74. मैं अपना कर्तव्य स्थिरता के साथ निभाने में सक्षम हो गई हूँ
मैं दो साल से ज्यादा समय से कलीसिया में इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की मरम्मत कर रही हूँ। जब मैंने पहली बार यह कर्तव्य सँभाला, तो मैं सोचती थी कि यह बहुत चुनौतीपूर्ण है क्योंकि मुझे कुछ नए पेशेवर कौशल और नई तकनीकें सीखनी थीं। मैं इस पर शोध करने के लिए समय और ऊर्जा लगाने की इच्छुक थी और मुझे कष्ट उठाने या कीमत चुकाने का डर नहीं था। मेरे आसपास भाई-बहन मुझे ऐसे आँकते थे कि मैं अपना कर्तव्य जिम्मेदारी और दृढ़ता के साथ निभा रही हूँ। यह सुनकर मुझे बहुत खुशी होती थी। मगर जैसे-जैसे यह कर्तव्य निभाते हुए मेरा समय बढ़ा, मैं तकनीकी कौशलों में कुछ हद तक पकड़ बनाने में सक्षम हो गई और काम काफी सुचारू रूप से चलने लगा। इसलिए मुझे यह काम साधारण और नीरस लगने लगा। दिन भर एक जैसे काम और कार्य-विधियों को दोहराते हुए मैं मन ही मन सोचती थी, “क्या मुझे हमेशा ऐसे ही करते रहना पड़ेगा? यह तो बहुत उबाऊ है! तकनीकी तौर पर मैंने काम चलाने लायक महारत हासिल कर ली है। मुझे पता है कि सामने आने वाली अधिकतर समस्याओं का हल कैसे निकालना है, इसलिए कोई बड़ी मुश्किल नहीं है। ऐसे ही काम करते रहना तो काफी उबाऊ होगा! बेहतर होगा कि मैं कोई और कर्तव्य कर सकूँ और किसी नए परिवेश में जाऊँ। मैं कुछ नए लोगों, घटनाओं और चीजों के संपर्क में आऊँगी और शायद तब मैं अपना कर्तव्य करने के लिए ऊर्जा से भर जाऊँगी। भले ही मैं पेशेवर कौशलों से परिचित न भी होऊँ, मैं उन्हें शुरू से सीख सकती हूँ—बस इतना भी ठीक रहेगा।” मैं अपने विचारों पर चर्चा करने के लिए पर्यवेक्षक से मिलना चाहती थी। लेकिन फिर मैंने सोचा कि मैं यह कर्तव्य काफी लंबे समय से कर रही हूँ और मेरा काम तुरंत सँभालने के लिए कोई उपयुक्त व्यक्ति नहीं मिल सकता, इसलिए मैंने कुछ नहीं कहा। लेकिन कुछ न कहने से मेरा मन अभी भी दमित और उदास महसूस कर रहा था। हर दिन मैं बस औपचारिकता निभाने के लिए उपकरणों की मरम्मत करती थी। मैं जो भी करती थी, उसमें न तो लगन होती थी, न सावधानी और दिन भर सुस्ताने में ही गुजर जाता था।
चूँकि मैं अपना कर्तव्य निभाने में सावधानी नहीं बरतती थी, इसलिए मैं जिन उपकरणों की मरम्मत करती थी, उनमें बार-बार समस्याएँ आती थीं और कभी-कभी तो उनकी बार-बार मरम्मत करवानी पड़ती थी। एक कंप्यूटर की मरम्मत जो तीन दिन में पूरी होनी चाहिए, उसे पाँच दिन या उससे भी ज्यादा समय लग जाता था, जिससे मेरे भाई-बहनों को उसका इस्तेमाल करने में देरी होती थी। एक बार मैंने एक कंप्यूटर उठाया और जब देखा कि यह एक आम समस्या है, तो मैं तंग आ गई और लापरवाही से मरम्मत का काम पूरा करके निपटा दिया। बाद में जिस भाई के साथ मैं काम करती थी, उसने जाँच की तो पाया कि कंप्यूटर में अभी भी एक खराबी है और उसे खोलकर दोबारा मरम्मत करने की जरूरत है। एक और बार पर्यवेक्षक ने मुझे दो नए भाइयों, वू मिंग और झेंग यांग को उपकरण मरम्मत करना सिखाने के लिए कहा। मैंने बस संक्षेप में बताया कि आम खराबियों से कैसे निपटा जाए और फिर दोनों भाइयों को खुद ही मरम्मत का प्रशिक्षण लेने को छोड़ दिया। कुछ दिन बीत गए और उपकरण अभी तक ठीक नहीं हुआ था, इसलिए मैं उसके बारे में पूछताछ करने गई और पता लगाया कि क्या हो रहा है। वू मिंग ने कहा कि उसकी मरम्मत की जा रही है। मैंने मन ही मन सोचा, “इस तरह के उपकरण की मरम्मत करना बिल्कुल