8. सौभाग्य के पीछे भागने पर चिंतन

सु मिन, चीन

2022 के अंत में मैंने प्रचारक के रूप में अपना कर्तव्य शुरू किया और कई कलीसियाओं के कार्यों की जाँच करने की जिम्मेदारी ले ली। एक दिन मुझे उच्च-स्तरीय अगुआ का पत्र मिला, जिसमें कहा गया था कि एक कलीसिया में दो अगुआओं की अवस्था खराब है और इससे कलीसिया के कार्य की विभिन्न मदें पहले ही प्रभावित हो चुकी थीं। उसने मुझे जल्दी से वहाँ जाकर स्थिति समझने और संगति कर इसे सुलझाने के लिए कहा। मैंने मन ही मन सोचा “हाल ही में इस कलीसिया ने कम्युनिस्ट पार्टी के गिरफ्तारी अभियान को झेला है, कई भाई-बहन सुरक्षा जोखिमों का सामना कर रहे हैं और सामान्य रूप से अपने कर्तव्य नहीं निभा सकते। यह समझा जा सकता है कि इस कठिनाई के कारण दोनों अगुआ थोड़ी नकारात्मक हैं। अगर मैं परमेश्वर के कुछ वचन ढूँढ़ूँ और उनके साथ संगति करूँ तो मैं इस समस्या को सुलझा पाऊँगी।” जब मैंने दोनों अगुआओं को देखा तो उनकी अवस्था बहुत खराब थी। उन्होंने कहा कि कलीसिया के काम की विभिन्न मदों में नतीजे नहीं मिलने की वजह यही थी कि वे वास्तविक काम नहीं कर पा रही थीं और वे इतनी नकारात्मक थीं कि इस्तीफा देना चाहती थीं। मैंने तुरंत उनके साथ संगति की और कहा, “यह वातावरण परमेश्वर की अनुमति से बना है। हम नकारात्मक अवस्था में नहीं फँसे रह सकते। अब सबसे महत्वपूर्ण यह है कि हम अपने कर्तव्य निभाने के लिए एक साथ कैसे काम करें ताकि कलीसिया के काम में देरी न हो।” लेकिन चाहे मैंने कितनी भी संगति की हो, दोनों बहनें अपनी नकारात्मक अवस्थाओं में फँसी रहीं, कहती रहीं कि उनकी काबिलियत खराब है, कि वे सत्य का अनुसरण नहीं करती हैं और वे अगुआई नहीं कर सकतीं। ऐसी स्थिति का सामना करने पर मैंने सोचा, “मैं इतनी बदकिस्मत क्यों हूँ? मैं अभी-अभी प्रचारक बनी हूँ और मुझे यह कलीसिया सौंपी गई है जहाँ अगुआ इतनी नकारात्मक हैं कि वे जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होतीं। क्या इसका मतलब यह नहीं है कि सारा काम मेरे कंधों पर आ जाएगा?” उस दौरान मैं एक ही समय में कलीसिया के अगुआओं के साथ उनकी अवस्थाओं को सुलझाने के लिए संगति कर रही थी और कुछ काम कराने के लिए विभिन्न सभाओं में भी जा रही थी। मैं हर दिन इतनी व्यस्त रहती थी कि बहुत थक जाती थी। बाद में एक अगुआ ने इस्तीफा दे दिया। दूसरी अगुआ से एक यहूदा ने गद्दारी कर दी और उसे गिरफ्तारी से बचने के लिए अस्थायी रूप से छिपना पड़ा तो वह अपना कर्तव्य करने के लिए बाहर नहीं जा सकती थी। यह खबर सुनकर मैंने अनायास ही गहरी आह भरी और सोचा, “इस कलीसिया में बहुत-सी समस्याएँ हैं; दोनों अगुआ अपना कर्तव्य भी नहीं कर पाती हैं। सारा काम मुझ अकेली पर ही आ गया है। मैं इस सब में कब तक व्यस्त रहूँगी?” उन दिनों मेरी हालत घूमते हुए लट्टू की तरह थी जो रुक नहीं सकता था। कभी-कभी मैं काम समझने के लिए दिन में भाई-बहनों से मिलती थी और जब मैं रात को लौटती थी तो उत्तर देने के लिए पत्रों का ढेर लगा होता था। मैं हर रात देर तक व्यस्त रहती थी और फिर भी सारे काम पूरे नहीं कर पाती थी। इन समस्याओं और कठिनाइयों का सामना करते हुए मैं बुरी तरह थक गई थी, मानसिक और शारीरिक रूप से चुक गई थी। ऐसा लगता था मानो मेरे सीने पर पत्थर रखा हो, जिससे साँस लेना मुश्किल हो रहा हो। मैंने सोचा, “जब से यह कलीसिया मुझे सौंपी गई है, तभी से मुझे एक के बाद एक प्रतिकूल घटनाओं का सामना करना पड़ा है। पुरानी समस्याओं को सुलझाने से पहले ही नई समस्याएँ पैदा हो जाती हैं। अब तो कोई कलीसिया अगुआ भी नहीं है। मैं अकेली कमांडर की तरह हूँ जिसके पास सलाह लेने के लिए भी कोई नहीं है, मुझे सारा काम खुद ही सँभालना पड़ता है। इस बीच दूसरा प्रचारक तीन अगुआओं वाली कलीसियाओं की जिम्मेदारी निभा रहा है। हालाँकि बहुत सारे काम हैं, लेकिन हर व्यक्ति थोड़ा-बहुत करता है, इसलिए उसे मेरी तरह थकावट नहीं होती। उसकी किस्मत इतनी अच्छी क्यों है? और मुझे इस तरह की कलीसिया क्यों सौंपी गई? मैं कितनी बदकिस्मत हूँ!” जितना मैंने इसके बारे में सोचा, मुझे उतना ही दुख हुआ, मुझे हमेशा लगता था कि मैं बदकिस्मत हूँ क्योंकि वह कलीसिया मुझे सौंपी गई थी। हालाँकि मैं हर दिन अपना कर्तव्य सामान्य रूप से निभाते हुए दिखती थी लेकिन मैं हताश हो गई थी और यहाँ तक कि इस माहौल से भाग जाना चाहती थी।

