86. मेरा परिवार किसने उजाड़ा?

फेंग शिया, चीन

मैं टीचर थी और मेरा पति इंजीनियर। हमारी शादी बहुत अच्छी चल रही थी, हमारी बेटी भी बहुत समझदार और सुशील थी। सभी दोस्त और सहकर्मी हमसे ईर्ष्या करते थे। फिर दिसंबर 2006 में मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने जाना कि हमारे उद्धारक, सर्वशक्तिमान परमेश्वर ने मानवजाति को शुद्ध करने और बचाने के लिए बहुत-से सत्य व्यक्त किए हैं। आस्था रखकर, परमेश्वर के वचन पढ़कर, सत्य पाकर, पाप और अपने भ्रष्ट स्वभाव से मुक्त होकर ही महाविनाशों के दौरान हमें परमेश्वर से सुरक्षा प्राप्त हो सकती है, हम जीवित रह सकते हैं और आखिरकार उसके राज्य में प्रवेश कर सकते हैं। मैंने यह भी जाना कि हम सबका जीवन परमेश्वर की देन है, हमारा सब कुछ परमेश्वर का दिया हुआ है। सृजित प्राणी होने के नाते हमें अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। बाद में मैंने सुसमाचार का प्रचार करना और नये सदस्यों का सिंचन करना शुरू कर दिया। मेरा हर दिन संतुष्टि भरा होता था। मेरे पति ने देखा कि जब से मैं विश्वासी बनी, तब से बहुत खुश रहने लगी हूँ, उसने मुस्कुराते हुए कहा, “पहले दिन भर काम करके तुम पूरी तरह थक जाती थी, मुझे तुम्हारी चिंता होती थी। परमेश्वर में विश्वास रखने के बाद तुम अब भी उतनी ही व्यस्त हो, पर अब तुम्हारी मानसिक दशा बेहतर होती जा रही है। परमेश्वर में विश्वास रखना वाकई बहुत अच्छा है!” मगर अच्छी चीजें ज्यादा समय तक नहीं टिकतीं। जल्दी ही वह मुझ पर दबाव डालने लगा और मेरी आस्था के मार्ग में आने लगा।

मार्च 2007 में एक दिन वह काम से घर आया और अंदर आते ही सख्ती से कहा, “आज हमारे बॉस ने हर विभाग के कैडरों की एक आम बैठक बुलाई और कहा कि पिछले कुछ सालों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों की संख्या बढ़ने के कारण पार्टी में दहशत फैल गई है। उन्होंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को प्रमुख राष्ट्रीय लक्ष्य बना लिया है, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के सभी विश्वासियों को कम्युनिस्ट पार्टी गिरफ्तार करेगी। सरकारी कर्मचारियों के साथ और भी बुरा होगा : अगर उनमें से कोई विश्वासी हुआ या उनके परिवार में कोई कलीसिया से जुड़ा हुआ होगा, तो बिना किसी अपवाद के उसे निकाल दिया जाएगा! चूँकि तुम्हारे स्कूल में तुम्हारी आस्था के बारे में अब तक कोई नहीं जानता, तो समय रहते इसका त्याग कर दो। अगर तुम्हारे बॉस को पता लगा तो गिरफ्तार कर ली जाओगी!” मैं सोच रही थी कि परमेश्वर में विश्वास रखना सही मार्ग है और इससे कोई कानून भी नहीं टूट रहा, फिर सीसीपी को मुझे रोकने का क्या हक है? तो मैंने उनसे कहा, “जब चीन डब्लूटीओ में शामिल हुआ, तो क्या उसने घोषणा नहीं की थी कि चीन में विश्वास रखने की आजादी है? अब किस बात का उत्पीड़न? मेरी आस्था में क्या खराबी है?” उसने बहुत गुस्से में जवाब दिया, “मैं जानता हूँ परमेश्वर में विश्वास रखना अच्छा है, पर पार्टी को यह मंजूर नहीं, हम क्या कर सकते हैं? आप सरकार से तो नहीं लड़ सकते। अगर तुमने आस्था रखी तो कभी भी गिरफ्तार करके जेल भेज दी जाओगी। अगर तुम गिरफ्तार हुई, तो क्या हमारा परिवार टूट नहीं जाएगा? इस परिवार की खातिर तुम्हें अपनी आस्था छोड़नी होगी!” यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मैंने कभी सोचा भी नहीं कि लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकने की कोशिश में पार्टी लोगों के बॉस के जरिए उन पर दबाव बनाएगी, मेरे पति का मन अचानक बदलने की वजह यही थी। मैंने विचार किया, “अगर पार्टी को मेरी आस्था का पता चला तो क्या वह मुझे छोड़ेगी? चीन में विश्वासी होना इतना मुश्किल क्यों है?” फिर मुझे परमेश्वर के वचनों का एक अंश याद आया जो मुझे एक बहन ने सुनाया था : “बड़ा लाल अजगर परमेश्वर का उत्पीड़न करता है और परमेश्वर का शत्रु है, इसीलिए इस देश में लोगों को परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण अपमान और उत्पीड़न सहना पड़ता है और परिणामस्वरूप ये वचन तुम लोगों में, लोगों के इस समूह में पूरे होते हैं। चूँकि परमेश्वर अपना कार्य उस देश में क्रियान्वित करता है जो परमेश्वर का विरोध करता है, इसलिए उसका संपूर्ण कार्य प्रचंड बाधाओं का सामना करता है और उसके बहुत-से वचन तुरंत पूरे नहीं हो सकते हैं; इस प्रकार, परमेश्वर के वचनों के परिणामस्वरूप लोग शोधित किए जाते हैं, जो पीड़ा सहने का हिस्सा भी है। परमेश्वर के लिए बड़े लाल अजगर के देश में अपना कार्य कार्यान्वित करना अत्यंत कठिन है, परंतु इसी कठिनाई के माध्यम से परमेश्वर अपने कार्य का एक चरण करता है, ताकि वह अपनी बुद्धि और अपने अद्भुत कर्मों को प्रकट कर सके, और परमेश्वर इस अवसर का उपयोग लोगों के इस समूह को पूर्ण करने के लिए करता है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)। मुझे