18. क्या ज्ञान व्यक्ति की नियति को सचमुच बदल सकता है?
मेरा जन्म नेपाल के एक ग्रामीण परिवार में हुआ था। मेरे माता-पिता दोनों किसान थे और उनकी पारिवारिक स्थितियाँ अच्छी न होने के कारण उन्हें पढ़ने का मौका नहीं मिला, इसलिए उन्होंने मुझे विकसित करने के लिए बहुत मेहनत की। वे अक्सर मुझसे कहते थे, “तुम्हें मेहनती बनना होगा और मन लगाकर पढ़ाई करनी होगी।” वे जानते थे कि अगर मैंने अच्छी तरह से पढ़ाई नहीं की, तो मुझे भविष्य में कोई अच्छी नौकरी नहीं मिल पाएगी और मुझे भी उन्हीं की तरह एक मुश्किल जीवन जीना पड़ेगा। जब भी मैं अपने माता-पिता को इतनी मेहनत करते हुए देखता, तो मुझे लगता कि मुझे और भी ज्यादा मेहनत करनी चाहिए, ताकि भविष्य में मुझे एक अच्छी नौकरी मिल सके, मैं बहुत सारा पैसा कमा सकूँ और अपने परिवार के लिए एक बड़ा घर बना सकूँ, जिससे वे एक सुखी जीवन जी सकें। शुरू में, मैंने एक साधारण सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। वहाँ पढ़ाने की अच्छी सुविधाएँ नहीं थीं और छात्रों के नंबर आम तौर पर खराब आते थे। अपने दोस्तों को एक अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में पढ़ते देखकर मैं भी सच में वहीं जाना चाहता था। मेरे माता-पिता भी सोचते थे कि यूँ तो अंग्रेजी माध्यम के स्कूल की फीस बहुत महंगी है, लेकिन अगर मैं किसी अच्छे स्कूल में पढ़ सकूँ तो भविष्य में मेरे लिए अच्छी नौकरी पाना अधिक आसान रहेगा। बाद में, जैसा कि मैं चाहता था, मुझे एक सरकारी अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में दाखिला मिल गया। शुरू में मेरे अंक बहुत अच्छे नहीं थे, इसलिए मैंने दोगुनी मेहनत की। मैं हर दिन जल्दी उठकर पिछले दिन सीखी हुई बातों को दोहराता, अपने लिए लक्ष्य तय करता, पढ़ाई की योजनाएँ बनाता और जो बातें समझ नहीं आती थीं, उनके बारे में शिक्षकों से पूछता था। लगातार कोशिशों से मेरे नंबरों में काफी सुधार हुआ।
स्कूल में शिक्षक हमें प्रायः सीख देते थे कि ज्ञान प्राप्त करके ही हमारा भविष्य बेहतर और उज्ज्वल हो सकता है और एक ऐसी नौकरी पा सकते हैं जो दूसरों का सम्मान अर्जित करेगी। मैं प्रतिष्ठा और सफलता पाने के लिए डॉक्टर बनना चाहता था और अपने परिवार को एक सुखी जीवन जीने देने के लिए पैसा भी कमाना चाहता था, इसलिए मैंने और भी ज्यादा मेहनत से पढ़ाई की। हर दिन मैं समय पर क्लास में जाता था और मैंने एक भी क्लास नहीं छोड़ी। मैं क्लास में ध्यान से सुनता और घर वापस आने के बाद अपने नोट्स बार-बार पढ़ता और अन्य किताबें और सामग्री भी पढ़ता था। मैं हर दिन पढ़ने में व्यस्त रहता था और दोस्तों के साथ घूमने-फिरने के लिए मेरे पास लगभग बिल्कुल भी समय नहीं था। मुझे लगता था कि मुझे एक मिनट भी बर्बाद नहीं करना चाहिए। मेरे नंबर बेहतर से बेहतर होते गए और यहाँ तक कि मेरे दोस्तों से भी आगे निकल गए। मैं यह मानकर बहुत खुश था कि अगर मैं मेहनत करता रहा तो जो कुछ भी मैं चाहता हूँ वह सब पा सकता हूँ : डॉक्टर बनूँगा, रुतबा और प्रतिष्ठा प्राप्त करूँगा और खूब सारा पैसा हासिल करूँगा। इसलिए मैंने मेडिकल स्कूल की प्रवेश परीक्षा देने की योजना बनाई। लेकिन महामारी के कारण मैं प्रवेश परीक्षा की तैयारी करने के लिए स्कूल नहीं जा सका। मैं केवल घर पर ऑनलाइन तैयारी कर सकता था। ऑनलाइन परीक्षाओं में मेरे नंबर अच्छे नहीं थे और मुझे चिंता हुई कि अगर ऐसा ही चलता रहा तो मैं अच्छे नंबर नहीं ला पाऊँगा और तब मुझे छात्रवृत्ति नहीं मिल पाएगी। अपने परिवार की माली हालत के कारण हम इतनी ऊँची फीस बिल्कुल भी वहन नहीं कर सके। कुछ महीने बाद मैंने प्रवेश परीक्षा दी। यूँ तो मैं पास हो गया, लेकिन मेरे अंक इतने अधिक नहीं थे कि मुझे छात्रवृत्ति मिल सके। मेरा दिल टूट गया, मुझे लगा कि मेरी साल भर की मेहनत बर्बाद हो गई है। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और अगले साल की प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी। लेकिन महामारी का एक और दौर शुरू होने के कारण मैं फिर से केवल घर पर ही ऑनलाइन तैयारी कर सकता था। मैंने सोचा कि इस बार चाहे कुछ भी हो जाए, मुझे छात्रवृत्ति पानी ही होगी। इसलिए मैंने पहले साल से भी ज्यादा मेहनत की, सुबह 6 बजे से लेकर रात 12 बजे तक पढ़ाई की। कभी-कभी नींद की कमी के कारण मेरा सिर भारी हो जाता था, लेकिन मैं आराम नहीं करता था। लेकिन अनेक ऑनलाइन परीक्षाओं में अपने लगातार खराब अंक देखकर मैं धीरे-धीरे चिंतित होने लगा, सोचने लगा, “अगर मैं अपना लक्ष्य हासिल नहीं कर पाया, तो मेरे दोस्त और पड़ोसी मेरे बारे में क्या सोचेंगे? अगर मैं डॉक्टर नहीं बन सकता हूँ तो मेरा भविष्य अंधकारमय होगा। मैं हमेशा अपने झंडे गाड़ने, एक बड़ा घर बनाने और अपने परिवार को एक खुशहाल जीवन देने का सपना देखा है, लेकिन ये सारे सपने बिखर जाएँगे।” इन नकारात्मक विचारों ने मुझे और भी चिंतित कर दिया, जिससे मेरी मानसिक स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ने लगी और अंततः मुझे हल्का अवसाद रहने लगा। जब मैं उदास होता था, तो मैं पूरी रात सो नहीं पाता था और मुझे भूख भी नहीं लगती थी। कभी-कभी तो मैं पूरी रात रोते हुए बिता देता था। उन तीन महीनों के दौरान मैं अवसाद के कारण बहुत पीड़ा में था, लेकिन मैं नहीं जानता था कि इससे बाहर कैसे निकलूँ। मैंने यूट्यूब पर बहुत सारे प्रेरणादायक वीडियो देखे थे, लेकिन मेरी हालत में बिल्कुल भी सुधार नहीं हुआ।
