30. मैंने प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करना कैसे बंद किया

रोज, फिलीपींस

फरवरी 2021 में, मुझे कलीसिया अगुआ चुना गया। एक दिन, एक उच्च अगुआ ने मुझसे कहा कि बहन एस्तेर में अच्छी काबिलियत है, वह अपने कर्तव्यों में बहुत सक्रिय है और मुझे उसे विकसित करना है। उच्च अगुआ को यह कहते हुए सुनकर मैं थोड़ी चिंतित हो गई, सोचने लगी कि शायद बहन एस्तेर जल्द ही अपने कर्तव्यों में मुझसे बेहतर करने लगेगी। अगर उच्च अगुआ और भाई-बहन सभी उसे अधिक महत्व देने लगे, तो मुझे शायद नजरअंदाज कर दिया जाएगा और भविष्य में कलीसिया के मामलों के लिए कोई मेरे पास नहीं आएगा। बाद में, भले ही मैंने एस्तेर को बताया कि कलीसिया का कार्य कैसे करना है, मैंने उसके साथ कलीसिया की स्थिति के सभी वास्तविक विवरण साझा नहीं किए और मैंने उसे इस बारे में विस्तृत संगति नहीं दी कि कार्य को अच्छी तरह से कैसे किया जाए। मैंने देखा कि एस्तेर अपने कर्तव्यों में सक्रिय थी। उसने जल्दी ही काम से खुद को परिचित कर लिया और उसके कर्तव्यों के नतीजे बेहतर से बेहतर होते गए। उसे भाई-बहनों से प्रशंसा मिली और उच्च अगुआओं ने भी इस पर ध्यान दिया। जल्द ही, एस्तेर को कलीसिया अगुआ चुन लिया गया और उसने कलीसिया के कार्य में मेरे साथ सहयोग करना शुरू कर दिया। चूँकि मैं मध्य पूर्व में थी और फिलीपींस के साथ समय का अंतर था, भाई-बहनों को मुझसे संपर्क करने में मुश्किल होती थी, इसलिए वे सभाओं की मेजबानी करने के लिए हमेशा एस्तेर से संपर्क करते थे। मैं उसे हर सभा में देखती थी और वह अपने कर्तव्यों में वाकई सक्रिय थी। मुझे उससे बहुत ईर्ष्या हुई, मुझे चिंता थी कि भाई-बहन उसे मुझसे अधिक सक्रिय और सक्षम समझेंगे और कि वह मुझसे अधिक काम कर सकती है, जिससे वे मुझसे ज्यादा उसे महत्व देंगे। मैंने सोचा, “भविष्य में, मैं कलीसिया के कार्य के अपने कुछ अनुभव उसके साथ तुरंत साझा नहीं कर सकती। वह पहले से ही कलीसिया के कार्य और कुछ सत्यों के बारे में बहुत कुछ समझती है, इसलिए अगर मैं उसे वह सब कुछ बता दूँ जो मैं समझती हूँ, तो एक दिन, वह कलीसिया के कार्य को मुझसे बेहतर समझेगी और इसे मुझसे बेहतर करेगी। तब भाई-बहन मुझसे ज्यादा उसे पसंद करेंगे और सराहेंगे, उच्च अगुआ भी उसे अधिक महत्व देंगे और सोचेंगे कि अब मुझे विकसित करना उतना सार्थक नहीं रहा।” नतीजतन, मैं एस्तेर को विकसित नहीं करना चाहती थी। जैसे-जैसे दिन बीतते गए, एस्तेर अपने कर्तव्यों में और अधिक सक्रिय हो गई। उसने और अधिक काम किया, हर बार जब मैं उसके साथ होती थी, तो मैं खुद को अक्षम और हतोत्साहित महसूस करती थी।

एक बार, क्योंकि बहुत से नवागंतुक कलीसिया में शामिल हुए थे, इसलिए हमें और अधिक छोटे सभा समूह बनाने की जरूरत थी। एस्तेर और मैंने इस कार्य पर अलग-अलग काम किया। देखने में लग रहा था कि हम दोनों बहनें अच्छी तरह मिलकर काम कर रही हैं। लेकिन मैंने उसे यह नहीं बताया कि इस कार्य की व्यवस्था जल्दी करने की जरूरत है, मैं बस अपना काम करने में ही व्यस्त रही। मैंने सोचा, “अगर मैं और अधिक समूह बना सकती हूँ और अधिक लोगों के लिए सभाओं में शामिल होने की व्यवस्था कर सकती हूँ, तो मुझे भाई-बहनों से प्रशंसा मिलेगी।” जब मैंने एस्तेर से उसके कार्य की प्रगति के बारे में पूछा, उसने मुझे बताया कि क्योंकि उसका कार्यभार अधिक था, इसलिए वह उन और अधिक लोगों पर ध्यान नहीं दे पाई थी जिन्हें सभा करने की जरूरत थी। लेकिन मैंने उसकी कोई मदद नहीं की। जब उच्च अगुआओं ने मुझसे एस्तेर के कार्य के बारे में पूछा, मैंने यहाँ तक कह दिया कि उसने अपने अधिक कार्यभार के बारे में शिकायत की थी। उच्च अगुआ मेरी बात से सहमत लग रहे थे और मुझे बहुत खुशी हुई। मुझे लगा कि उनकी नजरों में एस्तेर का मूल्य कम हो गया है, वे अब यह नहीं सोचेंगे कि उसमें अच्छी कार्य क्षमताएँ हैं। एक और बार, जब एस्तेर ने एक