याद है उसने मेरे साथ संगति भी की थी, “कम्युनिस्ट पार्टी एक नास्तिक पार्टी है। वह परमेश्वर से नफरत करती है और उसके बेहद खिलाफ है। कम्युनिस्ट पार्टी के शासन वाले देश में विश्वासी होकर हम उत्पीड़न और अपमान सहने को मजबूर हैं। प्रभु यीशु ने एक बार कहा था : ‘धन्य हैं वे, जो धार्मिकता के कारण सताए जाते हैं, क्योंकि स्वर्ग का राज्य उन्हीं का है(मत्ती 5:10)। परमेश्वर ऐसे उत्पीड़न भरे माहौल का इस्तेमाल लोगों की आस्था को पूर्ण बनाने के लिए करता है। ऐसे दमनकारी, कष्टदायी माहौल में अपनी गवाही में अडिग रहने को ही परमेश्वर स्वीकृति देता है!” इससे मुझे आस्था मिली। मैं जानती थी कि पार्टी के उत्पीड़न के कारण मैं पीछे नहीं हट सकती। मेरा पति मेरे मार्ग में कैसी भी बाधा डाले, मैंने विश्वास रखने की ठान ली।

कुछ समय तक उसके दफ्तर में लगभग रोज ही बैठक होती रही, जहाँ इस पर जोर दिया जाता कि कर्मचारियों या उनके परिवार वालों में कोई भी विश्वासी न हो। मेरा पति लगभग रोज ही घर आकर मुझे विचारधारा पर भाषण देता था। एक शाम जब मैं सभा से वापस आई, तो उसने गंभीरता से कहा, “तुम फिर से सभा में गईं थीं? कितनी बार बताऊँ कि तुम सभाओं में नहीं जा सकतीं—मेरी बात क्यों नहीं मानतीं? ऐसा तो नहीं है तुम नहीं जानतीं कि पार्टी धार्मिक होने की अनुमति नहीं देती। हमारे बॉस ने बार-बार हमें बताया है कि पार्टी सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को आसानी से नहीं छोड़ेगी! ऐसे गंभीर वक्त में आस्था रखकर क्या तुम खुद को खतरे में नहीं डाल रही हो?” मैंने कहा, “आस्था रखने से कोई कानून नहीं टूटता। पार्टी को हमें धार्मिक होने से रोकने का क्या अधिकार है?” उसने जवाब दिया, “पार्टी को कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुमने कोई कानून तोड़ा है या नहीं। सर्वशक्तिमान परमेश्वर के विश्वासियों को राजनीतिक अपराधी माना जाता है। अगर तुम्हारी आस्था के कारण पार्टी तुम्हें गिरफ्तार करती है, तो इससे न सिर्फ तुम्हारी प्रतिष्ठा खत्म होगी, बल्कि तुम्हारा जीवन भी खतरे में पड़ जाएगा और तुम्हारे परिवार को भी फँसा दिया जाएगा।” मेरे पति ने जब अपनी बात कह दी तो मैंने उससे कहा, “तुम अच्छे से जानते हो कि पार्टी परमेश्वर का प्रतिरोध करती है, फिर भी उसकी तरफदारी कर रहे हो, मेरा रास्ता रोक रहे हो। क्या तुम्हें सजा से डर नहीं लगता?” उसने उपेक्षा से कहा, “दंड मायने नहीं रखता—मायने यह रखता है कि हवा किस दिशा में बह रही है। अभी कम्युनिस्ट पार्टी का शासन है, अगर उसके शासन में जिंदा रहना है, तो उसकी बात माननी ही पड़ेगी न? अगर तुम उसकी बात नहीं मानोगी तो क्या तुम आजीविका चला पाओगी? पार्टी मुझे पैसे देती है, तो मुझे उसकी ओर से बोलना और काम करना ही होगा। तुम भी तो पार्टी के नीचे काम करके ही उससे तनख्वाह लेती हो, अगर तुमने उसके बजाय परमेश्वर का अनुसरण किया तो वह तुम्हें सजा नहीं देगी? तुम्हें इस परिस्थिति में फायदे-नुकसान का पता होना चाहिए! तुम पार्टी का साथ दोगी या फिर सर्वशक्तिमान परमेश्वर का? आज तुम्हें फैसला करना ही होगा!” तब मैं बड़ी उलझन में थी। अगर मैंने आस्था जारी रखने का फैसला किया तो मेरे बॉस को कभी भी पता लग जाएगा। फिर मैं अपना ओहदा खो दूँगी और शायद पुलिस मुझे गिरफ्तार कर लेगी। मेरी नौकरी को दस साल से ज्यादा हो गए थे। मैं मेहनत करके आगे बढ़ी थी और मुझे तरक्की देकर पहले दर्जे की टीचर बनाया गया था। छात्र मेरी प्रशंसा करते, उनके माता-पिता मेरी इज्जत करते और मेरे सहकर्मी मुझसे जलते थे, मैंने अपने बॉस की मान्यता और स्वीकृति भी पा ली थी। मैं जहाँ भी जाती, रिश्तेदार और दोस्त मुझसे बहुत जोश से पेश आते थे। अगर मैंने नौकरी गँवा दी, तो मेरा परिवार मुझे ठुकरा देगा, पड़ोसी मेरा मजाक उड़ाएँगे और सहकर्मियों से तिरस्कार का सामना करना होगा। मुझे डर था कि अगर ऐसा हुआ, तो मेरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। फिर मैंने सोचा, “अंत के दिनों में सर्वशक्तिमान परमेश्वर का न्याय का कार्य मानवजाति को बचाने के उसके कार्य का आखिरी चरण है। अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने का एकमात्र तरीका परमेश्वर के न्याय और शुद्धिकरण से गुजरना है; तब हम परमेश्वर की सुरक्षा में महाविनाशों में जीवित रह सकते हैं और एक सुंदर गंतव्य तक ले जाए जा सकते हैं। यह मौका गँवा दिया तो जीवन भर पछतावा होगा।” मैंने परमेश्वर की इस बात पर विचार किया : “यदि तुम्हारे पास ऊँचा रुतबा है, अत्यधिक प्रतिष्ठा है, प्रचुर ज्ञान है, असंख्य संपत्तियाँ हैं और बहुत-से लोगों का सहारा है, लेकिन तुम इन बातों से अप्रभावित रहते हो और परमेश्वर की पुकार और आदेश को स्वीकार करने और परमेश्वर तुमसे जो कुछ कहता है वह करने के लिए अभी भी उसके सम्मुख आते हो तो फिर तुम जो कुछ भी करोगे वह सब पृथ्वी पर