36. अपना कर्तव्य अच्छे से निभाना परमेश्वर द्वारा सौंपा गया मिशन है

चिंगतियान, चीन

मेरे परिवार की आर्थिक हालत बहुत अच्छी नहीं थी। जब मैं बहुत छोटी थी, तो मेरे पिता मुझे और मेरे छोटे भाई को स्कूल भेजने के लिए पैसे कमाने के लिए घर से दूर काम करते थे। वे बहुत कम खर्च करते थे और बीमार होने पर भी आराम नहीं करते थे। अपनी छोटी और नासमझ उम्र में, मुझे लगता था कि मेरे पिता ने हमें पालने के लिए बहुत दुख उठाए हैं, इसलिए मैंने ठान लिया था कि बड़ी होकर मैं अपने पिता के प्रति संतानोचित बनूँ। हालाँकि मैं छोटी थी, फिर भी मैं जितना हो सकता था, अपने माता-पिता के कामों में मदद करती थी, घर पर कपड़े धोती, खाना बनाती और अपने भाई की देखभाल करती थी, और हमारे पड़ोसी मेरी तारीफ करते हुए कहते थे, “यह लड़की कितनी समझदार और मेहनती है!” जब मैं बड़ी हुई, तो मैं हर महीने अपनी कमाई में से बस थोड़े से पैसे अपने खर्च के लिए रखती और बाकी अपने माता-पिता को दे देती थी, और मैं अक्सर अपने माता-पिता के लिए कपड़े, खाना और दूसरी जरूरी चीजें भी खरीदती थी। कभी-कभी मेरे पिता मेरे खरीदे हुए नए कपड़े पहनते और खुशी-खुशी रिश्तेदारों और पड़ोसियों से कहते, “देखो, देखो मेरी बेटी मेरे लिए क्या लाई है!” अपने माता-पिता को इतना खुश देखकर मुझे भी खुशी होती थी।

2009 में, मैंने परमेश्वर को पाया और आखिरकार कलीसिया में एक कर्तव्य जिम्मा ले लिया। उस समय, जहाँ मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, वह जगह घर के पास थी, इसलिए मैं अक्सर अपने माता-पिता से मिलने जा पाती थी। 2013 तक, सीसीपी की पुलिस को परमेश्वर में मेरे विश्वास के बारे में पता चल गया और वे मुझे गिरफ्तार करने मेरे घर आ गए, जिसके बाद मैं घर नहीं जा सकी। नवंबर 2017 में, मुझे पता चला कि मेरे पिता का कार एक्सीडेंट हो गया है और उनकी कलाई टूट गई है। यह सुनकर, मैं बेचैन हो गई, और मैं अपने पिता को देखने घर जाना चाहती थी। मैंने यह भी सुना कि जिस ड्राइवर ने उन्हें टक्कर मारी थी, उसने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया, और उन्हें अदालत जाना पड़ेगा। मैं बहुत चिंतित थी, सोचने लगी, “मेरा भाई घर पर नहीं है, और मेरी माँ को मेरे पिता की देखभाल करने के साथ-साथ इन सब चीजों को भी सँभालना है। क्या वह यह सब सँभाल पाएगी? अगर मैं घर पर होती, तो मैं अपने पिता की देखभाल में मदद कर सकती थी, लेकिन घर में इतनी बड़ी घटना होने के बावजूद मैं उनका बोझ नहीं बाँट सकती।” मुझे लगा जैसे मैंने उनके कर्ज तले बिल्कुल दबी हूँ, और मैं सच में घर जाकर अपने पिता की देखभाल करना चाहती थी, लेकिन मुझे गिरफ्तार होने का डर था, इसलिए मैंने बिना सोचे-समझे वापस जाने की हिम्मत नहीं की। लेकिन मैंने सोचा, “अगर मैं अस्पताल में अपने पिता से मिलने नहीं गई, तो क्या मेरे रिश्तेदार और दोस्त मुझे इंसानियत और जमीर की कमी के लिए नहीं कोसेंगे?” मैं बहुत परेशान थी और बस घर वापस जाना चाहती थी। इसलिए मैंने अपने काम खत्म करने के लिए ओवरटाइम काम किया, और बारहवें चंद्र महीने की 29 तारीख को मैं खतरा मोल लेकर घर के लिए निकली।

जब तक मैं घर पहुँची, मेरे पिता को अस्पताल से छुट्टी मिल चुकी थी, और जब मैंने अपने पिता को अच्छी तरह से ठीक होते देखा, तो आखिरकार मुझे सुकून मिला। मेरे पिता मुझे देखकर बहुत खुश हुए, लेकिन कुछ ही देर बाद, उनका चेहरा चिंता से घिर गया क्योंकि कुछ घंटे पहले ही पुलिस ने मेरे पिता को फोन किया था, और उनसे परमेश्वर में मेरी आस्था के बारे में पूछताछ करने के लिए हमारे गृहनगर लौटने को कहा था। पुलिस के उत्पीड़न का सामना करते हुए, हमारा परिवार बहुत दमित और असहाय महसूस कर रहा था। मेरे पिता के जाने के बाद, मेरी माँ ने मुझे बताया कि पुलिस स्टेशन साल में कई बार मेरे बारे में पूछताछ करने के लिए घर फोन करता रहा है, और वे अक्सर मेरे दादा-दादी के घर जाकर उन्हें परेशान करते थे। उन्होंने यह भी बताया कि हर नए साल और छुट्टियों में पुलिस पूछती थी कि क्या मैं घर आई हूँ। अपनी माँ से यह सुनकर मुझे बहुत गुस्सा आया। मुझे उम्मीद नहीं थी कि मेरे घर छोड़ने के बाद से पुलिस इतने सालों से मुझे ढूँढ़ रही होगी, और वे नए साल पर भी मेरे माता-पिता को परेशान करेंगे। लेकिन साथ ही, मुझे डर था कि पुलिस मुझे घर पर गिरफ्तार करने आ जाएगी, और घर पर बिताए दो दिनों में मैं हर समय सहमी हुई थी। मैं अपने पिता के वापस आने का इंतजार करना चाहती थी ताकि मैं उनसे फिर से मिल सकूँ, लेकिन तीसरे