29. मैं मानसिक अस्पताल से कैसे बाहर निकली

चेनशियाओ, चीन

वर्ष 2006 की दूसरी छमाही में, मैंने सर्वशक्तिमान परमेश्वर का अंत के दिनों का कार्य स्वीकारा। सभाओं में भाग लेने और परमेश्वर के वचन पढ़ने से, मुझे समझ में आया कि इंसान परमेश्वर के बनाए हुए हैं और हमारे जीवन की साँस उसी से आती है। बाद में, मैंने अपनी पूरी क्षमता से कलीसिया में अपने कर्तव्य निभाने शुरू कर दिए और मेरा जीवन कहीं अधिक संतोषजनक हो गया। पहले मेरे पति को पता था कि मैं परमेश्वर में विश्वास रखती हूँ, लेकिन उसने मुझे सताया नहीं और कहा कि हर किसी का अपना विश्वास होता है। बाद में, उसने सीसीपी को ऑनलाइन सर्वशक्तिमान परमेश्वर की कलीसिया को बदनाम और कलंकित करते हुए देखा और वह मेरी आस्था के आड़े आने लगा।

वर्ष 2009 की दूसरी छमाही में, एक सभा से घर लौटने के बाद, मैंने अपने नाना, मामा और मामी को अपने घर पर देखा। उनके हाव-भाव से मैं जान गई थी कि वे परमेश्वर में मेरे विश्वास के कारण वहाँ आए थे। मेरे सबसे बड़े मामा ने मुझे दोषी ठहराते हुए कहा, “क्या तू नहीं जानती कि सरकार ने परमेश्वर में विश्वास करने पर पाबंदी लगाई है और तुझे गिरफ्तार किया जा सकता है? अगर तुझे गिरफ्तार कर लिया गया, जेल की सजा हुई और यातनाएँ दी गईं, तो तुम्हारा काम तमाम हो जाएगा!” दूसरे रिश्तेदारों ने भी उनकी हाँ में हाँ मिलाई। फिर मेरे मामा ने मुझे धमकी दी, “तू हमारी बात नहीं सुनेगी, है न? ठीक है! अगर हम तुझे नहीं रोक पाए, तो हम कानून को तुझसे निपटने देंगे! हम तुझे पुलिस स्टेशन भिजवा देंगे!” यह सुनकर कि वे मुझे पुलिस स्टेशन भेज देंगे, मैं सचमुच चिंतित हो गई। मैंने सोचा, “क्या होगा अगर वे सच में मुझे जेल भेज दें? मेरा बेटा अभी बहुत छोटा है—उसकी देखभाल कौन करेगा? अगर पुलिस आ गई और मेरे पड़ोसियों ने देख लिया, तो वे मेरे बारे में क्या सोचेंगे? शायद मुझे अपने रिश्तेदारों से कह देना चाहिए कि मैं अब विश्वास नहीं रखूँगी ताकि वे बस जल्दी से चले जाएँ।” इसलिए, मैंने कह दिया कि मैं अब विश्वास नहीं रखूँगी। मेरे ऐसा कहते ही, उन्होंने मुझ पर दबाव डालना बंद कर दिया। उस पल, मुझे ऐसा कहने पर पछतावा हुआ। लेकिन जब मैंने सोचा कि आस्था का मार्ग कितना कठिन है और अपने परिवार से मुझे जिस उत्पीड़न और अपमान का सामना करना पड़ रहा था, तो मैं अंदर से कमजोर महसूस करने लगी। इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे आगे बढ़ते रहने के लिए मुझे शक्ति और आस्था देने को कहा। बाद में, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक अंश पढ़ा जिसने मुझे अत्यंत भावविभोर कर दिया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “तुम लोगों के बीच एक भी व्यक्ति नहीं है जो व्यवस्था द्वारा सुरक्षित है—इसके बजाय, तुम व्यवस्था द्वारा दण्ड के भागी ठहराए जाते हो। इससे भी अधिक समस्यात्मक यह है कि लोग, तुम लोगों को समझते नहीं हैं : चाहे वे तुम्हारे रिश्तेदार हों, तुम्हारे माता-पिता, तुम्हारे मित्र, या तुम्हारे सहकर्मी हों, उनमें से कोई भी तुम लोगों को समझता नहीं है। जब परमेश्वर द्वारा तुम लोगों को त्याग दिया जाता है, तब तुम लोगों के लिए पृथ्वी पर और रह पाना असंभव हो जाता है, किंतु फिर भी, लोग परमेश्वर से दूर होना सहन नहीं कर सकते हैं, जो परमेश्वर द्वारा लोगों पर विजय प्राप्त करने का महत्व है, और यही परमेश्वर की महिमा है(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, क्या परमेश्वर का कार्य उतना सरल है जितना मनुष्य कल्पना करता है?)। परमेश्वर के वचन पढ़कर मेरी आँखों से आँसू बहने लगे। मैंने महसूस किया कि परमेश्वर ठीक मेरी बगल में है, मुझे दिलासा दे रहा है। परमेश्वर मेरी कमजोरी और मूर्खता को नहीं देख रहा था और वह जानता है कि उसमें अपने विश्वास के कारण हम कानून द्वारा दंडित किए जाएंगे और अपने परिवारों द्वारा गलत समझे जाएंगे और यह भी कि हम ये चीजें सहेंगे। परमेश्वर सच में हमें समझता है। परमेश्वर के वचन पढ़ने के बाद, मेरी आस्था फिर से लौट आई और मैंने संकल्प लिया कि चाहे कुछ भी हो जाए, मैं कभी भी परमेश्वर से इनकार नहीं करूँगी या उसके साथ विश्वासघात नहीं करूँगी, मैं पूरे दिल से परमेश्वर का अनुसरण करूँगी और अपना कर्तव्य निभाऊँगी। लेकिन मेरे पति ने मुझे फिर भी सताना जारी रखा।