तीन महीने बाद, मुझे यूट्यूब पर प्रभु की प्रशंसा करने वाले भजन और प्रार्थना के बारे में वीडियो मिले। ये भजन और प्रार्थनाएँ सुनकर मेरा दिल धीरे-धीरे शांत हो गया। मैंने हर सुबह और शाम प्रार्थना करना शुरू कर दिया। प्रार्थना करने के बाद मेरे मन के कुछ नकारात्मक विचार धीरे-धीरे गायब हो जाते थे और मेरी मनोदशा अच्छी होती जाती थी। लगभग दो महीनों तक मैंने हर दिन बाइबल पढ़ी और भजन सुने। मैंने प्रभु यीशु के वचन पढ़े : “हे सब परिश्रम करनेवालो और बोझ से दबे हुए लोगो, मेरे पास आओ; मैं तुम्हें विश्राम दूँगा। मेरा जूआ अपने ऊपर उठा लो, और मुझ से सीखो; क्योंकि मैं नम्र और मन में दीन हूँ : और तुम अपने मन में विश्राम पाओगे। क्योंकि मेरा जूआ सहज और मेरा बोझ हल्का है” (मत्ती 11:28-30)। इन वचनों ने मुझे बहुत दिलासा दिया। मुझे लगा कि प्रभु यीशु मेरे ठीक बगल में है और मुझे दर्द से बाहर निकलने में मदद कर रहा है; मेरे दिल पर दबाव बहुत कम होता गया और मैंने प्रभु में विश्वास करना शुरू कर दिया। पलक झपकते ही तीन महीने बीत गए और मैंने दूसरी बार प्रवेश परीक्षा दी। मेरे अंक अब भी इतने अधिक नहीं थे कि मुझे छात्रवृत्ति मिल पाती, लेकिन इस बार मुझे पहले जैसा दर्द महसूस नहीं हुआ। कुछ दिनों बाद मुझे पता चला कि एक दोस्त आईईएलटीएस परीक्षा की तैयारी कर रहा है और ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने की योजना बना रहा है। मुझे एहसास हुआ कि डॉक्टर बनना ही मेरा एकमात्र विकल्प नहीं है और मैं भी पढ़ने और एक बेहतर जीवन बनाने के लिए ऑस्ट्रेलिया जा सकता हूँ। इसलिए मैंने आईईएलटीएस परीक्षा की तैयारी शुरू कर दी।
परीक्षा की तैयारी के दौरान मैंने फेसबुक पर एक अंश पढ़ा : “जिस क्षण तुम रोते हुए इस दुनिया में आते हो उसी पल से तुम अपनी जिम्मेदारियाँ निभाना शुरू कर देते हो। परमेश्वर की योजना और उसके विधान की खातिर तुम अपनी भूमिका निभाते हो और अपनी जीवन यात्रा शुरू करते हो। तुम्हारी पृष्ठभूमि जो भी हो और तुम्हारी आगे की यात्रा जैसी भी हो, किसी भी स्थिति में कोई भी स्वर्ग के आयोजनों और व्यवस्थाओं से बच नहीं सकता और कोई भी अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकता, क्योंकि जो सभी चीजों का संप्रभु है सिर्फ वही ऐसा करने में सक्षम है” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर मनुष्य के जीवन का स्रोत है)। ये वचन बहुत सही लगे। हमारे बारे में सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। हमारी नियति भी परमेश्वर की संप्रभुता और व्यवस्थाओं के अधीन है; हम अपनी नियति को नियंत्रित नहीं कर सकते हैं। मैंने अपने अनुभवों के बारे में सोचा : मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानता था और मुझे लगता था कि मैं अपनी कोशिशों से अमीर बन सकता हूँ और सुखी जीवन जी सकता हूँ। लेकिन मैंने चाहे कितनी भी मेहनत की और योजना बनाई, आखिरकार मैं नाकाम रहा और यहाँ तक कि मुझे अवसाद भी रहने लगा। इस अंश को पढ़ने के बाद मैं समझ गया कि मैं किस परिवार में पैदा हुआ, किस माहौल में पला-बढ़ा और मेरा भविष्य कैसा होगा—यह सब व्यवस्था परमेश्वर द्वारा पहले ही की जा चुकी थी और मैं चाहे कितनी भी कोशिश कर लूँ, मैं अपनी नियति को नहीं बदल सकता हूँ। कुछ देर बाद एक बहन ने मुझे एक ऑनलाइन सभा में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया। लेकिन अगले दिन मुझे आईईएलटीएस की परीक्षा देनी थी और मुझे अपने प्रदर्शन को लेकर थोड़ी-सी चिंता थी। अगर परीक्षा में मेरे अंक अच्छे नहीं आए तो मैं ऑस्ट्रेलिया जाने का अपना सपना पूरा नहीं कर पाऊँगा और मेरा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। यह मेरा आखिरी मौका हो सकता है और अगर मैं नाकाम रहा, तो मैं अपने दोस्तों में सबसे फिसड्डी साबित होऊँगा और मेरे माता-पिता और दोस्त भी निश्चित रूप से मुझे निकम्मा समझेंगे। जैसे ही मैं यह सोच रहा था, मैंने देखा कि सभा के उपदेश का विषय था “मैं एक दुखद जीवन जी रहा हूँ—मुझे क्या करना चाहिए?” मैं तुरंत इसकी ओर खिंचा चला गया। एक भाई ने कुछ अंश साझा किए : “चूँकि लोग परमेश्वर के आयोजनों और परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानते हैं, इसलिए वे हमेशा प्रतिरोधी मनोदशा से और विद्रोही रवैये के साथ नियति का सामना करते हैं और वे हमेशा परमेश्वर के अधिकार, उसकी संप्रभुता और अपनी नियति में होने वाली चीजों से मुक्त होना चाहते हैं, व्यर्थ ही यह आशा रखते हैं कि वे अपनी वर्तमान परिस्थितियों को बदल देंगे और अपनी नियति को पलट देंगे। परंतु वे कभी भी सफल नहीं हो सकते हैं और वे हर मोड़ पर नाकामियों का सामना करते हैं। उनकी आत्मा की गहराइयों में घटित होने वाला यह संघर्ष उन्हें पीड़ा देता है और यह पीड़ा हड्डियों तक उतर जाती है, साथ ही यह उनसे उनका जीवन व्यर्थ करवा देती है। इस पीड़ा का कारण क्या है? क्या यह परमेश्वर की संप्रभुता के कारण है या दुर्भाग्य के कारण? स्पष्ट है कि दोनों में कोई भी बात सही नहीं है। अंतिम विश्लेषण में, लोग जिस मार्ग पर चलते हैं और अपना जीवन जीने के जो तरीके वे चुनते हैं, उसी कारण से