समूह के लिए सभा की मेजबानी की, एक नवागंतुक को परमेश्वर के कार्य और प्रकटन के बारे में कुछ धारणाएँ थीं। एस्तेर ने मुझे बताया कि वह इन धारणाओं को हल करने के लिए संगति करना नहीं जानती। मैं वास्तव में जानती थी कि उन्हें हल करने के लिए किन सत्यों पर संगति करने की जरूरत है, लेकिन मैं नहीं चाहती थी कि वह और सीखे। मैंने सोचा, “तुम पहले से ही अच्छा कर रही हो। अगर तुम और सीखती हो और इस मुद्दे को हल कर सकती हो, तो सभी भाई-बहन तुम्हारी प्रशंसा करेंगे। मैं नहीं चाहती कि हर कोई तुम्हारी प्रशंसा करे। भले ही हम दोनों कलीसिया अगुआ हैं, मैं पहले अगुआ बनी थी और मैं सबसे अच्छी बनना चाहती हूँ। अगर तुम लोगों की हर समस्या हल कर सकती हो, तो भाई-बहन सोचेंगे कि तुम्हारा कार्य मेरे कार्य से अधिक प्रभावी है। तो फिर मैं काम कैसे जारी रख सकती हूँ?” इसलिए, मैंने उसे यह नहीं बताया कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए। इसके बजाय, मैंने बस उसे उच्च अगुआओं से पूछने के लिए कह दिया। मैंने सोचा कि इस तरह उच्च अगुआ यह नहीं सोचेंगे कि वह सत्य समझती है और इसलिए वे अब उसे उतना महत्व नहीं देंगे। ऐसा करने के बाद मुझे सच में अपराध-बोध हुआ, लेकिन मैंने फिर भी उसकी मदद नहीं की, केवल जब उच्च अगुआओं ने मुझसे उसकी मदद करने के लिए कहा, तभी मैंने आखिरकार उसे बताया कि इस समस्या को कैसे हल किया जाए।

मुझे लगा कि मैं सच में कठोर दिल हो गई थी। मैं सच में एस्तेर से ईर्ष्या नहीं करना चाहती थी, लेकिन मैं खुद पर नियंत्रण नहीं रख सकी। मैं अपने क्रियाकलापों से दुखी थी और मैं जानती थी कि मेरी दशा बहुत खराब है। अपनी समस्या का एहसास होने के बाद, मैंने आत्मचिंतन करने और खुद को समझने के लिए सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचन पढ़े। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “कलीसिया का अगुआ होने के नाते तुम्‍हें समस्याएँ सुलझाने के लिए केवल सत्य का प्रयोग सीखने की आवश्‍यकता ही नहीं है, बल्कि प्रतिभाशाली लोगों का पता लगाने और उन्‍हें विकसित करना सीखने की आवश्‍यकता भी है, जिनसे तुम्‍हें बिल्कुल ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए या जिनका बिल्कुल दमन नहीं करना चाहिए। इस तरह अभ्यास करना कलीसिया के कार्य के लिए लाभकारी है। अगर तुम अपने साथ सहयोग करने और हर एक काम अच्छे से करने के लिए सत्य का अनुसरण करने वाले कुछ लोगों को विकसित कर सकते हो और अंत में उन सबके पास अनुभवजन्‍य गवाहियाँ होती हैं तो फिर तुम एक मानक स्तर के अगुआ या कार्यकर्ता हो। यदि तुम हर चीज सिद्धांतों के अनुसार सँभाल सको, तो तुम समर्पित इंसान हो। कुछ लोग हमेशा इस बात से डरे रहते हैं कि दूसरे लोग उनसे बेहतर और ऊपर हैं, अन्‍य लोगों को पहचान मिलेगी, जबकि उन्हें अनदेखा किया जाता है, और इसी वजह से वे दूसरों पर हमला करते हैं और उन्हें अलग कर देते हैं। क्या यह प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करने का मामला नहीं है? क्या यह स्‍वार्थपूर्ण और निंदनीय नहीं है? यह कैसा स्वभाव है? यह एक क्रूर स्वभाव है। जो लोग दूसरों के बारे में सोचे बिना या परमेश्वर के घर के हितों को ध्‍यान में रखे बिना केवल अपने हितों के बारे में सोचते हैं, जो केवल अपनी स्‍वार्थपूर्ण इच्छाओं को संतुष्ट करते हैं, वे बुरे स्वभाव वाले होते हैं और परमेश्वर उन्हें पसंद नहीं करता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं बहुत व्यथित हो गई। मुझे एहसास हुआ कि मैं प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करने वाली व्यक्ति हूँ। जब उच्च अगुआओं ने मुझसे एस्तेर को विकसित करने के लिए कहा, मैंने देखा कि उसमें प्रतिभा है, वह अच्छी तरह से सभाओं की मेजबानी करना जानती है और उसके कार्य के नतीजे अच्छे हैं, इसलिए मुझे उससे ईर्ष्या होने लगी। मुझे डर था कि वह मुझसे आगे निकल