56. परमेश्वर का वचन सभी झूठों का समाधान करता है

ये किउ, चीन

जून 2022 में मैं सिंचन कार्य की उपयाजक चुनी गई और बहन चेंग लिन के साथ मैं नए सदस्यों का सिंचन करने लगी। अभी-अभी अंत के दिनों का परमेश्वर का कार्य स्वीकारने के कारण नए विश्वासियों में अब भी बहुत-सी धार्मिक धारणाएँ थीं। डर था कि कहीं मेरी संगति अबूझ होने से उनकी समस्याएँ हल न हो पाएँ तो मैंने पहले ही अगुआ से कह दिया कि वह मेरे साथ उनकी धारणाओं से जुड़े परमेश्वर के वचनों के अंश ढूँढ़े। सभा के दिन मैंने नए सदस्यों की धारणाओं से जुड़े परमेश्वर के उन वचनों पर संगति की जो मैंने पहले से तैयार किए थे और उनकी धारणाएँ हल हो गईं। हम समेटने जा ही रहे थे, तभी चेंग लिन ने पूछा, “नए सदस्यों के सवालों पर तुम्हारे जवाब आज काफी ब्योरेदार थे। क्या तुमने पहले अगुआ के साथ संगति की थी?” यह सुनकर मेरे मन में विचारों का बवंडर आ गया। चूँकि मैं उस कर्तव्य में नई थी, तो क्या उसे यह संदेह हुआ कि मेरा आज का प्रदर्शन मेरे असली स्तर को नहीं दिखाता है? अगर मैंने उसे बता दिया कि मेरी ज्यादातर संगति अगुआ से आई थी, क्या वह तब भी मेरा आदर करेगी? क्या वह यह नहीं सोचेगी कि मुझमें खराब कार्यक्षमता है? मैंने सोचा कि मैं उसे सच नहीं बता सकती। इसलिए, मैंने कहा, “नहीं।” यह कहते ही लगा कि मैंने अपनी अंतरात्मा को धोखा दिया है। स्पष्ट रूप से, अगुआ और मैंने इस बारे में पहले संगति की थी, पर मैंने उसकी आँखों में देखकर ना कह दिया। क्या मैंने जानबूझकर झूठ नहीं बोला? अगर किसी दिन अगुआ आ गया और चेंग लिन ने इस बारे में पूछ लिया, तो मेरा झूठ उजागर हो जाएगा—यह कितना अपमानजनक होगा! सब यही कहेंगे कि मैं बड़ी धूर्त हूँ। मैंने जितना सोचा, उतनी ही बेचैन होती गई। उस रात मैं बिस्तर पर पड़ी रही और ठीक से सो नहीं पाई। अगले दिन मैं चेंग लिन को खोजने गई, खुलकर बताने और खुद को सामने रखने को तैयार थी, पर शब्द मेरी जुबान पर अटक गए, मैं कुछ बोल ही नहीं पाई। मुझे डर लगा कि सच बताने से कहीं चेंग लिन मुझे नीची नजर से न देखे और यह न सोचे कि मुझमें खराब कार्यक्षमता है, मेरा ध्यान बस प्रतिष्ठा और रुतबे पर लगा रहता है। वो कह सकती है मैं बहुत धोखेबाज हूँ, छोटी सी बात के लिए झूठ बोलती हूँ। यह सब सोचकर मैं चुप ही रही। घर लौटते वक्त मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया : “तुम लोगों को पता होना चाहिए कि परमेश्वर उन लोगों को पसंद करता है जो ईमानदार हैं(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तीन चेतावनियाँ)। मैंने खुद को और अधिक दोषी माना। मैं एक सच्ची बात तक न कह पाई। मैं ऐसी ईमानदार इंसान कैसे बन सकती हूँ, जो परमेश्वर को पसंद है? लगा जैसे मेरा दिल एक भारी बोझ तले दब गया हो—मैं बहुत परेशान हो गई। मैंने खुद से पूछा : मैं अच्छी तरह जानती हूँ, परमेश्वर को धोखेबाज झूठे लोगों से नफरत है तो फिर सच बोलना इतना मुश्किल क्यों है?

सोच-विचार करने पर समझ आया कि मैंने सिर्फ एक बात झूठ नहीं बोली थी। दूसरे मामलों में भी अक्सर मेरा रवैया यही रहता था। एक बार अगुआ ने पूछा कि हम हर महीने कितने नए सदस्यों का सिंचन कर सकते हैं। मैं इस कर्तव्य में नई थी, इसके सिद्धांतों को अच्छी तरह नहीं समझती थी, इसलिए मैं ज्यादा लोगों की जिम्मेदारी नहीं ले सकती थी। लेकिन अगर मैंने सच बोला तो कहीं अगुआ यह न कहे कि मुझमें कमी है और मैं इस काम के लायक नहीं हूँ। इसलिए मैंने कुछ बढ़ा-चढ़ाकर संख्या बता दी। लेकिन, बढ़ा-चढ़ाकर संख्या बताकर भी मैं सहज नहीं थी। डर लगा, बाद में कितनी शर्मिंदगी होगी अगर मैं उतने नए सदस्यों का सिंचन नहीं कर पाई और उनके जीवन प्रवेश में देरी कर दी। मगर मैंने संख्या बता दी थी और अगर मैं अगुआ को खुलकर सच बताती तो शर्मिंदगी उठानी पड़ती। मुझे कड़वा घूँट पीकर आगे बढ़ना ही था। कुछ दिन पहले ही अगुआ ने पूछा था कि एक नए सदस्य की समस्या हल करने में मुझे कितना समय लगा। पहले तो मैं उस नए सदस्य की धारणा को अच्छे से समझ नहीं पाई, इसलिए मैंने कई बार संगति की। जब अगुआ ने इस बारे में पूछा तो डर लगा कि सच बोलने से कहीं अगुआ यह न कहे कि मुझमें काबिलियत की कमी है और कि मुझमें खराब कार्यक्षमता है क्योंकि ऐसे छोटे-से मुद्दे को हल करने के लिए मुझे कई संगतियाँ करनी पड़ीं। अपनी छवि बचाने के लिए मैंने झूठ बोला, कहा कि एक संगति में ही समस्या हल हो गई थी। फिर मुझे बेचैनी महसूस हुई, डर लगा किसी दिन प्रकट न कर दी जाऊँ। अपने व्यवहार के बारे में सोचा तो पाया कि अपनी छवि बचाने और लोगों पर अच्छी छाप छोड़ने की कोशिश में मैं बहुत झूठ बोलती थी। मैं अंधकार और पीड़ा में जी