिए, कलाकारों के लिए ऐसे सरल, अच्छी फिटिंग वाले, गरिमापूर्ण और शालीन और सुरुचिपूर्ण कपड़े पहनना पर्याप्त है, जो परमेश्वर की गवाही देने का उद्देश्य हासिल करते हों। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, वे प्रकृति से मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होते। मनोरंजन कार्यक्रम क्या होते हैं? मनोरंजन कार्यक्रम वे चीजें हैं, जिन्हें लोग अपने खाली समय में मनोरंजन के लिए देखते हैं; वे केवल लोगों को प्रसन्न करने के लिए होते हैं। जब लोग आराम करते हैं, तब वे मजे करने, आराम करने, खुश महसूस करने, अपनी चिंताएँ भुलाने और तनाव दूर करने के लिए कोई कार्यक्रम देखते हैं। उसके बाद, जो भी काम उन्हें करना होता है, वापस उसे करने चले जाते हैं, बिना इस पर ज्यादा सोचे या बिना इसके बारे में कोई भावना रखे। मनोरंजन कार्यक्रम ऐसे ही होते हैं। हम जो कार्यक्रम करते हैं, उनके बारे में क्या? रूप के लिहाज से वे मनोरंजन हैं, लेकिन सार में वे जनता को प्रसन्न करने के लिए नहीं हैं, न ही वे कलात्मक कौशल दिखाने के लिए हैं। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका लक्ष्य परमेश्वर की गवाही देना है। उदाहरण के लिए, भजन कार्यक्रम तैयार करते समय परमेश्वर के वचनों के भजनों का उद्देश्य परमेश्वर के वचनों के सत्य की गवाही देना और उसका प्रसार करना होता है, जिससे लोग परमेश्वर के सामने आने में सक्षम बनें; अनुभवजन्य भजनों का उद्देश्य परमेश्वर के कार्य द्वारा प्राप्त प्रभावों की और परमेश्वर के कार्य ने लोगों में जो परिणाम उत्पन्न किए हैं, उनकी गवाही देना है। संक्षेप में, हम चाहे किसी भी प्रकार के कार्यक्रम तैयार करें, वे विशुद्ध रूप से मनोरंजन कार्यक्रम नहीं होते। उनका उद्देश्य लोगों का ध्यान खींचना या लोगों को समय बर्बाद करने और मनोरंजन करने में मदद करना नहीं होता, कलात्मक कौशल दिखाना तो और भी नहीं होता। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका केवल एक ही लक्ष्य होता है, जो कि परमेश्वर के वचनों का प्रसार करना और परमेश्वर के कार्य की गवाही देना है, जिससे अधिक लोगों को यह पता चले कि परमेश्वर ने देह धारण कर लिया है और कार्य का एक नया चरण करता रहा है, जिससे अधिक लोगों को यह पता चले कि परमेश्वर के कार्य ने पहले ही लोगों के एक समूह को प्राप्त कर लिया है और यह कि परमेश्वर अब कार्य कर रहा है और बोल रहा है। हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका यही एकमात्र उद्देश्य होता है। चूँकि हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, उनका उद्देश्य यही होता है, इसलिए यदि लोग शानदार कपड़े पहनते हैं और भारी मेकअप करते हैं और हर तरह के रूप धारण करते हैं, तो क्या यह परमेश्वर की गवाही देने के लक्ष्य के विपरीत नहीं है? (हाँ।) यह एक टकराव है। इसलिए हम इस बात पर ध्यान केंद्रित नहीं करते कि कलाकार क्या पहनते हैं। वह एकमात्र चीज क्या है, जिस पर हम ध्यान केंद्रित करते हैं? हम केवल इस बात पर ध्यान केंद्रित करते हैं कि कार्यक्रम जो कुछ प्रस्तुत करते हैं—भाई-बहनों का व्यवहार, नृत्य की मुद्राएँ और कार्यक्रमों का रूप—क्या वे लोगों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं और क्या वे लोगों को उन्हें पसंद करने और उनमें रुचि लेने के लिए प्रेरित कर सकते हैं, जिससे लोगों पर अनुकूल प्रभाव पड़े और उन्हें परमेश्वर के कार्य की जाँच करने, परमेश्वर के वचन स्वीकार करने और भाई-बहनों के साथ मिलकर भजन गाने और परमेश्वर की आराधना करने के लिए इच्छुक होने में मदद मिले—यही वह उद्देश्य है, जिसे हम हासिल करना चाहते हैं। इस उद्देश्य को हासिल करने के लिए, जहाँ तक कलाकारों की पोशाकों और उनके दिखने का संबंध है, उन्हें बस गरिमापूर्ण और शालीन, साफ और सुथरा दिखना चाहिए और उनका व्यवहार बहुत अच्छा होना चाहिए; जहाँ तक बाकी चीजों का संबंध है—शानदार पोशाकें, भारी मेकअप और सभी प्रकार के रूप—उन सभी के नकारात्मक प्रभाव होते हैं। क्या नकारात्मक प्रभाव? यदि सभी नाचने वाली बहनें दिव्य कन्याओं की तरह सजी-धजी हों और सभी भाई सुंदर लड़कों या अमीर वारिसों की तरह सजे-धजे हों, तो जब लोग इसे देखेंगे, तब वे सोचेंगे, “तुम लोग दिखावा कर रहे हो। क्या तुमने बुरे इरादे नहीं पाल रखे हैं? क्या तुम लोगों को लुभा नहीं रहे हो?” यदि लोगों के मन में ये विचार आते हैं, तो यह अच्छा नहीं है। भाई-बहन गरिमापूर्ण और शालीन, और सुरुचिपूर्ण और उचित तरीके से कपड़े पहनते हैं। हालाँकि, कुल मिलाकर, शायद वे सुरुचिपूर्ण न दिखें, लेकिन वे बहुत साफ, सुथरे, गरिमापूर्ण और शालीन होते हैं। जब लोग उन्हें देखते हैं, तो वे देखते हैं कि इन लोगों का व्यवहार अच्छा है, ये परमेश्वर में विश्वास करने वाले हैं और ये जो कार्यक्रम प्रस्तुत कर रहे हैं वह परमेश्वर की गवाही देने वाला है, न कि कोई कुटिल या बुरी चीज। देखो, गैर-विश्वासियों के कार्यक्रम केवल आँखें मटकाने, हवा में चुंबन उछालने या कलाकारों के शरीर दिखाने वाले होते हैं। नाचते समय कलाकार अपनी कला दिखाने के अलावा अपने आकर्षण का भी दिखावा करते हैं, ज़रा-सा भी सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान नहीं करते। इसके विपरीत, हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, वे पूरी तरह से सकारात्मक मार्गदर्शन देते हैं। यदि दर्शक अनुचित विचार रखना भी चाहें, तो भी उन्हें ऐसा करने का कोई अवसर या गुंजाइश नहीं मिलती। यदि वे कलाकारों के शरीर और चेहरे के नैन-नक्श देखना चाहें, तो वे उन्हें अच्छी तरह से नहीं देख सकते; यदि वे देखना चाहें कि कौन अपने आकर्षण का दिखावा कर रहा है तो वे वह भी नहीं देख सकते। वे केवल एक ही भाव देखते हैं—मुस्कान—जो पूरी तरह से गरिमापूर्ण और शालीन आचरण प्रस्तुत करती है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि हमारे कार्यक्रम दिखावा करने या किसी को प्रसन्न करने के लिए नहीं होते, बल्कि परमेश्वर की गवाही देने के लिए होते हैं; यह एक मुख्य सिद्धांत है। इसके अलावा, हमने नृत्य मंडली के लिए जो कपड़ों की शैलियाँ चुनीं—टी-शर्ट, स्वेटशर्ट और स्वेटपैंट—लोग उनमें नाचते हुए काफी आराम महसूस कर सकते हैं, लेकिन कुछ युवा लोगों को अपनी पसंद के आधार पर हो सकता है वे वास्तव में पसंद न आएँ। उन्हें लगता है कि ये शैलियाँ बहुत साधारण हैं, कि ये बस रोजमर्रा के आम कपड़े हैं, ऐसे कपड़े जिन्हें तुम घर में पहनते हो, लेकिन गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े ठीक ऐसे ही होते हैं। टी-शर्ट, स्वेटशर्ट और स्वेटपैंट आजकल रोज़मर्रा के पहनावों की सबसे आम शैलियाँ हैं। हम इन शैलियों को क्यों चुनते हैं? मैंने देखा है कि रोज़मर्रा के पहनावों की इस शैली को पहली बार आए हुए शायद अब तक कम से कम कई दशक हो चुके हैं। हम अब अपने कार्यक्रमों के लिए यह शैली इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए चुनते हैं कि अगले कुछ दशकों में भी यह पुरानी या अप्रचलित नहीं होगी। इसके अलावा, यह शैली सभी आयु-समूहों और सभी सामाजिक वर्गों के लोगों के लिए उपयुक्त है; चाहे वे आम लोग हों या उच्च वर्ग के लोग, वे सभी अपने दैनिक जीवन में घर पर ऐसे ही कपड़े पहनते हैं। इसके अलावा, ये कपड़े ढीले और नाचने के लिए आरामदायक होते हैं। इस प्रकार, हमने अंततः मंच की पोशाकों के लिए कपड़ों की इस शैली का निर्णय लिया। मंच पर इन्हें पहनने वाले लोग इन्हें पसंद करें या न करें, यह शैली मंच के लिए उपयुक्त है; यानी, न तो दर्शक और न ही पहनने वाले ऐसे कपड़ों में कोई गलती निकाल सकते हैं। हो सकता है, पहनने वाले कहें, “तुमने हमारे लिए जो ये कपड़े चुने हैं, ये बहुत भद्दे हैं; मैं अपने दैनिक जीवन में ऐसे कपड़े बिल्कुल नहीं पहनूँगा।” इस पर मेरा उत्तर यह है कि तुम अपने दैनिक जीवन में क्या पहनते हो, मैं उसमें हस्तक्षेप नहीं करता। तुम क्या पहनते हो और तुम्हें क्या पसंद है, यह दर्शाता है कि तुम कौन हो; वे तुम्हारी मानवता और सार का प्रतिनिधित्व करते हैं। यदि तुम्हें सरल, सुरुचिपूर्ण, गरिमापूर्ण और शालीन कपड़े पसंद नहीं हैं, बल्कि इसके बजाय अजीबोगरीब कपड़े पसंद हैं, तो तुम काफी अपरंपरागत हो। यदि तुम्हें अपनी छाती और पीठ दिखाना, अपने बाल खुले रखना और बड़े धूप के चश्मे पहनना पसंद है और तुम हमेशा किसी बड़ी हस्ती की तरह व्यवहार करते हो, तो मैं कहता हूँ कि तुम परमेश्वर के घर के सदस्य नहीं हो। तुम्हें गरिमापूर्ण और शालीन होना पसंद नहीं है; कम से कम, तुम मेरे साथ असंगत हो। गरिमापूर्ण और शालीन होना, और सुरुचिपूर्ण और उचित होना—कपड़ों की शैलियाँ चुनने का यही सिद्धांत है। तो कपड़ों के रंग कैसे चुने जाने चाहिए? कुछ लोग कहते हैं, “सफेद रंग पवित्रता का प्रतिनिधित्व करता है, हरा रंग जीवन का प्रतिनिधित्व करता है, लाल रंग उत्सव का प्रतिनिधित्व करता है और पीला रंग मित्रता का प्रतिनिधित्व करता है, इसलिए हमें बस ये रंग ही चुनने चाहिए।” मैं कहता हूँ कि यह कोरी बकवास है; रंग किसी चीज का प्रतिनिधित्व नहीं करते। तो कौन-से रंग पहनने चाहिए, इसका सिद्धांत क्या है? यह बहुत सरल है; केवल एक ही सिद्धांत है : वह कैमरे पर साफ दिखना चाहिए। खासकर, कुछ रंग अत्यधिक गहरे और काफी उजले होते हैं, और लोग अपने दैनिक जीवन में उन्हें शायद ही कभी पहनते हों, लेकिन हमने इन रंगों को इनके द्वारा प्रदान किए जाने वाले मंच प्रभाव और दृश्य प्रभाव के लिए चुना। एक लिहाज से, ये रंग अपेक्षाकृत अत्यधिक गहरे और उजले हैं, इसलिए इनके द्वारा प्रदान किया जाने वाला मंच प्रभाव अच्छा होता है। दूसरे लिहाज से, इनमें से अधिकांश रंग बहुत अजीब नहीं हैं; कोई भी रंग फीका नहीं है और कोई भी ऐसा नहीं है जो लोगों को दूर भगाए, इसलिए इस तरह से बनाए गए वीडियो का प्रभाव अच्छा होता है।
मैंने अभी जिन चीजों पर संगति की, वे नृत्य कार्यक्रमों की पोशाकें चुनने के सिद्धांत थे। इनमें से कौन-से पहलू तुम लोगों ने स्पष्ट रूप से देखे हैं? मुझे बताओ, मैंने जिन सिद्धांतों पर विचार किया है, क्या वे उचित हैं? (हाँ।) यह मुख्य रूप से परमेश्वर की गवाही देने, परमेश्वर का अनादर न करने और सर्वोत्तम परिणाम हासिल करने के सिद्धांतों के इर्द-गिर्द घूमता है, है ना? (हाँ।) क्या इसका कोई ऐसा पहलू है, जो विकृत या चरम हो? (नहीं।) क्या इसमें पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहने का कोई तत्त्व है? (नहीं।) यह किसी भी तरह से विकृत या पुराने तौर-तरीकों से चिपका हुआ नहीं है। तो पोशाकें चुनने के हमारे ये सिद्धांत परंपरा का पालन करते हैं या ये आधुनिकता का पालन करते हैं? (ये न तो परंपरा का पालन करते हैं और न ही आधुनिकता का; हम जो कार्यक्रम तैयार करते हैं, अगर वे परमेश्वर की गवाही देने का परिणाम प्राप्त कर सकते हैं, तो यह सबसे अच्छा है।) तुम लोग अंततः समझ गए हो; इन कार्यक्रमों का उद्देश्य परमेश्वर की गवाही देना है, और कुछ नहीं। परमेश्वर की गवाही देने के लिए यह विचार करने की आवश्यकता है कि हमें परमेश्वर का अनादर बिल्कुल नहीं करना चाहिए या परमेश्वर के घर को बुरा नहीं दिखाना चाहिए। बेशक, हमें इस बात पर भी विचार करना चाहिए कि पोशाकों का कपड़ा और शैली पहनने में आरामदायक होनी चाहिए। यानी, कोई भी गरिमापूर्ण और शालीन व्यक्ति जो तुम्हें ये कपड़े पहने हुए देखे, उन्हें यह स्वीकार्य लगेगा, उन्हें लगेगा कि तुम परमेश्वर में विश्वास करने वाले की तरह दिखते हो, और कि तुम परमेश्वर के लोगों का प्रतिनिधित्व करने में सक्षम हो, न कि किसी गैर-विश्वासी या किसी फिल्म स्टार या गायक की तरह लगते हो—और एक ही नजर में कोई बता सकता है कि तुम एक गरिमापूर्ण और शालीन व्यक्ति हो। इससे आँकने पर, क्या तुम लोगों को लगता है कि चीजों के प्रति मेरे दृष्टिकोण और अपनी सामान्य मानवता के भीतर मैं जिन सिद्धांतों का पालन करता हूँ वे तुम लोगों के समान हैं? (नहीं।) वे निश्चित रूप से समान नहीं हैं। तो मुझे बताओ, मैं जिन सिद्धांतों का पालन करता हूँ, क्या वे ऊँचे और भव्य हैं? क्या वे असाधारण हैं? वे बिल्कुल भी ऊँचे और भव्य नहीं हैं। वे बहुत सामान्य हैं। मैं जो सिद्धांत अपनाता हूँ और चीजें करने के द्वारा मैं जो परिणाम प्राप्त करना चाहता हूँ, वे सब अत्यधिक व्यावहारिक हैं और मैं कभी दिखावा नहीं करता। यदि हम, तुम सभी लोगों के चीजों को देखने के तरीके के अनुसार चलें, तो कार्यक्रमों के लिए पोशाकें चुनने में हम या तो परंपरागत होंगे और पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहेंगे या सांसारिक चलनों के पीछे चलेंगे। कुछ लोग कहते हैं, “दुनिया में स्मोकी आई मेकअप, नकली पलकें, नथ और बड़े झुमके लोकप्रिय हैं। हमें भी भाई-बहनों को सुंदर और आकर्षक बनाना चाहिए। न केवल उनके कपड़े शानदार होने चाहिए, बल्कि उनका मेकअप भी मोहक होना चाहिए। उन्हें दुनिया के गायकों और फिल्मी सितारों से पीछे नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें और भी उच्चस्तरीय और ठाठदार दिखना चाहिए। परमेश्वर में विश्वास करने वालों को उनसे अधिक श्रेष्ठ होना चाहिए, इसलिए कलाकारों को तैयार करते समय हमें इसी दिशा में आगे बढ़ना चाहिए।” तो ऐसा क्यों है कि ये कलाकार अंततः एक भी शानदार चीज पहने बिना मंच पर जाते हैं? क्योंकि मैं यहाँ हर चीज की जाँच-परख कर रहा हूँ। आधुनिकतावादी हों या परंपरावादी, उन सभी को किनारे कर दिया गया है—उन्हें अपने “कौशल” दिखाने का कोई अवसर नहीं मिलता। उन्हें मेरे द्वारा नियंत्रित किया गया है। यदि तुम लोग जाँच-परख कर रहे होते, तो क्या तुम लोग इन लोगों को अपने “कौशल” दिखाने का अवसर देते? (नहीं।) क्यों नहीं? (यदि उन्हें अवसर दिया जाता, तो वे पटरी से उतर जाते। वे परमेश्वर के घर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों का पालन नहीं करेंगे।) यदि उन्हें अवसर दिया जाता तो वे कलाकारों को दानवों जैसा तैयार करते। वे ऐसे मनोरंजन कार्यक्रम तैयार करते, जो समाज में लोकप्रिय हैं, परमेश्वर की गवाही देने के उद्देश्य वाले कार्यक्रमों को जनता को प्रसन्न करने वाले मनोरंजन कार्यक्रमों में बदल देते और उनमें काम करने वाले लोगों को दानवों और भूतों जैसा बना देते। क्या तब भी कार्यक्रम देखने लायक होते? कार्यक्रमों की प्रकृति बदल जाती; वे परमेश्वर की गवाही न दे रहे होते बल्कि परमेश्वर का अनादर कर रहे होते, और वे शापित और प्रतिबंधित किए जाने के लायक होते। यह कर्तव्य निभाना नहीं, बल्कि बुराई करना होता। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) तुम लोग इतने छोटे-से मामले को भी नहीं समझते थे। अब जबकि मैंने इसे अधिक स्पष्ट और सरल तरीके से रखा है तो कुछ लोगों को अचानक एहसास हुआ है : “अच्छा, तो यह बात है। अब मुझे पता चला कि परमेश्वर का घर अपने नृत्य कार्यक्रमों के लिए ऐसी पोशाकें क्यों चुनता है।” चाहे जो भी युग हो, लोगों को किस सिद्धांत का पालन करना चाहिए? वह है, सभी चीजों में परमेश्वर के वचन को सिद्धांत मानना। कार्य की कोई भी मद करते समय या कोई भी मामला सँभालते समय तुम्हारा पहला लक्ष्य लोगों का आत्मिक उन्नयन करना होना चाहिए और तुम्हारा दूसरा लक्ष्य परमेश्वर के कार्य की गवाही देना होना चाहिए। ये दो सिद्धांत हैं। इसलिए, सभी मामलों में ये वे दो सिद्धांत हैं जिनका लोगों को पालन करना चाहिए। फिर, देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता के भीतर मौजूद सामान्यता और व्यावहारिकता भी पूरी तरह से इन्हीं सिद्धांतों का पालन करने में निहित है। सिद्धांत नहीं बदलते; देहधारी परमेश्वर न तो परंपरा का पालन करता है और न ही आधुनिकता का। अपनी सामान्य मानवता के भीतर मैं जिस सिद्धांत का पालन करता हूँ, वह जमीर और विवेक के दायरे में आचरण और कार्य करना है। तो परमेश्वर के घर का कार्य करने में मैं किन सिद्धांतों का पालन करता हूँ? वह है मैं जो कुछ भी करता हूँ उसमें लोगों को लाभ पहुँचाना—ऐसी चीजें करना जो उन्हें लाभ पहुँचाएँ और उनका आत्मिक उन्नयन करें। इसके अतिरिक्त, वह परमेश्वर की गवाही देने का कार्य करना है, परमेश्वर की गवाही देने और परमेश्वर के वचनों का प्रसार करने के सिद्धांतों का पालन करना है। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसा ही है? (हाँ।) इस तरह संगति करने से क्या तुम लोग अब मुझे बेहतर समझते हो? (हाँ।) यदि मैं इन चीजों के बारे में विस्तार से बात न करूँ, तो तुम लोग इनके बारे में स्पष्ट नहीं होगे। तुम लोग इतने साधारण मामले की भी थाह नहीं पा सकते। वास्तव में, यह बिल्कुल भी गहन नहीं है; यह सब बहुत व्यावहारिक और साधारण है। यह कितना साधारण है? यह सामान्य मानवता की तर्कसंगतता के अत्यधिक अनुरूप है। यानी, यदि तुममें सामान्य मानवता की तर्कसंगतता है, तो तुम इसे समझ सकते हो, लेकिन यदि नहीं है, तो तुम्हारे लिए इसे समझना बहुत कठिन होगा—मुझे इसे स्पष्ट रूप से और पूरी तरह से समझाना होगा, इसे तुम्हें आसान शब्दों में और विस्तार से बताना होगा, ताकि तुम समझ सको कि क्या हो रहा है। यह इतना साधारण मामला है, यह सत्य सिद्धांतों के स्तर तक भी नहीं पहुँचता, फिर भी तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से नहीं समझा सकते। यहाँ चल क्या रहा है? क्या यह मामला गहन और अथाह है? (नहीं।) फिर तुम लोग इसे स्पष्ट रूप से क्यों नहीं समझा सकते? मोटे तौर पर कहें तो, ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोग सत्य नहीं समझते। अधिक विस्तृत स्तर पर, ऐसा इसलिए है क्योंकि तुम लोगों की सामान्य मानवता और तर्कसंगतता में कुछ चीजों की कमी है और उनमें दोष हैं। जब गरिमापूर्ण और शालीन होने की बात आती है, तो तुम लोग परंपरा और पुराने तौर-तरीकों से चिपके रहते हो। जब सामान्य मानवता की बात आती है, तो तुम लोग सोचते हो कि सामान्य मानवता होने का अर्थ निष्कपट होना है, किसी मूर्ख की तरह। क्या यह ये नहीं दर्शाता कि तुम्हारी काबिलियत वास्तव में खराब है और तुममें कोई बोध-क्षमता नहीं है? (हाँ।) असल में यही समस्या है। ठीक है, इस पर इतना ही काफी है।