भी मुश्किल नहीं है। इसकी मरम्मत अभी तक क्यों नहीं हुई? जाने दो। अगर वे काम के बीच में हैं तो कोई बात नहीं।” कुछ दिन और बीतने के बाद भी उन्होंने इसे ठीक नहीं किया, लेकिन मैंने उनसे बस करते रहने का आग्रह किया और वास्तव में उनकी कठिनाइयों या मरम्मत की स्थिति के बारे में पता नहीं लगाया। दो दिन और बीतने के बाद मुझे पता चला कि उन्होंने उस महत्वपूर्ण चरण में महारत हासिल नहीं की है, इसलिए उन्होंने बिल्कुल भी कोई प्रगति नहीं की है। जब मैंने देखा कि मेरे कर्तव्य में एक के बाद एक समस्याएँ आ रही हैं, प्रगति बाधित हो रही है और नतीजतन सभी को कष्ट हो रहा है, तो मुझे अपने दिल में आत्मग्लानि हुई। मुझे एहसास हुआ कि यह मेरे द्वारा अपने कर्तव्य को लापरवाह ढंग से निभाने के कारण हुआ है और इसलिए मैंने अपनी दशा ठीक करने के लिए परमेश्वर के वचनों को खोजा। मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जो लोग लापरवाह रहना पसंद करते हैं, उनमें जमीर या विवेक नहीं होता है, उनकी मानवता कमजोर होती है, वे भरोसे के लायक नहीं होते, और बहुत ही अविश्वसनीय होते हैं। क्या पवित्र आत्मा ऐसे लोगों पर कार्य करेगा? कतई नहीं। इसलिए, जो लोग अपने कर्तव्यों में लापरवाह रहना पसंद करते हैं, उन्हें परमेश्वर न तो कभी पूर्ण बनाएगा और न कभी उनका उपयोग करेगा। जो लापरवाह रहना पसंद करते हैं, वे सभी कपटी होते हैं, बुरी मंशाओं से भरे होते हैं, और उनमें बिल्कुल भी जमीर और विवेक नहीं होता है। वे सिद्धांतों या निचली सीमाओं के बिना कार्य करते हैं; वे अपनी पसंद-नापसंद के आधार पर कार्य करते हैं, और तमाम तरह की खराब चीजें करने में सक्षम होते हैं। उनके सारे कार्यकलाप उनके मिजाज पर निर्भर करते हैं। अगर उनका मिजाज अच्छा है, वे खुश हैं, तो फिर वे थोड़ा-सा अच्छा करेंगे। अगर उनका मिजाज खराब है और वे खिन्न हैं तो फिर वे लापरवाह हो जाएँगे। अगर वे गुस्से में हैं, तो फिर वे मनमानी और लापरवाही दिखा सकते हैं, और महत्वपूर्ण मामले लटका सकते हैं। उनके दिलों में बिल्कुल भी परमेश्वर नहीं होता है। वे बस दिन गुजारते रहते हैं, और बैठे-सुस्ताते मौत का इंतजार करते रहते हैं। ... हृदयहीन लोगों के पास अपने क्रियाकलापों में कोई निचली सीमा नहीं होती है; कोई भी चीज उन पर अंकुश नहीं लगा सकती है। क्या ऐसे लोग जमीर पर आधारित मामले सँभाल सकते हैं? (नहीं।) क्यों नहीं? (उनके पास जमीर के मानक नहीं होते हैं, न उनमें मानवता, या निचली सीमाएँ होती हैं।) बिल्कुल सही। अपने क्रियाकलापों में उनके पास अंतरात्मा के मानक नहीं होते हैं; वे अपनी प्राथमिकताओं के आधार पर कार्य करते हैं, अपने मिजाज के आधार पर जो चाहते हैं वह करते हैं। उन्हें अपने कर्तव्यों में जो नतीजे मिलेंगे वे अच्छे होंगे या बुरे यह उनके मिजाज पर निर्भर करता है। अगर उनका मिजाज अच्छा हो तो नतीजे अच्छे होंगे, लेकिन मिजाज बुरा हुआ तो नतीजे बुरे मिलेंगे। क्या इस तरीके का कर्तव्य निर्वाह संभवतः मानक स्तर का हो सकता है? वे अपने कर्तव्य सत्य सिद्धांत के आधार पर नहीं, अपनी मनोदशाओं के आधार पर निभाते हैं; इस प्रकार, उनके लिए सत्य को अभ्यास में लाना बहुत कठिन है और परमेश्वर की स्वीकृति प्राप्त करना भी बहुत कठिन है। जो लोग शारीरिक प्राथमिकताओं के आधार पर कार्य करते हैं वे सत्य को अभ्यास में बिल्कुल भी नहीं लाते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, परमेश्वर की प्रबंधन