हताशा और प्रतिरोध की इस गलत अवस्था में रहते हुए एक दिन मैंने एक अनुभवजन्य गवाही वीडियो देखा जिसमें परमेश्वर के वचनों के एक अंश ने मुझे गहराई से प्रभावित किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “एक प्रकार के व्यक्ति ऐसे होते हैं जो हमेशा यह सोचते हैं कि उनके साथ कुछ खराब घटित होने का मतलब उनकी किस्मत खराब होना है—यहाँ तक कि जब वे गलत राह पकड़ते हैं, तब भी उन्हें लगता है कि उनकी किस्मत खराब है। चाहे वे किन्हीं भी खराब चीजों या आपदाओं का सामना करें, वे सोचते हैं कि उनकी किस्मत खराब है। क्या इस तरह से चीजों को मापना सही है? (नहीं।) जब लोगों का सामना किसी खराब चीज से होता है तो वे उसे बदकिस्मती बताते हैं और जब उनका सामना किसी अच्छी चीज से होता है तो वे उसे खुशकिस्मती बताते हैं और जब वे आशीष प्राप्त करते हैं या अपने लिए फायदे हासिल करते हैं तो वे इसे बताने के लिए खुशकिस्मती का इस्तेमाल करते हैं। क्या यह नजरिया सही है? (नहीं।) चीजों को मापने का यह नजरिया गलत है। यह चीजों को मापने का एक चरम और विकृत तरीका है। चीजों को मापने का यह तरीका अक्सर लोगों को गलती में डाल देता है और उन्हें जड़ से समस्याओं के सार की असलियत जानने में असमर्थ बना देता है। अगर वे कठिनाइयों का सामना करते हैं तो न केवल वे उनसे सही ढंग से नहीं निपट पाते हैं, बल्कि वे अपने दिलों में बेचैनी भी महसूस करते हैं और चिंता और बेचैनी में पड़ जाते हैं, यह नहीं जानते कि क्या करें। जब ये नकारात्मक भावनाएँ अनसुलझी रह जाती हैं तो लोग लगातार हताशा और निराशा में पड़ जाते हैं और यहाँ तक कि महसूस करते हैं कि उन्होंने परमेश्वर की उपस्थिति खो दी है और परमेश्वर ने उनसे दूरी बना ली है और उन्हें त्याग दिया है। इस बिंदु पर वे परमेश्वर के बारे में शिकायत करेंगे : ‘परमेश्वर क्यों हमेशा दूसरों के साथ अनुग्रह के साथ पेश आता है, लेकिन मेरे साथ नहीं? बुरी चीजें हमेशा मेरे साथ क्यों होती हैं? मेरे रास्ते में कभी अच्छी चीजें क्यों नहीं आती हैं? मैं तो अपने साथ बस एक अच्छी चीज होने के लिए कह रहा हूँ—भले ही सिर्फ एक बार!’ जब लोग अच्छी और बुरी किस्मत के इस तरह के विचार और नजरिए के आधार पर चीजों को देखते हैं तो उनके शैतान के जाल में पड़ने की संभावना होती है। खासकर अगर तुम यह फैसला सुनाते हो कि तुम एक ऐसे व्यक्ति हो जिसकी किस्मत खराब है तो तुम लगातार हताशा में पड़ जाओगे, जो यह साबित करता है कि तुम अच्छी और बुरी किस्मत के इस नजरिए से बँध गए हो। तुम्हारे साथ चाहे कुछ भी हो, तुम उसे मापने के लिए अच्छी या बुरी किस्मत का इस्तेमाल करते हो और इस तरह तुम अतियों पर पहुँच जाते हो। नतीजतन तुम अपनी हताशा से बाहर नहीं निकल पाते। यह हताशा तुम्हारी सामान्य सोच और निर्णय को और यहाँ तक कि तुम्हारी तरह-तरह की भावनाओं को भी प्रभावित करेगी। अगर तुम इस तरह की नकारात्मक भावना में जीते हो तो परमेश्वर का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य निभाने के तुम्हारे समस्त संकल्प और इच्छा में बाधा पैदा होगी और ये नष्ट हो जाएँगे और जो थोड़े-बहुत सत्य तुमने समझे हैं वे हवा में गायब हो जाएँगे और इनका बिल्कुल भी कोई असर नहीं होगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों ने मेरी वास्तविक अवस्था को उजागर कर दिया। मेरे विचार से बिना किसी मुश्किल के अपना कर्तव्य ठीक से निभाना और सब कुछ ठीक-ठाक होना सौभाग्य था। जब मुझे अपने कर्तव्य में कुछ कठिनाइयों या समस्याओं का सामना करना पड़ता था तो मुझे लगता था कि मैं अभागी और बदकिस्मत हूँ और मैं तुरंत हताशा की मनःस्थिति में चली जाती थी। उदाहरण के लिए जब मैं इस कलीसिया में आई और देखा कि दोनों अगुआ इतनी नकारात्मक थीं कि वे इस्तीफा देना चाहती थीं और कलीसिया के काम में कई कठिनाइयाँ और समस्याएँ थीं तो मैंने इसे परमेश्वर से नहीं स्वीकारा और न ही उसके इरादे को खोजा या इस बारे में सोचा कि मैं अपनी सारी ऊर्जा काम की जिम्मेदारी निभाने में कैसे लगाऊँ। इसके बजाय मैं हताशा में घिर गई और सोचने लगी कि यह मेरी बदकिस्मती थी कि इन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। खास तौर पर जब बाद में कोई भी अगुआ काम नहीं कर पाया और जब मैंने उस क्षेत्र के बारे में सोचा, जिसकी देखरेख दूसरा प्रचारक कर रहा था, जहाँ अगुआ और कार्यकर्ता सभी अपनी जगह पर थे और काम सुचारु रूप से चल रहा था, मुझे उससे विशेष रूप से ईर्ष्या हुई और मैंने सोचा कि वह भाग्यशाली है, जबकि मैं बदकिस्मत थी और मुझे सभी बुरी चीजों का सामना करना पड़ा। जब मैंने चीजों को इस गलत नजरिए से देखा तो मैं हताशा और प्रतिरोध में डूबती चली गई, मेरे पास अपना कर्तव्य करने के लिए कोई ऊर्जा नहीं बची थी और यहाँ तक कि मैं इस वातावरण से भाग जाना चाहती थी। लेकिन वास्तव में जिन सभी वातावरणों का मैं सामना करती हूँ वे परमेश्वर द्वारा निर्धारित हैं। परमेश्वर का इरादा है कि मैं सत्य खोजूँ, परमेश्वर पर भरोसा करूँ और इस वातावरण का व्यावहारिक तरीके से अनुभव करूँ। जब कठिनाइयाँ आती हैं तब भी मुझे परमेश्वर से प्रार्थना करनी चाहिए और उन्हें सुलझाने के लिए सत्य खोजना चाहिए और उन कर्तव्यों को उठाना चाहिए, जिन्हें मैं सँभाल सकती हूँ। लेकिन मैंने इस बारे में नहीं सोचा था कि ऐसे वातावरण में परमेश्वर का कार्य कैसे अनुभव करूँ और उसकी संप्रभुता और आयोजनों को कैसे समझूँ। जब मुझे असंतोषजनक चीजों का सामना करना पड़ा तो मैंने सोचा कि मैं बदकिस्मत हूँ और मेरी किस्मत खराब है, और मैं हताश मनोदशा में जीने लगी और परमेश्वर की संप्रभुता का प्रतिरोध करने लगी। मैं इस तरह से सबक कैसे सीख सकती हूँ? मैं परमेश्वर के कर्मों को कैसे समझ सकती हूँ? मैं उन लोगों के बारे में सोचने से खुद को रोक नहीं पाई जो परमेश्वर में विश्वास नहीं करते। वे कभी भी परमेश्वर से चीजें नहीं स्वीकारते हैं, परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित नहीं होते हैं, और जब चीजें उनकी पसंद के हिसाब से नहीं होती हैं तो वे खुद को छोड़कर हर किसी को दोषी ठहराते हैं। वे अपना पूरा जीवन परमेश्वर को जाने बिना जीते हैं। जहाँ तक मेरी बात है, भले ही मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी और कहती थी कि परमेश्वर हर चीज पर संप्रभुता रखता है, फिर भी मैंने हर चीज का मूल्यांकन अविश्वासियों के नजरिए के अनुसार किया। क्या यह एक असली छद्म-विश्वासी का व्यवहार नहीं है?

मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े जो कहते हैं : “कुछ लोग, चाहे उनके साथ अच्छी चीजें हों या बुरी, हमेशा यह फैसला सुनाते हैं कि उनकी किस्मत अच्छी है या बुरी। क्या चीजों को लेकर इस तरह का नजरिया सही है? क्या अच्छी और बुरी किस्मत के विचार का कोई आधार है? (नहीं, इसका कोई आधार नहीं है।) तुम्हारे यह कहने का आधार क्या है कि इसका कोई आधार नहीं है? (हर दिन जिन लोगों से हम मिलते हैं और जो चीजें हमारे साथ होती हैं उन पर परमेश्वर संप्रभुता रखता है और उनकी व्यवस्था करता है, यानी हमारे साथ जो कुछ भी होता है वह अपरिहार्य रूप से होता है और उसके पीछे कोई अर्थ होता है और इसलिए अच्छी और बुरी किस्मत के विचार का कोई आधार नहीं है।) क्या यह सही है? (यह सही है।) यह सही है और यही सैद्धांतिक आधार है। तुम्हारे साथ चाहे कुछ भी हो, चाहे वह अच्छा हो या बुरा, तुम्हें उसका सही ढंग से सामना करना चाहिए। यह साल के चार मौसमों की तरह है—हर दिन धूप का दिन नहीं हो सकता है। धूप वाले दिनों की व्यवस्था परमेश्वर करता है और बादल वाले दिनों, हवा, बारिश और बर्फ की व्यवस्था भी परमेश्वर द्वारा की जाती है। यह सब परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है और परमेश्वर द्वारा स्थापित विधानों और नियमों के अनुसार होता है। इसलिए चाहे मौसम कैसा भी हो, यह एक प्राकृतिक विधान के कारण है और अच्छे या बुरे मौसम का कोई भेद नहीं होता है—बस इतना है कि अलग-अलग मौसम लोगों को अलग-अलग एहसास देते हैं। ... कोई व्यक्ति किसी चीज के बारे में अच्छा या बुरा महसूस करता है, यह उसकी अपनी स्वार्थी मंशाओं, उसकी इच्छाओं और उसके स्वार्थ पर आधारित होता है, न कि उस चीज के अपने सार पर। तो लोग जिस आधार पर यह मापते हैं कि कोई चीज अच्छी है या बुरी, वह गलत है। चूँकि आधार गलत है, इसलिए वे जो अंतिम निष्कर्ष निकालते हैं, वे भी गलत होते हैं। अब तुम सब जानते हो कि अच्छी और बुरी किस्मत के विचार का कोई आधार नहीं है, कि परमेश्वर उन लोगों, घटनाओं और चीजों पर संप्रभुता रखता है और उनकी व्यवस्था करता है जिनका तुम सामना करते हो, चाहे वे अच्छी हों या बुरी और तुम्हें उन्हें परमेश्वर से स्वीकार करना चाहिए और उनका सही ढंग से सामना करना चाहिए। जब तुम्हारे साथ अच्छी चीजें हों तो यह मत सोचो कि तुम्हारी किस्मत अच्छी है और जब तुम्हारे साथ बुरी चीजें हों तो यह मत सोचो कि तुम बदकिस्मत हो। इन सभी चीजों में ऐसे सबक हैं जो तुम्हें सीखने चाहिए और तुम्हें उन्हें अस्वीकार नहीं करना चाहिए या उनसे बचने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। लोगों को अच्छी और बुरी दोनों चीजों के लिए परमेश्वर का धन्यवाद करना चाहिए, क्योंकि उन सबकी व्यवस्था उसी के द्वारा की जाती है। अच्छे लोगों, घटनाओं, चीजों और परिवेशों में ऐसे सबक हैं जो लोगों को सीखने चाहिए और बुरे लोगों, घटनाओं, चीजों और परिवेशों में तो ऐसे और भी ज्यादा सबक सीखने को मिलते हैं। ये सभी ऐसे अनुभव और प्रकरण हैं जो व्यक्ति के जीवन का हिस्सा होने चाहिए। इन्हें मापने के लिए लोगों को भाग्य के विचार का प्रयोग नहीं करना चाहिए(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। “अगर तुम अच्छे और बुरे भाग्य का ख्याल छोड़ देते हो और इन चीजों से शांत और सही तरीके से पेश आते हो तो तुम्हें पता चलेगा कि ज्यादातर चीजें निपटने में उतनी प्रतिकूल या कठिन नहीं हैं। जब तुम अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को छोड़ देते हो और अपने साथ होने वाली चीजों को मापने के लिए अच्छी और बुरी किस्मत के विचार का इस्तेमाल करना बंद कर देते हो तो बहुत सारी चीजों पर तुम्हारा नजरिया पहले से अलग हो जाएगा। जिन चीजों को तुम पहले दुर्भाग्यपूर्ण और बुरी माना करते थे, उन्हें अब तुम अच्छा समझोगे और तुम उन्हें अस्वीकार करना और उनसे बचने की कोशिश करना बंद कर दोगे। चीजों पर तुम्हारा नजरिया बदल चुका होगा और तुम्हारी मानसिकता बदल चुकी होगी, जिससे तुम अपनी जीवन यात्रा में एक अलग अनुभव प्राप्त कर सकोगे और साथ ही कुछ अलग हासिल कर सकोगे। यह एक असाधारण अनुभव है जो तुम्हारे लिए अकल्पित लाभ लेकर आएगा। यह अच्छी बात है, बुरी नहीं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रबुद्ध किया। दरअसल अच्छी या बुरी किस्मत जैसी कोई चीज नहीं होती। मेरे साथ जो कुछ भी होता है, चाहे वह सतह पर मेरी धारणाओं के अनुरूप हो या नहीं, वह परमेश्वर द्वारा शासित है और उसका होना निश्चित है और मेरे जीवन में एक आवश्यक अनुभव भी है। परमेश्वर मुझे सबक सिखाने के लिए इन चीजों की व्यवस्था करता है। जब तक मैं सत्य की खोज पर ध्यान केंद्रित करूँगी, मुझे कुछ न कुछ हासिल होगा; जो चीज लोगों को बुरी लगती है, वह अच्छी चीज में बदल सकती है। उदाहरण के लिए जब अय्यूब ने शैतान के प्रलोभनों का सामना किया तो उसने अपनी बहुत सारी संपत्ति गँवा दी, उसके बच्चे कुचलकर मारे गए और उसे खुद भी हर जगह फोड़े हो गए। मानवीय दृष्टिकोण से अय्यूब के साथ एक के बाद एक होने वाली घटनाएँ बहुत दुर्भाग्यपूर्ण और बदकिस्मत लगती हैं। हालाँकि परमेश्वर के नजरिए से उसने अय्यूब को इन प्रलोभनों का सामना करने की अनुमति दी ताकि उसे परमेश्वर की गवाही देने का मौका मिले, जिससे शैतान के सामने साबित हुआ कि अय्यूब एक धार्मिक व्यक्ति था जो परमेश्वर का भय मानता था और बुराई से दूर रहता था, जिसने शैतान को उस पर फिर आगे आरोप लगाने या हमला करने से रोक दिया। परमेश्वर में अपनी आस्था और भय के साथ अय्यूब इन परीक्षणों के दौरान अपनी गवाही में दृढ़ रहा और उसने परमेश्वर की स्वीकृति पाई। यह बहुत ही सार्थक बात थी! अय्यूब के अनुभव के माध्यम से हम देख सकते हैं कि अच्छी या बुरी किस्मत जैसी कोई चीज नहीं होती और जो कुछ भी होता है वह परमेश्वर की संप्रभुता और आयोजनों के कारण होता है, जो हमें विभिन्न वातावरणों में अलग-अलग सबक सिखाने के लिए बनाए गए हैं। लेकिन मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझ पाई और हमेशा अपने साथ होने वाली हर चीज को भाग्य के आधार पर मापा। ऐसा इसलिए था क्योंकि मैं अपनी देह के बारे में बहुत विचारशील थी, हमेशा देह को कष्ट पहुँचाए बिना आराम से अपने कर्तव्य करना चाहती थी। जब तक यह मेरी देह के लिए फायदेमंद होता था और मुझे कष्ट नहीं उठाना पड़ता था, मुझे लगता था कि मैं भाग्यशाली हूँ। इसके विपरीत अगर मुझे कुछ कठिनाइयों और समस्याओं का सामना करना पड़ता था, कष्ट सहना पड़ता था और कीमत चुकानी पड़ती थी तो मुझे लगता था कि मैं बदकिस्मत हूँ और मैं अक्सर अपने दिल में शिकायत करती थी। चीजों के आकलन के बारे में मेरा नजरिया बहुत विकृत था! अभी मैं एक के बाद एक जिन कठिनाइयों और समस्याओं का सामना कर रही थी, वे सतह पर प्रतिकूल प्रतीत होती थीं लेकिन परमेश्वर ने इन कठिनाइयों का उपयोग मुझे उस पर भरोसा करने, सत्य खोजने, अपनी देह के खिलाफ विद्रोह करने और कुछ सबक सिखाने के लिए किया था। पहले जब मैं आरामदायक वातावरण में अपना कर्तव्य निभा रही थी और हर दिन एक ही दिनचर्या में जी रही थी तो यह बाहर से आसान लगता था लेकिन मुझे बहुत कम लाभ हुआ। मैं कई सत्य सिद्धांतों को नहीं समझती थी और मेरा जीवन विकास धीमा था, जबकि अब यह वर्तमान वातावरण मेरे जीवन के लिए फायदेमंद था। परमेश्वर का इरादा समझकर मुझे बहुत राहत महसूस हुई, अब मैं हताश और प्रतिरोधी नहीं थी। मैं उस वातावरण के प्रति समर्पित होने के लिए तैयार थी जो परमेश्वर ने मेरे लिए निर्धारित किया था और व्यावहारिक तरीके से परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने के लिए तैयार थी। इसके बाद मैंने अपना कर्तव्य ईमानदारी से करना शुरू कर दिया, परमेश्वर के घर की आवश्यकताओं के अनुसार कार्य किया। कुछ समय के बाद कलीसिया का कुछ काम धीरे-धीरे ठीक होने लगा। मैं कर्मियों और काम की विभिन्न मदों से और परिचित हो गई और मैंने काम के सिद्धांतों को पहले से बेहतर समझा, जिससे मुझे कुछ आस्था मिली। केवल तभी मैंने इन वातावरणों को निर्धारित करने में परमेश्वर के श्रमसाध्य इरादों का प्रत्यक्ष अनुभव किया। मैंने देखा कि आस-पास के लोगों, घटनाओं और चीजों को अच्छे या बुरे भाग्य के नजरिए से न आंकने, सब कुछ परमेश्वर से स्वीकारने और सत्य खोजने से मुझे अपने कर्तव्य में थकान महसूस नहीं हुई। इसके बजाय मैं संतुष्ट और शांत महसूस करने लगी।

