9. निष्कासन के बाद आत्मचिंतन

अंत के दिनों का सर्वशक्तिमान परमेश्वर का कार्य स्वीकारने के बाद, मैं हमेशा कलीसिया में सुसमाचार फैला रहा था। बाद में, मैं सुसमाचार का प्रचार करने दूसरी जगह गया और चार-पाँच कलीसियाओं के सुसमाचार कार्य का प्रभारी भी रहा। एक अवधि तक सहयोग करने के द्वारा सुसमाचार कार्य ने कुछ नतीजे हासिल किए, और मैं अपने आप से काफी खुश था। खासकर, सुसमाचार कार्य में कठिनाइयों का सामना कर रहे कुछ कलीसिया अगुआ मुझसे संगति चाहते थे, और भाई-बहन भी मेरे बारे में काफी ऊँचा सोचते थे। तो मैं यह सोचकर बहुत खुश था, “लगता है मैं काफी सत्य समझता हूँ और मुझमें थोड़ी सत्य वास्तविकता है।”

2013 में, मैं सुसमाचार प्रचार के लिए स्थानीय कलीसिया लौट आया। मैंने मन-ही-मन सोचा, “पिछले करीब एक साल से दूर जाकर सुसमाचार प्रचार करते हुए, मैंने काफी सारा अभ्यास किया और कुछ सत्य समझे। अब जब मैं स्थानीय कलीसिया लौट आया हूँ, तो मैं निश्चित ही विकसित करने के लिए मुख्य उम्मेदवार हूँ, और जब भाई-बहन मेरी संगति सुनेंगे, तो यह निश्चित ही पहले की संगति से अलग होगी। शायद मैं चुनावों में कलीसिया अगुआ भी चुना जाऊँ।” कुछ दिन बाद, जिया शिन नाम की एक कलीसिया अगुआ मेरे घर आई। उसने कहा कि उसका काम उसे बहुत थका देता है, और कुछ सहकर्मियों ने कहा कि वह समस्याएँ हल नहीं कर सकती, सभाओं में वह हमेशा ऊँघती रहती है, और उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है, और उसे खुद को जिम्मेदार मानते हुए इस्तीफा दे देना चाहिए। उसने कहा कि प्रचारकों ने भी उसे यही करने को कहा था। उसने इस बात पर भी जोर दिया कि इन दोनों प्रचारकों को उसने एक बार बर्खास्त भी किया था, पर उन्होंने कभी आत्मचिंतन नहीं किया और यह भी कहा कि वह उन्हें दबा रही है। जिया शिन ने मुझसे और मेरी पत्नी से पूछा कि वो ऐसी परिस्थितियों का अनुभव कैसे करे। उसे यह सब कहते हुए सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया, मैंने सोचा, “क्या यह बदला लेना नहीं है? मैंने पहले जिया शिन के साथ काम किया है और वह सुसमाचार प्रचार करते हुए सच में कष्ट उठाने और कीमत चुकाने में सक्षम है। कभी-कभी, नए विश्वासी देर तक काम करते थे, पर वह अभी भी अपनी दैहिक इच्छाओं के खिलाफ विद्रोह करके उनके साथ संगति करती थी। वह बहुत जिम्मेदार है; वे कैसे कह सकते हैं कि उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है? क्या वे उसे दबा नहीं रहे हैं? झूठे अगुआ और कार्यकर्ता ऐसा ही करते हैं। नहीं, मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता। अब मैं लौट आया हूँ, तो मुझे उसकी मदद करनी ही होगी।” जल्दी ही, मैं अपनी पत्नी के साथ इस मामले को समझने और इसकी छानबीन करने गया। छानबीन करते हुए, मैं यह सोचकर अपने आप से काफी खुश था, “मैं बहुत विवेकशील हूँ; कलीसिया लौटने के तुरंत बाद मैं नकली अगुआओं का भेद पहचान पाऊँगा। अगर इन झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं की रिपोर्ट करके उन्हें बर्खास्त करा पाया, तो मैंने एक महान कर्म करूँगा। उनके बर्खास्त होने के बाद, शायद मुझे अगुआ चुने जाने का मौका मिल जाए। मैं सच में एक तीर से दो निशाने साध लूँगा।” इस बारे में सोचकर, मेरी “न्याय की भावना” और मजबूत हो गई। कुछ दिनों बाद, मुझे पता चला कि अनेक सहकर्मियों ने जिया शिन को उसके पद से हटा दिया था। सहकर्मियों ने सभाओं में जिया शिन के कलीसिया में व्यवहार का गहन विश्लेषण किया और उसे पहचानने में भाई-बहनों की मदद की। यह खबर सुनकर, मैं गुस्से से भर गया और सोचा, “जिया शिन तुम सभी से ज्यादा त्याग करने और कष्ट सहने में सक्षम है। वह ऐसी झूठी अगुआ कैसे हो सकती है जिसके पास पवित्र आत्मा का कार्य नहीं है? तुम सभी को हटाया जा सकता है, पर उसे नहीं।” मेरा मानना था कि यह बदले की कार्रवाई है, इसलिए मैंने सभास्थलों में यह आरोप फैलाया कि ये झूठे अगुआ और कार्यकर्ता हैं, और जिया शिन को हटाया जाना कार्य व्यवस्थाओं के अनुरूप नहीं था। इसी वजह से भाई-बहन सामान्य कलीसियाई जीवन जीने में असमर्थ हैं, और कलीसिया थोड़ा अस्त-व्यस्त हो गया है।