योजना का सर्वाधिक लाभार्थी मनुष्य है)। “बहुत-से लोग अपने कर्तव्य अनमने ढंग से निभाते हैं, इन्हें कभी गंभीरता से नहीं लेते, मानो वे अविश्वासियों के लिए काम कर रहे हों। वे चीजों को फूहड़, सतही, उदासीन और लापरवाह ढंग से करते हैं, मानो मजाक चल रहा हो। ऐसा क्यों है? वे श्रम करने वाले अविश्वासी हैं; कर्तव्य निभा रहे छद्म-विश्वासी हैं। ये लोग अत्यधिक दुष्ट हैं; ये लम्पट और बेलगाम हैं, और ये अविश्वासियों से अलग नहीं हैं। अपने लिए कुछ करते समय वे बिल्कुल भी अनमने नहीं होते, तो फिर जब अपने कर्तव्य निभाने की बात आती है तो वे थोड़े-से भी ईमानदार या लगनशील क्यों नहीं होते? वे जो कुछ भी करते हैं, जो भी कर्तव्य निभाते हैं, उसमें चंचलता और शरारत का गुण रहता है। ये लोग हमेशा अनमने होते हैं और इनमें धोखा देने की प्रवृत्ति होती है। क्या ऐसे लोगों में मानवता होती है? उनमें निश्चित रूप से मानवता नहीं होती; न ही उनमें थोड़ा-सा भी जमीर और विवेक होता है। जंगली गधों या जंगली घोड़ों की तरह उन्हें लगातार साधने और उन पर नजर रखने की जरूरत होती है। वे परमेश्वर के घर के साथ धोखेबाजी और चालबाजी करते हैं। क्या इसका मतलब उन्हें परमेश्वर पर कोई सच्चा विश्वास है? क्या वे खुद को उसके लिए खपा रहे हैं? वे निश्चित रूप से उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते हैं और उनका श्रम मानक स्तर का नहीं है। यदि ऐसे लोगों को कोई और काम पर रखता तो उन्हें कुछ ही दिनों में निकाल देता। परमेश्वर के घर में यह कहना पूरी तरह से सही है कि वे श्रमिक और काम पर रखे गए मजदूर हैं, और उन्हें केवल हटाया ही जा सकता है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि जो व्यक्ति कलीसिया के हितों या अपनी जिम्मेदारियों का ध्यान रखे बिना अपना कर्तव्य निभाता है और जो लगातार अपनी इच्छाओं के पीछे भागता है, अपनी पसंद के अनुसार चलता है और अपनी मनमर्जी करता है, वह मानवताहीन व्यक्ति है। मैंने सोचा कि कैसे हाल ही में मेरा कर्तव्य निर्वहन भी बिल्कुल ऐसा ही रहा था। लंबे समय तक यह कर्तव्य निभाने के बाद मैंने कुछ तकनीकों और पेशेवर कौशलों में महारत हासिल कर ली थी और मुझे लगा था कि मेरा कर्तव्य अब नया या चुनौतीपूर्ण नहीं रहा। इसलिए मैं अपने कर्तव्य को निभाने में लापरवाह होने लगी थी और जब भी संभव होता, लापरवाही बरतती थी। मैंने उपकरणों की मरम्मत में सावधानी नहीं बरती थी और स्पष्ट खामियों को नजरअंदाज कर दिया था, जिसके कारण दोबारा काम करना पड़ा और प्रगति में देरी हुई। वू मिंग और झेंग यांग ने अभी-अभी इस कर्तव्य के लिए प्रशिक्षण लेना शुरू किया था, उनसे और अधिक संवाद करने और काम का जायजा लेने की जरूरत थी ताकि वे जल्द से जल्द मरम्मत की तकनीकों से वाकिफ हो सकें। मगर मैंने कोई जिम्मेदारी नहीं उठाई थी और न ही उन्हें विस्तृत ढंग से मार्गदर्शन दिया था। नतीजतन, उनके पेशेवर कौशलों में धीमी प्रगति हुई थी और मरम्मत में देर हो गई थी। अपने कर्तव्य के निर्वहन में मेरी निजी प्राथमिकताएँ बहुत अधिक हावी हो गई थीं और मैंने कलीसिया के हितों की रक्षा के बारे में बिल्कुल भी नहीं सोचा था। मैं लापरवाह रही थी और अनदेखी कर रही थी और अपना कर्तव्य निभाते हुए अपनी इच्छाओं के पीछे भाग रही थी। मुझमें वास्तव में मानवता की बहुत कमी थी और मैं बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं थी! मैंने परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचा : “केवल बेमन से अपना कर्तव्य निभाना भारी वर्जना है। अगर तुम हमेशा ऐसे ही अपना कर्तव्य करते हो, तो तुम इसे मानक स्तर के अनुरूप पूरा नहीं कर पाओगे। अगर तुम समर्पण से अपना कर्तव्य निभाना चाहते हो तो पहले तुम्हें बेमन से काम करने की अपनी समस्या दूर करनी होगी। यह समस्या देखते ही इसके निराकरण के कदम उठाने होंगे। अगर हमेशा भ्रमित रहते हो, समस्याएँ कभी नहीं देख पाते और लापरवाही से कार्य करते हो तो तुम अपना कर्तव्य ठीक से कभी नहीं निभा पाओगे। इसलिए, तुम्हें हमेशा पूरे दिल से अपना कर्तव्य निभाना होगा। लोगों को अपना कर्तव्य करने का अवसर मिलना बहुत कठिन है! जब परमेश्वर उन्हें अवसर देता है लेकिन वे उसे पकड़ नहीं पाते, तो वह अवसर खो जाता है—और अगर बाद में वे ऐसा अवसर खोजना चाहें, तो शायद वह दोबारा न मिले। परमेश्वर का कार्य किसी की प्रतीक्षा नहीं करता, और न ही अपना कर्तव्य निभाने के अवसर किसी की प्रतीक्षा करते हैं” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, जीवन प्रवेश कर्तव्य निभाने से प्रारंभ होता है)। परमेश्वर के वचनों से मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर लोगों को कर्तव्य निभाने के लिए सीमित अवसर देता है। मैंने अपना कर्तव्य निभाने में निजी प्राथमिकताओं के अनुसार चलकर और उसे लापरवाही से करके पहले ही काम में देरी कर दी थी। अगर मैं पछतावे के बारे में सोचे बिना इसी तरह अपनी इच्छाओं के पीछे भागती रही, तो अंत में मैं कर्तव्य निभाने का अपना मौका जरूर गँवा दूँगी! मैं ऐसे ही चलते रहने की इच्छुक नहीं थी। फिर पश्चात्ताप में मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और अपने कर्तव्य में लगन और ध्यान के साथ जुट गई। मैंने उपकरणों की सावधानीपूर्वक मरम्मत की और साथ ही मैंने वू मिंग और झेंग यांग को उनकी तकनीकों के बारे में सावधानीपूर्वक मार्गदर्शन दिया। इस तरह अभ्यास करने से मेरी दशा काफी बेहतर हो गई, मरम्मत में पहले से कम समस्याएँ आईं और यह भावना भी काफी कम हो गई कि मेरा काम उबाऊ और नीरस है।
बाद में मैंने आत्म-चिंतन किया : इतने लंबे समय तक एक ही काम करने के बाद मैं उकताहट और बोरियत क्यों दिखाने लगी थी और क्यों लापरवाही बरतने लगी थी? कुछ दिन बाद मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “अगर हम यह कहें कि रोमांचक चीजों का आनंद लेना एक भ्रष्ट स्वभाव है तो यह किस तरह का भ्रष्ट स्वभाव है? क्या यह घमंड, धोखेबाजी या क्रूरता है? (यह इनमें से कोई भी नहीं है।) यह किसी भी तरह के भ्रष्ट स्वभाव से संबंधित नहीं है। तो यह किस तरह की समस्या है? (यह मानवता की समस्या है।) यह मानवता की किस तरह की समस्या है? क्या यह कुछ हद तक उद्दंड होना है? (हाँ।) यह अनुचित और ऐसे तरीके से आचरण करना है जो उद्दंड है, यह रोमांचक चीजों का आनंद लेना है और बेचैन होना है। बेचैनी सामान्य मानवता का अभाव दर्शाती है। इसमें जमीर शामिल नहीं है लेकिन यह मुख्य रूप से सामान्य मानवता में तार्किकता का अभाव दर्शाती है। ऐसे लोग एक कार्य पर चिपके नहीं रह पाते हैं या अपने कर्तव्य नियमों का पालन करते हुए और कर्तव्यनिष्ठ तरीके से नहीं कर पाते हैं। वे वयस्कों की तरह चीजें करने में असमर्थ होते हैं; उनमें परिपक्व सोच, व्यक्तिगत आचरण की परिपक्व शैली और चीजें करने का परिपक्व तरीका नहीं होता है। कम-से-कम यह उनकी मानवता का एक दोष है। यकीनन यह