जाएगी और भाई-बहन उसकी प्रशंसा करेंगे, मुझे चिंता थी कि ऊपरी अगुआ उसे महत्व देंगे और इसलिए वे मुझे विकसित करना बंद कर देंगे। एस्तेर को अपना कर्तव्य अच्छी तरह से करने के लिए पदोन्नत और विकसित होने से रोकने के लिए, मैंने उसे दबाया। मैं अच्छी तरह जानती थी कि उसमें अच्छी काबिलियत है, लेकिन मैंने उसे विकसित नहीं किया और मैंने उसे यह नहीं बताया कि कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कैसे किया जाए। मैं बस अकेली ही वह व्यक्ति बनना चाहती थी जिसका आदर किया जाए। जब वह भाई-बहनों की समस्याएँ हल नहीं कर सकी, भले ही मैं जानती थी कि उन्हें कैसे हल करना है, फिर भी मैंने उसे नहीं बताया। ऊपर से तो मैं उसे उच्च अगुआओं से पूछने के लिए प्रोत्साहित कर रही थी, लेकिन वास्तव में ऐसा करके मैं उच्च अगुआओं पर उसका बुरा प्रभाव डालना चाहती थी और चाहती थी कि वे सोचें कि वह सत्य नहीं समझती और इस कर्तव्य को पूरा करने की क्षमता नहीं रखती। मैं सचमुच कुटिल, धोखेबाज, स्वार्थी और नीच थी! कलीसिया अगुआ के रूप में, प्रतिभाशाली लोग मिलने पर मुझे उन्हें विकसित करना चाहिए था और कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से करने में उनकी मदद करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए थी। लेकिन मैंने परमेश्वर के इरादे पर विचार नहीं किया, न ही मैंने कलीसिया के कार्य पर विचार किया। मैंने केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए काम किया। प्रतिभा से ईर्ष्या करने की दशा में रहते हुए, मैंने प्रतिभाशाली व्यक्तियों को दबाया और एस्तेर को विकसित करने से इनकार कर दिया, यहाँ तक कि उम्मीद की कि वह कलीसिया के कार्य में असफल हो जाए। इन क्रियाकलापों के पीछे मैं एक दुर्भावनापूर्ण स्वभाव प्रकट कर रही थी। केवल दुर्भावनापूर्ण स्वभाव वाले ही अपने भाई-बहनों को दबाते हैं। सामान्य मानवता वाले लोग अपने भाई-बहनों को नुकसान नहीं पहुँचाते। उस समय मुझे एहसास हुआ कि मैं अपने कर्तव्य में एक शैतानी स्वभाव के अनुसार कार्य कर रही थी और यह परमेश्वर की नजरों में घृणित था। एस्तेर में अच्छी काबिलियत है और वह अपने कर्तव्य में सक्रिय है, उसे विकसित करने से कलीसिया का कार्य अधिक आसानी से हो जाता और कलीसिया के कार्य के सभी पहलुओं के नतीजे बेहतर होते। मुझे उससे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए थी; इसके बजाय मुझे उसे विकसित करना चाहिए था, उसके कर्तव्य में उसकी मदद करनी चाहिए थी, कलीसिया का कार्य जिम्मेदारी और लगन से करना चाहिए था। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं अब और अपने शैतानी स्वभाव के अनुसार कार्य नहीं करना चाहती। मैं अब और तुम्हारे खिलाफ विद्रोह या तुम्हारा विरोध नहीं करना चाहती। मैं तुम्हारे सामने पश्चात्ताप करना चाहती हूँ, अपनी बहन की मदद करना चाहती हूँ और उसके साथ मिलकर अपने कर्तव्य अच्छी तरह से करना चाहती हूँ।” मैंने बार-बार परमेश्वर से प्रार्थना की। उस दौरान मुझे अपने दिल में बहुत अपराध-बोध हुआ। मैंने खुद से कहा कि मुझे अब और एस्तेर से ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए—यह एक भ्रष्ट स्वभाव था जो परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करता। उसके बाद, मैंने सक्रिय रूप से एस्तेर की मदद करना शुरू कर दिया। मैं प्रतिदिन उसके साथ संवाद करती और धीरे-धीरे उसे मार्गदर्शन देती कि कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से कैसे किया जाए ताकि वह प्रगति कर सके। जब भी उच्च अगुआ मुझे उस कार्य के बारे में सूचित करते थे जिसे लागू करने की जरूरत होती थी, मैं एस्तेर के साथ चर्चा करती थी कि कार्य को कैसे किया जाना चाहिए। मैं अब इस बात से नहीं डरती थी कि वह मुझसे आगे निकल जाएगी, भाई-बहनों द्वारा उसकी प्रशंसा की जाएगी और वह मेरी वाहवाही लूट लेगी। जब हमने एक साथ अपने कर्तव्य किए, तो मैंने एस्तेर के साथ सामंजस्य से काम किया और मैंने पाया कि कई कार्य आसान हो गए, कलीसिया के कार्य के नतीजे भी बेहतर हुए।