पिछली बार, हमने “देहधारी परमेश्वर को भ्रष्ट मानवजाति के समान न मानना” विषय के अंतर्गत देहधारी परमेश्वर का “षड्यंत्र नहीं करना” विषय पर संगति की थी। आज हम “दूसरों पर प्रहार न करना” विषय पर संगति करेंगे। दूसरों पर प्रहार न करना देहधारी परमेश्वर की सामान्य मानवता में मौजूद सार और उसके जीने का एक हिस्सा है और यह उन सिद्धांतों में से एक है जिनका पालन सामान्य मानवता का जमीर और विवेक, लोगों के साथ व्यवहार करते समय करते हैं। यानी, कम से कम, देहधारी परमेश्वर की तुम्हारे साथ शांति से निभ सकती है। तुम चाहे किसी भी प्रकार के व्यक्ति हो, चाहे तुम बेहतर काबिलियत वाले व्यक्ति हो या खराब काबिलियत वाले, या बेहतर मानवता वाले व्यक्ति हो या खराब मानवता वाले, देहधारी परमेश्वर तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता है और तुम्हारे साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रह सकता है। यदि मुझे पता चलता है कि तुममें कोई दोष या खामी है, या यहाँ तक कि तुम्हारी मानवता के भीतर कोई बुरा सार है, या तुमने कोई बुरा कर्म किया है, तो अवसर मिलने पर या परिस्थितियाँ अनुकूल होने पर मैं तुम्हारे साथ स्पष्ट रूप से संगति करूँगा। यदि तुम स्वीकार कर सको तो मैं स्पष्ट रूप से तुम्हारी समस्याएँ उजागर करूँगा और तुम्हें उन्हें हल करने का मार्ग बताऊँगा। लेकिन यदि तुम इसे स्वीकार नहीं कर सकते तो शायद मैं उचित समय पर, स्वयं द्वारा खोजी गई किसी वास्तविक जीवन की समस्या का उपयोग करके तुम्हें याद दिलाऊँ, तुम्हें उजागर करूँ और तुम्हें सचेत करूँ, जिससे तुम्हें पता चले कि तुम्हारी समस्या क्या है—वह तुम्हारी मानवता की समस्या है या तुम्हारी काबिलियत की या फिर तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव की। तुम्हारी समस्या के आधार पर मैं तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हें सचेत करूँगा, जिससे तुम्हें अपनी कमियों का या तुम्हारी समस्या कहाँ है इसका पता चलेगा, और फिर मैं तुम्हें बताऊँगा कि इस प्रकार की समस्या का सार क्या है और जिन लोगों में यह समस्या होती है, उनके प्रति परमेश्वर का रवैया क्या होता है। यदि तुम इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हो और देह से विद्रोह करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हो तो मैं तुम्हें अभ्यास का मार्ग बताऊँगा और यह कि इस प्रकार की समस्या से कैसे पेश आना और हल करना है। मैं तुम्हारी समस्याओं और खामियों का इस्तेमाल तुम्हारे खिलाफ या तुम्हारी कमजोरियों का फायदा उठाने के लिए नहीं करूँगा और फिर समय-समय पर तुम्हारा मजाक नहीं उड़ाऊँगा या तुम्हारा उपहास नहीं करूँगा या उनके बारे में व्यंग्यात्मक टिप्पणियाँ नहीं करूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा; मैं तुम्हारे साथ और तुम्हारी मौजूदा समस्याओं के साथ न्यायपूर्ण और वस्तुनिष्ठ ढंग से पेश आऊँगा। यदि मैं तुम्हें कुछ याद दिलाता हूँ, लेकिन तुममें जागरूकता की कमी है और तुम्हें नहीं लगता कि मैंने जो कहा है उसका तुमसे कोई लेना-देना है, या यदि मैं तुम्हें बताता हूँ कि तुम्हारी समस्या की प्रकृति गंभीर है लेकिन तुम इसे स्वीकार नहीं करते और इसे अस्वीकार कर देते हो, इसका प्रतिरोध करते हो और यहाँ तक कि बहस करने और खुद को सही ठहराने के लिए बहाने तक बनाते हो तो मैं स्थिति के अनुसार चीजों का आकलन करूँगा। यदि तुम जो कार्य करते हो, वह बहुत महत्वपूर्ण है और तुम्हारी समस्या ने कलीसिया के कार्य को प्रभावित किया है तो मैं विचार करूँगा कि क्या तुम इस कर्तव्य के लिए उपयुक्त हो। लेकिन यदि तुम केवल एक साधारण विश्वासी हो और तुम जो कर्तव्य करते हो उसका और तुम्हारी अभिव्यक्तियों का कलीसिया के कार्य या परमेश्वर के चुने हुए लोगों पर ज्यादा प्रभाव नहीं पड़ता और यह केवल तुम्हारी व्यक्तिगत समस्या है, तो मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हारी मदद करूँगा। यदि तुम इसे गंभीरता से नहीं लेते, तो मैं तुम्हारे प्रति कोई द्वेष नहीं रखूँगा और बेशक मैं तुम्हें इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर करने का हर संभव प्रयास नहीं करूँगा। मैं इस मामले के साथ बहुत तर्कसंगत ढंग से पेश आऊँगा और मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाना और तुम्हारी मदद करना जारी रखूँगा। यदि मैं देख सका कि तुम्हारी समस्या का सार तुम्हारे या दूसरों के लिए नकारात्मक परिणाम लाएगा, तो अपने जमीर से प्रेरित होकर मैं सद्भावना से तुम्हें याद दिलाऊँगा और तुम्हारी मदद करूँगा, न कि मैं बस तुम्हें खुद का मजाक बनवाते हुए देखूँगा। मैं यह कहते हुए यूँ ही तुम्हारा निरूपण भी नहीं करूँगा, “तुमसे कोई आशा नहीं रखी जा सकती, परमेश्वर तुमसे घृणा करता है और तुम्हारा नाश होने वाला है,” और मैं अपना मुँह खोलकर यह कहते हुए तुम्हें शाप तो बिल्कुल नहीं दूँगा, “तुम दानव, तुम शैतान के वंशज, तुम जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हो।” मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। चूँकि मेरी पहचान विशेष है, इसलिए मैं अक्सर खुद को बहुत तर्कसंगत ढंग से संयमित करता हूँ : मैं किसी के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ और उससे कैसे बात करता हूँ, यह इस बात पर निर्भर होना चाहिए कि वह कौन है—यह एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, मुझे लापरवाही से किसी का निरूपण नहीं करना चाहिए। और दूसरी बात, अपनी आवाज के लहजे, शब्दों के चयन या कहने के तरीके से मुझे दूसरे व्यक्ति को यह महसूस कराना चाहिए कि मैं जो कहता और करता हूँ वह सद्भावना से है और द्वेष से मुक्त है। जहाँ तक मेरे इरादे की बात है, मैं ईमानदारी से तुम्हारी मदद करने की कोशिश कर रहा हूँ; मैं तुम्हें गलत रास्ते पर जाते हुए नहीं देखना चाहता, न ही मैं यह देखना चाहता हूँ कि तुम कमजोर पड़ो, हिचकिचाओ, या यहाँ तक कि चीजों का सामना करने पर अपनी दिशा खो दो या भटक जाओ। इसके बजाय, मुझे उम्मीद है कि मेरे द्वारा संगति और तुम्हारी मदद कर चुकने के बाद तुम खुद को सही ढंग से देख सको, नकारात्मकता में पड़ने से बच सको, अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपनी समस्याओं की सटीक समझ रख सको और अपने साथ सही ढंग से व्यवहार कर सको और फिर परमेश्वर के वचनों से अभ्यास का मार्ग खोज सको और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अपने भ्रष्ट स्वभावों और अपनी समस्याओं को थोड़ा-थोड़ा करके हल कर सको, साथ ही दूसरों के साथ सौहार्दपूर्ण ढंग से रह सको और उनकी मदद कर सको। यानी, मैं यह सुनिश्चित करने का प्रयास करता हूँ कि लोगों के साथ मिलते-जुलते समय मैं जो कहता और करता हूँ, वह उन्हें परमेश्वर के इरादे समझने में सक्षम बना सके, यह जानने में सक्षम बना सके कि परमेश्वर लोगों से किन सिद्धांतों की अपेक्षा करता है, लोगों की विभिन्न समस्याओं के प्रति परमेश्वर के रवैये और दृष्टिकोण क्या हैं, परमेश्वर की अपेक्षाएँ पूरी करने और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए लोगों को इन समस्याओं को कैसे सँभालना चाहिए और उन्हें अपनी समस्याएँ हल करने के लिए सत्य कैसे खोजना चाहिए। मेरा मकसद लोगों की मदद करना है, ताकि वे सभी प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों से निपटते समय और जब उनके भ्रष्ट स्वभाव प्रकट होते हैं तब इन समस्याओं को सही ढंग से लें और उन्हें हल करें, जिसका अंतिम परिणाम यह होता है कि वे सत्य और परमेश्वर के प्रति समर्पण करते हैं। बेशक, इन वर्षों में कार्य करने और बोलने के दौरान मैं जिन विभिन्न प्रकार के लोगों के संपर्क में आया हूँ, उनके आधार पर, मैंने एक तथ्य पहचाना है : चाहे मैं लोगों के साथ कितनी भी शांति से बोलूँ और बातचीत करूँ, मेरे मन में कितनी भी सद्भावना हो या किसी की मदद करने की मेरी कैसी भी मानसिकता हो, बहुत कम लोग यह महसूस कर सकते या समझ सकते हैं कि मैं क्या कहता हूँ और क्यों कहता हूँ, और फिर, मैंने जो वचन बोले हैं और जिस विषयवस्तु पर मैंने उनके साथ संगति की है, उसके माध्यम से प्रगति कर सकते हैं या अपने वास्तविक जीवन में वास्तविक, व्यावहारिक मदद प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन लोग अंततः मेरे साथ बातचीत और मेलजोल करने के माध्यम से चाहे कितना भी बटोरें और प्राप्त करें, लोगों के साथ मिलने-जुलने के मेरे सिद्धांत नहीं बदलते। कुछ लोग कहते हैं, “तो तुम अपना तरीका क्यों नहीं बदलते?” मुझे बताओ, मैं अपना तरीका क्यों नहीं बदलता? क्या मुझे अपना तरीका बदलना चाहिए? लोगों से बात करते समय क्या मुझे किसी ऊँचे स्थान से बोलना चाहिए, मानो मूसा को दस आज्ञाओं की घोषणा कर रहा हूँ? क्या मेरी आवाज आकाश में गड़गड़ाहट की तरह होनी चाहिए या क्या मुझे किसी प्रकार का लहजा अपनाना चाहिए, ताकि लोग डर जाएँ, मेरा कहा आसानी से याद रखें और अभ्यास करने के इच्छुक और समर्पण करने में सक्षम हों? या लोगों के साथ संवाद करते समय यदि मैं हमेशा उनसे शाप देने और उनका निरूपण करने के लहज़े में बात करूँ, तो क्या लोग तब अपना सबक सीखेंगे? क्या वे तब इसे स्वीकार कर पाएँगे? (नहीं।) क्या तुम लोग जानते हो कि वे ऐसा क्यों नहीं कर पाएँगे? बहुत पहले जब यहोवा ने मूसा के माध्यम से दस आज्ञाएँ जारी की थीं, तब इस्राएलियों ने आकाश में गड़गड़ाहट की आवाज सुनी थी और बिजली देखी थी—क्या इससे वे यहोवा के खिलाफ विद्रोह करने और उसकी आलोचना करने से रुक गए थे? बोलने के लिए तुम चाहे किसी भी तरीके का उपयोग करो, तुम्हारे वचनों की विषयवस्तु कुछ भी हो या बोलने में तुम्हारा उद्देश्य कुछ भी हो, जहाँ तक प्राप्तकर्ता का संबंध है, यदि वह व्यक्तिपरक रूप से सत्य स्वीकार करने और सकारात्मक चीजों से प्रेम करने की इच्छा और आवश्यकता रखता है—यदि उसके हृदय में यह आवश्यकता है—तो तुम बोलने के लिए चाहे किसी भी तरीके का उपयोग करो, वह इसे स्वीकार कर पाएगा और इसे आसानी से याद रखेगा। लेकिन यदि उसके हृदय में यह आवश्यकता नहीं है, तो भले ही वह जानता हो कि सकारात्मक चीजें क्या हैं और नकारात्मक चीजें क्या हैं, फिर भी वह तुम्हारी किसी भी बात को स्वीकार नहीं करेगा या उसे दिल से नहीं अपनाएगा, फिर चाहे वह कितनी भी सही हो या उसका स्रोत और मकसद कितना भी सही हो। इसलिए, मेरे परिप्रेक्ष्य से, ये चीजें करने का मेरा सिद्धांत यह है कि मैं किसी के साथ भी सामान्य रूप से संगति करता हूँ। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि व्यक्ति मुझसे क्या प्राप्त कर सकता है और क्या बटोर सकता है और क्या वह सत्य प्राप्त कर सकता है, तो कुंजी इस बात में निहित है कि क्या वह सत्य से प्रेम करता है, और इस बात में भी कि क्या उसमें सामान्य मानवता की आवश्यकताएँ हैं। यदि वह स्वाभाविक रूप से सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, तो जब मैं उसके साथ इस तरह सामान्य रूप से मिलता-जुलता और बात करता हूँ, तो वह इस बात पर विचार कर पाएगा कि मैंने क्या कहा, इन वचनों के पीछे के सिद्धांत क्या हैं और मैंने उसे क्या करने का आदेश दिया; वह बाद में इन चीजों पर विचार करेगा, इन्हें ध्यान में रखेगा और फिर इन वचनों के अनुसार अभ्यास करेगा। यदि इस व्यक्ति को अपनी मानवता में सकारात्मक चीजों की कोई आवश्यकता नहीं है, तो मैं चाहे कुछ भी कहूँ, वह बेकार है। भले ही मैं उसकी काट-छाँट करूँ, उसे अनुशासित करूँ या यहाँ तक कि उसे ताड़ना दूँ, इससे कुछ नहीं होता। ताड़ना दिए जाने के बाद वह बाहर से शिष्ट और आज्ञाकारी लग सकता है, लेकिन चूँकि उसके हृदय में सकारात्मक चीजों की कोई आवश्यकता नहीं होती, इसलिए एक बार चीजें आगे बढ़ने के बाद वह जल्दी ही वैसा ही हो जाएगा जैसा वह पहले था, उसके हृदय में सकारात्मक वचनों, सकारात्मक चीजों या सत्य सिद्धांतों का कोई निशान नहीं होगा। इसलिए, ऐसे लोगों के लिए, तुम चाहे कितना भी कहो, तुम उन्हें बदल नहीं सकते ताकि वे सामान्य मानवता की आवश्यकताएँ विकसित कर सकें। यह एक पहलू है। इसके अतिरिक्त, दूसरों पर प्रहार न करना मूल रूप से इस बात के लिए मेरे सिद्धांतों में से एक है कि मैं तुम लोगों के साथ कैसा व्यवहार करता हूँ। तुम चाहे जिस भी प्रकार के व्यक्ति हो, चाहे तुम सत्य का अनुसरण करते हो या नहीं, यदि मैं तुम्हारी कोई समस्या उजागर करता भी हूँ, तो यह केवल इस समस्या के सार का गहन-विश्लेषण करने के लिए होता है ताकि तुम इसे पूरी तरह से समझ और जान सको, भविष्य में अपना कर्तव्य निभाने के दौरान प्रगति कर सको, वही गलतियाँ करना बंद कर सको और कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधा डालना या उसे नुकसान पहुँचाना बंद कर सको—यह तुम्हारी मदद करने के लिए है, तुम्हारे लिए परेशानी खड़ी करने या तुम्हारे खिलाफ इस्तेमाल करने के लिए कुछ खोजने के लिए नहीं। इसलिए, यदि मैं अतीत में हुई चीजों को सामने लाता भी हूँ, तो यह तुम्हारा उत्साह कम करने या तुम्हें चोट पहुँचाने के लिए नहीं होता, बल्कि तुम्हें अपनी समस्याओं का सार जानने, सत्य के एक निश्चित पहलू की गहन समझ प्राप्त करने, अपनी समझ रखने, परमेश्वर के इरादों के अनुसार कार्य करना जानने और अंततः परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार सटीक रूप से अभ्यास करने में सक्षम बनाने के लिए होता है। क्या तुम लोगों को इस तथ्य की कोई समझ है कि देहधारी परमेश्वर कभी दूसरों पर प्रहार नहीं करता? (हमें कुछ समझ है।)
दूसरों पर प्रहार न करने के अलावा देहधारी परमेश्वर समय-समय पर लोगों को प्रोत्साहित भी करता है। कुछ लोगों का आध्यात्मिक कद अपरिपक्व होता है और वे नाजुक होते हैं; अपनी मानवता के मामले में वे बहुत मजबूत नहीं होते, उनमें काम करने में दृढ़ता की कमी होती है या वे अक्सर सभी प्रकार की चीजों से बाधित होते हैं, वे नहीं जानते कि सत्य कैसे खोजा जाए और वे अपने कर्तव्य सामान्य रूप से नहीं कर सकते। ऐसी परिस्थितियों में मैं उन्हें कुछ प्रोत्साहन दूँगा ताकि वे आगे का मार्ग देख सकें, जिससे वे अब खुद को किसी मामले में फँसा हुआ और उससे बाधित नहीं पाएँगे। जब तुम प्रोत्साहन के ये वचन सुनते हो, तो तुम्हें लग सकता है कि मैं जिस बारे में बात कर रहा हूँ वह तुम्हारी पहुँच से बाहर है, लेकिन मेरा मकसद तुम्हें तुम्हारे विचारों और धारणाओं द्वारा लाया गया बोझ त्यागने में मदद करना है, ताकि तुम अब उन चीजों से बाधित न रहो और उन्हें पीछे छोड़ सको और फिर परमेश्वर के इरादे पूरे करने के लिए अपनी पूरी ताकत अपने कर्तव्य में लगा सको। कुछ लोग पहले विफलता के मार्गों पर चल चुके हैं, या ऐसी चीजें कर चुके हैं जो परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का उल्लंघन करती हैं, या उनमें कुछ स्पष्ट विद्रोही व्यवहार रहे हैं, और कुछ लोगों ने तो अपने कार्यों से विघ्न-बाधाएँ भी पैदा की हैं जिससे कलीसिया के कार्य को कुछ नुकसान हुआ है। यदि मैं अपनी संगति में कभी-कभार इन चीजों का उल्लेख करता हूँ तो मेरा उद्देश्य तुम्हारा उत्साह कम करना नहीं होता, न ही मैं कोई द्वेष रख रहा हूँ; बल्कि, मेरा उद्देश्य तुम्हारे मामले के तथ्यों का एक उदाहरण के रूप में उपयोग करना है, ताकि दूसरों को वही गलतियाँ न करने की याद दिलाई जा सके—मेरा उद्देश्य सत्य के एक पहलू पर स्पष्ट रूप से संगति करना है, ताकि अधिक लोग इससे यह देख सकें कि तुम जिस मार्ग पर चले वह गलत है और वह कैसे गलत है, ताकि वे इससे सबक ले सकें और फिर अधिक लोगों को उसी मार्ग पर न चलने की चेतावनी देना और यह याद दिलाना है कि कार्य करते समय उन्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। विशेष रूप से लोगों के विभिन्न भ्रष्ट स्वभावों पर संगति करते और उन्हें उजागर करते समय मैं जो उदाहरण देता हूँ या जिस विशिष्ट दशा पर मैं संगति करता हूँ, उसमें कई लोग शामिल हो सकते हैं या कुछ विशिष्ट लोग और चीजें शामिल हो सकती हैं। इन चीजों पर संगति करने का उद्देश्य तुम लोगों को बेनकाब करने और शर्मिंदा करने का अवसर खोजना नहीं है; जहाँ तक मेरे द्वारा सामने लाए गए तथ्यों या मेरे द्वारा उजागर की गई दशाओं की बात है, उनका केवल उस विषय और सत्य के उस पहलू से संबंध होता है, जिस पर हम संगति कर रहे हैं। हो सकता है कि मैं तुम्हें व्यक्तिगत रूप से न जानता हूँ और मुझे पता न हो कि तुम्हारे साथ ऐसा कुछ हुआ है, लेकिन मैंने जो उदाहरण दिया या जो दशा मैंने उजागर की, वह संयोग से तुम्हारे साथ घटित हुई है और तुम खुद को उससे मिलाते हो। जब कुछ लोग खुद को ऐसी चीजों से मिलाते हैं, तब वे सोचते हैं, “क्या किसी ने मेरी चुगली की? तुम्हें कैसे पता कि मेरे साथ यह चीज हुई, और मुझे यह समस्या थी और मैं इस दशा में था?” मैं कहता हूँ कि मुझे वास्तव में नहीं पता कि किसी विशेष व्यक्ति के साथ इस तरह की चीज हुई या वह इस तरह की दशा में था, लेकिन मैं जिन सत्यों पर संगति करता हूँ उनमें—या मैं जो समस्याएँ उजागर करता हूँ उनमें—यह दशा, ऐसी समस्या या इस विशिष्ट प्रकार का उदाहरण शामिल होता है। चूँकि इस प्रकार की दशा और इस विशिष्ट प्रकार का उदाहरण प्रातिनिधिक हैं और वे लोगों को कुछ प्रकार के लोगों, घटनाओं और चीजों को जानने और एक निश्चित प्रकार के व्यक्ति का सार जानने दे सकते हैं, इसलिए उदाहरण देते समय मैं कलीसिया में हुई कुछ विशिष्ट घटनाओं का हवाला देने या कुछ विशिष्ट दशाओं पर चर्चा करने से नहीं बच सकता। ऐसे में, यह अपरिहार्य है कि कुछ लोग, घटनाएँ और चीजें शामिल होंगी। लेकिन मेरा किन्हीं निश्चित लोगों पर प्रहार करने का ज़रा-सा भी इरादा नहीं है; मेरा लक्ष्य केवल लोगों को याद दिलाना और प्रोत्साहित करना है, जिससे परमेश्वर के अधिकांश चुने हुए लोगों को लाभ हो सके। जब मैं उपदेश देते और संगति करते समय कुछ उदाहरण देता हूँ, तो यह बिल्कुल भी किसी विशेष व्यक्ति पर निर्देशित नहीं होता; यह केवल सत्य पर संगति करने और किसी निश्चित समस्या का सार उजागर करने के लिए होता है, ताकि तुम लोग समस्या के सार