एक सभा के बाद अगुआ ने मुझे एक कलीसिया में कुछ सँभालने की जिम्मेदारी सौंपी। मैंने शुरू में इसे एक दिन में पूरा करने की योजना बनाई और फिर मुझे काम के लिए दूसरी कलीसिया में जाना था लेकिन अप्रत्याशित रूप से, जैसे ही मैं इस कलीसिया में पहुँची, कलीसिया पर्यवेक्षक ने घबराते हुए मुझसे कहा, “कुछ हुआ है। कल कई भाई-बहनों को गिरफ्तार किया गया था।” उसकी बात सुनने के बाद मुझे एहसास हुआ कि लगभग सभी अगुआ और कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए थे, जिसका मतलब है कि अब कलीसिया का कोई भी काम सामान्य रूप से करना लगभग असंभव होगा। कलीसिया अगुआओं को भी उन लोगों से संपर्क के कारण छिपना पड़ा और वे अपने कर्तव्य निभाने के लिए बाहर नहीं जा सके। उसके ठीक बाद मुझे उच्च-स्तरीय अगुआ से एक पत्र मिला जिसमें मुझे गिरफ्तारी के बाद की स्थिति सँभालने के लिए अस्थायी रूप से इसी कलीसिया में रहने का निर्देश दिया गया था। पहले तो मैं इसे परमेश्वर की ओर से स्वीकारने और समर्पण करने में सक्षम थी। उस समय विभिन्न मेजबान परिवारों और भाई-बहनों के लिए कई सुरक्षा जोखिम थे और कई कलीसियाई कार्य सँभालने की आवश्यकता थी। मैं पूरे दिन व्यस्त रहती थी और जब मैं रात को अपने मेजबान के घर लौटती थी तो मुझे दूसरी कलीसियाओं से आए पत्रों का जवाब देना होता था। मुझे लगभग हर रात देर तक जागना पड़ता था। माहौल में भी सख्ती थी, और लगभग हर दिन मुझे पत्र मिलते थे कि और भी भाई-बहनों को गिरफ्तार किया गया है। हर बार जब मैं बाहर जाती थी तो मेरी जान गले में अटक जाती थी, मुझे पता नहीं होता था कि मैं इस बार सुरक्षित वापस आ पाऊँगी या नहीं। कुछ समय बीता और मैं शारीरिक और मानसिक रूप से थकान महसूस करने लगी। मैंने देखा कि मेरे आस-पास के दो अगुआ सिर्फ पत्रों का जवाब दे रहे थे और घर पर कुछ काम कर रहे थे, जबकि मैं हमेशा लट्टू की तरह भागती-दौड़ती रहती थी, मेरे पास जितना समय होता था उससे ज्यादा काम होते थे और मेरी नसें तनी रहती थीं, मैं मन ही मन सोचती थी, “वे जो कर्तव्य करते हैं, वह बहुत आसान है। उन्हें चिंता करने या इधर-उधर भटकने की जरूरत नहीं है। मेरी तरह नहीं, जिसे आराम करने का कोई मौका भी नहीं मिलता। मैं हमेशा कलीसिया में गिरफ्तारियों से ही क्यों जूझती रहती हूँ? मैं कितनी बदकिस्मत हूँ! ये चीजें एक के बाद एक मेरे साथ ही क्यों होती रहती हैं?” हालाँकि मैंने खुलकर शिकायत करने की हिम्मत नहीं की लेकिन अंदर से मैं बहुत प्रतिरोधी थी और कर्तव्य निभाते समय मैं हमेशा अनिच्छा से मान लेती थी। जब मैं इस गलत अवस्था में थी तो मुझे अपने पिछले अनुभवों की याद आई और मुझे अस्पष्ट एहसास था कि यह वातावरण मेरे लिए परमेश्वर ने इसलिए बनाया था ताकि मैं सबक सीख सकूँ। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, जब मेरे साथ कुछ होता है तो मैं अभी भी अनजाने में उसे अच्छे या बुरे भाग्य के नजरिए से देखती हूँ और फिर भी मुझे लगता है कि यह मेरी बुरी किस्मत और दुर्भाग्य के कारण है। मैं वास्तव में तुम्हारा इरादा नहीं समझ पाती। हे परमेश्वर, मेरा प्रबोधन और मार्गदर्शन करो ताकि मैं इस वातावरण के बीच अनुभव करना सीख सकूँ।”