सर्वाधिक सार्थक ध्येय होगा और मनुष्य का सर्वाधिक न्यायसंगत उपक्रम होगा। यदि तुम अपने रुतबे या लक्ष्यों की खातिर परमेश्वर के आह्वान को अस्वीकार करोगे, तो जो कुछ भी तुम करोगे, वह परमेश्वर द्वारा शापित किया जाएगा, और भी अधिक यह उसके लिए घृणित होगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचकर मेरा दिल रोशन हो गया। परमेश्वर में विश्वास रखना, सत्य खोजना और एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही सबसे मूल्यवान और सार्थक है। मगर जब आस्था और काम में से किसी एक को चुनने की बारी आई, तो मैं शोहरत, लाभ और रुतबे द्वारा बेबस हो गई, इस डर से कि मेरी आस्था के कारण कम्युनिस्ट पार्टी मेरी नौकरी छीन लेगी, जिससे मेरी प्रतिष्ठा मिट्टी में मिल जाएगी। मेरे लिए अब भी मेरा करियर और नाम ज्यादा मायने रखता था। मगर उनसे मुझे क्या लाभ होता? मेरे अहंकार को बस पल भर की संतुष्टि मिलती; उनसे मुझे सत्य प्राप्त करने या अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्यागने में कोई मदद नहीं मिलती। और दूसरों की डाह या सराहना पाने में रखा क्या है? मैं यह भी जानती थी कि कम्युनिस्ट पार्टी परमेश्वर की दुश्मन है। अपनी नौकरी बचाने और शोहरत, लाभ और रुतबे का आनंद उठाने के लिए अगर मैंने अपनी आस्था त्याग दी और पार्टी के शासन में गरिमाहीन जीवन जीती रही, तो क्या यह परमेश्वर से विश्वासघात करना नहीं होगा? मैं ऐसा नहीं कर सकती थी। फिर मैंने अपने पति को शांति से कहा, “मैं अपनी आस्था कभी नहीं छोड़ूँगी।” उसने गुस्से से मुझे घूरते हुए कठोरता से कहा, “अगर तुमने अपनी आस्था जारी रखी, तो मैं पुलिस को रिपोर्ट करके तुम्हें गिरफ्तार करवा दूँगा।” इतना कहकर वह फोन लगाने लगा। तब मैं एकदम हैरान रह गई। यह जानते हुए भी कि कम्युनिस्ट पार्टी विश्वासियों को सताती है, वह मुझे उनके हवाले करने को तैयार था। क्या ऐसा करके वह मुझे भेड़ियों के बीच नहीं फेंक रहा था? अपने हितों के लिए उसने हमारे पति-पत्नी के प्रेम को अनदेखा किया और पुलिस को मेरी रिपोर्ट करनी चाही, ताकि मजबूर होकर मैं अपनी आस्था त्याग दूँ। मैं उससे हार नहीं मान सकती थी। फिर उसने बार-बार मुझसे पूछा, “कर लिया फैसला?” मैंने कहा, “मुझे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया, तब भी अपनी आस्था नहीं छोड़ूँगी!” मेरे पति का चेहरा पीला पड़ गया और उसने गुस्से में फोन जमीन पर पटक दिया।

अपने पति के उत्पीड़न के बावजूद मैं अपनी नौकरी और कर्तव्य के बीच संतुलन बनाए रखने में लगी रही। एक रात मुझे परमेश्वर के वचन पढ़ते देख उसके हाव-भाव फौरन बदल गए और उसने कहा, “तुम्हें कितनी बार बताऊँ? चीन में तुम आस्था के मार्ग पर नहीं चल सकती! केंद्रीय सरकार से लेकर स्थानीय अधिकारियों तक, सरकारी एजेंसियों से लेकर संस्थानों तक और प्रबंधन से लेकर कर्मचारियों तक, सभी स्तरों पर चीजों की निगरानी और संचालन किया जाता है। अगर तुम परमेश्वर में विश्वास रखती रही तो पार्टी तुम्हें छोड़ेगी नहीं!” हर वक्त अपने पति को यह कहते सुनना और पार्टी के शासन वाले देश में विश्वासी होने के कारण गिरफ्तारी का खतरा बने रहने के बारे में सोचना मेरे लिए डरावना था। मुझे चिंता हुई कि अगर मैं कभी गिरफ्तार हो गई तो क्या यातना का सामना कर पाऊँगी। अगर उन्होंने पीट-पीटकर मार डाला या अपाहिज बना दिया तो क्या होगा? अगर मैं पीड़ा नहीं सह पाई और यहूदा बनकर परमेश्वर को धोखा दिया, तो क्या यह मेरे जीवन का अंत नहीं होगा? मैं जानती थी मेरी दशा सही नहीं है, तो मैंने फौरन अपने दिल में परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे आस्था देने को कहा ताकि मैं उस उत्पीड़न और क्लेश में अपनी गवाही न खो दूँ। मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “जब लोग अपने जीवन का बलिदान करने के लिए तैयार होते हैं, तो हर चीज तुच्छ हो जाती है और कोई भी उन्हें रोक नहीं सकता है। जीवन से अधिक महत्वपूर्ण क्या हो सकता है? इस प्रकार, शैतान लोगों में आगे कुछ करने में असमर्थ हो जाता है, वह मनुष्य के साथ कुछ भी नहीं कर सकता(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, “संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचनों” के रहस्यों के खुलासे, अध्याय 36)। परमेश्वर के वचन बिल्कुल स्पष्ट हैं। अगर हम अपना जीवन दाँव पर लगाने को तैयार हों और मौत के आगे बेबस न हों, तो शैतान कुछ नहीं कर सकता। मुझे पुलिस द्वारा पीट-पीटकर मार डाले जाने का डर मुख्यतः इसलिए था क्योंकि मुझमें आस्था की कमी थी। मुझे अपना जीवन ही अधिक प्यारा था। हमारा जीवन और मौत सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। मुझे खुद को परमेश्वर के हाथों में सौंपकर उसके आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित हो जाना चाहिए। अगर मुझे पीट-पीटकर मार भी दिया गया, तो यह धार्मिकता की खातिर