7. परमेश्वर के वचनों से दूसरों को देखना महत्वपूर्ण है
शीला को मैं तीन साल से अधिक समय से जानती थी और मैं उसे अच्छे से जानती थी। जब भी हमारी मुलाकात होती, वह अपनी मौजूदा दशा के बारे में बातें करती। वह कहती कि वह हमेशा दूसरों पर संदेह करती है और इस बात की बहुत परवाह करती है कि लोग उसके बारे में क्या सोचते हैं। यह भी कहती कि वह बहुत छोटी सोच रखती है, हमेशा अंदाजा लगाती रहती है कि लोगों के कहने का आशय क्या है। किसी के चेहरे पर जरा-सा भी भाव देखकर, उनके लहजे या किसी सरसरी टिप्पणी से भी वह बेचैन हो जाती है। वह ऐसा नहीं बनना चाहती थी, पर इस पर काबू नहीं पा रही थी। अक्सर कहती कि वह बहुत भ्रष्ट और धोखेबाज है, उसमें जरा-सी भी मानवता नहीं है, वह इज्जत और रुतबे को कितना महत्व देती है, इससे उसे घृणा है, और वह बात करते हुए रोने लगती थी। उसे इतना अफसोस करते और खुद से इतनी नफरत करते देखकर मैंने सोचा कि वह सच में बदलना चाहती है। शायद यह भ्रष्ट स्वभाव थोड़ा ज्यादा गंभीर था और यह उसकी सबसे गंभीर समस्या थी, तो इसे बदलना आसान नहीं था; इसमें काफी समय लगता। इसलिए मुझे लगा मुझे उसके प्रति विचारशील होना चाहिए। मैं अपने कर्तव्य में कितनी भी व्यस्त रहती, अगर वह बात करना चाहती, तो मैं अपने काम को किनारे कर उसके दिल की बात सुनती, अक्सर उसका हौसला बढ़ाती, दिलासा देती और उसके साथ संगति करती। मगर मैं समझ नहीं पाई कि भले ही शीला अपनी संगति में स्पष्ट और तर्कसंगत ढंग से बोलती दिखती और खुद को अच्छे से जानती थी, मगर जब लोग उसकी समस्याएँ बताते, तो उसे लगता था कि वे उसका तिरस्कार कर रहे हैं और वह नकारात्मक हो जाती थी। ऐसा बार-बार हुआ और वह कभी नहीं बदली। इतना ही नहीं, उसने इस दशा के बारे में कई लोगों से बात की थी, कई बार खुलकर बताया और कई लोगों ने उसके साथ संगति की। लेकिन कई साल बाद भी उसमें सुधार की एक भी निशानी नजर नहीं आई।
एक बार की बात है, एक पर्यवेक्षक नए सदस्यों के सिंचन से जुड़े हमारे मसले पर गौर कर रही थी, उसने कहा कि हम नए सदस्यों का ध्यान नहीं रखते और पर्याप्त सब्र से काम नहीं लेते, जब वे सभाओं में नहीं आते हैं, तो हम फौरन संगति कर उनकी मदद नहीं करते हैं, यह गैर-जिम्मेदाराना है। पर्यवेक्षक यह बात सभी सिंचनकर्ताओं से बोल रही थी, किसी एक व्यक्ति पर उँगली नहीं उठा रही थी। मगर शीला ने कहा कि पर्यवेक्षक उसे उजागर कर उसकी छवि खराब कर रही थी, वह सभा में बात भी नहीं करना चाहती थी। एक बार, एक भाई अपनी मौजूदा दशा पर संगति करते हुए बोला कि कभी-कभी वह थोड़े कम काबिल भाई-बहनों से मिलता है तो वह उनके साथ निष्पक्ष ढंग से पेश नहीं आ पाता। उसने अपने अनुभवजन्य ज्ञान पर संगति की और बताया कि कैसे उसने खुद को बदला और प्रवेश किया। मगर जब शीला ने यह सुना तो उसने सोचा कि वह उसके बारे में ही बात कर रहा है, उसे कम काबिल आँक रहा और उसे नीची नजरों से देख रहा है। उसके बाद वह कई दिनों तक नकारात्मक रही, उस भाई के खिलाफ पूर्वाग्रह रखकर उससे दूर रहने लगी और उसकी अनदेखी करने लगी। एक बार काम की चर्चा के दौरान पर्यवेक्षक ने बताया कि शीला के नए सदस्यों के सिंचन-कार्य में एक छोटी-सी समस्या है, तो वह अचानक रोने लगी और बाहर भाग गई और काफी देर तक वापस नहीं आई। वह चुपचाप एक किनारे बैठी आँसुओं से अपना चेहरा भिगोती रही, मानो उसके साथ बहुत अन्याय हुआ हो। उसके चेहरे के हाव-भाव देखकर मेरा मन अशांत हो गया और सभा में व्यवधान पड़ गया। आखिर में, कोई चारा न देखकर पर्यवेक्षक ने उसका हौसला बढ़ाया और दिलासा दिया, तब जाकर वह शांत हुई। बाद में, अगुआ ने उसके साथ संगति कर बताया कि वह इज्जत और रुतबे को काफी महत्व देती है, अपना कर्तव्य करने के लिए उसे सभी लोगों की देखरेख और ध्यान की आवश्यकता थी। वह इस बात को और भी स्वीकार नहीं पाई : एक ओर उसने कहा कि पर्यवेक्षक की आलोचना पक्षपातपूर्ण और अनुचित थी, तो दूसरी ओर कहा कि दरअसल वह मुश्किल प्रकृति की इंसान है, वह बदलना चाहती है पर बदल नहीं पा रही है। उसने यह भी कहा, “मेरे बचाए जाने की कोई गुंजाइश नहीं है। मेरी प्रकृति ऐसी क्यों है? हर कोई मुझसे बेहतर क्यों है, वे कम जटिल विचारों से धन्य क्यों हैं? परमेश्वर ने मुझे अच्छी प्रकृति क्यों नहीं दी?” उसकी बातें सुनकर मैंने सोचा, “वह कैसी जानबूझकर तंग करने वाली और विवेकहीन इंसान है! परमेश्वर के बारे में शिकायत कैसे कर सकती है?” मगर फिर सोचा कि शायद वह इन दिनों बुरी दशा में हो, उसने ये बातें सिर्फ अपनी इज्जत और रुतबे पर खतरा होने के कारण कही हो। मुमकिन है कि दशा सुधर जाने पर वह ऐसी न रहे।