इसके बाद मैंने सचेत होकर पढ़ने के लिए परमेश्वर के वचन खोजे, समझना चाहा कि हमेशा अच्छे भाग्य का पीछा करने में दरअसल क्या गलत है। मैंने परमेश्वर के वचनों में यह अंश पढ़ा : “चीजें अच्छी हैं या बुरी, यह मापने के लिए भाग्य का प्रयोग करने वाले लोगों के विचार और दृष्टिकोण क्या होते हैं? ऐसे लोगों का सार क्या होता है? वे अच्छे भाग्य और खराब भाग्य पर इतना अधिक ध्यान क्यों देते हैं? क्या भाग्य पर ध्यान देने वाले लोग यह आशा करते हैं कि उनका भाग्य अच्छा हो या खराब? (वे आशा करते हैं कि यह अच्छा हो।) सही कहा। दरअसल, वे जिस चीज का अनुसरण करते हैं, वह यह है कि उनकी अपनी किस्मत अच्छी हो और उनके साथ हर तरह की अच्छी चीजें घटित हों। जब तक उन्हें फायदा होता है, बस यही मायने रखता है; वे इस बात की परवाह नहीं करते कि दूसरे कैसे कष्ट, दुख और परीक्षाओं से गुजरते हैं। वे केवल यह उम्मीद करते हैं कि सभी अच्छी चीजें उनके साथ हों और सभी बुरी चीजें उनके साथ न हों। उदाहरण के लिए, वे नहीं चाहते कि उनके साथ विफलता, असफलता, काट-छाँट, चीजों को खोना या धोखा खाने जैसी चीजें हों और जैसे ही ऐसी चीजें होती हैं, वे सोचते हैं कि वे बदकिस्मत हैं। जहाँ तक उन सभी चीजों की बात है जिन्हें वे अच्छा मानते हैं, जैसे कि पदोन्नत होना, चर्चा में रहना, अपने लिए फायदे हासिल करना, लाभ कमाना, अधिकारी बनना या अमीर बनना, वे उम्मीद करते हैं कि ये सभी चीजें उनके साथ हों और वे सोचते हैं कि यह अच्छी किस्मत है। वे जिन लोगों, घटनाओं और चीजों का सामना करते हैं, उन्हें मापने के लिए वे हमेशा अच्छी और बुरी किस्मत का इस्तेमाल करते हैं और वे हमेशा अच्छी किस्मत का अनुसरण करते हैं। जैसे ही कोई चीज थोड़ी-सी भी उनके मन-मुताबिक नहीं होती, वे नाराज और परेशान हो जाते हैं और वे अपने दिलों में असंतोष महसूस करते हैं। इसे बिना लाग-लपेट के कहें तो इस तरह के लोग स्वार्थी और मतलबी होते हैं। वे जिस चीज का अनुसरण करते हैं, वह है अपने लिए फायदे हासिल करना, लाभ कमाना, दूसरों से आगे निकलना और चर्चा में रहना; अगर हर अच्छी चीज अकेले उनके साथ हो तो वे संतुष्ट हो जाएँगे। यह गलत नजरिया उनके दिलों का मालिक बन गया है। यह उनके प्रकृति सार को दर्शाता है और यही उनका असली चेहरा है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे बहुत शर्मिंदा किया। यह पता चला कि सौभाग्य की मेरी निरंतर खोज और किसी भी कठिनाई या विपत्ति से बचना दरअसल मेरी स्वार्थी प्रकृति के कारण था। मैं “कभी भी घाटे का सौदा मत करो” के सांसारिक आचरण के फलसफे को मानती थी, हमेशा अपने हितों को आगे रखती थी। मैं हमेशा चाहती थी कि मेरे साथ सभी अच्छी चीजें हों, सब कुछ बिना किसी कठिनाई के आराम से चलता रहे; इसी से मुझे खुशी मिलती थी। जब भी मुझे ऐसी बाधाओं या कठिनाइयों का सामना करना पड़ता, जिनका असर मेरी देह के हितों पर पड़ता और मुझे कष्ट उठाना पड़ता तो मैं शिकायत करने लगती और चिढ़ने लगती, अपना संतुलन पूरी तरह से गँवा बैठती। परमेश्वर में विश्वास करने से पहले जब मैं ऐसे सहकर्मियों को देखती थी जो अच्छी पृष्ठभूमि से थे, जिनके परिवार के सदस्यों के पास स्थिर नौकरियाँ और अच्छे घर थे, जबकि मैं गरीबी में रहती थी और मेरा अपना घर भी नहीं था और घर पर परिवार के सदस्य बेरोजगार थे और उन्हें मेरी मदद की जरूरत थी तो मैं बहुत असंतुलित महसूस करती थी। मुझे लगता था कि ऐसा परिवार होना मेरा दुर्भाग्य है और मुझे खासकर अपने सहकर्मियों से ईर्ष्या और जलन होती थी। मुझे हमेशा लगता था कि अच्छी चीजें सिर्फ दूसरों के साथ ही होती हैं, मैं सिर्फ एक बदकिस्मत इंसान हूँ। हाल के समय पर विचार करते हुए जब मेरी जिम्मेदारी वाली दो कलीसियाओं को सीसीपी की गिरफ्तारियों का सामना पड़ा था, मुझे तकलीफ उठानी और कीमत चुकानी थी और इससे मेरे दैहिक हितों को भी चोट पहुँचती थी, इसलिए मैंने हर चीज के बारे में शिकायत करना शुरू कर दिया और अपनी बदकिस्मती और दुर्भाग्य को दोष देना शुरू कर दिया। न केवल मैंने अपना कर्तव्य सक्रिय होकर अच्छी तरह से निभाने के बारे में नहीं सोचा बल्कि मैं हताश और प्रतिरोधी भी हो गई, शिकायत करने लगी कि परमेश्वर मेरे लिए ऐसे ही वातावरण बनाता रहता है। अच्छी किस्मत की मेरी तलाश अनिवार्य रूप से मेरे दैहिक हितों को संतुष्ट करने के लिए थी; मैं चाहती थी कि सभी अच्छी चीजें मेरे साथ हों और मैं हमेशा दूसरों की कीमत पर लाभ कमाना चाहती थी। जहाँ तक उन कार्यों की बात है जिनमें जोखिम उठाने और कष्ट सहने की जरूरत थी, मैंने सोचा कि वे सभी दूसरों को करने चाहिए। जब तक मैं आराम से रह सकूँ और मेरी देह को फायदा हो, मैं संतुष्ट रहूँगी। मैं वाकई बहुत स्वार्थी थी! सतह पर ऐसा लग रहा था कि मैं परमेश्वर के घर में अपना कर्तव्य निभा रही हूँ लेकिन मेरे दिल ने कलीसिया के काम और परमेश्वर के उत्सुक इरादों के बजाय मेरे दैहिक हितों पर विचार किया। यह परमेश्वर के लिए घृणास्पद और घिनौना था और ऐसे अपना कर्तव्य निभाने से मुझे आखिरकार उसकी स्वीकृति नहीं मिलती।