कुछ समय बाद, एक बहन कलीसिया की अव्यवस्था से निपटने आई। उसने कहा, उसकी छानबीन से पता चला है कि जिया शिन सत्य पर संगति करना नहीं जानती थी और भाई-बहनों की वास्तविक समस्याएँ हल नहीं कर पाती थी। उसने कहा कि जिया शिन सच में झूठी अगुआ है जो वास्तविक काम नहीं कर सकी, और सिद्धांतों के अनुसार उसे बर्खास्त कर देना चाहिए। मगर उस बहन की बात सुनकर मैं थोड़ा आशंकित हो गया, मैंने सोचा, “क्या हम वाकई इस मामले में गलत थे? ऐसा नहीं हो सकता! मेरे पास भी लोगों को परखने का आधार है; मैं तुम लोगों से गुमराह नहीं हो सकता। तुम अगुआओं और कार्यकर्ताओं की तरफदारी कर रही हो।” उसके बाद, उस बहन ने जो कहा मैंने नहीं सुना, बस यही सोचा कि उसने चीजों को अन्यायपूर्ण ढंग से संभाला है। फिर मैंने तीन अन्य लोगों के साथ रिपोर्ट पत्र लिखकर बताया कि इन अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा जिया शिन को हटाया जाना सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था और वे उससे बदला ले रहे थे। हालांकि, यह पत्र लिखने की प्रक्रिया उतनी सरल बिल्कुल नहीं थी। यह पत्र लिखते हुए हमारे बीच हमेशा मतभेद उभरते रहे, हर कोई अपने विचारों पर टिका था। हमने इसे बार-बार लिखा, और हर बार नई गलतियाँ हुईं। मेरे मन में आशंकाएँ थी, मैंने सोचा, “क्या हमारा उनके बारे में रिपोर्ट करना परमेश्वर के इरादे के अनुरूप नहीं है? अगर नहीं है, तो हमें रिपोर्ट नहीं करनी चाहिए” मगर फिर मैंने यह भी सोचा, “अगर मैं इससे पीछे हटता हूँ और दूसरे लोग सच में रिपोर्ट करके झूठे अगुआओं को बर्खास्त करा देते हैं, तो यह सराहनीय कर्म उनका होगा। फिर क्या मेरे पिछले सारे प्रयास व्यर्थ नहीं हो जाएँगे? भाई-बहन निश्चित रूप से यही सोचेंगे कि सिर्फ वे सत्य समझते हैं, उनके पास ही विवेक और न्याय की समझ है। कोई भी मेरे बारे में ऊँचा नहीं सोचेगा।” तो जब रिपोर्ट पत्र पूरा हुआ, मैंने अपने नाम पर दस्तखत किया, और हमने उस बहन की भी रिपोर्ट की जो कलीसिया की अव्यवस्था से निपटी थी। पत्र को बंद करने के बाद, मैं अपने आप से काफी खुश था। मैंने सोचा, “इस बार, जब झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को बर्खास्त किया जाएगा, और वरिष्ठ अगुआ देखेंगे कि मैं सत्य समझता हूँ और लोगों को पहचान सकता हूँ, तो शायद वे प्रोटोकॉल तोड़कर मुझे तरक्की दे दें। सभी भाई-बहन मेरी काबिलियत की प्रशंसा करेंगे; यह कितना जबरदस्त होगा!” कुछ दिनों बाद, मुझे वरिष्ठ अगुआओं का पत्र मिला जिसमें कहा गया कि अभी कम्युनिस्ट पार्टी की गिरफ्तारियाँ बहुत गंभीर मामला है, और उन्हें इस रिपोर्ट पत्र की छानबीन करने और मामले को देखने के लिए थोड़ा समय चाहिए। एक बहन ने कहा, “आने वाले समय में अधिक गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं। अगर हम इस मामले से निपटने में वरिष्ठ अगुआओं का इंतजार करते रहे, तो बहुत देर हो जाएगी। भले ही हम अगुआ या कार्यकर्ता नहीं हैं, फिर भी हमें अधिक विवेकशील होने में भाई-बहनों की मदद करनी होगी।” मैं सोचा, “सही बात है। क्या अधिक विवेकशील होने में भाई-बहनों की मदद करना अपना कर्तव्य निभाने का तरीका नहीं है? जब इन झूठे अगुआओं को बर्खास्त किया जाएगा, तो हर कोई इस उपलब्धि का श्रेय मुझे ही देगा, और शायद मैं अगुआ चुने जाने में सक्षम हो जाऊँ।” तो मैं सभास्थलों में जाकर कहने लगा कि अगुआओं और कार्यकर्ताओं द्वारा जिया शिन को हटाया जाना सिद्धांतों के अनुरूप नहीं था। मैंने यह भी कहा कि जिया शिन झूठी अगुआ नहीं थी, और वह सुबह से शाम तक अपना कर्तव्य निभाती थी और कुछ वास्तविक काम कर सकती थी। इस दौरान, सभा करते हुए भाई-बहनों ने परमेश्वर के वचनों पर संगति नहीं की और केवल इन मामलों पर टिप्पणी की। कुछ भाई-बहन हमसे गुमराह हो गए और उन्होंने हमारा पक्ष लिया, उनके मन में अगुआओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ पूर्वाग्रह पैदा हो गया और वे भी उन्हें झूठे अगुआ बताने लगे। कुछ लोग तो अपने घरों में उनका स्वागत भी नहीं करते थे, जिसके कारण अगुआ और कार्यकर्ता सामान्य रूप से अपना कर्तव्य निभाने में असमर्थ थे। कुछ विवेकशील लोगों ने अगुआओं और कार्यकर्ताओं का पक्ष लेते हुए कहा कि हम कलीसियाई जीवन में बाधाएँ खड़ी कर रहे हैं। इस तरह, कलीसिया में दो धड़े बन गए; हम एक दूसरे के खिलाफ खड़ी दो सेनाओं जैसे थे। जब भी हम सभा करते, बस इन बातों की ही चर्चा करते, और भाई-बहन अपना सामान्य कलीसियाई जीवन खो बैठे। कई महीनों तक इसी तरह कलीसिया में अव्यवस्था बनी रही।

एक दिन, वरिष्ठ अगुआ हमारे रिपोर्ट पत्र की छानबीन करने और मामले को समझने के लिए आए। मैंने मन-ही-मन सोचा, “उन झूठे अगुआओं और कार्यकर्ताओं को निश्चित ही बर्खास्त कर दिया जाएगा।” जब मैं इन बातों को लेकर खुश हो रहा था, तभी उनमें से एक अगुआ ने परमेश्वर के वचनों का इस्तेमाल कर हमारे आचरण की प्रकृति का गहन विश्लेषण किया। उसने कहा कि हम धड़े बनाकर कलीसिया को बाँट रहे हैं और कलीसियाई जीवन में बाधाएँ डाल रहे हैं, जिसके कारण अगुआ और कार्यकर्ता सामान्य रूप से काम करने में असमर्थ हैं और कलीसिया का काम रुक गया है। उसने कहा कि हम कुकर्म कर रहे हैं। उसने यह भी कहा कि अगुआ के रूप में जिया शिन परमेश्वर के कार्य का अनुभव करने में भाई-बहनों का मार्गदर्शन करना नहीं जानती थी। बल्कि, वह हमेशा लोगों को जीतने और सहकर्मियों से अपनी असंतुष्टि जाहिर करने की कोशिश करती थी। उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य कैसे हो सकता था? उसने कहा कि जिया शिन वास्तविक कार्य करने या भाई-बहनों की समस्याएँ हल करने में असमर्थ थी, और वह चाहे कितनी भी त्याग करती या खुद को खपाती दिखती थी, वह झूठी अगुआ थी और उसे बर्खास्त किया जाना चाहिए; यही सिद्धांतों का पालन करना है। इस बहन की संगति और जिया शिन को झूठी अगुआ बताते हुए सुनकर मेरा दिल जोरों से धड़कने लगा, और मैंने सोचा, “उनकी बात में दम तो है। उन सहकर्मियों ने जिया शिन को उजागर करके हटाया था, और उसे आत्मचिंतन करके खुद को समझने की कोशिश करनी चाहिए थी। इसके बजाय, वह बार-बार हमारे पास आई, अपने साथ गलत होने की बात कहकर ढेर सारी शिकायतें की। उसने वाकई सत्य या परमेश्वर के कार्य के अनुभव को नहीं स्वीकारा। मैंने जिया शिन का साथ देकर अन्य अगुआओं और कार्यकर्ताओं की भी आलोचना की, कलीसियाई जीवन में बाधाएँ खड़ी की। इसकी प्रकृति गंभीर है!” हालांकि, उस समय मुझे अपने आचरण की कोई समझ नहीं थी, मैंने बस यह स्वीकार लिया कि मैंने गलती की थी। अंत में, वरिष्ठ अगुआओं ने कहा कि हमने कलीसियाई जीवन में बुरी तरह व्यवधान डाला था और इसकी प्रकृति बहुत गंभीर थी। उन्होंने हमारे लिए घर पर अकेले रहकर आत्मचिंतन करने की व्यवस्था की।