ऐसा होता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “शैतान लोगों के विचारों को नियंत्रित करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल करता है, उनसे और कुछ नहीं, बस इन दो ही चीजों के बारे में सोच-विचार करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ के लिए संघर्ष करवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए कष्ट उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपमान सहन करवाता है और भारी बोझ उठवाता है, प्रसिद्धि और लाभ के लिए अपना सर्वस्व बलिदान करवाता है और उनसे प्रसिद्धि और लाभ की खातिर हर फैसला या निर्णय करवाता है। इस तरीके से शैतान लोगों पर अदृश्य बेड़ियाँ डाल देता है और इन बेड़ियों के रहते उन बंधनों से मुक्त होने की न तो क्षमता होती है, न ही साहस। अनजाने में वे बड़ी ही कठिनाई से कदम-दर-कदम आगे घिसटते हुए ये बेड़ियाँ ढोते रहते हैं। इस प्रसिद्धि और लाभ की खातिर मानवजाति भटककर परमेश्वर से दूर हो जाती है, उसके साथ विश्वासघात करती है और अधिकाधिक दुष्ट होती जाती है। इस तरह, एक के बाद एक पीढ़ी शैतान की प्रसिद्धि और लाभ के बीच नष्ट होती जाती है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। भाई ने वचन पढ़ने के बाद संगति की, “हजारों सालों से लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करने के लिए शैतान नास्तिकता, भौतिकवाद और विकासवाद का इस्तेमाल करता आया है, जिसके कारण वे परमेश्वर के अस्तित्व को नकारते हैं और यह भी नकारते हैं कि परमेश्वर ने स्वर्ग, पृथ्वी और सभी चीजों को बनाया है; नतीजतन, लोग परमेश्वर से दूरी बना लेते हैं और अब और उसकी आराधना नहीं करते हैं। इतना ही नहीं, शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए प्रसिद्धि और लाभ का भी इस्तेमाल करता है, वह ऐसी बातें कहता है, जैसे कि, ‘भीड़ से ऊपर उठो और अपने पूर्वजों का नाम करो’ और ‘किसी व्यक्ति की नियति उसी के हाथ में होती है।’ इन ख्यालों और दृष्टिकोणों के असर में आकर हम यह मानने लगते हैं कि केवल पैसा, प्रसिद्धि और लाभ पाकर ही हम दूसरों का सम्मान जीत सकते हैं और एक खुशहाल जीवन जी सकते हैं। इसलिए बहुत-से लोग धन-दौलत का जीवन जीने के लिए हर दिन मशक्कत और संघर्ष करते हैं। वे ओवरटाइम काम करते हैं और अंततः कम उम्र में ही तरह-तरह की बीमारियों से घिर जाते हैं। कुछ लोग अपने करियर में सफल होने के लिए तमाम तरह की चालों और साजिशों का सहारा लेते हैं, दूसरों का इस्तेमाल करते हैं और उन्हें धोखा देते हैं और आगे बढ़ने के लिए दूसरों को बेरहमी से कुचलते हैं। भले ही वे सफल हो जाएँ, उनके दिलों में कोई शांति नहीं होती और वे फिर भी दुख में जीते हैं। ऐसे भी बहुत-से लोग हैं जो बहुत सारी मेहनत करते हैं लेकिन अलग पहचान नहीं बना पाते हैं। नतीजतन वे निराशावादी और हताश महसूस करते हैं, यहाँ तक कि संसार से थक जाते हैं और कुछ लोग आत्महत्या कर अपने जीवन का अंत करने का रास्ता चुनते हैं। यह सब शैतान द्वारा लोगों को सताए जाने के कारण होता है।” भाई की संगति ने मुझ पर गहरी छाप छोड़ी और मुझे वे मुश्किलें याद आ गईं जो मैंने अनुभव की थीं। चूँकि मैंने बचपन से ही अपने माता-पिता को कड़ी मेहनत करते देखा था, इसलिए मैं मन लगाकर पढ़ाई करके डॉक्टर बनना चाहता था ताकि रुतबा और प्रतिष्ठा पा सकूँ और इस तरह अपने परिवार को एक सुखी जीवन देने में सक्षम बना सकूँ। इसके लिए मैंने बहुत मेहनत की। खासकर जब मैंने अंग्रेजी माध्यम के स्कूल में दाखिला लिया, तो मैंने और भी ज्यादा मेहनत से पढ़ाई की। मैंने दोस्तों के साथ घूमना-फिरना बंद कर दिया और घर के काम करते समय भी मैं यही सोचता था कि क्या पढ़ना है। मैं अक्सर देर रात तक भी पढ़ता था। अपने सहपाठियों से अलग पहचान बनाने के लिए मैं हर दिन 12 से 15 घंटे तक पढ़ता था। लेकिन अंत में मैं फिर भी विफल रहा। मुझे अवसाद भी हो गया और मुझे मेडिकल स्कूल जाने की अपनी योजनाएँ रोकने के लिए मजबूर होना पड़ा। जब भी मैं यह सोचता कि मैं अपने दोस्तों से बहुत पीछे रह जाऊँगा, तो मेरे दिल में दर्द होता और ऐसा लगता मानो मेरे सीने पर किसी ने एक भारी-भरकम पत्थर रख दिया हो। मुझे लगता था कि मेरा भविष्य पूरी तरह से अंधकारमय है और मैं अक्सर पूरी रात सो नहीं पाता था, मुझे यह चिंता होती थी कि मेरा क्या होगा। मैं सोचने लगा, “मेरा जीवन ऐसी मुश्किल में क्यों पड़ गया है? मैं इतनी मेहनत आखिर किस चीज के लिए कर रहा था? मैं एक सुखी जीवन के लिए लालायित रहा हूँ तो मेरा जीवन बद से बदतर क्यों होता जा रहा है?” लेकिन अब मैं समझ गया था। मेरे कष्ट सहने की जड़ शैतान की भ्रष्टता थी। मैं पूरी तरह से पैसे, प्रसिद्धि और लाभ का गुलाम बन गया था। परमेश्वर के वचनों ने उजागर न किया होता तो मुझे कभी पता नहीं चलता कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए पैसे, प्रसिद्धि, लाभ और रुतबे का इस्तेमाल करता है। रुतबा, प्रसिद्धि और लाभ वे अदृश्य बेड़ियाँ हैं जो शैतान लोगों पर डालता है, जिससे उनका मुक्त होना बहुत मुश्किल हो जाता है। प्रतिष्ठा और रुतबा पाने के लिए मैंने खुद को पूरी तरह से शैतान को सौंप दिया और अंतहीन मुश्किलें सहीं। मैं ये सत्य समझ सका और यह प्रबोधन प्राप्त कर सका, यह परमेश्वर का प्रेम और उद्धार था!