रही थी, एक ईमानदार इंसान बनने के लिए परमेश्वर के मानकों से काफी दूर थी। मैंने उन सब भाई-बहनों के बारे में सोचा जो ईमानदार लोग बनने और अपनी धोखेबाज प्रकृति को हल करने का अभ्यास कर रहे थे। कुछ लोगों ने तो अनुभवजन्य गवाही के लेख भी लिखे थे। मगर इतने बरसों की आस्था के बावजूद मैं काफी झूठ बोल रही थी, मुझमें ईमानदारी नाम की चीज नहीं थी। अगर अपनी आस्था में इसी राह पर चलती रही तो परमेश्वर मुझे हटा ही देगा। मैंने तुरंत प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मैंने बरसों तुम पर विश्वास किया है। फिर भी जहाँ अपने हित देखती हूँ, मैं झूठ बोलकर धोखा देती हूँ, जिससे तुम्हें नफरत है। मैं इस राह पर नहीं चलना चाहती। मेरी झूठ बोलने की समस्या हल करने के लिए मुझे रास्ता दिखाओ।”

अपनी आध्यात्मिक भक्ति में मैंने यह अंश पढ़ा : “अपने रोजमर्रा के जीवन में लोग अक्सर निरर्थक बातें कहते हैं, झूठ बोलते हैं, और ऐसी बातें कहते हैं जो अज्ञानतापूर्ण, मूर्खतापूर्ण और रक्षात्मक होती हैं। इनमें से ज्यादातर बातें दिखावे के लिए और अपनी छवि बचाने के लिए, अपने अहंकार की तुष्टि के लिए कही जाती हैं। ऐसे झूठ बोलने से उनके भ्रष्ट स्वभावों का खुलासा होता है। अगर तुम इन भ्रष्ट तत्वों का समाधान कर लो, तो तुम्हारा हृदय शुद्धिकृत हो जाएगा और तुम धीरे-धीरे अधिक शुद्ध और अधिक ईमानदार हो जाओगे। वास्तव में सभी लोग जानते हैं कि वे झूठ क्यों बोलते हैं। यह सब व्यक्तिगत लाभ, दिखावे और अपनी छवि बचाने की खातिर है; यह प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए भी है, वे दूसरों के साथ प्रतिस्पर्धा करने और खुद को वैसा दिखाने की कोशिश करते हैं, जो वे नहीं होते। हालाँकि अंततः उनके झूठ उजागर हो जाते हैं, वे दूसरों के द्वारा बेनकाब कर दिए जाते हैं, वे अपनी इज्जत और साथ ही अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा भी खो बैठते हैं। यह सब अत्यधिक मात्रा में झूठ बोलने के कारण होता है। तुम्हारे झूठ बहुत ज्यादा हैं। तुम्हारे द्वारा कहा गया प्रत्येक शब्द मिलावटी और झूठा होता है, एक भी शब्द सच्चा या ईमानदार नहीं माना जा सकता। भले ही तुम्हें लगे कि झूठ बोलकर तुम मान-सम्मान खोने से बचते हो, लेकिन अंदर ही अंदर तुम अपमानित महसूस करते हो। तुम्हारा जमीर तुम्हें धिक्कारता है और अंदर से तुम अपने लिए तिरस्कार और खुद को तुच्छ महसूस करते हो, ‘मैं ऐसा दयनीय जीवन क्यों जी रहा हूँ? क्या सच बोलना इतना कठिन है? क्या मुझे अपनी छवि बचाने की खातिर झूठ का सहारा लेना होगा? मेरा जीवन इतना थका देने वाला क्यों है?’ तुम्हें ऐसा थका देने वाला जीवन जीने की जरूरत नहीं है। अगर तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अभ्यास कर सको, तो तुम एक निश्चिंत, स्वतंत्र और मुक्त जीवन जीने में सक्षम होगे। लेकिन तुमने झूठ बोलकर अपनी छवि बचाने और झूठा दिखावा करने का मार्ग चुना है। नतीजतन, तुम एक थकाऊ और दयनीय जीवन जीते हो। यह सब तुम्हारा खुद मोल लिया हुआ है। झूठ बोलकर व्यक्ति अपनी छवि बचा सकता है, लेकिन वह छवि क्या है? यह महज एक खोखली चीज है, और यह पूरी तरह से बेकार है। झूठ बोलने का मतलब है अपनी सत्यनिष्ठा और गरिमा से विश्वासघात करना। इससे लोग अपनी गरिमा गँवा देते हैं और अपनी सत्यनिष्ठा खो देते हैं। यह परमेश्वर को अप्रिय और घृणा योग्य लगता है। क्या यह सार्थक है? नहीं है। क्या यह सही मार्ग है? (नहीं, यह सही मार्ग नहीं है।) जो लोग अक्सर झूठ बोलते हैं, वे अपने शैतानी स्वभावों के अनुसार जीते हैं; वे शैतान की शक्ति के अधीन रहते हैं। वे प्रकाश में नहीं रहते, न ही वे परमेश्वर की उपस्थिति में रहते हैं। तुम लगातार इस बारे में सोचते रहते हो कि झूठ कैसे बोला जाए, और फिर झूठ बोलने के बाद तुम्हें यह सोचना पड़ता है कि उस झूठ को कैसे छिपाया जाए। और जब तुम झूठ को अच्छी तरह से नहीं छिपाते हो, तो वह उजागर हो जाता है और तुम्हें उस झूठ को छिपाने की खातिर और अधिक झूठ गढ़ने के लिए अपने दिमाग पर जोर देना पड़ता है। क्या इस तरह जीना थका देने वाला नहीं है? यह बहुत अधिक थका देने वाला है। और क्या यह सार्थक है? नहीं, यह वास्तव में सार्थक नहीं है। अपनी छवि बचाने, झूठा दिखावा करने और रुतबे की खातिर झूठ बोलना और फिर उसे छिपाने के लिए अपना दिमाग लगाना क्या मायने रखता है? अंत में तुम चिंतन करते हुए मन ही मन सोचते हो, ‘क्या मायने हैं? झूठ बोलना और उसे छिपाना बहुत थका देने वाला होता है। इस तरीके से आचरण करने से काम नहीं चलेगा; अगर मैं एक ईमानदार व्यक्ति बन जाऊँ, तो ज्यादा आसानी होगी।’ तुम एक ईमानदार व्यक्ति बनना चाहते हो, लेकिन तुम अपने घमंड, मिथ्याभिमान और व्यक्तिगत हितों को नहीं छोड़ पाते हो। तुम इन चीजों को बनाए रखने के लिए सिर्फ झूठ बोलने, इरादतन मिथ्या का उपयोग करने का ही सहारा ले सकते हो। ... अगर तुम सोचते हो कि झूठ वह प्रतिष्ठा, रुतबा, झूठे दिखावे और तुम्हारी छवि को बरकरार रख सकता है जो तुम चाहते हो, तो तुम पूरी तरह से गलत हो। वास्तव में झूठ बोलकर तुम न सिर्फ अपने झूठे दिखावे और अपनी छवि, अपनी गरिमा और सत्यनिष्ठा बनाए रखने में विफल रहते हो, लेकिन इससे भी बुरी बात यह है कि तुम सत्य का अभ्यास करने और एक ईमानदार व्यक्ति बनने का अवसर चूक जाते हो। अगर तुम उस पल अपनी प्रतिष्ठा, रुतबा, झूठे दिखावे और छवि को बचाए रखने में सफल हो भी जाते हो, तो भी तुमने सत्य को त्याग दिया है और परमेश्वर से विश्वासघात किया है। इसका मतलब है कि तुमने उसके द्वारा बचाए और पूर्ण बनाए जाने का मौका पूरी तरह से खो दिया है, जो सबसे बड़ा नुकसान और अनंत पछतावा है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, केवल एक ईमानदार व्यक्ति बनकर ही कोई सच्चे मानव के समान जी सकता है)। परमेश्वर के सभी वचन मेरी वास्तविक दशा बयान कर रहे थे। मैं अपने अहंकार और दंभ को बचाने के लिए हमेशा झूठ बोलकर धोखा देती थी। मैं दिखावा कर रही थी, जो जीने का एक थकाऊ तरीका था जिसने मुझे दुखी कर दिया। जब मैंने पहली बार नए विश्वासियों का सिंचन शुरू किया था, चेंग लिन ने देखा कि मेरी संगति ठीक-ठाक थी तो उसने पूछा कहीं मैंने अगुआ के साथ पहले से ही संगति तो नहीं की। यह बिल्कुल सामान्य सवाल था। मैं बस “हाँ” भी कह सकती थी। मगर मुझे डर लगा कि सच बोलने से वह मुझे नीची नजर से देखेगी। अपनी प्रतिष्ठा की बात सोचते हुए मैंने जानबूझकर झूठ बोल दिया। फिर जब अगुआ ने पूछा कि हम कितने नए सदस्यों का सिंचन कर सकते हैं तो मैंने अपने असली आध्यात्मिक कद के आधार पर जवाब नहीं दिया। मुझे डर था कि अगर मैंने कम संख्या बताई तो अगुआ कहेगी कि मेरी कार्यक्षमता में कमी है, इसलिए मैंने जानबूझकर बढ़ा-चढ़ा आँकड़ा बताया। उसके बाद डरने लगी कि मैं इसे सँभाल नहीं पाऊँगी—इस तरह से अपना कर्तव्य करना बहुत तनावपूर्ण और थकाऊ था। मैं नए विश्वासियों का सिंचन भी इसी तरह कर रही थी। सत्य की अपनी उथली समझ के कारण, नए सदस्यों की समस्या हल करने के लिए मुझे कई बार संगति करनी पड़ती थी। मगर मैं यही सोचती थी कि अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेंगे, इसलिए मैंने कह दिया कि एक ही संगति में समस्या हल हो गई। मैंने अपने अहंकार और दंभ को बचाने के लिए बार-बार झूठ बोलकर धोखा दिया, ताकि लोग मुझे स्वीकारें। मैं बहुत धोखेबाज और पाखंडी थी! मैंने सोचा कि अगर सच नहीं बताया तो अगुआ और दूसरे लोग मेरी असली क्षमता नहीं जान पाएँगे और मेरी छवि बची रहेगी। मगर परमेश्वर तो सभी चीजों की पड़ताल करता है। मैं लोगों को मूर्ख बना सकती हूँ, पर परमेश्वर को कभी नहीं। कुछ समय बाद सब मेरा भेद पहचानने में सक्षम हो जाएँगे। तब उन्हें दिखेगा कि मुझमें सत्य वास्तविकता नहीं है और मैं आदतन झूठ बोलती हूँ। झूठ बोलकर मैं सच में बहुत संताप महसूस करती थी। डरती थी, न जाने किस दिन मेरा झूठ उजागर हो जाएगा और मेरी कलई खुल जाएगी। तब मुझे बेइज्जत तो होना ही पड़ेगा, लोगों का भरोसा भी खो बैठूँगी। समय के साथ, इस चिंता और बेचैनी ने मुझे बहुत सताया। मैं बहुत थक गई थी। मैं अंधकार और पीड़ा में थी। लगातार झूठ बोलकर धोखा देने, सत्य का अभ्यास न करने या ईमानदार न रहने से, मेरे जीवन को नुकसान तो हुआ ही और मैं बगैर चरित्र और गरिमा के जीवन जी रही थी, जिससे परमेश्वर अत्यधिक घृणा और नफरत करता है। मैंने प्रभु यीशु की बातों को याद किया : “तुम्हारी बात ‘हाँ’ की ‘हाँ,’ या ‘नहीं’ की ‘नहीं’ हो; क्योंकि जो कुछ इस से अधिक होता है वह बुराई से होता है(मत्ती 5:37)। “तुम अपने पिता शैतान से हो और अपने पिता की लालसाओं को पूरा करना चाहते हो। वह तो आरम्भ से हत्यारा है और सत्य पर स्थिर न रहा, क्योंकि सत्य उसमें है ही नहीं। जब वह झूठ बोलता, तो अपने स्वभाव ही से बोलता है; क्योंकि वह झूठा है वरन् झूठ का पिता है(यूहन्ना 8:44)। परमेश्वर ईमानदार लोगों को पसंद करता है और कपटी लोगों से घृणा करता है। मेरी कथनी-करनी परमेश्वर के वचनों के अनुरूप होनी चाहिए, मुझे बिना लाग-लपेट के बोलना चाहिए। हाँ का मतलब हाँ है और नहीं का मतलब न है। मगर अपनी छवि बचाने के लिए मैंने बार-बार झूठ बोला। यह दानव—शैतान—से अलग कहाँ है? शैतान हमेशा झूठ बोलता है—कभी कोई सच्ची बात नहीं करता। मैंने अभी तक काफी झूठ बोले थे। अगर मैंने पश्चात्ताप नहीं किया तो परमेश्वर मुझे हटा ही देगा। मैं अपनी छवि बचाने और त्वरित फायदे पाने के लिए झूठ बोलने और मुखौटा लगाने को दिमाग लड़ाती रही थी। नतीजतन, मुझसे परमेश्वर ने घृणा की, लोग दूर हुए और मैंने तकलीफ झेली। मैं सरासर बेवकूफ थी।