उत्पीड़न झेलना होगा, यह सार्थक होगा। परमेश्वर के वचनों से आस्था और शक्ति पाकर मैंने अपने पति को कुछ वचन पढ़कर सुनाए : “हम सबको विश्वास है कि परमेश्वर जो कुछ हासिल करना चाहता है उसे कोई भी देश या ताकत बाधित नहीं कर सकती और जो लोग परमेश्वर के कार्य में बाधा उत्पन्न करने की कोशिश करते हैं, परमेश्वर के वचनों का विरोध करते हैं, और परमेश्वर की योजना में विघ्न डालते और उसे बिगाड़ने की कोशिश करते हैं वे अंततः परमेश्वर द्वारा दंडित किए जाएँगे। जो भी व्यक्ति परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नरक भेजेगा; जो भी देश परमेश्वर के कार्य का प्रतिरोध करता है उसे परमेश्वर नष्ट कर देगा; जो भी राष्ट्र परमेश्वर के कार्य को अस्वीकार करने के लिए उठता है उसे परमेश्वर इस पृथ्वी से मिटा देगा और उसका अस्तित्व समाप्त हो जाएगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। मैंने अपने पति को परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव की गवाही दी जो कोई अपमान नहीं सहता। मैंने कहा, “कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा विश्वासियों को गिरफ्तार करके सताना बुरा कर्म और परमेश्वर का प्रतिरोध करना है, अंततः परमेश्वर इसे दंड देगा। पार्टी के साथ खड़े रहकर और मेरी आस्था के मार्ग में बाधा बनकर तुम उनके साथ मिलकर बुरा कर्म कर रहे हो।” मेरी बात सुनकर उसने हताश होकर कहा, “तुम्हें लगता है यह मेरी इच्छा है? सब कम्युनिस्ट पार्टी का किया-धरा है। अगर मैंने तुम्हें परमेश्वर में विश्वास रखने से नहीं रोका, तो मैं अपनी आजीविका भी खो दूँगा। तुम मेरे बारे में क्यों नहीं सोचती? विश्वासी होने के कारण यदि तुम्हें गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया जाए, तो वे तुम्हारी जान भले न लें, पर तुम्हें भयंकर चोटें पहुँचेंगी। मैं तुम्हें बस पीड़ा सहते कैसे देखूँगा? मैं ऐसा क्या करूँ जिससे तुम अपनी आस्था त्याग दो?” मैंने कहा, “सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही एक सच्चा परमेश्वर है, मैं कभी अपनी आस्था नहीं छोड़ूँगी!” हैरानी की बात थी कि जब उसने देखा मैं हार नहीं मान रही, तो वह मेरे साथ मारपीट करने लगा। गुस्से में उसने मुझसे कहा, “अगर तुम अपनी आस्था के कारण गिरफ्तार हुई, तो तुम्हारे लिए कोई रास्ता नहीं बचेगा! तुम बस साम्यवादियों का निशाना बनने पर अड़ी हो। देखते हैं क्या मरने के बाद भी तुम विश्वास रख पाओगी।” इसके बाद उसने पागलों की तरह मुझे बिस्तर पर पटक दिया, कसकर मेरी गर्दन पकड़ी और कहा, “मैं तुम्हारा गला दबा दूँगा, फिर देखते हैं कैसे विश्वासी बनी रहती हो!” वह मेरा गला इतनी जोर से दबा रहा था कि मैं साँस नहीं ले पा रही थी, मैं भरसक संघर्ष कर रही थी, पर कोई फायदा नहीं हुआ। उसके बाद मैं बेहोश हो गई। फिर धीरे-धीरे होश में आई, तो सोचा जिस पति ने इतने सालों की शादी में कभी मुझ पर हाथ नहीं उठाया या कभी मुझ पर चिल्लाया नहीं, वह अपना रुतबा और नौकरी बचाने के लिए मेरे प्रति इतना क्रूर कैसे बन गया था, उसने गला दबाकर मुझे मारने की कोशिश की। मेरा दिल टूट गया था। साथ ही मुझे कम्युनिस्ट पार्टी से और भी ज्यादा नफरत हो गई। अगर उन्होंने परिवार के सदस्यों की नौकरी और भविष्य की धमकी न दी होती, तो मेरा पति कभी इतना निर्दयी नहीं होता।

बाद में जब भी मेरे पति पर उसका विभाग बैठकों के जरिए ज्यादा दबाव बनाता, तो वह मुझ पर अपना अत्याचार बढ़ा देता था। एक दिन जब वह बैठक से घर आया, तो मुझे एक और सैद्धांतिक भाषण सुना दिया, कहा कि चीन में सीसीपी के शासन में परिवार का एक सदस्य भी विश्वासी हो, तो पूरे परिवार को नतीजा भुगतना पड़ता है, इसलिए मैं अपनी आस्था नहीं रख सकती, वरना हम दोनों ही अपनी नौकरी गँवा देंगे, इसका असर हमारी बेटी की पढ़ाई और करियर पर भी पड़ेगा। उसने कहा अगर मेरी आस्था के कारण मुझे गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया तो हमारी बेटी सिर उठाकर कैसे चल पाएगी और हमारे बारे में न सही, मुझे उसके बारे में तो सोचना चाहिए। मैं सोच रही थी कि अगर कम्युनिस्ट पार्टी ने मेरे पति की नौकरी छीन ली और मेरी आस्था के कारण मेरी बेटी का भविष्य खराब हो गया, तो क्या वे दोनों हमेशा के लिए मुझसे नफरत नहीं करने लगेंगे? उस वक्त मैं बहुत परेशान थी, तो मन-ही-मन परमेश्वर को पुकारकर उससे आस्था और शक्ति प्रदान करने को कहा। मुझे परमेश्वर के वचनों का यह अंश याद आया : “ब्रह्मांड में समस्त चीजों में से ऐसी कोई चीज नहीं है, जिसमें मेरी बात आखिरी न हो। क्या कोई ऐसी चीज है, जो मेरे हाथ में न हो? जो कुछ मैं कहता हूँ, वह पूरा होता है, मनुष्यों के बीच ऐसा कौन है, जो मेरा संकल्प बदल सकता है? ... क्या मैं ही वह नहीं हूँ जिसने व्यक्तिगत रूप से सब कुछ की योजना बनाई है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, संपूर्ण ब्रह्मांड