के बारे में अधिक स्पष्ट हो सको और उसे बेहतर ढंग से समझ सको। समस्या का सार समझने के माध्यम से, चाहे तुम खुद को इस समस्या वाले व्यक्ति के रूप में पहचानो या चाहे तुम इसमें शामिल लोगों, घटनाओं और चीजों की असलियत जानो, तुम संबंधित सत्य सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास कर सकते हो, अपने भीतर की समस्याएँ हल करने के लिए उनका उपयोग कर सकते हो और सत्य वास्तविकता में प्रवेश प्राप्त कर सकते हो। मैं चाहे किसी भी प्रकार की समस्या पर संगति करूँ, चाहे वह ऐसी समस्या हो जो तुम्हारे भीतर मौजूद हो या ऐसी समस्या हो जो दूसरों के भीतर मौजूद हो, मैं ऐसा केवल सत्य पर संगति करने और किसी निश्चित प्रकार की समस्या का सार और वास्तविकता बेहतर ढंग से समझने में तुम लोगों की मदद करने के लिए करता हूँ; यह किसी विशिष्ट व्यक्ति या किसी विशिष्ट प्रकार के व्यक्ति पर निर्देशित नहीं होता। बेशक, यह भी संभव है कि किसी समस्या पर संगति करते समय मैं जो उदाहरण देता हूँ उसका मूल रूप कुछ ऐसा हो जो तुम्हारे साथ हुआ हो और मैंने एक उदाहरण देने के लिए इस मामले का उपयोग किया हो। लेकिन यह उदाहरण देने में मैं किसी ऐसी समस्या का खुलासा नहीं कर रहा होता जो केवल तुम्हारी हो; बल्कि, तुम्हारी समस्या हर किसी में—पूरी मानवजाति में—पाई जाने वाली समस्याओं की प्रतिनिधि होती है। बेशक, समस्या का खुलासा करने का उद्देश्य केवल समस्या हल करना होता है, तुम पर प्रहार करना नहीं। इसलिए, जब तुम इस प्रकार की स्थिति का सामना करते हो, तब तुम्हें उसे सही तरीके से लेना चाहिए; यह मेरा काम है। मेरा काम, एक लिहाज से, तुम लोगों को सभी सत्य, सत्य के सभी पहलू प्रदान करना है, और दूसरे लिहाज से, यह तुम लोगों के भीतर की समस्याएँ, भ्रष्ट मानवजाति की विभिन्न दशाएँ और उसके भीतर के सभी भ्रष्ट स्वभाव, साथ ही भ्रष्ट स्वभावों से जुड़ी समस्याएँ उजागर करना है। यह मेरा काम है। चूँकि मेरे काम में सत्य प्रदान करने के अलावा भ्रष्ट मानवजाति की भ्रष्टता की वास्तविकता उजागर करना भी शामिल है, इसलिए जब इस कार्य की बात आती है, तब मेरे इरादे अच्छे होते हैं। मैं तुम लोगों की मदद और समर्थन करना चाहता हूँ, तुम्हें याद दिलाना और तुम लोगों को पोषण प्रदान करना चाहता हूँ, ताकि तुम लोग समस्या का सार स्पष्ट रूप से देख सको और अपने भ्रष्ट स्वभावों से विद्रोह करने में सक्षम हो सको, जिससे तुम अब अपने भ्रष्ट स्वभावों के भीतर न रहो, बल्कि खुद को बदलने, अपने हाथों की बुराई त्यागने, परमेश्वर के सामने पश्चात्ताप करने और परमेश्वर द्वारा अपेक्षित सिद्धांतों के अनुसार अभ्यास करने में सक्षम हो सको और सत्य के प्रति समर्पण और परमेश्वर के प्रति समर्पण प्राप्त कर सको।
मैं तुम लोगों की चाहे जो भी समस्याएँ उजागर करूँ और इन समस्याओं को उजागर करते समय मैं चाहे जिस भी तरीके या लहजे का उपयोग करूँ, मैं ऐसा तुम लोगों की मदद करने और तुम लोगों को उद्धार के मार्ग पर चलने के लिए समर्थन देने के सिद्धांत और उद्देश्य के आधार पर करता हूँ। मेरे मन में कोई दुर्भावना नहीं होती—यह पूरी तरह से सद्भावना से होता है। अगर किसी व्यक्ति या किसी तरह के इंसान के भीतर की समस्या का सार उजागर करते समय मैं कभी-कभी जो शब्द इस्तेमाल करता हूँ वे बहुत सभ्य न हों तो भी, मेरा उद्देश्य किसी पर प्रहार करना या उसे दबाना नहीं होता, बल्कि समस्या के सार का गहन-विश्लेषण करना होता है, ताकि लोगों में भेद पहचानने की क्षमता आ सके और वे अपने भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकें। इसमें कोई साजिश नहीं होती, तुम पर प्रहार करने या तुम्हें दबाने का कोई इरादा नहीं होता और तुम्हारी कमियाँ उजागर करने या तुम्हें शर्मिंदा करने की कोई मंशा नहीं होती। कुछ समस्याओं पर संगति करते समय अगर मैं किसी विशेष प्रकार के व्यक्ति के व्यवहार या स्वभाव और सार का निरूपण करता भी हूँ तो भी, वह निरूपण पूरी तरह से वस्तुनिष्ठ तथ्यों के अनुरूप होता है। उदाहरण के लिए, यदि तुम घमंडी और आत्मतुष्ट हो, हमेशा तानाशाही से कार्य करते हो और तुमने ऐसे काम किए हैं जो विघ्न-बाधा पैदा करते हैं और मैं तुमसे कहता हूँ, “यदि तुम ऐसा करना जारी रखते हो और चाहे जो हो जाए पश्चात्ताप करने से इनकार करते हो, तो यह तुम्हारा सार है और तुम्हारे प्रति परमेश्वर का रवैया तुम्हें किनारे कर देने या ठुकराने का है,” तो क्या ये शब्द तुम पर प्रहार कर रहे हैं? नहीं। यद्यपि ये बातें एक निश्चित संदर्भ में कही जाती हैं और इस तरह से रखी जाती हैं, फिर भी जो पोषण और मदद मैं तुम्हें देता हूँ और तुमसे मेरी जो अपेक्षाएँ हैं, वे नहीं बदलतीं; तुम्हें अभी भी पश्चात्ताप करने का अवसर दिया जाता है। यदि तुम पछतावा महसूस करते हो, अपना मार्ग बदलते हो और खुद को परिवर्तित करते हो, तो परमेश्वर का घर तुम्हें अभी भी उस प्रकार के कर्तव्य के लिए आगे बढ़ाएगा जिसके लिए तुम उपयुक्त हो; मैं कभी इसके आड़े नहीं आऊँगा। पहली बार परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने और सत्य न समझने पर हर व्यक्ति कुछ गलतियाँ करता है, लेकिन कुछ लोग पश्चात्ताप करने में सक्षम होते हैं और उन्होंने कुछ अच्छी चीजें की होती हैं और कुछ अच्छे कर्म किए होते हैं। मान लो भाई-बहन यह कहते हुए उनकी सिफारिश करते हैं, “इस व्यक्ति ने वास्तव में पश्चात्ताप किया है और यह पहले जैसा नहीं रहा। पहले यह घमंडी और लंपट था, इसमें इंसानियत नहीं थी; इसने कुछ बुरे काम किए, जिससे कलीसिया के काम में विघ्न-बाधा पैदा हुई और परमेश्वर की भेंटों को नुकसान पहुँचा, इसलिए कलीसिया ने इसे बाहर निकाल दिया। लेकिन बाहर निकाले जाने के बाद इसे बहुत पछतावा हुआ और अब इसने पश्चात्ताप कर लिया है। यहाँ तक कि इसने नुकसान की भरपाई करने की भी पहल की, कलीसिया से खुद को फिर से स्वीकार करने के लिए कहा, वादा किया कि वह फिर कभी बुराई नहीं करेगा, और वह कलीसिया में सबसे छोटा बनने और परमेश्वर का घर उसे जो कुछ भी करने के लिए कहेगा, उसके प्रति समर्पण के लिए तैयार है।” जो लोग उनके अपेक्षाकृत करीब हैं, अगर वे उन्हें अच्छी तरह से समझने के बाद उनकी सिफारिश करना चाहते हैं, तो मैं कहता हूँ कि अगर उन्होंने वास्तव में पश्चात्ताप किया है और अब परमेश्वर के घर के काम के लिए उनकी आवश्यकता है, तो उनका फिर से उपयोग किया जा सकता है; मैं इसके आड़े नहीं आऊँगा। अगर कुछ व्यक्तियों ने ऐसे काम किए हैं जो व्यक्तिगत रूप से मेरे प्रति बहुत मैत्रीपूर्ण नहीं थे तो भी, अगर वे बढ़ावा दिए जाने की शर्तें पूरी करते हैं, तो मैं इसके भी आड़े नहीं आऊँगा; मैं उन्हें एक अवसर दूँगा। इसलिए, चाहे उपदेशों में हो या वास्तविक जीवन में और चाहे कोई भी परिवेश या संदर्भ हो, मैं तुम्हारे साथ निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से व्यवहार करूँगा। जिन संदर्भों में परिवेश अनुमति दे, मैं सद्भावना से तुम लोगों की मदद करूँगा या इस बारे में पूछूँगा कि तुम लोग अपने कर्तव्यों में कैसे हो। यदि यह किसी विशेष कार्य परिवेश में है, तो मैं भी तुम लोगों की मदद और समर्थन करने की पूरी कोशिश करूँगा, तुम लोगों को किसी पेशेवर काम में कोचिंग, मार्गदर्शन या मदद प्रदान करूँगा। कभी-कभी मैं जो कर रहा होता हूँ, वह तुम लोगों के साथ जानकारी और मतों का आदान-प्रदान करना और विचार-विनिमय करना होता है। भले ही मैं कभी-कभी कहूँ, “तुमने जो काम किया है वह स्वीकार्य नहीं है,” मैं बस सच कह रहा होता हूँ और स्पष्टवादी होता हूँ। मैं ऐसी बातें तुम लोगों को दबाने के लिए नहीं कह रहा होता, बल्कि तुम लोगों के साथ विचार-विनिमय और जानकारी और मतों का आदान-प्रदान करने के लिए कह रहा होता हूँ। मैं तुम लोगों को बोलने और लगन से काम करने के अवसर देने की पूरी कोशिश करता हूँ, ताकि तुम लोगों की काबिलियत, प्रतिभा, तुम लोगों ने जो ज्ञान सीखा है, तुम लोगों के पास जो सामान्य समझ है या तुम लोगों ने जो अनुभव संचित किया है, उसका पूरी तरह से उपयोग किया जा सके। यदि परिणाम अच्छे नहीं होते, तो मैं बस इतना कहता हूँ, “तुमने जो काम किया है, वह उतना बढ़िया नहीं है। विचार करो और अधिक खोजो और देखो कि क्या तुम इसे बेहतर कर सकते हो।” मैं तुम लोगों को हमेशा अधिकतम समर्थन, पोषण और मदद देता हूँ, ताकि जब तुम लोग मेरे साथ बातचीत करो और मिलो-जुलो, तब तुम लोग लाभान्वित हो सको, चाहे वह जीवन में हो या अपना कर्तव्य करने के दौरान। काम में मेरा यही सिद्धांत है और मेरे दैनिक जीवन में भी ऐसा ही है। कभी-कभी, जब मैं लोगों के साथ मिलता-जुलता और बातचीत करता हूँ, तब हम अनिवार्य रूप से दैनिक जीवन के कुछ छोटे-मोटे मामलों के बारे में बात करते हैं, जिसमें बुनियादी जरूरतों, स्वस्थ रहने, दवा आदि जैसी बाहरी चीजें शामिल होती हैं और कुछ लोग जीवन के छोटे-मोटे मामलों के संबंध में कुछ दृष्टिकोण, कहावतें या सामान्य समझ का उल्लेख करते हैं। सामान्य समझ के सभी पहलुओं के संबंध में मैं केवल अपने व्यक्तिगत दृष्टिकोण व्यक्त करता हूँ। यदि तुम्हें लगता है कि मैं जो कहता हूँ वह सही है, तो तुम उसे स्वीकार कर सकते हो; यदि तुम्हें लगता है कि मैं जो कहता हूँ वह गलत है, तो मैं तुम्हें दबाने के लिए अपनी पहचान और रुतबे का उपयोग नहीं करूँगा और तुमसे यह नहीं कहूँगा, “मैं जो कुछ भी कहता हूँ, वह सही है। चाहे मैं किसी भी लहजे का उपयोग करूँ या तुम्हें मेरा कहा पसंद आए या नहीं, क्या मैं तुम्हें नुकसान पहुँचा सकता हूँ या तुम्हारे साथ गलत कर सकता हूँ? तुम्हें इसे स्वीकार करना ही होगा!” मैं ऐसा नहीं करूँगा; मैं चीजों को उनके स्वाभाविक क्रम से चलने दूँगा। उदाहरण के लिए, तुम अपने खाने में बहुत अधिक नमक डालते हो, और मैं कहता हूँ कि बहुत अधिक नमक खाना स्वास्थ्य के लिए बुरा है। कुछ लोग इसे स्वीकार नहीं करते; उन्हें लगता है कि यदि वे कम नमक का उपयोग करेंगे, तो खाना फीका हो जाएगा और उसमें स्वाद नहीं रहेगा। वे अपने स्वाद के अनुसार खाने पर जोर देते हैं। मैं कहता हूँ कि तुम ऐसा करने के लिए स्वतंत्र हो और मैं हस्तक्षेप नहीं करूँगा। यद्यपि यह कहावत कि “बहुत अधिक नमक खाना स्वास्थ्य के लिए बुरा है” सत्य के स्तर तक नहीं पहुँचती, फिर भी यह जीवन की सामान्य समझ है। जहाँ तक इस भौतिक शरीर की बात है जिसे परमेश्वर ने लोगों के लिए सृजित किया है, इसे प्रतिदिन नमक की एक निश्चित मात्रा की आवश्यकता होती है; इस मात्रा से अधिक होने पर व्यक्ति के शरीर को नुकसान पहुँचेगा और इसके परिणाम भुगतने होंगे। ऐसे लोग भी हैं, जिन्हें हमेशा लगता है कि उनमें पोषक तत्त्वों की कमी है, इसलिए वे लगातार पौष्टिक खाना खाते हैं। अंत में, उनके द्वारा पोषक तत्त्वों के अत्यधिक सेवन से स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ पैदा हो जाती हैं और उन्हें समायोजन करने पड़ते हैं। परमेश्वर द्वारा बनाए गए इस भौतिक शरीर को कितने पोषक तत्त्वों की आवश्यकता है, इसका संबंध उन अनाजों, सब्जियों, फलों और मांस के अनुपातों से है जिन्हें परमेश्वर ने मानवजाति के लिए सृजित किया है। यदि तुम इन अनुपातों के अनुसार खाते हो, तो तुम बुनियादी स्वास्थ्य बनाए रख सकते हो; यदि तुम इन अनुपातों की अनदेखी करते हो और अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार लापरवाही और अंधाधुंध तरीके से खाते हो, तो तुम्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो जाएँगी। मैं तुम्हें ये तथ्य बताता हूँ, लेकिन तुम इन्हें स्वीकार नहीं करते। तुम सोचते हो, “उपदेश देना और सत्य पर संगति करना तुम्हारी विशिष्टता है, लेकिन तुम दैनिक जीवन के इन मामलों को नहीं समझते। मुझे तुम्हारी बात सुनने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि इसमें सत्य शामिल नहीं है।” मैं कहता हूँ कि तुम इसे स्वीकार न करने का चुनाव कर सकते हो और अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार जी सकते हो, लेकिन तुम्हें यह जानना चाहिए कि यदि तुम मेरे वचन स्वीकार नहीं कर सकते, तो देर-सबेर तुम्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो जाएँगी। तुम अपने चुनाव की कीमत चुकाओगे। मैं केवल अपने दृष्टिकोण व्यक्त कर रहा हूँ; मैं तुम्हें दबाने के लिए अपने रुतबे का उपयोग नहीं करूँगा। दूसरी बात, यदि तुम मेरे दृष्टिकोण स्वीकार नहीं करते, तो मैं तुम्हारे साथ जबरदस्ती नहीं करूँगा, न ही मैं यह कहूँगा कि सकारात्मक चीजें स्वीकार न करने के कारण तुम बहुत मूर्ख और जिद्दी हो। वास्तव में, तुम हो तो सचमुच वैसे ही, लेकिन मैं ऐसा कभी कहता नहीं। मैं दैनिक जीवन की किसी छोटी-मोटी बात का बतंगड़ नहीं बनाऊँगा और फिर तुम्हें भाषण नहीं पिलाऊँगा या सिद्धांत नहीं बघारूँगा। मैं ऐसा नहीं करूँगा, क्योंकि यह मेरी जिम्मेदारी नहीं है। मैं ऐसा करना भी नहीं चाहता। मैंने संगति करके और उपदेश देकर अपनी जिम्मेदारी पहले ही पूरी कर दी है; यह मेरी सेवकाई के दायरे में आता है। जहाँ तक इस बात का संबंध है कि तुम रोज क्या खाते हो, उसे तुम खुद सँभालो। परमेश्वर ने मानवजाति के लिए क्या बनाया है और कितनी मात्रा में, और हर मौसम में कौन-से खाद्य पदार्थ और विशेष चीजें पैदा होती हैं—तुम इन सब चीजों का उपयोग कैसे करते हो, यह तुम्हारा अपना मामला है; तुम उन्हें खुद आवंटित कर सकते हो। यदि तुम्हारी मानवता का जमीर और विवेक सामान्य और सही हैं, तो तुम उनका उपयोग और आवंटन संयम से करोगे। यदि तुम्हारा विवेक सही नहीं है, तो तुम उनका उपयोग या आवंटन अत्यधिक मात्रा में करोगे और अंततः तुम्हारे भौतिक शरीर पर इसके जो भी परिणाम होंगे, उन्हें केवल तुम ही भुगतोगे। इसलिए, जब इस मामले की बात आती है तो मैं बहुत तर्कसंगत होता हूँ; मैं तुम्हें केवल अपने दृष्टिकोण बताता हूँ और मैं तुम्हें उन्हें स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करूँगा। कभी-कभी, जब मैं देखता हूँ कि तुम लोगों में रहन-सहन की कुछ खराब आदतें हैं, तो मैं तुम लोगों को उन्हें बदलने के लिए मजबूर भी नहीं करूँगा; मैं बस एक साधारण-सी याद दिलाऊँगा। यदि तुम लोग इसे स्वीकार नहीं करते या नहीं बदलते, तो मैं और कुछ नहीं कहूँगा। रहन-सहन की आदतें सुधारना वास्तव में बहुत आसान है। रहन-सहन की जो आदतें गलत या अवांछनीय हैं, उन्हें सुधारा जाना चाहिए; यह सकारात्मक चीजें स्वीकार करने का रवैया है। सकारात्मक चीजें स्वीकार करने का रवैया और इच्छा होना उस बुनियादी तर्कसंगतता का हिस्सा है, जो सामान्य मानवता के भीतर मौजूद होनी चाहिए। कुछ लोग सकारात्मक चीजों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से निकाल देते हैं। वे उन्हें गंभीरता से नहीं लेते और यहाँ तक कि वे अभ्यास के अपने गलत तरीकों और काम करने के गलत तरीकों पर अड़े रहते हैं। कुछ लोग तो यह तक कहते हैं, “मैं इतने वर्षों से ऐसे ही जी रहा हूँ और इसके कोई दुष्परिणाम नहीं हुए हैं।” यह स्वभाव की समस्या है। यह किस प्रकार का स्वभाव है? यह जिद्दीपन और हठधर्मिता का और सही दृष्टिकोण या सकारात्मक चीजें स्वीकार न करने का स्वभाव है। मैं तुम्हें बता रहा हूँ, यह भ्रष्ट स्वभाव का सूचक है और तुम्हें इसे बदलना और उतार फेंकना चाहिए। अभ्यास के तुम्हारे गलत तरीकों और तुम्हारे उस हठधर्मी रवैये को बदलना होगा; केवल तभी तुममें सच्चा बदलाव आ सकता है।
कुछ लोगों को दूसरों पर प्रहार करना पसंद होता है; यह अच्छा नहीं है। यदि मैं तुम लोगों को कुछ गलत करते हुए देखता हूँ, तो मैं तर्कसंगत रूप से अपने दृष्टिकोण व्यक्त करूँगा और सद्भावना से तुम लोगों को याद दिलाऊँगा। यह मेरे काम करने का तरीका है। इसके अतिरिक्त, यदि कुछ समस्याओं के लिए तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करने की आवश्यकता होती है, तो मैं उन्हें बिना किसी लिहाज के उजागर करूँगा; यह लोगों के प्रति जिम्मेदार होना है। जब मैं लोगों की समस्याएँ उजागर करता हूँ, तो मैं समस्याओं का सार उजागर करता हूँ और दिखाता हूँ कि वे वास्तव में कैसी हैं; मैं विनियम लागू नहीं करता या बात का बतंगड़ नहीं बनाता। मैं ऐसा इसलिए करता हूँ क्योंकि यह मेरे काम के दायरे में आता है, मैं वह उजागर करता हूँ जिसे उजागर किया जाना चाहिए, और जो कहा जाना चाहिए उससे मैं एक शब्द भी कम नहीं कहता। इसलिए, मेरे काम करने के सिद्धांत हैं। एक लिहाज से, दैनिक जीवन में, मैं इन मामलों को तर्कसंगतता के सिद्धांत के आधार पर लेता हूँ और तुम्हें बताता हूँ कि मेरे दृष्टिकोण क्या हैं। यदि तुम ध्यान देते हो, इसे गंभीरता से लेते हो और तुममें सामान्य मानवता की तर्कसंगतता है, तो तुम ये विचार और दृष्टिकोण स्वीकार करोगे या इन्हें सही ढंग से लोगे और इसके बारे में मुझे उपदेश देने की आवश्यकता नहीं होगी। दूसरे लिहाज से, काम में, मैं तुम लोगों की समस्याओं से बचूँगा नहीं, न ही मैं तुम लोगों को शर्मिंदा करने के डर से बोलने से पीछे हटूँगा। मैं तुम लोगों की समस्याएँ और तुम लोगों के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करूँगा, ताकि तुम लोग इस संबंध में समस्याएँ जान सको और अपने भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंको। मेरा उद्देश्य तुम लोगों को उस मार्ग पर चलने में सक्षम बनाना है जो सही है। चाहे तुम्हें जीवन में कोई समस्या हो या काम में, यदि इसमें भ्रष्ट स्वभाव या सत्य शामिल है, तो मैं समस्या से बचूँगा नहीं; मैं तुम लोगों के साथ इस पर स्पष्ट रूप से संगति करूँगा। मैं चाहे जैसे भी संगति करूँ या चाहे जैसे भी किसी समस्या से निपटूँ, मेरे अपने तरीके और सिद्धांत हैं। जब मेरा अपनी जिम्मेदारी पूरी करने का समय आता है, तो मैं ऐसा करने का दायित्व बिना किसी के कहे खुद ले लेता हूँ। मैं तुम लोगों को शर्मिंदा करने से नहीं डरता; मैं तुम लोगों की समस्याएँ और भ्रष्ट स्वभाव उजागर करूँगा, ताकि तुम लोग उन्हें जान सको। यह मेरी जिम्मेदारी है। यदि तुम लोगों की समस्याओं में भ्रष्ट स्वभाव या सत्य सिद्धांत शामिल नहीं हैं, तो तुम लोगों को अपनी इच्छा के अनुसार चुनाव और अभ्यास करने की स्वतंत्रता और अधिकार है; मैं