मैंने आत्मचिंतन करते हुए एक दिन परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : “जब लोग कपट में संलग्न होते हैं, तब उनकी अंतर्निहित मंशा क्या होती है? वे कौन-सा लक्ष्‍य प्राप्‍त करने की कोशिश कर रहे हैं? बिना किसी अपवाद के, ऐसा प्रसिद्धि, लाभ और रुतबा हासिल करने के लिए है; संक्षेप में, यह उनके अपने हितों के लिए है। और निजी हितों के पीछे भागने के मूल में क्या है? जड़ यह है कि लोग अपने हितों को बाक़ी सब चीजों से ज्‍़यादा महत्‍वपूर्ण मानते हैं। वे अपना स्‍वार्थ साधने के लिए कपट करते हैं, जिससे उनका कपटी स्‍वभाव प्रकट हो जाता है। इस समस्‍या का समाधान कैसे किया जाना चाहिए? पहले तुम्हें यह भेद पहचानना और जानना चाहिए कि निजी हित क्या हैं, वे सटीक रूप से लोगों के लिए क्या ला सकते हैं और उनके पीछे भागने के क्या परिणाम होते हैं। अगर तुम इसे स्पष्ट रूप से नहीं देख सकते, तो उनका त्याग करने की बात कहना आसान होगा, करना मुश्किल। अगर लोग सत्य नहीं समझते, तो उनके लिए अपने हित छोड़ने से कठिन कुछ नहीं होता। ऐसा इसलिए है, क्योंकि उनके जीवन के फलसफे होते हैं ‘हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए’ और ‘मनुष्य धन के लिए मरता है, जैसे पक्षी भोजन के लिए मरते हैं।’ स्पष्ट रूप से, वे केवल अपने निजी हितों के लिए जीते हैं। लोग सोचते हैं कि यदि उनके निजी हित नहीं हैं या यदि वे उन्हें खो देते हैं, तो वे जीवित नहीं रह पाएँगे, मानो उनका अस्तित्व उनके अपने निजी हितों पर निर्भर करता हो। इसलिए अधिकांश लोग अपने निजी हितों के अलावा और कुछ नहीं देख पाते। वे अपने हितों को सबसे ऊपर देखते हैं और केवल अपने निजी हितों के लिए जीते हैं। वे तब तक एक उँगली भी नहीं हिलाते जब तक कि उसमें उनके अपने हित न जुड़े हों और उनसे अपने निजी हितों को छोड़ने के लिए कहना उनकी जान देने के लिए कहने जैसा है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है)। “मान लो किसी धोखेबाज व्यक्ति को पता हो कि वह धूर्त है, झूठ बोलने का शौकीन है और वह सच बोलना पसंद नहीं करता है और वह काम करते हुए हमेशा दूसरों से कुछ-न-कुछ छिपाता है, लेकिन फिर भी वह इस बारे में सोचते हुए मन-ही-मन खुश होता रहता है और सोचता है, ‘इस तरह जीना बहुत अच्छा है। मैं निरंतर दूसरों के साथ खिलवाड़ कर रहा हूँ, लेकिन वे मेरे साथ ऐसा नहीं कर पाते। जहाँ तक मेरे अपने हितों, गर्व, अभिमान और रुतबे की बात है तो मैं हमेशा संतुष्ट रहता हूँ। चीजें मेरी योजनाओं के अनुसार, त्रुटिहीन ढंग से, निर्बाध रूप से चलती हैं, और कोई उनकी असलियत नहीं देख सकता।’ क्या इस तरह का व्यक्ति ईमानदार बनने को तैयार है? नहीं। ऐसा व्यक्ति धोखेबाजी और कुटिलता को बुद्धिमत्ता और ज्ञान समझता है, सकारात्मक चीजें मानता है। वह खासकर इन चीजों को सँजोता है और इन्हें त्यागने की बात सहन नहीं कर सकता। वह सोचता है, ‘यह आचरण करने का उत्तम तरीका और जीने का एकमात्र संतुष्टिदायक ढंग है। केवल यही जीने का मूल्यवान तरीका है और केवल इसी तरीके से दूसरे मुझसे ईर्ष्या करेंगे और मेरा आदर करेंगे। शैतान के फलसफों के अनुसार न जीना मेरे लिए मूर्खता और बेवकूफी होगी। मैं हमेशा नुकसान उठाऊँगा—मुझे धौंस दी जाएगी, मेरे साथ भेदभाव किया जाएगा और मैं दूसरों के लिए नौकर के समान कार्य करता रहूँगा। इस तरह जीने का कोई मूल्य नहीं है। मैं कभी ईमानदार व्यक्ति नहीं बनूँगा!’ क्या इस तरह का व्यक्ति अपने कपटपूर्ण स्वभाव से विद्रोह करेगा और ईमानदार होने का अभ्यास करेगा? बिल्कुल नहीं। ... उनमें सकारात्मक चीजों के लिए कोई प्रेम नहीं है, वे प्रकाश के लिए नहीं तरसते और वे परमेश्वर के वचन या सत्य से प्रेम नहीं करते। वे सांसारिक प्रवृत्तियों का पालन करना पसंद करते हैं, वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे से प्रेम करते हैं और वे भीड़ से अलग दिखना पसंद करते हैं। वे प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के साथ ही प्रसिद्ध लोगों और महान हस्तियों की पूजा करते हैं, लेकिन वास्तव में वे जिनकी पूजा कर रहे हैं वे राक्षस और शैतान हैं। वे दिल से जिनका अनुसरण करते हैं वे सत्य या सकारात्मक चीजें नहीं हैं; इसके बजाय, वे दुष्ट ज्ञान के प्रति श्रद्धा रखते हैं। उनके दिल में, वे उन लोगों को स्वीकार नहीं करते जो सत्य का अनुसरण करते हैं या जो परमेश्वर की गवाही देते हैं; इसके बजाय, वे