एक दिन, मैं अपनी माँ के घर गया, तो उसने मुझे निष्कासन के तीन नोटिस दिए। उन्हें देखकर मुझे हैरानी हुई कि उनमें जिया शिन के अलावा मेरे और मेरी पत्नी के निष्कासन का नोटिस भी शामिल था। इन नोटिसों में कहा गया था कि जिया शिन धूर्त और कपटी थी, उसने कलीसिया में कलह के बीज बोए और धड़े बनाए, और अंत में उसे मसीह-विरोधी मानकर निष्कासित कर दिया गया। वहीं मैंने कुकर्म करने और कलीसियाई जीवन में विघ्न-बाधाएँ डालने में इस मसीह-विरोधी का साथ दिया था। मैं इस मसीह-विरोधी का सह-अपराधी था, इसलिए मुझे भी निष्कासित कर दिया गया। निष्कासन के इन नोटिसों को पढ़कर, मुझे अपनी आँखों पर यकीन ही नहीं हुआ। मेरी हालत ऐसी थी मानो कोई कैदी अपनी मौत की सजा का फरमान पढ़ रहा हो। मैं इतना डर गया कि मेरी टांगे कमजोर पड़ गईं और काँपने लगीं, मैंने सोचा, “मुझे निष्कासित कर दिया गया है? क्या हमें सिर्फ घर पर बैठकर आत्मचिंतन नहीं करना था? हमें निष्कासित कैसे किया जा सकता है? इस बार मैंने वाकई बड़ा कुकर्म किया है।” उस समय मेरा दिमाग एकदम खाली था, और मैं फौरन अपनी पत्नी को हमारे निष्कासन की खबर देने घर भागा। उसे यह सब बताने के बाद मैं खुद को रोक नहीं पाया, और फर्श पर बैठकर रोने लगा। मैंने मन-ही-मन सोचा, “मेरा तो बस हो गया, अब कुछ नहीं हो सकता। परमेश्वर में विश्वास का मेरा सफर खत्म हो गया, और मैं फिर कभी वापस कलीसिया नहीं जा सकूँगा। इस बार, मैंने वाकई परमेश्वर के स्वभाव का अपमान किया था, और शायद किसी दिन मुझे दंड भी दिया जाए।” इस बारे में सोचकर, लगा मानो मेरे दिल में चाकुओं से वार किया गया हो; मैं बेहद निराशा और पीड़ा में था। ऐसा कुछ करने में सक्षम रहने पर मैंने खुद से नफरत की। मैं जिया शिन की बातों पर आँख मूंदकर भरोसा कैसे कर सकता था? कलीसियाई जीवन में मैंने जो बड़ा व्यवधान डाला था उसकी भरपाई करने का कोई तरीका नहीं था, मैंने इस बारे में जितना सोचा उतना ही मेरा दिल दुखी हो गया। हर दिन, कुछ भी करने का मन नहीं होता था। मैं न तो खा पाता और न ही रात को ठीक से सो पाता, कुछ ही समय बाद, मेरा वजन 10 पाउंड से ज्यादा घट गया। हर दिन ऐसा लगता मानो मुझे बस मौत का इंतजार है। मैंने सोचा कि अब मेरे पास बचाए जाने का कोई अवसर नहीं है, दंड मिलना और नरक में जाना मेरी नियति बन चुकी है। मैं घातक कैंसर के मरीज जैसा था, इतना निराश और हतोत्साहित था जितना कोई नहीं हो सकता। मैंने सोचा कि देर-सबेर मुझे तो मरना ही है, तो शायद मुझे इन सबसे मुक्ति मिल जाए। जब मैं अत्यंत पीड़ा में और असहाय था, मैंने परमेश्वर के वचनों के इस भजन के बोलों को याद किया : “तुम्हारी पीड़ा जितनी भी हो ज़्यादा, परमेश्वर को प्रेम करने का करो प्रयास” “आज अधिकतर लोगों के पास यह ज्ञान नहीं है। वे मानते हैं कि कष्ट सहने का कोई मूल्य नहीं है और दुनिया उन्हें ठुकरा देती है, उनका पारिवारिक जीवन अशांत रहता है, परमेश्वर उनसे प्रसन्न नहीं होता और उनका भविष्य अंधकारमय है। कुछ लोग तो एक निश्चित सीमा तक कष्ट सहते हुए मर ही जाना चाहते हैं। यह परमेश्वर के प्रति सच्चा प्रेम नहीं है; ऐसे लोग कायर होते हैं, उनमें दृढ़ता नहीं होती है, वे डरपोक और अक्षम होते हैं!(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, पीड़ादायक परीक्षणों के अनुभव से ही तुम परमेश्वर की मनोहरता को जान सकते हो)। मैंने इस भजन को बार-बार सुना। मुझे लगा जैसे परमेश्वर इस भजन के जरिए मुझे बता रहा है कि वह मुझे कमजोर और शक्तिहीन नहीं देखना चाहता, वह नहीं चाहता कि मैं उसमें अपनी आस्था खो बैठूं। मैंने इतना अधिक कुकर्म किया था और मुझे निष्कासित भी किया गया था, भविष्य में दंड मिलना मेरी नियति थी, मगर परमेश्वर ने अभी भी मुझे इस भजन को याद करने के लिए प्रबुद्ध किया और रास्ता दिखाया, उसने मुझे और निराशा में डूबने नहीं दिया। मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ, मेरे दिल में उम्मीद की किरण प्रकट हुई और थोड़ी शक्ति भी लौटी। फिर मैंने, परमेश्वर के और वचन पढ़े : “व्यावहारिक परमेश्वर का अनुसरण करते हुए, हममें यह संकल्प होना चाहिए : चाहे कितने ही बड़े परिवेश या किसी भी तरह की मुश्किल का सामना कर रहे हों, और चाहे हम कितने ही कमजोर या नकारात्मक हो जाएँ, हम अपने स्वभावगत बदलाव में या परमेश्वर के कहे वचनों में आस्था नहीं छोड़ेंगे। परमेश्वर ने लोगों से एक वादा किया है, और इसके लिए यह जरूरी है कि उनमें संकल्प, आस्था, और इसे धारण करने की दृढ़ता हो। परमेश्वर को कायर लोग पसंद नहीं हैं; वह दृढ़ निश्चयी लोगों को पसंद करता है। भले ही तुमने बहुत-सारी भ्रष्टता दिखाई है, भले ही तुमने बहुत-से विमार्ग लिए हैं या कई अपराध किए हैं, परमेश्वर के बारे में शिकायतें की हैं या धर्म के अंदर से परमेश्वर का प्रतिरोध किया या अपने दिल में उसके खिलाफ ईशनिंदा पाली है, वगैरह-वगैरह—परमेश्वर इन सब पर कतई गौर नहीं करता है। परमेश्वर सिर्फ यह देखता है कि क्या व्यक्ति सत्य का अनुसरण करता है या नहीं और क्या वह किसी दिन बदल सकता है या नहीं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग)। मैंने देखा कि परमेश्वर कायरों को पसंद नहीं करता; उसे दृढ़ संकल्प वाले लोग पसंद हैं। भले ही मुझे इतना बड़ा कुकर्म करने पर निष्कासित किया गया था, मगर परमेश्वर इस बात को महत्व देता है कि मैं बदल पाया या नहीं। अगर मैं बदल गया, तो भले ही मैं मर जाऊँ या अंत में दंड पाऊँ, यह सार्थक होगा। उस दौरान, भजन के बोल और परमेश्वर के वचन समय-समय पर मेरे मन में आते रहे। मैं बहुत प्रभावित हुआ, और सोचा कि परमेश्वर ने मुझे नहीं छोड़ा है। मेरे सबसे अधिक हताशापूर्ण और अंधकरमय समय में, उसने अपने वचनों से मुझे रास्ता दिखाया, हौसला बढ़ाया और राहत दी। मैंने सोचा कि परमेश्वर मनुष्य से इतना अधिक प्रेम करता है, तो मैं निराश नहीं रह सकता। तब से, मैं हर दिन जल्दी उठने लगा और दृढ़ता से परमेश्वर के वचनों को खाने-पीने लगा, मैंने जिन तरीकों से परमेश्वर का अपमान किया था उन पर भी विचार किया।

