1. मैंने अपनी नकारात्मक भावनाओं को कैसे पराजित किया

डेज़ी, यूएसए

अक्टूबर 2022 में मुझे और शैली को कलीसिया अगुआ चुना गया। चूँकि हमने अभ्यास करना अभी शुरू ही किया था और हम कई कामों से परिचित नहीं थीं, इसलिए हम मामलों पर हमेशा मिलकर चर्चा करती थीं। कुछ समय बाद हमारे कार्य के कुछ नतीजे दिखने लगे। शैली में अपेक्षाकृत अच्छी काबिलियत थी। जब भी अगुआ सवाल पूछती थी, वह तुरंत जवाब दे सकती थी। ज्यादातर समय, अगुआ भी उसकी बात मानती थी। परिणामस्वरूप, अगुआ बहुत-से मामलों पर शैली से सुझाव माँगना ज्यादा पसंद करती थी, जबकि मैं एक तरफ फालतू-सी बैठी रहती थी। मैं मन ही मन सोचती, “शैली में अच्छी काबिलियत है और अगुआ भी उसके बारे में अपेक्षाकृत ज्यादा अच्छी राय रखती है, जबकि मैं लंबे समय तक बिना कुछ बोले बैठी रहती हूँ। अगुआ ने शायद मुझमें योग्यता के अभाव की असलियत देख ली है और सोचती है कि मैं केवल थोड़ा-बहुत सहायक कार्य ही कर सकती हूँ।” मैं थोड़ी निराश हो जाती थी, लेकिन फिर मुझे लगता था कि चूँकि मैंने अभी अभ्यास करना शुरू ही किया है और मेरी काबिलियत उतनी अच्छी नहीं है, इसलिए किसी महत्वपूर्ण कार्य के लिए मेरा उपयोग न किया जाना एक सामान्य बात है। मैंने खुद को सांत्वना दी और मेरे मन से यह भावना निकल गई।

आगे चलकर, हमारे जिम्मे का काम काफी बढ़ गया। काम सौंपते समय अगुआ हम दोनों को बुलाती। लेकिन जब कुछ ज्यादा चुनौतीपूर्ण कार्यों के कार्यान्वयन की बात आती, तो अगुआ विशिष्ट रूप से शैली से उन कामों का अनुवर्तन कराने की बात कहती थी, शायद ही कभी मेरे नाम का जिक्र करती थी। ज्यादा से ज्यादा, अगुआ इतना भर कह देती, “शैली, तुम और बाकी लोग इस कार्य को देख लेना।” ऊपर से तो मैं दिखाती कि मैं परवाह नहीं करती, लेकिन अंदर ही अंदर बेचैन हो जाती : “मुझे ही हमेशा अनदेखा किया जाता है, मैं ‘बाकियों’ का एक हिस्सा-मात्र हूँ। ऐसा लगता है जैसे अगुआ के लिए मेरा कोई वजूद ही नहीं है। लेकिन मैं कुछ कर नहीं सकती; आखिरकार, मेरी काबिलियत उतनी नहीं है जितनी कि शैली की है। ठीक है, बस उतना ही करूँगी जितना कर सकती हूँ।” इसके बाद, मैं कामों का अनुवर्तन करने में अधिकाधिक निष्क्रिय होती चली गई और जिस कार्य के लिए शैली जिम्मेदार थी, उसमें मैं ज्यादा शामिल नहीं होना चाहती थी। जब वह मुझसे काम के बारे में चर्चा करने आती तो मैं आधे-अधूरे मन से जवाब देती। कभी-कभी सब लोग किसी समस्या पर सक्रिय रूप से चर्चा करते, और मैं एक बाहरी व्यक्ति की तरह महसूस करती, दोपहर-भर शायद ही कोई शब्द मेरे मुँह से निकलता था। कभी-कभी मेरे पास कुछ विचार होते, लेकिन मुझे यकीन नहीं हो पाता था कि वे सही भी हैं या नहीं। अगर मैंने कुछ गलत बोल दिया, तो कहीं मैं मूर्ख तो नहीं कहलाऊँगी? बहुत सोच-विचार करने के बाद, मैंने तय किया कि नहीं बोलना है। इस तरह, मुझे अधिकाधिक यह लगता कि मुझमें कम काबिलियत है और मैं ज्यादा उपयोगी नहीं हूँ, इसलिए मैं अब इतने सारे कार्य के लिए जिम्मेदार नहीं होना चाहती थी। फिर मैंने अपना ध्यान सिंचन कार्य पर लगा दिया। उस समय, कलीसिया में सिंचन समूह के अगुआ की कमी थी, और मुझे बहन रोज़ का ख्याल आया, जो पहले नए विश्वासियों को सिंचित करने में कुछ परिणाम हासिल कर चुकी थी। लेकिन भाई-बहनों का कहना था कि वह अपने कर्तव्य का बोझ नहीं उठाती थी और समूह अगुआ बनने योग्य नहीं थी। मैं शैली के साथ इस पर चर्चा करना चाहती थी, लेकिन उसकी व्यस्तता को देखते हुए, मैंने उससे उस बात की चर्चा नहीं की, मुझे डर था कि कहीं वह यह न कहे कि मुझमें बहुत ही कम काबिलियत है क्योंकि मैं इस छोटे से काम को भी नहीं सँभाल पाती। मैंने सोचा, “रोज़ में अच्छी काबिलियत है और वह कुछ समस्याओं को सुलझाने के लिए संगति कर सकती है। भले ही अपने पति से बाधित होने के कारण शायद वह अब बोझ न उठा पाए, फिर भी मेरी ओर से अधिक अनुवर्तन और संगति होने के चलते, इससे कार्य में देरी नहीं होनी चाहिए।” इसलिए, मैंने रोज़ को सिंचन कार्य के समूह अगुआ के लिए चुन लिया। लेकिन कुछ दिनों बाद, मुझे पता चला कि रोज़ ने अपने पति से बाधित होने के कारण अपना कर्तव्य छोड़ दिया और वह घर चली गई है। यह सुनकर मैं स्तब्ध रह गई, सोचने लगी, “सब कुछ खत्म हो गया। मैंने उसे चुना था। क्या इससे यह प्रकट नहीं होता कि मुझमें कोई विवेकशीलता नहीं है? एक छोटे से काम को भी स्वतंत्र रूप से करते हुए गलतियाँ करती हूँ, यह वाकई बहुत बुरी बात है; अगर इससे नए विश्वासियों को सिंचित करने में देरी हुई, तो मैं कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी पैदा कर रही हूँगी।” सोच-सोचकर मुझे बहुत बुरा लग रहा था, मुझे यकीन होने लगा था कि मैं कुछ भी अच्छा नहीं कर सकती। चूँकि मुझमें काबिलियत और विवेकशीलता की कमी है और मैं चीजों को स्पष्ट रूप से नहीं देख पाती, इसलिए इससे पहले कि भाई-बहनों को और ज्यादा नुकसान पहुँचे और कलीसिया के कार्य में देरी हो, मुझे फौरन इस्तीफा दे देना चाहिए। इसलिए, मैंने अपना त्यागपत्र लिखा और अगुआ और शैली को भेज दिया। कुछ समय बाद ही, शैली ने मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश भेजा : “हर किसी के सामने ऐसा समय आता है जब वह गलतियाँ करता है और हर किसी का सामना ऐसी चीजों से होता है जो उसकी काबिलियत और अंतर्दृष्टि से परे होती हैं, चाहे वह कोई भी कर्तव्य निभाए या कोई भी काम करे। यह बहुत सामान्य है और तुम्हें इसे सही ढंग से लेना सीखना होगा। किसी भी हाल में, चाहे तुमसे कोई भी गलती हो, तुम्हें उसका सक्रिय