हस्तक्षेप नहीं करूँगा। इसलिए, चाहे मैं तुम लोगों की समस्याएँ उजागर करूँ या नहीं, इसमें तुम लोगों पर प्रहार करना, तुम लोगों को बाधित करना या तुम लोगों को दबाना शामिल नहीं है। दैनिक जीवन में, उन मामलों के लिए जिनमें सिद्धांत शामिल नहीं हैं, जैसे कि बुनियादी जरूरतें, मैं तुम लोगों को अपने लिए चुनाव करने की पर्याप्त स्वतंत्रता देता हूँ। लेकिन यदि इसमें सिद्धांत का कोई मामला शामिल है—अर्थात, यदि इसमें भ्रष्ट स्वभाव शामिल हैं या काम करने, अपना कर्तव्य करने, परमेश्वर या सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया शामिल है—तो मेरा इस पर संगति करना जरूरी है। देखो, मैं चाहे कोई काम कैसे भी करूँ, मैं उस पर विचार करता हूँ, है ना? मेरे सिद्धांत हैं। जिस चीज में सत्य, परमेश्वर या सत्य के प्रति तुम लोगों का रवैया या कलीसिया के काम और अपना कर्तव्य करने के प्रति तुम लोगों का रवैया शामिल नहीं होता, मैं उसमें हस्तक्षेप नहीं करता; मैं अपने काम से काम रखता हूँ। विशेष रूप से जब व्यक्तिगत चुनाव और व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के मामलों की बात आती है, तब मैं कभी हस्तक्षेप नहीं करता। उदाहरण के लिए, कुछ बहनें अपने बाल लंबे रखना, उनकी चोटी बनाना या उनका जूड़ा बनाना पसंद करती हैं और कुछ भाई अपने बाल छोटे रखना या सिर मुँड़वाना पसंद करते हैं; तुम लोगों को ऐसा करने की स्वतंत्रता है और मैं कभी हस्तक्षेप नहीं करता। कुछ भाई-बहन खाने में नखरे करते हैं और विशेष रूप से किसी खास तरह का खाना पसंद करते हैं या उनकी जीवन-शैली की कोई ऐसी आदत होती है जो अच्छी नहीं होती; मैं इन चीजों में भी कभी हस्तक्षेप नहीं करता। यदि जीवन-शैली की यह खराब आदत उनके स्वास्थ्य, उनके कर्तव्य करने या कलीसिया के काम को प्रभावित करती है, तो मेरा उन्हें याद दिलाना और उनकी मदद करना या भाई-बहनों से उनकी मदद करवाना जरूरी है। हालाँकि, कुछ लोग भाई-बहनों का उनकी मदद करना स्वीकार नहीं करते, वे यह तक कहते हैं कि वे बाधित और दबावग्रस्त महसूस करते हैं; अंत में, वे किसी को बताए बिना चुपचाप कलीसिया छोड़ देते हैं और सभी भाई-बहन निराश महसूस करते हैं। मैं कहता हूँ, “तुम्हारा निराश महसूस करना गलत है। हम लोगों की स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करते। यदि वे जाना चाहते हैं, तो जाने दो; यह उनका चुनाव है। मैं बिल्कुल भी निराश महसूस नहीं करता।” मैं निराश महसूस क्यों नहीं करता? क्योंकि मुझे लगता है कि उनकी मदद करना मेरा दायित्व है, ऐसी चीज जो मुझे अपनी मानवता में करनी चाहिए। मैं उन्हें जो मदद प्रदान करता हूँ, वह कोई एहसान या खैरात नहीं होती; बात बस इतनी है कि उनकी स्थिति के बारे में सुनकर मैं तुम लोगों को उनकी मदद करने का काम सौंपने के लिए बाध्य होता हूँ। वे कलीसिया में पूर्णकालिक रूप से अपना कर्तव्य कर रहे हैं। यदि उनकी जीवनशैली की खराब आदत उनका स्वास्थ्य प्रभावित करती है और उन्हें स्वास्थ्य संबंधी समस्याएँ हो जाती हैं, तो क्या भाई-बहनों को प्रेमवश उनकी मदद नहीं करनी चाहिए? यह इंसानों के लिए बुनियादी सामाजिक नैतिकता है। लेकिन यदि वे इस प्रकार की मदद स्वीकार नहीं करते और अपने दिलों में अरुचि या दबाव महसूस करते हैं, तो हम उनके साथ जबरदस्ती नहीं करेंगे और हम उनकी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं करेंगे। तो उनके कलीसिया छोड़कर जाने पर कुछ लोग निराश महसूस क्यों करते हैं? तुम निराश इसलिए महसूस करते हो, क्योंकि तुम्हें लगता है कि उनके प्रति अपनी जिम्मेदारी और दायित्व पूरा करना उन पर एक प्रकार का एहसान है। उन्होंने इसकी कद्र नहीं की, यह एहसान स्वीकार नहीं किया और वैसा नहीं किया जैसा तुम चाहते थे, जिससे तुम्हारी भावनाओं और तुम्हारे गौरव को ठेस पहुँची। जैसी कि कहावत है, उन्होंने तुम्हारी मदद बेरुखी से ठुकरा दी, इसलिए तुम निराश महसूस करते हो। मैं बिल्कुल भी निराश महसूस नहीं करता। इसे समझने का मेरा तरीका तुम लोगों के तरीके से अलग है। मैं कहता हूँ कि मुझे इस मामले से सबक सीखना चाहिए और भविष्य में दोबारा इस तरह की मूर्खतापूर्ण चीज नहीं करनी चाहिए। हर व्यक्ति की अपनी आकांक्षाएँ होती हैं। तुम लोगों को अपने नियंत्रण में रखकर उनसे यह उम्मीद नहीं कर सकते कि वे खुश रहें और तुम्हारी तारीफ करें, है ना? यह बिल्कुल हास्यास्पद होगा। तुम्हें लोगों को स्वतंत्रता देनी चाहिए और उन्हें स्वतंत्र रूप से चुनने देना चाहिए। यदि उन्हें लगता है कि तुम जो कहते हो वह सही है, तो वे इसे स्वीकार करने और इन वचनों के अनुसार अभ्यास करने का चुनाव कर सकते हैं; यदि उन्हें लगता है कि तुम जो कहते हो वह गलत है, तो वे इसे स्वीकार न करने का चुनाव भी कर सकते हैं। उन्हें चुनाव करने का अधिकार है। तुम्हें उन्हें अपनी सद्भावना स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं करना चाहिए। वे इसे स्वीकार करते हैं या नहीं, यह रवैये का मामला है; उन्हें ऐसा करने की स्वतंत्रता है। तुम अधिक से अधिक उन समस्याओं पर संगति कर सकते हो जो उन जैसे लोगों में होती हैं, और तुम उन सबकों पर संगति कर सकते हो जो तुमने ऐसे व्यक्ति से सीखे हैं और उन समस्याओं के सार पर संगति कर सकते हो जो तुमने उनमें देखी हैं, जिससे तुम्हें यह सीखने में मदद मिलती है कि लोगों का भेद कैसे पहचाना जाए, लोगों को कैसे देखा जाए और परमेश्वर के वचनों के सिद्धांतों के अनुसार ऐसे लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, और अब मूर्खतापूर्ण चीजें न की जाएँ। तब तुम लोग कहाँ गलत हो जाते हो? तुम चाहे जिसकी भी मदद करो, तुम भावनाओं के आधार पर कार्य करते हो और यह तक सोचते हो, “देखो, मुझमें कितना प्रेम है और मैं कितना प्रेमपूर्ण हूँ।” यह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना नहीं है, बल्कि लोगों के साथ अपनी इच्छा और प्राथमिकताओं के आधार पर व्यवहार करना है; यह भावनाओं के आधार पर कार्य करना है। मैं चाहे जिससे भी बात या व्यवहार करूँ, मैं सिद्धांतों के आधार पर बोलता और कार्य करता हूँ; इसमें भावनाएँ नहीं आतीं। बोलने और कार्य करने में मैं पूरी तरह से जमीर और सद्भावना से कार्य करता हूँ और यही वह नजरिया है जो मुझे हर व्यक्ति के साथ अपनाना चाहिए। विशेष रूप से, उन भाई-बहनों के साथ जो सामान्य रूप से अपना कर्तव्य कर रहे हैं, मुझे ठीक इसी तरह से करना चाहिए। यह मेरा दायित्व और जिम्मेदारी है। अगर मैं यह जिम्मेदारी पूरी करता हूँ, तो यह पर्याप्त है। वे स्वीकार करने का चुनाव कर सकते हैं या वे इनकार करने का चुनाव कर सकते हैं; मैं लोगों के साथ जबरदस्ती नहीं करता। यदि वे स्वीकार करते हैं, तो मैं खुश होता हूँ; यदि वे नहीं करते, तो मैं दुखी नहीं होता। मैं बस सिद्धांतों के अनुसार वे कुछ चीजें कर रहा था जो मुझे करनी चाहिए; मैं केवल अपनी जिम्मेदारी पूरी कर रहा था। क्या तुम समझे? (हाँ।)
चाहे कोई भी परिवेश हो, लोगों के साथ मिलते-जुलते समय मैं सभी प्रकार के लोगों और सभी प्रकार की चीजों के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार कर सकता हूँ। अगर जीवन में मैं लोगों को कुछ मदद प्रदान करता भी हूँ या लोगों का आत्मिक उन्नयन करने वाली कुछ बातें कहता भी हूँ तो यह भी सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने का एक हिस्सा है; यह भावनाओं के वशीभूत होकर कार्य करना नहीं है। जहाँ तक सत्य पर संगति करने की बात है, जैसे कि लोगों का प्रकृति सार उजागर करना, लोगों के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करना और विशिष्ट मामलों में लोगों की भ्रष्टता के विभिन्न प्रकाशन और भ्रष्ट दशाएँ उजागर करना, साथ ही विभिन्न समस्याओं का सार उजागर करना, तो उसमें भी मैं सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता हूँ; मैं भावनाओं के वशीभूत होकर कार्य नहीं करता, न ही मैं मानवीय इच्छा से कार्य करता हूँ। जब लोग काम करते हैं, तो वे हमेशा इस आधार पर कि वे किसके साथ व्यवहार कर रहे हैं और अपनी मनोदशा और प्राथमिकताओं के आधार पर कार्य करते हैं। वे उन लोगों पर कुछ कृपा दिखाते हैं, जिन्हें वे पसंद करते हैं और जिनके साथ उनकी बनती है, और इन लोगों को कुछ लाभ देते हैं, जबकि वे उन लोगों पर प्रहार करते हैं और उन्हें बहिष्कृत कर देते हैं, जिन्हें वे नापसंद करते हैं और जिनके साथ उनकी नहीं बनती; वे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं कर सकते। वे या तो भावनाओं के आधार पर कार्य करते हैं या बुरे कर्म करते हैं; संक्षेप में, वे सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं करते। जब मैं कलीसिया में भाई-बहनों के साथ जुड़ता हूँ, चाहे वे कोई भी हों, मैं उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार कर सकता हूँ। इसी तरह, गैर-विश्वासियों के साथ मिलते-जुलते और व्यवहार करते समय भी मेरे सिद्धांत और सीमाएँ होती हैं। भले ही वे कुछ विरोध के शब्द कहें, या ऐसे शब्द जो असभ्य, अशिष्ट या अपमानजनक हों, मैं जैसे को तैसा जवाब नहीं दूँगा। यदि मुझे काम करवाने के लिए उनके साथ मिलना-जुलना पड़े, तो मैं उनके साथ मिल-जुल लूँगा; यदि मुझे काम करवाने की आवश्यकता न हुई, तो मैं उनसे बचने और उन्हें अस्वीकार करने का चुनाव करूँगा। यदि कोई व्यक्ति घटिया चरित्र का है और हमेशा दूसरों का फायदा उठाना और लाभ माँगना चाहता है, और मेरे मदद करने पर भी वह इसे सही तरीके से नहीं ले सकता या बदल नहीं सकता—जिसका अर्थ है कि उसकी मानवता खराब है—तो मैं बस उससे दूर रहता हूँ। संक्षेप में, चाहे मैं भाई-बहनों के साथ मिल-जुल रहा होऊँ या गैर-विश्वासियों के साथ, मैं सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर सकता हूँ; कम से कम, मैं मानवता के जमीर और विवेक की सीमाओं के अनुसार लोगों से मिलता-जुलता हूँ। क्या तुम लोग ऐसा कर सकते हो? (नहीं।) भ्रष्ट इंसान चाहे जिसके भी साथ मिले-जुलें, वे हमेशा अपने हितों की रक्षा करते हैं या लोगों के साथ बिना सिद्धांतों के, भावनाओं और प्राथमिकताओं के आधार पर व्यवहार करते हैं। यदि कोई ऐसा भाई या बहन है, जिसके बारे में उन्हें लगता है कि उसके साथ उनकी बनती है और उनके अच्छे संबंध हैं, तो वे उनकी मदद कर सकते हैं, उन्हें प्रेम दिखा सकते हैं, उन्हें चीजें दे सकते हैं और उनके साथ निकट संपर्क रख सकते हैं। लेकिन यदि यह व्यक्ति ऐसा कुछ करता है जिससे उनकी भावनाओं को ठेस पहुँचती है, तो वे कहते हैं, “मैं इससे फिर कभी नहीं मिलूँगा और मैं इसके साथ फिर कभी मेल-जोल नहीं करूँगा। मुझे वास्तव में इसका पछतावा है! मैं पहले इसके साथ बहुत अच्छा था और मैंने इसकी बहुत मदद की, फिर भी यह मेरे साथ ऐसा व्यवहार करता है। यह कमबख्त एक एहसान-फरामोश, एक कृतघ्न व्यक्ति है!” वे लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के लिए सिद्धांतों के अनुसार कार्य नहीं कर सकते। जब वे किसी के साथ अच्छे होते हैं, तो वे भावनाओं के कारण ऐसा करते हैं, और यदि वे किसी के साथ बुरे होते हैं, तो यह उनकी व्यक्तिगत पसंद के कारण होता है; वे जो कुछ भी करते हैं, वह केवल अपनी भावनाएँ संतुष्ट करने के लिए करते हैं। इसलिए, यदि वे किसी की मदद करते हैं और उसे लाभ पहुँचाते हैं, लेकिन वह व्यक्ति न केवल कृतघ्न होता है बल्कि उनकी भावनाओं को ठेस भी पहुँचाता है, तो वे बहुत दुखी और आहत होंगे और यह महसूस करते हुए शिकायत करेंगे कि उनके प्रयास मिट्टी में मिल गए हैं। वे इसे स्वीकार करने के अनिच्छुक होंगे और फिर कभी ऐसा नहीं करेंगे। मुझे बताओ, यदि मुझे इस प्रकार की स्थिति का सामना करना पड़े, तो मैं इससे कैसे निपटूँगा? पहले, तुम इस मामले का मूल्यांकन लोगों द्वारा एक-दूसरे पर एहसान करने के परिप्रेक्ष्य से नहीं कर सकते; तुम ऐसी स्थिति का आकलन भावनाओं के आधार पर नहीं कर सकते। तुम्हें ऐसे लोगों का भेद परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के आधार पर पहचानना चाहिए; तुम्हें उनकी मानवता और उस मार्ग का, जिस पर वे चलते हैं, साथ ही परमेश्वर के प्रति, सत्य के प्रति, और अपने कर्तव्य के प्रति उनके रवैये का भी भेद पहचानना चाहिए, न कि भावनाओं के आधार पर उनका भेद पहचानना और उन्हें देखना चाहिए। किसी को इस तरह से देखना बहुत अधिक सटीक है। यह किसी व्यक्ति या मामले का मूल्यांकन भावनाओं या तुम्हारे व्यक्तिगत लाभ और हानि के आधार पर करना नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचनों और सत्य सिद्धांतों के आधार पर उनका मूल्यांकन करना है। किसी व्यक्ति या मामले को इस तरह से देखना सटीक और सिद्धांतों के अनुसार है। जब तुम लोगों और चीजों को इस तरह से देखते हो, तो तुम इसलिए दुखी और आहत नहीं होगे कि जिस किसी की तुमने कभी मदद की थी वह कृतघ्न है, न ही तुम किसी के प्रति इसलिए बहुत ज्यादा आभार महसूस करोगे कि तुमने कभी उनसे कोई एहसान लिया था; इसके बजाय, तुम सिद्धांतों के अनुसार उनके साथ सही ढंग से व्यवहार करने में सक्षम होगे। एक आम कहावत है : “एक बूँद पानी की दया का बदला झरने से चुकाना चाहिए।” आम लोग अभी भी परंपरागत संस्कृति के ऐसे विचारों और दृष्टिकोणों के तर्क के भीतर जीते हैं। वे चीजों या लोगों को परमेश्वर के वचनों या सत्य के आधार पर नहीं देखते हैं, न ही वे लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करते हैं। वे मानते हैं कि, जब यह बात आती है कि तुम लोगों के साथ कैसा व्यवहार करते हो, तब उन्हें धोखा न देने, उन्हें नुकसान न पहुँचाने, उनके साथ मार-पीट न करने, उनके साथ गाली-गलौज न करने या उनके साथ बुरे काम न करने के अलावा तुम्हें उनके साथ अच्छा भी होना चाहिए। विशेष रूप से, यदि किसी ने तुम पर कोई एहसान किया है, तो तुम्हें उसे दोगुना करके चुकाना चाहिए; अन्यथा, तुम कृतघ्न हो। क्या इन तरीकों से लोगों के साथ व्यवहार करना लोगों के साथ अच्छा होना माना जाता है? (नहीं।) फिर वास्तव में लोगों के साथ अच्छा होना क्या है? यह मानवीय भावनाओं के कारण किसी से प्रेम करना, उसकी परवाह करना और उसकी देखभाल करना नहीं है, बल्कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार सिद्धांतों के आधार पर कार्य करना है। अधिकांश लोग सिद्धांतों के आधार पर कार्य नहीं कर सकते; लोग केवल भावनाओं के आधार पर कार्य करते हैं, सिद्धांतों के आधार पर नहीं। भावनाओं के आधार पर कार्य करना और सिद्धांतों के आधार पर कार्य करना बहुत अलग हैं; वे दो अलग-अलग मार्ग हैं। भावनाओं के आधार पर कार्य करने में मानवीय इच्छा की मिलावट होती है—जब तुम किसी की मदद करते हो, तो यह तुम्हारी व्यक्तिगत भावनाओं की जरूरतें पूरी करने के लिए होता है; यह मामले निष्पक्ष रूप से सँभालना नहीं है। यदि यह व्यक्ति तुम्हारे प्रति अत्यधिक आभार महसूस करता है, तो तुम उसके साथ अच्छे बने रहोगे; यदि वह इसकी कद्र नहीं करता और तुम्हारे दिल को चोट और तुम्हारी भावनाओं को ठेस पहुँचाता है, तो तुम अब उसकी मदद नहीं करोगे। तो क्या तुम बिना सिद्धांतों के कार्य नहीं कर रहे? (हाँ।) यह बिना सिद्धांतों के कार्य करना है। फिर सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना क्या है? यह एक व्यक्ति के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी करना, आवश्यकतानुसार दूसरों की मदद करना और उन्हें इसे जैसे वे चाहें वैसे लेने देना है। यदि वे तुम्हारी मदद स्वीकार करने के लिए तैयार हैं, तो यह बहुत अच्छा है; यदि वे उसे स्वीकार करने के अनिच्छुक हैं, तो तुम्हें यह नहीं कहना चाहिए कि वे धन्य नहीं हैं, न ही तुम्हें परेशान, दुखी या निराश महसूस करना चाहिए, बल्कि अभी भी उनके साथ सही ढंग से व्यवहार करना चाहिए। यह सिद्धांतों के अनुसार कार्य करना है। क्या तुम लोग “दूसरों पर प्रहार न करने” का यह सिद्धांत समझ गए हो? (हाँ।)