मार्च 2013 में, एक रात करीब 9 बजे, मैं सुसमाचार का प्रचार करने के बाद घर लौटी। जब मेरे पति ने मुझे वापस आते देखा, तो उसने कहा कि वह सिगरेट खरीदने बाहर जा रहा है। अप्रत्याशित रूप से, वह चार पुलिस अधिकारियों को वापस ले आया। मुख्य अधिकारी ने मुझसे पूछताछ की कि हाल के दिनों में मैं कहाँ थी, लेकिन मैंने कुछ नहीं कहा। उन्होंने मुझ पर “एक पंथ संगठन में भाग लेने और कानून प्रवर्तन में बाधा डालने” का आरोप लगाया और मुझे हथकड़ी लगा दी। फिर वे मुझे पुलिस स्टेशन ले गए। पूछताछ कक्ष में, उन्होंने परमेश्वर में मेरे विश्वास के बारे में मुझसे सवाल करना शुरू कर दिया। जब वे मुझसे अपनी मनचाही जानकारी नहीं निकलवा सके, तो उन्होंने मीठी-मीठी बातें करके मुझे फुसलाने की कोशिश की, “तुम्हारा बेटा किस स्कूल में जाता है? उसकी पढ़ाई कैसी चल रही है? सरकार तुम्हारी आस्था का विरोध करती है, इसलिए अगर तुम अपनी इस आस्था पर चलती रही, तो तुम अपने बेटे का भविष्य बर्बाद कर दोगी!” अधिकारियों की बातें सुनकर, मैंने मन ही मन सोचा, “शैतान जानता है कि मेरी सबसे बड़ी चिंता मेरा बेटा है, इसलिए वह मुझे धमकाने के लिए मेरे बेटे के भविष्य का इस्तेमाल कर रहा है। वह चाहता है कि मैं परमेश्वर को नकारूँ और उसे धोखा दूँ। मैं शैतान के जाल में नहीं फँस सकती!” मैंने मन ही मन खुद को चेताया, “मुझे हरगिज उनके जाल में नहीं फँसना है।” यह देखकर कि मुझ पर कोई असर नहीं हो रहा है, पुलिस मेरी सबसे करीबी बुआ को मुझे मनाने के लिए ले आई। अपनी बुआ को पुलिस का पक्ष लेते देख, मैं गुस्से से भर गई। मैंने सोचा, “क्या हमने पहले साथ में परमेश्वर के वचन नहीं पढ़े हैं? आप जानती हैं कि विश्वासी वैसे नहीं होते जैसा पुलिस दावा करती है। अब जब मुझे गिरफ्तार कर लिया गया है, तो आप न केवल सही के लिए बोलने से इनकार कर रही हैं, बल्कि आप उनका पक्ष भी ले रही हैं!” उनकी बात पूरी होने से पहले ही मैंने गुस्से में उन्हें जाने के लिए कह दिया। बाद में, पुलिस ने मेरे पति से बाहर कुछ मिनट बात की और फिर उन्होंने मुझे जबरदस्ती एक पुलिस कार में डाल दिया।

रात के करीब 10 बजे, पुलिस ने मुझे एक मानसिक अस्पताल भेज दिया। जैसे ही मैं कार से बाहर निकली, तीस साल से अधिक उम्र के दो पुलिसवालों ने मुझे बाँहों से पकड़ा, जबरदस्ती अस्पताल के दफ्तर में ले गए और मुझे निदेशक के हवाले कर दिया। उन्होंने मुझसे कुछ नहीं कहा और न ही मेरी कोई जाँच की, उन्होंने मेरे दोनों हाथ सीधे एक रस्सी से बाँध दिए और मुझे लोहे के दरवाजे वाले एक कमरे में धकेल दिया। ऐसा लगा जैसे मुझे एक पिंजरे में फेंक दिया गया हो और मैं पूरी तरह से उनकी दया पर थी। मुझे नहीं पता था कि वे मेरे साथ क्या करेंगे। मैं घबराई हुई और डरी हुई थी, इसलिए मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मार्गदर्शन माँगा। जैसे ही मैंने कमरे में प्रवेश किया, एक दुर्गंध मेरी नाक में आई, जिससे मेरा जी मिचलाने लगा और उल्टी करने का मन हुआ। मैंने सोचा, “ऐसी जगह पर कोई कैसे रह सकता है?” वे मुझे एक ऐसे कमरे में ले गए जहाँ महिला मनोरोगियों को रखा गया था और फिर दो लोगों ने जबरदस्ती मुझे एक बिस्तर से बाँध दिया, मेरी कलाइयाँ पलंग के सिरहाने के कोनों से और मेरे पैर दूसरे सिरे पर एक साथ बाँध दिए गए। छह-सात मरीज बिस्तर के चारों ओर खड़े होकर मुझे घूर रहे थे, कुछ के बाल बिखरे थे और कुछ भावशून्य नजरों से घूर रही थीं। मैंने मन ही मन सोचा, “क्या यह पागलों की जगह नहीं है? अब मेरा यहाँ क्या होगा?” इससे पहले कि मैं और कुछ सोच पाती, निदेशक ने एक सिरिंज उठाई और मुझे इंजेक्शन लगाने के लिए तैयार हो गया। सिरिंज में लाल तरल देखकर, मैं बहुत डर गई क्योंकि मुझे कोई अंदाजा नहीं था कि वे मुझे कौन-सी दवा का इंजेक्शन लगा रहे हैं। क्या इससे मेरा दिमाग खराब हो जाएगा? मैंने कहा, “मैं बीमार नहीं हूँ; मैं पागल नहीं हूँ। तुम मुझे इंजेक्शन क्यों दे रहे हो?” मैंने संघर्ष करने की कोशिश की, लेकिन मैं हिल नहीं सकी क्योंकि मैं बँधी हुई थी। निदेशक ने जबरदस्ती मेरे कूल्हे में इंजेक्शन लगाया और चिल्लाया, “चुप रहो! अगर तुम पागल नहीं हो, तो और क्या हो?” मैंने याद किया कि सीसीपी परमेश्वर के चुने हुए लोगों को नुकसान पहुँचाने के लिए जो एक तरीका इस्तेमाल करती है वह है मानसिक रूप से तोड़ने के लिए नशीली दवाओं के इंजेक्शन देना ताकि वे परमेश्वर में विश्वास न रख सकें। मैं सचमुच घबराई हुई और डरी हुई थी। क्या यह इंजेक्शन मेरा दिमाग खराब कर देगा? अगर मैं पागल हो गई, तो मैं परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाऊँगी। अपनी बेबसी में, मैं चुपचाप आँसू बहाने के अलावा कुछ न कर सकी। मैंने मन ही मन परमेश्वर से चुपचाप प्रार्थना की, “परमेश्वर, मुझे नहीं पता कि वे मुझे कैसा इंजेक्शन दे रहे हैं और मुझे पागल हो जाने का डर है। मेरी रक्षा करो।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे एहसास हुआ कि मैं पागल हो जाऊँगी या नहीं, यह परमेश्वर के हाथों में है और मेरा दिल थोड़ा शांत हो गया। रात के करीब 1 बजे, एक नर्स ने आखिरकार मेरे बंधन ढीले कर दिए और मैं गहरी बेहोशी जैसी नींद में चली गई।