रूप से सामना करना चाहिए, समस्या की जड़ का पता लगाना चाहिए और उसे हल करने के लिए सत्य की खोज करनी चाहिए। थोड़ी-सी कठिनाई का सामना होने पर नकारात्मक या दमित महसूस न करो और नकारात्मक भावनाओं में न पड़ो। यह राई का पहाड़ बनाना है और इसकी कोई जरूरत नहीं है। तुम्हें जो करना चाहिए वह यह है कि तुरंत आत्म-चिंतन करो और देखो कि क्या गलती तुम्हारे काम में कुशलता की कमी, तुम्हारे कामों में व्यक्तिगत इरादों की मिलावट, या तुम्हारी अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के आधार पर काम करने की समस्या के कारण हुई थी। तुम्हें इन सभी पहलुओं की जाँच करनी चाहिए। अगर यह तुम्हारे काम में कुशलता की कमी की समस्या है, तो तुम पेशेवर कौशल सीख सकते हो, या उन लोगों से सलाह-मशविरा कर सकते हो जो उस पेशे को समझते हैं। अगर तुम्हारे इरादे गलत हैं या तुम्हारे पास धारणाएँ और कल्पनाएँ हैं, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों पर आत्मचिंतन करना चाहिए और उनमें खुद को जानने की कोशिश करनी चाहिए और फिर अपने गलत इरादों या धारणाओं को सुधारना चाहिए और उनके खिलाफ विद्रोह करना चाहिए और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए। बेशक, अगर तुम खुद समस्या का समाधान नहीं कर सकते, तो तुम किसी कलीसिया अगुआ या सत्य को समझने वाले किसी व्यक्ति से खोज सकते हो और संगति भी कर सकते हो। क्या इस तरह से समस्या हल नहीं हो जाएगी? आने वाले दिनों में, तुम्हें अपना कर्तव्य निभाते रहना चाहिए। जब तक तुम जीवित हो, तुम्हें वह कर्तव्य पूरा करना चाहिए जो तुम्हें करना है। यह एक ऐसा लक्ष्य है जो व्यक्ति के पूरे जीवन में कभी नहीं बदलना चाहिए। चाहे जब भी हो, चाहे तुम किसी भी कठिनाई का सामना करो या तुम्हें किसी भी नाकामी और असफलता का सामना करना पड़े, तुम्हें दमित महसूस नहीं करना चाहिए। अगर, जब भी तुम थोड़ी-सी कठिनाई का सामना करते हो, तुम दमन की भावना में पड़ जाते हो और एक ही जगह पर अटक जाते हो, अपना कर्तव्य निभाने की कोई प्रेरणा नहीं होती और ढह जाते हो, तो क्या यह बहुत निकम्मा और कायर होना नहीं है? किस तरह का व्यक्ति हमेशा दमित महसूस करता है? निकम्मे कायर अक्सर दमित महसूस करते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (6))। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने अपने अंदर बहुत सहज महसूस किया। परमेश्वर ने कहा कि अपने कर्तव्य निभाते समय लोगों के सामने ऐसे दौर भी आते हैं जब सत्य की समझ न होने के कारण वे भ्रमित हो सकते हैं, गलतियाँ कर सकते हैं या सिद्धांतों का उल्लंघन कर सकते हैं। इसलिए जब ऐसी समस्याएँ आती हैं जिनसे काम को कुछ नुकसान होता है, या जब लोगों की काट-छाँट की जाती है, तो ये सब सामान्य हैं और इनके साथ सही तरीके से पेश आना चाहिए। मुख्य बात है असफलताओं से सबक सीखना, आत्म-चिंतन करना, पश्चात्ताप करना और खुद को बदलना। अगर भ्रष्ट स्वभाव के अनुसार काम करने से कार्य में हानि होती है, तो फिर व्यक्ति को भ्रष्ट स्वभावों के समाधान के लिए सत्य की खोज करनी चाहिए। अगर कौशल की कमी के कारण कार्य अप्रभावी है, तो व्यक्ति को तुरंत सीखना चाहिए या किसी ज्यादा कुशल व्यक्ति से परामर्श लेना चाहिए। अगर इन विचलनों या गलतियों के प्रकट होने मात्र के कारण कोई सोचता है कि वह बेनकाब हो गया है और इस प्रकार वह नकारात्मक हो जाता है, अपने ही बारे में फैसला देने लगता है और अपने कर्तव्य निभाने का इच्छुक भी नहीं होता है तो यह दिखाता है कि वह मूर्ख और कमजोर है। मैंने रोज़ को चुनने के मुद्दों पर विचार किया और मुझे एहसास हुआ कि मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को लेकर बहुत चिंतित थी। शैली के साथ सहयोग करने के दौरान, मुझे यही लगता कि हर जगह वही छाई हुई है, इसलिए मैं स्वतंत्र रूप से कोई कार्य करके यह साबित करना चाहती थी कि मुझमें अभी भी कुछ कार्यक्षमताएँ हैं। इसलिए सिंचन समूह के अगुआ का चयन करने के मामले में, यूँ तो मुझमें स्पष्ट रूप से सिद्धांतों का अभाव था और मैं लोगों का भेद पहचान नहीं पाती थी, चूँकि मुझे डर था कि अगर मैंने भाई-बहनों से पूछा, तो वे सोचेंगे कि इतना छोटा-सा काम भी नहीं सँभाल पाने के कारण मैं वाकई अयोग्य हूँ, इसलिए मैंने अपनी कल्पना के अनुसार रोज़ को चुना। मुझमें लोगों को लेकर विवेकशीलता की कमी थी और मैं उन्हें चुनने और उपयोग करने में सिद्धांतों का पालन नहीं करती थी। दरअसल, परमेश्वर का घर काफी पहले संगति कर चुका है कि लोगों को चुनते और उपयोग करते समय, हमें उन लोगों से परामर्श करना और पूछना चाहिए जो उनकी पृष्ठभूमि जानते हैं ताकि चुने गए लोगों को विकसित करने से पहले यह सुनिश्चित हो सके कि उनमें दायित्व-बोध और थोड़ी-बहुत काबिलियत है, और अगर पता चलता है कि किसी व्यक्ति के साथ कोई समस्या है, तो हमें स्थिति को समझने के लिए तुरंत जाँच करनी चाहिए। अगर हम उसे साफ तौर पर न समझ पाएँ, तो हमें किसी ऐसे व्यक्ति से मार्गदर्शन माँगना चाहिए जो सत्य को समझता हो। केवल इसी तरह से हमारा चयन और लोगों का उपयोग ज्यादा सटीक हो सकता है। लेकिन मैंने अपने घमंड और रुतबे की रक्षा के लिए, मनमर्जी से रोज़ को आगे बढ़ाया। मैं मनमाने ढंग से काम कर रही थी और काम के प्रति बेहद गैर-जिम्मेदार थी। अब जबकि कार्य में देरी हो चुकी थी, मुझे हताशा में डूबने और खुद को खारिज करने के बजाय फौरन समस्या का समाधान करने के तरीके सोचने चाहिए। ऐसा करके मैं अपनी जिम्मेदारी से बच रही थी। मैं बहुत स्वार्थी थी!