के लिए परमेश्वर के वचन, अध्याय 1)। सभी चीजें और घटनाएँ परमेश्वर के हाथों में हैं। मेरी और मेरे पति की नौकरी रहेगी या जाएगी, क्या मेरी बेटी की पढ़ाई खराब होगी और क्या उसे नौकरी मिलेगी, सारा आयोजन और सारी व्यवस्था परमेश्वर ने की है। केवल परमेश्वर ही यह सब तय कर सकता है—कम्युनिस्ट पार्टी नहीं। यह सोचकर मैंने अपने पति से कहा, “लोगों का भाग्य परमेश्वर के हाथों में है, उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है। तुम्हें लगता है कम्युनिस्ट पार्टी की बात मानकर तुम्हारी नौकरी बची रहेगी? पार्टी अपना भाग्य खुद नहीं तय कर सकती, तो वह दूसरों का भाग्य कैसे तय करेगी?” तब गुस्से में उसने जवाब दिया, “अगर तुम विश्वासी बनी रहने पर अड़ी रही, तो पार्टी तुम्हें आसानी से छोड़ेगी नहीं। वह विश्वासियों को ढूँढ़कर मौत के घाट उतार देती है। उसके बजाय बेहतर यह होगा कि तुम मेरे हाथों मारी जाओ।” मेरे कोई जवाब देने से पहले ही, वह पागलों की तरह रसोई में भागा, चाकू उठाया और मेरे सामने आकर खड़ा हो गया, फिर चाकू तानते हुए कठोरता से कहा, “तुम्हें विश्वासी बनना है या एक अच्छी जिंदगी जीनी है? अगर तुम विश्वासी बनी रहने पर अड़ी रही, तो मैं तुम्हारी बोटी-बोटी काट डालूँगा!” गुस्से और डर में मैंने फौरन अपने दिल में परमेश्वर को पुकारा। तभी अचानक हमारी बेटी अपने कमरे से बाहर निकली, और मेरे सामने खड़ी होकर चिल्लाई, “डैड! अगर आप मॉम को मारेंगे, तो आपको पहले मुझे मारना होगा!” उसने जो किया उसे देख मेरा पति अवाक रह गया और दाँत भींचते हुए उसकी ओर एकटक देखता रहा। फिर धीरे-धीरे चाकू वाले हाथ को नीचे किया। उस समय लगा जैसे मैंने कुछ खो दिया, दिल में पीड़ा हुई, दुःख और आक्रोश के आँसू आँखों से बह निकले। मैंने कभी सोचा भी नहीं था, परमेश्वर में आस्था के कारण मेरा पति मेरी जान लेने पर उतारू हो जाएगा। मैंने ऐसे इंसान से शादी नहीं की थी। यह तो राक्षस ही है!

एक दिन अपनी भक्ति में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “पति अपनी पत्नी से क्यों प्रेम करता है? पत्नी अपने पति से क्यों प्रेम करती है? बच्चे क्यों माता-पिता के प्रति कर्तव्यशील होते हैं? माता-पिता क्यों अपने बच्चों की गहरी परवाह करते हैं? लोगों की सारी मंशा किस चीज पर केंद्रित होती है? क्या यह सारी उनकी अपनी योजनाओं और स्वार्थी इच्छाओं को पूरा करने पर केंद्रित नहीं होती है? क्या वास्तव में उनका इरादा परमेश्वर की प्रबंधन योजना के लिए कार्य करने का है? क्या वे परमेश्वर के कार्य के लिए कार्य कर रहे हैं? क्या उनकी मंशा सृजित प्राणी के कर्तव्यों को अच्छे से निभाने की है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। “जो कोई परमेश्वर को नहीं पहचानता, शत्रु है; यानी जो कोई भी परमेश्वर के देहधारण को नहीं पहचानता—चाहे वह इस धारा के भीतर है या बाहर—एक मसीह-विरोधी है! परमेश्वर पर विश्वास न रखने वाले प्रतिरोधियों के सिवाय भला शैतान कौन हैं, राक्षस कौन हैं और परमेश्वर के शत्रु कौन हैं? क्या ये वे लोग नहीं, जो परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। जब मैं परमेश्वर के वचनों पर विचार कर रही थी तो मेरे पति के उत्पीड़न के दृश्य किसी फिल्म की तरह एक-एक कर मेरे मन में आते रहे। मेरा पति जो न तो कभी मुझ पर चिल्लाया, न ही मुझे मारा, मेरे विश्वासी बनने के बाद से ही उसने मुझे सताने में कोई कसर नहीं छोड़ी, क्यों? इतने सालों की शादी निजी हितों के लिए यूँ ही बिखर गई, क्यों? इंसानों के बीच कोई सच्चा प्रेम नहीं होता—हर कोई बस एक दूसरे का इस्तेमाल करता है। मेरा पति पहले मेरे लिए अच्छा था क्योंकि मैं काम करती थी, पैसे कमाती थी, उसके बच्चे पैदा करती थी और उनकी परवरिश करती थी। उसकी नजरों में मैं उपयोगी थी। लेकिन अब मैंने आस्था का मार्ग चुना, जिससे उसके हितों पर असर पड़ा, तो उसने हमारी भावनाओं की कोई परवाह नहीं की। मुझे परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकने के लिए उसने पुलिस को मेरी रिपोर्ट करने की कोशिश की, उसने मेरे बेहोश होने तक मेरा गला दबाया और चाकू से मारने की धमकी भी दी। उसने जोर देकर कहा, वह मुझे इसलिए परमेश्वर में आस्था नहीं रखने देना चाहता था क्योंकि उसे मेरी परवाह थी, मेरी गिरफ्तारी का डर था, पर दरअसल यह सब उसके फायदे के लिए था। उसने अपने करियर और प्रतिष्ठा को सबसे ऊपर रखा। अपनी आजीविका बचाने के लिए वह कम्युनिस्ट पार्टी का पालतू कुत्ता, उसका चाकर बनने को तैयार था, वह मुझे एक बंद गली वाले रास्ते पर धकेल रहा था। मुझे परमेश्वर में विश्वास रखने से रोकने के लिए उसने हर तरह का घृणित तरीका अपनाया, दुर्भावनापूर्ण तरकीबें आजमाईं। उसका सार परमेश्वर से नफरत और उसका प्रतिरोध करने वाले राक्षस का था। फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक और अंश पढ़ा : “सामान्य लोगों