एक दिन, मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े : “ऐसे कई लोग कलीसिया में मौजूद हैं, जिनमें कोई विवेक नहीं है। जब लोगों को गुमराह करने की घटनाएं होती हैं, तो वे उलटे शैतान के पक्ष में जा खड़े होते हैं; उन्हें शैतान का सेवक कहा जाना भी अपने साथ बहुत अन्याय होना लगता है। यद्यपि लोग कह सकते हैं कि उनमें विवेक नहीं है, वे हमेशा अ-सत्य के पक्ष में खड़े होते हैं, वे संकटपूर्ण समय में कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े नहीं होते हैं, वे कभी भी सत्य के पक्ष में खड़े होकर दलील पेश नहीं करते हैं। क्या उनमें सच में विवेक का अभाव है? वे विपरीत जाकर शैतान का पक्ष क्यों लेते हैं? वे कभी भी एक भी शब्द ऐसा क्यों नहीं बोलते हैं जो निष्पक्ष हो या सत्य के समर्थन में तार्किक हो? क्या ऐसी स्थिति वाकई उनके क्षणिक भ्रम के परिणामस्वरूप पैदा हुई है? लोगों में विवेक की जितनी कमी होगी, वे सत्य के पक्ष में उतना ही कम खड़ा हो पाएँगे। इससे क्या ज़ाहिर होता है? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि विवेकशून्य लोग पाप से प्रेम करते हैं? क्या इससे यह ज़ाहिर नहीं होता कि वे शैतान की निष्ठावान संतान हैं? ऐसा क्यों है कि वे हमेशा शैतान के पक्ष में खड़े होकर उसी की भाषा बोलते हैं? उनका हर शब्द और कर्म, और उनके चेहरे के हाव-भाव, यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं कि वे सत्य के किसी भी प्रकार के प्रेमी नहीं हैं; बल्कि, वे ऐसे लोग हैं जो सत्य से घृणा करते हैं। शैतान के साथ उनका खड़ा होना यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि शैतान इन तुच्छ इब्लीसों को वाकई में प्रेम करता है जो शैतान की खातिर लड़ते हुए अपना जीवन व्यतीत कर देते हैं। क्या ये सभी तथ्य पूरी तरह से स्पष्ट नहीं हैं?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी)। “जो लोग विवेकशून्य हैं, वे अपनी तुच्छ चालाकी के कारण बुरे लोगों के हाथों विनाश को प्राप्त होंगे, और ऐसे लोग दुष्ट लोगों के द्वारा पथभ्रष्ट कर दिये जायेंगे तथा लौटकर आने में असमर्थ होंगे। इन लोगों के साथ इसी प्रकार पेश आना चाहिए, क्योंकि इन्हें सत्य से प्रेम नहीं है, क्योंकि ये सत्य के पक्ष में खड़े होने में अक्षम हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों का अनुसरण करते हैं, ये दुष्ट लोगों के पक्ष में खड़े होते हैं, क्योंकि ये दुष्ट लोगों के साथ साँठ-गाँठ करते हैं और परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं। वे बहुत अच्छी तरह से जानते हैं कि वे दुष्ट लोग दुष्टता विकीर्ण करते हैं, मगर वे अपना हृदय कड़ा कर लेते हैं और उनका अनुसरण करने के लिए सत्य के विपरीत चलते हैं। क्या ये लोग जो सत्य का अनुसरण नहीं करते हैं लेकिन जो विनाशकारी और घृणास्पद कार्यों को करते हैं, दुष्टता नहीं कर रहे हैं? यद्यपि उनमें से कुछ ऐसे हैं जो अपने आप को सम्राटों की तरह पेश करते हैं और कुछ ऐसे हैं जो उनका अनुसरण करते हैं, किन्तु क्या परमेश्वर का प्रतिरोध करने की उनकी प्रकृति एक-सी नहीं है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर उन्हें नहीं बचाता है? उनके पास इस बात का दावा करने का क्या बहाना हो सकता है कि परमेश्वर धार्मिक नहीं है? क्या यह उनकी अपनी दुष्टता नहीं है जो उनका विनाश कर रही है? क्या यह उनकी खुद की विद्रोहशीलता नहीं है जो उन्हें नरक में नहीं धकेल रही है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, जो सत्य का अभ्यास नहीं करते हैं उनके लिए एक चेतावनी)। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मैंने शर्मिंदा और व्यथित महसूस किया। मैंने इतना बड़ा कुकर्म सिर्फ इसलिए नहीं किया था कि मैं चीजों को समझ नहीं पाया; इसका मुख्य कारण यह था कि मैं प्रतिष्ठा और रुतबे को बहुत अधिक संजोता था। जिया शिन ने अगुआ के रूप में अपना रुतबा बचाने की खातिर हमें राजी किया। मैं उसके क्रियाकलापों के पीछे के इरादे नहीं पहचान पाया, न ही मैंने यह देखा कि उसकी बातें तथ्यों के अनुरूप हैं या नहीं। मैंने बस आँखें मूंदकर उसका साथ दिया, मैं “न्याय के लिए लड़ने वाला” बनकर खुद का दिखावा करना चाहता था। मैं अगुआ का रुतबा हासिल करने का मौका भी पाना चाहता था। रिपोर्ट पत्र लिखते समय, मैंने साफ तौर पर महसूस किया कि हमें परमेश्वर का मार्गदर्शन नहीं मिल रहा है। हम अपनी-अपनी राय को लेकर आम सहमति नहीं बना पाए, और मेरे दिल को शांति नहीं मिली। फिर भी, मैंने कठोर मन से वह पत्र लिखा और ऐसे कुकर्म में इस मसीह-विरोधी का साथ दिया। कलीसिया में आई उच्च स्तर की बहन ने मेरी मदद के लिए संगति करके मुझे उजागर किया, मगर मैंने यह सोचकर अपना रास्ता नहीं बदला कि अगर मैंने अपनी गलतियाँ मान लीं, तो कहीं लोग मुझे नीची नजरों से न देखने लगें। मैंने सभा स्थलों में जाकर अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जानबूझकर आलोचना की, यह सूचना फैलाई कि वे नकली हैं। मेरा लक्ष्य यही था कि भाई-बहन अगुआओं और कार्यकर्ताओं को ठुकरा दें और मेरे बारे में ऊँचा सोचें, ताकि आगे होने वाले चुनावों में शायद मैं अगुआ चुना जाऊँ। मेरी विघ्न-बाधाओं के कारण, भाई-बहन न तो सामान्य रूप से सभा कर पाए और न ही परमेश्वर के वचन खा-पी सके। कलीसिया में करीब आधे भाई-बहन हमारे द्वारा गुमराह हो गए, और हम मिलकर अगुआओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ खड़े हो गए। परमेश्वर चाहता था कि भाई-बहन सामान्य रूप से सभा और उसके वचनों पर संगति कर सकें, और अपने-अपने कर्तव्य निभा सकें। जब परमेश्वर कलीसिया का निर्माण कर रहा था, तो शैतान उसके कार्य को बिगाड़ना चाहता था। इस बीच, मैं शैतान के नौकर और सह-अपराधी की भूमिका निभा रहा था, और कलीसिया के कार्य में विघ्न-बाधाएँ डाल रहा था। इन व्यवहारों के साथ, मैं सिर्फ क्षणिक विवेकहीनता के कारण गलत राह पर नहीं चल रहा था। मेरी प्रकृति भी जिया शिन जैसी ही थी; हम दोनों ही प्रतिष्ठा और रुतबे के जबरदस्त कद्रदान थे। रुतबा पाने के लिए, हमने कलीसिया में अव्यवस्था पैदा की, और मुझे निष्कासित किया गया क्योंकि मैं सत्य का अनुसरण करने के बजाय रुतबे के पीछे भागा। इस बारे में सोचकर, मुझे काफी पछतावा और आत्मग्लानि हुई। मैं घुटनों के बल फर्श पर बैठ गया और अपने गालों पर 100 से अधिक जोरदार चांटे मारे। मैं बेरहमी से खुद को सजा देना चाहता था ताकि यह सबक हमेशा याद रहे। मैंने परमेश्वर से प्रार्थना भी की, “परमेश्वर, मैंने कुकर्म किया है। मैंने रुतबे के पीछे भागकर कलीसिया के काम में बाधा डाली है। मैं सही तरीके से पश्चात्ताप और आत्मचिंतन करके अपने कुकर्मों को समझना चाहता हूँ।”