फिर भाई ने एक और सवाल भेजा : “तो हम इस दुख से कैसे बच सकते हैं?” फिर उसने कुछ और अंश भेजे : “अपनी क्षमताओं और बुद्धि में अंतर के बावजूद और चाहे उनमें संकल्प हो या न हो, भाग्य के सामने सभी लोग समान हैं, जहाँ महान और छोटे, ऊँच और नीच, प्रतिष्ठित और तुच्छ के बीच कोई भेद नहीं किया जाता। कोई किस पेशे में संलग्न होता है, वह अपनी आजीविका के लिए क्या करता है और जीवन में उसके पास कितना धन होता है, यह उसके माता-पिता, उसकी प्रतिभा या उसके प्रयासों और महत्वाकांक्षाओं पर निर्भर नहीं करता—यह सृष्टिकर्ता की पूर्वनियति पर निर्भर करता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “जब लोग नहीं जानते कि भाग्य क्या है या परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं समझते हैं तो वे बस मनमर्जी से धुंध में हाथ-पैर मारते हुए और लड़खड़ाते हुए आगे बढ़ते हैं और यह यात्रा बहुत ही कठिन होती है और दिल में बहुत अधिक दर्द उत्पन्न करती है। इसलिए जब लोगों को यह एहसास होता है कि परमेश्वर मानव भाग्य पर संप्रभु है तो चतुर लोग परमेश्वर की संप्रभुता को जानना और स्वीकार करना चुनते हैं और भाग्य के खिलाफ संघर्ष जारी रखने और अपने तरीके से अपने तथाकथित जीवन लक्ष्यों का पीछा करने के बजाय ‘अपने स्वयं के हाथों से एक अच्छा जीवन बनाने की कोशिश करने’ के दर्दनाक दिनों को अलविदा कहते हैं। जब कोई व्यक्ति परमेश्वर के बिना होता है, जब वह उसे नहीं देख सकता है, जब वह वास्तव में और स्पष्टता से परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जान पाता है तो उसका हर दिन निरर्थक, बेकार और अवर्णनीय रूप से पीड़ादायक होता है। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कोई व्यक्ति कहाँ है और उसका क्या काम है, उसके जीने के साधन और जिन लक्ष्यों का वह अनुसरण करता है वे उसे केवल अंतहीन दिल का दर्द और ऐसी पीड़ा देते हैं जिससे उबरना कठिन होता है, जो ऐसे अनुभव हैं जिन्हें वह पीछे मुड़कर देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाता है। सृष्टिकर्ता की संप्रभुता को स्वीकार करके, उसके आयोजनों और उसकी व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करके और एक सच्चा मानव जीवन हासिल करने का अनुसरण करके ही कोई व्यक्ति धीरे-धीरे समस्त दिल के दर्द और पीड़ा से मुक्त हो सकता है और धीरे-धीरे मानव जीवन के सारे खालीपन से खुद को छुटकारा दिला सकता है” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है III)। “मनुष्य आखिर मनुष्य है; परमेश्वर के दर्जे और जीवन की जगह कोई मनुष्य नहीं ले सकता। मानवजाति को केवल एक ऐसे न्यायपूर्ण समाज की ही आवश्यकता नहीं है जिसमें हर व्यक्ति को भरपेट भोजन मिले, सभी समान और स्वतंत्र हों; मानवजाति को जिस चीज की जरूरत है वह है परमेश्वर का उद्धार और मनुष्य के लिए उसके जीवन का पोषण” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परिशिष्ट 2 : परमेश्वर संपूर्ण मानवजाति के भाग्य पर संप्रभु है)। ये अंश पढ़ने के बाद भाई ने संगति की, “परमेश्वर मानवजाति की नियति पर संप्रभुता रखता है। युगों से पहले ही परमेश्वर ने यह पूर्वनिर्धारित कर दिया था कि हम किस तरह के परिवार में पैदा होंगे, कौन-सा पेशा अपनाएँगे और हमारे पास कितनी दौलत होगी। सृजित प्राणी होने के नाते हमें नियति के खिलाफ संघर्ष नहीं करना चाहिए और हमें परमेश्वर के आयोजनों और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना चाहिए और वह सब कुछ स्वीकार करना चाहिए जो सृष्टिकर्ता ने हमारे लिए तैयार किया है। केवल तभी हमारे दिलों को शांति और खुशी मिल सकती है और केवल तभी हम किसी चिंता के बगैर और सहज होकर जी सकते हैं।” भाई की संगति खत्म होने के बाद मैंने सोचा कि मैंने डॉक्टर बनने का अपना लक्ष्य हासिल करने के लिए कितनी मेहनत और कोशिश की थी। लेकिन इसका अंत नाकामी में हुआ और मुझे समझ नहीं आया कि यह सब मेरे साथ क्यों हुआ। क्या मैं पैदाइशी बदकिस्मत था या मैंने पर्याप्त कड़ी मेहनत नहीं की थी? अब मैं समझ गया था कि मैं इतना दुखी इसलिए था क्योंकि मैं परमेश्वर की संप्रभुता को नहीं जानता था। परमेश्वर मानव के भाग्य का संप्रभु है, और मैं किस तरह के परिवार में पैदा होऊँगा, कौन-सा पेशा अपनाऊँगा, अपने जीवन में मेरे पास कितनी दौलत होगी और मैं किस उम्र में मरूँगा, ऐसी सारी चीजें परमेश्वर द्वारा पूर्वनिर्धारित की जा चुकी हैं। अगर मैं चिंता और दुख से बचना चाहता था, तो मुझे परमेश्वर की संप्रभुता स्वीकार करनी थी और उसने जिन परिस्थितियों की व्यवस्था की है, उनके प्रति समर्पण करना था। जैसे कि आने वाली आईईएलटीएस परीक्षा के मामले में परिणाम चाहे जो भी हो, मैं स्वीकार और समर्पण करने को तैयार था। सभा खत्म होने के बाद मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “हे परमेश्वर, मुझे इस सभा में भाग लेने देने के लिए तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद। आज ही मुझे एहसास हुआ कि