के रूप में और परमेश्वर से प्रेम करने का प्रयास करने वाले लोगों के रूप में, राज्य में प्रवेश करना और परमेश्वर के लोग बनना तुम्हारा सच्चा भविष्य है और एक ऐसा जीवन है जो अत्यंत मूल्यवान और सार्थक है; कोई भी तुम लोगों से अधिक धन्य नहीं है। मैं यह क्यों कहता हूँ? क्योंकि जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं करते, वे देह के लिए जीते हैं और वे शैतान के लिए जीते हैं, लेकिन आज तुम लोग परमेश्वर के लिए जीते हो और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने के लिए जीते हो। यही कारण है कि मैं कहता हूँ कि तुम्हारा जीवन सबसे सार्थक है। केवल इसी समूह के लोग, जिन्हें परमेश्वर द्वारा चुना गया है, सबसे सार्थक जीवन जीने में सक्षम हैं : पृथ्वी पर और कोई तुम्हारे जितना मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने में सक्षम नहीं है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर के सबसे नए कार्य को जानो और उसके पदचिह्नों का अनुसरण करो)। परमेश्वर के वचन बहुत प्रेरक थे, इनसे मुझे जीवन का अर्थ समझने में मदद मिली। परमेश्वर में आस्था रखना, सत्य का अनुसरण करना और सृजित प्राणी का कर्तव्य निभाना ही सार्थक और मूल्यवान जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। मैं इस दुनिया में पूरी मेहनत से काम कर रही थी, हालाँकि मैंने थोड़ा नाम भी कमाया था, पर अंदर से खाली और दुखी महसूस करती थी। मैं थककर बीमार पड़ गई थी, मेरी अच्छी-खासी आवाज ऐसी कर्कश हो गई कि ठीक से बात भी नहीं कर पाती थी। तब जाकर मैंने महसूस किया कि सम्मान के कितने भी प्रमाणपत्र मिलें या लोग कितना भी जलें और मेरी कितनी भी सराहना करें, इससे मेरी बीमारी या खालीपन की समस्या कभी दूर नहीं होगी। मैं जिस शोहरत और लाभ के पीछे भागी थी और इतने साल बिताए थे उनसे मुझे सत्य हासिल करने में कोई मदद नहीं मिली, न ही शैतान की भ्रष्टता और नुकसान से मेरी रक्षा हुई। सबसे बड़ी बात, टीचर के रूप में इतने सालों तक मैं छात्रों को वे सभी प्रकार की भ्रांतियाँ सिखाती रही थी जो परमेश्वर को नकारती हैं। हर पल कम्युनिस्ट पार्टी की प्रशंसा के गीत गाती थी। यह सिलसिला जारी रहता, तो मुझे कभी अच्छा परिणाम नहीं मिलता। मुझे पार्टी की सेवा छोड़नी ही थी। मैंने अपने दिल में परमेश्वर को पुकारा, मुझे रास्ता दिखाने की विनती की ताकि मैं अपनी नौकरी छोड़ सकूँ और अपने कर्तव्य पर ध्यान दे सकूँ। बाद में जब मैं स्वास्थ्य जाँच के लिए गई, तो डॉक्टर ने कहा, “तुम्हारे गले की हालत बहुत खराब है। गले का रंग बदल गया है, दरअसल पूरे गले में खून भर गया है। यह सूजकर बड़ा हो गया है जिससे तुम्हारे वोकल कॉर्ड पर बहुत गंभीर असर पड़ा है। अगर तुमने अपने गले का इस्तेमाल करना बंद नहीं किया, तो संभवतः आगे चलकर तुम पूरी तरह अपनी बोलने की क्षमता भी खो बैठोगी।” फिर उसने मुझे छह महीने की मेडिकल लीव लेने की सलाह दी। मैंने दिल से परमेश्वर को धन्यवाद दिया। मैंने सोचा अब मेरे पास परमेश्वर के वचन पढ़ने और कर्तव्य निभाने के लिए ज्यादा समय होगा, पर अप्रत्याशित रूप से मेरा पति मेरे रास्ते की रुकावट बनकर और भी ज्यादा दुष्ट तरकीबें आजमाने लगा।

फरवरी 2009 में एक दिन उसने मेरे दो सहपाठियों और मेरे छोटे भाई को मेरे घर बुलाया। वे मुझे जबरन कार में डालकर एक मनोरोग अस्पताल ले गए। मगर मुझे कोई समस्या नहीं थी, तो अस्पताल ने मुझे भर्ती करने से इनकार कर दिया। मेरे पति ने कहा, “तुम्हें साफ तौर पर पता है कि पार्टी तुम विश्वासियों को गिरफ्तार करती है, तो वह तुम्हें मौत के घाट उतार देगी, फिर भी तुम विश्वासी बनी रहने पर अड़ी हो। कोई मनोरोगी ही होगा जिसे मौत से डर न लगता हो। इस अस्पताल में जाँच करने की पर्याप्त सुविधाएँ उपलब्ध नहीं हैं। प्रांतीय मनोरोग अस्पताल में बेहतर सुविधाएँ और सक्षम डॉक्टर मौजूद हैं। मैं तुम्हें जाँच के लिए वहीं लेकर जाऊँगा कि कहीं तुम मनोरोगी तो नहीं!” मैंने गुस्से से जवाब दिया, “मुझे लगता है मनोरोगी तो तुम हो! ऐसा नहीं कि मैं मरने से नहीं डरती। भले ही इसका मतलब मौत हो, मैंने विश्वास रखने को चुना क्योंकि मुझे पता है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर उद्धारक बनकर आया है। उसने बहुत-से सत्य व्यक्त किए हैं, वह मनुष्य को पाप और आपदाओं से बचा सकता है। जो लोग परमेश्वर में विश्वास नहीं रखते या न्याय और शुद्धिकरण को नहीं स्वीकारते, वे सभी महा विनाशों में मारे जाएँगे...।” मगर उसने एक न सुनी। अगले ही दिन सबेरे वह मुझे जबरन प्रांतीय मानसिक अस्पताल में ले गया। हम दूसरी मंजिल पर गए, तो मैंने देखा हॉल के फर्श पर एक पागल महिला सिकुड़ी-सिमटी हुई सी बैठी थी और उसे बहुत मोटी लोहे की जंजीर से बाँधकर रखा गया था। एक अधेड़ उम्र का आदमी जंजीर के एक सिरे को पकड़कर उसे जोर से खींच रहा था, जिससे महिला फर्श पर घिसटती जा रही