उसके बाद, मैं यह सोचकर आत्मचिंतन करता रहा, “मैं रुतबे से इतना अधिक प्रेम क्यों करता हूँ, क्यों हमेशा इसके पीछे भागकर इसे पाना चाहता हूँ? मैं ऐसे कुकर्म कैसे कर पाता हूँ?” मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “अगर अपने हृदय में तुम वास्तव में सत्य को समझते हो तो तुम जान लोगे कि सत्य का अभ्यास और परमेश्वर के प्रति समर्पण कैसे करना है और तुम स्वाभाविक रूप से सत्य का अनुसरण करने के मार्ग पर चलना शुरू कर दोगे। अगर तुम जिस मार्ग पर चल रहे हो वह सही है, और परमेश्वर के इरादों के अनुरूप है, तो पवित्र आत्मा का कार्य तुम्हारा साथ नहीं छोड़ेगा—ऐसी स्थिति में तुम्हारे परमेश्वर को धोखा देने की संभावना कम से कम होगी। सत्य के बिना, बुरे काम करना आसान है और तुम यह अपनी मर्जी के बिना करोगे। उदाहरण के लिए, यदि तुम्हारा स्वभाव अहंकारी और दंभी होगा, तो तुम्हें परमेश्वर का विरोध न करने को कहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा, क्योंकि तुम खुद को नियंत्रित नहीं कर पाओगे—यह कुछ हद तक तुम्हारे लिए अनैच्छिक होगा। तुम ऐसा जानबूझकर नहीं करोगे; तुम ऐसा अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन करोगे। तुम्हारे अहंकार और दंभ के कारण तुम परमेश्वर को तुच्छ समझोगे और उसे अनदेखा कर दोगे; वे तुम्हें खुद की बड़ाई करने की ओर ले जाएँगे और उनके कारण तुम हर मोड़ पर खुद का दिखावा करोगे; वे तुम्हें दूसरों को नीची नजर से देखने के लिए मजबूर करेंगे और तुम्हारे दिल में तुम्हें छोड़कर और किसी को नहीं रहने देंगे; वे तुम्हारे दिल से परमेश्वर का स्थान छीन लेंगे, और अंततः तुम्हें परमेश्वर के स्थान पर बैठने और यह माँग करने के लिए मजबूर करेंगे और चाहेंगे कि लोग तुम्हें समर्पित हों, तुमसे अपने ही विचारों, ख्यालों और धारणाओं को सत्य मानकर पूजा करवाएँगे। लोग अपनी अहंकारी और दंभी प्रकृति के प्रभुत्व के अधीन इतनी बुराई करते हैं!(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य का अनुसरण करके ही व्यक्ति स्वभाव में बदलाव ला सकता है)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने समझा कि मेरा ऐसे कुकर्म करने में सक्षम होने का मूल कारण यह था कि मैं बहुत अहंकारी था, मुझे खुद पर बहुत अधिक विश्वास था, और मैं अपने बारे में बहुत ऊँचा सोचता था। मेरा मानना था, चूँकि मैं सुसमाचार प्रचार करते हुए कुछ समस्याएँ हल कर पाता था, इसका मतलब था कि मैं सत्य समझता था और मुझमें वास्तविकता थी। इसलिए मैं खुद पर आँखें मूँदकर विश्वास करता और लापरवाही से काम करता था, नतीजतन, मैंने वे सभी कुकर्म किए। जब जिया शिन को हटाने की बात आई, मैंने कभी सही तरीके से सत्य सिद्धांत नहीं खोजे। मैंने देखा कि जिया शिन त्याग करके खुद को खपा सकती थी, अपने कर्तव्य में कष्ट उठाकर कीमत चुका सकती थी, इसलिए मैंने सोचा कि वह सत्य का अभ्यास कर रही है और उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य है। मैंने सोचा कि सत्य का अनुसरण किए बिना भला कौन इस हद तक वे सभी चीजें कर सकता है? वास्तव में, किसी के पास पवित्र आत्मा का कार्य है या नहीं, यह पहचानने में उसके कष्ट उठाते, कीमत चुकाते, त्याग करते और खुद को खपाते दिखने के आधार पर फैसला नहीं किया जा सकता। ये चीजें कोई भी उत्साही व्यक्ति कर सकता है। मुख्य रूप से यह देखा जाना चाहिए कि व्यक्ति मुसीबत आने पर परमेश्वर से प्रार्थना करने में सक्षम है या नहीं, और जब यह उसकी धारणाओं के अनुरूप न हो, तब भी क्या वह खुद का त्याग करके सत्य खोज सकता है, और क्या उसके पास परमेश्वर का भय मानने और उसके प्रति समर्पण करने वाला दिल है। इसके अतिरिक्त, उसे परमेश्वर के चुने हुए लोगों को परमेश्वर के वचनों का अनुभव करने और खुद को समझने के लिए मार्गदर्शन करने में सक्षम होना चाहिए, और उसे अपने कर्तव्य में भाई-बहनों की समस्याएँ हल करने में भी सक्षम होना चाहिए। अगुआ और कार्यकर्ता को यही करना चाहिए। जिया शिन अगुआ का काम करने में असमर्थ थी, उसके पास पवित्र आत्मा का कार्य होने की बात तो दूर रही। जब लोगों ने उसकी समस्याएँ उजागर कीं, तो उसने इसे नहीं स्वीकारा, यहाँ तक कि कथित अन्यायों की शिकायत करके हमें गुमराह किया। उसने जानबूझकर हमारे बीच यह सूचना फैलाई कि उसके खिलाफ फाइल की गई सभी रिपोर्ट गलत थीं, उसने हमें ऐसे फँसा लिया कि हम उसके लिए खड़े हो गए। हम उससे गुमराह हो गए और कलीसिया में लोगों को बताया कि अगुआ और कार्यकर्ता उसे दबा रहे थे, जिसके कारण कलीसिया दो धड़ों में बँट गया और सब कुछ अस्त-व्यस्त हो गया। जिया शिन त्याग करती और खुद को थोड़ा खपाती थी, पर मुसीबत आने पर वह बिल्कुल भी सत्य नहीं खोजती थी, न ही आत्मचिंतन करके खुद को समझने की कोशिश करती थी। अपना रुतबा बचाने के लिए, उसने कलीसिया के काम में विघ्न-बाधाएँ खड़ी की और उसे कमजोर किया। उसका खुद को खपाना और कष्ट उठाना केवल उसके रुतबे की रक्षा करने और रुतबे की उसकी निजी चाह को संतुष्ट करने के लिए था। जैसे ही कोई उसके रुतबे के लिए संकट बनता, वह धड़े बनाने और कलह के बीज बोने जैसे कुकर्म करने लगती थी। उसकी प्रकृति सत्य से नफरत करने की थी; वह मक्कार, कपटी, धूर्त और दुष्ट मसीह-विरोधी थी। मुझमें जरा सा भी विवेक नहीं था। अपने कुकर्म करने में जिया शिन का अनुसरण किया और सभाओं के दौरान अगुआओं और कार्यकर्ताओं की आलोचना की, नतीजतन, भाई-बहन गुमराह हो गए और उन्होंने अगुआओं और कार्यकर्ताओं को अलग करके मेरा पक्ष लिया। इससे कलीसियाई जीवन में गंभीर बाधाएँ आईं। मैंने इतना बड़ा कुकर्म किया था, फिर भी लगता था कि मुझमें न्याय की समझ है; मैं सच में इतना भ्रमित और अहंकारी था कि सारी सूझ-बूझ खो बैठा था। अगर मैंने थोड़ा सा भी सत्य समझा होता और मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता, तो मैंने इतना बड़ा कुकर्म नहीं किया होता। मैंने देखा मुझे बहुत कमियाँ थीं, और मेरा स्वभाव बहुत अहंकारी था। मुझे स्वच्छ होने और बदलने के लिए परमेश्वर की ताड़ना और अनुशासन की सख्त जरूरत थी!