लोगों की सारी पीड़ा और कठिनाइयाँ शैतान द्वारा उत्पन्न की जाती हैं। शैतान ने मुझे गुमराह और भ्रष्ट करने के लिए रुतबे, प्रसिद्धि और लाभ का इस्तेमाल किया और मुझे तुम्हारी संप्रभुता से अनजान रखा। इसी वजह से मैं नियति को अपने हाथों में पकड़ना चाहता था और इस प्रकार अँधेरे में जी रहा था। मुझे प्रबुद्ध करने और शैतान की साजिशों की असलियत देखने देने के लिए तुम्हारा धन्यवाद। कल की परीक्षा का नतीजा चाहे जो भी हो, मैं उसे खुशी-खुशी स्वीकार करूँगा।” अगले दिन जब मैंने परीक्षा दी, तो मेरा दिल बहुत शांत था। बिना किसी परेशानी के परीक्षा पूरी करने के बाद मैं घर चला गया। बाद में मुझे पता चला कि मैं परीक्षा में पास हो गया हूँ और मैं बहुत खुश हुआ। इसके बाद के दिनों में, जब मैं ऑस्ट्रेलिया जाने की तैयारी कर रहा था, तब मैं सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की सभाओं में भी शामिल होता था। उस दौरान मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर के बहुत-से वचन पढ़े। मैं मानवजाति को बचाने के परमेश्वर के कार्य के तीन चरणों, परमेश्वर के नामों के रहस्य, देहधारण के रहस्य, बाइबल की आंतरिक कहानी और अंत के दिनों में परमेश्वर के न्याय के कार्य, इत्यादि को समझ गया। मैंने अपने दिल से स्वीकार किया कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर ही लौटकर आया हुआ प्रभु यीशु है।
कुछ समय बाद मैं अपने माता-पिता और भाई-बहनों को सुसमाचार सुनाने लगा और उन सभी ने परमेश्वर के नए कार्य को स्वीकार कर लिया। रूस-यूक्रेन युद्ध के प्रकोप और हर जगह लगातार हो रही आपदाओं को देखकर मुझे एहसास हुआ कि परमेश्वर का कार्य समाप्त होने वाला है। लेकिन बहुत-से लोगों ने अभी तक परमेश्वर का उद्धार स्वीकार नहीं किया है और मुझे एहसास हुआ कि इस समय सुसमाचार का प्रचार करना अत्यंत महत्वपूर्ण है। अगर मैं ऑस्ट्रेलिया चला गया तो मेरे पास अपना कर्तव्य निभाने के लिए समय सीमित होगा। लेकिन ऑस्ट्रेलिया जाने का यह मौका बहुत मुश्किल से मिला था और अगर मैं नहीं गया, तो मेरी पिछली सारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी। तब मेरा भविष्य कैसा होगा? मैं यह अच्छा मौका गँवाना नहीं चाहता था। मेरे परिवार, पड़ोसियों और दोस्तों सबको ही पता था कि मैं ऑस्ट्रेलिया जाने वाला हूँ, इसलिए अगर मैं नहीं गया, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि मैं और अधिक धन कमाना और संपन्न जीवन जीना चाहता था और अगर मैं पढ़ने नहीं गया, तो मैं अपनी इच्छा पूरी नहीं कर पाऊँगा। एक तरफ मेरी पढ़ाई थी और दूसरी तरफ मेरा कर्तव्य। मैं बड़ी कश्मकश में था कि क्या चुनूँ।
एक दिन मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया की वेबसाइट पर “माँ की ममता” नाम की एक फिल्म देखी। उसमें परमेश्वर के वचनों के कुछ अंश थे, जिन्होंने सीधे मेरे दिल को छू लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “मानव ज्ञान में केवल सरल कथन और सिद्धांत ही शामिल नहीं होते, बल्कि कुछ विचार और दृष्टिकोण, साथ ही मानवीय बेतुकापन, पूर्वाग्रह और शैतानी विष भी होते हैं, कुछ ज्ञान तो लोगों को गुमराह और भ्रष्ट भी कर सकता है। यह शैतान का विष है। एक बार जब कोई इस विष को स्वीकार कर लेता है और उस पर महारत हासिल कर लेता है, तो यह उसके दिल में एक ट्यूमर बन जाएगा। यह ट्यूमर उसके पूरे शरीर में फैल जाएगा और यदि परमेश्वर के वचनों और सत्य से उसका उपचार नहीं किया गया तो अनिवार्य रूप से उसकी मृत्यु हो जाएगी। इसलिए, लोग जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करते और उस पर महारत हासिल करते हैं, उतनी ही कम संभावना होती है कि वे परमेश्वर के अस्तित्व में विश्वास करेंगे और इसके बजाय वे उसे नकारेंगे और उसका प्रतिरोध करेंगे। ऐसा इसलिए है क्योंकि ज्ञान कुछ ऐसा है जिसे वे देख सकते हैं और उस तक पहुँच सकते हैं, यह सीधे उनके जीवन, संभावनाओं और नियति से संबंधित है। लोग स्कूल में बहुत सारा ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं, लेकिन वे ज्ञान के स्रोत और आध्यात्मिक क्षेत्र के साथ उसके संबंध के प्रति अंधे होते हैं। अधिकांश ज्ञान जो लोग सीखते हैं और उस पर महारत हासिल करते हैं, वह परमेश्वर के वचनों के सत्य के विरुद्ध जाता है। विशेष रूप से, दार्शनिक भौतिकवाद और विकासवाद नास्तिकता के पाखंडों और भ्रांतियों के अंतर्गत आते हैं और निस्संदेह ऐसी भ्रांतियाँ हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करती हैं। ... किसी भी दर से, ये ज्ञान-संबंधी चीजें लोगों को गुमराह और भ्रष्ट करती हैं, उन्हें परमेश्वर के मार्ग से भटकाती हैं, परमेश्वर को नकारने, उसका प्रतिरोध करने और यहाँ तक कि उससे शत्रुता करने की ओर ले जाती हैं। इससे फर्क नहीं पड़ता है कि तुम लोग इस पर विश्वास करते हो या नहीं, या तुम इसे आज स्वीकार सकते हो या नहीं—वो दिन अवश्य आएगा जब तुम लोग इस तथ्य को मानोगे। ज्ञान लोगों को विनाश की ओर, नरक की ओर ले जा सकता है—क्या तुम लोग इसकी असलियत देख सकते हो?” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, अपना स्वभाव बदलने के लिए अभ्यास का मार्ग)। “भला यह ज्ञान क्या है—क्या तुम लोग मुझे बता सकते हो? क्या यह जीवन जीने के वे नियम और फलसफे नहीं हैं जिन्हें शैतान मनुष्य के भीतर डालता है, जैसे ‘पार्टी से प्यार करो, देश से प्यार करो, और अपने धर्म से प्यार करो’ और ‘बुद्धिमान इंसान हालात के अनुसार अपना रुख बदलता है’? क्या ये जीवन की ‘ऊँची आकांक्षाएँ’ नहीं हैं, जिन्हें शैतान द्वारा मनुष्य के भीतर डाला गया है, जैसे, महान लोगों की सोच, प्रसिद्ध लोगों की ईमानदारी या वीर शख्सियतों की बहादुरी की भावना या मार्शल आर्ट से जुड़े उपन्यासों में शूरवीरों और तलवारबाजों का शौर्य और उदारता? ये विचार और कथन पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों को प्रभावित करते हैं; बहुत-से लोग इन विचारों को स्वीकार करते हैं, और वे इन ‘ऊँची आकांक्षाओं’ को पूरा करने के लिए उनके पीछे भागते हैं, संघर्ष करते हैं और यहाँ तक कि अपने प्राणों की आहुति देने को भी तैयार रहते हैं। यह वह साधन और तरीका है जिसके द्वारा शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है। तो जब शैतान लोगों को इस मार्ग पर ले जाता है, तो क्या वे परमेश्वर के प्रति समर्पण और उसकी आराधना कर पाते हैं? और क्या वे परमेश्वर के वचन स्वीकार कर पाते हैं और सत्य का अनुसरण कर पाते हैं? बिल्कुल नहीं—क्योंकि वे शैतान द्वारा दिग्भ्रमित किए जा चुके हैं” (वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है VI)। परमेश्वर के वचनों के ये अंश पढ़कर मैं समझ गया कि शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग कैसे करता है। ठीक इसी फिल्म की तरह, मुख्य पात्र की माँ को अच्छी नौकरी नहीं मिल सकी क्योंकि उसके पास उच्च शिक्षा नहीं थी और उसके पास अपनी कंपनी में पदोन्नति का कोई मौका नहीं था। इसलिए वह उम्मीद करती थी कि उसका बच्चा एक अच्छे विश्वविद्यालय में दाखिला ले, ताकि उसका बच्चा एक अच्छी नौकरी पा सके, एक ऊँचे पद पर पदोन्नत हो सके और प्रसिद्धि और लाभ प्राप्त कर सके। शैतान लोगों को भ्रष्ट करने के लिए ज्ञान का उपयोग करता है, जिससे वे सोचते हैं कि केवल ज्ञान और उपाधियों से ही उनके पास एक अच्छा भविष्य हो सकता है और ज्ञान का मतलब है कि एक व्यक्ति सब कुछ पा सकता है। वे यह विश्वास नहीं करते कि परमेश्वर ने सब कुछ बनाया है और वे परमेश्वर की संप्रभुता में विश्वास नहीं करते। ऐसे विचार परमेश्वर के प्रति शत्रुतापूर्ण हैं। शैतान लोगों के अंदर हर तरह के शैतानी विष घोलने के लिए ज्ञान और विज्ञान का भी इस्तेमाल करता है और लोग जितना अधिक ज्ञान प्राप्त करते हैं, उतने ही अधिक भ्रष्ट और अहंकारी हो जाते हैं। लोग जितने अधिक शिक्षित होते हैं, उतना ही अधिक वे रुतबे और प्रसिद्धि के पीछे भागते हैं और विलासितापूर्ण जीवन की लालसा करते हैं। वे प्रसिद्धि और लाभ के लिए एक-दूसरे से लड़ते हैं, और इसके लिए वे कोई भी हथकंडा अपनाने से नहीं चूकते। यदि ये इच्छाएँ पूरी नहीं होती हैं, तो वे उदास हो जाते हैं और कुछ तो आत्महत्या करने की हद तक पीड़ित होते हैं। लोग जितना अधिक ज्ञान के पीछे भागते हैं, उतना ही वे परमेश्वर से दूर हो जाते हैं। मैं उन लोगों में शामिल था जिनके मन में शैतान ने जहर बैठा दिया था। बचपन से ही मैं अपनी कोशिशों और ज्ञान के अध्ययन के जरिए अपनी नियति को बदलना चाहता था। मैंने इसके लिए बहुत मेहनत की और बहुत अधिक पीड़ा सही। आखिरकार मुझे अवसाद हो गया और मेरा जीवन और भी बदतर हो गया। अब मैं समझ गया था कि शैतान ने मुझे एक ऐसे मार्ग पर ले जाने का प्रलोभन देने के लिए ज्ञान का इस्तेमाल किया जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं था। अगर मैं इसी रास्ते पर चलता रहता, तो मैं निश्चित रूप से शैतान द्वारा और भी गहराई से भ्रष्ट हो जाता और आखिरकार उसके साथ नरक में चला जाता। किसी व्यक्ति की नियति परमेश्वर के हाथ में होती है, फिर भी मैं हमेशा ज्ञान के माध्यम से अपनी नियति को बदलना चाहता था। क्या मैं परमेश्वर के विधान के विरुद्ध नहीं जा रहा था? सोचता हूँ कि क्या ज्ञान सच में मेरी नियति को बदल सकता है? क्या मैं सच में ज्ञान के माध्यम से पैसा और प्रतिष्ठा पा सकता हूँ? क्या यह मेरे माता-पिता और परिवार को एक सुखी जीवन दे सकता है? कुछ लोग बहुत ज्ञानी होते हैं और उनके पास उच्च शैक्षणिक योग्यताएँ होती हैं, लेकिन वे अपनी आदर्श नौकरी पाने और अधिक पैसा कमाने में नाकाम रहते हैं। वहीं दूसरी ओर जो लोग शिक्षित नहीं हैं या जिनके पास ज्यादा ज्ञान नहीं है, उनके पास बहुत धन-दौलत होती है। इससे हम देख सकते हैं कि एक व्यक्ति का भाग्य परमेश्वर ने बहुत पहले ही पूर्व-निर्धारित कर दिया है। इसका इससे कोई लेना-देना नहीं है कि उनके पास कितना ज्ञान है। फिल्म देखते समय मैंने इन सवालों पर विचार किया।