एक सभा में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जो मेरे लिए बहुत उपयोगी था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम एक दृढ़ संकल्प वाले व्यक्ति हो, अगर तुम उन जिम्मेदारियों और दायित्वों को जो लोगों को वहन करने चाहिए, उन चीजों को जो सामान्य मानवता वाले लोगों को हासिल करनी चाहिए और उन चीजों को जो वयस्कों को हासिल करनी चाहिए, उनसे अपने अनुसरण के उद्देश्य और लक्ष्य के रूप में पेश आ सकते हो और अगर तुम अपनी जिम्मेदारियाँ उठा सकते हो तो तुम चाहे जो भी कीमत चुकाओ और चाहे जिस तरह का दर्द सहो, तुम शिकायत नहीं करोगे और जब तक तुम इसे परमेश्वर की अपेक्षाओं और इरादों के रूप में पहचानते हो, तुम किसी भी पीड़ा को सहन करने में सक्षम होगे और अपना कर्तव्य निभा पाओगे। उस समय तुम्हारी मानसिक स्थिति अलग होगी; अपने दिल में, तुम शांति और स्थिरता महसूस करोगे और आनंद का अनुभव करोगे। देखो, अगर लोग सामान्य रूप से अपने कर्तव्य निभा सकते हैं, परमेश्वर के आदेश का जिम्मा ले सकते हैं और जीवन के सही मार्ग पर चल सकते हैं, तो वे अपने दिलों में शांति और खुशी महसूस करते हैं और स्थिरता और आनंद का अनुभव करते हैं। अगर वे इसके अलावा सत्य का अनुसरण कर सकते हैं और उस मुकाम तक पहुँच सकते हैं जहाँ वे सिद्धांतों के अनुसार कार्य करते हैं और अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से निभाते हैं, तो उनमें कुछ बदलाव आ चुके होंगे। ऐसे लोग वे होते हैं, जिनमें जमीर और विवेक होता है; वे खरे लोग हैं, जो किसी भी कठिनाई पर काबू पा सकते हैं और किसी भी कार्य का जिम्मा ले सकते हैं। वे मसीह के अच्छे सैनिक हैं, वे प्रशिक्षण से गुजरे हैं और कोई भी कठिनाई उन्हें हरा नहीं सकती। मुझे बताओ, क्या इस तरह से आचरण करना अच्छा है? (हाँ, अच्छा है।) ऐसे लोगों में संकल्प होता है; चाहे वे किसी भी कठिनाई का सामना करें, वे अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हैं। तो क्या कठिनाइयों का सामना करते समय, वे तब भी दमित महसूस करेंगे? (नहीं।) तो फिर उनके दमन की भावना कैसे हल होती है, ताकि वे अब इससे परेशान न हों? (सत्य को समझने और अपने भ्रष्ट स्वभावों को जान जाने से, वे दमन के नियंत्रण से मुक्त हो जाते हैं।) यह सही है, यह सत्य को समझना और अपने उचित कार्य पर ध्यान देना शुरू करना है। ... अगर कोई व्यक्ति सत्य को समझता है, तो वह अपने उचित कार्य पर ध्यान दे सकता है और सही मार्ग पर चल सकता है और इसलिए दमन की यह भावना पैदा नहीं होगी। भले ही यह भावना खास परिस्थितियों के कारण कभी-कभी उसमें पैदा हो जाए, यह केवल एक पल की मनोदशा होगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे सत्य की खोज करने और उसका अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, इसलिए भले ही वे नकारात्मक भावनाएँ कभी-कभी दिखाई दें, वे गायब हो जाएँगी। परिणामस्वरूप, ऐसा व्यक्ति अक्सर दमन की भावना में फँसा नहीं रहेगा। दूसरे शब्दों में, तुम दमन की भावना से बिल्कुल भी परेशान नहीं होगे। हो सकता है कि तुम्हारी मनोदशा अस्थायी रूप से खराब हो, लेकिन तुम उसमें नहीं फँसोगे और उसमें से निकलने में असमर्थ नहीं होगे। यही सत्य का अनुसरण करने का महत्व है। अगर तुम अपने उचित कार्य पर ध्यान देने की कोशिश करते हो, अगर तुम वे जिम्मेदारियाँ उठाते हो जो वयस्कों को उठानी चाहिए और अगर तुम्हारे अनुसरण का दृष्टिकोण सही है और तुम्हारे पास जीने का एक सकारात्मक तरीका है, तो तुममें नकारात्मक भावनाएँ विकसित नहीं होंगी और तुम दमन की भावना में नहीं उलझोगे(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))। परमेश्वर के वचन पढ़कर मुझे बहुत शर्म आई। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि वयस्क और जो लोग उचित कार्य सँभालते हैं, वे सही मामलों पर पूरा ध्यान देते हैं। वे हर दिन, अपने कर्तव्यों से जुड़ी बातों के बारे में सोचते हैं, जैसे कि अपने कर्तव्यों को अच्छे से कैसे निभाएँ, उनके कर्तव्यों में अभी भी क्या समस्याएँ हैं, अपना काम बेहतर तरीके से कैसे करें, वगैरह। भले ही उनके कर्तव्यों में कुछ विचलन या गलतियाँ हों, उन्हें असफलताओं का सामना करना पड़ जाए और वे कुछ समय के लिए कमजोर या हताश हो जाएँ, लेकिन वे हमेशा नकारात्मक भावनाओं में नहीं रहते, बल्कि वे अपनी समस्याओं को हल करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य खोजेंगे। लेकिन मैं अभी भी एक ऐसी बेकार इंसान जैसी थी जो जिम्मेदारियाँ नहीं उठा सकती थी। कुछ असफलताओं का सामना कर मैं नकारात्मक हो गई और हार मान बैठी, मुझमें रत्तीभर भी एक वयस्क जितनी हिम्मत नहीं थी। इसके अतिरिक्त, इससे यह भी उजागर हुआ कि हाल ही में मुझे जो करना चाहिए था उस पर मैं ध्यान देने में विफल रही। कलीसिया का काम सँभालने के बाद से, यह देखकर कि मेरी सहयोगी बहन कई पहलुओं में मुझसे बेहतर है, मुझे लगा कि मुझमें काबिलियत की कमी है और मेरी सराहना नहीं की जा रही। इसलिए मैं वास्तव में अपनी क्षमताएँ साबित करने के एक अवसर की उम्मीद कर रही थी। जब अगुआ हमारे साथ सभाएँ करती, तो मैं लगातार उसके हाव-भाव पर गौर करती और उसके लहजे से यह अंदाजा लगाने की कोशिश करती कि वह मुझे महत्व देती है या नहीं। अगर अगुआ विशेष रूप से मुझसे कोई काम करने को कहती, तो मुझे खुशी होती, मुझे लगता कि अगुआ मुझे महत्व देती है, और मुझे अपना कर्तव्य निभाने की प्रेरणा मिलती। लेकिन अगर अगुआ मुख्य जिम्मेदारियाँ मेरी सहयोगी बहन को सौंपती, तो मुझे लगता कि मैं महत्वहीन हूँ। प्रतिष्ठा और रुतबा पाने की मेरी इच्छा पूरी न होने पर मैं दुखी हो जाती। मैं भाई-बहनों के साथ सहयोग तो करती, पर मेरा मन अपने कर्तव्यों पर न रहता बल्कि इस पर रहता कि वे मेरी बात से कितने सहमत हैं। जब कभी मैं अपना कोई दृष्टिकोण सामने रखती और किसी से प्रतिक्रिया न मिलती, तो मैं असहज हो जाती थी। अगर वे कोई उलटे ही सुझाव देते तो मैं और भी ज्यादा नकारात्मक हो जाती और मान बैठती कि मुझमें ही काबिलियत की कमी है, चर्चा में भाग लेने की भी इच्छा न होती। विशेषकर रोज़ के मामले में, विवेकशीलता की कमी के बावजूद मैंने अपनी मनमर्जी के अनुसार बिना सोचे समझे कार्य किया और गलती करने के बाद आत्म-चिंतन नहीं किया, बल्कि मैं नकारात्मक भावनाओं में पड़ गई और इस्तीफा देना चाहती थी। यह सब इसलिए था क्योंकि मैं अपने कर्तव्यों का पालन करते समय सही काम नहीं करती थी, बल्कि हमेशा प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागती थी। मेरी दृष्टि और विचार सिर्फ अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे पर ही केंद्रित रहते थे। जब मुझे लोगों से प्रशंसा न मिलती तो मैं नकारात्मक और दुखी हो जाती थी, यहाँ तक कि कलीसिया के कार्य को भी दर-किनार कर देती थी। ऐसे में मैं अपना कर्तव्य बिल्कुल भी अच्छे से न निभा पाती। इस रवैये से परमेश्वर को घृणा थी। मुझे याद आया परमेश्वर ने कहा था : “खास तौर पर, जो लोग अभी परमेश्वर के घर में अपने कर्तव्य निभा रहे हैं, वे सुसमाचार का प्रचार करने और परमेश्वर की गवाही देने में व्यस्त हैं—वे जो सोच रहे हैं वह यह है कि अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से कैसे निभाया जाए, तो वे दमित कैसे महसूस कर सकते हैं? इसलिए, कुछ लोग जब कोई बात थोड़ी-सी भी उनकी मर्जी के मुताबिक नहीं होती, तो दमित महसूस करने, खराब मूड में आने और हताशा में डूबने की जो अभिव्यक्तियाँ दिखाते हैं, वे सब उनके पूरे दिन भरे पेट के साथ आलस में रहने, किसी भी चीज पर गंभीरता से न सोचने और सत्य की बिल्कुल भी खोज न करने के कारण होती हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (5))। जब मैंने यह देखा कि मेरे आस-पास के सभी भाई-बहन अपने-अपने कर्तव्यों में व्यस्त रहते हैं जबकि मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की चिंताओं में ही उलझी रहती हूँ, इन मुद्दों को हल करने के लिए सत्य नहीं खोजती हूँ, बल्कि और ज्यादा नकारात्मक और प्रतिरोधी बनती जा रही हूँ, तो मुझे एहसास हुआ कि मैं ऐसी इंसान नहीं हूँ जो सत्य का अनुसरण करती है। विशेष रूप से तब जब मुझे ख्याल आया कि शैली ने कहा था कि जिस सुसमाचार कार्य के लिए वह जिम्मेदार है, उसके परिणाम अच्छे नहीं आए, और हर कोई मुश्किलों में है, और वह उम्मीद कर रही थी कि इन मुश्किलों को हम मिल-जुलकर और एकमत होकर दूर कर लेंगे, तो मन ही मन मुझे बहुत अपराध-बोध और ग्लानि हुई। परमेश्वर ने हमारे लिए कलीसिया के कार्य की खातिर जिम्मेदार होने के लिए मिलकर सहयोग करने के लिए वातावरण की व्यवस्था की, लेकिन अपने कर्तव्यों को अच्छे से कैसे निभाऊँ इस पर ध्यान देने के बजाय, मैं अपने क्षुद्र विचारों में खोई हुई थी, नकारात्मक होकर पीछे हट गई थी और इस्तीफा देना चाहती थी। मुझमें सचमुच मानवता का अभाव था! मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं बहुत स्वार्थी हूँ। अभी कलीसिया के कार्य में बहुत सारी कठिनाइयाँ हैं, फिर भी मैंने उचित मामलों पर ध्यान न देकर हर दिन बहन के साथ प्रतिस्पर्धा की। जब मैं उससे बेहतर नहीं बन सकी, तो मैं नकारात्मक हो गई। मुझे लगता है जैसे मैं अंदर से एक गंदी हौदी हूँ, मुझमें कोई भी सकारात्मक अनुसरण नहीं है। मैं न केवल खुद को कष्ट दे रही हूँ बल्कि कलीसिया के कार्य में भी देरी कर रही हूँ। अब मुझे अपनी समस्याएँ समझ में आ गई हैं। हालाँकि मुझमें कोई बहुत काबिलियत नहीं है, फिर भी मुझे बहन के साथ सहयोग करते हुए सौहार्दपूर्ण ढंग से काम करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। कम से कम मुझे अपने रवैये के कारण काम में देरी नहीं करनी चाहिए। हे परमेश्वर, तुम मेरे हृदय की पड़ताल करो; मैं पश्चात्ताप करने को तैयार हूँ!” उसके बाद, अपने कर्तव्य-निर्वहन के प्रति मेरा रवैया और ज्यादा सक्रिय हो गया। मैंने शैली के साथ काम में आने वाली समस्याओं पर सक्रिय रूप से चर्चा करते हुए उन्हें हल करना शुरू कर दिया। कुछ कठिन कार्यों के लिए जिनसे मैं डरती थी, मैं परमेश्वर से प्रार्थना करती और जितना हो सके उनमें भाग लेती। जब मैं दूसरों के कार्यों में कठिनाइयाँ देखती, और ज्यादा सहायता न कर पाती, तो उन्हें हल करने में सहयोग के लिए किसी ऐसे व्यक्ति को ढूँढ़ती थी जिसे सत्य की समझ हो। कभी-कभी, भले ही अगुआ मेरे नाम का उल्लेख किए बिना किसी काम का अनुवर्तन करने का जिम्मा विशेष रूप से शैली को सौंपती थी, तब अगर शैली मुझसे बात करती थी तो मैं उसमें भाग लेती थी और सुझाव देती थी, इस बात की परवाह नहीं करती थी कि अगुआ इस पर गौर करेगी कि नहीं। मैंने परमेश्वर के सामने कार्य करने का अभ्यास किया, प्रत्येक कार्य को कर्तव्यनिष्ठा से करने पर ध्यान दिया, और यह माना कि सत्य का अभ्यास कर परमेश्वर को संतुष्ट करना ही महत्वपूर्ण है। जब मैंने सचेत होकर अपने इरादों के खिलाफ विद्रोह किया और हर दिन अपने कर्तव्यों पर दिल लगाया, तो मुझे दृढ़ता का एहसास हुआ और मैं अपनी नकारात्मक भावनाओं से थोड़ा बाहर आने लगी।

कुछ समय बाद, मुझे काट-छाँट का सामना करना पड़ा और मैं वापस नकारात्मक भावनाओं में डूब गई। उस समय, अगुआ ने मुझसे कुछ सामग्री व्यवस्थित करने के लिए कहा। अनुभव की कमी के कारण, मैंने उसे करने में भाई-बहनों का सहयोग लिया। जब हमने मसौदा तैयार कर लिया तो इसे पढ़कर अगुआ को यह अच्छा लगा, लेकिन उसने कुछ स्थानों पर कुछ ब्योरे जोड़ने का सुझाव दिया। मुझे यह देखकर खुशी हुई कि कोई बड़ी समस्या नहीं है और सोचा कि यह कार्य अच्छे से हुआ है, अतिरिक्त विवरण जोड़ना आसान होगा, और केवल थोड़ी और सामग्री जोड़ना संतोषजनक होगा। इसलिए मैंने भाई-बहनों के साथ सिद्धांतों पर संगति नहीं की। अप्रत्याशित रूप से, और ब्योरे जोड़ने के बाद, अगुआ को नई सामग्री शब्दाडंबरयुक्त और असंगत लगी, जिसने सामग्री को और भी खराब बना दिया। उसने पूछा कि क्या हमने ध्यानपूर्वक विचार किया है और स्पष्ट रूप से समझ लिया है कि समस्या क्या है। फिर उसने दूसरों से सामग्रियों को पुनर्व्यवस्थित करने को कहा। यह सुनकर मैं दंग रह गई, “मैं इसे अच्छे से करना चाहती थी, लेकिन इसका अंजाम ऐसा क्यों हुआ?” इस पर विचार किया, तो लगा कि इसकी वजह मेरी कम काबिलियत और सत्य की उथली समझ है। मुझे लगा कि मैं कुछ सामान्य मामले सँभाल सकती हूँ, लेकिन जब बात उस काम की आई जिसके लिए सत्य की समझ की जरूरत थी, तो मैं उसके योग्य नहीं थी। अब ऐसा नहीं था कि मैं जानबूझकर पीछे हटना चाहती थी; मेरे पास इच्छाशक्ति तो थी लेकिन योग्यता नहीं थी। उसके बाद, मैं काम में सहयोग करने में झिझकने लगी। जब मैं कार्य में कुछ समस्याएँ देखती थी, तो मैं उन्हें इंगित करना चाहती थी लेकिन फिर मैं खुद को नकार देती थी, सोचती थी, “अपनी कम काबिलियत के होते, क्या मैं समस्याओं का पता भी लगा सकती हूँ? क्या मैं इस काम के योग्य हूँ? मुझमें काबिलियत कम है और मैं चीजों का भेद पहचानने में अपर्याप्त हूँ, वरना काम इतने बुरे ढंग से न किया गया होता; इसलिए बेहतर होगा कि मैं दूसरों के लिए समस्याएँ न बताऊँ।” परिणामस्वरूप, मैं फिर से नकारात्मक भावनाओं में डूबकर अपने कर्तव्यों के प्रति निष्क्रिय हो गई, अपने भविष्य और संभावनाओं को लेकर लगातार चिंता करती रहती थी और अपने दिल को शांत करने में अक्षम थी।