बाद में, मैं कई कलीसियाओं के कार्य का पर्यवेक्षण कर रही थी, उच्च अगुआओं ने बहन मेलीन को एक कलीसिया में अपने कर्तव्य करने के लिए नियुक्त किया जिसका मैं पर्यवेक्षण कर रही थी। पहले तो वह सभाओं के दौरान बहुत कम बोलती थी और बहुत शांत रहती थी, लेकिन बाद में उसने बहुत अधिक संगति की और उसकी संगति बहुत अच्छी थी। मुझे उससे कुछ हद तक ईर्ष्या हुई और चिंता हुई क्योंकि वह लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास करती थी, अधिक सत्य समझती थी, कार्य के बारे में बहुत कुछ जानती थी और कार्य में अधिक अनुभव रखती थी। मैंने सोचा कि भाई-बहन निश्चित रूप से उसकी प्रशंसा और आदर करेंगे। मैं नहीं चाहती थी कि ऐसा हो। एक दिन, मैंने बहन मेलीन के साथ उन कई समूहों की स्थिति पर चर्चा की, जिनका वह पर्यवेक्षण कर रही थी, मैंने उससे पूछा कि भाई-बहन नियमित रूप से सभाओं में क्यों नहीं आ रहे हैं। उसने मुझे बताया कि वह इस मामले को देख रही है, लेकिन बहुत काम करने के बावजूद उसे अभी भी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या गलत है। यह सुनने के बाद मुझे लगा कि वह शिकायत कर रही है और मैंने सोचा कि उसमें कई कमियाँ हैं। जब उच्च अगुआ कार्य के बारे में पूछने आए, मैंने उनसे कहा, “मेलीन को शिकायत करना पसंद है और लगन से अपने कर्तव्य निभाने को तैयार नहीं है।” मैंने हमारी बातचीत के स्क्रीनशॉट भी अगुआओं को भेज दिए, यह चाहते हुए कि अगुआ सोचें कि वह शिकायत कर रही है और दूसरों की सलाह मानने को तैयार नहीं है। मैं यह भी चाहती थी कि वे उसे नीची नजरों से देखें, मुझे अधिक महत्व दें और सोचें कि मुझे विकसित करना उससे ज्यादा सार्थक है। जब मैंने ये विचार प्रकट किए, तो मुझे एहसास हुआ कि मेरी दशा गलत थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और खोजा।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जब वे किसी ऐसे व्यक्ति को देखते हैं जो उनसे बेहतर है तो वे उसे नीचे गिराने की कोशिश करते हैं, उसके बारे में निराधार अफवाहें गढ़ते हैं या उसे बदनाम करने और उसकी प्रतिष्ठा कम करने के लिए कुछ घिनौने तरीके इस्तेमाल करते हैं—यहाँ तक कि उसे रौंदते हैं—ताकि लोगों के मन में अपनी जगह की रक्षा कर सकें। यह किस तरह का स्वभाव है? यह केवल अहंकार और दंभ नहीं है, यह शैतान का स्वभाव है, यह दुर्भावनापूर्ण स्वभाव है। इस व्यक्ति का अपने से बेहतर और श्रेष्ठतर लोगों पर हमला करना और उन्हें अलग-थलग करना कपटपूर्ण और दुष्टतापूर्ण है। इस व्यक्ति का लोगों को नीचे गिराने के लिए कोई कसर न छोड़ना यह दिखाता है कि उसके अंदर अच्छी-खासी दानवी प्रकृति है! शैतान के स्वभाव के अनुसार जीते हुए वह लोगों को कमतर दिखाता है, उन्हें फँसाने की कोशिश करता है और उन्हें सताता है। क्या यह कुकृत्य नहीं है? और इस तरह जीने के बावजूद उसे अभी भी यह लगता है कि वह ठीक है, एक अच्छा व्यक्ति है। लेकिन जब वह अपने से श्रेष्ठ किसी व्यक्ति को देखता है तो वह उसे सताता है और उसे पूरी तरह कुचलता है। यहाँ क्या मसला है? जो लोग ऐसे बुरे कर्म करते हैं, क्या वे निर्लज्ज और स्वेच्छाचारी नहीं हैं? ऐसे लोग केवल अपने हितों और अपनी भावनाओं का खयाल करते हैं और वे केवल अपनी इच्छाओं, महत्वाकांक्षाओं और अपने लक्ष्यों को पाना चाहते हैं। वे इस बात की परवाह नहीं करते कि कलीसिया के कार्य को कितना नुकसान पहुँचता है और वे लोगों के मन में अपने रुतबे की रक्षा के लिए और अपनी प्रतिष्ठा की रक्षा करने के लिए परमेश्वर के घर के हितों का बलिदान करना पसंद करेंगे। क्या ऐसे लोग अभिमानी और आत्मतुष्ट, स्वार्थी और नीच नहीं होते? ऐसे लोग अभिमानी और आत्मतुष्ट ही नहीं, बल्कि बेहद स्वार्थी और नीच भी होते हैं। वे