उनके चरित्र की समस्या होने के स्तर तक नहीं बढ़ता है लेकिन उस रवैये से संबंधित होता है जिससे वे आचरण और कार्य करते हैं। नवीनता का और रोमांचक चीजों का आनंद लेना, जो कुछ भी वे करते हैं उसमें अस्थिर होना, डटे रहने में असमर्थ होना, बेचैन और अनुचित होना और हमेशा रोमांचक चीजों की तलाश करने और नई-नई चीजें आजमाने की चाह रखना—इस प्रकार के मुद्दे मानवता के दोषों के तहत आते हैं। रोमांचक चीजों का आनंद लेने वाले लोगों में सामान्य मानवता की तार्किकता का अभाव होता है; उनके लिए वे जिम्मेदारियाँ और कार्य वहन करना आसान नहीं होता है जो वयस्कों को वहन करने चाहिए। वे जो भी कार्य करते हैं, यदि वे उसे लंबे समय तक करते हैं और उसकी नवीनता खो जाती है तो उन्हें यह उबाऊ लगता है, वे उसे करने में दिलचस्पी खो देते हैं और नवीनता और रोमांच की भावना तलाशना चाहते हैं। रोमांचक चीजों के बिना उन्हें लगता है कि चीजें नीरस हैं और उन्हें आध्यात्मिक शून्यता की भावना का भी अनुभव हो सकता है। जब वे ऐसा महसूस करते हैं तो उनके दिल बेचैन हो उठते हैं और वे रोमांचक चीजों या ऐसी चीजों की तलाश करना चाहते हैं जो उन्हें दिलचस्प लगती हैं। वे लगातार कुछ अपरंपरागत करना चाहते हैं। जब भी वे पाते हैं कि वे जो कार्य कर रहे हैं या जो मामले सँभाल रहे हैं वे उबाऊ या अरोचक हैं तो वे जारी रखने की इच्छा खो देते हैं। भले ही वह कार्य कुछ ऐसा हो जो उन्हें करना चाहिए या वह कोई सार्थक और कीमती कार्य हो, फिर भी वे डटे नहीं रह पाते हैं। ... इस प्रकार के लोग बाहर से अक्सर ऐसे दिखते हैं जैसे कि उन्हें कोई बड़ी समस्या नहीं है। अगर तुम ऐसे लोगों का भेद नहीं पहचान पाते हो या उनके सार या इस तरह की समस्या के सार की असलियत नहीं देख पाते हो, तो हो सकता है कि तुम सोचो, ‘इन लोगों के स्वभाव बस अस्थिर हैं; वे तीस या चालीस वर्ष के हो चुके हैं लेकिन अब भी बच्चों की तरह बचकाने हैं।’ दरअसल, इस प्रकार के लोग अपने दिलों की गहराई में लगातार रोमांचक चीजों की तलाश करते रहते हैं। वे चाहे जो भी करें, उनमें वयस्कों के विचारों और जागरूकता के साथ-साथ उस दृष्टिकोण और रवैये का भी अभाव होता है जिससे वयस्क मामले सँभालते हैं। इसलिए, ऐसे लोग बहुत समस्यात्मक होते हैं। हो सकता है कि उनकी मानवता बुरी न हो और उनका चरित्र खास तौर पर घिनौना न हो, लेकिन उनकी मानवता के इस दोष के कारण उनके लिए अर्थपूर्ण कार्य, खास तौर पर कार्य की कुछ महत्वपूर्ण मदों के लिए योग्य होना बहुत मुश्किल होता है” (वचन, खंड 7, सत्य के अनुसरण के बारे में, सत्य का अनुसरण कैसे करें (9))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे आखिरकार एहसास हुआ कि मेरे काम में उकताहट और बोरियत दिखने और लापरवाह और असावधान रहने का मुख्य कारण मेरी मानवता में कोई समस्या थी। मुझे नयापन और उत्साह पसंद था और मामूली और साधारण चीजें नापसंद थीं। मैंने शुरू से अंत तक एक ही काम से चिपके रहने और उसे लगातार करने के बजाय एक ऐसा कर्तव्य निभाने की इच्छा की थी जो बदलावों और चुनौतियों से भरा हो। जैसे जब मैंने पहली बार मरम्मत का कर्तव्य किया था, तो मैं नई चीजों के संपर्क में आई थी और मुझे इस कर्तव्य से जुड़े कुछ पेशेवर कौशलों पर अच्छी पकड़ नहीं थी, इसलिए कुछ चुनौतियाँ और कठिनाइयाँ आई थीं। अपना कर्तव्य निभाते हुए मुझे कई नए और रोमांचक अनुभव मिल सकते थे, इसलिए मुझे यह कर्तव्य पसंद था और मैं इसकी कीमत