अगली सुबह मैं करीब 5 बजे उठी और मैंने कई मरीजों को अपने बिस्तर के पास इकट्ठा देखा। उनमें से एक ने हाथ बढ़ाकर मेरा कान खींचने की कोशिश की। यह दृश्य देखकर मैं दहशत से भर गई, इसलिए मैंने जल्दी से कंबल अपने सिर पर खींच लिया और कसकर सिमट गई। मेरे शरीर में सिहरन दौड़ गई और मैंने मन ही मन सोचा, “मैं सड़क पर मानसिक रूप से बीमार लोगों से बचती थी, लेकिन अब मैं उनके साथ रह रही हूँ। मैं इससे कैसे निकल पाऊँगी? मुझे नहीं पता कि मैं इस नरक जैसी जगह में कब तक फँसी रहूँगी।” इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। मैंने दानिय्येल के बारे में सोचा, जिसे शेरों की माँद में फेंक दिया गया था। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर उसके साथ था। शेरों ने उसे नुकसान पहुँचाने की हिम्मत नहीं की। अंत में, दानिय्येल शेरों की माँद से पूरी तरह सुरक्षित बाहर निकला। उसने परमेश्वर से प्रार्थना की और परमेश्वर के कर्मों को देखा। इस अनुभव से गुजरने के लिए मुझे भी परमेश्वर से प्रार्थना करनी थी और उस पर निर्भर रहना था। यह सोचकर, मुझे उतना डर नहीं लगा। नाश्ते के बाद, मैंने पुरुष नर्स को हमें दवा के लिए बुलाते हुए सुना और मेरा दिल फिर से तेजी से धड़कने लगा, “मैं बीमार नहीं हूँ—क्या उनकी दवा मुझे पागल कर देगी या मेरे दिमाग को सुन्न कर देगी? क्या मेरा हश्र भी सड़कों पर घूमने वाले उन पागलों जैसा होगा और मेरा मजाक उड़ाया जाएगा?” मैंने उन्हें करीब बारह-तेरह साल की एक छोटी लड़की को जबरदस्ती दवा देते हुए देखा और मैं पूरी तरह से सहम गई। मैं जल्दी से आखिरी कमरे में छिप गई, लेकिन पुरुष नर्स फिर भी आया और मुझसे दवा लेने को कहा। उसने मुझसे कठोरता से कहा, “अब जब तुम यहाँ आ गई हो, तो चाहे तुम बीमार हो या नहीं, तुम्हारे साथ एक मरीज जैसा ही व्यवहार किया जाएगा!” मैंने फिर भी दवा लेने जाने से इनकार कर दिया। थोड़ी देर बाद, एक आदमी रस्सी लेकर आया, मुझे बाँधने की तैयारी करते हुए मुझे धमकाया, “तो, तू अपनी दवा नहीं लेगी? अगर तू नहीं लेगी, तो हम तुझे बाँध देंगे और जबरदस्ती तेरे गले से नीचे उतार देंगे! तो, तू अपनी मर्जी से दवा लेगी या नहीं?” बेबस और लाचार होकर, मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की। मुझे परमेश्वर के वचन याद आए : “अब जितनी ज्यादा बार संभव हो, सर्वशक्तिमान परमेश्वर की उपस्थिति में लौटो। उससे सब-कुछ माँगो। वह निश्चित रूप से तुम्हें भीतर से प्रबुद्ध करेगा और संकट के क्षणों में तुम्हारी रक्षा करेगा। बिलकुल मत डरो! तुम्हारा संपूर्ण अस्तित्व पहले से ही उसके अधिकार में है। उसकी सुरक्षा और देखभाल के होते हुए तुम्हारे लिए डरने की क्या बात है? ... स्वर्ग एक पल में बदल सकता है, लेकिन तुम्हारे लिए डरने की क्या बात है? उसके हाथ की एक हलकी-सी हरकत से स्वर्ग और पृथ्वी तुरंत नष्ट हो जाते हैं। तो चिंतित होने से मनुष्य क्या हासिल कर सकता है? क्या सब-कुछ परमेश्वर के हाथों में नहीं है?(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, आरंभ में मसीह के कथन, अध्याय 42)। परमेश्वर के वचनों ने मुझे आस्था और शक्ति दी। क्या सब कुछ परमेश्वर के हाथों में नहीं है? मेरा जीवन भी परमेश्वर के हाथों में है और यह दवा लेने के बाद मैं पागल हो जाऊँगी या नहीं, यह भी परमेश्वर पर निर्भर था और परमेश्वर की अनुमति के बिना, मैं मानसिक रूप से बीमार नहीं होती। यह सोचकर, मेरा दिल शांत हो गया। पुरुष नर्स ने मुझे छह-सात गोलियाँ दीं और मैंने बेमन से उन्हें ले लिया। बाद में, पुरुष नर्स ने हमसे फिर से दवा के लिए लाइन में लगने को कहा और मैं चाहती थी कि जब वे ध्यान न दे रहे हों तो गोलियाँ फेंक दूँ। हालाँकि, वे हम पर बहुत कड़ी नजर रखते थे। एक व्यक्ति दवा बाँटता था, और दूसरा हमारे दवा लेने पर निगरानी रखता था। एक मरीज ने उनके आदेश के अनुसार दवा नहीं ली, तो उन्होंने चाबियों के एक बड़े गुच्छे से उसके सिर पर मारा और फिर बेरहमी से उसे घूँसों और लातों से मारा। मैं जानती थी कि अगर मैंने वैसा नहीं किया जैसा उन्होंने कहा, फिर मुझे या तो जबरदस्ती खिलाया जाएगा या पीटा जाएगा। मैं बेबस महसूस कर रही थी और मेरे पास दवा लेने के अलावा कोई चारा नहीं था। मैंने सोचा कि मैं तो केवल परमेश्वर में विश्वास रख रही हूँ और उसका अनुसरण कर रही हूँ, फिर भी पुलिस ने मुझे जबरन एक मानसिक अस्पताल भेज दिया था, जहाँ मेरे पागल न होने पर भी उन्होंने मेरे साथ एक पागल औरत जैसा व्यवहार किया, मुझे इंजेक्शन और दवाओं से यातनाएँ दीं। ये लोग सचमुच बहुत क्रूर थे! मुझे वहाँ हर दिन दो बार दवा लेनी पड़ती थी। मुझे बहुत बुरा लगता था और मुझे नहीं पता था कि इतनी सारी दवा लेने के बाद मेरा क्या होगा। जब मैं अकेली और बेबस महसूस करती थी, तो मुझे पहले सीखे हुए कुछ भजन याद आ जाते और मैं उन्हें गुनगुनाने लगती। “यद्यपि परमेश्वर से प्रेम करने का मार्ग बाधाओं से भरा है, मैं उसके वचनों के आधार पर कार्य करके आस्था प्राप्त करूँगा। क्लेश चाहे कितने भी बड़े हों, मैं मृत्यु तक वफादार रहूँगा, और मैं हमेशा परमेश्वर से प्रेम करूँगा और उसकी गवाही दूँगा!” (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ, परमेश्वर आज के दिन तक हमारे साथ रहा है)। “परमेश्वर के वचनों में महान अधिकार है, जो क्लेश पर विजय पाने में हमारी अगुआई करते हैं। वे हर पल हमारा मार्गदर्शन और रक्षा करते हैं, जिससे हमें परमेश्वर का प्रियपन और मनोहरता और भी अधिक महसूस होती है। क्लेश में हमारी आस्था पूर्ण की जाती है; हम परमेश्वर की बुद्धि और सर्वशक्तिमत्ता को देखते हैं। हम पर चाहे जो भी परीक्षण आएँ, हमारे परमेश्वर-प्रेमी दिल कभी नहीं बदलेंगे” (मेमने का अनुसरण करो और नए गीत गाओ, परमेश्वर के वचनों ने जीत लिया है हमारा दिल)। मैं जितना गाती गई, मुझे अंदर से उतनी ही ज्यादा शक्ति महसूस हुई और मेरी आस्था मजबूत हो गई। भले ही मैं एक मानसिक अस्पताल में थी, उनके नियंत्रण में आजादी से वंचित थी और मुझे हर दिन दवा लेने के लिए मजबूर किया जा रहा था और दवाओं से यातनाएँ दी जा रही थीं, फिर भी मुझे लगा कि परमेश्वर ने मुझे त्यागा नहीं है। आगे चाहे कुछ भी हो, मैं इसका अनुभव करने के लिए परमेश्वर पर भरोसा रखूँगी और मैं कभी भी परमेश्वर को नहीं छोडूँगी या उनके साथ विश्वासघात नहीं करूँगी।