लोगों के बीच रहते हुए और उनके साथ मेलजोल और संवाद करते हुए, परमेश्वर के देहधारी देह के सिद्धांतों में से एक है उन पर हमला न करना। दूसरों पर हमला न करने में लोगों के साथ व्यवहार करने और सत्य पर संगति करने के सिद्धांत शामिल हैं। दूसरों पर हमला न करने के अलावा, देहधारी परमेश्वर का लोगों के साथ व्यवहार करने का एक और सिद्धांत है, जो कि बदला न लेना है। लोग बदला लेने के मामले को कैसे देखते हैं? यदि किसी को धौंस दी जाती है या चोट पहुँचाई जाती है और फिर वह न्यायसंगत रूप से पलटवार करता है या वापस लड़ता है, तो क्या लोग इसे स्वीकार्य मानते हैं? (हाँ।) लेकिन परमेश्वर के मामले में, क्या यह लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, इसका कोई सिद्धांत है? (नहीं।) मानवजाति के बीच, कोई भी बदला ले सकता है और हर व्यक्ति ऐसा करने में सक्षम है; हर व्यक्ति में बदला लेने की प्रवृत्ति और साथ ही बदला लेने का इरादा और इच्छा होती है। यदि किसी ने तुम्हारा मौखिक रूप से अपमान किया है या तुम्हें चोट पहुँचाई है, तो भले ही तुम अभी बदला न ले सको, फिर भी तुम ऐसा करने का मौका ढूँढ़ोगे, ताकि तुम उन्हें यह बता सको कि तुममें गरिमा है, कि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जिसे धौंस दी जा सके या जिसके साथ खिलवाड़ किया जा सके, कि तुम मूर्ख नहीं हो, और यह कि तुममें सामान्य मानवता का विवेक है, और तुम चीजों को समझ सकते हो और निर्णय ले सकते हो। तो फिर लोगों से बदला लेने के ये विचार कैसे आते हैं? क्या ये सामान्य मानवता के जमीर और विवेक से आते हैं या शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के उतावलेपन से? (शैतानी भ्रष्ट स्वभावों के उतावलेपन से।) यह स्पष्ट है। यदि दूसरों द्वारा किसी को धौंस दी जाती है, उसका फायदा उठाया जाता है या उसे धोखा दिया जाता है, तो जब उसके पास कोई रुतबा नहीं होता, तब उसके पास बदला लेने का अवसर नहीं होगा और उसकी स्थितियाँ इसकी अनुमति नहीं देंगी, इसलिए वह इन सभी चीजों को अपने दिल में दफना देगा, जहाँ वे एक तरह की नफरत में बदल जाती हैं। इस नफरत के कारण, और चूँकि उन्हें यह अनुचित व्यवहार मिला, इसलिए वे समाज के प्रति, मानवजाति के प्रति और हर उस व्यक्ति के प्रति शत्रुतापूर्ण हो सकते हैं जिसे वे दुश्मन मानते हैं। जब किसी भी व्यक्ति के पास रुतबा होता है, जब स्थितियाँ अनुमति देती हैं और उसके पास ऐसा करने का अवसर होता है, तो वह बदला लेने के कार्य करने में सक्षम होता है, जिससे वे लोग जिन्होंने कभी उसे चोट पहुँचाई थी या उसका तिरस्कार किया था, उसका प्रतिशोध भुगतते हैं और अपने किए का फल पाते हैं। उन्हें लगता है कि इस तरह से जीने का मतलब है कि उनमें चरित्र-बल है और अंततः उन्होंने इस वैमनस्य का बोझ उतार दिया है। मानवजाति के बीच, जो कोई ऐसा करता है, उसकी समाज या उसके जमीर द्वारा निंदा नहीं की जाएगी। इसलिए, लोगों का मानना है कि बदला लेना कोई अनुचित, शर्मनाक बात नहीं है, न ही वे इसे कोई सकारात्मक या नकारात्मक चीज मानते हैं। लेकिन अनुग्रह के युग से लेकर कार्य के इस चरण तक, तुम परमेश्वर द्वारा बोले गए सारे वचनों में एक भी ऐसा वाक्य नहीं पा सकते, जो लोगों को दूसरों से बदला लेने के लिए कहता हो। परमेश्वर ने कभी लोगों से यह नहीं कहा है, “अगर कोई तुम्हें चोट पहुँचाता है या अगर किसी ने तुम्हें धोखा दिया है, तो तुम्हें बदला लेना ही चाहिए, तुम्हें उन्हें जैसे को तैसा जवाब देना चाहिए, दाँत के बदले दाँत, आँख के बदले आँख।” क्या बदला लेना लोगों के साथ व्यवहार करने के उन सिद्धांतों में से एक है, जो परमेश्वर ने तुम्हें बताए हैं? (नहीं।) अनुग्रह के युग में परमेश्वर ने लोगों को क्या बताया था कि दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करना चाहिए? धैर्य, सहनशीलता और प्रेम के साथ। और कुछ? (अपने दुश्मनों से प्रेम करो और यदि कोई तुम्हारे बाएँ गाल पर मारता है तो अपना दायाँ गाल उसकी ओर कर दो।) और कुछ? दूसरों को सात गुणा सत्तर बार क्षमा करो। “सात गुणा सत्तर” की संख्या केवल प्रातिनिधिक है; इसका अर्थ वास्तव में उतनी बार नहीं है। परमेश्वर ऐसा इसलिए कहता है, ताकि तुम उन सभी को क्षमा कर दो जिन्होंने तुम्हारे साथ कुछ गलत किया है, उन्हें अनंत बार क्षमा कर दो; यह एक सिद्धांत है। धैर्य, सहनशीलता, विनम्रता, अपने दुश्मनों से प्रेम करना, बाएँ गाल पर मारे जाने पर दायाँ गाल आगे कर देना और दूसरों को सात गुणा सत्तर बार क्षमा करना—ये वे चीजें हैं जिनके बारे में अनुग्रह के युग में अक्सर बोला जाता था। तो क्या लोगों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत इन वचनों से निकाले जा सकते हैं? वे कौन-से सिद्धांत हैं, जिनका परमेश्वर लोगों से दूसरों के साथ व्यवहार करने में पालन करने की अपेक्षा करता है? क्या उनमें आँख के बदले आँख, दाँत के बदले दाँत शामिल है? (नहीं।) क्या उनमें जैसे को तैसा करना शामिल है? (नहीं।) क्या उनमें बदला लेना शामिल है? (नहीं।) इनमें से कोई भी शामिल नहीं है। यद्यपि अनुग्रह के युग में परमेश्वर द्वारा कही गई इन चीजों में से प्रत्येक एक विशिष्ट प्रकार का व्यवहार और अभ्यास है, फिर भी वे सब दूसरों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत हैं जो परमेश्वर लोगों को बताता है। तो, अंत के दिनों में कार्य के इस चरण में परमेश्वर लोगों को दूसरों के साथ व्यवहार करने के बारे में क्या बताता है? लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना, उनकी खूबियों और गुणों को देखना, न कि उनकी कमियों और कमजोरियों को। विशेष रूप से और क्या है? दूसरों को धोखा न देना, उनसे बहस न करना, या उन पर हमला न करना और दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना। क्या ये सब लोगों के साथ व्यवहार करने के विशिष्ट सिद्धांत हैं? (हाँ।) चाहे कोई भी युग हो, दूसरों के साथ व्यवहार करने के लिए परमेश्वर द्वारा दिए गए विशिष्ट सिद्धांतों में से एक भी लोगों को बदला लेने के लिए नहीं कहता। एक भी सिद्धांत यह नहीं कहता, “यदि कोई तुम्हें चोट पहुँचाता है, तो उसे चोट पहुँचाओ; यदि कोई तुम्हें मारता है, तो तुम्हें उसे वापस मारना चाहिए; यदि वे तुम्हें मुक्का मारते हैं, तो उन्हें वापस मुक्का मारो; यदि वे तुम्हें कोसते हैं, तो उन्हें वापस कोसो।” परमेश्वर ने कभी ऐसा एक भी शब्द नहीं कहा है। परमेश्वर तुमसे दूसरों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करने और लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के लिए कहता है। दूसरा व्यक्ति कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जिसे तुम तुच्छ समझते हो, कोई ऐसा व्यक्ति जिसने कभी तुम्हें चोट पहुँचाई हो या धोखा दिया हो, या कोई ऐसा व्यक्ति जिसने तुम पर हमला किया हो या तुम्हारी आलोचना की हो। लेकिन अगर वे ऐसे व्यक्ति हैं जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास करते हैं, तो तुम्हें उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार करना चाहिए और उनके साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना चाहिए। यह सिद्धांत है, और यह वह सिद्धांत है जो सामान्य मानवता वाले व्यक्ति के पास होना चाहिए और दूसरों के साथ व्यवहार करने में उसे इसका पालन करना चाहिए। सामान्य मानवता के जमीर और तर्क-बुद्धि वाले लोग इन सत्य सिद्धांतों को स्वीकार करेंगे और दूसरों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने का अभ्यास करेंगे। जिनके पास सामान्य मानवता का जमीर और तर्क-बुद्धि नहीं है, वे इन वचनों को सुनकर इन्हें एक प्रकार का धर्म-सिद्धांत या धार्मिक शिक्षा मानेंगे। यदि कोई व्यक्ति उन लोगों के हितों, गौरव, रुतबे या गरिमा का अतिक्रमण करता है जो सत्य स्वीकार नहीं कर सकते, तो वे अपना उतावलापन ही उजागर करेंगे। वे न केवल बदला लेंगे और दूसरे पक्ष से हिसाब चुकता करने की माँग करेंगे, बल्कि वे दूसरे पक्ष से दोगुना बदला लेंगे और अपना प्रतिशोध बढ़ा देंगे। यदि किसी ने उन्हें चोट पहुँचाई है, उन्हें नाराज किया है, उनका अनादर करके उनका अपमान किया है या उनके साथ कोई मौखिक या शारीरिक विवाद तक किया है, तो वे बदला लेंगे और उनसे दोगुना बदला लेंगे। वे लोगों के साथ व्यवहार करने के उन सिद्धांतों का पालन करने में बिल्कुल असमर्थ हैं, जो परमेश्वर द्वारा अपेक्षित हैं।
देहधारी परमेश्वर द्वारा लोगों से बदला न लेने के विषय से जुड़े कई वास्तविक उदाहरण भी हैं। दूसरों के साथ कैसे व्यवहार करें, इसके लिए परमेश्वर की लोगों से यह अपेक्षा है कि उन्हें बदला न लेने के सिद्धांत का पालन करना चाहिए, क्योंकि देहधारी परमेश्वर अपने वास्तविक जीवन और कार्य-परिवेश में ऐसी सामान्य मानवता और ऐसा मानवता सार रखता है। इसका क्या अर्थ है कि वह ऐसा मानवता सार रखता है? इसका अर्थ है कि वह लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके में स्व-आचरण के ऐसे सिद्धांत का सख्ती से पालन कर सकता है, और मानवजाति के बीच और लोगों के समूहों के मध्य रहने के तरीके में आचरण के इस सिद्धांत का सख्ती से पालन कर सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि उसके पास ऐसा जीवन सार है, और ऐसा इसलिए भी है क्योंकि उसके पास ऐसा जीवन सार है कि उसके जीवन यापन में ऐसी वास्तविकता है। देहधारी परमेश्वर लोगों के बीच व्यावहारिक रूप से रहता है; वह एक वास्तविक जीवन जीता है जिसमें वह लोगों के साथ व्यवहार और संवाद करता है—वह शून्य में नहीं रहता। देह में रहते हुए वह अनिवार्य रूप से लोगों के संपर्क में आएगा, उनसे संवाद करेगा और उनके साथ व्यवहार करेगा। भ्रष्ट मानवजाति के साथ मेलजोल और व्यवहार करते समय उसके साथ अनिवार्य रूप से अनुचित व्यवहार किया जाएगा, उसका अनादर किया जाएगा, उसके साथ भेदभाव किया जाएगा, उसे धोखा दिया जाएगा, उसे धौंस दी जाएगी और ऐसे तरीकों से उसकी आलोचना की जाएगी जो वास्तविकता से भिन्न हैं। मैं ऐसे अनुचित व्यवहार से कैसे निपटता हूँ? इन वर्षों में लोगों के बीच रहते हुए, अविश्वासियों के बीच मुझे जिस विभिन्न प्रकार के अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा, उसकी तो बात ही छोड़ दो, केवल पारिवारिक परिवेश, स्थानीय कलीसिया और उन सभी उच्च-स्तरीय अगुआओं और कार्यकर्ताओं और साधारण भाई-बहनों के संदर्भ में, जिनके संपर्क में मैं आ सकता था, मुझे बताओ, क्या हर व्यक्ति मेरे साथ निष्पक्ष व्यवहार करने में सक्षम था? (नहीं।) निश्चित रूप से नहीं। मैं तुम लोगों के समान ही हूँ—मैं एक साधारण विश्वासी रहा हूँ और मैं एक परिवार का सदस्य भी रहा हूँ। जब मैं एक परिवार का सदस्य था, तब मुझे सभी प्रकार के अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ा। एक परिवार में, भाई-बहनों के बीच, जो कोई भी सबसे अधिक बलवान होता है, उसी की बात मानी जाती है, और जो निष्कपट और समझदार होता है, उसे हमेशा धौंस दी जाती है और उसके साथ अनुचित व्यवहार किया जाता है। पारिवारिक परिवेश के भीतर मुझे कुछ विशिष्ट घटनाएँ याद हैं। इन घटनाओं में, यदि तुम दबंग, अविवेकी होते और हंगामा खड़ा करते, तो तुम्हें धौंस न दी जाती या तुम्हारे साथ अनुचित व्यवहार न किया जाता। लेकिन यदि तुम समझदार होते और तुम इन घटनाओं को तर्कसंगत रूप से सँभालते, तो तुम्हें धौंस न दी जाती। यदि दूसरे लोग हंगामा खड़ा करते और अविवेकी होते, तो वे जबरन तुम्हारा फायदा उठाते और बेशर्मी से काम करते। मैं नहीं जानता कि बेशर्मी से कैसे काम किया जाता है; मैं केवल यह जानता हूँ कि समझदार कैसे बनें और ऐसे मामलों को तर्कसंगत रूप से कैसे सँभालें, लेकिन समझदार होने का मतलब था कि मुझे धौंस दी जाएगी। इस दुनिया को देखो : चाहे लोगों का जो भी समूह हो, निष्पक्षता और धर्मिता सत्ता में नहीं हैं। जो कोई भी बेशर्मी से काम कर सकता है, हंगामा खड़ा कर सकता है और अनुचित तर्कों को जबरन मनवा सकता है, वही हावी हो जाता है। तुम जितने अधिक समझदार होगे और निष्पक्षता, जमीर और तर्क-बुद्धि को जितना अधिक महत्व दोगे, तुम्हारे लिए पैर जमाना उतना ही कठिन होगा और तुम्हें उतनी ही अधिक धौंस दी जाएगी। परिवार में मेरे साथ भी ऐसा ही था; परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा मुझे धौंस दी जाती थी। स्थानीय कलीसिया में भी कुछ लोग थे जो हमेशा मेरे साथ भेदभाव करते थे। मैंने उन्हें नाराज नहीं किया था या उन्हें चोट नहीं पहुँचाई थी। केवल इसलिए कि उस समय मैं युवा था, थोड़ा सक्रिय और उत्साही था, और सभाओं में उपस्थित होने और विभिन्न गतिविधियों में भाग लेने के लिए तैयार रहता था, कुछ लोग हमेशा मुझे पूर्वाग्रह और बुरी नीयत से देखते थे। इसके अलावा, उन्होंने मुझे अपशब्द कहे और मेरी पीठ पीछे मेरी आलोचना की, और हर तरह की भद्दी बातें कहीं। बाद में, जब मैं अन्य स्थानों की कलीसियाओं में गया और वहाँ स्थानीय भाई-बहनों के साथ रहा, तब वहाँ भी ऐसा ही हुआ। मैं चाहे जो भी करता, कुछ लोग धारणाएँ बना लेते, और कुछ ने तो मेरा मजाक भी उड़ाया, मुझे नीचा दिखाया और मेरी पीठ पीछे मेरी आलोचना की। मुझे चाहे जो भी अनुचित व्यवहार मिला हो, इन वर्षों में मैंने कभी किसी ऐसे व्यक्ति से बदला नहीं लिया जिसने कभी मुझे चोट पहुँचाई हो। भले ही कुछ लोगों ने मुझे अपशब्द कहे हों या मेरी आलोचना की हो, या मेरे बारे में बहुत भद्दी बातें तक कही हों, मैंने कभी उनसे बदला नहीं लिया है। बदला न लेने का क्या अर्थ है? व्यवहार के कौन-से रूप बदला लेना हैं? बदला लेने के व्यवहार के कई रूप हैं। एक प्रकार का बदला लोगों के पिछले दुष्कर्म उनके सामने लाना होगा, उन्हें यह बताना कि अब मेरे पास रुतबा है, जब उन्होंने अतीत में मुझे अपशब्द कहे थे और मेरी आलोचना की थी तो मुझे कैसा महसूस हुआ था, और अब जबकि मेरे पास रुतबा है, यदि मैं उनसे निपटना और उनसे बदला लेना चाहूँ तो यह बहुत आसान होगा। लेकिन मैंने ऐसा कभी नहीं किया है, न ही मैं करूँगा। मैं ऐसा क्यों नहीं करूँगा? सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए मेरे दिल में सिद्धांत हैं। यदि किसी की मानवता खराब है और वह एक बुरा व्यक्ति है, तो यदि वह मुझे चोट पहुँचाता है तो यह कोई बड़ी बात नहीं है। लेकिन यदि वह कलीसिया में विघ्न-बाधा डालता है, परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाता है, कलीसिया के प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करता है, कलीसिया के सिद्धांतों का उल्लंघन करता है, या कार्य-व्यवस्थाओं के खिलाफ जाता है, तो चूँकि परमेश्वर के घर में प्रशासनिक आदेश हैं, इसलिए वह स्वाभाविक रूप से उससे निपटेगा। यदि भाई-बहन दृष्टिहीन हैं और उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है, और वे उसे अगुआ के रूप में चुनना चाहते हैं, तो मैं उनके साथ अगुआओं को चुनने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों पर संगति करूँगा। यदि इस व्यक्ति के मामले में भाई-बहनों में भेद पहचानने की क्षमता है, तो वे उससे चुनाव से हटने के लिए कह सकते हैं; यदि उनमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं है और वे उसे चुनते हैं, तो उसे अगुआ बनकर देखने दो। जब भाई-बहन पर्याप्त कष्ट सह लेंगे, तब वे स्वाभाविक रूप से उसका भेद पहचानने में सक्षम होंगे और उसे हटा देंगे। एक लिहाज से, यह भाई-बहनों को एक सबक सीखने देता है; वे सीख सकते हैं कि लोगों का भेद कैसे पहचाना जाए और उन्हें कैसे जाना जाए। दूसरे लिहाज से, यह परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेशों और सभी प्रकार के लोगों से निपटने के लिए परमेश्वर के घर के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करना है। और यहाँ एक और बात है जो और भी अधिक महत्वपूर्ण है : परमेश्वर का घर, कलीसिया, ऐसा स्थान है जहाँ पवित्र आत्मा कार्य करता है, जहाँ परमेश्वर की सत्ता है; यह परमेश्वर का घर है। इसका क्या अर्थ है कि यह परमेश्वर का घर है? इसका अर्थ है कि सत्य की सत्ता है, परिणामस्वरूप जिसका यह अर्थ है कि यहाँ सत्य का ही अंतिम निर्णय होता है। कलीसिया में आने वाले हर व्यक्ति का एक उपयुक्त परिणाम और मंजिल होती है। चाहे कोई रखा जाए, चला जाए या रहे, चाहे कोई किसी भी परिवेश में हो, और परमेश्वर का घर उन्हें कैसे भी सँभाले—इन सबके लिए परमेश्वर का समय तय है। यह तथ्य कि किसी ने मुझे चोट पहुँचाई है, मुझे नाराज किया है, मुझे अपशब्द कहे हैं या मुझे फँसाया है और मेरी पीठ पीछे मेरी आलोचना की है, मेरी नजर में सिद्धांतों का उल्लंघन करना नहीं है। फिर सिद्धांतों का उल्लंघन करना क्या है? यह परमेश्वर के घर के हितों को नुकसान पहुँचाना और प्रशासनिक आदेशों का उल्लंघन करना है। परमेश्वर के घर में सत्य की सत्ता है। देर-सबेर बुरे लोगों को प्रतिफल मिलेगा; सभी को उनके कर्मों के अनुसार वह सजा मिलेगी, जिसके वे हकदार हैं। सभी प्रकार के लोगों से निपटना कलीसिया का काम है और वह काम है जो अगुआओं और कार्यकर्ताओं को करना चाहिए; मुझे इसे सीधे करने की कोई आवश्यकता नहीं है। ऐसी चीजों से निपटने का मेरा यही सिद्धांत है। अतीत में किसी ने मेरे साथ चाहे जो कुछ भी किया हो या मुझे जो कुछ भी कहा हो, चाहे वह सम्मानजनक हो या अपमानजनक, चाहे उचित हो या अनुचित, मैं उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार कर सकता हूँ। जब तक तुम परमेश्वर के घर में कलीसियाई जीवन जीते हो, या यदि तुमने केवल थोड़े समय से ही परमेश्वर में विश्वास किया है और तुम सत्य नहीं समझते, और पवित्र आत्मा का कार्य उस चरण तक नहीं पहुँचा है, तो तुम परमेश्वर के घर में बने रह सकते हो। लोगों के परिणामों की अंतिम रूप से घोषणा करने का समय आने से पहले, मैं प्रतीक्षा कर सकता हूँ। मैं तुम्हारा परिणाम निर्धारित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य के रूप में केवल मेरे प्रति तुम्हारे रवैये का उपयोग नहीं करूँगा। इसलिए, मैं कभी किसी ऐसे व्यक्ति से बदला नहीं लूँगा जिसने मुझे कभी चोट पहुँचाई हो; मैं उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करूँगा।