दिन तक भी वे वापस नहीं आए। मुझे बहुत बेचैनी हो रही थी, और मुझे लगा कि मैं जितने ज्यादा दिन घर पर रहूँगी, खतरा उतना ही बढ़ता जाएगा, इसलिए मैं जल्दी से चली गई। जब मैं वापस उस जगह पहुँची जहाँ मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, तो मैं घर पर हुई घटनाओं के बारे में सोचती रही और शांत नहीं हो पा रही थी। मैंने सोचा, “दूसरे लोगों के बच्चे नए साल पर अपने माता-पिता से मिलने घर जाते हैं, और वे उनके लिए कुछ पौष्टिक चीजें लाते हैं, और उनके साथ घर-परिवार की बातें करते हैं और दिल की बात करते हैं, लेकिन मैं मुश्किल से ही घर जा पाती हूँ और अपने माता-पिता के साथ ज्यादा समय नहीं बिता सकती। ऊपर से, पुलिस मेरी वजह से उन्हें परेशान करती रहती है। मुझे यह भी नहीं पता कि जब मेरे पिता वापस जाएँगे तो पुलिस उनके साथ कैसा व्यवहार करेगी।” मुझे बहुत दुख हुआ। हालाँकि मैं अपना कर्तव्य निभा रही थी, लेकिन जब भी मैं अपने माता-पिता के बारे में सोचती, तो मेरा मन बेचैन हो जाता।

बाद में मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा, और मेरी दशा में थोड़ा सुधार हुआ। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “कुछ माता-पिताओं को ऐसा आशीष मिला होता है और ऐसी नियति होती है कि वे घर-परिवार का आनंद लेते हुए एक बड़े और समृद्ध परिवार की खुशियाँ भोगें। यह परमेश्वर की संप्रभुता है और परमेश्वर से मिला आशीष है। कुछ माता-पिताओं की नियति ऐसी नहीं होती; परमेश्वर ने उनके लिए ऐसी व्यवस्था नहीं की होती। उन्हें एक खुशहाल परिवार का आनंद लेने, या अपने बच्चों को अपने साथ रखने का आनंद लेने का सौभाग्य प्राप्त नहीं है। यह परमेश्वर का आयोजन है और लोग इसे जबरदस्ती हासिल नहीं कर सकते। चाहे कुछ भी हो, अंततः जब संतानोचित शील की बात आती है, तो लोगों को कम से कम समर्पण की मानसिकता रखनी चाहिए। यदि वातावरण अनुमति दे और तुम्हारे पास ऐसा करने के साधन हों, तो तुम अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित दायित्व निर्वाह दिखा सकते हो। अगर वातावरण उपयुक्त न हो और तुम्हारे पास साधन न हों, तो तुम्हें जबरन ऐसा करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए। इसे क्या कहते हैं? (समर्पण।) इसे समर्पण कहा जाता है। यह समर्पण कैसे आता है? समर्पण का आधार क्या है? यह परमेश्वर द्वारा व्यवस्थित और परमेश्वर द्वारा शासित इन सभी चीजों पर आधारित है। यद्यपि लोग चुनना चाह सकते हैं, लेकिन वे ऐसा नहीं कर सकते, उन्हें चुनने का अधिकार नहीं है, और उन्हें समर्पण करना चाहिए। जब तुम महसूस करते हो कि लोगों को समर्पण करना चाहिए और सब कुछ परमेश्वर द्वारा आयोजित है, तो क्या तुम्हें अपने हृदय में शांति महसूस नहीं होती? (हाँ।) क्या तुम्हारी अंतरात्मा तब भी धिक्कार का अनुभव करती रहेगी? उसे अब लगातार धिक्कार की अनुभूति नहीं होगी, और अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित दायित्वों का निर्वाह न कर पाने का विचार अब तुम पर हावी नहीं होगा। इतने पर भी कभी-कभी तुम्हें ऐसा महसूस हो सकता है क्योंकि मानवता में ये एक तरह से सामान्य विचार या सहज प्रवृत्ति है और कोई भी इससे बच नहीं सकता(वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, सत्य वास्तविकता क्या है?)। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि माता-पिता इस जीवन में अपने बच्चों के कारण कितना आशीष पाते हैं, और वे अपने बच्चों के लिए कितना दुख उठाते हैं, यह सब परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित है। कुछ माता-पिता जीवन भर अपने बच्चों के साथ रहते हैं और पारिवारिक सुख का आनंद लेते हैं, जबकि दूसरों का जीवन ऐसा नहीं होता। इन सभी चीजों में परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाएँ शामिल हैं। जब मेरे पिता का कार एक्सीडेंट हुआ, तो शुरू में, गलती करने वाले ड्राइवर ने जिम्मेदारी लेने से इनकार कर दिया, लेकिन अप्रत्याशित रूप से, वहाँ से गुजर रहे एक पत्रकार ने उस सड़क दुर्घटना का खुलासा कर दिया। बाद में, मेरी माँ को अस्पताल में एक वकील मिला जिसने मुकदमे में स्वेच्छा से मदद की, और मामला आसानी से सुलझ गया। इससे मुझे एहसास हुआ कि माता-पिता अपने जीवन में किन चीजों का अनुभव करते हैं, वे कितने आशीषों का आनंद लेते हैं और कितना दुख सहते हैं, यह सब परमेश्वर ने पहले से ही तय कर रखा है। इन बातों का इस बात से कोई लेना-देना नहीं है कि बच्चे अपने माता-पिता के पास हैं या नहीं, और