बाद में मुझे एहसास हुआ कि शीला चाहे जिसके साथ भी हो, वह उसके हाव-भाव की बहुत परवाह करती थी—अगर उसे लगता कि कोई उसके प्रति उदासीन है या उसे उसका लहजा या रवैया पसंद न आता, तो वह समझती कि वह व्यक्ति उससे चिढ़ता है। उसके साथ मेलजोल में, मैं बेहद सतर्क रहती थी, हमेशा सोचती कि अपनी बातों से कहीं मैं उसे नाराज न कर दूँ, वह नकारात्मक होकर कर्तव्य में देरी न करने लगे। शीला के साथ संवाद करने में घुटन होती थी, मैं हमेशा उससे बचना चाहती थी। फिर मैंने सोचा, मैं भी तो भ्रष्ट हूँ, ऐसे में उसे आलोचना की नजर से नहीं देखना चाहिए। मुझे उसकी परवाह कर उसके संघर्ष पर विचार करना चाहिए, उसके प्रति सहनशील और दयालु बनना चाहिए। मैंने खुद को उसके साथ सामान्य तरीके से संवाद करने को बाध्य किया, इसका भरसक प्रयास किया कि उसके मान-सम्मान को ठेस न पहुँचे।
बाद में, चूँकि शीला सत्य हरगिज नहीं स्वीकारती थी, विवेकहीन थी, और वह कलीसिया में कोई सकारात्मक भूमिका नहीं निभा रही थी, अगुआ ने उसे बर्खास्त कर दिया और अलग रहकर चिंतन करने की व्यवस्था की। यह खबर सुनकर मैं बहुत हैरान हुई, क्योंकि शीला भले ही इज्जत और रुतबे की बहुत परवाह करती थी, अक्सर दूसरों पर संदेह करती थी, फिर भी वह खुलकर बात और संगति करने को तैयार थी, वह सत्य का अनुसरण करने वाली लगती थी। फिर उसे अलग कर चिंतन करने की व्यवस्था क्यों की गई? बाद में, एक सभा में जब अगुआओं ने शीला के बारे में भाई-बहनों के मूल्यांकन पढ़कर सुनाए और परमेश्वर के वचनों से उसके बर्ताव का गहन-विश्लेषण किया, तब जाकर मुझे उसके भेद की थोड़ी पहचान हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जो लोग अविवेकी और मनमाने ढंग से परेशान करने वाले होते हैं, वे जब कार्य करते हैं, तो सिर्फ अपने हितों के बारे में सोचते हैं, और वही करते हैं जो उन्हें अच्छा लगता है। उनके शब्द ऊटपटाँग बहस और पाखंडों के अलावा और कुछ नहीं होते हैं और वे तर्कपूर्ण बात सुनने से इनकार कर देते हैं। उनके क्रूर स्वभाव सारी हदें पार कर चुके हैं। खुद पर आपदा आमंत्रित करने के डर से कोई उनके साथ जुड़ने की हिम्मत नहीं करता और कोई उनके साथ सत्य के बारे में संगति करने को तैयार नहीं होता। दूसरे लोग जब भी अपने मन की बात उनसे कहते हैं तो बेचैन रहते हैं, वे डरते हैं कि अगर उन्होंने एक भी शब्द ऐसा कह दिया जो उन्हें पसंद या उनकी इच्छा के अनुरूप न हो, तो वे उसे लपक लेंगे और उसके आधार पर घोर आरोप लगा देंगे। क्या ऐसे लोग बुरे नहीं हैं? क्या वे जीते-जागते राक्षस नहीं हैं? बुरे स्वभाव और बगैर तार्किकता वाले सभी लोग जीते-जागते राक्षस हैं। और जब कोई जीते-जागते राक्षस के साथ बातचीत करता है तो वह पल भर की लापरवाही से अपने ऊपर आपदा ला सकता है। अगर ऐसे जीते-जागते राक्षस कलीसिया में मौजूद हों तो क्या इससे एक बड़ी मुसीबत नहीं खड़ी हो जाएगी? (हो जाएगी।) अपनी भड़ास निकालने और गुस्सा उतारने के बाद ये जीते-जागते राक्षस कुछ देर के लिए एक इंसान की तरह बोल सकते हैं और माफी माँग सकते हैं, लेकिन बाद में वे नहीं बदलते। कौन जानता है कि कब उनका मूड खराब हो जाएगा और वे फिर से नखरे दिखाने लगेंगे, अपने ऊटपटाँग तर्क बकने लगेंगे। हर बार उनके नखरे दिखाने और भड़ास निकालने का लक्ष्य अलग होता है; और ठीक ऐसा ही उनकी भड़ास का स्रोत और पृष्ठभूमि होती है। यानी, कोई भी चीज उन्हें उकसा सकती है, कोई भी चीज उन्हें असंतुष्ट महसूस करवा सकती है, और कोई भी चीज उन्हें उन्मादी और अविवेकी तरीके से प्रतिक्रिया करने पर मजबूर कर सकती है। यह कितनी भयानक, कितनी तकलीफदेह बात है! ये विक्षिप्त बुरे लोग किसी भी समय पगला सकते हैं; कोई नहीं जानता कि वे क्या करने में सक्षम हैं। मुझे ऐसे लोगों से सबसे ज्यादा नफरत है। उनमें से हर एक को दूर कर देना चाहिए—उन सभी को बाहर निकाल देना चाहिए। मैं उनके साथ जुड़ना नहीं चाहता। वे भ्रमित विचारों वाले और पाशविक स्वभाव के होते हैं, वे ऊटपटाँग तर्कों और दानवी शब्दों से भरे होते हैं, और जब उनके साथ कुछ घटित होता है, तो वे आवेगपूर्ण ढंग से इसके बारे में अपनी भड़ास निकालते हैं। ... अपनी खुद की कई समस्याओं के बारे में स्पष्ट रूप से जानने के बावजूद वे कभी भी उन्हें सुलझाने के लिए सत्य की तलाश नहीं करते हैं और न ही वे दूसरों के साथ अपनी संगति में आत्म-ज्ञान पर चर्चा करते हैं। जब उनकी अपनी समस्याओं का जिक्र किया जाता है तो वे पलट जाते हैं और दोष किसी और के मत्थे मढ़ देते हैं, सभी