परमेश्वर के इरादों को लेकर बिल्कुल विचारशील नहीं हैं। क्या ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल होता है? उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता। यही कारण है कि वे मनमाने ढंग से कार्य करते हैं और वही करते हैं जो करना चाहते हैं, उन्हें कोई अपराध-बोध नहीं होता, कोई भय नहीं होता, कोई भी आशंका या चिंता नहीं होती और वे परिणामों पर भी विचार नहीं करते। यही वे अक्सर करते हैं और इसी तरह उन्‍होंने हमेशा व्यवहार किया है। इस तरह के व्यवहार की प्रकृति क्या है? हल्‍के-फुल्‍के ढंग से कहें तो इस तरह के लोग बहुत अधिक ईर्ष्‍यालु होते हैं और उनमें अपनी निजी प्रतिष्ठा और रुतबे की बहुत प्रबल आकांक्षा होती है; वे बहुत धोखेबाज और धूर्त होते हैं। और अधिक कठोर ढंग से कहें तो समस्‍या का सार यह है कि इस तरह के लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता है। वे परमेश्वर से नहीं डरते हैं, वे अपने आपको अत्यंत महत्वपूर्ण मानते हैं और वे अपने बारे में हर चीज को परमेश्वर से भी ऊँचा और सत्य से भी ऊँचा मानते हैं। उनके दिलों में परमेश्वर उल्लेख के योग्य नहीं है और महत्वहीन है, उनके दिलों में परमेश्वर का कहीं कोई दर्जा नहीं होता है। जिनके हृदय में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं है और जिनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं है क्‍या वे सत्‍य का अभ्यास कर सकते हैं? बिल्कुल नहीं। इसलिए जब वे सामान्यतः उत्साहित होकर और ढेर सारे प्रयास खपाते हुए खुद को व्‍यस्‍त बनाये रखते हैं, तब वे क्‍या कर रहे होते हैं? ऐसे लोग यह तक दावा करते हैं कि उन्‍होंने परमेश्वर के लिए खपने की खातिर सब कुछ त्‍याग दिया है और बहुत अधिक पीड़ा सही है, लेकिन वास्‍तव में उनके सारे क्रियाकलापों का प्रयोजन, सिद्धांत और उद्देश्य खुद के रुतबे और प्रतिष्ठा के लिए हैं, अपने सारे हितों की रक्षा करने के लिए है। क्या तुम लोग ऐसे व्यक्ति को बहुत ही भयावह कहोगे कि नहीं कहोगे? किस तरह के लोगों में वर्षों तक परमेश्वर पर विश्वास करने के बाद भी परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं होता? क्या वे अहंकारी नहीं हैं? क्या वे शैतान नहीं हैं? और किन चीजों में परमेश्वर का भय मानने वाला दिल सबसे कम होता है? जानवरों के अलावा, बुरे लोगों और मसीह-विरोधियों में, दानवों और शैतान के जैसों में। वे सत्य को जरा-भी नहीं स्वीकारते; उनके पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल बिल्कुल नहीं होता। वे किसी भी बुराई को करने में सक्षम हैं; वे परमेश्वर के शत्रु हैं, और उसके चुने हुए लोगों के भी शत्रु हैं(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, पाँच शर्तें, जिन्हें परमेश्वर पर विश्वास के सही मार्ग पर चलने के लिए पूरा करना आवश्यक है)। परमेश्वर के वचनों ने मेरी असली दशा को उजागर कर दिया। मैं उन भाई-बहनों से ईर्ष्या करती थी जिनके कार्य के नतीजे मुझसे बेहतर थे, मैंने अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बनाए रखने के लिए उन पर हमला किया और उन्हें बहिष्कृत भी किया। भले ही मैं जानती थी कि वे परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपने कर्तव्य कर रहे थे, मैंने परमेश्वर के इरादों पर विचार नहीं किया। मैं परमेश्वर के इरादों पर विचार करके कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से करने के बजाय बस अपना कर्तव्य इस तरह से करना चाहती थी कि दूसरों से प्रशंसा पा सकूँ और वे मेरा आदर करें। जब मुझे एहसास हुआ कि मेलीन लंबे समय से परमेश्वर में विश्वास रखती आई है, उसमें काबिलियत और कार्य क्षमता है और यह भी कि उसे अपने कर्तव्य के प्रति दायित्व का गहरा एहसास है, तो मुझे उससे ईर्ष्या होने लगी और चिंता हुई कि वह मुझसे आगे निकल जाएगी। मैंने उच्च अगुआओं के सामने उसकी