फिर मैंने परमेश्वर के कुछ और वचन पढ़े : “अपना कोप भेजने से पहले परमेश्वर हर मामले के सार को पहले ही पर्याप्त स्पष्टता से जान चुका होता है, और उसने पहले ही सटीक परिभाषाएँ और निष्कर्ष निरूपित कर लिए होते हैं। इस प्रकार परमेश्वर जो कुछ भी करता है, उसमें उसका उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट होता है, उसका रवैया भी बिलकुल साफ है। वह भ्रमित, अंधा, आवेशपूर्ण या लापरवाह नहीं हैं, और वह निश्चित रूप से सिद्धांतहीन नहीं है। यह परमेश्वर के कोप का व्यावहारिक पहलू है, और परमेश्वर के कोप के इस व्यावहारिक पहलू के कारण ही मनुष्य ने अपना सामान्य अस्तित्व हासिल किया है। परमेश्वर के कोप के बिना मनुष्य असामान्य जीवन-स्थितियों में पतित हो जाता और सभी न्यायोचित, सुंदर और अच्छी चीजों को नष्ट कर दिया जाता और वे अस्तित्व में न रहतीं। परमेश्वर के कोप के बिना सृजित प्राणियों के अस्तित्व के नियम और विधियाँ तोड़ दी जातीं या पूरी तरह से उलट दी जातीं। मनुष्य के सृजन के समय से ही परमेश्वर ने मनुष्य के सामान्य अस्तित्व की रक्षा करने और उसे कायम रखने के लिए अपने धार्मिक स्वभाव का निरंतर इस्तेमाल किया है। क्योंकि उसके धार्मिक स्वभाव में कोप और प्रताप का समावेश है, इसलिए सभी दुष्ट लोग, घटनाएँ और चीजें, और मनुष्य के सामान्य अस्तित्व को बाधित करने और उसे क्षति पहुँचाने वाली सभी चीज़ें उसके कोप के परिणामस्वरूप दंडित, नियंत्रित और नष्ट कर दी जाती हैं(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। “परमेश्वर का ऐसा धार्मिक स्वभाव इसलिए है, क्योंकि वह दुष्टता, अंधकार, विद्रोहशीलता और शैतान के दुष्ट कार्यों—जैसे कि मानवजाति को भ्रष्ट करना और निगल जाना—से घृणा करता है, क्योंकि वह अपने विरुद्ध पाप के सारे कार्यों से घृणा करता है और इसलिए भी, क्योंकि उसका सार पवित्र और निष्कलंक है। यही कारण है कि वह किसी भी सृजित या ग़ैर-सृजित प्राणी द्वारा खुला विरोध या स्वयं से मुकाबला सहन नहीं करेगा। यहाँ तक कि कोई ऐसा व्यक्ति भी, जिसके प्रति उसने किसी समय दया दिखाई हो या जिसका चुनाव किया हो, उसके स्वभाव को भड़का दे या उसके धीरज और सहनशीलता के सिद्धांत का उल्‍लंघन कर दे, तो वह थोड़ी-सी भी दया या संकोच दिखाए बिना, अपमान बरदाश्त न करने वाला अपना धार्मिक स्वभाव प्रकट और प्रकाशित कर देगा(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है II)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मैंने समझा परमेश्वर का धार्मिक स्वभाव मनुष्य से अपमानित होने के लिए नहीं है। किसी की निंदा करने और उसे हटाने के लिए परमेश्वर के सिद्धांत हैं। यह कोई क्षणिक आवेग या यूँ ही कर देने वाली चीज नहीं है; बल्कि यह तभी किया जाता है जब वह किसी के सार को देखता है। जब मैं कुकर्म कर रहा था उस दौरान भाई-बहनों ने बार-बार मुझे सलाह दी और विघ्न-बाधाएँ खड़ी करने के बजाय मुझे आत्मचिंतन करने को कहा। लेकिन मैंने इसे नहीं स्वीकारा, और जब भी किसी की संगति मेरे विचारों के अनुरूप नहीं होती, मैं उसका विरोध करता, जिससे कुकर्म अधिक से अधिक गंभीर होता गया। मेरी शुरुआती अवज्ञा से लेकर बाद में बाधाएँ खड़ी करने और अंत में कलीसिया को बाँटने तक किए गए सभी कुकर्म मेरे अहंकार और दंभ के साथ-साथ मेरे सत्य से विमुख होने और उससे नफरत करने के साक्ष्य थे। मैं बहुत अहंकारी और दुराग्रही था, अपनी खुद की कब्र देखने से पहले मेरे आँसू नहीं गिरे। परमेश्वर पहले ही मुझे पश्चात्ताप करने के अनेक अवसर दे चुका था, पर मैंने उन सभी को ठुकरा दिया। अगर कलीसिया ने मुझे निष्कासित नहीं किया होता, तो न परमेश्वर का गुस्सा और न ही कलीसिया की अव्यवस्था खत्म होती। मैंने सोचा कि कैसे सदोम को नष्ट करने से पहले, परमेश्वर ने शहर के लोगों को अनेक बार पश्चात्ताप करने की चेतावनी दी, पर वे अड़ियल बनकर उसका विरोध करते रहे और लेशमात्र भी पश्चात्ताप नहीं दिखाया। अंत में सदोम पर परमेश्वर का कोप बरसा और उसने शहर को नष्ट कर दिया। अब मैंने खुद परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अनुभव किया है और भले ही मेरा दिल काफी संतप्त और पीड़ा में है, मगर इसने मुझे कुकर्म करने से रोक दिया और मैंने देखा कि परमेश्वर के धार्मिक स्वभाव का अपमान नहीं किया जा सकता, और कलीसिया में सत्य और धार्मिकता का ही शासन चलता है। अब यह तथ्य कि परमेश्वर ने मुझे साँस लेते रहने दिया है और उसने मेरा जीवन नहीं छीना है, यह उसकी दया का ही प्रतीक है। अगर मैं आत्मचिंतन करने या खुद को समझने की कोशिश जारी नहीं रखता, तो अंत में परमेश्वर मुझे नष्ट कर देता। मैंने परमेश्वर के समक्ष जाकर उससे प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैंने कुकर्म करके तुम्हारे स्वभाव का अपमान किया है। मेरा निष्कासित होना तुम्हारी धार्मिकता है। मेरे पिछले अपराधों की भरपाई नहीं हो सकती, और अब मैं खुद को समझने और तुम्हारे समक्ष पश्चाताप करने के लिए जी रहा हूँ।” मैंने मन बना लिया है कि भविष्य में मेरा परिणाम चाहे जो भी हो, मैं सत्य का अनुसरण करूँगा और अपने भ्रष्ट स्वभाव को त्याग दूँगा, अब प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे नहीं भागूँगा। अगर वाकई किसी दिन परमेश्वर ने मुझे नष्ट कर दिया, तो भी वह उसकी धार्मिकता होगी। मुझे राज्य में प्रवेश करने की कोई बड़ी आशा नहीं है; मैं सिर्फ नए सिरे से शुरुआत करके सच्चा सृजित प्राणी बनना चाहता हूँ। मैंने दिल-ही-दिल में परमेश्वर से प्रार्थना करते हुए कहा कि अगर वह मुझे एक और अवसर दे, तो मैं कलीसिया के सबसे छोटे अनुयायियों में से एक बनना चाहूँगा। मैं मुझे सौंपा गया कोई भी कर्तव्य निभाने को तैयार हूँ; परमेश्वर के घर के लिए कुछ करना ही मेरे लिए काफी है। बाद में, कलीसिया ने मुझे ढूंढकर कुछ सामान खरीदने में भाई-बहनों की मदद करने को कहा। मुझे बहुत गर्व हुआ।