समस्याएँ और जिम्मेदारियाँ दूसरों पर डाल देते हैं, और यहाँ तक कि यह शिकायत भी करते हैं कि उनके व्यवहार का कारण यह है कि दूसरे उनके साथ बुरा व्यवहार करते हैं। ऐसा लगता है जैसे उनके नखरे और बेतुके भड़कावे दूसरे लोगों के कारण हुए हैं, जैसे कि बाकी सभी दोषी हैं और उनके पास इस तरह से कार्य करने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं है—वे मानते हैं कि वे जायज तरीके से खुद का बचाव कर रहे हैं। वे जब भी असंतुष्ट होते हैं, तो अपनी नाराजगी की भड़ास निकालना और बकवास करना शुरू कर देते हैं, अपने ऊटपटाँग तर्कों पर ऐसे अड़े रहते हैं मानो बाकी सभी गलत हैं, वे दूसरों को खलनायक के रूप में चित्रित करते हैं और खुद को अकेला अच्छा व्यक्ति बताते हैं। चाहे वे कितने भी नखरे दिखाएँ या ऊटपटाँग तर्क क्यों न बकें, वे अपेक्षा करते हैं कि उनके बारे में अच्छी-अच्छी बातें कही जाएँ। जब वे गलत करते हैं, तब भी वे दूसरों को उन्हें उजागर करने या उनकी आलोचना करने से रोक देते हैं। अगर तुम उनके किसी मामूली मुद्दे की तरफ भी ध्यान दिलाते हो तो वे तुम्हें अंतहीन विवादों में फँसा देंगे और फिर तुम शांति से जीना तो भूल ही जाओ। यह किस किस्म का व्यक्ति है? यह अविवेकी और मनमाने ढंग से परेशान करने वाला व्यक्ति है और जो लोग ऐसा करते हैं, वे बुरे लोग हैं” (वचन, खंड 5, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ, अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ (26))। परमेश्वर के वचन उन लोगों के व्यवहार को उजागर करते हैं जो अविवेकी और कष्टकारी हैं। जैसे ही कोई कुछ ऐसा कहता या करता है जिससे उनके हितों को खतरा हो तो वे अनुचित ढंग से बात कर बखेड़ा खड़ा कर देते हैं। वे क्रूर स्वभाव प्रकट करते हैं, ताकि लोग उन्हें नाराज करने और उनका विरोध करने से डरें। वे भाई-बहनों और कलीसियाई जीवन में बुरी तरह व्यवधान डालते हैं। शीला शुरू से ही वैसी थी। जब दूसरे लोग उसके मसले बताते तो वह कभी नहीं सोचती कि क्या उनकी बात सही है, न ही चिंतन करती, उसका ध्यान उनके लहजे और रवैये पर ही रहता। अगर वे उसकी पसंद के मुताबिक नहीं होते तो वह आपा खो देती थी और या तो उनके प्रति प्रतिरोध महसूस करती थी और उनके बारे में खराब राय बना लेती, सोचती कि वे उससे चिढ़ते और उसे नीची नजर से देखते हैं, या रोकर अपनी नाराजगी जाहिर करती। इससे दूसरे लोग बेबस हो जाते, वे या तो उससे बचते फिरते या उन्हें उसकी बात सुननी पड़ती। हमारे पर्यवेक्षक ने सिंचन कार्य की समस्याओं पर गौर किया, ताकि हमारे विचलनों को पलटने और अपने कर्तव्य बेहतर ढंग से करने में हमारी मदद कर सके, मगर शीला को लगा पर्यवेक्षक उस पर उँगली उठाकर उसकी पिछली गलतियाँ उजागर कर रहा है, तो वह पर्यवेक्षक को लेकर पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो गई। जब एक भाई ने अपनी दशा पर संगति करते हुए कहा कि वह लोगों से सही ढंग से पेश नहीं आता और वह खुद को जानने के लिए चिंतन कर रहा है, तो उसे लगा वह उसका तिरस्कार कर रहा है और नीची नजर से देख रहा है, इसलिए उसने उसे अनदेखा कर दिया। जब पर्यवेक्षक ने उसके कर्तव्य में उसकी समस्याएँ बताईं, तो वह अपनी भड़ास निकालने के लिए बुरी तरह रोने लगी। लोगों में उसका विरोध या उसे नाराज करने की हिम्मत नहीं थी, वे विनम्र होकर ही उससे बात करते, उसे शांत करते और उसकी बात मान लेते। तब जाकर वह अपना कर्तव्य करती। शीला कई सालों से ऐसा ही बर्ताव कर रही थी। जो भी उसकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाता या उसके हितों के लिए खतरा बनाता, वह उसके बारे में खराब राय बना लेती। वह तो यहाँ तक कहती थी कि उसके नकारात्मक होने की वजह यह है कि उसके प्रति दूसरे लोगों का रवैया बुरा है, जो कि सत्य को पूरी तरह अनुचित रूप से उलट देना था। क्या वह उन विवेकहीन लोगों में से नहीं थी जिन्हें परमेश्वर उजागर करता है? इसका एहसास होने पर ही मैंने जाना कि दूसरों के प्रति संदेह रखना और इज्जत की बहुत परवाह करना ही शीला की समस्या नहीं है, वह सत्य बिल्कुल भी नहीं स्वीकार करती थी, असल में वह खीझ पैदा करने वाली विवेकहीन इंसान थी। तब मैंने विचार किया कि जब मैं शीला को अक्सर अपनी दशा पर चर्चा करते, अपनी भ्रष्टता पर खुलकर बात और संगति करते, सभाओं में खुद का गहन-विश्लेषण करते और अपनी भ्रष्टता के बारे में चर्चा करते समय रो-रोकर अफसोस दिखाते देखती थी तो मुझे लगता था कि अवश्य ही उसे खुद की असली समझ है और वह सत्य का अनुसरण करती है। मेरी समझ में गलती क्या थी?