फिर एक दिन सभा में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिससे मुझे अपनी अवस्था सुधारने में मदद मिली। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “हर दिन उत्पन्न होने वाली सभी चीजें, बड़ी हों या छोटी, जो तुम्हारे संकल्प को हिला सकती हैं, तुम्हारे दिल पर कब्जा कर सकती हैं या तुम्हें अपना कर्तव्य करने या आगे बढ़ने से बाधित कर सकती हैं, उन्हें गंभीरता से लिया जाना चाहिए—तुम्हें अपनी सावधानीपूर्वक जाँच करनी चाहिए और सत्य की तलाश करनी चाहिए। ये सभी समस्याएँ हैं जिन्हें तुम्हें अनुभव करते समय हल करना चाहिए। कुछ लोग नकारात्मक हो जाते हैं, शिकायत करते हैं, कठिनाइयों का सामना करने पर अपने कर्तव्यों को छोड़ देते हैं और वे प्रत्येक असफलता के बाद अपने पैरों पर वापस खड़े नहीं हो पाते। ये सभी लोग हठी मूर्ख हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते और वे जीवन भर की आस्था से भी इसे प्राप्त नहीं कर पाएँगे। ऐसे हठी मूर्ख अंत तक कैसे अनुसरण कर सकते हैं? यदि तुम्हारे साथ एक ही बात दस बार होती है और हर बार तुम सत्य की तलाश नहीं करते, उससे जरा-सा भी सबक नहीं सीखते, तो तुम किसी काम के नहीं हो और सबसे बेकार व्यक्ति हो। चतुर लोग और वे जिनमें वास्तव में काबिलियत और आध्यात्मिक समझ होती है, वे सत्य के खोजी होते हैं; दस स्थितियों का सामना करने पर, शायद उन आठ मामलों में, वे कुछ प्रबुद्धता प्राप्त करेंगे, कुछ सबक सीखेंगे, कुछ सत्य समझेंगे और कुछ प्रगति करेंगे। जब किसी मूर्ख के साथ दस बार कुछ घटित होता है—जिसमें आध्यात्मिक समझ नहीं होती—एक बार भी यह उसके जीवन को लाभ नहीं पहुँचाएगा, एक बार भी यह उसे नहीं बदलेगा और एक बार भी यह उसे अपनी कुरूपता का ज्ञान नहीं कराएगा; इस तरह के लोग पूरी तरह से खत्म हो चुके हैं। हर बार जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे गिर जाते हैं और हर बार जब वे गिरते हैं, तो उन्हें किसी और के सहारे और मनाने की जरूरत होती है; सहारा दिए और मनाए जाने के बिना, वे उठ नहीं सकते और हर बार जब कुछ घटित होता है, तो उनके गिरने और पतित होने का खतरा होता है। क्या यह उनके लिए अंत नहीं है? ऐसे बेकार व्यक्ति के लिए, अभी भी उद्धार की क्या आशा हो सकती है? परमेश्वर द्वारा मानवजाति का उद्धार उन लोगों का उद्धार है, जो सत्य से प्रेम करते हैं, उनके उस हिस्से का उद्धार है, जिसमें इच्छा-शक्ति और संकल्प हैं, और उनके उस हिस्से का उद्धार है जो उनके दिल में सत्य और न्याय के लिए लालायित है। किसी व्यक्ति का संकल्प उसके दिल का वह हिस्सा है, जो न्याय, अच्छाई और सत्य के लिए तरसता है और जमीर से युक्त होता है। परमेश्वर इस हिस्से को बचाता है और इसके माध्यम से, वह उनके भ्रष्ट स्वभावों को बदलता है, ताकि वे सत्य को समझ सकें और हासिल कर सकें, ताकि उनकी भ्रष्टता शुद्ध हो सके, और उनका जीवन स्वभाव रूपांतरित किया जा सके। यदि तुम्हारे भीतर ये चीजें नहीं हैं, तो तुम सुधार से परे हो। ... कुछ लोगों को लगता है कि उनकी काबिलियत बहुत खराब है और उनमें समझने की क्षमता नहीं है, इसलिए वे अपने बारे में फैसला सुना देते हैं। उन्हें लगता है कि वे चाहे कितना भी सत्य का अनुसरण कर लें, परमेश्वर की अपेक्षाओं को पूरा नहीं कर सकते और चाहे वे कितनी भी कोशिश कर लें, वे बस ऐसे ही हैं। वे हमेशा नकारात्मक होते हैं। नतीजतन, बरसों परमेश्वर में विश्वास रखकर भी, उन्होंने सत्य प्राप्त नहीं किया है। सत्य का अनुसरण करने का प्रयास किए बिना, तुम कहते हो कि तुम्हारी काबिलियत बहुत खराब है, तुम हार मान लेते हो और हमेशा एक नकारात्मक दशा में रहते हो। नतीजतन, तुम उस सत्य को नहीं समझते जिसे तुम्हें समझना चाहिए या उस सत्य का अभ्यास नहीं करते जिसका अभ्यास करने में तुम सक्षम हो—क्या तुम खुद को रोक नहीं रहे हो? तुम हमेशा यही कहते रहते हो कि तुम्हारी काबिलियत खराब है और यह पर्याप्त नहीं है—क्या यह अपनी जिम्मेदारी से बचना और जी चुराना नहीं है? यदि तुम कष्ट उठा सकते हो, कीमत चुका सकते हो और पवित्र आत्मा का कार्य प्राप्त कर सकते हो, तो तुम निश्चित रूप से कुछ सत्य समझ पाओगे और कुछ वास्तविकताओं में प्रवेश कर पाओगे। यदि तुम परमेश्वर की ओर नहीं देखते, उस पर निर्भर नहीं रहते और बिना कोई प्रयास किए या कीमत चुकाए बस हार मान लेते हो और घुटने टेक देते हो, तो तुम किसी काम के नहीं हो और तुममें अंतरात्मा और विवेक का जरा-सा भी अंश नहीं है। तुम्हारी काबिलियत चाहे जैसी भी हो, जब तक तुममें थोड़ा-सा भी अंतरात्मा और विवेक है, तुम्हें लगन से अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए और अपना मिशन पूरा करना चाहिए। भगोड़ा होना एक घोर विद्रोही कृत्य है; जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के साथ विश्वासघात करता है, तो यह अक्षम्य है। सत्य का अनुसरण करने के लिए एक दृढ़ इच्छाशक्ति की आवश्यकता होती है, जो लोग बहुत नाजुक होते हैं और जिनके भीतर बहुत अधिक नकारात्मकता होती है, वे कुछ भी हासिल नहीं कर पाएँगे। वे अंत तक परमेश्वर में विश्वास नहीं कर पाएँगे, उनके लिए सत्य प्राप्त करने और स्वभाव में परिवर्तन हासिल करने की आशा और भी कम है। केवल वे जो सत्य का अनुसरण करते हैं और जिनमें संकल्प होता है, वे ही इसे प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जा सकते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मैंने उन्हें अपने आपसे जोड़ा। मुझे एहसास हुआ कि जब असफलताओं और नाकामियों का सामना करना पड़ता है, तो मैं विशेष रूप से कमजोर और नकारात्मक हो जाती हूँ, और लगता है जैसे मैं कागज का कोई तुड़ा-मुड़ा टुकड़ा हूँ। मेरे मन में पहली प्रतिक्रिया हमेशा यह होती थी, “इसे दूसरों को करने दो,” या “मेरी काबिलियत बहुत कम है,” और फिर हल करने के लिए मैं उस काम को दूसरों पर डाल देती। ऐसा करके मुझे लगता कि मैं समझदार और आत्म-जागरूक हूँ, लेकिन असल में, मैं खुद को सीमित कर हार मान रही थी। इससे पता चलता था कि मैं सत्य अस्वीकार कर रही हूँ या सत्य से प्रेम नहीं कर रही। जब हम असफलताओं और नाकामियों का सामना करते हैं, तो परमेश्वर चाहता है कि हम समस्याओं को हल करने और प्रगति करने के लिए