एक महीने बाद, मुझे गंभीर अनिद्रा की समस्या होने लगी। मुझे दिन-रात नींद नहीं आती थी, मैं चिड़चिड़ी और बेचैन रहती थी और मुझे लगता था जैसे मेरा दिल सीने से बाहर निकल आएगा। दिन के दौरान, मैं कुछ मिनट बैठती और फिर उठकर चलने की इच्छा होती, लेकिन कुछ मिनट चलने के बाद, मैं फिर से बैठ जाना चाहती थी। रात में भी यही होता; कुछ मिनट सोने के बाद, मैं फिर से उठ जाना चाहती थी और जब बाकी सब सो रहे होते थे, तो मैं गलियारे में अकेले टहल रही होती थी। मैं मुश्किल से साँस ले पा रही थी, मेरा दिमाग सुन्न हो रहा था और मुझे लगा कि मैं मानसिक रूप से टूटने की कगार पर थी। जब मैंने पागल मरीजों को दिन-रात न सोते हुए और दौरा पड़ने पर लगातार चिल्लाते हुए देखा, तो मैंने मन ही मन सोचा, “क्या मैं इसलिए सो नहीं पा रही हूँ क्योंकि मैं पागल हो रही हूँ? अगर मैं सच में पागल हो गई, तो मैं अब परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाऊँगी और तब जीने का क्या मतलब रह जाएगा? शायद मुझे मर जाना चाहिए; कम से कम तब मुझे यह यातना और नहीं सहनी पड़ेगी।” अपनी पीड़ा में, मैं परमेश्वर के सामने आई और अपना दिल उसके सामने खोलकर रख दिया, “परमेश्वर, मुझे लग रहा है कि मैं मानसिक रूप से टूट जाऊँगी और मेरा दिल बहुत पीड़ा में है। मेरे दिल की रक्षा करो, क्योंकि मैं तुम्हें नहीं छोड़ सकती।” प्रार्थना करने के बाद, मुझे परमेश्वर के कुछ वचन याद आए : “यदि तुम शैतान के सामने गवाही नहीं दे सकते, तो शैतान तुम पर हँसेगा, वह तुम्हें एक मजाक के रूप में, एक खिलौने के रूप में लेगा, वह बार-बार तुम्हें मूर्ख बनाएगा, और तुम्हें विक्षिप्त कर देगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, केवल परमेश्वर से प्रेम करना ही वास्तव में परमेश्वर पर विश्वास करना है)। अगर मैं ऐसी मानसिक यातना न सह पाने के कारण परमेश्वर में अपनी आस्था खो देती हूँ और मरने का विकल्प चुनती हूँ तो शैतान की साजिश सफल हो जाएगी। शैतान इस चीज के लिए लालायित था कि मैं नकारात्मक, कमजोर और परमेश्वर से दूर हो जाऊँ, मैं शैतान की चालों या साजिशों में नहीं फँस सकती थी। चाहे मैं सच में पागल हो जाती या नहीं, मैं मौत को नहीं चुन सकती थी। मुझे सही तरीके से जीना था और यह विश्वास रखना था कि सब कुछ परमेश्वर के हाथों में है। धीरे-धीरे, मुझे नींद आने लगी और अब मैं बेचैन महसूस नहीं करती थी।