बाद में, भाई-बहनों के साथ परमेश्वर के वचनों पर संगति करके मुझे उसके तथाकथित “आत्मज्ञान” के भेद की थोड़ी पहचान हुई। परमेश्वर कहता है : “जब कुछ लोग अपने आत्म-ज्ञान के बारे में संगति करते हैं तो वे बरबस बोल पड़ते हैं, ‘मैं एक दानव हूँ, एक जीवित शैतान हूँ, ऐसा इंसान हूँ जो परमेश्वर का प्रतिरोध करता है। मैं उसके खिलाफ विद्रोह करता हूँ और उसके साथ विश्वासघात करता हूँ; मैं एक जहरीला साँप हूँ, एक बुरा इंसान हूँ। मैं शापित होने लायक हूँ।’ क्या यही सच्चा आत्म-ज्ञान है? वे केवल सामान्य बातें बोलते हैं। वे उदाहरण क्यों नहीं देते? वे अपने द्वारा की गई शर्मनाक चीजों का खुलासा क्यों नहीं करते हैं, उनका गहन-विश्लेषण क्यों नहीं करते हैं और उन्हें सबके सामने क्यों नहीं लाते? कुछ अविवेकी लोग उनकी बात सुनकर सोचते हैं, ‘अब यह है सच्चा आत्म-ज्ञान! यहाँ तक कि वे खुद को एक दानव के रूप में जानते हैं और खुद को कोसते हैं। वे कितनी ऊँचाई तक पहुँच गए हैं!’ बहुत-से लोग, खासकर नए विश्वासियों में, इन शब्दों से गुमराह होने की प्रबल संभावना होती है। वे सोचते हैं कि वक्ता शुद्ध है और उसके पास आध्यात्मिक समझ है, सत्य से प्रेम करता है और अगुआ बन सकता है। लेकिन जब वे उससे कुछ समय तक मिलते-जुलते हैं तो पाते हैं कि यह वैसा इंसान नहीं है जैसी उन्होंने कल्पना की थी, बल्कि असाधारण रूप से झूठा और धोखेबाज है, स्वाँग रचने और ढोंग करने में माहिर है, जिससे उन्हें बड़ी निराशा होती है। किस आधार पर यह माना जा सकता है कि लोग वास्तव में खुद को जानते हैं? तुम केवल इस बात पर विचार नहीं कर सकते कि वे क्या कहते हैं—मुख्य बात है यह देखना कि वे सत्य को स्वीकार करने में सक्षम हैं या नहीं और सत्य समझने के बाद उसे अभ्यास में ला सकते हैं या नहीं। जो लोग वास्तव में सत्य समझते हैं, वे न केवल अपने बारे में सच्चा ज्ञान रखने में सक्षम होते हैं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं। वे न केवल अपनी सच्ची समझ के बारे में बोलते हैं, बल्कि वे जो कहते हैं उसे सच में करने में भी सक्षम होते हैं। यानी उनकी कथनी और करनी में पूरी तरह तालमेल होता है। अगर वे जो कहते हैं वह अच्छा और तर्कसंगत लगता है, लेकिन वे वैसा करते नहीं, उसे जीते नहीं, तो इसमें वे फरीसी बन जाते हैं, वे पाखंडी होते हैं और खुद को सच में जानने वाले लोग बिल्कुल नहीं होते। कई लोग सत्य के बारे में संगति करते हुए बहुत तर्कसंगत लगते हैं, लेकिन यह महसूस नहीं करते कि कब वे भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करते हैं। क्या ये वे लोग हैं, जो खुद को जानते हैं? अगर लोग खुद को नहीं जानते, तो क्या वे सत्य को समझने वाले लोग होते हैं? वे सभी, जो स्वयं को नहीं जानते, वे सत्य को न समझने वाले लोग हैं, और जो आत्म-ज्ञान के खोखले शब्द बोलते हैं उनमें झूठी आध्यात्मिकता होती है, वे झूठे होते हैं। कुछ लोग शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते समय विशेष रूप से तर्कसंगत लगते हैं, लेकिन जब उनकी आत्माओं की दशा की बात आती है, तो वे सुन्न और मंदबुद्धि होते हैं, वे चीजों को महसूस नहीं कर पाते हैं और किसी भी मसले पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देते। कहा जा सकता है कि वे सुन्न होते हैं, लेकिन कभी-कभी ऐसा लगता है कि उनकी आत्माएँ काफी प्रखर हैं। उदाहरण के लिए, कुछ घटित होने के ठीक बाद वे तुरंत खुद को जानने में सक्षम होते हैं और कहते हैं : ‘अभी-अभी मुझे एक विचार आया। मैंने उसके बारे में सोचा और महसूस किया कि वह कपटी विचार था, कि मैं परमेश्वर को धोखा दे रहा था।’ यह सुनकर कुछ अविवेकी लोग ईर्ष्यालु हो जाते हैं और कहते हैं : ‘इस इंसान को तुरंत पता चल जाता है कि कब उसकी भ्रष्टता प्रकट हो रही है, और यह उसके बारे में खुलकर बात करने और संगति करने में सक्षम है। वह प्रतिक्रिया व्यक्त करने में बहुत तेज है, उसकी आत्मा प्रखर है, वह हमसे बहुत बेहतर है। वह वास्तव में ऐसा इंसान है, जो सत्य का अनुसरण करता है।’ क्या यह लोगों का आकलन करने का सटीक तरीका है? (नहीं।) तो यह आँकने का आधार क्या होना चाहिए कि लोग सच में खुद को जानते हैं या नहीं? इसका आधार केवल उनके मुँह से निकलने वाली बातें नहीं होनी चाहिए। तुम्हें यह भी देखना चाहिए कि उनमें वास्तव में क्या प्रकट होता है। सबसे सरल तरीका यह देखना है कि क्या वे सत्य का अभ्यास करने में सक्षम हैं—यही सबसे महत्वपूर्ण है। अगर वे सत्य का अभ्यास कर सकते हैं, तो यह साबित करता है कि वे सच में खुद को जानते हैं, क्योंकि जो लोग वास्तव में खुद को जानते हैं, वे पश्चात्ताप अभिव्यक्त करते हैं, और जब लोग पश्चात्ताप अभिव्यक्त करते हैं, तभी वे वास्तव में खुद को जानते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करने के लिए आत्म-ज्ञान होना अनिवार्य है)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने जाना कि जो सच में खुद को जानते हैं वे सत्य स्वीकार सकते हैं, भ्रष्टता उजागर होने पर शर्मिंदा होते हैं, और फिर सच्चा पश्चात्ताप करके बदलते हैं। जो इसके उलट होते हैं, वे सभी सही बातें कहते हैं, खुद को राक्षस या शैतान कहते हैं, मानो उन्हें खुद की गहरी समझ है, पर काट-छाँट होने पर वे इसे हरगिज नहीं स्वीकारते और चिंतन नहीं करते, बार-बार खुद का बचाव करते हुए उचित लगने वाले तर्क देते हैं। ऐसे लोगों के शब्द बाहर से सुनने में चाहे जितने अच्छे लगें या उनमें चाहे कितना भी आत्मज्ञान दिखता हो, यह सब नकली है। मैंने विचार किया कि कैसे शीला हमेशा अपनी दशा के बारे में लोगों से बात करते हुए कहती थी उसे अपनी छवि की बहुत परवाह है और वह लोगों के लहजे और रवैये से बेबस है। उसने यह भी कहा कि वह धोखेबाज है, दूसरों पर संदेह करती है। ऊपर से तो लगता था मानो वह बहुत खुलकर सीधी बात करती है, अपनी भ्रष्टता का प्रकटन पहचानकर आत्मचिंतन कर सकती है, कभी-कभी तो बोलते-बोलते रो पड़ती है। ऐसा लगता मानो उसे सच में अफसोस और खुद से नफरत है। इससे मुझे लगा कि वह सत्य का अनुसरण करती होगी। मगर वह ये बरसों से बोलती आई है, फिर भी कभी बदली हुई नजर नहीं आई। परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन से ही मैंने जाना कि शीला का तथाकथित आत्मज्ञान बस एक दिखावा था; वह असल में न सत्य स्वीकारती थी, न ही अपनी भ्रष्टता पर चिंतन करती थी। वह अक्सर अपने बारे में बहुत-सी गहरी लगने वाली, पर खोखली बातें करती, कहती कि उसमें बुरी मानवता है, वह धोखेबाज, दुर्भावना से भरी एक मसीह-विरोधी है और उसे नरक में भेज देना चाहिए। ऐसा लगता था उसके पास गहरा आत्मज्ञान है, पर जब लोग उसकी समस्याएँ बताते या काट-छाँट करते, तो वह हरगिज नहीं स्वीकारती, प्रतिरोध करती और गुस्सा होती। वह रोना तक शुरू कर देती और संताप देते हुए बेतुकी हो जाती, सही-गलत पर बहस करती, दूसरों को इस कदर परेशान कर देती कि वे न सभा कर पाते और न सामान्य ढंग से कर्तव्य कर पाते। उसने कलीसियाई जीवन और कलीसिया के कार्य को बुरी तरह बाधित किया। पहले, मैं सत्य नहीं समझती थी, चीजों का भेद पहचान नहीं पाती थी, इसलिए उसके ऊपरी व्यवहार से गुमराह हो गई, सोचती थी कि वह सत्य का अनुसरण करने वाली इंसान है। मैं कितनी भ्रमित और मूर्ख थी। बाद में यह एहसास हुआ कि शीला दूसरों को अपनी दशा के बारे में इसलिए नहीं बताती थी कि वह अपनी समस्याएँ हल करने और अपनी दशा सुधारने के लिए सत्य खोजना चाहती थी, बल्कि उसे अपनी भड़ास निकालने के लिए किसी की जरूरत थी, जो उसे दिलासा दे और उसकी पीड़ा कम करने में मदद करे। जब वह अपनी दशा के बारे में किसी से खुलकर बात करती थी, वह बस एक बाधा ही होती थी। अगर उसे बर्खास्त कर उसके व्यवहार का गहन-विश्लेषण न किया जाता, तो मैं उसका भेद पहचान न पाती। उसे बहन मानकर सहनशीलता और सब्र से पेश आती, शायद अनजाने में उससे गुमराह होकर धोखा भी खा जाती। तब जाकर एहसास हुआ कि परमेश्वर के वचनों के अनुसार लोगों को देखना कितना अहम है!
बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिससे मुझे शीला की मंशाओं और लोगों को गुमराह करने की उसकी तरकीबों के भेद की थोड़ी पहचान हुई। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कैसे यह भेद पहचाना जा सकता है कि क्या कोई व्यक्ति सत्य से प्रेम करता है? एक संबंध में, यह देखना चाहिए कि क्या वह व्यक्ति परमेश्वर के वचन के आधार पर स्वयं को जान सकता है, क्या वह आत्म-चिंतन कर सच्चा पश्चात्ताप महसूस कर सकता है; दूसरे संबंध में, यह देखना चाहिए कि क्या वह सत्य को स्वीकार और उसका अभ्यास कर सकता है। अगर वह सत्य को स्वीकार और उसका अभ्यास कर सकता है, तो वह ऐसा व्यक्ति है जो सत्य से प्रेम करता है और परमेश्वर के कार्य के प्रति समर्पण कर सकता है। अगर वह सत्य को केवल मानता है, पर इसे कभी स्वीकार नहीं करता है या इसका अभ्यास नहीं करता है, जैसा कि कुछ लोग कहते हैं, ‘मैं सारा सत्य समझता हूँ, लेकिन मैं उसका अभ्यास नहीं कर सकता,’ तो यह साबित करने के लिए यह पर्याप्त है कि वह ऐसा व्यक्ति नहीं है जो सत्य से प्रेम करता है। कुछ लोग मानते हैं कि परमेश्वर का वचन सत्य है और उनमें भ्रष्ट स्वभाव हैं और यह भी कहते हैं कि वे पश्चात्ताप करने और नए लोग बनने के लिए तैयार हैं, लेकिन उसके बाद बिल्कुल भी कोई बदलाव नहीं होता। उनके शब्द और क्रियाकलाप अभी भी बिल्कुल पहले जैसे होते हैं। जब वे खुद को जानने के बारे में बात करते हैं, तो ऐसा लगता है मानो वे कोई चुटकुला सुना रहे हों या कोई नारा लगा रहे हों और वे अपने दिल की गहराइयों में बिल्कुल भी आत्म-चिंतन नहीं करते और खुद को नहीं जान पाते हैं। मुख्य मसला यह है कि उनमें पछतावे का कोई रवैया नहीं होता है। वास्तव में आत्म-चिंतन करने के लिए एक सरल और शुद्ध तरीके से अपनी भ्रष्टता के बारे में खुलकर बोलना और उसे सबके सामने खोलकर रखना तो वे बिल्कुल भी नहीं जानते। बल्कि वे बेमन से ऐसा करने की प्रक्रिया से गुजरने का दिखावा करके खुद को जानने का नाटक करते हैं। वे ऐसे लोग नहीं हैं, जो वास्तव में खुद को जानते या सत्य स्वीकारते हैं। जब ऐसे लोग खुद को जानने की बात करते हैं, तो वे केवल औपचारिकता निभाते हैं; वे स्वाँग, कपट और झूठी आध्यात्मिकता में संलग्न रहते हैं। कुछ लोग धोखेबाज होते हैं, और जब वे दूसरों को आत्म-ज्ञान पर सहभागिता करते हुए देखते हैं, तो वे सोचते हैं, ‘बाकी सब खुलकर बोलते हैं और अपनी-अपनी धोखेबाजी का गहन-विश्लेषण करते हैं। अगर मैंने कुछ नहीं कहा, तो वे सोचेंगे कि मैं खुद को नहीं जानता, तब मुझे औपचारिकता निभानी पड़ेगी!’ जिसके बाद वे अपनी धोखेबाजी को अत्यधिक गंभीर बताते हैं, उसके बारे में बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं और उनका आत्म-ज्ञान विशेष रूप से गहरा प्रतीत होता है। सुनने वाला हर व्यक्ति महसूस करता है कि वे वास्तव में खुद को जानते हैं, और फिर उन्हें ईर्ष्या से देखता है, जिससे उन्हें ऐसा महसूस होता है मानो वे विशेष रूप से गौरवशाली हों, मानो उन्हें प्रभामंडल से सजा दिया गया हो। इस तरह से खुद के बारे में जानने में औपचारिकता निभाना, साथ ही उनका स्वाँग और धोखेबाजी दूसरों को गुमराह कर देती है। क्या ऐसा करने से उनके जमीर को सुकून मिल सकता है? क्या यह खुलेआम धोखा नहीं है? अगर लोग खुद को जानने के बारे में केवल खोखली बातें करते हैं, लेकिन वह ज्ञान चाहे कितना भी ऊँचा या अच्छा क्यों न हो, वे अभी भी बिना किसी भी बदलाव के अपने भ्रष्ट स्वभावों के अनुसार काम करना जारी रखते हैं, तो फिर यह सच्चा आत्म-ज्ञान नहीं है। अगर लोग जानबूझकर इस तरह से स्वांग रच सकते हैं और धोखा दे सकते हैं, तो यह साबित करता है कि वे सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते, और बिल्कुल गैर-विश्वासियों जैसे हैं। इस तरह से अपने आत्म-ज्ञान के बारे में बात करके वे केवल प्रवृत्ति का अनुसरण करते हैं और कुछ ऐसी बातें बोलते हैं जो सबको अच्छी लगती हैं। क्या उनका आत्म-ज्ञान और खुद का गहन-विश्लेषण धोखे में डालने वाला नहीं है? क्या यही सच्चा आत्म-ज्ञान है? बिल्कुल नहीं। ऐसा इसलिए है क्योंकि वे दिल से खुद को खोलकर नहीं रखते और अपना गहन-विश्लेषण नहीं कर रहे हैं—यह केवल औपचारिकता निभाने के लिए है कि वे छद्म, बनावटी तरीके से खुद को जानने के बारे में थोड़ी-बहुत बात करते हैं। इससे भी गंभीर बात यह है कि जब वे अपने आत्म-ज्ञान के बारे में बात करते हैं, तो वे जानबूझकर बढ़ा-चढ़ाकर बोलते हैं, अपनी समस्याओं के बारे में ऐसे बोलते हैं मानो वे बहुत गंभीर हों, ताकि दूसरे उनकी प्रशंसा और उनसे ईर्ष्या करें। यह दिखाता है कि उनके व्यक्तिगत इरादे और लक्ष्य यहाँ मिले हुए हैं। जब वे ऐसा करते हैं, तो वे ऋणी महसूस नहीं करते, खुद को छद्मवेश में रखने और धोखेबाजी में लिप्त होने के बाद भी उनका जमीर उन्हें नहीं धिक्कारता। वे परमेश्वर के खिलाफ विद्रोह करने और उसे धोखा देने के बाद कुछ भी महसूस नहीं करते और अपनी गलती मानने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते। क्या ऐसे लोग अपने दिलों में काफी हठी नहीं हैं? यदि वे ऋणी महसूस नहीं करते, तो क्या वे कभी पछतावा महसूस कर सकते हैं? क्या पछतावे के सच्चे दिल के बिना कोई देह के खिलाफ विद्रोह कर सकता है और सत्य का अभ्यास कर सकता है? क्या पछतावे के सच्चे दिल के बिना कोई वास्तव में पश्चात्ताप कर सकता है? निश्चित रूप से नहीं। यदि उनमें पछतावे वाला दिल भी नहीं है, तो क्या आत्म-ज्ञान के बारे में बात करना बेतुका नहीं है? क्या यह सिर्फ छद्मवेश और धोखा नहीं है?