उन लोगों को स्वीकार करते और उन्हें आदर्श मानते हैं जिनमें विशेष प्रतिभाएँ और विशेष गुण होते हैं। वे परमेश्वर में विश्वास करने और सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर नहीं चलते; बल्कि, वे प्रसिद्धि, लाभ, रुतबे और ताकत का अनुसरण करते हैं; वे एक गहरे धूर्त व्यक्ति बनने का अनुसरण करते हैं जो शानदार रणनीतियों से जीत सकता है; वे समाज के उच्च दर्जों के साथ खुद को एकीकृत करने का प्रयास करते हैं ताकि महान और प्रसिद्ध बन सकें। वे प्रयास करते हैं कि वे आदर्श माने जाएँ और जिन भी अवसरों पर वे उपस्थित होते हैं, उन पर उनका स्वागत किया जाए; वे एक आदर्श बनने का प्रयास करते हैं। वे इस तरह का व्यक्ति बनना चाहते हैं। यह किस तरह का मार्ग है? यह राक्षसों का मार्ग है, दुष्टता का मार्ग है। यह परमेश्वर में विश्वास करने वाले द्वारा लिया गया मार्ग नहीं है। वे शैतान के फलसफों, उसके तर्क का उपयोग करते हैं, वे लोगों के व्यक्तिगत भरोसे का लाभ उठाकर उन्हें धोखा देने के लिए, उनसे अपनी पूजा और अनुसरण करवाने के लिए हर परिस्थिति में उसकी हर चाल, हर युक्ति का उपयोग करते हैं। यह वह मार्ग नहीं है जिस पर परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को चलना चाहिए, बल्कि यह वह मार्ग है जिस पर शैतान और दानव चलते हैं। इस तरह का व्यक्ति न केवल बचाया नहीं जाएगा, बल्कि उसे परमेश्वर का दंड भी मिलेगा—इसमें जरा-सा भी संदेह नहीं हो सकता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, धर्म में विश्वास रखने या धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता)। परमेश्वर के वचनों ने दिखाया कि क्यों मैं बार-बार झूठ बोलकर धोखा करते हुए काम करती थी, क्यों कभी सच बोलने और ईमानदार बनने की हिम्मत नहीं दिखाई। क्योंकि मुझमें धूर्त प्रकृति थी। मैं सत्य से विमुख थी, मुझे सकारात्मक चीजें पसंद नहीं थीं। मैंने सत्य प्राप्त करने के प्रयास को प्राथमिकता नहीं दी थी, ऐसी व्यक्ति बनने को जो परमेश्वर को खुशी देती है। इसके बजाय मैंने “हर व्यक्ति अपनी सोचे बाकियों को शैतान ले जाए,” “जैसे पेड़ को उसकी छाल की जरूरत है वैसे ही लोगों को आत्मसम्मान की जरूरत है,” और “झूठ बोले बिना कोई भी बड़ा काम पूरा नहीं किया जा सकता” जैसे शैतानी फलसफों के साथ ही अपनी छवि और अपने हितों को अहमियत दी। जब मैं छोटी थी, महज मिडल स्कूल तक पढ़े मेरे एक रिश्तेदार खुद को कॉलेज ग्रेजुएट बताते थे। कोई खास हुनरमंद न होकर भी खुद को ऊँचा दिखाते, कहते कि उन्होंने इसकी पढ़ाई किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय में की है। जब वे इस तरह झूठ बोलते और दिखावा करते तो लोग उन्हें नीची नजर से नहीं देखते, बल्कि उनका सम्मान और सराहना करते। मैंने बड़े होते हुए ऐसी कई घटनाएँ देखी थीं। मैं उनसे प्रभावित थी। अनजाने में ही उन शैतानी तरीकों ने मेरे दिल में जगह बना ली। मुझे लगा कि कभी-कभी झूठ बोलने से भी बात बन सकती है। इससे तारीफ तो होती ही है, मन की मुराद भी पूरी हो सकती है। परमेश्वर के घर में आने के बाद भी मैं इसी दृष्टिकोण के अनुसार जीती रही। अगर किसी चीज का संबंध मेरी छवि या मेरे हितों से होता था तो मैं झूठ बोलने, धोखा देने और दिखावा करने से खुद को रोक नहीं पाती थी। झूठ बोलकर ग्लानि होने पर भी, मुझे किसी से सच बोलने की हिम्मत नहीं होती, इस डर से कि अगर मैंने सच बोला तो वे मेरी असलियत जान जाएँगे और मेरे बारे में अच्छा नहीं सोचेंगे। इस तरह शर्मिंदा होने से तो मारा जाना ही अच्छा है! सच बोलने के बजाय मैंने अँधेरे में रहकर मुसीबतें उठाना पसंद किया और पाखंडी और धोखेबाज बनती गई। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी भी बिल्कुल ऐसी ही है। वह चाहे कितनी ही निंदनीय और बुरी चीजें करती है, पर उन्हें कभी सामने नहीं आने देती, बल्कि अपने झूठों से दुनिया को भरमाती है। वह लोगों को गुमराह करने के लिए, आम लोगों को बेवकूफ बनाने के लिए अपने महान, शानदार और सही होने की छवि गढ़ती है। वह बेहद नीच और दुष्ट है। क्या मेरा झूठ बोलना और धोखा देना भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी जैसा ही नहीं था? इससे मुझे परमेश्वर के वचन याद आये : “यह किस तरह का मार्ग है? यह राक्षसों का मार्ग है, दुष्टता का मार्ग है। यह परमेश्वर में विश्वास करने वाले द्वारा लिया गया मार्ग नहीं है। वे शैतान के फलसफों, उसके तर्क का उपयोग करते हैं, वे लोगों के व्यक्तिगत भरोसे का लाभ उठाकर उन्हें धोखा देने के लिए, उनसे अपनी पूजा और अनुसरण करवाने के लिए हर परिस्थिति में उसकी हर चाल, हर युक्ति का उपयोग करते हैं। यह वह