जैसे-जैसे दिन बीतते गए, किसी ने मुझे नहीं बताया कि मैं यहाँ कब तक रहूँगी। मैं हर दिन इन पागलों के बीच रहती थी और ऐसा लगता था मानो समय घोंघे की गति से चल रहा हो। जब सूरज उगता, तो मैं चाहती कि बस रात आ जाए और जब रात होती, तो मैं चाहती कि बस सुबह हो जाए। रात के अँधेरे में मैं उस समय के बारे में सोचती जब मैं अपने भाई-बहनों के साथ सभा करती और अपने कर्तव्य निभाती थी। कभी-कभी, मैं अपने भाई-बहनों के साथ होने का सपना भी देखती थी, लेकिन जागने पर देखती कि मैं अभी भी मानसिक अस्पताल में बंद हूँ और मैं कामना करती कि काश मैं उन सपनों से न जागी होती। एक दिन, निदेशक आँगन में टहल रहा था और मैंने उससे पूछा, “मैं कब जा सकती हूँ?” निदेशक ने कठोरता से कहा, “तुमसे किसने कहा परमेश्वर में विश्वास रखने के लिए! तुम परमेश्वर में विश्वास रखती हो और यह सरकार के खिलाफ है। तुम पागल हो गई हो!” मैंने उसे सीधे जवाब नहीं दिया। मैं बस यह जानना चाहती थी कि मुझे कब तक बंद रखा जाएगा, इसलिए मैंने फिर से पूछा। निदेशक ने गुस्से में मेरी ओर उँगली उठाई और धमकी दी, “अगर तुमने दोबारा यह पूछा, तो मैं तुम्हें दो साल के लिए बंद कर दूँगा!” यह सुनकर कि मैं पागल हो गई हूँ और वह मुझे दो साल के लिए बंद कर देगा, मैं और भी ज्यादा परेशान हो गई। मैं वहाँ एक और दिन नहीं रहना चाहती थी, तो मैं दो साल कैसे सह पाती? अगर ऐसा ही चलता रहा, तो भले ही मैं पागल न होऊँ, वे मुझे यातनाएँ दे-देकर मेरी सोचने-समझने की शक्ति खत्म कर देंगे और मैं फिर परमेश्वर में विश्वास नहीं रख पाऊँगी। तो क्या वह मेरा अंत नहीं होगा? मैं निराशा में थी, इसलिए मैंने अपने दिल में परमेश्वर को पुकारा, उसे अपनी दशा और कठिनाइयों के बारे में बताया। बाद में, मैंने परमेश्वर की इच्छा का संदेश देने वाले पैगंबर यिर्मयाह के बारे में सोचा। क्या राजा ने नहीं कहा था कि वह पागल हो गया है? क्या लोगों ने नहीं कहा था कि नूह जब जहाज बना रहा था तो वह पागल हो गया था? और फिर परमेश्वर के कई अन्य सच्चे विश्वासियों और उपासकों के बारे में क्या दानवों ने नहीं कहा था कि वे परमेश्वर में विश्वास रखने के कारण पागल हो गए हैं? केवल दानव ही ऐसी दानवी बातें करेंगे! मैंने नूह के बारे में सोचा, जिसने परमेश्वर का वचन सुनने के बाद, 100 से अधिक वर्ष जहाज बनाने में बिताए और दुनिया की बदनामी और उपहास को सहा। लेकिन नूह ने कभी शिकायत नहीं की, न ही वह दुनिया के लोगों से प्रभावित हुआ और उसने परमेश्वर की आज्ञा के अनुसार जहाज बनाकर पूरा किया और परमेश्वर का आदेश पूरा किया। लेकिन जब मैंने निदेशक को यह कहते सुना कि मैं पागल हो गई हूँ और वह मुझे दो साल के लिए बंद कर देगा, तो मैं नकारात्मक और परेशान हो गई। क्या मैं पूरी तरह से कमजोर नहीं पड़ रही थी और शैतान के जाल में नहीं फँस रही थी? इन बातों को सोचकर, मुझे अब उतना बुरा नहीं लगा। चाहे वे मुझे कितने भी समय तक बंद रखें या मेरे साथ कुछ भी हो, मैं बिना शिकायत किए समर्पण करूँगी।

तीन महीने बाद, मेरा पति मेरे पास आया और कहा, “पुलिस ने कहा है कि अगर तुम एक बयान पर दस्तखत कर देती हो कि तुम परमेश्वर में विश्वास नहीं रखती, तो तुम कभी भी जा सकती हो।” मैं वास्तव में इस नारकीय स्थान को छोड़ना चाहती थी, लेकिन मुझे डर था कि पुलिस मुझसे परमेश्वर को त्यागने के बयान पर दस्तखत करने को बाध्य करेगी। अगर मैंने उस पर दस्तखत कर दिए और परमेश्वर के साथ विश्वासघात किया, तो मुझ पर एक स्थायी दाग लग जाएगा और मैं परमेश्वर द्वारा ठुकरा दी जाऊँगी। चाहे कुछ भी हो जाए, मैं इस बयान पर दस्तखत नहीं कर सकती थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, मैं तुम्हारे साथ विश्वासघात नहीं करना चाहती। लेकिन मैं कमजोर और शक्तिहीन हूँ और मुझे सच में चिंता है कि पुलिस मुझे यहाँ बंद रखेगी। परमेश्वर, मेरा मानना है कि सब कुछ तुम्हारे हाथों में है और मैं बाहर जा सकती हूँ या नहीं, यह भी तुम्हारे हाथों में है। मैं तुम्हारी ओर देखने और तुम पर भरोसा करने को तैयार हूँ, मैं प्रार्थना करती हूँ कि तुम मेरा मार्गदर्शन करो और मेरे लिए एक रास्ता निकालो।” उस दौरान, मैं इस बारे में हर दिन प्रार्थना करती थी। कुछ दिनों बाद, जब मैं खाना खा रही थी, तो निदेशक ने अचानक मुझसे कहा, “अपना सामान बाँधो और घर जाओ।” उसने मुझसे बयान पर दस्तखत करने के लिए नहीं कहा। मैं बहुत खुश हो गई क्योंकि मैं जानती थी कि परमेश्वर ने मेरी प्रार्थना सुन ली है। परमेश्वर जानता था कि मेरा आध्यात्मिक कद बहुत छोटा है, उसने मुझ पर दया की और मेरे लिए एक रास्ता खोल दिया। मैं दिल ही दिल में परमेश्वर का धन्यवाद करती रही!