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करने के लिए आत्म-ज्ञान होना अनिवार्य है)। परमेश्वर के वचन पढ़ते हुए मैंने शीला के व्यवहार के बारे में सोचा। उसे दूसरों के साथ अपनी दशा के बारे में बात करना पसंद था, वह सभाओं में आत्मचिंतन करने और खुद को जानने के लिए परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल करती थी। वह खुद के बारे में बुरी से बुरी बातें कहती थी। ऊपरी तौर पर लगता था कि उसे खुद की गहरी समझ है, खुद पर बेहद पछतावा और नफरत है, मगर यह सब दूसरों के लिए उसका दिखावा भर था, ताकि उन्हें दिखाए कि वह सत्य स्वीकारती है और खुद को समझती है। यह तथाकथित आत्मज्ञान दूसरों को गुमराह करने और आँखों में धूल झोंकने का तरीका था, ताकि वे सोचें कि वह अपने बारे में सब खुलकर बताने की हिम्मत रखती है, और वे उसका भेद पहचान ही न पाएँ, बल्कि उसकी बहुत प्रशंसा करें। जब भी शीला भ्रष्टता उजागर करती, वह खुद के बारे में बताने के लिए मसीह-विरोधियों का खुलासा करने वाले परमेश्वर के प्रकाशनों की मदद लेती, कहती कि वह इज्जत और रुतबे के पीछे भागती थी, एक मसीह-विरोधी के मार्ग पर चल रही थी, रुतबे की चाह उसके जीवन पर हावी थी और उसने पश्चात्ताप नहीं किया तो यह चाहत उसे मार डालेगी। मगर किसी स्थिति से उसकी इज्जत और रुतबे को खतरा होता, तो वह पुराने ढर्रे पर चलने लगती, और बरसों तक अपनी दशा पर संगति करने के बावजूद वह बिल्कुल नहीं बदली थी। अगुआओं ने उसकी समस्याएँ बताकर कई बार संगति की, पर उसने इन्हें नहीं स्वीकारा। यहाँ तक कि वह प्रतिरोधी हो जाती, लगातार बहस करके गलत तर्क देती। यह स्पष्ट था कि चाहे वह स्वयं को कितनी भी नकारात्मक दृष्टि से देखती हो या चाहे वह कितना भी पश्चात्ताप करती या रोती हुई दिखाई देती हो, यह सब लोगों को धोखा देने का एक कृत्य था, उसका उद्देश्य केवल अपने रुतबे और छवि की रक्षा करना था। साथ ही, जब वह देखती कि कैसे लोग अपने अहंकार को किनारे कर सत्य खोजते हैं, तो उनकी खूबियों से सीखने के बजाय यह सोचती थी कि वे अच्छी प्रकृति के साथ पैदा हुए हैं, और यह भी सोचती थी कि खुद वह सत्य का अभ्यास इसलिए नहीं कर पाती और हमेशा दूसरों पर संदेह करती है क्योंकि परमेश्वर ने उसे अच्छी प्रकृति नहीं दी है। वह अपने शैतानी स्वभाव से नफरत करने के बजाय परमेश्वर के बारे में शिकायत करती, उससे नाराज रहती थी और कहती थी कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है। इससे पता चलता था कि शीला में एक राक्षस का सार था, वह काफी बेतुकी और विवेकहीन थी। परमेश्वर के वचनों का खुलासा न होता, तो मैं उसे सत्य का अनुसरण करने वाली ही मानती रहती।
एक सभा के दौरान मैंने परमेश्वर के वचनों का यह अंश देखा : “जो सत्य से प्रेम करते हैं केवल वे ही परमेश्वर के घर के लोग हैं; वे ही असली भाई-बहन हैं। क्या तुम सोचते हो कि परमेश्वर के घर में अक्सर सभाओं में हिस्सा लेने वाले सभी लोग भाई-बहन होते हैं? जरूरी नहीं कि ऐसा हो। कौन-से लोग भाई-बहन नहीं होते? (वे जो सत्य से विमुख रहते हैं और जो सत्य को स्वीकार नहीं करते।) जो लोग सत्य को नहीं स्वीकारते और जो उससे विमुख रहते हैं, वे सभी बुरे लोग हैं। उन सबमें जमीर या विवेक नहीं होता। उनमें से कोई ऐसा नहीं है, जिसे परमेश्वर बचाता है। वे लोग मानवता से रहित हैं, वे अपने उचित कार्य नहीं करते और जानबूझकर बुरी चीजें करते हैं। वे पूरी तरह से शैतान के फलसफों के अनुसार जीते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं वह केवल कुटिल रणनीति का उपयोग करना, दूसरों का शोषण करना, फुसलाना और धोखा देना है। वे सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते और वे केवल आशीषें प्राप्त करने के लिए परमेश्वर के घर में घुसपैठ करते हैं; वे छद्म-विश्वासी हैं। मैं क्यों कहता हूँ कि वे छद्म-विश्वासी हैं? ऐसा इसलिए है क्योंकि वे केवल आशीषें प्राप्त करने के लिए परमेश्वर में विश्वास करते हैं और फिर भी सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार नहीं करते; चाहे उनके साथ कुछ भी हो, वे कभी भी सत्य की तलाश नहीं करते और जब भी सत्य