चुकाने की इच्छुक थी। लेकिन लंबे समय तक यह कर्तव्य निभाते रहने के बाद इसका नयापन खत्म हो गया था और मुझे यह कर्तव्य उबाऊ और नीरस लगने लगा था। भले ही मैं बाहरी तौर पर अपना कर्तव्य निभा रही थी, मेरा मन ऊब चुका था और मैं हर दिन लापरवाह ढंग से उपकरणों की मरम्मत करती रहती थी। अपने दिल में मैं एक नए परिवेश में जाकर एक अलग कर्तव्य निभाने के बारे में भी सोचती रहती थी। मैंने अपने कर्तव्य के प्रति निष्ठा नहीं दिखाई थी। जब मुझे अपना कर्तव्य निभाने में कोई नयापन या उत्साह महसूस नहीं होता था, तो मैं उसमें अपनी रुचि नहीं जगा पाती थी। मैं अपना कर्तव्य पूरी तरह से अपनी व्यक्तिगत प्राथमिकताओं के आधार पर निभा रही थी। अपने आचरण और कार्यशैली में मैं अनुशासनहीन और बेचैन थी। मुझमें निरंतरता का अभाव था और मैंने एक वयस्क की जिम्मेदारियाँ नहीं उठाईं थीं। इस तरह से कुछ भी कर पाना मुश्किल था और मैं बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं रही थी। विशेष रूप से मैंने परमेश्वर के वचन पढ़े : “जब भी वे पाते हैं कि वे जो कार्य कर रहे हैं या जो मामले सँभाल रहे हैं वे उबाऊ या अरोचक हैं तो वे जारी रखने की इच्छा खो देते हैं। भले ही वह कार्य कुछ ऐसा हो जो उन्हें करना चाहिए या वह कोई सार्थक और कीमती कार्य हो, फिर भी वे डटे नहीं रह पाते हैं। ... हो सकता है कि उनकी मानवता बुरी न हो और उनका चरित्र खास तौर पर घिनौना न हो, लेकिन उनकी मानवता के इस दोष के कारण उनके लिए अर्थपूर्ण कार्य, खास तौर पर कार्य की कुछ महत्वपूर्ण मदों के लिए योग्य होना बहुत मुश्किल होता है।” परमेश्वर के वचनों से मैंने देखा कि मानवता में इस प्रकार का दोष अत्यंत हानिकारक है। मैं उपकरणों की मरम्मत के लिए जिम्मेदार थी और मेरी क्षमताओं के आधार पर कलीसिया के लिए यह उचित था कि वह मेरे लिए इस कर्तव्य की व्यवस्था करे। लेकिन मैं अपने कर्तव्य के साथ अपनी पसंद के अनुसार पेश आई थी और जैसे ही मुझे यह नया या दिलचस्प नहीं लगा, मैं ऊब गई और लापरवाह हो गई। यहाँ तक कि मैंने अपने कर्तव्य में बदलाव के बारे में भी सोचा। मुझमें निष्ठा का भाव कहाँ था? अगर मैं चीजों को नहीं बदलती और बिना किसी जिम्मेदारी की भावना के अपना कर्तव्य निभाती, तो मुझे बेनकाब किए जाने और बरखास्त होने का खतरा रहेगा।
जब मुझे यह समझ आया तो मैंने नूह के बारे में सोचा, जो 120 वर्षों तक जहाज बनाने में लगा रहा था, इसलिए मैंने परमेश्वर के वचन पढ़ने के लिए खोजे। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “नूह को जहाज बनाने में कितने वर्ष लगे? (120 वर्ष।) आज के लोगों के लिए 120 वर्ष क्या दर्शाते हैं? यह एक सामान्य व्यक्ति के जीवन-काल से अधिक लंबा समय है, शायद दो लोगों के जीवन-काल से भी अधिक लंबा। और फिर भी 120 वर्षों तक नूह ने एक ही काम किया, और उसने हर दिन वही काम किया। उस पूर्व-औद्योगिक समय में, सूचना-संचार से पहले के उस युग में, जब सब-कुछ लोगों के दो हाथों और शारीरिक श्रम पर निर्भर था, नूह ने हर दिन वही काम किया। 120 सालों तक उसने काम नहीं छोड़ा, न ही वह रुका। एक सौ बीस साल : हम इसकी कल्पना भी कैसे कर सकते हैं? क्या मानवजाति में से कोई और 120 साल तक एक ही काम करने के लिए प्रतिबद्ध रह पाता? (नहीं।) 