अप्रैल 2016 में एक दिन, एक अगुआ मेरे घर आया और उसने मुझसे कहा, “तुम्हें फिर से कलीसिया में स्वीकार लिया गया है, और अधिकांश भाई-बहन इस फैसले से सहमत हैं।” उस समय, मैं इतना भावुक हो गया कि कुछ बोल ही नहीं पाया। अगुआ के जाने के बाद, मैं अपने आँसुओं को बहने रोक नहीं पाया। अपने दिल में, मैं निरंतर परमेश्वर का धन्यवाद और उसका गुणगान करता रहा! मैंने उससे प्रार्थना की, “परमेश्वर! मैंने उम्मीद भी नहीं की थी कि तुम मुझे कलीसिया में लौटने का अवसर दोगे। मेरा साथ देने, मुझे प्रबुद्ध करने और खुद को समझने में मेरा मार्गदर्शन करने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। परमेश्वर! मैं इस अवसर को संजोना चाहता हूँ, और मैं यकीन दिलाता हूँ कि अब मैं न तो कोई कुकर्म करूँगा, न ही बाधाएँ खड़ी करूँगा। अगर मैं अपने पुराने स्वभाव में लौटकर कलीसिया में बाधाएँ खड़ी करूँ, तो तुम्हारे दंड का भागी बनने को तैयार हूँ।”