पर संगति की जा रही होती है, तो वे इसमें रुचि नहीं लेते हैं, इसके प्रति विमुख महसूस करते हैं और इसे ग्रहण नहीं करते हैं, वे महसूस करते हैं कि यह उबाऊ है और वे स्थिर नहीं बैठ सकते। ये लोग स्पष्ट रूप से छद्म-विश्वासी और अविश्वासी हैं। तुम्हें उनके साथ बिल्कुल भी भाई-बहन मानकर व्यवहार नहीं करना चाहिए। ... वे सत्य में रुचि नहीं रखते, तो वे उसे अभ्यास में कैसे ला सकते हैं? तो वे हमेशा किसके अनुसार जीते हैं? निश्चित रूप से, ये शैतान के फलसफे हैं; वे हमेशा तुच्छ चालों और कपटी साजिशों का सहारा लेते हैं, सामान्य मानवता वाले लोगों की तरह नहीं जीते। वे कभी भी परमेश्वर से प्रार्थना नहीं करते या सत्य की तलाश नहीं करते, बल्कि हर चीज से मानवीय साजिशों, मानवीय युक्तियों और सांसारिक आचरण के फलसफों का उपयोग करके निपटते हैं; इस प्रकार, उनका जीवन थकाऊ और कष्टों से भरा होता है। ... जो सत्य से प्रेम नहीं करते, वे सभी वास्तव में परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। जो सत्य को ज़रा भी स्वीकार नहीं करते, उन सभी को भाई-बहन नहीं कहा जा सकता। भाई-बहन केवल वे ही हैं, जो सत्य से प्रेम करते हैं और उसे स्वीकारने में सक्षम हैं। अब, वे कौन हैं जो सत्य से प्रेम नहीं करते? वे सभी अविश्वासी हैं। जो लोग बिल्कुल भी सत्य नहीं स्वीकारते, वे सत्य से विमुख होते हैं और इसे नकार देते हैं। अधिक सटीक रूप से, वे सभी अविश्वासी हैं, जिन्होंने कलीसिया में घुसपैठ कर ली है। यहाँ तक कि अगर वे हर तरह की बुराई करते हैं और कलीसिया के काम में गड़बड़ी करते और बाधा डालते हैं, तो वे शैतान के सेवक हैं। उन्हें बाहर निकाल देना और हटा देना चाहिए। उनके साथ बिल्कुल भी भाई-बहनों जैसा व्यवहार नहीं किया जा सकता। उनके प्रति प्रेम दिखाने वाले सभी लोग बेहद बेवकूफ, मूर्ख और अज्ञानी हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से एहसास हुआ कि सच्चे भाई-बहन वे हैं जो सत्य से प्रेम करते हैं और सत्य स्वीकार सकते हैं। वे परमेश्वर के लिए खुद को खपाते हैं, उनके पास सत्य के अभ्यास की गवाही होती है। मुमकिन है कि वे किसी गहरे आत्मज्ञान की बातें न करें, पर वे सत्य से प्रेम करते हैं, परमेश्वर के जितने वचन समझ सकते हैं, उनका अभ्यास करते हैं। भले ही वे अपराध करें, भ्रष्टता दिखाएँ और कभी-कभार नकारात्मक हो जाएँ, मगर चूँकि वे सत्य का अनुसरण करते हैं, तो काट-छाँट या असफलताओं और नाकामियों का सामना करने पर वे इसे परमेश्वर से स्वीकार कर सत्य खोज सकते हैं और आत्मचिंतन कर सकते हैं। अपनी समस्याएँ पहचान लेने पर वे धीरे-धीरे उन्हें ठीक कर सुधार सकते हैं। ऐसे लोग ही सच्चे भाई-बहन हैं। जो सत्य नहीं स्वीकारते, यहाँ तक कि सत्य से विमुख हैं, उन्हें भाई-बहन नहीं कहा जा सकता। अगर उनमें बुरी मानवता हो और वे ऐसे कुकर्म करें जिनसे कलीसिया के कार्य में गड़बड़ी और बाधा पैदा हो, तो वे बुरे लोग और मसीह-विरोधी हैं, वे भाई या बहन कहलाने लायक तो बिल्कुल नहीं हैं। भले ही वे कलीसिया में बने रहें, वे केवल परमेश्वर के घर में घुसपैठ करने वाले नकली विश्वासी हैं। वे चाहे जितने समय तक विश्वास रखें, आखिर में परमेश्वर उन्हें प्रकट कर हटा देगा। ऊपर से तो नहीं लगता था कि शीला ने कोई बड़ा कुकर्म किया हो, पर उसने जो कुछ किया उससे लोगों की सोच बाधित हुई और उनके कर्तव्यों में रुकावट आई, वह हमेशा से ऐसा करती रही थी। लोगों ने उसके साथ कितनी भी संगति और उसकी मदद की हो, पर वह जरा-सी भी नहीं बदली, बल्कि वह बहस करती रही, कुतर्क करती रही और बेतुके ढंग से व्यवहार करती रही। इससे पता चलता है कि शीला सत्य बिल्कुल भी नहीं स्वीकारती थी और प्रकृति से वह सत्य से विमुख थी। वह हमारी बहनों में से नहीं बल्कि राक्षस की है। पहले मैं सत्य के इस पहलू को नहीं समझती थी और मुझमें भेद पहचानने की क्षमता नहीं थी। मैं सोचती थी, अगर कोई परमेश्वर में विश्वास रखकर उसके नाम को पहचानता है, तो वह भाई या बहन है। मैं उन्हें भाई या बहन मानकर पेश आती और आँखें मूँदकर सहानुभूति दिखाती और उन्हें बर्दाश्त करती, बेवकूफों की तरह दया दिखाती और बिना भेद पहचाने उनकी मदद करती। नतीजतन, मेरे बहुत-से प्रयास बेकार गए। मैं कितनी मूर्ख और नासमझ थी! अब जबकि शीला को बर्खास्त कर अलग कर दिया गया है, तो मैंने देखा परमेश्वर कितना धार्मिक है। जो सत्य का अनुसरण नहीं करते और अनुचित व्यवहार करते हैं, वे कलीसिया में पाँव नहीं जमा सकते, आखिर में परमेश्वर उन्हें बेनकाब कर ही देगा। मुझे परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों की भी समझ हुई : परमेश्वर ने ऐसे हालात बनाए ताकि मैं सबक सीख सकूँ। मुझे उनका फायदा उठाना चाहिए। आगे से मैं सत्य पर अधिक समय और ऊर्जा लगाऊँगी, और परमेश्वर के वचनों से ही लोगों और चीजों को देखूँगी और आचरण करूँगी और चीजें करूँगी।