मानसिक अस्पताल से बाहर आने के बाद, मेरे पति ने, इस डर से कि मैं फिर से परमेश्वर में विश्वास रखने लगूँगी, मुझे मेरे माता-पिता के घर भेज दिया और उसने मेरी माँ और भाई को मुझ पर नजर रखने के लिए लगा दिया। जब उसने देखा कि वे मुझे नहीं रोक सकते, तो मेरे पति ने मुझे अपने साथ शहर से बाहर काम करने के लिए मजबूर किया, और क्योंकि मैंने उसके साथ जाने से इनकार कर दिया, तो वह गुस्सा हो गया और कहने लगा, “तुम मेरे साथ इसलिए नहीं आना चाहती क्योंकि तुम दूसरे विश्वासियों को ढूँढ़ना चाहती हो, है न? किसी दिन मैं तुझे वापस मानसिक अस्पताल भेज दूँगा और तुझे सच में पागल बना दूँगा!” मेरे पति को यह कहते हुए सुनकर, मैंने पूरी तरह से निराश और दुखी महसूस किया। मैंने कभी उम्मीद नहीं की थी कि वह इतना निर्दयी होगा कि ऐसी बातें कहेगा। मैं परमेश्वर के वचनों के बारे में सोचे बिना नहीं रह सकी : “आजकल, वे जो खोज करते हैं और वे जो नहीं करते, दो पूरी तरह भिन्न प्रकार के लोग हैं, जिनके गंतव्य भी काफ़ी अलग हैं। वे जो सत्य के ज्ञान का अनुसरण करते हैं और सत्य का अभ्यास करते हैं, वे लोग हैं जिनका परमेश्वर उद्धार करेगा। वे जो सच्चे मार्ग को नहीं जानते, वे दुष्टात्माओं और शत्रुओं के समान हैं। वे प्रधान स्वर्गदूत के वंशज हैं और विनाश की वस्तु होंगे। यहाँ तक कि एक अज्ञात परमेश्वर के धर्मपरायण विश्वासीजन—क्या वे भी दुष्टात्मा नहीं हैं? जिन लोगों का अंतःकरण साफ़ है, परंतु सच्चे मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे भी दुष्टात्मा हैं; उनका सार भी परमेश्वर का प्रतिरोध करने वाला है। वे जो सत्य के मार्ग को स्वीकार नहीं करते, वे हैं जो परमेश्वर का प्रतिरोध करते हैं और भले ही ऐसे लोग बहुत-सी कठिनाइयाँ सहते हैं, तब भी वे नष्ट किए जाएँगे। वे सभी जो संसार को छोड़ना नहीं चाहते, जो अपने माता-पिता से अलग होना नहीं सह सकते और जो स्वयं को देह के सुख से दूर रखना सहन नहीं कर सकते, परमेश्वर के प्रति विद्रोही हैं और वे सब विनाश की वस्तुएँ बनेंगे। जो भी देहधारी परमेश्वर को नहीं मानता, दुष्ट है, यही नहीं, वह नष्ट किया जाएगा(वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, परमेश्वर और मनुष्य साथ-साथ विश्राम में प्रवेश करेंगे)। मेरे पति ने सीसीपी की निराधार अफवाहों पर विश्वास कर लिया था और परिवार के सदस्यों को मुझ पर हमला करने और मुझे सताने के लिए उकसाया था। उसने पुलिस के साथ मिलकर मुझे मानसिक अस्पताल भेज दिया और मेरे साथ एक पागल औरत जैसा व्यवहार किया। उसे इस बात की परवाह नहीं थी कि मैं जीती हूँ या मरती हूँ। अब वह मुझे अपने साथ आकर काम करने के लिए मजबूर कर रहा था, मुझे परमेश्वर से दूर करने और उसके साथ विश्वासघात करवाने की कोशिश कर रहा था, वरना, वह मुझे वापस मानसिक अस्पताल भेज देता और सच में पागल बना देता। मेरे पति को हमारी इतने सालों की शादी की कोई परवाह नहीं थी और उसने मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकने के लिए हर संभव तरीका सोचा। उसका सार परमेश्वर से घृणा करने वाला है। वह एक दानव है और परमेश्वर का दुश्मन है। मेरे पति के साथ मेरी शादी को चौदह साल हो गए थे और परमेश्वर में विश्वास करना शुरू करने से पहले, मैं परिवार के लिए हाड़-तोड़ मेहनत करती थी, बच्चों की देखभाल ही नहीं करती थी, बल्कि परिवार का भरण-पोषण करने के लिए भी पैसे कमाती थी। मेरे पति ने देखा कि मैं उसके लिए उपयोगी हूँ, इसलिए वह मेरी खूब अच्छी देखभाल करता था, लेकिन अब जब मैं परमेश्वर में विश्वास करना शुरू कर चुकी थी तो उसे डर था कि मैं गिरफ्तार कर ली जाऊँगी और परिवार के लिए पैसे कमाने और उनका भरण-पोषण करने में असमर्थ हो जाऊँगी, जो उसके हितों से जुड़ा था। इसलिए उसने मेरा उत्पीड़न करने के लिए बार-बार दुर्भावनापूर्ण तरीकों का इस्तेमाल किया, जिससे मेरे शरीर और मन दोनों को बहुत नुकसान पहुँचा। मुझे यह स्पष्ट हो गया कि उसने मुझसे कभी सच्चा प्यार नहीं किया और वह तो बस मेरा इस्तेमाल कर रहा था। मेरे पति ने सीसीपी के दानवी शब्दों पर विश्वास किया और वह सीसीपी का अनुसरण कर रहा था, जबकि मैं परमेश्वर में विश्वास करती थी और सत्य का अनुसरण करना और अपना कर्तव्य निभाना चाहती थी। हमारे रास्ते पूरी तरह से अलग थे। हम पूरी तरह से अलग लोग थे और भले ही हम एक साथ रह रहे थे, पर हमारे विचार बिल्कुल नहीं मिलते थे। मैं उसे तलाक देना चाहती थी, लेकिन मैंने यह भी सोचा, “मेरा बेटा अभी बहुत छोटा है—अगर हमारा तलाक हो गया और मैं चली गई तो उसका क्या होगा? मेरा पति मुझे घर नहीं देगा, तो मैं भविष्य में कैसे रहूँगी? अगर हम तलाक नहीं लेते हैं, तो वह बस मुझे परमेश्वर में विश्वास करने से रोकेगा, तो क्या मुझे उसके साथ काम करने चले जाना चाहिए?” उस दौरान, मैंने इस कठिनाई के बारे में परमेश्वर से प्रार्थना की, “परमेश्वर, अपने पति से उत्पीड़न का सामना करते हुए मुझे नहीं पता कि मुझे कौन-सा रास्ता अपनाना है। कृपया, मेरा मार्गदर्शन करो और मुझे कष्ट सहने का संकल्प दो।”

एक दिन, मैंने परमेश्वर के वचनों का एक भजन सुना :