मार्ग नहीं है जिस पर परमेश्वर में विश्वास करने वाले लोगों को चलना चाहिए, बल्कि यह वह मार्ग है जिस पर शैतान और दानव चलते हैं। इस तरह का व्यक्ति न केवल बचाया नहीं जाएगा, बल्कि उसे परमेश्वर का दंड भी मिलेगा—इसमें जरा-सा भी संदेह नहीं हो सकता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, धर्म में विश्वास रखने या धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने मात्र से किसी को नहीं बचाया जा सकता)। परमेश्वर विश्वसनीय है। परमेश्वर यह अपेक्षा करता है कि हम ईमानदार बनकर अंत में उसका उद्धार पाएँ। मगर लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करने के लिए शैतान सभी तरह के फलसफे और भ्रांतियाँ आजमाता है, ताकि हम अपनी शोहरत, लाभ और रुतबे के लिए लगातार झूठ बोलें और धोखा दें और नकली और धूर्त बनते जाएँ। आखिर में हम नर्क में गिर जाएँगे और उसके साथ ही दंडित होंगे। तब जाकर मैंने शैतान की कपटी और क्रूर मंशा को साफ तौर पर समझा। मैंने उससे अथाह नफरत की और ईमानदार इंसान बनने की कोशिश की।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों के कुछ और अंश पढ़े : “परमेश्वर का लोगों से ईमानदार बनने की माँग करना यह साबित करता है कि वह धोखेबाज लोगों से सचमुच अत्यधिक घृणा करता है और उन्हें नापसंद करता है। धोखेबाज लोगों के प्रति परमेश्वर की नापसंदगी उनके काम करने के तरीके, उनके स्वभावों और साथ ही उनकी मंशाओं और उनकी धोखेबाजी के साधनों के प्रति नापसंदगी है; परमेश्वर को ये सब चीजें नापसंद हैं। यदि धोखेबाज लोग सत्य स्वीकार कर पाते हैं, अपने धोखेबाज स्वभाव को मान पाते हैं और ईमानदार लोग बनने के लिए परमेश्वर का उद्धार स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने को तैयार होते हैं तो उनके पास भी बचाए जाने की उम्मीद होती है, क्योंकि परमेश्वर किसी के प्रति पक्षपात नहीं करता है और न ही सत्य ऐसा करता है। और इसलिए, यदि हम परमेश्वर को प्रसन्न रखने वाले लोग बनना चाहते हैं तो हमें सबसे पहले अपने स्व-आचरण के सिद्धांतों को बदलना होगा, शैतानी फलसफों के अनुसार जीना बंद करना होगा, अपना जीवन जीने के लिए झूठ बोलने और धोखा देने पर निर्भर रहना बंद करना होगा और हमें अपने सारे झूठ छोड़ने होंगे और ईमानदार लोग बनने की कोशिश करनी होगी। तब हमारे प्रति परमेश्वर का दृष्टिकोण बदलेगा। पहले लोग दूसरों के बीच रहते हुए हमेशा झूठ, धोखेबाजी और ढोंग पर निर्भर रहते थे और शैतानी फलसफों को अपने अस्तित्व का आधार, अपना जीवन और अपनी नींव मानकर आचरण करते थे। इससे परमेश्वर को घृणा थी। गैर-विश्वासियों के बीच यदि तुम ईमानदार व्यक्ति बनने की कोशिश करते हो और सच बोलते हो, तो तुम्हें बदनाम किया जाएगा, तुम्हारी आलोचना की जाएगी और तुम्हें ठुकरा दिया जाएगा। इसलिए तुम सांसारिक प्रवृत्तियों का अनुसरण करते हो और शैतानी फलसफों के अनुसार जीते हो; तुम झूठ बोलने में अधिकाधिक कुशल होते जाते हो और अधिक से अधिक धोखेबाज होते जाते हो। तुम अपने लक्ष्य पूरे करने के लिए धूर्त साधनों का उपयोग भी करते हो और इस प्रकार अपनी सुरक्षा करते हो। तुम शैतान की दुनिया में अधिकाधिक समृद्ध होते चले जाते हो और परिणामस्वरूप तुम पाप में अधिक से अधिक गहरे गिरते जाते हो और उसमें से खुद को निकाल नहीं सकते हो। परमेश्वर के घर में चीजें ठीक इसके विपरीत होती हैं। तुम झूठ बोलने और धोखेबाज होने में जितना अधिक कुशल होते हो, परमेश्वर के चुने हुए लोग तुमसे उतने ही अधिक विमुख होंगे और तुम्हें ठुकरा देंगे। यदि तुम पश्चात्ताप करने से इनकार कर देते हो, अब भी शैतानी फलसफों और तर्क से चिपके रहते हो, छद्मवेश धारण करने और मुखौटे पहनने के लिए साजिशों, चालों और परिष्कृत तरकीबों का भी इस्तेमाल करते हो तो बहुत संभव है कि तुम बेनकाब कर दिए जाओगे और हटा दिए जाओगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि परमेश्वर धोखेबाज लोगों से अत्यधिक घृणा करता है। परमेश्वर के घर में केवल ईमानदार लोग फल-फूल सकते हैं और सभी धोखेबाज लोगों को अंततः ठुकरा और हटा दिया जाएगा। यह सब परमेश्वर ने बहुत पहले पूर्वनियत कर दिया है(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, एक ईमानदार व्यक्ति होने का सबसे बुनियादी अभ्यास)। “सत्य को स्वीकारना और स्वयं को जानना तुम्हारे जीवन के विकास और उद्धार प्राप्त करने का मार्ग है; यह तुम्हारे लिए अवसर है कि तुम परमेश्वर के सामने आकर उसकी जाँच-पड़ताल, उसके न्याय और ताड़ना को स्वीकार करो, सत्य और जीवन प्राप्त करो। अगर तुम प्रतिष्ठा, रुतबे और अपने निजी हितों का अनुसरण करने के लिए सत्य का अनुसरण करना