मुझे परमेश्वर के वचनों के आधार पर चीजों को देखना चाहिए, अपने माता-पिता को परमेश्वर के हाथों में सौंपना चाहिए, परमेश्वर की संप्रभुता के प्रति समर्पण करना चाहिए, और अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए। यही बुद्धिमानी का चुनाव है। मैंने यह भी सोचा कि इस मुलाकात के दौरान अपने माता-पिता को कुछ भावनात्मक सांत्वना देने के अलावा, मैं उनके लिए और कुछ नहीं कर सकती थी। इसके विपरीत, अगर मैं घर पर गिरफ्तार हो जाती, तो न केवल मैं अपना कर्तव्य नहीं निभा पाती, बल्कि इससे मेरे जीवन को भी नुकसान पहुँचता, और मुझे गिरफ्तार होते देखकर मेरे माता-पिता और भी ज्यादा परेशान और दुखी होते। भविष्य में, जब कुछ हो तो मुझे और अधिक प्रार्थना करनी चाहिए और परमेश्वर को खोजना चाहिए, और अब भावनाओं के आधार पर काम नहीं करना चाहिए।

अगस्त 2023 में एक दिन, मुझे अपने छोटे भाई का एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था कि मेरे पिता को दो साल पहले कोरोनरी हृदय रोग हो गया था, और उन्हें हमेशा डर लगा रहता था कि कहीं एक दिन वे मुझे देखे बिना अचानक दुनिया से न चले जाएँ। उसने यह भी बताया कि हमारे पिता अवसाद में चले गए थे, क्योंकि उन्हें हमेशा शक रहता था कि मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है और प्रताड़ित किया है, और वे अक्सर मेरे साथ कुछ बुरा होने के सपने देखते थे। वे अक्सर परिवार वालों से कहते थे कि उन्हें मेरी याद आती है, और यह कहते-कहते रो पड़ते थे। जब मैंने पत्र पढ़ा, तो मेरा दिमाग सुन्न हो गया। मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि पत्र में जिस व्यक्ति का वर्णन किया गया है, वह मेरे पिता हैं। मैंने सोचा, “मेरे पिता हमेशा स्वस्थ रहे हैं। उन्हें अचानक कोरोनरी हृदय रोग और साथ में अवसाद भी कैसे हो गया? जब भी मेरे पिता मेरा जिक्र करते हैं, तो वे रोते हैं और कहते रहते हैं कि उन्हें मेरी कितनी याद आती है। क्या उनकी यह बीमारी मेरी चिंता करने की वजह से हुई है? क्या मेरे लिए उनका लगातार डर ही उनके अवसाद का कारण बना?” मेरा दिल टूट रहा था और मेरी आँखों में आँसू भर आए। मैंने सोचा कि मेरे माता-पिता ने कितनी मेहनत से मुझे पाला है, और यह उनके लिए कितना मुश्किल रहा होगा। मैं न केवल उनकी देखभाल नहीं कर रही थी, बल्कि मेरे कारण उन्हें सीसीपी ने परेशान भी किया था। वे मेरे बारे में चिंता कर रहे थे और डर में जी रहे थे, और मेरे पिता को तो अवसाद भी हो गया था। रिश्तेदार और दोस्त निश्चित रूप से मुझे डाँटेंगे, मुझे एहसान-फरामोश और बे-जमीर कहेंगे। मेरे जमीर ने बहुत दोषी महसूस किया। मैंने यह भी सोचा कि गंभीर कोरोनरी हृदय रोग जानलेवा हो सकता है। इस बीमारी में भावनात्मक उत्तेजना बिल्कुल भी ठीक नहीं है, और मेरे पिता हमेशा मेरी चिंता करते रहते हैं और उनका मिजाज खराब रहता है, उनकी जान किसी भी पल खतरे में पड़ सकती है! अगर वे इसी तरह अवसाद में रहे, तो क्या वे अपना मानसिक संतुलन खो देंगे? मैं आगे सोचने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी। मेरी आँखों से आँसू बेकाबू होकर बहने लगे, और मुझे दिल में चुभन जैसी असहनीय पीड़ा महसूस हुई। मैंने यहाँ तक सोचा, “अगर मुझे उस समय अगुआ नहीं चुना गया होता, तो मुझे बार-बार सभा के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता और न ही पुलिस मेरी निगरानी करती और मेरा पीछा करती। अगर ऐसा नहीं हुआ होता, तो मुझे घर नहीं छोड़ना पड़ता, और जब मेरे माता-पिता बीमार पड़ते, तो मैं उनकी देखभाल के लिए उनके पास रह सकती थी, और मेरे पिता मेरी चिंता करने और मुझे याद करने से अवसाद में नहीं जाते।” अगले कुछ दिनों तक, मैं अपने माता-पिता के प्रति अपराध-बोध में डूबी रही, मेरी दशा बहुत खराब थी, और मेरा मन अपना कर्तव्य निभाने में नहीं लग रहा था। कभी-कभी, मेरे दिमाग में एक विचार आता था : “अगर मैं घर जाकर अपने पिता को दिखा दूँ कि मैं ठीक हूँ, तो शायद उन्हें अच्छा लगे और वे जल्दी ठीक हो जाएँ।” इन बातों के बारे में सोचने से मेरा मन बहुत बेचैन हो जाता था। अपनी पीड़ा में, मैं प्रार्थना करने के लिए परमेश्वर के सामने आई, “परमेश्वर, मैं जानती हूँ कि ऐसी बातें तेरी अनुमति से होती हैं, और मुझे तेरी इच्छा खोजनी चाहिए, लेकिन मैं भावनाओं से बेबस हूँ और लगातार अपने माता-पिता के बारे में चिंता करती हूँ। मैं बहुत पीड़ा में हूँ। कृपया सत्य खोजने और भावनाओं के बंधन से मुक्त होने में मेरा मार्गदर्शन कर।”