मैं कलीसिया में कुछ लोगों के संपर्क में आया हूँ; उनमें से कुछ मुझसे काफी अशिष्टता से और बिना सम्मान के बात करते हैं। यह देखकर कि मेरे प्रति उनका रवैया ऐसा है, मैंने उन्हें अनदेखा कर दिया। मुझे बताओ, क्या इसका मतलब यह है कि उनके प्रति मेरा रवैया खराब था? (नहीं।) तो क्या मुझे उनके रवैये के कारण उनकी काट-छाँट करनी चाहिए थी और उन्हें अनुशासित करना चाहिए था? मैंने वास्तव में ऐसा कभी नहीं किया है। अंत में यह हुआ कि कुछ भाई-बहन इसे और बर्दाश्त नहीं कर सके। उन्होंने मेरा पक्ष लेते हुए कहा, “परमेश्वर से बात करते समय इस व्यक्ति का ऐसा रवैया कैसे हो सकता है? इसे शुद्ध कर दो!” भाई-बहन बहुत क्रोधित थे। उस व्यक्ति के एक जैसे व्यवहार के आधार पर उन्होंने सिद्धांतों के अनुसार उसे शुद्ध कर दिया। यह देखकर कि भाई-बहनों ने उसे शुद्ध कर दिया है, मैं अपने दिल में जानता था, “ऐसा लगता है कि इस व्यक्ति की मानवता की सामान्य अभिव्यक्तियाँ उतनी अच्छी नहीं हैं। भाई-बहन इससे केवल इसलिए न निपटते कि मेरे प्रति इसका रवैया खराब था; संभवतः, अधिकांश चीजों में इस व्यक्ति का व्यवहार खराब ही रहता है।” कलीसिया उससे निपटने में सिद्धांतों के अनुसार कार्य कर रही थी; मुझे इस बारे में कुछ नहीं कहना था। मैं इसका सम्मान करता हूँ कि भाई-बहनों ने उससे कैसे निपटने का चुनाव किया, और मैं उनके निर्णय का सम्मान करता हूँ। लेकिन यह सम्मान इसलिए नहीं है कि तुम लोग किसी ऐसे व्यक्ति से निपटे, जो मेरे प्रति अशिष्ट था—मैं लोगों से निपटने के लिए कलीसिया के सिद्धांतों का सम्मान करता हूँ। मुझे बताओ, क्या लोगों के साथ मेरे व्यवहार करने का यह सिद्धांत सही है? (हाँ।) जब बात यह आती है कि लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाए, तब मैंने कभी स्थानीय कलीसिया के अगुआओं से उन लोगों से निपटने के लिए नहीं कहा है जिन्होंने अतीत में मेरी आलोचना की थी या मेरा मौखिक रूप से अपमान किया था। इसके विपरीत, यदि कोई स्थानीय कलीसिया उनमें से कुछ व्यक्तियों को सुसमाचार निर्देशक या अगुआ और कार्यकर्ता बनने के लिए पदोन्नत करती और चुनती है, तो मैं इसके आड़े नहीं आता; मैं उन्हें एक अवसर देता हूँ। मेरे गृहनगर की कलीसिया के लोगों के मामले में यह विशेष रूप से सच है—वे बस वही कर्तव्य करते हैं जो उन्हें करने चाहिए। मैंने किसी को उन लोगों से बदला लेने के लिए अधिकृत नहीं किया है जिन्होंने कभी मुझे चोट पहुँचाई या नाराज किया; मैंने कभी ऐसा एक भी काम नहीं किया है। मैं अपने दिल में इसे कैसे देखता हूँ? यदि ऐसे लोग वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं और उनके स्वभाव बदल जाते हैं, तो उनके लिए उद्धार प्राप्त करने की उम्मीद है। उन्होंने पहले मुझसे जो भद्दी बातें कही थीं, वे सब उनकी मानवता की समस्याएँ थीं जो उनके भ्रष्ट स्वभावों के कारण थीं। उस समय वे सत्य नहीं समझते थे और सभी के स्वभाव दुष्ट थे। यह अपरिहार्य था कि वे उन लोगों के बारे में कुछ भद्दी बातें कहेंगे और उनके साथ कुछ अनुचित काम करेंगे, जिन्हें वे तुच्छ समझते थे। विशेष रूप से, जब वे लोग पदोन्नत हुए जिनसे वे ईर्ष्या करते थे या जिन्हें वे तुच्छ समझते थे, तब उनके दिलों में डाह, ईर्ष्या और नफरत पैदा हो गई। तब उनके भ्रष्ट स्वभाव उन पर हावी हो जाते और उन्हें हरकत करने के लिए प्रेरित करते, और वे दानवी शब्द बोलते। यह उनके भ्रष्ट स्वभावों और उनकी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं के कारण था। इस तथ्य के साथ कि उनमें परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल भी नहीं था, वे कोई भी भद्दी बात कह सकते थे; वे वही कहते जिससे उन्हें अपना क्रोध निकालने में मदद मिलती, जिससे उनकी नफरत कम होती और जिससे वे अपने लक्ष्य हासिल कर पाते। लोगों ने मेरी पीठ पीछे चाहे जो भी भद्दी बातें कही हों या जो भी बुरे काम किए हों, यदि यह भ्रष्ट स्वभावों के सामान्य प्रकटन के दायरे में आता है और कुछ ऐसा है जिसे परमेश्वर क्षमा कर सकता है, तो, यह देखते हुए कि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, परमेश्वर उन्हें अवसर देगा, उन्हें पदोन्नत होने, विकसित होने और उपयोग किए जाने देगा, यहाँ तक कि कुछ लोगों को पूर्ण भी बनाया जा सकता है। लेकिन यदि ये प्रकटन सामान्य मानवता के भ्रष्ट स्वभाव के दायरे से बाहर निकल जाते हैं और परमेश्वर द्वारा इनकी निंदा की जाती है, तो यह देखते हुए कि परमेश्वर इन सबकी जाँच-परख करता है, परमेश्वर इन लोगों के साथ क्या करेगा या वह इनके लिए क्या व्यवस्था करेगा और वह इनसे कैसे निपटेगा, यह परमेश्वर पर निर्भर है। मुझे इस बारे में चिंता करने की आवश्यकता नहीं है, न ही मुझे हस्तक्षेप करने की आवश्यकता है। इसलिए, जब मुझे किसी अनुचित व्यवहार का सामना करना पड़ता है या मैं ऐसे शब्द सुनता हूँ जो मुझ पर हमला करते हैं और मुझे दोषी ठहराते हैं, तो मुझे अपने दिल में थोड़ा दुख या उदासी महसूस होती है, लेकिन मैं कुछ भी करने के लिए सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं करूँगा। मैं न केवल इन चीजों को याद रखता हूँ, बल्कि मैं इन लोगों का मानवता सार भी और अधिक जाँचता हूँ जो उनके व्यवहार के माध्यम से उजागर होता है, लेकिन उनके इन सभी व्यवहारों और प्रकटनों, उनकी मानवता और उनके स्वभाव सार पर अंततः क्या फैसला दिया जाता है और उनका अंतिम परिणाम क्या होगा, इससे निपटने का मेरे पास केवल एक ही तरीका है : मैं यह सब परमेश्वर पर छोड़ देता हूँ। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर सभी चीजों पर संप्रभु है, हर किसी का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है और परमेश्वर सभी लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। मैं तुम लोगों के किसी भी परिणाम को निर्धारित नहीं करता। यद्यपि मैं इस सब की असलियत जान सकता हूँ, अपने दिल में इसे परिभाषित कर सकता हूँ और इस पर फैसला दे सकता हूँ, और अपने दिल में तुम्हारे बारे में राय रख सकता हूँ, फिर भी मैं कभी सार्वजनिक रूप से तुम लोगों का निरूपण नहीं करता; मैं ऐसा नहीं करता। यदि कलीसिया तुम लोगों से निपटना चाहती है, तो मैं अपनी राय दे सकता हूँ, लेकिन मैं कलीसिया के तुम लोगों से निपटने में हस्तक्षेप नहीं करता या उसके आड़े नहीं आता। साथ ही, मैं परमेश्वर के आत्मा द्वारा तुम लोगों पर अपनी संप्रभुता का प्रयोग करने में हस्तक्षेप नहीं करता। मैं इन सिद्धांतों के आधार पर लोगों के साथ व्यवहार करता हूँ, इसलिए जिन लोगों ने मेरे साथ मेलजोल किया है, उनके द्वारा मेरे साथ की गई अनुचित चीजें और मुझसे कही गई भद्दी बातें मुझ तक ही सीमित रहती हैं—और एक इंच भी आगे नहीं जातीं। इसका क्या अर्थ है कि वे एक इंच भी आगे नहीं जातीं? इसका अर्थ है कि चाहे किसी ने भी मेरे बारे में भद्दी बातें कही हों, मुझे धौंस दी हो, मेरा अपमान किया हो या मुझे चोट पहुँचाई हो, मैंने कभी किसी से इसका जिक्र नहीं किया, उससे बदला लेना तो दूर की बात है। कुछ लोग कहते हैं, “तब से कई साल बीत चुके हैं—क्या ऐसा है कि तुम इन लोगों के बारे में भूल गए हो?” व्यक्ति के जीवन में हमेशा कुछ ऐसी चीजें होंगी जो गहरी छाप छोड़ती हैं और कभी भुलाई नहीं जा सकतीं। ऐसा नहीं है कि मैं इन चीजों को भूल गया हूँ, न ही ऐसा है कि मैं उन्हें महसूस नहीं कर सकता, ऐसा तो बिल्कुल भी नहीं है कि मैं उन्हें समझता नहीं हूँ। मैं नाराजगी न रखने और बदला न लेने में इसलिए सक्षम हूँ, क्योंकि मेरा दिल नाराजगी और बदले जैसी चीजों से रहित है; यह लोगों के साथ व्यवहार करने का मेरा सिद्धांत बन गया है। इस सिद्धांत का एक पहलू हर व्यक्ति के साथ निष्पक्ष व्यवहार करना है। सभी लोगों का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है। हर व्यक्ति का परिणाम और मंजिल इससे संबंधित है कि उन्होंने क्या किया है, उनकी अभिव्यक्तियाँ क्या हैं, सत्य के प्रति और परमेश्वर के प्रति उनका रवैया कैसा है और वे किस मार्ग पर चलते हैं; वे इन कारकों द्वारा निर्धारित होते हैं। किसी ने मेरे साथ क्या किया है, यह उसके परिणाम और मंजिल को मापने का कोई मानक या कारक नहीं है। इसलिए, जब बदला न लेने की बात आती है, तो सबसे महत्वपूर्ण बात यह होती है कि सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करने के लिए मेरे सिद्धांत हैं। यदि तुमने मुझे चोट पहुँचाई है, मुझे नुकसान पहुँचाया है, मुझे धोखा दिया है, या यहाँ तक कि मेरा अपमान किया है या मुझे कोसा है, तो मैं तुमसे बदला नहीं लूँगा, क्योंकि बदला लेना लोगों के साथ मेरे व्यवहार करने का सिद्धांत नहीं है, न ही यह वह सिद्धांत है जो परमेश्वर लोगों को दूसरों के साथ व्यवहार करने के लिए सिखाता है। इसलिए, इससे पहले कि परमेश्वर लोगों को दूसरों के साथ व्यवहार करने के सिद्धांत बताए, परमेश्वर के पास भी लोगों के साथ व्यवहार करने के अपने सिद्धांत हैं। परमेश्वर के वचनों में और उन सभी सिद्धांतों में जो परमेश्वर लोगों को सिखाता है, दूसरों से बदला लेने जैसा कोई सिद्धांत नहीं है। क्या तुम लोग कहोगे कि ऐसा ही है? (हाँ।) क्या वे सिद्धांत, जिनके द्वारा मैं सभी प्रकार के मामले सँभालता हूँ और सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करता हूँ, उन सत्य सिद्धांतों के विपरीत हैं जिन पर मैंने इतने वर्षों में संगति की है? (नहीं।)
देहधारी परमेश्वर अपनी सामान्य मानवता में बदला न लेने में सक्षम है—क्या भ्रष्ट इंसानों के लिए ऐसा करना आसान है? (नहीं।) यह आसान क्यों नहीं है? (अन्य लोगों के साथ मिलते-जुलते समय भ्रष्ट इंसान ज्यादातर अपने भ्रष्ट स्वभावों और उतावलेपन पर निर्भर करते हैं, इसलिए वे दूसरों से बदला लेने में काफी प्रवृत्त होते हैं।) भ्रष्ट इंसानों में दुष्ट स्वभाव होता है, इसलिए वे बदला लेने से खुद को रोक नहीं पाते। वे जानते हैं कि परमेश्वर लोगों को दूसरों के साथ व्यवहार करने के बारे में क्या सिद्धांत बताता है, लेकिन वे उनका पालन नहीं कर सकते, क्योंकि उनमें दुष्ट स्वभाव है। अगर बोलते समय तुम्हारा उन्हें चोट पहुँचाने का कोई इरादा न हो तो भी, यदि तुम सावधान नहीं हो और एक भी ऐसी बात कह देते हो जो उन्हें चोट पहुँचाती है, तो वे अपमान के कारण आगबबूला हो उठेंगे और तुमसे बदला लेना चाहेंगे। वे तुम पर हमला करने के लिए इसे एक बड़ी बात बनाने की कोशिश भी करेंगे; वे तुम्हारी पीठ पीछे तुम्हें बदनाम करेंगे और तुम पर कीचड़ उछालेंगे, और यह कहते हुए दूसरों के सामने तुम्हारी बुराई करेंगे कि तुम कितने महत्वाकांक्षी और चालाक हो, जबकि वास्तव में ऐसा बिल्कुल नहीं है। तुमने केवल अनजाने में कुछ ऐसा कह दिया जिससे उन्हें चोट पहुँची; तुम्हारे मन में कोई दुर्भावना नहीं थी, फिर भी वे तुमसे बदला ले सकते हैं। देखो, क्या ऐसे लोगों का दुष्ट स्वभाव डरावना नहीं है? (हाँ।) कुछ लोग दूसरों से बदला लेने के लिए अविवेकी हो सकते हैं, बेशर्मी से काम कर सकते हैं, यहाँ तक कि नखरे भी दिखा सकते हैं और हंगामा भी खड़ा कर सकते हैं; यह सिद्धांतों के अनुसार नहीं है। भ्रष्ट इंसान अक्सर इसी तरह से कार्य करते हैं, है ना? बदला लेने की स्थिति का सामना करने पर मैं कैसे काम करता हूँ? दूसरे मेरे साथ चाहे जैसा भी व्यवहार करें, मैं उनसे बदला नहीं लेता, न ही मैं बेशर्मी से काम करता हूँ। चाहे कोई भी समय हो, मेरे स्व-आचरण के सिद्धांत नहीं बदल सकते। मुझे विवेकपूर्ण होना चाहिए और मानवता की तर्क-बुद्धि के दायरे में आचरण और चीजें करनी चाहिए। मैं केवल इसलिए तुमसे बदला लेने के लिए मानवता से रहित तरीकों का सहारा नहीं ले सकता कि तुम तर्कहीन हो और तुममें कोई मानवता नहीं है; यह अनुचित होगा। मुझे अपने काम और अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों पर डटे रहना चाहिए। मैं अपने आचरण के सिद्धांत केवल इसलिए नहीं छोड़ूँगा क्योंकि तुममें मानवता नहीं है और तुम वैसे कार्य नहीं करते जैसे एक इंसान को करना चाहिए। मैं अभी भी वैसे ही आचरण करूँगा जैसे मुझे करना चाहिए; मेरे स्व-आचरण के सिद्धांत अपरिवर्तित रहते हैं। घर पर भी मैं ठीक ऐसा ही करता था। जब बर्तन धोने, घर को व्यवस्थित करने और सफाई करने जैसी चीजों की बात आती थी, तो दूसरे चाहे कितना भी हंगामा खड़ा करते या वे कितने भी अविवेकी रहे हों, मैं फिर भी वही करता था जो मुझे करना चाहिए था और मैंने कभी किसी से इसलिए बदला नहीं लिया कि मुझे अनुचित व्यवहार मिला था। अंत में, माता-पिता ने मुझे क्या उपाधि दी? उन्होंने कहा कि मैं उच्च नैतिक मानदंडों वाला हूँ। आज तक मुझे ये शब्द स्पष्ट रूप से याद हैं। लोगों के साथ व्यवहार करने का मेरा यही सिद्धांत है और यह आज तक अपरिवर्तित है। मैंने न केवल घर पर इस तरह से काम किया, बल्कि बाद में, जब मैं विभिन्न कलीसियाओं में गया और भाई-बहनों के संपर्क में आया, तब भी यह सिद्धांत नहीं बदला। मुझे बताओ, क्या यह मानवता सार से निर्धारित होता है? (हाँ।) क्या तुम लोग इसे हासिल कर सकते हो? (नहीं।) यह कठिन है, है ना? यदि तुम कोशिश करते-करते थक भी जाओ, तो भी तुम इसे हासिल नहीं कर सकते। लोग केवल अपने गौरव के लिए लड़ना चाहते हैं और अपने मामले पर बहस करना चाहते हैं, लेकिन वे स्व-आचरण की सीमाओं और सिद्धांतों को भूल जाते हैं। किसी ने भी कभी स्व-आचरण की सीमाओं और सिद्धांतों का पालन नहीं किया है। कोई भी उनका पालन क्यों नहीं करता? क्योंकि लोगों के भीतर का जीवन सामान्य मानवता और सिद्धांतों से रहित है। लोगों का जीवन उनके भ्रष्ट स्वभाव हैं, जो शैतान से आते हैं। तुम चाहे जो कुछ भी करो, तुम्हारे व्यवहार का नियंत्रण और मार्गदर्शन करने वाला सिद्धांत हमेशा भ्रष्ट स्वभावों से आता है। तुम चाहे जो भी तर्क इस्तेमाल करो या तुम्हारे क्रियाकलापों का आधार चाहे जो भी हो, यह सब भ्रष्ट स्वभावों से आता है। इसलिए, लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार मेलजोल करना भ्रष्ट इंसानों के लिए बहुत कठिन है। देखो, क्या जीवन की ये चीजें, जिनके बारे में मैं बात करता हूँ, बहुत साधारण नहीं लगतीं? लेकिन भ्रष्ट मानवजाति के बीच इस तरह से काम करने को उच्च नैतिक मानदंडों वाला होने के रूप में निरूपित किया जाता है। उच्च नैतिक मानदंडों वाला होने का यह गुण ऐसा है जो अधिकांश लोगों के पास नहीं है और वे इसे प्राप्त नहीं कर सकते, कोई सम्मान दिखाना तो दूर की बात है। वे सिद्धांतों के अनुसार दूसरों के साथ मेलजोल करने में सक्षम होने से बहुत पीछे रह जाते हैं, क्योंकि ये चीजें भ्रष्ट मानवता में मौजूद ही नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि लोग सिद्धांतों पर डटे नहीं रह सकते, बल्कि ऐसा है कि उनके पास कोई सिद्धांत ही नहीं है। तुम चाहे जो भी कहो या करो, या तुम चाहे जिस भी चीज का सामना करो, तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट हो जाते हैं। तुम्हारी व्यक्तिगत प्राथमिकताएँ, भावनाएँ, हित, गर्व और गौरव, प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की लालसा, तुम्हारी महत्वाकांक्षाएँ और इच्छाएँ, यहाँ तक कि बदला लेने और लोगों के पीछे पड़ने की तुम्हारी इच्छा, ये सब खुद को दिखा देती हैं। ये चीजें प्रभार सँभाल लेती हैं और तुम जो कहते और करते हो, उसे नियंत्रित करती हैं, जो यह दर्शाता है कि तुम्हारा दिल पूरी तरह से इन भ्रष्ट स्वभावों से भरा हुआ है। इस प्रकार, जब तुम्हें कोई नुकसान होता है, तो तुम अपना क्रोध पी नहीं सकते; तुम हार मानने से पहले यह देखने के लिए लड़ने पर जोर देते हो कि कौन जीतता है। अंत में क्या होता है? अपना गौरव वापस पाने, अपनी गरिमा बहाल करने और अपने हितों की रक्षा करने के लिए तुम जमीर की सीमाएँ तोड़ दोगे और दूसरे पक्ष के साथ पागलों की तरह होड़ और लड़ाई करोगे, यहाँ तक कि किसी भी हद तक गिरकर अनैतिक ढंग से बदला भी लोगे। और जब तुम बदला लेते हो, तो तुम उन्हें तब तक अपशब्द कहते हो, जब तक कि तुम क्रोध से लाल न हो जाओ। जितने अधिक अपशब्द तुम उन्हें कहते हो, उतना ही कम तुम्हें लगता है कि इससे तुम्हारी नफरत कम हुई है; जितने अधिक अपशब्द तुम उन्हें कहते हो, तुम्हारा क्रोध उतना ही अधिक बढ़ जाता है; जितने अधिक अपशब्द तुम उन्हें कहते हो, तुम्हारी नफरत उतनी ही गहरी हो जाती है, और फिर हाथापाई की नौबत आ जाती है। जब शारीरिक लड़ाई शुरू हो जाती है, तब दुश्मनी पैदा हो जाती है; स्थिति ऐसी हो जाती है जिसे सँभाला नहीं जा सकता, और पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचता। इसलिए, बदला लेना मूल रूप से भ्रष्ट मानवजाति का अनन्य क्षेत्र है। यह तथ्य कि तुम बदला ले सकते हो, यह साबित करता है कि तुम्हारे जमीर और विवेक का तुम पर कोई नियंत्रण नहीं है। इसके अलावा, तुममें से कुछ में जमीर और विवेक है ही नहीं। इस प्रकार, जब तुम किसी स्थिति का सामना करते हो, तब अगर दूसरा पक्ष तुम्हारे हितों को नुकसान पहुँचाता है या तुम्हारे गर्व को ठेस पहुँचाता है, तो तुम न केवल सिद्धांतों के अनुसार उसके साथ व्यवहार करने में असमर्थ होते हो, बल्कि तुम अनैतिक ढंग से बदला भी लेते हो, ऐसा करने के लिए जमीर और नैतिकता की सीमाएँ तोड़ देते हो, यह तक सोचते हो कि तुम्हारा प्रतिशोध बहुत सही है। तुम लगातार सत्य सिद्धांतों और स्व-आचरण के सिद्धांतों को बुरे कर्मों से बदल देते हो। तुम जो जीते हो, वह किसी दानव का चेहरा और रूप है, फिर भी तुम्हें लगता है कि तुम जीत गए हो और तुमने फायदा उठाया है। वास्तव में, परमेश्वर इसे कैसे देखता है? परमेश्वर की नजर में किस प्रकार का व्यवहार और आचरण करने का कौन-सा तरीका सकारात्मक चीजें हैं, जिन्हें परमेश्वर द्वारा मान्यता दी जाती है? यह सबसे जरूरी और अहम बात है। ऊपर से देखने पर, चूँकि कुछ लोग बहुत चालाक होते हैं, वाक्पटु होते हैं, जानते हैं कि अपने गर्व और गौरव की रक्षा कैसे करनी है, जानते हैं कि लोगों से बदला लेने के अवसर कैसे खोजने हैं, और जानते हैं कि हंगामा कैसे खड़ा करना है और बेशर्मी से कैसे काम करना है, इसलिए वे चाहे जिसका भी सामना करें, उन्हें कभी नुकसान नहीं होता, और वे आराम और चैन का आनंद ले सकते हैं, उन्हें कोई दर्द नहीं सहना पड़ता। जो कोई भी उन्हें उकसाता या चोट पहुँचाता है, वे उस पर पलटवार कर सकते हैं, बाहरी प्रतिष्ठा और वास्तविक लाभ दोनों प्राप्त कर सकते हैं, अपने गौरव को कभी ठेस नहीं पहुँचने देते। लेकिन वे कभी सत्य स्वीकार नहीं करेंगे या लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार नहीं करेंगे, यहाँ तक कि वे ऐसे काम भी कर सकते हैं जो जमीर और नैतिकता की सीमाएँ पार कर जाते हैं। अपने गौरव और हितों की रक्षा करने के लिए बदला लेना और लोगों को चोट पहुँचाना—परमेश्वर की नजर में ये सब बुरे कर्म हैं। तुमने अपने गर्व और गौरव की रक्षा की होगी और अपने दैहिक हित सुरक्षित रखे होंगे, लेकिन तुमने कभी परमेश्वर द्वारा सिखाए गए सिद्धांतों के अनुसार आचरण या लोगों के साथ व्यवहार नहीं किया है। तो परमेश्वर इसे कैसे देखता है? तुमने परमेश्वर के सामने कभी उसकी स्वीकृति प्राप्त नहीं की है। तुम बहुत चालाक और बहुत बड़े षड्यंत्रकारी हो। तुम बाहरी प्रतिष्ठा, वास्तविक लाभों और व्यक्तिगत हितों के लिए होड़ करते हो और अपने गौरव के लिए लड़ते हो। अपने गर्व और गौरव की रक्षा करने के लिए तुम कभी स्व-आचरण के उन सिद्धांतों को गंभीरता से नहीं लेते जो परमेश्वर तुम्हें सिखाता है, और कभी उनका पालन नहीं करते। इसलिए, यद्यपि कुछ लोगों के दैहिक हितों को बिल्कुल भी कोई नुकसान हुआ प्रतीत नहीं होता, और ऐसा लगता है कि वे बहुत सफल, अद्भुत और सम्मानजनक जीवन जीते हैं, लेकिन उनके पास जरा भी परमेश्वर के वचनों का जीवनदायी सत्य नहीं है; उन्होंने इसे प्राप्त नहीं किया है। उनमें चीजों को समझने की क्षमता भी नहीं है; वे इसे नहीं समझ सकते और इसे नहीं समझते। क्या यह अपने जीवन के संदर्भ में नुकसान उठाना नहीं है? (हाँ।) उन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया है, उनके जीवन को नुकसान हुआ है, और परमेश्वर उन्हें आशीष नहीं देता, फिर भी उन्हें लगता है कि वे काफी चतुर हैं और उन्हें कोई नुकसान नहीं हुआ है। ऐसे लोग सबसे ज्यादा मूर्ख होते हैं!