थी। उसने डर के मारे हाथ फैलाकर जंजीर को दोनों हाथों से जकड़ रखा था, वह अपनी पूरी ताकत से संघर्ष कर रही थी और जोर से चिल्ला रही थी। उसके उलझे हुए बालों और डरावने हाव-भाव को देखना और हृदय-विदारक चीखें सुनना एक दिल दहला देने वाला अनुभव था। उस पल मैं भयंकर पीड़ा से भर गई और लगा मेरे साथ गलत हो रहा है। ऐसा महसूस हुआ मानो यह मेरी गरिमा का भयंकर अपमान है, मैं फौरन पीछे मुड़कर तेजी से सीढ़ियों से उतरकर उस अभिशप्त जगह से निकल जाना चाहती थी, पर ऐसा कर न सकी क्योंकि मेरा पति मेरे हर कदम पर नजदीक से मेरा पीछा कर रहा था। फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को याद किया : “मानवजाति के लिए कार्य हेतु परमेश्वर ने कई रातें बिना सोए गुजारी हैं। वह उच्चतम स्थान से लेकर अनंत गहराई तक जीते-जागते नरक में जहाँ मनुष्य रहता है, वहाँ पृथ्वी के दोनों छोरों के बीच मनुष्य के साथ अपने दिन गुजारने के लिए उतर आया है, फिर भी उसने कभी मनुष्य के बीच पसरी फटेहाली की शिकायत नहीं की है, मनुष्य के विद्रोहीपन के लिए कभी भी उसे फटकारा नहीं है, बल्कि वह व्यक्तिगत रूप से अपना कार्य करते हुए सर्वाधिक अपमान सहन करता है। परमेश्वर नरक का कैसे हो सकता है? वह नरक में अपना जीवन कैसे बिता सकता है? लेकिन समस्त मानवजाति के लिए, ताकि पूरी मानवजाति को जल्द ही विश्राम मिल सके, उसने अपमान सहा है और पृथ्वी पर आने में अन्याय झेला है, मनुष्य को बचाने की खातिर व्यक्तिगत रूप से ‘नरक’ और ‘रसातल’ में, बाघ की माँद में, प्रवेश किया है। मनुष्य परमेश्वर का विरोध करने योग्य कैसे हो सकता है? परमेश्वर से शिकायत करने का उसके पास क्या कारण है? वह परमेश्वर के सामने जाने की हिम्मत कैसे कर सकता है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (9))। मानवजाति को बचाने के लिए परमेश्वर ने अंत के दिनों में नास्तिक शासन वाले चीन में देहधारण किया है, वह इस दुष्ट, घोर परमेश्वर-विरोधी जगह में प्रकट होकर कार्य कर रहा है, कम्युनिस्ट पार्टी और धार्मिक जगत के उत्पीड़न और निंदा झेल रहा है, भयंकर अपमान सहन कर रहा है, मगर वह चुपचाप यह सब सह रहा है। वह सृष्टिकर्ता है, सर्वोच्च और सम्मान के लायक है, फिर भी भ्रष्ट इंसानों के बीच रहने और भयंकर अपमान सहने आया है, वह इंसानों के बीच सत्य व्यक्त करते हुए चुपचाप मानवजाति को बचाने का कार्य कर रहा है। मगर मैं, एक भ्रष्ट इंसान, यह देखकर कि मेरी तुलना मानसिक रोगियों से की जा रही है, सोचने लगी मेरी गरिमा और सत्यनिष्ठा आहत की गई है और यह मेरा भयंकर अपमान है, मैं भाग जाना चाहती थी। यह सोचकर ही मुझे शर्मिंदगी होने लगी, मैंने मन-ही-मन परमेश्वर से प्रार्थना की, कसम खाई कि चाहे जो भी हो, मैं हालात का सामना करूँगी, कितना भी अपमान सहना पड़े, शैतान के आगे हार नहीं मानूँगी। डॉक्टर ने झट से बिना सोचे-समझे मुझे दवाओं के दो थैले पकड़ाए और घर भेज दिया। जब मेरे पति ने देखा कि वह मुझे आस्था रखने से नहीं रोक सकता, वह मेरे बारे में अब परवाह नहीं करता था और मैं फिर से कर्तव्य करने लगी।

अक्टूबर 2012 में, क्योंकि एक यहूदा ने मेरे साथ गद्दारी की थी, इसलिए पुलिस को लगा शायद मैं कलीसिया अगुआ हूँ, तो सादे कपड़ों में कुछ अधिकारी मेरा पीछा करने भेज दिए। मुझे अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़कर दूसरे इलाके में जाना पड़ा, ताकि गिरफ्तार न हो जाऊँ। बाद में पता चला कि मेरे घर छोड़ने के अगले ही दिन पुलिस मुझे गिरफ्तार करने वहाँ गई थी। उन्होंने तीन अन्य भाई-बहनों को गिरफ्तार कर उनसे मेरा पता-ठिकाना जानने की कोशिश की और मेरी फोटो लेकर गहन तलाशी अभियान शुरू कर दिया। दो महीने बाद राष्ट्रीय सुरक्षा ब्रिगेड ने मेरे घर को छान मारा और परमेश्वर के वचन की कुछ किताबें जब्त कर लीं और मेरे पति से कहा कि मैं धरती के किसी भी कोने में चली जाऊँ, वे मुझे ढूँढ़ निकालेंगे। शिक्षा ब्यूरो भी लगभग हर दिन मेरे घर पर जाकर मेरे पति पर मुझे ढूँढ़ने के लिए दबाव बनाने लगा। तब मैं कम्युनिस्ट पार्टी का निशाना बनने वालों की सूची में लगभग शीर्ष पर थी।

बाद में मुझे घर वापस बुलाने के लिए उन्होंने मेरी बेटी का भी सहारा लिया। दिसंबर 2012 के आखिर में एक दोपहर अचानक मेरी बेटी ने मुझे कॉल किया : “मॉम, मैं आपको कॉल करने से डर रही थी। पुलिस हर जगह आपको ढूँढ़ रही है, उन्होंने हमारे घर को भी छान मारा। मैं बस यह बताने के लिए कॉल कर रही हूँ कि शिक्षा ब्यूरो और आपके स्कूल के अगुआ ने डैड और मुझे आपसे यह बताने को कहा है कि अगर आप अपनी आस्था छोड़ दें और तुरंत घर वापस लौट आएँ, तो वे आपको इन सबके लिए जवाबदेह नहीं ठहराएँगे। उन्होंने यह भी कहा कि घर आने के बाद अगर तुम काम पर नहीं भी जाओगी तो भी वे तुम्हें पूरी तन्ख्वाह देंगे...।” यह सुनकर मुझे काफी गुस्सा आया। कम्युनिस्ट पार्टी मेरी आस्था छुड़वाने के लिए रुतबे और पैसे का लालच दिखा रही थी। कितनी नीच है! मुझे सबसे अधिक दुख इस बात से हुआ कि मेरी बेटी को सरकार और स्कूल के अगुआओं की बातों पर पूरा भरोसा था। इससे मैंने साफ तौर देखा कि कम्युनिस्ट पार्टी मेरे पति और बेटी, दोनों को गुमराह कर उनका इस्तेमाल कर रही थी। मैंने दृढ़ता से अपनी बेटी से कहा, “बेटी, तुम इन बातों से बहुत अनजान हो। तुम्हें पता है, मेरे घर वापस आने पर क्या होगा? मैं भेड़ियों के बीच मेमने की तरह फेंक दी जाऊँगी। मैं घर नहीं जाऊँगी।” उसने चिंतित होकर जवाब दिया, “उन्होंने कहा कि अगर तुम घर नहीं आओगी, तो वे तुम्हारी 20 साल से ज्यादा की सारी पेंशन निरस्त कर देंगे। मॉम, वापस आ जाओ। अगर नहीं आई, तो वे डैड से तुम्हें तलाक दिलवा देंगे और तुम्हारे साथ मेरा रिश्ता भी तुड़वा देंगे। अगर तुम घर नहीं आई, तो फिर तुम मेरी मॉम नहीं रहोगी।” मैं तो सन्न रह गई। कम्युनिस्ट पार्टी न सिर्फ मेरे पेंशन बीमा को निरस्त कर रही थी, बल्कि मेरे पति पर मुझे तलाक देने और मेरी बेटी पर रिश्ता तोड़ देने का दबाव बना रही थी। यह बहुत दुष्टता और नीचता थी! मुझे पार्टी से भयंकर नफरत हो गई। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “कौन-सी धार्मिक स्वतंत्रता? नागरिकों के कौन-से वैध अधिकार और हित? ये सब बुराई को छिपाने की चालें हैं! किसने परमेश्वर के कार्य को अंगीकार किया है? किसने परमेश्वर के कार्य के लिए अपना जीवन अर्पित किया है या रक्त बहाया है? मनुष्य जो पीढ़ियों से माता-पिता से लेकर बच्चों तक एक अखंड क्रम में गुलाम रहे हैं, उन्होंने परमेश्वर को बेझिझक गुलाम बना लिया है—ऐसा कैसे हो सकता है कि इससे रोष न भड़के? दिल में हजारों वर्ष की घृणा भरी हुई है, हजारों साल का पाप दिल पर अंकित है—इससे कैसे न घृणा पैदा होगी? परमेश्वर का बदला लो, उसके शत्रु को पूरी तरह से समाप्त कर दो, उसे अब और बेकाबू न दौड़ने दो, और उसे अत्याचारी के रूप में शासन मत करने दो! यही समय है : मनुष्य बहुत पहले अपनी सभी शक्ति जुटा चुका है और वह इसके लिए अपने हृदय का सारा रक्त अर्पित करेगा और हर मूल्य चुकाएगा, ताकि वह इस दानव के घृणित चेहरे से नकाब उतार सके और जो लोग अंधे हो गए हैं, जिन्होंने हर प्रकार की पीड़ा और कठिनाई सही है, उन्हें अपनी पीड़ा से उबरने और इस दुष्ट बूढ़े दानव से विद्रोह करने दे। परमेश्वर के कार्य को इतनी पूरी तरह क्यों बाधित करना? परमेश्वर के लोगों को धोखा देने के लिए विभिन्न चालें क्यों चलना? वास्तविक स्वतंत्रता और वैध अधिकार एवं हित कहाँ हैं? निष्पक्षता कहाँ है? आराम कहाँ है? गर्मजोशी कहाँ है? परमेश्वर के जनों को छलने के लिए धोखे भरी चालों का उपयोग क्यों करना? परमेश्वर के आगमन को दबाने के लिए बल का इस्तेमाल क्यों करना?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, कार्य और प्रवेश (8))। कम्युनिस्ट पार्टी सरेआम धार्मिक आजादी की घोषणा करती है, पर विश्वासियों को दबाने के लिए गुप्त रूप से सभी तरह की नीच तरकीबें आजमाती है। यह सत्य से नफ़रत करने और परमेश्वर का प्रतिरोध करने के उसके राक्षसी सार को स्पष्टता से प्रकट करता है। पार्टी मुझे आस्था रखने से रोकने के लिए हर तरह के हथकंडे आजमा रही थी, पहले उसने अच्छी तन्ख्वाह का प्रलोभन दिया, घर वापस आने के लिए मुझे पैसों से ललचाया ताकि वे मुझे गिरफ्तार कर सकें। जब मैं इनके झांसे में नहीं आई, तो अब वे मेरी नौकरी और वेतन हड़पने जा रहे थे, मेरी आय के रास्ते बंद करके मुझे गिरफ्तार करने और मेरे घर लौटने की गुंजाइश खत्म करने आ रहे थे। इससे साफ पता चल गया, पार्टी बाहर से भले ही नैतिक और न्यायसंगत दिखती हो, पर उसके सार में क्रूरता और दुष्टता ही है। यह ऐसे राक्षसों का गिरोह है जो हर मोड़ पर स्वर्ग के विरुद्ध और परमेश्वर के खिलाफ जाता है। मैंने इससे दिल से नफरत की और इसे ठुकरा दिया, मैंने कसम खाई चाहे जान चली जाए पर इससे पूरी तरह रिश्ता तोड़ लूँगी! उसके बाद मेरे पति को मुझे तलाक देना पड़ा और बेटी ने भी मुझसे रिश्ता तोड़ लिया।

पहले जब मैं पार्टी की व्यवस्था में काम करती थी, तो उसके बुरे सार का भेद नहीं पहचान पाती थी, बल्कि हर वक्त उसकी प्रशंसा करती थी। इसके उत्पीड़न को अनुभव करने के बाद आखिर मैं सत्य से नफरत और परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाले इसके राक्षसी सार को देख पाई, इससे पूरी तरह नफरत कर इसके खिलाफ विद्रोह कर पाई, कभी इसका अनुसरण न करने की कसम खाई! मैंने परमेश्वर का प्रेम भी देखा। परमेश्वर के वचनों ने ही मुझे आस्था और हिम्मत दी, जिससे मैं बार-बार उत्पीड़न और क्लेश के बीच डटी रह पाई। मैं परमेश्वर की बहुत आभारी हूँ। आगे मेरा रास्ता कितना भी मुश्किल क्यों न हो, मैं अंत तक दृढ़तापूर्वक सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अनुसरण करूँगी!

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