इसके बाद मैंने परमेश्वर के वचनों के कई अंश पढ़े और उनके अंदर उत्तर प्राप्त किए। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “जब लोग वास्तव में परमेश्वर को जान जाते हैं, सत्य को समझते हैं और सत्य प्राप्त करते हैं तो जीवन के प्रति उनकी विश्वदृष्टि और दृष्टिकोण वास्तविक बदलाव से गुजरते हैं, जिसके बाद उनके जीवन स्वभाव में भी वास्तविक परिवर्तन होता है। जब लोगों के सही जीवन-लक्ष्य होते हैं, जब वे सत्य का अनुसरण करने में सक्षम होते हैं और सत्य के अनुसार आचरण करते हैं, जब वे पूरी तरह से परमेश्वर के प्रति समर्पित होते हैं और उसके वचनों के अनुसार जीते हैं, जब वे अपने दिल की गहराई तक स्थिर और रोशन महसूस करते हैं, जब उनके दिल अँधेरे से मुक्त होते हैं और वे पूरी तरह से स्वतंत्र और मुक्त होकर परमेश्वर की उपस्थिति में जीते हैं, तभी उन्हें एक सच्चा मानव-जीवन प्राप्त होता है और केवल ऐसे लोगों में ही सत्य और मानवता होती है। इसके अलावा, जो भी सत्य तुमने समझे और प्राप्त किए हैं, वे सभी परमेश्वर के वचनों से और स्वयं परमेश्वर से आए हैं। जब तुम सर्वोच्च परमेश्वर—सृष्टिकर्ता—का अनुमोदन प्राप्त करते हो और वह कहता है कि तुम एक मानक स्तर के सृजित प्राणी हो और तुम मानव के समान जीते हो, तब तुम्हारा जीवन सबसे अधिक सार्थक होगा” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, मनुष्य की प्रकृति को कैसे जानें)। “सिर्फ सत्य का अनुसरण करने में कड़ी मेहनत करने पर ध्यान दो, और तुम लोग अपनी सभी समस्याओं का समाधान करने में सक्षम हो जाओगे। जब तुम अपनी समस्याओं का समाधान कर लोगे, तब तुमने तरक्की कर ली होगी और तुम्हारा विकास हो चुका होगा। जब लोग उस दिन तक अनुभव करते हैं जब तक जीवन के बारे में उनका दृष्टिकोण और उनके अस्तित्व का अर्थ एवं आधार पूरी तरह से बदल नहीं जाते हैं, यानी उनमें पूरा का पूरा परिवर्तन हो चुका है और वे कोई और व्यक्ति बन गए हैं—क्या यह अद्भुत नहीं है? यह एक बड़ा परिवर्तन है; यह एक ऐसा परिवर्तन है जो सब कुछ उलट-पुलट कर देता है। तुम ऐसे मुकाम पर पहुँच जाते हो जहाँ तुम्हें यह फर्क नहीं पड़ता है कि तुम्हारे पास प्रसिद्धि, रुतबा, धन, भोग-विलास या दुनिया की सत्ता और महिमा है या नहीं—तुम आसानी से उन सबको छोड़ पाते हो। केवल तभी तुम्हें मानव के समान माना जा सकता है। जो लोग अंततः परमेश्वर द्वारा पूर्ण किए जाएँगे, वे इस तरह के एक समूह होंगे। वे सत्य के लिए, परमेश्वर के लिए और जो न्यायसंगत है उसके लिए जिएँगे। यही एक सच्चे मानव के समान होना है” (वचन, खंड 3, अंत के दिनों के मसीह के प्रवचन, भाग तीन)। पहले मैं सोचता था कि केवल ज्ञान प्राप्त करके और अधिक पैसा कमाकर ही मेरा भविष्य अच्छा हो सकता है, लेकिन असल में ये चीजें सब खोखली हैं। ज्ञान मेरी नियति को नहीं बदल सकता है। भले ही मैं ज्ञान प्राप्त कर लूँ और पैसा कमा लूँ, फिर भी यह मेरे दिल को शांति नहीं दिला सकता है। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद मुझे एहसास हुआ कि ज्ञान मेरी नियति को नहीं बदल सकता है और सिर्फ़ सत्य का अनुसरण करके और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीने से व्यक्ति परमेश्वर की स्वीकृति और एक अच्छी नियति प्राप्त कर सकता है। परमेश्वर में विश्वास करना और सत्य का अनुसरण करना ही मूल्यवान और सार्थक जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। इस दुनिया में बहुत-से लोग पैसा कमाने और अधिक भौतिक सुख पाने के लिए एक-दूसरे से होड़ करते हैं और हर तरह के बुरे काम करते हैं। ये लोग अपने करियर में सफलता पाने के लिए दूसरों को इस्तेमाल करते हैं और धोखा देते हैं, लेकिन अंदर ही अंदर वे संघर्ष करते हैं और असहज महसूस करते हैं। ऐसे जीना बहुत दर्दनाक है! केवल परमेश्वर में विश्वास करके, उसके वचनों को खा-पीकर, इन शैतानी फलसफों को त्यागकर और परमेश्वर के वचनों के अनुसार जीकर ही व्यक्ति शैतान की यंत्रणा से बच सकता है और एक सार्थक जीवन जी सकता है। परमेश्वर के वचनों ने मेरा दिल खोल दिया। मुझे एहसास हुआ कि लोग धन-दौलत, प्रतिष्ठा या रुतबे के बिना जी सकते हैं, लेकिन परमेश्वर की सुरक्षा और मार्गदर्शन के बिना जीवित रहना मुश्किल है। अब मैं हर दिन परमेश्वर के वचन खाता-पीता हूँ और अपना कर्तव्य निभाता हूँ और यूँ तो मैंने वह प्रसिद्धि या रुतबा हासिल नहीं किया है जिसे दुनिया मूल्यवान समझती है लेकिन परमेश्वर के वचन पढ़कर मैं धीरे-धीरे सामान्य मानवता को जी रहा हूँ, अपनी भ्रष्टता और शैतानी प्रकृति को जान रहा हूँ और हर चीज को सत्य से देखने का अभ्यास कर रहा हूँ। यही वास्तव में एक सार्थक जीवन है! अगर मैं ऑस्ट्रेलिया जाकर पढ़ता भी हूँ तो भले ही मुझे धन-दौलत, प्रतिष्ठा और सफलता मिल जाए, लेकिन मुझे सत्य और जीवन नहीं मिलेगा। तब क्या मैंने अपना पूरा जीवन बेकार ही नहीं जिया होगा? मुझे जीवन के प्रति अपना दृष्टिकोण बदलना था। मैं अब सांसारिक धन-दौलत, रुतबे या प्रतिष्ठा के पीछे नहीं भागूँगा और इसके बजाय मैं अपना कर्तव्य अच्छे से निभाने और सत्य का अनुसरण करने के लिए जतन करूँगा। केवल इसी तरह जीने से जीवन का मूल्य और अर्थ है।