आलोचना की, यह कहते हुए कि वह हमेशा अपने कर्तव्य के बारे में शिकायत करती है, जबकि वास्तव में मेलीन ने बस मुझे यही बताया था कि उसे अपने कर्तव्य में कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और यह कि भले ही उसने बहुत कुछ किया, फिर भी वह मुद्दों को हल नहीं कर पाई। लेकिन मैंने उच्च अगुआओं से झूठ बोला, यह कहते हुए कि वह शिकायत कर रही है। मेरा लक्ष्य उच्च अगुआओं को यह सोचने पर मजबूर करना था कि वह विकसित किए जाने के लायक नहीं है और मेरा उद्देश्य अगुआओं के मन में उसकी छवि को खराब करना था। इस तरह अगुआ उसके बारे में ऊँचा नहीं सोचेंगे या उसे विकसित नहीं करेंगे और मुझे उसके आगे निकलने की चिंता नहीं करनी पड़ेगी। मैंने वास्तव में अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की खातिर अपनी बहन को बदनाम किया। मैं पूरी तरह से कुटिल और दुर्भावनापूर्ण थी! एक कलीसिया अगुआ के रूप में, मुझे अपने भाई-बहनों के साथ सामंजस्यपूर्ण ढंग से सहयोग करना चाहिए था, ताकि हम एक-दूसरे की कमियों को पूरा करते हुए और खूबियों को अपनाते हुए, अपनी जिम्मेदारियों और कर्तव्यों को पूरा कर सकें। मुझे अपने भाई-बहनों को प्रतिस्पर्धी नहीं मानना चाहिए था। लेकिन मैंने केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे की परवाह की। मैं बस अकेली ही वह व्यक्ति बनना चाहती थी जिसकी दूसरे प्रशंसा करें। ऊपर से तो ऐसा लगता था कि मुझे कलीसिया के कार्य के प्रति दायित्व का एहसास है, लेकिन मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल नहीं था। जब मैंने देखा कि मेलीन प्रतिभाशाली है, तो मुझे ईर्ष्या होने लगी और मैंने उसे मुझसे आगे नहीं निकलने दिया। अपने लक्ष्यों को हासिल करने के लिए, यह साफ-साफ जानते हुए भी कि उसे अपने कर्तव्य में मुश्किलें आ रही थीं, मैंने उसकी मदद तक नहीं की। मैं बस अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे को बचाने के लिए कलीसिया के कार्य को नुकसान पहुँचाने को भी तैयार थी। मैंने जो घमंडी और दुर्भावनापूर्ण स्वभाव प्रकट किया था, उससे मैं भयभीत थी। मैंने कलीसिया के कार्य पर विचार नहीं किया, बल्कि अपने ही उद्यम में लगी रही। इससे सचमुच परमेश्वर को घृणा हुई! मैंने सोचा कि राज्य का सुसमाचार कितनी तेजी से फैल रहा है, हर जगह इतनी सारी कलीसियाएँ स्थापित हो रही हैं, नवागंतुकों को सींचने और कलीसियाओं की अगुआई करने के लिए और अधिक लोगों की तत्काल आवश्यकता है। लेकिन मेरे विचार दुष्ट थे। मैंने केवल अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बचाने की कोशिश की, जब मैंने प्रतिभाशाली लोगों को देखा, तो मैंने न केवल उन्हें विकसित नहीं किया, बल्कि उन्हें बहिष्कृत किया और दबाया। मैं परमेश्वर का विरोध कर रही थी और सुसमाचार कार्य में गड़बड़ कर रही थी और बाधा डाल रही थी। अच्छी मानवता वाला व्यक्ति यह देखकर खुश होता कि और अधिक लोग कलीसिया के कार्य में सहयोग करने के लिए उठ खड़े हो रहे हैं, केवल मसीह-विरोधी और बुरे लोग ही जब दूसरों को खुद से अधिक सक्षम देखते हैं, तो वे खुद को खतरे में महसूस करते हैं, अपनी प्रतिष्ठा और रुतबे को बनाए रखने के लिए दूसरों पर हमला करते और उन्हें बहिष्कृत करते हैं। मेरे दिल में परमेश्वर के लिए कोई जगह नहीं थी, न ही मेरे पास परमेश्वर का भय मानने वाला दिल था। मैंने प्रतिष्ठा और रुतबे को बहुत अधिक महत्व दिया। अपनी महत्वाकांक्षाओं और इच्छाओं को पूरा करने के लिए, मैंने न केवल मेलीन की मदद नहीं की, बल्कि उसे दबाने के लिए तरकीबें भी इस्तेमाल कीं, जिससे उसके अपने कर्तव्यों को अच्छी तरह से करने की क्षमता प्रभावित हुई। जो स्वभाव मैंने प्रकट किया, वह एक मसीह-विरोधी का स्वभाव था। मैं परमेश्वर का प्रतिरोध कर रही थी। अगर मैं बिना पश्चात्ताप किए इसी तरह चलती रही, तो निश्चित रूप से परमेश्वर मुझे त्याग देगा। इसलिए मैंने परमेश्वर के सामने अपना दिल खोलकर रख दिया और उससे क्षमा माँगते हुए प्रार्थना की। मैंने परमेश्वर से मुझे प्रबुद्ध और रोशन करने के लिए भी कहा ताकि मैं उसके इरादे को समझ सकूँ और अभ्यास का मार्ग खोज सकूँ।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा : “अगर तुम परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशीलता दिखाने में वाकई समर्थ हो तो तुम दूसरे लोगों से निष्पक्ष ढंग से पेश आने में सक्षम होगे। अगर तुम किसी अच्छे व्यक्ति की सिफारिश करते हो और उसे प्रशिक्षित होने और कोई कर्तव्य निर्वहन करने देते हो, और इस तरह एक प्रतिभाशाली व्यक्ति को परमेश्वर के घर में शामिल करते हो, तो क्या उससे तुम्‍हारा काम और आसान नहीं हो जाएगा? तब क्या तुम अपने कर्तव्‍य में समर्पित नहीं होगे? यह परमेश्वर के समक्ष एक अच्छा कर्म है; यह वह न्यूनतम अंतरात्मा और विवेक है जो अगुआ के रूप में कार्य करने वालों के पास होना चाहिए। जो लोग सत्य को अभ्‍यास में लाने में समर्थ हैं वे जो चीजें करते हैं उनमें परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार कर सकते हैं। परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार करते हो तो तुम्‍हारा हृदय सही हो जाएगा। यदि तुम हमेशा दूसरों को दिखाने के लिए ही चीजें करते हो और हमेशा दूसरों की प्रशंसा और सराहना प्राप्त करना चाहते हो और परमेश्वर की जाँच-पड़ताल स्वीकार नहीं करते हो तो क्या तब भी परमेश्वर तुम्‍हारे हृदय में है? ऐसे लोगों में परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय नहीं होता। हमेशा अपने लिए कार्य मत करो, हमेशा अपने हितों की मत सोचो, अपने गौरव, प्रतिष्ठा और रुतबे पर विचार मत करो और अपने निजी हितों पर विचार मत करो। तुम्‍हें सबसे पहले परमेश्वर के घर के हितों पर विचार करना चाहिए और उन्‍हें अपनी प्राथमिकता बनाना चाहिए। तुम्‍हें परमेश्वर के इरादों के प्रति विचारशील होना चाहिए और सबसे पहले यह चिंतन करना चाहिए कि तुम्‍हारे कर्तव्‍य निर्वहन में अशुद्धियाँ रही हैं या नहीं, तुम समर्पित रहे हो या नहीं, तुमने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी की हैं या नहीं, और अपना सर्वस्व दिया है या नहीं, साथ ही तुम अपने कर्तव्य, और कलीसिया के कार्य के प्रति पूरे दिल से विचार करते रहे हो या नहीं। तुम्‍हें इन चीजों के बारे में अवश्‍य विचार करना चाहिए। अगर तुम इन पर बार-बार विचार करते हो और इन्हें समझ लेते हो, तो तुम्‍हारे लिए अपना कर्तव्‍य अच्‍छी तरह से निभाना आसान हो जाएगा(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपने भ्रष्ट स्वभावों को त्यागकर ही आजादी और मुक्ति पाई जा सकती है)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि एक कलीसिया अगुआ के रूप में मुझे अपने कर्तव्यों में परमेश्वर के इरादे पर विचार करना चाहिए, हमेशा कलीसिया के कार्य को पहले रखना चाहिए। जब मैं अच्छी काबिलियत और कार्य क्षमता वाले भाई-बहनों को देखती हूँ, तो मुझे अपनी प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे की खातिर उनसे ईर्ष्या नहीं करनी चाहिए या उन्हें बहिष्कृत नहीं करना चाहिए, बल्कि उनकी सिफारिश करनी चाहिए और उन्हें विकसित करना चाहिए, उनके कर्तव्यों को पूरा करने में उनकी मदद करनी चाहिए ताकि वे तेजी से प्रगति कर सकें। यह मेरा कर्तव्य और जिम्मेदारी थी। मुझे परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास करना चाहिए, प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे के बंधन से, साथ ही ईर्ष्या से मुक्त होना चाहिए, अपने हितों को अलग रखकर, सच्चे मन से भाई-बहनों को विकसित करना चाहिए और परमेश्वर को संतुष्ट करने के लिए अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। परमेश्वर का इरादा समझने के बाद, मैंने अपने इरादों को सुधारना शुरू कर दिया और मैं खुद को याद दिलाती रही कि परमेश्वर ईर्ष्या से घृणा करता है। मेलीन के साथ फिर से कार्य पर चर्चा करते हुए मैंने उसकी बात सुनने के लिए खुद को शांत किया, मैंने उसकी किसी भी कठिनाई में उसकी देखभाल करने और मदद करने की पूरी कोशिश की, मैंने अपने समान अनुभवों के बारे में संगति की। मैं अपने काम से सीखे अच्छे तरीके भी साझा करती थी। इस तरह से अभ्यास करके मुझे सच में शांति महसूस हुई और कार्य से जल्दी ही अच्छे नतीजे मिले।

एक बार मेलीन ने मुझे एक संदेश भेजा जिसमें कहा गया था कि वह बहुत परेशान है क्योंकि कुछ नवागंतुक अभी भी नियमित रूप से सभाओं में शामिल नहीं हो रहे हैं। उसका संदेश देखकर मुझे अपराध-बोध हुआ, क्योंकि इसने मुझे उस समय की याद दिला दी जब मैं उससे ईर्ष्या करती थी। उस समय, जब उसे अपने कर्तव्यों में कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, तो मैंने न केवल उसकी मदद नहीं की, बल्कि मैंने अगुआओं के सामने उसकी आलोचना भी की, यह कहते हुए कि वह अपना कर्तव्य करते समय हमेशा शिकायत करती है। मेरे स्वार्थ ने उसे बहुत ठेस पहुँचाई थी। उस दिन से, मैं अक्सर उसे दिलासा देती और प्रोत्साहित करती थी, मैं उसे चिंता न करने के लिए कहती और सक्रिय रूप से उसके साथ काम करती थी। मुझे अब इस बात की परवाह नहीं थी कि क्या उसके कर्तव्यों के नतीजे मुझसे बेहतर हैं या वह मुझसे ज्यादा अलग दिखने लगी है। जल्द ही, मेलीन को सुसमाचार कार्य का पर्यवेक्षण करने के लिए चुन लिया गया, मेरे साथ मिलकर वह कलीसियाओं के सुसमाचार कार्य का जायजा लेने के लिए जिम्मेदार होगी। जब भी सुसमाचार कार्य में समस्याएँ या कठिनाइयाँ होती थीं, हम एक साथ समाधानों पर चर्चा किया करते हैं और अक्सर दिल खोलकर बात करते हैं। मुझे अब उससे ईर्ष्या महसूस नहीं होती है और अब हमारे बीच कोई बाधा नहीं है। तब से, मेरा दिल हल्का महसूस हुआ है। अपने अनुभव में, मुझे एहसास हुआ कि मुझे वास्तव में प्रतिष्ठा और रुतबे की अपनी इच्छा को छोड़ना होगा, क्योंकि तभी मैं परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकती हूँ। मैं अब और भाई-बहनों के साथ प्रतिष्ठा और रुतबे के लिए प्रतिस्पर्धा नहीं करना चाहती थी, क्योंकि मैं जानती थी कि मैं जितना अधिक प्रतिष्ठा और रुतबे का अनुसरण करूँगी, उतना ही मैं परमेश्वर से दूर भटक जाऊँगी। ऐसा करके मैं केवल भ्रष्ट स्वभाव में ही जियूँगी और मैं कलीसिया का कार्य अच्छी तरह से नहीं कर पाऊँगी या अपने कर्तव्यों को पूरा नहीं कर पाऊँगी। उसके बाद जब भी कलीसिया में नवागंतुकों को विकसित किए जाने की जरूरत होती, मैं उनकी मदद करने की पूरी कोशिश करती थी। भले ही कभी-कभी मैं अभी भी ईर्ष्या प्रकट करती हूँ, लेकिन मैं खुद से घृणा करती हूँ। मैं अपना दिल शांत करती हूँ और परमेश्वर से प्रार्थना करती हूँ, मैं परमेश्वर से अपने दिल की रक्षा करने के लिए कहती हूँ ताकि मैं अब और भ्रष्ट विचारों से बाधित न होऊँ। इस तरह प्रार्थना करने के बाद, मेरे दिल को शांति मिली, मुझे अब दूसरों से ईर्ष्या नहीं होती या उनके मुझसे आगे निकल जाने का डर नहीं है, मैं बस अपने भाई-बहनों की मदद करना चाहती हूँ, उनके साथ अच्छी तरह से सहयोग करना चाहती हूँ और अपने कर्तव्यों को पूरा करना चाहती हूँ।

यह सर्वशक्तिमान परमेश्वर के वचनों का मार्गदर्शन ही था जिसने मुझे प्रतिभाशाली लोगों से ईर्ष्या करने के अपने भ्रष्ट स्वभाव का एहसास कराया और यह जानने में मदद की कि परमेश्वर मेरे जैसे लोगों से घृणा करता है। मैं अब अपनी देह के खिलाफ विद्रोह कर सकती हूँ और परमेश्वर के वचनों के अनुसार अभ्यास कर सकती हूँ, सच्चे मन से अपने भाई-बहनों की मदद कर सकती हूँ और उन्हें सहारा दे सकती हूँ, ऐसे काम कर सकती हूँ जो कलीसिया के कार्य और मेरे भाई-बहनों को लाभ पहुँचाते हैं। यह सब परमेश्वर का उद्धार है।

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