छोड़ देते हो, तो यह परमेश्वर के न्याय और ताड़ना को स्वीकार करने और उद्धार पाने का अवसर छोड़ने के समान है। तुम प्रसिद्धि, लाभ, रुतबा और अपने हित चुनते हो, लेकिन तुम सत्य का त्याग कर देते हो, जीवन खो देते हो और बचाए जाने का मौका गँवा देते हो। इनमें से किसका महत्व अधिक है? अगर तुम अपने निजी हितों को चुनते हो और सत्य को त्‍याग देते हो, तो क्या यह मूर्खतापूर्ण नहीं है? आम बोलचाल की भाषा में कहें तो यह एक छोटे से फायदे के लिए बहुत बड़ा नुकसान उठाना है। प्रसिद्धि, लाभ, रुतबा, धन और निजी हित सब अस्थायी हैं, ये सब धुएँ के गुबार की तरह लुप्त हो जाते हैं, जबकि सत्य और जीवन शाश्वत और अपरिवर्तनीय हैं। अगर लोग प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के पीछे दौड़ाने वाले भ्रष्ट स्वभाव दूर कर लें, तो वे उद्धार पाने की आशा कर सकते हैं। इसके अलावा, लोगों द्वारा प्राप्त सत्य शाश्वत होते हैं; शैतान लोगों से ये सत्‍य छीन नहीं सकता, न ही कोई और उनसे इन्हें छीन सकता है। तुम अपने हित त्याग देते हो, लेकिन तुम्हें सत्य और उद्धार प्राप्त हो जाते हैं; ये तुम्हारे अपने परिणाम हैं और इन्हें तुम अपने लिए प्राप्त करते हो। अगर कोई सत्‍य का अभ्‍यास करने का चुनाव करता है, तो वह अपने हितों को गँवा देने के बावजूद परमेश्वर का उद्धार और शाश्‍वत जीवन हासिल कर लेता है; ऐसे लोग सबसे ज्यादा होशियार होते हैं। अगर कोई अपने हितों के लिए सत्‍य को त्‍याग देता है तो वह जीवन और परमेश्वर के उद्धार को गँवा देता है; ऐसे लोग सबसे ज्‍यादा बेवकूफ होते हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने स्‍वभाव का ज्ञान उसमें बदलाव की बुनियाद है)। परमेश्वर के वचनों ने याद दिलाया कि सिर्फ ईमानदार इंसान ही बचाया जा सकता है और वही स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करेगा। कपटी लोगों को परमेश्वर बेनकाब करके हटा देगा। कोई इंसान कैसा है और वह कौन-सा रास्ता चुनता है, इसका सीधा असर उसके परिणाम और मंजिल पर पड़ता है। मगर मैं कितनी अंधी थी। सत्य से प्रेम करने के बजाय, मैंने बस अपनी छवि बनाये रखने पर ध्यान दिया, यहाँ तक कि बार-बार झूठ बोलकर दिखावा किया। इसके बाद भी मुझमें खुलकर बोलने का साहस नहीं था, मैं अभी तक सबसे बुनियादी झूठों को भी दूर नहीं कर पाई थी। अपना जीवन स्वभाव जरा भी नहीं बदला। इस तरह आस्था रखने पर परमेश्वर मेरा उद्धार कैसे कर पाएगा? मैंने देखा कि अपनी इज्जत की परवाह करने और निजी फायदे के पीछे भागने की कोई अहमियत नहीं थी। शायद इस तरह दूसरों की सराहना और मदद मिल सकती है, पर लगातार झूठ बोलकर परमेश्वर की घृणा की पात्र बनना और बचाये जाने का मौका गँवाना व्यर्थ ही है।

ईमानदार बनने का रास्ता खोजते हुए मेरी नजर परमेश्वर के इन वचनों पर पड़ी : “चाहे तुम किन्हीं भी समस्याओं का सामना करो, तुम्हें उनका समाधान करने के लिए सत्य खोजना ही चाहिए, तुम्हें खुद को बिल्कुल भी छिपाना नहीं चाहिए या दूसरों के सामने झूठी छवि पेश नहीं करनी चाहिए। चाहे ये तुम्हारी कमियाँ हों, तुम्हारी अपर्याप्तताएँ हों, तुम्हारी खामियाँ हों या तुम्हारे भ्रष्ट स्वभाव हों, तुम्हें इन सभी चीजों के बारे में खुलकर बात और संगति करनी ही चाहिए। उन्हें छिपाकर मत रखो। अपनी बात खुलकर कैसे रखें, यह सीखना जीवन प्रवेश का सबसे पहला कदम है और यही वह पहली बाधा है जिसे पार करना सबसे मुश्किल है। एक बार जब तुम इस बाधा को पार कर लोगे, तो सत्य में प्रवेश करना आसान हो जाएगा। जब तुम यह कदम उठाओगे, तो इसका क्या अर्थ होगा? यह दर्शाएगा कि तुम अपना दिल खोल रहे हो, और अपने हर हिस्से को—चाहे अच्छा हो या बुरा, सकारात्मक हो या नकारात्मक—उजागर कर रहे हो और खोल रहे हो, और उस पर दूसरे लोगों और परमेश्वर के देखने के लिए रोशनी डाल रहे हो, परमेश्वर से कुछ भी छिपा या ढँक नहीं रहे हो, परमेश्वर के प्रति कोई छद्मवेश, कपट या धोखा नहीं अपना रहे हो, और इसी तरह दूसरे लोगों के साथ भी स्पष्टवादी हो। इस तरह, तुम रोशनी में जिओगे; न केवल परमेश्वर तुम्हारी पड़ताल करेगा, बल्कि दूसरे लोग भी देखेंगे कि तुम्हारे क्रियाकलापों में सिद्धांत और पारदर्शिता है। तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा, छवि और रुतबे की रक्षा के लिए किसी भी तरीके का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें अपनी गलतियों को छिपाने या ढँकने की कोई जरूरत है। तुम्हें इन बेकार के प्रयासों में शामिल होने की जरूरत नहीं है। यदि तुम इन चीजों को छोड़ सकते हो, तो तुम्हारा जीवन बहुत तनावमुक्त हो जाएगा, बंधनों और दर्द से मुक्त हो जाएगा और तुम पूरी तरह से रोशनी में जिओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैंने जाना कि अपनी गरिमा और हितों की बात होने पर ईमानदार बनने और सच बोलने के लिए, सबसे पहले प्रार्थना कर परमेश्वर की जाँच-पड़ताल को स्वीकारना चाहिए। चाहे मुझमें कैसी भी खामियाँ या कमियाँ हों, कैसी भी भ्रष्टता प्रकट करूँ, मैं लीपापोती कर इन्हें छिपा नहीं सकती। अपनी असलियत जाहिर करने और सत्य खोजने से ही झूठ बोलने की यह समस्या धीरे-धीरे खत्म होगी। चाहे मैं कैसी भी भ्रष्टता प्रकट करूँ और मुझमें कैसी भी खामियाँ या कमियाँ हों, परमेश्वर वास्तव में बिल्कुल स्पष्ट रूप से पड़ताल कर सकता था, इसलिए मैं झूठ बोलकर और दिखावा करके लीपापोती नहीं कर सकती। भले ही लोग पहले-पहल मुझे जानते नहीं थे, पर समय बीतने के साथ सब मेरी असली प्रकृति को अच्छे से समझने लगेंगे। भले ही मुझ पर सिंचन कार्य की जिम्मेदारी थी, मैं उस काम में नई थी और मुझमें अभी भी बहुत-सी कमियाँ और दोष थे। जब मुझे किसी नए सदस्य की धारणाओं या समस्याओं की समझ नहीं थी, या जब मुझे सत्य की उथली समझ थी और स्पष्ट संगति नहीं कर पाती थी तो किसी अगुआ की मदद लेना एक सामान्य तरीका था, इसमें कोई शर्मिंदगी कैसी। मुझे अपनी खामियों का खुलकर सामना करने, सच बोलने की हिम्मत दिखाने और सत्य पर अमल कर ईमानदार इंसान बनने की जरूरत थी। यही आगे बढ़ने का सही रास्ता है। इस बारे में सोचकर मेरा दिल रोशन हो गया। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना कर पश्चात्ताप किया। मैं अपनी इज्ज़त और हितों के लिए बोलना और काम करना बंद कर दूँगी और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करूँगी। बाद में बहन चेंग लिन से मिलकर मैंने अपनी झूठ बोलने की समस्याओं के बारे में उसे सब कुछ बता दिया। मुझे काफी राहत महसूस हुई और सुकून मिला। मैं जानती थी मुझे अपनी छवि की काफी परवाह थी, हमेशा सोचती थी कि लोग मेरे बारे में क्या सोचते हैं। चीजें सामने आने पर मैं अपनी प्रतिष्ठा और हितों को बचाने में लग जाती थी और झूठ बोलने से खुद को नहीं रोक पाती थी। मैं परमेश्वर से प्रार्थना कर उससे मेरे दिल पर नजर रखने को कहती रही, ताकि झूठ बोलने की इच्छा होते ही मुझे पता चल जाए और मैं तुरंत अपना रास्ता बदलकर खुलकर बोलूँ और ईमानदार इंसान बन सकूँ।

एक बार एक सभा में अगुआ ने एक नए विश्वासी की समस्या पर सबसे अपनी-अपनी राय बताने को कहा। मैं बहुत घबरा गई। अगुआ को मेरे मुकाबले सिद्धांतों की अधिक समझ थी। पल भर में यह साफ हो जाता कि मैं समस्या को पहचान पाती हूँ या नहीं, मैं सही हूँ या गलत और मुझमें कोई भटकाव तो नहीं है। अगर मैं समस्या की जड़ नहीं पकड़ पाई या उसे हल नहीं कर पाई तो अगुआ मेरे बारे में क्या सोचेगा? इस बारे में जितना सोचा उतनी ही परेशान होती गई, न खुद को शांत कर विश्वासियों की समस्या पर सोच न पाई। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों को याद किया : “तुम्हें अपनी प्रतिष्ठा, छवि और रुतबे की रक्षा के लिए किसी भी तरीके का उपयोग करने की आवश्यकता नहीं है, न ही तुम्हें अपनी गलतियों को छिपाने या ढँकने की कोई जरूरत है। तुम्हें इन बेकार के प्रयासों में शामिल होने की जरूरत नहीं है। यदि तुम इन चीजों को छोड़ सकते हो, तो तुम्हारा जीवन बहुत तनावमुक्त हो जाएगा, बंधनों और दर्द से मुक्त हो जाएगा और तुम पूरी तरह से रोशनी में जिओगे(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों पर गहराई से विचार करते हुए मैं समझ गई कि मुझे एक ईमानदार इंसान बनना चाहिए और सच बोलना चाहिए। चाहे मैं कितनी भी समस्या देखूँ या मुझमें चाहे जो विचलन हों, फिर भी मुझे लीपापोती करने, छिपाने या दिखावा करने या अपने बारे में अगुआ की राय की परवाह करने के बजाय सच्चाई से बोलना चाहिए। सबसे अहम था सत्य का अभ्यास करना और परमेश्वर के समक्ष एक ईमानदार इंसान बनना। इन विचारों ने मुझे शांत कर दिया। फिर मैंने अपनी राय बताई। इसे सुनने के बाद अगुआ ने हमारी कमियों के बारे में आगे संगति की। इस प्रकार के संवाद के बाद मुझे स्पष्ट समझ प्राप्त हुई कि मैं नए सदस्यों की समस्या कैसे हल करूँ। इस अनुभव से मुझे लगा कि परमेश्वर की अपेक्षा अनुसार सच बोलना कितना अद्भुत है। यह काफी राहत और सुकून देता है। अब मैं झूठ बोलने की बेचैनी और पीड़ा में नहीं जी रही हूँ। मैं परमेश्वर की बहुत आभारी हूँ! अगर मुझे इन परिस्थितियों में बेनकाब न किया गया होता या परमेश्वर के वचनों द्वारा मेरा न्याय न किया गया होता और मुझे उजागर न किया गया होता, तो मुझमें न कभी ऐसी समझ आती, न ही मैं बदल पाती।

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