परमेश्वर के कार्य के लिए अपना पूरा अस्तित्व अर्पित कर दो

1  अब वह समय है जब मेरा आत्मा महान कार्य करता है और वह समय है जब मैं अन्य-जाति राष्ट्रों के बीच अपना कार्य शुरू करता हूँ। इससे भी बढ़कर यह वह समय है जब मैं सभी सृजित प्राणियों को वर्गीकृत करता हूँ, हर एक को उसकी संबंधित श्रेणी में रखता हूँ ताकि मेरा कार्य और अधिक तेजी से आगे बढ़ सके और नतीजे हासिल करने में अधिक सक्षम हो। और इसलिए मैं तुमसे अभी भी यही माँग करता हूँ कि तुम अपने पूरे अस्तित्व को मेरे संपूर्ण कार्य के लिए अर्पित कर दो; और इससे भी अधिक तुम मेरे द्वारा तुम में किए गए संपूर्ण कार्य का स्पष्ट रूप से भेद पहचान लो और इसे सटीकता से देख लो और मेरे कार्य में अपना समस्त प्रयास खपा दो ताकि यह और अधिक नतीजे हासिल कर सके। यही चीज तुम्हें समझ लेनी चाहिए।

2  आपस में मत लड़ो, बाहर निकलने का रास्ता मत तलाशो या अपनी देह के लिए आराम मत तलाशो, ताकि मेरे कार्य में विलंब न हो और तुम्हारे अद्भुत भविष्य में विलंब न हो। वरना ऐसा करने से तुम्हें सुरक्षा मिलनी तो दूर रही, तुम खुद पर केवल बरबादी ले आओगे। क्या यह तुम्हारी मूर्खता नहीं होगी? जिसका तुम आज ललचाते हुए आनंद उठाते हो वही चीज तुम्हारे भविष्य को बरबाद कर रही है, जबकि आज तुम जो पीड़ा सहते हो वही चीज तुम्हारी सुरक्षा कर रही है। तुम्हें इन चीजों का स्पष्ट रूप से पता होना चाहिए ताकि तुम उन प्रलोभनों का शिकार बनाने से बच सको जिनसे बाहर निकलने में तुम्हें बहुत मुश्किल होगी और ताकि तुम घने कोहरे में गलती से घुसने और सूर्य को न खोज पाने से बच सको। जब घना कोहरा छँटेगा, तुम अपने आपको महान दिन के न्याय के मध्य पाओगे।

—वचन, खंड 1, परमेश्वर का प्रकटन और कार्य, सुसमाचार को फैलाने का कार्य मनुष्य को बचाने का कार्य भी है

परमेश्वर के वचनों ने मुझे प्रेरित किया और मुझे साहस और अभ्यास का मार्ग दिया। मैं सिर्फ इसलिए अपने पति के साथ दूसरी जगह काम करने नहीं जा सकती थी क्योंकि मुझे अपने बेटे की चिंता थी और अपनी देह को लेकर सरोकार था, क्योंकि अगर मैं ऐसा करती, तो मैं न तो सभा कर पाती और न ही अपना कर्तव्य निभा पाती, मैं परमेश्वर से दूर हो जाती और बचाए जाने का अवसर खो देती। अगर मैं ऐसा करती, तो मुझे बाद में पछतावा होता। हर किसी का भाग्य परमेश्वर की संप्रभुता के अधीन है और मेरे बेटे का भाग्य भी। वह जो जीवन जिएगा और जो कष्ट सहेगा, वे पहले से ही परमेश्वर द्वारा पूर्वनियत हैं और मेरी चिंताएँ और फिक्र अनावश्यक थीं। अगर मैं उसके साथ होती, तो भी कष्ट के समय मैं उसकी मदद नहीं कर पाती। मैंने यह भी सोचा कि कैसे मेरे जीवन का भविष्य परमेश्वर के हाथों में है; इसका अनुभव करने के लिए मुझे परमेश्वर पर निर्भर रहना था और मुझे उसकी संप्रभुता और व्यवस्थाओं के प्रति समर्पण करना था।

फरवरी 2014 तक, मैंने फिर से कलीसिया में अपना कर्तव्य निभाना शुरू कर दिया था। एक दिन, मेरे पति ने मुझसे अपने साथ यात्रा पर चलने के लिए कहा, लेकिन मैंने इनकार कर दिया और उसने कहा, “अगर तुम मेरे साथ नहीं चलोगी, तो यह घर अब तुम्हारा नहीं रहेगा और गाड़ी में बैठने वाली औरत भी तुम नहीं होगी।” उसका मतलब मुझे तलाक देना था। मेरा दिल टूट गया था, मैं गुस्से से भरी हुई थी और मैं जानती थी कि अब मेरे लिए कोई विकल्प चुनने का समय आ गया है। लेकिन जब मैंने अपने घर की हर चीज उसे देने के बारे में सोचा, तो मैं थोड़ी-सी हिचक रही थी, इसलिए मैंने परमेश्वर से प्रार्थना की,विनती की कि वह मेरा मार्गदर्शन करे। ठीक उसी समय, परमेश्वर के नवीनतम वचन जारी हुए। मैंने परमेश्वर के ये वचन पढ़े और अभ्यास का मार्ग प्राप्त किया। सर्वशक्तिमान परमेश्वर कहता है : “अगर तुम परमेश्वर में विश्वास करना चाहते हो और अगर तुम परमेश्वर को प्राप्त करना चाहते हो और उसकी संतुष्टि हासिल करना चाहते हो, तो जब तक तुम एक निश्चित मात्रा में कष्ट सहन नहीं करते और एक निश्चित मात्रा में प्रयास नहीं करते, तब तक तुम ये चीजें प्राप्त करने में समर्थ नहीं होगे। तुम लोगों ने बहुत उपदेश सुना है, लेकिन सिर्फ उसे सुनने का यह मतलब नहीं कि वह उपदेश तुम्हारा है; तुम्हें उसे आत्मसात करना चाहिए और ऐसी वस्तु में रूपांतरित करना चाहिए, जो तुम्हारी हो। तुम्हें उसे अपने जीवन में आत्मसात करना होगा, और अपने अस्तित्व में लाना होगा, तुम्हें इन वचनों और उपदेश को अपनी जीवन-शैली का मार्गदर्शन करने देना होगा, और अपने जीवन में अस्तित्वगत मूल्य और अर्थ लाने देना होगा। जब ऐसा होगा, तब तुम्हारा इन वचनों को सुनना सार्थक हो जाएगा। अगर मेरे द्वारा बोले गए वचन तुम्हारे जीवन में कोई सुधार नहीं लाते या तुम्हारे अस्तित्व में कोई मूल्य नहीं जोड़ते, तो तुम्हारा इन्हें सुनना कोई अर्थ नहीं रखता। तुम लोग इसे समझते हो, है न? इसे समझने के बाद, आगे क्या होता है, यह तुम लोगों पर है। तुम लोगों को काम में लग जाना चाहिए! तुम्हें सभी बातों में ईमानदार होना चाहिए! भ्रम में मत रहो; समय तेजी से गुजर रहा है! तुम लोगों में से अधिकतर लोग पहले ही दस साल से भी ज्यादा समय से परमेश्वर में विश्वास करते आ रहे हैं। इन पिछले दस सालों को मुड़कर देखो : तुम लोगों ने कितना पाया है? और इस जीवन के और कितने दशक तुम्हारे पास बचे हैं? तुम्हारे पास ज्यादा समय नहीं बचा है। इस बारे में भूल जाओ कि परमेश्वर का कार्य तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है या नहीं, उसने तुम्हारे लिए कोई अवसर छोड़ा है या नहीं, या वह वही कार्य पुनः करेगा या नहीं—इन चीजों के बारे में बात मत करो। क्या तुम अपने जीवन के पिछले दस वर्षों का समय पलट सकते हो? हर गुजरते दिन और तुम्हारे द्वारा उठाए गए हर कदम के साथ तुम्हारे पास एक दिन कम हो जाता है। समय किसी की प्रतीक्षा नहीं करता! तुम्हें परमेश्वर में अपनी आस्था को भोजन, कपड़ों या किसी भी चीज से ज्यादा महत्व की चीज की तरह, जीवन के सबसे महत्वपूर्ण मामले के रूप में लेना चाहिए, इसी तरह से तुम्हें परिणाम मिलेंगे। अगर तुम केवल तभी विश्वास करते हो जब तुम्हारे पास समय होता है, और अपनी आस्था के प्रति अपना पूरा ध्यान समर्पित करने में असमर्थ रहते हो, और अगर तुम हमेशा अपनी आस्था में भ्रमित रहते हो, तो तुम्हें कुछ भी प्राप्त नहीं होगा(वचन, खंड 2, परमेश्वर को जानने के बारे में, स्वयं परमेश्वर, जो अद्वितीय है X)। परमेश्वर के वचनों से, मैंने उनके अत्यावश्यक इरादे को महसूस किया। परमेश्वर आशा करता है कि हम शारीरिक सुखों को त्याग सकें, अपने दिल उसे दे सकें और सृजित प्राणियों के रूप में अपने कर्तव्यों को पूरा कर सकें। केवल तभी जीवन का अर्थ है। पीछे मुड़कर सोचती हूँ, तो भले ही मैं कई सालों से परमेश्वर में विश्वास रखती आई हूँ, पर मैं अपने पति के उत्पीड़न के कारण सामान्य रूप से सभाओं में भाग नहीं ले पाती थी या अपने कर्तव्य नहीं निभा पाती थी और भले ही मैं परमेश्वर के वचन खाती-पीती थी, पर मैं बस ऊपरी तौर पर यह सब करती थी और अपनी आस्था में गंभीर नहीं थी। मैंने परमेश्वर में विश्वास रखने को जीवन की सबसे महत्वपूर्ण चीज कभी भी नहीं माना और मैंने सत्य पाने के कई अवसर गँवा दिए। चूँकि मैं अभी भी जवान थी, मुझे सत्य का अनुसरण करने और सत्य पाने के लिए कीमती समय को संजोना था। अगर मैं पहले की तरह शरीर को संतुष्ट करने की कोशिश करती रही और उलझन में रहकर परमेश्वर में विश्वास करती रही, तो मेरे हाथ कुछ भी नहीं लगता। मैं एक साथ दो नावों पर पैर रखकर आगे नहीं बढ़ सकती थी, एक तरफ परिवार और शरीर को बनाए रखने की कोशिश करती और दूसरी तरफ सत्य और उद्धार भी पाना चाहती। मुझे परमेश्वर में विश्वास रखने को अनुसरण करने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज मानना होगा, क्योंकि केवल सत्य पाने से ही जीवन का अर्थ है। एक दिन, जब मैं एक सभा से लौटी, तो मेरे पति ने मुझसे पूछा, “क्या तुम परमेश्वर में विश्वास करती रहोगी? अगर हाँ, तो इस घर से निकल जाओ और कभी वापस मत आना! और यह सोचना भी मत कि तुम्हें हमारा बेटा या घर मिलेगा!” जब मैंने अपने पति को यह कहते सुना कि वह मुझे मेरा बेटा या घर नहीं देगा, तो ऐसा लगा मानो मेरा माँस काटा जा रहा हो; यह बहुत दर्दनाक था। मैंने चुपचाप परमेश्वर से प्रार्थना की और उससे मार्गदर्शन माँगा, ताकि मैं शैतान की चालों के झाँसे में न आऊँ। प्रार्थना करने के बाद मेरा दिल धीरे-धीरे शांत हो गया और मैंने शांति से अपने पति से कहा, “अगर तुम ऐसा महसूस करते हो, तो हमें तलाक ले लेना चाहिए और अपने-अपने रास्ते चले जाना चाहिए।” अगले दिन, हम तलाक की कार्यवाही के लिए नागरिक मामलों के ब्यूरो गए और जब मैं नागरिक मामलों के ब्यूरो से बाहर निकली, तो मैंने सचमुच मुक्त महसूस किया। मैं आखिरकार परमेश्वर में विश्वास रखने और अपने कर्तव्य निभाने के लिए आजाद थी।

इस अनुभव को याद करती हूँ तो जब मैं पीड़ा और दुर्बलता में थी, परमेश्वर ने ही मुझे आस्था दी और उसके वचनों ने ही मुझे उन पीड़ा भरे दिनों में मार्गदर्शन दिया। मुझे महसूस हुआ कि परमेश्वर हमेशा मेरे साथ था और उसने मुझे कभी नहीं छोड़ा था, और परमेश्वर में मेरी आस्था भी बढ़ गई। यूँ तो मेरे पति के उत्पीड़न और सीसीपी के दुष्ट दानवों की यातना ने मुझे बहुत पीड़ा दी, लेकिन इससे गुजरने के बाद मैं अपने पति और सीसीपी के शैतानी सार को साफ-साफ देख पाई। मैं पहले की तरह भ्रमित, दुर्बल और सही-गलत में भेद न कर पाने वाली नहीं रही; परमेश्वर का अनुसरण करने का मेरा संकल्प और भी मजबूत हो गया, और मुझे लगा कि ऐसी पीड़ा सहना सार्थक था। ये ऐसी चीजें थीं जो मुझे एक आरामदायक माहौल में हासिल नहीं हो सकती थीं। परमेश्वर का धन्यवाद!

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