सत्य खोजें। परमेश्वर हमारी इच्छा और न्याय की लालसा के जरिए हमें पूर्ण बनाता है। जो लोग सत्य से प्रेम करते हैं और काबिलियत रखते हैं वे सक्रिय होते हैं। वे असफलताओं के अनुभवों को सारांशित करने, अपनी कमी की जाँच करने में अच्छे होते हैं और खोज के जरिए कुछ सत्य समझ सकते हैं, अपने बारे में कुछ ज्ञान प्राप्त कर जीवन में प्रगति कर सकते हैं। इस बार, जब मुझे काट-छाँट का सामना करना पड़ा, तो मैंने अपनी असफलता के कारणों का विश्लेषण नहीं किया बल्कि बहाने बनाये। मुझे लगा इसकी वजह यह नहीं है कि मैं अपना कर्तव्य अच्छे से नहीं निभाना चाहती, बल्कि यह है कि काबिलियत में कमी के कारण मुझे अपना कर्तव्य निभाने में बहुत सारी समस्याएँ आईं। आशय यह था कि मैं अपनी क्षमताओं के अनुसार अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर चुकी थी और आत्म-चिंतन करने के लिए कुछ नहीं था। लेकिन अगर बारीकी से जाँच की जाए, तो क्या यह सच है कि मुझे वाकई कोई समस्या नहीं थी? जब अगुआ ने कहा कि सामग्रियों में विवरण का अभाव है, तो मैंने विचार नहीं किया और न ही खोज की, बल्कि अपनी कल्पना के आधार पर बहुत सारी अनावश्यक सामग्री जोड़ दी, संशोधित सामग्रियों को बेहद लंबा और तुच्छ बना दिया। मैंने सिद्धांत नहीं खोजे या यह नहीं सोचा कि बेहतर परिणाम कैसे हासिल करूँ; मैंने बस यंत्रवत नियमों का पालन किया। अपने कर्तव्य निभाने के प्रति यह तरीका बस खानापूरी करने का था। मुझे फौरन अपने दृष्टिकोण की समीक्षा कर इसे सुधारना चाहिए। एक तो पहले ही मुझमें काबिलियत की कमी थी, और अगर मुझमें सक्रिय मानसिकता का भी अभाव रहा और कठिनाइयों का सामना करने पर मैं निष्क्रिय होकर पीछे हट गई, तो मेरे लिए सुधार करना कठिन होगा।

फिर मैंने विचार किया, असफलताओं और नाकामियों से सामना होने पर मैं क्यों हमेशा बचना निकलना चाहती हूँ। बहुत सोचने के बाद, मुझे यह कारण समझ में आया कि मैं प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत ज्यादा चिंता करती हूँ और परमेश्वर में आस्था के जिस मार्ग पर चल रही हूँ वह सही नहीं है। मुझे एक अंश याद आया जहाँ परमेश्वर मसीह-विरोधियों का गहन-विश्लेषण करता है। परमेश्वर के वचन कहते हैं : “अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मसीह-विरोधियों का अनुराग साधारण लोगों से कहीं ज्यादा होता है और यह एक ऐसी चीज है जो उनके स्वभाव सार के भीतर होती है; यह कोई अस्थायी रुचि या उनके परिवेश का क्षणिक प्रभाव नहीं होता—यह उनके जीवन, उनकी हड्डियों में समायी हुई चीज है और इसलिए यह उनका सार है। कहने का तात्पर्य यह है कि मसीह-विरोधी जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार उनकी अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे का होता है और कुछ नहीं। मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा उनका जीवन हैं और वही वे लक्ष्य होते हैं जिसका वे जीवन भर अनुसरण करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें उनका पहला विचार यही होता है : ‘मेरे रुतबे का क्या होगा? और मेरी प्रतिष्ठा का क्या होगा? क्या ऐसा करने से मुझे अच्छी प्रतिष्ठा मिलेगी? क्या इससे लोगों के मन में मेरा रुतबा बढ़ेगा?’ यही वह पहली चीज है जिसके बारे में वे सोचते हैं जो इस बात का पर्याप्त प्रमाण है कि उनमें मसीह-विरोधियों का स्वभाव और सार होता है—और इसी कारण से वे चीजों को इस तरह से देखते हैं। यह कहा जा सकता है कि मसीह-विरोधियों के लिए प्रतिष्ठा और रुतबा कोई अतिरिक्त आवश्यकता नहीं है, यह बात तो रहने ही दो कि ये उनके लिए ऐसी बाहरी चीजें हैं जिनके बिना उनका काम चल सकता है। ये मसीह-विरोधियों की प्रकृति का हिस्सा हैं, ये उनकी हड्डियों में हैं, उनके खून में हैं, ये उनमें जन्मजात हैं। मसीह-विरोधी इस बात के प्रति उदासीन नहीं होते कि उनके पास प्रतिष्ठा और रुतबा है या नहीं; यह उनका रवैया नहीं होता। फिर उनका रवैया क्या होता है? प्रतिष्ठा और रुतबा उनके दैनिक जीवन से, उनकी दैनिक स्थिति से, जिस चीज का वे रोजाना अनुसरण करते हैं उससे, घनिष्ठ रूप से जुड़े होते हैं। मसीह-विरोधियों के लिए रुतबा और प्रतिष्ठा उनका जीवन हैं। चाहे वे कैसे भी जीते हों, चाहे वे किसी भी परिवेश में रहते हों, चाहे वे कोई भी काम करते हों, चाहे वे किसी भी चीज का अनुसरण करते हों, उनके कोई भी लक्ष्य हों, उनके जीवन की कोई भी दिशा हो, यह सब अच्छी प्रतिष्ठा और ऊँचा रुतबा पाने के इर्द-गिर्द घूमता है। और यह लक्ष्य बदलता नहीं है; वे कभी ऐसी चीजों को दरकिनार नहीं कर सकते हैं। यह मसीह-विरोधियों का असली चेहरा और सार है(वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, मद नौ (भाग तीन))। परमेश्वर कहता है कि मसीह-विरोधी सामान्य लोगों की तुलना में अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को ज्यादा महत्व देते हैं, प्रतिष्ठा और रुतबा ही उनके जीवनभर के अनुसरण होते हैं और उनके हर कार्य का प्रारंभिक बिंदु और मकसद होते हैं। जब लोग उनका आदर करते हैं और उनकी प्रशंसा करते हैं, तो वे अपने कर्तव्य निभाने के लिए प्रेरित होते हैं और कुछ भी करने को तैयार रहते हैं। लेकिन जब उन्हें लोगों से प्रशंसा नहीं मिलती तो वे नकारात्मक और सुस्त हो जाते हैं, उन्हें यहाँ तक लगने लगता है कि परमेश्वर में विश्वास रखना और अपने कर्तव्यों का पालन करना व्यर्थ है। अनुसरण के पीछे मेरा परिप्रेक्ष्य भी बिल्कुल मसीह-विरोधियों जैसा ही था। जब हर कोई मेरी राय मानता और अपनाता था तो मैं सक्रिय होकर कुछ काम कर लेती थी। लेकिन जब मेरी सहकर्मी बहन को महत्व दिया जाता था और मुझे हमेशा नजरअंदाज कर दिया जाता था तो मैं बहुत खोई-खोई और उदास महसूस करती थी, अपने कर्तव्यों में प्रेरणा खो बैठती थी। जब मुझे और अधिक असफलताओं का सामना करना पड़ा और बेनकाब हो गई तो मैंने अपने बारे में और भी यह राय बनाई कि मुझमें काबिलियत की कमी है और मैं कार्य के अयोग्य हूँ, मैं भाग जाना चाहती थी। मुझे हमेशा यही लगता कि मैं इसलिए इस्तीफा देना चाहती हूँ क्योंकि मैं इस काम के काबिल नहीं हूँ, और इससे पता चलता था कि मुझमें आत्म-जागरूकता है, लेकिन असल में, इसकी वजह यह थी कि मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बहुत ज्यादा महत्व देती थी। मैं जानती थी कि इस कर्तव्य को निभाना मेरे लिए सिर उठाकर चलना मुश्किल बना देगा और अगर मैं यह कर्तव्य निभाती रही तो बहुत संभव है कि मैं और भी बहुत सारे बार असफल और उजागर हो जाऊँगी, और