कलीसिया लौटने के बाद, मैं जल्दी ही अपना कर्तव्य निभाने लगा। एक बार, कलीसिया अगुआ ने मेरे लिए मेजबानी का कर्तव्य निभाने की व्यवस्था की। मैंने मन-ही-मन सोचा, “वे मुझसे यह काम कैसे करवा सकते हैं? क्या यह काम उन लोगों का नहीं है जो बुजुर्ग हो चुके हैं? अगर भाई-बहनों को पता चला तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे?” मेरे मन में अगुआ को लेकर कुछ विचार आए और लगा कि वे मामूली सा काम देकर मेरी प्रतिभा बर्बाद कर रहे हैं। लेकिन फिर मैंने परमेश्वर के इन वचनों को पढ़ा : “जब परमेश्वर यह अपेक्षा करता है कि लोग अपने कर्तव्य को अच्छे से निभाएँ तो वह उनसे एक निश्चित संख्या में कार्य पूरे करने या किसी महान उपक्रम को संपन्न करने को नहीं कह रहा है, और न ही वह उनसे किन्हीं महान उपक्रमों का निर्वहन करवाना चाहता है। परमेश्वर बस इतना चाहता है कि लोग जमीनी तरीके से वह सब करें, जो वे कर सकते हैं, और उसके वचनों के अनुसार जिएँ। परमेश्वर यह नहीं चाहता कि तुम कोई महान या उत्कृष्ट व्यक्ति बनो, न ही वह चाहता है कि तुम कोई चमत्कार करो, न ही वह तुममें कोई सुखद आश्चर्य देखना चाहता है। उसे ऐसी चीजें नहीं चाहिए। परमेश्वर बस इतना चाहता है कि तुम मजबूती से उसके वचनों के अनुसार अभ्यास करो। जब तुम परमेश्वर के वचन सुनते हो तो तुमने जो समझा है वह करो, जो समझ-बूझ लिया है उसे क्रियान्वित करो, जो तुमने सुना है उसे अच्छे से याद रखो और जब अभ्यास का समय आए, तो परमेश्वर के वचनों के अनुसार ऐसा करो। उन्हें तुम्हारा जीवन, तुम्हारी वास्तविकताएँ और जो तुम लोग जीते हो, वह बन जाने दो। इस तरह, परमेश्वर संतुष्ट होगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, कर्तव्य के उचित निर्वहन के लिए सामंजस्यपूर्ण सहयोग आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों से मैंने समझा कि परमेश्वर को मुझसे बहुत महत्वपूर्ण काम कराने की जरूरत नहीं थी। वह मुझसे सिर्फ इतना चाहता था मैं एकदम व्यावहारिक तरीके से अपना कर्तव्य निभाऊँ। भले ही यह साधारण सा काम था, अगर मैंने परमेश्वर के वचनों पर ध्यान देकर उसकी अपेक्षाओं के अनुसार काम किया, तो यह काफी होगा। मैं अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार कर्तव्य नहीं निभा सकता था; मुझे कलीसिया के कार्य की जरूरतों के आधार पर काम करना था। मुझे कलीसिया की व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होकर चुपचाप अपना कर्तव्य अच्छे से करना होगा। अंतरात्मा और विवेक वाला इंसान ऐसे ही काम करता है। अब इस कर्तव्य ने मुझे प्रकट करके मेरी परीक्षा ली है। ऐसी परिस्थितयों के बिना, मैंने यही सोचा होता कि मैं परमेश्वर के प्रति बहुत समर्पित हूँ और मेरे अहंकारी स्वभाव के साथ-साथ प्रतिष्ठा और रुतबे के पीछे भागने की मेरी चाह पहले ही बदल चुकी है। वास्तव में, मैं अभी भी बहुत अहंकारी और दंभी था; मुझमें तीव्र महत्वाकांक्षाएँ और आकांक्षाएँ थी, मैं भीड़ में सबसे छोटा दिखने को तैयार नहीं था। यही मेरा असली आध्यात्मिक कद था। शुद्ध होकर बदलने के लिए, मुझे परमेश्वर के वचनों के न्याय और ताड़ना के साथ-साथ परीक्षणों और शोधन का अनुभव करने की भी जरूरत थी। यह एहसास होने पर मैंने इस कर्तव्य को स्वीकार लिया। भले ही मैं खाना बनाना नहीं जानता था, मगर अपना कर्तव्य करते हुए लगन से सब सीख सकता था और सिद्धांतों के अनुसार भाई-बहनों की मेजबानी कर सकता था। ऐसा करके मेरे दिल को शांति मिली। मुझे बचाने के लिए परमेश्वर का धन्यवाद!

पिछला: 8. मैं अब अपने बेटे से ज्यादा अपेक्षाएँ नहीं रखती

अगला: 10. मेरी सतर्कता और गलतफहमी दूर हो गई

परमेश्वर के बिना जीवन कठिन है। यदि आप सहमत हैं, तो क्या आप परमेश्वर पर भरोसा करने और उसकी सहायता प्राप्त करने के लिए उनके समक्ष आना चाहते हैं?

संबंधित सामग्री

32. एक महत्वपूर्ण खोज

लेखिका: फांगफांग, चीनमेरे परिवार के सब लोग प्रभु यीशु में विश्वास रखते हैं। मैं कलीसिया में एक साधारण विश्वासी थी और मेरे डैड कलीसिया में...

45. खोया फिर पाया

लेखिका: शियेली, अमेरिकामैं एक खुशनुमा शानदार जीवन-स्तर की तलाश में अमेरिका आया। शुरू के कुछ सालों में तो काफी दिक्कतों का सामना करना पड़ा,...

48. मौत के कगार से जीवन में वापसी

यांग मेई, चीन2007 में मैं अचानक गुर्दे फेल होने की लंबी बीमारी से ग्रस्त हो गई। जब मेरी ईसाई माँ और भाभी तथा कुछ कैथोलिक दोस्तों ने यह खबर...

परमेश्वर का प्रकटन और कार्य परमेश्वर को जानने के बारे में अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन मसीह-विरोधियों को उजागर करना अगुआओं और कार्यकर्ताओं की जिम्मेदारियाँ सत्य के अनुसरण के बारे में सत्य के अनुसरण के बारे में न्याय परमेश्वर के घर से शुरू होता है अंत के दिनों के मसीह, सर्वशक्तिमान परमेश्वर के अत्यावश्यक वचन परमेश्वर के दैनिक वचन सत्य वास्तविकताएं जिनमें परमेश्वर के विश्वासियों को जरूर प्रवेश करना चाहिए मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ राज्य का सुसमाचार फ़ैलाने के लिए दिशानिर्देश परमेश्वर की भेड़ें परमेश्वर की आवाज को सुनती हैं परमेश्वर की आवाज़ सुनो परमेश्वर के प्रकटन को देखो राज्य के सुसमाचार पर अत्यावश्यक प्रश्न और उत्तर मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 1) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 2) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 3) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 4) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 5) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 6) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 7) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 8) मसीह के न्याय के आसन के समक्ष अनुभवात्मक गवाहियाँ (खंड 9) मैं वापस सर्वशक्तिमान परमेश्वर के पास कैसे गया

सेटिंग

  • इबारत
  • कथ्य

ठोस रंग

कथ्य

फ़ॉन्ट

फ़ॉन्ट आकार

लाइन स्पेस

लाइन स्पेस

पृष्ठ की चौड़ाई

विषय-वस्तु

खोज

  • यह पाठ चुनें
  • यह किताब चुनें

WhatsApp पर हमसे संपर्क करें