बाद में मैंने परमेश्वर के और भी वचन पढ़े, जो कहते हैं : “क्या इस हताशा से बाहर निकलना आसान है? दरअसल, यह आसान है। अपने गलत नजरियों को जाने दो, हर चीज के अच्छा होने, या ठीक तुम्हारे चाहे जैसा या आसान होने की उम्मीद मत करो। जो चीजें गलत दिशा में चली जाती हैं, उनसे डरो मत, उनका प्रतिरोध मत करो या उन्हें मत ठुकराओ। इसके बजाय, अपने प्रतिरोध को जाने दो, शांत हो जाओ, समर्पण के रवैये के साथ परमेश्वर के समक्ष आओ, और परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित हर चीज को स्वीकार करो। तथाकथित ‘अच्छे भाग्य’ के पीछे मत भागो और तथाकथित ‘अभागेपन’ को मत ठुकराओ। अपना हृदय और संपूर्ण अस्तित्व परमेश्वर को दे दो और उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करो। परमेश्वर तुम्हारी जरूरतों और कमियों के अनुसार परिस्थितियों, लोगों, घटनाओं और चीजों का इंतजाम करेगा ताकि तुम्हें जो सबक सीखने चाहिए, वे तुम उन लोगों, घटनाओं और चीजों से सीख सको जिनका तुम सामना करते हो। बेशक इन सबके लिए पूर्व शर्त यह है कि तुम्हारे पास परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करने की मानसिकता होनी ही चाहिए। इसलिए यह कोशिश मत करो कि हर चीज तुम्हारी इच्छानुसार ही हो और जो कुछ भी तुम्हारे मन-मुताबिक या सुचारु रूप से न हो, उसका प्रतिरोध मत करो, उसे अस्वीकार मत करो या उससे भयभीत मत हो और इससे भी बढ़कर, इसके कारण हताशा में मत जियो और इसे सत्य के अपने अनुसरण और अपने कर्तव्य के उचित निर्वहन पर असर न डालने दो(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (2))। परमेश्वर के वचनों से मैं उसका इरादा समझ गई। परमेश्वर ने मेरे लिए जो वातावरण बनाए थे, वे सब अच्छे थे और मुझे सबक सिखाने के लिए थे। मुझे इस तथाकथित सौभाग्य और हमेशा आरामदायक वातावरण में कर्तव्य निभाने की इच्छा के पीछे नहीं पड़ना चाहिए। ऐसा करते रहने से केवल निरर्थक श्रम ही होगा। इसके बजाय मुझे परमेश्वर द्वारा बनाए गए वातावरण के प्रति समर्पित होना सीखना चाहिए और चाहे अनुकूल हो या प्रतिकूल, मुझे उनसे सत्य खोजना चाहिए, अपने द्वारा प्रकट किए भ्रष्ट स्वभावों पर चिंतन करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और देह के खिलाफ विद्रोह करना चाहिए और परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार कार्य करना चाहिए। यही परमेश्वर के इरादे के अनुरूप है। अब भाई-बहनों को गिरफ्तार किया जा रहा था, दो कलीसिया अगुआओं के लिए सुरक्षा जोखिम थे और कुछ काम नहीं हो पा रहा था। एक अगुआ के रूप में मुझे इस महत्वपूर्ण क्षण में अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए। हालाँकि कलीसिया का काम सँभालना मुश्किल होगा और इसमें कुछ दैहिक पीड़ा शामिल होगी, जब तक इससे कलीसिया के कार्य को लाभ होता है, मुझे सहयोग करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। यह समझकर मैं अब नकारात्मकता में नहीं जी रही थी और मैं अपने दिल से समझ गई थी कि यही मेरा कर्तव्य है, यही वह जिम्मेदारी है जो मुझे निभानी चाहिए। उसके बाद अपने कर्तव्य का पालन करते हुए मैंने कलीसिया के कार्य में हर मुद्दे या विचलन को सुलझाने के लिए सक्रिय रूप से संगति की। अगर मुझे ऐसी समस्याओं का सामना करना पड़ता था जिन्हें मैं नहीं समझ पाती थी तो मैं उन पर दोनों अगुआओं से चर्चा करती थी ताकि वे उन्हें तुरंत समझ सकें और फिर हम उन्हें सुलझाने के लिए सिद्धांतों की तलाश करें। इस तरीके से अभ्यास करके भले ही मैं हर दिन व्यस्त रहती थी, जब तक मैं चीजों को उचित ढंग से व्यवस्थित करती थी, मैं उन्हें सँभाल पाती थी और मुझे यह असहनीय या कठिन नहीं लगता था।