बाकी लोग पूरी तरह मेरी असलियत देख लेंगे। इसलिए मैं अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को कायम रखने के लिए एक अधिक सरल कर्तव्य लेना चाहती थी। इस सबके दौरान, चाहे कोई कर्तव्य चुनना हो या यह चुनना हो कि कहाँ अध्ययन या काम करना है, मेरी पहली कसौटी यही होती थी कि क्या उससे मेरी छवि अच्छी दिखेगी और क्या मैं सबसे अलग दिखूँगी। कॉलेज के लिए आवेदन करते समय भी, एक अच्छे विषय वाला विश्वविद्यालय था और दूसरा उसके मुकाबले थोड़ा कमजोर। लेकिन दूसरे विश्वविद्यालय के शिक्षक आवेदन करने के लिए मुझे बार-बार बुला रहे थे और मुझे लगा कि यहाँ मेरी कद्र होगी। आखिरकार, मैंने कमजोर विषय वाला विश्वविद्यालय चुना। विश्वविद्यालय के दौरान भी मैंने ऐसा ही किया। मैं उन विषयों में ज्यादा मेहनत करती थी जहाँ शिक्षक मेरी कद्र करते थे और उन विषयों से बचती रही जहाँ मेरी कद्र नहीं हो रही थी। जीवनभर, मैंने चीजों का मूल्यांकन इस आधार पर किया कि क्या वे मुझे प्रतिष्ठा और रुतबा दिला सकती हैं। मुझे ऐसी जगहें पसंद थीं जहाँ मुझे महत्व दिया जाता हो और मेरी अलग पहचान बनती हो और मैं उन जगहों से दूर रहती थी जहाँ मेरी उपेक्षा होती हो या मेरा अपमान होता हो। अब मुझे एहसास हुआ कि प्रतिष्ठा और रुतबे के प्रति मेरी चाह बहुत गहरी थी, और वह मेरे व्यक्तित्व का हिस्सा बन चुकी थी, मैं लगातार उसकी रक्षा करना चाहती थी। उदाहरण के लिए, अब मैं स्पष्ट रूप से जान गई थी कि एक अगुआ होने का मतलब बहुत कुछ उजागर होना और काट-छाँट होना है, जो सत्य सिद्धांतों की मेरी समझ और मेरे जीवन प्रवेश के लिए फायदेमंद है। लेकिन अपनी प्रतिष्ठा और रुतबा बनाए रखने के लिए मैंने अपने कर्तव्य का त्याग करने तक पर विचार किया। मैंने देखा कि मैं सत्य से ज्यादा महत्व प्रतिष्ठा और रुतबे को देती हूँ और मैं सत्य से विमुख होने का स्वभाव प्रकट करती हूँ। अगर मैं इसी तरह अनुसरण करती रही तो आखिरकार मुझे हासिल क्या होगा? मुझे अपने कौशल का अभ्यास करने का अवसर नहीं मिलेगा, न ही मैं अपने जीवन प्रवेश में कोई प्रगति करूँगी और अंत में मैं बस एक ऐसी बेकार व्यक्ति बन कर रह जाऊंगी जिससे परमेश्वर घृणा करता है और जिसे निकाल देता है। तब जाकर मुझे एहसास हुआ कि प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागकर मैं कहीं नहीं पहुँच पाऊँगी, मुझे इस स्थिति से निकलकर सत्य खोजना चाहिए और प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागना छोड़ देना चाहिए।

फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा और अभ्यास करने का तरीका पाया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर में विश्वास करने में मुख्य ध्यान किस पर होना चाहिए? इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम्हारी काबिलियत ऊँची है या नीची, कि तुममें आध्यात्मिक समझ है या तुम किस तरह की काट-छाँट का सामना करते हो—इनमें से कोई भी सबसे महत्वपूर्ण नहीं है। तो अब सबसे महत्वपूर्ण बात क्या है? यह है कि तुम लोग सत्य वास्तविकता में कैसे प्रवेश करते हो। ऐसा करने के लिए, एक व्यक्ति में सबसे बुनियादी चीज क्या होनी चाहिए? उनके पास एक सच्चा दिल होना चाहिए। और एक सच्चा दिल होने की अभिव्यक्तियाँ क्या हैं? जब तुम्हारे साथ कुछ होता है, तो तुम धूर्त तरीके से काम नहीं करते हो, तुम अपने हितों पर विचार नहीं करते हो, तुम दूसरों के खिलाफ साजिश नहीं रचते हो और तुम परमेश्वर के प्रति कपट से पेश नहीं आते हो। यदि तुम परमेश्वर को धोखा देने का प्रयास करते हो और उसके प्रति सच्चा दिल नहीं रखते हो, तो तुम पूरी तरह से खत्म हो चुके हो और परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाएगा, तो सत्य को समझने का क्या मतलब है? हो सकता है कि तुममें आध्यात्मिक समझ हो, अच्छी काबिलियत हो, तुम वाक्पटु हो, चीजों को जल्दी समझते हो और निष्कर्ष निकाल पाते हो और परमेश्वर के वचन जो कुछ भी कहते हैं उसे समझ सकते हो, लेकिन जब तुम्हारे साथ चीजें घटित होती हैं तो तुम परमेश्वर के प्रति कपट से पेश आते हो। यह एक शैतानी स्वभाव है और बहुत खतरनाक है। चाहे तुम्हारी काबिलियत कितनी भी अच्छी क्यों न हो, यह बेकार है। परमेश्वर तुम्हें नहीं चाहेगा; वह कहेगा, ‘तुम काफी वाक्पटु हो, अच्छी काबिलियत वाले हो, हाजिरजवाब हो और आध्यात्मिक समझ रखते हो, लेकिन एक समस्या है—तुम सत्य से प्रेम नहीं करते हो।’ यदि कोई व्यक्ति सत्य से प्रेम नहीं करता, तो यह परेशानी का सबब है—परमेश्वर उसे नहीं चाहेगा। यदि किसी व्यक्ति के पास अच्छा दिल नहीं होता है तो वह बर्बाद हो जाता है। यह ठीक वैसा ही है जैसे एक कार जो बाहर से अच्छी तरह से रखी हुई दिखती है लेकिन जिसका इंजन खराब हो, वह पूरी तरह से कबाड़ हो जाएगी। लोग भी ऐसे ही होते हैं : चाहे तुम्हारी काबिलियत बाहर से कितनी भी अच्छी क्यों न दिखे, तुम कितने भी चतुर, वाक्पटु या सक्षम क्यों न हो, या तुम समस्याओं को सँभालने में कितने भी अच्छे क्यों न हो, इनमें से कुछ भी काम का नहीं है। यह महत्वपूर्ण नहीं है। तो, विचार करने वाली महत्वपूर्ण बात क्या है? यह है कि क्या किसी का दिल सत्य से प्रेम करता है। इसका आशय यह सुनना नहीं है कि वह कैसे बोलता है, बल्कि यह देखना है कि वह क्या करता है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुम उसके सामने क्या कहते हो या क्या वादा करते हो; वह यह देखता है कि तुम जो करते हो क्या उसमें सत्य वास्तविकता है। परमेश्वर यह नहीं देखता कि तुम्हारे वचन कितने ऊँचे, गहरे या भव्य हैं। भले ही तुम कोई छोटा-सा काम करो, यदि परमेश्वर तुम्हारे हर कदम में तुम्हारा सच्चा दिल देखता है तो वह कहेगा, ‘यह व्यक्ति मुझ पर सच्चे दिल से विश्वास करता है। उसने कभी बड़े-बड़े दावे नहीं किए। वह अपनी उचित स्थिति में रहता है। यूँ तो उसने परमेश्वर के घर में कोई बड़ा योगदान नहीं दिया है और उसकी काबिलियत खराब है, लेकिन वह जो कुछ भी करता है उसमें बहुत जमीन से जुड़ा होता है और उसमें सच्चा दिल होता है।’ इस ‘सच्चे दिल’ में क्या शामिल है? इसमें परमेश्वर का भय और उसके प्रति समर्पण, साथ ही सच्ची आस्था और प्रेम शामिल है—इसके भीतर वह सब कुछ है जो परमेश्वर देखना चाहता है। इस तरह का व्यक्ति जरूरी नहीं कि कोई ऐसा हो जिसे दूसरे बहुत सम्मान देते हों; वह कोई ऐसा व्यक्ति हो सकता है जो मेजबानी का कर्तव्य निभाता है या जो एक साधारण कर्तव्य करता है। वह दूसरों के लिए अनुल्लेखनीय हो सकता है, उसने कोई महान उपलब्धि हासिल नहीं की हो सकती है और उसमें ऐसा कुछ भी नहीं हो सकता जिससे दूसरे उसका आदर करें, उसे सराहें या उसकी जैसी उपलब्धियाँ पाने की इच्छा करें—वह बस एक साधारण व्यक्ति हो सकता है। और फिर भी उसमें वह सब कुछ है जिसकी माँग परमेश्वर करता है, वह इसे जी सकता है और वह इसे परमेश्वर को अर्पित कर सकता है। यह परमेश्वर को संतुष्ट करता है और वह और कुछ नहीं चाहता है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। मैं इस बात को बहुत महत्व देती थी कि किसी व्यक्ति में काबिलियत और खूबियाँ हैं कि नहीं और यह मानती थी कि परमेश्वर के घर में केवल काबिलियत रखने वाले लोगों का ही भरपूर उपयोग किया जा सकता है। जब बार-बार मुझमें काबिलियत की कमी और चीजों को स्पष्ट रूप से न देख पाने का खुलासा हुआ, तो मैं नकारात्मक हो गई और मैंने खुद को सीमित कर लिया, मैं उन कार्यों को भी नहीं कर पा रही थी जिनमें मैं सक्षम थी। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं समझ गई कि विश्वासियों को इस बात पर ध्यान नहीं देना चाहिए कि उनकी काबिलियत का स्तर क्या है, या उनमें वाक्पटुता या तेज दिमाग है या नहीं—परमेश्वर इन चीजों को महत्व नहीं देता। परमेश्वर इंसान का दिल देखता है, वह देखता है कि विश्वासी में परमेश्वर और कलीसिया के काम के प्रति सच्चा दिल है या नहीं। परमेश्वर ने मुझे जो काबिलियत और वाक्पटुता दी है उससे यह तय नहीं होता कि मैं अपने कर्तव्य अच्छे से निभा सकती हूँ या नहीं। अगर मैं वाक्पटु और कार्य में सक्षम हूँ लेकिन अपनी जिम्मेदारियों से जी चुराती हूँ और अपने वास्तविक अभ्यास में बेईमानी करती हूँ, तो फिर चाहे मुझमें कितनी भी काबिलियत क्यों न हो, मैं एक ऐसी इंसान हूँ जिससे परमेश्वर घृणा करता है। यूँ तो काबिलियत लोगों को अपने कर्तव्य अच्छी तरह निभाने में मदद कर सकती है, लेकिन ज्यादा महत्वपूर्ण है सत्य और अपने कर्तव्यों के प्रति इंसान का रवैया, क्या उस इंसान के पास एक सक्रिय और सत्य-प्रेमी दिल है, क्या वह असफल और बेनकाब होने पर सत्य खोज सकता है, अपने अनुभवों से सीख सकता है और अपने जीवन में संवृद्धि का अनुसरण कर सकता है—ये वे चीजें हैं जिन्हें परमेश्वर महत्व देता है। पहले कुछ प्रतिभाशाली और योग्य लोग कलीसिया के अगुआ के रूप में कार्य करते थे, लेकिन कई अपना कर्तव्य ठीक से नहीं निभाते थे। कुछ समय बाद वे आराम में लिप्त हो गए, वे वास्तविक कार्य नहीं करते थे या प्रसिद्धि और लाभ के लिए लड़ते थे, कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी पैदा करते थे, और वे अंततः हटा दिए गए। लेकिन कुछ साधारण से दिखने वाले लोग भी थे जिनमें औसत काबिलियत थी, कोई प्रतिभा नहीं थी, फिर भी उन्होंने व्यावहारिक रूप से अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया, हर चीज में सिद्धांतों की खोज की, और अपने कर्तव्य निभाने में प्रगति की, उन्हें न तो बदला गया, न हटाया गया। इससे पता चलता है कि परमेश्वर धार्मिक है, और वह किसी व्यक्ति पर उसकी काबिलियत के आधार पर फैसला नहीं सुनाता, बल्कि इस बात को महत्व देता है कि क्या वह इंसान सत्य का अनुसरण और अभ्यास करता है और क्या वह हर काम को व्यावहारिक तरीके से और जिम्मेदारी से कर पाता है। इस बात को समझकर मैंने मन ही मन अपने आप से कहा कि अब से, मैं अपने कर्तव्यों पर ध्यान केंद्रित करूँगी और निष्ठापूर्वक कार्य करूँगी, और अगर मुझे कोई काम सौंपा जाता है, तो उसे ईमानदारी और जिम्मेदारी से करूँगी, यथासंभव प्रयास करूँगी, और एक ऐसी व्यावहारिक और विश्वसनीय व्यक्ति बनूँगी जो अपने उचित काम पर ध्यान दे।

फिर मैं हर असफलता से सबक सीखने पर ध्यान देने लगी, और जब भी मैं उजागर होती तो अपनी मानसिकता बदलती। पहले, जब भी मुझे विफलता या काट-छाँट का सामना करना पड़ता था, तो मैं सोचती थी, “अरे, अगुआ ने मेरी असलियत देख ली होगी” या “हर एक को जरूर यह लगता होगा कि मुझमें काबिलियत की कमी है।” जब मैं इसमें डूब जाती तो बहुत हताश हो जाती थी। फिर मैंने विचार करना शुरू किया, मुझे क्यों उजागर किया जा रहा है, मैं अपनी किन समस्याओं का पता लगा सकती हूँ और किन कमियों को दूर कर सकती हूँ। इस नई मानसिकता के साथ, मैं अपने दिल में सही मामलों पर ज्यादा ध्यान देने लगी। बाद में कुछ समय तक मुझे बार-बार काट-छाँट का सामना करना पड़ा, कभी-कभी काम करने में कम दक्षता की वजह से, कभी-कभी कार्यों को निपटाने में सिद्धांतों को न समझ पाने के कारण, और कभी-कभी किसी विशेष मामले पर एकतरफा दृष्टिकोण रखने और सही समझ की कमी की वजह से। इसलिए, मैंने अपनी समस्याओं पर चिंतन किया, और अगर इनका संबंध मेरे कौशल से था तो मैंने अपनी कार्य दक्षता को सुधारने के तरीके खोजे और अगर यह समझ से जुड़ा हुआ मसला होता था तो मैं अपनी समस्याओं पर विचार करती थी, देखती थी कि मेरी समझ में कैसे विचलन आ गया और फिर उन भाई-बहनों से पूछती थी जो सत्य को समझते थे और जिनके पास अनुभव था। जब मैंने इस प्रकार विचार किया, तो काट-छाँट के प्रति मेरा रवैया सुधर गया। यूँ तो मुझे अब भी कभी-कभी हताशा होती है, लेकिन मैं अब उसमें फँसती नहीं हूँ और हर दिन, अपने कर्तव्य निभाते समय मेरा मन अब उतना बोझिल नहीं रहता है, और मेरे सामने जो परिस्थितियाँ आती हैं उनका अनुभव मैं सामान्य रूप से कर सकती हूँ।

जब उस समय पर विचार करती हूँ, जब मैं नकारात्मकता में फँस गई थी, पीड़ा और थकान में डूबी रहती थी, उस वक्त अगर परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन न होता, तो मैं उन नकारात्मक भावनाओं को पीछे नहीं छोड़ पाती और परमेश्वर से दूर रहकर पतित होती रहती, यहाँ तक कि अपने वर्तमान कर्तव्य भी गँवा बैठती। तहे-दिल से, मैं परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ, क्योंकि मेरे सबसे कमजोर क्षणों में उसने मेरे आस-पास के लोगों के माध्यम से मुझे चेताया, और अपने वचनों का उपयोग करके मेरा मार्गदर्शन किया, और इस नकारात्मक भावना को त्यागने में मेरी मदद की। अब से, मैं बस शांत रहना चाहती हूँ और अपनी सर्वोत्तम क्षमताओं का इस्तेमाल कर अपना कर्तव्य निभाना चाहती हूँ।

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2. शुद्धिकरण का मार्ग

आली, संयुक्त राज्य अमेरिकामुझे 1990 में प्रभु यीशु के नाम का बपतिस्मा दिया गया था और 1998 तक मैं कलीसिया की सहकर्मी बन गयी थी। पवित्र आत्मा...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

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