जिन सिद्धांतों से देहधारी परमेश्वर लोगों के साथ व्यवहार करता है, क्या उनके माध्यम से तुम लोग दैनिक जीवन में मेरे आचरण करने के तरीके को थोड़ा बेहतर समझते हो? (हाँ।) तो क्या तुम लोग इस बात पर भी थोड़े अधिक स्पष्ट हो कि लोगों के साथ व्यवहार करने में तुम्हें किन सिद्धांतों का पालन करना चाहिए? (हाँ।) अगर कुछ लोग यह सोचें कि तुम कमजोर और कायर हो और तुम्हें आसानी से परेशान किया जा सकता है, और तुम महसूस कर सकते हो कि वे ऐसा सोचते हैं—और वे तुम्हारे साथ ऐसा ही व्यवहार भी करते हैं—तो भी तुम्हें लोगों के साथ निष्पक्ष व्यवहार करने के सिद्धांत का पालन करना चाहिए। यदि तुम उनकी मदद करने में सक्षम हो, तो तुम्हें उनकी मदद करने के लिए सत्य पर संगति करनी चाहिए; यदि वे ऐसे लोग नहीं हैं जो सत्य स्वीकार करते हों, या ऐसे लोग नहीं हैं जो सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, तो भी तुम्हें उनके साथ सिद्धांतों के अनुसार सही ढंग से व्यवहार करना चाहिए। हर समय, अधिक समग्र अर्थ में बोलते हुए, मेरा दृढ़ विश्वास है कि परमेश्वर हर चीज पर और सभी लोगों के भाग्य पर संप्रभु है। मैं अपने दिल में निश्चित हूँ कि मानवजाति का भाग्य, प्रत्येक व्यक्ति का भाग्य, परमेश्वर के हाथों में है, कि कोई भी परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजन से बच नहीं सकता, और कोई भी परमेश्वर की आँखों की जाँच-परख से बच नहीं सकता। इसे अधिक संक्षिप्त परिप्रेक्ष्य से देखें तो, परमेश्वर का घर एक ऐसा स्थान है जहाँ परमेश्वर के वचनों की सत्ता है और जहाँ सत्य की सत्ता है। अधिक विशिष्ट रूप से कहूँ तो, परमेश्वर के घर में प्रशासनिक आदेश हैं, कलीसिया में विनियम हैं और हर अवधि में कार्य-व्यवस्थाएँ होती हैं। जब बात यह आती है कि परमेश्वर का घर सभी प्रकार के लोगों के साथ कैसे व्यवहार करता है, तो वह, जहाँ तक संभव हो, उनसे सत्य सिद्धांतों के अनुसार निपटेगा, और ऐसे एक भी व्यक्ति को नहीं छोड़ेगा जिसे बाहर निकाला जाना चाहिए या जिससे निपटा जाना चाहिए। मसीह-विरोधी, बुरे लोग और छद्म-विश्वासी, साथ ही वे लोग जो सत्य से प्रेम नहीं करते, वे जिनकी मानवता खराब है और वे जो सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे सब परमेश्वर की नजर में हटाए जाने के लक्ष्य हैं। देर-सबेर, इन लोगों को हटा दिया जाएगा और बाहर निकाल दिया जाएगा, जबकि जो लोग वास्तव में सत्य का अनुसरण करते हैं, या जो कम से कम परमेश्वर के लिए श्रम करने के इच्छुक हैं और जिनमें कामचलाऊ मानवता है, वे परमेश्वर के घर में सृजित प्राणियों का कर्तव्य करते रहेंगे। जहाँ तक मानव संसार की बात है, यह परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है; जहाँ तक कलीसिया की बात है, परमेश्वर के घर में प्रशासनिक नियम और सत्य सिद्धांत हैं। इसलिए, इस संदर्भ में कि अन्य लोगों के साथ कैसे व्यवहार किया जाना चाहिए, ये दो सिद्धांत हैं जिनका पालन किया जाना चाहिए। क्या तुम इस पहलू पर स्पष्ट हो? (हाँ।) जहाँ तक जीवन में कुछ लोगों के संपर्क में आने और मिलने-जुलने की बात है, यदि मैं कुछ अप्रिय स्थितियों का सामना करता हूँ या अगर कोई ऐसी बातें कहता है जो मेरे दृष्टिकोणों के साथ असंगत हैं, तो मैं भी इसे सही ढंग से सँभालूँगा। यदि बाद में मैं विचार करता हूँ, चिंतन करता हूँ और तुमने जो कहा उसके बारे में सत्यापन प्राप्त करता हूँ और यह निर्धारित करता हूँ कि यह सही है, तो मैं इसे स्वीकार करूँगा; यदि तुमने जो कहा वह गलत है, तो मैं भी तुम्हारे साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करूँगा। यदि तुम्हारे साथ मिलने-जुलने की प्रक्रिया में घर्षण, टकराव या अप्रियता हुई और उसमें सत्य, कलीसिया का कार्य या तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव शामिल हुए, तो अगर अवसर मिला तो मैं तुम्हारे साथ संगति करूँगा, ताकि तुम सत्य समझ सको और अपने भीतर मौजूद समस्याएँ स्पष्ट रूप से देख सको। अगर यह अवसर कभी न आया या अगर तुम्हारे साथ इस पर संगति करना जरूरी न हुआ, तो अगर तुम्हारी इच्छा हो तो तुम स्वयं खोज सकते हो। यदि तुम्हारा स्वभाव बहुत अहंकारी है, या यदि तुम मेरे सामने बदतमीजी से बोलते हो और मेरा अनादर करते हो, तो निश्चिंत रहो, मैं सिद्धांतों के अनुसार तुम्हारे साथ व्यवहार करूँगा। मैं केवल इसलिए तुम्हारी काट-छाँट बिल्कुल नहीं करूँगा कि तुम मेरा अनादर करते हो या तुमने अतीत में मेरा अनादर किया है; मैं ऐसा कोई काम नहीं करूँगा। यदि तुमने मेरा अनादर किया है, तो मुझे यह देखना होगा कि यह जानबूझकर किया गया था या अनजाने में। यदि यह अनजाने में किया गया था, तो मैं इसे ऐसे लूँगा जैसे यह कभी हुआ ही न हो। मैं बस यह समझूँगा कि तुम बेवकूफी कर रहे थे, तुममें तर्क-बुद्धि की कमी थी और तुम बिना सोचे-समझे बोल रहे थे—जब तुम बोले, तो तुम्हें नहीं पता था कि तुम्हारे वचनों की प्रकृति क्या है, और तुम्हें नहीं पता था कि तुम क्या कह रहे हो; यह बस बकवास थी। लेकिन यदि यह जानबूझकर किया गया था, तो मुझे हर किसी के साथ इस मामले पर संगति और चर्चा करनी होगी, और देखना होगा कि क्या तुम केवल मेरे साथ इस तरह से सोचते और कार्य करते हो, या तुम कई लोगों के प्रति, कलीसिया के प्रति और परमेश्वर के घर के प्रति शत्रुतापूर्ण हो; मुझे यह समझना होगा कि विशिष्ट स्थिति क्या है। यदि तुम केवल मेरे प्रति शत्रुतापूर्ण हो, तो मैं तुम्हारा अवलोकन करूँगा; मैं पहले तुम्हें पश्चात्ताप करने का अवसर दूँगा और यह भी देखूँगा कि तुम वास्तव में किस प्रकार के व्यक्ति हो। यदि मेरे प्रति शत्रुतापूर्ण होने के अलावा तुम परमेश्वर के घर, कलीसिया और सभी भाई-बहनों के प्रति भी शत्रुतापूर्ण हो, हमेशा परमेश्वर के घर को हँसी का पात्र बनते देखना चाहते हो और हमेशा मुझे हँसी का पात्र बनते देखना चाहते हो; यदि तुम तब ताली बजाते और खुशी मनाते हो जब बड़ा लाल अजगर और धार्मिक दुनिया मेरे बारे में निराधार अफवाहें गढ़ते हैं, और तुम उन्हें भाई-बहनों के बीच फैलाते भी हो, जानबूझकर मुझे बदनाम और भाई-बहनों को गुमराह करते हो, तो मैं भी सिद्धांतों के अनुसार कार्य करूँगा। मैं तुमसे बदला नहीं लूँगा; मैं तुमसे परमेश्वर के घर के प्रशासनिक आदेशों के अनुसार निपटूँगा, जो कि निष्पक्ष और उचित है। मैं अगुआओं और कार्यकर्ताओं से प्रशासनिक आदेशों को देखने के लिए कहूँगा, मैं पवित्र आत्मा द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले व्यक्ति से इस मामले का भेद पहचानने और इसे सँभालने के लिए कहूँगा, और मैं यह कलीसिया और परमेश्वर के घर पर छोड़ दूँगा कि अंततः इसे कैसे सँभाला जाता है। मैं सिद्धांतों के अनुसार कार्य करता हूँ; निश्चिंत रहो, मैं लोगों के साथ पूर्ण निष्पक्षता से व्यवहार करता हूँ। यदि कोई अच्छा व्यक्ति है जो वास्तव में परमेश्वर में विश्वास और सत्य का अनुसरण करता है, तो वह निश्चित रूप से परमेश्वर के घर में रहेगा। लेकिन यदि कोई बुरा व्यक्ति है जो परमेश्वर के घर और परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण है, जो शैतान का है, और जो एक दुष्ट दानव है, तो परमेश्वर का घर ऐसे किसी भी व्यक्ति को बिल्कुल नहीं छोड़ेगा। क्या तुम समझते हो? (हाँ।) यदि तुम मसीह-विरोधियों, बुरे लोगों, दुष्ट दानवों या शैतान के सेवकों की श्रेणी में आते हो, तो मैं तुम्हारे साथ व्यवहार करने में भी सिद्धांतों के अनुसार कार्य करूँगा; मैं तुम्हारे साथ अन्याय नहीं करूँगा। मुझे यह समझना होगा कि क्या तुमने अनजाने में मेरा अनादर किया, या तुम्हारे मन में व्यक्तिगत रूप से मेरे बारे में बस नकारात्मक मत और विचार हैं—यदि ऐसा इसलिए है कि मैं साधारण दिखता हूँ, मेरा रूप-रंग साधारण और सामान्य है, मैं बहुत ऊँचा नहीं हूँ, मेरी कोई प्रतिष्ठित पृष्ठभूमि नहीं है, मैं एक साधारण पृष्ठभूमि से आता हूँ, और मैं एक साधारण व्यक्ति हूँ कि तुम मुझे नीचा समझते हो और बार-बार मेरा अनादर करते हो, अपमानजनक बातें कहते हो, या क्या ऐसा है कि तुम्हारे मन में पूरी कलीसिया और परमेश्वर के घर के प्रति बुरे विचार और शत्रुता है। मुझे तुम्हारे बारे में जानना होगा। तुम्हारे द्वारा मेरा अनादर किए जाने के बाद मुझे यह देखना होगा कि पर्दे के पीछे कलीसिया के प्रति, भाई-बहनों के प्रति, अपने कर्तव्य के प्रति और परमेश्वर के घर के कार्य की विभिन्न मदों के प्रति तुम्हारा रवैया कैसा है। जब मुझे तुम्हारी सटीक समझ हो जाएगी, तो मैं सिद्धांतों के अनुसार तुमसे निपटूँगा। मैं तुम्हारे साथ अन्याय बिल्कुल नहीं करूँगा; अगर तुम्हें बाहर निकाल दिया जाए तो भी, वह तुम्हारे साथ अन्याय करना नहीं है। परमेश्वर का घर तुमसे निपटने में बिल्कुल सटीक होगा। लेकिन तुमसे निपटने से पहले, मैं बिल्कुल भी व्यक्तिपरक रूप से अपनी ओर से यह नहीं कहूँगा, “इसे कलीसिया से दूर कर दो!” मैं ऐसा बिल्कुल नहीं करूँगा। मैं इस मामले के बारे में जानने, इसकी जाँच करने, इसे सँभालने और इसका समाधान करने के लिए परमेश्वर के घर की प्रक्रियाओं का पालन करता हूँ, अंततः हर किसी से यह स्वीकार कराता हूँ कि इस मामले को सिद्धांतों के अनुसार सँभाला गया था। तुम लोग उन लोगों को देख सकते हो, जिन्हें उनके कर्तव्यों से बर्खास्त कर दिया गया है, जिनसे निपटा गया है और जिन्हें बाहर निकाल दिया गया है, और देख सकते हो कि परमेश्वर का घर उनसे जिस तरह से निपटा, क्या उसका मेरे प्रति उनके रवैये से कोई लेना-देना है। इसके अतिरिक्त, कुछ लोगों ने कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास किया है, फिर भी वे अभी भी मुझसे अविश्वासियों की तरह बात करते हैं। जब मैं यह सुनता हूँ तो मुझे अपने दिल में अरुचि महसूस होती है, लेकिन मैंने उनके मुँह पर उनकी काट-छाँट नहीं की है, न ही मैं कभी उनके पीछे पड़ा हूँ। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो युवा और उतावले हैं, और वे जिससे भी बात करते हैं उसे “अरे तुम” कहकर संबोधित करते हैं, जिसमें औचित्य की भावना की कमी होती है, और वे ऐसे लोगों की तरह लगते हैं जिन्होंने कभी शिष्टाचार नहीं सीखा। मैंने ऐसे लोगों की भी काट-छाँट नहीं की है; मैंने ऐसा काम कभी नहीं किया है। संक्षेप में, चाहे तुम लोगों ने कितने भी समय तक परमेश्वर में विश्वास किया हो, तुम्हारी कोई नींव हो या नहीं, तुम लोगों की मानवता कैसी भी हो, तुम लोग जो भी कर्तव्य करते हो, या मेरा तुम लोगों से केवल एक ही बार सामना हुआ हो या मैं तुम लोगों के साथ कई बार मिला-जुला हूँ, मैं कमोबेश तुम लोगों के प्रकृति सार को समझता हूँ और उसके बारे में एक निश्चित दृष्टिकोण रखता हूँ, और कुछ व्यक्तियों का तो निरूपण भी मेरे पास है। मेरा किसी के प्रकृति सार को समझना और उसके बारे में एक निश्चित दृष्टिकोण रखना उस व्यक्ति के परिणाम से संबंध नहीं रखता, लेकिन उसका निरूपण होना रखता है। उसमें इस प्रकार की अभिव्यक्तियाँ और प्रकटन होते हैं, इसलिए मेरे पास उसके साथ व्यवहार करने के सिद्धांत और उसका निरूपण है। यद्यपि मेरे पास लोगों के लिए सिद्धांत हैं और मैं उनका निरूपण करता हूँ, फिर भी क्या तुमने मुझे किसी से निपटते हुए देखा है? मैं कभी किसी से नहीं निपटा हूँ। मैं परमेश्वर की संप्रभुता और उसकी व्यवस्थाओं की प्रतीक्षा करता हूँ। साथ ही, मैं ये मामले कलीसिया पर छोड़ देता हूँ; कलीसिया सिद्धांतों के अनुसार उनसे निपटेगी। लोगों के साथ व्यवहार करने के मेरे सिद्धांत के बारे में तुम लोग क्या सोचते हो? (यह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप है; अर्थात, परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है।) यह सही है, परमेश्वर हर चीज पर संप्रभु है और उसकी व्यवस्था करता है; हर चीज परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं पर छोड़ दी जानी चाहिए। इन सिद्धांतों में सत्य के प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना भी शामिल है। न केवल तुममें यह जागरूकता और यह रवैया होना जरूरी है, बल्कि तुम्हारा इस तरह से कार्य और अभ्यास करना भी जरूरी है।
देहधारी परमेश्वर के पास परमेश्वर का जीवन है और उसके पास उसके जीवन के रूप में दिव्य सार है। किसी भी अन्य चीज से पहले, वह स्वयं जो कुछ भी करता है, उसमें उसके सिद्धांत, दृष्टिकोण और तरीके सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकते। चाहे उसकी सामान्य मानवता का व्यक्तित्व और अभिव्यक्ति का तरीका कैसा भी हो, या चाहे वह किसी भी प्रकार के लोगों के बीच रहता हो, पहली बात तो यह है कि वह जिन सिद्धांतों का पालन करता है, वे सत्य सिद्धांतों का उल्लंघन नहीं कर सकते; वे परमेश्वर के जीवन और परमेश्वर के सार के अनुरूप हैं। चूँकि देहधारी परमेश्वर तुम लोगों को सिखाता है कि आचरण कैसे करना है, इसलिए पहले उसका स्वयं ऐसा व्यक्ति होना जरूरी है—ऐसा इसलिए है क्योंकि उसका ऐसा जीना है और उसके पास ऐसा सार है कि वह तुम लोगों को ऐसा व्यक्ति बनना सिखा सकता है। केवल इसी बात पर, परमेश्वर के देहधारी शरीर में तुम लोगों को मानव जीवन के सही मार्ग पर ले जाने, तुम लोगों को उद्धार के मार्ग पर ले जाने और तुम लोगों को परमेश्वर के सामने लाने की पर्याप्त क्षमता और स्थितियाँ हैं, जो तुम लोगों को परमेश्वर के प्रति समर्पण का रवैया और दिल रखने में सक्षम बनाती हैं। यदि तुम लोग मेरे द्वारा कहे गए इन वचनों और मेरे द्वारा दिए गए इन उपदेशों का अभ्यास कर सकते हो और उन्हें प्राप्त कर सकते हो, तो ये वचन तुम लोगों को अपने भ्रष्ट स्वभाव उतार फेंकने और ऐसे लोग बनने में पर्याप्त रूप से सक्षम बना सकते हैं, जो परमेश्वर का भय मानते हैं और बुराई से दूर रहते हैं। परमेश्वर का देहधारी शरीर सामान्य मानवता में और वास्तविक जीवन में रहता है, और यद्यपि जीने का यह तरीका और अस्तित्व का यह रूप लोगों के साथ केवल सीमित संपर्क करने देता है, फिर भी सीमित संख्या में लोगों के साथ मिलते-जुलते समय वह लोगों के साथ व्यवहार करने के जिन विभिन्न सिद्धांतों का पालन करता है, वे आचरण के उन सिद्धांतों का खंडन नहीं करते या उनसे टकराते नहीं जो परमेश्वर मनुष्य को सिखाता है, बल्कि उनके अनुरूप होते हैं। इसलिए, जब सामान्य मानवता के प्रकटनों या सभी प्रकार के लोगों के भ्रष्ट स्वभावों के प्रकटनों की बात आती है, तो चाहे वे व्यक्तिगत रूप से मेरे लिए अनादर या धृष्टता हों या नहीं, और चाहे वे उस समय मेरे व्यक्तित्व, प्राथमिकताओं या भावनाओं के अनुकूल हों या नहीं, मैं हर व्यक्ति के साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। यदि तुम हमेशा मुझ पर संदेह करते हो, मुझसे सावधान रहते हो और मेरे खिलाफ साजिश रचते हो या हमेशा सोचते हो कि मैं तुम्हारे खिलाफ साजिश रच रहा हूँ, तो भी मैं तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। तुम चाहे जिस भी प्रकार के भ्रष्ट स्वभाव उजागर करो, चाहे तुम झूठ बोलो, मुझ पर संदेह करो, मेरे बारे में अटकलें लगाओ, मुझसे सावधान रहो और हमेशा मुझसे बचना चाहो या अपने दिल में मेरे खिलाफ साजिश रचो, मैं तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। मैं तुमसे बदला लेने के लिए बिल्कुल भी तुम्हारे तरीकों का उपयोग नहीं करूँगा—मैं दाँत के बदले दाँत और आँख के बदले आँख नहीं करूँगा। अगर मुझे पता भी हो कि तुम क्या सोच रहे हो और मुझे पता हो कि तुम मेरे खिलाफ कैसे साजिश रचना चाहते हो और मेरे साथ कैसे व्यवहार करना चाहते हो, और अगर मैं देख भी लूँ कि तुम मुझे बहुत अमित्रतापूर्ण नजरों से देखते हो, तो भी मैं तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। निश्चिंत रहो, मैं तुमसे बिल्कुल भी बदला नहीं लूँगा। तुम्हें लग सकता है कि, तुमसे बदला न लेकर, मैं वास्तव में तुम्हारा फायदा उठाने का अवसर तलाश कर रहा हूँ और मैं तुम्हारे खिलाफ साजिश रच रहा हूँ। तुम्हारा ऐसा सोचना गलत है; तुम मेरे बारे में अटकलें लगा रहे हो। मैंने तुम लोगों को लोगों के साथ व्यवहार करने के अपने सिद्धांत पहले ही बता दिए हैं। क्या तुम लोग अब मुझे समझते हो? (हाँ।) तो, क्या मेरे साथ निभना बहुत आसान है? क्या लोगों को मेरे साथ संबंध रखना आसान लगता है? (परमेश्वर हमारे साथ ईमानदारी से व्यवहार करता है, इसलिए हमें परमेश्वर के साथ खुला और ईमानदार होना चाहिए।) यह सिद्धांत सही है। लेकिन यदि तुम खुले और ईमानदार नहीं हो सकते, तो मुझे बताओ, क्या मैं तुम्हारी काट-छाँट करूँगा और अतीत में तुम्हारे द्वारा की गई कोई घृणित चीजें उजागर करूँगा? (नहीं।) मेरे दिल में तुम्हारे बारे में एक खराब धारणा बनेगी, मैं अपने मन में सोचूँगा कि यह व्यक्ति बहुत मतलबी है, रुक-रुक कर बोलता है, मानो हर शब्द जबरदस्ती निकालना पड़ रहा हो, और लोगों के साथ स्पष्टवादी नहीं है। लेकिन अगर मेरे दिल में तुम्हारे बारे में खराब धारणा भी हो, तो भी मैं तुम्हारे पीछे नहीं पड़ूँगा। यदि अधिकांश लोग रिपोर्ट करते हैं कि तुम परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य ठीक-ठाक कर रहे हो, लेकिन तुम्हारा स्वभाव थोड़ा धोखेबाज है, तुम मेरे साथ स्पष्टवादी नहीं हो, और तुम हमेशा मेरे सामने दिखावा करते हो और शेखी बघारते हो, तो भी मैं तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार करने और तुम्हें समय के साथ बदलने के अवसर देने में सक्षम हूँगा। मैं बिल्कुल भी यह नहीं देखूँगा कि तुम लोग कौन-से भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हो और फिर यह नहीं कहूँगा, “मैं छोटी-सी गलती भी बर्दाश्त नहीं कर सकता। मैं एक नजर में ही तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों की असलियत जान सकता हूँ। यदि तुम मुझ पर विश्वास नहीं करते, तो मैं उजागर कर दूँगा