120 साल तक कोई भी एक ही काम करने के लिए प्रतिबद्ध नहीं रह सकता था, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। और फिर भी एक व्यक्ति था, जो 120 वर्षों तक, बिना किसी फेर-बदल के, परमेश्वर ने उसे जो सौंपा था, उसमें दृढ़ता से लगा रहा, उसने न कभी कोई शिकायत की और न ही कभी हार मानी, वह किसी भी बाहरी परिवेश से अप्रभावित रहा, और अंततः उसने ठीक उसी तरह कार्य संपन्न कर दिया, जैसा परमेश्वर ने कहा था। यह किस प्रकार का मामला था? मानवजाति में यह दुर्लभ था, असामान्य—यहाँ तक कि यह अद्वितीय था। मानव-इतिहास के लंबे प्रवाह में, उन सभी मानवजातियों में जिन्होंने परमेश्वर का अनुसरण किया, इसकी कोई मिसाल नहीं मिलती। इसमें लगी इंजीनियरिंग की विशालता और जटिलता, इसके लिए अपेक्षित शारीरिक बल और परिश्रम, और इसमें लगी अवधि को देखते हुए यह कोई आसान काम नहीं था, इसलिए जब नूह ने यह कार्य संपन्न किया, तो यह मानवजाति के बीच अद्वितीय कार्य था, और वह उन सभी के लिए एक आदर्श और मिसाल है, जो परमेश्वर का अनुसरण करते हैं। नूह ने केवल कुछ ही संदेश सुने थे, और उस समय परमेश्वर ने ज्यादा वचन व्यक्त नहीं किए थे, इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि नूह ने बहुत-से सत्य नहीं समझे थे। उसे न आधुनिक विज्ञान की समझ थी, न आधुनिक ज्ञान की। वह एक अत्यंत सामान्य व्यक्ति था, मानवजाति का एक मामूली सदस्य। फिर भी एक मायने में वह सबसे अलग था : वह परमेश्वर के वचनों का पालन करना जानता था, वह जानता था कि परमेश्वर के वचनों का अनुसरण और पालन कैसे करना है, वह जानता था कि मनुष्य का उचित स्थान क्या है, और वह परमेश्वर के वचनों पर वास्तव में विश्वास कर उनके प्रति समर्पित होने में सक्षम था—इससे अधिक कुछ नहीं। नूह को परमेश्वर द्वारा सौंपे गए काम को क्रियान्वित करने देने के लिए ये कुछ सरल सिद्धांत पर्याप्त थे, और वह इसमें केवल कुछ महीनों, कुछ वर्षों या कुछ दशकों तक नहीं, बल्कि एक शताब्दी से भी अधिक समय तक दृढ़ता से जुटा रहा। क्या यह संख्या आश्चर्यजनक नहीं है? नूह के अलावा इसे और कौन कर सकता था? (कोई नहीं।) ... नूह परमेश्वर की आज्ञा पूरी करने में सक्षम इसलिए था, क्योंकि जब नूह ने परमेश्वर के वचन सुने, तो वह उन्हें दृढ़ता से अपने दिल में बसाए रखने में सक्षम था; उसके लिए परमेश्वर की आज्ञा एक जीवन भर की जिम्मेदारी थी, उसकी आस्था अटूट थी, उसकी इच्छा सौ वर्षों तक अपरिवर्तित रही। चूँकि उसके पास परमेश्वर का भय मानने वाला हृदय था, वह एक वास्तविक व्यक्ति था, और उसमें इस बात का अत्यधिक विवेक था इसलिए परमेश्वर ने उसे जहाज के निर्माण का काम सौंपा है” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक दो : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग एक))। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मैं बहुत भावुक और शर्मिंदा हो गई। नूह ने परमेश्वर के ज्यादा वचन नहीं सुने थे, न ही उसने ज्यादा सत्य समझा था, फिर भी वह एक सौ बीस वर्षों तक परमेश्वर के आदेश पर डटा रहा। ऐसा इसलिए था क्योंकि उसके पास अंतरात्मा और विवेक था। जब नूह ने परमेश्वर को दुनिया के जलप्रलय से नष्ट होने से पहले जहाज बनाने के लिए कहते सुना, तो उसने परमेश्वर के तात्कालिक इरादे का अनुभव किया और उसके हृदय में परमेश्वर के प्रति विचारशीलता विकसित होनी शुरू हो गई। उसने जहाज बनाने को अपने सबसे महत्वपूर्ण और जरूरी काम की तरह लिया। जहाज बनाने की विशाल परियोजना पूरी करने के दौरान नूह को कठिनाइयों, असफलताओं, बीमारी, थकान, अपने परिवार की नासमझी और दुनिया के लोगों के