एक दिन एक सभा के दौरान भाई-बहनों ने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने सच में मेरे दिल को छू लिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “क्या तू अपने कंधों के बोझ, अपने आदेश और अपने उत्तरदायित्व से अवगत है? ऐतिहासिक मिशन का तेरा बोध कहाँ है? तू अगले युग के स्वामी के रूप में उचित ढंग से सेवा कैसे करेगा? क्या तुझमें स्वामी होने का प्रबल बोध है? सभी चीजों के स्वामी की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए? क्या वास्तव में वही संसार के समस्त सजीव प्राणियों और सभी भौतिक वस्तुओं का स्वामी है? कार्य के अगले चरण की प्रगति के लिए तेरे पास क्या योजनाएँ हैं? कितने लोग प्रतीक्षा कर रहे हैं कि तू उनकी चरवाही करे? क्या तेरा काम बहुत भारी है? वे दरिद्र, दयनीय, अंधे और असहाय हैं और अंधकार में विलाप कर रहे हैं—मार्ग कहाँ है? वे कैसे लालायित रहते हैं कि रोशनी एक टूटते तारे की तरह अचानक नीचे उतरे और अंधकार की उन शक्तियों को भगा दे जिन्होंने इतने सारे वर्षों से मनुष्यों का दमन किया है। वे इसके लिए दिन-रात व्याकुल होकर आस लगाए रहते हैं और लालायित रहते हैं—इसे पूरी तरह कौन जान सकता है? उस दिन भी जब रोशनी कौंधकर जाती है, गहन कष्ट सहते ये लोग रिहाई की उम्मीद के बिना अंधेरी कालकोठरी में कैद रहते हैं; वे कब रोना बंद करेंगे? इन भंगुर आत्माओं का दुर्भाग्य भयावह है जिन्हें कभी विश्राम नहीं मिला है और बहुत समय से ये इसी स्थिति में क्रूर बंधनों और जमे हुए इतिहास में जकड़ी हुई हैं। और किसने उनके विलाप की आवाज सुनी है? किसने उनकी दयनीय दशा देखी है? क्या तूने कभी सोचा है कि परमेश्वर का हृदय कितना दुखी और चिंतित है? जिस मासूम मानवजाति को उसने अपने हाथों से रचा, उसे वह ऐसी पीड़ा भोगते देखना कैसे सह सकता है? मनुष्य आखिरकार वे पीड़ित हैं जिन्हें जहर दिया गया है। और यूँ तो मनुष्य आज तक बचा हुआ है, लेकिन कौन जान सकता था कि मानवजाति को बहुत पहले ही उस दुष्ट के द्वारा जहर दिया जा चुका है? क्या तू भूल चुका है कि तू भी पीड़ित लोगों में से एक है? क्या तू इन सारे जीवित बचे लोगों को बचाने के लिए परमेश्वर के प्रति अपने प्रेम की खातिर प्रयास करने का इच्छुक नहीं है? क्या तू उस परमेश्वर को प्रतिफल देने के लिए अपनी सारी शक्ति समर्पित करने का इच्छुक नहीं है जो अपनी देह और लहू के समान मानवजाति से प्रेम करता है? अपना असाधारण जीवन जीने के लिए तुम अपने को परमेश्वर द्वारा उपयोग में लाए जाने को वास्तव में कैसे समझते हो? क्या तुम्हारे पास सचमुच यह संकल्प और आस्था है कि तुम एक धर्मपरायण, परमेश्वर-सेवी व्यक्ति का सार्थक जीवन जी सको?” (वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, तुझे अपने भविष्य के मिशन से कैसे पेश आना चाहिए?)। परमेश्वर के वचनों का यह अंश पढ़ने के बाद मुझे शर्मिंदगी महसूस हुई। मेरे देश नेपाल में अभी भी बहुत-से लोग हैं जिन्हें परमेश्वर का उद्धार नहीं मिला है। वे भारी दुख में शैतान की शक्ति के अधीन जीते हैं और उन्हें कोई उम्मीद नहीं दिख पाती है। अंत के दिनों में परमेश्वर ने मानवजाति को बचाने के लिए देहधारण किया है और परमेश्वर आशा करता है कि लोग उसकी वाणी सुन सकें और सृष्टिकर्ता का उद्धार पाने के लिए उसके पास लौट सकें। परमेश्वर ने मुझे अंधकार से प्रकाश में लाकर मुझ पर अनुग्रह किया, मुझे अपनी वाणी सुनने में सक्षम बनाया और इसलिए मेरी यह जिम्मेदारी थी कि मैं परमेश्वर के सुसमाचार का प्रचार और अधिक लोगों तक करूँ। अगर मैं पढ़ने के लिए ऑस्ट्रेलिया गया तो वहाँ पढ़ाई का दबाव बहुत अधिक होगा और मेरा सभाओं में शामिल हो पाना और अपना कर्तव्य निभा पाना संदेहास्पद था। क्या बस सांसारिक भविष्य के पीछे भागने के लिए मुझे सत्य पाने और बचाए जाने का यह मौका गँवा देना चाहिए? यही नहीं, महा विनाश पहले ही शुरू हो चुके हैं और किसी भी क्षण विश्व युद्ध छिड़ सकते हैं, लेकिन बहुत-से लोग अभी भी परमेश्वर के नए कार्य के बारे में नहीं जानते हैं। अगर मैं केवल अपने भविष्य के बारे में चिंता करता रहा तो मुझमें अंतरात्मा का नितांत अभाव होगा! यह सोचकर मैंने ऑस्ट्रेलिया में पढ़ने का अवसर छोड़ने और इसके बजाय सत्य का अनुसरण करने और अपना कर्तव्य ठीक से निभाने का फैसला किया।
अब मुझे कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाते हुए दो साल हो गए हैं और अपने कर्तव्य के दौरान मैं ऐसे बहुत सारे सत्यों को समझ गया हूँ जिन्हें मैं पहले भली-भाँति नहीं समझता था। हर दिन मैं परमेश्वर के वचन खाता-पीता हूँ और अपना कर्तव्य निभाता हूँ और मैं एक बहुत ही संतुष्टिपूर्ण जीवन जी रहा हूँ। मैंने अनुभव किया है कि एक सृजित प्राणी का कर्तव्य निभा पाना ही एक सार्थक जीवन जीने का एकमात्र तरीका है। सर्वशक्तिमान परमेश्वर का धन्यवाद हो!