एक दिन उच्च-स्तरीय अगुआ ने हमें एक पत्र भेजा जिसमें हमें सफाई और निष्कासन पर सामग्री का एक सेट जल्दी से व्यवस्थित करने के लिए कहा गया, इस बात पर जोर दिया गया था कि इसे तुरंत करना है और इसे उन लोगों द्वारा एकत्र और व्यवस्थित करना था जिन्हें सुरक्षा जोखिम नहीं थे। यह पत्र पढ़कर मुझे पता चला कि मेरे लिए ऐसा करना सबसे उपयुक्त होगा। लेकिन मैंने सोचा कि मुझे इतने सारे भाई-बहनों का सत्यापन करना होगा और निश्चित रूप से हर दिन इधर-उधर भटकना पड़ेगा, तो फिर से वही पुराने विचार मेरे मन में आने लगे, “उफ, अगुआ ने साफ तौर पर किसी ऐसे व्यक्ति से यह काम कराने को कहा है जो सुरक्षा जोखिम से मुक्त हो, इसलिए मैं चाहकर भी इसे नहीं टाल सकती। इस तरह भागते-दौड़ते रहने से कौन जानता है कि इन सामग्रियों को इकट्ठा करने और सत्यापित करने में कितना समय लगेगा।” मुझे लगा कि मैं बदकिस्मत हूँ। जब मेरे मन में यह विचार आया तो मुझे परमेश्वर के ये वचन याद आ गए : “हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्‍हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्‍हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्‍हारे कर्तव्‍य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य, और कलीसिया के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्‍हें इन चीजों के बारे में अवश्‍य विचार करना चाहिए(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरे हृदय को उज्ज्वल कर दिया। चाहे मुझे किसी भी कर्तव्य का सामना करना पड़े, उसमें परमेश्वर के इरादे निहित हैं। खासकर, चूँकि यह कार्य इतना महत्वपूर्ण था, क्या इस कार्य को करने का अवसर परमेश्वर की ओर से एक उत्कर्ष नहीं था? फिर भी जब कोई कर्तव्य आता था तो सबसे पहले मैं यह सोचती थी कि मेरी देह को फिर से कष्ट सहना पड़ेगा और मुझे लगता था कि मैं बदकिस्मत हूँ। मैं वास्तव में बहुत स्वार्थी थी! मुझे पहले उन दैहिक कठिनाइयों के बारे में सोचने के बजाय कलीसिया के कार्य को प्राथमिकता देनी चाहिए और परमेश्वर पर भरोसा करने और उसके साथ सहयोग करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। इस एहसास के साथ मैंने अब इस कर्तव्य का इतना विरोध नहीं किया और मैंने कलीसिया के अगुआओं के साथ चर्चा की कि सामग्री सत्यापित करने के लिए लोगों को कैसे खोजा जाए। सत्यापन प्रक्रिया के दौरान मुझे कुछ कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन मैंने उन्हें परमेश्वर की ओर से स्वीकारा और अब कोई शिकायत नहीं की, साथ ही विचलन की समीक्षा की और सहयोग जारी रखने के लिए परमेश्वर पर भरोसा किया। आखिरकार सामग्री सफलतापूर्वक एकत्रित कर ली गई। मैंने परमेश्वर को उसके मार्गदर्शन के लिए ईमानदारी से धन्यवाद दिया!