उपहास और बदनामी का सामना करना पड़ा, लेकिन शुरू से अंत तक वह परमेश्वर के आदेश पर डटा रहा और उसे त्यागने के बारे में कभी नहीं सोचा। उसने लगातार इस बात के लिए गहरा आभार भी महसूस किया कि परमेश्वर ने उसे इतना महत्वपूर्ण आदेश सौंपा था और वह अक्सर परमेश्वर द्वारा की गई बड़ाई से प्रेरित होता था। परमेश्वर के वचनों और परमेश्वर के आदेश के प्रति नूह का रवैया आज्ञापालन और स्वीकार करने; समर्पण और दृढ़ रहने का था। यह नूह की अंतरात्मा और विवेक की अभिव्यक्ति थी। ऐसा चरित्र सचमुच बहुत अनमोल होता है! जब मैंने परमेश्वर को पूछते देखा, “नूह 120 साल तक टिके रहने में सक्षम था। तुम लोग कितने साल तक टिके रह सकते हो?” (वचन, खंड 4, मसीह-विरोधियों को उजागर करना, अनुपूरक दो : कैसे नूह और अब्राहम ने परमेश्वर के वचनों का पालन किया और उसके प्रति समर्पण किया (भाग एक))। तो मेरे पास सचमुच जवाब में कहने के लिए कुछ नहीं था! इन वर्षों में मैंने परमेश्वर के अनेक वचनों के सिंचन और प्रावधान का और परमेश्वर की देखभाल और सुरक्षा का आनंद लिया था, लेकिन केवल दो वर्षों तक उपकरण की मरम्मत का कर्तव्य करने के बाद मैं और अधिक नहीं टिक सकी, बेपरवाह और लापरवाह होने लगी। मुझमें सचमुच अंतरात्मा या विवेक का जरा भी अंश नहीं था और मैं बिल्कुल भी भरोसेमंद नहीं थी! मुझे बेहद पछतावा और आत्मग्लानि हुई और मैंने पश्चात्ताप में परमेश्वर से प्रार्थना की, “प्रिय परमेश्वर, चाहे मुझे यह कर्तव्य कितने भी लंबे समय तक करने को कहा जाए, मैं इसे उचित ढंग से करने की इच्छुक हूँ और अब मैं इसे अपनी पसंद के आधार पर नहीं करूँगी।”
बाद में जब हम सारांश तैयार कर रहे थे, तो मुझे पता चला कि मेरे कर्तव्य में अभी भी बहुत सी समस्याएँ थीं। मुझमें मरम्मत के कौशल बहुत औसत दर्जे के थे और मुझे अभी भी कौशल सीखते रहने की जरूरत थी। मगर चूँकि मैं प्रगति करने का प्रयास नहीं कर रही थी और पेशेवर कौशल सीखने पर ध्यान केंद्रित नहीं कर रही थी, इसलिए मेरे मरम्मत के कौशल में अधिक सुधार नहीं हुआ था। मैं वास्तव में बहुत घमंडी और आत्म-तुष्ट थी। मैंने अपनी कमियों की पहचान नहीं की थी और मुझे लगता था कि मैं यह काम करना जानती हूँ या इस काम में निपुण हूँ और इस कर्तव्य में अब कोई कठिनाई या चुनौती नहीं है। मैं सचमुच बहुत अज्ञानी थी और मुझे अपने बारे में बिल्कुल भी सही समझ नहीं थी। इसके बाद मुझे परमेश्वर की अपेक्षाओं के अनुसार अपने कर्तव्य के प्रति गंभीर होना पड़ा, अपनी कमियों और खामियों का पता लगाना पड़ा और अपने कौशल को बेहतर बनाने का तरीका खोजना पड़ा ताकि मैं अपना कर्तव्य मानकों के अनुरूप निभा सकूँ।
इसके बाद मैंने अपना कर्तव्य बदलने के बारे में नहीं सोचा, बल्कि यह सोचा कि अपने कर्तव्य को अच्छी तरह से कैसे निभाऊँ। जब मेरी मानसिकता बदली, तो चिड़चिड़ेपन और ऊब की मेरी पिछली भावनाएँ गायब हो गईं और मैं अपने हृदय को अपने कर्तव्यों के प्रति समर्पित करने में सक्षम थी। समस्या चाहे आसान हो या कठिन, मैं उससे गंभीरता से निपटने में सक्षम हूँ और अपने भाई-बहनों को उनके उपकरणों का उपयोग करने से रोके बिना उन्हें जल्द से जल्द ठीक करने के लिए समय और प्रयास लगाती हूँ। मैं परमेश्वर के वचनों के प्रकाशन का धन्यवाद करती हूँ जिन्होंने मुझे अपने कर्तव्य निभाने की दशा की कुछ समझ दी और उसमें कुछ बदलाव लाने में मेरी मदद की। मैं अपने हृदय की गहराइयों से परमेश्वर का धन्यवाद करती हूँ!