बाद में, मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अगर तुम अपना कर्तव्य निभाने के लिए घर छोड़कर नहीं गए होते और अपने माता-पिता के साथ ही रह रहे होते, तो क्या तुम उन्हें बीमार पड़ने से रोक सकते थे? (नहीं।) क्या यह तुम्हारे वश में है कि तुम्हारे माता-पिता जीवित रहें या मर जाएँ? क्या उनका अमीर या गरीब होना तुम्हारे वश में है? (नहीं।) तुम्हारे माता-पिता को जो भी रोग हो, वह इस वजह से नहीं है कि वे तुम्हें बड़ा करने में बहुत थक गए, या उन्हें तुम्हारी याद आई; उन्हें विशेष रूप से तुम्हारे कारण कोई भी बड़ी, गंभीर बीमारी या जानलेवा स्थिति नहीं हो जाएगी। यह उनका भाग्य है, और इसका तुमसे कोई लेना-देना नहीं है। तुम चाहे कितने भी संतानोचित क्यों न हो या तुम उनकी कितनी भी ध्यान से देखभाल क्यों न करो, ज्यादा-से-ज्यादा तुम बस उनके दैहिक कष्ट और दायित्वों को जरा-सा कम कर सकोगे। लेकिन वे कब बीमार पड़ेंगे, उन्हें कौन-सी बीमारी होगी, उनकी मृत्यु कब और कहाँ होगी—क्या इन चीजों का इस बात से कोई लेना-देना है कि तुम उनके साथ रहकर उनकी देखभाल कर रहे हो या नहीं? नहीं, नहीं है। अगर तुम संतानोचित हो, अगर तुम बेपरवाह एहसान-फरामोश नहीं हो और तुम उनकी देखभाल करते हुए पूरा दिन उनके साथ बिताते हो, तो क्या वे बीमार नहीं पड़ेंगे? क्या वे नहीं मरेंगे? अगर उन्हें बीमार पड़ना ही है, तो क्या वे कैसे भी बीमार नहीं पड़ेंगे? अगर उन्हें मरना ही है, तो क्या वे कैसे भी नहीं मर जाएँगे? क्या यह सही नहीं है?(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। “तुम हमेशा सोचते हो कि तुम्हारे माता-पिता ने जो सब-कुछ सहा और जिस चीज का सामना किया है, उसका संबंध तुमसे है और तुम्हें उनकी पीड़ा हल्की करने के लिए उनकी चिंताओं का बोझ बाँटना चाहिए; तुम हमेशा अपने कंधों पर जिम्मेदारी डालते हो, हमेशा इनसे जुड़ जाना चाहते हो। क्या यह विचार सही है? (नहीं।) क्यों? ... मनुष्य के जीवन में जन्म, बुढ़ापा, बीमारी और मृत्यु का अनुभव करना और छोटी-बड़ी तरह-तरह की बातों का सामना करना बहुत सामान्य है। अगर तुम एक वयस्क हो तो तुम्हें इन मामलों को शांत और सही ढंग से देखना चाहिए। अपने माता-पिता की देखभाल न कर पाने के कारण खुद को बहुत ज्यादा दोष मत दो या बहुत ज्यादा कर्जदार महसूस मत करो और इससे भी बढ़कर, इस मामले में बहुत ज्यादा ऊर्जा मत लगाओ, जिससे तुम्हारे सत्य के अनुसरण और तुम्हारे कर्तव्य के उचित निर्वहन पर असर पड़े। कुछ लोग सोचते हैं कि माता-पिता अपने बच्चों की याद सताने के कारण बीमार पड़ते हैं। क्या ऐसा है? कुछ लोगों के बच्चे साल भर उनके साथ रहते हैं, फिर भी क्या वे बीमार नहीं पड़ते हैं? लोगों को जीवन में कब और कौन-सी बीमारियाँ होती हैं, यह सब परमेश्वर के हाथ के आयोजन हैं और इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है कि उनके बच्चे उनके साथ हैं या नहीं। अगर परमेश्वर ने तुम्हारे माता-पिता के भाग्य में बीमार पड़ना तय नहीं किया है तो अगर तुम उनके साथ नहीं भी हो तो भी उन्हें कुछ नहीं होगा। अगर उनके जीवन में किसी बीमारी या बड़ी विपत्ति का सामना करना तय है तो तुम उनके साथ रहकर भी इसमें क्या बदल सकते हो? वे फिर भी इसे टाल नहीं पाएंगे, है न? (हाँ।) बस इतना है कि उनके बच्चे होने के नाते चूँकि तुम्हारा अपने माता-पिता के साथ खून का रिश्ता है तो जब तुम उनके बीमार होने के बारे में सुनोगे तो तुम परेशान हो जाओगे। यह बहुत सामान्य है। लेकिन तुम्हें इस पर मनन करने की जरूरत नहीं है कि अपने माता-पिता को उनके दर्द से कैसे छुटकारा दिलाया जाए या उनकी मुश्किलें कैसे हल की जाएँ क्योंकि वे बीमारी या बड़ी विपत्ति का सामना कर रहे हैं। तुम्हारे माता-पिता इस तरह की चीजों का अनुभव कई बार कर चुके हैं। अगर परमेश्वर उन्हें इन मसलों से छुटकारा दिलाने के लिए किसी परिवेश का आयोजन करता है तो देर-सबेर वे पूरी तरह से गायब हो जाएँगे। अगर ये मुद्दे उनके लिए जीवन की बाधाएँ हैं और ये ऐसी चीजें हैं जिनका उन्हें अनुभव करना ही है, तो वे उनसे बच नहीं सकते और यह परमेश्वर पर निर्भर है कि उन्हें कब तक इनका अनुभव करना है; लोग इसे बदल नहीं सकते हैं। अगर तुम अपनी ताकत के भरोसे इन मसलों को हल करना चाहते हो और उनके कारणों और परिणामों का विश्लेषण और जाँच करना चाहते हो तो यह एक मूर्खतापूर्ण विचार है और यह अनावश्यक है(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर ने यह स्पष्ट कर दिया है कि माता-पिता के बीमार होने के मामले से कैसे निपटा जाए। किसी व्यक्ति का भाग्य कैसे सामने आता है, क्या वे बीमार पड़ेंगे, किस उम्र में बीमार पड़ेंगे, उन्हें किस तरह की बीमारी होगी, क्या वे उससे मर जाएँगे, उनकी उम्र कितनी लंबी होगी, वगैरह—ये सब परमेश्वर ने पहले से ही तय कर रखा है। कोई भी व्यक्ति इन बातों में दखल नहीं दे सकता और न ही उन्हें बदल सकता है। ऊपरी तौर पर, ऐसा लग रहा था कि मेरे पिता मुझे याद करने की वजह से बीमार हो गए, लेकिन असल में, परमेश्वर ने यह पहले से ही तय कर रखा था कि वे अपने जीवन के इस पड़ाव पर इस बाधा का अनुभव करेंगे। मेरे लिए अपने पिता की बीमारी की सारी जिम्मेदारी अपने ऊपर लेना पूरी तरह से तर्कहीन था, और यह तथ्यों के अनुरूप नहीं था। मैंने सोचा कि कैसे मेरे चचेरे भाई-बहन अपने माता-पिता के साथ रहते थे और उनकी देखभाल करते थे, लेकिन मेरी बुआ को कुछ साल पहले उच्च रक्तचाप और अस्थमा हो गया, और मेरे फूफा भी एक गंभीर बीमारी से पीड़ित हो गए थे। यह दिखाता है कि भले ही बच्चे अपने माता-पिता के पास रहें, इससे कुछ नहीं बदलता। इसके अलावा, लोग केवल मांस और खून के बने हैं, और चूँकि इंसान धरती का अनाज खाते हैं, इसलिए वे किसी न किसी समय बीमार जरूर पड़ेंगे। मेरे पिता साठ साल के आस-पास थे, और इस उम्र में, उनका शरीर खराब हो रहा था और उनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर हो रही थी, इसलिए उनके लिए ऐसी बीमारियाँ होना सामान्य था जो आमतौर पर अधेड़ और बुजुर्ग लोगों को होती हैं। कई बुजुर्ग लोग उच्च रक्तचाप, मधुमेह और हृदय रोग से पीड़ित होते हैं। जब मैं घर पर थी, तो मैंने अपने पिता को बहुत ज्यादा धूम्रपान और शराब पीते देखती थी, और उनकी दिनचर्या अनियमित थी। मैंने उन्हें धूम्रपान और शराब छोड़ने में मदद करने के लिए कई तरीके आजमाए, और मैंने उन्हें उनके स्वास्थ्य के लिए फायदेमंद खाद्य पदार्थ खाने के लिए प्रोत्साहित किया, लेकिन उन्होंने कभी मेरी सलाह नहीं मानी। अगर मैं अपने पिता की इन अस्वास्थ्यकर आदतों को भी नहीं बदल सकती, तो मैं उनकी बीमारी के बारे में कुछ करने की उम्मीद कैसे कर सकती हूँ? साथ ही, मेरे आस-पास एक बहन थी जिसके माता-पिता को मधुमेह और उच्च रक्तचाप हो गया था। यह बहन एक डॉक्टर थी, और जब उसके माता-पिता बीमार हुए, तो उसने उन्हें सबसे अच्छी दवा और महँगे स्वास्थ्य पूरक दिए, और उसने उनके लिए सबसे अच्छा नर्सिंग होम ढूँढ़ने में कोई कसर नहीं छोड़ी। वह लगभग हर दिन अपने माता-पिता से मिलने जाती थी, और वह उनकी खाने से लेकर उनकी दिनचर्या तक की सभी जरूरतों का पूरा ध्यान रखती थी, लेकिन तब भी उसकी माँ को मधुमेह की जटिलताओं के कारण अपने पैर कटवाने पड़े, और उसके पिता को अल्ज़ाइमर रोग हो गया। मैं एक बुजुर्ग बहन को भी जानती थी जिनके बच्चे उनके साथ नहीं थे। वह लगभग अस्सी साल की थीं, लेकिन वे अभी भी बहुत स्वस्थ थीं, और उनकी स्वास्थ्य जाँच में हर बार सामान्य परिणाम आते थे। मैंने देखा कि हर किसी को अपने जीवन में कितना कुछ सहना पड़ता है, और क्या वे बीमारी की पीड़ा का अनुभव करते हैं, यह सब परमेश्वर के पूर्वनिर्धारण पर निर्भर करता है और इसे कोई नहीं बदल सकता। माता-पिता केवल इसलिए अधिक आशीष का आनंद नहीं लेंगे या बीमारी से नहीं बचेंगे क्योंकि उनके बच्चे उनकी देखभाल के लिए आस-पास हैं, और न ही वे इसलिए अधिक बीमार पड़ेंगे या अधिक पीड़ा सहेंगे क्योंकि उनके बच्चे उनकी देखभाल के लिए आस-पास नहीं हैं। इन तथ्यों से, मैंने देखा कि हर किसी का जीवन, उनके जन्म, बुढ़ापे, बीमारियों और मृत्यु से, पूर्वनिर्धारित है, जहाँ तक मेरे पिता की बीमारी की बात है, भले ही मैं उनके पास रहती, मैं कुछ भी नहीं बदल पाती। इन बातों को समझने के बाद, मेरा मन बहुत हल्का हो गया।

एक दिन, मैंने एक अनुभवजन्य गवाही वीडियो देखा, और उसमें परमेश्वर के वचनों का एक अंश था जो मेरे लिए बहुत मददगार था। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “गैर-विश्वासी दुनिया में एक कहावत है : ‘कौए अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाते हैं, और मेमने अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकते हैं।’ एक कहावत यह भी है : ‘जो व्यक्ति संतानोचित नहीं है, वह किसी पशु से बदतर है।’ ये कहावतें कितनी आडंबरपूर्ण लगती हैं! असल में, पहली कहावत में जिन घटनाओं का जिक्र है, कौओं का अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाना, और मेमनों का अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकना, वे सचमुच होती हैं, वे तथ्य हैं। लेकिन वे सिर्फ प्राणी जगत की परिघटनाएँ हैं। वह महज एक प्रकार का नियम है जो परमेश्वर ने विभिन्न जीवित प्राणियों के लिए बनाया है। मनुष्य सहित सभी जीवित प्राणी इस नियम का पालन करते हैं, और यह आगे दर्शाता है कि सभी जीवित प्राणियों का सृजन परमेश्वर ने किया है। कोई भी जीवित प्राणी न तो इस नियम को तोड़ सकता है, न इसके पार जा सकता है। शेर और बाघ जैसे अपेक्षाकृत खूंख्वार मांसभक्षी भी अपनी संतान को पालते हैं और वयस्क होने से पहले उन्हें नहीं काटते। यह पशुओं का सहजप्रवृत्ति है। वे जिस भी प्रजाति के हों, खूंख्वार हों या दयालु और भद्र, सभी पशुओं में यह सहजप्रवृत्ति होती है। इंसानों सहित सभी प्रकार के प्राणी इस सहजप्रवृत्ति और इस नियम का पालन करके ही अपनी संख्या बढ़ा और जीवित रह सकते हैं। अगर वे इस नियम का पालन न करें, या उनके पास यह नियम और यह सहजप्रवृत्ति न हो तो वे अपनी संख्या बढ़ाने और जीवित रहने में सक्षम नहीं होंगे। न यह जैविक खाद्य शृंखला रहेगी, न ही यह संसार रहेगा। क्या यह सच नहीं है? (है।) कौओं का अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाना, और मेमनों का अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकना ठीक यही दर्शाता है कि प्राणी जगत इस नियम का पालन करता है। सभी प्रकार के जीवित प्राणियों में यह सहजप्रवृत्ति होती है। संतान पैदा होने के बाद प्रजाति के नर या मादा उसकी तब तक देखभाल और पालन-पोषण करते हैं, जब तक वह वयस्क नहीं हो जाती। सभी प्रकार के जीवित प्राणी अपनी संतान के प्रति अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व पूरे करने में सक्षम होते हैं और शुद्ध अंतःकरण और कर्तव्यनिष्ठा से अगली पीढ़ी को पाल-पोस कर बड़ा करते हैं। इंसानों के साथ तो ऐसा और अधिक होना चाहिए। इंसानों को मानवजाति उच्च प्राणी कहती है—अगर इंसान इस नियम का पालन न कर सकें और उनमें यह सहज प्रवृत्ति न हो तो वे पशुओं से बदतर हैं, है कि नहीं? इसलिए तुम्हारे माता-पिता ने तुम्हें बड़ा करते समय तुम्हारी चाहे जितनी भी देखभाल की हो या तुम्हारे प्रति चाहे जितनी भी जिम्मेदारियाँ पूरी की हों, वे बस वही कर रहे थे जो एक सृजित प्राणी को करना चाहिए—यह उनकी सहज प्रवृत्ति है। ... सभी प्रकार के जीवित प्राणियों और पशुओं में ये सहजप्रवृत्तियाँ और नियम होते हैं, और वे उनका बढ़िया पालन कर उन्हें पूर्णता तक कार्यान्वित करते हैं। यह ऐसी चीज है जिसे कोई भी व्यक्ति नष्ट नहीं कर सकता। कुछ विशेष पशु भी होते हैं, जैसे कि बाघ और सिंह। वयस्क हो जाने पर ये पशु अपने माता-पिता को छोड़ देते हैं, और उनमें से कुछ नर तो प्रतिद्वंद्वी भी बन जाते हैं, और जैसी जरूरत हो, वैसे काटते और लड़ते-झगड़ते हैं। यह सामान्य है, यह एक नियम है। वे भावनाओं पर ध्यान नहीं देते और वे लोगों की तरह भावनाओं में नहीं जीते, उन्हें बड़ा करने में उनके माता-पिता ने जो दयालुता दिखाई, वे हमेशा उसका कर्ज चुकाना नहीं चाहते, हमेशा यह चिंता नहीं करते कि अगर उन्होंने अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा नहीं दिखाई, तो दूसरे लोग उनकी निंदा करेंगे, उन्हें फटकारेंगे, और पीठ पीछे उनकी आलोचना करेंगे। ऐसे विचार पशु जगत में नहीं होते। लोग ऐसी बातें क्यों करते हैं? इस वजह से कि समाज में और लोगों के समुदायों में ऐसे विभिन्न विचार और आमतौर पर अपनाए गए दृष्टिकोण हैं जो गलत होते हैं। इन चीजों से लोगों के प्रभावित हो जाने, क्षय होने और सड़-गल जाने के बाद उनके भीतर माता-पिता और बच्चे के रिश्ते की व्याख्या करने और उससे निपटने के अलग-अलग तरीके पैदा होते हैं, और आखिरकार वे अपने माता-पिता से लेनदारों जैसा बर्ताव करते हैं—ऐसे लेनदार जिनका कर्ज वे पूरी जिंदगी नहीं चुका सकेंगे। कुछ ऐसे लोग भी हैं जो अपने माता-पिता के निधन के बाद पूरी जिंदगी अपराधी महसूस करते हैं, इस बात के लिए अपराध बोध महसूस करते हैं कि वे अपने माता-पिता की दयालुता का बदला नहीं चुका पाए, क्योंकि कभी उन्होंने कुछ ऐसा काम किया जिससे उनके माता-पिता खुश नहीं हुए या वे उस राह पर नहीं चले जो उनके माता-पिता चाहते थे। मुझे बताओ, क्या यह ज्यादती नहीं है? लोग अपनी भावनाओं के बीच जीते हैं, तो इन भावनाओं से उपजने वाले तरह-तरह के विचारों से ही वे अतिक्रमित और परेशान हो सकते हैं(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं आखिरकार समझ गई कि यह विचार कि “कौए अपनी माँओं को खाना दे कर उनका कर्ज चुकाते हैं, और मेमने अपनी माँओं से दूध पाने के लिए घुटने टेकते हैं” परमेश्वर द्वारा सभी प्राणियों को दी गई सहज प्रवृत्ति को दर्शाता है। विभिन्न जानवरों में जब वे छोटे होते हैं तो स्वतंत्र रूप से जीवित रहने की क्षमता नहीं होती, और उन्हें जीवित रहने के लिए अपने माता-पिता की देखभाल की आवश्यकता होती है। यह अस्तित्व का एक नियम है जो सभी प्राणियों को प्रजनन करने और फलने-फूलने की अनुमति देता है। इंसान भी ऐसे ही हैं, माता-पिता का अपने बच्चों का पालन-पोषण करना एक सहज प्रवृत्ति है, और ऐसा करने में, वे माता-पिता के रूप में अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्य को पूरा कर रहे हैं, और वे अपने बच्चों के प्रति कोई दयालुता नहीं दिखा रहे हैं। मैंने सोचा कि मेरे माता-पिता ने मुझे बहुत मेहनत और कठिनाई से पाला है, और खास तौर पर, जब मैंने अपने पिता को परिवार को सहारा देने और मुझे स्कूल भेजने के लिए पैसे कमाने के लिए कड़ी मेहनत करते देखा, कम खर्च में जीते और बीमार होने पर भी आराम करने से कतराते देखा, तो मैंने मेरे पिता द्वारा मुझे पालने के लिए चुकाई गई कीमत और सहे गए दुख को दयालुता माना, और यह मेरे दिल में अंकित हो गया। मैंने सोचा कि जब मैं बड़ी हो जाऊँगी, तो मैं उनके प्रति संतानोचित रहूंगी, नहीं तो मुझमें बिल्कुल भी जमीर नहीं होगा। और तो और, मैं “संतानोचित धर्मनिष्ठा का गुण सबसे ऊपर रखना चाहिए,” और “जो व्यक्ति संतानोचित नहीं है, वह किसी पशु से बदतर है,” जैसे विचारों से प्रभावित थी, और मैं अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित होने को सबसे महत्वपूर्ण चीज मानती थी। जब मैंने सुना कि मेरे पिता का कार एक्सीडेंट हो गया है, तो मैं गिरफ्तार होने का खतरा उठाकर उनसे मिलने गई। जब मुझे पता चला कि मेरे पिता को कोरोनरी हृदय रोग और अवसाद हो गया है, मुझे लगा कि यह बीमारी सीसीपी के उस उत्पीड़न के कारण हुई है जो मैं ही उन पर लाई थी और मेरे लिए उनके डर और चिंता के कारण हुई है। नतीजतन, मैंने गहराई से दोषी महसूस किया, और मुझे शुरू में एक अगुआई का कर्तव्य सँभालने पर भी पछतावा हुआ। हालाँकि प्रार्थना के कारण मैंने अपना कर्तव्य नहीं छोड़ा और घर नहीं गई, लेकिन मैं अपने कर्तव्य के बारे में बिल्कुल नहीं सोच रही थी, और मैंने बस अपने कर्तव्य की रस्म अदायगी करनी शुरू कर दी। अब मैं समझ गई कि शैतान जो पारंपरिक विचार लोगों में डालता है, वे गुमराह करने वाले और भ्रष्ट करने वाले हैं, और वे लोगों को भावनाओं में जीने, परमेश्वर को धोखा देने, परमेश्वर से दूर होने का कारण बनते हैं, और अंततः परमेश्वर के उद्धार का अपना मौका खो देते हैं।

बाद में, मैंने परमेश्वर के और वचन पढ़े : “परमेश्वर ने यह नियत किया था कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारा पालन-पोषण करेंगे, लेकिन इसलिए नहीं कि तुम उनका कर्ज चुकाते हुए जीवन गुजार दो। इस जीवन में तुम्हारे पास अपनी जिम्मेदारियाँ और दायित्व हैं जो तुम्हें निभाने ही हैं, एक पथ है जिस पर तुम्हें चलना है; तुम्हारे पास अपना जीवन है। अपने जीवन में तुम्हें अपनी सारी ताकत अपने माता-पिता की नेक संतान होने और उनकी दयालुता का कर्ज चुकाने में नहीं लगा देनी चाहिए। अपने माता-पिता की नेक संतान होना बस एक चीज है जो तुम्हारे जीवन में तुम्हारे साथ रहती है। यह एक ऐसी चीज है जिससे स्नेह के मानवीय रिश्तों में बचा नहीं जा सकता है। लेकिन जहाँ तक यह बात है कि तुम्हारा और तुम्हारे माता-पिता का कैसा जुड़ाव नियत है और तुम लोग कितने लंबे समय तक साथ रह पाओगे, यह परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं पर निर्भर करता है। अगर परमेश्वर ने यह योजना बनाई है और व्यवस्था की है कि तुम और तुम्हारे माता-पिता अलग-अलग स्थानों पर रहोगे, कि तुम उनसे बहुत दूर रहोगे और साथ नहीं रह पाओगे तो इस जिम्मेदारी को पूरा करना तुम्हारे लिए बस एक तरह की लालसा ही है। अगर परमेश्वर ने यह व्यवस्था की है कि तुम्हारा आवास अपने माता-पिता के बहुत पास होगा और तुम उनकी बगल में रह पाओगे तो अपने माता-पिता के प्रति थोड़ी-सी जिम्मेदारियाँ निभाना और उन्हें थोड़ी-सी संतानोचित निष्ठा दिखाना ऐसी चीजें हैं जो तुम्हें करनी चाहिए—इस बारे में आलोचना करने लायक कुछ नहीं है। लेकिन अगर तुम अपने माता-पिता से अलग किसी और जगह हो, तुम्हारे पास उन्हें संतानोचित निष्ठा दिखाने का मौका या सही हालात नहीं हैं तो तुम्हें इसे शर्मनाक चीज मानने की जरूरत नहीं है। संतानोचित निष्ठा न दिखा पाने के कारण तुम्हें अपने माता-पिता को मुँह दिखाने में शर्मिंदा नहीं होना चाहिए, बात बस इतनी है कि तुम्हारे हालात इसकी अनुमति नहीं देते हैं। एक बच्चे के तौर पर तुम्हें समझना चाहिए कि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारे लेनदार नहीं हैं। अगर तुम अपने माता-पिता की दयालुता का कर्ज चुकाने पर ही ध्यान देते हो यह ऐसे बहुत सारे कर्तव्यों के आड़े आएगा जो तुम्हें निभाने चाहिए। ऐसी बहुत-सी चीजें हैं जो तुम्हें अपने जीवन में अवश्य ही करनी चाहिए और तुम्हारे लिए वांछनीय ये कर्तव्य ऐसी चीजें हैं जो एक सृजित प्राणी को करनी चाहिए और जो तुम्हें सृष्टिकर्ता ने सौंपी हैं और इनका तुम्हारे माता-पिता के दयालुता का कर्ज चुकाने के साथ कोई लेना-देना नहीं है। अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाना, उनका कर्ज चुकाना, उनकी दयालुता का बदला चुकाना—इन चीजों का तुम्हारे जीवन के उद्देश्य से कोई लेना-देना नहीं है। यह भी कहा जा सकता है कि तुम्हारे लिए अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाना, उनका कर्ज चुकाना या उनके प्रति अपनी कोई भी जिम्मेदारी पूरी करना जरूरी नहीं है। दो टूक शब्दों में कहें तो जब तुम्हारे हालात इजाजत दें, तुम यह थोड़ा-बहुत कर सकते हो और अपनी थोड़ी-सी जिम्मेदारियाँ पूरी कर सकते हो; जब हालात इजाजत न दें तो तुम्हें ऐसा करने के लिए खुद को मजबूर करने की जरूरत नहीं है। अगर तुम अपने माता-पिता के प्रति संतानोचित निष्ठा दिखाने के लिए अपनी जिम्मेदारी नहीं निभा सकते हो तो यह कोई बड़ी गलती नहीं है, यह बस तुम्हारे जमीर और नैतिक न्याय के थोड़ा खिलाफ है और कुछ लोग तुम्हारी निंदा करेंगे—बस इतना ही। लेकिन कम से-कम, यह सत्य के खिलाफ नहीं है। अगर यह अपना कर्तव्य निभाने और परमेश्वर की इच्छा के अनुसार चलने की खातिर है तो तुम परमेश्वर द्वारा सराहे तक जाओगे। इसलिए जहाँ तक अपने माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने की बात है, अगर तुम सत्य को समझते हो और लोगों के लिए परमेश्वर की अपेक्षाओं को समझते हो तो भले ही तुम्हारी स्थितियाँ तुम्हें माता-पिता के प्रति कर्तव्यनिष्ठ होने की अनुमति न दें, तुम्हारा जमीर तुम्हें नहीं कोसेगा(वचन, खंड 6, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (17))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मैं समझ गई कि माता-पिता के प्रति संतानोचित होने को अपने जीवन का मिशन नहीं मानना चाहिए। अपने माता-पिता से जुड़े मामलों में, मुझे परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पित होना चाहिए, और अगर मुझे अपने माता-पिता के साथ रहने का मौका मिले, तो मुझे उनकी देखभाल करने और एक संतान के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को पूरा करने की पूरी कोशिश करनी चाहिए। लेकिन अगर मेरे पास ऐसा मौका नहीं है, तो मुझे मन की शांति के साथ अपने कर्तव्यों को पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। मैं अपने माता-पिता की देखभाल इसलिए नहीं कर सकी क्योंकि मैं एक संतान के रूप में अपनी जिम्मेदारी पूरी करने को तैयार नहीं थी, ऐसा नहीं है, बल्कि इसलिए कि सीसीपी मेरा पीछा कर रही थी और मैं घर नहीं लौट सकती थी, और मुझे इसके लिए दोषी या निंदित महसूस करने की जरूरत नहीं थी। परमेश्वर ने अंत के दिनों में मेरे जन्म को पूर्वनिर्धारित किया और मुझे अपने सामने लाया, और मैंने परमेश्वर के इतने सारे वचनों के सिंचन और आपूर्ति का आनंद लिया है। अब राज्य के सुसमाचार के विस्तार के लिए एक महत्वपूर्ण क्षण है, और मुझे अपना दिल सुसमाचार के काम में लगाना चाहिए, अपना कर्तव्य पूरा करना चाहिए, और परमेश्वर के प्रेम का बदला चुकाना चाहिए। अगर मैं केवल माता-पिता के प्रति संतानोचित होने की कोशिश करूँ, और मैं एक सृजित प्राणी के रूप में अपनी जिम्मेदारी और मिशन को त्याग दूँ, तो मैं मेरे लिए परमेश्वर के पोषण, देखभाल और सुरक्षा को निराश करूँगी, और वह वास्तव में जमीर और इंसानियत की कमी होगी। परमेश्वर के वचन पढ़कर, मैं माता-पिता और बच्चों के बीच के रिश्ते को समझ गई, मैं अब शैतान के पारंपरिक विचारों से बंधी या विवश महसूस नहीं करती, मैंने अंदर से मुक्त महसूस किया, और मैं मन की शांति के साथ अपना कर्तव्य निभाने पर ध्यान केंद्रित करने में सक्षम हो गई। मैं तहे दिल से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!

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