इस अनुभव से मुझे सौभाग्य के अनुसरण के गलत नजरिए के बारे में कुछ समझ मिली और मैंने देखा कि इस अनुसरण के पीछे एक भ्रष्ट स्वभाव छिपा है जो स्वार्थी और घृणित है। दरअसल परमेश्वर ने मेरे लिए जो भी वातावरण बनाए हैं, चाहे मैं उन्हें अच्छा मानूँ या बुरा, वे मेरे आध्यात्मिक कद और जरूरतों के आधार पर बनाए गए हैं। वे मुझे सत्य खोजने, अपने भ्रष्ट स्वभाव को पहचानने और इन वातावरणों से सबक सीखने में मदद करने के लिए हैं। उनमें परमेश्वर की बुद्धि और श्रमसाध्य इरादा है। भविष्य में मैं भाग्य के आधार पर अपने सामने आने वाले सभी लोगों, घटनाओं और चीजों पर राय नहीं बनाना चाहती। मैं परमेश्वर द्वारा बनाए गए वातावरण के प्रति समर्पण करना और परमेश्वर के कार्य का अनुभव करना सीखना चाहती हूँ।

पिछला: 7. परमेश्वर के वचनों से दूसरों को देखना महत्वपूर्ण है

अगला: 9. नकली अगुआओं को बर्खास्त करने को लेकर मेरी चिंताएँ

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

45. खोया फिर पाया

लेखिका: शियेली, अमेरिकामैं एक खुशनुमा शानदार जीवन-स्तर की तलाश में अमेरिका आया। शुरू के कुछ सालों में तो काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा,...

1. न्याय स्वर्ग-राज्य की कुंजी है

झेंगलू, चीनमेरा जन्म एक ईसाई परिवार में हुआ था। मेरे पिता अक्सर कहते थे, "प्रभु में विश्वास करने से हमारे पाप क्षमा कर दिए जाते हैं और उसके...

18. मुझे अपनी गलतफहमियों और रक्षात्मक-प्रवृत्ति से नुकसान हुआ

सुशिंग, चीनकुछ समय पहले, हमारी कलीसिया की अगुआ ने अपना पद गँवा दिया क्योंकि उसने न तो सत्य का अनुशीलन किया और न ही कोई व्यावहारिक काम किया।...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें