85. अपनी अनुभवजन्य गवाही लिखने से मुझे क्या मिला
हाल ही में मैंने कई भाई-बहनों को परमेश्वर की गवाही देने के लिए अनुभवजन्य लेख लिखते देखा तो मैं भी लिखने का अभ्यास करना चाहती थी। मैं वर्षों से विश्वासी रही हूँ, परमेश्वर के वचनों के पोषण का बहुत आनंद उठाया है और मेरे पास कुछ अनुभव भी हैं। मैं अपनी भक्ति का कुछ समय लेख लिखने में लगाना चाहती थी, पर हर बार भूमिका लिखने के बाद मुझे समझ नहीं आता था कि आगे क्या लिखूँ। मैंने सोचा कि मैं कई बार बर्खास्तगी, विफलताओं और ठोकरों से गुजरी हूँ और कई बार मेरी काट-छाँट हुई है। एक हद तक मुझे कुछ अनुभव हुए थे। मगर जैसे ही मैं लिखने वाली होती, मेरा दिमाग खाली क्यों हो जाता था? इस तरह एक-दो महीने बीते, आखिर में कभी कोई लेख नहीं लिख पाई। मुझे लगा कि यह बहुत कठिन है, इसलिए मैं खुद को ढील देने लगी। अगुआ भी जानती थी कि मुझमें काबिलियत और विचारों की कमी है। मुझे खुद पर सख्ती नहीं करनी चाहिए। मुझे रोज कई चीजों से निपटना होता था और मैं खुद को परमेश्वर के वचनों पर मनन करने में नहीं लगा पाती थी। इसके अतिरिक्त अच्छी काबिलियत और अनुभव वाले दूसरे भाई-बहन लिख सकते थे। उनके लिए लेख लिखना ठीक था—मुझे लिखने की जरूरत नहीं थी। इसलिए मैंने लेख लिखने का विचार पूरी तरह त्याग दिया। कभी-कभी भाई-बहन याद दिलाते कि मैं अपने खाली समय में लिख सकती हूँ, पर मैं नाराज हो जाती और उनके संदेशों का जवाब भी नहीं देना चाहती थी। कुछ समय बाद मेरी भक्ति नियमित रूप से नहीं हो पा रही थी। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े पर मेरे पास पवित्र आत्मा का प्रबोधन नहीं था और मैं परमेश्वर को महसूस नहीं कर सकी। काम में बहुत-सी समस्याएँ थीं जिन्हें मैं समझ या हल नहीं कर सकी, वो एक के बाद एक सामने आती गईं। मैं बहुत दबाव और पीड़ा में थी। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मुझे प्रबुद्ध करने और राह दिखाने की विनती की, ताकि मैं अपनी समस्याओं को समझ सकूँ।
एक दिन अपनी भक्ति में मैंने परमेश्वर के वचनों में यह पढ़ा : “सत्य का अनुसरण स्वैच्छिक होता है। यदि तुम सत्य से प्रेम करते हो, तो पवित्र आत्मा तुममें कार्य करेगा। अगर तुम अपने दिल में सत्य से प्रेम करते हो, तो चाहे तुम पर कोई भी जुल्म या क्लेश आए, तुम परमेश्वर से प्रार्थना और उस पर भरोसा कर पाओगे; तुम चाहे कोई भी भ्रष्ट स्वभाव प्रकट करो, तुम आत्मचिंतन कर और खुद को जान पाओगे और पाई गई समस्याओं को हल करने के लिए सक्रिय रूप से सत्य की खोज कर पाओगे और अपने कर्तव्य को मानक स्तरीय ढंग से निभा पाओगे। इस तरह, तुम अपनी गवाही में अडिग रह पाओगे। ये सभी अभिव्यक्तियाँ ऐसे परिणाम हैं जो सत्य से प्रेम करने वाले ही हासिल कर सकते हैं। ये ऐसी चीजें नहीं हैं जो लोगों से जबरदस्ती करवाई जाती हैं; ये सब लोगों द्वारा स्वेच्छा से, खुशी-खुशी और अपनी इच्छा से, बिना किसी अतिरिक्त शर्त के, सत्य की खोज करने से हासिल होती हैं। अगर लोग परमेश्वर का इस तरह अनुसरण कर सकें, तो अंततः वे सत्य और जीवन प्राप्त कर पाएँगे और वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश करेंगे और मनुष्य के समान जिएँगे। ... परमेश्वर पर विश्वास करने का तुम्हारा जो भी कारण हो, अंततः परमेश्वर तुम्हारे परिणाम का निर्धारण इस आधार पर करेगा कि तुमने सत्य प्राप्त किया है या नहीं। अगर तुमने अब तक सत्य को नहीं पाया है फिर भी परमेश्वर से एक अच्छे परिणाम की माँग करते हो, तो क्या यह मान्य है? यह मान्य नहीं है, चाहे तुम कितने भी औचित्य या बहाने दो। जब परमेश्वर लोगों के परिणाम तय करता है, तो वह उनसे सलाह-मशविरा नहीं करता। तुम चाहे कितनी भी बहस करो या अपना बचाव करो, उसका कोई फायदा नहीं होगा—परमेश्वर तुम पर कोई ध्यान नहीं देगा। भले ही तुम अपील करने के लिए तीसरे स्वर्ग में चले जाओ, उसका भी कोई फायदा नहीं होगा। सत्य का अनुसरण न करना तुम्हारी अपनी समस्या है—परमेश्वर सभी के प्रति धार्मिक है। इसलिए, जब तुम्हें प्रकट किया और हटा दिया जाता है, तो परमेश्वर को गलत मत समझो या उसकी शिकायत मत करो। सत्य का अनुसरण न करने के लिए तुम चाहे जो भी औचित्य दो या बहाना ढूँढ़ो, उसका कोई फायदा नहीं होगा। परमेश्वर ने इतने सारे वचन कहे हैं, फिर भी तुम उनमें से एक भी नहीं सुनते। परमेश्वर लोगों से यह माँग करता है कि वे सभी परिस्थितियों में और अपने ऊपर आने वाले हर मामले में सत्य की खोज करें, लेकिन तुम बस इसे सुनते नहीं हो या इसका अभ्यास नहीं करते। अंत में, सत्य और उद्धार को पाने में असफल होना तुम्हारा अपना किया-धरा है। परमेश्वर ने तुम्हारे लिए चाहे जिन परिस्थितियों का इंतजाम किया हो, चाहे जिन लोगों और घटनाओं से तुम्हारा सामना हो और चाहे जिस परिवेश में तुम खुद को पाओ, तुम्हें उनका सामना करने के लिए परमेश्वर से प्रार्थना कर सत्य खोजना चाहिए। ये ही वे सबक हैं, जो तुम्हें सत्य का अनुसरण करने में सीखने चाहिए। यदि तुम हमेशा इन परिस्थितियों से निकल भागने, इनसे बचने, ठुकराने, इनका प्रतिरोध करने के लिए औचित्य खोजोगे, तो परमेश्वर तुम्हें त्याग देगा। बहस करने, बेतुकी जिद करने या रुकावटी होने का कोई फायदा नहीं है—अगर तुम सत्य को स्वीकार नहीं करते, तो तुम उद्धार पाने का अपना मौका खो दोगे। अगर तुम सत्य की खोज करते हो, तो ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे हल नहीं किया जा सकता। परमेश्वर धार्मिक है; उसके पास हर किसी के लिए उचित व्यवस्था और हर समस्या का समाधान है। तुम अपने बचाव में चाहे जो भी तर्क दो, परमेश्वर उन्हें नहीं सुनेगा, भले ही वे उचित लगें या न लगें। वह तुमसे बस यही पूछेगा, ‘क्या परमेश्वर के वचन सत्य हैं? तुम उन्हें स्वीकार करते हो या नहीं? चूँकि तुम्हारे अंदर भ्रष्ट स्वभाव हैं, तो क्या तुम्हें न्याय स्वीकार नहीं करना चाहिए? अगर तुम उद्धार पाना चाहते हो, तो क्या तुम्हें सत्य का अनुसरण नहीं करना चाहिए?’ परमेश्वर बस तुम्हारा रवैया देखेगा। अगर तुम ऐसे व्यक्ति हो जो ईमानदारी से परमेश्वर में विश्वास करता है, तो तुम्हें बस एक तथ्य स्पष्ट रूप से जानने की जरूरत है : परमेश्वर सत्य है और तुम एक भ्रष्ट इंसान हो, इसलिए तुम्हें खुद से पहल करके अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य की खोज करनी चाहिए, केवल तभी तुम उद्धार पा सकते हो; तुम्हारी कोई भी समस्या या कठिनाई, तुम्हारा कोई भी औचित्य या बहाना मान्य नहीं है—अगर तुम सत्य स्वीकार नहीं करते, तो तुम नष्ट हो जाओगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (1))। परमेश्वर के वचनों ने मुझे तुरंत जगा दिया। सत्य का अनुसरण एक निजी, स्वैच्छिक मामला है। मुझे लेख न लिखने या सत्य का अनुसरण न करने के पीछे कोई कारण या कोई बहाना नहीं तलाशना चाहिए। परमेश्वर इसकी परवाह नहीं करता कि कारण कितने सही हैं। परमेश्वर चाहता है कि हम हर हाल में उसके वचन सुनें और उसकी अपेक्षाओं के आगे समर्पण करें, चाहे जो कुछ भी घटित हो। मुझे यही करना चाहिए। परमेश्वर यह भी कहता है : “मुझ पर तुम्हारी आस्था का कर्तव्य है मेरे लिए गवाही देना, किसी अन्य के प्रति नहीं बल्कि मेरे प्रति वफादार होना और अंत तक समर्पित बने रहना” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुम आस्था के बारे में क्या जानते हो?)। परमेश्वर की गवाही देना ही वह चीज है जिसकी उसे अपेक्षा है और यह हमारा कर्तव्य है। सत्य के बारे में मेरी समझ चाहे गहरी हो या उथली, मुझे परमेश्वर की गवाही देने के लिए लिखना चाहिए कि मैंने अपनी आस्था से क्या पाया। लेकिन मैंने सत्य की खोज या परमेश्वर के वचनों पर मनन करने का प्रयास नहीं किया। लेख लिखने को अस्वीकार करने और उसका विरोध करने के मेरे पास तरह-तरह के बहाने थे। मैं कहती रहती कि मुझमें काबिलियत नहीं है, समय नहीं है क्योंकि मैं काम में बहुत व्यस्त हूँ। मुझे लगा कि लेख न लिखना सामान्य बात है। कभी-कभी जब दूसरे मुझसे कहते कि मुझे लेख लिखना चाहिए, तो मैं झुँझलाकर बहाने बनाने लगती। मैं उनके संदेशों का जवाब भी नहीं देना चाहती थी। मगर अब शांत मन से इस बारे में सोचा तो लगा भले ही मुझे अगुआ के बतौर अपने काम के हर पहलू पर ध्यान देना था, पर सभी समस्याएँ तुरंत ही हल नहीं करनी थीं—मैं कई चीजों के लिए वक्त निकाल सकती थी। फिर, रोजमर्रा के काम पूरा करने में भी इतना समय नहीं लगता था। मैं इतनी व्यस्त भी नहीं थी कि मेरे पास लेख लिखने का समय न हो। वो तो बस मैंने बहाने ढूँढ़ लिए थे। मुझे लगा कि रोजमर्रा के काम करना सहज और आसान था, उनमें ज्यादा मानसिक प्रयास नहीं करने होते थे, पर लिखना मेरा मजबूत पक्ष नहीं था तो मैं इससे बचना चाहती थी। मैंने यह तर्क भी दिया कि अगुआ को पता था कि मेरे पास काबिलियत और विचारों की कमी है। मैं वास्तव में बातों को तोड़-मरोड़ कर पेश करने और भ्रांतियाँ गढ़ लेने में माहिर थी। वास्तव में गवाही लेख लिखना हमें सत्य के अनुसरण का प्रयास करने को प्रेरित कर सकता है। परमेश्वर के वचनों पर विचार करने और सत्य की खोज करने से हम अपनी भ्रष्टता को दूर कर सकते हैं, सिद्धांतों के अनुसार काम कर सकते हैं और अपने कर्तव्य को बेहतर ढंग से निभा सकते हैं। परमेश्वर के गवाही लेख लिखना हमारा कर्तव्य है और ऐसा न करने का कोई बहाना नहीं हो सकता। परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर सत्य है और तुम एक भ्रष्ट इंसान हो, इसलिए तुम्हें खुद से पहल करके अपने भ्रष्ट स्वभावों को हल करने के लिए सत्य की खोज करनी चाहिए, केवल तभी तुम उद्धार पा सकते हो; तुम्हारी कोई भी समस्या या कठिनाई, तुम्हारा कोई भी औचित्य या बहाना मान्य नहीं है—अगर तुम सत्य स्वीकार नहीं करते, तो तुम नष्ट हो जाओगे” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (1))। तब मुझे एहसास हुआ कि बहानों में फँसना, सत्य की तलाश न करना या उसे स्वीकार न करना मुझे पूरी तरह नष्ट कर देगा और मेरा अंतिम परिणाम विनाश होगा। कितनी भयावह दशा है! तो मैंने तुरंत प्रार्थना की : “परमेश्वर! मुझे अभी महसूस हुआ कि मैं वो इंसान नहीं जो सत्य स्वीकारे। मैंने तुम्हारे बहुत-से वचन पढ़े हैं, इतने सारे उपदेश सुने हैं, पर मेरे पास कोई सत्य वास्तविकता नहीं है और मैं गवाही लेख लिखने का अभ्यास करने को तैयार नहीं हूँ। यह वाकई शर्मनाक है। अब मैंने अपनी कमियाँ, खामियाँ देख ली हैं। मैं यह गलत मनोदशा बदलना चाहती हूँ और तुम्हारे कहे अनुसार चलने का प्रयास करना चाहती हूँ।”
फिर मैंने खोज करते हुए परमेश्वर से प्रार्थना की : मैं सत्य का अनुसरण क्यों नहीं कर रही थी और अपनी गवाही क्यों नहीं लिखना चाहती थी? आत्मचिंतन करते हुए मैंने परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “परमेश्वर पर अपनी आस्था में बहुत-से लोग सिर्फ परमेश्वर के लिए काम करने पर ध्यान देते हैं, वे सिर्फ कष्ट उठाने और कीमत चुकाने से ही संतुष्ट हो जाते हैं, लेकिन वे सत्य का अनुसरण बिल्कुल नहीं करते। नतीजतन दस, बीस, या तीस साल तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी उनके पास परमेश्वर के कार्य का सच्चा ज्ञान नहीं होता, और वे सत्य या परमेश्वर के वचनों को लेकर किसी भी तरह के अनुभवजन्य ज्ञान के बारे में नहीं बोल पाते। सभाओं के दौरान, जब वे अपनी थोड़ी अनुभवजन्य गवाही साझा करना चाहते हैं, तो उनके पास कहने के लिए कुछ नहीं होता, और वे पक्के तौर पर भी नहीं कह सकते कि उन्हें बचाया जाएगा या नहीं। यहाँ क्या समस्या है? जो लोग सत्य का अनुसरण नहीं करते, वे ऐसे ही होते हैं। चाहे वे कितने भी वर्षों से विश्वासी रहे हों, वे सत्य समझने में असमर्थ होते हैं, उसका अभ्यास तो और भी नहीं करते। जो सत्य को बिल्कुल भी स्वीकार ही नहीं करता, वह भला सत्य वास्तविकता में प्रवेश कैसे कर सकता है? कुछ ऐसे लोग हैं, जो इस समस्या की असलियत नहीं देख पाते। वे मानते हैं कि अगर शब्द और धर्म-सिद्धांत को बार-बार बोलने वाले लोग सत्य का अभ्यास करते हैं, तो वे सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। क्या यह सही है? जो लोग स्वाभाविक रूप से शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते रहते हैं, वे अंतर्निहित रूप से सत्य नहीं समझते हैं—तो भला वे उसका अभ्यास कैसे कर सकते हैं? उनके अभ्यास सत्य का उल्लंघन करते प्रतीत नहीं होते, और अच्छे कर्म, अच्छे व्यवहार लगते हैं, पर उन अच्छे कर्मों और अच्छे व्यवहारों को सत्य वास्तविकता कैसे कहा जा सकता है? जो लोग सत्य नहीं समझते, वे नहीं जानते कि सत्य वास्तविकता क्या है; वे लोगों के अच्छे कर्मों और अच्छे व्यवहारों को ही सत्य का अभ्यास मानते हैं। यह बेतुका है, है न? यह धार्मिक लोगों के विचारों और दृष्टिकोणों से किस प्रकार भिन्न है? और विकृत समझ की ऐसी समस्याओं का समाधान कैसे किया जा सकता है? लोगों को पहले परमेश्वर के वचनों से उसके इरादे समझने चाहिए, उन्हें जानना चाहिए कि सत्य समझना क्या है, और सत्य का अभ्यास क्या है, ताकि वे दूसरों को देखकर उन्हें पहचान पाएँ कि वे वास्तव में क्या हैं, और यह बता पाएँ कि उनमें सत्य वास्तविकता है या नहीं। परमेश्वर के कार्य और मनुष्य के उद्धार का उद्देश्य है लोगों को सत्य समझाकर उनसे उसका अभ्यास करवाना; तभी लोग अपना भ्रष्ट स्वभाव छोड़ पाएँगे, और सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने में सक्षम होंगे, और सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकेंगे। अगर तुम सत्य का अनुसरण नहीं करते, और सिर्फ अपनी धारणाओं और कल्पनाओं के अनुसार परमेश्वर के लिए खपने, कष्ट सहने और कीमत चुकाने से संतुष्ट हो, तो क्या तुम जो कुछ भी करते हो, वह तुम्हारे सत्य के अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण को दर्शाएगा? क्या वह साबित करेगा कि तुमने अपने जीवन स्वभाव में बदलाव किए हैं? क्या वह दर्शाएगा कि तुम्हारे पास परमेश्वर का सच्चा ज्ञान है? नहीं। तो, तुम जो कुछ भी करते हो, वह क्या दर्शाता है? वह सिर्फ तुम्हारी व्यक्तिगत पसंद, समझ और खयाली पुलाव को ही दर्शा सकता है। ये वे चीजें होंगी जिन्हें तुम करना पसंद करते हो, जिन्हें करने के तुम इच्छुक हो; तुम जो कुछ भी करते हो, वह सिर्फ तुम्हारी इच्छाओं, संकल्पों और आकांक्षाओं को ही संतुष्ट करता है। जाहिर है, यह सत्य का अनुसरण करना नहीं है। तुम्हारे किन्हीं भी क्रियाकलापों या व्यवहारों का सत्य से या परमेश्वर की अपेक्षाओं से कोई संबंध नहीं है। तुम्हारे सभी क्रियाकलाप और व्यवहार अपने लिए हैं; तुम सिर्फ अपने आदर्शों, प्रतिष्ठा और हैसियत के लिए काम कर रहे हो, लड़ और दौड़ रहे हो—यह तुम्हें पौलुस से कतई अलग नहीं बनाता, जिसने अपने पूरे जीवन में केवल पुरस्कृत होने, मुकुट पाने और स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए मेहनत और कार्य किया—यह दर्शाता है कि तुम स्पष्ट रूप से पौलुस के मार्ग पर चल रहे हो” (वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण करने का क्या अर्थ है (2))। परमेश्वर के न्याय और प्रकाशन के वचनों ने मेरे छिपने के लिए कोई जगह न छोड़ी। मैं कई साल से विश्वासी थी, परमेश्वर के बहुत-से वचन पढ़े थे, असफलताओं और ठोकरों से गुजरी थी और काट-छाँट का सामना किया था, मगर मैंने कोई गवाही लेख नहीं लिखे थे। मैं सत्य और परमेश्वर के वचनों के बारे में अपनी अनुभवजन्य समझ भी व्यक्त नहीं कर पाई, क्योंकि मैंने सत्य की खोज ही नहीं की थी। मैं केवल यही देखकर खुश थी कि अपनी जिम्मेदारी वाले काम में बिना विचलनों या चूक के पीड़ा झेलकर कीमत चुका सकती थी। असल में कुछ रोजमर्रा के काम तुरंत करने योग्य नहीं थे, लेकिन डर था कि दूसरे कहेंगे कि मैंने वास्तविक काम नहीं किया या वास्तविक समस्याएँ हल नहीं कीं। फिर अगर अगुआ पता चलने के बाद मुझे बर्खास्त कर दे तो? यही सोचकर मैंने लेख लिखना और परमेश्वर के वचनों पर मनन करना छोड़ दिया और कभी-कभी मैं उठकर थोड़ी भक्ति करना भी चाहती थी, पर जब मैं अपना कंप्यूटर खोलती और जवाब चाहने वाले तरह-तरह के संदेश देखती, तो मैं भक्ति छोड़कर संदेशों का जवाब देना और समस्याओं से निपटना शुरू कर देती। लेकिन असल में हर चीज तुरंत सँभालने की जरूरत नहीं होती। अगर मैं जवाब देने से पहले कुछ समय निकाल सकती तो भी देर नहीं होती। मगर चूँकि मैं उन कामों में व्यस्त थी, इसलिए मैंने परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने और मनन करने के लिए अपना समय छोड़ दिया। मैंने यह भी सोचा कि मैं अपने कर्तव्य में जिम्मेदार थी, काम का बोझ उठाती थी और वास्तविक कार्य कर सकती थी, पर वास्तव में मैं अपनी दिखावटी पीड़ा और प्रयासों का उपयोग दूसरों की सराहना पाने के लिए करना चाहती थी। यह कैसा कर्तव्य निभाना था? मैं अपना नाम और रुतबा बचाने, निजी महत्वाकांक्षाएँ पूरी करने के लिए अपने कर्तव्य का उपयोग करना चाहती थी। मैं परमेश्वर के खिलाफ चल रही थी। मैं जानती थी कि लेख लिखना सत्य की खोज की प्रक्रिया है, पर मैंने सत्य की खोज नहीं की और मैं परमेश्वर की गवाही देने के लिए लेख नहीं लिखना चाहती थी। मैं हर दिन चीजों में व्यस्त थी और जब समय मिलता तब भी मुझे न लिखने का कोई बहाना मिल ही जाता था। क्या मैं सत्य का अनुसरण किए बिना इस तरह से अपना कर्तव्य करके महज मजदूरी नहीं कर रही थी? मैंने परमेश्वर के वचनों पर विचार किया : “तुम्हारे किन्हीं भी क्रियाकलापों या व्यवहारों का सत्य से या परमेश्वर की अपेक्षाओं से कोई संबंध नहीं है। तुम्हारे सभी क्रियाकलाप और व्यवहार अपने लिए हैं; तुम सिर्फ अपने आदर्शों, प्रतिष्ठा और हैसियत के लिए काम कर रहे हो, लड़ और दौड़ रहे हो—यह तुम्हें पौलुस से कतई अलग नहीं बनाता।” मैंने आत्मचिंतन किया कि मैं पौलुस के मार्ग पर जा रही थी। मैं हमेशा तरह-तरह के कामों में लगी रहती थी, अपनी पसंद के काम करती थी और वही चुनती थी जो मुझे आसान लगता था, लेकिन परमेश्वर द्वारा अपेक्षित कलीसिया के आवश्यक कार्य के मामले में मैंने न केवल सत्य की खोज नहीं की, बल्कि उस कार्य से विमुख रही और उससे परहेज करती रही। परिणामस्वरूप, कई वर्षों तक परमेश्वर में विश्वास करने के बाद भी, मैं अभी भी सत्य को नहीं समझ पाई थी और कार्य के कुछ प्रमुख पहलू ऐसे थे जिनमें भाग लेने के लिए मैं पूरी तरह से अयोग्य थी, जिससे मुझे केवल सामान्य मामलों के काम को ही सँभालना पड़ा। मैं सिर्फ रुतबे की इच्छा पूरी करने के लिए काम कर रही थी। मैं परमेश्वर की शत्रु होने के मार्ग पर थी। अगर ऐसा ही चलता रहता तो चाहे मैंने जितना भी काम किया हो, अंत में परमेश्वर मुझे हटा देता। यह जानकर मैं डर गई और तुरंत स्थिति बदलना चाहती थी।
एक दिन मैंने अपनी भक्ति में परमेश्वर के कुछ वचन पढ़े : “सत्य से विमुख होने वालों की सबसे स्पष्ट दशा यह होती है कि उन्हें सत्य और सकारात्मक चीजों में कोई दिलचस्पी नहीं होती, यहाँ तक कि वे उनसे दूर भागते और बेहद घृणा करते हैं। वे प्रवृत्तियों के पीछे भागना खास तौर पर पसंद करते हैं और वे अपने दिल में उन चीजों को स्वीकार नहीं करते जिनसे परमेश्वर प्रेम करता है और जिन्हें करने की अपेक्षा परमेश्वर लोगों से करता है। इसके बजाय, उनके प्रति उनका रवैया उपेक्षापूर्ण और उदासीन होता है, कुछ लोग तो उन मानकों और सिद्धांतों का अक्सर तिरस्कार भी करते हैं जिनकी परमेश्वर मनुष्य से अपेक्षा करता है। वे सकारात्मक चीजों से विकर्षित होते हैं और वे उनके प्रति अपने दिलों में हमेशा प्रतिरोध, विरोध और तिरस्कार से भरा हुआ महसूस करते हैं। यह सत्य से विमुख होने की प्राथमिक अभिव्यक्ति है। कलीसियाई जीवन में परमेश्वर के वचन पढ़ना, प्रार्थना करना, सत्य पर संगति करना, कर्तव्यों को निभाना और सत्य के द्वारा समस्याओं का समाधान करना, ये सब सकारात्मक चीजें हैं और ये चीजें परमेश्वर को प्रिय हैं। फिर भी कुछ लोग इन सकारात्मक चीजों से दूर भागते हैं, इनकी बिल्कुल भी परवाह नहीं करते हैं और इनके प्रति उपेक्षापूर्ण रहते हैं। ... क्या यह सत्य से विमुख होने का स्वभाव नहीं है? क्या यह भ्रष्ट स्वभाव का खुलासा नहीं है? ऐसे बहुत-से लोग हैं जो परमेश्वर में अपने विश्वास में बस उसके लिए कार्य करना और उत्साहपूर्वक भाग-दौड़ करना, अपने गुणों और खूबियों का उपयोग करना, अपनी पसंद के अनुसार चलना और दिखावा करना पसंद करते हैं। जब बाहरी मामलों से निपटने की बात आती है, तो उनमें हमेशा असीम ऊर्जा होती है, लेकिन अगर तुम उन्हें सत्य का अभ्यास करने और सत्य सिद्धांतों के अनुसार कार्य करने के लिए कहो, तो उनकी हवा निकल जाती है, उनका जोश खत्म हो जाता है। अगर उन्हें दिखावा न करने दिया जाए, तो वे उदासीन और हताश हो जाते हैं। दिखावा करने के लिए उनमें ऊर्जा क्यों होती है? और सत्य का अभ्यास करने के लिए उनमें ऊर्जा क्यों नहीं होती? यहाँ क्या समस्या है? सभी लोग अपनी अलग पहचान बनाना पसंद करते हैं; वे सब दंभी हैं। आशीष और पुरस्कार पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करने की बात हो तो हर किसी के पास असीम ऊर्जा होती है, लेकिन सत्य का अभ्यास करने और देह के खिलाफ विद्रोह करने की बात आने पर वे हताश क्यों हो जाते हैं और उदासीन क्यों रहते हैं? ऐसा क्यों होता है? इससे साबित होता है कि लोगों के दिलों में मिलावट है। वे पूरी तरह से आशीष पाने के लिए परमेश्वर पर विश्वास करते हैं—स्पष्ट रूप से कहें तो, वे स्वर्ग के राज्य में प्रवेश करने के लिए विश्वास करते हैं। पाने के लिए आशीष या लाभ न होने पर लोग उदासीन और हताश हो जाते हैं और उनमें कोई जोश नहीं रहता। यह सब सत्य से विमुख रहने वाले भ्रष्ट स्वभाव की देन है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचन प्रबुद्ध करने वाले थे। मैं लेख लिखने से बच रही थी और सत्य से विमुख होने के अपने शैतानी स्वभाव के कारण ही सत्य के अनुसरण पर काम नहीं करना चाहती थी। मैं अच्छी तरह जानती थी कि परमेश्वर हमसे गवाही देने वाले लेख लिखने की अपेक्षा करता है और यदि कोई गहरी बात नहीं, तो मैं कुछ सरल बातें लिख सकती थी। अगर यह व्यावहारिक है, इसमें अनुभवजन्य समझ है और फायदेमंद है, तो यह ठीक है। परमेश्वर लोगों की गवाहियाँ संजोता है और अच्छी वाली उसके दिल को सर्वाधिक सुकून देती है। इसलिए परमेश्वर हमसे उम्मीद करता है कि हम उसकी गवाही देने के लिए अपने अनुभवों और प्राप्तियों पर लेख लिखें। मगर परमेश्वर जो चाहता है उसके लिए प्रयास करने के बजाय मैं उसे टालने और मना करने के बहाने ढूँढ़ती रही। मैं सत्य से विमुख होने का शैतानी स्वभाव दिखा रही थी। परमेश्वर सत्य से विमुख होने के स्वभाव के बारे में क्या सोचता है? मैंने अपनी भक्ति में परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ा : “तुम लोगों के विचार में किस तरह के लोग सत्य से विमुख होते हैं? क्या वे वो लोग नहीं हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और खुद को उसके विरोध में खड़ा कर लेते हैं? हो सकता है कि वे खुलकर परमेश्वर का प्रतिरोध न करें, लेकिन उनका प्रकृति सार परमेश्वर को नकारने और उसका प्रतिरोध करने वाला होता है, जो परमेश्वर से खुले तौर पर यह कहने के समान है, ‘तुम जो कहते हो मुझे वह सुनना पसंद नहीं है, मैं इसे स्वीकार नहीं करता, और चूँकि मैं नहीं स्वीकारता हूँ कि तुम्हारे वचन सत्य हैं, इसलिए मैं तुम पर विश्वास नहीं करता। मैं उस पर विश्वास करता हूँ, जो मेरे हितों की पूर्ति करता है और मुझे लाभ पहुँचाता है।’ क्या यह गैर-विश्वासियों का रवैया नहीं है? यदि सत्य के प्रति तुम्हारा यह रवैया है, तो क्या तुम खुले तौर पर परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण नहीं हो रहे हो? और यदि तुम खुले तौर पर परमेश्वर के प्रति शत्रुता रखते हो, तो क्या परमेश्वर तुम्हें बचाएगा? नहीं बचाएगा। परमेश्वर को नकारने और उसका विरोध करने वाले सभी लोगों के प्रति परमेश्वर के कोप का यही कारण है। ... जब कोई व्यक्ति सत्य से विमुख हो जाता है, तो यह निस्संदेह उसकी उद्धार प्राप्ति के लिए घातक है। बात यह नहीं है कि इसे परमेश्वर द्वारा क्षमा किया जा सकता है कि नहीं—सत्य के प्रति विमुख होना किसी व्यक्ति का एक किस्म का व्यवहार या क्षणिक प्रकाशन नहीं, बल्कि प्रकृति सार है। परमेश्वर ऐसे लोगों के प्रति सर्वाधिक विमुख होता है। यदि तुम कभी-कभी सत्य से विमुख होने की भ्रष्टता प्रकट करते हो, तो तुम्हें परमेश्वर के वचनों के आधार पर जाँच करनी चाहिए कि ये खुलासे सत्य के प्रति तुम्हारी नापसंदगी के कारण हैं या सत्य की समझ की कमी के कारण। इसकी खोज करने की आवश्यकता है, और उसके लिए परमेश्वर की प्रबुद्धता और सहायता की आवश्यकता है। यदि तुम्हारा प्रकृति सार सत्य से विमुख होने का है और तुम सत्य को कभी स्वीकार नहीं करते, और विशेष रूप से इससे घृणा करते हो और इसके प्रति शत्रुतापूर्ण हो, तो तुम मुश्किल में हो। निश्चय ही तुम बुरे व्यक्ति हो और परमेश्वर तुम्हें नहीं बचाएगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए सत्य को समझना सबसे महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचन सीधे मेरे दिल में चुभ गए। सत्य से विमुख होना खुले तौर पर परमेश्वर का विरोध है, खुलेआम उसका दुश्मन होना है। मेरा दावा था कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर में मेरी आस्था है, मैं उसके नाम पर प्रार्थना कर रही थी, उसके व्यक्त किए सत्य खा-पी रही थी, हर सभा में परमेश्वर के वचनों पर संगति कर भाई-बहनों में उनका प्रचार कर रही थी। मगर जिस तरह मैं काम कर रही थी और जिस तरह जी रही थी, वह परमेश्वर के वचनों के मुताबिक नहीं था और उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप भी नहीं था। इसके बजाय मैं सत्य से विमुख होने लगी थी। इस तरह मैं सत्य को स्वीकार कर उसका अभ्यास कैसे करती? विश्वासी के बतौर बचाए जाने का एकमात्र तरीका सत्य स्वीकार करना है। पर मुझे परमेश्वर द्वारा व्यक्त किए गए सत्यों से प्रेम नहीं था। दिल में कहीं गहरे मैं परमेश्वर के खिलाफ थी। सत्य से विमुख हो जाने का शैतानी स्वभाव मुझे बर्बाद कर सकता था। तब मैंने देखा कि सत्य से विमुख होने का स्वभाव वास्तव में डरावना है, यह उद्धार के रास्ते में घातक कमजोरी है। फिर मैं पश्चात्ताप के लिए परमेश्वर के सामने आई : “हे परमेश्वर! मैं सत्य से विमुख हो चुकी हूँ, मेरा ध्यान लेख लिखने या सत्य की खोज करने पर नहीं है और अब मैंने देखा कि सत्य से विमुख होने के स्वभाव से तुम्हें घृणा है। मैं पश्चात्ताप कर सत्य का ठीक से अनुसरण करना चाहती हूँ—मुझे रास्ता दिखाओ।”
मैंने उसके बाद परमेश्वर के और वचन पढ़े : “अगर तुम वास्तव में अपने दिल में सत्य से प्रेम करते हो, और बात सिर्फ इतनी है कि तुम कुछ हद तक कम काबिलियत वाले हो और तुममें अंतर्दृष्टि की कमी है, थोड़े मूर्ख हो और तुम अक्सर गलतियाँ करते हो, लेकिन तुम बुराई करने का इरादा नहीं रखते, और तुमने बस कुछ मूर्खतापूर्ण काम किए हैं; यदि तुम परमेश्वर को सत्य पर संगति करते हुए सुनने को तैयार हो, और तुम्हारे दिल में सत्य के लिए प्यास है; यदि सत्य और परमेश्वर के वचनों के प्रति तुम्हारा रवैया ईमानदारी और प्यास का है, और तुम परमेश्वर के वचनों को मूल्यवान मानकर सहेज और सँजो सकते हो—तो इतना ही काफी है। परमेश्वर ऐसे लोगों को पसंद करता है। भले ही तुम कभी-कभी मूर्खतापूर्ण काम कर सकते हो, फिर भी परमेश्वर तुम्हें पसंद करता है। परमेश्वर तुम्हारे उस दिल से प्रेम करता है जो सत्य के लिए प्यासा है, और वह सत्य के प्रति तुम्हारे ईमानदार रवैये से प्रेम करता है। उसे तुम्हारी खराब काबिलियत या तुम्हारी मूर्खता, न ही तुम्हारे अपराधों की परवाह है। ऐसा ठीक इसलिए क्योंकि सत्य के प्रति तुम्हारा रवैया ईमानदारी और पिपासा का है, और क्योंकि तुम्हारा दिल सच्चा है—सिर्फ तुम्हारे दिल की सच्चाई और तुम्हारे इस रवैये के आधार पर—वह हमेशा तुम पर दयालु रहेगा और तुम पर अनुग्रह दिखाएगा, और पवित्र आत्मा तुम पर कार्य करेगा और तुम्हारे पास उद्धार की आशा होगी” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना कर्तव्य पूरा करने के लिए सत्य को समझना सबसे महत्वपूर्ण है)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे जगाया और अभ्यास का मार्ग दिया। मेरा दिल खिल उठा और मुझे सुकून का एहसास हुआ। परमेश्वर लोगों की कम काबिलियत या अज्ञानता की परवाह नहीं करता। जब तक लोग सत्य के प्यासे हैं और सत्य के साथ ईमानदारी का व्यवहार करते हैं, तब तक उन पर परमेश्वर की दया रहेगी। मैंने देखा कि औसत दर्जे की काबिलियत वाले अन्य भाई-बहन भी थे जो परमेश्वर के वचनों के प्यासे थे और समस्याएँ सामने आने पर उन्हें हल करने के लिए उन्होंने पूरे मन से विचार कर सत्य की खोज की। वे परमेश्वर की गवाही देने के लिए अनुभवजन्य लेख लिख पाए। और जो कुछ ही समय पहले आस्थावान हुए थे, चाहे उन्हें कर्तव्य में कितनी भी कठिनाई आई हो, वे छोड़कर भागे नहीं, बल्कि परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होकर सत्य की तलाश और कठिनाई दूर करने के लिए उस पर निर्भर रहे। आखिर वे मर्मस्पर्शी गवाही दे पाए। कुछ नए विश्वासियों ने भ्रष्टता प्रकट होने पर सत्य की खोज करने पर ध्यान दिया। उन्होंने परमेश्वर के वचन पढ़कर आत्मचिंतन किया। उनकी साझा की गई समझ सचमुच असली और व्यावहारिक थी। परमेश्वर को इस बात की परवाह नहीं कि किसी की आस्था कितनी पुरानी है, वे अज्ञानी हैं या उनकी काबिलियत कमजोर है, बल्कि वह यह देखता है कि क्या वे सत्य का अनुसरण करते हैं, उससे प्रेम करते हैं, क्या उन्हें सत्य की प्यास है, और क्या वे परमेश्वर के वचनों के प्रति सच्चे मन से पेश आते हैं। खराब काबिलियत घातक नहीं है। मुख्य बात यह है कि क्या हमारा दिल सत्य से प्रेम करता है, क्या हम सत्य स्वीकार कर अभ्यास कर सकते हैं। परमेश्वर भरोसेमंद और धार्मिक है, उसे परवाह नहीं कि किसकी काबिलियत अच्छी है या किसकी खराब। अगर हम सत्य के प्यासे हैं और उसके लिए प्रयासरत हैं, जो जानते हैं उसे लागू करते हैं तो हम पवित्र आत्मा का प्रबोधन पा सकते हैं, इससे हमारी समझ और अंतर्दृष्टि सुधरेगी। मुझे कम काबिलियत होने से पीछे नहीं हटना चाहिए या लेख लिखने से बचने के बहाने नहीं खोजने चाहिए। मैं सचमुच पूरे मन से परमेश्वर के वचनों को खाना-पीना और उनका अनुभव करना चाहती थी और अपने अनुभवों को लेख में लिखकर परमेश्वर की गवाही देना चाहती थी।
फिर मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिससे परमेश्वर का इरादा समझ आ गया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “सत्य को स्वीकार करना और सत्य का अनुसरण करना उद्धार पाने का सबसे यथार्थवादी, व्यावहारिक मार्ग है। यदि तुम सत्य प्राप्त नहीं कर सकते, तो तुम व्यर्थ में परमेश्वर में विश्वास करते हो। जो लोग खोखले शब्द और धर्म-सिद्धांत बोलते हैं, जो हमेशा नारे लगाते हैं, बड़े-बड़े विचार उछालते हैं और सत्य का अभ्यास करने पर ध्यान केंद्रित किए बिना हमेशा विनियमों का पालन करते हैं, उन्हें कुछ भी हासिल नहीं होता, चाहे वे कितने भी वर्षों तक विश्वास करें। वे कौन लोग हैं जिन्हें कुछ हासिल होता है? जो लोग सच्चे मन से अपना कर्तव्य करते हैं और सत्य का अभ्यास करने को तैयार हैं, जो परमेश्वर ने उन्हें जो सौंपा है उसके प्रति अपने मिशन की तरह व्यवहार करते हैं, जो स्वेच्छा से अपना पूरा जीवन परमेश्वर के लिए खुद को खपाने में बिताते हैं और अपने भले के लिए साजिश नहीं रचते, जो व्यावहारिक रूप से आचरण करते हैं और परमेश्वर के आयोजनों का पालन करते हैं। अपना कर्तव्य करते समय, ऐसे लोग सत्य सिद्धांतों को ग्रहण करने, प्रत्येक कार्य को सावधानीपूर्वक अच्छी तरह से करने, परमेश्वर की गवाही देने का नतीजा हासिल करने और परमेश्वर के इरादों को पूरा करने में सक्षम होते हैं। अपना कर्तव्य करते समय जब वे कठिनाइयों का सामना करते हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और परमेश्वर के इरादों को समझने की कोशिश कर सकते हैं, वे परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं का पालन कर सकते हैं, वे चीजें करते समय सत्य की तलाश कर सकते हैं और सत्य का अभ्यास कर सकते हैं। वे नारे नहीं लगाते या बड़े-बड़े विचार नहीं उछालते, बल्कि केवल व्यावहारिक रूप से काम करने पर और सिद्धांतों के अनुसार मामलों को बहुत सावधानीपूर्वक सँभालने पर ध्यान केंद्रित करते हैं। वे जो कुछ भी करते हैं उसमें अपना दिल लगाते हैं और हर चीज का अनुभव अपने दिल से करते हैं। अधिकांश मामलों में, वे सत्य को अभ्यास में ला सकते हैं, अनुभव के माध्यम से ज्ञान और समझ प्राप्त कर सकते हैं, सबक सीख सकते हैं और वास्तविक लाभ प्राप्त कर सकते हैं। और जब उनमें गलत विचार या गलत दशाएँ होती हैं, तो वे परमेश्वर से प्रार्थना कर सकते हैं और उनका समाधान करने के लिए सत्य की तलाश कर सकते हैं। चाहे वे कोई भी सत्य समझें, उनके पास अनुभव और अंतर्दृष्टि होती है और वे अपनी अनुभवजन्य गवाही साझा करने में सक्षम होते हैं। ऐसे लोग अंततः सत्य प्राप्त कर सकते हैं। जो विचारहीन होते हैं वे कभी भी अपने दिलों में सत्य का अभ्यास करने के मामलों पर विचार नहीं करते। वे केवल प्रयास करने और कार्रवाई करने पर और खुद को प्रदर्शित करने और दिखावा करने पर ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि कभी यह नहीं तलाशते कि सत्य का अभ्यास कैसे करें। इससे उनके लिए सत्य प्राप्त करना कठिन हो जाता है। इसके बारे में सोचो—ठीक किस तरह के लोग सत्य वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं? (जो लोग चीजों में अपना दिल लगाते हैं, जो यथार्थवादी हैं और जो अपने कर्तव्यों को व्यावहारिक तरीके से करते हैं।) यह सही है। केवल वे जो अपने कर्तव्यों को व्यावहारिक रूप से करते हैं और लगन से सत्य की तलाश करते हैं, वे ही सत्य को समझ सकते हैं और वास्तविकता में प्रवेश कर सकते हैं। इसके अलावा, ऐसे लोग सभी चीजों में व्यावहारिक बातों पर ध्यान केंद्रित करते हैं; वे अपेक्षाकृत यथार्थवादी होते हैं, सकारात्मक चीजों से प्रेम करते हैं, सत्य को स्वीकार करने और सत्य का अभ्यास करने में सक्षम होते हैं, अंततः वे सत्य प्राप्त कर सकते हैं और परमेश्वर के प्रति समर्पण कर सकते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर पर विश्वास करने में सबसे महत्वपूर्ण उसके वचनों का अभ्यास और अनुभव करना है)। मैंने परमेश्वर के वचनों से जाना कि सत्य के खोजी परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देते हैं, अक्सर परमेश्वर के वचनों पर मनन कर उन्हें अभ्यास में लाते हैं। वे सत्य की तलाश कर आसपास के लोगों, चीजों और घटनाओं से सबक सीख सकते हैं और अपने अनुभवों से लाभान्वित हो सकते हैं। लेख लिखना हमें परमेश्वर के सामने आने, उसके वचनों पर सोचने और सत्य खोजने को प्रेरित करने का एक अच्छा तरीका है। जब मैं परमेश्वर का इरादा समझ गई तो मुझे जिम्मेदारी का एहसास हुआ और लेख लिखने की प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि परमेश्वर के दिल को सुकून देने के लिए वह कर्तव्य करना चाहिए और एहसास हुआ कि मैं लेख लिखकर और अधिक सत्य खोज सकती हूँ और जीवन में प्रगति कर सकती हूँ।
उसके बाद मैंने हर दिन के काम की योजना बनानी शुरू की, तय किया कि मैं किस समस्या को तात्कालिक जरूरत के मुताबिक कब समय दूँगी। समय मिलते ही मैं परमेश्वर के वचनों को खाती-पीती और लेख लिखने पर काम करती। जब मैंने पहली बार लिखना शुरू किया, तो परमेश्वर के वचनों के बारे में जो मैंने लिखा, वह काफी सतही था। मैं तब हार मानकर लिखना बंद कर देना चाहती थी और परमेश्वर के वचनों पर मनन नहीं करना चाहती थी। फिर मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर! मैं हार मानना नहीं चाहती। मैं तुम्हारे वचनों पर मनन करना चाहती हूँ और फिलहाल जो कुछ भी जानती हूँ, उसे लिखना चाहती हूँ और जैसे-जैसे अनुभव बढ़े, वैसे-वैसे लिखना जारी रखना चाहती हूँ। मैं अपने भ्रष्ट स्वभाव से नहीं जीना चाहती। मैं तुम्हारी गवाही देने के लिए तुम्हारे प्रबोधन और रोशनी के बारे में लिखना चाहती हूँ।” इस प्रार्थना के बाद मुझे बहुत शांति महसूस हुई। शांत होकर जब मैंने अपनी दशा और परमेश्वर के वचनों पर मनन किया, तो मुझे जो-जो प्रबोधन मिला, उसे मैं नोट करती गई। मैंने परमेश्वर के वचनों पर सोचा और समय मिलते ही अपनी समझ लिख दी। काम पूरा करने के बाद जब मैंने देखा कि कुछ हिस्से बहुत साफ नहीं थे, तो मैंने उन्हें संपादित करने की पूरी कोशिश की। जितना अधिक मैं लिखती गई, उतनी ही अधिक मुझे स्पष्टता मिलती गई और उतनी ही बेहतर मैं अपनी मनोदशा को देख पाई। मुझे सत्य की ज्यादा से ज्यादा वास्तविक समझ भी मिली। मुझे लगा ऐसा अभ्यास सचमुच संतुष्टि देने वाला है।