कि तुम अपने दिल में क्या सोच रहे हो, और तुम देख सकते हो कि मैं सही हूँ या नहीं।” मैं ये चीजें नहीं करता। मैं लोगों के भ्रष्ट स्वभावों की विभिन्न अभिव्यक्तियों के साथ सही ढंग से व्यवहार करता हूँ—जिनमें उनकी बातचीत, उनके व्यवहार और उनके विचारों और दृष्टिकोणों में प्रकट होने वाली अभिव्यक्तियाँ शामिल हैं। यदि तुम ऐसे व्यक्ति हो जो सत्य का अनुसरण करता है और सकारात्मक चीजों से प्रेम करता है, तो तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार धीरे-धीरे अपने इन भ्रष्ट स्वभावों और अवस्थाओं को बदल दोगे। यदि तुम ऐसे व्यक्ति नहीं हो जो सत्य का अनुसरण करता है, तो तुम्हारा जबरन सिंचन करना भी बेकार होगा; तुम नहीं बदलोगे। मेरी उपस्थिति में तुम मेरे प्रति चाहे कितने भी विनम्र और शिष्ट हो, यह किसी काम का नहीं है—यह तुम्हारे सत्य का अभ्यास करने या सत्य के प्रति समर्पण करने का स्थान नहीं ले सकता। चाहे तुम मेरे सामने विनम्र हो या अशिष्ट, मैं तुम्हारे साथ सही ढंग से व्यवहार करूँगा। अतीत में, कुछ ऐसे लोग थे जिन्होंने अपने छोटे आध्यात्मिक कद और सत्य की समझ की कमी के कारण मेरे साथ मिलते-जुलते और संवाद करते समय कई भ्रष्ट स्वभाव प्रकट किए, और उन्होंने बहुत विद्रोहीपन और प्रतिरोध भी प्रदर्शित किया। लेकिन बाद में, उन्होंने पछतावा महसूस किया और खुद को बदल लिया, और कुछ वर्षों बाद उन्होंने कुछ सत्य समझे और वे बदल गए। संयोग से, परमेश्वर के घर ने उन्हें फिर से पदोन्नत कर दिया। जब मैंने सुना कि उन्हें पदोन्नत किया गया है, तो मैं अपने दिल में काफी खुश हुआ। देखा तुमने, मैं मन में बैर नहीं रखता, है ना? (तुम बैर नहीं रखते।) मैं अभी भी उनके साथ सही ढंग से व्यवहार कर सकता हूँ। मैं यह नहीं कहता, “पहले, तुमने मेरे प्रति अनादर दिखाया, मेरी कोई बात नहीं सुनी और ऐसी बहुत सारी चीजें कीं जिनसे मेरी भावनाओं को ठेस पहुँची। अब तुम फिर से पदोन्नत किए गए हो। मुझे तुम्हें बताना होगा कि मुझे वे सभी चीजें पता हैं जो तुमने पहले की थीं; यह मत सोचना कि मैं उन्हें भूल गया हूँ।” मैं ये चीजें नहीं करता। इसके बजाय, मैं यह कहते हुए उन्हें सांत्वना देता हूँ, “पूरी लगन से अनुसरण करो। मन पर कोई बोझ मत रखो।” जब लोगों का आध्यात्मिक कद छोटा होता है और वे सत्य नहीं समझते, तो वे सभी विद्रोहीपन प्रकट करेंगे, क्योंकि लोग भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में जीते हैं, और जिनके दिलों में सत्य की सत्ता नहीं होती, वे अपना प्रभार नहीं ले सकते, न चाहते हुए भी चीजें कह और कर देते हैं। भ्रष्ट स्वभावों से जीने वाले लोग ऐसे ही होते हैं। इसलिए, सत्य के अपने अनुसरण में मन पर कोई बोझ मत रखो। मैं किसी व्यक्ति या लोगों की किसी प्रजाति को पूर्वाग्रह की नजर से बिल्कुल नहीं देखूँगा। मैं तुम्हारी शिक्षा के स्तर या तुम्हारे अतीत को नहीं देखता। मैं केवल तुम्हारे मानवता सार और तुम्हारे अनुसरण को देखता हूँ, साथ ही सत्य के प्रति तुम्हारे रवैये, परमेश्वर के प्रति तुम्हारे रवैये और अपने कर्तव्य के प्रति तुम्हारे रवैये को देखता हूँ। यदि तुम कभी अपना कर्तव्य करने में लापरवाह रहे और तुमने परमेश्वर के घर को कुछ नुकसान पहुँचाया, यहाँ तक कि अपना कर्तव्य करते समय ऐसे बुरे कर्म किए जिनसे विघ्न-बाधा उत्पन्न हुई, यद्यपि वे चीजें मेरे दिमाग में स्पष्ट हैं और मेरी स्मृति में अंकित हैं, फिर भी मैं तुम्हें देखने के अपने तरीके में उन चीजों से प्रभावित या गुमराह नहीं हूँगा। मैं तुम्हारे बारे में एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाऊँगा; मैं तुम्हें सत्य सिद्धांतों के अनुसार देखूँगा, यह देखूँगा कि तुम अब अपना कर्तव्य कैसे करते हो उसके साथ कैसे पेश आते हो, और क्या तुम अभी भी पहले की तरह ही खानापूरी करने वाले हो। अतीत में तुम परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं कर सके, तुम बहुत अधिक सतर्कता बरतते थे और सबको खुश रखने वाला बनने की कोशिश करते थे। क्या तुमने अब दिशा बदल ली है और तुम बदल गए हो? क्या तुम सत्य सिद्धांतों के अनुसार कुछ सत्यों का अभ्यास कर सकते हो? तुम हमेशा दैहिक आराम के लिए ललचाया करते थे; क्या तुम अब कष्ट सह सकते हो? क्या तुम ईमानदारी से खुद को खपा रहे हो? क्या तुम अपना कर्तव्य करने के दौरान सत्य खोज सकते हो? क्या तुममें थोड़ी वफादारी और ईमानदारी है? क्या तुमने पहले की तुलना में प्रगति की है और खुद को बदला है? ये वे चीजें हैं, जिन्हें मैं देखता हूँ। यदि तुम अतीत में हमेशा खानापूरी करते थे, आराम में लिप्त रहते थे और परमेश्वर के घर के हितों की रक्षा नहीं करते थे, और तुम अब भी ऐसे ही हो, तो मैं अपने दिल में तुम्हारे प्रति कोई अनुकूल भावना नहीं रखूँगा। यदि तुम अतीत में वैसे थे, तो यद्यपि मेरे मन में तुम्हारे बारे में एक खराब धारणा थी, लेकिन अब चूँकि तुम बदल गए हो, मैं काफी खुश हूँ। और मैं तुम्हें यह कहते हुए सांत्वना भी दूँगा, “अब से इसी तरह अनुसरण करो। अतीत में तुम्हारा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा था, तुम युवा और नासमझ थे, और तुमने बस बेकाबू होकर बुरे काम किए; ये सभी तुम्हारे लिए सबक हैं। तुम्हें अपनी खानापूरी और अपने बुरे कर्मों का समाधान करने के लिए सत्य का अनुसरण करना चाहिए, और तब तुम वास्तव में बदल गए होगे।” मैं तुम्हें सांत्वना दूँगा और प्रोत्साहित करूँगा। यदि वे बुरे लोग होते, तो यह देखकर कि तुम बदल गए हो, वे तुमसे ईर्ष्या करते और तुमसे नफरत करते। वे तुम्हारे प्रति विनम्र न होते, कहते, “मुझे वे घृणित चीजें उजागर करनी होंगी जो तुमने अतीत में की थीं और लोगों को दिखाना होगा कि तुम पहले कितने घिनौने थे। यह मत समझना कि मुझे इन सबके बारे में पता नहीं है!” देखो, भ्रष्ट इंसान बस होशियार बनना, क्षुद्र चालें चलना, अपनी उपस्थिति दर्ज कराना, लोगों की कमियाँ उजागर करना, और लोगों का घृणित अतीत खोदकर निकालना पसंद करते हैं। मैं वास्तव में कभी ऐसा नहीं करता। मैं लोगों से कभी ऐसी बातें नहीं कहता। मैं बस उन्हें प्रोत्साहित करने और सांत्वना देने की कोशिश करता हूँ, ताकि वे अपने दिलों में शांति महसूस करें और महसूस करें कि सत्य का अनुसरण करना अच्छा है। जब मैं देखता हूँ कि वे थोड़े बदल गए हैं, तो मुझे उन्हें प्रोत्साहित करना होगा, उन्हें यह बताना होगा कि उन्होंने प्रगति की है, और उन्हें कुछ प्रेरणा और आत्मविश्वास देना होगा। मुझे बताओ, लोगों के साथ इस तरह से व्यवहार करने में, क्या मैं सिद्धांतों के भीतर कार्य कर रहा हूँ? (हाँ।) क्या मैं स्वाभाविकता से या उतावलेपन से कार्य करता हूँ? (नहीं।) कुछ लोग कहते हैं, “क्या ऐसा है कि तुम्हारी याददाश्त खराब है? शायद तुम इन चीजों की परवाह नहीं करते? या तुम स्वाभाविक रूप से उदार हो?” मुझे बताओ, क्या इसका व्यक्तित्व, उदार होने या याददाश्त से कोई लेना-देना है? (नहीं।) अगर कोई व्यक्ति स्वाभाविक रूप से उदार भी हो और उसका व्यक्तित्व अच्छा भी हो, तो भी यदि वह भ्रष्ट स्वभावों के नियंत्रण में जीता है, तो वह अभी भी लोगों के साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार नहीं कर सकता या लोगों को सही मार्ग पर चलने के अवसर नहीं दे सकता; वह इसे हासिल नहीं कर सकता। अधिक से अधिक, भ्रष्ट इंसान कहेंगे, “मैं तुम्हारी कमियाँ उजागर नहीं करूँगा; वरना लोग मुझ पर हँसेंगे।” वे ऐसा गौरव की खातिर और दुनिया में जनमत के दबाव के कारण करते हैं, उन्हें चिंता होती है कि उस तरह से आचरण करने से वे क्षुद्र और अनुदार दिखेंगे। वे केवल अपने गौरव की रक्षा करने के लिए लोगों की कमियाँ उजागर करने से बचते हैं, लेकिन क्या वे लोगों के लिए कुछ सही मार्ग बता सकते हैं? (नहीं।) अधिकांश लोगों के लिए यही बहुत अच्छा है कि वे बदला लेने से बच सकें—उनसे अन्य लोगों की मदद करने या उनका भला चाहने के लिए कहना उनके सामर्थ्य से बाहर है। अधिक से अधिक, वे महसूस करते हैं, “तुम अच्छा करते हो या नहीं, इससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है।” कुछ लोग घोषणा करते हैं, “मैं सद्गुणों वाला एक विनम्र व्यक्ति हूँ; मैं लोगों से बदला नहीं ले सकता,” लेकिन अपने दिलों में वे सोचते हैं, “काश तुम्हारा बुरा हो। यदि तुम अच्छा करते हो, तो मैं अंदर से असहज महसूस करूँगा। मैं तब खुश हूँगा, जब अंततः वह दिन आएगा जब तुम मर जाओगे!” उनके वचन परोपकार, धार्मिकता और नैतिकता से भरे होते हैं, लेकिन उनके दिल कुटिल और दुष्ट होते हैं। वे अच्छी लगने वाली बातों के अलावा कुछ नहीं कहते, जबकि उनके दिल किसी भी अन्य व्यक्ति के दिल से अधिक दुर्भावनापूर्ण होते हैं। इसे ही कहते हैं मुँह में राम बगल में छुरी; इसे ही पाखंडी होना कहा जाता है। देखो, क्या भ्रष्ट इंसान अन्य लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के आधार पर व्यवहार कर सकते हैं? भ्रष्ट इंसान सोचते कुछ और हैं और करते कुछ और हैं। बाहरी तौर पर, खुद को सम्मानजनक, सुसंस्कृत और कुलीन दिखाने के लिए, वे कुछ अच्छी लगने वाली बातें कहते हैं, लेकिन वे अपने दिलों में वैसा नहीं सोचते और गुप्त रूप से दूसरों की राह में अड़ंगे डालने वाली चीजें करते हैं। इसलिए, जब अविश्वासियों के लोगों के साथ व्यवहार करने के तरीके की बात आती है, तो भले ही वे तुमसे बदला न लें, लेकिन वे तुम्हारा भला भी नहीं चाहेंगे। जिस तरीके से वे लोगों के साथ व्यवहार करते हैं, वह सत्य सिद्धांतों के अनुरूप नहीं होता। जब वे तुम्हें अच्छा करते हुए देखते हैं, तब वे अपने दिलों में असहज और ईर्ष्यालु महसूस करते हैं; जब वे तुम्हें बुरा करते हुए देखते हैं, तब यदि उन्हें मौका मिलता है, तो वे तुम्हारे घावों पर नमक छिड़केंगे या यहाँ तक कि तुम्हें कुछ बार लातें भी मारेंगे, और तभी उन्हें अपनी नफरत कम होती महसूस होगी। उनके लिए बदला लेने से बचना ही काफी कठिन है—लोगों के प्रति सिद्धांतवादी होना तो उनके लिए और भी कठिन है; उनमें ऐसी मानवता नहीं है।
देहधारी परमेश्वर एक साधारण व्यक्ति बन गया। अपने दैनिक जीवन में उसके लोगों के साथ व्यवहार करने का तरीका कम से कम जमीर और विवेक की सीमाओं के भीतर है; यह इस मानक से नीचे बिल्कुल नहीं गिरेगा, और केवल इसके ऊपर ही हो सकता है। कहने की आवश्यकता नहीं है कि देहधारी परमेश्वर लोगों के साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करता है। चूँकि उसमें दिव्य सार है, इसलिए वह तुम्हारे साथ सत्य सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करने में और भी अधिक सक्षम है, और वह तुम्हारे पीछे बिल्कुल नहीं पड़ेगा। यह ठीक वैसा ही है. जैसे परमेश्वर का घर सभी प्रकार के लोगों के साथ व्यवहार करता है—सभी स्तरों पर अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बर्खास्त करना, लोगों को सौंपे गए कर्तव्य समायोजित करना या उन्हें बर्खास्त करना, सभी प्रकार के लोगों को दूर करना आदि, ये सभी सिद्धांतों के अनुसार किए जाते हैं, किसी की प्राथमिकताओं के आधार पर तय नहीं किए जाते; इन निर्णयों पर कलीसिया में अधिकांश लोगों की सहमति रहती है। इसलिए परमेश्वर के घर में सत्य पूर्ण रूप से सत्ता में रहता है; यह सच है। यहाँ तक कि सामान्य मानवता वाले लोग भी उस तरह से काम कर सकते हैं जो सामान्य लोगों में मौजूद जमीर के मानक के अनुरूप हो, और जब सत्य सिद्धांत शामिल होते हैं, तो वे अभी भी सामान्य लोगों के जमीर और विवेक के मानकों का पालन कर सकते हैं—तो देहधारी परमेश्वर द्वारा धारण की गई सामान्य मानवता के लिए यह कितना अधिक सच है। कलीसिया के काम, कर्तव्य जो तुम लोग करते हो, और तुम्हारे भ्रष्ट स्वभावों से जुड़े मामलों के संबंध में, वह सिद्धांतों के अनुसार तुम लोगों के साथ व्यवहार करने में और भी अधिक सक्षम है। जब बात यह आती है कि मैं, यह साधारण और सामान्य व्यक्ति, तुम लोगों के साथ मिलता-जुलता और संपर्क में आता हूँ, तब चाहे मैं सत्य पर कैसे भी संगति करूँ या कैसी भी समस्याएँ सँभालूँ, मुझे बताओ, क्या मेरी यह सामान्य मानवता तुम लोगों के भरोसे के लायक है? (हाँ।) क्या तुम लोगों को मुझसे सावधान रहने के लिए बचाव की कोई दीवार बनाने की आवश्यकता है? (नहीं।) तो मैं तुम लोगों को यह बता दूँ : मेरे साथ बात करते और मिलते-जुलते समय तुम्हें बस खुला और ईमानदार होने की आवश्यकता है। मैं तुम्हारे बारे में चाहे कितना भी जानता होऊँ या मैं तुम्हारे बारे में जो कुछ भी जानता होऊँ, मैं तुम्हारे साथ सिद्धांतों के अनुसार व्यवहार करूँगा। मेरे प्रति तुम्हारा रवैया चाहे जो भी हो, मैं फिर भी तुम्हारे साथ सिद्धांतों के अनुसार ही व्यवहार करूँगा। तुम निश्चिंत रह सकते हो; मुझसे सावधान रहने की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा दिव्य सार और दिव्य जीवन अलग रखते हुए बस मेरे, इस साधारण व्यक्ति के इस सामान्य और व्यावहारिक पक्ष में मौजूद मानवता सार ऐसी चीज है जिस पर तुम लोग विश्वास कर सकते हो। हम चाहे जिस भी बात पर चर्चा कर रहे हों, तुम्हारी मानसिकता जटिल नहीं होनी चाहिए। तुम्हें बस सरल और खुला होने की आवश्यकता है। यदि तुम किन्हीं कठिनाइयों का सामना कर रहे हो, तो बस उनके बारे में सीधे बात करो। मुझसे इस तरह सावधान रहने की कोई आवश्यकता नहीं है, जैसे तुम किसी अजनबी से सावधान रहते हो। यदि तुम हमेशा मुझसे सावधान रहते हो, तो मैं तुम्हें एक बात बताने जा रहा हूँ : तुम बहुत मूर्ख हो, और तुम अंधे हो! क्या तुम नहीं जानते कि मैं क्या कार्य करता हूँ? तुम मुझसे जितना अधिक सावधान रहोगे, अंत में तुम सत्य प्राप्त करने में उतने ही कम सक्षम होगे। क्या यह खुद को रोकना और बर्बाद करना नहीं है? यदि तुम हमेशा परमेश्वर के देहधारी शरीर पर संदेह करते हो और उससे सावधान रहते हो, और चाहे वह कैसे भी बोले और सत्य पर संगति करे, तुम हमेशा जाँच-परख का रवैया बनाए रखते हो, और जो वह कहता है उसे स्वीकार नहीं करते भले ही तुम यह स्वीकार करते हो कि यह सत्य है, तो न केवल पवित्र आत्मा तुम्हें प्रबुद्ध नहीं करेगा या तुम्हें आशीष नहीं देगा, बल्कि इसके विपरीत परमेश्वर तुमसे अपना मुँह छिपा लेगा और तुम्हें अनदेखा कर देगा। यदि तुम्हें मुझ पर विश्वास न हो, तो बस आजमाकर देखो कि क्या ऐसा ही है। यदि मेरे, सामान्य मानवता वाले इस साधारण व्यक्ति के, साथ मिलते-जुलते समय तुम्हारे कोई सिद्धांत नहीं हैं, तुम नहीं जानते कि मेरे साथ कैसे बातचीत करनी है, और तुम नहीं जानते कि परमेश्वर तुम्हें जो सिद्धांत सिखाता है उनके अनुसार मेरे साथ कैसे व्यवहार करना है, तो क्या तुम स्वर्गिक परमेश्वर के साथ भी वैसा ही व्यवहार नहीं करोगे? (हाँ।) यदि तुम स्वर्गिक परमेश्वर के साथ उसी तरह से बातचीत करते हो, तो इसके परिणाम क्या होंगे? (हमें दोषी ठहराया जाएगा और मार गिराया जाएगा।) तुम फिर से गलत हो। परमेश्वर मनमाने ढंग से लोगों को मार नहीं गिराता। लेकिन तुम्हें परमेश्वर का वास्तविक रूप देखने का अवसर कभी नहीं मिलेगा, न ही तुम कभी इसके योग्य होगे; यह एक तथ्य है। तुम कभी परमेश्वर का वास्तविक रूप देखने के योग्य नहीं होगे—यहाँ तक कि तुम परमेश्वर की पीठ भी नहीं देख पाओगे। इसका क्या अर्थ है? इसका अर्थ है कि परमेश्वर तुम्हें कभी अपना सृजित प्राणी स्वीकार नहीं करेगा। इसका क्या अर्थ था कि अय्यूब ने यहोवा की पीठ देखी? इसका क्या अर्थ था कि अब्राहम ने परमेश्वर की आवाज सुनी जो उससे बात कर रही थी? (परमेश्वर ने उन्हें स्वीकृति दी थी।) इसका अर्थ था कि वे परमेश्वर के साथ बातचीत करने, स्वर्गिक परमेश्वर के साथ, उसके वास्तविक रूप के साथ, परमेश्वर के आत्मा के साथ बातचीत करने के योग्य थे। परमेश्वर ने उन्हें सृजित प्राणियों के रूप में मान्यता दी और स्वीकार किया। परमेश्वर ने उन्हें सृजित प्राणियों के रूप में स्वीकार किया। परमेश्वर ने उन्हें प्राप्त कर लिया। इसका महत्व बहुत गहरा है! परमेश्वर उनसे मिलने के लिए तैयार था और उनके साथ बातचीत करने के लिए तैयार था। परमेश्वर चाहता था कि वे स्वर्ग से आती उसकी आवाज की ध्वनि सुनें। परमेश्वर उन्हें अपना आध्यात्मिक शरीर देखने देना चाहता था, उसे उन पर प्रकट करना चाहता था। मानवों के लिए यह कितना बड़ा आशीष है! यह बहुत बड़ा सम्मान है! क्या तुम लोग इसे खोजते हो? तुम लोग शायद इसे खोजने का साहस न करो, लेकिन तुम्हें यह इच्छा रखनी होगी। तो इस इच्छा को साकार करने के लिए तुम्हें कैसे अभ्यास करना चाहिए? पहले देहधारी परमेश्वर, इस साधारण और सामान्य व्यक्ति के साथ व्यवहार करने के अपने तरीके के साथ अपना अभ्यास शुरू करो। तुम्हें उसके साथ कैसे मिलना-जुलना और कैसे व्यवहार करना चाहिए? जब तुम उसे उसके मूर्त रूप में देखते हो, तब यदि तुम उसके साथ सामान्य रूप से मिल-जुल सकते हो, उसके बारे में सब कुछ स्वीकार कर सकते हो, उसके साथ खुले और ईमानदार हो सकते हो, और उसके साथ मिलने-जुलने और जुड़ने में तुम्हें कोई बाधा या कठिनाई नहीं है, तो परमेश्वर के सामने—कम से कम मेरी नजर में—मैं तुम्हारे साथ मिलने-जुलने के लिए तैयार हूँगा; मैं तुमसे अरुचि महसूस नहीं करूँगा। तब तुम्हें परमेश्वर की आवाज सुनने, स्वर्ग से आती परमेश्वर की अपनी आवाज सुनने और परमेश्वर की आकृति देखने का अवसर प्राप्त हो सकता है और तुम इसके योग्य हो सकते हो। बेशक, अभी तुम लोग इस लक्ष्य से बहुत दूर हो; मैं बस तुम लोगों को एक मार्ग दे रहा हूँ। यदि तुम लोग इस बाधा को भी पार नहीं कर सकते जो मैं, यह साधारण व्यक्ति, प्रस्तुत करता हूँ, फिर भी तुम स्वर्गिक परमेश्वर को देखना चाहते हो, तो मुझे तुम्हें एक बात बतानी है : इसकी कोई संभावना नहीं है! यह सचमुच कोरी कल्पना है!
ठीक है, चलो आज के लिए अपनी संगति यहीं समाप्त करते हैं। अलविदा!
14 सितंबर 2024